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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३१२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ३

३१२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ३


| णत्वं दर्शयति मनोमय इत्या- <br> दिना ज्यायानेभ्यो लोकेभ्य <br> इत्यन्तेन ॥ ३ ॥ | यहाँसे लेकर 'ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः' <br> यहाँतकके ग्रन्थद्वारा उसका अनन्त- <br> परिमाणत्व प्रदर्शित करती है ॥३॥ |


हृदयस्थित ब्रह्म और परब्रह्मकी एकता

सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिद-
मभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्मान्तर्हृदय एतद्ब्रह्मै-
तमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मीति यस्य स्यादद्धा न विच-
कित्सास्तोति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः ॥ ४ ॥

जो सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस सबको सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाक्रहित और सम्भ्रमशून्य है वह मेरा आत्मा हृदयकमलके मध्यमें स्थित है। यही ब्रह्म है, इस शरीरसे मरकर जानेपर मैं इसीको प्राप्त होऊँगा। ऐसा जिसका निश्चय है और जिसे इस विषयमें कोई संदेह भी नहीं है [उसे ईश्वरभावकी ही प्राप्ति होती है] ऐसा शाण्डिल्यने कहा है, शाण्डिल्यने कहा है ॥ ४ ॥

| यथोक्तगुणलक्षण ईश्वरोऽत्रोपास्यत्वेन ध्येयो न तु तद्गुण- <br><br> (सगुणब्रह्माभिप्रेतं न निर्गुणमिति स्थापनम्) <br><br> विशिष्ट एव। यथा राजपुरुषमानय चित्रगुं वेत्युक्ते न विशेषणस्याप्यानयने व्याप्रियते तद्वदिहापि प्राप्तमतस्तन्निवृत्त्यर्थं सर्वकर्मेत्यादि | पूर्वोक्त गुणोंसे लक्षित होनेवाले ईश्वरका ही ध्यान करना चाहिये, उन गुणोंसे युक्तका नहीं; जिस प्रकार 'राजपुरुषको अथवा चित्रगुको¹ लाओ' ऐसा कहे जानेपर उनके विशेषण (राजा अथवा चित्र-विचित्र गाय) को लानेकी चेष्टा नहीं की जाती उसी प्रकार यहाँ भी निर्गुण ब्रह्म ही [उपास्यरूपसे] प्राप्त होता था; अतः उसकी निवृत्तिके लिये 'सर्व- |


१. जिसकी गाय चित्र-विचित्र रंगकी हो उसे 'चित्रगु' कहते हैं।

खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१३


संस्कृतहिन्दी
पुनर्वचनम् । तस्मान्मनोमयत्वादिगुणविशिष्ट एवेश्वरो ध्येयः ।कर्म' इत्यादि विशेषणोंको पुनः कहा गया है। इसलिये मनोमयत्वादि गुणोंसे युक्त ईश्वरका ही ध्यान करना चाहिये ।
अत एव षष्ठसप्तमयोरिव "तत्त्वमसि" (छा० उ० ६।८।१६) "आत्मैवेदं सर्वम्" (छा० उ० ७।२५।२) इति नेह स्वाराज्येऽभिषिञ्चति, एष म आत्मेतद्ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मीति लिङ्गात्; न त्वात्मशब्देन प्रत्यगात्मैवोच्यते, ममेति षष्ठ्याः संबन्धार्थप्रत्यायकत्वात्, एतम् अभिसंभवितास्मीति च कर्मकर्तृत्वनिर्देशात् ।इसी छठे और सातवें अध्यायोंमें श्रुतिने जिस प्रकार "तत्त्वमसि" [तू वह है] और "आत्मैवेदं सर्वम्" [ यह सब आत्मा ही है ] इन वाक्योंद्वारा साधकको स्वाराज्यपर अभिषिक्त किया है उस प्रकार वह यहाँ नहीं करती; 'यह मेरा आत्मा है' 'यह ब्रह्म है' 'मैं यहाँसे मरकर जानेपर इसे प्राप्त होऊँगा' इत्यादि वाक्य इस विषयमें लिङ्ग हैं । यहाँ 'आत्मा' शब्दसे प्रत्यगात्माका ही निरूपण नहीं किया जाता, क्योंकि 'मम' यह षष्ठी उसके सम्बन्धार्थकी प्रतीति करानेवाली है । तथा 'मैं इसे प्राप्त होऊँगा' इन शब्दोंद्वारा ब्रह्म और आत्माके कर्मत्व और कर्तृत्वका निर्देश किया गया है ।
ननु षष्ठेऽप्यथ संपत्स्य इति <br> पूर्वपक्षिण आक्षेपः सत्संपत्तेः कालान्तरितत्वं दर्शयति ।पूर्व०-किंतु छठे अध्यायमें भी 'अथ संपत्स्ये' [ देहत्यागके अनन्तर सत्स्वरूप हो जाऊँगा ] इस वचनसे श्रुतिने सत्स्वरूप होनेमें कालका व्यवधान तो दिखाया ही है ।

३१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३१४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| [उक्ताक्षेप-निरासः] <br> न, आरब्धसंस्कारशेषस्थित्यर्थपरत्वात्, न कालान्तरितार्थता; अन्यथा तत्त्वमसीत्येतस्यार्थस्य बाधप्रसङ्गात् । यद्यप्यात्मशब्दस्य प्रत्यगर्थत्वं सर्वं खल्विदं ब्रह्मेति च प्रकृतम्, एष म आत्मान्तर्हृदय एतद्ब्रह्मेत्युच्यते; तथाप्यन्तर्धानमीषदपरित्यज्यैवैतमात्मानमितोऽस्माच्छरीरात्प्रेत्याभिसंभवितास्मीत्युक्तम् । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यह वचन प्रारब्धकर्म-जनित संस्कारोंकी समाप्तिपर्यन्त ही जीवकी स्थिति बतलानेके लिये है, इसका तात्पर्य कालका व्यवधान प्रदर्शित करनेमें नहीं है; नहीं तो 'तू वह है' इस वाक्यके अर्थके बाध होनेका प्रसङ्ग उपस्थित होगा*। यद्यपि यहाँ 'आत्मा' शब्द प्रत्यगात्माका बोधक है, और 'यह सब निश्चय ब्रह्म ही है' इस वाक्यसे ब्रह्मका भी प्रकरण है तथा 'यह मेरा आत्मा हृदयके भीतर है—यह ब्रह्म है' ऐसा भी कहा गया है; तथापि 'थोड़ा-सा भी व्यवधान न छोड़कर मैं मरनेपर इस शरीरसे जाकर इसे प्राप्त होऊँगा'—ऐसा साधकका निश्चय बताया गया है। | | यथाक्रतुरूपस्यात्मनः प्रतिपत्तास्मीति यस्यैवंविदः स्याद्ध्वेदद्धा सत्यमेवं स्यामहं प्रेत्यैवं न | इस प्रकार जाननेवाले जिस विद्वान्को 'मैं अपने निश्चयके अनुरूप सगुण परमात्माको प्राप्त होनेवाला हूँ, मैं अवश्य. वैसा ही हो |


* इसमें ब्रह्म और आत्माके अभेदका वर्तमानकालिक क्रियापदसे प्रतिपादन किया गया है; अतः कालभेद स्वीकार करनेसे इसके अभिप्रायसे विरोध उपस्थित होगा ।

खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१५


| स्यामिति न च विचिकित्सास्ति, इत्येतस्मिन्नर्थे क्रतुफलसंबन्धे; स तथैवेश्वरभावं प्रतिपद्यते विद्वानित्येतदाह स्मोक्तवान्किल शाण्डिल्यो नामर्षिः । द्विरभ्यास आदरार्थः ॥ ४ ॥ | जाऊँगा' ऐसा निश्चय है; और जिसे 'मैं ऐसा नहीं होऊँगा' ऐसी अपने निश्चयके फलके सम्बन्धमें शङ्का नहीं है, वह विद्वान् उसी प्रकार ईश्वर-भावको प्राप्त हो जाता है—ऐसा शाण्डिल्य नामक ऋषिने कहा है । 'शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः' यह द्विरुक्ति आदरके लिये है ॥ ४ ॥ |


—: ० :—

इतिच्छाान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥

पञ्चदश खण्ड

—: ० :—

विराट्कोशोपासना

| 'अस्य कुले वीरो जायते'<br><br>इत्युक्तम् । न वीरजन्ममात्रं<br><br>पितुस्त्राणाय; “तस्मात्पुत्रमनुशिष्टं<br><br>लोक्यमाहुः” इति श्रुत्यन्तरात् ।<br><br>अतस्तद्दीर्घायुष्ट्वं कथं स्यादित्येव-<br><br>मर्थं कोशविज्ञानारम्भः । अभ्य-<br><br>र्हितविज्ञानव्यासङ्गादनन्तरमेव<br><br>नोक्तं तदिदानीमेवारभ्यते— | 'इसके कुलमें वीर पुत्र होता है'—ऐसा ( ३ । १३ । ६ में ) कहा गया है । किंतु वीर पुत्रका जन्ममात्र ही पिताकी रक्षाका कारण नहीं हो सकता; जैसा कि “अतः अनुशासित पुत्रको [ ब्राह्मणलोग ] लोक्य [ पुण्यलोक प्राप्त करानेवाला ] कहते हैं” इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। अतः उसे दीर्घायुष्ट्वकी प्राप्ति कैसे हो सकती है—इसीके लिये कोशविज्ञानका आरम्भ किया जाता है । अभ्यर्हित* उपासनाके प्रतिपादनमें संलग्न रहनेके कारण 'वीरो जायते' इस श्रुतिके अनन्तर ही इसका वर्णन नहीं किया, इसलिये अब आरम्भ किया जाता है— |


* गायत्रीरूप उपाधिसे युक्त ब्रह्मकी उपासनाको कौक्षेय ज्योतिमें आरोपित करके परब्रह्मकी उपासना करना अभ्यर्हित है और उसकी मनोमयत्वादिगुणविशिष्ट ब्रह्मोपासना अन्तरङ्ग है ।

खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१७


अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुध्नो न जीर्यति दिशो
ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलꣳ स एष कोशो वसुधा-
नस्तस्मिन्विश्वमिदꣳ श्रितम् ॥ १ ॥

अन्तरिक्ष जिसका उदर है वह कोश पृथिवीरूप मूलवाला है। वह जीर्ण नहीं होता। दिशाएँ इसके कोण हैं, आकाश ऊपरका छिद्र है वह यह कोश वसुधान है। उसीमें यह सारा विश्व स्थित है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अन्तरिक्षमुदरमन्तः सुषिरं यस्य सोऽयमन्तरिक्षोदरः, कोशः कोश इवानेकधर्मसादृश्यात्कोशः स च भूमिबुध्नः, भूमिर्बुध्नो मूलं यस्य स भूमिबुध्नः, न जीर्यति न विनश्यति, त्रैलोक्यात्मकत्वात् । सहस्रयुगकालावस्थायी हि सः ।अन्तरिक्ष है उदर—अन्तःछिद्र जिसका वह यह अन्तरिक्षोदर कोश जो अनेक धर्मोंमें सादृश्य रखनेके कारण कोशके समान कोश है, वह भूमिबुध्न–भूमि है बुध्न–मूल जिसका ऐसा भूमिबुध्न (पृथ्वीमूलक) है, वह त्रैलोक्यरूप होनेके कारण जीर्ण नहीं होता अर्थात् नाशको प्राप्त नहीं होता। क्योंकि वह तो सहस्रयुगकालपर्यन्त रहनेवाला है।
दिशो ह्यस्य सर्वाः स्रक्तयः कोणाः । द्यौरस्य कोशस्योत्तरमूर्ध्वं बिलम्, स एष यथोक्तगुणः कोशो वसुधानः, वसु धीयतेऽस्मिन्प्राणिनां कर्मफलाख्यमतो वसुधानः । तस्मिन्नन्तर्विश्वं समस्तं प्राणिकर्मफलं सहसमस्त दिशाएँ ही इसकी स्रक्तियाँ अर्थात् कोण हैं। द्युलोक इस कोशका ऊपरी छिद्र है। वह यह पूर्वोक्त गुणोंवाला कोश वसुधान है, इसमें प्राणियोंके कर्मफलसंज्ञक वसुका आधान किया जाता है, इसलिये यह कोश वसुधान है। तात्पर्य यह है कि उस कोशके भीतर ही प्राणियोंका सम्पूर्ण कर्मफल जिसका कि]

३१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३१८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| तत्साधनैरिदं यद्गृह्यते प्रत्यक्षादि प्रमाणैः श्रितमाश्रितं स्थितमित्यर्थः ॥ १ ॥ | प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे ग्रहण किया जाता है, अपने साधनोंके सहित श्रित—आश्रित अर्थात् स्थित है ॥ १ ॥ |

—: ० :—

तस्य प्राची दिग्जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञीनाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदँरोदिति सोऽहमेतमेवं वायुंदिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदँरुदम्॥२॥

उस कोशकी पूर्व दिशा 'जुहू' नामवाली है, दक्षिण दिशा 'सहमाना' नामकी है, पश्चिम दिशा 'राज्ञी' नामवाली है तथा उत्तर दिशा 'सुभूता' नामकी है। उन दिशाओंका वायु वत्स है। वह, जो इस प्रकार इस वायुको दिशाओंके वत्सरूपसे जानता है पुत्रके निमित्तसे रोदन नहीं करता। वह मैं इस प्रकार इस वायुको दिशाओंके वत्सरूपसे जानता हूँ; अतः मैं पुत्रके कारण न रोऊँ ॥ २ ॥

| तस्यास्य प्राची दिक्प्राग्गतो भागो जुहूर्नाम जुह्वत्यस्यां दिशि कर्मिणः प्राङ्मुखाः सन्त इति जुहूर्नाम। सहमाना नाम सहन्तेऽस्यां पापकर्मफलानि यमपुर्यां प्राणिन इति सहमाना नाम दक्षिणा दिक्। तथा राज्ञी नाम प्रतीची पश्चिमा दिक्, | उस इस कोशकी प्राची दिशा—पूर्वकी ओरका भाग, 'जुहू' नामवाला है। कर्मठ लोग इस दिशामें पूर्वाभिमुख होकर हवन करते हैं इसलिये यह 'जुहू' नामवाली है। दक्षिण दिशा 'सहमाना' नामकी है, क्योंकि इसी दिशामें जीव यमपुरीमें अपने पापकर्मोंके फलरूप दुःखको सहन करते हैं, इसलिये दक्षिण दिशा 'सहमाना' नामवाली है। तथा प्रतीची यानी पश्चिम दिशा 'राज्ञी' नामकी है; वरुण राजासे |

खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१९


भाष्यम्भाष्यार्थ
राज्ञी राज्ञा वरुणेनाधिष्ठिता संध्यारागयोगाद्वा। सुभूता नाम भूतिमद्भििरीश्वरकुबेरादिभिरधिष्ठितत्वात्सुभूता नामोदीची।<br><br>तासां दिशां वायुर्वत्सो दिग्जत्वाद्वायोः, पुरोवात इत्यादिदर्शनात्। यः कश्चित्पुत्रदीर्घजीविताथ्र्येवं यथोक्तगुणं वायुं दिशां वत्सममृतं वेद, स न पुत्ररोदं पुत्रनिमित्तं रोदनं न रोदिति पुत्रो न म्रियत इत्यर्थः।<br><br>यत एवं विशिष्टं कोशादिग्वत्सविषयं विज्ञानमतः सोऽहं पुत्रजीविताथ्र्यैवमेतं वायुं दिशां वत्सं वेद जाने। अतो मा पुत्ररोदं मा रुदं पुत्रमरणनिमित्तम्। पुत्ररोदो मम माभूदित्यर्थः॥२॥अधिष्ठित होनेके कारण अथवा सायंकालिक राग (लालिमा) के योगसे पश्चिम दिशा 'राज्ञी' है। उत्तर दिशा 'सुभूता' नामवाली है। ईश्वर, कुबेर आदि भूतिसम्पन्न देवताओंसे अधिष्ठित होनेके कारण उत्तर दिशा 'सुभूता' नामवाली है।<br><br>उन दिशाओंका वायु वत्स है, क्योंकि वायु दिशाओंसे ही उत्पन्न होनेवाला है। जैसा कि पूर्वीय वायु आदि प्रयोगोंसे देखा जाता है। वह कोई भी पुरुष, जो कि पुत्रके दीर्घजीवनकी कामनावाला है, यदि इस प्रकार पूर्वोक्त गुणवाले दिशाओंके वत्स अमृतरूप वायुको जानता है वह पुत्ररोद—पुत्रनिमित्तक रोदन नहीं करता। अर्थात् उसका पुत्र नहीं मरता, क्योंकि कोश और दिशाओंके वत्ससे सम्बन्ध रखनेवाला विज्ञान ऐसे गुणवाला है अतः अपने पुत्रके जीवनकी कामनावाला मैं दिशाओंके वत्सरूप इस वायुको इस प्रकार जानता हूँ; इसलिये पुत्ररोद—पुत्रके मरणसे होनेवाला रोदन न करूँ। अर्थात् मुझे पुत्रके लिये रोनेका प्रसङ्ग प्राप्त न हो॥ २ ॥

३२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३२०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

अरिष्टं कोशं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना प्राणं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना भूः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना भुवः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना स्वः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना ॥ ३ ॥

मैं अमुक अमुक अमुकके सहित अविनाशी कोशकी शरण हूँ; अमुक अमुक अमुकके सहित प्राणकी शरण हूँ; अमुक अमुक अमुकके सहित भूःकी शरण हूँ; अमुक-अमुक अमुकके सहित भुवःकी शरण हूँ; अमुक अमुक अमुकके सहित स्वःकी शरण हूँ* ॥ ३ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अरिष्टमविनाशिनं कोशं यथोक्तं प्रपद्ये प्रपन्नोऽस्मि पुत्रायुषे । अमुनाऽमुनाऽमुनेति त्रिर्नाम गृह्णाति पुत्रस्य । तथा प्राणं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना, भूःप्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना, भुवःप्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना, स्वः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना, सर्वत्र प्रपद्य इति त्रिर्नाम गृह्णाति पुनः पुनः ॥ ३ ॥पुत्रकी दीर्घायुके लिये मैं पूर्वोक्त अरिष्ट—अविनाशी कोशकी शरण हूँ। 'अमुना अमुना अमुना' इसका यह तात्पर्य है कि तीन-तीन बार अपने पुत्रका नाम लेता है। तथा अमुक अमुक अमुकके सहित प्राणकी शरण हूँ; अमुक अमुक अमुकके सहित भूःकी शरण हूँ; अमुक अमुक अमुकके सहित भुवःकी शरण हूँ और अमुक अमुक अमुकके सहित स्वःकी शरण हूँ। सर्वत्र 'अमुक अमुक अमुकके सहित शरण हूँ' ऐसा कहकर बारम्बार तीन-तीन बार पुत्रका नाम लेता है ॥ ३ ॥

स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति प्राणो वा इदꣳसर्वं भूतं यदिदं किञ्च तमेव तत्प्रापत्सि ॥४॥ अथ यदवोचं


* इसमें जहाँ-जहाँ 'अमुक' शब्द आया है वहाँ अपने पुत्रके नामका उच्चारण करना चाहिये।

खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२१

भूः प्रपद्य इति पृथिवीं प्रपद्ये ऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ५ ॥ अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्यग्निं प्रपद्ये वायुं प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तद्वोचम् ॥ ६ ॥ अथ यदवोचँस्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य इत्येव तदवोचं तदवोचम् ॥ ७ ॥

उस मैंने जो कहा कि 'मैं प्राणकी शरण हूँ' सो यह जो कुछ सम्पूर्ण भूतसमुदाय है प्राण ही है, उसीकी मैं शरण हूँ ॥ ४ ॥ तथा मैंने जो कहा कि 'मैं भूःकी शरण हूँ' इससे मैंने यही कहा है कि 'मैं पृथिवीकी शरण हूँ, अन्तरिक्षकी शरण हूँ और द्युलोककी शरण हूँ' ॥ ५ ॥ फिर मैंने जो कहा कि 'मैं भुवःकी शरण हूँ' इससे यह कहा गया है कि 'मैं अग्निकी शरण हूँ, वायुकी शरण हूँ और आदित्यकी शरण हूँ' ॥ ६ ॥ तथा मैंने जो कहा कि 'मैं स्वःकी शरण हूँ' इससे 'मैं ऋग्वेदकी शरण हूँ, यजुर्वेदकी शरण हूँ और सामवेदकी शरण हूँ' यही मैंने कहा है, यही मैंने कहा है ॥ ७ ॥

| स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति व्याख्यानार्थमुपन्यासः । प्राणो वा इदँसर्वं भूतं यदिदं जगत् । ‘यथा वारा नाभौ’ ( छा० उ० ७ । १५ । १ ) इति वक्ष्यति । अतस्तमेव सर्वं तत्त्वेन प्राणप्रतिपादनेन प्रापत्तिं प्रपन्नोऽभूवम् । तथा भूः प्रपद्य इति त्रीँल्लोकान् | 'उस मैंने जो कहा कि मैं प्राणकी शरण हूँ' इसीकी व्याख्या करनेके लिये विस्तार किया जाता है। यह जितना भी जगत् है सब प्राण ही है, 'जैसे कि नाभिमें अरे लगे रहते हैं [ उस प्रकार प्राणमें सम्पूर्ण भूत समर्पित हैं]' ऐसा आगे कहेंगे भी। अतः उस प्राणकी प्रतिपत्तिके द्वारा मैं उस सर्वभूत [विराट्] की ही शरण हूँ। मैंने जो यह कहा कि 'मैं भूः- |

३२२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ३

३२२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ३


| भूरादीन्प्रपद्य इति तदवोचम् ।<br><br>अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्य-<br><br>ग्न्यादीन्प्रपद्य इति तदवोचम् ।<br><br>अथ यदवोचं स्वः प्रपद्य इत्यृ-<br><br>ग्वेदादीन्प्रपद्य इत्येव तदवोच-<br><br>मिति । उपरिष्टान्मन्त्राञ्जपेत्ततः<br><br>पूर्वोक्तमजरं कोशं सदिग्वत्सं<br><br>यथावद्ध्यात्वा । द्विर्वचनमादरा-<br><br>र्थम् ॥ ४-७ ॥ | की शरण हूँ' उससे यही कहा गया कि मैं पृथिवी आदि तीन लोकोंकी शरण हूँ । तथा मैंने जो कहा कि 'मैं भुवःकी शरण हूँ' उससे यही कहा गया है कि मैं अग्नि आदिकी शरण हूँ । और ऐसा जो कहा है कि 'मैं स्वःकी शरण हूँ' इससे यही कहा गया है कि मैं ऋग्वेदादिकी शरण हूँ । तत्पश्चात् उपर्युक्त अजर कोशका दिशाओंके वत्सके सहित विधिपूर्वक ध्यान कर ऊपरके मन्त्रों-को जपे । 'तदवोचं तदवोचम्' यह द्विरुक्ति आदरके लिये है ॥४-७॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥

षोडश खण्ड

—: ० :—
आत्मयज्ञोपासना

पुत्रायुष उपासनमुक्तं जपञ्च ।<br>अथेदानीमात्मनो दीर्घजीवना-<br>येदमुपासनं जपं च विदधदाह ।<br>जीवन्हि स्वयं पुत्रादिफलेन<br>युज्यते, नान्यथा । इत्यत आ-<br>त्मानं यज्ञं संपादयति पुरुषः—पुत्रकी आयुके लिये उपासना<br>और जप कहे गये । अब अपनी<br>दीर्घायुके लिये इस जप और<br>उपासनाका विधान करता हुआ<br>वेद कहता है। पुरुष स्वयं जीवित<br>रहनेपर ही पुत्रादि फलसे युक्त<br>होता है, और किसी प्रकार नहीं;<br>इसीसे वह अपनेको यज्ञरूपसे<br>निष्पन्न करता है—

पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विंशतिवर्षाणि तत्प्रातःसवनं चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीदँसर्वं वासयन्ति ॥ १ ॥

निश्चय पुरुष ही यज्ञ है। उसके (उसकी आयुके) जो चौबीस वर्ष हैं, वे प्रातः सवन हैं। गायत्री चौबीस अक्षरोंवाली है; और प्रातःसवन गायत्री छन्दसे सम्बद्ध है। उस इस प्रातःसवनके वसुगण अनुगत हैं। प्राण ही वसु हैं, क्योंकि ये ही इस सबको बसाये हुए हैं ॥ १ ॥

पुरुषो जीवनविशिष्टः कार्य-<br>करणसंघातो यथाप्रसिद्ध एव ।<br>वावशव्दोऽवधारणार्थः । पुरुषजीवनसे युक्त देह और इन्द्रियोंका<br>संघात, जैसा कि प्रसिद्ध है, वही<br>‘पुरुष’ है। ‘वाव’ शब्द निश्चयार्थक<br>है। अतः तात्पर्य यह है कि पुरुष

छा० उ० ११—

३९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
एव यज्ञ इत्यर्थः । तथा हि सामान्यैः संपादयति यज्ञत्वम् । कथम् ? तस्य पुरुषस्य यानि चतुर्विंशतिवर्षाण्यायुषस्तत्प्रातःसवनं पुरुषाख्यस्य यज्ञस्य ।ही यज्ञ है । अब श्रुति सदृशता दिखलाकर पुरुषकी यज्ञरूपता सिद्ध करती है । किस प्रकार ? (सो बतलाते हैं—) उस पुरुषकी आयुके जो चौबीस वर्ष हैं, वे उस पुरुषसंज्ञक यज्ञके प्रातःसवन हैं ।
केन सामान्येन ? इत्याह—चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री छन्दो गायत्रं गायत्रीछन्दस्कं हि विधियज्ञस्य प्रातःसवनम् । अतः प्रातःसवनसंपन्नेन चतुर्विंशतिवर्षायुषा युक्तः पुरुषः अतो विधियज्ञसादृश्याद्यज्ञः । तथोत्तरयोरप्यायुषोः सवनद्वयसंपत्तिस्त्रिष्टुब्जगत्यक्षरसंख्यासामान्यतो वाच्या ।वे किस समताके कारण प्रातःसवन हैं ? सो बतलाते हैं—गायत्री छन्द चौबीस अक्षरोंवाला है और विधियज्ञका प्रातःसवन भी गायत्र—गायत्रीछन्दवाला है । अतः पुरुष प्रातःसवनरूपसे निष्पन्न हुई चौबीस वर्षकी आयुसे युक्त है । इसीसे विधियज्ञसे सदृशता होनेके कारण वह यज्ञ है । इसी प्रकार पीछेकी दोनों आयुओंसे त्रिष्टुप् और जगती छन्दके अक्षरोंकी संख्यामें समानता होनेके कारण उनके द्वारा अन्य दोनों सवनोंकी निष्पत्ति बतलानी चाहिये ।
किं च तदस्य पुरुषयज्ञस्य प्रातःसवनं विधियज्ञस्येव वसवो देवा अन्वायत्ता अनुगताः, सवनदेवतात्वेन स्वामिन इत्यर्थः। पुरुषयज्ञेऽपि विधियज्ञ इवाग्न्यादयो वसवो देवाः प्राणा इत्यतोतथा विधियज्ञके समान इस पुरुषयज्ञके प्रातःसवनके भी वसु देवता अनुगत हैं । तात्पर्य यह है कि सवनदेवतारूपसे वे उसके स्वामी हैं । [इस कथनसे] विधियज्ञके समान पुरुषयज्ञमें भी अग्नि आदि ही वसुदेवता निश्चित होते हैं; अतः

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२५


| विशिनष्टि । प्राणा वाव वसवो वागादयो वायवश्च; ते हि यस्मादिदं पुरुषादिप्राणिजातमेते वासयन्ति । प्राणेषु हि देहे वसत्सु सर्वमिदं वसति, नान्यथा; इत्यतो वसनाद्वासनाच्च वसवः ॥१॥ | श्रुति उनकी विशेषता ( विभिन्नता ) बतलाती है । [ पुरुषयज्ञमें ] वाक् आदि इन्द्रियाँ और प्राण आदि वायु ही वसु हैं, क्योंकि वे ही इस पुरुष आदि प्राणिसमुदायको वासित किये हुए हैं । देहमें प्राणोंके रहते हुए ही यह सब बसा हुआ है, और किसी प्रकार नहीं; अतः देहमें बसने अथवा उसे बसानेके कारण प्राण वसु हैं ॥ १ ॥ |

<br>

तं चेदेतस्मिन्वयसि किञ्चिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा वसव इदं मे प्रातःसवनं माध्यन्दिनꣳसवनमनुसंतनु- तेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्यु- द्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ २ ॥

यदि इस प्रातःसवनसम्पन्न आयुमें उसे कोई रोग आदि कष्ट पहुँचावे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राणरूप वसुगण ! मेरे इस प्रातःसवनको माध्यन्दिनसवनके साथ एकरूप कर दो; यज्ञस्वरूप मैं आप प्राणरूप वसुओंके मध्यमें विलुप्त ( नष्ट ) न होऊँ' तब उस कष्टसे मुक्त होकर वह नीरोग हो जाता है ॥ २ ॥

| तं चेद्यज्ञसंपादिनमेतस्मिन्प्रातःसवनसंपन्ने वयसि किञ्चिद्गदाध्यादि मरणशङ्काकारणमुपतपेद्दुःखमुत्पादयेत्स तदा यज्ञसंपादी | उस यज्ञसम्पादकको यदि प्रातःसवनरूपसे निष्पन्न हुई इस आयुमें मरणकी शङ्काकी कारणभूत कोई व्याधि आदि कष्ट पहुँचावे तो वह यज्ञसम्पादन करनेवाला पुरुष |

३२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३२६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| पुरुष आत्मानं यज्ञं मन्यमानो ब्रूयाज्जपेदित्यर्थ इमं मन्त्रम्— | अपनेको यज्ञ मानते हुए कहे—अर्थात् इस मन्त्रको जपे— | | हे प्राणा वसव इदं मे प्रातःसवनं मम यज्ञस्य वर्तते तन्माध्यन्दिनं सवनमनुसंतनुतेति माध्यन्दिनेन सवनेनायुषा सहितमेकीभूतं संततं कुरुतेत्यर्थः । माहं यज्ञो युष्माकं प्राणानां वसूनां प्रातःसवनेशानां मध्ये विलोप्सीय विलुप्येय विच्छिद्येयेत्यर्थः । इतिशब्दो मन्त्रपरिसमाप्त्यर्थः । स तेन जपेन ध्यानेन च ततस्तस्मादुपतापादुदेत्युद्गच्छति । उद्गम्य विमुक्तः सन्नगदो ह्यनुपतापो भवत्येव ॥२॥ | 'हे प्राणरूप वसुगण ! यह मेरे यज्ञका प्रातःसवन विद्यमान है; इसे माध्यन्दिनसवनरूपसे अनुसंतत करो; अर्थात् इसे माध्यन्दिनसवनरूप मेरी आयुके साथ एकीभूत कर दो । यज्ञस्वरूप मैं प्रातःसवनके अधिष्ठाता आप प्राणरूप वसुओंके मध्यमें विलुप्त अर्थात्-विच्छिन्न न होऊँ । मूलमें 'इति' शब्द मन्त्रकी समाप्तिके लिये है । उस जप और ध्यानके द्वारा वह उस कष्टसे छूट जाता है और उससे छूटकर अगद—संताप-शून्य ही हो जाता है ॥ २ ॥ |

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अथ यानि चतुश्चत्वारिग्ंशद्वर्षाणि तन्माध्यन्दिनग्ंसवनं चतुश्चत्वारिग्ंशदक्षरा त्रिष्टुप्त्रैष्टुभं माध्यन्दिनग्ंसवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव रुद्रा एते हीदग्ंसर्वग्ंरोदयन्ति ॥३॥ तं चेदेतस्मिन्वयसि किञ्चिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा रुद्रा इदं मे माध्यन्दिनग्ंसवनं तृतीयसवनमनुसंतनुतेति माहं प्राणानाग्ंरुद्राणां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ ४ ॥

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्याथ ३२७

इसके पश्चात् जो चौवालीस वर्ष हैं, वे माध्यन्दिनसवन हैं। त्रिष्टुप् छन्द चौवालीस अक्षरोंवाला है और माध्यन्दिनसवन त्रिष्टुप् छन्दसे सम्बद्ध है। उस माध्यन्दिनसवनके रुद्रगण अनुगत हैं। प्राण ही रुद्र हैं, क्योंकि ये ही इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायको रुलाते हैं। यदि उस यज्ञकर्ताको इस आयुमें कोई [रोगादि] संतप्त करे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राणरूप रुद्रगण! मेरे इस मध्याह्नकालिक सवनको तृतीय सवनके साथ एकीभूत कर दो। यज्ञस्वरूप मैं प्राणरूप रुद्रोंके मध्यमें कभी विच्छिन्न (नष्ट) न होऊँ।' ऐसा कहनेसे वह उस कष्टसे छूट जाता है और नीरोग हो जाता है ॥ ३-४ ॥

| अथ यानि चतुश्चत्वारिंशद्व-<br><br>र्षाणीत्यादि समानम्। रुदन्ति<br><br>रोदयन्तीति प्राणा रुद्राः क्रूरा<br><br>हि ते मध्यमे वयस्यतो रुद्राः<br><br>॥ ३-४ ॥ | 'अथ यानि चतुश्चत्वारिंशद्वर्षाणि'<br>इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है।<br>रोते अथवा रुलाते हैं, इसलिये<br>प्राण 'रुद्र' हैं। वे (प्राण) मध्यम<br>आयुमें क्रूर होते हैं, इसलिये रुद्र<br>कहलाते हैं ॥ ३-४ ॥ |

अथ यान्यष्टाचत्वारिंशद्वर्षाणि तत्तृतीयसवन- मष्टाचत्वारिंशदक्षरा जगती जागतं तृतीयसवनं तदस्यादित्या अन्वायत्ताः प्राणा वावादित्या एते हीदꣳसर्वमाददते ॥ ५ ॥ तं चेदेतस्मिन्वयसि किञ्चि- दुपतपेत्स ब्रूयात् प्राणा आदित्या इदं मे तृतीयसवन- मायुरनुसंतनुतेति माहं प्राणानामादित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो हैव भवति ॥ ६ ॥

इसके पश्चात् जो अड़तालीस वर्ष हैं, वे तृतीय सवन हैं। जगती छन्द अड़तालीस अक्षरोंवाला है तथा तृतीय सवन जगती छन्दसे सम्बद्ध

३२८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३२८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

रखता है। इस सवनके आदित्यगण अनुगत हैं। प्राण ही आदित्य हैं, क्योंकि ये ही इस सम्पूर्ण शब्दादि विषयसमूहको ग्रहण करते हैं। उस उपासकको यदि इस आयुमें कोई [रोगादि] संतप्त करे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राणरूप आदित्यगण! मेरे इस तृतीय सवनको आयुके साथ एकीभूत कर दो। यज्ञस्वरूप मैं प्राणरूप आदित्योंके मध्यमें विनष्ट न होऊँ।' ऐसा कहनेसे वह उस कष्टसे मुक्त होकर नीरोग हो जाता है॥ ५-६॥

| तथादित्याः प्राणाः। ते हीदं शब्दादिजातमाददतेऽत आदित्याः। तृतीयसवनमायुः षोडशोत्तरवर्षशतं समापयतानुसंतनुत यज्ञं समापयतेत्यर्थः। समानमन्यत्॥ ५-६॥ | इसी प्रकार प्राण ही आदित्य हैं। वे इस शब्दादि विषयसमूहका आदान (ग्रहण) करते हैं, इसलिये आदित्य हैं। [हे प्राणरूप आदित्यगण!] तृतीयसवनको आयुरूपसे अनुसंतत करो अर्थात् एक सौ सोलह वर्ष तक पूर्ण करो यानी इस यज्ञको समाप्त करो। शेष सब पूर्ववत् है॥ ५-६॥ |

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| निश्चिता हि विद्या फलायेत्येतद्दर्शयन्नुदाहरति— | निश्चिता विद्या अवश्य फलवती होती है—इस बातको प्रदर्शित करती हुई श्रुति उदाहरण देती है— |

एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स किं म एतदुपतपसि योऽहमनेन न प्रेष्यामीति स ह षोडशं वर्षशतमजीवत्प्र ह षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद ॥ ७ ॥

इस प्रसिद्ध विद्याको जाननेवाले ऐतरेय महिदासने कहा था—'[अरे रोग!] तू मुझे क्यों कष्ट देता है, जो मैं कि इस रोगद्वारा

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२९


मृत्युको प्राप्त नहीं हो सकता।' वह एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहा था; जो इस प्रकार जानता है वह एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहता है ॥ ७ ॥

एतद्यज्ञदर्शनं ह स्म वै किल तद्विद्वानाह महिदासो नामतः, इतराया अपत्यमैतरेयः। किं कस्मान्मे ममैतदुपतपनमुपतपसि स त्वं हे रोग; योऽहं यज्ञोऽनेन त्वत्कृतेनोपतापेन न प्रेष्यामि न मरिष्याम्यतो वृथा तव श्रम इत्यर्थः। इत्येवमाह स्मेति पूर्वेण संबन्धः। स एवंनिश्चयः सन् षोडशं वर्षशतमजीवत्। अन्योऽप्येवंनिश्चयः षोडशं वर्षशतं प्रजीवति य एवं यथोक्तं यज्ञसंपादनं वेद जानाति, स इत्यर्थः ॥ ७ ॥इस प्रसिद्ध यज्ञदर्शनको जाननेवाले महिदासनामक इतराके पुत्र ऐतरेयने 'हे रोग ! तू मुझे यह संताप क्यों देता है ? जो यज्ञरूप मैं तेरे इस संतापसे मृत्युको प्राप्त नहीं होऊँगा—नहीं मरूँगा; तात्पर्य यह है कि इसलिये तेरा यह श्रम वृथा ही है—इस प्रकार कहा था—इसका पूर्वसे सम्बन्ध है। ऐसे निश्चयवाला होकर वह एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहा। ऐसे ही निश्चयवाला दूसरा पुरुष भी, जो इस प्रकार पूर्वोक्त यज्ञसम्पादनको जानता है, एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहता है ॥ ७ ॥

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥

सप्तदश खण्ड

अक्षयादि फल देनेवाली आत्मयज्ञोपासना

स यदशिशिषति यत्पिपासति यन्न रमते ता अस्य दीक्षाः ॥ १ ॥

वह [ पुरुष ] जो भोजन करनेकी इच्छा करता है, जो पीनेकी इच्छा करता है और जो रममाण ( प्रसन्न ) नहीं होता—वही इसकी दीक्षा है ॥ १ ॥

| स यदशिशिषतीत्यादियज्ञ-सामान्यनिर्देशः पुरुषस्य पूर्वेणैव संबध्यते । यदशिशिषत्यशितुमिच्छति, तथा पिपासति पातुमिच्छति, यन्न रमत इष्टाद्यप्राप्तिनिमित्तम्, यदेवंजातीयकं दुःखमनुभवति ता अस्य दीक्षाः, दुःखसामान्याद्विधियज्ञस्येव ।१। | 'वह जो भोजन करनेकी इच्छा करता है' इत्यादि पुरुषका यज्ञसे सादृश्यनिरूपण पूर्वग्रन्थसे ही सम्बन्ध रखता है । जो 'अशिशिषति'—खानेकी इच्छा करता है, तथा 'पिपासति' पीनेकी इच्छा करता है, तथा जो इष्ट पदार्थोंकी अप्राप्तिके कारण रममाण नहीं होता अर्थात् जो इस प्रकारके दुःखका अनुभव करता है, वह, दुःखमें सदृशता होनेके कारण विधियज्ञकी दीक्षाके समान, इसकी दीक्षा है॥१॥ |

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अथ यदश्नाति यत्पिबति यद्रमते तदुपसदैरेति ॥२॥

फिर वह जो खाता है, जो पीता है और जो रतिका अनुभव करता है—वह उपसदोंकी सदृशताको प्राप्त होता है ॥ २ ॥

खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३१


| अथ यदश्नाति यत्पिबति यद्रमते रतिं चानुभवतीष्टादि-संयोगात्तदुपसदैः समानतामेति। उपसदां च पयोव्रतत्वनिमित्तं सुखमस्ति। अल्पभोजनीयानि चाहान्यासन्नानीति प्रत्यासो-ऽतोऽशनादीनामुपसदां च सामान्यम् ॥ २ ॥ | फिर वह जो भोजन करता है, पीता है और इष्ट पदार्थादिके संयोग-से रतिका अनुभव करता है—वह सब उपसदोंकी समानताको प्राप्त होता है । उपसदोंको पयोव्रतत्व ( केवल दुग्धपान ) सम्बन्धी सुख प्राप्त होता है । जिन दिनोंमें स्वल्प आहार प्राप्त हो सकता है वे समीप ही हैं—यह देखकर यज्ञकर्ताको आश्वासन होता है। अतः भोजनादि-की उपसदोंसे सदृशता है ॥ २ ॥ |


अथ यद्धसति यज्जक्षति यन्मैथुनं चरति स्तुतशस्त्रैरेव तदेति ॥ ३ ॥

तथा वह जो हँसता है, जो भक्षण करता है और जो मैथुन करता है—वे सब स्तुत शस्त्रकी ही समानताको प्राप्त होते हैं ॥३॥

| अथ यद्धसति यज्जक्षति भक्षयति यन्मैथुनं चरति स्तुतशस्त्रैरेव तत्समानतामेति; शब्दवत्त्वसामान्यात् ॥ ३ ॥ | तथा वह जो हँसता है, जो भक्षण करता है और जो मैथुन करता है वह स्तुतशस्त्रकी समानताको प्राप्त होता है; क्योंकि शब्दयुक्त होनेमें उनमें समानता है ॥ ३ ॥ |


अथ यत्तपो दानमार्जवमहिꣳसा सत्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणाः ॥ ४ ॥

तथा जो तप, दान, आर्जव ( सरलता ), अहिंसा और सत्यवचन हैं, वे ही इसकी दक्षिणा हैं ॥ ४ ॥