भारतकोश
संग्रह पर लौटें

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थं [ ३५७


वात्थैनम् ? अननुरूपमस्मिन्, न युक्तमीदृशं वक्तुं रैक्व इवेत्यभिप्रायः। इतरश्चाह—यो नु कथं त्वयोच्यते सयुग्वा रैक्वः। इत्युक्तवन्तं भल्लाक्ष आह—शृणु यथा स रैक्वः॥ ३॥इसे बतला रहा है? यह कथन इसके अनुरूप नहीं है; अर्थात् 'यह रैक्वके समान है' ऐसा कहना उचित नहीं। इसपर दूसरेने कहा—'जिसके विषयमें तुम कह रहे हो वह गाड़ीवाला रैक्व कैसा है?' ऐसा कहनेवाले उस हंससे भल्लाक्ष बोला—'जैसा वह रैक्व है, सुन' ॥ ३ ॥

यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनꣳसर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्तत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥ ४ ॥

जिस प्रकार [द्यूतक्रीडामें] कृतनामक पासेके द्वारा जीतनेवाले पुरुषके अधीन उससे निम्न श्रेणीके सारे पासे हो जाते हैं उसी प्रकार प्रजा जो कुछ सत्कर्म करती है वह सब उस (रैक्व) को प्राप्त हो जाता है। जो बात वह रैक्व जानता है उसे जो कोई भी जानता है उसके विषयमें भी मैंने यह कह दिया ॥ ४ ॥

[रैक्वस्य महत्त्वम्]<br>यथा लोके कृतायः कृतो नामायो द्यूतसमये प्रसिद्धश्चतुरङ्कः, स यदा जयति द्यूते प्रवृत्तानां तस्मै विजिताय तदर्थमितरे त्रिद्व्येकाङ्का अधरेयास्त्रेताद्वापरकलिना-जिस प्रकार लोकमें द्यूतक्रीडाके समय जो चार अङ्कवाला कृत-नामक पासा प्रसिद्ध है, जब द्यूतमें प्रवृत्त हुए पुरुषोंका वह कृतनामक पासा जय प्राप्त करता है तो उसके द्वारा विजय प्राप्त करनेवालेको ही तीन, दो और एक अङ्कसे युक्त त्रेता, द्वापर और कलिनामक

३५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

३५८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

| मानः संयन्ति संगच्छन्तेऽन्त- | नीचेके पासे भी प्राप्त हो जाते हैं | | र्भवन्ति। चतुरङ्के कृताये त्रिव्ये- | अर्थात् उसके अधीन हो जाते हैं; | | काङ्कानां विद्यमानत्वात्तदन्तर्भ- | तात्पर्य यह है कि चार अङ्कसे युक्त | | वन्तीत्यर्थः। यथायं दृष्टान्तः, | कृतनामक पासेमें तीन, दो और | | एवमेनं रैक्वं कृतायस्थानीयं | एक अङ्कवाले पासे भी विद्यमान | | त्रेताद्ययस्थानीयं सर्वं तदभि- | रहनेके कारण वे भी उसके अन्तर्गत | | समेत्यन्तर्भवति रैक्वे। किं तत् ? | हो जाते हैं। जैसा यह दृष्टान्त है; | | यत्किञ्च लोके सर्वाः प्रजाः साधु | उसी प्रकार कृतस्थानीय इस रैक्व- | | शोभनं धर्मजातं कुर्वन्ति तत्सर्वं | को त्रेतादिस्थानीय वह सब प्राप्त हो | | रैक्वस्य धर्मेऽन्तर्भवति। तस्य | जाता है—सब उस रैक्वके अन्तर्गत | | च फले सर्वप्राणिधर्मफलमन्तर्भ- | हो जाता है। वह क्या है ? वह | | वतीत्यर्थः। | यह कि जो कुछ लोकमें प्रजा साधु | | तथान्योऽपि कश्चिद्यस्तद्वेद्यं | —शोभन यानी धर्मकार्य करती है | | वेद, किं तत् ? यद्वेद्यं स रैक्वो | सब-का-सब रैक्वके धर्ममें समा | | वेद तद्वेद्यमन्योऽपि यो वेद तमपि | जाता है। तात्पर्य यह है कि | | सर्वप्राणिधर्मजातं तत्फलं च | समस्त प्राणियोंके धर्मफल उसके | | रैक्वमिवाभिसमेतीत्यनुवर्तते। स | धर्मफलके अन्तर्गत हो जाते हैं। | | एवंभूतोऽरैक्वोऽपि मया विद्वानेत- | तथा दूसरा पुरुष भी, जो कोई | | | उस वेद्यको जानता है—वह वेद्य | | | क्या है ? जिसे कि वह रैक्व | | | जानता है उस वेद्यको दूसरा भी | | | जो कोई जानता है उसे भी रैक्वके | | | समान समस्त प्राणियोंका धर्मसमूह | | | और उसका फल प्राप्त हो जाता है | | | इस प्रकार यहाँ ‘सर्वं तदभिसमेति’ इस | | | पूर्ववाक्यका अनुवर्तन होता है। वह | | | इस प्रकारका रैक्वसे भिन्न विद्वान् | | | भी मैंने ऐसा कहकर बतला दिया। |

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५९


| दुक्त एवमुक्तः, रैक्वत्स एव कृतायस्थानीयो भवतीत्यभिप्रायः ॥ ४ ॥ | तात्पर्य यह है कि रैक्वके समान वही कृतनामक पासेके सदृश होता है ॥ ४ ॥ |


तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायण उपशुश्राव । स ह संजिहान एव क्षत्तारमुवाचाङ्गारारे ह सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो कथँसयुग्वा रैक्व इति ॥ ५ ॥ यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनँसर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥ ६ ॥

इस बातको जानश्रुति पौत्रायणने सुन लिया। [ दूसरे दिन सबेरे ] उठते ही उसने सेवकसे कहा—'अरे भैया ! तू गाड़ीवाले रैक्वके समान मेरी स्तुति क्या करता है !' [ इसपर सेवकने पूछा— ] 'यह जो गाड़ीवाला रैक्व है, कैसा है ?' ॥ ५ ॥ [ राजाने कहा— ] 'जिस प्रकार कृतनामक पासेके द्वारा जीतनेवाले रुषके अधीन उससे निम्नवर्ती समस्त पासे हो जाते हैं उसी प्रकार उस रैक्वको जो कुछ प्रजा सत्कर्म करती है, वह सब प्राप्त हो जाता है तथा जो कुछ वह ( रैक्व ) जानता है उसे जो कोई जानता है उसके विषयमें भी इस कथनद्वारा मैंने बतला दिया' ॥ ६ ॥


| तदु ह तदेतदीदृशं हंसवाक्यमात्मनः कुत्सारूपमन्यस्य विदुषो रैक्वादेः प्रशंसारूपमुपशुश्राव श्रुतवान्हर्म्यतलस्थो राजा जानश्रुतिः पौत्रायणः । तच्च हंसवाक्यं | महलकी छतपर स्थित राजा जानश्रुति पौत्रायणने अपनी निन्दारूप और रैक्व आदि किसी अन्य विद्वान्की प्रशंसारूप यह इस प्रकारका हंसका वचन सुन लिया । तथा उस हंसके वचनको पुनः- |

३६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४

३६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४


संस्कृतहिन्दी
स्मरन्नेव पौनःपुन्येन रात्रिशेषमतिवाहयामास ।पुनः स्मरण करते हुए ही उसने शेष रात्रिको बिताया ।
ततः स वन्दिभी राजा स्तुतियुक्ताभिर्वाग्भिः प्रतिबोध्यमान उवाच क्षत्तारं संजिहान एव शयनं निद्रां वा परित्यजन्नेव, हेडङ्ग वत्सारे ह सयुग्वानमिव रैक्वमात्थ किं माम् ? स एव स्तुत्यर्हो नाहमित्यभिप्रायः । अथवा सयुग्वानं रैक्वमात्थ गत्वा मम तद्दिदृक्षाम्; तदेवशब्दोऽवधारणाथोऽनर्थको वा वाच्यः ।तब वन्दियोंद्वारा स्तुतियुक्त वाक्योंसे जगाये जानेपर राजाने शय्या अथवा निद्राको त्यागते ही सेवकसे कहा—'हे वत्स ! अरे ! क्या तू मुझे गाड़ीवाले रैक्वके समान बतला रहा है ?' तात्पर्य यह है कि स्तुतिके योग्य तो वही है, मैं नहीं हूँ; अथवा तू जाकर गाड़ीवाले रैक्वको उसे देखनेकी मेरी इच्छा सुना। ऐसा अर्थ होनेपर 'सयुग्वानम् इव' इसमें 'इव' शब्द निश्चयार्थक अथवा अर्थहीन कहना चाहिये।
स च क्षत्ता प्रत्युवाच रैक्वानयनकामो राज्ञोऽभिप्रायज्ञः । यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इति राज्ञैवं चोक्त आनेतुं तच्चिह्नं ज्ञातुमिच्छन् यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इत्यवोचत् । स च भल्लाक्षवचनमेवावोचत् ॥ ५-६ ॥राजाके अभिप्रायको जाननेवाले उस सेवकने रैक्वको लानेकी इच्छासे पूछा—'यह जो गाड़ीवाला रैक्व है, कैसा है ?' अर्थात् राजाके इस प्रकार कहनेपर उसे लानेके लिये उसके चिह्न जाननेकी इच्छासे उसने 'यह जो गाड़ीवाला रैक्व है, कैसा है ?' ऐसा कहा। तब राजाने भल्लाक्षका वचन ही दोहरा दिया ॥ ५-६ ॥

— : ० : —

| तस्य स्मरन्— | उसके कथनको याद रखकर— |

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६१


स ह क्षत्तानन्विष्य नाविदमिति प्रत्येयाय तँ होवाच यत्रारे ब्राह्मणस्यान्वेषणा तदेनमच्छेति ॥७॥

वह सेवक उसकी खोज करनेके अनन्तर 'मैं उसे नहीं पा सका' ऐसा कहता हुआ लौट आया ! तब उससे राजाने कहा—'अरे ! जहाँ ब्राह्मणकी खोज की जाती है वहाँ उसके पास जा' ॥ ७ ॥

स ह क्षत्ता नगरं ग्रामं वा गत्वान्विष्य रैक्वं नाविदं न व्यज्ञासिषमिति प्रत्येयाय प्रत्यागतवान् । तं होवाच क्षत्तारमरे यत्र ब्राह्मणस्य ब्रह्मविद् एकान्तेऽरण्ये नदीपुलिनादौ विविक्ते देशेऽन्वेषणानुमार्गणं भवति तत्तत्रैनं रैक्वमच्छ ऋच्छ गच्छ तत्र मार्गणं कुर्वित्यर्थः ॥ ७ ॥वह सेवक नगर या ग्राममें जाकर वहाँ खोजनेके अनन्तर 'मैंने रैक्वको नहीं जाना—नहीं पहचाना' ऐसा कहता हुआ लौट आया । तब राजाने उस सेवकसे कहा—अरे ! जहाँ एकान्त जंगलमें—नदीके तीर आदि शून्य स्थानोंमें ब्राह्मण-ब्रह्मवेत्ताकी खोज की जाती है वहाँ इस रैक्वके पास 'ऋच्छ' अर्थात् जा यानी वहाँ जाकर उसकी खोज कर ॥ ७ ॥

इत्युक्तः—इस प्रकार कहे जानेपर—

सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कषमाणमुपोपविवेश तँहाभ्युवाद त्वं नु भगवः सयुग्वा रैक्व इत्यह१ँह्यरा ३ इति ह प्रतिजज्ञे स ह क्षत्ताविदमिति प्रत्येयाय ॥८॥

उसने एक छकड़ेके नीचे खाज खुजलाते हुए [ रैक्वको देखा ] । वह उसके पास बैठ गया और बोला—'भगवन् ! क्या आप ही गाड़ी-वाले रैक्व हैं ?' तब रैक्वने 'अरे ! हाँ, मैं ही हूँ' ऐसा कहकर स्वीकार

३६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

३६२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

किया। तब वह सेवक यह समझकर कि मैंने उसे पहचान लिया है, लौट आया ॥ ८ ॥

| क्षत्तानन्विष्य तं विजने देशेऽधस्ताच्छकटस्य गन्त्र्याः पामां खर्जूं कषमाणं कण्डूयमानं दृष्ट्वा 'अयं नूनं सयुग्वा रैक्वः' इत्युपसमीप उपविवेश विनयेनोपविष्टवान् । तं च रैक्कं हाम्युवादोक्तवान्—त्वमसि हे भगवो भगवन् सयुग्वा रैक्व इति । एवं पृष्टोऽहमस्मि ह्यरा ३ अर इति हानादर एव प्रतिजज्ञेऽभ्युपगतवान् । स तं विज्ञायाविदं विज्ञातवानस्मीति प्रत्येयाय प्रत्यागत इत्यर्थः ॥ ८ ॥ | वह सेवक निर्जन स्थानमें खोज करनेपर उसे एक गाड़ीके नीचे खाज खुजलाते देखकर 'निश्चय यही गाड़ीवाला रैक है' ऐसा निश्चय कर उसके समीप नम्रतापूर्वक बैठ गया; तथा उस रैक्वसे कहा—'हे भगवन् ! गाड़ीवाले रैक्व आप ही हैं ?' इस तरह पूछे जानेपर 'अरे ! हाँ, मैं ही हूँ' इस प्रकार 'अरे' कहकर उसने अनादर ही प्रकट किया । तब सेवक उसे जानकर—यह समझकर कि 'अब मैंने रैक्वको जान लिया—पहचान लिया है' लौट आया ॥ ८ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
प्रथमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥

द्वितीय खण्ड


रैकके प्रति जानश्रुतिकी उपसत्ति

तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायणः षट्शतानि गवां निष्कमश्वतरीरथं तदादाय प्रतिचक्रमेतं हाभ्युवाद ॥ १ ॥

तब वह जानश्रुति पौत्रायण छः सौ गौएँ, एक हार और एक खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ लेकर उसके पास आया और बोला ॥१॥

तत्तत्र ऋषेर्गाईस्थ्यं प्रत्यभिप्रायं बुद्ध्वा धनार्थितां च उ ह एव जानश्रुतिः पौत्रायणः षट्शतानि गवां निष्कं कण्ठहारमश्वतरीरथमश्वतरीभ्यां युक्तं रथं तदादाय धनं गृहीत्वा प्रतिचक्रमे रैक्वं प्रति गतवान् । तं च गत्वाभ्युवाद हाभ्युक्तवान् ॥ १ ॥तब [ सेवकके कथनसे ] ऋषिका गृहस्थाश्रम-सम्बन्धी अभिप्राय और धनकी इच्छा जान वह जानश्रुति पौत्रायण छः सौ गौएँ, निष्क—गलेका हार और एक अश्वतरीरथ—दो अश्वतरियों [ खच्चरियों ] से जुता हुआ रथ—यह इतना धन लेकर रैक्वके पास चला । और उसके पास जाकर अभिवादन किया अर्थात कहा ॥ १ ॥

रैक्वेमानि षट्शतानि गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथो नु म एतां भगवो देवताꣳशाधि यां देवतामुपास्स इति ॥ २ ॥

'हे रैक्व ! ये छः सौ गौएँ, यह हार और यह खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ मैं [ आपके लिये ] लाया हूँ । [ आप इस धनको स्वीकार कीजिये

३६४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४

३६४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४

और] हे भगवन्! आप मुझे उस देवताका उपदेश दीजिये, जिसकी आप उपासना करते हैं॥ २ ॥

| हे रैक गवां षट् शतानीमानि तुभ्यं मयानीतानि, अयं निष्कोऽश्वतरीरथश्चायमेतद्धनमादत्स्व, भगवोऽनुशाधि च मे मामेताम्, यां च देवतां त्वमुपास्से तद्देवतोपदेशेन मामनुशाधीत्यर्थः ॥२॥ | हे रैक्व! मैं आपके लिये ये छः सौ गौएँ लाया हूँ तथा यह हार और खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ भी लाया हूँ, इस धनको ले लीजिये और हे भगवन्! मुझे उस देवताका उपदेश दीजिये जिसकी आप उपासना करते हैं; अर्थात् उस देवताका उपदेश करनेके द्वारा मेरा अनुशासन कीजिये ॥ २ ॥ |


तमु ह परः प्रत्युवाचाह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्त्विति। तदु ह पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणः सहस्रं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रतिचक्रमे ॥ ३ ॥

उस राजासे दूसरे [अर्थात् रैक्व] ने कहा—'ऐ शूद्र! गौओंके सहित यह हारयुक्त रथ तेरे ही पास रहे।' तब वह जानश्रुति पौत्रायण एक सहस्र गौएँ, एक हार, खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ और अपनी कन्या—इतना धन लेकर फिर उसके पास आया ॥ ३ ॥

| तमेवमुक्तवन्तं राजानं प्रत्युवाच परो रैकः; अहेत्ययं निपातो विनिग्रहार्थी योऽन्यत्रेह त्वनर्थकः, एवशब्दस्य पृथक्प्रयोगात्। हारेत्वा हारेण युक्ता इत्वा गन्त्री | इस प्रकार कहते हुए उस राजासे उस द्वितीय व्यक्ति—रैक्वने कहा—'अह' यह निपात दूसरी जगह 'विनिग्रह' अर्थमें प्रयुक्त होता है, किंतु यहाँ 'एव' शब्दका पृथक् प्रयोग रहनेके कारण निरर्थक है। हारसे युक्त जो इत्वा—गाड़ी |

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
सेयं हारेत्वा गोभिः सह तवैवास्तु तवैव तिष्ठतु, न ममापर्याप्तेन कर्मार्थमनेन प्रयोजनमित्यभिप्रायः, हे शूद्रेति ।उसे 'हारेत्वा' कहते हैं, वह यह गौओंके सहित 'हारेत्वा' तेरा ही रहे। तात्पर्य यह है कि हे शूद्र ! जो कर्मके लिये अपर्याप्त है ऐसे इस धनसे मुझे कोई प्रयोजन नहीं है।
ननु राजासौ क्षत्तृसम्बन्धात्स ह क्षत्तारमुवाचेत्युक्तम् । विद्याग्रहणाय च ब्राह्मणसमीपोपगमाच्छूद्रस्य चानधिकारात्कथमिदमननुरूपं रैक्वेणोच्यते हे शूद्रेति ?शङ्का-क्षत्ता (सेवक) से सम्बन्ध होनेके कारण यह जानश्रुति तो राजा है, क्योंकि 'स ह क्षत्तारमुवाच' (उसने सेवकसे कहा) ऐसा पहले कहा जा चुका है। तथा शूद्रका अधिकार न होनेसे ब्राह्मणके समीप विद्याग्रहणके लिये जानेके कारण भी [ यह क्षत्रिय ही जान पड़ता है ] फिर रैक्वने 'हे शूद्र' ऐसा अनुचित शब्द क्यों कहा ?
तत्राहुराचार्याः—हंसवचनश्रवणाच्छुगेनमाविवेश; तेनासौ शुचा, श्रुत्वा रैक्वस्य महिमानं वा आद्रवतीति ऋषिरात्मनः परोक्षज्ञतां दर्शयंञ्छूद्रेत्याहेति। शूद्रवद्वा धनेनैवैनं विद्याग्रहणायोपजगामसमाधान-इस विषयमें आचार्यगण ऐसा कहते हैं कि हंसका वचन सुननेपर इस जानश्रुतिमें शोकका आवेश हो गया था। उस शोकसे अथवा रैक्वकी महिमा सुनकर वह द्रवीभूत हो रहा था; इसलिये ऋषिने अपनी परोक्षज्ञता प्रदर्शित करनेके लिये उसे 'शूद्र' कहकर सम्बोधित किया। अथवा वह शूद्रके समान केवल धनके द्वारा ही विद्या ग्रहण करनेके लिये उसके समीप गया था, शुश्रूषाद्वारा ग्रहण करने नहीं गया

३६६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४

३६६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४


| न च शुश्रूषया, न तु जात्यैव शूद्र इति । | [ इसलिये उसे 'शूद्र' कहा हो ] वह जातिसे ही शूद्र हो—ऐसी बात नहीं है । | | अपरे पुनराहुरल्पं धनमाहृतमिति रुषैवैनमुक्तवाञ्शूद्रेति ।<br><br>लिङ्गं च बह्वाहरण उपादानं धनस्येति । | परंतु अन्य लोग ऐसा कहते हैं कि वह थोड़ा धन लाया था इसलिये रोषवश उसे 'शूद्र' कहा था; बहुत-सा धन लानेपर उसे ग्रहण कर लेना इस बातको सूचित करता है। | | तदु हपेर्मतं ज्ञात्वा पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणो गवां सहस्रमधिकं जायां चर्षेरभिमतां दुहितरमात्मनस्तदादाय प्रतिचक्रमे क्रान्तवान् ॥ ३ ॥ | तब ऋषिका अभिप्राय समझकर राजा जानश्रुति पौत्रायण पहलेसे अधिक करके एक सहस्र गौएँ तथा ऋषिको अभीष्ट पत्नीरूपा अपनी एक कन्या लेकर फिर उसके पास गया ॥ ३ ॥ |


तꣳहाभ्युवाद रैक्वेदꣳसहस्रं गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथ इयं जायायं ग्रामो यस्मिन्नास्सेऽन्वेव मा भगवः शाधीति ॥ ४ ॥ तस्या ह मुखमुपोद्गृह्णन्नुवाचाजहारेमाः शूद्रानेनैव मुखेनालापयिष्यथा इति ते हैते रैक्वपर्णा नाम महावृषेषु यत्रास्मा उवास स तस्मै होवाच ॥ ५ ॥

और उस (रैक्व) से कहा—'हेरैक्व ! ये एक सहस्र गौएँ, यह हार, यह खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ, यह पत्नी और यह ग्राम जिसमें कि आप हैं लीजिये और हे भगवन् ! मुझे अवश्य अनुशासित कीजिये' ॥४॥

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्याथ [ ३६७


तब उस (राजकन्या) के मुखको ही [विद्याग्रहणका द्वार] समझते हुए रैक्वने कहा—'अरे शूद्र! तू ये (गौएँ आदि) लाया है [सो ठीक है;] तू इस विद्याग्रहणके द्वारसे ही मुझसे भाषण कराता है।' इस प्रकार जहाँ वह रैक्व रहता था वे रैक्वपर्णीनामक ग्राम महावृष देशमें प्रसिद्ध हैं। तब उसने उससे कहा ॥ ५ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
रैक्वेदं गवां सहस्रमयं निष्को-<br>ऽयमश्वतरीरथ इयं जायार्थं मम<br><br>दुहितानीतायं च ग्रामो यस्मि-<br><br>न्नास्से तिष्ठसि स च त्वदर्थे मया<br><br>कल्पितः। तदेतत्सर्वमादायानु-<br><br>शाध्येव मा मां हे भगवः।[और रैक्वसे कहा—] 'हे रैक्व! ये एक सहस्र गौएँ, यह हार, यह खच्चरियोंसे युक्त रथ और यह पत्नी अर्थात् आपकी भार्या होनेके लिये अपनी कन्या लाया हूँ; तथा जिसमें आप रहते हैं वह गाँव भी मैंने आपहीके लिये निश्चित कर दिया है। हे भगवन्! इन सबको ग्रहणकर आप मुझे उपदेश कर ही दीजिये।'
इत्युक्तस्तस्या जायार्थमानी-<br>ताया राज्ञो दुहितुर्हैव मुखं द्वारं<br>विद्याया दाने तीर्थमुपोद्गृह्णञ्जान-<br>न्नित्यर्थः। “ब्रह्मचारी धनदायी<br>मेधावी श्रोत्रियः प्रियः। विद्यया<br>वा विद्यां प्राह तानि तीर्थानि<br>षण्मम” इति विद्याया वचनं<br>विज्ञायते हि।ऐसा कहे जानेपर भार्या होनेके लिये लायी गयी उस राजकन्याके मुखको ही विद्यादानका द्वार अर्थात् तीर्थ जानते हुए [रैक्वने कहा—] ऐसा इसका तात्पर्य है। इस विषयमें विद्याका यह वचन प्रसिद्ध है—“ब्रह्मचारी धन देनेवाला बुद्धिमान्, श्रोत्रिय, प्रिय और जो विद्याके बदलेमें विद्याका उपदेश करता है—ये छः मेरे तीर्थ हैं।”
एवं जानन्नुपोद्गृह्णन्नुवाचो-<br>क्तवान्—आजहाराहृतवान्म-ऐसा जानकर अर्थात् ग्रहण कर रैक्वने कहा—'तू जो ये गौएँ तथा

३६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

३६८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४
वान्यदिमा गा यच्चान्यद्धनं तत्साध्विति वाक्यशेषः। शूद्रेति पूर्वोक्तानुकृतिमात्रं न तु कारणान्तरापेक्षया पूर्ववत्। अनेनैव मुखेन विद्याग्रहणतीर्थेनालापयिष्यथा आलापयसीति मां भाषयसीत्यर्थः।अन्य धन लाया है; यह ठीक ही है,—ऐसा वाक्यशेष है। यहाँ जो 'शूद्र' ऐसा सम्बोधन है यह पूर्वोक्तका अनुकरणमात्र ही है, पूर्ववत किसी अन्य कारणकी अपेक्षासे नहीं है। इस मुख यानी विद्याग्रहणके द्वारसे ही तू मुझसे आलाप अर्थात् सम्भाषण कराता है।
ते हैते ग्रामा रैक्वपर्णा नाम विख्याता महावृषेषु देशेषु यत्र येषुग्रामेषूवासोषितावान्रैक्वः, तानस्मै ग्रामानदादस्मै रैक्वाय राजा। तस्मै राज्ञे धनं दत्तवते ह किलोवाच विद्यां स रैक्वः॥४-२-५॥वे ये रैक्वपर्ण नामसे प्रसिद्ध ग्राम महावृष देशमें हैं, जिन ग्रामोंमें कि रैक्व रहा करता था, वे ग्राम राजाने इस रैक्वको दे दिये। इस प्रकार धन देनेवाले उस राजाको रैक्वने विद्याका उपदेश किया॥४-५॥
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये द्वितीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥२॥

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तृतीय खण्ड

—: ० :—

रैकद्वारा संवर्गविद्याका उपदेश

वायुर्वाव संवर्गो यदा वा अग्निरुद्वायति वायुमेवाप्येति यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ॥ १ ॥

वायु ही संवर्ग है। जब अग्नि बुझता है तो वायुमें ही लीन होता है, जब सूर्य अस्त होता है तो वायुमें ही लीन होता है और जब चन्द्रमा अस्त होता है तो वायुमें ही लीन हो जाता है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
वायुर्वाव संवर्गो वायुर्वाह्यो वावेत्यवधारणार्थः । संवर्गः संवर्जनात्संग्रहणात्संग्रसनाद्वा संवर्गः । वक्ष्यमाणा अग्नयाद्या देवता आत्मभावमापादयतीत्यतः संवर्गः । संवर्जनाख्यो गुणो ध्येयो वायुवत, कृतायान्तर्भावदृष्टान्तात् । कथं संवर्गत्वं वायोः ? इत्याह—यदा यस्मिन्काले वा अग्निरुद्वायत्युद्वासनं प्राप्नो-वायु ही संवर्ग है। यहाँ 'वायु' शब्दसे बाह्यवायु अभिप्रेत है। 'वाव' यह निपात निश्चयार्थक है। संवर्जन—संग्रहण अथवा संग्रसन करनेके कारण वह संवर्ग है। आगे कहे जानेवाले अग्नि आदि देवताओंको वायु अपने स्वरूपमें मिला लेता है इसलिये वह संवर्ग है। कृतनामक पासेमें जैसे अन्य पासोंका अन्तर्भाव हो जाता है उसी दृष्टान्तके अनुसार वायुके समान संवर्जनसंज्ञक गुणका चिन्तन करना चाहिये। वायुकी संवर्गता किस प्रकार है ? इस विषयमें श्रुति कहती है—जब अर्थात् जिस समय अग्नि उद्वासनको प्राप्त होता है अर्थात्

३७० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४

३७० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४


त्युपशाम्यति तदासावग्निर्वायुमेवाप्येति वायुस्वाभाव्यमपिगच्छति । तथा यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति । यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ।<br><br>ननु कथं सूर्याचन्द्रमसोः स्वरूपावस्थितयोर्वायावपिगमनम् ?<br><br>नैष दोषः; अस्तमनेऽदर्शनप्राप्तेर्वायुनिमित्तत्वात्, वायुना ह्यस्तं नीयते सूर्यः; चलनस्य वायुकार्यत्वात् । अथवा प्रलये सूर्याचन्द्रमसोः स्वरूपभ्रंशे तेजोरूपयोर्वायावेवापिगमनं स्यात् ॥ १ ॥शान्त हो जाता है उस समय यह अग्नि वायुमें ही लीन हो जाता है अर्थात् वायुके स्वभावको प्राप्त हो जाता है । तथा जिस समय सूर्य अस्त होता है वह भी वायुमें ही लीन हो जाता है और जब चन्द्रमा अस्त होता है वह भी वायुमें ही लीन हो जाता है ।<br><br>शङ्का—अपने स्वरूपमें स्थित सूर्य और चन्द्रमाका वायुमें किस प्रकार लय हो सकता है ?<br><br>समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि इनका अस्त होनेपर अदर्शनको प्राप्त होना वायुके कारण होता है । सूर्य वायुके ही द्वारा अस्तको प्राप्त कराया जाता है, क्योंकि गति वायुका ही कार्य है अथवा प्रलयकालमें तेजोरूप सूर्य और चन्द्रमाके स्वरूपका नाश होनेपर भी उनका वायुमें ही लय हो सकता है ॥ १ ॥

— : ० : —

| तथा— | । तथा— |

यदाप उच्छुष्यन्ति वायुमेवापियन्ति वायुर्ह्यैवैतान् सर्वान्संवृङ्क्त इत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७१


जिस समय जल सूखता है वह वायुमें ही लीन हो जाता है । वायु ही इन सब जलोंको अपनेमें लीन कर लेता है । यह अधिदैवत दृष्टि है ॥ २ ॥

यदाप उच्छुष्यन्त्युच्छोष-<br>माप्नुवन्ति तदा वायुमेवापिय-<br>न्ति । वायुर्हि यस्माद्वैतान-<br>ग्न्याद्यान्महाबलान्संवृङ्क्ते, अतो<br>वायुः संवर्गगुण उपास्य इत्यर्थः<br>इत्यधिदैवतं देवतासु संवर्गदर्श-<br>नमुक्तम् ॥ २ ॥जब जल सूखता है—शोषणको प्राप्त होता है उस समय वह भी वायुमें ही लीन हो जाता है । क्योंकि वायु ही इन अग्नि आदि महाबलवान् तत्त्वोंको अपनेमें लीन कर लेता है, इसलिये वायुकी संवर्ग गुणरूपसे उपासना करनी चाहिये—यह इसका तात्पर्य है । इस प्रकार यह अधिदैवत—देवताओंमें संवर्ग-दृष्टि कही गयी ॥ २ ॥

अथाध्यात्मं प्राणो वाव संवर्गः स यदा स्वपिति प्राणमेव वागप्येति प्राणं चक्षुः प्राणꣳश्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इति ॥ ३ ॥

अब अध्यात्मदर्शन कहा जाता है—प्राण ही संवर्ग है । जिस समय वह पुरुष सोता है, प्राणको ही वाक इन्द्रिय प्राप्त हो जाती है; प्राणको ही चक्षु, प्राणको ही श्रोत्र और प्राणको ही मन प्राप्त हो जाता है, प्राण ही इन सबको अपनेमें लीन कर लेता है ॥ ३ ॥

अथानन्तरमध्यात्ममात्मनि<br>संवर्गदर्शनमिदमुच्यते — प्राणो<br>मुख्यो वाव संवर्गः । स पुरुषो<br>यदा यस्मिन्काले स्वपिति प्राण-अब आगे यह अध्यात्म अर्थात् शरीरमें संवर्गदर्शन कहा जाता है । मुख्य प्राण ही संवर्ग है । यह पुरुष जिस समय सोता है उस समय प्राणको ही वाक् इन्द्रिय प्राप्त हो

३७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

३७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४


मेव वागप्येति वायुमिवाग्निः । प्राणं चक्षुः प्राणं श्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो हि यस्मादेवैतान्वागादीन्सर्वान्संवृङ्क्त इति ॥ ३ ॥जाती है, जिस प्रकार कि अग्नि वायुको । तथा प्राणको ही चक्षु, प्राणको ही श्रोत्र और प्राणको ही मन प्राप्त हो जाता है; क्योंकि प्राण ही इन वाक् आदि सबको अपनेमें लीन कर लेता है ॥ ३ ॥

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तौ वा एतौ द्वौ संवर्गौ वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ॥ ४ ॥

वे ये दो ही संवर्ग हैं--देवताओंमें वायु और इन्द्रियोंमें प्राण ॥४॥

तौ वा एतौ द्वौ संवर्गौ संवर्जनगुणौ वायुरेव देवेषु संवर्गः प्राणः प्राणेषु वागादिषु मुख्यः ॥ ४ ॥वे ये दो ही संवर्ग—संवर्जन गुणवाले हैं—देवताओंमें वायु ही संवर्ग है तथा वाक् आदि प्राणोंमें (इन्द्रियोंमें) मुख्य प्राण ॥ ४ ॥

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संवर्गकी स्तुतिके लिये आख्यायिका

अथैतयोः स्तुत्यर्थमियमाख्यायिकारभ्यते—अब इन (वायु और प्राण) की स्तुतिके लिये आख्यायिका आरम्भ की जाती है—

अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिं परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी बिभिक्षे तस्मा उ ह न ददतुः ॥ ५ ॥

एक बार कपिगोत्रज शौनक और कक्षसेनके पुत्र अभिप्रतारीसे, जब कि उन्हें भोजन परोसा जा रहा था एक ब्रह्मचारीने भिक्षा माँगी; किंतु उन्होंने उसे भिक्षा न दी ॥ ५ ॥

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७३


| हेत्यैतिह्यार्थः, शौनकं च शुनकस्यापत्यं शौनक कापेयं कपिगोत्रमभिप्रतारिणं च नामतः कक्षसेनस्यापत्यं काक्षसेनिं भोजनायोपविष्टौ परिविष्यमाणौ सूपकारैर्ब्रह्मचारी ब्रह्मविच्छौण्डो बिभिक्षे भिक्षितवान् । ब्रह्मचारिणो ब्रह्मविन्मानितां बुद्ध्वा तं जिज्ञासमानौ तस्मा उ भिक्षां न ददतुर्न दत्तवन्तौ ह किमयं वक्ष्यतीति ॥ ५ ॥ | ‘ह’ यह निपात ऐतिह्य (परम्परागत कथानक) का द्योतक है । शौनक-शुनकका पुत्र शौनक जो कि कापेय—कपिके गोत्रमें उत्पन्न हुआ था, उससे और कक्षसेनका पुत्र काक्षसेनि, जो नामसे अभिप्रतारी था, उससे, जब कि वे दोनों भोजनके लिये बैठे थे और रसोइयोंद्वारा इन्हें भोजन परोसा जा रहा था; अपनेको ब्रह्मवेत्ताओं में शूरवीर समझनेवाले एक ब्रह्मचारीने भिक्षा माँगी। ब्रह्मचारीके ‘मैं ब्रह्मवेत्ता हूँ’ ऐसे अभिमानको जानकर यह जाननेकी इच्छासे कि ‘देखें यह क्या कहता है ?’ उन्होंने भिक्षा न दी ॥ ५ ॥ |

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स होवाच महात्मनश्चतुरो देव एकः कः स जगार भुवनस्य गोपास्तं कापेय नाभिपश्यन्ति मर्त्या अभिप्रतारिन्बहुधा वसन्तं यस्मै वा एतदन्नं तस्मा एतन्न दत्तमिति ॥ ६ ॥

उसने कहा—भुवनोंके रक्षक उस एक देव प्रजापतिने चार महात्माओंको ग्रस लिया है । हे कापेय ! हे अभिप्रतारिन् ! मनुष्य अनेक प्रकारसे निवास करते हुए उस एक देवको नहीं देखते; तथा जिसके लिये यह अन्न है उसे ही नहीं दिया गया ॥ ६ ॥

| स होवाच ब्रह्मचारी महात्मनश्चतुर इति द्वितीयाबहुवचनम् । | उस ब्रह्मचारीने कहा—‘महात्मनः और ‘चतुरः’ ये पद द्वितीया विभक्तिके बहुवचन हैं । उस एक ही देव |

३७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

३७४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

| देव एकोऽग्न्यादीन्वायुर्वागादीन् प्राणः, कः स प्रजापतिर्जगार ग्रसितवान् कः स जगारेति प्रश्नमेके । भुवनस्य भवन्त्यस्मिन् भूतानीति भुवनं भूरादिः सर्वो लोकस्तस्य गोपा गोपायिता रक्षिता गोप्तेत्यर्थः । तं कं प्रजापतिं हे कापेय नाभि- पश्यन्ति न जानन्ति मर्त्या मरणधर्माणोऽविवेकिनो वा हेऽभिप्रतारिन्बहुधाध्यात्ममाधिदैवताधिभूतप्रकारैर्वसन्तम् । यस्मै वा एतदहन्यहन्यन्नमदनायाह्रियते संस्क्रियते च तस्मै प्रजापतय एतदन्नं न दत्तमिति ॥ ६ ॥ | क—प्रजापतिने अर्थात् वायुने अग्नि आदिको और प्राणने वागादिको ग्रस लिया है । किन्हीं-किन्हींका मत है कि जिसने ग्रसा है वह एक देव कौन है ? इस प्रकार यह प्रश्न है । वह भुवनका—जिसमें भूत ( प्राणी ) आदि होते हैं उस भूर्लोक आदि समस्त लोकोंको भुवन कहते हैं, उसका गोपा—गोपायिता अर्थात् रक्षा करनेवाला है । हे कापेय ! उस क अर्थात् प्रजापतिको अथवा हे अभिप्रतारिन् ! अनेक प्रकारसे यानी अध्यात्म, अधिदैवत और अधिभूत-भेदसे वास करते हुए उस देवको मर्त्य—मरणधर्मा अथवा अविवेकी पुरुष नहीं देखते । तथा जिसके भक्षणके लिये नित्यप्रति इस अन्नका आहरण-संस्कार किया जाता है उस प्रजापतिको ही यह अन्न नहीं दिया गया ॥ ६ ॥ |

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तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायात्मा देवानां जनिता प्रजानाँ१हिरण्यदंष्ट्रो बभसोऽनसूरिर्महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यदनन्नमत्तीति वै वयं ब्रह्मचारिन्नेदमुपास्महे दत्तास्मै भिक्षामिति ॥७॥

उस वाक्यका कपिगोत्रोत्पन्न शौनक ने मनन किया और फिर उस [ ब्रह्मचारी ] के पास आकर कहा—'जो देवताओंका आत्मा, प्रजाओंका

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७५


उत्पत्तिकर्ता, हिरण्यदंष्ट्र, भक्षणशील और मेधावी है, जिसकी बड़ी महिमा कही गयी है, जो स्वयं दूसरोंसे न खाया जानेवाला और जो वस्तुतः अन्न नहीं है उनको भी भक्षण कर जाता है, हे ब्रह्मचारिन् ! उसीकी हम उपासना करते हैं । [ ऐसा कहकर उसने सेवकोंको आज्ञा दी कि ] 'इस ब्रह्मचारीको भिक्षा दो' ॥ ७ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तदु ह—ब्रह्मचारिणो वचनं शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानो मनसालोचयन्ब्रह्मचारिणं प्रत्ये-यायाजगाम । गत्वा चाह यं त्वमवोचो न पश्यन्ति मर्त्या इति तं वयं पश्यामः; कथम् ? आत्मा सर्वस्य स्थावरजङ्गमस्य, किञ्च देवानामग्न्यादीनामात्मनि संहृत्य ग्रसित्वा पुनजनितोत्पाद-यिता वायुरूपेणाधिदैवतमग्न्या-दीनाम् । अध्यात्मं च प्राण-रूपेण वागादीनां प्रजानां च जनिता ।कपिगोत्रोत्पन्न शौनक ब्रह्मचारी-के उस वचनकी मनसे आलोचना कर ब्रह्मचारीके समीप गया तथा जाकर इस प्रकार बोला—जिसके विषयमें तुमने कहा कि मर्त्यगण उसे नहीं देखते उसे हम देखते हैं । किस प्रकार देखते हैं ? वह सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गमका आत्मा तथा अग्नि आदि देवताओंका उत्पत्तिकर्ता अर्थात् अधिदैवत वायुरूपसे अपनेमें लीन कर अग्नि आदिका पुनः उत्पन्न करनेवाला और अध्यात्म प्राणरूपसे वागादि प्रजाओंकी उत्पत्ति करने-वाला है ।
अथवात्मा देवानामग्निवागा-दीनां जनिता प्रजानां स्थावर-जङ्गमानाम् । हिरण्यदंष्ट्रोऽमृतदंष्ट्रो-ऽभग्नदंष्ट्र इति यावत् । बभसो भक्षणशीलः । अनसूरिः सूरिर्मे-अथवा यों समझो कि अग्नि और वाक् आदि देवोंका आत्मा और स्थावर-जङ्गम प्रजाओंका उत्पत्तिकर्ता है । हिरण्यदंष्ट्र—अमृतदंष्ट्र अर्थात् जिसकी डाढ़ें कभी नहीं टूटतीं, 'बभसः'—भक्षणशील, 'अनसूरिः'—सूरि मेधावीको कहते हैं, जो सूरि न

३७६] छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४

३७६] छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४


| धावी न सूरिरसूरिस्तत्प्रतिषेधोऽनसूरिः सूरिरेवेत्यर्थः । महान्तमतिप्रमाणमप्रमेयस्य प्रजापतेर्महिमानं विभूतिमाहुर्ब्रह्मविदः ।<br><br>यस्मात्स्वयमन्यैरनद्यमानोऽभक्ष्यमाणो यदनन्नमग्निवागादिदेवतारूपमत्ति भक्षयतीति । वा इति निरर्थकः । वयं हे ब्रह्मचारिन् आ इदमेवं यथोक्तलक्षणं ब्रह्म वयमा उपास्महे । वयमिति व्यवहितेन सम्बन्धः। अन्ये न वयमिदमुपास्महे, किं तर्हि ? परमेव ब्रह्मोपास्महे इति वर्णयन्ति । दत्तास्मै भिक्षामित्यवोचद् भृत्यान् ॥ ७ ॥ | हो वह 'असूरि' कहलाता है उसका भी प्रतिषेध 'अनसूरि' है अर्थात् वह सूरि (मेधावी) ही है। ब्रह्मवेत्ता-लोग इस प्रजापतिकी महती—अति प्रमाणवाली अर्थात् अप्रमेय महिमा विभूति बतलाते हैं; क्योंकि यह स्वयं दूसरोंसे अभक्ष्यमाण—न खाया जानेवाला और जो अग्नि आदि देवता-रूप अनन्न (दूसरोंका अन्न नहीं) है उसका अदन—भक्षण करता है। 'वै' यह अव्यय निरर्थक है। हे ब्रह्मचारिन् ! हम इस उपर्युक्त लक्षणोंवाले ब्रह्मकी ही उपासना करते हैं। 'उपास्महे' इस क्रियाका व्यवधानयुक्त 'वयम्' इस कर्तासे सम्बन्ध है। कोई-कोई ['ब्रह्मचारिन्नेदमुपास्महे' इसका 'ब्रह्मचारिन् न इदम् उपास्महे' ऐसा पदच्छेद कर] हम इस ब्रह्मकी उपासना नहीं करते; तो किसकी करते हैं ? परब्रह्मकी ही उपासना करते हैं—ऐसी व्याख्या करते हैं। फिर उसने सेवकोंसे कहा कि 'इसे भिक्षा दो' ॥७॥ |


तस्मा उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्तस्तत्कृतं तस्मात्सर्वासु दिक्ष्वन्नमेव दश कृतꣳसैषा