छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७५
| मानानां क्रमेण षष्ठाहुतिभूतानां ताः पुरुषवचसः पुरुषशब्दवाच्या भवन्ति पुरुषाख्यां लभन्ते ? इत्यर्थः । इत्युक्तो नैव भगव इत्याह, नैवाहमत्र किञ्चन जानामीत्यर्थः ॥ ३ ॥ | जिन छठी आहुतिभूत द्रव्योंका 'पुरुष' यही वचन यानी नाम है वे पुरुषवाची कैसे हो जाते हैं ? अर्थात् पुरुषसंज्ञा कैसे प्राप्त करते हैं ?' ऐसा कहे जानेपर उसने यही कहा— 'भगवन् ! नहीं; अर्थात् मैं इस विषयमें कुछ भी नहीं जानता' ॥ ३ ॥ |
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प्रवाहणसे पराभूत श्वेतकेतुका अपने पिताके पास आना
अथानु किमनुशिष्टोऽवोचथा यो हीमानि न विद्यात्कथंसोऽनुशिष्टो ब्रवीतेति। स हायस्तः पितुरर्धमेय्याय तँहोवाचाननुशिष्य वाव किल मा भगवानब्रवीदनु त्वाशिषमिति ॥ ४ ॥
'तो फिर तू अपनेको 'मुझे शिक्षा दी गयी है' ऐसा क्यों बोलता था ? जो इन बातोंको नहीं जानता वह अपनेको शिक्षित कैसे कह सकता है ?' तब वह त्रस्त होकर अपने पिताके स्थानपर आया और उससे बोला—'श्रीमान्ने मुझे शिक्षा दिये बिना ही कह दिया था कि मैंने तुझे शिक्षा दे दी है' ॥ ४ ॥
| अथैवमज्ञः सन्किमनु कस्मात्त्वमनुशिष्टोऽस्मीत्यवोचथा उक्तवानसि ? यो हीमानि मया पृष्टान्यर्थजातानि न विद्यान्न विजानीयात्कथं स विद्वत्स्वनुशिष्टोऽस्मीति ब्रुवीत ? इत्येवं स श्वेतकेतुं राज्ञायस्त आयासितः | 'तो फिर इस प्रकार अज्ञ होनेपर भी तूने 'मुझे शिक्षा दी गयी है' ऐसा कैसे कहा ? जो पुरुष इन मेरी पूछी हुई बातोंको नहीं जानता वह विद्वानोंमें 'मुझे शिक्षा दी गयी है' ऐसा कैसे कह सकता है ? इस प्रकार राजासे आयस्त—पीडित हो वह श्वेतकेतु अपने |
४७६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
४७६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
| सन्पितुरर्धंस्थानमेयायागतवान्, तं च पितरमुवाच----अननुशिष्यानुशासनमकृत्वैव मा मां किल भगवान्समावर्तनकालेऽब्रवीदुक्तवाननु त्वाशिषमन्वशिषं त्वामिति ॥ ४ ॥ | पिताके अर्ध-स्थानपर आया और उस अपने पितासे बोला--'श्रीमान्-ने अनुशासन किये बिना ही समावर्तन संस्कारके समय मुझसे कह दिया था कि 'मैने तुझे शिक्षा दे दी है' ॥ ४ ॥ |
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| यतः--- । | क्योंकि— |
पञ्च मा राजन्यबन्धुः प्रश्नानप्राक्षीत्तेषां नैकञ्चनाशकं विवक्तुमिति स होवाच यथा मा त्वं तदैतानवदो यथाहमेषां नैकञ्चन वेद यद्यहमिमानवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति ॥ ५ ॥
'उस क्षत्रियबन्धुने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे थे; किंतु मैं उनमेंसे एकका भी विवेचन नहीं कर सका।' उसने कहा--'तुमने उस समय (आते ही) जैसे ये प्रश्न मुझे सुनाये हैं उनमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता। यदि मैं इन्हें जानता होता तो तुम्हें क्यों न बतलाता?' ॥५॥
| पञ्च पञ्चसंख्याकान्प्रश्नान् राजन्यबन्धू राजन्या बन्धवोऽस्येति राजन्यबन्धुः स्वयं दुर्वृत्त इत्यर्थः । अप्राक्षीत्पृष्टवान्; तेषां प्रश्नानां नैकञ्चन एकमपि नाशकं न शक्तवानहं विवक्तुं विशेषेणार्थतो निर्णैतुमित्यर्थः । | 'राजन्यबन्धुने--राजन्य (क्षत्रिय लोग) जिसके बन्धु हों उसे राजन्यबन्धु कहते हैं अर्थात् जो स्वयं दुराचारी है ऐसे उस राजन्यबन्धुने मुझसे पाँच--गिनतीके पाँच प्रश्न पूछे थे; किंतु मैं उन प्रश्नोंमेंसे एकका भी विवेचन नहीं कर सका; अर्थात् उनका विशेषरूपसे अर्थतः निर्णय नहीं कर सका।' |
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| खण्ड ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४७७ |
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| स होवाच पिता--यथा मा मां वत्स त्वं तदागतमात्र एवैतान् प्रश्नानवद उक्तवानसि--तेषां नैकञ्चनाशकं विवक्तुमिति, तथा मां जानीहि, त्वदीयाज्ञानेन लिङ्गेन मम तद्विषयमज्ञानं जानीहीत्यर्थः । कथम् ? यथाहमेषां प्रश्नानामेकञ्चनैकमपि न वेद न जान इति; यथा त्वमेवाङ्गैतान् प्रश्नान्न जानीषे तथाहमप्येतान्न जान इत्यर्थः । अतो मय्यन्यथाभावो न कर्तव्यः । कुत एतदेवम् ? यतो न जाने; यद्यहमिमान्प्रश्नानवेदिष्यं विदितवानस्मि, कथं ते तुभ्यं प्रियाय पुत्राय समावर्तनकाले पुरा नावक्ष्यं नोक्तवानस्मि ? ॥ ५ ॥ | तब उस पिताने कहा--'हे वत्स ! तुमने उस समय आते ही जैसे ये प्रश्न मुझसे कहे हैं उनमेंसे मैं एकका भी विवेचन नहीं कर सकता । ऐसा ही तुम मुझे समझो; अर्थात् अपने अज्ञानरूप लिङ्गसे तुम उस विषयमें मेरा अज्ञान समझ लो; ऐसा क्यों ? क्योंकि इन प्रश्नोंमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता । तात्पर्य यह है कि हे तात ! जिस प्रकार तुम इन प्रश्नोंको नहीं जानते उसी प्रकार मैं भी नहीं जानता । अतः मेरे प्रति तुम्हें अन्यथाबुद्धि नहीं करनी चाहिये । किंतु यह बात ऐसी कैसे समझी जाय ? क्योंकि मैं इन्हें जानता नहीं हूँ; यदि मैं इन प्रश्नोंको जानता तो पहले समावर्तनसंस्कारके समय अपने प्रियपुत्र तुम्हारे प्रति क्यों न कहता !' ॥ ५ ॥ |
पिता-पुत्रका प्रवाहणके पास आना
| इत्युक्त्वा-- | ऐसा कहकर-- |
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स ह गौतमो राज्ञोऽर्धमेयाय तस्मै ह प्राप्तायार्हाञ्चकार स ह प्रातः सभाग उदेयाय तँहोवाच मानुषस्य भगवन्गौतम वित्तस्य वरं वृणीथा इति। स होवाच तवैव
४७८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
४७८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
राजन्मानुषं वित्तंयामेव कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्ता-
मेव मे ब्रूहीति स ह कृच्छ्री बभूव ॥ ६ ॥
तब वह गौतम राजाके स्थानपर आया। राजाने अपने यहाँ आये हुए उसकी पूजा की। [ दूसरे दिन प्रातःकाल होते ही राजाके सभामें पहुँचनेपर वह गौतम उसके पास गया। उसने उससे कहा—'हे भगवान् गौतम ! आप मनुष्यसम्बन्धी धनका वर माँग लीजिये।' उसने कहा—'राजन् ! ये मनुष्यसम्बन्धी धन आपहीके पास रहें; आपने मेरे पुत्रके प्रति जो बात [ प्रश्नरूपसे ] कही थी वही मुझे बतलाइये।' तब वह संकटमें पड़ गया ॥ ६ ॥
| स ह गौतमो गोत्रतः, राज्ञो जैवलेरर्धं स्थानमेयायागतवान् । तस्मै ह गौतमाय प्राप्तायार्हाम-र्हणां चकार कृतवान् । स च गौतमः कृतातिथ्य उषित्वा परेद्युः प्रातःकाले सभागे सभां गते राज्ञ्युदेयाय । भजनं भागः पूजा सेवा सह भागेन वर्तमानो वा सभागः पूज्यमानोऽन्यैः स्वयं गौतम उदेयाय राजान-मुद्गतवान् ।<br><br>तं होवाच गौतमं राजा—मानुषंस्य भगवन्गौतम मनुष्य-सम्बन्धिनो वित्तस्य ग्रामादेर्वरं वरणीयं कामं वृणीथाःप्रार्थयेथाः। | वह गौतम-गोत्रोत्पन्न मुनि राजा जैवलिके स्थानपर आया । अपने यहाँ आये हुए उस गौतमकी उसने अर्हा-पूजा की । इस प्रकार आतिथ्यसत्कारसे सत्कृत वह गौतम उस दिन निवास कर दूसरे दिन सबेरे ही राजाके सभागत होने--सभामें पहुँचनेपर उसके समीप गया । अथवा [ 'सभागः' पाठ मानकर ऐसा अर्थ हो सकता है-] भाग-भजन अर्थात् पूजा-सेवाको कहते हैं जो भागसे युक्त अर्थात् दूसरेसे पूजित था वह गौतम स्वयं राजाके पास गया ।<br><br>उस गौतमसे राजाने कहा--'हे भगवन् ! आप मनुष्यसम्बन्धी ग्रामादि धनका वरण करने योग्य वर इच्छानुसार माँग लीजिये।' |
खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ ४७९
| स होवाच गौतमः—तवैव तिष्ठतु राजन्मानुष वित्तम्; यामेव कुमारस्य मम पुत्रस्यान्ते समीपे वाचं पञ्चप्रश्नलक्षणामभाषथा उक्तवानसि तामेव वाचं मे मह्यं ब्रूहि कथयेत्युक्तो गौतमेन राजा सह कृच्छ्री दुःखी बभूव—कथं न्विदामिति ॥६॥ | उस गौतमने कहा—‘हे राजन् ! यह मनुष्यसम्बन्धी धन तुम्हारे ही पास रहे । तुमने कुमार अर्थात् मेरे पुत्रके प्रति जो पाँच प्रश्नरूप बात कही थी वही मुझसे कहो । गौतमके इस प्रकार कहनेपर वह राजा यह कहता हुआ कि ‘यह कैसे हो सकता है?’ कृच्छ्री --दुखी हो गया ॥ ६ ॥ |
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प्रवाहणका वरप्रदान
| स ह कृच्छ्रीभूतोऽप्रत्याख्येयं ब्राह्मणं मन्वानो न्यायेन विद्या वक्तव्येति मत्वा— | इस प्रकार दुखी हुए उस राजाने ‘ब्राह्मणका प्रत्याख्यान नहीं करना चाहिये’ यह मानते हुए तथा ‘विद्याका नियमानुसार ही उपदेश करना चाहिये’ यह समझते हुए— |
तꣳह चिरं वसेत्याज्ञापयाञ्चकार तꣳहोवाच यथा मा त्वं गौतमावदो यथेयं न प्राक् त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान्गच्छति तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासनमभूदिति तस्मै होवाच ॥ ७ ॥
उसे ‘यहाँ चिरकालतक रहो’ ऐसी आज्ञा दी, और उससे कहा—‘हे गौतम ! जिस प्रकार तुमने मुझसे कहा है [उससे तुम यह समझो कि] पूर्वकालमें तुमसे पहले यह विद्या ब्राह्मणोंके पास नहीं गयी। इसीसे सम्पूर्ण लोकोंमें [इस विद्याद्वारा] क्षत्रियोंका ही [शिष्योंके प्रति] अनुशासन होता रहा है।' ऐसा कहकर वह गौतमसे बोला—॥ ७ ॥
| तं ह गौतमं चिरं दीर्घकालं वसेत्येवमाज्ञापयाञ्चकाराज्ञप्तवान्। यत्पूर्वं प्रत्याख्यातवान्राजा | उस गौतमको उसने 'यहाँ चिरकालतक रहो' ऐसी आज्ञा दी । राजाने पहले जो विद्याका प्रत्या- |
४८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| विद्यां यच्च पश्चाच्चिरं वसेत्याज्ञाप्तवान्, तन्निमित्तं ब्राह्मणं क्षमापयति हेतुवचनोक्त्या ।<br><br>तं होवाच राजा सर्वविद्यो ब्राह्मणोऽपि सन्नयथा येन प्रकारेण मा मां हे गौतमावदस्त्वं तामेव विद्यालक्षणां वाचं मे ब्रूहीत्यज्ञानात्तेन त्वं जानीहि । तत्रास्ति वक्तव्यं यथा येन प्रकारेणेयं विद्या प्राक् त्वत्तो ब्राह्मणान्न गच्छति न गतवती । न च ब्राह्मणा अनया विद्ययानुशासितवन्तः । तथैतत्प्रसिद्धं लोकेयतस्तस्मादु पुरा पूर्वं सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव क्षत्रजातेरेवानया विद्यया प्रशासनं प्रशास्तृत्वं शिष्याणामभूद्बभूव । क्षत्रियपरम्परयैवेयं विद्यैतावन्तं कालमागता, तथाप्यहमेतां तुभ्यं वक्ष्यामि त्वत्सम्प्रदानादूर्ध्वं ब्राह्मणान्गमिष्यति । अतो मया यदुक्तं तत्क्षन्तुमर्हसीत्युक्त्वा तस्मै होवाच विद्यां राजा ॥७॥ | स्थान किया और फिर उसे 'चिरकालतक रहो' ऐसी आज्ञा दी, उसका कारण बतलाते हुए वह ब्राह्मणसे क्षमा कराता है।<br><br>राजाने उससे कहा—'सर्वविद्यासम्पन्न ब्राह्मण होनेपर भी हे गौतम ! तुमने जिस प्रकार मुझसे 'उस विद्यारूप वाणीको ही मेरे प्रति कहो' इस प्रकार अज्ञानपूर्वक कहा है इससे तुम यह जानो। उसमें यह कारण बतलाता है कि जिससे यह विद्या तुमसे पहले ब्राह्मणोंमें नहीं गयी तथा इस विद्याद्वारा ब्राह्मणोंने उपदेश ही नहीं किया; क्योंकि इस प्रकार यह बात इस लोकमें प्रसिद्ध है इसीसे पूर्वकालमें समस्त लोकोंमें क्षत्रियका ही--क्षत्रियजातिका ही इस विद्याके द्वारा शिष्योंका शासन--शिक्षकत्व रहा है। अर्थात् क्षत्रियोंकी परम्परासे ही इतने समयतक यह विद्या आयी है। तथापि मैं तुम्हारे प्रति इसका उपदेश करूँगा। तुम्हें देनेके पश्चात् यह ब्राह्मणोंके पास जायगी। इसलिये मैंने जो कुछ कहा है उसे क्षमा करना। ऐसा कहकर राजाने उसे विद्याका उपदेश किया ॥ ७ ॥ |
--: ० :-- इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥ -—: ० :—-
चतुर्थ खण्ड
पञ्चम प्रश्नका उत्तर
| पञ्चम्यामाहुतावाप इत्ययं प्रश्नः प्राथम्येनापाक्रियते । तदपाकरणमन्वितरेषामपाकरणमनुकूलं भवेदिति । अग्निहोत्राहुत्योः कार्यारम्भो यः स उक्तो वाजसनेयके । तं प्रति प्रश्नाः, उत्क्रान्तिराहुत्योर्गतिः प्रतिष्ठा तृप्तिः पुनरावृत्तिर्लोकं प्रत्युत्थायीति । तेषां चापाकरणमुक्तं तत्रैव—‘ते वा एते आहुती हुते उत्क्रामतस्ते अन्तरिक्षमाविशतस्ते अन्तरिक्षमेवाहवनीयं कुर्वते वायुं | अब 'पाँचवीं आहुतिमें आप (जल) पुरुषसंज्ञक क्यों हो जाते हैं?' इस प्रश्नका सबसे पहले निराकरण किया जाता है, क्योंकि उसका निराकरण होनेपर अन्य प्रश्नोंका निराकरण सुगम हो जायगा । अग्निहोत्रकी [ प्रातःकालिक और सायंकालिक ] दोनों आहुतियोंका जो कार्यारम्भ है वह वाजसनेयोपनिषद्में बतला दिया गया है । वहाँ उस ( कार्यारम्भ ) के विषयमें उन दोनों आहुतियोंकी उत्क्रान्ति, गति, प्रतिष्ठा, तृप्ति, पुनरावृत्ति तथा लोकोंके प्रति उत्थान करना-ये छः प्रश्न हैं । वहीं उनका निराकरण भी इस प्रकार बतलाया गया है—‘‘वे ये आहुतियाँ हवन किये जानेपर [ अपूर्वरूप होकर उत्क्रमण करते हुए यजमानको आवृत कर उसके साथ ] उत्क्रमण करती हुई अन्तरिक्षलोकमें प्रवेश करती हैं; और अन्तरिक्षलोकको ही आहवनीय, वायुको समिध् तथा किरणोंको |
४८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| समिधं मरीचीरेव शुक्लामाहुतिं ते अन्तरिक्षं तर्पयतस्ते तत उत्क्रामतः'' इत्यादि; एवमेव पूर्ववद्दिवं तर्पयतस्ते तत आवर्तेते । इमामाविश्य तर्पयित्वा पुरुषमाविशतः । ततः स्त्रियमाविश्य लोकं प्रत्युत्थायी भवतोति । | शुक्ल आहुति बनाती हैं; इस प्रकार ये अन्तरिक्षलोकको तृप्त करती हैं* फिर वहाँसे [ यजमानके उत्क्रमण करनेपर ] वे उत्क्रमण करती हैं" इत्यादिरूपसे इसी तरह पहलेहीके समान द्युलोकको [ द्युलोकस्थ यजमानको फलप्रदानद्वारा ] तृप्त करती हैं । तत्पश्चात् [ प्रारब्धक्षय होनेपर यजमानके पुनरावर्तन करनेपर ] वे वहाँसे लौट आती हैं, तथा इस लोकमें प्रवेश कर इसे तृप्त करनेके अनन्तर [रेतःसेकमें समर्थ] पुरुषमें प्रवेश करती हैं । फिर स्त्रीमें प्रवेश कर वे परलोकके प्रति [ लौकिक कर्म कराती हुई ] उत्थान करनेवाली होती हैं । † | | तत्राग्निहोत्राहुत्योः कार्यारम्भमात्रमेवंप्रकारं भवतीत्युक्तम् । इह तु तं कार्यारम्भमग्निहोत्रापूर्वपरिणामलक्षणं पञ्चधा प्रविभज्याग्नित्वेनोपासनमुत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधनं विधित्सन्नाह । असौ वाव लोको गौतमाग्निरित्यादि । | वहाँ ( वाजसनेयोपनिषद्में ) तो यह बतलाया गया था कि अग्निहोत्रकी आहुतियोंका केवल कार्यारम्भमात्र इस प्रकार होता है; किंतु यहाँ अग्निहोत्रके अपूर्वके परिणामरूप उस कार्यारम्भको पाँच प्रकारसे विभक्त कर उनमें उत्तरमार्गकी प्राप्तिके साधनभूत अग्निभावसे उपासनाका विधान करनेकी इच्छासे श्रुति 'असौ वाव लोको गौतमाग्निः' इत्यादि कथन करती है । |
* अर्थात् अन्तरिक्षलोकस्थ यजमानको फलोन्मुख करती हैं ।
† अर्थात् गर्भरूपसे उत्पन्न हुए यजमानको कर्मानुष्ठानमें समर्थ देहकी प्राप्ति करा उसके द्वारा पारलौकिक कर्म कराती हुई उसका परलोकके प्रति गमन कराती हैं !
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८३
| इह सायं प्रातरग्निहोत्राहुती हुते पयआदिसाधने श्रद्धापुरःसरे आहवनीयाग्निसमिद्धूमार्चिरङ्गारविस्फुलिङ्गभाविते कर्त्रादिकारकभाविते चान्तरिक्षक्रमेणोत्क्रम्य द्युलोकं प्रविशन्त्यौ सूक्ष्मभूते अप्समवायित्वादप्शब्दवाच्ये श्रद्धाहेतुत्वाच्च श्रद्धाशब्दवाच्ये। तयोरधिकरणोऽग्निः, अन्यच्च तत्संबद्धं समिदादीत्युच्यते। या चासावग्न्यादिभावना हुत्योः साऽपि तथैव निर्दिश्यते। | इस लोकमें जल आदि जिनके साधन हैं, जो श्रद्धापूर्वक निष्पन्न की जाती हैं, जिनमें आहवनीय अग्नि, समिध्, धूम, अर्चि, अङ्गार और विस्फुलिङ्गकी तथा कर्ता आदि कारककी भावना की गयी है, वे अग्निहोत्रकी सायंकालिक एवं प्रातःकालिक दो आहुतियाँ अन्तरिक्षक्रमसे उत्क्रमण कर द्युलोकमें प्रवेश करती हुई सूक्ष्म एवं अप्-समवायिनी (जलमयी) होनेके कारण 'अप्' शब्दकी वाच्य हैं और श्रद्धाजनित होनेके कारण 'श्रद्धा' शब्दकी वाच्य हैं। यहाँ उनके आश्रयभूत अग्नि और उससे सम्बद्ध जो समिध् आदि हैं उनका वर्णन किया जाता है तथा उन आहुतियोंमें जो अग्नि आदिकी भावना है उसका भी उसी प्रकार निर्देश किया जाता है। |
लोकरूपा अग्निविद्या
असौ वाव लोको गौतमाग्निस्तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिश्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! यह प्रसिद्ध [द्यु-] लोक ही अग्नि है। उसका आदित्य ही समिध् है, किरणें धूम हैं, दिन ज्वाला है, चन्द्रमा अङ्गार है और नक्षत्र विस्फुलिङ्ग (चिनगारियाँ) हैं ॥ १ ॥
छा० उ० १६—
४८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| असौ वाव लोकोऽग्निर्ह गौतम यथाग्निहोत्राधिकरणमाहवनीय इह। तस्याग्नेर्द्युलोकाख्यस्यादित्य एव समित्, तेन हीद्धोऽसौ लोको दीप्यते अतः समिन्धनात्समिदादित्यः। रश्मयो धूमस्तदुत्थानात्, समिधो हि धूम उत्तिष्ठति। अहरर्चिः प्रकाशसामान्यात्, आदित्यकार्यत्वाच्च। चन्द्रमा अङ्गाराः, अहःप्रशमेऽभिव्यक्तेः अर्चिषो हि प्रशमेऽङ्गारा अभिव्यज्यन्ते। नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गाश्चन्द्रमसोऽवयवा इव विप्रकीर्णत्वसामान्यात् ॥ १ ॥ | हे गौतम ! जिस प्रकार इस लोकमें आहवनीयाग्नि अग्निहोत्रका अधिकरण है उसी प्रकार यह प्रसिद्ध लोक ही अग्नि है। उस द्युलोकसंज्ञक अग्निका आदित्य ही समिध् है; उससे सम्यक्प्रकारसे दीप्त हुआ ही यह लोक देदीप्यमान होता है; अतः सम्यक् प्रकारसे इन्धन (दीपन) करनेके कारण आदित्य ही समिध् (इन्धन) है। उससे निकलनेके कारण किरणें धूम हैं, क्योंकि समिध्से ही धूम निकला करता है। प्रकाशमें समानता और आदित्यका कार्य होनेके कारण दिन ज्वाला है। चन्द्रमा अङ्गार है, क्योंकि यह दिनके शान्त होनेपर अभिव्यक्त होता है; लौकिक अङ्गारे भी ज्वालाके शान्त होनेपर ही प्रकट हुआ करते हैं। तथा चन्द्रमाके अवयवोंके समान नक्षत्रगण विस्फुलिङ्ग हैं, क्योंकि इधर-उधर छिटके रहनेमें [विस्फुलिङ्गोंके साथ] उनकी समानता है ॥ १ ॥ |
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुतेः सोमो राजा संभवति ॥ २ ॥
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८५
उस इस [द्युलोकरूप] अग्निमें देवगण श्रद्धाका हवन करते हैं । उस आहुतिसे सोम राजाकी उत्पत्ति होती है ॥ २ ॥
| तस्मिन्नेतस्मिन्यथोक्तलक्षणेऽग्नौ देवा यजमानप्राणा अग्न्यादिरूपा अधिदैवतम् । श्रद्धामग्निहोत्राहुतिपरिणामावस्थारूपाः सूक्ष्मा आपः श्रद्धाभाविताः श्रद्धा उच्यन्ते । पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीत्यपां होम्यतया प्रश्ने श्रुतत्वात् । श्रद्धा वा आपः, श्रद्धामेवारभ्य प्रणीय प्रचरन्ति, इति च विज्ञायते । तां श्रद्धामद्रूपां जुह्वति ।<br><br>तस्या आहुतेः सोमो राजापां श्रद्धाशब्दवाच्यानां द्युलोकाग्नौ हुतानां परिणामः सोमो राजा संभवति । यथर्ग्वेदादिपुष्परसा ऋगादिमधुकराेपनीतास्त आदित्ये यशआदिकार्यं रोहितादि- | उस इस उपर्युक्त लक्षणवाले अग्निमें देवगण—[अध्यात्मदृष्टिसे] यजमानके प्राण तथा अधिदैवत-रूपसे अग्नि आदि देवगण श्रद्धाका [ हवन करते हैं ] । अग्निहोत्रकी आहुतियोंकी परिणामावस्थारूप सूक्ष्म जल श्रद्धारूपसे भावित होनेके कारण श्रद्धा कहा जाता है। [ यहाँ 'श्रद्धा' शब्दसे जलका उल्लेख इसलिये किया गया है ] क्योंकि 'पाँचवीं' आहुति देनेपर जल 'पुरुष' शब्दवाची हो जाता है' इस प्रश्नमें जल होम्यद्रव्यरूपसे सुना गया था । इसके सिवा यह प्रसिद्ध भी है कि 'श्रद्धा ही जल है तथा श्रद्धासे आरम्भ करके ही लोग सामग्री जुटाकर कर्म करते हैं' । उस जलरूपा श्रद्धाका वे हवन करते हैं ।<br><br>उस आहुतिसे राजा सोम होता है अर्थात् 'श्रद्धा' शब्दवाच्य जल-का द्युलोकरूप अग्निमें हवन किये जानेपर उसका परिणामरूप दीप्ति-मान् चन्द्रमा होता है । जिस प्रकार ( अ० ३ खं० १ में ) यह कहा गया है कि 'ऋग्वेदादि पुष्पके रस ऋगादि मधुकरोंद्वारा ले जाये जानेपर आदित्यमें जिस प्रकार रोहितादिरूप |
४८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| रूपलक्षणमारभन्त इत्युक्तं तथेमा अग्निहोत्राहुतिसमवायिन्यः सूक्ष्माः श्रद्धाशब्दवाच्या आपो द्युलोकमनुप्रविश्य चान्द्रं कार्यमारभन्ते फलरूपमग्निहोत्राहुत्योः। <br><br> यजमानाश्च तत्कर्त्तार आहुतिमया आहुतिभावनाभाविता आहुतिरूपेण कर्मणाकृष्टाः श्रद्धाप्समवायिनो द्युलोकमनुप्रविश्य सोमभूता भवन्ति । तदर्थं हि तैरग्निहोत्रं हुतम् । अत्र त्वाहुतिपरिणाम एव पञ्चाग्निसंबन्धक्रमेण प्राधान्येन विवक्षित उपासनार्थं न यजमानानां गतिः । तां त्वविदुषां धूमादिक्रमेणोत्तरत्र वक्ष्यति विदुषां चोत्तरां विद्याकृताम् ॥ २ ॥ | यज्ञ आदि कार्य आरम्भ करते हैं, उसी प्रकार अग्निहोत्रकी आहुतियोंसे सम्बद्ध ये 'श्रद्धा' शब्दवाच्य सूक्ष्म जल द्युलोकमें प्रवेश कर अग्निहोत्रकी आहुतियोंका फलरूप चन्द्रमासम्बन्धी कार्य आरम्भ करते हैं । <br><br> तथा उस हवनके करनेवाले यजमान आहुतिमय—आहुतिकी भावनासे भावित आहुतिरूप कर्मसे आकर्षित हो श्रद्धारूप जलसे पूर्ण हो द्युलोकमें प्रवेश कर चन्द्रमारूप हो जाते हैं, क्योंकि उसीके लिये उन्होंने अग्निहोत्र किया था; किंतु यहाँ तो उपासनाके लिये प्रधानतया पाँच अग्नियोंके सम्बन्धसे आहुतियोंका परिणाम ही बतलाना अभीष्ट है, यजमानोंकी गति नहीं; उसका तो श्रुति आगे चलकर धूमादिक्रमसे अविद्वानोंकी गतिका तथा विद्यासे प्राप्त होनेवाली विद्वानोंकी उत्तरमार्गीय गतिका वर्णन करेगी ॥२॥ |
—: ० :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥
—: ० :—
पञ्चम खण्ड
पर्जन्यरूप अग्निविद्या
| द्वितीयहोमपर्यायार्थमाह— | अब श्रुति द्वितीय होमके पर्यायार्थका वर्णन करती है— |
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पर्जन्यो वाव गौतमाग्निस्तस्य वायुरेव समिदभ्रं धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा ह्रादनयो विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! पर्जन्य ही अग्नि है; उसका वायु ही समिध् है, बादल धूम है, विद्युत् ज्वाला है, वज्र अङ्गार है तथा गर्जन विस्फुलिङ्ग हैं ॥१॥
| पर्जन्यो वाव पर्जन्य एव गौतमाग्निः पर्जन्यो नाम वृष्ट्युपकरणाभिमानी देवताविशेषः। तस्य वायुरेव समित्। वायुना हि पर्जन्योऽग्निः समिध्यते, पुरोवातादिप्राबल्ये वृष्टिदर्शना। अभ्रं धूमो धूमकार्यत्वाद् धूमवच्च लक्ष्यमाणत्वात्। विद्युदर्चिः, प्रकाशसामान्यात्। अशनिरङ्गाराः, काठिन्याद्विद्युत्सम्बन्धाद्वा। ह्रादनयो | हे गौतम ! 'पर्जन्यो वाव'-पर्जन्य ही अग्नि है—वृष्टिके जो साधन हैं उनके अभिमानी देवताविशेषका नाम 'पर्जन्य' है। उसका वायु ही समिध् है, क्योंकि पर्जन्यरूप अग्नि वायुसे ही प्रदीप्त होता है, जैसा कि पूर्वीय वायु आदिकी प्रबलता होनेपर वृष्टि होती देखी जानेसे सिद्ध होता है। धूमका कार्य होने तथा धूमवत् देखा जानेके कारण बादल धूम है। प्रकाशमें समानता होनेके कारण विद्युत् (बिजली) ज्वाला है। कठिनताके कारण अथवा विद्युत्से सम्बन्ध रखनेके कारण वज्र अङ्गार है। ह्रादनय विस्फुलिङ्ग |
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४८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ५
| ४८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ५ |
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| विस्फुलिङ्गाः, ह्रादनयो गर्जित- | है; मेघोंकी गर्जनाके शब्दोंको |
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| शब्दा मेघानां विप्रकीर्णत्वसा- | 'ह्रादनि' कहते हैं; विप्रकीर्णत्व (इधर-उधर फैले रहने) में समानता |
| मान्यात् ॥ १ ॥ | होनेके कारण वे विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥ |
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोमं राजानं जुह्वति तस्या आहुतेर्वर्ष सम्भवति ॥ २ ॥
उस अग्निमें देवगण राजा सोमका हवन करते हैं; उस आहुतिसे वर्षा होती है ॥ २ ॥
| तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पूर्ववत्सोमं राजानं जुह्वति। तस्या आहुतेर्वर्षं संभवति । श्रद्धाख्या आपः सोमाकारपरिणता द्वितीये पर्याये पर्जन्याग्निं प्राप्य वृष्टि-त्वेन परिणमन्ते ॥ २ ॥ | उस इस अग्निमें देवगण पूर्ववत् राजा सोमका हवन करते हैं । उस आहुतिसे वर्षा होती है । श्रद्धासंज्ञक आप् इस द्वितीय पर्यायमें सोमके आकारमें परिणत हो पर्जन्याग्निको प्राप्त होकर वृष्टिरूपमें परिणत हो जाते हैं ॥ २ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥
षष्ठ खण्ड
पृथिवीरूपा अग्निविद्या
पृथिवी वाव गौतमाग्निस्तस्याः संवत्सर एव समिदाकाशो धूमो रात्रिरर्चिर्दिशोऽङ्गारा अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! पृथिवी ही अग्नि है। उसका संवत्सर ही समिध् है, आकाश धूम है, रात्रि ज्वाला है, दिशाएँ अङ्गारे हैं तथा अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥
| पृथिवी वाव गौतमाग्निरित्यादि पूर्ववत् । तस्याः पृथिव्याख्यस्याग्नेः संवत्सर एव समित्; संवत्सरेण हि कालेन समिद्धा पृथिवी व्रीह्यादिनिष्पत्तये भवति । आकाशो धूमः, पृथिव्या इवोत्थित आकाशो दृश्यते; यथाग्नेर्धूमः । रात्रिरर्चिः, पृथिव्या ह्यप्रकाशात्मिकाया अनुरूपा रात्रिः; तमोरूपत्वात्, अग्नेरिवानुरूपमर्चिः। | 'हे गौतम ! पृथिवी ही अग्नि है' इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये । उस पृथिवीसंज्ञक अग्निका संवत्सर ही समिध् है, क्योंकि संवत्सररूप कालसे समिद्ध होकर अर्थात् पुष्टि लाभ करके ही पृथिवी धान्यादिकी निष्पत्तिमें समर्थ होती है । आकाश धूम है, क्योंकि आकाश पृथिवीसे उठा हुआ-सा दिखायी देता है, जिस प्रकार कि अग्निसे धुआँ उठता दिखायी देता है । रात्रि ज्वाला है; अप्रकाशात्मिका पृथिवीके अनुरूप ही रात्रि ज्वाला है, क्योंकि वह तमोरूपा है; अतः [ पृथिवीरूप ] अग्निके समान यह उसके अनुरूप ज्वाला है । |
४९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| दिशोऽङ्गाराः, उपशान्तत्वसामान्यात् । अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गाः, क्षुद्रत्वसामान्यात् ॥ १ ॥ | उपशान्तिमें समानता होनेके कारण दिशाएँ अङ्गारे हैं तथा क्षुद्रत्वमें समानता होनेके कारण अवान्तर-दिशाएँ (कोण) विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥ |
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वर्षं जुह्वति तस्या आहुतेरन्नँसंभवति ॥ २ ॥
उस इस अग्निमें देवगण वर्षाका हवन करते हैं; उस आहुतिसे अन्न होता है ॥ २ ॥
| तस्मिन्नित्यादि समानम् । तस्या आहुतेरन्नं व्रीहियवादि संभवति ॥ २ ॥ | ‘तस्मिन्नेतस्मिन्’ इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत् है। उस आहुतिसे व्रीहियवादिरूप अन्न होता है ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
सप्तम खण्ड
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पुरुषरूपा अग्निविद्या
पुरुषो वाव गौतमाग्निस्तस्य वागेव समित्प्राणो धूमो जिह्वार्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। उसकी वाक् ही समिध् है, प्राण धूम है, जिह्वा ज्वाला है, चक्षु अङ्गारे और श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं ॥१॥
| पुरुषो वाव गौतमाग्निः। । तस्य वागेव समित्, वाचा हि मुखेन समिध्यते पुरुषो न मूकः। प्राणो धूमः, धूम इव मुखान्निर्गमनात्। जिह्वार्चिर्लोहितत्वात्। चक्षुरङ्गाराः, भास आश्रयत्वात्। श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः, विप्रकीर्णत्वसाम्यात् ॥ १ ॥ | हे गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। उसकी वाक् ही समिध् है, क्योंकि वाणीरूप मुखके द्वारा ही पुरुष सुशोभित होता है, मूक पुरुष शोभित नहीं होता। प्राण धूम है, क्योंकि वह धूमके समान मुखसे निकलता है; लाल होनेके कारण जिह्वा ज्वाला है; प्रकाशका आश्रय होनेके कारण नेत्र अङ्गारे हैं तथा विप्रकीर्णत्वमें समानता होनेसे श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥ |
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुते रेतः संभवति ॥ २ ॥
४९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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उस इस अग्निमें देवगण अन्नका होम करते हैं। उस आहुतिसे वीर्य उत्पन्न होता है ॥ २ ॥
| समानमन्यत् । अन्नं जुह्वति <br><br> व्रीह्यादिसंस्कृतम् । तस्या <br><br> आहुते रेतः संभवति ॥ २ ॥ | शेष अर्थ पूर्ववत् है। देवगण इसमें व्रीहि आदिसे सम्यक् प्रकारसे तैयार किये हुए अन्नका हवन करते हैं। उस आहुतिसे वीर्य उत्पन्न होता है ॥ २ ॥ |
<div align="center">इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥
अष्टम खण्ड
—: ० :—
स्त्रीरूपा अग्निविद्या
योषा वाव गौतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव समि- द्यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! स्त्री ही अग्नि है। उसका उपस्थ ही समिध् है, पुरुष जो उपमन्त्रण करता है वह धूम है, योनि ज्वाला है तथा जो भीतरकी ओर करता है वह अङ्गारे हैं और उससे जो सुख होता है वह विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥
| योषा वाव गौतमाग्निः । तस्या उपस्थ एव समित्, तेन हि सा पुत्राद्युत्पादनाय समिध्यते । यदुपमन्त्रयते स धूमः, स्त्रीसंभवादुपमन्त्रणस्य । योनिरर्चिर्लोहितत्वात् । यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अग्निसंबन्धात् । अभिनन्दाः सुखलवा विस्फुलिङ्गाः क्षुद्रत्वात् ॥ १ ॥ | हे गौतम ! स्त्री ही अग्नि है। उसका उपस्थ ही समिध् है, क्योंकि उससे वह पुत्रादि उत्पन्न करनेके लिये समिद्ध होती है। पुरुष जो उपमन्त्रण करता है वह धूम है, क्योंकि उपमन्त्रणकी प्रवृत्ति स्त्रीसे ही होती है। लोहितवर्ण होनेके कारण योनि ज्वाला है तथा जो भीतरकी ओर करता है वह अग्निके सम्बन्धके कारण अङ्गारे हैं और अभिनन्द—सुखके कणमात्र क्षुद्र होनेके कारण विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥ |
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४९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुतेर्गर्भः संभवति ॥ २ ॥
उस इस अग्निमें देवगण वीर्यका हवन करते हैं, उस आहुतिसे गर्भ उत्पन्न होता है ॥ २ ॥
| तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति, तस्या आहुतेर्गर्भः संभवतीति; एवं श्रद्धासोमवर्षान्नरेतोहवनपर्यायक्रमेणाप एव गर्भीभूतास्ताः। तत्रापामाहुतिसमवायित्वात्प्राधान्यविवक्षाः आपः पञ्चम्यामाहुतौ पुरुषवचसो भवन्तीति। न त्वाप एव केवलाः सोमादिकार्यमारभन्ते, न चापोऽत्रिवृत्कृताः सन्तीति। त्रिवृत्कृतत्वेऽपि विशेषसंज्ञालाभो दृष्टः पृथिवीयमिमा आपोऽयमग्निरित्यन्यतमबाहुल्यनिमित्तः। | उस इस अग्निमें देवगण वीर्यका हवन करते हैं; उस आहुतिसे गर्भ उत्पन्न होता है—इस प्रकार श्रद्धा, सोम, वर्षा, अन्न और रेतःरूप आहुतियोंके हवनके पर्यायक्रमसे वह जल ही गर्भरूपमें परिणत होता है। उनमें आहुतियोंसे सम्बद्ध होनेके कारण श्रुतिको जलकी ही प्रधानता बतलानी अभीष्ट है, इसीसे उसने कहा है कि पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुषवाची हो जाता है। केवल जल ही सोमादि कार्य आरम्भ कर देते हों—यह बात नहीं है, और न जल अत्रिवृत्कृत (पृथिवी, जल और तेज इन तीनोंके सम्मिश्रणसे रहित) हों—ऐसी ही बात है। त्रिवृत्कृत होनेपर भी एक-एक भूतकी बहुलताके कारण उनमेंसे प्रत्येकको 'यह पृथिवी है, यह जल है, यह अग्नि है' इस प्रकार भिन्न-भिन्न नाम प्राप्त होता देखा जाता है। अतः जलकी |