देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ६ ] पञ्चम स्कन्ध ५५९
अ० ६ ] पञ्चम स्कन्ध ५५९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तं तथा पतितं वीक्ष्य ह्यारिरतिकोपनः ॥ ३३<br><br>आजगाम रमानाथं त्रासयन्नतिगर्जितैः ।<br>वासुदेवोऽपि तं दृष्ट्वा समायान्तं क्रुधान्वितम् ॥ ३४<br><br>चापज्यानिनादं चोग्रं चकार नन्दयन्सुरान् ।<br>शरवृष्टिं चकाराशु भगवान्महिषोपरि ॥ ३५<br><br>सोऽपि चिच्छेद बाणौघैस्ताञ्छरानागनेरितान् ।<br>तयोर्युद्धमभूद्राजन् परस्परभयावहम् ॥ ३६ | उसे इस प्रकार गिरा हुआ देखकर महिषासुर अत्यन्त क्रोधित हो उठा और अपनी घोर गर्जनासे भयभीत करता हुआ भगवान् विष्णुके सामने आ गया। भगवान् विष्णुने भी उस महिषासुरको कुपित होकर अपने समक्ष आया देखकर देवताओंको आनन्दित करते हुए अपने धनुषकी प्रत्यंचासे भयानक टंकार उत्पन्न की। तत्पश्चात् भगवान् विष्णु महिषासुरके ऊपर शीघ्रतापूर्वक बाणोंकी बौछार करने लगे। उसने भी अपने बाणसमूहोंसे उन आते हुए बाणोंको आकाशमें ही काट डाला। हे राजन्! इस प्रकार उन दोनोंमें परस्पर अति भीषण युद्ध हुआ॥ ३३-३६॥ |
| गदया ताडयामास केशवो मस्तकोपरि ।<br>स गदाभिहतो मूर्ध्नि पपातोर्व्यां सुमूर्च्छितः ॥ ३७<br><br>हाहाकारो महानासीत्सैन्ये तस्य सुदारुणः ।<br>स विहाय व्यथां दैत्यो मुहूर्तादुत्थितः पुनः ॥ ३८<br><br>गृहीत्वा परिघं शीर्षे जघान मधुसूदनम् ।<br>परिघेणाहतस्तेन मूर्च्छामप जनार्दनः ॥ ३९<br><br>मूर्च्छितं तमुवाहाशु जगाम गरुडो रणात् ।<br>परावृत्ते जगन्नाथे देवा इन्द्रपुरोगमाः ॥ ४० | भगवान् विष्णुने गदासे महिषासुरके मस्तकपर प्रहार किया। मस्तकपर उस गदाके आघातसे मूर्च्छित होकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। [यह देखकर] उसकी सेनामें अति भीषण हाहाकार मच गया। कुछ ही क्षणोंमें अपनी वेदनाको भूलकर वह दैत्य फिर उठकर खड़ा हो गया। उसने तत्काल एक परिघ लेकर मधुसूदन श्रीविष्णुके सिरपर प्रहार किया। उस परिघके प्रहारसे आहत होकर भगवान् विष्णु मूर्च्छाको प्राप्त हो गये। तब गरुड मूर्च्छाको प्राप्त उन भगवान् विष्णुको युद्धस्थलसे लेकर बाहर चले गये। इस प्रकार जगत्पति विष्णुके समरांगणसे लौट जानेपर इन्द्र आदि प्रधान देवता भयभीत हो गये और दुःखसे पीड़ित होकर युद्धभूमिमें चीखने-चिल्लाने लगे॥ ३७-४० १/२॥ |
| भयं प्रापुः सुदुःखातार्श्चक्रुशुश्च रणाजिरे ।<br>क्रन्दमानान्सुरान्वीक्ष्य शङ्करः शूलभृत्तदा ॥ ४१<br><br>महिषं तरसाभ्येत्य प्राहरद्रोषसंयुतः ।<br>सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ शङ्करस्योरसि स्फुटम् ॥ ४२<br><br>जगर्ज स च दुष्टात्मा वञ्चयित्वा त्रिशूलकम् ।<br>शङ्करोऽपि तदा पीडां न प्रापोरसि ताडितः ॥ ४३<br><br>तं जघान त्रिशूलेन कोपादरुणलोचनः । | तत्पश्चात् शूलधारी भगवान् शंकरने देवताओंको इस प्रकार करुण क्रन्दन करते हुए देखकर अत्यन्त क्रोधके साथ महिषासुरके पास द्रुतगतिसे पहुँचकर उसपर भीषण प्रहार किया। उस महिषासुरने भी भगवान् शंकरके वक्षःस्थलपर अपनी शक्ति (बर्छी)-से तेज प्रहार किया और उनके त्रिशूलप्रहारको विफल करके उस दुष्टात्माने बड़ी तेज गर्जना की। वक्षपर प्रहार होनेपर भी भगवान् शंकरको कोई पीड़ा नहीं हुई और क्रोधसे आँखें लाल करके उन्होंने उसपर अपने त्रिशूलसे प्रहार किया॥ ४१-४३ १/२॥ |
| ५६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| संलग्नं शङ्करं दृष्ट्वा महिषेण दुरात्मना ॥ ४४<br><br>आजमाम हरिस्तावत्त्यक्त्वा मूर्च्छां प्रहारजाम् ।<br>महिषस्तु तदा वीक्ष्य सम्प्राप्तौ हरिशङ्करौ ॥ ४५<br><br>युद्धकामौ महावीर्यौ चक्रशूलधरौ वरौ ।<br>कोपयुक्तो बभूवासौ दृष्ट्वा तौ समुपागतौ ॥ ४६<br><br>जगाम सम्मुखस्तावत्संग्रामार्थं महाभुजः ।<br>माहिषं वपुरास्थाय धुन्वन्पुच्छं समुत्कटम् ॥ ४७<br><br>चकार भैरवं नादं त्रासयन्नमरानपि ।<br>धुन्वञ्शृङ्गे महाकायो दारुणो जलदो यथा ॥ ४८<br><br>शृङ्गाभ्यां पर्वताञ्छृङ्गांश्चिक्षेप भृशमुत्कटान् । | इसी बीच दुष्टात्मा महिषासुरके साथ भगवान् शंकरको इस प्रकार युद्धरत देखकर प्रहारजनित मूर्च्छाका त्याग करके वहाँ भगवान् विष्णु आ गये। उस समय युद्धके लिये उत्सुक महापराक्रमी विष्णु तथा शिवको श्रेष्ठ सुदर्शन चक्र तथा त्रिशूल धारण करके लड़नेके लिये अपने समक्ष उपस्थित देखकर वह महाबली महिषासुर अत्यन्त कुपित हो उठा। तत्पश्चात् वह विशालबाहु दैत्य उन दोनों देवताओंको अपने समीप आया हुआ देखकर महिषका रूप धारण करके पूँछ हिलाता हुआ युद्ध करनेके लिये उनके समक्ष पहुँच गया। देवताओंको आतंकित करते हुए उस विशालकाय तथा भयावह महिषासुरने अपनी सींगें फटकारते हुए मेघकी भाँति भीषण गर्जना की तथा वह अपनी सींगोंसे पर्वतोंकी बड़ी-बड़ी चट्टानें उखाड़-उखाड़कर फेंकने लगा ॥ ४४-४८ ½ ॥ |
| दृष्ट्वा तौ तु महावीर्यौ दानवं देवसत्तमौ ॥ ४९<br><br>चक्रतुर्बाणवृष्टिं च दानवोपरि दारुणाम् ।<br>कुर्वाणौ बाणवृष्टिं तौ दृष्ट्वा हरिहरौ हरिः ॥ ५०<br><br>चिक्षेप गिरिशृङ्गं तु पुच्छेनावृत्य दारुणम् ।<br>आपतन्तं गिरिं वीक्ष्य भगवान्सात्वतां पतिः ॥ ५१<br><br>विशिखैः शतधा चक्रे चक्रेणाशु जघान तम् ।<br>हरिचक्राहतः संख्ये मूर्च्छामाप स दैत्यराट् ॥ ५२<br><br>उत्तस्थौ च क्षणान्नूनं मानुषं वपुरास्थितः ।<br>गदापाणिर्महाघोरो दानवः पर्वतोपमः ॥ ५३<br><br>मेघनादं ननादोच्चैर्भीषयन्नमरानपि । | उस दानवको देखकर महापराक्रमी देवश्रेष्ठ विष्णु तथा शंकर उसके ऊपर भीषण बाण-वृष्टि करने लगे। भगवान् विष्णु तथा शिवको अपने ऊपर बाण-वृष्टि करते हुए देखकर महिषासुरने अपनी पूँछमें एक भयानक पर्वतशिखर लपेटकर उनके ऊपर फेंका। उस पर्वत-शिखरको आते देखकर भगवान् विष्णुने अपने बाणोंसे उसके सैकड़ों टुकड़े कर दिये और फिर सुदर्शन चक्रसे उसके ऊपर शीघ्रतासे प्रहार किया। भगवान् विष्णुके चक्रसे आहत होकर वह दैत्यराज महिषासुर युद्धमें मूर्च्छित हो गया। किंतु थोड़ी ही देरमें वह मनुष्यका शरीर धारण करके उठ खड़ा हुआ। पर्वतके समान शरीरवाला वह महाभयानक दैत्य हाथमें गदा धारणकर देवताओंको भयभीत करता हुआ मेघके समान जोर-जोरसे गरजने लगा ॥ ४९-५३ ½ ॥ |
| तच्छ्रुत्वा भगवान्विष्णुः पाञ्चजन्यं समुज्ज्वलम् ॥ ५४<br><br>पूरयामास तरसा शब्दं कर्तुं खरस्वरम् ।<br>तेन शब्देन शङ्खस्य भयत्रस्ताश्च दानवाः ।<br>बभूवुर्मुदिता देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥ ५५ | उस नादको सुनकर भगवान् विष्णुने तीव्रतर ध्वनि उत्पन्न करनेके लिये बड़ी तेजीसे अपना देदीप्यमान पांचजन्य नामक शंख बजाया। शंखकी उस ध्वनिसे समस्त दानव भयभीत हो गये और तपोधन ऋषिगण तथा देवता आनन्दमग्न हो गये ॥ ५४-५५ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषासुरस्येन्द्रादिदेवैः सह युद्धवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
अ० ७] पञ्चम स्कन्ध ५६१
अ० ७] पञ्चम स्कन्ध ५६१
अथ सप्तमोऽध्यायः
महिषासुरको अवध्य जानकर त्रिदेवोंका अपने-अपने लोक लौट जाना, देवताओंकी पराजय तथा महिषासुरका स्वर्गपर आधिपत्य, इन्द्रका ब्रह्मा और शिवजीके साथ विष्णुलोकके लिये प्रस्थान
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| असुरान्महिषो दृष्ट्वा विषण्णमनसस्तदा।<br>त्यक्त्वा तन्माहिषं रूपं बभूव मृगराडसौ॥ १ | [हे महाराज जनमेजय!] महिषासुरने समस्त दानवोंको खिन्नमनस्क देखकर महिषका वह रूप छोड़कर तत्काल सिंहका रूप धारण कर लिया॥ १॥ |
| कृत्वा नादं महाघोरं विस्तार्य च महासटाम्।<br>पपात सुरसेनायां त्रासयन्नखदर्शनैः॥ २ | तत्पश्चात् भयानक गर्जन करके गर्दनके बाल (अयाल) फैलाकर अपने तीक्ष्ण नख दिखाकर देवताओंको भयभीत करता हुआ वह देवसेनापर टूट पड़ा॥ २॥ |
| गरुडञ्च नखाघातैः कृत्वा रुधिरविप्लुतम्।<br>जघान च भुजे विष्णुं नखाघातेन केसरी॥ ३ | उसने गरुड़के ऊपर अपने नाखूनोंसे आघात करके उन्हें रक्तसे लथपथ कर दिया। पुनः सिंहरूपधारी उस दानवने विष्णुकी भुजापर अपने नखोंसे प्रहार किया॥ ३॥ |
| वासुदेवोऽपि तं दृष्ट्वा चक्रमुद्यम्य वेगवान्।<br>हन्तुकामो हरिः काममवापाशु क्रुधान्वितः॥ ४ | भगवान् विष्णुने उसे देखकर कुपित हो तत्काल अपना सुदर्शन चक्र लेकर उस दैत्यको मार डालनेकी इच्छासे बड़े वेगसे उसपर चला दिया॥ ४॥ |
| यावद्वयरिपुं वेगाच्चक्रेणाभिजघान तम्।<br>तावत्सोऽतिबलः शृङ्गी शृङ्गाभ्यां न्यहनद्धरिम्॥ ५ | भगवान् विष्णुने उस महिषासुरपर ज्यों ही अपने चक्रसे तेज प्रहार किया त्यों ही वह महान् शक्तिशाली महिषका रूप धारणकर भगवान् विष्णुको अपनी सींगोंसे मारने लगा॥ ५॥ |
| वासुदेवो विषाणाभ्यां ताडितोरसि विह्वलः।<br>पलायनपरो वेगाज्जगाम भुवनं निजम्॥ ६ | वक्षःस्थलपर सींगके आघातसे व्याकुल होकर भगवान् विष्णु बड़े वेगसे भागकर अपने लोक चले गये। |
| गतं दृष्ट्वा हरिं कामं शङ्करोऽपि भयान्वितः।<br>अवध्यं तं परं मत्वा ययौ कैलासपर्वतम्॥ ७ | विष्णुको पलायित देखकर शंकरजी भी बहुत भयभीत हो गये और उसे सर्वथा अवध्य मानकर कैलासपर्वतपर चले गये। |
| ब्रह्मापि च निजं धाम त्वरितः प्रययौ भयात्।<br>मघवा वज्रमालम्ब्य तस्थावाजौ महाबलः॥ ८ | ब्रह्माजी भी उसके डरसे तत्काल अपने लोक चले गये॥ ६-७ १/२॥<br>महाबली इन्द्र वज्र धारण किये हुए समरांगणमें डटे रहे। |
| वरुणः शक्तिमालम्ब्य धैर्यमालम्ब्य संस्थितः।<br>यमोऽपि दण्डमादाय यत्तः समरतत्परः॥ ९ | वरुणदेव अपना पाशास्त्र लेकर धैर्यपूर्वक खड़े रहे। यमराज अपना दण्ड धारण किये युद्ध करनेके लिये सावधान होकर खड़े थे। |
| ततो यक्षाधिपः कामं बभूव रणतत्परः।<br>पावकः शक्तिमादाय तत्राभूद्युद्धमानसः॥ १० | यक्षाधिपति कुबेर युद्ध करनेके लिये पूर्णरूपसे उद्यत थे और अग्निदेव बर्छी लेकर युद्ध करनेके विचारसे स्थित थे। |
| नक्षत्राधिपतिः सूर्यः समवेतौ स्थितावुभौ।<br>वीक्ष्य तं दानवश्रेष्ठं युद्धाय कृतनिश्चयौ॥ ११ | नक्षत्रोंके नायक चन्द्रमा तथा भगवान् सूर्य—दोनों एक साथ युद्ध करनेके लिये खड़े हो गये और उस दानवश्रेष्ठ महिषासुरको देखकर उन्होंने युद्ध करनेका निश्चय कर लिया॥ ८—११॥ |
| श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ ] |
|---|---|
| ५६२ |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धं दैत्यसैन्यं समभ्यगात्।<br>विसृजन्बाणजालानि क्रूराहिसदृशानि च॥ १२ | इतनेमें क्रूर सर्पोंके समान बाण-समूहोंकी वर्षा करती हुई क्रुद्ध दानवी सेना वहाँ आ गयी॥ १२॥ |
| कृत्वा हि माहिषं रूपं भूपतिः संस्थितस्तदा।<br>देवदानवयोधानां निनादस्तुमुलोऽभवत्॥ १३ | वह दानवराज महिषका रूप धारण करके खड़ा था। उस समय देवता तथा असुर-पक्षके योद्धाओंका भीषण गर्जन होने लगा॥ १३॥ |
| ज्याघातश्च तलाघातो मेघनादसमोऽभवत्।<br>संग्रामे सुमहाघोरे देवदानवसेनयोः॥ १४ | देवताओं तथा दानवोंके बीच हो रहे महाभयानक संग्राममें धनुषकी टंकार तथा ताल ठोंकनेकी ध्वनि मेघ-गर्जना जैसी प्रतीत हो रही थी॥ १४॥ |
| शृङ्गाभ्यां पर्वताञ्छृङ्गांश्चिक्षेप च महाबलः।<br>जघान सुरसङ्घांश्च दानवो मदगर्वितः॥ १५ | अभिमानमें चूर महाबली दैत्य महिषासुर अपनी सींगोंसे पर्वत-शिखर फेंक-फेंककर देवसमूहपर प्रहार कर रहा था॥ १५॥ |
| खुराघातैस्तथा देवान्युच्छस्य भ्रमणेन च।<br>स जघान रुषाविष्टो महिषः परमाद्भुतः॥ १६ | क्रोधमें भरे हुए उस परम अद्भुत महिषासुरने अपने खुरोंके आघातसे तथा पूँछ घुमाकर बहुत-से देवताओंपर प्रहार किया॥ १६॥ |
| ततो देवाः सगन्धर्वा भयमाजग्मुरुद्यताः।<br>मघवा महिषं दृष्ट्वा पलायनपरोऽभवत्॥ १७ | तत्पश्चात् लड़नेके लिये उद्यत देवता तथा गन्धर्व भयभीत हो गये और महिषासुरको देखकर इन्द्र भी भाग गये॥ १७॥ |
| सङ्गरं सम्परित्यज्य गते शक्रे शचीपतौ।<br>यमो धनाधिपः पाशी जग्मुः सर्वे भयातुराः॥ १८ | संग्राम छोड़कर शचीपति इन्द्रके भाग जानेपर यमराज, धनाध्यक्ष कुबेर तथा वरुणदेव—ये सब भी भयभीत होकर भाग चले॥ १८॥ |
| महिषोऽपि जयं मत्वा जगाम स्वगृहं ततः।<br>ऐरावतं गजं प्राप्य त्यक्तमिन्द्रेण गच्छता॥ १९<br>तथोच्चैःश्रवसं भानोः कामधेनुं पयस्विनीम्।<br>स्वसैन्यसंवृतस्तूर्णं स्वर्गं गन्तुं मनो दधे॥ २० | महिषासुर भी अपनी जीत मानकर अपने घर चला गया। इन्द्रके भाग जानेके बाद उनके द्वारा त्यक्त ऐरावत हाथी, सूर्यका उच्चैःश्रवा घोड़ा तथा दूध देनेवाली कामधेनु गौको उसने हस्तगत कर लिया। तत्पश्चात् उसने शीघ्र ही सेनाको साथमें लेकर स्वर्ग जानेका मनमें निश्चय किया॥ १९-२०॥ |
| तरसा देवसदनं गत्वा स महिषासुरः।<br>जग्राह सुरराज्यं वै त्यक्तं देवैर्भयातुरैः॥ २१ | इसके बाद शीघ्र ही देवलोक पहुँचकर महिषासुरने भयाक्रान्त देवताओंके द्वारा पहलेसे ही छोड़ दिये गये उनके राज्यपर आधिपत्य कर लिया॥ २१॥ |
| इन्द्रासने तथा रम्ये दानवः समुपविशत्।<br>दानवान्स्थापयामास देवानां स्थानकेषु सः॥ २२ | इसके बाद उस रमणीय इन्द्रासनपर महिषासुर आसीन हुआ और उसने राज्य-संचालनार्थ देवताओंके स्थानपर दानवोंको स्थापित कर दिया॥ २२॥ |
| एवं वर्षशतं पूर्णं कृत्वा युद्धं सुदारुणम्।<br>अवापैन्द्रपदं कामं दानवो मदगर्वितः॥ २३ | इस प्रकार पूरे सौ वर्षतक भीषण युद्ध करके अभिमानमें चूर उस दैत्यने इन्द्रपद प्राप्त किया॥ २३॥ |
| निर्जरा निर्गता नाकात्तेन सर्वेऽतिपीडिताः।<br>एवं बहूनि वर्षाणि बभ्रमुर्गिरिगह्वरे॥ २४ | सभी देवता उस महिषासुरसे प्रताड़ित होकर स्वर्गसे निकल गये और बहुत वर्षोंतक पर्वतकी गुफाओंमें घूमते-फिरते रहे॥ २४॥ |
| अ० ७ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५६३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रान्ताः सर्वे तदा राजन् ब्रह्माणं शरणं ययुः।<br>प्रजापतिं जगन्नाथं रजोरूपं चतुर्मुखम्॥ २५<br>पद्मासनं वेदगर्भं सेवितं मुनिभिः स्वजैः।<br>मरीचिप्रमुखैः शान्तैर्वेदवेदाङ्गपारगैः॥ २६<br>किन्नरैः सिद्धगन्धर्वैश्चारणोरगपन्नगैः।<br>तुष्टुवुर्भयभीतास्ते देवदेवं जगद्गुरुम्॥ २७ | हे राजन्! तब थके हुए सभी देवतागण ब्रह्माजीकी शरणमें गये। उस महिषासुरके भयसे त्रस्त वे सभी देवता समस्त वेद-वेदांगोंके पारगामी विद्वान्, शान्त स्वभाववाले और स्वयं ब्रह्माके मनसे उत्पन्न मरीचि आदि प्रमुख मुनियों एवं सिद्धों, किन्नरों, गन्धर्वों, चारणों, उरगों तथा पन्नगोंद्वारा निरन्तर सेवित, रजोगुणसे सम्पन्न, चार मुखवाले, जगन्नाथ, प्रजापति, वेदगर्भ, कमलके आसनपर विराजमान तथा समस्त संसारके गुरु देवाधिदेव ब्रह्माजीकी स्तुति करने लगे॥ २५—२७॥ |
| देवा ऊचुः<br>धातः किमेतदखिलार्तिहराम्बुजन्म<br>जन्माभिवीक्ष्य न दयां कुरुषे सुरान् यत्।<br>सम्पीडितान् रणजितानसुराधिपेन<br>स्थानच्युतान् गिरिगुहाकृतसन्निवासान्॥ २८ | देवता बोले—हे सम्पूर्ण दुःख दूर करनेवाले पद्मयोनि ब्रह्माजी! इस समय सभी देवता संग्राममें दानवेन्द्र महिषासुरसे पराजित होकर गिरि-कन्दराओंमें कालक्षेप कर रहे हैं। स्थानच्युत हो जानेके कारण उन्हें महान् कष्ट उठाना पड़ रहा है। हमारी ऐसी दशा देखकर भी क्या आपको दया नहीं आती, यह कैसी विचित्र बात है!॥ २८॥ |
| पुत्रान्विता किमपराधशतैः समेता-<br>न्सन्त्यज्य लोभरहितः कुरुतेऽतिदुःखान्।<br>यस्त्वं सुरांस्तव पदाम्बुजभक्तियुक्ता-<br>न्दैत्यार्दितांश्च कृपणान् यदुपेक्षसेऽद्य॥ २९ | क्या निर्लोभी पिता सैकड़ों अपराधोंसे युक्त अपने पुत्रोंको त्यागकर उन्हें कष्टमें पड़े रहना देख सकता है? तब फिर दैत्योंद्वारा सताये गये असहाय देवताओंकी, जो आपके चरणकमलकी भक्तिमें लगे रहते हैं, उपेक्षा आज आप क्यों कर रहे हैं?॥ २९॥ |
| अमरभुवनराज्यं तेन भुक्तं नितान्तं<br>मखहविरपि योग्यं ब्राह्मणैराददाति।<br>सुरतरुवरपुष्पं सेवतेऽसौ दुरात्मा<br>जलनिधिनिधिभूतां गामसौ सेवते ताम्॥ ३० | [दुष्ट] महिषासुर देवलोकका साम्राज्य भोग रहा है। ब्राह्मणोंद्वारा यज्ञमें दी हुई पवित्र हविको वह स्वयं ले लेता है। वह दुष्टात्मा असुर स्वर्गके पारिजातपुष्पोंको अपने उपभोगमें लाता है तथा समुद्रकी निधिस্বরূপा उस कामधेनु गौका भी उपयोग कर रहा है॥ ३०॥ |
| किं वा गृणीमः सुरकार्यमद्भुतं<br>जानासि देवेश सुरारिचेष्टितम्।<br>ज्ञानेन सर्वं त्वमशेषकार्यवि-<br>त्तस्मात्प्रभो ते प्रणताः स्म पादयोः॥ ३१ | हे देवेश! हमलोग देवताओंकी विषम स्थितिका वर्णन कहाँतक करें? आप तो अपने ज्ञानसे दैत्योंकी सारी कुचेष्टा जानते हैं; आप सम्पूर्ण कार्योंको जाननेवाले हैं। अतः हे प्रभो! हम सभी देवता आपके चरणोंमें आ पड़े हैं॥ ३१॥ |
| यत्रापि कुत्रापि गतान्सुरानसौ<br>नानाचरित्रः खलु पापमानसः।<br>पीडां करोत्येव स दुष्टचेष्टित-<br>स्त्रातासि देवेश विधेहि शं विभो॥ ३२ | हे देवेश! देवता जहाँ कहीं भी जाते हैं [वहीं पहुँचकर] विविध चरित्रोंवाला, पापमय विचारोंवाला तथा दुष्ट आचरणवाला वह महिषासुर उन्हें पीड़ित करने लगता है। हे विभो! अब आप ही हमारे रक्षक हैं; हमारा कल्याण कीजिये॥ ३२॥ |
| ५६४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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| नो चेदद्यं दावमहाग्निपीडिताः<br>कं शान्तिकर्तारमनन्ततेजसम्।<br>यामः प्रजेशं शरणं सुरेष्टं<br>धातारमाद्यं परिमुच्य कं शिवम्॥ ३३ | यदि आप हमारी रक्षा नहीं करेंगे तो दैत्योंके भीषण अत्याचाररूपी दावानलसे पीड़ित हमलोग आप सदृश शान्तिदाता, अनन्त तेजस्वी, प्रजापति, देवताओंके पूज्य, आदिपिता तथा कल्याणकारी प्रभुको छोड़कर किसकी शरणमें जायँ? ॥ ३३ ॥ | | व्यास उवाच<br>इति स्तुत्वा सुराः सर्वे प्रणेमुस्तं प्रजापतिम्।<br>बद्धाञ्जलिपुटाः सर्वे विषण्णवदना भृशम्॥ ३४<br>तांस्तथा पीडितान्दृष्ट्वा तदा लोकपितामहः।<br>उवाच श्लक्ष्णया वाचा सुखं सञ्जनयन्निव॥ ३५ | व्यासजी बोले—इस प्रकार स्तुति करके सम्पूर्ण देवता हाथ जोड़कर प्रजापति ब्रह्माको प्रणाम करने लगे। उन सबके मुखपर अत्यन्त उदासी छायी हुई थी। तब उन्हें इस प्रकार दुःखी देखकर लोकपितामह ब्रह्माजी उन्हें सुख पहुँचाते हुए मधुर वाणीमें कहने लगे—॥ ३४-३५ ॥ | | ब्रह्मोवाच<br>किं करोमि सुराः कामं दानवो वरदर्पितः।<br>स्त्रीवध्योऽसौ न पुंवध्यो विधेयं तत्र किं पुनः॥ ३६<br>व्रजामोऽद्य सुराः सर्वे कैलासं पर्वतोत्तमम्।<br>शङ्करं पुरतः कृत्वा सर्वकार्यविशारदम्॥ ३७<br>ततो व्रजाम वैकुण्ठं यत्र देवो जनार्दनः।<br>मिलित्वा देवकार्यञ्च विमृशामो विशेषतः॥ ३८ | ब्रह्माजी बोले—हे देवताओ! मैं क्या करूँ? वर पानेके कारण वह दैत्य अभिमानी हो गया है। उसका वध कोई स्त्री ही कर सकती है, पुरुष नहीं। ऐसी परिस्थितिमें मैं क्या कर सकता हूँ? ॥ ३६ ॥<br>हे देवताओ! हम सबलोग पर्वतश्रेष्ठ कैलासपर चलें। [वहाँ विराजमान] सम्पूर्ण कर्मोंके ज्ञाता भगवान् शंकरको आगे करके वहाँसे वैकुण्ठधामको चलें, जहाँ भगवान् विष्णु रहते हैं। उनसे मिलकर हमलोग देवताओंके कार्यके विषयमें विशेषरूपसे विचार करेंगे॥ ३७-३८ ॥ | | इत्युक्त्वा हंसमारुह्य ब्रह्मा कार्यसमुच्चये।<br>देवांश्च पृष्ठतः कृत्वा कैलासाभिमुखो ययौ॥ ३९ | ऐसा कहकर ब्रह्माजी हंसपर सवार होकर कार्यसिद्धिके लिये देवताओंको साथ लेकर कैलासकी ओर चल पड़े॥ ३९ ॥ | | तावच्छिवोऽपि तरसा ज्ञात्वा ध्यानेन पद्मजम्।<br>आगच्छन्तं सुरैः सार्धं निर्गतः स्वगृहाद् बहिः॥ ४० | तभी शिवजी अपने ध्यानयोगसे सभी देवताओंसहित ब्रह्माजीको आता हुआ जानकर अपने भवनसे बाहर निकल आये॥ ४० ॥ | | दृष्ट्वा परस्परं तौ तु कृताभिवादनौ भृशम्।<br>प्रणतौ च सुरैः सर्वैः सन्तुष्टौ सम्बभूवतुः॥ ४१ | एक-दूसरेको देखकर उन्होंने परस्पर प्रणाम किया। उन सभी देवताओंने भी भगवान् शंकर तथा ब्रह्माको प्रणाम किया और वे दोनों अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ ४१ ॥ | | आसनानि पृथग्दत्त्वा देवेभ्यो गिरिजापतिः।<br>उपविष्टेषु तेष्वेव निषसादासने स्वके॥ ४२<br>कृत्वा तु कुशलप्रश्नं ब्रह्माणं वृषभध्वजः।<br>पप्रच्छ कारणं देवान्कैलासागमने विभुः॥ ४३ | शिवजी वहाँ सभी देवताओंको पृथक्-पृथक् आसन देकर सबके यथास्थान बैठ जानेपर स्वयं भी अपने आसनपर बैठ गये। तब ब्रह्माजीसे कुशल-प्रश्न करके भगवान् शिवने देवताओंसे कैलास आनेका कारण पूछा॥ ४२-४३ ॥ |
अ० ७] पञ्चम स्कन्ध ५६५
अ० ७] पञ्चम स्कन्ध ५६५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शिव उवाच<br>किमत्रागमनं ब्रह्मन् कृतं देवैः सवासवैः।<br>भवता च महाभाग ब्रूहि तत्कारणं किल॥ ४४ | शिवजी बोले—हे ब्रह्मन्! इन्द्र आदि देवताओंके साथ आपके यहाँ आनेका क्या प्रयोजन है? हे महाभाग! वह कारण अवश्य बताइये॥ ४४॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>महिषेण सुरेशान पीडिताः स्वर्गनिवासिनः।<br>भ्रमन्ति गिरिदुर्गेषु भयत्रस्ताः सवासवाः॥ ४५ | ब्रह्माजी बोले—हे सुरेशान! महिषासुर स्वर्गमें रहनेवाले इन्द्रादि देवताओंको महान् कष्ट दे रहा है और उसके भयसे त्रस्त होकर ये देवगण पर्वतोंकी कन्दराओंमें घूम रहे हैं॥ ४५॥ |
| यज्ञभुग्महिषो जातस्तत्स्थान्ये सुरशत्रवः।<br>पीडिता लोकपालाश्च त्वामद्य शरणं गताः॥ ४६<br><br>मया ते भवनं शम्भो प्रापिताः कार्यगौरवात्।<br>यद्युक्तं तद्विधत्स्वाद्य सुरकार्यं सुरेश्वर॥ ४७<br><br>त्वयि भारोऽस्ति सर्वेषां देवानां भूतभावन। | महिषासुर यज्ञ-भाग स्वयं ग्रहण कर रहा है। अन्य अनेक दैत्य भी देवताओंके शत्रु बन गये हैं। उन सबसे पीड़ित होकर ये सभी लोकपाल आपकी शरणमें आये हुए हैं। हे शम्भो! इसी गुरुतर कार्यके लिये मैंने इन देवताओंको आपके भवनपर पहुँचा दिया है। अतः हे सुरेश्वर! अब इनके कार्यके विषयमें जो उचित जान पड़े, वह आप करें। हे भूतभावन! सम्पूर्ण देवताओंका भार अब आपपर है॥ ४६-४७ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तद्वचनं श्रुत्वा शङ्करः प्रहसन्निव॥ ४८<br>वचनं श्लक्ष्णया वाचा प्रोवाच पद्मजं प्रति। | व्यासजी बोले—ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर भगवान् शंकर मुसकराते हुए कोमल वाणीमें ब्रह्माजीसे यह वचन कहने लगे—॥ ४८ १/२॥ |
| शिव उवाच<br>भवतैव कृतं कार्यं वरदानात्पुरा विभो॥ ४९<br><br>अनर्थदञ्च देवानां किं कर्तव्यमतः परम्।<br>ईदृशो बलवाञ्छूरः सर्वदेवभयप्रदः॥ ५० | शिवजी बोले—हे विभो! आपने ही तो पूर्वकालमें [महिषासुरको] वरदान देकर देवताओंके लिये ऐसा अनर्थकारी कार्य किया है। अब इसके बाद हमें क्या करना चाहिये? [आपके वरके प्रभावसे ही] वह इतना बली, पराक्रमी तथा सभी देवताओंके लिये भयदायक हो गया है॥ ४९-५०॥ |
| का समर्था वरा नारी तं हन्तुं मददर्पितम्।<br>न मे भार्या न ते भार्या संग्रामं गन्तुमर्हति॥ ५१<br><br>गत्वैव ते महाभागे युयुधाते कथं पुनः।<br>इन्द्राणी च महाभागा न युद्धकुशलास्ति हि॥ ५२<br><br>कान्या हन्तुं समर्थास्ति तं पापं मददर्पितम्। | अभिमानमें चूर रहनेवाले उस दानवको मारनेमें कौन श्रेष्ठ स्त्री समर्थ हो सकती है? न तो मेरी भार्या ‘रुद्राणी’ और न आपकी भार्या ‘ब्रह्माणी’ ही संग्राममें जानेयोग्य हैं। महाभाग्यवती ये देवियाँ संग्रामभूमिमें जाकर भी भला युद्ध किस प्रकार करेंगी? इन्द्रकी पत्नी महाभागा इन्द्राणी भी युद्धकलामें कुशल नहीं हैं। तब दूसरी कौन-सी देवांगना उस मदोन्मत्त पापीको मारनेमें समर्थ है?॥ ५१-५२ १/२॥ |
| ममेदं मतमद्यैव गत्वा देवं जनार्दनम्॥ ५३<br><br>स्तुत्वा तं देवकार्याय प्रेरयामः सुसत्वरम्।<br>सोऽतिबुद्धिमतां श्रेष्ठो विष्णुः सर्वार्थसाधने॥ ५४ | अतः मेरा तो यह विचार है कि हमलोग इसी समय भगवान् विष्णुके पास चलकर और उनकी स्तुति करके देवताओंका कार्य करनेके लिये उन्हींको |
| ५६६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| मिलित्वा वासुदेवं वै कर्तव्यं कार्यचिन्तनम्।<br>प्रपञ्चेन च बुद्ध्या स संविधास्यति साधनम्॥ ५५<br><br>व्यास उवाच<br>इति रुद्रवचः श्रुत्वा ब्रह्माद्याः सुरसत्तमाः।<br>उत्थितास्ते तथेत्युक्त्वा शिवेन सह सत्वराः॥ ५६<br><br>स्वकीयैर्वाहनैः सर्वे ययुर्विष्णुपुरं प्रति।<br>मुदिताः शकुनान्दृष्ट्वा कार्यसिद्धिकराञ्छुभान्॥ ५७<br><br>ववुर्वाताः शुभाः शान्ताः सुगन्धाः शुभशंसिनः।<br>पक्षिणश्च शिवा वाचस्तत्रोचुः पथि सर्वशः॥ ५८<br><br>निर्मलं चाभवद्व्योम दिशश्च विमलास्तथा।<br>गमने तत्र देवानां सर्वं शुभमिवाभवत्॥ ५९ | शीघ्रतापूर्वक प्रेरित करें। परम बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ वे विष्णु सम्पूर्ण कार्योंको सिद्ध करनेमें कुशल हैं। उन्हीं वासुदेवसे मिलकर इस कार्यके सम्बन्धमें विचार करना चाहिये। वे किसी प्रपंच अथवा बुद्धिसे कार्य सिद्ध होनेका उपाय बना देंगे॥ ५३-५५॥<br>व्यासजी बोले—भगवान् शंकरकी यह बात सुनकर ब्रह्मा आदि समस्त श्रेष्ठ देवता 'यह ठीक है'—ऐसा कहकर उठ खड़े हुए और वे सब अपने-अपने वाहनोंपर सवार हो शिवजीके साथ तुरन्त वैकुण्ठकी ओर चल दिये। उस समय कार्यसिद्धिके सूचक अनेक शुभ शकुन देखकर वे सब अत्यन्त प्रसन्न हुए। शुभ सूचना देनेवाली शीतल, मन्द तथा सुगन्धित हवाएँ चलने लगीं और पवित्र पक्षी सर्वत्र मार्गमें मंगलमयी बोली बोलने लगे। आकाश निर्मल हो गया और दिशाएँ स्वच्छ हो गयीं। इस प्रकार देवताओंकी यात्रामें मानो सब मंगल ही मंगल हो गया॥ ५६-५९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां पञ्चमस्कन्धे पराजितदेवतानां शङ्करशरणगमनवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
अथाष्टमोऽध्यायः
ब्रह्माप्रभृति समस्त देवताओंके शरीरसे तेजःपुंजका निकलना और उस तेजोराशिसे भगवतीका प्राकट्य
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| तरसा तेऽथ सम्प्राप्य वैकुण्ठं विष्णुवल्लभम्।<br>ददृशुः सर्वशोभाढ्यं दिव्यसद्माविराजितम्॥ १ | हे राजन्! उन देवताओंने शीघ्रतापूर्वक भगवान् विष्णुके प्रिय धाम वैकुण्ठमें पहुँचकर वहाँ उन श्रीहरिका विशाल सदन देखा, जो सम्पूर्ण शोभाओंसे युक्त तथा दिव्य महलोंसे सुशोभित था। |
| सरोवापीसरिद्भिश्च संयुक्तं सुखदं शुभम्।<br>हंससारसचक्राह्वैः कूजद्भिश्च विराजितम्॥ २ | सुन्दर तथा सुखदायक वह भवन सरोवर, बावली एवं नदियोंसे सुशोभित था, जिनमें हंस, सारस, चक्रवाक आदि पक्षी कलरव कर रहे थे। |
| चम्पकाशोककह्लारमन्दारबकुलावृतैः ।<br>मल्लिकातिलकाम्रातयुतैः कुरबकादिभिः॥ ३<br>कोकिलारावसन्नादैः शिखण्डैर्नृत्यराजितैः।<br>भ्रमरारावरम्यैश्च दिव्यैरुपवनैर्युतम्॥ ४ | उस भवनके चारों ओर सुशोभित हो रहे दिव्य उपवनोंमें चम्पा, अशोक, कह्लार, मन्दार, मौलसिरी, मालती, तिलक, आमड़ा और कुरबक आदि विविध प्रकारके वृक्ष लगे हुए थे। उपवनोंमें चारों ओर कोयलोंकी कूक सुनायी दे रही थी, मोर नृत्य कर रहे थे और भौंरे गुंजार कर रहे थे। |
| सुनन्दनन्दनाद्यैश्च पार्षदैर्भक्तितत्परैः।<br>संस्तुवद्भिर्युतं भक्तैरनन्यभववृत्तिभिः॥ ५ | नन्द-सुनन्द आदि भक्तिपरायण पार्षद तथा |
| अ० ८ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५६७ | | :--- | :--- |
| प्रासादै रत्नखचितैः काञ्चनैश्चित्रमण्डितैः ।<br>अभ्रंलिहैर्विराजद्भिः संयुतं शुभसद्मकैः ॥ ६<br><br>गायद्भिर्देवगन्धर्वैर्नृत्यद्भिरप्सरोगणैः ।<br>रञ्जितं किन्नरैः शश्वद्रक्तकण्ठैर्मनोहरैः ॥ ७<br><br>मुनिभिश्च तथा शान्तैर्वेदपाठकृतादरैः ।<br>स्तुवद्भिः श्रुतिसूक्तैश्च मण्डितं सदनं हरेः ॥ ८ | त्याग-वृत्तिसम्पन्न अनन्य भक्त भगवान् विष्णुकी स्तुति कर रहे थे। वहाँ रत्नजटित महल बने हुए थे, जिनपर सुनहरे चित्र बने हुए थे; सुन्दर-सुन्दर कक्षोंसे सुशोभित वे महल ऊँचाईमें आकाशको छू रहे थे। वहाँ देवता और गन्धर्व गा रहे थे, अप्सराएँ नाच रही थीं और वह मनको मुग्ध करनेवाले तथा मधुर कण्ठध्वनिवाले किन्नरोंसे मण्डित था। वैदिक सूक्तोंके द्वारा आदरपूर्वक भगवान् विष्णुकी स्तुति करते हुए शान्त स्वभाववाले वेदपाठपरायण मुनियोंसे वह भवन अत्यन्त सुशोभित हो रहा था॥ १–८ ॥ | | ते च विष्णुगृहं प्राप्य द्वारपालौ शुभाकृती ।<br>वीक्ष्योचुर्जयविजयौ हेमयष्टिधरौ स्थितौ ॥ ९<br><br>गत्वैकोऽप्युभयोर्मध्ये निवेदयतु सङ्गतान् ।<br>द्वारस्थान् ब्रह्मरुद्रादीन्विष्णुदर्शनलालसान् ॥ १० | भगवान् विष्णुके भवनपर पहुँचकर देवताओंने सुन्दर स्वरूपवाले तथा हाथमें स्वर्णकी छड़ी धारण किये हुए जय-विजय नामक द्वारपालोंको देखकर उनसे कहा कि आप दोनोंमेंसे कोई एक जाकर भगवान् विष्णुसे कह दे कि आपके दर्शनकी अभिलाषासे ब्रह्मा, रुद्र आदि देवता द्वारपर खड़े हैं॥ ९-१०॥ | | व्यास उवाच<br>विजयस्तद्वचः श्रुत्वा गत्वाथ विष्णुसन्निधौ ।<br>सर्वान्समागतान्देवान्प्रणम्योवाच सत्वरः ॥ ११ | व्यासजी बोले— उनकी बात सुनकर विजयने तुरन्त भगवान् विष्णुके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके सभी देवताओंके आगमनकी बात उनको बतायी ॥ ११॥ | | विजय उवाच<br>देवदेव महाराज रमाकान्त सुरारिहन् ।<br>समागताः सुराः सर्वे द्वारि तिष्ठन्ति वै विभो ॥ १२<br><br>ब्रह्मा रुद्रस्तथेन्द्रश्च वरुणः पावको यमः ।<br>स्तुवन्ति वेदवाक्यैस्त्वाममरा दर्शनार्थिनः ॥ १३ | विजयने कहा— हे देवाधिदेव ! हे महाराज ! हे दैत्योंका दमन करनेवाले लक्ष्मीकान्त ! हे विभो ! इस समय सभी देवता आये हुए हैं और वे द्वारपर खड़े हैं। आपके दर्शनके इच्छुक ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वरुण, अग्नि, यम आदि देवता वेदवाक्योंसे आपकी स्तुति कर रहे हैं॥ १२-१३॥ | | व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णुर्विजयस्य रमापतिः ।<br>निर्जगाम गृहात्तूर्णं सुरान्समधिकोत्सवः ॥ १४ | व्यासजी बोले— लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु विजयकी बात सुनकर देवोंसे मिलनेहेतु अत्यधिक उत्साहित होकर शीघ्रतापूर्वक अपने भवनसे बाहर निकल आये॥ १४॥ | | गत्वा वीक्ष्य हरिर्देवान्द्वारस्थाञ्छ्रमकर्शितान् ।<br>प्रीतिप्रवणया दृष्ट्या प्रीणयामास दुःखितान् ॥ १५ | वहाँ जाकर भगवान् विष्णुने द्वारपर स्थित उन देवताओंको थकानसे व्याकुल तथा दुःखित देखकर अपनी प्रेमभरी दृष्टिसे उन्हें आनन्दित किया॥ १५॥ | | प्रणेमुस्ते सुराः सर्वे देवदेवं जनार्दनम् ।<br>तुष्टुवुश्च सुरारिघ्नं वाग्भिर्वेदविनिश्चितम् ॥ १६ | उन सभी देवताओंने दैत्योंका संहार करनेवाले तथा वेदोंके द्वारा सुनिश्चित किये गये (तत्त्वस्वरूप) देवाधिदेव भगवान् विष्णुको प्रणाम किया और मधुर वाणीमें उनकी स्तुति की॥ १६॥ |
| ५६८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| देवा ऊचुः<br>देवदेव जगन्नाथ सृष्टिस्थित्यन्तकारक।<br>दयासिन्थो महाराज त्राहि नः शरणागतान्॥ १७ | देवता बोले—हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाले! हे दयासिन्धो! हे महाराज! हम शरणागतोंकी रक्षा कीजिये॥ १७॥ | | विष्णुरुवाच<br>विशन्तु निर्जराः सर्वे कुशलं कथयन्तु वः।<br>आसनेषु किमर्थं वै मिलिताः समुपागताः॥ १८<br>चिन्तातुराः कथं जाता विषण्णा दीनमानसाः।<br>ब्रह्मरुद्रेण सहिताः कार्यं प्रब्रूत सत्वरम्॥ १९ | विष्णु बोले—हे देवताओ! आप सभी लोग आसनोंपर बैठ जाइये और फिर अपना कुशल-क्षेम बताइये। आपलोग एक साथ मिलकर यहाँ किसलिये आये हुए हैं? ब्रह्मा तथा शिवसहित आप सभी देवता चिन्तामग्न, दुःखित और उदास क्यों हो गये हैं? आपलोग अपना प्रयोजन शीघ्र बताएँ॥ १८-१९॥ | | देवा ऊचुः<br>महिषेण महाराज पीडिताः पापकर्मणा।<br>असाध्येनातिदुष्टेन वरदृप्तेन पापिना॥ २० | देवता बोले—हे महाराज! पापकर्ममें संलग्न, अजेय, महादुष्ट, वरदान पाकर अभिमानमें चूर तथा पापी महिषासुरसे हमलोग पीड़ित हैं॥ २०॥ | | यज्ञभागानसौ भुंक्ते ब्राह्मणैः प्रतिपादितान्।<br>अमरा गिरिदुर्गेषु भ्रमन्ति च भयातुराः॥ २१ | ब्राह्मणोंद्वारा देवताओंको दिये गये यज्ञभागोंको वह स्वयं ग्रहण कर लेता है। हम सभी देवता उससे भयभीत होकर पर्वतोंकी कन्दराओंमें भटकते फिरते हैं॥ २१॥ | | वरदानेन धातुः स दुर्जयो मधुसूदन।<br>तस्मात्त्वां शरणं प्राप्ता ज्ञात्वा तत्कार्यगौरवम्॥ २२<br>समर्थोऽसि समुद्धर्तुं दैत्यमायाविशारद।<br>कुरु कृष्ण वधोपायं तस्य दानवमर्दन॥ २३ | हे मधुसूदन! ब्रह्माजीके वरदानसे वह अजेय बन गया है, अतः इस कार्यको अत्यन्त गुरुतर जानकर हमलोग आपकी शरणमें आये हैं। दानवोंकी मायाको जाननेवाले तथा दानवोंका वध करनेवाले हे कृष्ण! आप ही देवताओंका उद्धार करनेमें समर्थ हैं, अतः उसके वधका कोई उपाय कीजिये॥ २२-२३॥ | | धात्रा तस्मै वरो दत्तो ह्यवध्योऽसि नरैः किल।<br>का स्त्री त्वेवंविधा बाला या हन्यात्तं शठं रणे॥ २४ | विधाताने उसे वर दे दिया है कि तुम पुरुषमात्रसे सदा अवध्य रहोगे। तब ऐसी कौन स्त्री होगी जो रणमें उस शठको मार सके?॥ २४॥ | | उमा मा वा शची विद्या का समर्थास्य घातने।<br>महिषस्यातिदुष्टस्य वरदानबलादपि॥ २५<br>विचिन्त्य बुद्ध्या यत्सर्वं मरणस्यास्य कारणम्।<br>कुरु कार्यं च देवानां भक्तवत्सल भूधर॥ २६ | क्या भगवती पार्वती, लक्ष्मी, इन्द्राणी अथवा सरस्वती भी इस अत्यन्त दुष्ट तथा वरदानके कारण अत्यन्त अभिमानी महिषासुरका वध करनेमें समर्थ होंगी? अतएव हे भक्तवत्सल! हे भूधर! आप अपनी बुद्धिसे भलीभाँति विचार करके उसके मरणका जो भी उपाय हो उसके द्वारा हमलोगोंका यह कार्य सम्पन्न कर दीजिये॥ २५-२६॥ | | व्यास उवाच<br>श्रुत्वा तद्वचनं विष्णुस्तानुवाच हसन्निव।<br>युद्धं कृतं पुरास्माभिस्तथापि न मृतो ह्यसौ॥ २७ | व्यासजी बोले—यह बात सुनकर भगवान् विष्णु मुसकराते हुए उनसे कहने लगे—पहले भी हमलोगोंने महिषासुरसे युद्ध किया था, किंतु वह नहीं मारा जा सका॥ २७॥ |
| अ० ८ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अद्य सर्वसुराणां वै तेजोभी रूपसम्पदा।<br>उत्पन्ना चेद्वरारोहा सा हन्यात्तं रणे बलात्॥ २८<br><br>ह्यारिं वरदृप्तञ्च मायाशतविशारदम्।<br>हन्तुं योग्या भवेन्नारी शक्त्यंशैर्निर्मिता हि नः॥ २९ | अब एक ही उपाय है कि यदि सभी देवताओंके तेजसे कोई श्रेष्ठ रूपवती सुन्दरी उत्पन्न की जाय तो वही समरांगणमें उसे अपने पराक्रमसे मार सकती है। हम सबकी शक्तिके अंशोंसे निर्मित कोई वीर नारी ही सैकड़ों प्रकारकी माया रचनेमें निपुण और वरप्राप्तिके कारण अभिमानमें चूर उस महिषासुरका वध करनेमें समर्थ होगी॥ २८-२९॥ |
| प्रार्थयन्तु च तेजोंऽशान्स्त्रियोऽस्माकं तथा पुनः।<br>उत्पन्नैस्तैश्च तेजोंऽशैस्तेजोराशिर्भवेद्यथा॥ ३० | अब आप सभी देवतागण तेजांशोंसे प्रार्थना करें; साथ ही हमारी स्त्रियाँ भी प्रार्थना करें, जिससे कि उन आविर्भूत तेजांशोंके द्वारा एक तेजोराशि उत्पन्न हो जाय॥ ३०॥ |
| आयुधानि वयं दद्मः सर्वे रुद्रपुरोगमाः।<br>तस्यै सर्वाणि दिव्यानि त्रिशूलादीनि यानि च॥ ३१<br><br>सर्वायुधधरा नारी सर्वतेजःसमन्विता।<br>हनिष्यति दुरात्मानं तं पापं मदगर्वितम्॥ ३२ | उस समय रुद्र आदि हम सब मुख्य देवतागण त्रिशूल आदि जो भी दिव्य आयुध हैं, वह सब उसे दे देंगे। तत्पश्चात् सभी प्रकारके आयुध धारण करनेवाली तथा सम्पूर्ण तेजसे सम्पन्न वह देवी उस दुराचारी, पापी तथा मदोन्मत्त दानवको मार डालेगी॥ ३१-३२॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्तवति देवेशे ब्रह्मणो वदनात्ततः।<br>स्वयमेवोद्बभौ तेजोराशिश्चातीव दुःसहः॥ ३३<br><br>रक्तवर्णं शुभाकारं पद्मरागमणिप्रभम्।<br>किञ्चिच्छीतं तथा चोष्णं मरीचिजालमण्डितम्॥ ३४<br><br>निःसृतं हरिणा दृष्टं हरेण च महात्मना।<br>विस्मितौ तौ महाराज बभूवतुरुरुक्रमौ॥ ३५ | व्यासजी बोले— भगवान् विष्णुके ऐसा कहते ही ब्रह्माजीके मुखसे अपने आप एक अत्यन्त असह्य तेजःपुंज निकल पड़ा। वह तेज लाल रंगका था, उसकी आकृति सुन्दर थी, वह पद्मराग मणिके समान प्रभावाला था। उसमें कुछ शीतलता एवं ऊष्णता भी थी और वह अनेक किरणोंसे सुशोभित था। हे महाराज! भगवान् विष्णु और शिवने भी उस निःसृत तेजको देखा। [उसे देखकर] अमित पराक्रमवाले वे दोनों आश्चर्यचकित हो गये॥ ३३-३५॥ |
| शङ्करस्य शरीरात्तु निःसृतं महदद्भुतम्।<br>रौप्यवर्णमभूत्तीव्रं दुर्दर्शं दारुणं महत्॥ ३६<br><br>भयङ्करञ्च दैत्यानां देवानां विस्मयप्रदम्।<br>घोररूपं गिरिप्रख्यं तमोगुणमिवापरम्॥ ३७ | तत्पश्चात् शंकरजीके शरीरसे भी चाँदीके सदृश वर्णवाला, अत्यन्त अद्भुत, तीव्र, देखनेमें असह्य तथा महाप्रचण्ड तेज निकला जो दैत्योंको भयभीत कर देनेवाला तथा देवताओंको आश्चर्यमें डाल देनेवाला था। वह भयानक रूपवाला, पर्वतके समान विशाल तथा साक्षात् दूसरे तमोगुण जैसा था॥ ३६-३७॥ |
| ततो विष्णुशरीरात्तु तेजोराशिमिवापरम्।<br>नीलं सत्त्वगुणोपेतं प्रादुरास महाद्युति॥ ३८ | तदनन्तर भगवान् विष्णुके शरीरसे सत्त्वगुण-सम्पन्न, नीलवर्ण और अत्यन्त दीप्तिमान् दूसरी तेजोराशि प्रकट हुई॥ ३८॥ |
| ततश्चेन्द्रशरीरात्तु चित्ररूपं दुरासदम्।<br>आविरासीत्सुसंवृत्तं तेजः सर्वगुणात्मकम्॥ ३९ | इसके बाद इन्द्रके शरीरसे विचित्र आकारवाला, असह्य, पूर्ण गोलाकार और सर्वगुणात्मक तेज प्रादुर्भूत हुआ॥ ३९॥ |
| ५७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ | | :--- | :--- |
| Sanskrit Shloka | Hindi Meaning |
|---|---|
| कुबेरयमवह्नीनां शरीरेभ्यः समन्ततः।<br>निश्चक्राम महत्तेजो वरुणस्य तथैव च॥ ४०<br><br>अन्येषां चैव देवानां शरीरेभ्योऽतिभास्वरम्।<br>निर्गतं तन्महातेजोराशिरासीन्महोज्ज्वलः॥ ४१ | कुबेर, यम, अग्नि तथा वरुणके भी शरीरोंसे सभी ओर महान् तेज निकलने लगा। इसी प्रकार अन्य देवताओंके शरीरोंसे भी अतिशय प्रदीप्त तेज निकला। वह महान् तेजोराशि अत्यन्त दीप्तिमान् थी॥ ४०-४१॥ |
| तं दृष्ट्वा विस्मिताः सर्वे देवा विष्णुपुरोगमाः।<br>तेजोराशिं महादिव्यं हिमाचलमिवापरम्॥ ४२ | दूसरे हिमालयपर्वतके सदृश उस महादिव्य तेजोराशिको देखकर विष्णु आदि सभी प्रधान देवता आश्चर्यचकित हो गये॥ ४२॥ |
| पश्यतां तत्र देवानां तेजःपुञ्जसमुद्भवा।<br>बभूवातिवरा नारी सुन्दरी विस्मयप्रदा॥ ४३ | उसी क्षण वहाँ सभी देवताओंके देखते-देखते उस तेजःपुंजसे अत्यन्त श्रेष्ठ, सुन्दर तथा सबको विस्मित कर देनेवाली एक स्त्री प्रकट हो गयी॥ ४३॥ |
| त्रिगुणा सा महालक्ष्मीः सर्वदेवशरीरजा।<br>अष्टादशभुजा रम्या त्रिवर्णा विश्वमोहिनी॥ ४४<br><br>श्वेतानना कृष्णनेत्रा संरक्ताधरपल्लवा।<br>ताम्रपाणितला कान्ता दिव्यभूषणभूषिता॥ ४५ | सभी देवताओंके शरीरसे आविर्भूत वह नारी त्रिगुणात्मिका, अठारह भुजाओंवाली, मनोहर, त्रिवर्णा तथा विश्वको मोहमें डाल देनेवाली साक्षात् महालक्ष्मी थीं। वे उज्ज्वल मुखवाली, कृष्णवर्णके नेत्रोंवाली, अत्यन्त लाल अधरोष्ठसे सुशोभित, ताम्रवर्णकी हथेलीसे सुन्दर लगनेवाली, कान्तिसे सम्पन्न तथा दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत थीं॥ ४४-४५॥ |
| अष्टादशभुजा देवी सहस्रभुजमण्डिता।<br>सम्भूतासुरनाशाय तेजोराशिसमुद्भवा॥ ४६ | देवताओंके शरीरसे उत्पन्न तेजोराशिसे प्रकट वे अठारह भुजाओंवाली भगवती असुरोंका विनाश करनेके लिये हजारों भुजाओंसे सुशोभित हो गयीं॥ ४६॥ |
| जनमेजय उवाच<br>कृष्ण देव महाभाग सर्वज्ञ मुनिसत्तम।<br>विस्तरं ब्रूहि तस्यास्त्वं शरीरस्य समुद्भवम्॥ ४७<br><br>एकीभूतं च सर्वेषां तेजः किं वा पृथक् स्थितम्।<br>अङ्गानि चैव तस्यास्तु सर्वतेजोमयानि वा॥ ४८<br><br>भिन्नभागविभागेन जातान्यङ्गानि यानि तु।<br>मुखनासाक्षिभेदेन सर्वत्रैकभवानि च॥ ४९<br><br>ब्रूहि तद्विस्तरं व्यास शरीराङ्गसमुद्भवम्।<br>बभूव यस्य देवस्य तेजसोऽङ्गं यदद्भुतम्॥ ५० | जनमेजय बोले— हे कृष्णद्वैपायन! हे महाभाग! हे सर्वज्ञ! हे मुनिवर! अब आप उन भगवतीके शरीरकी उत्पत्तिका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। उन सब देवताओंके शरीरसे निकला हुआ तेज बादमें एकत्र हो गया अथवा पृथक्-पृथक् ही रहा? उनके अंग-प्रत्यंग विभिन्न देवताओंके तेजसे सम्पन्न थे अथवा नहीं? उनके शरीरके विभिन्न अंग—मुख, नासिका, नेत्र आदि अलग-अलग देवताओंके तेजसे निर्मित थे अथवा सब तेज एक साथ मिलकर बने थे? हे व्यासजी! उनके शरीरके अंगोंकी उत्पत्तिके विषयमें विस्तारपूर्वक बताइये। जिस देवताके तेजसे उनका जो-जो अद्भुत अंग बना, वह सब मुझे बताइये॥ ४७-५०॥ |
| आयुधाभरणादीनि दत्तानि यैर्यथा यथा।<br>तत्सर्वं श्रोतुकामोऽस्मि त्वन्मुखाम्बुजनिर्गतम्॥ ५१ | जिन-जिन देवताओंने उन भगवतीको जो-जो आयुध तथा आभूषण आदि समर्पित किये, आपके मुखारविन्दसे निकली सारी बात मैं सुनना चाहता हूँ। |
| अ० ८ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५७१ |
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| न हि तृप्याम्यहं ब्रह्मन् सुधामयरसं पिबन्।<br>चरितञ्च महालक्ष्म्यास्त्वन्मुखाम्भोजनिःसृतम्॥ ५२ | हे ब्रह्मन्! आपके मुखकमलसे निकले महालक्ष्मीके चरित्ररूपी अमृतमय रसका पान करते हुए मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ॥ ५१-५२॥ | | सूत उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा राज्ञः सत्यवतीसुतः।<br>उवाच मधुरं वाक्यं प्रीणयन्निव भूपतिम्॥ ५३ | सूतजी बोले—[हे मुनिवृन्द!] उन राजा जनमेजयका यह वचन सुनकर सत्यवतीपुत्र श्रीव्यासजी उन्हें प्रसन्न करते हुए यह मधुर वचन कहने लगे॥ ५३॥ | | व्यास उवाच<br>शृणु राजन्महाभाग विस्तरेण ब्रवीमि ते।<br>यथामति कुरुश्रेष्ठ तस्या देहसमुद्भवम्॥ ५४ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! हे महाभाग! हे कुरुश्रेष्ठ! सुनिये, मैं अपनी बुद्धिके अनुसार उनके शरीरकी उत्पत्तिके विषयमें विस्तारपूर्वक आपसे कहता हूँ॥ ५४॥ | | न ब्रह्मा न हरिः साक्षान्न रुद्रो न च वासवः।<br>याथातथ्येन तद्रूपं वक्तुमीशः कदाचन॥ ५५ | स्वयं ब्रह्मा, विष्णु, महेश और इन्द्र भी भगवतीके यथार्थ रूपको बता पानेमें कभी भी समर्थ नहीं हैं तब देवीका जो रूप है, जैसा है और जिस उद्देश्यसे बना है, उसे मैं कैसे जान सकता हूँ? | | कथं जानाम्यहं देव्या यद्रूपं यादृशं यतः।<br>वाचारम्भणमात्रं तदुत्पन्नेति ब्रवीमि यत्॥ ५६ | बस, मेरी वाणी इतना ही कह सकती है कि वे भगवती प्रकट हुईं॥ ५५-५६॥ | | सा नित्या सर्वदैवास्ते देवकार्यार्थसिद्धये।<br>नानारूपा त्वेकरूपा जायते कार्यगौरवात्॥ ५७ | वे देवी नित्यस्वरूपा हैं और सदा ही सर्वत्र विराजमान रहती हैं। वे एक होती हुई भी गुरुतर कार्य पड़नेपर देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये नाना प्रकारके रूप धारण कर लेती हैं॥ ५७॥ | | यथा नटो रङ्गगतो नानारूपो भवत्यसौ।<br>एकरूपस्वभावोऽपि लोकरञ्जनहेतवे॥ ५८ | जिस प्रकार नाटकका कोई नट एक होता हुआ भी रंगमंचपर जाकर लोगोंके मनोरंजनहेतु अनेक रूप धारण कर लेता है, उसी प्रकार रूपरहित तथा निर्गुणा होती हुई भी ये भगवती देवताओंका कार्य सम्पन्न करनेके लिये अपनी लीलासे अनेक सगुण रूप धारण कर लिया करती हैं और किये जानेवाले कर्मके अनुसार धात्वर्थ-गुणसंयुक्त उनके अनेक गौण नाम पड़ जाते हैं॥ ५८—६०॥ | | तथैषा देवकार्यार्थमरूपापि स्वलीलया।<br>करोति बहुरूपाणि निर्गुणा सगुणानि च॥ ५९ | | | कार्यकर्मानुसारेण नामानि प्रभवन्ति हि।<br>धात्वर्थगुणयुक्तानि गौणानि सुबहून्यपि॥ ६० | | | तद्वै बुद्ध्यनुसारेण प्रब्रवीमि नराधिप।<br>यथा तेजःसमुद्भूतं रूपं तस्या मनोहरम्॥ ६१ | हे राजन्! देवताओंके तेजसमूहसे उन भगवतीका मनोहर रूप जिस प्रकार उत्पन्न हुआ, उसे मैं अपनी बुद्धिके अनुसार बता रहा हूँ॥ ६१॥ | | शङ्करस्य च यत्तेजस्तेन तन्मुखपङ्कजम्।<br>श्वेतवर्णं शुभाकारमजायत महत्तरम्॥ ६२ | भगवान् शंकरका जो तेज था, उससे उन भगवतीका गौरवर्ण, सुन्दर आकारवाला तथा अत्यन्त विशाल मुखकमल निर्मित हुआ॥ ६२॥ | | केशास्तस्यास्तथा स्निग्धा याम्येन तेजसाभवन्।<br>वक्राग्राश्चातिदीर्घा वै मेघवर्णा मनोहराः॥ ६३ | यमराजके तेजसे उनके कोमल, घुँघराले, बहुत लम्बे, मेघके समान कृष्ण वर्णवाले और मनोहर केश बने॥ ६३॥ |
| ५७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| नयनत्रितयं तस्या जज्ञे पावकतेजसा।<br>कृष्णं रक्तं तथा श्वेतं वर्णत्रयविभूषितम्॥ ६४ | अग्निके तेजसे उन भगवतीके तीनों नेत्र बने। तीन प्रकारके वर्णोंसे सुशोभित वे नेत्र काले, लाल तथा श्वेत थे॥ ६४॥ | | वक्रे स्निग्धे कृष्णवर्णे सन्ध्ययोस्तेजसा भ्रुवौ।<br>जाते देव्याः सुतेजस्के कामस्य धनुषीव ते॥ ६५ | उनकी भौंहें दोनों सन्ध्याओंके तेजसे बनीं। वे टेढ़ी, चिकनी, काले रंगकी, अत्यन्त तेजोमय तथा कामदेवके धनुषकी भाँति प्रतीत हो रही थीं॥ ६५॥ | | वायोश्च तेजसा शस्तौ श्रवणौ सम्बभूवतुः।<br>नातिदीर्घौ नातिह्रस्वौ दोलाविव मनोभुवः॥ ६६<br>तिलपुष्पसमाकारा नासिका सुमनोहरा।<br>सञ्जाता स्निग्धवर्णा वै धनदस्य च तेजसा॥ ६७ | उनके दोनों उत्तम कान वायुके तेजसे बने, जो न बहुत बड़े तथा न बहुत छोटे थे। वे कामदेवके झूलेके सदृश प्रतीत हो रहे थे। तिलके फूलके समान आकृतिवाली, अत्यन्त मनोहर और स्निग्ध नाक कुबेरके तेजसे उत्पन्न हुई॥ ६६-६७॥ | | दन्ताः शिखरिणः श्लक्ष्णाः कुन्दाग्रसदृशाः समाः।<br>सञ्जाताः सुप्रभा राजन् प्राजापत्येन तेजसा॥ ६८ | हे राजन्! उन देवीके नुकीले, चिकने, चमकीले, कुन्दके अग्रभागके सदृश तथा समान दाँत प्रजापतिके तेजसे उत्पन्न हुए॥ ६८॥ | | अधरश्चातिरक्तोऽस्याः सञ्जातोऽरुणतेजसा।<br>उत्तरोष्ठस्तथा रम्यः कार्तिकेयस्य तेजसा॥ ६९ | उनका रक्तवर्ण अधरोष्ठ अरुणके तेजसे उत्पन्न हुआ तथा ऊपरका अत्यन्त मनोहर उत्तरोष्ठ (ऊपरका ओष्ठ) कार्तिकेयके तेजसे उत्पन्न हुआ॥ ६९॥ | | अष्टादशभुजाकारा बाहवो विष्णुतेजसा।<br>वसूनां तेजसाङ्गुल्यो रक्तवर्णास्तथाभवन्॥ ७०<br>सौम्येन तेजसा जातं स्तनयोर्युग्ममुत्तमम्।<br>ऐन्द्रेणास्यास्तथा मध्यं जातं त्रिवलिसंयुतम्॥ ७१<br>जङ्घोरू वरुणस्याथ तेजसा सम्बभूवतुः।<br>नितम्बः स तु सञ्जातो विपुलस्तेजसा भुवः॥ ७२ | उन देवीकी अठारह भुजाएँ विष्णुके तेजसे प्रकट हुईं तथा उनकी रक्तवर्णकी अँगुलियाँ वसुओंके तेजसे उत्पन्न हुईं। उनके दोनों उत्तम स्तन चन्द्रमाके तेजसे आविर्भूत हुए तथा तीन रेखाओंसे युक्त उनका मध्यभाग इन्द्रके तेजसे उत्पन्न हुआ। उनकी जाँघें तथा ऊरु-प्रदेश वरुणके तेजसे उत्पन्न हुए तथा उनका विशाल नितम्ब पृथ्वीके तेजसे उत्पन्न हुआ॥ ७०–७२॥ | | एवं नारी शुभाकारा सुरूपा सुस्वरा भृशम्।<br>समुत्पन्ना तथा राजंस्तेजोराशिसमुद्भवा॥ ७३ | हे राजन्! इस प्रकार उस तेजोराशिसे सुन्दर आकारवाली, दिव्य रूपसे सम्पन्न तथा मधुर स्वरवाली भगवती नारी-रूपमें प्रकट हुईं॥ ७३॥ | | तां दृष्ट्वा सुष्ठुसर्वाङ्गीं सुदतीं चारुलोचनाम्।<br>मुदं प्रापुः सुराः सर्वे महिषेण प्रपीडिताः॥ ७४ | मनोहर अंग-प्रत्यंगवाली, सुन्दर दाँतोंवाली तथा भव्य नेत्रोंवाली उन देवीको देखकर महिषासुरसे पीड़ित समस्त देवता अत्यन्त आनन्दित हो उठे॥ ७४॥ | | विष्णुस्त्वाह सुरान्सर्वान्भूषणान्यायुधानि च।<br>प्रयच्छन्तु शुभान्यस्यै देवाः सर्वाणि साम्प्रतम्॥ ७५<br>स्वायुधेभ्यः समुत्पाद्य तेजोयुक्तानि सत्वराः।<br>समर्पयन्तु सर्वेऽद्य देव्यै नानायुधानि वै॥ ७६ | उसी समय भगवान् विष्णुने सभी देवताओंसे कहा—हे देवताओ! अब आपलोग अपने-अपने सभी शुभ भूषण एवं आयुध इन देवीको प्रदान करें। अपने-अपने आयुधोंसे नानाविध तेजस्वी शस्त्रास्त्र उत्पन्न करके सभी लोग शीघ्र ही देवीको अर्पित कर दें॥ ७५–७६॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
देव्याः स्वरूपोद्भववर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥
अ० ९] पञ्चम स्कन्ध ५७३
अ० ९] पञ्चम स्कन्ध ५७३
अथ नवमोऽध्यायः
देवताओंद्वारा भगवतीको आयुध और आभूषण समर्पित करना तथा उनकी स्तुति करना, देवीका प्रचण्ड अट्टहास करना, जिसे सुनकर महिषासुरका उद्विग्न होकर अपने प्रधान अमात्यको देवीके पास भेजना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>देवा विष्णुवचः श्रुत्वा सर्वे प्रमुदितास्तदा।<br>ददुश्च भूषणान्याशु वस्त्राणि स्वायुधानि च॥ १ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] तब भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर सभी देवता बहुत प्रसन्न हुए। वे तुरंत महालक्ष्मीको वस्त्र, आभूषण और अपने-अपने आयुध प्रदान करने लगे॥ १॥ |
| क्षीरोदश्चाम्बरे दिव्ये रक्ते सूक्ष्मे तथाजरे।<br>निर्मलञ्च तथा हारं प्रीतस्तस्यै सुमण्डितम्॥ २<br><br>ददौ चूडामणिं दिव्यं सूर्यकोटिसमप्रभम्।<br>कुण्डले च तथा शुभ्रे कटकानि भुजेषु वै॥ ३<br><br>केयूरान्कङ्कणान्दिव्यान्नानारत्नविराजितान् ।<br>ददौ तस्यै विश्वकर्मा प्रसन्नेन्द्रियमानसः॥ ४<br><br>नूपुरौ सुस्वरौ कान्तौ निर्मलौ रत्नभूषितौ।<br>ददौ सूर्यप्रतीकाशौ त्वष्टा तस्यै सुपादयोः॥ ५ | क्षीरसागरने देवीको दिव्य, रक्तवर्णवाले, महीन तथा कभी भी जीर्ण न होनेवाले दो वस्त्र; निर्मल तथा मनोहर हार; करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान दिव्य चूडामणि; दो सुन्दर कुण्डल तथा कड़े प्रसन्नतापूर्वक दिये। विश्वकर्माने भुजाओंपर धारण करनेके लिये बाजूबन्द और अनेक प्रकारके रत्नजटित दिव्य कंकण प्रसन्नचित्त होकर उन्हें प्रदान किये। साथ ही त्वष्टाने मधुर ध्वनिवाले, चमकीले, स्वच्छ, रत्नजटित और सूर्यके समान प्रकाशमान दो नूपुर पैरोंमें पहननेके लिये उन्हें प्रदान किये॥ २–५॥ |
| तथा ग्रैवेयकं रम्यं ददौ तस्यै महार्णवः।<br>अङ्गुलीयरत्नानि तेजोवन्ति च सर्वशः॥ ६ | महासमुद्रने उन्हें गलेमें धारण करनेके लिये मनोहर कण्ठहार और रत्नोंसे निर्मित तेजोमय अँगूठियाँ प्रदान कीं॥ ६॥ |
| अम्लानपङ्कजां मालां गन्धाढ्यां भ्रमरानुगाम्।<br>तथैव वैजयन्तीञ्च वरुणः सम्प्रयच्छत॥ ७ | वरुणदेवने कभी न मुरझानेवाले कमलोंकी माला, जो सुगन्धसे परिपूर्ण थी तथा जिसपर भौंरे मँडरा रहे थे और वैजयन्ती नामक माला भगवतीको प्रदान की॥ ७॥ |
| हिमवानथ सन्तुष्टो रत्नानि विविधानि च।<br>ददौ च वाहनं सिंहं कनकाभं मनोहरम्॥ ८ | हिमवान्ने प्रसन्न होकर उन्हें नाना प्रकारके रत्न तथा सुवर्णके समान चमकीले वर्णवाला एक मनोहर सिंह वाहनके रूपमें प्रदान किया॥ ८॥ |
| भूषणैर्भूषिता दिव्यैः सा रराज वरा शुभा।<br>सिंहारूढा वरारोहा सर्वलक्षणसंयुता॥ ९ | सभी लक्षणोंसे सम्पन्न तथा सुन्दर रूपवाली वे कल्याणमयी श्रेष्ठ भगवती दिव्य आभूषणोंसे विभूषित होकर सिंहपर आरूढ़ होकर अत्यन्त सुशोभित हो रही थीं॥ ९॥ |
| विष्णुश्चक्रात्समुत्पाद्य ददावस्यै रथाङ्गकम्।<br>सहस्रारं सुदीप्तञ्च देवारिशिरसां हरम्॥ १० | तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने अपने चक्रसे उत्पन्न करके सहस्र अरोंवाला, तेजसम्पन्न और दैत्योंका सिर काट लेनेकी सामर्थ्यवाला एक चक्र उन्हें प्रदान किया॥ १०॥ |
| ५७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्वत्रिशूलात्समुत्पाद्य शङ्करः शूलमुत्तमम्।<br>ददौ देव्यै सुरारीणां कृन्तनं भयनाशनम्॥ ११ | शंकरजीने अपने त्रिशूलसे उत्पन्न करके भगवतीको एक ऐसा उत्तम त्रिशूल अर्पण किया, जो दानवोंको काट डालनेकी शक्तिसे सम्पन्न तथा देवताओंके भयका नाश करनेवाला था॥ ११॥ |
| वरुणश्च प्रसन्नात्मा ददौ शङ्खं समुज्ज्वलम्।<br>घोषवन्तं स्वशङ्खात्तु समुत्पाद्य सुमङ्गलम्॥ १२ | वरुणदेवने अपने शंखसे उत्पन्न करके प्रसन्नचित्त होकर देवीजीको एक ऐसा शंख प्रदान किया; जो मंगलमय, अत्यन्त उज्ज्वल तथा तीव्र ध्वनि करनेवाला था॥ १२॥ |
| हुताशनस्तथा शक्तिं शतघ्नीं सुमनोजवाम्।<br>प्रायच्छत्तु प्रसन्नात्मा तस्यै दैत्यविनाशिनीम्॥ १३ | अग्निदेवने प्रसन्नचित्त होकर सैकड़ों शत्रुओंका संहार करनेवाली, मनके समान तीव्र गतिसे चलनेवाली तथा दैत्योंका विनाश करनेवाली एक शक्ति उन्हें प्रदान की॥ १३॥ |
| इषुधिं बाणपूर्णञ्च चापं चाद्भुतदर्शनम्।<br>मारुतो दत्तवांस्तस्यै दुराकर्षं खरस्वरम्॥ १४ | पवनदेवने उन भगवती महालक्ष्मीको बाणोंसे भरा हुआ एक तरकस तथा देखनेमें अत्यन्त अद्भुत, कठिनाईसे खींचा जा सकनेवाला और कर्कश टंकार करनेवाला धनुष प्रदान किया॥ १४॥ |
| स्ववज्राद्वज्रमुत्पाद्य ददाविन्द्रोऽतिदारुणम्।<br>घण्टामैरावतात्तूर्णं सुशब्दां चातिसुन्दराम्॥ १५ | देवराज इन्द्रने अपने वज्रसे उत्पन्न करके एक अत्यन्त भयंकर वज्र तथा ऐरावत हाथीसे उतारकर एक परम सुन्दर तथा तीव्र ध्वनि करनेवाला घण्टा तुरंत भगवतीको अर्पण किया॥ १५॥ |
| ददौ दण्डं यमः कामं कालदण्डसमुद्भवम्।<br>येनान्तं सर्वभूतानामकरोत्काल आगते॥ १६ | यमराजने अपने कालदण्डसे आविर्भूत एक ऐसा दण्ड भगवतीको प्रदान किया, जिससे वे समय आनेपर सभी प्राणियोंका अन्त करते थे॥ १६॥ |
| ब्रह्मा कमण्डलुं दिव्यं गङ्गावारिप्रपूरितम्।<br>ददावस्यै मुदा युक्तो वरुणः पाशमेव च॥ १७ | ब्रह्माजीने गंगाजलसे परिपूर्ण दिव्य कमण्डलु और वरुणदेवने अपना पाश उन्हें प्रसन्नतापूर्वक प्रदान किया॥ १७॥ |
| कालः खड्गं तथा चर्म प्रायच्छत्तु नराधिप।<br>परशुं विश्वकर्मा च तीक्ष्णमस्यै ददावथ॥ १८ | हे राजन्! कालने महालक्ष्मीको खड्ग तथा ढाल दिये और विश्वकर्माने उन्हें तीक्ष्ण परशु अर्पण किया॥ १८॥ |
| धनदस्तु सुरापूर्णं पानपात्रं सुवर्णजम्।<br>पङ्कजं वरुणश्चादाद्देव्यै दिव्यं मनोहरम्॥ १९ | कुबेरने भगवतीको एक सुवर्णमय पानपात्र तथा वरुणने उन्हें दिव्य तथा मनोहर कमल-पुष्प प्रदान किया॥ १९॥ |
| गदां कौमोदकीं त्वष्टा घण्टाशतनिनादिनीम्।<br>अदात्तस्यै प्रसन्नात्मा सुरशत्रुविनाशिनीम्॥ २०<br><br>अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यञ्च दंशनम्।<br>ददौ त्वष्टा जगन्मात्रे निजरश्मीन्दिवाकरः॥ २१ | प्रसन्न मनवाले त्वष्टाने सैकड़ों घण्टोंके समान ध्वनि करनेवाली और दानवोंका विनाश कर डालनेवाली कौमोदकी नामक गदा उन्हें प्रदान की। साथ ही उन त्वष्टाने जगज्जननी भगवती महालक्ष्मीको अनेक प्रकारके अस्त्र तथा अभेद्य कवच प्रदान किये और सूर्यदेवने उन्हें अपनी किरणें प्रदान कीं॥ २०-२१॥ |
| अ० ९ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५७५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सायुधां भूषणैर्युक्तां दृष्ट्वा ते विस्मयं गताः।<br>तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं त्रैलोक्यमोहिनीं शिवाम्॥ २२ | इस प्रकार सभी आयुधों तथा आभूषणोंसे युक्त उन भगवतीको देखकर देवतागण अत्यन्त विस्मित हुए और त्रैलोक्यमोहिनी उन कल्याणकारिणी देवीकी स्तुति करने लगे॥ २२॥ |
| देवा ऊचुः<br>नमः शिवायै कल्याण्यै शान्त्यै पुष्ट्यै नमो नमः।<br>भगवत्यै नमो देव्यै रुद्राण्यै सततं नमः॥ २३ | देवता बोले— शिवाको नमस्कार है। कल्याणी, शान्ति और पुष्टि देवीको बार-बार नमस्कार है। भगवतीको नमस्कार है। देवी रुद्राणीको निरन्तर नमस्कार है॥ २३॥ |
| कालरात्र्यै तथाम्बायै इन्द्राण्यै ते नमो नमः।<br>सिद्धयै बुद्धयै तथा वृद्धयै वैष्णव्यै ते नमो नमः॥ २४ | आप कालरात्रि, अम्बा तथा इन्द्राणीको बार-बार नमस्कार है। आप सिद्धि, बुद्धि, वृद्धि तथा वैष्णवीको बार-बार नमस्कार है॥ २४॥ |
| पृथिव्यां या स्थिता पृथ्व्या न ज्ञाता पृथिवीञ्च या।<br>अन्तःस्थिता यमयति वन्दे तामीश्वरीं पराम्॥ २५ | पृथ्वीके भीतर स्थित रहकर जो पृथ्वीको नियन्त्रित करती हैं, किंतु पृथ्वी जिन्हें नहीं जान पातीं, उन परा परमेश्वरीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ २५॥ |
| मायायां या स्थिता ज्ञाता मायया न च तामजाम्।<br>अन्तःस्थिता प्रेरयति प्रेरयित्रीं नुमः शिवाम्॥ २६ | जो मायाके अन्दर स्थित रहनेपर भी मायाके द्वारा नहीं जानी जा सकीं तथा जो मायाके अन्दर विराजमान रहकर उसे प्रेरणा प्रदान करती हैं, उन जन्मरहित तथा प्रेरणा प्रदान करनेवाली भगवती शिवाको हम नमस्कार करते हैं॥ २६॥ |
| कल्याणं कुरु भो मातस्त्राहि नः शत्रुतापितान्।<br>जहि पापं हयारिं त्वं तेजसा स्वेन मोहितम्॥ २७<br>खलं मायाविनं घोरं स्त्रीवध्यं वरदर्पितम्।<br>दुःखदं सर्वदेवानां नानारूपधरं शठम्॥ २८ | हे माता! आप हमारा कल्याण करें और शत्रुओंसे संत्रस्त हम देवताओंकी रक्षा करें। आप अपने तेजसे इस मोहग्रस्त पापी महिषासुरका वध कर डालें। यह महिषासुर दुष्ट, घोर मायावी, केवल स्त्रीके द्वारा मारा जा सकनेवाला, वरदान प्राप्त करनेसे अभिमानी, समस्त देवताओंको दुःख देनेवाला तथा अनेक रूप धारण करनेवाला महादुष्ट है॥ २७-२८॥ |
| त्वमेका सर्वदेवानां शरणं भक्तवत्सले।<br>पीडितान्दानवेनाद्य त्राहि देवि नमोऽस्तु ते॥ २९ | हे भक्तवत्सले! एकमात्र आप ही सभी देवताओंकी शरण हैं; दानव महिषासुरसे पीड़ित हम देवताओंकी आप रक्षा कीजिये। हे देवि! आपको नमस्कार है॥ २९॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं स्तुता तदा देवी सुरैः सर्वसुखप्रदा।<br>नानुवाच महादेवी स्मितपूर्वं शुभं वचः॥ ३० | व्यासजी बोले— इस प्रकार सब देवताओंके स्तुति करनेपर समस्त सुख प्रदान करनेवाली महादेवी मुसकराकर उन देवताओंसे यह मंगलमय वचन कहने लगीं॥ ३०॥ |
| देव्युवाच<br>भयं त्यजन्तु गीर्वाणा महिषान्मन्दचेतसः।<br>हनिष्यामि रणेऽद्यैव वरदृप्तं विमोहितम्॥ ३१ | देवी बोलीं— हे देवतागण! आपलोग मन्दबुद्धि महिषासुरका भय त्याग दें। मैं वर पानेके कारण अभिमानमें चूर तथा मोहग्रस्त उस महिषासुरको आज ही रणमें मार डालूँगी॥ ३१॥ |
| ५७६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ |
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| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा सा सुरान्देवी जहासातीव सुस्वरम्।<br>चित्रमेतच्च संसारे भ्रममोहयुतं जगत्॥ ३२<br>ब्रह्मविष्णुमहेशाद्याः सेन्द्राश्चान्ये सुरास्तथा।<br>कम्पयुक्ता भयत्रस्ता वर्तन्ते महिषात्किल॥ ३३ | व्यासजी बोले—देवताओंसे ऐसा कहकर वे भगवती अत्यन्त उच्च स्वरमें हँस पड़ीं। [वे बोलीं—] इस संसारमें यह बड़ी विचित्र बात है कि यह सारा जगत् ही भ्रम तथा मोहसे ग्रसित है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र आदि तथा अन्य देवता भी महिषासुरसे भयभीत होकर काँपने लगते हैं॥ ३२-३३॥ | | अहो दैवबलं घोरं दुर्जयं सुरसत्तमाः।<br>कालः कर्तास्ति दुःखानां सुखानां प्रभुरीश्वरः॥ ३४<br>सृष्टिपालनसंहारे समर्था अपि ते यदा।<br>मुह्यन्ति क्लेशसन्तप्ता महिषेण प्रपीडिताः॥ ३५ | हे श्रेष्ठ देवताओ! दैवबल बड़ा ही भयानक और दुर्जय है। काल ही सुख और दुःखका कर्ता है। यही सबका प्रभु तथा ईश्वर है। सृष्टि, पालन तथा संहार करनेमें समर्थ रहते हुए भी वे ब्रह्मा आदि मोह-ग्रस्त हो जाते हैं, कष्ट भोगते हैं और महिषासुरके द्वारा सताये जाते हैं॥ ३४-३५॥ | | इति कृत्वा स्मितं देवी साट्टहासं चकार ह।<br>उच्चैः शब्दं महाघोरं दानवानां भयप्रदम्॥ ३६ | मुसकराकर ऐसा कहनेके पश्चात् देवी अट्टहास करने लगीं। उस अट्टहासका महाभयानक गर्जन दानवोंको भयभीत कर देनेवाला था॥ ३६॥ | | चकम्पे वसुधा तत्र श्रुत्वा तच्छब्दमद्भुतम्।<br>चेलुश्च पर्वताः सर्वे चुक्षोभाब्धिश्च वीर्यवान्॥ ३७<br>मेरुश्चचाल शब्देन दिशः सर्वाः प्रपूरिताः।<br>भयं जग्मुस्तदा श्रुत्वा दानवास्तत्स्वनं महत्॥ ३८<br>जय पाहीति देवास्तामूचुः परमहर्षिताः। | उस अद्भुत शब्दको सुनकर पृथ्वी काँपने लगी, सभी पर्वत चलायमान हो उठे और अगाध महासमुद्रमें विक्षोभ उत्पन्न होने लगा। उस शब्दसे सुमेरुपर्वत हिलने लगा और सभी दिशाएँ गूँज उठीं। उस तीव्र ध्वनिको सुनकर सभी दानव भयभीत हो गये। सभी देवता परम प्रसन्न होकर 'आपकी जय हो', 'हमारी रक्षा करो'—ऐसा उन देवीसे कहने लगे॥ ३७-३८ १/२॥ | | महिषोऽपि स्वनं श्रुत्वा चुकोप मदगर्वितः॥ ३९<br>किमेतदिति तान्दैत्यानपृच्छ स्वनशङ्कितः।<br>गच्छन्तु त्वरिता दूता ज्ञातुं शब्दसमुद्भवम्॥ ४०<br>कृतः केनायमत्युग्रः शब्दः कर्णव्यथाकरः।<br>देवो वा दानवो वापि यो भवेत्स्वनकारकः॥ ४१<br>गृहीत्वा तं दुरात्मानं मत्समीपं नयन्त्विह।<br>हनिष्यामि दुराचारं गर्जन्तं स्मयदुर्मदम्॥ ४२<br>क्षीणायुष्यं मन्दमतिं नयामि यमसादनम्।<br>पराजिताः सुराः कामं न गर्जन्ति भयातुराः॥ ४३<br>नासुरा मम वश्यास्ते कस्येदं मूढचेष्टितम्।<br>त्वरिता मामुपायान्तु ज्ञात्वा शब्दस्य कारणम्॥ ४४ | अभिमानमें चूर महिषासुर भी वह ध्वनि सुनकर क्रुद्ध हो उठा। उस ध्वनिसे सशंकित महिषासुरने दैत्योंसे पूछा—यह कैसी ध्वनि है? इस ध्वनिके उद्गम-स्थलको जाननेके लिये दूतगण तत्काल यहाँसे जायें। कानोंको पीड़ा पहुँचानेवाला यह अति भीषण शब्द किसने किया है? देवता या दानव जो कोई भी इस ध्वनिको उत्पन्न करनेवाला हो, उस दुष्टात्माको पकड़कर मेरे पास ले आयें। ऐसा गर्जन करनेवाले उस अभिमानके मदमें उन्मत्त दुराचारीको मैं मार डालूँगा। मैं क्षीण-आयु तथा मन्दबुद्धिवाले उस दुष्टको अभी यमपुरी पहुँचा दूँगा। देवता मुझसे पराजित होकर भयभीत हो गये हैं, अतः वे ऐसा गर्जन कर ही नहीं सकते। दानव भी ऐसा नहीं कर सकते; क्योंकि वे सब तो मेरे अधीन हैं, तो फिर यह |
अ० ९] पञ्चम स्कन्ध ५७७
अ० ९] पञ्चम स्कन्ध ५७७
| अहं गत्वा हनिष्यामि तं पापं वितथश्रमम्। | मूर्खतापूर्ण चेष्टा किसकी हो सकती है ? अब दूतगण इस शब्दके कारणका पता लगाकर मेरे पास शीघ्र आयें। तत्पश्चात् मैं स्वयं वहाँ जाकर ऐसा व्यर्थ कर्म करनेवाले उस पापीका वध कर दूँगा ॥ ३९—४४ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्तास्तेन ते दूता देवीं सर्वाङ्गसुन्दरीम् ॥ ४५<br><br>अष्टादशभुजां दिव्यां सर्वार्भरणभूषिताम्।<br>सर्वलक्षणसम्पन्नां वरायुधधरां शुभाम् ॥ ४६<br><br>दधतीं चषकं हस्ते पिबन्तीं च मुहुर्मुधु।<br>संवीक्ष्य भयभीतास्ते जग्मुस्त्रस्ताः सुशङ्किताः ॥ ४७<br><br>सकाशे महिषस्याशु तमूचुः स्वनकारणम्। | व्यासजी बोले—महिषासुरके ऐसा कहनेपर वे दूत [शब्दके कारणका पता लगाते-लगाते] समस्त सुन्दर अंगोंवाली, अठारह भुजाओंवाली, दिव्य विग्रहमयी, सभी प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत, सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, उत्तम आयुध धारण करनेवाली और हाथमें मधुपात्र लेकर बार-बार उसका पान करती हुई भगवतीके पास पहुँच गये। उन्हें देखकर वे भयभीत हो गये और व्याकुल तथा सशंकित होकर वहाँसे भाग चले। महिषासुरके पास आकर वे उससे ध्वनिका कारण बताने लगे॥ ४५—४७ १/२ ॥ |
| दूता ऊचुः<br>देवी दैत्येश्वर प्रौढा दृश्यते काचिदङ्गना ॥ ४८<br><br>सर्वाङ्गभूषणा नारी सर्वरत्नोपशोभिता।<br>न मानुषी नासुरी सा दिव्यरूपा मनोहरा ॥ ४९<br><br>सिंहारूढायुधधरा चाष्टादशकरा वरा।<br>सा नादं कुरुते नारी लक्ष्यते मदगर्विता ॥ ५०<br><br>सुरापानरता कामं जानीमो न सभर्तृका।<br>अन्तरिक्षस्थिता देवास्तां स्तुवन्ति मुदान्विताः ॥ ५१ | दूत बोले—हे दैत्येन्द्र! वह कोई प्रौढा स्त्री और देवीकी भाँति दिखायी देती है। उस स्त्रीके सभी अंगोंमें आभूषण विद्यमान हैं तथा वह सभी प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित है। वह स्त्री न तो मानवी है और न तो आसुरी है। दिव्यविग्रहवाली वह स्त्री बड़ी मनोहर है। अठारह भुजाओंवाली वह श्रेष्ठ नारी नानाविध आयुध धारण करके सिंहपर विराजमान है। वही स्त्री गर्जन कर रही है। वह मदोन्मत्त दिखायी दे रही है। वह निरन्तर मद्यपान कर रही है। हमें ऐसा जान पड़ता है कि वह अभी विवाहिता नहीं है॥ ४८—५० १/२ ॥ |
| जयेति पाहि नश्चेति जहि शत्रूमिति प्रभो।<br>न जाने का वरारोहा कस्य वा सा परिग्रहः ॥ ५२<br><br>किमर्थमागता चात्र किं चिकीर्षति सुन्दरी।<br>द्रष्टुं नैव समर्थाः स्मस्तत्तेजःपरिकर्षिताः ॥ ५३<br><br>शृङ्गारवीरहासाढ्या रौद्राद्भुतरसान्विता।<br>दृष्ट्वैवंविविधां नारीमसम्भाष्य समागताः ॥ ५४<br><br>वयं त्वदाज्ञया राजन् किं कर्तव्यमतःपरम्। | देवतागण आकाशमें स्थित होकर प्रसन्नतापूर्वक उसकी इस प्रकार स्तुति कर रहे हैं—'आपकी जय हो', 'हमारी रक्षा करो' और 'शत्रुओंका वध करो'। हे प्रभो! मैं यह नहीं जानता कि वह सुन्दरी कौन है, किसकी पत्नी है, वह सुन्दरी यहाँ किसलिये आयी हुई है और वह क्या करना चाहती है? उस स्त्रीके तेजसे चकाचौंध हमलोग उसे देखनेमें समर्थ नहीं हो सके। वह स्त्री शृंगार, वीर, हास्य, रौद्र और अद्भुत—इन सभी रसोंसे परिपूर्ण थी। इस प्रकारकी अद्भुत स्वरूपवाली नारीको देखकर हमलोग बिना कुछ कहे ही आपके आज्ञानुसार लौट आये। हे राजन्! अब इसके बाद क्या करना है?॥ ५१—५४ १/२ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 19 A
| ५७८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ ] |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| महिष उवाच<br>गच्छ वीर मयादिष्टो मन्त्रिश्रेष्ठ बलान्वितः ॥ ५५<br><br>सामादिभिरुपायैस्त्वं समानय शुभाननाम्।<br>नायाति यदि सा नारी त्रिभिः सामादिभिस्त्विह ॥ ५६<br><br>अहत्वा तां वरारोहां त्वमानय ममान्तिकम्।<br>करोमि पट्टमहिषीं तां मरालभ्रुवं मुदा ॥ ५७<br><br>प्रीतियुक्ता समायाति यदि सा मृगलोचना।<br>रसभङ्गो यथा न स्यात्तथा कुरु ममेप्सितम् ॥ ५८<br><br>श्रवणान्मोहितोऽस्म्यद्य तस्या रूपस्य सम्पदा। | महिषासुर बोला—हे वीर! हे मन्त्रिश्रेष्ठ! तुम मेरे आदेशसे सेना साथमें लेकर जाओ और साम आदि उपायोंसे उस सुन्दर मुखवाली स्त्रीको यहाँ ले आओ। यदि वह स्त्री साम, दान और भेद—इन तीन उपायोंसे भी यहाँ न आये तो उस सुन्दरीको बिना मारे ही पकड़कर मेरे पास ले आओ, यदि वह मृगनयनी प्रीतिपूर्वक आयेगी तो मैं हंसके समान भौंहोंवाली उस स्त्रीको प्रसन्नतापूर्वक अपनी पटरानी बनाऊँगा। मेरी इच्छा समझकर जिस प्रकार रसभंग न हो, वैसा करना। मैं उसकी रूपराशिकी बात सुनकर मोहित हो गया हूँ॥ ५५–५८ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>महिषस्य वचः श्रुत्वा पेशलं मन्त्रिसत्तमः ॥ ५९<br><br>जगाम तरसा कामं गजाश्वरथसंयुतः।<br>गत्वा दूरतरं स्थित्वा तामुवाच मनस्विनीम् ॥ ६०<br><br>विनयावनतः श्लक्ष्णं मन्त्री मधुरया गिरा। | व्यासजी बोले—महिषासुरकी यह कोमल वाणी सुनकर वह श्रेष्ठ मन्त्री हाथी, घोड़े और रथ साथ लेकर तुरंत चल पड़ा। वहाँ पहुँचकर कुछ दूर खड़े होकर वह सचिव कोमल तथा मधुर वाणीमें विनम्रतापूर्वक उस दृढ़ निश्चयवाली नारीसे कहने लगा॥ ५९–६० १/२ ॥ |
| प्रधान उवाच<br>कासि त्वं मधुरालापे किमत्रागमनं कृतम् ॥ ६१ | प्रधान बोला—हे मधुरभाषिणि! तुम कौन हो और यहाँ क्यों आयी हो? हे महाभागे! मेरे मुखसे ऐसा कहलाकर मेरे स्वामीने तुमसे यह बात पूछी है॥ ६१ १/२ ॥ |
| पृच्छति त्वां महाभागे मन्मुखेन मम प्रभुः।<br>स जेता सर्वदेवानाभवध्यस्तु नरैः किल ॥ ६२<br><br>ब्रह्मणो वरदानेन गर्वितश्चारुलोचने।<br>दैत्येश्वरोऽसौ बलवान्कामरूपधरः सदा ॥ ६३ | उन्होंने समस्त देवताओंको जीत लिया है और वे मनुष्योंसे अवध्य हैं। हे चारुलोचने! ब्रह्माजीसे वरदान पानेके कारण वे बहुत गर्वयुक्त रहते हैं। वे दैत्यराज महिष बड़े बलवान् हैं और अपनी इच्छाके अनुसार वे सदा विविध रूप धारण कर सकते हैं॥ ६२–६३॥ |
| श्रुत्वा त्वां समुपायातां चारुवेषां मनोहराम्।<br>द्रष्टुमिच्छति राजा मे महिषो नाम पार्थिवः ॥ ६४<br><br>मानुषं रूपमादाय त्वत्समीपं समेष्यति।<br>यथा रुच्येत चार्वङ्गि तथा मन्यामहे वयम् ॥ ६५ | सुन्दर वेष तथा मनोहर विग्रहवाली आप यहाँ आयी हुई हैं—ऐसा सुनकर मेरे प्रभु महाराज महिषासुर आपको देखना चाहते हैं। वे मनुष्यका रूप धारण करके आपके पास आयेंगे। हे सुन्दर अंगोंवाली! आपकी जो इच्छा होगी, हम उसीको मान लेंगे॥ ६४–६५॥ |
| तर्हीहि मृगशावाक्षि समीपं तस्य धीमतः।<br>नो चेदिहानयाम्येनं राजानं भक्तितत्परम् ॥ ६६ | हे बालमृगके समान नेत्रोंवाली! अब आप उन बुद्धिमान् राजा महिषके पास चलें और नहीं तो मैं स्वयं जाकर आपके प्रेममें लीन राजा महिषको यहाँ ले आऊँ॥ ६६॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 19 B