देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ६ ] द्वितीय स्कन्ध २०७
अ० ६ ] द्वितीय स्कन्ध २०७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मा मा मा मेति बहुधा निषिद्धोऽपि तया भृशम्।<br>आलिलिङ्ग प्रियां दैवात्पपात धरणीतले॥ ६० | भी उन्होंने बलपूर्वक अपनी उस प्रियाका आलिंगन कर लिया और वे दैववश [शापके कारण] पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ५९-६०॥ |
| यथा वृक्षगता वल्ली छिन्ने पतति वै द्रुमे।<br>तथा सा पतिता बाला कुर्वन्ती रोदनं बहु॥ ६१ | जैसे वृक्षपर चढ़ी हुई लता वृक्षके कट जानेपर गिर पड़ती है, वैसे ही वह रानी माद्री भी बहुत रुदन करती हुई गिर पड़ी॥ ६१॥ |
| प्रत्यागता तदा कुन्ती रुदती बालकास्तथा।<br>मुनयश्च महाभागाः श्रुत्वा कोलाहलं तदा॥ ६२ | उस समय कोलाहल सुनकर रोती हुई कुन्ती, सभी बालक और महाभाग मुनिगण भी वहाँ आ गये॥ ६२॥ |
| मृतः पाण्डुस्तदा सर्वे मुनयः संशितव्रताः।<br>सहाग्निभिर्विधिं कृत्वा गङ्गातीरे तदादहन्॥ ६३<br>चक्रे सहैव गमनं माद्री दत्त्वा सुतौ शिशू।<br>कुन्त्यै धर्मं पुरस्कृत्य सतीनां सत्यकामतः॥ ६४ | इस प्रकार जब पाण्डु मर गये, तब सभी व्रतधारी मुनियोंने गंगाके तटपर चिता लगाकर उनका दाह-संस्कार कर दिया। तत्पश्चात् अपने दोनों पुत्र कुन्तीको सौंप करके सती-धर्मका पालन करते हुए वह माद्री सत्यकी कामनासे उनके साथ ही सती हो गयी॥ ६३-६४॥ |
| जलदानादिकं कृत्वा मुनयस्तत्र वासिनः।<br>पञ्चपुत्रयुतां कुन्तीमनयन्हस्तिनापुरम्॥ ६५ | वहाँके निवासी मुनिगण जलांजलि आदि देकर पाँचों पुत्रोंसहित कुन्तीको हस्तिनापुर ले आये॥ ६५॥ |
| तां प्राप्तां च समाज्ञाय गाङ्गेयो विदुरस्तथा।<br>नगरीं धृतराष्ट्रस्य सर्वे तत्र समाययुः॥ ६६ | धृतराष्ट्रकी नगरी हस्तिनापुरमें कुन्तीके आनेका समाचार पाकर भीष्म, विदुर आदि सभी लोग वहाँ आ पहुँचे॥ ६६॥ |
| पप्रच्छुश्च जनाः सर्वे कस्य पुत्रा वरानने।<br>पाण्डोः शापं समाज्ञाय कुन्ती दुःखान्विता तदा॥ ६७<br>तानुवाच सुराणां वै पुत्राः कुरुकुलोद्भवाः।<br>विश्वासार्थं समाहूताः कुन्त्या सर्वे सुरास्तदा॥ ६८<br>आगत्य खे तदा तैस्तु कथितं नः सुताः किल।<br>भीष्मेण सत्कृतं वाक्यं देवानां सत्कृताः सुताः॥ ६९ | सभी लोगोंने कुन्तीसे पूछा—हे सुमुखि! ये किसके पुत्र हैं? तब कुन्ती अत्यन्त दुःखित होकर पाण्डुकी शापजन्य मृत्युका उल्लेख करके बोली—कुरुवंशमें उत्पन्न हुए ये सब बालक देवताओंके पुत्र हैं। उन्हें विश्वास दिलानेके लिये कुन्तीने उस समय सभी देवताओंका आह्वान भी किया, तब उन देवताओंने आकाशमें प्रकट होकर कहा—ये पाँचों निःसन्देह हमलोगोंके पुत्र हैं। भीष्मने देवताओंके वचनका अनुमोदन किया तथा कुन्तीके पाँचों पुत्रोंका स्वागत किया॥ ६७-६९॥ |
| गता नागपुरं सर्वे तानादाय सुतान्वधूम्।<br>भीष्मादयः प्रीतचित्ताः पालयामासुरर्थतः॥ ७०<br>एवं पार्थाः समुत्पन्ना गाङ्गेयेनाथ पालिताः॥ ७१ | तत्पश्चात् उन पुत्रों तथा वधू कुन्तीको लेकर भीष्म आदि सभी लोग हस्तिनापुर चले गये और प्रसन्नचित्त होकर प्रयत्नपूर्वक उनका पालन-पोषण करने लगे। इस प्रकार पाण्डव उत्पन्न हुए और भीष्मने उनका परिपालन किया॥ ७०-७१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे युधिष्ठिरादीनामुत्पत्तिवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
२०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७
अथ सप्तमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरसे दुर्योधनके पिण्डदानहेतु धन माँगना, भीमसेनका प्रतिरोध; धृतराष्ट्र, गान्धारी, कुन्ती, विदुर और संजयका वनके लिये प्रस्थान, वनवासी धृतराष्ट्र तथा माता कुन्तीसे मिलनेके लिये युधिष्ठिरका भाइयोंके साथ वनगमन, विदुरका महाप्रयाण, धृतराष्ट्रसहित पाण्डवोंका व्यासजीके आश्रमपर आना, देवीकी कृपासे व्यासजीद्वारा महाभारत-युद्धमें मरे कौरवों-पाण्डवोंके परिजनोंको बुला देना
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| पञ्चानां द्रौपदी भार्या सा मान्या सा पतिव्रता।<br>पञ्च पुत्रास्तु तस्याः स्युर्भर्तृभ्योऽतीव सुन्दराः ॥ १ | [हे मुनिगण!] माननीया द्रौपदी उन पाँचों पाण्डवोंकी पतिव्रता पत्नी थी। उन द्रौपदीको अत्यन्त सुन्दर पाँच पुत्र उन पतियोंसे उत्पन्न हुए॥ १॥ |
| अर्जुनस्य तथा भार्या कृष्णस्य भगिनी शुभा।<br>सुभद्रा या हृता पूर्वं जिष्णुना हरिसम्मते ॥ २ | अर्जुनकी एक दूसरी सुन्दर पत्नी श्रीकृष्णकी बहन सुभद्रा थीं, जिन्हें अर्जुनने पूर्वकालमें भगवान् श्रीकृष्णकी अनुमतिसे हर लिया था॥ २॥ |
| तस्यां जातो महावीरो निहतोऽसौ रणाजिरे।<br>अभिमन्युर्हतास्तत्र द्रौपद्याश्च सुताः किल ॥ ३ | उन्हीं सुभद्राके गर्भसे महान् वीर अभिमन्युका जन्म हुआ। वह संग्राम-भूमिमें मारा गया था। उसी युद्धमें द्रौपदीके पाँचों पुत्र भी मारे गये थे॥ ३॥ |
| अभिमन्योर्वरा भार्या वैराटी चातिसुन्दरी।<br>कुलान्ते सुषुवे पुत्रं मृतो बाणाग्निना शिशुः ॥ ४<br><br>जीवितः स तु कृष्णेन भागिनेयसुतः स्वयम्।<br>द्रौणिबाणाग्निनिर्दग्धः प्रतापेनाद्भुतेन च ॥ ५ | वीर अभिमन्युकी श्रेष्ठ तथा अत्यन्त सुन्दर पत्नी महाराज विराटकी पुत्री उत्तरा थी। [महाभारतके युद्धमें] कुरुकुलका नाश हो जानेपर उसने एक पुत्र उत्पन्न किया था; वह द्रोणपुत्र अश्वत्थामाकी बाणाग्निसे [पहले गर्भमें ही] मर गया था, किंतु बादमें भगवान् श्रीकृष्णने अश्वत्थामाकी बाणाग्निसे निर्दग्ध अपने भांजेके पुत्रको अपने अद्भुत प्रतापसे पुनः जीवित कर दिया था॥ ४-५॥ |
| परिक्षीणेषु वंशेषु जातो यस्माद्वरः सुतः।<br>तस्मात्परीक्षितो नाम विख्यातः पृथिवीतले ॥ ६ | कुरुवंशके समाप्त होनेपर वह श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ था; इसलिये वह बालक ‘परीक्षित्’ नामसे पृथवीतलपर प्रसिद्ध हुआ॥ ६॥ |
| निहतेषु च पुत्रेषु धृतराष्ट्रोऽतिदुःखितः।<br>तस्थौ पाण्डवराज्ये च भीमवाग्बाणपीडितः ॥ ७<br><br>गान्धारी च तथातिष्ठत् पुत्रशोकातुरा भृशम्।<br>सेवां तयोर्दिवारात्रं चकारार्तो युधिष्ठिरः ॥ ८ | अपने सौ पुत्रोंके मारे जानेपर अत्यन्त दुःखित राजा धृतराष्ट्र भीमके वाग्बाणोंसे सन्तप्त रहते हुए अब पाण्डवोंके राज्यमें रहने लगे। वैसे ही गान्धारी भी अत्यन्त दुःखी होकर जीवन-यापन करने लगी। दुःखित युधिष्ठिर दिन-रात उन दोनोंकी सेवा करने लगे॥ ७-८॥ |
| विदुरोऽप्यतिधर्मात्मा प्रज्ञानेत्रमबोधयत्।<br>युधिष्ठिरस्यानुमते भ्रातृपार्श्वे व्यतिष्ठत ॥ ९ | महान् धर्मात्मा विदुर युधिष्ठिरकी अनुमतिसे अपने भाई धृतराष्ट्रके पासमें ही रहते थे और वे उन प्रज्ञाचक्षुको समझाते-बुझाते रहते थे॥ ९॥ |
| अ० ७ ] | द्वितीय स्कन्ध | २०९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| धर्मपुत्रोऽपि धर्मात्मा चकार सेवनं पितुः।<br>पुत्रशोकोद्भवं दुःखं तस्य विस्मारयन्निव॥ १० | धर्मपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिर भी अपने पितातुल्य धृतराष्ट्रके पुत्रशोकजनित दुःखको विस्मारित कराते हुए उनकी सेवा करने लगे॥ १०॥ |
| यथा शृणोति वृद्धोऽसौ तथा भीमोऽतिरोषितः।<br>वाग्बाणेनाहनत्तं तु श्रावयन्संस्थिताञ्जनान्॥ ११<br>मया पुत्रा हताः सर्वे दुष्टस्यान्धस्य ते रणे।<br>दुःशासनस्य रुधिरं पीतं हृद्यं तथा भृशम्॥ १२<br>भुनक्ति पिण्डमन्धोऽयं मया दत्तं गतत्रपः।<br>ध्वांक्षवद्वा श्ववच्चापि वृथा जीवत्यसौ जनः॥ १३ | जिस किसी भी प्रकार यह वृद्ध धृतराष्ट्र सुन ले [यह ध्यानमें रखकर] भीम अत्यन्त क्रोधित होकर अपने वचनरूपी बाणोंसे उनपर सर्वदा प्रहार किया करते थे। वहाँ उपस्थित लोगोंको सुना-सुनाकर भीम कहा करते थे कि मैंने इस दुष्ट अन्धेके सभी पुत्रोंको रणभूमिमें मार डाला और दुःशासनके हृदयका रक्त जी-भरके पी लिया है। अब यह अन्धा निर्लज्ज होकर मेरे दिये हुए पिण्डको कौओं एवं कुत्तोंकी भाँति खाता है। अब तो यह व्यर्थ ही जीवन बिता रहा है॥ ११-१३॥ |
| एवंविधानि रूक्षाणि श्रावयत्यनुवासरम्।<br>आश्वासयति धर्मात्मा मूर्खोऽयमिति च ब्रुवन्॥ १४ | भीम इस प्रकारकी कठोर बातें प्रतिदिन उन्हें सुनाते थे; परंतु धर्मात्मा युधिष्ठिर यह कहते हुए धृतराष्ट्रको धैर्य प्रदान करते थे कि यह भीम मूर्ख है॥ १४॥ |
| अष्टादशैव वर्षाणि स्थित्वा तत्रैव दुःखितः।<br>धृतराष्ट्रो वने यानं प्रार्थयामास धर्मजम्॥ १५<br>अयाचत धर्मपुत्रं धृतराष्ट्रो महीपतिः।<br>पुत्रेभ्योऽहं प्रदाम्यद्य निर्वापं विधिपूर्वकम्॥ १६<br>वृकोदरेण सर्वेषां कृतमत्रौर्ध्वदैहिकम्।<br>न कृतं मम पुत्राणां पूर्ववैरमनुस्मरन्॥ १७<br>ददासि चेद्धनं मह्यं कृत्वा चैवौर्ध्वदैहिकम्।<br>गमिष्येऽहं वनं तप्तुं तपः स्वर्गफलप्रदम्॥ १८ | इस प्रकार उस दुःखी धृतराष्ट्रने अठारह वर्षतक वहाँ रहकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे वनमें जानेकी इच्छा प्रकट की। महाराज धृतराष्ट्रने धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे यह भी प्रार्थना की कि अब मैं अपने पुत्रोंके लिये विधि-पूर्वक पिण्डदान करूँगा। यद्यपि भीमने सभीका और्ध्वदैहिककर्म कर दिया था, किंतु पूर्व वैरका स्मरण करते हुए उन्होंने मेरे पुत्रोंका नहीं किया। अतः यदि आप मुझे कुछ धन दें तो मैं अपने पुत्रोंका और्ध्वदैहिककर्म करके स्वर्गफल देनेवाला तप करनेके लिये वनमें चला जाऊँगा॥ १५-१८॥ |
| एकान्ते विदुरेणोक्तो राजा धर्मसुतः शुचिः।<br>धनं दातुं मनश्चक्रे धृतराष्ट्राय चार्थिने॥ १९<br>समाहूय निजान्सर्वानुवाच पृथिवीपतिः।<br>धनं दास्ये महाभागाः पित्रे निर्वापकामिने॥ २० | विदुरने भी एकान्तमें पवित्रात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे जब ऐसा कहा तब उन्होंने धनार्थी धृतराष्ट्रको धन देनेका निश्चय कर लिया। राजा युधिष्ठिरने परिवारके सभी जनोंको बुलाकर कहा— हे महाभाग ! मैं कौरवोंका श्राद्ध करनेके इच्छुक ज्येष्ठ पिताको धन प्रदान करूँगा॥ १९-२०॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं भ्रातुर्ज्येष्ठस्यामिततेजसः।<br>संग्रहेऽस्य महाबाहुर्मारुतिः कुपितोऽब्रवीत्॥ २१<br>धनं देयं महाभाग दुर्योधनहिताय किम्।<br>अन्धोऽपि सुखमाप्नोति मूर्खत्वं किमतः परम्॥ २२ | महातेजस्वी ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिरका वचन सुनकर वायुपुत्र महाबली भीमने अत्यन्त क्रोधित होकर कहा— हे महाभाग! दुर्योधनके कल्याणके लिये राजकोषका धन क्यों दिया जाय? इससे अन्धे धृतराष्ट्रको भी सुख मिलेगा; इससे बड़ी मूर्खता और क्या होगी ?॥ २१-२२॥ |
| २१० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तव दुर्मन्त्रितेनाथ दुःखं प्राप्ता वने वयम्।<br>द्रौपदी च महाभागा समानीता दुरात्मना॥ २३ | आपकी दूषित मन्त्रणाके फलस्वरूप ही हमलोगोंने वनवासका कठोर कष्ट सहा। दुरात्मा दुःशासन महारानी द्रौपदीको अपमानपूर्वक सभामें खींच लाया॥ २३॥ |
| विराटभवने वासः प्रसादात्तव सुव्रत।<br>दासत्वं च कृतं सर्वैर्मत्स्यस्यामितविक्रमैः॥ २४ | हे सुव्रत! आपकी कृपासे ही हमलोगोंको विराट राजाके घर रहना पड़ा तथा हम अमित पराक्रमवालोंको मत्स्यदेशके राजाकी दासता करनी पड़ी थी॥ २४॥ |
| देविता त्वं न चेज्ज्येष्ठः प्रभवेत्संक्षयः कथम्।<br>सूपकारो विराटस्य हत्वाभूवं तु मागधम्॥ २५ | हम सबमें ज्येष्ठ आप यदि जुआ न खेलते तो हम लोगोंकी दुर्गति क्यों होती? मगधनरेश जरासंधका वध करनेवाले मुझको राजा विराटके यहाँ रसोइया बनना पड़ा॥ २५॥ |
| बृहन्नला कथं जिष्णुर्भवेद् बालस्य नर्तकः।<br>कृत्वा वेषं महाबाहुर्योषाया वासवात्मजः॥ २६<br><br>गाण्डीवशोभितौ हस्तौ कृतौ कङ्कणशोभितौ।<br>मानुषं च वपुः प्राप्य किं दुःखं स्यादतः परम्॥ २७<br><br>दृष्ट्वा वेणीं कृतां मूर्ध्नि कज्जलं लोचने तथा।<br>असिं गृहीत्वा तरसा छेत्स्यहं नान्यथा सुखम्॥ २८ | आपके ही कारण इन्द्रपुत्र महाबाहु अर्जुनको विराट राजाके यहाँ स्त्रीका रूप धारण करके उनके बच्चोंको नृत्यकी शिक्षा देनेके लिये बृहन्नला बनना पड़ा। गाण्डीव धनुषके स्थानपर अर्जुनको अपने हाथोंमें कंकण धारण करना पड़ा। मनुष्यका शरीर पाकर भला इससे बड़ा कष्ट और क्या हो सकता है? अर्जुनके सिरपर चोटी और आँखोंमें काजलकी बातका स्मरण करके तो मनमें यही आता है कि मैं अभी तलवार लेकर शीघ्र ही धृतराष्ट्रका सिर काट दूँ; इसके अतिरिक्त मुझे शान्ति नहीं मिल सकती॥ २६—२८॥ |
| अपृष्ट्वा च महीपालं निक्षिप्तोऽग्निर्मया गृहे।<br>दग्धुकामश्च पापात्मा निर्दग्धोऽसौ पुरोचनः॥ २९ | आप महाराजसे बिना पूछे ही मैंने लाक्षागृहमें अग्नि लगा दी थी, जिससे हमलोगोंको जलानेकी इच्छावाला वह पापी पुरोचन स्वयं जल गया॥ २९॥ |
| कीचका निहताः सर्वे त्वामपृष्ट्वा जनाधिप।<br>न तथा निहताः सर्वे सभार्या धृतराष्ट्रजाः॥ ३० | हे राजन्! मैंने आपसे परामर्श किये बिना ही जैसे सभी कीचकोंका वध कर डाला, वैसे ही स्त्रियोंसमेत धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंका भी वध मैं नहीं कर पाया॥ ३०॥ |
| मूर्खत्वं तव राजेन्द्र गन्धर्वेभ्यश्च मोचिताः।<br>दुर्योधनादयः कामं शत्रवो निगडीकृताः॥ ३१ | हे राजेन्द्र! यह आपकी नासमझी ही थी कि जब गन्धर्वोंने दुर्योधन आदि हमारे शत्रुओंको बन्दी बना लिया था, तब आपने ही उन्हें छुड़ा दिया॥ ३१॥ |
| दुर्योधनहितायाद्य धनं दातुं त्वमिच्छसि।<br>नाहं ददे महीपाल सर्वथा प्रेरितस्त्वया॥ ३२ | हे राजन्! आज पुनः उसी दुष्ट दुर्योधनके कल्याणके लिये आप धन देनेकी इच्छा कर रहे हैं। आपके कहनेपर भी मैं उन्हें धन नहीं देने दूँगा॥ ३२॥ |
| इत्युक्त्वा निर्गते भीमे त्रिभिः परिवृतो नृपः।<br>ददौ वित्तं सुबहुलं धृतराष्ट्राय धर्मजः॥ ३३ | ऐसा कहकर भीमके चले जानेपर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने [अर्जुन, नकुल तथा सहदेव—इन] तीनोंकी सम्मति लेकर धृतराष्ट्रको बहुत-सा धन दे दिया॥ ३३॥ |
| अ० ७ ] | द्वितीय स्कन्ध | २११ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कारयामास विधिवत्पुत्राणां चौर्ध्वदैहिकम्।<br>ददौ दानानि विप्रेभ्यो धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः॥ ३४ | तब अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्रने धन लेकर अपने पुत्रोंका विधिवत् श्राद्धकर्म कराया और ब्राह्मणोंको विविध दान दिये॥ ३४॥ |
| कृत्वौर्ध्वदैहिकं सर्वं गान्धारीसहितो नृपः।<br>प्रविवेश वनं तूर्णं कुन्त्या च विदुरेण च॥ ३५ | इस प्रकार अपने पुत्रोंका श्राद्धकर्म करके गान्धारीसहित महाराज धृतराष्ट्र कुन्ती तथा विदुरके साथ शीघ्र ही वनमें चले गये॥ ३५॥ |
| सञ्जयेन परिज्ञातो निर्गतोऽसौ महामतिः।<br>पुत्रैर्निवार्यमाणापि शूरसेनसुता गता॥ ३६ | संजयद्वारा सबको यह समाचार मिला कि महामति धृतराष्ट्र वनमें जा रहे हैं, उस समय अपने पुत्रोंके मना करनेपर भी शूरसेनकी पुत्री कुन्ती उनके साथ चली गयी॥ ३६॥ |
| विलपन्भीमसेनोऽपि तथान्ये चापि कौरवाः।<br>गङ्गातीरात्परावृत्य ययुः सर्वे गजाह्वयम्॥ ३७ | यह देखकर भीम भी रोने लगे। वे तथा अन्यान्य सभी कौरव उन लोगोंको गंगातटतक पहुँचाकर पुनः हस्तिनापुरको लौट आये॥ ३७॥ |
| ते गत्वा जाह्नवतीरे शतयूपाश्रमं शुभम्।<br>कृत्वा तृणैः कुटीं तत्र तपस्तेपुः समाहिताः॥ ३८ | तत्पश्चात् धृतराष्ट्र आदि गंगातटपर स्थित शुभ शतयूप-आश्रममें पहुँचे और वहाँ पर्णकुटी बनाकर एकचित्त हो तपस्या करने लगे॥ ३८॥ |
| गतान्यब्दानि षट् तेषां यदा याता हि तापसाः।<br>युधिष्ठिरस्तु विरहादनुजानिदमब्रवीत्॥ ३९<br><br>स्वप्ने दृष्टा मया कुन्ती दुर्बला वनसंस्थिता।<br>मनो मे जायते द्रष्टुं मातरं पितरौ तथा॥ ४०<br><br>विदुरं च महात्मानं सञ्जयं च महामतिम्।<br>रोचते यदि वः सर्वान् व्रजाम इति मे मतिः॥ ४१ | जब वे तपस्वी चले गये और इस प्रकार छः वर्ष बीत गये, तब उनके विरहसे सन्तप्त युधिष्ठिर अपने भाइयोंसे कहने लगे—मैंने स्वप्न देखा है कि वनमें रहती हुई माता कुन्ती अत्यन्त दुर्बल हो गयी हैं, अतः माता तथा पितृजनोंको देखनेकी मनमें इच्छा हो रही है। साथ ही महात्मा विदुर तथा महाबुद्धिमान् संजयसे भी मिलनेकी मेरी इच्छा है। यदि आप लोगोंको भी यह उचित प्रतीत होता हो तो हमलोग वहाँ चलें—ऐसा मेरा विचार है॥ ३९-४१॥ |
| ततस्ते भ्रातरः सर्वे सुभद्रा द्रौपदी तथा।<br>वैराटी च महाभागा तथा नागरिको जनः॥ ४२<br><br>प्राप्ताः सर्वजनैः सार्धं पाण्डवा दर्शनोत्सुकाः।<br>शतयूपाश्रमं प्राप्य ददृशुः सर्व एव ते॥ ४३ | तब वे सभी भाई, सुभद्रा, द्रौपदी, महाभागा उत्तरा तथा अन्यान्य नागरिकजन वहाँ एकत्र हुए। दर्शनके लिये उत्सुक उन पाण्डवोंने सभी लोगोंके साथ शतयूप-आश्रममें जाकर धृतराष्ट्र आदिको देखा॥ ४२-४३॥ |
| विदुरो न यदा दृष्टो धर्मस्तं पृष्टवांस्तदा।<br>क्वास्ते स विदुरो धीमांस्तमुवाचाम्बिकासुतः॥ ४४<br><br>विरक्तश्चरते क्षत्ता निरीहो निष्परिग्रहः।<br>कुतोऽप्येकान्तसंवासी ध्यायतेऽन्तः सनातनम्॥ ४५ | वहाँ जब विदुरजी दिखायी नहीं दिये, तब धर्मराज युधिष्ठिरने धृतराष्ट्रसे पूछा—वे बुद्धिमान् विदुरजी कहाँ हैं? तब अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्रने उनसे कहा—विदुर तो विरक्त एवं निष्काम होकर तथा सब कुछ त्यागकर कहीं एकान्तमें रहते हुए अन्तःकरणमें परमात्माका ध्यान कर रहे होंगे॥ ४४-४५॥ |
| २९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| गङ्गां गच्छन्द्वितीयेऽह्नि वने राजा युधिष्ठिरः।<br>ददर्श विदुरं क्षामं तपसा संशितव्रतम्॥ ४६<br><br>दृष्ट्वोवाच महीपालो वन्देऽहं त्वां युधिष्ठिरः।<br>तस्थौ श्रुत्वा च विदुरः स्थाणुभूत इवानघः॥ ४७ | दूसरे दिन गंगाजीकी ओर जाते हुए युधिष्ठिरने वनमें तपस्याके कारण क्षीण देहवाले व्रतधारी विदुरजीको देखा। उन्हें देखकर महाराज युधिष्ठिरने कहा—मैं आपको प्रणाम करता हूँ। यह सुनकर भी निष्पाप विदुरजी ठूँठवृक्षके समान अचल स्थित रहे॥ ४६-४७॥ |
| क्षणेन विदुरस्यास्यान्निःसृतं तेज अद्भुतम्।<br>लीनं युधिष्ठिरस्यास्ये धर्मांशत्वात्परस्परम्॥ ४८ | उसी क्षण विदुरजीके मुखसे एक अद्भुत तेज निकला और वह तत्काल युधिष्ठिरके मुखमें समा गया; क्योंकि वे दोनों ही धर्मके अंश थे॥ ४८॥ |
| क्षत्ता जहाँ तदा प्राणाञ्छुशोचाति युधिष्ठिरः।<br>दाहार्थं तस्य देहस्य कृतवानुद्यमं नृपः॥ ४९ | इस प्रकार विदुरजीने प्राणत्याग कर दिया और युधिष्ठिर अत्यन्त शोकाकुल हो गये। वे राजा युधिष्ठिर उनके शरीरका दाह-संस्कार करनेका प्रबन्ध करने लगे॥ ४९॥ |
| शृण्वतस्तु तदा राज्ञो वागुवाचाशरीरिणी।<br>विरक्तोऽयं न दाहार्हो यथेष्टं गच्छ भूपते॥ ५० | उसी समय राजाको सुनाते हुए आकाशवाणी हुई—हे राजन्! ये विदुरजी विरक्त हैं, अतः ये दाह-संस्कारके योग्य नहीं हैं। अब आप इच्छानुसार यहाँसे प्रस्थान करें॥ ५०॥ |
| श्रुत्वा ते भ्रातरः सर्वे सस्नुर्गङ्गाजलेऽमले।<br>गत्वा निवेदयामासुर्धृतराष्ट्राय विस्तरात्॥ ५१ | यह सुनकर उन सभी भाइयोंने गंगाके निर्मल जलमें स्नान किया और वहाँ जाकर धृतराष्ट्रसे [सभी वृत्तान्त] विस्तारपूर्वक बताया॥ ५१॥ |
| स्थितास्तत्राश्रमे सर्वे पाण्डवा नागरैः सह।<br>तत्र सत्यवतीसूनुर्नारदश्च समागतः॥ ५२<br><br>मुनयोऽन्ये महात्मानश्चागता धर्मनन्दनम्।<br>कुन्ती प्राह तदा व्यासं संस्थितं शुभदर्शनम्॥ ५३ | तत्पश्चात् सब पाण्डव नागरिकोंके साथ उस आश्रममें बैठ गये। उसी समय सत्यवतीपुत्र व्यासजी तथा नारदजी भी वहाँ पहुँच गये। अन्य मुनिगण भी वहाँ धर्मपुत्र युधिष्ठिरके पास आ गये। उस समय कुन्तीने वहाँ विराजमान शुभदर्शन व्यासजीसे कहा—॥ ५२-५३॥ |
| कृष्ण कर्णस्तु पुत्रो मे जातमात्रस्तु वीक्षितः।<br>मनो मे तप्यतेऽत्यर्थं दर्शयस्व तपोधन॥ ५४<br>समर्थोऽसि महाभाग कुरु मे वाञ्छितं प्रभो। | हे कृष्णद्वैपायन! मैंने अपने पुत्र कर्णको जन्मके समय ही देखा था। [उसे देखनेके लिये] मेरा मन बहुत तड़प रहा है, अतः हे तपोधन! मुझे उसको दिखा दीजिये। हे महाभाग! आप समर्थ हैं, अतः मेरी यह इच्छा पूर्ण कीजिये॥ ५४ १/२॥ |
| गान्धार्युवाच<br>दुर्योधनो रणेऽगच्छद्वीक्षितो न मया मुने॥ ५५<br><br>तं दर्शय मुनिश्रेष्ठ पुत्रं मे त्वं सहानुजम्। | गान्धारी बोली—हे मुने! दुर्योधन समरभूमिमें चला गया था और मैं उसे देख नहीं पायी। अतः हे मुनिश्रेष्ठ! छोटे भाइयोसहित उस दुर्योधनको आप मुझे दिखा दीजिये॥ ५५ १/२॥ |
| सुभद्रोवाच<br>अभिमन्युं महावीरं प्राणादप्यधिकं प्रियम्॥ ५६<br>द्रष्टुकामास्मि सर्वज्ञ दर्शयाद्य तपोधन। | सुभद्रा बोली—हे सर्वज्ञ! मैं प्राणोंसे भी अधिक प्रिय अपने महान् वीर पुत्र अभिमन्युको देखना चाहती हूँ। अतः हे तपोधन! उसे अभी दिखा दीजिये॥ ५६ १/२॥ |
| अ० ७ ] | द्वितीय स्कन्ध | २१३ |
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| सूत उवाच<br>एवंविधानि वाक्यानि श्रुत्वा सत्यवतीसुतः ॥ ५७<br>प्राणायामं ततः कृत्वा दध्यौ देवीं सनातनीम्।<br>सन्ध्याकालेऽथ सम्प्राप्ते गङ्गायां मुनिसत्तमः ॥ ५८<br>सर्वांस्तांश्च समाहूय युधिष्ठिरपुरोगमान्।<br>तुष्टाव विश्वजननीं स्नात्वा पुण्यसरिज्जले ॥ ५९<br>प्रकृतिं पुरुषारामां सगुणां निर्गुणां तथा।<br>देवदेवीं ब्रह्मरूपां मणिद्वीपाधिवासिनीम् ॥ ६० | सूतजी बोले— इस प्रकारके वचन सुनकर सत्यवतीपुत्र व्यासजीने प्राणायाम करके सनातनी देवी भगवतीका ध्यान किया। तब सायंकाल आनेपर मुनिश्रेष्ठ व्यासजी युधिष्ठिर आदि सभी जनोंको गंगाजीके तटपर बुलाकर पुण्यनदी गंगाके पवित्र जलमें स्नान करके प्रकृतिस्वरूपिणी, परम पुरुषको प्रसन्न करनेवाली, सगुण-निर्गुणरूपा, देवताओंकी भी देवी, ब्रह्मस्वरूपिणी उन मणिद्वीपनिवासिनी भगवतीकी स्तुति करने लगे ॥ ५७—६० ॥ | | यदा न वेधा न च विष्णुरीश्वरो<br>न वासवो नैव जलाधिपस्तथा।<br>न वित्तपो नैव यमश्च पावक-<br>स्तदासि देवि त्वमहं नमामि ताम् ॥ ६१ | हे देवि! जब ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, इन्द्र, वरुण, कुबेर, यम तथा अग्नि—ये कोई भी नहीं थे, उस समय भी आपकी सत्ता थी; ऐसी उन आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ६१ ॥ | | जलं न वायुर्न धरा न चाम्बरं<br>गुणा न तेषां च न चेन्द्रियाण्यहम्।<br>मनो न बुद्धिर्न च तिग्मगुः शशी<br>तदासि देवि त्वमहं नमामि ताम् ॥ ६२ | जिस समय जल, वायु, पृथ्वी, आकाश तथा उनके रस आदि गुण, समस्त इन्द्रियाँ, अहंकार, मन, बुद्धि, सूर्य तथा चन्द्रमा—ये कोई भी नहीं थे, तब भी आप विद्यमान थीं; ऐसी उन आपको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ६२ ॥ | | इमं जीवलोकं समाधाय चित्ते<br>गुणैर्लिङ्गकोशं च नीत्वा समाधौ।<br>स्थिता कल्पकालं नयस्यात्मतन्त्रा<br>न कोऽप्यस्ति वेत्ता विवेकं गतोऽपि ॥ ६३ | इस जीवलोकको अपने चित्तमें समाहित करके सत्व-रज-तम आदि गुणोंसहित लिंग-कोशको समाधिकी अवस्थामें पहुँचाकर जब आप कल्पपर्यन्त स्वतन्त्र होकर विहार करती हैं, तब विवेकप्राप्त पुरुष भी आपको जाननेमें समर्थ नहीं होता ॥ ६३ ॥ | | प्रार्थयत्येष मां लोको मृतानां दर्शनं पुनः।<br>नाहं क्षमोऽस्मि मातस्त्वं दर्शयाशु जनान्मृतान् ॥ ६४ | हे माता! ये लोग मृत व्यक्तियोंके पुनः दर्शनके लिये मुझसे प्रार्थना कर रहे हैं, किंतु मैं ऐसा कर पानेमें समर्थ नहीं हूँ। अतएव आप इन्हें मृत व्यक्तियोंको शीघ्र ही दिखा दें ॥ ६४ ॥ | | सूत उवाच<br>एवं स्तुता तदा देवी माया श्रीभुवनेश्वरी।<br>स्वर्गादाहूय सर्वान्वै दर्शयामास पार्थिवान् ॥ ६५ | सूतजी बोले— व्यासजीके द्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर महामाया श्रीभुवनेश्वरी देवीने समस्त मृत राजाओंको स्वर्गसे बुलाकर दिखा दिया ॥ ६५ ॥ | | दृष्ट्वा कुन्ती च गान्धारी सुभद्रा च विराटजा।<br>पाण्डवा मुमुदुः सर्वे वीक्ष्य प्रत्यागतान्स्वकान् ॥ ६६ | कुन्ती, गान्धारी, सुभद्रा, विराटपुत्री उत्तरा एवं सभी पाण्डव वापस आये हुए स्वजनोंको देखकर प्रसन्न हो गये ॥ ६६ ॥ | | पुनर्विसर्जितास्तेन व्यासेनामिततेजसा।<br>स्मृत्वा देवीं महामायामिन्द्रजालमिवोद्यतम् ॥ ६७ | तदनन्तर अपरिमित तेजवाले व्यासजीने महामाया देवीका स्मरण करके इन्द्रजालकी भाँति प्रकट हुए उन सबको पुनः लौटा दिया ॥ ६७ ॥ |
| २१४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
|---|
| तदा पृष्ट्वा ययुः सर्वे पाण्डवा मुनयस्तथा।<br>राजा नागपुरं प्राप्तः कुर्वन्व्यासकथां पथि॥ ६८ | तत्पश्चात् [धृतराष्ट्र आदि तापसोंसे] आज्ञा लेकर सभी पाण्डव तथा मुनिजन वहाँसे चल दिये। राजा युधिष्ठिर भी मार्गमें व्यासजीकी चर्चा करते हुए हस्तिनापुर आ गये॥ ६८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे पाण्डवानां कथानकं मृतानां दर्शनवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
अथाष्टमोऽध्यायः
धृतराष्ट्र आदिका दावाग्निमें जल जाना, प्रभासक्षेत्रमें यादवोंका परस्पर युद्ध और संहार, कृष्ण और बलरामका परमधामगमन, परीक्षित्को राजा बनाकर पाण्डवोंका हिमालय-पर्वतपर जाना, परीक्षित्को शापकी प्राप्ति, प्रमद्वरा और रुरुका वृत्तान्त
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| ततो दिने तृतीये च धृतराष्ट्रः स भूपतिः।<br>दावाग्निना वने दग्धः सभार्यः कुन्तिसंयुतः॥ १ | वहाँसे पाण्डवोंके प्रस्थित होनेके तीसरे दिन उस वनमें लगी दावाग्निमें कुन्ती एवं गान्धारीसहित राजा धृतराष्ट्र दग्ध हो गये॥ १॥ |
| सञ्जयस्तीर्थयात्रायां गतस्त्यक्त्वा महीपतिम्।<br>श्रुत्वा युधिष्ठिरो राजा नारदाद्दुःखमाप्तवान्॥ २ | संजय पहले ही धृतराष्ट्रको छोड़कर तीर्थयात्राके लिये चले गये थे। नारदजीसे यह वृत्तान्त सुनकर राजा युधिष्ठिर अत्यन्त दुःखी हुए॥ २॥ |
| षट्त्रिंशेऽथ गते वर्षे कौरवाणां क्षयात्पुनः।<br>प्रभासे यादवाः सर्वे विप्रशापात्क्षयं गताः॥ ३<br><br>ते पीत्वा मदिरां मत्ताः कृत्वा युद्धं परस्परम्।<br>क्षयं प्राप्ता महात्मानः पश्यतो रामकृष्णयोः॥ ४ | कौरवोंके विनाशके छत्तीस वर्ष बीतनेपर विप्र-शापके प्रभावसे सभी यादव प्रभासक्षेत्रमें नष्ट हो गये। वे सभी यादव मदिरा पीकर मतवाले हो गये और आपसमें लड़कर बलराम तथा श्रीकृष्णके देखते-देखते मृत्युको प्राप्त हो गये॥ ३-४॥ |
| देहं तत्याज रामस्तु कृष्णः कमललोचनः।<br>व्याधबाणहतः शापं पालयन्भगवान्हरिः॥ ५ | तदनन्तर बलरामजीने योगक्रियाद्वारा शरीरका त्याग किया और कमलके समान नेत्रवाले भगवान् श्रीकृष्णने शापकी मर्यादा रखते हुए एक बहेलियेके बाणसे आहत होकर महाप्रयाण किया॥ ५॥ |
| वसुदेवस्तु तच्छ्रुत्वा देहत्यागं हरेरथ।<br>जहौ प्राणाञ्छुचीन्कृत्वा चित्ते श्रीभुवनेश्वरीम्॥ ६ | इसके पश्चात् जब वसुदेवजीने श्रीकृष्णके शरीर-त्यागका समाचार सुना तो उन्होंने अपने चित्तमें श्रीभुवनेश्वरी देवीका ध्यान करके अपने पवित्र प्राणोंका परित्याग कर दिया॥ ६॥ |
| अर्जुनस्तु ततो गत्वा प्रभासे चातिदुःखितः।<br>संस्कारं तत्र सर्वेषां यथायोग्यं चकार ह॥ ७ | तत्पश्चात् अत्यन्त शोक-संतप्त अर्जुनने प्रभास-क्षेत्रमें पहुँचकर सभीका यथोचित अन्तिम संस्कार सम्पन्न किया॥ ७॥ |
| समीक्ष्याथ हरेर्देहं कृत्वा काष्ठस्य सञ्चयम्।<br>अष्टाभिः सह पत्नीभिर्दहयामास पार्थिवः॥ ८ | भगवान् श्रीकृष्णका शरीर खोजकर और लकड़ी जुटाकर अर्जुनने आठ पटरानियोंके साथ उनका दाह-संस्कार किया॥ ८॥ |
| अ० ८ ] | द्वितीय स्कन्ध | २१५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देहं रामस्य रेवत्या सह दग्ध्वा विभावसौ।<br>अर्जुनो द्वारकामेत्य पुरान्निष्क्रामयज्जनम्॥ ९ | तदनन्तर रेवतीके साथ बलरामजीके मृतशरीरका दाह-संस्कार करके अर्जुनने द्वारकापुरी पहुँचकर उस नगरीसे नागरिकोंको बाहर निकाला॥ ९॥ |
| पुरी सा वासुदेवस्य प्लावितोदधिना ततः।<br>अर्जुनः सर्वलोकान्वै गृहीत्वा निर्गतस्तदा॥ १० | तत्पश्चात् कुछ ही क्षणोंमें भगवान् श्रीकृष्णकी वह द्वारकापुरी समुद्रमें डूब गयी, किंतु अर्जुन सभी लोगोंको साथ लेकर बाहर निकल गये थे॥ १०॥ |
| कृष्णपत्न्यस्तदा मार्गे चौरार्भीरैश्च लुण्ठिताः।<br>धनं सर्वं गृहीतं च निस्तेजश्चार्जुनोऽभवत्॥ ११ | मार्गमें चोरों और भीलोंने श्रीकृष्णकी पत्नियोंको लूट लिया और समस्त धन छीन लिया; उस समय अर्जुन तेजहीन हो गये॥ ११॥ |
| इन्द्रप्रस्थे समागत्य वज्रो राजा कृतस्तदा।<br>अनिरुद्धसुतो नाम्ना पार्थेनामिततेजसा॥ १२ | तदनन्तर अपरिमित तेजसे सम्पन्न अर्जुनने इन्द्रप्रस्थ पहुँचकर अनिरुद्धके वज्र नामक पुत्रको राजा बनाया॥ १२॥ |
| व्यासाय कथितं दुःखं तेनोक्तोऽसौ महारथः।<br>पुनर्यदा हरिस्त्वञ्च भवितासि महामते॥ १३<br><br>तदा तेजस्तवात्युग्रं भविष्यति पुनर्युगे।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं पार्थो गत्वा नागपुरेऽर्जुनः॥ १४<br><br>दुःखितो धर्मराजानं वृत्तान्तं सर्वमब्रवीत्।<br>देहत्यागं हरेः श्रुत्वा यादवानां क्षयं तथा॥ १५ | अर्जुनने अपने तेजहीन होनेका दुःख व्यासजीसे निवेदन किया, जिसपर व्यासजीने उस महारथी अर्जुनसे कहा—हे महामते! जब भगवान् श्रीकृष्ण और आपका पुनः अवतार होगा, तब उस युगमें आपका तेज पुनः अत्यन्त उग्र हो जायगा। उनका यह वचन सुनकर अर्जुन वहाँसे हस्तिनापुर चले गये। वहाँपर अत्यन्त दुःखी होकर अर्जुनने धर्मराज युधिष्ठिरसे समस्त वृत्तान्त कहा॥ १३-१४ १/२॥ |
| गमनाय मतिं चक्रे राजा हैमाचलं प्रति।<br>षट्त्रिंशद्वार्षिकं राज्ये स्थापयित्वोत्तरासुतम्॥ १६<br><br>निर्जगाम वनं राजा द्रौपद्या भ्रातृभिः सह।<br>षट्त्रिंशच्चैव वर्षाणि कृत्वा राज्यं गजाह्वये॥ १७ | श्रीकृष्णके देहत्याग एवं यादवोंके विनाशका समाचार सुनकर राजा युधिष्ठिरने हिमालयकी ओर जानेका निश्चय कर लिया। इसके बाद छत्तीसवर्षीय उत्तरापुत्र परीक्षित्को राजसिंहासनपर प्रतिष्ठित करके वे राजा युधिष्ठिर द्रौपदी तथा भाइयोंके साथ वनकी ओर निकल गये। इस प्रकार छत्तीस वर्षकी अवधितक हस्तिनापुरमें राज्य करके द्रौपदी तथा कुन्तीपुत्रों—इन छहोंने हिमालयपर्वतपर जाकर प्राण त्याग दिये॥ १५-१७ १/२॥ |
| गत्वा हिमाचले षट् ते जहुः प्राणान्पृथासुताः।<br>परीक्षिदपि राजर्षिः प्रजाः सर्वाः सुधार्मिकः॥ १८<br><br>अपालयच्च राजेन्द्रः षष्टिवर्षाण्यतन्द्रितः।<br>बभूव मृगयाशीलो जगाम च वनं महत्॥ १९ | इधर धर्मनिष्ठ राजर्षि परीक्षित्ने भी आलस्यरहित भावसे साठ वर्षोंतक सम्पूर्ण प्रजाका पालन किया। वे एक बार आखेटहेतु एक विशाल जंगलमें गये॥ १८-१९॥ |
| विद्धं मृगं विचिन्वानो मध्याह्ने भूपतिः स्वयम्।<br>तृषितश्च परिश्रान्तः क्षुधितश्चोत्तरासुतः॥ २० | अपने बाणसे विद्ध एक मृगको खोजते-खोजते मध्याह्नकालमें उत्तरापुत्र राजा परीक्षित् भूख-प्यास तथा थकानसे व्याकुल हो गये॥ २०॥ |
| २१६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राजा घर्मेण सन्तप्तो ददर्श मुनिमन्तिके ।<br>ध्याने स्थितं मुनिं राजा जलं पप्रच्छ चातुरः ॥ २१ | धूपसे पीड़ित राजाने समीपमें ही एक ध्यानमग्न मुनिको विराजमान देखा और प्याससे व्याकुल उन्होंने मुनिसे जल माँगा ॥ २१ ॥ |
| नोवाच किञ्चिन्मौनस्थश्चुकोप नृपतिस्तदा ।<br>मृतं सर्पं तदादाय धनुष्कोट्या तृषातुरः ॥ २२<br>कलिनाविष्टचित्तस्तु कण्ठे तस्य न्यवेशयत् ।<br>आरोपिते तथा सर्पे नोवाच मुनिसत्तमः ॥ २३ | मौन व्रतमें स्थित वे मुनि कुछ भी नहीं बोले, जिससे राजा कुपित हो गये और प्याससे आकुल तथा कलिसे प्रभावित चित्तवाले राजाने अपने धनुषकी नोकसे एक मृत साँप उठाकर उनके गलेमें डाल दिया। गलेमें सर्प डाल दिये जानेके बाद भी वे मुनिश्रेष्ठ कुछ भी नहीं बोले ॥ २२-२३ ॥ |
| न चचाल समाधिस्थो राजापि स्वगृहं गतः ।<br>तस्य पुत्रोऽतितेजस्वी गविजातो महातपाः ॥ २४ | वे थोड़ा भी विचलित नहीं हुए और समाधिमें स्थित रहे। राजा भी अपने घर चले गये। उन मुनिका पुत्र गविजात अत्यन्त तेजस्वी तथा महातपस्वी था ॥ २४ ॥ |
| महाशक्तोऽथ शुश्राव क्रीडमानो वनान्तिके ।<br>मित्राण्याहुश्च तत्पुत्रं पितुः कण्ठे तवाधुना ॥ २५<br>लम्बितोऽस्ति मृतः सर्पः केनापीति मुनीश्वर ।<br>तेषां तद्वचनं श्रुत्वा चुकोपातिशयं तदा ॥ २६<br>शशाप नृपतिं क्रुद्धो गृहीत्वाशु करे जलम् ।<br>पितुः कण्ठेऽद्य मे येन विनिक्षिप्तो मृतोरगः ॥ २७<br>तक्षकः सप्तरात्रेण तं दशेत्पापपूरुषम् ।<br>मुनेः शिष्योऽथ राजानं समुपेत्य गृहे स्थितम् ॥ २८<br>शापं निवेदयामास मुनिपुत्रेण चार्पितम् ।<br>अभिमन्युसुतः श्रुत्वा शापं दत्तं द्विजेन वै ॥ २९<br>अनिवार्यं च विज्ञाय मन्त्रिवृद्धानुवाच ह ।<br>शप्तोऽहं द्विजरूपेण मम द्वेषादसंशयम् ॥ ३० | पराशक्तिके आराधक उस गविजातने पासके वनमें खेलते हुए अपने मित्रोंको ऐसा कहते हुए सुना कि हे मुनिश्रेष्ठ! तुम्हारे पिताके गलेमें किसीने मृत सर्प डाल दिया है। उनकी यह बात सुनकर वह अत्यन्त कुपित हुआ और शीघ्र ही हाथमें जल लेकर उसने कुपित होकर राजाको शाप दे दिया—जिस व्यक्तिने मेरे पिताजीके कण्ठमें मृत सर्प डाला है, उस पापी पुरुषको एक सप्ताहमें तक्षक डस लेगा। मुनिके शिष्यने महलमें स्थित राजा परीक्षित्के समीप जाकर मुनिपुत्रके द्वारा दिये गये शापकी बात कही। ब्राह्मणके द्वारा दिये गये शापको सुनकर अभिमन्युपुत्र परीक्षित्ने उसे अनिवार्य समझकर वृद्ध मन्त्रियोंसे कहा—अपने अपराधके कारण मैं मुनिपुत्रसे शापित हुआ हूँ ॥ २५-३० ॥ |
| किं विधेयं मयामात्या उपायश्चिन्त्यतामिह ।<br>मृत्युः किलानिवायोऽसौ वदन्ति वेदवादिनः ॥ ३१<br>यत्नस्तथापि शास्त्रोक्तः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः ।<br>उपायवादिनः केचित्प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ३२<br>विज्ञोपायेन सिध्यन्ति कार्याणि नेतरस्य च ।<br>मणिमन्त्रौषधीनां वै प्रभावाः खलु दुर्विदः ॥ ३३<br>न भवेदिति किं तैस्तु मणिमद्भिः सुसाधितैः ।<br>सर्पदष्टा पुरा भार्या मुनेः सञ्जीविता मृता ॥ ३४ | हे मन्त्रियो! अब मुझे क्या करना चाहिये? आप लोग कोई उपाय सोचें। मृत्यु तो अनिवार्य है—ऐसा वेदवादी लोग कहते हैं, तथापि बुद्धिमान् पुरुषोंको शास्त्रोक्त रीतिसे सर्वथा प्रयत्न करना ही चाहिये। कुछ पुरुषार्थवादी विद्वान् ऐसा कहते हैं कि बुद्धिमानीके साथ उपाय करनेपर कार्य सिद्ध हो जाते हैं; न करनेपर नहीं। मणि, मन्त्र और औषधोंके प्रभाव अत्यन्त ही दुर्ज्ञेय होते हैं। मणि धारण करनेवाले सिद्धजनोंके द्वारा क्या नहीं सम्भव हो जाता? पूर्वकालमें किसी ऋषिपत्नीको सर्पने काट लिया था, जिससे वह मर गयी थी; उस समय उस मुनिने अपनी आयुका आधा |
| अ० ८ ] | द्वितीय स्कन्ध | २१७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दत्त्वार्धमायुषस्तेन मुनिना सा वराप्सराः।<br>भवितव्ये न विश्वासः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः ॥ ३५ | भाग देकर उस श्रेष्ठ अप्सराको जीवित कर दिया था। अतः बुद्धिमान् लोगोंको चाहिये कि वे भवितव्यतापर विश्वास न करें, उपाय भी करें ॥ ३१—३५ ॥ |
| प्रत्यक्षं तत्र दृष्टान्तं पश्यन्तु सचिवाः किल।<br>दिवि कोऽपि पृथिव्यां वा दृश्यते पुरुषः क्वचित् ॥ ३६<br><br>दैवे मतिं समाधाय यस्तिष्ठेत्तु निरुद्यमः।<br>विरक्तस्तु यतिर्भूत्वा भिक्षार्थं याति सर्वथा ॥ ३७<br><br>गृहस्थानां गृहे काममाहूतो वाथवान्यथा।<br>यदृच्छयोपपन्नं च क्षिप्तं केनापि वा मुखे ॥ ३८<br><br>उद्यमेन विना चास्यादुदरे संविशेत्कथम्।<br>प्रयत्नश्चोद्यमे कार्यो यदा सिद्धिं न याति चेत् ॥ ३९<br><br>तदा दैवं स्थितं चेति चित्तमालम्बयेद् बुधः। | हे सचिवो ! आपलोग यह दृष्टान्त प्रत्यक्ष देख लें। इस लोक या परलोकमें ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं दिखायी देता, जो केवल भाग्यके भरोसे रहकर उद्यम न करता हो। गृहस्थीसे विरक्त मनुष्य संन्यासी होकर जगह-जगह भिक्षाटनके लिये बुलानेपर अथवा बिना बुलाये भी गृहस्थोंके घर जाता ही है। दैवप्राप्त उस भोजनको भी क्या कोई मुखमें डाल देता है ? उद्यमके बिना वह भोजन मुखसे उदरमें कैसे प्रवेश कर सकता है ? अतः प्रयत्नपूर्वक उद्यम तो करना ही चाहिये, यदि सफलता न मिले तो बुद्धिमान् मनुष्य मनमें विश्वास कर ले कि दैव यहाँ प्रबल है ॥ ३६—३९ ½ ॥ |
| मन्त्रिण ऊचुः<br>को मुनिर्येन दत्त्वार्धमायुषो जीविता प्रिया ॥ ४०<br>कथं मृता महाराज तन्नो ब्रूहि सविस्तरम्। | मन्त्रियोंने कहा— हे महाराज ! वे कौन मुनि थे, जिन्होंने अपनी आधी आयु देकर अपनी प्रिय पत्नीको जीवित किया था ? वह कैसे मरी थी ? यह कथा विस्तारसे हमसे कहिये ॥ ४० ½ ॥ |
| राजोवाच<br>भृगोर्भार्या वरारोहा पुलोमा नाम सुन्दरी ॥ ४१<br>तस्यां तु च्यवनो नाम मुनिर्जातोऽतिविश्रुतः।<br>च्यवनस्य च शर्यातेः सुकन्या नाम सुन्दरी ॥ ४२ | राजा बोले— महर्षि भृगुकी एक सुन्दर स्त्री थी, जिसका नाम पुलोमा था। उससे परम विख्यात च्यवनमुनिका जन्म हुआ। च्यवनकी पत्नीका नाम सुकन्या था, वह महाराज शर्यातिकी रूपवती कन्या थी ॥ ४१-४२ ॥ |
| तस्यां जज्ञे सुतः श्रीमान्प्रमतिर्नाम विश्रुतः।<br>प्रमतेस्तु प्रिया भार्या प्रतापी नाम विश्रुता ॥ ४३<br>रुरुर्नाम सुतो जातस्तथा परमतापसः। | उस सुकन्यासे श्रीमान् प्रमतिने जन्म लिया, जो बड़े यशस्वी थे। उस प्रमतिकी प्रिय पत्नीका नाम प्रतापी था। उन्हीं राजा प्रमतिके पुत्र परम तपस्वी 'रुरु' हुए ॥ ४३ ½ ॥ |
| तस्मिंश्च समये कश्चित्स्थूलकेशश्च विश्रुतः ॥ ४४<br>बभूव तपसा युक्तो धर्मात्मा सत्यसम्मतः।<br>एतस्मिन्नन्तरे मान्या मेनका च वराप्सराः ॥ ४५<br>क्रीडां चक्रे नदीतीरे त्रिषु लोकेषु सुन्दरी।<br>गर्भं विश्वावसोः प्राप्य निर्गता वरवर्णिनी ॥ ४६ | उन्हीं दिनों स्थूलकेश नामक एक विख्यात ऋषि थे, जो बड़े ही तपस्वी, धर्मात्मा एवं सत्यनिष्ठ थे। इसी बीच त्रिलोकसुन्दरी मेनका नामकी श्रेष्ठ अप्सरा नदीके किनारे जलक्रीडा कर रही थी। वह अप्सरा विश्वावसुके द्वारा गर्भवती होकर वहाँसे निकल पड़ी ॥ ४४—४६ ॥ |
| स्थूलकेशाश्रमे गत्वा विससर्ज वराप्सराः।<br>कन्यकां च नदीतीरे त्रिषु लोकेषु सुन्दरीम् ॥ ४७ | उस श्रेष्ठ अप्सराने स्थूलकेशके आश्रममें जाकर नदीतटपर एक त्रैलोक्यसुन्दरी कन्याको जन्म दिया और वह उसे छोड़कर चली गयी। तब उस नवजात शिशु |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे रुरुचरित्रवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥
२१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| दृष्ट्वानाथां तदा कन्यां जग्राह मुनिसत्तमः।<br>पुपोष स्थूलकेशस्तु नाम्ना चक्रे प्रमद्वराम्॥ ४८ | कन्याको अनाथ जानकर मुनिवर स्थूलकेश अपने आश्रममें ले गये और उसका पालन-पोषण करने लगे। उन्होंने उसका नाम प्रमद्वरा रखा॥ ४७-४८॥ |
| सा काले यौवनं प्राप्ता सर्वलक्षणसंयुता।<br>रुरुर्दृष्ट्वाथ तां बालां कामबाणार्दितो ह्यभूत्॥ ४९ | वह सर्वलक्षणसम्पन्न कन्या यथासमय यौवनको प्राप्त हुई। उस सुन्दरीको देखकर रुरु काममोहित हो गये॥ ४९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे रुरुचरित्रवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥
अथ नवमोऽध्यायः
सर्पके काटनेसे प्रमद्वराकी मृत्यु, रुरुद्वारा अपनी आधी आयु देकर उसे जीवित कराना, मणि-मन्त्र-औषधिद्वारा सुरक्षित राजा परीक्षित्का सात तलवाले भवनमें निवास करना
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| परीक्षिदुवाच<br>कामार्तः स मुनिर्गत्वा रुरुः सुप्तो निजाश्रमे।<br>पिता पप्रच्छ दीनं तं किं रुरो विमना असि॥ १ | परीक्षित् बोले—[हे सचिववृन्द!] इस प्रकार कामासक्त होकर रुरुमुनि अपने आश्रममें सो गये, तब उनके पिताने उन्हें दुःखी देखकर पूछा—हे रुरु! तुम इतने उदास क्यों हो?॥ १॥ |
| स तमाहातिकामार्तः स्थूलकेशस्य चाश्रमे।<br>कन्या प्रमद्वरा नाम सा मे भार्या भवेदिति॥ २ | कामातुर रुरुने अपने पितासे कहा—महर्षि स्थूलकेशके आश्रममें प्रमद्वरा नामकी एक कन्या है; मैं चाहता हूँ कि वह मेरी पत्नी बन जाय॥ २॥ |
| स गत्वा प्रमतिस्तूर्णं स्थूलकेशं महामुनिम्।<br>प्रमुह्य सुमुखं कृत्वा ययाचे तां वराननाम्॥ ३ | उन प्रमतिने महामुनि स्थूलकेशके पास शीघ्र जाकर उन्हें प्रसन्न तथा अपने अनुकूल करके उस सुन्दर कन्याकी याचना की॥ ३॥ |
| ददौ वाचं स्थूलकेशः प्रदास्यामि शुभेऽहनि।<br>विवाहार्थं च सम्भारं रचयामासतुर्वने॥ ४<br><br>प्रमतिः स्थूलकेशश्च विवाहार्थं समुद्यतौ।<br>बभूवतुर्महात्मानौ समीपस्थौ तपोवने॥ ५ | महामुनि स्थूलकेशने यह वचन दे दिया कि किसी अच्छे मुहूर्तमें कन्यादान दूँगा। अब उस वनमें वे दोनों विवाहकी सामग्रीका प्रबन्ध करने लगे। इस प्रकार उस तपोवनमें समीपमें ही रहकर प्रमति और स्थूलकेश दोनों महात्मा विवाहोत्सवकी तैयारी करने लगे॥ ४-५॥ |
| तस्मिन्नवसरे कन्या रममाणा गृहाङ्गणे।<br>प्रसुप्तं पन्नगं पादेनास्पृशच्चारुलोचना॥ ६<br><br>दष्टा तु पन्नगेनाथ सा ममार वराङ्गना।<br>कोलाहलस्तदा जातो मृतां दृष्ट्वा प्रमद्वराम्॥ ७ | उसी अवसरपर वह कन्या अपने घरके आँगनमें खेल रही थी, तभी एक सोये हुए सर्पसे उस सुनयनीका पैर छू गया। [स्पर्श होते ही] सर्पने उसे डँस लिया और वह सुन्दरी कन्या मर गयी। तब मृत्युको प्राप्त हुई प्रमद्वराको देखकर वहाँ कोलाहल मच गया॥ ६-७॥ |
| मिलिता मुनयः सर्वे चुक्रुशुः शोकसंयुताः।<br>भूमौ तां पतितां दृष्ट्वा पिता तस्यातिदुःखितः॥ ८ | सभी मुनि जुट गये और शोकसे ग्रस्त होकर रोने लगे। पृथ्वीपर प्राणहीन होकर पड़ी हुई अत्यन्त तेजसे देदीप्यमान उस कन्याको देखकर उसके पिता |
अ० ९] द्वितीय स्कन्ध २१९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रुरोद विगतप्राणां दीप्यमानां सुतेजसा।<br>रुरुः श्रुत्वा तदाक्रन्दं दर्शनार्थं समागतः॥ ९<br><br>ददर्श पतितां तत्र सजीवामिव कामिनीम्।<br>रुदन्तं स्थूलकेशं च दृष्ट्वान्यानृषिसत्तमान्॥ १०<br><br>रुरुः स्थानाद् बहिर्गत्वा रुरोद विरहाकुलः। | स्थूलकेश अत्यन्त दुःखित होकर रुदन करने लगे। उस समय करुण क्रन्दन सुनकर रुरु भी उसे देखनेके लिये आये। उन्होंने उस मृत पड़ी सुन्दरीको सजीव-जैसी देखा। स्थूलकेश तथा अन्य श्रेष्ठ मुनियोंको रुदन करते देखकर रुरुमुनि उस स्थानसे बाहर आ करके विरहाकुल होकर रोने लगे॥ ८—१० १/२॥ |
| अहो दैवेन सर्पोऽयं प्रेषितः परमाद्भूतः॥ ११<br><br>मम शर्मविघाताय दुःखहेतुरयं किल।<br>किं करोमि क्व गच्छामि मृता मे प्राणवल्लभा॥ १२<br><br>न वै जीवितुमिच्छामि वियुक्तः प्रिययानया।<br>नालिङ्गिता वरारोहा न मया चुम्बिता मुखे॥ १३<br><br>न पाणिग्रहणं प्राप्तं मन्दभाग्येन सर्वथा।<br>लाजाहोमस्तथा चाग्नौ न कृतस्त्वनया सह॥ १४<br><br>मानुष्यं धिगिदं कामं गच्छन्त्वद्य ममासवः।<br>दुःखितस्य न वा मृत्युर्वाञ्छितः समुपैति हि॥ १५<br><br>सुखं तर्हि कथं दिव्यमाप्यते भुवि वाञ्छितम्।<br>प्रपतामि ह्रदे घोरे पावके प्रपताम्यहम्॥ १६<br><br>विषमद्य गले पाशं कृत्वा प्राणांस्त्यजाम्यहम्। | [वे कहने लगे—] अहो! प्रारब्धने ही मेरे सुखके विनाशके लिये ही यह अत्यन्त विचित्र सर्प भेजा था। यह निश्चित ही मेरे दुःखका कारण है। अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? मेरी प्राणप्रिया तो मर गयी। अब मैं अपनी इस प्रियासे विलग होकर जीना नहीं चाहता। अभीतक मैंने उस सुन्दरीका आलिंगन आदि कोई सांसारिक सुख भी नहीं प्राप्त किया था। मैं ऐसा अभागा हूँ कि उसका पाणिग्रहण नहीं कर सका और न तो उसके साथ अग्निमें लाजाहोम ही कर पाया। मेरे इस मनुष्य-जीवनको धिक्कार है। अब तो मेरे प्राण निकल जायँ तो अच्छा है, जब दुःखित मनुष्यको चाहनेपर भी मृत्यु नहीं मिलती, तब इस संसारमें वांछित उत्तम सुख कैसे मिल सकता है? अब मैं या तो कहीं किसी भयानक तालाबमें डूब जाऊँ, अग्निमें कूद पडूँ, विष खा लूँ अथवा गलेमें फाँसी लगाकर प्राण त्याग दूँ॥ ११—१६ १/२॥ |
| विलप्यैवं रुरुस्तत्र विचार्य मनसा पुनः॥ १७<br><br>उपायं चिन्तयामास स्थितस्तस्मिन्नदीतटे।<br>मरणात्किं फलं मे स्यादात्महत्या दुरत्यया॥ १८<br><br>दुःखितश्च पिता मे स्याज्जननी चातिदुःखिता।<br>दैवस्तुष्टो भवेत्कामं दृष्ट्वा मां त्यक्तजीवितम्॥ १९<br><br>सर्वः प्रमुदितश्च स्यान्मत्क्षये नात्र संशयः।<br>उपकारः प्रियायाः कः परलोके भवेदपि॥ २०<br><br>मृते मय्यात्मघातेन विरहात्पीडितेऽपि च।<br>परलोके प्रिया सापि न मे स्यादात्मघातिनः॥ २१<br><br>एतदर्थं मृते दोषा मयि नैवामृते पुनः। | इस प्रकार विलाप करके रुरु अपने मनमें विचारकर उस नदीके तटपर स्थित रहते हुए उपाय सोचने लगे। प्राण त्यागनेसे मुझे क्या लाभ होगा? आत्महत्याका फल तो अत्यन्त दुर्निवार्य होता है। [मेरी मृत्यु सुनकर] पिताजी दुःखी होंगे, माताजीको भी महान् कष्ट होगा। हाँ, हो सकता है कि मुझे मरा हुआ देखकर प्रारब्ध सन्तुष्ट हो जाय? मेरे मर जानेपर मेरे सभी शत्रु भी प्रसन्न होंगे, इसमें सन्देह नहीं है, किंतु इससे परलोकमें मेरी प्रियाका क्या उपकार होगा? इस प्रकार विरहसे सन्तप्त होकर आत्महत्या करके मेरे मर जानेपर भी परलोकमें मुझ आत्मघातीको मेरी वह प्रिया नहीं मिलेगी। इसलिये मेरे मरनेमें बहुत दोष हैं और न मरनेपर मुझे कोई दोष नहीं होगा॥ १७—२१ १/२॥ |
| २२० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ |
|---|
| विमृश्यैवं रुरुस्तत्र स्नात्वाचम्य शुचिः स्थितः॥ २२<br>अब्रवीद्वचनं कृत्वा जलं पाणावसौ मुनिः।<br>यन्मया सुकृतं किञ्चित्कृतं देवार्चनादिकम्॥ २३<br>गुरवः पूजिता भक्त्या हुतं जप्तं तपः कृतम्।<br>अधीतास्त्वखिला वेदा गायत्री संस्कृता यदि॥ २४<br>रविराराधितस्तेन सञ्जीवतु मम प्रिया।<br>यदि जीवेन्न मे कान्ता त्यजे प्राणानहं ततः॥ २५<br>इत्युक्त्वा तज्जलं भूमौ चिक्षेपाराध्य देवताः। | ऐसा सोचकर रुरु स्नान तथा आचमन करके पवित्र होकर वहींपर बैठ गये। इसके बाद उन मुनिने हाथमें जल लेकर यह वचन कहा—यदि मेरे द्वारा देवाराधन आदि कुछ भी पुण्य कर्म सम्पादित किया गया हो, यदि मैंने श्रद्धापूर्वक गुरुओंकी पूजा की हो; हवन, जप एवं तप किया हो, समस्त वेदोंका अध्ययन किया हो, गायत्रीकी उपासना की हो और सूर्यकी आराधना की हो तो उस पुण्यके प्रभावसे मेरी प्रिया जीवित हो जाय। यदि मेरी प्रिया जीवित नहीं होगी तो मैं प्राण त्याग दूँगा। ऐसा कहकर देवताओंका ध्यान करके उन्होंने वह जल जमीनपर छोड़ दिया॥ २२—२५ १/२॥ | | राजोवाच<br>एवं विलपतस्तस्य भार्यया दुःखितस्य च॥ २६<br>देवदूतस्तदाभ्येत्य वाक्यमाह रुरुं ततः। | राजा बोले—तदनन्तर इस प्रकार अपनी भार्याके लिये विलाप कर रहे उन दुःखित रुरुके पास एक देवदूत आकर यह वाक्य बोला॥ २६ १/२॥ | | देवदूत उवाच<br>माकार्षीः साहसं ब्रह्मन्कथं जीवेन्मृता प्रिया॥ २७<br>गतायुरेशा सुश्रोणी गन्धर्वाप्सरसोः सुता।<br>अन्यां कामय चार्वङ्गीं मृतेयं चाविवाहिता॥ २८<br>किं रोदिषि सुदुर्बुद्धे का प्रीतिस्तेऽनया सह। | देवदूत बोला—हे ब्रह्मन्! ऐसा साहस मत कीजिये। आपकी मरी हुई प्रियतमा भला कैसे जीवित हो सकेगी? गन्धर्व और अप्सराकी इस सुन्दर कन्याकी आयु समाप्त हो चुकी थी, जिससे यह अविवाहिता ही मर गयी; अतः अब आप किसी अन्य शुभ अंगोंवाली कन्याका वरण कर लीजिये। हे हतबुद्धि! आप क्यों रो रहे हैं? इसके साथ आपका कैसा प्रेम है?॥ २७-२८ १/२॥ | | रुरुरुवाच<br>देवदूत न चान्यां वै वरिष्याम्यहमङ्गनाम्॥ २९<br>यदि जीवेन्न जीवेद्वा मर्तव्यं चाधुना मया। | रुरु बोले—हे देवदूत! मैं किसी अन्य सुन्दरीका वरण नहीं करूँगा। यदि यह जीवित हो जाती है तो ठीक है, अन्यथा मैं इसी समय अपने प्राण त्याग दूँगा॥ २९ १/२॥ | | राजोवाच<br>विदित्वेति हठं तस्य देवदूतो मुदान्वितः॥ ३०<br>उवाच वचनं तथ्यं सत्यं चातिमनोहरम्।<br>उपायं शृणु विप्रेन्द्र विहितं यत्सुरैः पुरा॥ ३१<br>आयुषोऽर्धप्रदानेन जीवयाशु प्रमद्वराम्। | राजा बोले—उन मुनिका यह हठ देखकर देवदूतने प्रसन्न होकर तथ्यपूर्ण, सत्य तथा मनोहर वचन कहा—हे विप्रेन्द्र! देवताओंके द्वारा इसका पूर्वविहित उपाय मुझसे सुनिये। आप अपनी आयुका आधा भाग देकर अपनी प्रमद्वराको शीघ्र ही जीवित कर लीजिये॥ ३०-३१ १/२॥ | | रुरुरुवाच<br>आयुषोऽर्धं प्रयच्छामि कन्यायै नात्र संशयः॥ ३२<br>अद्य प्रत्यावृतप्राणा प्रोत्तिष्ठतु मम प्रिया।<br>विश्वावसुस्तदा तत्र विमानेन समागतः॥ ३३ | रुरु बोले—मैं निःसन्देह अपनी आयुका आधा भाग इस कन्याको दे रहा हूँ। अब मेरी प्रियतमाके प्राण वापस आ जायें और यह उठकर बैठ जाय। उसी समय विश्वावसु अपनी पुत्री प्रमद्वराकी मृत्यु |
| अ० ९ ] | द्वितीय स्कन्ध | २२१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ज्ञात्वा पुत्रीं मृतां चाशु स्वर्गलोकात्प्रमद्वराम्।<br>ततो गन्धर्वराजश्च देवदूतश्च सत्तमः॥ ३४<br><br>धर्मराजमुपेत्येदं वचनं प्रत्यभाषताम्।<br>धर्मराज रुरोः पत्नी सुता विश्वावसोस्तथा॥ ३५<br><br>मृता प्रमद्वरा कन्या दष्टा सर्पेण चाधुना।<br>सा रुरोरायुषोऽर्धेन मर्तुकामस्य सूर्यज॥ ३६<br><br>समुत्तिष्ठतु तन्वङ्गी व्रतचर्याप्रभावतः। | जान करके स्वर्गलोकसे विमानद्वारा शीघ्र ही वहाँ आ गये। तत्पश्चात् गन्धर्वराज विश्वावसु तथा उस श्रेष्ठ देवदूतने धर्मराजके पास पहुँचकर यह वचन कहा— हे धर्मराज! रुरुकी पत्नी तथा विश्वावसुकी पुत्री इस प्रमद्वरा नामक कन्याकी सर्पदंशके कारण इस समय मृत्यु हो गयी है। हे सूर्यतनय! इसके वियोगमें मरणके लिये उद्यत मुनि रुरुकी आधी आयु तथा उनकी तपस्याके प्रभावसे यह कोमलांगी जीवित हो जाय॥ ३२—३६ १/२॥ |
| धर्म उवाच<br>विश्वावसुसुतां कन्यां देवदूत यदीच्छसि॥ ३७<br><br>उत्तिष्ठत्वायुषोऽर्धेन रुरुं गत्वा त्वमर्पय। | धर्मराजने कहा— हे देवदूत! यदि तुम ऐसा चाहते हो तो उसकी आधी आयुसे विश्वावसुकी यह कन्या जीवित होकर उठ जाय और तुम जाकर इसे रुरुको समर्पित कर दो॥ ३७ १/२॥ |
| राजोवाच<br>एवमुक्तस्ततो गत्वा जीवयित्वा प्रमद्वराम्॥ ३८<br><br>रुरोः समर्पयामास देवदूतस्त्वरान्वितः।<br>ततः शुभेऽह्नि विधिना रुरुणापि विवाहिता॥ ३९ | राजा बोले— धर्मराजके ऐसा कहनेपर देवदूतने जाकर प्रमद्वराको जीवित करके शीघ्र ही रुरुको समर्पित कर दिया और तत्पश्चात् रुरुने किसी शुभ दिन उसके साथ विधानपूर्वक विवाह कर लिया॥ ३८-३९॥ |
| इत्थं चोपाययोगेन मृताप्युज्जीविता तदा।<br>उपायस्तु प्रकर्तव्यः सर्वथा शास्त्रसम्मतः॥ ४० | इस प्रकार उपायका आश्रय लेकर मृत प्रमद्वराको भी जीवित कर लिया गया था। अतः मणि, मन्त्र तथा औषधियोंके विधिवत् प्रयोगद्वारा प्राणरक्षाके लिये शास्त्र-सम्मत उपाय अवश्य किया जाना चाहिये॥ ४० १/२॥ |
| मणिमन्त्रौषधीभिश्च विधिवत्प्राणरक्षणे।<br>इत्युक्त्वा सचिवान् राजा कल्पयित्वा सुरक्षकान्॥ ४१<br><br>कार्यित्वाथ प्रासादं सप्तभूमिकमुत्तमम्।<br>आरुरोहोत्तरासूनुः सचिवैः सह तत्क्षणम्॥ ४२ | मन्त्रियोंसे यह कहकर उत्तम रक्षकोंकी व्यवस्था करके एक सात तलवाला उत्तम राजभवन बनवाकर उसी क्षण उत्तरापुत्र परीक्षित् अपने मन्त्रियोंके साथ उसपर चढ़ गये॥ ४१-४२॥ |
| मणिमन्त्रधराः शूराः स्थापितास्तत्र रक्षणे।<br>प्रेषयामास भूपालो मुनिं गौरमुखं ततः॥ ४३<br><br>प्रसादार्थं सेवकस्य क्षमस्वेति पुनः पुनः।<br>ब्राह्मणान्सिद्धमन्त्रज्ञान् रक्षणार्थमितस्ततः॥ ४४ | उस भवनकी सम्यक् सुरक्षाके लिये मणि-मन्त्र-धारी वीरोंको नियुक्त किया गया और इसके बाद राजाने गौरमुखमुनिको [गविजातके पास उन्हें] प्रसन्न करनेके उद्देश्यसे भेजा और कहलाया कि मुझ सेवकका अपराध वे बार-बार क्षमा करें। तत्पश्चात् राजाने मन्त्र-प्रयोगमें निपुण ब्राह्मणोंको रक्षा-कार्यके निमित्त चारों ओर नियुक्त कर दिया॥ ४३-४४॥ |
| मन्त्रिपुत्रः स्थितस्तत्र स्थापयामास दन्तिनः।<br>न कश्चिदारुहेत्तत्र प्रासादे चातिरक्षिते॥ ४५ | एक मन्त्रिपुत्र वहाँ नियुक्त किया गया, जिसने महलके चारों ओर हाथियोंका घेरा स्थापित कराया ताकि विशेषरूपसे रक्षित उस महलपर कोई चढ़ न सके॥ ४५॥ |
अथ दशमोऽध्यायः
| २२२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
|---|
| वातोऽपि न चरेत्तत्र प्रवेशे विनिवार्यते।<br>भक्ष्यभोज्यादिकं राजा तत्रस्थश्च चकार सः॥ ४६<br>स्नानसन्ध्यादिकं कर्म तत्रैव विनिवर्त्य च।<br>राजकार्याणि सर्वाणि तत्रस्थश्चाकरोन्नृपः॥ ४७<br>मन्त्रिभिः सह सम्मन्त्र्य गणयन्दिवसानपि।<br>कश्चिच्च कश्यपो नाम ब्राह्मणो मन्त्रिसत्तमः॥ ४८<br>शुश्राव च तथा शापं प्राप्तं राज्ञा महात्मना।<br>स धनार्थी द्विजश्रेष्ठः कश्यपः समचिन्तयत्॥ ४९<br>व्रजामि तत्र यत्रास्ते शप्तो राजा द्विजेन ह।<br>इति कृत्वा मतिं विप्रः स्वगृहान्निःसृतः पथि॥ ५०<br>कश्यपो मन्त्रविद्विद्वान्धनार्थी मुनिसत्तमः॥ ५१ | महलके भीतर वायुका भी संचरण नहीं हो पाता था; क्योंकि उसका प्रवेश सर्वथा वर्जित था। राजा वहीं स्थित रहकर भोजनादि करने लगे। वहींपर रहते हुए स्नान एवं सन्ध्यादि कार्योंसे निवृत्त होकर राजा मन्त्रियोंसे मन्त्रणा करते तथा शापके दिन गिनते हुए समस्त राजकार्योंको संचालित करते थे॥ ४६-४७ १/२॥<br>इसी बीच किसी कश्यप नामक मन्त्र-विशेषज्ञ ब्राह्मणने सुना कि राजा परीक्षित्को [सर्पद्वारा काटे जानेका] शाप प्राप्त हुआ है। उस धनाभिलाषी ब्राह्मणश्रेष्ठ कश्यपने विचार किया कि मुनिके द्वारा शापित राजा इस समय जहाँ रह रहे हैं, मैं वहीं पर जाऊँगा। ऐसा निश्चय करके मन्त्रज्ञ, विद्वान् तथा धनाभिलाषी वह कश्यप नामक मुनिश्रेष्ठ विप्र अपने घरसे निकलकर रास्तेपर चल पड़ा॥ ४८-५१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे परीक्षिद्राज्ञो गुप्तगृहे वासवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
अथ दशमोऽध्यायः
महाराज परीक्षित्को डँसनेके लिये तक्षकका प्रस्थान, मार्गमें मन्त्रवेत्ता कश्यपसे भेंट, तक्षकका एक वटवृक्षको डँसकर भस्म कर देना और कश्यपका उसे पुनः हरा-भरा कर देना, तक्षकद्वारा धन देकर कश्यपको वापस कर देना, सर्पदंशसे राजा परीक्षित्की मृत्यु
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| तस्मिन्नेव दिने नाम्ना तक्षकस्तं नृपोत्तमम्।<br>शप्तं ज्ञात्वा गृहात्तूर्णं निःसृतः पुरुषोत्तमः॥ १<br>वृद्धब्राह्मणवेषेण तक्षकः पथि निर्गतः।<br>अपश्यत्कश्यपं मार्गे व्रजन्तं नृपतिं प्रति॥ २ | [हे मुनिवृन्द!] उसी दिन तक्षक नामक नाग नृपश्रेष्ठ परीक्षित्को शापित जानकर एक उत्तम मनुष्यका रूप धारण करके अपने घरसे शीघ्र निकल पड़ा। वृद्ध ब्राह्मणके वेषमें रास्तेपर चलते हुए उस तक्षकने महाराज परीक्षित्के यहाँ जाते हुए कश्यपको देखा॥ १-२॥ |
| तमपृच्छत्पन्नगोऽसौ ब्राह्मणं मन्त्रवादिनम्।<br>क्व भवांस्त्वरितो याति किञ्च कार्यं चिकीर्षति॥ ३ | उस नागने उन मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणसे पूछा—आप इतनी शीघ्र गतिसे कहाँ चले जा रहे हैं और कौन-सा कार्य करनेकी आपकी इच्छा है?॥ ३॥ |
| कश्यप उवाच | कश्यपने कहा— |
| परीक्षितं नृपश्रेष्ठं तक्षकश्च प्रधक्ष्यति।<br>तत्राहं त्वरितो यामि नृपं कर्तुमपज्वरम्॥ ४ | महाराज परीक्षित्को तक्षकनाग डँसनेवाला है। अतः मैं उन्हें विषमुक्त करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक वहीं जा रहा हूँ॥ ४॥ |
| मन्त्रोऽस्ति मम विप्रेन्द्र विषनाशकरः किल।<br>जीवयिष्याम्यहं तं वै जीवितव्येऽधुना किल॥ ५ | हे विप्रेन्द्र! मेरे पास प्रबल विषनाशक मन्त्र है, अतएव यदि उनकी आयु शेष होगी तो मैं उन्हें जीवित कर दूँगा॥ ५॥ |
| अ० १० ] | द्वितीय स्कन्ध | २२३ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तक्षक उवाच<br>अहं स पन्नगो ब्रह्मंस्तं धक्ष्यामि महीपतिम्।<br>निवर्त्तस्व न शक्तस्त्वं मया दष्टं चिकित्सितुम्॥ ६ | तक्षकने कहा—हे ब्रह्मन्! मैं ही वह तक्षकनाग हूँ और मैं ही महाराज परीक्षित्को काटूँगा। मेरे काट लेनेपर आप चिकित्सा करनेमें समर्थ नहीं हो सकेंगे; अतएव आप लौट जाइये॥ ६॥ |
| कश्यप उवाच<br>अहं दष्टं त्वया सर्प नृपं शप्तं द्विजेन वै।<br>जीवयिष्याम्यसन्देहं कामं मन्त्रबलेन वै॥ ७ | कश्यपने कहा—हे सर्प! ब्राह्मणके द्वारा शापित किये गये राजाको आपके काटनेके उपरान्त मैं उन्हें अपने मन्त्रबलसे निःसन्देह जीवित कर दूँगा॥ ७॥ |
| तक्षक उवाच<br>यदि त्वं जीवितुं यासि मया दष्टं नृपोत्तमम्।<br>मन्त्रशक्तिबलं विप्र दर्शय त्वं ममानघ॥ ८<br>धक्ष्याम्येनं च न्यग्रोधं विषदंष्ट्राभिरद्य वै। | तक्षकने कहा—हे विप्र! हे अनघ! यदि आप मेरे काटे हुए नृपश्रेष्ठ परीक्षित्को जीवित करनेके लिये जा रहे हैं तो आप अपनी मन्त्र-शक्तिका प्रभाव दिखाइये। मैं इसी समय इस वटवृक्षको अपने विषैले दाँतोंसे डँसता हूँ॥ ८ १/२ ॥ |
| कश्यप उवाच<br>जीवयिष्ये त्वया दष्टं दग्धं वा पन्नगोत्तम॥ ९ | कश्यपने कहा—हे सर्पश्रेष्ठ! आप इसे काट लें अथवा इसे जलाकर भस्म कर दें तो भी मैं इसे पुनः जीवित कर दूँगा॥ ९॥ |
| सूत उवाच<br>अदशत्पन्नगो वृक्षं भस्मसाच्च चकार तम्।<br>उवाच कश्यपं भूयो जीवयैनं द्विजोत्तम॥ १० | सूतजी बोले—नागराज तक्षकने उस वृक्षको डँस लिया और उसे जलाकर भस्म कर दिया। तब उसने कश्यपसे कहा—‘हे द्विजश्रेष्ठ! अब आप इसे पुनः जीवित कीजिये’॥ १०॥ |
| दृष्ट्वा भस्मीकृतं वृक्षं पन्नगेन विषाग्निना।<br>सर्वं भस्म समाहृत्य कश्यपो वाक्यमब्रवीत्॥ ११<br>पश्य मन्त्रबलं मेऽद्य न्यग्रोधं पन्नगोत्तम।<br>जीवयाम्यद्य वृक्षं वै पश्यतस्ते महाविष॥ १२ | तक्षकनागकी विषाग्निसे भस्म हुए वृक्षके सम्पूर्ण भस्मको एकत्र करके कश्यपने यह बात कही—हे महाविषधर नागराज! अब आप मेरे मन्त्रका प्रभाव देखिये। मैं आपके देखते-देखते इस वटवृक्षको जीवन प्रदान करता हूँ॥ ११-१२॥ |
| इत्युक्त्वा जलमादाय कश्यपो मन्त्रवित्तमः।<br>सिषेच भस्मराशिं तं मन्त्रितेनैव वारिणा॥ १३<br>तद्वारिसेचनाज्जातो न्यग्रोधः पूर्ववच्छुभः।<br>विस्मयं तक्षकः प्राप्तो दृष्ट्वा तं जीवितं नगम्॥ १४ | ऐसा कहकर हाथमें जल लेकर मन्त्रविद् कश्यपने उस जलको अभिमन्त्रित किया और उसे भस्मराशिपर छिड़क दिया। जलके पड़ते ही वह वटवृक्ष पुनः पहलेकी भाँति सुन्दर हो गया। उस वृक्षको इस प्रकार जीवित देखकर तक्षकको बड़ा आश्चर्य हुआ॥ १३-१४॥ |
| तमाह कश्यपं नागः किमर्थं ते परिश्रमः।<br>सम्पादयामि तं कामं ब्रूहि वाडव वाञ्छितम्॥ १५ | उस नागराजने कश्यपसे कहा—हे विप्र! आप इतना परिश्रम किसलिये करेंगे? आपकी वह कामना मैं ही पूर्ण कर दूँगा। कहिये, आप क्या चाहते हैं?॥ १५॥ |
| कश्यप उवाच<br>वित्तार्थी नृपतिं मत्वा शप्तं पन्नग निःसृतः।<br>गृहादहं चोपकर्तुं विद्यया नृपसत्तमम्॥ १६ | कश्यपने कहा—हे पन्नग! मैं धनका अभिलाषी हूँ; नृपश्रेष्ठ परीक्षित्को शापित जानकर अपनी मन्त्रविद्यासे उनका उपकार करनेके लिये मैं अपने घरसे निकला हुआ हूँ॥ १६॥ |
| २२४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
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| तक्षक उवाच<br>वित्तं गृहाण विप्रेन्द्र यावदिच्छसि पार्थिवात्।<br>ददामि स्वगृहं याहि सकामोऽहं भवाम्यतः॥ १७ | तक्षकने कहा—हे विप्रवर ! राजासे जितना धन आप चाहते हैं, उतना धन मुझसे अभी ले लें और अपने घर लौट जायँ, जिससे मैं अपने कृत्यमें सफल हो सकूँ॥ १७॥ | | सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कश्यपः परमार्थवित्।<br>चिन्तयामास मनसा किं करोमि पुनः पुनः॥ १८<br><br>धनं गृहीत्वा स्वगृहं प्रयामि यद्यहं पुनः।<br>भविष्यति न मे कीर्तिर्लोके लोभसमाश्रयात्॥ १९<br><br>जीवितेऽथ नृपश्रेष्ठे कीर्तिः स्यादचला मम।<br>धनप्राप्तिश्च बहुधा भवेत्पुण्यं च जीवनात्॥ २० | सूतजी बोले—तक्षककी यह बात सुनकर परमार्थवेत्ता कश्यपजी मनमें बार-बार सोचने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये? यदि मैं धन लेकर अपने घर जाता हूँ तो धनलोलुप होनेके कारण संसारमें मेरी कीर्ति नहीं होगी। यदि राजा जीवित हो जाते हैं तो मेरी अचल कीर्ति होगी तथा धन-प्राप्तिके साथ-साथ पुण्य भी प्राप्त होगा॥ १८–२०॥ | | रक्षणीयं यशः कामं धिग्ध्नं यशसा विना।<br>सर्वस्वं रघुणा पूर्वं दत्तं विप्राय कीर्तये॥ २१<br><br>हरिश्चन्द्रेण कर्णेन कीर्त्यर्थं बहुविस्तरम्।<br>उपेक्ष्यं कथं भूपं दह्यमानं विषाग्निना॥ २२ | यश ही रक्षणीय है और बिना यशके धनको धिक्कार है; क्योंकि प्राचीन कालमें महाराज रघुने कीर्तिके लिये अपना सब कुछ ब्राह्मणको दे दिया था। सत्यवादी हरिश्चन्द्र तथा दानी कर्णने भी केवल कीर्तिके लिये बहुत कुछ किया था। अतः विषकी अग्निसे जलते हुए राजा परीक्षित्की उपेक्षा मैं कैसे करूँ?॥ २१-२२॥ | | जीवितेऽद्य मया राज्ञि सुखं सर्वजनस्य च।<br>अराजके प्रजानाशो भविता नात्र संशयः॥ २३ | यदि मैं महाराजको जिला दूँ तो सब लोगोंको अत्यन्त सुख मिलेगा और यदि राजा मर गये तो अराजकताके कारण सारी प्रजा नष्ट हो जायगी, इसमें सन्देह नहीं है॥ २३॥ | | प्रजानाशस्य पापं मे भविष्यति मृते नृपे।<br>अपकीर्तिश्च लोकेषु धनलोभाद्भविष्यति॥ २४ | राजाके मृत हो जाने पर मुझे प्रजानाशका पाप लगेगा तथा संसारमें धन-लोभके कारण मेरी अपकीर्ति भी होगी॥ २४॥ | | इति सञ्चिन्त्य मनसा ध्यानं कृत्वा स कश्यपः।<br>गतायुषं च नृपतिं ज्ञातवान्बुद्धिमत्तरः॥ २५ | मनमें ऐसा विचार करके परम बुद्धिमान् कश्यपने ध्यान करके जाना कि महाराज परीक्षित्की आयु अब समाप्त हो चुकी है॥ २५॥ | | आसन्नमृत्युं राजानं ज्ञात्वा ध्यानेन कश्यपः।<br>गृहं ययौ स धर्मात्मा धनमादाय तक्षकात्॥ २६ | इस प्रकार ध्यान-दृष्टिसे धर्मात्मा कश्यप राजाकी मृत्यु निकट जानकर तक्षकसे धन लेकर अपने घर लौट गये॥ २६॥ | | निवर्त्य कश्यपं सर्पः सप्तमे दिवसे नृपम्।<br>हन्तुकामो जगामाशु नगरं नागसाह्वयम्॥ २७ | कश्यपको लौटाकर वह नाग सातवें दिन राजाको डँसनेकी इच्छासे शीघ्र हस्तिनापुर चला गया॥ २७॥ | | शुश्राव नगरस्यान्ते प्रासादस्थं परीक्षितम्।<br>मणिमन्त्रौषधैः कामं रक्ष्यमाणमतन्द्रितम्॥ २८ | नगरमें पहुँचते ही उसने सुना कि मणि, मन्त्र तथा औषधियोंसे भलीभाँति सावधानीपूर्वक सुरक्षित होकर राजा परीक्षित् अपने महलमें रह रहे हैं॥ २८॥ |
अ० १०] द्वितीय स्कन्ध २२५
अ० १०] द्वितीय स्कन्ध २२५
| चिन्ताविष्टस्तदा नागो विप्रशापभयाकुलः।<br>चिन्तयामास योगेन प्रविशेयं गृहं कथम्॥ २९<br><br>वञ्चयामि कथं चैनं राजानं पापकारिणम्।<br>विप्रशापादतं मूढं विप्रपीडाकरं शठम्॥ ३० | [यह जानकर] ब्राह्मणके शापसे भयभीत सर्पराज तक्षकको बड़ी चिन्ता हुई। वह सोचने लगा कि अब मैं किस उपायसे इस राजभवनमें प्रवेश करूँ? और इस पापी, मूढ, विप्रको पीड़ित करनेवाले तथा मुनिके शापसे आहत इस दुष्ट राजाको मैं कैसे छलूँ?॥ २९-३०॥ |
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| पाण्डवानां कुले जातः कोऽपि नैतादृशो भवेत्।<br>तापसस्य गले येन मृतः सर्पो निवेशितः॥ ३१ | पाण्डववंशमें ऐसा कोई नहीं हुआ, जिसने इस प्रकार किसी तपस्वी ब्राह्मणके गलेमें मृत सर्प डाल दिया हो॥ ३१॥ |
| कृत्वा विगर्हितं कर्म जानन्कालगतिं नृपः।<br>रक्षकान्भवने कृत्वा प्रासादमभिगम्य च॥ ३२<br><br>मृत्युं वञ्चयते राजा वर्ततेऽद्य निराकुलः।<br>तं कथं धक्ष्यिष्यामि विप्रवाक्येन चोदितः॥ ३३ | ऐसा निन्दित कर्म करके कालचक्रको जानते हुए भी यह राजा भवनमें रक्षकोंकी नियुक्ति करके राज-भवनमें छिपकर मृत्युकी वंचना कर रहा है और निश्चिन्त होकर पड़ा है। विप्रके शापानुसार मैं उस राजाको कैसे डसूँ?॥ ३२-३३॥ |
| न जानाति च मन्दात्मा मरणं ह्यनिवर्तनम्।<br>तेनासौ रक्षकान्स्थाप्य सौधारूढोऽद्य मोदते॥ ३४ | यह मन्दबुद्धि इतना भी नहीं जानता कि मृत्यु तो अनिवार्य है? इसी कारण यह रक्षकोंकी नियुक्ति करके स्वयं भवनपर चढ़कर आनन्द ले रहा है॥ ३४॥ |
| यदि वै विहितो मृत्युर्दैवेनामिततेजसा।<br>स कथं परिवर्तेत कृतैर्यत्नैस्तु कोटिभिः॥ ३५ | यदि अमित तेजवाले दैवने मृत्यु निश्चित कर दी है तो करोड़ों प्रकारके प्रयत्नोंसे भी उसे कैसे टाला जा सकता है?॥ ३५॥ |
| पाण्डवस्य च दायादो जानन्मृत्युं गतं नृपः।<br>जीवने मतिमास्थाय स्थितः स्थाने निराकुलः॥ ३६ | पाण्डववंशका उत्तराधिकारी यह राजा परीक्षित् अपनेको मृत्युके मुखमें गया हुआ जानते हुए भी जीवित रहनेकी अभिलाषा रखकर सुरक्षित स्थानमें निश्चिन्त होकर पड़ा हुआ है॥ ३६॥ |
| दानपुण्यादिकं राजा कर्तुमर्हति सर्वथा।<br>धर्मेण हन्यते व्याधिर्येनायुः शाश्वतं भवेत्॥ ३७ | यह यदि चाहता तो अनेक प्रकारके दान-पुण्य-द्वारा अपनी आयु बढ़ा सकता था; क्योंकि धर्माचरणसे व्याधि नष्ट होती है और उससे आयु स्थिर होती है॥ ३७॥ |
| नोचेन्मृत्युविधिं कृत्वा स्नानदानादिकाः क्रियाः।<br>मरणं स्वर्गलोकाय नरकायान्धथा भवेत्॥ ३८ | यदि ऐसा सम्भव नहीं था तो मृत्युके समय सम्पन्न की जानेवाली स्नान, दान आदि क्रियाएँ करके मृत्युके अनन्तर स्वर्गयात्रा कर सकता था, अन्यथा इसे नरक जाना होगा॥ ३८॥ |
| द्विजपीडाकृतं पापं पृथग्वास्य च भूपतेः।<br>विप्रशापस्तथा घोर आसन्ने मरणे किल॥ ३९ | मुनिको पीड़ा पहुँचानेका पाप इस राजाको था ही और ब्राह्मणका घोर शाप अलगसे है। अतः अब इसकी मृत्यु सन्निकट है॥ ३९॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—8 A
| २२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
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| न कोऽपि ब्राह्मणः पार्श्वे य एनं प्रतिबोधयेत्।<br>वेधसा विहितो मृत्युरनिवार्यस्तु सर्वथा॥ ४० | इस समय ऐसा कोई ब्राह्मण भी इसके पास नहीं है, जो इसे यह बता सके कि विधाताके द्वारा निर्धारित मृत्यु सर्वथा अनिवार्य है॥ ४०॥ | | इति सञ्चिन्त्य सर्पोऽसौ स्वानागानिकटे स्थितान्।<br>कृत्वा तापसवेषांस्तानग्राहिणोत्सुभुजङ्गमान्॥ ४१<br><br>फलमूलादिकं गृह्य राज्ञे नागोऽथ तक्षकः।<br>स्वयं च कीटरूपेण फलमध्ये ससार ह॥ ४२ | ऐसा विचारकर तक्षकनागने अपने निकटवर्ती श्रेष्ठ नागोंको तपस्वी ब्राह्मणोंका वेष धारण कराकर राजाके पास भेजा। वे राजाको देनेके लिये फल-मूल आदि लेकर तैयार हो गये और तक्षकनाग भी एक छोटे-से कीटके रूपमें फलके बीचमें छिप गया॥ ४१-४२॥ | | निर्गतास्ते तदा नागाः फलान्यादाय सत्वराः।<br>ते राजभवनं प्राप्य स्थिताः प्रासादसन्निधौ॥ ४३ | तब वे नाग फल आदि लेकर शीघ्र ही निकल पड़े और राजभवनमें पहुँचकर महलके पास खड़े हो गये॥ ४३॥ | | रक्षकास्तापसान्दृष्ट्वा पप्रच्छुस्तच्चिकीर्षितम्।<br>ऊचुस्ते भूपतिं द्रष्टुं प्राप्ताः स्मोऽद्य तपोवनात्॥ ४४ | इस प्रकार तपस्वियोंको खड़े देखकर रक्षकोंने उनसे पूछा कि आपलोगोंकी क्या इच्छा है? तब उन्होंने कहा—हमलोग महाराजको देखनेके लिये तपोवनसे आये हैं॥ ४४॥ | | अभिमन्युसुतं वीरं कुलार्कं चारुदर्शनम्।<br>परिवर्धयितुं प्राप्ता मन्त्रैराथर्वणैस्तथा॥ ४५ | पाण्डवकुलके सूर्य, शुभदर्शन तथा पराक्रमी अभिमन्यु-पुत्र परीक्षित्को अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंसे आशीर्वाद देनेहेतु हमलोग यहाँ आये हैं॥ ४५॥ | | निवेदयध्वं राजानं दर्शनार्थगतान्मुनीन्।<br>कृत्वाभिषेकान्यास्यामो दत्त्वा मिष्टफलानि च॥ ४६ | आप जाकर महाराजसे कहें कि कुछ मुनिजन उनसे मिलने आये हैं और वे महाराजका मन्त्राभिषेक करके उन्हें मधुर फल देकर लौट जायेंगे॥ ४६॥ | | भारतानां कुले क्वापि न दृष्टा द्वाररक्षकाः।<br>न श्रुतं तापसानां तु राज्ञोऽसन्दर्शनं किल॥ ४७<br><br>आरोहामो वयं तत्र यत्र राजा परीक्षितः।<br>आशीर्भिर्वर्धयित्वैनं दत्ताज्ञाः प्रव्रजामहे॥ ४८ | भरतवंशी राजाओंके कुलमें कभी भी द्वाररक्षक नहीं देखे गये। ऐसा भी कहीं सुना नहीं गया कि तपस्वियोंको राजाका दर्शन न मिले। जहाँ महाराज परीक्षित् विराजमान हैं, वहाँ हमलोग जायँगे और उन्हें अपने आशीर्वादसे दीर्घायुष्य बनाकर आज्ञा लेकर लौट जायँगे॥ ४७-४८॥ | | सूत उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तेषां तापसानां तु रक्षकाः।<br>प्रत्युचुस्तान् द्विजान्मत्वा निदेशं भूपतेर्यथा॥ ४९<br><br>नाद्य वो दर्शनं विप्रा राज्ञः स्यादिति नो मतिः।<br>श्वः सर्वतापसैरत्र त्वागन्तव्यं नृपालये॥ ५० | सूतजी बोले—उन तपस्वियोंका वचन सुनकर रक्षकोंने उन्हें ब्राह्मण समझकर महाराजका आदेश सुनाते हुए कहा—हे विप्रो! हमारे विचारमें आज आपलोगोंको राजाका दर्शन नहीं हो सकेगा। अतः आप समस्त तपस्वीजन राजभवनमें कल पधारें॥ ४९-५०॥ | | अनारोहस्तु प्रासादो विप्राणां मुनिसत्तमाः।<br>विप्रशापभयाद्राज्ञा विहितोऽस्ति न संशयः॥ ५१ | हे मुनिश्रेष्ठो! विप्रशापसे भयभीत होकर राजाने अपने महलमें ब्राह्मणोंका प्रवेश वर्जित कर रखा है; इसमें संशय नहीं है॥ ५१॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—8 B