देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० १३] पञ्चम स्कन्ध ५९९
अ० १३] पञ्चम स्कन्ध ५९९
| कृत्वा सुविपुलं नादं देवी सा निर्भया स्थिता।<br>उभौ च चक्रतुस्तीव्रां बाणवृष्टिं कुरुद्वह॥ १५ | वे भगवती जगदम्बा भी गम्भीर गर्जना करके निर्भीक भावसे विराजमान थीं। हे कुरुनन्दन! वे दोनों दैत्य घनघोर बाण-वृष्टि करने लगे॥ १५॥ |
| भगवत्यपि बाणौघान्मुमोच दानवौ प्रति।<br>कृत्वातिमधुरं नादं देवकार्यार्थसिद्धये॥ १६ | भगवती जगदम्बा भी देवताओंकी कार्य-सिद्धिके निमित्त अत्यन्त मधुर नाद करती हुई उन दोनों दानवोंपर बाण-समूह बरसाने लगीं॥ १६॥ |
| तयोस्तु बाष्कलस्तूर्णं सम्मुखोऽभूद् रणाङ्गणे।<br>दुर्मुखः प्रेक्षकस्तत्र देवीमभिमुखः स्थितः॥ १७ | उन दोनोंमेंसे बाष्कल शीघ्रतापूर्वक समरभूमिमें देवीके सामने आ गया। उस समय दुर्मुख केवल दर्शक बनकर देवीकी ओर मुख करके खड़ा रहा॥ १७॥ |
| तयोर्युद्धमभूद् घोरं देवीबाष्कलयोस्तदा।<br>बाणासिपरिघाघातैर्भयदं मन्दचेतसाम्॥ १८ | अब भगवती तथा बाष्कलके बीच बाणों, तलवार तथा परिघके प्रहारसे भीषण युद्ध होने लगा, जो उत्साहहीन चित्तवाले लोगोंके लिये भयदायक था॥ १८॥ |
| ततः क्रुद्धा जगन्माता दृष्ट्वा तं युद्धदुर्मदम्।<br>जघान पञ्चभिर्बाणैः कर्णाकृष्टैः शिलाशितैः॥ १९ | तत्पश्चात् युद्धके लिये उन्मत्त उस बाष्कलको देखकर जगदम्बिका कुपित हो गयीं और उन्होंने पत्थरकी सानपर चढ़ाकर तीखे बनाये गये तथा कानोंतक खींचे गये पाँच बाणोंसे उसपर प्रहार किया॥ १९॥ |
| दानवोऽपि शरान्देव्याश्चिच्छेद निशितैः शरैः।<br>सप्तभिस्ताडयामास देवीं सिंहोपरिस्थिताम्॥ २० | उस दानवने भी अपने तीक्ष्ण बाणोंसे देवीके बाणोंको काट दिया और पुनः सिंहपर विराजमान भगवतीपर सात बाणोंसे प्रहार किया॥ २०॥ |
| सापि तं दशभिस्तीक्ष्णैः सुपीतैः सायकैः खलम्।<br>जघान तच्छरांश्छित्त्वा जहास च मुहुर्मुहुः॥ २१ | देवी भगवतीने उसके बाणोंको काटकर पानी चढ़ाकर तीक्ष्ण किये हुए दस बाणोंसे उस दुष्टपर प्रहार किया और वे बार-बार जोर-जोरसे हँसने लगीं॥ २१॥ |
| अर्धचन्द्रेण बाणेन चिच्छेद च शरासनम्।<br>बाष्कलोऽपि गदां गृह्य देवीं हन्तुमुपाययौ॥ २२ | जगदम्बाने अपने अर्धचन्द्राकार बाणसे उसका धनुष काट डाला। तब बाष्कल भी गदा लेकर देवीको मारनेके लिये उनकी ओर दौड़ा॥ २२॥ |
| आगच्छन्तं गदापाणिं दानवं मदगर्वितम्।<br>चण्डिका स्वगदापातैः पातयामास भूतले॥ २३ | अभिमानमें चूर उस दानवको हाथमें गदा लिये आता हुआ देखकर देवी चण्डिकाने अपनी गदाके प्रहारसे उसे धराशायी कर दिया॥ २३॥ |
| बाष्कलः पतितो भूमौ मुहूर्तादुत्थितः पुनः।<br>चिक्षेप च गदां सोऽपि चण्डिकां चण्डविक्रमः॥ २४ | बाष्कल मुहूर्तभर पृथ्वीपर पड़ा रहा, इसके बाद वह फिर उठ खड़ा हुआ और प्रचण्ड, पराक्रमी उस वीरने भी भगवतीपर गदा चला दी॥ २४॥ |
| तमागच्छन्तमालोक्य देवी शूलेन वक्षसि।<br>जघान बाष्कलं क्रुद्धा पपात च ममार सः॥ २५ | उस दैत्यको सामने आते देखकर भगवतीने कुपित होकर बाष्कलके वक्षःस्थलपर त्रिशूलसे प्रहार किया, जिससे वह गिर पड़ा और मर गया॥ २५॥ |
| ६०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ | | :--- | :--- | | पतिते बाष्कले सैन्यं भग्नं तस्य दुरात्मनः ।<br>जयेति च मुदा देवाश्चक्रुशुर्गगने स्थिताः ॥ २६ | बाष्कलके गिरते ही उस दुरात्माकी सेना भाग गयी और आकाशमण्डलमें विद्यमान देवता प्रसन्नतापूर्वक भगवतीकी जय-जयकार करने लगे ॥ २६ ॥ | | तस्मिंश्च निहते दैत्ये दुर्मुखोऽतिबलान्वितः ।<br>आजगाम रणे देवीं क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ २७ | उस दैत्यके मार दिये जानेपर महाबली दुर्मुख क्रोधसे आँखें लाल किये रणभूमिमें देवीके समक्ष आया ॥ २७ ॥ | | तिष्ठ तिष्ठाबले सोऽपि भाषमाणः पुनः पुनः ।<br>धनुर्बाणधरः श्रीमान्रथस्थः कवचावृतः ॥ २८ | उस समय वह वैभवशाली दैत्य ‘अरी अबले ! ठहरो, ठहरो’—ऐसा बार-बार कहते हुए धनुष-बाण धारण करके कवच पहने हुए रथपर सवार था ॥ २८ ॥ | | तमागच्छन्तमालोक्य देवी शङ्खमवादयत् ।<br>कोपयन्ती दानवं तं ज्याघोषञ्च चकार ह ॥ २९ | उस दानवको अपनी ओर आते देखकर देवीने शंखध्वनि की और उसे कुपित करती हुई वे अपने धनुषकी टंकार करने लगीं ॥ २९ ॥ | | सोऽपि बाणान्मुमोचाशु तीक्ष्णानाशीविषोपमान् ।<br>स्वबाणैस्तान्महामाया चिच्छेद च ननाद च ॥ ३० | दुर्मुख भी बड़ी तेजीसे सर्पके समान विषैले तीक्ष्ण बाण छोड़ने लगा। तब महामायाने अपने बाणोंसे उन बाणोंको काट डाला और वे गर्जन करने लगीं ॥ ३० ॥ | | तयोः परस्परं युद्धं बभूव तुमुलं नृप ।<br>बाणशक्तिगदाघातैर्मुसलैस्तोमरैस्तथा ॥ ३१ | हे राजन् ! बाण, शक्ति, गदा, मूसल और तोमर आदिके प्रहारसे उन दोनोंमें परस्पर भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ३१ ॥ | | रणभूमौ तदा जाता रुधिरौघवहा नदी ।<br>पतितानि तदा तीरे शिरांसि प्रबभुस्तदा ॥ ३२<br>यथा सन्तरणार्थाय यमकिङ्करनायकैः ।<br>तुम्बीफलानि नीतानि नवशिक्षापरैर्मुदा ॥ ३३ | उस समय रणभूमिमें रुधिरकी नदी बह चली। उसके तटपर गिरे हुए मस्तक इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे, मानो वैतरणी पार करनेके लिये तैरना सीखनेवाले यमदूतोंके द्वारा प्रसन्नतापूर्वक तुम्बीफल लाकर रख दिये गये हों ॥ ३२-३३ ॥ | | रणभूमिस्तदा घोरा बभूवातीव दुर्गमा ।<br>शरीरैः पतितैर्भूमौ खाद्यमानैर्वृकादिभिः ॥ ३४ | भूमिपर कटकर गिरे शवों तथा उन्हें खानेवाले भेड़िये आदि जन्तुओंसे वह रणभूमि अत्यन्त भयंकर तथा दुर्गम हो गयी थी ॥ ३४ ॥ | | गोमायुसारमेयाश्च काकाः कङ्का अयोमुखाः ।<br>गृध्राः श्येनाश्च खादन्ति शरीराणि दुरात्मनाम् ॥ ३५ | सियार, कुत्ते, कौए, कंक, अयोमुख नामक पक्षी, गिद्ध और बाज उन दुष्ट दानवोंके शरीरको [नोच-नोचकर] खा रहे थे ॥ ३५ ॥ | | ववौ वायुश्च दुर्गन्धो मृतानां देहसङ्गतः ।<br>अभूत्किलकिलाशब्दः खगानां पलभक्षिणाम् ॥ ३६ | मृतकोंके शरीरके संसर्गसे दुर्गन्धित हवा चल रही थी और मांसाहारी पक्षियोंकी किलकिला ध्वनि हो रही थी ॥ ३६ ॥ | | तदा चुकोप दुष्टात्मा दुर्मुखः कालमोहितः ।<br>देवीमुवाच गर्वेण कृत्वा चोर्ध्वकरं शुभम् ॥ ३७ | तब कालसे मोहित वह दुरात्मा दुर्मुख अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा और गर्वके साथ अपनी सुन्दर भुजा उठाकर देवीसे कहने लगा— ॥ ३७ ॥ |
| अ० १३ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६०१ | | :--- | :--- |
| गच्छ चण्डि हनिष्यामि त्वामद्यैव सुबालिशे।<br>दैत्यं वा भज वामोरु महिषं मदगर्वितम्॥ ३८ | हे चण्डिके! हे मूर्ख बाले! भाग जाओ, नहीं तो मैं तुम्हें अभी मार डालूँगा अथवा हे वामोरु! मदसे मत्त महिषासुरको स्वीकार कर लो॥ ३८॥ |
| देव्युवाच<br>आसन्नमरणः कामं प्रलपस्यद्य मोहितः।<br>अद्यैव त्वां हनिष्यामि यथायं बाष्कलो हतः॥ ३९ | देवी बोलीं—अब तुम्हारी मृत्यु समीप है, तभी तुम मोहित होकर ऐसा प्रलाप कर रहे हो। अभी मैं तुम्हें भी उसी प्रकार मार डालूँगी, जैसे मैंने इस बाष्कलको मारा है॥ ३९॥ |
| गच्छ वा तिष्ठ वा मन्द मरणं यदि रोचते।<br>हत्वा त्वां वै वधिष्यामि बालिशं महिषीसुतम्॥ ४० | हे मूर्ख! भाग जाओ और यदि तुम्हें मृत्यु अच्छी लगती हो तो रुके रहो। तुम्हें मारनेके बाद मैं मूर्ख महिषासुरका भी संहार कर दूँगी॥ ४०॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या दुर्मुखो मर्तुमुद्यतः।<br>मुमोच बाणवृष्टिं तु चण्डिकां प्रति दारुणाम्॥ ४१ | देवीका वह वचन सुनकर मरणोन्मुख दुर्मुख भगवती चण्डिकाके ऊपर भीषण बाण-वृष्टि करने लगा॥ ४१॥ |
| सापि तां तरसा छित्त्वा बाणवृष्टिं शितैः शरैः।<br>जघान दानवं क्रुद्धा वृत्रं वज्रधरो यथा॥ ४२ | भगवतीने भी कुपित होकर अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उस बाण-वृष्टिको तत्काल व्यर्थ करके उस दैत्यपर उसी प्रकार आघात किया, जैसे इन्द्रने वृत्रासुरपर किया था॥ ४२॥ |
| तयोः परस्परं युद्धं सञ्जातं चातिकर्कशम्।<br>भयदं कातराणाञ्च शूराणां बलवर्धनम्॥ ४३ | अब उन दोनोंमें बड़ा भीषण युद्ध आरम्भ हो गया, जो कायरोंके लिये भयदायक तथा वीरोंके लिये उत्साहवर्धक था॥ ४३॥ |
| देवी चिच्छेद तरसा धनुस्तस्य करे स्थितम्।<br>तथैव पञ्चभिर्बाणैर्बभञ्ज रथमुत्तमम्॥ ४४ | देवीने बड़ी फुर्तीके साथ उसके हाथमें स्थित धनुषको काट डाला और उसी तरह अपने पाँच बाणोंसे उसके उत्तम रथको छिन्न-भिन्न कर दिया॥ ४४॥ |
| रथे भग्ने महाबाहुः पदातिर्दुर्मुखस्तदा।<br>गदां गृहीत्वा दुर्धर्षां जगाम चण्डिकां प्रति॥ ४५ | रथके नष्ट हो जानेपर महाबाहु दुर्मुख अपनी भयानक गदा लेकर पैदल ही भगवती चण्डिकाकी ओर दौड़ा॥ ४५॥ |
| चकार स गदाघातं सिंहमौलौ महाबलः।<br>न चचाल हरिः स्थानात्ताडितोऽपि महाबलः॥ ४६ | [उनके पास पहुँचकर] उस महाबली दैत्यने सिंहके मस्तकपर गदासे प्रहार कर दिया, किंतु महाशक्तिशाली सिंह गदासे मारे जानेपर भी अपने स्थानसे विचलित नहीं हुआ॥ ४६॥ |
| अम्बिका तं समालोक्य गदापाणिं पुरःस्थितम्।<br>खड्गेन शितधारेण शिरश्चिच्छेद मौलिमत्॥ ४७ | उसी समय जगदम्बाने हाथमें गदा लिये हुए उस दुर्मुखको सम्मुख उपस्थित देखकर अपनी तीक्ष्ण धारवाली तलवारसे उसके किरीटयुक्त मस्तकको काट दिया॥ ४७॥ |
| छिन्ने च मस्तके भूमौ पपात दुर्मुखो मृतः।<br>जयशब्दं तदा चक्रर्मुदिता निर्जरा भृशम्॥ ४८ | मस्तक कट जानेपर दुर्मुख जमीनपर गिर पड़ा और मर गया। तब देवता परम प्रसन्न होकर देवीकी जय-जयकार करने लगे॥ ४८॥ |
| ६०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ |
|---|
| तुष्टुवुस्तां तदा देवीं दुर्मुखे निहतेऽमराः।<br>पुष्पवृष्टिं तथा चक्रुर्जयशब्दं नभःस्थिताः॥ ४९ | दुर्मुखके मर जानेपर आकाशमें विद्यमान देवता भगवतीकी स्तुति करने लगे। उनपर पुष्प बरसाने लगे तथा उनकी जयकार करने लगे॥ ४९॥ |
| ऋषयः सिद्धगन्धर्वाः सविद्याधरकिन्नराः।<br>जहृषुस्तं हतं दृष्ट्वा दानवं रणमस्तके॥ ५० | रणभूमिमें उस महान् दानवको मरा हुआ देखकर ऋषि, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर और किन्नर आनन्दित हो उठे॥ ५०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषसेनाधिप-<br>बाष्कलदुर्मुखनिपातनवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः
चिक्षुर और ताम्रका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध
</div>| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| दुर्मुखं निहतं श्रुत्वा महिषः क्रोधमूर्च्छितः।<br>उवाच दानवान्सर्वांकिं जातमिति चासकृत्॥ १<br>निहतौ दानवौ शूरौ रणे दुर्मुखबाष्कलौ।<br>तन्व्या तत्परमाश्चर्यं पश्यन्तु दैवचेष्टितम्॥ २ | हे राजन्! दुर्मुख मार दिया गया—यह सुनकर महिषासुर क्रोधसे मूर्च्छित हो गया और दानवोंसे बार-बार कहने लगा—'यह क्या हो गया?' दुर्मुख और बाष्कल तो बड़े शूर-वीर दानव थे। एक सुकुमार नारीने उन्हें रणभूमिमें मार डाला, यह तो महान् आश्चर्य है! दैवका विधान तो देखो॥ १-२॥ |
| कालो हि बलवान्कर्ता सततं सुखदुःखयोः।<br>नराणां परतन्त्राणां पुण्यपापानुयोगतः॥ ३ | समय बड़ा बलवान् होता है, वही परतन्त्र मनुष्योंके पुण्य तथा पापके अनुसार सदा उनके सुखों-दुःखोंका निर्माण करता है॥ ३॥ |
| निहतौ दानवश्रेष्ठौ किं कर्तव्यमतः परम्।<br>ब्रुवन्तु मिलिताः सर्वे यद्युक्तं कार्यसङ्कटे॥ ४ | ये दोनों ही श्रेष्ठ दानव मार डाले गये हैं, अब इसके बाद क्या करना चाहिये? इस विषम स्थितिमें सब लोग विचार करके जो उचित हो, बतायें॥ ४॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं ब्रुवति राजेन्द्र महिषेऽतिबलान्विते।<br>चिक्षुराख्यस्तु सेनानीस्तमुवाच महारथः॥ ५<br>राजन्नहं हनिष्यामि का चिन्ता स्त्रीविहिंसने। | **व्यासजी बोले—**हे राजेन्द्र! इस प्रकार महाशक्तिशाली महिषासुरके कहनेपर उसके महारथी सेनाध्यक्ष चिक्षुरने कहा—हे राजन्! स्त्रीको मार डालनेमें चिन्ता किस बातकी! मैं उसे मार डालूँगा॥ ५ १/२॥ |
| इत्युक्त्वा स्वबलैर्युक्तः प्रययौ रथसंयुतः॥ ६<br>द्वितीयं पार्ष्णिरक्षं तु कृत्वा ताम्रं महाबलम्।<br>महता सैन्यघोषेण पूरयन्गगनं दिशः॥ ७ | ऐसा कहकर वह चिक्षुराख्य रथपर बैठकर दूसरे महाबली ताम्रको अपना अंगरक्षक बनाकर सेनाकी तुमुल ध्वनिसे आकाश एवं दिशाओंको निनादित करता हुआ युद्धके लिये चल पड़ा॥ ६-७॥ |
| तमागच्छन्तमालोक्य देवी भगवती शिवा।<br>चकार शङ्खज्याघोषं घण्टानादं महाद्भुतम्॥ ८<br>तत्रसुस्तेन शब्देन ते च सर्वे सुरारयः।<br>किमेतदिति भाषन्तो दुद्रुवुर्भयकम्पिताः॥ ९ | उसे आता हुआ देखकर कल्याणमयी भगवतीने अद्भुत शंखध्वनि, घण्टानाद तथा धनुषकी टंकार की। उस ध्वनिसे सभी राक्षस भयभीत हो गये। 'यह क्या'—ऐसा कहते हुए वे भयसे काँपने लगे तथा भाग खड़े हुए॥ ८-९॥ |
| अ० १४ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६०३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चिक्षुराख्यस्तु तान्दृष्ट्वा पलायनपरायणान्।<br>उवाचातीव संक्रुद्धः किं भयं वः समागतम्॥ १०<br><br>अद्यैवाहं हनिष्यामि बाणैर्बालां मदोन्नताम्।<br>तिष्ठन्त्वत्र भयं त्यक्त्वा दैत्याः समरमूर्धनि॥ ११ | उन्हें भागते हुए देखकर चिक्षुराख्यने अत्यन्त क्रोधित होकर कहा—तुम्हारे सामने कौन-सा भय आ गया? मैं इस मदोन्मत्त नारीको आज ही बाणोंद्वारा मार डालूँगा। हे दैत्यो! तुम लोग भय छोड़कर लड़ाईके मोर्चेपर डटे रहो॥ १०-११॥ |
| इत्युक्त्वा दानवश्रेष्ठश्चापपाणिर्बलान्वितः।<br>आगत्य सङ्गरे देवीमित्युवाच गतव्यथः॥ १२<br><br>किं गर्जसि विशालाक्षि भीषयन्तीतरान्ररान्।<br>नाहं बिभेमि तन्वङ्गि श्रुत्वा तेऽद्य विचेष्टितम्॥ १३ | ऐसा कहकर उस पराक्रमी दैत्यश्रेष्ठ चिक्षुरने हाथमें धनुष उठा लिया और युद्धभूमिमें आकर वह निश्चिन्ततापूर्वक भगवतीसे कहने लगा—हे विशालाक्षि! अन्य साधारण मनुष्योंको भयभीत करती हुई तुम क्यों गरज रही हो? तुम्हारा यह व्यर्थ गर्जन सुनकर मैं भयभीत नहीं हो सकता॥ १२-१३॥ |
| स्त्रीवधे दूषणं ज्ञात्वा तथैवाकीर्तिसम्भवम्।<br>उपेक्षां कुरुते चित्तं मदीयं वामलोचने॥ १४<br><br>स्त्रीणां युद्धं कटाक्षैश्च तथा हावैश्च सुन्दरि।<br>न शस्त्रैर्विहितं क्वापि त्वादृशीनां कदाचन॥ १५ | हे सुलोचने! स्त्रीका वध करना पाप है तथा इससे जगत्में अपकीर्ति होती है—यह जानकर मेरा चित्त तुम्हें मारनेसे विचलित हो रहा है। हे सुन्दरि! तुम-जैसी स्त्रियोंके कटाक्षों तथा हाव-भावोंसे समरका कार्य सम्पन्न हो जाता है; कभी कहीं भी शस्त्रोंद्वारा स्त्रीका युद्ध नहीं हुआ है॥ १४-१५॥ |
| पुष्पैरपि न योद्धव्यं किं पुनर्निशितैः शरैः।<br>भवादृशीनां देहेषु दुनोति मालतीदलम्॥ १६ | हे सुन्दरि! तुम्हें तो पुष्पसे भी युद्ध नहीं करना चाहिये, तब फिर तीक्ष्ण बाणोंसे युद्धकी बात ही क्या; क्योंकि तुम्हारी-जैसी सुन्दरियोंके शरीरमें मालतीकी पंखुड़ी भी पीड़ा उत्पन्न कर सकती है॥ १६॥ |
| धिग्जन्म मानुषे लोके क्षात्रधर्मानुजीविनाम्।<br>लालितोऽयं प्रियो देहः कृन्तनीयः शितैः शरैः॥ १७ | इस संसारमें क्षात्रधर्मानुयायी लोगोंके जन्मको धिक्कार है; क्योंकि वे बड़े प्यारसे पाले गये अपने शरीरको भी तीक्ष्ण बाणोंसे छिदवाते हैं!॥ १७॥ |
| तैलाभ्यङ्गैः पुष्पवातैस्तथा मिष्टान्नभोजनैः।<br>पोषितोऽयं प्रियो देहो घातनीयः परेषुभिः॥ १८<br><br>देहं छित्त्वासिधाराभिर्धनभृज्जायते नरः।<br>धिग्धनं दुःखदं पूर्वं पश्चात्किं सुखदं भवेत्॥ १९ | तेलकी मालिशसे, फूलोंकी हवासे तथा स्वादिष्ट भोजन आदिसे पोषित इस प्रिय शरीरको शत्रुओंके बाणोंसे बिंधवाते हैं। तलवारकी धारसे अपना शरीर कटवाकर मनुष्य धनवान् होना चाहते हैं। ऐसे धनको धिक्कार है जो प्रारम्भमें ही दुःख देनेवाला होता है; तो बादमें क्या वह सुख देनेवाला हो सकता है?॥ १८-१९॥ |
| त्वमप्यज्ञैव वामोरु युद्धमाकाङ्क्षसे यतः।<br>सुखं सम्भोगजं त्यक्त्वा कं गुणं वेत्सि सङ्गरे॥ २० | हे सुन्दरि! तुम भी मूर्ख ही हो, तभी तो सम्भोगजन्य सुखको त्यागकर युद्धकी इच्छा कर रही हो। युद्धमें तुम कौन-सा लाभ समझ रही हो?॥ २०॥ |
| खड्गपातं गदाघातं भेदनञ्च शिलीमुखैः।<br>मरणान्ते तु संस्कारो गोमायुमुखकर्षणम्॥ २१ | युद्धमें तलवारें चलती हैं, गदाका प्रहार होता है और बाणोंसे शरीरका बेधन किया जाता है। मृत्युके अन्तमें सियार अपने मुँहसे नोच-नोचकर उस देहका संस्कार करते हैं॥ २१॥ |
| ६०४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ |
|---|
| तस्यैव कविभिर्धूर्तैः कृतं चातीव शंसनम्।<br>रणे मृतानां स्वःप्राप्तिरर्थवादोऽस्ति केवलः ॥ २२ | धूर्त कवियोंने उसी युद्धकी अत्यन्त प्रशंसा की है कि रणभूमिमें मरनेवालोंको स्वर्ग प्राप्त होता है। उनका यह कहना केवल अर्थवादमात्र है॥ २२॥ | | तस्माद् गच्छ वरारोहे यत्र ते रमते मनः।<br>भज वा भूपतिं नाथं ह्यारिं सुरमर्दनम् ॥ २३ | अतः हे वरारोहे ! तुम्हारा मन जहाँ लगे, वहाँ चली जाओ अथवा तुम देवताओंका दमन करनेवाले मेरे स्वामी महाराज महिषासुरको स्वीकार कर लो ॥ २३ ॥ | | व्यास उवाच<br>एवं ब्रुवाणं तं दैत्यं प्रोवाच जगदम्बिका।<br>किं मृषा भाषसे मूढ बुद्धिमानिव पण्डितः ॥ २४ | व्यासजी बोले—इस प्रकार बोलते हुए उस दैत्यसे भगवती जगदम्बाने कहा—मूर्ख ! तुम अपनेको बुद्धिमान् पण्डितके समान मानकर व्यर्थ क्यों बोल रहे हो? तुम न तो नीतिशास्त्र जानते हो, न आन्वीक्षिकी विद्या ही जानते हो, तुमने कभी न वृद्धोंकी सेवा की है और न तो तुम्हारी बुद्धि ही धर्मपरायण है ॥ २४-२५ ॥ | | नीतिशास्त्रं न जानासि विद्यां चान्वीक्षिकीं तथा।<br>न सेवितास्त्वया वृद्धा न धर्मे मतिरस्ति ते ॥ २५ | | | मूर्खसेवापरो यस्मात्तस्मात्त्वं मूर्ख एव हि।<br>राजधर्मं न जानासि किं ब्रवीषि ममाग्रतः ॥ २६ | क्योंकि तुम मूर्खकी सेवामें लगे रहते हो, अतः तुम भी मूर्ख हो। जब तुम्हें राजधर्म ही ज्ञात नहीं, तब मेरे सामने क्यों व्यर्थ बकवाद कर रहे हो ? ॥ २६ ॥ | | संग्रामे महिषं हत्वा कृत्वा रुधिरकर्दमम्।<br>यशःस्तम्भं स्थिरं कृत्वा गमिष्यामि यथासुखम् ॥ २७ | संग्राममें महिषासुरका वध करके समरांगणको रुधिरसे पंकमय बनाकर अपना यश-स्तम्भ सुदृढ़ स्थापितकर मैं सुखपूर्वक चली जाऊँगी ॥ २७ ॥ | | देवानां दुःखदातारं दानवं मदगर्वितम्।<br>हनिष्येऽहं दुराचारं युद्धं कुरु स्थिरो भव ॥ २८<br><br>जीवितेच्छास्ति चेन्मूढ महिषस्य तथा तव।<br>तदा गच्छन्तु पातालं दानवाः सर्व एव ते ॥ २९<br><br>मुमूर्षा यदि वश्चित्ते युद्धं कुर्वन्तु सत्वराः।<br>सर्वानेव वधिष्यामि निश्चयोऽयं ममाधुना ॥ ३० | देवताओंको दुःख देनेवाले इस दुराचारी तथा मदोन्मत्त दानवको मैं अवश्य मार डालूँगी। तुम सावधान होकर युद्ध करो। हे मूर्ख! यदि तुम्हें तथा महिषासुरको जीनेकी अभिलाषा हो तो सभी दानव पाताललोकको शीघ्र ही चले जायँ; अन्यथा यदि तुमलोगोंके मनमें मरनेकी इच्छा हो तो तुरंत युद्ध करो। यह मेरा संकल्प है कि मैं सभी दानवोंको मार डालूँगी ॥ २८-३०॥ | | व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या दानवो बलदर्पितः।<br>मुमोच बाणवृष्टिं तां घनवृष्टिमिवापराम् ॥ ३१ | व्यासजी बोले—देवीका वचन सुनकर बलके अभिमानसे युक्त वह दैत्य उनपर इस प्रकार बाणोंकी वर्षा करने लगा, मानो दूसरे मेघ ही जलकी धारा बरसा रहे हों ॥ ३१ ॥ | | चिच्छेद तस्य सा बाणान्स्वबाणैर्निशितैस्तदा।<br>जघान तं तथा घोरैराशीविषसमैः शरैः ॥ ३२<br><br>युद्धं परस्परं तत्र बभूव विस्मयप्रदम्।<br>गदया घातयामास तं रथाज्जगदम्बिका ॥ ३३ | तब भगवतीने अपने तीक्ष्ण बाणोंद्वारा उसके सभी बाण काट डाले और विषधर सर्पके समान विषैले बाणोंसे उसपर प्रहार किया। उन दोनोंमें परस्पर विस्मयकारी युद्ध होने लगा। जगदम्बाने अपने वाहन सिंहपरसे ही उस दैत्यपर गदासे प्रहार किया ॥ ३२-३३ ॥ |
| अ० १४ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६०५ | | :--- | :--- | | मूर्च्छां प्राप स दुष्टात्मा गदयाभिहतो भृशम्।<br>मुहूर्तद्वयमात्रं तु रथोपस्थ इवाचलः॥ ३४ | गदासे अत्यधिक आहत होनेके कारण वह दुष्टात्मा दैत्य मूर्च्छित हो गया और दो मुहूर्ततक पाषाणकी भाँति रथपर ही पड़ा रहा॥ ३४॥ | | तं तथामूर्च्छितं दृष्ट्वा ताम्रः परबलार्दनः।<br>आजगाम रणे योद्धुं चण्डिकां प्रति चापलात्॥ ३५ | इस प्रकार उसे मूर्च्छित देखकर शत्रुसेनाको नष्ट कर डालनेवाला ताम्र नामक दैत्य चण्डिकासे लड़नेके लिये वेगपूर्वक रणमें उपस्थित हो गया॥ ३५॥ | | आगच्छन्तं तु तं वीक्ष्य हसन्ती प्राह चण्डिका।<br>एह्येहि दानवश्रेष्ठ यमलोकं नयाम्यहम्॥ ३६ | उसे आते देखकर भगवती चण्डिका उससे हँसती हुई बोलीं—अरे दानवश्रेष्ठ! आओ-आओ, अभी तुम्हें यमलोक भेज देती हूँ॥ ३६॥ | | किं भवद्भिः समायातैर्बलैश्च गतायुषैः।<br>महिषः किं गृहे मूढः करोति जीवनोद्यमम्॥ ३७<br><br>किं भवद्भिर्हतैर्मन्दैर्ममापि विफलः श्रमः।<br>अहते महिषे पापे सुरशत्रौ दुरात्मनि॥ ३८<br><br>तस्माद्यूयं गृहं गत्वा महिषं प्रेषयन्त्विह।<br>पश्येन्मां सोऽपि मन्दात्मा यादृशीं तादृशीं स्थिताम्॥ ३९ | निर्बल और समाप्त आयुवाले तुमलोगोंके यहाँ आनेसे क्या लाभ? वह मूर्ख महिषासुर घरमें रहकर अपने जीनेका कौन-सा उपाय कर रहा है? देवताओंके शत्रु, दुष्टात्मा तथा पापी महिषासुरका संहार किये बिना तुम मूर्खोंको मारनेसे मुझे क्या लाभ होगा? इससे तो मेरा परिश्रम भी व्यर्थ हो जायगा, अतः तुमलोग घरपर जाकर महिषासुरको यहाँ भेज दो, जिससे वह मन्दबुद्धि भी मैं जिस रूपमें स्थित हूँ, उसमें मुझको देख ले॥ ३७–३९॥ | | ताम्रस्तद्वचनं श्रुत्वा बाणवृष्टिं चकार ह।<br>चण्डिकां प्रति कोपेन कर्णाकृष्टशरासनः॥ ४० | भगवतीका वचन सुनकर वह ताम्र कुपित हो धनुषको कानतक खींचकर उनपर बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ ४०॥ | | भगवत्यपि ताम्राक्षी समाकृष्य शरासनम्।<br>बाणान्मुमोच तरसा हन्तुकामा सुराहितम्॥ ४१ | देवताओंके शत्रु उस दैत्यको मारनेकी इच्छावाली ताम्राक्षी भगवती भी धनुष खींचकर उसके ऊपर वेगपूर्वक बाण छोड़ने लगीं॥ ४१॥ | | चिक्षुराख्योऽपि बलवान्मूर्च्छां त्यक्त्वोत्थितः पुनः।<br>गृहीत्वा सशरं चापं तस्थौ तत्सम्मुखः क्षणात्॥ ४२ | इतनेमें बलवान् चिक्षुराख्य भी मूर्च्छा त्यागकर उठ खड़ा हुआ और तुरंत बाणसहित धनुष लेकर देवीके सामने आकर खड़ा हो गया॥ ४२॥ | | चिक्षुराख्यश्च ताम्रश्च द्वावप्यतिबलोत्कटौ।<br>युयुधाते महावीरौ सह देव्या रणाङ्गणे॥ ४३ | चिक्षुराख्य और ताम्र दोनों ही अत्यन्त उग्र बलवान् और महान् वीर थे। अब वे दोनों ही मिलकर भगवती जगदम्बासे रणमें युद्ध करने लगे॥ ४३॥ | | कुपिता च महामाया ववर्ष शरसन्ततिम्।<br>चकार दानवान् सर्वान् बाणक्षततनुच्छदान्॥ ४४ | तब महामाया क्रोधित होकर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगीं, और उन्होंने अपने बाणोंके प्रहारसे सभी दानवोंके कवच छिन्न-भिन्न कर दिये॥ ४४॥ | | असुराः क्रोधसम्मूढा बभूवुः शरताडिताः।<br>चिक्षिपुः शरजालानि देवीं प्रति रुषान्विताः॥ ४५ | उन बाणोंसे आहत होकर सभी असुर क्रोधसे व्याकुल हो गये तथा रोषपूर्वक देवीपर बाणसमूह छोड़ने लगे। उस समय समस्त रणभूमिमें भगवतीके |
| ६०६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ |
|---|
| बभुस्ते राक्षसास्तत्र किंशुका इव पुष्पिणः।<br>शिलीमुखक्षताः सर्वे वसन्ते च वने रणे॥ ४६ | बाणोंसे घायल सभी राक्षस ऐसे सुशोभित होने लगे, जैसे वसन्त ऋतुमें वनमें किंशुकके लाल पुष्प दिखायी पड़ते हों॥ ४५-४६॥ | | बभूव तुमुलं युद्धं ताम्रेण सह संयुगे।<br>विस्मयं परमं जग्मुर्देवा ये प्रेक्षकाः स्थिताः॥ ४७ | उस समरभूमिमें ताम्रके साथ देवीका भीषण युद्ध होने लगा। इसे देखनेवाले जो देवता आकाशमें स्थित थे, वे आश्चर्यचकित हो गये॥ ४७॥ | | ताम्रो मुसलमादाय लोहजं दारुणं दृढम्।<br>जघान मस्तके सिंहं जहास च ननर्द च॥ ४८ | उसी समय ताम्रने लोहेका बना हुआ एक सुदृढ़ तथा भयंकर मूसल लेकर देवीके सिंहके सिरपर प्रहार किया और वह जोरसे हँसने तथा गरजने लगा॥ ४८॥ | | नर्दमानं तदा तं तु दृष्ट्वा देवी रुषान्विता।<br>खड्गेन शितधारेण शिरश्शिच्छेद सत्वरा॥ ४९ | तब उसे गरजता हुआ देखकर भगवती क्रोधित हो गयीं और उन्होंने तुरंत अपनी तेज धारवाली तलवारसे उसका मस्तक काट डाला॥ ४९॥ | | छिन्ने शिरसि ताम्रस्तु विशीर्षो मुसली बली।<br>बभ्राम क्षणमात्रं तु पपात रणमस्तके॥ ५० | सिर कट जानेपर भी वह मस्तकविहीन बलशाली ताम्र मूसल लिये हुए कुछ क्षणतक घूमता रहा, इसके बाद वह समरांगणमें गिर पड़ा॥ ५०॥ | | पतितं ताम्रमालोक्य चिक्षुराख्यो महाबलः।<br>खड्गमादाय तरसा दुद्राव चण्डिकां प्रति॥ ५१ | ताम्रको गिरा हुआ देखकर महाबली चिक्षुराख्य खड्ग लेकर बड़े वेगसे चण्डिकाकी ओर झपटा॥ ५१॥ | | भगवत्यपि तं दृष्ट्वा खड्गपाणिमुपागतम्।<br>दानवं पञ्चभिर्बाणैर्जघान तरसा रणे॥ ५२ | हाथमें तलवार लिये उस दानवको रणमें अपनी ओर आते देखकर देवीने भी तुरंत पाँच बाणोंसे उसपर प्रहार किया॥ ५२॥ | | एकेन पातितं खड्गं द्वितीयेन तु तत्करः।<br>कण्ठाच्च मस्तकं तस्य कृन्तितं चापरैः शरैः॥ ५३ | भगवतीने एक बाणसे उसका खड्ग काट दिया, दूसरेसे उसका हाथ काट दिया और अन्य बाणोंसे उसका मस्तक कण्ठसे अलग कर दिया॥ ५३॥ | | एवं तौ निहतौ क्रूरौ राक्षसौ रणदुर्मदौ।<br>भग्नं सैन्यं तयोस्तूर्णं दिक्षु सन्त्रस्तमानसम्॥ ५४ | इस प्रकार युद्धके लिये उन्मत्त रहनेवाले उन दोनों क्रूर राक्षसोंका वध हो गया, तब उन दोनोंकी सेना भयभीत होकर चारों दिशाओंमें शीघ्रतापूर्वक भाग चली॥ ५४॥ | | देवाश्च मुदिताः सर्वे दृष्ट्वा तौ निहतौ रणे।<br>पुष्पवृष्टिं मुदा चक्रुर्जयशब्दं नभःस्थिताः॥ ५५<br><br>ऋषयो देवगन्धर्वा वेतालाः सिद्धचारणाः।<br>ऊचुस्ते जय देवीति चाम्बिकेति पुनः पुनः॥ ५६ | उन दोनों दानवोंको रणमें मारा गया देखकर आकाशमें विराजमान सम्पूर्ण देवता आह्लादित हो गये और प्रसन्नतापूर्वक भगवतीकी जयध्वनि करते हुए फूलोंकी वर्षा करने लगे। ऋषि, देवता, गन्धर्व, वेताल, सिद्ध और चारण—वे सब ‘देवीकी जय, अम्बिकाकी जय' ऐसा बार-बार बोलने लगे॥ ५५-५६॥ |
<div align="center">इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
ताम्रचिक्षुराख्यवधवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
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अ० १५] पञ्चम स्कन्ध ६०७
अ० १५] पञ्चम स्कन्ध ६०७
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
बिडालाख्य और असिलोमाका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>तौ तया निहतौ श्रुत्वा महिषो विस्मयान्वितः ।<br>प्रेषयामास दैत्यांस्तद्वधार्थं महाबलान् ॥ १<br>असिलोमबिडालाख्यप्रमुखान् युद्धदुर्मदान् ।<br>सैन्येन महता युक्तान्सायुधान्सपरिच्छदान् ॥ २ | व्यासजी बोले—उस देवीने चिक्षुराख्य तथा ताम्रका वध कर दिया—यह सुनकर महिषासुरको बड़ा विस्मय हुआ। अब उसने विशाल सेनासे युक्त, शस्त्रास्त्र लिये हुए तथा कवच धारण किये हुए असिलोमा, बिडालाख्य आदि प्रमुख युद्धोन्मत्त तथा महाबली दैत्योंको भगवतीका वध करनेके लिये भेजा॥ १-२॥ |
| ते तत्र ददृशुर्देवीं सिंहस्योपरि संस्थिताम् ।<br>अष्टादशभुजां दिव्यां खड्गखेटकधारिणीम् ॥ ३ | वहाँपर उन्होंने सिंहके ऊपर विराजमान, अठारह भुजाओंसे सुशोभित, खड्ग तथा ढाल धारण की हुई दिव्यस्वरूपवाली भगवतीको देखा॥ ३॥ |
| असिलोमाग्रतो गत्वा तामुवाच हसन्निव ।<br>विनयावनतः शान्तो देवीं दैत्यवधोद्यताम् ॥ ४ | तब असिलोमा दैत्योंके वधके लिये उद्यत देवीके पास जाकर विनयावनत होकर शान्तिपूर्वक उनसे हँसते हुए कहने लगा— ॥ ४॥ |
| असिलोमोवाच<br>देवि ब्रूहि वचः सत्यं किमर्थमिह सुन्दरि ।<br>आगतासि किमर्थं वा हंसि दैत्यान्निरागसः ॥ ५<br>कारणं कथयाद्य त्वं त्वया सन्धिं करोम्यहम् ।<br>काञ्चनं मणिरत्नानि भाजनानि वराणि च ॥ ६<br>यानीच्छसि वरारोहे गृहीत्वा गच्छ मा चिरम् ।<br>किमर्थं युद्धकामासि दुःखसन्तापवर्धनम् ॥ ७ | असिलोमा बोला—हे देवि! सच्ची बात बताइये, आप यहाँ किस प्रयोजनसे आयी हैं? हे सुन्दरि! इन निरपराध दैत्योंको आप क्यों मार रही हैं? इसका कारण बताइये। मैं अभी आपके साथ सन्धि करनेको तैयार हूँ। हे वरारोहे! सुवर्ण, मणि, रत्न और अच्छे-अच्छे पात्र जो भी आप चाहती हैं, उन्हें लेकर यहाँसे शीघ्र चली जाइये। आप युद्धकी इच्छुक क्यों हैं? महात्मा पुरुष कहते हैं कि युद्ध दुःख तथा सन्तापको बढ़ानेवाला और सम्पूर्ण सुखोंका विघातक होता है॥ ५-७ १/२॥ |
| कथयन्ति महात्मानो युद्धं सर्वसुखापहम् ।<br>कोमलेऽतीव ते देहे पुष्पघातासहे भृशम् ॥ ८<br>किमर्थं शस्त्रसम्पातान्सहसीति विसिस्मिये ।<br>चातुर्यस्य फलं शान्तिः सततं सुखसेवनम् ॥ ९<br>तत्किमर्थं दुःखहेतुं संग्रामं कर्तुमिच्छसि ।<br>संसारेऽत्र सुखं ग्राह्यं दुःखं हेयमिति स्थितिः ॥ १० | मुझे महान् आश्चर्य हो रहा है कि पुष्पका भी आघात न सह सकनेवाले अपने अत्यन्त सुकोमल शरीरमें आप शस्त्रोंके आघात सहनेके लिये क्यों तैयार हैं? चातुर्यका फल तो शान्ति और निरन्तर सुख भोगना है। अतः एकमात्र दुःखके कारणस्वरूप इस संग्रामको आप क्यों करना चाहती हैं? इस संसारमें सुख ग्रहण करना चाहिये और दुःखका परित्याग करना चाहिये—यही सर्वमान्य नियम है॥ ८—१०॥ |
| ६०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्सुखं द्विविधं प्रोक्तं नित्यानित्यप्रभेदतः ।<br>आत्मज्ञानं सुखं नित्यमनित्यं भोगजं स्मृतम् ॥ ११<br>नाशात्मकं तु तत्त्याज्यं वेदशास्त्रार्थचिन्तकैः ।<br>सौगतानां मतं चेत्त्वं स्वीकरोषि वरानने ॥ १२<br>तथापि यौवनं प्राप्य भुंक्ष्व भोगाननुत्तमान् ।<br>परलोकस्य सन्देहो यदि तेऽस्ति कृशोदरि ॥ १३<br>स्वर्गभोगपरा नित्यं भव भामिनि भूतले ।<br>अनित्यं यौवनं देहे ज्ञात्वेति सुकृतं चरेत् ॥ १४ | वह सुख भी नित्य और अनित्यके भेदसे दो प्रकारका कहा गया है। आत्मज्ञानसम्बन्धी सुखको ‘नित्य’ और भोगजनित सुखको ‘अनित्य’ माना गया है। वेद और शास्त्रके तत्त्वका चिन्तन करनेवाले लोगोंको चाहिये कि उस विनाशशील अनित्य सुखको त्याग दें। हे वरानने! यदि आप नास्तिकका मत स्वीकार करती हों तो भी इस यौवनको पाकर उत्तमसे उत्तम सुखोंका भोग करें। हे कृशोदरि! हे भामिनि! यदि परलोकके विषयमें आपको सन्देह हो तो इस पृथ्वीपर ही सदाचारपूर्वक रहती हुई स्वर्गीय सुख प्राप्त करनेमें सदा तत्पर रहें, नहीं तो शरीरमें यह यौवन अनित्य है—ऐसा समझकर आपको सदा सत्कर्म करते रहना चाहिये॥ ११-१४॥ |
| परोपतापनं कार्यं वर्जनीयं सदा बुधैः ।<br>अविरोधेन कर्तव्यं धर्मार्थकामसेवनम् ॥ १५<br>तस्मात्त्वमपि कल्याणि मतिं धर्मे सदा कुरु ।<br>अपराधं विना दैत्यान्कस्मान्मारयसेऽम्बिके ॥ १६<br>दयाधर्मोऽस्य देहोऽस्ति सत्ये प्राणाः प्रकीर्तिताः ।<br>तस्माद्दया तथा सत्यं रक्षणीयं सदा बुधैः ॥ १७<br>कारणं वद सुश्रोणि दानवानां वधे तव । | बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि वे दूसरोंको पीड़ित करनेके कार्यका त्याग कर दें। अतः बिना विरोधके धर्म, अर्थ और कामका सेवन करना चाहिये। इसलिये हे कल्याणि! आप अपनी बुद्धि धर्मकृत्यमें लगाइये। हे अम्बिके! आप हम दैत्योंको बिना अपराधके क्यों मार रही हैं? दयाभाव पुरुषमात्रका शरीर है और सत्यमें ही उसका प्राण प्रतिष्ठित कहा गया है। अतः बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि दया और सत्यकी सदा रक्षा करें। हे देवि! आप दानवोंके संहारमें अपना प्रयोजन बतायें?॥ १५-१७ १/२॥ |
| देव्युवाच<br>त्वया पृष्टं महाबाहो किमर्थमिह चागता ॥ १८<br>तदहं सम्प्रवक्ष्यामि हनने च प्रयोजनम् ।<br>विचरामि सदा दैत्य सर्वलोकेषु सर्वदा ॥ १९<br>न्यायान्यायौ च भूतानां पश्यन्ती साक्षिरूपिणी ।<br>न मे कदापि भोगेच्छा न लोभो न च वैरिता ॥ २० | देवी बोलीं—हे महाबाहो! तुमने जो यह पूछा है कि मैं यहाँ क्यों आयी हूँ—उसे बताती हूँ और दानववधका प्रयोजन भी बताती हूँ। हे दैत्य! मैं सदा साक्षी बनकर सभी प्राणियोंके न्याय तथा अन्यायको देखती हुई सब लोकोंमें निरन्तर विचरती रहती हूँ। मुझे न तो कभी भोगविलासकी इच्छा है, न लोभ है और न किसीके प्रति द्वेषभाव ही है॥ १८-२०॥ |
| धर्मार्थं विचराम्यत्र संसारे साधुरक्षणम् ।<br>व्रतमेतत्तु नियतं पालयामि निजं सदा ॥ २१<br>साधूनां रक्षणं कार्यं हन्तव्या येऽप्यसाधवः ।<br>वेदसंरक्षणं कार्यमवतारैरनेकशः ॥ २२<br>युगे युगे तानेवाहमवतारान्बिभर्मि च । | धर्मकी मर्यादा रखनेके लिये मैं इस संसारमें विचरण करती रहती हूँ। साधुपुरुषोंकी रक्षा करना—अपने इस व्रतका मैं सदा पालन करती हूँ। अनेक अवतार धारण करके मैं सज्जनोंकी रक्षा करती हूँ, जो असाधु हैं उनका संहार करती हूँ और वेदोंका संरक्षण करती हूँ। मैं प्रत्येक युगमें उन अवतारोंको धारण करती रहती हूँ॥ २१-२२ १/२॥ |
अ० १५] पञ्चम स्कन्ध ६०९
अ० १५] पञ्चम स्कन्ध ६०९
| महिषस्तु दुराचारो देवान्वै हन्तुमुद्यतः॥ २३<br>ज्ञात्वाहं तद्वधार्थं भोः प्राप्तास्मि राक्षसाधुना।<br>तं हनिष्ये दुराचारं सुरशत्रुं महाबलम्॥ २४ | दुराचारी महिषासुर देवताओंको मार डालनेके लिये उद्यत है—यह जानकर मैं उसके वधके लिये इस समय यहाँ उपस्थित हुई हूँ। हे दानव! मैं उस दुराचारी तथा सुरद्रोही महाबली महिषको मार डालूँगी॥ २३-२४॥ | | गच्छ वा तिष्ठ कामं त्वं सत्यमेतदुदाहृतम्।<br>ब्रूहि वा तं दुरात्मानं राजानं महिषीसुतम्॥ २५<br>किमन्यान् प्रेषयस्यत्र स्वयं युद्धं कुरुष्व ह।<br>सन्धिश्चेत्कर्तुमिच्छास्ति राजंस्तव मया सह॥ २६<br>सर्वे गच्छन्तु पातालं वैरं त्यक्त्वा यथासुखम्।<br>देवद्रव्यं तु यत्किञ्चिद्धृतं जित्वा रणे सुरान्।<br>तद्दत्त्वा यान्तु पातालं प्रह्लादो यत्र तिष्ठति॥ २७ | अब तुम इच्छानुसार जाओ या रुके रहो, मैंने तुमसे यह सब सच-सच बतला दिया। अतः जाकर अपने उस दुराचारी राजा महिषसे कह दो—‘आप अन्य दैत्योंको क्यों भेजते हैं? स्वयं युद्ध कीजिये।' यदि तुम्हारे राजाकी इच्छा मेरे साथ सन्धि करनेकी हो, तो सभी दैत्य शत्रुता छोड़कर सुखपूर्वक पाताल चले जायँ। देवताओंको जीतकर जो भी देवद्रव्य असुरोंने छीन लिया है, वह सब वापस करके वे उस पातालपुरीमें चले जायँ, जहाँ इस समय प्रह्लाद विराजमान हैं॥ २५-२७॥ | | व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं देव्या असिलोमा पुरःस्थितः।<br>बिडालाख्यं महावीर्यं पप्रच्छ प्रीतिपूर्वकम्॥ २८ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] इस प्रकार देवीका वचन सुनकर असिलोमा भगवतीके सामने ही महान् शूरवीर बिडालाख्यसे प्रीतिपूर्वक पूछने लगा—॥ २८॥ | | असिलोमोवाच<br>श्रुतं तेऽद्य बिडालाख्य भवान्या कथितं च यत्।<br>एवं गते किं कर्तव्यो विग्रहः सन्धिरेव वा॥ २९ | **असिलोमा बोला—**बिडालाख्य! देवीने अभी-अभी जो कहा है, वह तो तुमने सुन लिया, इस स्थितिमें हमें सन्धि या विग्रह—क्या करना चाहिये?॥ २९॥ | | बिडालाख्य उवाच<br>न सन्धिकामोऽस्ति नृपोऽभिमानी<br>युद्धे च मृत्युं नियतं हि जानन्।<br>दृष्ट्वा हतान् प्रेरयते तथास्मा-<br>न्दैवं हि कोऽतिक्रमितुं समर्थः॥ ३० | **बिडालाख्य बोला—**युद्धमें मृत्युको निश्चित जानते हुए भी हमारे अभिमानी महाराज सन्धि नहीं करना चाहते। समरमें बहुत-से योद्धा मारे जा चुके हैं—यह देखकर भी वे हमें भेज रहे हैं। दैवको टाल सकनेमें भला कौन समर्थ है!॥ ३०॥ | | (दुःसाध्य एवास्तिवह सेवकानां<br>धर्मः सदा मानविवर्जितानाम्।<br>आज्ञापराणां वशवर्त्तिकानां<br>पाञ्चालिकानामिव सूत्रभेदात्॥) | (सम्मानकी भावनासे रहित, स्वामीकी आज्ञाका पालन करनेवाले तथा सदा उनके अधीन रहनेवाले सेवकोंका सेवाधर्म अत्यन्त कठिन है। सूतके संकेतपर नर्तन करनेवाली कठपुतलीकी भाँति वे सदा परतन्त्र रहते हैं।) | | गत्वा कथं तस्य पुरस्त्वया च<br>मयापि वक्तव्यमिदं कठोरम्।<br>गच्छन्तु पातालमितश्च सर्वे<br>दत्त्वाथ रत्नानि धनं सुराणाम्॥ ३१ | अतः उन महिषासुरके सामने जाकर मेरे अथवा तुम्हारे द्वारा ऐसा अप्रिय वचन कैसे कहा जा सकता है कि देवताओंके धन एवं रत्न वापस करके सभी दानव यहाँसे पातालको लौट चलें?॥ ३१॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—20 A
| ६१० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
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| ( प्रियं हि वक्तव्यमसत्यमेव<br>न च प्रियं स्याद्धितकृत्तु भाषितम्।<br>सत्यं प्रियं नो भवतीह कामं<br>मौनं ततो बुद्धिमतां प्रतिष्ठितम्॥ )<br><br>न फल्गुवाक्यैः प्रतिबोधनीयो<br>राजा तु वीरैरिति नीतिशास्त्रम्॥ ३२ | (सदा प्रिय वचन बोलना चाहिये, किंतु वह असत्य न हो। वचन हितकारक तथा प्रिय होना चाहिये। यदि वचन सत्य होनेपर भी प्रिय न हो तो ऐसी दशामें बुद्धिमान् मनुष्योंके लिये मौन ही श्रेष्ठ होता है।)<br>नीतिशास्त्रका कथन है कि वीर पुरुषोंको चाहिये कि वे मिथ्या वचनोंद्वारा राजाको धोखेमें न डालें॥ ३२॥ | | न नूनं तत्र गन्तव्यं हितं वा वक्तुमादरात्।<br>प्रष्टुं वापि गते राजा कोपयुक्तो भविष्यति॥ ३३<br><br>इति सञ्चिन्त्य कर्तव्यं युद्धं प्राणस्य संशये।<br>स्वामिकार्यं परं मत्वा मरणं तृणवत्तथा॥ ३४ | [सत्य बात तो यह है कि] आदरके साथ हितकी बात कहने अथवा पूछनेके लिये हमलोगोंको वहाँ नहीं चलना चाहिये। वहाँ जानेपर राजा महिषासुर कोपाविष्ट हो जायँगे। यह विचारकर अब हमलोगोंको यहाँ युद्ध ही करना चाहिये। जहाँ प्राणका संशय हो वहाँ स्वामीके कार्यको मुख्य मानकर मृत्युको तृणसदृश समझना चाहिये॥ ३३-३४॥ | | व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य तौ वीरौ संस्थितौ युद्धतत्परौ।<br>धनुर्बाणधरौ तत्र सन्नद्धौ रथसङ्गतौ॥ ३५ | व्यासजी बोले—इस प्रकार विचार करके वे दोनों वीर युद्धके लिये तत्पर हो गये और कवच धारण करके हाथोंमें धनुष-बाण लेकर रथपर आरूढ हो देवीके सामने आ डटे॥ ३५॥ | | प्रथमं तु बिडालाख्यः सप्तबाणान्मुमोच ह।<br>असिलोमा स्थितो दूरे प्रेक्षकः परमास्त्रवित्॥ ३६ | सर्वप्रथम बिडालाख्यने देवीके ऊपर सात बाण चलाये। अस्त्र चलानेमें अत्यन्त निपुण असिलोमा दूर जाकर दर्शकके रूपमें खड़ा हो गया॥ ३६॥ | | चिच्छेद तांस्तथाप्राप्तानम्बिका स्वशरैः शरान्।<br>बिडालाख्यं त्रिभिर्बाणैर्जघान च शिलाशितैः॥ ३७ | भगवती जगदम्बाने अपने बाणोंसे बिडालाख्यके द्वारा चलाये गये उन बाणोंको काट डाला और पत्थरपर घिसकर तीक्ष्ण बनाये गये तीन बाणोंसे बिडालाख्यपर आघात किया॥ ३७॥ | | प्राप्य बाणव्यथां दैत्यः पपात समराङ्गणे।<br>मूर्च्छितोऽथ ममाराशु दानवो दैवयोगतः॥ ३८ | उन बाणोंकी असह्य वेदनासे पीड़ित होकर वह दैत्य समरभूमिमें गिर पड़ा, उसे मूर्च्छा आ गयी और कालयोगसे वह मर गया॥ ३८॥ | | बिडालाख्यं हतं दृष्ट्वा रणे शक्तिशरोत्करैः।<br>असिलोमा धनुष्पाणिः संस्थितो युद्धतत्परः॥ ३९<br><br>ऊर्ध्वं सव्यं करं कृत्वा तामुवाच मितं वचः।<br>देवि जानामि मरणं दानवानां दुरात्मनाम्॥ ४०<br><br>तथापि युद्धं कर्तव्यं पराधीनेन वै मया।<br>महिषो मन्दबुद्धिश्च न जानाति प्रियाप्रिये॥ ४१ | इस प्रकार भगवतीके बाणसमूहोंसे रणमें बिडालाख्यको मारा गया देखकर असिलोमा भी हाथमें धनुष लेकरके युद्ध करनेके लिये तैयार होकर सामने आ गया और दाहिना हाथ ऊपर उठाकर अभिमानपूर्वक बोला—हे देवि! मैं जानता हूँ कि सभी दुराचारी दानव मारे जायँगे, फिर भी पराधीन होनेके कारण मुझे युद्ध करना ही होगा। वह मन्दबुद्धि महिषासुर अपने प्रिय तथा अप्रियके विषयमें नहीं जानता॥ ३९—४१॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—20 B
| अ० १५ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६११ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तदग्रे नैव वक्तव्यं हितं चैवाप्रियं मया।<br>मर्त्तव्यं वीरधर्मेण शुभं वाप्यशुभं भवेत्॥ ४२<br><br>दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम्।<br>पतन्ति दानवास्तूर्णं तव बाणहता भुवि॥ ४३ | उसके सामने हितकर वचन भी यदि अप्रिय है तो मुझे नहीं बोलना चाहिये। अब वीरधर्मके अनुसार मर जाना ही मेरे लिये उचित है—वह चाहे शुभ हो अथवा अशुभ। मैं तो दैवको ही बलवान् मानता हूँ, अनर्थकारी पुरुषार्थको धिक्कार है, तभी तो आपके बाणोंसे हत होकर दानव पृथ्वीपर गिरते जा रहे हैं॥ ४२-४३॥ |
| इत्युक्त्वा शरवृष्टिं स चकार दानवोत्तमः।<br>देवी चिच्छेद तान्बाणैरप्राप्तांस्तु निजान्तिके॥ ४४<br><br>अन्यैर्विव्याध तं तूर्णमसिलोमानमाशुगैः।<br>वीक्षितामरसङ्घैश्च कोपपूर्णानना तदा॥ ४५<br><br>शुशुभे दानवः कामं बाणैर्विद्धतनुः किल।<br>स्रवद्रुधिरधारः स प्रफुल्लः किंशुको यथा॥ ४६ | ऐसा कहकर दानवश्रेष्ठ असिलोमा बाणवृष्टि करने लगा। देवीने अपने पासतक न पहुँचे हुए उन बाणोंको अपने बाणोंसे काट डाला और अपने अन्य शीघ्रगामी बाणोंसे असिलोमाको शीघ्रतापूर्वक बींध डाला। उस समय आकाशमें स्थित देवताओंने देखा कि भगवतीका मुखमण्डल क्रोधसे भर उठा है। देवीके बाणोंसे बिंधे शरीरवाला तथा बहती हुई रुधिरकी धारासे युक्त वह दैत्य ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो पुष्पित हुआ पलाशका वृक्ष हो॥ ४४-४६॥ |
| असिलोमा गदां गुर्वी लौहीमुद्यम्य वेगतः।<br>दुद्राव चण्डिकां कोपात्सिंहं मूर्ध्नि जघान ह॥ ४७<br><br>सिंहोऽपि नखराघातैस्तं ददार भुजान्तरे।<br>अगणय्य गदाघातं कृतं तेन बलीयसा॥ ४८ | अब असिलोमा लोहेकी बनी एक विशाल गदा लेकर बड़ी तेजीसे चण्डिकाकी ओर दौड़ा और क्रोधपूर्वक सिंहके सिरपर उसने गदासे प्रहार कर दिया। परंतु देवीके सिंहने उस बलवान् दानवके द्वारा किये गये गदा-प्रहारकी कुछ भी परवाह न करके अपने नखोंद्वारा उसके वक्षःस्थलको फाड़ डाला॥ ४७-४८॥ |
| उत्पत्य तरसा दैत्यो गदापाणिः सुदारुणः।<br>सिंहमूर्ध्नि समारुह्य जघान गदयाम्बिकाम्॥ ४९ | तब उस महाविकराल दैत्यने हाथमें गदा लिये ही बड़े वेगसे उछलकर सिंहके मस्तकपर सवार हो भगवतीके ऊपर गदासे प्रहार किया॥ ४९॥ |
| कृतं तेन प्रहारं तु वञ्चयित्वा विशांपते।<br>खड्गेन शितधारेण शिरश्चिच्छेद कण्ठतः॥ ५०<br><br>छिन्ने शिरसि दैत्येन्द्रः पपात तरसा क्षितौ।<br>हाहाकारो महानासीत्सैन्ये तस्य दुरात्मनः॥ ५१ | हे राजन्! उसके द्वारा किये गये प्रहारको रोककर देवीने तेज धारवाली तलवारसे उसका मस्तक गर्दनसे अलग कर दिया। इस प्रकार मस्तक कट जानेपर वह दानवराज तुरंत गिर पड़ा। अब उस दुरात्माकी सेनामें हाहाकार मच गया॥ ५०-५१॥ |
| जय देवीति देवास्तां तुष्टुवुर्जगदम्बिकाम्।<br>देवदुन्दुभयो नेदुर्जगुश्च नृप किन्नराः॥ ५२ | हे राजन्! देवीकी जय हो—ऐसा कहकर देवतागण भगवतीकी स्तुति करने लगे। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और किन्नरगण देवीका यशोगान करने लगे॥ ५२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 20 C
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे असिलोमबिडालाख्यवधवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥
| ६१२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
|---|
| निहतौ दानवौ वीक्ष्य पतितौ च रणाङ्गणे।<br>निहताः सैनिकाः सर्वे तत्र केसरिणा बलात्॥ ५३<br><br>भक्षिताश्च तथा केचिन्निःशेषं तद्रणं कृतम्।<br>भग्नाः केचिद् गता मन्दा महिषं प्रति दुःखिताः॥ ५४<br><br>चुक्रुशू रुरुदुश्चैव त्राहि त्राहीति भाषणैः।<br>असिलोमबिडालाख्यौ निहतौ नृपसत्तम॥ ५५<br><br>अन्ये ये सैनिका राजन् सिंहेन भक्षिताश्च ते।<br>एवं ब्रुवन्तो राजानं तदा चक्रुश्च वैशसम्॥ ५६ | मारे गये उन दोनों दैत्योंको समरांगणमें गिरा हुआ देखकर शेष सम्पूर्ण सैनिकोंको सिंहने अपने पराक्रमद्वारा मार गिराया और कुछ दानवोंको खा डाला और इस प्रकार उस युद्धभूमिको दानवोंसे रहित कर दिया। कुछ अंग-भंग हुए मूर्ख दानव दुःखी होकर महिषासुरके पास पहुँचे और 'रक्षा कीजिये-रक्षा कीजिये'—ऐसा कहते हुए वे चीखने-चिल्लाने तथा रोने लगे—'हे नृपश्रेष्ठ! असिलोमा और बिडालाख्य दोनों ही मारे गये। हे राजन्! अन्य जो भी सैनिक थे, उन्हें सिंह खा गया' ऐसा कहते हुए उन्होंने राजाको दुःखमें डाल दिया॥ ५३—५६॥ | | तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां महिषो दुर्मनास्तदा।<br>बभूव चिन्ताकुलितो विमना दुःखसंयुतः॥ ५७ | उनकी बात सुनकर महिषासुर खिन्नमनस्क, चिन्तासे व्याकुल, उदास तथा दुःखी हो गया॥ ५७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे असिलोमबिडालाख्यवधवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥
अथ षोडशोऽध्यायः
महिषासुरका रणभूमिमें आना तथा देवीसे प्रणय-याचना करना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| तेषां तद्वचनं श्रुत्वा क्रोधयुक्तो नराधिपः।<br>दारुकं प्राह तरसा रथमानय मेऽद्भुतम्॥ १<br><br>सहस्रखरसंयुक्तं पताकाध्वजभूषितम्।<br>आयुधैः संयुतं शुभ्रं सुचक्रं चारूकूबरम्॥ २ | उन सैनिकोंकी बात सुनकर राजा महिष क्रोधित हो उठा और उसने सारथिसे कहा—हजार गधोंसे जुते हुए, ध्वजा तथा पताकाओंसे सुशोभित, अनेक प्रकारके आयुधोंसे परिपूर्ण, सुन्दर चक्कों तथा जुएसे विभूषित तथा प्रकाशमान मेरा अद्भुत रथ तुरंत ले आओ॥ १-२॥ |
| सूतोऽपि रथमानीय तमुवाच त्वरान्वितः।<br>राजन् रथोऽयमानीतो द्वारि तिष्ठति भूषितः॥ ३ | सारथिने भी तत्क्षण रथ लाकर उससे कहा—हे राजन्! सुसज्जित करके रथ ला दिया गया जो द्वारपर खड़ा है; यह सभी आयुधोंसे समन्वित तथा उत्तम आस्तरणोंसे युक्त है॥ ३ १/२॥ |
| सर्वायुधसमायुक्तो वरास्तरणसंयुतः।<br>आनीतं तं रथं ज्ञात्वा दानवेन्द्रो महाबलः॥ ४<br><br>मानुषं देहमास्थाय संग्रामे गन्तुमुद्यतः।<br>विचार्य मनसा चेति देवी मां प्रेक्ष्य दुर्मुखम्॥ ५<br><br>शृङ्गिणं महिषं नूनं विमना सा भविष्यति।<br>नारीणां च प्रियं रूपं तथा चातुर्यमित्यपि॥ ६ | रथके आनेकी बात सुनकर महाबली दानवराज महिष मनुष्यका रूप धारण करके युद्धभूमिमें जानेको तैयार हुआ। उसने अपने मनमें सोचा कि यदि मैं अपने महिषरूपमें जाऊँगा तो देवी मुझ शृंगयुक्त महिषको देखकर अवश्य उदास हो जायगी। स्त्रियोंको सुन्दर रूप और चातुर्य अत्यन्त प्रिय होता है। अतः आकर्षक रूप तथा चातुर्यसे सम्पन्न होकर मैं उसके |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—20 D
| अ० १६ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६१३ | | :--- | :--- |
| तस्माद्रूपं च चातुर्यं कृत्वा यास्यामि तां प्रति।<br>यथा मां वीक्ष्य सा बाला प्रेमयुक्ता भविष्यति॥ ७ | पास जाऊँगा, जिससे मुझे देखते ही वह युवती प्रेमयुक्त—मोहित हो जायगी। मुझे भी इसी स्थितिमें सुख होगा, अन्य किसी स्वरूपसे नहीं॥ ४—७ १/२ ॥ | | ममापि च तदैव स्यात्सुखं नान्यस्वरूपतः।<br>इति सञ्चिन्त्य मनसा दानवेन्द्रो महाबलः॥ ८<br><br>त्यक्त्वा तन्माहिषं रूपं बभूव पुरुषः शुभः।<br>सर्वायुधधरः श्रीमांश्चारूभूषणभूषितः॥ ९<br><br>दिव्याम्बरधरः कान्तः पुष्पबाण इवापरः।<br>रथोपविष्टः केयूरस्रग्वी बाणधनुर्धरः॥ १०<br><br>सेनापरिवृतो देवीं जगाम मदगर्वितः।<br>मनोज्ञं रूपमास्थाय मानिनीनां मनोहरम्॥ ११ | मनमें ऐसा विचार करके महाबली वह दानवेन्द्र महिषरूप छोड़कर एक सुन्दर पुरुष बन गया। वह सभी प्रकारके आयुधको धारण किये हुए था, वह ऐश्वर्यसम्पन्न था, वह सुन्दर आभूषणोंसे अलंकृत था, उसने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे। केयूर और हार पहने तथा हाथमें धनुष-बाण धारण किये रथपर बैठा हुआ वह कान्तिमान् दैत्य दूसरे कामदेवके सदृश प्रतीत हो रहा था। मानिनी सुन्दरियोंका भी मन हर लेनेवाला ऐसा सुन्दर रूप बनाकर वह मदोन्मत्त दैत्य अपनी विशाल सेनाके साथ देवीकी ओर चला॥ ८—११॥ | | तमागतं समालोक्य दैत्यानामधिपं तदा।<br>बहुभिः संवृतं वीरैर्देवी शङ्खमवादयत्॥ १२ | अनेक वीरोंसे घिरे हुए उस दैत्यराज महिषासुरको आया हुआ देखकर देवीने अपना शंख बजाया॥ १२॥ | | स शङ्खनिनादं श्रुत्वा जनविस्मयकारकम्।<br>समीपमेत्य देव्यास्तु तामुवाच हसन्निव॥ १३ | लोगोंको आश्चर्यचकित कर देनेवाली उस शंखध्वनिको सुनकर भगवतीके पास आकर वह दैत्य हँसता हुआ उनसे कहने लगा—॥ १३॥ | | देवि संसारचक्रेऽस्मिन्वर्तमानो जनः किल।<br>नरो वाथ तथा नारी सुखं वाञ्छति सर्वथा॥ १४<br><br>सुखं संयोगजं नृणां नासंयोगे भवेदिह।<br>संयोगो बहुधा भिन्नस्तानब्रवीमि शृणुष्व ह॥ १५<br><br>भेदान्सुप्रीतिहेतूत्थान्स्वभावोत्थाननेकशः ।<br>तत्र प्रीतिभवानादौ कथयामि यथामति॥ १६ | हे देवि! इस परिवर्तनशील जगत्में रहनेवाला व्यक्ति वह स्त्री अथवा पुरुष चाहे कोई भी हो, सब प्रकारसे सुख ही चाहता है। इस लोकमें सुख मनुष्योंको संयोगमें ही प्राप्त होता है, वियोगमें सुख होता ही नहीं। संयोग भी अनेक प्रकारका होता है। मैं उन भेदोंको बताता हूँ, सुनो। कहीं उत्तम प्रीतिके कारण संयोग हो जाता है और कहीं स्वभावतः संयोग हो जाता है, इनमें सर्वप्रथम मैं प्रीतिसे उत्पन्न होनेवाले संयोगके विषयमें अपनी बुद्धिके अनुसार बता रहा हूँ॥ १४—१६॥ | | मातापित्रोस्तु पुत्रेण संयोगस्तूत्तमः स्मृतः।<br>भ्रातृर्भ्रात्रा तथा योगः कारणान्मध्यमो मतः॥ १७<br><br>उत्तमस्य सुखस्यैव दातृत्वादुत्तमः स्मृतः।<br>तस्मादल्पसुखस्यैव प्रदातृत्वाच्च मध्यमः॥ १८ | माता-पिताका पुत्रके साथ होनेवाला संयोग उत्तम कहा गया है। भाईका भाईके साथ संयोग किसी प्रयोजनसे होता है, अतः वह मध्यम माना गया है। उत्तम सुख प्रदान करनेके कारण पहले प्रकारके संयोगको उत्तम तथा उससे कम सुख प्रदान करनेके कारण [दूसरे प्रकारके] संयोगको मध्यम कहा गया है॥ १७-१८॥ |
६१४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १६
६१४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १६
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| नाविकानां तु संयोगः स्मृतः स्वाभाविको बुधैः।<br>विविधावृतचित्तानां प्रसङ्गपरिवर्तिनाम्॥ १९<br><br>अत्यल्पसुखदातृत्वात्कनिष्ठोऽयं स्मृतो बुधैः।<br>अत्युत्तमस्तु संयोगः संसारे सुखदः सदा॥ २०<br><br>नारीपुरुषयोः कान्ते समानवयसोः सदा।<br>संयोगो यः समाख्यातः स एवात्युत्तमः स्मृतः॥ २१<br><br>अत्युत्तमसुखस्यैव दातृत्वात्स तथाविधः।<br>चातुर्यरूपवेषाद्यैः कुलशीलगुणैस्तथा॥ २२<br><br>परस्परसमुत्कर्षः कथ्यते हि परस्परम्।<br>तं चेत्करोषि संयोगं वीरेण च मया सह॥ २३<br><br>अत्युत्तमसुखस्यैव प्राप्तिः स्यात्ते न संशयः।<br>नानाविधानि रूपाणि करोमि स्वेच्छया प्रिये॥ २४<br><br>इन्द्रादयः सुराः सर्वे संग्रामे विजिता मया।<br>रत्नानि यानि दिव्यानि भवनेऽस्मिन्ममाधुना॥ २५<br><br>भुंक्ष्व त्वं तानि सर्वाणि यथेष्टं देहि वा यथा।<br>पट्टराज्ञी भवाद्य त्वं दासोऽस्मि तव सुन्दरि॥ २६<br><br>वैरं त्यजेऽहं देवैस्तु तव वाक्यान्न संशयः।<br>यथा त्वं सुखमाप्नोषि तथाहं करवाणि वै॥ २७<br><br>आज्ञापय विशालाक्षि तथाहं प्रकरोम्यथ।<br>चित्तं मे तव रूपेण मोहितं चारुभाषिणि॥ २८<br><br>आतुरोऽस्मि वरारोहे प्राप्तस्ते शरणं किल।<br>प्रपन्नं पाहि रम्भोरु कामबाणैः प्रपीडितम्॥ २९<br><br>धर्माणामुत्तमो धर्मः शरणागतरक्षणम्।<br>त्वदीयोऽस्म्यसितापाङ्गि सेवकोऽहं कृशोदरि॥ ३०<br><br>मरणान्तं वचः सत्यं नान्यथा प्रकरोम्यहम्।<br>पादौ नतोऽस्मि तन्वङ्गि त्यक्त्वा नानायुधानि ते॥ ३१ | विविध विचारोंसे युक्त चित्तवाले तथा प्रसंगवश एकत्रित नौकामें बैठे हुए लोगोंके मिलनेको विद्वानोंने स्वाभाविक संयोग कहा है। बहुत कम समयके लिये सुख प्रदान करनेके कारण विद्वानोंके द्वारा इसे कनिष्ठ संयोग कहा गया है॥ १९ ½॥<br><br>अत्युत्तम संयोग संसारमें सदा सुखदायक होता है। हे कान्ते! समान अवस्थावाले स्त्री-पुरुषका जो संयोग है, वही अत्युत्तम कहा गया है। अत्युत्तम सुख प्रदान करनेके कारण ही उसे उस प्रकारका संयोग कहा गया है। चातुर्य, रूप, वेष, कुल, शील, गुण आदिमें समानता रहनेपर परस्पर सुखकी अभिवृद्धि कही जाती है॥ २०—२२ ½॥<br><br>यदि तुम मुझ वीरके साथ संयोग करोगी तो तुम्हें अत्युत्तम सुखकी प्राप्ति होगी; इसमें सन्देह नहीं है। हे प्रिये! मैं अपनी रुचिके अनुसार अनेक प्रकारके रूप धारण कर लेता हूँ। मैंने इन्द्र आदि सभी देवताओंको संग्राममें जीत लिया है। मेरे भवनमें इस समय जो भी दिव्य रत्न हैं, उन सबका तुम उपभोग करो; अथवा इच्छानुसार उसका दान करो। अब तुम मेरी पटरानी बन जाओ। हे सुन्दरि! मैं तुम्हारा दास हूँ॥ २३—२६॥<br><br>तुम्हारे कहनेसे मैं देवताओंसे वैर करना भी छोड़ दूँगा; इसमें सन्देह नहीं है। तुम्हें जैसे भी सुख मिलेगा, मैं वही करूँगा। हे विशालनयने! अब तुम मुझे आज्ञा दो और मैं उसका पालन करूँ। हे मधुरभाषिणि! मेरा मन तुम्हारे रूपपर मोहित हो गया है॥ २७-२८॥<br><br>हे सुन्दरि! मैं [तुम्हें पानेके लिये] व्याकुल हूँ, इसलिये इस समय तुम्हारी शरणमें आया हूँ। हे रम्भोरु! कामबाणसे आहत मुझ शरणागतकी रक्षा करो। शरणमें आये हुएकी रक्षा करना सभी धर्मोंमें उत्तम धर्म है। श्याम नेत्रोंवाली हे कृशोदरि! मैं तुम्हारा सेवक हूँ। मैं मरणपर्यन्त सत्य वचनका पालन करूँगा, इसके विपरीत नहीं करूँगा। हे तन्वंगि! नानाविध आयुधोंको त्यागकर मैं तुम्हारे चरणोंमें अवनत हूँ॥ २९—३१॥ |
| अ० १६ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६१५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दयां कुरु विशालाक्षि तप्तोऽस्मि काममार्गणैः।<br>जन्मप्रभृति चार्वङ्गि दैन्यं नाचरितं मया ॥ ३२<br><br>ब्रह्मादीनीश्वरान्प्राप्य त्वयि तद्विदधाम्यहम्।<br>चरितं मम जानन्ति रणे ब्रह्मादयः सुराः ॥ ३३<br><br>सोऽप्यहं तव दासोऽस्मि मन्मुखं पश्य भामिनि। | हे विशालाक्षि! मैं कामदेवके बाणोंद्वारा सन्तप्त हो रहा हूँ, अतः तुम मेरे ऊपर दया करो। हे सुन्दरि! जन्मसे लेकर आजतक मैंने ब्रह्मा आदि देवताओंके समक्ष भी दीनता नहीं प्रदर्शित की, किंतु तुम्हारे समक्ष आज उसे प्रकट कर रहा हूँ। ब्रह्मा आदि देवता समरांगणमें मेरे चरित्रको जानते हैं। हे भामिनि! वही मैं आज तुम्हारी दासता स्वीकार करता हूँ, मेरी ओर देखो ॥ ३२–३३ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इति ब्रुवाणं तं दैत्यं देवी भगवती हि सा ॥ ३४<br><br>प्रहस्य सस्मितं वाक्यमुवाच वरवर्णिनी। | व्यासजी बोले— ऐसा कहते हुए उस दैत्य महिषासुरसे हँसकर अनुपम सौन्दर्यमयी भगवती मुसकानके साथ यह वचन कहने लगीं ॥ ३४ १/२ ॥ |
| देव्युवाच<br>नाहं पुरुषमिच्छामि परं पुरुषं विना ॥ ३५<br><br>तस्य चेच्छाम्यहं दैत्य सृजामि सकलं जगत्।<br>स मां पश्यति विश्वात्मा तस्याहं प्रकृतिः शिवा ॥ ३६<br><br>तत्सान्निध्यवशादेव चैतन्यं मयि शाश्वतम्।<br>जडाहं तस्य संयोगात्प्रभवामि सचेतना ॥ ३७ | देवी बोलीं— मैं परमपुरुषके अतिरिक्त अन्य किसी पुरुषको नहीं चाहती। हे दैत्य! मैं उनकी इच्छाशक्ति हूँ, मैं ही सारे संसारकी सृष्टि करती हूँ। वे विश्वात्मा मुझे देख रहे हैं; मैं उनकी कल्याणमयी प्रकृति हूँ। निरन्तर उनके सांनिध्यके कारण ही मुझमें शाश्वत चेतना है। वैसे तो मैं जड़ हूँ, किंतु उन्हींके संयोगसे मैं चेतनायुक्त हो जाती हूँ जैसे चुम्बकके संयोगसे साधारण लोहेमें भी चेतना उत्पन्न हो जाती है ॥ ३५–३७ १/२ ॥ |
| अयस्कान्तस्य सान्निध्यादयस्सचेतना यथा।<br>न ग्राम्यसुखवाञ्छा मे कदाचिदपि जायते ॥ ३८<br><br>मूर्खस्त्वमसि मन्दात्मन् यत्स्त्रीसङ्गं चिकीर्षसि।<br>नरस्य बन्धनार्थाय शृङ्खला स्त्री प्रकीर्तिता ॥ ३९<br><br>लोहबद्धोऽपि मुच्येत स्त्रीबद्धो नैव मुच्यते।<br>किमिच्छसि च मन्दात्मन् मूत्रागारस्य सेवनम् ॥ ४०<br><br>शमं कुरु सुखाय त्वं शमात्सुखमवाप्स्यसि।<br>नारीसङ्गे महद्दुःखं जानन्किं त्वं विमुह्यसि ॥ ४१ | मेरे मनमें कभी भी विषयभोगकी इच्छा नहीं होती। हे मन्दबुद्धि! तुम मूर्ख हो जो कि स्त्रीसंग करना चाहते हो; पुरुषको बाँधनेके लिये स्त्री जंजीर कही गयी है। लोहेसे बँधा हुआ मनुष्य बन्धनमुक्त हो भी सकता है, किंतु स्त्रीके बन्धनमें बँधा हुआ प्राणी कभी नहीं छूटता। हे मूर्ख! मूत्रागार (गुह्य अंग)-का सेवन क्यों करना चाहते हो? सुखके लिये मनमें शान्ति धारण करो। शान्तिसे ही तुम सुख प्राप्त कर सकोगे। स्त्रीसंगसे बहुत दुःख मिलता है—इस बातको जानते हुए भी तुम अज्ञानी क्यों बनते हो? ॥ ३८–४१ ॥ |
| त्यज वैरं सुरैः सार्धं यथेष्टं विचरावनौ।<br>पातालं गच्छ वा कामं जीवितेच्छा यदस्ति ते ॥ ४२<br><br>अथवा कुरु संग्रामं बलवत्यस्मि साम्प्रतम्।<br>प्रेषिताहं सुरैः सर्वैस्तव नाशाय दानव ॥ ४३ | तुम देवताओंके साथ वैरभाव छोड़ दो और पृथ्वीपर इच्छानुसार विचरण करो। यदि जीवित रहनेकी तुम्हारी अभिलाषा हो तो पाताललोक चले जाओ अथवा मेरे साथ युद्ध करो। इस समय मुझमें पूर्ण शक्ति विद्यमान है। हे दानव! सभी देवताओंने तुम्हारा नाश करनेके लिये मुझे यहाँ भेजा है ॥ ४२–४३ ॥ |
| ६१६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सत्यं ब्रवीमि येनाद्य त्वया वचनसौहृदम्।<br>दर्शितं तेन तुष्टास्मि जीवन्गच्छ यथासुखम्॥ ४४<br><br>सतां सप्तपदी मैत्री तेन मुञ्चामि जीवितम्।<br>मरणेच्छास्ति चेद्युद्धं कुरु वीर यथासुखम्॥ ४५<br><br>हनिष्यामि महाबाहो त्वामहं नात्र संशयः। | मैं तुमसे यह सत्य कह रही हूँ, तुमने वाणीद्वारा सौहार्दपूर्ण भाव प्रदर्शित किया है, अतः मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ। अब तुम जीवित रहते ही सुखपूर्वक यहाँसे चले जाओ। केवल सात पग साथ चलनेपर ही सज्जनोंमें मैत्री हो जाती है, इसी कारण मैं तुम्हें जीवित छोड़ दे रही हूँ। हे वीर! यदि मरनेकी ही इच्छा हो तो तुम मेरे साथ आनन्दसे युद्ध कर सकते हो। हे महाबाहो! मैं तुम्हें युद्धमें मार डालूँगी; इसमें संशय नहीं है॥ ४४-४५ ½ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तस्या वचः श्रुत्वा दानवः काममोहितः॥ ४६<br><br>उवाच श्लक्ष्णया वाचा मधुरं वचनं ततः।<br>बिभेम्यहं वरारोहे त्वां प्रहर्तुं वरानने॥ ४७<br><br>कोमलां चारुसर्वाङ्गीं नारीं नरविमोहिनीम्।<br>जित्वा हरिहरादींश्च लोकपालांश्च सर्वशः॥ ४८<br><br>किं त्वया सह युद्धं मे युक्तं कमललोचने। | व्यासजी बोले— भगवतीका यह वचन सुनकर कामसे मोहित दानव [पुनः] मधुर वाणीमें मीठी बातें करने लगा— हे सुन्दरि! हे सुमुखि! कोमल, सुन्दर अंगोंवाली तथा पुरुषोंको मोह लेनेवाली तुझ युवतीके ऊपर प्रहार करनेमें मुझे भय लगता है। हे कमललोचने! विष्णु, शिव आदि बड़े-बड़े देवताओं और सब लोकपालोंपर विजय प्राप्त करके क्या अब तुम्हारे साथ मेरा युद्ध करना उचित होगा?॥ ४६—४८ ½॥ |
| रोचते यदि चार्वङ्गि विवाहं कुरु मां भज॥ ४९<br><br>नोचेद् गच्छ यथेष्टं ते देशं यस्मात्समागता।<br>नाहं त्वां प्रहरिष्यामि यतो मैत्री कृता त्वया॥ ५०<br><br>हितमुक्तं शुभं वाक्यं तस्माद् गच्छ यथासुखम्।<br>का शोभा मे भवेदन्ते हत्वा त्वां चारुलोचनाम्॥ ५१<br><br>स्त्रीहत्या बालहत्या च ब्रह्महत्या दुरत्यया। | हे सुन्दर अंगोंवाली! यदि तुम्हारी इच्छा हो तो मेरे साथ विवाह कर लो और मेरा सेवन करो; अन्यथा तुम जहाँसे आयी हो, उसी देशमें इच्छानुसार चली जाओ। मैं तुम्हारे साथ मित्रता कर चुका हूँ, इसलिये तुमपर प्रहार नहीं करूँगा। यह मैंने तुम्हारे लिये हितकर तथा कल्याणकारी बात बतायी है; इसलिये तुम सुखपूर्वक यहाँसे चली जाओ। सुन्दर नेत्रोंवाली तुझ रमणीका वध करनेसे मेरी कौन-सी गरिमा बढ़ जायगी? स्त्रीहत्या, बालहत्या और ब्रह्महत्याका पाप बहुत ही जघन्य होता है॥ ४९—५१ ½॥ |
| गृहीत्वा त्वां गृहं नूनं गच्छाम्यद्य वरानने॥ ५२<br><br>तथापि मे फलं न स्याद् बलाद्भोगसुखं कुतः।<br>प्रब्रवीमि सुकेशि त्वां विनयावनतो यतः॥ ५३<br><br>पुरुषस्य सुखं न स्यादृते कान्तामुखाम्बुजात्।<br>तत्तथैव हि नारीणां न स्याच्च पुरुषं विना॥ ५४ | हे वरानने! वैसे तो मैं तुम्हें बलपूर्वक पकड़कर अपने घर निश्चितरूपसे ले जा सकता हूँ, किंतु बलप्रयोगसे मुझे सच्चा सुख नहीं मिलेगा, उसमें भोगसुख कैसे प्राप्त हो सकता है? अतएव हे सुकेशि! मैं बहुत विनीतभावसे तुमसे कह रहा हूँ कि जैसे पुरुषको अपनी प्रियाके मुखकमलके बिना सुख नहीं मिलता, उसी प्रकार स्त्रियोंको भी पुरुषके बिना सुख नहीं मिलता॥ ५२—५४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितयां पञ्चमस्कन्धे
| अ० १६ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६१७ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| संयोगे सुखसम्भूतिर्वियोगे दुःखसम्भवः।<br>कान्तासि रूपसम्पन्ना सर्वाभरणभूषिता॥ ५५<br><br>चातुर्यं त्वयि किं नास्ति यतो मां न भजस्यहो।<br>तवोपदिष्टं केनेदं भोगानां परिवर्जनम्॥ ५६<br><br>वञ्चितासि प्रियालापे वैरिणा केनचित्त्विह।<br>मुञ्चाग्रहमिमं कान्ते कुरु कार्यं सुशोभनम्॥ ५७<br><br>सुखं तव ममापि स्याद्विवाहे विहिते किल।<br>विष्णुर्लक्ष्म्या सहाभाति सावित्र्या च सहात्मभूः॥ ५८<br><br>रुद्रो भाति च पार्वत्या शच्या शतमखस्तथा।<br>का नारी पतिहीना च सुखं प्राप्नोति शाश्वतम्॥ ५९<br><br>येन त्वमसितापाङ्गि न करोषि पतिं शुभम्।<br>कामः क्वादद्य गतः कान्ते यस्त्वां बाणैः सुकोमलैः॥ ६०<br><br>मादनैः पञ्चभिः कामं न ताडयति मन्दधीः।<br>मन्येऽहमिव कामोऽपि दयावांस्त्वयि सुन्दरि॥ ६१<br><br>अबलेति च मन्वानो न प्रेरयति मार्गणान्।<br>मनोभवस्य वैरं वा किमप्यस्ति मया सह॥ ६२<br><br>तेन च त्वय्यरालाक्षि न मुञ्चति शिलीमुखान्।<br>अथवा मेऽहितैर्देवैर्वारितोऽसौ झषध्वजः॥ ६३<br><br>सुखविध्वंसिभिस्तेन त्वयि न प्रहरत्यपि।<br>त्यक्त्वा मां मृगशावाक्षि पश्चात्तापं करिष्यसि॥ ६४<br><br>मन्दोदरीव तन्वङ्गि परित्यज्य शुभं नृपम्।<br>अनुकूलं पतिं पश्चात्सा चकार शठं पतिम्।<br>कामार्ता च यदा जाता मोहेन व्याकुलान्तरा॥ ६५ | संयोगमें सुख उत्पन्न होता है और वियोगमें दुःख। तुम सुन्दर, रूपवती और सभी आभूषणोंसे अलंकृत हो। [यह सब होते हुये भी] तुझमें चतुरता क्यों नहीं है, जिससे तुम मुझे स्वीकार नहीं कर रही हो? इस तरह भोगोंको छोड़ देनेका परामर्श तुम्हें किसने दिया है? हे मधुरभाषिणि! [ऐसा करके] किसी शत्रुने तुम्हें धोखा दिया है॥ ५५-५६½॥<br><br>हे कान्ते! अब तुम यह आग्रह छोड़ दो और अत्यन्त सुन्दर कार्य करनेमें तत्पर हो जाओ। विवाह सम्पन्न हो जानेपर तुम्हें और मुझे दोनोंको सुख प्राप्त होगा। विष्णु लक्ष्मीके साथ, ब्रह्मा सावित्रीके साथ, शंकर पार्वतीके साथ तथा इन्द्र शचीके साथ रहकर ही सुशोभित होते हैं। पतिके बिना कौन स्त्री चिरस्थायी सुख प्राप्त कर सकती है? हे सुन्दरि! [कौन-सा ऐसा कारण है] जिससे तुम मुझ-जैसे उत्तम पुरुषको अपना पति नहीं बना रही हो?॥ ५७-५९½॥<br><br>हे कान्ते! न जाने मन्दबुद्धि कामदेव इस समय कहाँ चला गया जो अपने अत्यन्त कोमल तथा मादक पंचबाणोंसे तुम्हें आहत नहीं कर रहा है। हे सुन्दरि! मुझे तो लगता है कि कामदेव भी तुम्हारे ऊपर दयालु हो गया है और तुम्हें अबला समझते हुए वह अपने बाण नहीं छोड़ रहा है। हे तिरछी चितवनवाली सुन्दरि! सम्भव है उस कामदेवको भी मेरे साथ कुछ शत्रुता हो, इसीलिये वह तुम्हारे ऊपर बाण न चलाता हो। अथवा यह भी हो सकता है कि मेरे सुखका नाश करनेवाले मेरे शत्रु देवताओंने उस कामदेवको मना कर दिया हो, इसीलिये वह तुम्हारे ऊपर [अपने बाणोंसे] प्रहार नहीं कर रहा है॥ ६०-६३½॥<br><br>हे मृगशावकके समान नेत्रोंवाली! मुझे त्यागकर तुम मन्दोदरीकी भाँति पश्चात्ताप करोगी, हे तन्वंगि! पतिरूपमें प्राप्त सुन्दर तथा अनुकूल राजाका त्याग करके बादमें वह मन्दोदरी जब कामार्त तथा मोहसे व्याकुल अन्तःकरणवाली हो गयी, तब उसने एक धूर्तको अपना पति बना लिया था॥ ६४-६५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितयां पञ्चमस्कन्धे महिषद्वारा देवीप्रबोधनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
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</div>| ६१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ |
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अथ सप्तदशोऽध्यायः
महिषासुरका देवीको मन्दोदरी नामक राजकुमारीका आख्यान सुनाना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| इति श्रुत्वा वचस्तस्य देवी पप्रच्छ दानवम्।<br>का सा मन्दोदरी नारी कोऽसौ त्यक्तो नृपस्तया ॥ १ | [हे महाराज!] उसका यह वचन सुनकर भगवतीने उस दानवसे पूछा—वह स्त्री मन्दोदरी कौन थी और वह राजा कौन था, जिसे उसने त्याग दिया था? ॥ १ ॥ |
| शठः को वा नृपः पश्चात्तन्मे ब्रूहि कथानकम्।<br>विस्तरेण यथा प्राप्तं दुःखं वनितया पुनः ॥ २ | बादमें उसने जिसे पति बनाया, वह धूर्त राजा कौन था? उस स्त्रीको पुनः जिस प्रकार दुःख मिला हो, वह कथानक विस्तारपूर्वक बताओ ॥ २ ॥ |
| महिष उवाच | महिषासुर बोला— |
| सिंहलो नाम देशोऽस्ति विख्यातः पृथिवीतले।<br>घनपादपसंयुक्तो धनधान्यसमृद्धिमान् ॥ ३ | पृथवीतलपर विख्यात सिंहल नामक एक देश है। उसमें बहुत ही घने-घने वृक्ष हैं और वह धन-धान्यसे समृद्ध है ॥ ३ ॥ |
| चन्द्रसेनाभिधस्तत्र राजा धर्मपरायणः।<br>न्यायदण्डधरः शान्तः प्रजापालनतत्परः ॥ ४<br><br>सत्यवादी मृदुः शूरस्तितिक्षुर्नीतिसागरः।<br>शास्त्रवित्सर्वधर्मज्ञो धनुर्वेदेऽतिनिष्ठितः ॥ ५ | वहाँ चन्द्रसेन नामका राजा राज्य करता था, जो बड़ा धर्मात्मा, शान्तस्वभाव, प्रजापालनमें तत्पर, न्यायपूर्वक शासन-कार्य करनेवाला, सत्यवादी, मृदु स्वभाववाला, वीर, सहिष्णु, नीतिशास्त्रका सागर, शास्त्रवेत्ता, सब धर्मोंका ज्ञाता और धनुर्वेदमें अत्यन्त प्रवीण था ॥ ४-५ ॥ |
| तस्य भार्या वरारोहा सुन्दरी सुभगा शुभा।<br>सदाचारातिसुमुखी पतिभक्तिपरायणा ॥ ६<br><br>नाम्ना गुणवती कान्ता सर्वलक्षणसंयुता।<br>सुषुवे प्रथमे गर्भे पुत्रीं सा चातिसुन्दरीम् ॥ ७ | उसकी भार्या भी रूपवती, सुन्दरी, सौभाग्यशालिनी, सद्गुणी, सदाचारिणी, अत्यन्त सुन्दर मुखवाली, पतिभक्तिमें लीन रहनेवाली, मनोहर और सभी उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थी। उसका नाम गुणवती था। उसने प्रथम गर्भसे एक अति सुन्दर कन्याको जन्म दिया ॥ ६-७ ॥ |
| पिता चातीव सन्तुष्टः पुत्रीं प्राप्य मनोरमाम्।<br>मन्दोदरीति नामास्याः पिता चक्रे मुदान्वितः ॥ ८ | उस मनोरम कन्याको पाकर पिता बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्होंने बड़े हर्षके साथ उसका नाम मन्दोदरी रखा ॥ ८ ॥ |
| इन्दोः कलेव चात्यर्थं ववृधे सा दिने दिने।<br>दशवर्षा यदा जाता कन्या चातिमनोहरा ॥ ९ | वह कन्या चन्द्रमाकी कलाके समान दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। अत्यन्त मनोहारिणी वह कन्या जब दस वर्षकी हुई, तब उसके वरके लिये राजा चन्द्रसेन प्रतिदिन चिन्तित रहने लगे ॥ ९ ½ ॥ |
| वरार्थं नृपतिश्चिन्तामवाप च दिने दिने।<br>मद्रदेशाधिपः शूरः सुधन्वा नाम पार्थिवः ॥ १०<br><br>तस्य पुत्रोऽतिमेधावी कम्बुग्रीवोऽतिविश्रुतः।<br>ब्राह्मणैः कथितो राज्ञे स युक्तोऽस्या वरः शुभः ॥ ११<br><br>सर्वलक्षणसम्पन्नः सर्वविद्यार्थपारगः। | उस समय मद्रदेशके अधिपति सुधन्वा नामवाले एक पराक्रमी नरेश थे। कम्बुग्रीव नामसे अति विख्यात उनका एक पुत्र था, जो बहुत मेधावी था। ब्राह्मणोंने राजा चन्द्रसेनसे कहा कि कम्बुग्रीव उस कन्याके योग्य वर है। वह सुन्दर, सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा समस्त विद्याओंमें पारंगत है ॥ १०-११ ½ ॥ |