ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
तृतीय उद्योतः ३२७
ध्वन्यालोकः
तेन ध्वनेः प्रभेदेषु सर्वेष्वेवास्ति रम्यता ॥
विच्छित्तिशोभिनैकेन भूषणेनेव कामिनी ।
पदद्योत्येन सुकवेर्ध्वनिना भाति भारती ॥'
इति परिकरश्लोकाः ॥ १ ॥
( यस्त्वलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यो ध्वनिर्वर्णपदादिषु ।
वाक्ये सङ्घटनायां च स प्रबन्धेऽपि दीप्यते ॥ २ ॥
जिस प्रकार कामिनी विशेष शोभा वाले (विच्छित्तिशोभिना) एक ही आभूषण
से शोभित होने लगती है उसी प्रकार सुकवि की वाणी पद से द्योतित होने वाली
ध्वनि से शोभित होने लगती है ।
ये परिकर-श्लोक हैं ॥ १ ॥
परन्तु जो अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि वर्ण, पद आदि में होता है वह वाक्य में,
संघटना में और प्रबन्ध में भी दीप्त होता है ॥ २ ॥
लोचनम्
वहति तेन हेतुना सर्वेषु प्रकारेषु निरूपितस्य पदमात्रावभासिनोऽपि पदप्रका-
शस्यापि ध्वने रम्यतास्ति स्मारकत्वेऽपि पदानामिति समन्वयः । अपिशब्दः
काकाक्षिन्यायेनोभयत्रापि सम्बध्यते । अधुना चारुत्वप्रतीतौ पदस्यान्वयव्य-
तिरेकौ दर्शयति—विच्छित्तीति ॥ १ ॥
एवं कारिकां व्याख्याय तदसङ्गृहीतमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यं प्रपञ्चयितुमाह—
यस्त्विति । तुशब्दः पूर्वभेदेभ्योऽस्य विशेषद्योतकः । वर्णसमुदायश्च पदम् ।
तत्समुदायो वाक्यम् । सङ्घटना पदगता वाक्यगता च । सङ्घटितवाक्यसमुदायः
कारण इस प्रकार इष्ट अर्थ की स्मृति चारुत्व अर्पित करती है उस कारण सब प्रकारों
में निरूपित, पदमात्र से अवभासित होने वाले भी पदप्रकाश ध्वनि की रम्यता पदों
के स्मारक होने पर भी है, यह (श्लोकार्थ का) समन्वय है । 'भी' शब्द ('अपि' )
'काकाक्षिगोलक' न्याय (अर्थात् जिस प्रकार कौए का एक ही अक्षिगोल दोनों ओर का
काम करता है उस प्रकार) से दोनों ओर लगेगा । अब चारुत्व की प्रतीति में पद का
अन्वय-व्यतिरेक दिखाते हैं—विशेष शोभा (विच्छित्ति)—॥ १ ॥
इस प्रकार कारिका की व्याख्या करके उसके द्वारा असङ्गृहीत अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य
का प्रपञ्च करने के लिए कहते हैं—परन्तु जो—। 'परन्तु' ('तु') शब्द पहले के प्रभेदों
से इसका विशेष द्योतक है, वर्णों का समुदाय 'पद' होता है, उन (पदों) का समुदाय
'वाक्य' होता है, संघटना पदगत और वाक्यगत होती है, संघटित वाक्यों का समुदाय
३२८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्र वर्णानामनर्थकत्वाद्व्योतकत्वमसम्भवीत्याशङ्क्येदमूच्यते— शषौ सरेफसंयोगो ढकारश्चापि भूयसा। विरोधिनः स्युः शृङ्गारे ते न वर्णा रसच्युतः ॥ ३ ॥ त एव तु निवेश्यन्ते बीभत्साद्यौ रसे यदा। तदा तं दीपयन्त्येव ते न वर्णा रसच्युतः ॥ ४ ॥ उनमें, वर्णों के अनर्थक होने के कारण द्योतकत्व असम्भव है, यह आशङ्का करके कहते हैं— श, ष, रेफ के साथ संयोग, और ढकार बहुत बार (प्रयुक्त होने पर) शृङ्गार में विरोधी हैं, इसलिए वर्ण रस को प्रवाहित करने वाले नहीं (सिद्ध) होते हैं ॥३॥ परन्तु वे ही जब बीभत्स आदि रस में निवेशित किये जाते हैं तब उस (रस) को दीपित ही करते हैं, इसलिए वर्ण रस को प्रवाहित करने वाले नहीं होते हैं ॥ ४ ॥ लोचनम् प्रबन्धः इत्यभिप्रायेण वर्णादीनां यथाक्रममुपादानम् आदिशब्देन पदैकदेश- पदद्वित्यादीनां ग्रहणम् । सप्तम्या निमित्तत्वमुक्तम् । दीप्ततेऽवभासते सकलका- व्यावभासकतयेति पूर्ववत्काव्यविशेषत्वं समर्थितम् ॥ २ ॥ भूयसेति प्रत्येकमभिसम्बध्यते । तेन शकारो भूयसेत्यादि व्याख्यातव्यम् । रेफप्रधानस्संयोगः र्कहंद्रं इत्यादिः । विरोधिन इति । परुषा वृत्तिर्विरोधिनी शृङ्गारस्य । यतस्ते वर्णा भूयसा प्रयुज्यमाना न रसांश्च्योतन्ति स्रवन्ति । यदि वा तेन शृङ्गारविरोधित्वेन हेतुना वर्णाः शषादयो रसाच्छृङ्गाराच्च्यवन्ते तं न व्यञ्जयन्तीति व्यतिरेक उक्तः । अन्वयमाह—त एव त्विति । शादयः । तमिति । बीभत्सादिकं रसम् । दीपयन्ति द्योतयन्ति । कारिकाद्वयं तात्पर्येण 'प्रबन्ध' होता है, इस अभिप्राय से वर्ण आदि का क्रम से उपादान है। 'आदि' शब्द से पद के एकदेश, पदद्वितय आदि के ग्रहण हैं (……पद आदि में) सप्तमी से निमित्तत्व कहा है। दीप्त होता है अर्थात् सकल काव्य के अवभासकरूप से अवभासित होता है, इससे पूर्व की भांति काव्यविशेषत्व का समर्थन किया ॥ २ ॥ बहुत बार—। यह प्रत्येक के साथ लगेगा । इस लिए 'बहुत बार शकार' इत्यादि व्याख्यान करना चाहिए । रेफप्रधान संयोग र्कहंद्रं इत्यादि । विरोधी—। परुषा वृत्ति शृङ्गार की विरोधिनी है। क्यों कि वे वर्ण बहुत बार प्रयुज्यमान होकर रसों को प्रवाहित नहीं करते । अथवा ('तेन' अर्थात्) शृङ्गार के विरोधी होने के कारण श, ष आदि वर्ण रस अर्थात् शृङ्गार से च्युत होजाते हैं, अर्थात् उसे व्यञ्जित नहीं करते, यह 'व्यतिरेक' कहा गया । 'अन्वय' कहते हैं—वे ही—। अर्थात् श आदि (वर्ण) । उसको अर्थात् बीभत्स आदि रस को । दीपित करते हैं अर्थात् द्योतित करते हैं। दोनों
तृतीय उद्योतः ३२९
ध्वन्यालोकः
श्लोकद्वयेनान्वयव्यतिरेकाभ्यां वर्णानां द्योतकत्वं दर्शितं भवति ।
श्लोकद्वय से अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा वर्णों का द्योतकत्व मालूम होता है।
लोचनम्
व्याचष्टे-श्लोकद्वयेनेति । यथासंख्यप्रसङ्गपरिहारार्थं श्लोकाभ्यामिति न कृतम् ।
पूर्वश्लोकेन हि व्यतिरेक उक्तो द्वितीयेनान्वयः । अस्मिन्विषये शृङ्गारलक्षणे
शषादिप्रयोगः सुकवित्वमभिवाञ्छता न कर्तव्य इत्येवंफलत्वादुपदेशस्य
कारिकाकारेण पूर्वं व्यतिरेक उक्तः । न च सर्वथा न कर्तव्योऽपि तु वीभत्साद्यौ
कर्तव्य एवेति पश्चादन्वयः । वृत्तिकारेण त्वन्वयपूर्वको व्यतिरेक इति शैलीमनु-
सर्तुमन्वयः पूर्वमुपात्तः ।
एतदुक्तं भवति-यद्यपि विभावानुभावव्यभिचारिप्रतीतिसम्पदेव रसास्वादे
निवन्धनम् । तथापि विशिष्टश्रुतिकशब्दसमर्थ्यमानास्ते विभावादयस्तथा
भवन्तीति स्वसंवित्सिद्धमदः । तेन वर्णानामपि श्रुतिसमयोपलभ्यमानार्थान-
पेक्ष्यपि श्रोत्रैकग्राह्यो मृदुपारुषात्मा स्वभावो रसास्वादे सहकार्येत्र । अत एव च
सहकारितामेवाभिधातुं निमित्तसप्तमी कृता वर्णपदादिष्विति । न तु वर्णैरेव
रसाभिव्यक्तिः, विभावादिसंयोगाद्धि रसनिष्पत्तिरित्युक्तं बहुशः । श्रोत्रैक-
ग्राह्योऽपि च स्वभावो रसनिष्यन्दे व्यापियत एव, अपद्गीतध्वनिवत् पुष्कर-
कारिकाओं का तात्पर्य से व्याख्यान करते हैं— श्लोक द्वय से—। यथासंख्य का प्रसंग
हटाने के लिए ‘दोनों श्लोकों से’ (श्लोकाभ्यां) यह नहीं किया है, क्यों कि प्रथम
श्लोक से ‘व्यतिरेक’ कहा है, द्वितीय से ‘अन्वय’। शृङ्गार रूप इस विषय में श, ष
आदि का प्रयोग सुकवित्व की इच्छा वाला व्यक्ति नहीं करे, एतद्रूप उपदेश के फल
के कारण कारिकाकार ने पहले ‘व्यतिरेक’ कहा है। ऐसा नहीं कि सर्वथा नहीं करे,
अपि तु बीभत्स आदि में करे ही, यह बाद में ‘अन्वय’ है। परन्तु वृत्तिकार ने
‘अन्वयपूर्वक व्यतिरेक’ इस शैली के अनुसरण के लिए ‘अन्वय’ का पहले उपादान
किया है।
बात यह कही गई—यद्यपि विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी की प्रतीतिसम्पत्ति
ही रसास्वाद में कारण (निबन्धन) है, तथापि जिनका सुनना विशिष्ट होता है ऐसे
शब्दों द्वारा समर्प्यमाण होकर वे विभाव आदि उस प्रकार (अर्थात् रसास्वाद में निबन्धन)
होते हैं, यह स्वप्रतीतिसिद्ध बात है। इस कारण वर्णों का भी श्रवण के अवसर में
ज्ञायमान अर्थ की अपेक्षा नहीं रखने वाला भी एकमात्र श्रोत्रद्वारा ग्राह्य मृदु अथवा
परुषरूप स्वभाव रसास्वाद में सहकारी है ही। और इसी लिए सहकारिता के
अभिधान के लिए ‘वर्ण, पद आदि में’ यह निमित्तसप्तमी की है। न कि वर्णों से ही रस
की अभिव्यक्ति होती है, विभाव आदि के संयोग से रसनिष्पत्ति होती है, यह बहुत बार
कहा जा चुका है। एकमात्र श्रोत्रद्वारा ग्राह्य स्वभाव भी रसनिष्यन्द में व्यापृत होता
३३० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः (पदे चालक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य द्योतनं यथा- उत्कम्पिनी भयपरिस्खलितांशुकान्ता ते लोचने प्रतिदिशं विधुरे क्षिपन्ती । क्रूरेण दारुणतया सहसैव दग्धा धूमान्धितेन दहनेन न वीक्षितासि ॥ अत्र हि ते इत्येतत्पदं रसमयत्वेन स्फुटमेत्रावभासते सहृदयानाम् । पदावयवेन द्योतनं यथा— पद में अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का द्योतन, जैसे— भय के मारे छूट गए वस्त्र वालो, उन उत्कम्पशील विधुर आँखों को चारों ओर दौड़ाती हुई तुझे दारुण होने के कारण क्रूर अग्नि ने सहसा ही जला डाला, धुयें से अंधे (उस अग्नि) ने तुझे नहीं देखा । यहाँ 'उन' यह पद सहृदयों को रसमय रूप में स्पष्ट ही प्रतीत होता है । पद के अवयव से द्योतन, जैसे— लोचनम् वाद्यनियमितविशिष्टजातिकरणघाद्यनुकरणशब्दवच्च । पदे चेति । पदे च सती- त्यर्थः । तेन रसप्रतीतिर्विभावादेरेव । ते विभावादयो यदा विशिष्टेन केनापि पदेनार्प्यमाणा रसचमत्कारविधायिनो भवन्ति तदा पदस्यैवासौ महिमा समर्प्यत इति भावः । अत्र हीति । वासवदत्तादाहाकर्णनप्रबुद्धशोकनिर्भरस्य वत्सराजस्येदं परि- देवितवचनम् । तत्र च शोको नामेष्टजनविनाशप्रभव इति तस्य जनस्य ये भ्रूक्षेपकटाक्षप्रभृतयः पूर्वं रतिविभावतामवलम्बन्ते स्म त एवात्यन्तविनष्टाः सन्त इदानीं स्मृतिगोचरतया निरपेक्षभावत्वप्राणं करुणमुद्दीपयन्तीति स्थितम् । ही है, बिना पद के गीत की भांति और पुष्कर वाद्य में नियमित एवं विशिष्ट जाति, करण, घ आदि अनुकरण शब्द की भांति । पद में—। अर्थात् पद के होने पर । अतः रस की प्रतीति विभावादि से ही होती है । भाव यह कि वे विभाव आदि विशिष्ट किसी पद से अर्प्यमाण होकर रस-चमत्कार का विधान करते हैं तब पद की ही वह महिमा समर्पित होती है । यहां—। वासवदत्ता के जल जाने की खबर सुनने से उत्पन्न शोकनिर्भर वाले वत्सराज का यह परिदेवितवचन है । इसमें बात यह है कि शोक इष्ट जन के विनाश से उत्पन्न होता है, इस प्रकार उस व्यक्ति के जो भ्रूक्षेप, कटाक्ष प्रभृति पहले रति की विभावना का अवलम्बन करते थे वे ही अत्यन्त विनष्ट होते हुए अब स्मृतिगोचर होने के
तृतीय उद्योतः ३३१ ध्वन्यालोकः व्रीडायोगान्नतवदनया सन्निधाने गुरूणां बद्धोत्कम्पं कुचकलशयोर्र्मन्युमन्तर्निगृह्य। गुरुजनों (सास, असुर आदि) के समीप लज्जा के मारे सिर झुकाए, स्तन के कलशों में कम्प उत्पन्न कर देने वाले क्रोध को भीतर ही रोक कर और आँसू टपका लोचनम् ते लोचने इति तच्छब्दस्तल्लोचनगतस्वसंवेद्याव्यपदेश्यानन्तगुणस्मरणाकार- द्योतको रसस्यासाधारणनिमित्ततां प्राप्तः। तेन यत्केनचिच्चोदितं परिहृतं च तन्मिथ्यैव। तथाहि चोद्यम्—प्रक्रान्तपरामर्शकस्य तच्छब्दस्य कथमियति सामर्थ्यमिति। उत्तरं च—रसाविष्टोऽत्र पराम्रष्टेति। तदुभयमनुत्थानोपहतम्। यत्र ह्यनूद्दिश्यमानधर्मान्तरसाहित्ययोग्यधर्मयोगित्वं वस्तुनो यच्छब्देनाभिधाय तद्बुद्धिस्थधर्मान्तरसाहित्यं तच्छब्देन निर्वाह्यते। यत्रोच्यते—‘यत्तदोनित्य- सम्बन्धत्वम्’ इति, तत्र पूर्वप्रक्रान्तपरामर्शकत्वं तच्छब्दस्य। यत्र पुनर्निमित्तो- कारण निरपेक्षभावत्वप्राण करुण को उद्दीपित करते हैं। ‘उन आँखों को’ यहां ‘उन’ (‘तत्’) शब्द उसकी आँखों के स्वसंवेद्य एवं अव्यपदेश्य अनन्त गुणगणों के स्मरण के आकार का द्योतक बन कर रस का असाधारण निमित्त हो जाता है। इस लिए जो किसीने प्रश्न किया है और परिहार किया है, वह मिथ्या ही है। जैसा कि प्रश्न है—प्रक्रान्त के परामर्शक ‘तत्’ (‘उन’) शब्द की इतने में सामर्थ्य कैसे है? और उत्तर है—परामर्श करने वाला यहां रसाविष्ट है। ये दोनों अवसर न मिलने से (अनुत्थान के कारण) उपहत (वेकार) हैं। क्योंकि¹ जहां ‘यत्’ शब्द से वस्त्र का अनूद्दिश्यमान धर्मान्तर के साहित्ययोग्य धर्म का योगित्व अभिधान करके उस बुद्धिस्थ धर्मान्तर के साहित्य (सम्बन्ध) को ‘तत्’ शब्द के द्वारा बोध करते हैं, जहां कहते हैं— ‘यत्’ और ‘तत्’ का नित्य सम्बन्ध है, वहां ‘तत्’ शब्द पहले के प्रक्रान्त का परामर्शक होता है। फिर जहां ‘तत्’ शब्द किसी कारण से लाए गए स्मरण-विशेष के आकार का १. लोचनकार के कहने का आशय यह है कि ‘तत्’ शब्द का प्रयोग दो प्रकार से होता है। एक तो पूर्व प्रक्रान्त के परामर्श के लिए और दूसरा किसी निमित्त से प्राप्त स्मरण-विशेष के आकार की सूचना के लिए। जहां पहले प्रकार से प्रयोग होता है वहां ‘यत्तदोर्नित्यं सम्बन्धः’ इस नियम के अनुसार ‘यत्’ शब्द का होना अनिवार्य होता है, न होने पर आक्षेप कर लिया जाता है। किन्तु जहां किसी कारणवश प्राप्त स्मरण-विशेष के आकार का ‘तत्’ शब्द सूचक होता है वहाँ ‘यत्’ के प्रयोग की आवश्यकता नहीं होती। प्रस्तुत उदाहरण में ‘ते लोचने’ का ‘तत्’ शब्द दूसरे प्रकार से प्रयुक्त हुआ है, अर्थात् यहाँ उस नायिका के नेत्रों के स्वसंवेद्य एवं अव्यपदेश्य अनन्त गुणों के स्मरण के आकार का द्योतक या सूचक है। किन्तु दूसरे किसी ने भ्रमवश प्रथम प्रकार से यहाँ ‘तत्’ शब्द का प्रयोग समझकर जो समाधान किया है वह सर्वथा ठीक नहीं।
३३२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तिष्ठेत्युक्तं किमिव न तया यत्समुत्सृज्य बाष्पं मय्यासक्तश्चकितहरिणीहारिनेत्रत्रिभागः ॥ कर उसने चकित हरिणी की भांति मनोहर नेत्रों का तीसरा भाग (अर्थात् कटाक्ष) मुझमें लगा दिया तो क्या उसने 'ठहरो' यह नहीं कहा ? लोचनम् पनतस्मरणविशेषाकारसूचकत्वं तच्छब्दस्य 'स घट' इत्यादौ यथा, तत्र का परामर्शकत्वकथेत्यास्तामलीकपरामर्शकैः पण्डितम्मन्यैः सह विवादेन । उत्कम्पिनीत्यादिना तदीयभयानुभावोत्प्रेक्षणम् । मयाऽनिर्वाहितप्रतीकार- मिति शोकावेशस्य विभावः । ते इति सातिशयविभ्रमैकायतनरूपे अपि लोचने विधुरे कान्दिशीकतया निर्लङ्के क्षिपन्ती कस्त्राता कासावार्यपुत्र इति तयो- र्लोचनयोस्तादृशी चावस्थेति सुतरां शोकोद्द्दीपनम् । क्रूरेणेति । तस्यायं स्वभाव एव । किं कुरुतां तथापि च धूमेनान्धीकृतो द्रष्टुमसमर्थ इति न तु सविवेकस्येदृशानुचितकारित्वं सम्भाव्यते, इति स्मर्यमाणं तदीयं सौन्दर्य- मिदानीं सातिशयशोकावेशविभावतां प्राप्तमिति । ते शब्दे सति सर्वोऽयमर्थो निर्व्यूढः । एवं तत्र तत्र व्याख्यातव्यम् । सूचक होता है, जैसे 'वह घट' इत्यादि में, वहां परामर्शकत्व की बात क्या ? मिथ्या परामर्श करने वाले पण्डितम्मन्य जनों के साथ विवाद व्यर्थ है ! 'उत्कम्पशील' इत्यादि से उसके भय के अनुभावों का उत्प्रेक्षण है । जब कि मैंने कोई उसका प्रतीकार नहीं किया, यह शोकावेश का विभाव है । 'उन' अर्थात् अतिशय विलासों के एकमात्र आयतन रूप भी भय के मारे विधुर नेत्रों को दौड़ाती हुई 'कौन बचाने वाला है, वह आर्यपुत्र कहां हैं ?' यह उन आंखों की अवस्था पूर्ण रूप से शोक का उद्दीपन है । क्रूर—। उसका यह स्वभाव ही है । क्या करें, तथापि धुयें से अन्धा होने के कारण देख नहीं सका; विवेकशील व्यक्ति ऐसा अनुचित नहीं कर सकता । इस प्रकार स्मरण किया जाता हुआ उसका (रत्नावली का) सौन्दर्य इस समय अतिशय शोकावेश का विभाव बन रहा है । 'उन' शब्द के होने पर यह सब अर्थ निर्वाह हो जाता है । इस प्रकार वहां-वहां व्याख्यान कर लेना चाहिए । आचार्य लिखते हैं कि जहाँ 'तत्' शब्द पूर्व प्रक्रान्त का परामर्शक होता है वहाँ दोनों का प्रयोग अनिवार्य है, जैसे, 'यो विद्वान् स पूज्यः' । यहाँ पर 'यत्' शब्द से अनुद्दिश्यमान धर्मान्तर पूज्यत्व के साथ सम्बन्धयोग्य धर्मान्तर विद्वत्त्व के सम्बन्ध का अभिधान करके उस बुद्धि धर्मान्तर विद्वत्त्व का साहित्य सम्बन्ध 'तत्' शब्द से परामर्श किया गया है । प्रस्तुत उदाहरण में लोचनकार के अनुसार 'ते' यह पद स्मरण विशेषाकार का सूचक होने के कारण, कि सहृदयों की रसप्रतीति में सहायक होता है, क्योंकि यहाँ इसी शब्द से करुण रस के अनुकूल विभावादि समर्प्यमाण होकर रस-चमत्कार को उत्पन्न करते हैं ।
तृतीय उद्योतः ३३३ ध्वन्यालोकः इत्यत्र त्रिभागशब्दः। वाक्यरूपश्चालक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यो ध्वनिः शुद्धोऽलङ्कारसङ्कीर्णश्चेति द्विधा मतः। तत्र शुद्धस्योदाहरणं यथा रामाभ्युदये—‘कृतककुपितैः’ इत्यादि यहाँ तीसरा भाग (‘त्रिभाग)’ शब्द। वाक्यरूप अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि ‘शुद्ध’ और ‘अलङ्कारसङ्कीर्ण’ यह दो प्रकार का माना गया है। उनमें ‘शुद्ध’ का उदाहरण, जैसे—रामाभ्युदय में ‘कृतककुपितैः०’ लोचनम् त्रिभागशब्द इति। गुरुजनमवधीर्यापि सा मां यथा तथापि साभिलाष- मन्युदैन्यगर्वमन्थरं विलोकितवतीत्येवं स्मरणेन परस्परहेतुकत्वप्राणप्रवास- विप्रलम्भोद्दीपनं त्रिभागशब्दसन्निधौ स्फुटं भातीति। वाक्यरूपश्चेति। प्रथमा- निर्देशेनाव्यतिरेकनिर्देशस्यायमभिप्रायः। वर्णपदतद्भागादिषु सत्स्वेवालक्ष्यक्रमो व्यङ्ग्यो निर्भासमानोऽपि समस्तकाव्यव्यापक एव निर्भासते, विभावादि- संयोगप्राणत्वात्। तेन वर्णादीनां निमित्तत्वमात्रमेव, वाक्यं तु ध्वनेरलक्ष्य- क्रमस्य न निमित्ततामात्रेण वर्णादिवदुपकारि, किं तु समग्रविभावादिप्रतिपत्ति- व्यापृतत्वाद्रसादिमयमेव तन्निर्भासत इति ‘वाक्ये’ इत्येतत्कारिकायां न निमित्तसप्तमीमात्रम्, अपि त्वनन्यत्र भावविषयार्थमपीति। शुद्ध इत्यर्थाल- ङ्कारेण केनाप्यसंमिश्रः। ‘तीसरा भाग’ (‘त्रिभाग’) शब्द—। गुरुजन की परवाह न करके भी वह मुझे जिस किसी प्रकार भी अभिलाष-सहित क्रोध, दैन्य एवं गर्व से मन्थर भाव से देखने लगी, इस प्रकार स्मरण से परस्पर हेतु होने से उत्पन्न होने वाले प्रवासविप्रलम्भ का उद्दीपन ‘तीसरा भाग’ (‘त्रिभाग’) शब्द के सन्निधान में स्पष्ट प्रतीत होता है। वाक्यरूप—। प्रथमा विभक्ति के निर्देश द्वारा अव्यतिरेक अर्थात् अभेद के बोधन का यह अभिप्राय है—वर्ण, पद और पदभाग आदि में निर्भासमान भी अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य समस्त काव्य में व्यापकरूप में ही निर्भासित होता है, क्यों कि विभाव आदि का संयोग उसका प्राण है। इस लिए वर्ण आदि निमित्तमात्र ही होते हैं, परन्तु वाक्य अलक्ष्यक्रम ध्वनि का निमित्ततामात्र से वर्ण आदि की भांति उपकार नहीं करता, किन्तु समग्र विभाव आदि की प्रतिपत्ति (ज्ञान) से व्यापृत होने के कारण वह (वाक्य) रसमय ही निर्भासित होता है, इस लिए ‘वाक्य में’ यह (दूसरी) कारिका में निमित्तार्थक सप्तमीमात्र नहीं है। अपि तु अन्यत्र विषय का अभाव है इस (अर्थ के बोध के लिए सप्तमी है)। ‘शुद्ध’ अर्थात् किसी भी अर्थालङ्कार से न मिला हुआ।
३३४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः श्लोकः । एतद्धि वाक्यं परस्परानुरागं परिपोषप्राप्तं प्रदर्शयत्सर्वत एव परं रसत्त्वं प्रकाशयति । इत्यादि श्लोक । यह वाक्य परिपुष्ट परस्परानुराग को प्रदर्शित करता हुआ सब ओर से उत्कृष्ट रसत्त्व को प्रकाशित करता है । लोचनम् कृतककुपितैर्बाष्पाम्भोभिः सदैन्यवलोकितै- र्वनमपि गता यस्य प्रीत्या धृतापि तथाम्बया । नवजलधरश्यामाः पश्यन्दिशो भवतीं विना कठिनहृदयो जीवत्येव प्रिये स तव प्रियः ॥ अत्र तथा तैस्तैः प्रकारैर्मात्रा धृतापीत्यनुरागपरवशतवेन गुरुवचनोल्लङ्घन- मपि त्वया कृतमिति । प्रिये प्रिय इति परस्परजीवितसर्वस्वाभिमानात्मको रतिस्थायिभाव उक्तः । नवजलधरेत्यसोढपूर्वप्रावृषेण्यजलदालोकनं विप्रलम्भो- द्दीपनविभावत्वेनोक्तम् । जीवत्येवेति सापेक्षभावता एवकारेण करुणावकाश- निराकरणायोक्ता । सर्वत एवेति । नात्रान्यतमस्य पदस्याधिकं किञ्चिद्रसव्यक्ति- हेतुत्वमित्यर्थः । रसत्त्वमिति । विप्रलम्भशृङ्गारात्मतत्त्वम् । [ कृतककुपितैर्बाष्पाम्भोभिः सदैन्यविलोकितै- र्वनमपि गता यस्य प्रीत्या धृताऽपि तथाऽम्बया । नवजलधरश्यामाः पश्यन् दिशो भवतीं विना कठिनहृदयो जीवत्येव प्रिये स तव प्रियः ॥ ] कृत्रिम कोपों से, अश्रुजलों से और दीनतापूर्ण निरीक्षणों से उस प्रकार माता के द्वारा रोके जाने पर भी जिसके प्रेमवश तू वन को भी चली आई, हे प्रिये ! नये बादलों से श्यामवर्ण दिशाओं को देखताहुआ तुम्हारे बिना कठिनहृदय वह प्रिय जी ही रहा है । यहां उस प्रकार उन उन प्रकारों से माता के द्वारा रोके जाने पर भी, अर्थात् अनुराग के परवश होने के कारण गुरुवचन का उल्लंघन भी तुमने किया । 'प्रिये' 'प्रिय', इससे एक दूसरे के जीवितसर्वस्व होने के अभिमान रूप रतिस्थायिभाव कहा गया है । 'नये बादल' इससे असह्य वर्षाकालीन बादलों का आलोकन विप्रलम्भ के उद्दीपनविभाव के रूप में कहा है । 'जी ही रहा है' 'ही' ( एवकार ) से यह सापेक्षभावता करुण रस के प्रसंग के निराकरण के लिए कही गई है । सब ओर से-। अर्थात् यहां कोई ऐसा पद नहीं जो कुछ ही रस की अभिव्यक्ति करता है । रसत्त्व अर्थात् विप्रलम्भशृङ्गार रूप आत्मतत्त्व ।
तृतीय उद्योतः ३३५ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः अलङ्कारान्तरसङ्कीर्णो यथा—'स्मरनवनदीपूरेणोढाः' इत्या दिश्लो- कः । अत्र हि रूपकेण यथोक्तव्यञ्जकलक्षणानुगतेन प्रसाधितो रसः सुतरामभिव्यज्यते ॥ ३-४ ॥ अलङ्कारान्तरसङ्कीर्ण, जैसे— 'स्मरनवनदीपूरेणोढाः' इत्यादि श्लोक । यहाँ व्यञ्जक यथोक्त लक्षणों से युक्त रूपक से अलङ्कृत रस अच्छे ढङ्ग से अभिव्यक्त होता है ॥ ३-४ ॥ लोचनम् स्मरनवनदीपूरेणोढाः पुनर्गुरुसेतुभिर्यदपि विधृतास्तिष्ठन्त्यारादपूर्णमनोरथाः । तदपि लिखितप्रख्यैरङ्गैः परस्परसन्मुखा नयननलिनीनालाानीतं पिबन्ति रसं प्रियाः ॥ रूपकेणेति । स्मर एव नवनदीपूरः प्रावृषेण्यप्रवाहः सरभसमेव प्रवृद्धत्वात् तेनोढाः परस्परसांमुख्यमबुद्धिपूर्वमेव नीताः । अनन्तरं गुरवः श्वश्रूप्रभृतय एव सेतवः, इच्छाप्रसररोधकत्वात् । अथ च गुरवोऽलङ्घ्याः सेतवस्तैः विधृताः प्रतिहतेच्छाः । अत एवापूर्णमनोरथास्तिष्ठन्ति । तथापि परस्परोन्मुखता- लक्षणेनान्योन्यतादात्म्येन स्वदेहे सकलवृत्तिनिरोधाल्लिखितप्रायैरङ्गैर्नयनान्येव नलिनीनालानि तैरानीतं रसं परस्पराभिलाषलक्षणमास्वादयन्ति परस्परा- भिलाषात्मकदृष्टिच्छटामिश्रीकारयुक्त्यापि कालमतिवाहयन्तीति । ननु नात्र [ स्मरनवनदीपूरेणोढाः पुनर्गुरुसेतुभि- र्यदपि विधृतास्तिष्ठन्त्यारादपूर्णमनोरथाः । तदपि लिखितप्रख्यैरङ्गैः परस्परमुन्मुखा नयननलिनीनालाानीतं पिबन्ति रसं प्रियाः ॥ ] काम की नयी नदी के प्रवाह में बहे जाते हुए, पुनः गुरु (गुरुजन, माता-पिता आदि, पक्ष में विशाल) के सेतु से रोके गए अपूर्णमनोरथ प्रिय (प्रेमी और प्रेमिका) यद्यपि दूर-दूर खड़े रहते हैं तथापि चित्रलिखित की भांति अंगों से उन्मुख होकर नेत्रों के मृणाल से लाए गए रस का परस्पर पान करते हैं । रूपक से—। काम ही नवनदीपूर अर्थात् वर्षाकालीन प्रवाह है, क्योंकि बड़े वेग से वह बढ़ जाता है, उसके द्वारा ऊढ अर्थात् बिना सोचे-विचारे ही एक दूसरे के सम्मुख हुए । अनन्तर, गुरु अर्थात् सास प्रभृति ही सेतु हैं, क्योंकि वे इच्छा के वेग को रोक देते हैं, और भी, गुरु अर्थात् अलङ्घ्य जो सेतु हैं उनके द्वारा रोके गए अर्थात् प्रतिहत इच्छा वाले । अत एव अपूर्णमनोरथ खड़े रहते हैं । तथापि परस्पर उन्मुखतारूप अन्योन्य तादात्म्य के द्वारा अपने शरीर में समस्त वृत्तियों का विरोध हो जाने पर लिखितप्राय अङ्गों से (उपलक्षण में तृतीया) नयनरूपी नलिनीनालों अर्थात् मृणालों द्वारा आनीत परस्पराभिलाषरूप रस का आस्वादन करते हैं, अर्थात् परस्पराभिलाषरूप दृष्टिच्छटा के मिश्रीकार की युक्ति से भी काल-यापन करते हैं । (शङ्का—) यहां रूपक का पूर्ण रूप से
३३६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यः सङ्घटनायां भासते ध्वनिरित्युक्तं तत्र सङ्घटना- स्वरूपमेव तावन्निरूप्यते— अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि संघटना में (भी) भासित होता है, यह कह चुके हैं, वहाँ संघटना का स्वरूप ही पहले निरूपण करते हैं— लोचनम् रूपकं निर्व्यूढं हंसचक्रवाकादिरूपेण नायकयुगलस्यारूपितत्वात् । ते हि हंसाद्या एकनलिनीनालानीतसलिलपानक्रीडादिषूचिता इत्याशङ्क्याह— यथोक्तव्यञ्जकेति । उक्तं हि पूर्वम्—'विवक्षातत्परत्वेन' इत्यादौ 'नातिनिर्वहणै- षिता' इति । प्रसाधित इति । विभावादिभूषणद्वारेण रसोऽपि प्रसाधित इत्यर्थः ॥ सङ्घटनायामिति भावे प्रत्ययः, वर्णादिवच्च निमित्तमात्रे सप्तमी । उक्तमिति । कारिकायाम् । निरूप्यत इति । गुणेभ्यो विविक्ततया विचार्यत इति यावत् । निर्वाह नहीं किया गया है, क्योंकि नायकयुगल का हंस, चक्रवाक आदि रूप से रूपण नहीं किया गया है, क्योंकि वे हंस आदि एक मृणाल से आनीत जल के पान की क्रीड़ा आदि कार्यों में काबिल होते हैं, यह आशंका करके कहते हैं—व्यंजक यथोक्तलक्षण—। पहले कह चुके हैं 'विवक्षातत्परत्वेन' इत्यादि में 'नातिनिर्वहणैषिता' अर्थात् किसी अलङ्कार के अति दूर तक निर्वाह की इच्छा न हो । अलंकृत—। अर्थात् विभाव आदि भूषण के द्वारा रस भी अलंकृत या प्रसाधित होता है ॥ ३-४ ॥ 'संघटना' यह भाव में प्रत्यय है और (पूर्व कारिका में) 'वर्ण' आदि की भांति निमित्त मात्र में 'सप्तमी' है । कही है—कारिका में । निरूपण करते हैं—अर्थात् गुणों से भिन्न रूप से विचार करते हैं । 'रसान्' (हंसों को) यह कारिका में द्वितीयार्थ का १. यहाँ ध्वनिकार 'संघटना' पर एक विस्तृत विचार प्रस्तुत करते हैं । ध्वनिकार से पूर्व आचार्य वामन ने 'रीति' के नाम को साहित्य-शास्त्र में प्रतिष्ठित किया था और 'रीति' को काव्य का आत्मा बताया था ('रीतिरात्मा काव्यस्य') । दण्डी ने रीति को 'मार्ग' कहा, किन्तु प्रसिद्धिवश उसका लक्षण नहीं किया । साहित्य-शास्त्र के आद्य आचार्य भामह के ग्रन्थ में इसका उल्लेख नहीं मिलता । आचार्य वामन ने 'विशिष्टपदरचना' को 'रीति' कहा है और 'विशेष' का अर्थ 'गुण' किया है। इस प्रकार गुणात्मक पदरचना ही 'रीति' है। वामन ने रीति को तीन प्रकार की माना है—वैदर्भी, गौडी और पाञ्चाली । ओज, प्रसाद आदि समग्र गुणों वाली रचना 'वैदर्भी' है, ओज और कान्ति गुणों वाली रचना 'गौडी' है और माधुर्य और सौकुमार्य से युक्त रचना 'पाञ्चाली' है । जिसमें सर्वथा समास का अभाव हो उसे शुद्ध वैदर्भी कहा है। आनन्दवर्धन की प्रस्तुत 'सङ्घटना' वामन की 'रीति' ही है, क्योंकि ये भी असमासा, मध्यम-समासा और दीर्घसमासा, तीन भेद करते हैं, जिनमें पदरचना का ही उपयोग है । आनन्दवर्धन ने रीति या सङ्घटना को इतना महत्त्व नहीं दिया जो वामन ने दिया, किन्तु आचार्य आनन्दवर्धन इतना अवश्य स्वीकार करते हैं कि वर्ण, पद आदि की भाँति सङ्घटना भी काव्य के आत्मा 'ध्वनि' को व्यञ्जित करती है, रस से उसका गहरा सम्बन्ध है ।
तृतीय उद्योतः ३३७ ध्वन्यालोकः असमसा समासेन मध्यमेन च भूषिता । तथा दीर्घसमासेति त्रिधा सङ्घटनोदिता ॥ ५ ॥ कैश्चित्—तां केवलमनूद्येदमूच्यते— गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन्व्यनक्ति सा । रसान्— सा सङ्घटना रसादीन् व्यनक्ति गुणानाश्रित्य तिष्ठन्तीति । अत्र च विकल्प्यं गुणानां सङ्घटनायाश्चैक्यं व्यतिरेको वा । व्यतिरेकेऽपि संघटना तीन प्रकार की कही है—असमासा, मध्यम-समासा तथा दीर्घसमासा ॥ कुछ लोगों ने उसका केवल अनुवाद करके यह कहते हैं— माधुर्य आदि गुणों का आश्रयण करके रहती हुई वह रसों को व्यक्त करती है । वह संघटना रस आदि को व्यक्त करती है गुणों का आश्रयण करके रहती हुई । यहाँ विकल्प करना चाहिए कि गुणों का और संघटना का ऐक्य (अभेद) है अथवा लोचनम् रसानिति कारिकायां द्वितीयार्थस्यायं पदम् । 'रसांस्तन्नियमे हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः' इति कारिकार्धम् । बहुवचनेनाद्यर्थः सङ्गृहीत इति दर्शयति— रसादीनिति । अत्र चेति । अस्मिन्नेव कारिकार्धे । विकल्पेनेदमर्थजातं कल्पयितुं व्याख्यातुं शक्यम्, किं तदित्याह—गुणानामिति । त्रयः पक्षा ये सम्भाव्यन्ते ते पद है । 'रसांस्तन्नियमे हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः' यह कारिकार्ध है । बहुवचन से 'आदि' अर्थ संगृहीत है, यह दिखाते हैं—रस आदि को—। यहां—। इसी कारिकार्ध में । विकल्प के द्वारा यह अर्थसमूह कल्पना, व्याख्यान किया जा सकता है, वह क्या है ? कहते हैं—गुणों के—। तीन १ पक्ष जो सम्भावित होते हैं व्याख्यान किए जा १. मुख्यरूप से सङ्घटना और गुणों का सम्बन्ध और सङ्घटना को रसाभिव्यक्ति का एक साधन, ये दो बातें प्रस्तुत ग्रन्थ में विवेचित हैं, इसकी आधारभूत कारिका का यह अंश है—'गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन् व्यनक्ति सा । रसान् ।' कारिका के 'गुणानाश्रित्य' इस निर्देश के अनुसार गुणों और सङ्घटना के सम्बन्ध को लेकर तीन विकल्प किए गए हैं—प्रथम विकल्प के अनुसार गुण और रीति का अभेद है, (भेद पक्ष स्वीकार करने पर) सङ्घटना के आश्रित गुण हैं अथवा गुण के आश्रित सङ्घटना है, ये दो विकल्प हैं । वामन ने रीति और गुण का अभेद माना है । इस अभेद पक्ष के अनुसार 'गुणानाश्रित्य' का अर्थ 'आत्मभूत गुणों का आश्रयण करके' । यद्यपि गुण और सङ्घटना का अभेद है तथापि 'शिंशपा के आश्रित वृक्षत्व' की भाँति स्वाभिन्न वस्तु का भी स्व से भेद परिकल्पित किया है । गुण और सङ्घटना में भेद मानने वाले भट्ट उद्भट आदि के अनुसार गुण सङ्घटना के धर्म हैं, और धर्म अपने धर्मी के आश्रित होते ही हैं इस लिए गुण २२ ध्व०
३३८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः द्वयी गतिः । गुणाश्रया सङ्घटना, सङ्घटनाश्रया वा गुणा इति । तत्रै- क्यपक्षे सङ्घटनाश्रयगुणपक्षे च गुणानात्मभूतानाधेयभूतान्वाश्रित्य तिष्ठन्ती सङ्घटना रसादीन् व्यनक्तीत्ययमर्थः । यदा तु नानात्वपक्षे गुणाश्रयसङ्घटनापक्षः तदा गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती गुणपरतन्त्रस्वभावा न तु गुणरूपैवेत्यर्थः । किं पुनरेवं विकल्पनस्य प्रयोजनमिति ? व्यतिरेक (भेद)। व्यतिरेक (भेद) में भी दो ढङ्ग हैं, गुणों के आश्रित संघटना है या संघटना के आश्रित गुण हैं। वहाँ, ऐक्य (अभेद) पक्ष में और संघटना के आश्रित गुणों के पक्ष में अर्थ यह होता है कि आत्मभूत अथवा आधेयभूत गुणों का आश्रयण करके रहती हुई संघटना रस आदि को व्यक्त करती है। परन्तु जब नानात्व (अर्थात् भेद) पक्ष में गुणों के आश्रित संघटना का पक्ष (मानते हैं) तब अर्थ होता है कि गुणों के आश्रयण करके रहती हुई, गुणों के परतंत्र स्वभाव वाली है, न कि गुण रूप ही है। फिर इस प्रकार विकल्प करने का प्रयोजन क्या है ? लोचनम् व्याख्यातुं शक्याः । कथ मत्याह—तत्रैक्यपक्ष इति । आत्मभूतानिति । स्वभाव- स्य कल्पनया प्रतिपादनार्थं प्रदर्शितभेदस्य स्वाश्रयवाचोयुक्तिर्दृश्यते शिंशपा- श्रयं वृक्षत्वमिति । आधेयभूतानिति । सङ्घटनाया धर्मा गुणा इति भट्टोद्भटादयः, धर्माश्च धर्म्याश्रिता इति प्रसिद्धो मार्गः। गुणपरतन्त्रेति । अत्र नाधाराधेय- सकते हैं। कैसे ? कहते हैं—वहां ऐक्यपक्ष में—। आत्मभूत—। स्वभाव के प्रतिपादन के लिए कल्पना से प्रदर्शित भेद वाली वस्तु का ‘स्वाश्रय’ कहने का ढङ्ग देखा जाता है, शिंशपा के आश्रित वृक्षत्व । आधेयभूत—। ‘भट्ट उद्भट’ आदि के अनुसार गुण संघटना के धर्म हैं और यह प्रसिद्ध मार्ग (मन्तव्य) है कि धर्म धर्मी के आश्रित होते हैं। गुणों के परतन्त्र—। यहां आश्रय का अर्थ आधाराधेयभाव नहीं है, क्योंकि गुणों में संघटना के आश्रित हैं। इसके अनुसार ‘गुणान् आधेयभूतान् आश्रित्य’ अर्थात् आधेयभूत गुणों का आश्रयण करके, यह अर्थ होगा। तीसरे विकल्प के अनुसार संघटना गुणों के आश्रित है, अर्थात् संघटना अपने आधारभूत गुणों का आश्रयण करती है (‘गुणानाश्रित्य’)। यह अन्तिम विकल्प आचार्य आनन्दवर्धन का अपना सिद्धान्त-पक्ष है। संघटना को गुणों के आश्रित मानते हुए वह उसे रसों का अन्यतम व्यञ्जक भी मानते हैं। ‘गुणानाश्रित्य’ इस कारिकांश को तीनों विकल्पों के अनुसार सङ्गत करके आचार्य ने तीनों के अनुसार सङ्घटना की रसव्याञ्जकता सूचित की है। सङ्घटना गुणों के आश्रित है, इसका अभिप्राय यह नहीं कि गुणों के साथ सङ्घटना का आधारा- धेयभाव है, क्योंकि गुणों में सङ्घटना नहीं रहती है। इस लिए सङ्घटना गुण के परतन्त्र होकर रहती है, उनकी वह मुखापेक्षिणी है। जैसे राजाश्रित प्रजावर्ग, राजा के परतन्त्र या मुखापेक्षी होकर रहता है। यह बात ‘लोचन’ में निर्दिष्ट है।
तृतीय उद्योतः ३३९ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः अभिधीयते—यदि गुणाः सङ्घटना चेत्येकं तत्त्वं सङ्घटनाश्रया वा गुणाः, तदा सङ्घटनाया इव गुणानामनियतविषयत्वप्रसङ्गः । गुणा- नां हि माधुर्यप्रसादप्रकर्षः करुणविप्रलम्भशृङ्गारविषय एव । रौद्राद्भु- तादिविषयमोजः । माधुर्यप्रसादौ रसभावतदाभासविषयावेवेति विषय- नियमो व्यवस्थितः, सङ्घटनायास्तु स विघटते । तथा हि शृङ्गारेऽपि दीर्घसमासा दृश्यते रौद्रादिष्वसमासा चेति । बताते हैं—यदि गुण और संघटना एक तत्त्व है अथवा संघटना के आश्रित गुण हैं, तब संघटना की भांति गुणों की अनियतता का प्रसंग होगा । क्योंकि गुणों का माधुर्यप्रसाद-प्रकर्ष करुण और विप्रलम्भ शृङ्गार में ही होता है । ओज के विषय रौद्र, अद्भुत आदि हैं । माधुर्य और प्रसाद (गुण) रस, भाव और भावाभास को ही विषय करते हैं, इस प्रकार विषय का नियम व्यवस्थित है, परन्तु सङ्घटना में वह (नियम) विघटित हो जाता है । जैसा कि शृङ्गार में भी दीर्घसमासा और रौद्र आदि में भी असमासा (संघटना) देखी जाती है । लोचनम् भाव आश्रयार्थः । न हि गुणेषु सङ्घटना तिष्ठतीति । तेन राजाश्रयः प्रकृतिवर्ग- इत्यत्र यथा राजाश्रयौचित्येनामात्यादिप्रकृतय इत्ययमर्थः, एवं गुणेषु परतन्त्र- स्वभावा तदायत्ता तन्मुखप्रेक्षिणी सङ्घटनेत्ययमर्थो लभ्यत इति भावः । सङ्घटनाया इवेति । प्रथमपक्षे तादात्म्येन समानयोगक्षेमत्वादितरत्र तु धर्मत्वेनेति भावः । भवत्वनियतविषयतेत्याशङ्क्याह—गुणानां हीति । हिशब्द- स्तुशब्दार्थे । न त्वेवमुपपद्यते, आपद्यते तु न्यायबलादित्यर्थः । स इति । योऽयं गुणेषु नियम उक्तोऽसावित्यर्थः । तथात्वे लक्ष्यदर्शनमेव हेतुत्वेनाह— तथा हीति । सङ्घटना नहीं रहती है । इसलिए 'प्रकृतिवर्ग राजा का आश्रित है' यहां जैसे राजा के आश्रय के औचित्य से अमात्य आदि प्रकृतियां हैं, यह अर्थ है, इस प्रकार गुणों में परतन्त्रस्वभाव अर्थात् उनके अधीन अर्थात् उनके मुंह ताकने वाली (अपेक्षा करने वाली) सङ्घटना है यह अर्थ प्राप्त होता है, यह भाव है । संघटना की भांति—। पहले पक्ष में तादात्म्य होने से योगक्षेम समान होगा और अन्यत्र (दूसरे पक्ष में) धर्म होने के कारण (योगक्षेम समान होगा), यह भाव है । अनियतविषयत्व हो (क्या हर्ज है?) यह आशङ्का करके कहते हैं—क्योंकि गुणों का—। 'क्योंकि' शब्द 'परन्तु' शब्द के अर्थ में है, अर्थात् न कि इस प्रकार उत्पन्न होगा, परन्तु न्यायबल से आपन्न होगा । वह—। अर्थात् जो यह गुणों में नियम कहा है वह । उस स्थिति में लक्ष्य का दर्शन ही हेतुरूप से कहते हैं—जैसा कि ।
३४० सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
तत्र शृङ्गारे दीर्घसमासा यथा—'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका'
इति । यथा वा—
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Ah, "अनवरतनयनजललवनि Napatan" -> "अनवरतनयनजललवनि Napatan": अनवरतनयनजललवनि Napatan -> No, "अनवरतनयनजललवनि Napatan" is अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
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अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> No! It's:
अनवरतनयनजललवनि Napatan?
Look at the characters:
अ-न-व-र-त-न-य-न-ज-ल-ल-व-नि-प-त-न-प-रि-मु-षि-त-प-त्त्र-ले-खं ते ।
So: अनवरतनयनजललवनि Napatan... no: अनवरतनयनजललवनि Napatan is अनवरतनयनजललवनि Napatan? Wait: अनवरतनयनजललवनि Napatan is अनवरतनयनजललवनि Napatan?
Let's read: अ न व र त न य न ज ल ल व नि प त न प रि मु षि त प त्त्र ले खं ते । -> अनवरतनयनजललवनि Napatan is अनवरतनयनजललवनि Napatan?
Wait: अ न व र त न य न ज ल ल व नि प त न प रि मु षि त प त्त्र ले खं ते । -> अनवरतनयनजललवनि Napatan?
No, it is:
अनवरतनयनजललवनि Napatan... -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> no:
अनवरतनयनजललवनि Napatan = अनवरतनयनजललवनि Napatan!
Wait:
अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
Look:
अ (a) न (na) व (va) र (ra) त (ta) न (na) य (ya) न (na) ज (ja) ल (la) ल (la) व (va) नि (ni) प (pa) त (ta) न (na) प (pa) रि (ri) मु (mu) षि (ṣi) त (ta) प (pa) त्त्र (ttra) ले (le) खं (khaṃ) ते (te) ।
So it is simply: अनवरतनयनजललवनि Napatan... -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
Wait, why am I hallucinating English word "Napatan"? Ah, निपतन (ni-pa-ta-na).
So the full compound is:
अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan ->
अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan!
Wait, निपतनपरिमुषितपत्त्रलेखं = निपतन + परिमुषित + पत्त्रलेखं!
Yes! अनवरतनयनजललवनि Napatan... -> अनवरतनयनजललवनि Napatan? No, अनवरतनयनजललवनि Napatan is not English, it was just a typo in my thoughts.
It is: अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan!
It is:
अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan ->
अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
Let's carefully trace each line:
३४० सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
तत्र शृङ्गारे दीर्घसमासा यथा—'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका'
इति । यथा वा—
अनवरतनयनजललवनि Napatan... -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan? No:
अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan ->
अ न व र त न य न ज ल ल व नि प त न प रि मु षि त प त्त्र ले खं ते ।
= अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
Wait, Hindi: 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan'
Look at : 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' ->
'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan'
Wait!
'अनवरतनयनजललवनि Napatan' in is:
'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' ->
अ न व र त न य न ज ल ल व नि प त न प रि मु षि त प त्त्र ले खं ते ।
= 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
Look:
अ - न - व - र - त - न - य - न - ज - ल - ल - व - नि - प - त - न - प - रि - मु - षि - त - प - त्त्र - ले - खं ते ।
Let's transcribe cleanly:
अनवरतनयनजललवनि Napatan... -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
Wait, it's just:
अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan
Line 5: अनवरतनयनजललवनि Napatan... = अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan ->
अ न व र त न य न ज ल ल व नि प त न प रि मु षि त प त्त्र ले खं ते ।
Let's spell it out: अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अ न व र त न य न ज ल ल व नि प त न प रि मु षि त प त्त्र ले खं ते ।
Line 6: करतलनिषण्णमबले वदनमिदं कं न तापयति ॥
Line 7: इत्यादौ । तथा रौद्रादिष्वप्यसमासा दृश्यते । यथा—'यो यः शस्त्रं
Line 8: विभर्ति स्वभुजगुरुमदः' इत्यादौ । तस्मान्न सङ्घटनास्वरूपाः, न च
Line 9: सङ्घटनाश्रया गुणाः ।
Line 10: ननु यदि सङ्घटना गुणानां नाश्रयस्तत्किमालम्बना एते परि-
Line 11: कल्प्यन्ताम् । उच्यते—प्रतिपादितमेवैषामालम्बनम् ।
Line 12: वहाँ, शृङ्गार में दीर्घसमासा, जैसे—'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका' अर्थात्
Line 13: 'मन्दारपुष्प की धूल से पिञ्जरित अलकों वाली' । अथवा जैसे—
Line 14: 'अनवरतनयनजललवनि Napatan...' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan...' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan...' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan...' = 'अनवरतनयनजललवनि Napatan...' Wait: 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' Line 14: 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> Let's just write: 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' -> 'अनवरतनयनजललवनि Napatan' Wait, why does my sub-brain keep generating English for the devanagari letters? अ = a न = na व = va र = ra त = ta न = na य = ya न = na ज = ja ल = la ल = la व = va नि = ni प = pa त = ta न = na प = pa रि = ri मु = mu षि = ṣi त = ta प = pa त्त्र = ttra ले = le खं = khaṃ ते = te
Devanagari: अनवरतनयनजललवनि Napatan -> अनवरतनयनजललवनि Napatan -> No, it's: अनवरतनयनजललवनि Napatan -> Wait: अ न व र त न य न ज ल ल व नि प त न प रि मु षि त प त्त्र ले खं ते । = अनवरतनयनजललवनि Napatan... Wait, it is: अनवरतनयनजललवनि Napatan? No! अ + न + व + र + त + न + य + न + ज + ल + ल + व + नि + प + त + न + प + रि + मु + षि + त + प + त्त्र + ले + खं = अनवरतनयनजललवनि Napatan... NO! It is: अ-न-व-र-त-न-य-न-ज-ल-ल-व-नि-प-त-न-प-रि-मु-षि-त-प-त्त्र-ले-खं = अनवरतनयनजललवनि Napatan... Wait! Why is there "Napatan"? It is अनवरतनयनजललवनि Napatan -> no! Let's assemble the Unicode: अ (U+0905) न (U+0928) व (U+0935) र (U+0930) त (U+0924) न (U+0928) य (U+092F) न (U+0928) ज (U+091C) ल (U+0932) ल (U+0932) व (U+0935) नि (U+0928 U+093F) प (U+092A) त (U+0924) न (U+0928) प (U+092A) रि (U+0930 U+093F) मु (U+092E U+0941) षि (U+0937 U+093F) त (U+0924) प (U+092A) त्त्र (U+0924 U+094D U+0924 U+094D U+0930 or U+0924 U+094D U+0930) ले (U+0932 U+0947) खं (U+0916 U+0902) ते (U+0924 U+0947) । (U+0964)
The word is: अनवरतनयनजललवनि Napatan? No, अनवरतनयनजललवनि Napatan -> Wait: नि (ni) + प (pa) + त (ta) + न (na) = निपतन! So the whole word is: अनवरतनयनजललवनिपतनपरिमुषितपत्त्रलेखं ते ।
Yes! It is अनवरतनयनजललवनिपतनपरिमुषितपत्त्रलेखं ते ।!
Line by line check: ३४० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्र शृङ्गारे दीर्घसमासा यथा—'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका' इति । यथा वा— अनवरतनयनजललवनिपतनपरिमुषितपत्त्रलेखं ते । करतलनिषण्णमबले वदनमिदं कं न तापयति ॥ इत्यादौ । तथा रौद्रादिष्वप्यसमासा दृश्यते । यथा—'यो यः शस्त्रं विभर्ति स्वभुजगुरुमदः' इत्यादौ । तस्मान्न सङ्घटनास्वरूपाः, न च सङ्घटनाश्रया गुणाः । ननु यदि सङ्घटना गुणानां नाश्रयस्तत्किमालम्बना एते परि- कल्प्यन्ताम् । उच्यते—प्रतिपादितमेवैषामालम्बनम् । वहाँ, शृङ्गार में दीर्घसमासा, जैसे—'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका' अर्थात् 'मन्दारपुष्प की धूल से पिञ्जरित अलकों वाली' । अथवा जैसे— 'अनवरतनयनजललवनिपतनपरिमुषितपत्त्रलेखं ते । करतलनिषण्णमबले वदनमिदं कं न तापयति ॥' अर्थात् हे अबले, तेरा यह निरन्तर अश्रुकणों के गिरते रहने से मिटे हुए पत्र- लेखों वाला एवं हाथ पर पड़ा मुख किसे दुखी नहीं करता ? इत्यादि में । उसी प्रकार रौद्र आदि में भी 'असमासा' देखी जाती है । जैसे—'यो यः शस्त्रं विभर्ति स्वभुजगुरुमदः' इत्यादि में । इस कारण गुण सङ्घटना-स्वरूप नहीं हैं और संघटना के आश्रित भी नहीं हैं । यदि सङ्घटना गुणों का आश्रय नहीं है तो इनका आलम्बन किसे माना जाय ? ( इस शङ्का पर ) कहते हैं—इनका आलम्बन प्रतिपादन किया ही जा चुका है । लोचनम् दृश्यत इत्युक्तं दर्शनस्थानमुदाहरणमासूत्रयति—तत्रेति । नात्र शृङ्गारः कश्चिदित्याशङ्क्य द्वितीयमुदाहरणमाह—यथा वेति । एषा हि प्रणयकुपित- नायिकाप्रसादनायोक्तिर्नायकस्येति । तस्मादिति । नैतद् व्याख्यानद्वयं कारिकायां युक्तमिति यावत् । किमालम्बना इति । शब्दार्थालम्बनत्वे हि तदलङ्कारेभ्यः को विशेष इत्युक्तं चिरन्तनैरिति भावः । प्रतिपादितमेवेति । अस्मन्मूलग्रन्थकृतेत्यर्थः । 'देखा जाता है' इस प्रकार उक्त देखे जाने का स्थान आसूत्रित करते हैं—वहां—। यहां कोई श्रृंगार नहीं है, यह आशङ्का करके दूसरा उदाहरण कहते हैं—अथवा जैसे—। प्रणयकुपित नायिका को प्रसन्न करने के लिए यह नायक की उक्ति है । इस कारण—। मतलब कि यह दोनों व्याख्यान कारिका में ठीक नहीं हैं । आलम्बन किसे—। भाव यह कि शब्द और अर्थ के आलम्बन होने पर उनके ( शब्द और अर्थ के ) अलङ्कारों से कौन भेद रह जायगा ? 'प्रतिपादन किया ही जा चुका है'—। अर्थात्
Everything matches correctly and cleanly.३४० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्र शृङ्गारे दीर्घसमासा यथा—'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका' इति । यथा वा— अनवरतनयनजललवनिपतनपरिमुषितपत्त्रलेखं ते । करतलनिषण्णमबले वदनमिदं कं न तापयति ॥ इत्यादौ । तथा रौद्रादिष्वप्यसमासा दृश्यते । यथा—'यो यः शस्त्रं विभर्ति स्वभुजगुरुमदः' इत्यादौ । तस्मान्न सङ्घटनास्वरूपाः, न च सङ्घटनाश्रया गुणाः । ननु यदि सङ्घटना गुणानां नाश्रयस्तत्किमालम्बना एते परि- कल्प्यन्ताम् । उच्यते—प्रतिपादितमेवैषामालम्बनम् । वहाँ, शृङ्गार में दीर्घसमासा, जैसे—'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालका' अर्थात् 'मन्दारपुष्प की धूल से पिञ्जरित अलकों वाली' । अथवा जैसे— 'अनवरतनयनजललवनिपतनपरिमुषितपत्त्रलेखं ते । करतलनिषण्णमबले वदनमिदं कं न तापयति ॥' अर्थात् हे अबले, तेरा यह निरन्तर अश्रुकणों के गिरते रहने से मिटे हुए पत्र- लेखों वाला एवं हाथ पर पड़ा मुख किसे दुखी नहीं करता ? इत्यादि में । उसी प्रकार रौद्र आदि में भी 'असमासा' देखी जाती है । जैसे—'यो यः शस्त्रं विभर्ति स्वभुजगुरुमदः' इत्यादि में । इस कारण गुण सङ्घटना-स्वरूप नहीं हैं और संघटना के आश्रित भी नहीं हैं । यदि सङ्घटना गुणों का आश्रय नहीं है तो इनका आलम्बन किसे माना जाय ? ( इस शङ्का पर ) कहते हैं—इनका आलम्बन प्रतिपादन किया ही जा चुका है । लोचनम् दृश्यत इत्युक्तं दर्शनस्थानमुदाहरणमासूत्रयति—तत्रेति । नात्र शृङ्गारः कश्चिदित्याशङ्क्य द्वितीयमुदाहरणमाह—यथा वेति । एषा हि प्रणयकुपित- नायिकाप्रसादनायोक्तिर्नायकस्येति । तस्मादिति । नैतद् व्याख्यानद्वयं कारिकायां युक्तमिति यावत् । किमालम्बना इति । शब्दार्थालम्बनत्वे हि तदलङ्कारेभ्यः को विशेष इत्युक्तं चिरन्तनैरिति भावः । प्रतिपादितमेवेति । अस्मन्मूलग्रन्थकृतेत्यर्थः । 'देखा जाता है' इस प्रकार उक्त देखे जाने का स्थान आसूत्रित करते हैं—वहां—। यहां कोई श्रृंगार नहीं है, यह आशङ्का करके दूसरा उदाहरण कहते हैं—अथवा जैसे—। प्रणयकुपित नायिका को प्रसन्न करने के लिए यह नायक की उक्ति है । इस कारण—। मतलब कि यह दोनों व्याख्यान कारिका में ठीक नहीं हैं । आलम्बन किसे—। भाव यह कि शब्द और अर्थ के आलम्बन होने पर उनके ( शब्द और अर्थ के ) अलङ्कारों से कौन भेद रह जायगा ? 'प्रतिपादन किया ही जा चुका है'—। अर्थात्
तृतीय उद्योतः ३४१ ध्वन्यालोकः तमर्थमवलम्बन्ते येऽङ्गिनं ते गुणाः स्मृताः । अङ्गाश्रितास्त्वलङ्कारा मन्तव्याः कटकादिवत् ॥ इति । अथवा भवन्तु शब्दाश्रया एव गुणाः, न चैषामनुप्रासादितुल्य- त्वम् । यस्मादनुप्रासादयोऽनपेक्षितार्थशब्दधर्मा एव प्रतिपादिताः । गुणास्तु व्यङ्ग्यविशेषावभासिवाच्यप्रतिपादनसमर्थशब्दधर्मा एव । शब्दधर्मत्वं चैषामन्याश्रयत्वेऽपि शरीराश्रयत्वमिव शौर्यादीनाम् । उस अङ्गी ( रस रूप ) अर्थ को जो अवलम्बन करते हैं वे गुण कहे जाते हैं और कटक आदि की भाँति अङ्गों के आश्रित रहने वालों को अलङ्कार मानना चाहिए । अथवा गुण शब्द के आश्रित ही हों, ( ऐसी स्थिति में ) इनकी अनुप्रास आदि से समानता नहीं है । क्योंकि अनुप्रास आदि अर्थ की अपेक्षा न रखने वाले शब्दमात्र के धर्म ही प्रतिपादन किए गए हैं, परन्तु गुण व्यङ्ग्यविशेष को अवभासित करने वाले वाच्य के प्रतिपादन में समर्थ शब्द के ही धर्म ( प्रतिपादन किए गए हैं )। और इनका शब्दधर्मत्व शौर्य आदि की भाँति अन्य के आश्रित होने पर भी शरीर के आश्रित होना ( माना गया है )। लोचनम् अथवेति । न ह्येकाश्रितत्वादेक्यं, रूपस्य संयोगस्य चैक्यप्रसङ्गात् । संयोगे द्वितीयमपेक्ष्यमिति चेत्—इहापि व्यङ्ग्योपकारकवाच्यापेक्षास्त्येवेति समानम् । न चायं मम स्थितः पक्षः, अपि तु भवत्वेषामविवेकिनामभिप्रायेणापि शब्द- धर्मत्वं शौर्यादीनामिव शरीरधर्मत्वम् । अविवेकी हि औपचारिकत्वविभागं विवेक्तुमसमर्थः । तथापि न कश्चिद्दोष इत्येवम्परमेतदुक्तमित्येतदाह—शब्द- धर्मत्वमिति । अन्याश्रयत्वेऽपीति । आत्मनिष्ठत्वेऽपीत्यर्थः । हमारे मूलग्रन्थकार द्वारा । अथवा—। एक ही ( वस्तु ) में आश्रित होने के कारण ही ( गुण और अलङ्कार का ) ऐक्य नहीं होगा, ( ऐसा होने पर ) रूप और संयोग दोनों का ऐक्य ( अभेद ) प्रसक्त होगा ( क्योंकि दोनों ही घट आदि द्रव्य के आश्रित हैं )। संयोग में दूसरे की अपेक्षा होती है तो ठीक है यहां भी व्यङ्ग्य के उपकारक वाच्य की अपेक्षा है ही अतः बात ( दोनों जगह ) बराबर है। यह ( गुणों का शब्दधर्मत्व ) मेरा पक्ष नहीं है, बल्कि इन अविवेकी जनों के अभिप्राय से भी ( गुणों का ) शब्दधर्मत्व शौर्य आदि के शरीरधर्मत्व की भांति मान लेते हैं। अविवेकी आदमी औपचारिकत्व का विवेक नहीं कर पाता । तथापि कोई दोष नहीं, इस अभिप्राय से यह कहा है, इस प्रकार यह कहते हैं—शब्दधर्म होना—। अन्य के आश्रित होने पर भी—। अर्थात् आत्मनिष्ठ होने पर भी ।
३४२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ननु यदि शब्दाश्रया गुणास्तत्सङ्घटनारूपत्वं तदाश्रयत्वं वा तेषां प्राप्तमेव । न ह्यसङ्घटिताः शब्दा अर्थविशेषप्रतिपाद्यरसाद्याश्रितानां गुणानामवाचकत्वादाश्रया भवन्ति । नैवम् ; वर्णपदव्यङ्ग्यत्वस्य रसादीनां प्रतिपादितत्वात् । यदि गुण शब्द के आश्रित हैं तब वे सङ्घटना रूप अथवा उसके आश्रित हो ही जायेंगे । क्योंकि असङ्घटित शब्द अर्थविशेष द्वारा प्रतिपाद्य रस आदि के आश्रित गुणों के अवाचक होने के कारण आश्रय नहीं होते । ऐसा नहीं; क्योंकि रस आदि का वर्ण और पद से व्यङ्ग्यत्व प्रतिपादित हो चुका है । लोचनम् शब्दाश्रया इति । उपचारेण यदि शब्देषु गुणास्तदेदं तात्पर्यम्—शृङ्गारा- दिरसाभिव्यञ्जकवाच्यप्रतिपादनसामर्थ्यमेव शब्दस्य माधुर्यम् । तच्च शब्दगतं विशिष्टघटनयैव लभ्यते । अथ सङ्घटना न व्यतिरिक्ता काचित् , अपि तु सङ्घटिता एव शब्दाः, तदाश्रितं तत्सामर्थ्यमिति सङ्घटनाश्रितमेवेत्युक्तं भवतीति तात्पर्यम् । ननु शब्दधर्मत्वं शब्दैकात्मकत्वं वा तावतास्तु, किमयं मध्ये सङ्घटनानु- प्रवेश इत्याशङ्क्य स एव पूर्वपक्षवाच्याह—न हीति । अर्थविशेषैर्न तु पदान्तर- निरपेक्षशुद्धपदवाच्यैः सामान्यैः प्रतिपाद्या व्यङ्ग्या ये रसभावतदाभासतत्- प्रशमास्तदाश्रितानां मुख्यतया तन्निष्ठानां गुणानामसङ्घटिताः शब्दा आश्रया न भवन्त्युपचारेणापीति भावः । अत्र हेतुः—अवाचकत्वादिति । न ह्यसङ्घटिताः व्यङ्ग्योपयोगिनिराकाङ्क्षरूपं वाच्यमाहुरित्यर्थः । एतत्परिहरति—नैवमिति । शब्द के आश्रित—। उपचार से यदि शब्दों में गुण रहते हैं तो तात्पर्य यह है— शब्द का माधुर्य शृङ्गारादि रस के अभिव्यञ्जक वाच्य के प्रतिपादन का सामर्थ्य है, और वह ( माधुर्य ) विशिष्ट घटना से ही शब्दगत प्राप्त होता है । और सङ्घटना अलग कुछ नहीं, बल्कि सङ्घटित शब्द ही हैं, उन ( सङ्घटित शब्द ) के आश्रित वह ( पूर्वोक्त ) सामर्थ्य है, इसलिए सङ्घटना के आश्रित ( सामर्थ्य ) ही उक्त हुआ, यह तात्पर्य है । ( गुणों का ) शब्दधर्मत्व अथवा शब्दैकात्मकत्व हो, बीच में सङ्घटना का अनु- प्रवेश क्यों ? यह आशङ्का करके वही पूर्वपक्षवादी कहता है—क्योंकि—। अर्थविशेषों से, न कि पदान्तर की अपेक्षा से रहित शुद्ध पद के सामान्य वाच्यों से, प्रतिपाद्य व्यङ्ग्य जो रस, भाव, रसाभास, भावप्रशम हैं, उनके आश्रित अर्थात् मुख्यरूप से तन्निष्ठ गुणों के असङ्घटित शब्द आश्रय उपचार से भी नहीं होते । यहां हेतु है— अवाचक होने के कारण—। अर्थात् असङ्घटित ( शब्द ) व्यङ्ग्य के उपयोगी निराकांक्ष- रूप वाच्य को नहीं कहते हैं । इसका परिहार करते हैं—ऐसा नहीं—। जब कि रस को
तृतीय उद्योतः ३४३ ध्वन्यालोकः अभ्युपगते वा वाक्यव्यङ्ग्यत्वे रसादीनां न नियता काचित्स- ङ्घटना तेषामाश्रयत्वं प्रतिपद्यत इत्यनियतसङ्घटनाः शब्दा एव गुणानां या रस आदि को वाक्यव्यङ्ग्य मान लेने पर कोई नियत सङ्घटना उनका ( गुणों का ) आश्रय नहीं होती है, इसलिए जिनकी सङ्घटना नियत नहीं है ऐसे लोचनम् वर्णव्यङ्ग्यो हि यावद्रस उक्तस्तावदवाचकस्यापि पदस्य श्रवणमात्रावसेयेन स्वसौभाग्येन वर्णवदेव यद्रसाभिव्यक्तिहेतुत्वं स्फुटमेव लभ्यत इति तदेव माधुर्यादीति किं सङ्घटनया ? तथा च पद्व्यङ्ग्यो यावद्ध्वनिरुक्तस्तावच्छुद्ध- स्यापि पदस्य स्वार्थस्मारकत्वेनापि रसाभिव्यक्तियोग्यार्थावभासकत्वमेव माधुर्यादीति तत्रापि कः सङ्घटनाया उपयोगः । ननु वाक्यव्यङ्ग्ये ध्वनौ तर्ह्यवश्यमनुप्रवेष्टव्यं सङ्घटनया स्वसौन्दर्यं वाच्य- सौन्दर्यं वा, तया विना कुत इत्याशङ्क्याह—अभ्युपगत इति । वाशब्दोऽपि- शब्दार्थे, वाक्यव्यङ्ग्यत्वेऽपीत्यत्र योज्यः । एतदुक्तं भवति-अनुप्रविशतु तत्र सङ्घटना, न हि तस्याः सन्निधानं प्रत्याचक्ष्महे । किं तु माधुर्यस्य न नियता सङ्घटना आश्रयो वा स्वरूपं वा तया विना वर्णपदव्यङ्ग्ये रसादौ भावान्मा- धुर्यादेः वाक्यव्यङ्ग्येऽपि तादृशीं सङ्घटनां विहायापि वाक्यस्य तद्रसव्यञ्ज- कत्वात् सङ्घटना सन्निहितापि रसव्यक्तावप्रयोजिकेति । तस्मादौपचारिकत्वेऽपि शब्दाश्रया एव गुणा इत्युपसंहरति-शब्दा एवेति । वर्ण से व्यङ्ग्य भी कहा जा चुका है तब तो अवाचक भी पद का श्रवणमात्र से निर्धारणीय अपने सौभाग्य के कारण वर्ण की ही भांति जो रसाभिव्यक्ति का हेतुत्व स्पष्ट ही प्राप्त ( प्रतीत ) होता है, वही माधुर्य आदि है, सङ्घटना से क्या ? जैसा कि जब कि ध्वनि पदव्यङ्ग्य भी कहा गया है तब शुद्ध भी पद का स्वार्थ के स्मारक होने के कारण भी रसाभिव्यक्ति के योग्य अर्थ का अवभासकत्व ही माधुर्य आदि है, वहां भी सङ्घटना का कौन उपयोग है ? यह आशङ्का करके कि वाक्यव्यङ्ग्य ध्वनि में अवश्य ही सङ्घटना को अनुप्रवेश करना चाहिए, उसके बिना अपना ( वाक्य का ) सौन्दर्य अथवा वाच्य का सौन्दर्य कैसे होगा ?, कहते हैं—या रस आदि को—। 'या' शब्द 'भी' ('अपि') शब्द के अर्थ में है, यहां लगाना चाहिए 'वाक्यव्यङ्ग्य होने पर भी' । बात यह कही गई—वहां संघ- टना प्रवेश करे, हम उसके सन्निधान का प्रत्याख्यान नहीं करते । किन्तु नियत संघटना माधुर्य का आश्रय अथवा स्वरूप नहीं है, क्योंकि उस सङ्घटना के बिना भी वर्णपद- व्यङ्ग्य रसादि में ( माधुर्य ) रहता है । माधुर्यादि के वाक्यव्यङ्ग्य में उस प्रकार की सङ्घटना को छोड़कर भी वाक्य उस रस का व्यञ्जक होता है, सङ्घटना सन्निहित होकर भी रस की व्यञ्जना में प्रयोजक नहीं है । इस कारण औपचारिक होने पर भी गुण शब्द के आश्रित ही हैं, इस प्रकार उपसंहार करते हैं—शब्द ही ।
३४४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
व्यङ्ग्यविशेषानुगता आश्रयाः । ननु माधुर्ये यदि नामैवमुच्यते तदुच्य-
ताम् ; ओजसः पुनः कथमियतसङ्घटनशब्दाश्रयत्वम् । न ह्यसमासा
सङ्घटना कदाचिदोजस आश्रयतां प्रतिपद्यते । उच्यते—यदि न प्रसि-
द्विमात्रग्रहदूषितं चेतस्तदत्रापि न न ब्रूमः । ओजसः कथमसमासा
सङ्घटना नाश्रयः । यतो रौद्रादीन् हि प्रकाशयतः काव्यस्य दीप्तिरो-
ज इति प्राक्प्रतिपादितम् । तच्चौजो यद्यसमासायामपि सङ्घटनायां स्या-
त्को दोषो भवेत् । न चाचारुत्वं सहृदयहृदयसंवेद्यमस्ति । तस्मादनि-
यतसङ्घटनशब्दाश्रयत्वे गुणानां न काचित्क्षतिः । तेषां तु चक्षुरादी-
शब्द ही व्यङ्ग्यविशेष से अनुगत होकर गुणों के आश्रय हैं । ( शंका ) यदि माधुर्य
के विषय में इस प्रकार कहते हैं तो कह सकते हैं; परन्तु ओजस् का नियत सङ्घटना
से रहित शब्दों का आश्रयत्व कैसे बन सकता है ? क्योंकि असमासा सङ्घटना कभी
ओजस् का आश्रय नहीं बन सकती । ( उत्तर ) कहते हैं—यदि प्रसिद्धिमात्र के प्रति
आग्रह से मन दूषित नहीं है तो हम यहाँ भी नहीं नहीं कहतें । असमासा सङ्घटना
ओजस् की आश्रय कैसे नहीं ? क्योंकि रौद्र आदि को प्रकाशित करते हुए काव्य
की दीप्ति 'ओजस्' है, यह पहले प्रतिपादन कर चुके हैं । और वह ओजस् यदि
असमासा सङ्घटना में भी हो तो क्या दोष होगा । सहृदय द्वारा संवेद्य कोई अचारुत्व
भी तो नहीं । इस कारण गुणों के नियत सङ्घटना से रहित शब्दों के आश्रय होने से
लोचनम्
नन्विति । वाक्यव्यङ्ग्यध्वन्यभिप्रायेणेदं मन्तव्यमिति केचित् ।
वयं तु ब्रूमः-वर्णपदव्यङ्ग्येऽप्योजसि रौद्रादिस्वभावे वर्णपदानामेकाकिनां
स्वसौन्दर्यमपि न तादृगुन्मीलति यावद्यावत्तानि सङ्घटनाङ्कितानि न कृतानी-
ति सामान्येनैवायं पूर्वपक्ष इति । प्रकाशयत इति 'लक्षणहेत्वोः' इति शतृप्रत्ययः ।
रौद्रादिप्रकाशनाल्लक्ष्यमाणमोज इति भावः । नचेति । चशब्दो हेतौ । यस्मात्
‘यो यः शस्त्रम्’ इत्यादौ नाचारुत्वं प्रतिभाति तस्मादित्यर्थः । तेषान्विति गुणा-
शङ्का—कुछ लोगों के अनुसार वाक्यव्यङ्ग्य ध्वनि के अभिप्राय से यह मानना
चाहिए । परन्तु हम कहते हैं—रौद्रादिस्वभाव ओजस् के वर्णपदव्यङ्ग्य होने पर भी
अकेले वर्णपदों का अपना सौन्दर्य भी तबतक उस प्रकार नहीं उन्मीलित होता जबतक
वे ( वर्णपद ) सङ्घटना से अङ्कित नहीं किए जाते हैं, यह सामान्यरूप से पूर्वपक्ष है ।
'प्रकाशयतः' ( प्रकाशित करते हुए ) 'लक्षणहेत्वोः' ( पा. सू. ३. २. १२६ ) इस सूत्र से
शतृप्रत्यय है । भाव यह कि, रौद्र आदि के प्रकाशन से सम्यक् लक्षित होता हुआ ओजस् ।
और गुण—। 'और' ( च ) शब्द हेतु अर्थ में । अर्थात् जिस कारण 'यो यः शस्त्रम्'
तृतीय उद्योतः ३४५ ध्वन्यालोकः नामिव यथास्वं विषयनियमितस्य स्वरूपस्य न कदाचिद्व्यभिचारः। तस्मादन्ये गुणा अन्या च सङ्घटना। न च सङ्घटनामाश्रिता गुणा इत्येकं दर्शनम्। अथवा सङ्घटनारूपा एव गुणाः। यतूक्तम्—'सङ्घटनावद्गुणानामप्यनियतविषयत्वं प्राप्नोति। लक्ष्ये व्यभिचारदर्शनात्' इति। तत्राप्येतदुच्यते-यत्र लक्ष्ये परिकल्पित- विषयव्यभिचारस्तद्विरूपमेवास्तु। कथमचारुत्वं तादृशे विषये सहृदयानां नावभातीति चेत् ? कविशक्तितिरोहितत्वात्। द्विविधो हि दोषः- कवेरव्युत्पत्तिकृतोऽशक्तिकृतश्च। तत्राव्युत्पत्तिकृतो दोषः शक्तितिर- स्कृतत्वात् कदाचिन्न लक्ष्यते। यस्त्वशक्तिकृतो दोषः स झटिति प्रतीयते। परिकरश्लोकश्चात्र— कोई क्षति नहीं। परन्तु उन (गुणों) का चक्षु आदि की भाँति, अपने-अपने विषय- नियमित स्वरूप का कभी व्यभिचार नहीं है। इस कारण गुण अन्य हैं और सङ्घटना अन्य है। और, गुण सङ्घटना के आश्रित नहीं है यह एक दर्शन (सिद्धान्त) है। अथवा सङ्घटना रूप ही गुण हैं। जो कि कहा है—'सङ्घटना की भांति गुणों का भी अनियत-विषयत्व प्राप्त होगा, क्योंकि लक्ष्य में व्यभिचार देखा जाता है। वहाँ भी यह कहते हैं—'जिस लक्ष्य में परिकल्पित विषय (के नियम) का व्यभिचार है, वह विरूप ही (दूषित ही) होगा। यदि यह कहो कि उस प्रकार के विषय में सहृदयों को अचारुत्व कैसे नहीं होता तो (उत्तर है कि) कवि की शक्ति द्वारा (दोष के) तिरोहित हो जाने के कारण। क्योंकि दोष दो प्रकार का है—कवि की अव्युत्पत्ति द्वारा कृत और अशक्ति द्वारा कृत। उनमें अव्युत्पत्तिकृत दोष शक्ति से तिरस्कृत हो जाने के कारण कभी लक्षित नहीं होता। परन्तु जो अशक्तिकृत दोष है वह झट प्रतीत हो जाता है। यहां परिकर-श्लोक भी है— लोचनम् नाम्। यथास्वमिति। 'शृङ्गार एव परमो मनःप्रह्लादनो रसः' इत्यादिना च विषयनियम उक्त एव। अथवेति। रसाभिव्यक्तावेतदेव सामर्थ्यं शब्दानां यत्त- त्था तथा सङ्घटमानत्वमिति भावः। इत्यादि में अचारुत्व प्रतीत नहीं होता उस कारण। परन्तु उनका अर्थात् गुणों का। अपने अपने—। 'शृङ्गार ही मन को परम आह्लादित करने वाला रस है' इत्यादि द्वारा भी विषयनियम कहा जा चुका ही है। अथवा—। भाव यह कि रसाभिव्यक्ति में गुणों की इतनी ही सामर्थ्य है जो उस उस प्रकार सङ्घटमानत्व है।
३४६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः ‘अव्युत्पत्तिकृतो दोषः शक्त्या संव्रियते कवेः । यस्त्वशक्तिकृतस्तस्य स झटित्यवभासते ॥’ तथा हि—महाकवीनामप्युत्तमदेवताविषयप्रसिद्धसंभोगशृङ्गारनिब- न्धनाद्यनौचित्यं शक्तितिरस्कृतत्वात् ग्राम्यत्वेन न प्रतिभासते । यथा कुमारसम्भवे देवीसम्भोगवर्णनम् । एवमादौ च विषये यथौचित्या- त्यागस्तथा दर्शितमेवाग्रे । शक्तितिरस्कृतत्वं चान्वयव्यतिरेकाभ्यामव- 'कवि की अव्युत्पत्ति द्वारा कृत दोष शक्ति से ढंक जाता है, परन्तु जो उसकी अशक्ति द्वारा कृत है वह झट प्रतीत हो जाता है।' जैसा कि—महाकवियों का भी उत्तम देवता के सम्बन्ध में प्रसिद्ध सम्भोग शृङ्गार का निबन्धन आदि अनौचित्य शक्ति से तिरस्कृत होने के कारण ग्राम्य रूप से नहीं प्रतिभासित होता। जैसे, 'कुमारसम्भव' में देवी का सम्भोगवर्णन।—और इत्यादि प्रकार के विषय में जैसा औचित्य का त्याग नहीं है इस प्रकार आगे दिखाया ही है। और शक्ति द्वारा तिरस्कृतत्व अन्वय-व्यतिरेक द्वारा निश्चित होता है। जैसा लोचनम् शक्तिः प्रतिभानं वर्णनीयवस्तुविषयनूत्तनोल्लेखशालित्वम् । व्युत्पत्तिस्तदुप- योगिसमस्तवस्तुपौर्वापर्यपरामर्शकौशलम् । तस्येति कवेः । अनौचित्यमिति । आस्वादयितॄणां यः चमत्काराविघातस्तदेव रससर्वस्वम् आस्वादायत्तत्वात् । उत्तमदेवतासंभोगपरामर्शे च पितृसंभोग इव लज्जातङ्कादिना कश्चमत्कारा- वकाश इत्यर्थः । शक्तितिरस्कृतत्वादिति । संभोगोऽपि ह्यसौ वर्णितस्तथा प्रतिभानवता कविना यथा तत्रैव विश्रान्तं हृदयं पौर्वापर्यपरामर्शं कर्तुं न ददा- ति यथा निर्व्याजपराक्रमस्य पुरुषस्याविषयेऽपि युध्यमानस्य तावत्तस्मिन्नवसरे साधुवादो वितीर्यते न तु पौर्वापर्यपरामर्शो तथात्रापीति भावः । दर्शितमेवेति । शक्ति अर्थात् प्रतिभान, अर्थात् वर्णनीय वस्तु के सम्बन्ध में नई बात की उल्लेख- शालिता। व्युत्पत्ति अर्थात् उस (वर्णनीय) के उपयोगी समस्त वस्तुओं के पौर्वापर्य- पूर्वक परामर्श में कौशल। उसकी अर्थात् कवि की। अनौचित्य—। आस्वाद करने वालों के जो चमत्कार का अविघात है वही आस्वाद के अधीन होने के कारण रस- सर्वस्व है। अर्थात् उत्तमदेवता के सम्भोग के परामर्श में पितृसम्भोग की भांति कौन सा चमत्कार का अवकाश है! शक्ति द्वारा तिरस्कृत होने के कारण—। भाव यह कि प्रतिभानयुक्त कवि द्वारा वह सम्भोग भी उस प्रकार वर्णित है जैसे कि उसीमें विश्रान्त हृदय को पौर्वापर्य का परामर्श करने नहीं देता, जिस प्रकार कोई निर्व्याज पराक्रम वाला व्यक्ति जब बिना विषय के भी युद्ध करने लगता है उस अवसर में साधुवाद वितरण किया जाता है न कि पौर्वापर्य के परामर्श में (प्रवृत्ति होती है) उस प्रकार