ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
किंतु कहता हूँ कर साहस । मनमें धरके मै एक आस ।
आपके सम्मुख कर साहस । प्रिय बनूं आपके ॥ २३ ॥
अजी ! शीतल जो चंद्रमासे । जीवनदायी है अमृतसे ।
पूर्ण करता अवधानसे । मेरी चाह ॥ २४ ॥
अजी ! कृपा-दृष्टिकी वृष्टि आपकी । करती है सृष्टि सकलार्थ मतिकी ।
सूखेगी कली अंकुरीत मतिकी । आपकी उदासीसे ॥ २५ ॥
देते हैं आप सहज अवधान । मिलता उससे वक्तृत्वको अन्न ।
जिससे होते हैं अक्षर संपन्न । सिद्धान्तोंसे ॥ २६ ॥
राह देखता तब अर्थ शब्दकी । सृष्टी होती नव-नव आशयकी ।
बहार आती है भाव सुमनोंकी । मति पर सतत ॥ २७ ॥
रहता है जहां संवादका उल्लास । बरसता स्वारस्वत हृदयाकाश ।
सूखता है वह सारस्वतका रस । जहां श्रोता हो दुश्चित्त ॥ २८ ॥
अजी ! चंद्रकान्त मणि द्रवता । वह द्रावकता चंद्र ही देता ।
वैसा वक्ता वक्ता नहीं हो सकता । बिन श्रोताके ॥ २९ ॥
हमें अब मधुर कर लेना । ऐसा क्या तंदुलोंको है कहना ।
या गुड़ियाको प्रार्थना करना । सूत्र धारसे कया ॥ ३० ॥
वह क्या गुड़ियाके लिये नचाता । या अपना कल-ज्ञान है बढ़ता ।
इसीलिए हमारा क्या आता जाता । इस झमेलेसे ॥ ३१ ॥
“अरे क्या हुआ पूछा तब श्रीगुरुने । कहा “तुम्हारा विनय सुना हमने ।”
“कहो अब क्या कहा श्री नारायणने । धनंजयसे ॥ ३२ ॥
संतोषसे निवृत्तिका दास । “जी ! जी !!” कह कर स-उल्लास ।
बोले किया यह उपदेश । श्री कृष्णने तब ॥ ३३ ॥
भगवान उवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १ ॥
श्री भगवानने कहा
कहूंगा गुह्य जो श्रेष्ठ निष्पाप तुझसे अब ।
विज्ञान सह जो ज्ञान छुडाता दोषसे बडे ॥ १ ॥
२५१ राज-विद्या-समर्पणयोग
सरल बुद्धिके जिज्ञासुके सम्मुख गुह्यका उद्घाटन—
अथवा जो है यह बीज । कहता हूँ मैं तुझे आज ।
मेरे हृदयका है गुह्य । जीवनका पार्थ ॥ ३४ ॥
हृदयका गूढ़ क्यों ऐसा खोलना । वह गूढ़ भी मुझसे क्यों कहना ।
आती ऐसी यदि मनमें कल्पना । है वह स्वाभाविक ॥ ३५ ॥
तो तू सुन ले हे प्राज्ञ । तू है आस्थाकी ही संज्ञा ।
कही बातकी अवज्ञा । जानता नहीं ॥ ३६ ॥
टूटा तब अपना गूढ़पन । कहें न कहने जैसे वचन ।
किंतु अपना जो अन्तःकरण । उतरे तुझमें ॥ ३७ ॥
अजी ! स्तनमें क्षीर गुप्त होता । स्तनको क्यों मधुर नहीं होता ।
आत्मीय मिलता तब स्रवता । सहज-भावसे ॥ ३८ ॥
खत्तीमेंसे बीज निकाला । जोती हुई भूमिमें डाला ।
“व्यर्थ गया वह” ऐसा भला । कह सकते क्या ? ॥ ३९ ॥
जब सुमन औ, शुद्ध मति । अनिंदक जो अन्यन-गति ।
गूढ़ बात भी उसके प्रति । सुखसे कहना ॥ ४० ॥
इन गुणोंसे संपन्न अब । बिना तेरे कोई नहीं तब ।
तुझसे अपना गुह्य सब । नहीं छिपाता ॥ ४१ ॥
गुरु-मुखसे श्रवण करनेके बादही पवित्र ज्ञानका अनुभव—
गूढ़ कहनेसे पुनः पुनः । चमत्कृत होगा तेरा मन ।
अब कहूँगा ज्ञान-विज्ञान । सहज-भावसे ॥ ४२ ॥
सत्य-असत्य सन जाने पर । उसका यथार्थ चुनाव कर ।
निकालना जैसे परख कर । कहूँगा मैं वैसे ॥ ४३ ॥
अपनी चोंचकी संडसीसे जैसे । विभेदता हंस नीर-क्षीर वैसे ।
कहूँगा ज्ञान-विज्ञान तुझसे । रहस्य मैं आज ॥ ४४ ॥
अनाजसे सना हुआ भूसा । हवासे उड़ाकर जैसा ।
धानका ढेर होता है आपका । वैसे ही पार्थ ॥ ४५ ॥
ज्ञानेश्वरी २५२
अजी ! जानकारको वह ज्ञान । भवको करके भवमें लीन ।
देता मोक्ष-लक्ष्मीका सिंहासन । मोक्षार्थीको ॥ ४६ ॥
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥ २ ॥
ज्ञान जो विद्याओंके ग्राममें । गुरुत्वसे आचार्य-पदमें ।
सकल गुह्यके स्वामित्वमें । पवित्रम है ॥ ४७॥
तथा धर्मका जो निज-धाम । वैसे ही उत्तमका उत्तम ।
पानेसे जिसे नहीं है काम । जन्मांतरका ॥ ४८ ॥
दीखा अल्पसा गुरु-मुखसे उदित । तथा हृदयमें स्वयमेव स्थित ।
प्रत्यक्ष रूपमें होता है अनुभूत । अपने आप ॥ ४९ ॥
सुखकी पावरीसे हो उत्थान । जिससे करना होता मिलन ।
होनेसे अजी ! उससे मिलन । मिटता है भोग ॥ ५० ॥
किंतु भोगके इस तीर । चित्त खडा सुखसे भर ।
वैसे सुलभ औ' सुन्दर । तथा पर-ब्रह्म ॥ ५१ ॥
इसकी है एक महत्ता । पाने पर कभी नहीं खो जाता ।
अनुभवनेसे नहीं घटता । औ' बिगड़ता नहीं ॥ ५२ ॥
अर्जुन ! तू है तर्क-कुशल । यहां होकरके शंकाकुल ।
ऐसी वस्तु लोंगोंमें कुशल । रही कैसे जी ॥ ५३ ॥
वृद्धिके लिए एकोत्तरकी । गोदमें जाते जलती ज्वालाकी ।
वे क्या अनायाससे सु-सुखकी । छोड़ेंगे क्या माधुरी ॥ ५४॥
किंतु पवित्र तथा रम्य । वैसे सुखोपायसे गम्य ।
तथा स्वसुख परंतु धर्म्य । अपनेमें ही मिलता ॥ ५५ ॥
मूर्ख लोग हृदयको छोडकर बाहरी सुखके पीछे पडते हैं —
सब प्रकारसे ऐसा सुखकर । किंतु लोक सेवनसे बचकर ।
भ्रमका कारण यह धनुर्धर । रहा वह तज तू ॥ ५६ ॥
————————————————————————————————
राज-विद्या महा गुह्य उत्तमोत्तम पावन ।
प्रत्यक्ष बोध-दाता जो धर्म-सार सनातन ॥ २ ॥
२५३ राज-विद्या-समर्पणयोग
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप ।
अप्राप्य मां निवर्तते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥३॥
देख तू दूध पवित्र तथा मधुर । पास ही है त्वचाके पदरके पार ।
किंतु किलनी सदा उसे छोड़कर । चूसती रक्त-मात्र ॥ ५७ ॥
या कमलकंद औ' दादुर । रहते हैं सदा एक घर ।
किंतु पराग खाता भ्रमर । दूसरा कीचड़ ॥ ५८ ॥
अथवा अभागीके परिवारमें । गड़ी स्वर्ण मुद्रा पड़ी सहस्रमें ।
किंतु भूखे मरते हैं दारिद्र्यमें । बैठकर पार्थ ॥ ५९ ॥
वैसे हृदयमें बसा है राम । सकलैश्वर्य सुखका आराम ।
किंतु भ्रांतका है सदा काम । विषयका ही ॥ ६० ॥
दूर देख करके मृगजल । आधा निगला अमृत उगल ।
शुक्ता लाभार्थ डाला निकाल । गलेका पारसमणि ॥ ६१ ॥
मैं सर्वत्र हूं, यह विश्व मेरा ही विस्तार है—
अहं ममतामें जो व्यस्त । मुझे नहीं पाते हैं त्रस्त ।
जन्म मृत्यु प्रवाह ग्रस्त । रहते पार्थ ॥ ६२ ॥
नहीं तो मैं रहता हूँ कैसा । सम्मुख भानु-बिंब हूँ ऐसा ।
कभी वह उदयअस्त-सा । किंतु मैं हूँ सतत ॥ ७३ ॥
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ ४ ॥
नाम है मेरे विस्तारका । जान तू संपूर्ण जगतका ।
जैसा दही होता है दूधका । सहज जमकर ॥ ६४ ॥
जैसा बीजका वृक्ष बनता । या सोनेका गहना बनता ।
वैसा है मेरा विस्तार होता । जगतके रूपमें ॥ ६५ ॥
लोग नास्तक जो धर्म अश्रद्धासे न चाहते ।
मृत्यूकी चलते राह भवमें मुझ छोडके ॥ ३ ॥
अव्यक्त रूपसे मैंने वेरा है जगको सब ।
मुझमें रहते भूत उनमें मैं नहीं रहा ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी २४४
वह अव्यक्त जो जमा हुआ । वही विश्वाकार पिछला हुआ ।
अमूर्त मूर्तमें मै फैला हुआ । त्रैलोक्य रूपमें ॥ ६६ ॥
महत्तत्वसे शरीर तक । यहांके भूत जो हैं अशेष ।
मुझमें भास होते सम्यक । पानी पर झागसा ॥ ६७ ॥
जैसे झागमें न दीखता नीर । स्वप्नकी त्रिविधता धनुर्धर ।
नहीं दीखती जैसे जगकर । वैसे ही जान ॥ ६८ ॥
भास होते हैं भूत मुझमें । किंतु मैं नहीं जान उनमें ।
कही है पहले सातवेंमें । तुझे यह बात ॥ ६९ ॥
कही हुई बातका तब । विचार रहने दो अब ।
तेरा ध्यान मुझमें अब । पैठने दो ॥ ७० ॥
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥ ५ ॥
हमारा भाव जो प्रकृति अतीत । देखने लगो तो कल्पना रहित ।
मुझमें सभी भूत हैं यह व्यर्थ । सब मैं होनेसे ॥ ७१ ॥
संकल्पके संध्याकालमें जैसे । बुद्धि चक्षु मंद होते तमसे ।
तत्र अखंडित किंतु अस्पष्टसे । दीखते भूत भिन्न हैं ॥ ७१ ॥
होता जब संकल्प-संध्या लोप । तब अखंडित ही है स्वरूप ।
संदेह जाते जैसे होता लोप । मालाका सर्पपन ॥ ७३ ॥
मेरे शुद्ध रूपमें कल्पनासे विश्व उत्पन्न होता है
भूमिमेंसे क्या अपने आप । अंकुरते मटकोंके रूप ।
जैसे कुलाल मतिके छाप । अंकुरते सब ॥ ७४ ॥
है क्या सागरका पानी । बनी तरंगोंकी खानी ।
है अवांतर करनी । वायुकी वह ॥ ७५ ॥
है क्या कपासका उदर । कपड़ेका बना आगर ।
ओढण्याको है मनोहर । बना कपड़ा ॥ ७६ ॥
या नहीं मुझमें भूत देख तू दिव्य योग जो ।
सृजता पालता भूत उनमें रहता नहीं ॥ ५ ॥
२५५ राज-विद्या-समर्पणयोग
होने पर स्वर्णके अलंकार । स्वर्णत्वमें नहीं आता अंतर ।
नाना रूप उसके मनोहर । भूषितकी दृष्टिसे ॥ ७७ ॥
अजी ! प्रतिध्वनिका प्रत्युत्तर । या क्या प्रतिबिंबका आविष्कार ।
होता जो प्रति रूप ही आखर । या स्वयं भिन्न वस्तु ॥ ७८ ॥
वैसे है मेरा निर्मल स्वरूप । उसपे होता भूत-भावना आरोप ।
जिसका भासता है संकल्प । कल्पना रूप ॥ ७९ ॥
मिटती जब प्रकृति कल्पित । भूताभास नहीं रहता पार्थ ।
फिर शुद्ध स्वरूप अखंडित । रहता मेरा ॥ ८० ॥
जब है सिर चक्कर खा जाता । तब भासता है विश्व फिरता ।
अपनी कल्पनासे भास होता । भूतोंका अखंडमें ॥ ८१ ॥
वही तू कल्पना छोड़कर देख । मैं भूतोंमें भूत मुझमें अनेक ।
स्वप्नोंमें भी नहीं होगा सविवेक । विचारने योग्य ॥ ८२ ॥
भूतोंको करता मैं धारण । या भूतोंमें है मेरा जीवन ।
संकल्प सन्निपात कारण । होती ये बातें ॥ ८३ ॥
इसलिए सुन तू प्रियोत्तम । ऐसा मैं विश्वाका हूँ विश्वात्म ।
जो हो इस झूठे भूत-ग्राम । आश्रयदाता ॥ ८४ ॥
लेकर जैसे रवि-रश्मिका आधार । मृग-जल मिथ्या भासता भूमि पर
वैसा जान भास भूतोंका मुझ पर । और मुझे सत्य ॥ ८५ ॥
ऐसा हूँ मैं भूत-भावन । औ' सब भूतोंसे अभिन्न ।
जैसे भानु-रश्मि अभिन्न । होते हैं पार्थ ॥ ८६ ॥
यह है ऐश्वर्य-योग हमारा । देखा न तूने भला धनुर्धरा ।
इसमें है क्या कह तू आसरा । भूत भेदका ॥ ८७ ॥
इसलिए भूत मुझसे । न है भिन्न किसी रूपसे ।
अथवा हूँ भिन्न भूतोंसे । मैं यह नहीं मानता ॥ ८८ ॥
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥ ६ ॥
आकाशमें महा-वायु रहे सर्वत्र हो सदा ।
मुझमें हैं सभी भूत रहते जान तू यह ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी २५६
अजी ! आकाश होता जितना जैसा । पवन होता उतना ही औ' वैसा ।
हिलानेसे भास होता भिन्न ऐसा । नहीं तो उतना ही ॥ ८९ ॥
वैसे भूत मात्र मुझमें । भास होते हैं कल्पनामें ।
नहीं होता निर्विकल्पमें । वहां मैं ही सर्वत्र ॥ ९० ॥
नहीं औ' है यह कल्पनाका औरस । कल्पना लोपसे होता है वह अंश ।
कल्पनाके संग होता है भूताभास । पांडुकुमार ॥ ९१ ॥
मिटती है जब कल्पना मूलतः । तब वहां है या नहीं यह जाता ।
इसलिये तू आगे यह देखता । ऐश्वर्य योग ॥ ९२ ॥
ऐसा है यह प्रति-बोध सागर । अपनेको कर उसकी लहर ।
तब तू देखेगा सब स-चराचर । आप ही है ॥ ९३ ॥
ज्ञान-जागृति अब अर्जुन । हुई न यह पूछते कृष्ण ।
अब तो भंग हो द्वैत-स्वप्न । है जो मिथ्या ॥ ९४ ॥
फिर तुझे यदि शायद । आएगी कल्पनाकी नींव ।
मिटेगा अभेदका बोध । पड़ेगा स्वप्न ॥ ९५ ॥
जिससे टूटेगा निद्राका पथ । उद्बोध-रूप हो आप पार्थ ।
कहता अब ऐसा गुपित । खोल करके ॥ ९६ ॥
इंद्रियोंके अंतर्मुख होनेसे ईश्वरका अनुभव आता है—
तब हे धनुर्धर स-धैर्य । अवधान दे तू धनंजय ।
सब भूतोंको है यह माया । करती हरनी जो ॥ ९७ ॥
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ७ ॥
जिसका नाम ही प्रकृति है । तुझसे जो द्विविध कही है ।
एक अष्ठधा भेद्युत है । दूसरी जीव रूप ॥ ९८ ॥
मेरी प्रकृतिमें सोते भूत कल्पांतमें सभी ।
जगाता सबको मैं ही कल्प-आरंभमें स्वयं ॥ ७ ॥
२५७ -राज-विद्या-समर्पणयोग
(33)
यह प्रकृति विषय संपूर्ण । सुना तूने पहले अर्जुन ।
इसीलिए कहता हूं सुन । अगली बात ॥ ९९ ॥
यह है मेरी प्रकृति । महा कल्पांतमें होती ।
ऐक्य-लीन भूत-जाति । मुझ अव्यक्तमें ॥ १०० ॥
ग्रीष्मके प्रखर तापमें । बीज सह दूब भूमिमें ।
ऐक्य होती पूर्ण रूपमें । धनुर्धर ॥ १ ॥
या वर्षा आडंबर मिटता । शरदका परदा खुलता ।
जैसे घन-जात लय होता । गगनका गगनमें ॥ २ ॥
अथवा आकाशका घर । नीरमें तरंग सुंदर ।
लोपता वायु औ' आकार । वैसे ही ॥ ३ ॥
तथा जागते ही जैसा स्वप्न । मनके मनमें होता लीन ।
प्राकृत प्रकृतिमें ही लीन । कल्पक्षयमें ॥ ४ ॥
जब फिर कल्पारंभ होता । कहते हैं मैं सृष्टि सृजता ।
इस विषयमें मैं कहता । सुन तू पार्थ ॥ ५ ॥
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ८ ॥
तब है यह जो प्रकृति । करती सहज स्वीकृति ।
तंतु समवाय दीखती । पटमें बुनायी जैसे ॥ ६ ॥
लेकर उस बुनायीका आधार । भरते वस्त्र बन छोटे चौकोर ।
प्रकृति पंचात्मक आकार । लेती है वैसे ॥ ७ ॥
लेकर जामूनका आधार । दूध लेता दहीका आकार ।
वैसे प्रकृति रूप सुंदर । लेती है सृष्टिका ॥ ८ ॥
बीज होता पानीके नजदीक । औ' वही होता शाखोपशाख ।
वैसा मेरा ही कारण देख । भूत जातका यह ॥ ९ ॥
प्रकृति हाथमें लेके जगाता मैं पुनः पुनः ।
भूतोंका संघ संपूर्ण प्रकृतिके अधीन जो ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी २५८
अजी ! राजाने बसाया नगर । सच कहनेका यह प्रकार ।
थक गया क्या राजाका शरीर । नगर बसाके ॥ ११० ॥
मैं प्रकृति-अधिष्ठान कैसे । कोई स्वप्नमें रहता जैसे ।
फिर वही प्रवेशता जैसे । जागृतावस्थामें ॥ ११ ॥
स्वप्नसे जागृतिमें आते । उसके क्या पैर दुखते ।
अथवा स्वप्नमें रहते । होता क्या प्रवास ॥ १२ ॥
इसका है यह अभिप्राय । जो यह भूत-सृष्टिका कार्य ।
चलता उसमें करणीय । मुझे कुछ भी नहीं ॥ १३ ॥
या राजाकी आश्रित प्रजा जैसे । बरतती अपने लिए वैसे ।
प्रकृतिके साथ मेरा भी वैसे । संबंध है यहां ॥ १४ ॥
पूर्णचंद्रसे मिलकर । आता सिंधु उमडकर ।
तत्र चंद्रको धनुर्धर । श्रमना है क्या ॥ १५ ॥
पासका लोह जो अ-चेतन । हिलता रहता यथा-स्थान ।
उससे चुंबकको सहन । करना क्या कष्ट ॥ १६ ॥
ऐसा निज-प्रकृति स्वीकार । करता हूं मैं पांडुकुमार ।
ऐसी भूत-सृष्टि सरासर । प्रसवती जाती ॥ १७ ॥
जो है यह भूतग्राम संपूर्ण । रहता है प्रकृतिके आधीन ।
जैसे बीजसे अंकुर अर्जुन । उपजाती भूमि ॥ १८ ॥
अथवा बाल्यादि अवस्थात्रय । लेकर शरीरका ही आश्रय ।
गगनकी मेघावली प्रश्रय । लेती वर्षा-ऋतुका ॥ १९ ॥
या स्वप्नका कारण निद्रा । वैसी प्रकृति है नरेंद्र ।
जो सम्पूर्ण भूत समुद्र । स्वामिनी प्रकृति ॥ १२० ॥
स्थावर औ' जंगम । स्थूल अथवा सूक्ष्म ।
ऐसा जो भूत ग्राम । प्रकृति मूल ॥ २१ ॥
इसलिए भूतमात्रोंका सृजन । या सृजित भूतोंका प्रतिपालन ।
करना नहीं पडता अर्जुन । हमको कभी ॥ २२ ॥
जलमें फैलती चन्द्रिकाकी लता । उसे चन्द्रको फैलाना न पडता ।
वैसे मुझसे दूर ही है रहता । कर्मजाल ॥ २३ ॥
२५९ राज-विद्या-समर्पणयोग
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥ ९ ॥
उमडता जब ज्वार सिंधु-जलका । रोक न सकता तब बांध नूनका
वैसे मैं हूं सकल कर्मोंकी पूर्णता । यह क्या बांधेंगे मुझे ॥ २४ ॥
धूम्र रजका छतनार । रोके यदि वायुका जोर ।
या सूर्यबिंबमें अंधार । करे प्रवेश ॥ २५ ॥
जैसे पर्वतके उदरस्थ । न करे पर्जन्य-धार त्रस्त ।
वैसे प्रकृतिके कर्मजात । मुझे न करते स्पर्श ॥ २६ ॥
विकारोंमें यहां प्रकृतिके । मैं ही हूं जान तू समझके ।
किंतु उदासीन ही रहके । न करता न करता ॥ २७ ॥
घरमें रखी दीप-ज्योती । जो न प्रेरती या रोकती ।
कौन है यह न जानती । कौन क्या करता ॥ २८ ॥
जैसा होता वह साक्षीभूत । गृह-व्यापार प्रवृत्ति हेत ।
भूत कर्ममें मैं अनासक्त । वैसा रहता भूतोंमें ॥ २९ ॥
यह एक ही विचार । क्या कहूं मैं फिर फिर ।
पार्थ यहां एक बार । इतना जान तू ॥ १३० ॥
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ १० ॥
जैसा लोक-चेष्टामें समस्त । निमित्त मात्र होता सवित ।
जगत प्रभवमें पांडुसुत । कारण मैं हूं ॥ ३१ ॥
किया मैंने प्रकृतिका अंगीकार । जिससे हुआ उत्पन्न स-चराचर ।
तब कारण मैं हुआ स-चराचर । यह है उपपत्ति ॥ ३२ ॥
किंतु जो ये सभी कर्म न बांध सकते मुझे ।
रहता मैं उदासीन तथा आसक्ति हीन भी ॥ ९ ॥
साक्षी मैं प्रकृति-द्वारा उठाता स-चराचर ।
उससे सब सृष्टीका होता है परिवर्तन ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी २६०
इस प्रकाशमें तू निश्चित । निहार ऐश्वर्य योग नित ।
मुझमें है सब भूतजात । उसमें मैं नहीं ॥ ३३ ॥
या भूतमात्र नहीं मुझमें । तथा मैं नहीं भूतमात्रमें ।
इस रहस्यको जाननेमें । भूल न कर तू ॥ ३४ ॥
आकारके परे देखनेसे ही मेरा अनुभव आयेगा—
है यह हमारा सर्वस्व गूढ । दिखाया तुझको मैंने उघड़ ।
लगाकर इन्द्रियोंका किवाड़ । भोग तू हृदयमें ॥ ३५ ॥
रहस्य यह करमें नहीं आता । तब तक मेरा स्वरूप जो पार्था ।
नहीं समझेगा तुझको सर्वथा । भूसेमें जैसे दाना ॥ ३६ ॥
अन्यथा कभी अनुमानसे । लगे समझमें आयी ऐसे ।
क्या मृगजळके सींचनेसे । भीगती है खेती ॥ ३७ ॥
जलमें जब जाल फैलता । चन्द्रबिंब उसमें दीखता ।
जाल जब खींच लिया जाता । तब बिंब कहां ॥ ३८ ॥
शब्द चातुर्यसे वक्तृत्वके । मूँदते नयन प्रतीतिके ।
समय आने पर बोधके । रहते कोरे ॥ ३९ ॥
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
'परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ ११ ॥
यदि कोई संसारसे डरता । मेरी स्वरूप प्राप्तिको चाहता ।
तो हमारेमें जो विचार पार्थ । ध्यानमें रखले ॥ १४० ॥
जिसकी दृष्टिमें हुयी कामली । देखता वह चांदनी भी पीली ।
वैसा मेरा स्वरूप जो निर्मळ । देखते हैं मलिन ॥ ४१ ॥
या ज्वरसे दूषित जो मुख । दूधको कहे कडुआ विष ।
वैसे अमानुषको मानुष । कहेंगे मुझको ॥ ४२ ॥
तुच्छतासे मुझे मूढ देख मानव रूपमें ।
न जानते महा-रूप मेरा जो विश्व-चालक ॥ ११ ॥
२६१ राज-विद्या-समर्पणयोग
इसीलिए तू धनंजय । भूलेगा यह अभिप्राय ।
स्थूल दृष्टिका ज्ञानाशय । होगा व्यर्थ ॥ ४३ ॥
स्थूल-दृष्टिसे मुझे पार्थ । देखना है जान तू व्यर्थ ।
स्वप्नमें पीनेसे अमृत । न होता अमर ॥ ४४ ॥
वैसे स्थूल-दृष्टि है मूढ । जानते समझके दृढ ।
वह जानना होता आड । स्वरूप ज्ञानके ॥ ४५ ॥
होनेसे जैसा नक्षत्रका आभास । अपना ही घात कर लेता हंस ।
नीरमें रत्न-बुद्धिकी कर आस । मारकर चोंच ॥ ४६ ॥
गंगा जान गया मृगजल । उस जानेसे मिला क्या फल ।
सुरतरु समझ बबूल । लगानेसे क्या होगा ? ॥ ४७ ॥
हार मान नीलमणिका दुहरा । पकड लिया विषैला फणिधर ।
अथवा रत्न मानकर पत्थर । चुनना जैसे ॥ ४८ ॥
या प्रकट हुआ स्वर्ण-भंडार । कहकर उठा लिया अंगार ।
कूपमें कूदा छाया देखकर । अपनी सिंह ॥ ४९ ॥
मुझको देहधारी मानकर । निश्चय किया है धनुर्धर ।
उसने चंद्र समझकर । पकडा प्रतिबिंब ॥ १५० ॥
वैसे कृत-निश्चय गया व्यर्थ । कोयी जैसे मांड पीकर पार्थ ।
देखने लगा सुपरिणामार्थ । अमृतके मानो ॥ ५१ ॥
वैसे नाशवंत स्थूलाकार । चितमें निश्चय बांधकर ।
परखा अविनाश अक्षर । दीखूंगा मैं कैसे ॥ ५२ ॥
कोयी पश्चिम समुद्रका तट । चलके पहुंचे पूर्वकी बाट ।
चोकर कूट करके सुभट । मिलेंगे क्या दाने ॥ ५३ ॥
वैसे विकृत जो स्थूल । जानकर मैं केवल ।
जैसे फेन पीके जल । कैसे पायेगा ? ॥ ५४ ॥
ऐसे मोहग्रस्त मनसे । यही मैं मान संभ्रमसे ।
देहके जन्मादि कर्मोंसे । लादते मुझे ॥ ५५ ॥
जिससे अनामको नाम । मुझ क्रिया-शून्यको कर्म ।
अ-शरीरको देह धर्म । आरोपते ॥ ५६ ॥
ज्ञानेश्वरी २६२
मुझ आकारशून्यको आकार । औ' निरुपाधिकको उपचार ।
विधि विवर्जितको व्यवहार । आचारादिक ॥ ५७ ॥
मुझ वर्ण-हीनको वर्ण । तथा गुणातीतको गुण ।
औ' अ-चरणको चरण । अ-पाणिको पाणी ॥ ५८ ॥
अमर्यादको मान । सर्वगतको स्थान ।
शय्यापे लेटे जान । देखते हैं ॥ ५९ ॥
वैसे अ-श्रवणको श्रोत्र । मुझ अ-चक्षुको नेत्र ।
तथा अ-गोत्रको गोत्र । रूप अ-रूपको ॥ १६० ॥
मुझ अव्यक्तको व्यक्ति । तथा अनार्तको आर्ति ।
सर्व तृप्तिको है तृप्ति । सोचते सब ॥ ६१ ॥
अनावरणको प्रावरण । भूषण-अतीतको भूषण ।
सकल कारणको कारण । देखते मुझको ॥ ६२ ॥
मुझ सहजको रचते । स्वयंभूको हैं प्रतिष्ठते ।
निरंतरको आह्वानते । तथा विसर्जते हैं ॥ ६३ ॥
सर्वदा मैं स्वयं-सिद्ध । बाल तरुण और वृद्ध ।
एक रूपका संबंध । जानते वे मुझे ॥ ६४ ॥
मुझ अद्वयको द्वैत । अकर्ताको माने कर्ता ।
तथा अभोक्तकों भोक्ता । कह जानते ॥ ६५ ॥
अकुलका करते कुल-वर्णन । नित्यके निधनसे व्याकुल-मन ।
अंतर्यामिका शत्रु-मित्र अर्जुन । मानते हैं वे ॥ ६६ ॥
मैं हूं सर्वदा स्वानंदाभिराम । मुझे माने सकल-सुखकाम ।
सर्वत्र व्याप्त हूं संपूर्ण सम । मानतें मुझ स्थानिक ॥ ६७ ॥
आत्मा मैं चराचरमें बसता । कहते एकका पक्ष लेता ।
दूसरेका शत्रु बन मारता । बढाचढाके गाते यह ॥ ६८ ॥
अजी ! प्रायः ऐसे समस्त । मनुष्य-धर्म जो प्राकृत ।
लगाते मुझे विपरीत । यही उनका ज्ञान ॥ ६९ ॥
आकार कोई जब देखते । देव भावसे पूजा करते ।
वह बिगडनेपे कहते । नहीं रहा अब ॥ १७० ॥
२६३ राज-विद्या-समर्पणयोग
ऐसे ही अनेक प्रकार । बनाकर मानवाकार ।
करके ज्ञानपे अंधार । विपरीत ज्ञानसे ॥ ७१ ॥
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥
मैं अंधोंके हाथमें पड़ा मोति-सा हूं-
इसीलिए जन्मना ही मोघ । जैसे वर्षाके बिन ही मेघ ।
अथवा मृगजल तरंग । देखना दूरसे ही ॥ ७२ ॥
या मृत्तिकाके घुड़सवार । या कलंदरके अलंकार ।
गंधर्व-नगरका आवार । आभास जो ॥ ७३ ॥
जैसे थूहरका बडा सरल । अंदर खोकला ना है फल ।
लटकते स्तन जैसे गला- । में बकरीके ॥ ७४ ॥
मूर्खका जीवन है व्यर्थ । जैसे सेमल फल पार्थ ।
धिक् उसके कर्म समस्त । जो हैं निरर्थक ॥ ७५ ॥
फिर मानो है उसका पढना । मर्कटका नारियल तोडना ।
अथवा अंधेका हाथ पडना । मोति जैसे ॥ ७६ ॥
वास्तवमें उनके शस्त्र । कुम्हारके हाथमें शंख ।
या कहा अशौचको मंत्र- । बीज किसीने ॥ ७७ ॥
वैसे उसका ज्ञान-जात । औ' आचरण क्रिया पार्थ ।
वह संपूर्ण गया व्यर्थ । चित्तहीन ॥ ७८ ॥
तमो-गुण राक्षसी । जो है सद्बुद्धि ग्रासी ।
विवेक-मूल नासी । निशाचरी ॥ ७९ ॥
उस प्रकृतिके आधीन हुये । इसीलिए चिंताका ग्रास भये ।
इस तामसीके कलेऊ हुये । मुखमें ही ॥ १८० ॥
वे आशावाद मूढोंके व्यर्थ हैं ज्ञान-कर्म भी ।
जिन्होंने संपदा पायी आसुरी मोह-कारक ॥ १२ ॥
ज्ञानेश्वरी २६४
जहां लारमें आशाकी । लोटती जिह्वा हिंसाकी ।
जुगाली करें कौरकी । मोदसे नित ॥ ८१ ॥
जो हैं कान तक अनर्थके । चाटती जीभ बाहर लाके ।
कोह बन प्रमाद गिरिके । हुई उन्मत्त ॥ ८२ ॥
जहां हैं क्रूर दांत द्वेषके । पीसते हैं बीजको ज्ञानके ।
आवरण डालते तमके । मूढ-बुद्धि पर ॥ ८३ ॥
आसुरी बुद्धिके मुखमें ऐसे । पडते हैं भूत बलिके कौरसे ।
भ्रमजालके कुण्डमें पड़नेसे । सुन धनंजय ॥ ८४ ॥
पडे वे ऐसे गर्तमें तमके । न लगते हाथमें विचारके ।
जहां गये उस स्थानके । निशान भी नहीं ॥ ८५ ॥
मैं भक्तोंके कीर्तन-मेलेमें रहता हूं—
यह निष्फल वर्णन तदर्थ । रहने दो मूर्खोंकी बात पार्थ ।
विस्तार करनेसे वाणी व्यर्थ । थकेगी इससे ॥ ८६ ॥
ऐसे बोले तब देव । "जी" कहा सुन पांडव ।
सुन वाचा ही नीरव । साधु-कथासे ॥ ८७ ॥
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥
अजी ! जिनका है निर्मल मानस । बसता वहां मैं ले क्षेत्र-सन्यास ।
नींदमें भी वे करते स-उल्लास । वैराग्याराधना ॥ ८८ ॥
जिनका सद्भाव आलंबन । रहता धर्मका सिंहासन ।
जिनके मनका है जीवन । विवेकमात्र ॥ ८९ ॥
जो हैं ज्ञान गंगामें स्नात । पूर्णता-भोजनसे तृप्त ।
शांति-लताके नव-पात । है अति कोमल ॥ १९० ॥
जुटाके संपदा दैवी महात्मा भजते मुझे ।
अनन्य भावसे जान मैं विश्वारंभ शाश्वत ॥ १३ ॥
(34) २६५ राज-विद्या-समर्पणयोग
पूर्णावस्थामें जो फूटे अंकुर । तथा धर्म-मंडपके आधार ।
शांति-सागरसे लिये हैं भर । पूर्ण-कुम्भ जैसे ॥ ९१ ॥
भक्तिकी हुई इन्हें इतनी प्राप्ति । कहते वे परे हठो तुम मुक्ति ।
उनके आचरणसे है नीति । खिलती सदा ॥ ९२ ॥
उनकी इंद्रियां भी संपूर्ण । पहने हैं शांतिका भूषण ।
उनका चित्त है आभरण । मुझ व्यापकको ॥ ९३ ॥
ऐसे जो महानुभाव । दैवी प्रकृतिके देव ।
जान करके वे सर्व । मेरा ही रूप है ॥ ९४ ॥
बढता हुआ उनका प्रेम । मुझे भजता है जो निष्काम ।
किंतु भिन्नताका मनोधर्म । छूता भी नहीं ॥ ९५ ॥
स्वयं मैं होकर पांडव । करते हैं वे मेरी सेवा ।
किंतु आश्चर्य है जो भाव । अब मैं कहता ॥ ९६ ॥
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ १४ ॥
उत्कर्षसे उन्होंने कीर्तनके । नाशे व्यवसाय प्रायश्चित्तके ।
नाम भी न रहे सब पापके । ऐसा ही किया ॥ ९७ ॥
निस्तेज किये सब यम-दम । तीर्थ उठाये पदसे उत्तम ।
थमे यमलोकके उपक्रम । अनेक प्रकारके ॥ ९८ ॥
यम कहें क्या यमना । दम पूछे किसे दमना ।
तीर्थ कहते हैं क्या खाना । दोष नहीं नाम-मात्र ॥ ९९ ॥
ऐसा है मेरा नाम-घोष । मिटाते हैं विश्वके दुःख ।
सारे जगमें महासुख । गूंज-महकता ॥ २०० ॥
दिखाते वे सूर्योदय बिन । जिलाते हैं अमृतके बिन ।
तथा वे देते योगके बिन । दर्शन-कैवल्यको ॥ १ ॥
नित्य कीर्तनमें मेरे यत्नसे लीन जो व्रती ।
भक्तिसे नित्य हो युक्त पूजते नम्र भावसे ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी २६६
राजा रंकका भेद नहीं करते । बाल-वृद्ध यह भी नहीं देखते ।
जगतको आनंदमें भर देते । पूर्ण-रूपसे ॥ २ ॥
अजी ! कभी कोई जाता है वैकुण्ठ । इन्होंने किया है विश्व ही वैकुण्ठ ।
मेरे नाम गौरवसे हे सुभट । उजलाया विश्व ॥ ३ ॥
तेजमें होते सूर्य-से उज्ज्वल । किन्तु सूर्यमें अस्तका काजल ।
पूर्ण-चन्द्र रहता एक काल । ये सदा पूर्णत्वमें ही ॥ ४ ॥
बरसनेमें मेघ उदार । घटनेमें हैं वह अपूर ।
ये निःसंदेह कृपालु वीर । पंचानन ॥ ५ ॥
उनकी जिह्वा पर सतत । नाम रहे मेरा नृत्य-रत ।
पानेमें जो जाते जन्मजात । सहस्रावधि ॥ ६ ॥
तब मैं वैकुण्ठमें नहीं रहता । भानु-बिम्बमें तब नहीं दीखता ।
योगियोंके हृदयके पार जाता । मैं उस समय ॥ ७ ॥
किंतु उनके पास धनुर्धर । करते जो नाम-घोष मधुर ।
रहता हूँ मैं निश्चित सादर । जो है खोया हुआ ॥ ८ ॥
मेरे गुणगानमें ही हैं वे तृप्त । देशकाल भूलते जो नामरत ।
कीर्तन सुखमें हुए सतत । स्वरूप रूप ॥ ९ ॥
कृष्ण विष्णु हरि गोविंद । नामके निखिल प्रबंध ।
तथा आत्म-चर्चा विशद । खोते हैं उसमें ही ॥ १० ॥
नमस्कार भक्तिसे मद्रूप होते हैं--
रहने दो अब ये अर्जुन । सुन करके वे मेरा कीर्तन ।
तथा विचरते हैं अनुदिन । चराचरमें ॥ ११ ॥
ऐसे अनेक हैं पार्थ । कर सहज सिद्धता ।
मन-प्राणको ले साथ । पथ-दर्शक ॥ १२ ॥
बाहर लगायी यम नियमकी बाड़ । भीतर वज्रासनका गढ़ सुदृढ़ ॥
उस पर प्राणायामकी तोप चढ़ा- । रखी है सज्ज ॥ १३ ॥
वहां कुण्डलिनीके प्रकाशमें । मन-पवनके सहयोगमें ।
कर लिया अपने आधीनमें । सत्रहवींका कुम्भ ॥ १४ ॥
२६७ राज-विद्या-समर्पणयोग
प्रत्याहारने तब परक्रम किया । विषयोंके नाम मात्रको मिटा दिया
सब इन्द्रियोंको बांध करके लाया । हृदयांगनमें ॥ १५ ॥
तब दौड़े धारणाके घुड़सवार । पकड़ लाये महाभूत इक ठौर ।
फिर किया चतुरंग सेना संहार । जो हैं संकल्पकी ॥ १६ ॥
तब “विजय हुआरे विजय ।” सिंगी बजी ध्यानकी हो निर्भय ।
दीखता तन्मयका स-समय । वहां एक-छत्र ॥ १७ ॥
फिर समाधिश्रीका अशेष । आत्मानुभवका राज्य-सुख ।
सिंहासन आरोहण देख । हुआ समरससे ॥ १८ ॥
ऐसा है यह गहन । अर्जुन मेरा भजन ।
अब कहता हूं सुन । अन्य प्रकार ॥ १९ ॥
जैसे सर्वत्र समानरूपमें । एक तंतु रहता है वस्त्रमें ।
वैसे वे “मैं” बिन चराचरमें । जानते नहीं ॥ २० ॥
आदि ब्रह्मसे लेकर । मच्छर तक आखर ।
मेरा रूप है सुन्दर । जानते हैं यह ॥ २१ ॥
फिर छोटा बड़ा नहीं कहते । निर्जीव सजीव नहीं जानते ।
सबके सम्मुख नम्र हैं होते । सब “मैं” मानकर ॥ २२ ॥
अपना उत्तमत्व नहीं जानते । औरोंकी योग्यायोग्यता न देखते ।
सर्वत्र आत्म-तत्व देख नमते । प्रेम-भावसे ॥ २३ ॥
जैसे ऊपरसे पानी गिरता । नीचे तल तक है वह जाता ।
वैसे भूतमात्रसेही नम्रता । स्वभाव यह उनका ॥ २४ ॥
या वृक्षकी शाखा फल-भारसे । उतरती है सहज-भावसे ।
वैसे वे झुकते हैं नम्रतासे । सबके प्रति ॥ २५ ॥
रहते हैं सर्वज्ञ निराभिमान । विनय ही उनकी संपत्ति महान ।
करते वे जयजय मंत्र अर्पण । मुझको ही ॥ २६ ॥
नमनसे गला मानाभिमान । सहज हुए मद्रूप अर्जुन ।
ऐसे होकर मत्स्वरूप-लीन । भजते मुझको ॥ २७ ॥
है यह अर्जुन श्रेष्ठ भक्ति । कही मैंने अभी तेरे प्रति ।
ज्ञान-यज्ञसे भजन रीति । सुन तू भक्तकी अब ॥ २८ ॥
ज्ञानेश्वरी २६८
ज्ञानी-भक्त सदा-सर्वत्र एक भावसे मुझे देखता है—
यह भजन-परिपाटी। जानता ही है तू किरीटी।
की इसकी हमने गोष्ठी। पहले ही ॥ २९॥
तब कहता है “जी हां” अर्जुन। “यह है देवप्रसाद महान।”
जब मिलता अमृत-भोजन। कहेगा कौन “बस है” ॥ ३० ॥
सुनकर यह अनंत। हुआ अति प्रसन्न-चित्त।
सुननेका अर्जुन-मत। जानकर ॥ ३१ ॥
कहते हैं भला किया पार्था। यह अनवसर सर्वथा।
किंतु कहलाती तेरी अवस्था। मुझसे अब ॥ ३२ ॥
पार्थ पूछे ऐसे कैसे कहता। बिन चकोर चंद्र नहीं उगता ?।
देता है वह विश्वको शीतलता। यह स्वभाव उसका ॥ ३३ ॥
यहां चकोर अपनेही हितार्थ। चोंच उठाता चन्द्रकी ओर नित।
हमारी विनय है एक निमित्त। देव आप कृपासिंधु ॥ ३४ ॥
उदारतासे मेघ बरसता। जगतकी है तरस मिटाता।
चातककी प्यासकी क्या है कथा। वर्षाके सम्मुख ॥ ३५ ॥
पानीके लिये एक घूंट। जाना पडता गंगा-तट।
देव सुनाओ हमें चट। चाह है बहु या अल्प ॥ ३६॥
कृष्ण कहे रहने दो पार्था। देखके तुम्हारी यह आस्था।
हुआ है मेरा चित्त मुदित। स्तुति न होती सहन ॥ ३७ ॥
जब तू सुनता है अति उत्तम। वक्तृत्व निमंत्रणका काम।
कहता यह बोल पुरुषोत्तम। आदर कर बोले ॥ ३८ ॥
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥
ज्ञान-यज्ञका यह रूप। आदि संकल्प यह यूप।
पंच-महाभूत मंडप। भेद है पशु ॥ ३९॥
दूसरे ज्ञान-यज्ञोंसे देखके ब्रह्म-भावसे।
विवेकसे अविभेद भेदमें भजते मुझे ॥ १५ ॥
२६९
राज-विद्या-समर्पणयोग
फिर पांचोंके जो विशेष गुण । अथवा इन्द्रियां तथा है प्राण ।
यही है यज्ञोपचार भरण । अज्ञान है घृत ॥ २४० ॥
वहां कुण्ड है मन बुद्धिका । प्रज्वलित अग्नी है ज्ञानका ।
समताकी सुन्दर वेदिका । जान तू पार्थ ॥ ४१ ॥
मति कौशल्य स-विवेक । मंत्र-विद्या गौरव नेक ।
शांति ही है सुवा और सुक । जीव है यजमान ॥ ४२ ॥
स्वरूपानुभव पात्रसे । विवेकके महा-मंत्रसे ।
वह है ज्ञानाग्नि होत्रसे । नाशता भेद ॥ ४३ ॥
जब है अज्ञान मिट जाता । यजितका यज्ञ है रुकता ।
आत्म-समरस स्नान होता । अवभृतका ॥ ४४ ॥
तब भूत विषय कारण । न होता इसका भेद ज्ञान ।
एकत्वका है संपूर्ण ज्ञान । होता आत्म-बुद्धिसे ॥ ४५ ॥
जागृत मनुष्य जैसे अर्जुना । कहता स्वप्नकी विचित्र सेना ।
आप रही स्वयं बन गया था ना । निद्रावश होकर ॥ ४५ ॥
अब न रही सेना जो थी सेना । मैं अकेला ही था पूर्ण रूपेण ।
ऐसा होता तब एकत्व-भान । उसको विश्वका ॥ ४७ ॥
फिर जीवत्वका भान है मिटता । आब्रह्म परमात्म बोध भरता ।
इस भांति ज्ञान-भावसे भजता । अद्वय-बोधसे ॥ ४८ ॥
जब सर्वत्र मैं हूं तब अलग भजन कैसे ?—
या अनादि यह अनेक । भिन्नत्व है अनेकानेक ।
तथा है नाम-रूपादिक । वह भी बिषम ॥ ४९ ॥
इसीलिए विश्व है भिन्न । न भेदता उसका ज्ञान ।
जैसे अंग हैं भिन्न भिन्न । पर शरीर एक ॥ २५० ॥
शाखाओंके अनेक प्रकार । किंतु है एक ही तरुवर ।
रश्मि ढेर, एक दिनकर । वैसे ही पार्थ ॥ ५१ ॥
ज्ञानेश्वरी २७०