ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
यह ज्ञेय जो यहां संपूर्ण । इसका ज्ञाता तू एक जान ।
सूर्य ऐसे सबका वर्णन । करना क्या फिर ॥ ३९ ॥
सुनके यह श्रीकृष्ण । बोलता है तू अर्जुन ।
है क्या हमारा वर्णन । यह अल्प ॥ १३४० ॥
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ ६४ ॥
अनन्य भक्तसे कहा गया हृदयका गूढ—
एकाग्र कर संपूर्ण ध्यान । फिरसे यह बात तू सुन ।
मेरा वचन यह अर्जुन । जो अति निर्मल ॥ ४१ ॥
वाच्य है इसीलिये बोलना । या श्रव्य है इसीलिये सुनना ।
ऐसे नहीं तो तेरा अर्जुना । भला है भाग्य ॥ ४२ ॥
नहीं होती है कभी दृष्टि प्रेमार्द्र । पिल्लोंको कूर्माकी दृष्टि है प्रेमार्द्र ।
वैसे ही होता आकाश भी प्रेमार्द्र । चातकके लिये ॥ ४३ ॥
जहां जो व्यवहार नहीं होता । उसका फल भी तब मिलता ।
जब दैव अनुकूल हो जाता । उस समय ॥ ४४ ॥
वैसे जो द्वैतका आना जाना । रोकके ऐक्य-घरमें जाना ।
तथा वहांका सुख भोगना । जो है रहस्य ॥ ४५ ॥
तथा जो निरुपचार प्रेम । विषय होता है प्रियोत्तम ।
दूसरा नहीं होकर आत्म । जानना यह ॥ ४६ ॥
देखनेके लिये दर्पण । पोंछना स्वच्छ जो अर्जुन ।
अपने लिये होता जान । उसके लिये नहीं ॥ ४७ ॥
तेरे लिये अब मैं पार्थ । बोलता अपने ही साथ ।
मैं तू यह भेद यथार्थ । नहीं हममें ॥ ४८ ॥
गूढ जो सब गूढोंका फिरसे वाक्य उत्तम ।
हितार्थ कहता तेरे होगा तू सुन मप्रिय ॥ ६४ ॥
८२९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
इसीलिये यह हृदयका गुह्य । कहता मैं जीवसे ही धनंजय ।
अनन्यगति भक्तसे कैसे सह्य । रखना यह गूढ ॥ ४९ ॥
जलको सर्वस्व देता अपना । नून नहीं रहता तब भिन्न ।
तथा देनेमें सर्वस्व अं न । लजाता भी नहीं ॥ १३५० ॥
वैसे तू मुझमें अपना । न रखता द्वैत अर्जुन ।
तब तुझसे है छिपाना । रहा क्या गूढ ॥ ५१ ॥
इसीलिये गूढ जो संपूर्ण । खुलता है जिससे अर्जुन ।
यह शुद्ध गोप्य जो वचन । सुन तू अब ॥ ५२ ॥
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥
तब तू बाह्य और अंतर । अपने अन्य सभी व्यापार ।
मुझ व्यापकके धनुर्धर । कर विषय ॥ ५३ ॥
सर्वेंद्रिय मन वचन प्राणसे मुझमें लीन हो—
अथवा सर्वांगसे जैसे । वायु मिला है आकाशसे ।
सब कर्ममें तू भी वैसे । मुझसे मिल ॥ ५४ ॥
मानो तू अपना मन । कर मेरा ही सदन ।
मेरे श्रवणसे कान । भरे निरंतर ॥ ५५ ॥
आत्म-ज्ञानमें शुद्ध सिद्ध । रहते जो संत प्रसिद्ध ।
वहां हो तेरी दृष्टि बद्ध । कामुकोंकी सी ॥ ५६ ॥
सब विश्वका मैं वसतिस्थान । उस मेरे नाम जो अर्जुन ।
उसको अंतःकरणमें स्थान । दे तू वाचासे ॥ ५७ ॥
हाथोंका जो है करना । तथा पैरोंका चलना ।
यह ही मेरे कारण । ऐसे कर तू ॥ ५८ ॥
प्रेमसे करके ध्यान भज तू पूज तू मुझे ।
होगा तू मुझमें लीन प्रिय जो जान सत्य है ॥ ६५ ॥
ज्ञानेश्वरी ८३०
अपना अथवा पराया । उपकारमें धनंजय ।
कर तू योग्य उपाय । हो मेरा याज्ञिक ॥ ५९ ॥
एकेक क्या है यह सिखाना । अपनेमें पूजा भाव लाना ।
विश्व मद्रूप मान करना । पूजा सुखसे ॥ १३६० ॥
तब सब भूत-द्वेष मिटकर । करेगा मुझ एकको नमस्कार ।
इससे मेरा आश्रय धनुर्धर । पायेगा निश्चित ॥ ६१ ॥
तब इस विश्वमें भी फिर । तीसरेकी बात मिटकर ।
मेरा तेरा एकांत धनुर्धर । रहेगा केवल ॥ ६२ ॥
तब सभी अवस्थामें । मैं तुझमें तू मुझमें ।
भोग करेगा मोदमें । बढेगा सुख ॥ ६३ ॥
तब यहां जो प्रतिबंध करना । तीसरा जग सब मिट ही जाना ।
फिर है मेरा ही अनुभव आना । शेष जो मैं हूं ॥ ६४ ॥
जैसे जलकी जो प्रतिभा । जल नाशके होगी बिंब ।
होनेमें रहता विलंब । किसका वहां ॥ ६५ ॥
पवन तथा अंबर । या कल्लोल औ' सागर ।
मिलनेमें धनुर्धर । रोक है कैसे ॥ ६६ ॥
वैसे तू और मैं हम । दिखाते हैं देह-धर्म ।
फिर इसका विराम । मुझमें ही है ॥ ६७ ॥
इस मेरे बोलनेमें । शंका न कर मनमें ।
अन्यथा नहीं इसमें । तेरी सौगंध ॥ ६८ ॥
जैसे तेरी सौगंध लेना । मानो है अपनी ही लेना ।
प्रीति जातिको है लजाना । आता ही नहीं ॥ ६९ ॥
वेद कहता है निष्प्रपंच । जिससे विश्वाभास है सच ।
उसकी आज्ञाका नट-नाच । कालको जीतना ॥ १३७० ॥
यदि मैं देख सत्य-संकल्प । तथा विश्व-हितकर्ता बाप ।
तब मैं सौगंधका आक्षेप । करता ही क्यों ॥ ७१ ॥
८३१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
किंतु है तेरे ही कारण । देवत्व छोड़ा है अर्जुन ।
तथा रहा हूं मैं अपूर्ण । और पूर्ण हुवा तू ॥ ७२ ॥
राजा जैसे अपने कार्यार्थ । अपनी सौगंध देता पार्थ ।
वैसे मैं अपनी शपथ । लेता हूं अब ॥ ७३ ॥
इस पर कहता है पार्थ । देव ऐसे न बोल बहुत ।
तेरे नामसे होते समस्त । कार्य हमारे ॥ ७४ ॥
इतने परभी कहने बैठता । कहनेमें सौगंध भी तू दिलाता ।
इसभांति तेरा विनोद अनंता । असीम है देव ॥ ७५ ॥
जैसे कमलका विकास । करना रविका एकांश ।
किंतु देता पूर्ण प्रकाश । नित्य ही वह ॥ ७६ ॥
पृथ्वीको शांत करके सागर । भरते जितना वर्षता नीर ।
किंतु दिखा करके शाईंधर । बहाना चातकका ॥ ७७ ॥
इसभांति है यह तेरा औदार्य । मुझे निमित्त बनाके देवराय ।
विश्व-हितार्थ देता तू दयामय । यह ज्ञान-दान ॥ ७८ ॥
देव कहते रहने दे अर्जुन । न करना ऐसे हमारा वर्णन ।
इस उपायसे पायेगा तू जान । मत्स्वरूपको ही ॥ ७९ ॥
सैंधव जब सिंधुमें पड़ता । उसी क्षण पिघलने लगता ।
उसको कौन कारण रहता । अलग रहनेका ॥ १३८० ॥
सर्वत्र भजनेसे मुझे ऐसे । तत्वतः सब ही मैं हो जानेसे ।
अहंता सब नष्ट हो जानेसे । होता है मद्रूप ॥ ८१ ॥
इस भांति तुझे कर्मसे । मद्रूप होने तक ऐसे ।
साधना प्रकार जो ऐसे । बताये सारे ॥ ८२ ॥
कर्म सारे मुझको अर्जुन । करनेसे सदा समर्पण ।
मिलेगी मेरी वृत्ति प्रसन्न । तुझको सदैव ॥ ८३ ॥
मिलनेसे मेरा यह प्रसाद । तुझको होगा मेरा ज्ञान सिद्ध ।
तब समरस होगा विशुद्ध । मद्रूपमें तू ॥ ८४ ॥
ज्ञानेश्वरी ८३२
ऐसी स्थितिमें तुझको तब । न रहेगा साध्य साधने सब ।
करनेका रहता क्या तब । कह तू मुझको ॥ ८५ ॥
अपने सभी कर्मोंको अर्जुन । करनेसे मुझे सदा अर्पण ।
मिली है तुझे यह प्रसन्न । वृत्ति मेरी ॥ ८६ ॥
इसी लिये यह मेरा प्रसाद । तोडकर बुद्धिका प्रतिबंध ।
देता है तुझे यहां आत्मबोध । ऐसे पगलाके मैं ॥ ८७ ॥
इससे स-प्रपंच अज्ञान जाता । एक ही एक मैं दीखता रहता ।
विविध रूपसे तुझे यहां पार्था । यह है गीता-तत्व ॥ ८८ ॥
तुझको अब यह मेरा अपना । विविध रूपसे दिया है जो ज्ञान ।
जिससे तजेगा तू सब अज्ञान । मूल जो धर्माधर्मका ॥ ८९ ॥
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥
शरणागतिका विवेचन—
आशासे जैसे दुःख जन्मता । निंदासे दुरित प्रसक्ता ।
वैसे जन्म लेती है दीनता । दुर्भाग्यसे ही ॥ १३९० ॥
वैसे स्वर्ग-नरक सूचक । जन्मता अज्ञान धर्मादिक ।
तभी तू वह कर निःशेष । ज्ञानसे सदैव ॥ ९१ ॥
करमें डोर उठाकर । छोड़ दे वह सर्पाकार ।
या निद्रा-त्यागसे संसार- । स्वप्नका वैसे ॥ ९२ ॥
अथवा जाने पर कामला । जाता है चंद्र प्रकाश पीला ।
व्याधि त्यागसे कडुवा भला । जाता है मुखका ॥ ९३ ॥
अथवा दिवसका त्याग करनेसे । मिटता मृगजल अपने आपसे ।
अथवा है जैसे लकडीके त्यागसे । तजता अग्नि ॥ ९४ ॥
सारे ही छोडके धर्म मेरा आश्रय तू कर ।
जलाऊंगा सभी पाप तेरा मैं शोक ना कर ॥ ६६ ॥
(92) ८३३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योय
वैसे धर्माधर्म जो सकल । दिखाता है अज्ञान है मूल ।
तजके वह त्यागो सकल । धर्मजात ॥ ९५ ॥
मिट जाता जब अज्ञान । सहज रहता मैं ही जान ।
जानेसे जैसे स-नींद स्वप्न । रहता है आप ॥ ९६ ॥
वैसे मैं एकके बिन नहीं । भिन्नाभिन्न कुछ भी कहीं ।
सोऽहं-बोधसे हो उसमें ही । अनन्य सदैव ॥ ९७ ॥
किंतु है उनसे भेद बिन । मेरा ही जानना एकपन ।
उसका ही नाम है शरण । आना मेरी ॥ ९८ ॥
जैसे घटका होनेसे नाश । गगनमें गगन प्रवेश ।
इस भांति होता समरस । आनेसे शरण ॥ ९९ ॥
स्वर्ण-मणि जैसे स्वर्णमें । या कल्लोल जैसे पानीमें ।
वैसे अर्जुन तू मुझमें । पा ले आश्रय ॥ १४०० ॥
भिन्न अस्तित्व रखकर शरणागतिका विवेचन—
अथवा समुद्रके उदरमें जैसे । वडवानल आश्रय पाता है वैसे ।
सिंधुको वह जलाके सुखाता वैसे । तज दे वह ॥ १ ॥
मेरे ही शरणमें आना । जीवत्वसे भिन्न रहना ।
निर्लज्ज है ऐसे बोलना । ऐसी वह प्रज्ञा ॥ २ ॥
सहज ही करता है धनुर्धर । कोई राजा जब दासीका स्वीकार ।
वह दासी भी समान स्तरपर । आती है वैसे ॥ ३ ॥
अजी ! विश्वेश्वर मैं भेटता । तथा जीव बंध न छूटता ।
ऐसी यह अमंगल वार्ता । न सुनना कभी ॥ ४ ॥
मद्रूप हो मुझसे मिलना । भक्ति मेरी ऐसी ही करना ।
ऐसी भक्ति देता है जो ज्ञान । उसको कर प्राप्त ॥ ५ ॥
जिस मट्ठेसे निकाला नवनीत । फिरसे उसीमें डाला वह पार्थ ।
फिर कभी उसमें नहीं मिलता । उसी प्रकार ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ८३४
लोहेपे जंग सहज चढ़ता । किंतु उसे जब परिस छूता ।
सुवर्णपे कभी नहीं चढ़ता । जंग अर्जुन ॥ ७ ॥
जाने दे काष्ठोंका कर मंथन । करने पर अग्निको उत्पन्न ।
उसी काष्ठमें कहो अग्नि कण । समाता क्या कभी ॥ ८ ॥
अभिन्न शरणागतिसे सभी मैं हो जाता हूँ—
ऐसे अद्वयत्वमें मुझ । शरण आनेसे है तुझ ।
धर्माधर्म जो है सहज । नहीं छूएंगे ॥ ९ ॥
कभी क्या कह तू दिनकर । देखता है क्या कहीं अंधार ।
जागृतिमें होगा क्या गोचर । कभी स्वप्न ॥ १४१० ॥
वैसे मुझमें होनेसे मिलन । मेरी सर्व-व्यापकतासे भिन्न ।
रहनेका क्या रहा कारण । कह तू मुझे ॥ ११ ॥
इसलिये उसकी नहीं । चिंता व्यर्थ करना कहीं ।
तेरे पाप पुण्यका मैं ही । बनूंगा सारा ॥ १२ ॥
जलमें गिरा हुवा लवण । सब ही जल होता अर्जुन ।
बनूंगा मैं अनन्य शरण । तुझको वैसे ॥ १३ ॥
वहां जो सभी बंधका कारण । पाप है मुझसे रहता भिन्न ।
मेरे बोधमें ही वह विलीन । होगा सारा ॥ १४ ॥
इतनेमें ही तू सहज । मुक्त हुवा है पार्थ आज ।
जान ले भली भांति मुझ । करूंगा मैं मुक्त ॥ १५ ॥
इसीलिये न रहा है अर्जुन । मनमें चिंताका कोई कारण ।
मुझ एकको मान तू शरण । आज ही सुमति ॥ १६ ॥
ऐसे सभी रूपसे जो सुंदर । तथा सभी दृष्टिसे जो चतुर ।
कहता है जो सर्व व्याप कर । रहता श्रीकृष्ण ॥ १७ ॥
फिर शाम-सुंदर स-कंकण । पसार कर स्व-बाहू दक्षिण ।
आलिंगन करता स्व-शरण । भक्त-राजको ॥ १८ ॥
८३५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-जोग
भक्त और भगवानका सामरस्य—
नहीं पा करके जिसको । बगलमें मार बुद्धिको ।
वाचा लौट आई पीछेको । जिस स्थानसे ॥ १९ ॥
ऐसा है जो कुछ एक । वाणी बुद्धिको रोक ।
देनेमें किया है सुख । आलिंगन ॥ १४२० ॥
हृदयसे हुवा हृदय एक । हृदय हृदयमें सना नेक ।
द्वैत न भंगते किया है देख । अपनासा अर्जुनको ॥ २१ ॥
दीपसे दीप जलाया । ऐसा आलिंगन भया ।
द्वैत न तोड़ते किया । अपनासा पार्थ ॥ २२ ॥
तब आया सुखका पूर । पार्थमें वह भरपूर ।
बडे भी यहां डूबकर । गये प्रभु पूर्ण ॥ २३ ॥
सिंधुसे सिंधु मिलने आता । पानी उसमें दूना बढ़ता ।
उफानमें ओछा ही दीखता । तब आकाश ॥ २४ ॥
वैसे उन दोनोंका मिलन । यहां समेटे किसको कौन ।
किंतु यहां तब नारायण । ढूंंसता विश्व ॥ २५ ॥
गीता वेदका भी मूल-सूत्र है—
ऐसे जो वेदका मूल-सूत्र । सर्वाधिकार एक पवित्र ।
श्रीकृष्णने तब गीताशास्त्र । किया प्रकट ॥ २६ ॥
वेदोंका मूल है कैसी गीता । ऐसे कोई मुझसे पूछता ।
तब जो मैं संबंध कहता । यह प्रसिद्ध ॥ २७ ॥
अजी बने जिसके निःश्वास । इससे बनी वेदोंकी रास ।
सत्य प्रसिद्ध बोलता खास । स्व-मुखसे यह ॥ २८ ॥
इसीलिये वेदोंका मूलभूत । गीता-तत्त्व कहना है उचित ।
अन्य भी एक यहां यथार्थ । उपपत्ति भिन्न ॥ २९ ॥
स्वरूपसे जो नहीं नाशता । विस्तार आपमें समा लेता ।
उसीको असीम कहा जाता । विश्वमें संपूर्ण ॥ १४३० ॥
ज्ञानेश्वरी ८३६
वह कांड - त्रयात्मक । शब्दराशि जो अशेष ।
गीतामें है रहा सुख । बीजमें जैसे ॥ ३१ ॥
इसीलिये वेदका बीज । श्रीगीता ही है यह मुझ ।
लगा है वैसे भी सहज । लगता ही है ॥ ३२ ॥
जो है वेदके तीनों भाग । गीतामें उमडे हैं चांग ।
भूषण करनेसे सर्वांग । शोभता जैसे ॥ ३३ ॥
कर्मादिक जो उसके तीन । कांड हैं यहां किस स्थान ।
गीतामें है जो वे संपूर्ण । दिखाऊंगा अब ॥ ३४ ॥
गीता और वेदकी समानता—
गीताका जो पहला पर्व । शास्त्र-प्रवृत्तिका प्रस्ताव ।
दूजा सांख्य - शास्त्र सद्भाव । है प्रदर्शित ॥ ३५ ॥
मोक्ष-दानमें जो स्वतंत्र । ज्ञान प्रधान यह शास्त्र ।
इसीमें है यह सु-सूत्र । लिया हाथमें ॥ ३६ ॥
फिर हैं जो अज्ञानमें बद्ध । मोक्ष-पदमें चढ़ने सिद्ध ।
उन्हे साधनारंभ विशुद्ध । कहा तीसरेमें ॥ ३७ ॥
तथा जो देहाभिमानमें बद्ध । छोडकर काम्य-कर्म निषिद्ध ।
विहित कर्म करें अप्रमाद । कहा है यह ॥ ३८ ॥
सद्भावसे ऐसे कर्म करना । तीसरे अध्यायका है कहना ।
श्रीकृष्णका निर्णय जो जानना । कर्मकांड ॥ ३९ ॥
और वे ही नित्यादिक । अज्ञानंका आवश्यक ।
आचरनेसे मोचक । होगा ऐसे ॥ १४४० ॥
ऐसी जब अपेक्षा होती । बद्धमें मुमुक्षुता आती ।
तब ब्रह्मार्पणत्व कृती । करना भी सिखाया ॥ ४१ ॥
जो काया वाचा मनसे । विहित हो सब ऐसे ।
वह ईश्वरोद्देश्यसे । करनेको कहा । ४२ ॥
८३७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-बोध
कर्मयोगसे उपासना । ईश्वर-स्थानमें करना ।
श्रीहरिका यह कहना । चौथेके अंतमें ॥ ४३ ॥
वहांसे जो एकादशाध्याय । पूर्ण होने तक धनंजय ।
कर्मसे ईश-भजन कार्य । कहा है सारा ॥ ४४ ॥
इन आठ अध्यायोंमें है स्पष्ट । देवताकांड किया है निर्दिष्ट ।
शास्त्रोंमें कहे गये सभी पट । खोले हैं यहां ॥ ४५ ॥
तथा यही ईश्वर-प्रसादसे । मिलता श्रीगुरु-संप्रदायसे ।
सच्चा अपरिपक्व ज्ञान जिसे । प्रतीत किया जान ॥ ४६ ॥
वही अद्वेष्टावि श्लोकोंमें । तथा अमानित्वादिकमें ।
परिपक्व किया ज्ञानमें । बारहवाका अंत ॥ ४७ ॥
वह बारहवाका अध्याय प्रथम । तथा पंद्रहवा अध्याय अंतिम ।
ज्ञान-फल-पाक सिद्ध निरुपम । है निरूपण ॥ ४८ ॥
इसीलिये इन चारमें । ऊर्ध्व-मूलांत अध्यायमें ।
ज्ञान-कांड इस स्थानमें । कहा गया है ॥ ४९ ॥
एवं कांडत्रय निरूपण । करता है जो श्रुति-वचन ।
गीता पद रत्नोंके भूषण । पहनते यहां ॥ १४५० ॥
कहने पर ये कांडत्रयात्मक । श्रुति मोक्ष-फल जो है एक ।
प्राप्त करना है यह आवश्यक । कहा गरजकर ॥ ५१ ॥
उसीके साधन ज्ञानसे । वैर करते जो सदासे ।
अज्ञान वर्ग है जो उसे । कहा सोलहवेमें ॥ ५२ ॥
शास्त्रोंके यहां इसी साथीको । साथ ले जीतना है शत्रूको ।
ऐसा वह संदेश सबको । देता सत्रहवां ॥ ५३ ॥
इसभांति है पहलेसे । सत्रहवें तक जो ऐसे ।
बखाने हैं स्पष्ट-रूपसे । स आत्म-विश्वास ॥ ५४ ॥
यह अर्थ जात संपूर्ण । किया तात्पर्य अर्थ-पूर्ण ।
अष्टादशमें निरूपण । कलशाध्याय जो ॥ ५५ ॥
ज्ञानेश्वरी ८३६
ऐसा वह सकल सांख्य सिंधु । श्रीमद्भगवद्गीताका प्रबंध ।
सर्व-ज्ञान औदार्य-रूप वेद । मूर्तिमान है यह ॥ ५६ ॥
वेदोंकी कृपणता और गीताकी उदारता—
मूलमें हैं वेद अति संपन्न । किंतु हैं जो उतने ही कृपण ।
कानमें लगे मात्र तीन वर्ण । अन्योंसे दूर ॥ ५७ ॥
यहां भव-व्यथामें जो ग्रस्त । स्त्री शूद्र आदि प्राणि हैं व्यस्त ।
उन्हे अवसर न दें स्वस्थ । बैठे हैं वेद ॥ ५८ ॥
पीछेका यह व्यंग देख कर । उसको करनेमें अब दूर ।
प्रकाशमें आया है वेद-सार । गीताके रूपमें ॥ ५९ ॥
अर्थसे मनमें प्रवेश कर । श्रवणसे कानमें भरकर ।
पठनार्थ मुखमें घर कर । रहती है जो ॥ १४६० ॥
गीताका पाठ जो जानता । उसके साथ जो रहता ।
गीता लिखकर उठता । पुस्तक रूपमें ॥ ६१ ॥
ऐसा ऐसा निमित्त कर । संसारके चौराहे पर ।
डालते हैं अपरंपार : अन्न छत्र वेद ॥ ६२ ॥
अंतरिक्षमें करने विहार । तथा बसने आ पृथ्वी पर ।
सर्व-दीप्तिके अन्य व्यवहार । चलते आकाशसे ॥ ६३ ॥
करते हैं जो गीता-तत्व सेवन । उनमें उत्तम अधम न मान ।
सबको कैवल्य-दान दे समान । विश्वको देती शांति ॥ ६४ ॥
पिछली निंदासे डरकर । वेद बैठे गीताके अंदर ।
अब पाते हैं कीर्ति सुंदर । गीतासे दिगंत ॥ ६५ ॥
इसीलिये वेदोंकी सुसेव्यता । वह जो यहां मूर्ति रूप है गीता ।
पार्थसे यहां श्रीकृष्ण कहता । उपदेशरूप ॥ ६६ ॥
बछियाके निमित्त जो क्षीर । मिलता है वह पीता घर ।
वैसे करता जगदुद्धार । पार्थके निमित्त ॥ ६७ ॥
८३९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-बोध
करके चातकका निमित्त । दौड़ते मेघ पानीके साथ ।
तथा करते विश्वको शांत । उसी प्रकार ॥ ६८ ॥
अथवा अनन्य गति जो कमल । उसके लिये है सूर्य यथा काल ।
उदय होकर देता है सकल । सुख विश्वको ॥ ६९ ॥
वैसे अर्जुनको कर कारण । गीता प्रकाशित कर श्रीकृष्ण ।
दूर किया भार जन्म मरण । इस संसारका ॥ १४७० ॥
शास्त्र-रत्नोंकी दीप्ति सकल । तीनों लोकमें कर उज्ज्वल ।
कृष्ण-मुखाकाशमें निर्मल । शोभता गीता-सूर्य ॥ ७१ ॥
पितृ-कुल किया जो पवित्र । पार्थ इस ज्ञानका हो पात्र ।
जिसने किया गीता स्वतंत्र । विश्वका घर ॥ ७२ ॥
द्वैत स्थितिमें आकर गुरु-शिष्य संवाद—
फिर वह जगद्गुरु श्रीकृष्ण । पार्थका जो अद्वय मिलन ।
समेट लेता है उसी क्षण । द्वैत-स्थितिमें ॥ ७३ ॥
जब कहता है यहां श्रीकृष्ण । जीव करता क्या शास्त्र-ग्रहण ।
तब कहता है पार्थ श्रीकृष्ण । कृपा देवकी ॥ ७४ ॥
अजी ! पानेमें निधान । भाग्य लगता अर्जुन ।
भोगमें वह धन । उससे अधिक ॥ ७५ ॥
जैसे क्षीर-सागरके समान । न जमता जो दूधका बर्तन ।
सुर असुरोंको कैसे मंथन । करना पडा है ॥ ७६ ॥
उस प्रयत्नका भी आया फल । आंखोंसे देखा अमृत निर्मल ।
जतन करनेमें है सकल । गये चूक ॥ ७७ ॥
परोसा जो अमृतत्व पानेमें । कारण हुवा जो मृत्यु लानेमें ।
न जान कर भोग भोगनेमें । होता है ऐसा ॥ ७८ ॥
नहुष हुवा जो स्वर्गाधीश्वर । किंतु भूला वहांका व्यवहार ।
इससे सर्प हुवा पृथ्वीपर । जानता है तू ॥ ७९ ॥
ज्ञानेश्वरी ८४०
तूने बहुत पुण्य किया । उससे आज धनंजया ।
सुननेमें सुपात्र भया । गीता-तत्व ॥ १४८० ॥
इस शास्त्रके धनुर्धर । संप्रदायको ओढ़कर ।
आचर तू शास्त्रानुसार । भली भांति ॥ ८१ ॥
नहीं तो अमृत-मंथन । वैसे होगा जान अर्जुन ।
यदि होगा अनुष्ठान । संप्रदाय छोड़ ॥ ८२ ॥
गाय मिली है भली भाग्यसे । किंतु दुहना आता है उसे ।
नहीं तो दूध मिलेगा कैसे । मिलकर भी व्यर्थ ॥ ८३ ॥
वैसे गुरु होकर प्रसन्न । शिष्यको देता है विद्या-दान ।
संप्रदाय-युक्त अनुष्ठान । करनेसे फलती है ॥ ८४ ॥
इसीलिये यहां धनंजय । गीता शास्त्रका जो संप्रदाय ।
कहता सुन इस समय । आदरसे तू ॥ ८५ ॥
इदं ते नातपस्याय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥
यह इससे नहीं कहना चाहिये—
तुझे मिला यह जो पार्था । इसमें रखनेसे आस्था ।
तपोहीनको जो सर्वथा । कहना नहीं ॥ ८६ ॥
या तापस भी हुवा अर्जुन । किंतु है गुरु-भक्तिसे हीन ।
उनको वैसे ही दूर मान । जैसे अंत्यजको वेद ॥ ८७ ॥
अथवा पुरोडासु जैसा । मृगको नहीं देते वैसा ।
न दो गीता वैसे तापसा । गुरु-भक्तिहीन ॥ ८८ ॥
तथा तनसे जो है तपता । गुरु-देवको भी है भजता ।
किंतु जो सुनना न चाहता । उसको न कहना ॥ ८९ ॥
न है जिसे तपोभक्ति उसे न कह तू यह ।
ईर्षा जो करता मेरी न चाहता सुने इसे ॥ ६७ ॥
८४१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
ऊपरके दोनों गुण । जिसमें है विद्यमान ।
करने गीता श्रवण । नहीं योग्य ॥ १४९० ॥
उत्तम है जैसे मुक्ताफल । उसमें नहीं रंध्र सरल ।
गुण-प्रवेश होंगे निर्मल । उसमें कैसे ॥ ९१ ॥
सागर होता अति गंभीर । कौन करता है अस्वीकार ।
व्यर्थ जाती वर्षा धनुर्धर । उसपे जो होती ॥ ९२ ॥
दिव्यान्न देकर तृप्तको । व्यर्थ करनेसे उसको ।
वही नहीं दें क्यों भूखेको । उदारतासे ॥ ९३ ॥
हो सुयोग्य वह कितना ही । सुननेमें जिसे प्रेम नहीं ।
उसको गीता कहना नहीं । किसी समय ॥ ९४ ॥
रूप-दर्शी है सुजान नयन । किंतु नहीं परिमलमें प्राण ।
उसको देना सुगंध अर्जुन । उपयोग क्या है ॥ ९५ ॥
इसीलिये तप और भक्ति । यह देखना सुभद्रापति ।
किंतु सुननेमें अनासक्ति । न कहना उसे ॥ ९६ ॥
जिसमें तप और भक्ति । सुननेमें भी अनुरक्ति ।
इतना देखकर भी संगती । धनुर्धर ॥ ९७ ॥
जो है गीता-शास्त्रका निर्माता । वह मैं सकल-लोक-शास्ता ।
उसको जो सामान्य मानता । अपने मनमें भी ॥ ९८ ॥
तथा देव और संतोंकी नित । करता रहता निंदाकी बात ।
उसको गीता सुननेमें पार्थ । नहीं मानो योग्य ॥ ९९ ॥
वैसे उनकी संपूर्ण । सामग्री योग्य है मान ।
किंतु वह दीप बिन । रहता है रातमें ॥ १५०० ॥
अंग गौर और तरुण । ऊपर पहना भूषण ।
किंतु नहीं उसमें प्राण । उपयोग क्या है ॥ १ ॥
सुवर्णका घर सुंदर । निर्माण किया धनुर्धर ।
किंतु है सर्पांगना द्वार । रोक बैठी है ॥ २ ॥
ज्ञानेश्वरी ८४२
बनाया गया नाना विध पक्वान्न । उसमें मिलाया कालकूट मान ।
अथवा छल भरी मैत्री अर्जुन । रहती है जैसे ॥ ३ ॥
वैसे तप भक्ति मेधा । उसकी जान प्रबुद्धा ।
करता जो मेरी निंदा । तथा मद्भक्तोंकी ॥ ४ ॥
इसी कारण तू पांडुकुमार । भक्त तपी मेधावी होनेपर ।
गीता उसको त्याज्य मान कर । न कह तू बाबा ॥ ५ ॥
क्या कहूं यदि वह निंदक । योग्य है सृष्टिकर्ता सरीखा ।
गीता-ग्रंथ यह सकौतुक । न दे उसको ॥ ६ ॥
तभी है तपका धनुर्धर । पत्थरका बाडा बना कर ।
रचा गुरु-भक्तिका सुंदर । प्रासाद जिसने ॥ ७ ॥
वैसे ही श्रवणेच्छा द्वार । खुला रखना चारों प्रहर ।
फिर रचा कलश सुंदर । अनिंदा रत्नका ॥ ८ ॥
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ ६८ ॥
मेरे भक्तोंसे जो यह गीता कहेगा वह मद्रूप होगा—
देख ऐसा भक्तालय सुंदर । प्रतिष्ठा कर वहां गीतेश्वर ।
तुलेगा तू मेरे समान फिर । इस विश्वमें निश्चित ॥ ९ ॥
क्यों कि जो एकाक्षरपनमें । तीन मात्राओंके उदरमें ।
फंसाथा वहां गर्भ-वासमें । यह प्रणव ॥ १५१० ॥
यह वेद-बीज जो ओंकार । गीता विस्तारसे फैलकर ।
या गायत्री फल-फूलकर । आयी है श्लोकोंमें ॥ ११ ॥
यह जो मंत्र-रहस्य गीता । मेरे भक्तोंसे जो है कहता ।
अनन्य शिशुको जैसे माता । देती है जीव ॥ १२ ॥
कहेगा गूढ जो श्रेष्ठ मेरे भक्त-गणों सह ।
उसी परम भक्ती से मिलेगा मुझमें वह ॥ ६८ ॥
८४३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-गोम
अध्याय १५: पुरुषोत्तमयोग
वैसे भक्तोंको जो गीतासे । परिचय कराता ऐसे ।
देह-पातपे है मुझसे । मिलता वह ॥ १३ ॥
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ६९ ॥
उसे मैं अपना हृदय-सिंहासन देता हूं—
अथवा ले शरीरका भूषण । लेकर रहता है भिन्न जान ।
तब भी मेरा यह जीव प्राण । जान तू पार्थ ॥ १४ ॥
ज्ञानी कर्मठ तापस । जो है ये मेरे मानस ।
इनमें वह विशेष । प्रिय है मेरा ॥ १५ ॥
भूतल पर ऐसे संपूर्ण । अन्य कोई नहीं है अर्जुन ।
गीता कहता जो भक्त-जन- । मेलेमें मेरे ॥ १६ ॥
धरके मुझ ईश्वरका लोभ । गीता कहता है जो हो अक्षय ।
वह भूषण होता है सुलभ । संत-समाजका ॥ १७ ॥
नव-पल्लवोंसा रोमांचित । तथा मंदानिलसा कंपित ।
आमोद-जलसा हो द्रवित । पुष्य-नयन जैसे ॥ १८ ॥
कोकिल कल-रव वत । सगद्गद करके बात ।
मद्भक्तोग्रानमें वसंत । करता प्रवेश ॥ १९ ॥
सफल जन्म माने जैसे चकोर । वैसे उदित होता शशि अंबर ।
या नव-मेघ आते सुन पुकार । मयूरके जैसे ॥ १५२० ॥
वैसे सज्जनोंके मेलेमें जाकर । गीता पद रत्नोंका बरखा कर ।
मेरे स्वरूप प्राप्तिकी हेतु भर । रख अपनेमें ॥ २१ ॥
तब उससे मेरा कोई प्रिय । नहीं दीखता मुझे धनंजय ।
मेरे भक्तोंके सारे समुदाय । मध्यमें और ॥ २२ ॥
कोई मेरा नहीं पार्थ उससे बढके प्रिय ।
वैसे ही न कभी होगा जगमें उससे प्रिय ॥ ६९ ॥
ज्ञानेश्वरी ८४४
क्या कहूं मैं तुझे अब अर्जुन । संतोंको देता जो गीता भोजन ।
देता हूं मैं उसको सिंहासन । मेरे अंतःकरणका ॥ २३ ॥
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥ ७० ॥
मेरा तेरा यह जो मिलन । जिससे बढ़ा यह कथन ।
खिला मोक्ष-धर्मका जीवन । जिस स्थानपे ॥ २४ ॥
यह जो सकालार्थ प्रद । हम दोनोंका है संवाद ।
नहीं करके पद-भेद । करना आवर्तन ॥ २५ ॥
उस ज्ञानाग्निमें जो है प्रदीप्त । मूल अविद्या-आहुति दे पार्थ ।
किया है मुझको संतोषित । परमात्मा मैं ॥ २६ ॥
करने गीतार्थ विवेचन । ज्ञानियोंमें जो है बुद्धिमान ।
प्राप्त होते हैं कर पठन । ब्रह्म-रूप यह ॥ २७ ॥
गीता पाठकको भी ऐसे । फल अर्थज्ञको है जैसे ।
गीता-मातामें भेद ऐसे । न है छोटे बडेका ॥ २८ ॥
श्रद्धावाननसूयश्चशृणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥ ७१ ॥
तथा सभी मार्गमें निंदा । छोड़कर आस्था में शुद्ध ।
गीता श्रवणमें ही श्रद्धा । रखता है जो ॥ २९ ॥
करेंगे जब उनके कान । गीताके अक्षरोंका श्रवण ।
करेंगे दुरित पलायन । उसी समय ॥ १५३० ॥
वनमें होते ही अग्निका प्रवेश । वहां करते जो पशु-पक्षी वास ।
छोड दौड़ते हैं दिशाएं दस । मिलती जहां राह ॥ ३१ ॥
यह जो धर्म-संवाद अभ्यासेंगे जहां कहीं ।
मानता पूजते हैं वे मुझको ज्ञान-यज्ञसे ॥ ७० ॥
सुनेगा यह जो कोई श्रद्धासे द्वेष छोडके ।
पायेगा कर्म-पूतोंकी मुक्त हो वह सद्गती ॥ ७१ ॥
८४५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
अथवा जैसे उदयाचल पर । झलकते ही रवि-किरणके हार ।
खो जाता है अंतरालमें तिमिर । उसी भांति ॥ ३२ ॥
वैसे ही कर्णोंके महाद्वार । सुनते हैं गीताका गजर ।
मिटता है सभी पाप भार । सृष्ट्यादिका भी ॥ ३३ ॥
इससे भावी जन्म सर्वत्र । होते जाते हैं अति पवित्र ।
इससे अन्य ऐसे हैं अत्र । भारी पुण्य ॥ ३४ ॥
तथा इस गीताके हैं अक्षर । कानोंसे जाके हृदय-गव्हर ।
उतने ही करते हैं जो पूर । अश्वमेध याग ॥ ३५ ॥
तभी है श्रवणसे पाप हरता । वैसे ही धर्मको उन्नत करता ।
इससे स्वर्गका राज्य है मिलता । अंतमें जो ॥ ३६ ॥
मेरे पास आनेमें अर्जुन । स्वर्ग है पहला ही सदन ।
उसको भोग फिर सज्जन । मिलते मुझमें ही ॥ ३७ ॥
इस प्रकार गीता पार्था । जो सुनता और पढ़ता ।
उसे ब्रह्मानंद मिलता । मेरे रूपका ॥ ३८ ॥
यह सारा रहने दे पार्थ । किस लिये तुझे कही गीता ।
उसका क्या हुवा है स्पष्टता । कह तू मुझे ॥ ३९ ॥
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसः ।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनंजय ॥ ७२ ॥
सुन कर स्व-अज्ञान जन्य मोह दूर हुवा क्या—
तो तू मुझसे कह अर्जुन । यह शास्त्र-सिद्धांत संपूर्ण ।
किया न चित्त देके श्रवण । जीवभावसे ॥ १५४० ॥
हमने यहां जैसे जिस भांति । कानोंको दी है गीताकी संपत्ति
कानोंसे वह हृदयमें पूर्ति । रोपी है न ? ॥ ४१ ॥
इसे तूने सुना है न पूरा एकाग्र चित्तसे ।
अज्ञान रूप जो तेरा मिटा क्या मोह मूलता ॥ ७२ ॥
ज्ञानेश्वरी ८४६
अथवा वह बीचमें । गिरा फैला है व्यर्थमें ।
या वैसे ही उपेक्षामें । दिया छोड़ ॥ ४२ ॥
या मैंने जैसे कथन किया । हृदयमें वैसे रोपन भया ।
मुझसे कह तू धनंजया । पूछता हूं मैं ॥ ४३ ॥
था जो स्व-अज्ञान जनित । मोहमें हो चित्त भ्रमित ।
कर्माकर्म-मोहकी बात । रही क्या अब ॥ ४४ ॥
यह सब भला मैं क्यों पूछता । यह मैं करता या न करता ।
यह अपने हाथमें मानता । क्या तू अब भी ॥ ४५ ॥
स्वानंदैक्य इसमें पार्थ । गलेगा मान कर द्वैत ।
भावमें लाता लक्ष्मीनाथ । प्रश्न करके ॥ ४६ ॥
अर्जुनका समरसैक्यसे द्वैतमें अवतरण—
पूर्ण-ब्रह्म हुवा है पार्थ । अगला कार्य साधनार्थ ।
नहीं होने देता श्रीकांत । मर्यादा भंग ॥ ४७ ॥
स्वयं वैसे जो करता । सर्वज्ञ क्या नहीं जानता ।
किंतु श्रीकृष्ण है पूछता । सकारण ही ॥ ४८ ॥
ऐसे करके वह प्रश्न । लुप्त-प्राय अर्जुनपन ।
पूर्णत्वसे लाके कथन । कराता है अब ॥ ४९ ॥
जैसे क्षीराब्धि तटपर । नभमें बैठा रश्मिकर ।
अभिन्न हो भिन्न होकर । दीखता पूर्णचंद्र ॥ १५५० ॥
वैसे ब्रह्म मैं यह भूलता । ब्रह्मसे विश्व ही भरता ।
यह भी भूल सहज होता । स्वयं ब्रह्मत्व ॥ ५१ ॥
भूलता स्मरता ऐसे ब्रह्मत्व । देह दुख सीमापे मान तत्व ।
अर्जुन मैं ऐसा नाम-रूपत्व । लेके खडा रहा ॥ ५२ ॥
फिर वह कंपित करतल । दबाकर कुछ रोमांच-मूल ।
अपने आपमें ही स्वेद जल । पचा करके ॥ ५३ ॥
८४७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
प्राण-क्षोभसे डुलता हुवा । अंग अंगसे संभाला हुवा ।
हल चल सब भूल हुवा । खडा सूना स्तंभसा ॥ ५४ ॥
नेत्र-युगलसे बहते । आनंदामृतसे झरते ।
आंसुओंको जो संभालते । अति कष्टसे ॥ ५५ ॥
विविध औत्सुक्यका भार । भरा था गलेमें आकर ।
उसको कुछ दबाकर । हृदयमें तब ॥ ५६ ॥
वाचाका द्रवना । प्राण संभालना ।
अक्रम श्वासन । सुचारुकर ॥ ५७ ॥
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहःस्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥
तेरा दर्शन सब कुछ देता है—
अर्जुन कहता यह क्या देव । पूछता क्या रहा अब भी मोह ।
गया वह स-कुटुंब छोड ठाव । लेकर सब साथ ॥ ५८ ॥
पास आकरके दिनकर । पूछता आ आंखोंसे अंधार ।
दीखता क्या कहो किसी ओर । दीखेगा क्या वह ॥ ५९ ॥
ऐसा है तू श्रीकृष्ण । हमें देता दर्शन ।
क्या न देगा दर्शन । यही हमको ॥ १५६० ॥
फिर प्रेमसे माताके समान । कहता है बोध पूर्ण वचन ।
किसी उपायसे न होता ज्ञान । उस विषयमें ॥ ६१ ॥
और पूछता मोह है या नहीं । ऐसा यह पूछना रहा कहीं ।
कृतकृत्य हुवा मैं मुझमें ही । तेरे ही रूपसे ॥ ६२ ॥
अर्जुनने कहा
मिटा है मोह तो देव कृपासे बोध भी हुवा ।
हुवा निःशंक मैं आज करूंगा जो कहा मुझे ॥ ७३ ॥
ज्ञानेश्वरी ८४८