ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
तभी है इस अध्यायमें । न रहा कुछ कहनेमें ।
अब रहा गुरु-शिष्योंमें । स्नेहाचार ॥ ४६ ॥
ऐसे इस विषयकी बात । हो गयी है ज्ञानियोंको ज्ञात ।
किंतु हुए अन्य आकांक्षित । मुमुक्षुजन ॥ ४७ ॥
ऐसे जो मैं पुरुषोत्तम । ज्ञानसे मिलता सुवर्म ।
वह सर्वज्ञ मैं औ' सीमा । वही भक्तिकी ॥ ४८ ॥
इस भांति यह त्रिलोक नायक । बोला उस अध्यायका एक श्लोक ।
तब वहां तोषसे वर्णन एक । किया विज्ञानका ही ॥ ४९ ॥
संसारका एक कौर कर । जीवको एक दृष्टिसे देखकर ।
आनंद साम्राज्य सिंहासन पर । बिठाया है यह ॥ ५० ॥
उपाय नहीं इतना समर्थ । कहता है देव अन्य यथार्थ ।
यही एक सम्यक् ज्ञानका नाथ । सभी उपायोंमें है ॥ ५१ ॥
ज्ञान प्राप्तिका उपाय—
होते जो आत्म-जिज्ञासु ऐसे । सादर तथा प्रसन्नतासे ।
उतारते हैं ज्ञान परसे । अपना जीव ॥ ५२ ॥
जिस पर जब प्रेम होता । वही वही सम्मुख है आता ।
अन्य सबको पीछे हटाता । ऐसे है प्रेमका ॥ ५३ ॥
इसी लिये मुमुक्षु जिज्ञासुओंमें । नहीं करते ज्ञानानुभव अपनेमें ।
करेंगे योग-क्षेम ज्ञानके विषयमें । स्वाभाविक रूपसे ॥ ५४ ॥
तब है जो यह सम्यकज्ञान । कैसे होगा अपने स्वाधीन ।
या मिला उसका वृद्धि-यत्न । होगा कैसे ॥ ५५ ॥
या न होने देता जो ज्ञान उत्पन्न । तथा उदित ज्ञानका अप्रयोजन ।
ऐसे ज्ञान विरुद्धका होना भान । यह आवश्यक ॥ ५६ ॥
फिर ज्ञानका जो प्रतिकूल । दूर करना वह सकल ।
तथा ज्ञानका जो अनुकूल । करें स्वीकार ॥ ५७ ॥
६२९ देवासुर-संपद्विभाग-योग
जिज्ञासु-जन आप समस्त । सोचते ऐसे अपने चित्त ।
यह पूर्ण करने यथार्थ । बोलेंगे श्रीहरि ॥ ५८ ॥
जिससे होगा ज्ञान उत्पन्न । आप होंगे विश्रांतिसे पूर्ण ।
ऐसे दैवी-गुणोंका वर्णन । करेंगे श्रीहरि ॥ ५९ ॥
ज्ञानका कर अनादर । राग-द्वेषको दे आधार ।
वे आसुरी गुण भी घोर । कहेंगे स्पष्ट ॥ ६० ॥
इष्टानिष्ट दोनों स्वाभाविक । करता है जिनका कौतुक ।
उनका कथन किया देख । पहले नवममें ॥ ६१ ॥
वहां करना था इसका विस्तार । वहां अन्य विषय हुवा गोचर ।
तब यहां किया प्रसंगानुसार । उसका निरूपण ॥ ६२ ॥
इसका अब निरूपण । सोलहवेमें करेंगे पूर्ण ।
क्रमानुगत संख्या जान । पहलेसे जो ॥ ६३ ॥
रहने दो यहां है जो प्रस्तुत । जाननेमें ज्ञानका हिताहित ।
देवासुर संपदा है समर्थ । कहेंगे अब ॥ ६४ ॥
जो है मुमुक्षुओंका पथ दर्शक । तथा मोह-रात्रिका तम नाशक ।
कहती दैवी संपदा अलौकिक । सुनो वह प्रथम ॥ ६५ ॥
जहां परस्पर पोषक । ऐसे पदार्थ जो अनेक ।
एकत्र करते हैं लोक । कहते हैं संपदा ॥ ६६ ॥
सुख संभावना जो दैवी । तथा दैवी गुणोपजीवी ।
होती है इसीलिये दैवी । संपत्ति है वह ॥ ६७ ॥
भगवान उवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ १ ॥
श्री भगवानने कहा
निर्भयत्व मनःशुद्धि व्यवस्था ज्ञानयोगमें ।
यज्ञ निग्रह दातृत्व स्वाध्याय ऋजुता तप ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ६३०
१ दैवी-गुण, अभय—
अब जो दैवी गुणके श्रेष्ठ । आसन पर बैठता ज्येष्ठ ।
गुण कहलाता है वरिष्ठ । अभय ऐसे ॥ ६८ ॥
कूदा ही नहीं महा-पूरमें । तब डूबना कहो किसमें ।
या रोग नहीं आता घरमें । पथ्यके कभी ॥ ६९ ॥
वैसे कर्माकर्मका अहंकार । उठने नहीं देता धनुर्धर ।
तथा संसार भय तजकर । रहना सदैव ॥ ७० ॥
अथवा ऐक्य भावसे भरकर । अपनेसे अन्य नहीं मानकर ।
भय-वार्ताको करता सीमा पार । पूर्ण रूपसे ॥ ७१ ॥
जब लवणको पानी डुबाता । तब लवण ही पानी बनता ।
वैसे आप ही अद्वय बनता । नाशता भय ॥ ७२ ॥
जिसको कहते हैं अभय । वह समझनेसे अद्वय ।
चलता रहता धनंजय । सदा सर्वत्र ॥ ७३ ॥
२ दैवी-गुण, सत्त्वसंशुद्धि—
तथा सत्त्वशुद्धि जो कहलाता । एसे लक्षणोंसे है जाना जाता ।
जो न जलता या नहीं बुझता । राखके जैसे ॥ ७४ ॥
या शुक्लमें जो न बढ़ता । या कृष्णमें जो न घटता ।
वैसे सूक्ष्म होके रहता । चंद्रमा जैसे ॥ ७५ ॥
या वर्षाका उतरा महापूर । ग्रीष्मका शुरू न हुआ उतार ।
वैसे निज रूपमें हो सुंदर । गंगा प्रवाहसा ॥ ७६ ॥
वैसे संकल्प विकल्पका खींचाव । रज तमका तज बोझ दबाव ।
अनुभवता निज-धर्म स्वभाव । बुद्धिमात्र ॥ ७७ ॥
इन्द्रिय-समूहसे जो दर्शित । उचित अथवा हो अनुचित ।
देख चित्त नहीं होता स्पंदित । किंचितमात्र ॥ ७८ ॥
घरसे दूर गया वल्लभ । पतिव्रताका विरह क्षोभ ।
भुला देता अन्य हानि लाभ । मनमें न डसता वैसे ॥ ७९ ॥
६३१ देवासुर-संपद्विभाग योग
वैसे ही सत्स्वरूपमें पार्थ । अनन्य हो रहना सतत ।
सत्त्व-शुद्धि कहता श्रीनाथ । असुरारी जो ॥ ८० ॥
३ दैवी-गुण, योगज्ञान व्यवस्थित—
तथा जो आत्म-लाभके विषयमें । ज्ञान या योग दोनोंमेंसे एकमें ।
रखना अचल निष्ठा हृदयमें । योग्यतानुसार ॥ ८१ ॥
अपनी सभी चित्त वृत्ति । तजना वहां इस भांति ।
निष्काम देता पूर्णाहुति । यज्ञमें जैसे ॥ ८२ ॥
या कुलीन कन्यादान । दिया सत्कुलमें ही मान ।
या लक्ष्मी स्थिर हुई जान । नारायणमें ॥ ८३ ॥
ऐसे अनन्य होकर । योग-ज्ञानमें स्थिर ।
होना जो गुण तीसरा । जाण तू पार्थ ॥ ८४ ॥
४ दैवी-गुण, दान—
तथा तन मन वचनसे । संपन्नतानुसार वित्तसे ।
आर्त शत्रुको भी ऋजुतासे । पांडुकुमार ॥ ८५ ॥
पत्र पुष्प तथा छाया । फल फूल धनंजया ।
पथिक जो पास आया । देता वृक्ष जैसे ॥ ८६ ॥
वैसे मनसे धन तक सब । जब जैसे आवश्यक हो तब ।
काममें लाना आता श्रांत जब । विश्रामार्थ ॥ ८७ ॥
इसको कहते हैं दान । जो मोक्ष निधान अंजन ।
रहने दे अब अर्जुन । सुन तू दम ॥ ८८ ॥
५ दैवी-गुण, दम—
अजी ! जो विषयेंद्रियोंका मिलन । उसको भंग कर देता भिन्न ।
जैसे खडु गंदला पानी अर्जुन । करता शुद्ध ॥ ८९ ॥
विषय स्पर्श न होने देता । इंद्रियोंको बचाके रखता ।
नियम बद्ध कर सौंपता । प्रत्याहारके ॥ ९० ॥
ज्ञानेश्वरी ६३२
चित्त तक सब तज अंदर । प्रवृत्ति चली जाती है बाहर ।
तब सजाता है इंद्रिय द्वार । वैराग्याभिसे ॥ ९१ ॥
श्वासोच्छ्वाससे भी जो कठिन । व्रत आचरता निशिदिन ।
उसमें न मिलता है क्षण । विश्रांति उसको ॥ ९२ ॥
दम कहते हैं जिसे । उसके लक्षण ऐसे ।
यागार्थको संक्षेपसे । कहता हूं सुन ॥ ९३ ॥
६ दैवी-गुण, यज्ञ—
ब्राह्मणोंसे स्त्रियों तक । सबका विधिपूर्वक ।
अपना कर्तव्य नेक । करना सब ॥ ९४ ॥
जिसका है जो सर्वोत्तम । भजनीय देवता-धर्म ।
वह उसका यथागम- । पूर्वक करना ॥ ९५ ॥
द्विज जैसे षट्कर्म करता । उसे शूद्र नमन करता ।
उन दोनोंका समान होता । यह यज्ञकर्म ॥ ९६ ॥
अधिकारानुसार अपना । सबका ऐसे यज्ञ करना ।
उससे फलाशा न करना । विष रूप जो ॥ ९७ ॥
तथा मैं करता ऐसा भाव । न ले देह कार्यका पांडव ।
किंतु वेदकी आज्ञाका ठाव । होकर रहना ॥ ९८ ॥
अर्जुन ! यह है संज्ञा । सर्वत्र जान तू यज्ञ ।
कैवल्य-मार्गका विज्ञ । कहता यह ॥ ९९ ॥
७ दैवी-गुण, स्वाध्याय—
गेंदसे जैसे भूमिको जो मारना । मारना नहीं गेंद हाथमें लाना ।
अथवा खेतमें बीजको फेंकना । उपजके लिये ॥ १०० ॥
या रखी वस्तू देखनेके लिये । आदरसे जाते हैं दिया लिये ।
शाखामें फल फलनेके लिये । सींचते हैं मूल ॥ १ ॥
जाने दे यह जैसे है शीसा । आप देखनेके लिये ऐसा ।
पोंछ पोंछ रखते हैं स्वच्छ-सा । प्रीतिसे नित ॥ २ ॥
६३३ देवासुर-संपद्विभाग-योग
वैसे प्रतिपाद्य जो ईश्वर । होनेके लिये वह गोचर ।
करना श्रुतिका निरंतर । अभ्यास पार्थ ॥ ३ ॥
द्विजोंको देखना ब्रह्मसूत्र । अन्योंको स्तोत्र या नाममंत्र ।
आवर्तन करना पवित्र । देखने तत्व ॥ ४ ॥
कहलाता है यह स्वाध्याय । सुन तू यह धनंजय ।
तप शब्दका अभिप्राय । कहता हूं अब ॥ ५ ॥
८ दैवी-गुण, तप—
दानका अर्थ है सर्वस्व देना । व्ययको संपूर्ण व्यर्थ करना ।
फलकर जैसे स्वयं सूखना । वनस्पतिका धर्म ॥ ६ ॥
अन्यान्य धूपका जैसे अग्नि-प्रवेश । कनकमें जैसे मलका नाश ।
या बढ़ते पित्र-पक्षमें ह्रास । जैसे चंद्रमाका ॥ ७ ॥
वैसे स्वरूप प्राप्तिके कारण । गलाना तन मन प्राण ।
दक्ष रह करके प्रतिक्षण । कहलाता तप ॥ ८ ॥
अथवा तपका रूप भिन्न । अन्य कोई है तो तू जान ।
दूधमें डाली जैसे चोंच अर्जुन । हंसकी जो ॥ ९ ॥
वैसे देह जीवका मिलन । उसमें पानी करता भिन्न ।
वह विवेक अंतःकरण । जगाये रखना ॥ ११० ॥
देखते मानो आत्माकी ओर । बुद्धि संकोष होता सत्वर ।
निद्रा स्वप्न जैसे धनुर्धर । जागृतिमें डूबते ॥ ११ ॥
वैसे आत्म-आलोचन । होता सही प्रवर्तन ।
तपका सही अर्जुन । होता अर्थ ॥ १२ ॥
९ दैवी-गुण, आर्जव = ऋजुता—
बालकके लिये जैसे रम्य । होता भूतमात्रमें चैतन्य ।
वैसे जीवमात्रमें सौजन्य । कहलाता आर्जव ॥ १३ ॥
ज्ञानेश्वरी ६३४
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शांतिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं हीरचापलम् ॥ २ ॥
१० दैवी-गुण, अहिंसा—
विश्व-हित उद्देश्यसे । तन बचन मनसे ।
रहना जो दक्षतासे । अहिंसा जान ॥ १४ ॥
११ दैवी-गुण, सत्य—
तीक्ष्ण होकर भी मृदुल । जैसे स्वभावसे मुकुल ।
तेज होकर भी शीतल । शशांकका ॥ १५ ॥
दिखाते ही करे रोग निवारण । किंतु न लगे जिव्हामें जान ।
ऐसी औषधी न होनेके कारण । उपमा दूं कैसे ॥ १६ ॥
मृदुतामें जैसे आंखोंकी पूतली । किंतु है रगड़ने पर भी भली ।
वैसे फोडती पत्थरकी भी शिली । उदक जैसे ॥ १७ ॥
वैसे संदेह करनेमें दूर । मानो अति तीक्ष्ण तलवार ।
किंतु है सुननेमें मधुर । मधुसे भी ॥ १८ ॥
सुननेमें कौतुक । कानोंको होता सुख ।
सत्यतामें है देख । भेदता ब्रह्मको ॥ १९ ॥
अथवा जो कभी प्रियत्वमें । न आता किसीके झांसेमें ।
पूर्ण होकर भी सत्यमें । किसीको चुभता नहीं ॥ १२० ॥
वैसे तो व्याध-ध्वनि कर्ण-मधुर । अंत लाती है अतीव भयंकर ।
अग्नि जलाता है वैसे खुलकर । जले वह सत्य ॥ २१ ॥
रहता है अति कर्ण-मधुर । किंतु छीलता हृदय गह्वर ।
ऐसी भाषा भाषा नहीं सुंदर । होती है बला ॥ २३ ॥
अहितमें जैसे हो क्रोधानल । लालनमें सुमनसे कोमल ।
माताका रूप है यह सरल । बाचाका भी ॥ २४ ॥
अहिंसा सत्य अक्रोध त्याग शांति अपैशुन ।
निर्लोभ स्थैर्य माधुर्य मर्यादा जीवमें दया ॥ २ ॥
६३५ दैवासुर-संपद्विभाग-योग
वैसे ही हो सुननेमें सुखमय । परिणाममें सत्य मंगलमय ।
बोलनेमें अविकार औ' सदय । सत्य है वह ॥ २५ ॥
१२ दैवी-गुण, अक्रोध—
जैसे कितना ही पानी डालकर । शिलामें नहीं फूटता है अंकुर ।
अथवा छासको बहु मथकर । आता क्या नवनीत ॥ २६ ॥
केंचुलीके सिर पर पैर । मारा तो क्या उठाता है सिर ।
तथा वसंतमें भी अंबर । नहीं देता फूल ॥ २७ ॥
जैसे रंभाके भी अनेक रूप । न जगा सका शुकमें कंदर्प ।
या राखमें न होती है उदीप । घृतसे भी आग ॥ २८ ॥
शिशु भी क्रोधित हो वैसे । कुवाचाके बीजाक्षरोंसे ।
अथवा अन्य उपायोंसे । किसी समय ॥ २९ ॥
ब्रह्मको भी नमन कर पार्थ । गतायु कभी न होता जागृत ।
वैसे उसमें कभी न जागृत । होता क्रोध तरंग ॥ १३० ॥
१३ दैवी-गुण, त्याग—
मृत्तिका त्यागसे घट । तंतुके त्यागसे पट ।
बीजके त्यागसे वट । त्याग जैसे ॥ ३१ ॥
या तजकर भित्तिमात्र । तजता है संपूर्ण चित्र ।
या निद्रा-त्यागसे विचित्र । स्वप्न जाल ॥ ३२ ॥
तथा जल त्यागसे तरंग । वर्षा त्यागसे अनेक मेघ ।
वैसे झडते हैं समस्त भोग । धन-त्यागसे ॥ ३३ ॥
वैसे ही जो बुद्धिमंत । तजते हैं देहाहंता ।
जिससे संसार जात । छूटते हैं ॥ ३४ ॥
इसका नाम है त्याग । कहता यह यज्ञांग ।
यह मानके सुभग । पूछता पार्थ ॥ ३५ ॥
ज्ञानेश्वरी ६३६
१४ दैवी-गुण, शांति—
अब शांतिका लक्षण । कह तू मुझे श्रीकृष्ण ।
कृष्ण कहता अर्जुन । सुन तू अब ॥ ३६ ॥
निगलकर जब ज्ञेय । ज्ञाता ज्ञान भी धनंजय ।
मिट जाता जिस समय । मिलती जो शांति ॥ ३७ ॥
जैसे प्रलयांबुका उभार । डुबाकर विश्वका प्रसार ।
अपनेमें ही रहता नीर । भरके आप ॥ ३८ ॥
उगम ओघ तथा सागर । न रहता यह व्यवहार ।
सर्वत्र अनुभवता नीर । वह भी कौन ॥ ३९ ॥
वैसे ज्ञेयका होते ही आलिंगन । ज्ञातृत्व भी होता उसमें लीन ।
फिर रहता जो कुछ अर्जुन । वह है शांति ॥ १४० ॥
१५ दैवी-गुण, अनिंदा—
जैसे रोगको दूर कर । पुष्ट करनेमें शरीर ।
न देखता है आप पर । कमी सद्वैद्य ॥ ४१ ॥
या कीचमें फंसी गाय देखकर । नहीं देखा जाता सूखी या दुधार ।
उसकी जीवन व्यथा देख कर । चित्त होता व्याकुल ॥ ४२ ॥
डूबतेको देखकर सकरुण । न पूछता तू अंत्यज या ब्राह्मण ।
जानता उसके बचाना है प्राण । इतना मात्र ॥ ४३ ॥
महावनमें पापीसे नग्न । की हुई स्त्रीको कोई सज्जन ।
उसको वस्त्र पहने बिन । न देखता जैसे ॥ ४४ ॥
वैसे अज्ञान या प्रमादमें । अथवा दुर्दैव या दोषमें ।
सभी प्रकारके निंद्यत्वमें । जकड़े गये जो ॥ ४५ ॥
उन्हे अपने अंगके । भले गुण दे करके ।
भुलाते हैं चुभनेके । सभी शल्य ॥ ४६ ॥
अजी ! दूसरोंके सभी दोष । अपनी दृष्टिसे कर चोख ।
उनकी ओर वे फिर नेक । दृष्टिसे देखते ॥ ४७ ॥
६३७ देवासुर-संपद्विभाग-योग
पूज कर जैसे देव देखना । बुवाई करके खेतमें जाना ।
संतुष्ट करके प्रसाद लेना । अतिथिका जैसे ॥ ४८ ॥
ऐसे लगाकर अपने गुण । दूर कर औरके अवगुण ।
देखा करता है जो अर्जुन । सबकी ओर ॥ ४९ ॥
न करना मर्माघात । न उलझाना पापमें पार्थ ।
सदोष नामसे उल्लिखित । न करना कभी ॥ १५० ॥
तथा करके कोई उपाय । पतित खडा हो धनंजय ।
ऐसे ही करना सभी कार्य । न हो मर्माघात ॥ ५१ ॥
अधमको भी मान । उत्तम ही अर्जुन ।
कभी इसके बिन । न देखें दोष ॥ ५२ ॥
अनिंदाका यह लक्षण । जान तू होता है अर्जुन ।
मोक्ष-मार्गका सुखासन । मुमुक्षुओंका ॥ ५३ ॥
१६ दैवी-गुण, दया—
अब दया है ऐसी । पूर्ण चंद्रिका जैसी ।
शीतलता एकसी । देती सबको ॥ ५४ ॥
वैसे दुखितोंका कष्ट । दूर करना है इष्ट ।
उसमें श्रेष्ठ कनिष्ठ । देखता नहीं ॥ ५५ ॥
जगतमें जीवन जैसे । नाश होता है अंगसे ।
किंतु बचाना अपनेसे । तृणजात ॥ ५६ ॥
वैसे अन्योंका देख ताप । चटपटाता हो सकृप ।
सर्वस्व देकर भी आप । कुछ भी मानता नहीं ॥ ५७ ॥
जैसे गढ़ा देखकर अपूर्ण । पानी आगे नहीं बहता जान ।
वैसे श्रांतको तोष दिये बिन । आगे नहीं जाता ॥ ५८ ॥
पैरोंमें जब कांटा चुभता । उससे हृदय तडपता ।
वैसे कष्टोंसे चटपटाता । अन्योंके यह ॥ ५९ ॥
ज्ञानेश्वरी ३३८
या पैरोंकी होती शीतलता । आंखोंको मिलती है शांतता ।
वैसे पर सुखसे हर्षता । सदैव आप ॥ १६० ॥
या प्यासोंके लिये जैसे । पानीका जन्म है वैसे ।
दुखितोंके लिये वैसे । जीवन उसका ॥ ६१ ॥
ऐसे पुरुष धनंजया । मूर्तिमंत जान तू दया ।
उसके जन्मसे ही भया । ऋणी मैं उसका ॥ ६२ ॥
१७ दैवी-गुण, अलोभ—
जीव-भावसे अनुसरता । सूर्य पुष्प सूर्यको सतत ।
किंतु सूर्य कभी नहीं लेता । सौरभ उसका ॥ ६३ ॥
अथवा वसंतमें आते अनंत । वनमें बहार वैभवके नित ।
किंतु उनको तजकर वसंत । चलता जैसे ॥ ६४ ॥
जाने दो महासिद्धियोंके साथ । लक्ष्मी आयी पास कहके नाथ ।
किंतु महा-विष्णु न देखता पार्थ । उसकी ओर ॥ ६५ ॥
वैसे लौकिक या पारलौकिक । आते भोग बनकर सेवक ।
किंतु तरंग न उठते देख । भोगके मनमें ॥ ६६ ॥
इससे कहना क्या अधिक । मनमें न उठे सकौतुक ।
अभिलाषा विषयकी देख । वह अलोलुप्य ॥ ६७ ॥
१८ दैवी-गुण, मार्दव—
मद्माखियोंको छत्ता सुखकर । जलमें ही जैसे सुखी जलचर ।
या पक्षियोंको गगन धनुर्धर । होता है मुक्त ॥ ६८ ॥
या बालकके हितमें जैसे । माताका स्नेह होता है वैसे ।
बसंतमें छूता है हौलेसे । मलयानल ॥ ६९ ॥
या आखोंको प्रियका दर्शन । पिल्लोंको कूर्मीका दृष्टि जान ।
वैसे है उसका आचरण । जीव-मात्रसे ॥ १७० ॥
६३९ देवासुर-संपद्विभाग-योग
स्पर्शमें जो है अति मृदु । मुखमें लिया तो सुस्वादु ।
घ्राणमें वैसे ही सुगंधु । अंगोंसे उज्ज्वल ॥ ७१ ॥
यदि चाहे जितना भी लेता । कोई नुकसान नहीं होता ।
उसको तब है कहा जाता । कर्पूरसा वह ॥ ७२ ॥
महाभूत अपनेमें समालेता । तथा परमाणुमें भी जो समाता ।
जैसे विश्व है वैसे ही बन जाता । आकाश जैसा ॥ ७३ ॥
क्या कहूं मैं ऐसोंका जीवन । विश्वके लिये जीव धारण ।
उसको कहता हूं अर्जुन । मार्दव मैं ॥ ७४ ॥
१९ दैवी-गुण, मर्यादा : लज्जा—
तथा पराजयसे राजा । हीन दशामें जो सलज्ज ।
स्वाभिमानी होता निस्तेज । निकृष्टतामें ॥ ७५ ॥
या आया चंडालका सदन । अकस्मातही संन्यासी जान ।
होता है जैसे सलज्जमन । उत्तम जो ॥ ७६ ॥
क्षत्रियको रणसे भागना । कैसे सहना निर्लज्ज जीना ।
विधवा नामसे पुकारना । महासतीको जैसे ॥ ७७ ॥
सुरूपको महारोग भया । या शिष्टको कलंकित किया ।
प्राण संकटमें लजा गया । उसी भांति ॥ ७८ ॥
साडे तीन हाथका देह बना । तथा शवसा बनकर जीना ।
जनम ले लेकर मरना । पुनः पुनः जो ॥ ७९ ॥
गर्भके मेद सांचेमें । रक्त मूत्रके रसमें ।
पुतला बन जीनेमें । आती लज्जा ॥ १८० ॥
लेकर यह देहपन । नाम रूपका धारण ।
रहनेसे न कुछ भिन्न । लज्जा जनक ॥ ८१ ॥
ऐसेमें देहसे उकताकर । रहते हैं सूज्ञ पांडुकुमार ।
तथा मानते निर्लज्ज अपार । उसीमें सुख ॥ ८२ ॥
ज्ञानेश्वरी ६४०
२० दैवी-गुण, स्थैर्य—
सूत्र तंतु जब टूट जाता । गुड़ियाका थै थै रुक जाता ।
वैसे प्राण-जयसे टूटता । कर्मेंद्रियोंका खेल ॥ ८३ ॥
या अस्त होते ही दिनकर । रुकता किरणोंका प्रसार ।
वैसे मनो-जयसे व्यापार । ज्ञानेंद्रियोंका ॥ ८४ ॥
ऐसे मन-प्राणका संयम । करता है इंद्रियां अक्षम ।
यह है अचांचल्यका मर्म । जानना यहां ॥ ८५ ॥
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवंति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ ३ ॥
२१ दैवी-गुण, तेज—
संकट है मरनेका-सा । वह है अग्नि-प्रवेश-सा ।
प्राणेश्वरके लिये ऐसा । नहीं गणती सती ॥ ८६ ॥
वैसे आत्म-नाथके ध्यानमें भर । विषय विषकी बाधा दूर कर ।
जाता शूल्यकी कांटेली राह पर । दौड़ना है उसको ॥ ८७ ॥
निषेधकी बाधा तब नहीं आती । विधिकी भीड़ भी उसे न रोकती ।
हृदयमें चाह कभी नहीं होती । महासिद्धियोंकी ॥ ८८ ॥
ईश्वराभिमुख हो ऐसे निज । दौड़ता अपने आप सहज ।
उसको कहते हैं सुज्ञ तेज । अध्यात्मिक जो ॥ ८९ ॥
२२ दैवी-गुण, क्षमा—
तथा रहता है सभी गरिमा । गर्व नहीं आता है वही क्षमा ।
जैसे ढोता है शरीर जो रोम । जानता न ढोता ॥ १९० ॥
पवित्रता क्षमा तेज धैर्य अद्रोह नम्रता ।
जिसके गुण ये आया दैवी संपत्ति लेकर ॥ ३ ॥
(80) ६४१ देवासुर-संपद्विभाग-योग
२३ दैवी-गुण, धैर्य—
तथा उभर आया इंद्रिय-वेग । या भड़क उठे हैं पुराने रोग ।
अथवा हुये नाता योग-वियोग । प्रियाप्रियोंके ॥ ९१ ॥
इन सबका आया बवंडर । या साथ मिलकर आया पूर ।
तब अगस्ति बनकर धीर । खडा होता है ॥ ९२ ॥
नभमें धूम्रका वलय । जोरसे उठा धनंजय ।
क्षणमें करता विलय । वायु जैसे ॥ ९३ ॥
वैसे अधिभूताधिदैव । अध्यात्मिकादि उपद्रव ।
होते हैं उनको पांडव । निगलता जो ॥ ९४ ॥
जब ईश्वरकी प्राप्तिमें । प्रवर्तता ज्ञान-योगमें ।
धीरजका न्यून उसमें । नहीं होता ॥ ९५ ॥
आता ऐसा चित्त-क्षोभका समय । सहके पराक्रम करता धैर्य ।
धृति कहते हैं जिसे धनंजय । वह हैं यही ॥ ९६ ॥
२४ दैवी-गुण, शौच=पवित्रता—
जैसे शुद्ध कनक-कलश । उसमें भरा गंगा पीयूष ।
जैसे हे अंतर्बाह्य कलश । वैसे पावित्र्य ॥ ९७ ॥
शरीरसे निष्काम आचार । हृदयमें विवेक साकार ।
अंतर्बाह्य बना है आकार । शुचित्वका जो ॥ ९८ ॥
२५ दैवी-गुण, अद्रोह—
हरते हरते पाप ताप । पोसते किनारेके पादप ।
समुद्र तक जाता है आप । गंगाका जैसे ॥ ९९ ॥
या विश्वका तम हरते । क्रियाका सदन खोलते ।
चला परिक्रमा करते । भास्कर जैसे ॥ २०० ॥
वैसे बद्धको मुक्त करते । डूबेहुओंको जो उभारते ।
कठिनाईको दूर करते । अंतरतमकी ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ६४२
वैसे वह दिवस-राति । करते सबकी उन्नति ।
चलता आत्म-हित-रति । धनुर्धर ॥ २ ॥
केवल अपने हितार्थ । प्राणियोंका अहित पार्थ ।
मनमें भी लाना किंचित । नहीं कभी ॥ ३ ॥
अद्रोहत्वकी ऐसी गोष्ठी । कही मैंने तुझे किरीटी ।
मानो वह प्रत्यक्ष दृष्टी । देखती है ॥ ४ ॥
२६ दैवी-गुण, अमानित्व—
गंगा जैसे चढके शंभुके माथ । आप हुई अपनेमें संकुचित ।
वैसे सन्मानसे भी करें प्रतीत । लज्जा आप ॥ ५ ॥
वह अमानित्व कहलाता । तुझसे पहले जो कहा था ।
वही वही कहना क्या पार्थ । बार बार ॥ ६ ॥
दैवी-गुणोंकी महानता—
ऐसे ये गुण हैं जो छब्बीस । ब्रह्मेश्चर्य करता निवास ।
मोक्ष-चक्रवर्तिका है खास । अग्रहार ॥ ७ ॥
ऐसी नाना संपदा दैवी । गुण-तीर्थकी नित्य-नवी ।
निरिच्छ सगरोंकी दैवी- । गंगा बह आयी ॥ ८ ॥
या गुण-पुष्पकी वरमाला । लेकर आयी है मुक्ता बाला ।
निरिच्छ विरक्तका है गला । खोजती है ॥ ९ ॥
अथवा छब्बीस गुणोंकी ज्योती । उजलाकर ले यह आरती ।
उतारने आयी गीता खोजती । पति आत्माको ॥ २१० ॥
उगलते हैं जो निर्मल । इन गुणोंके मुक्ता-फल ।
दैवी श्रियाके शुक्तावळ । गीतार्णवमें जो ॥ ११ ॥
कितना करूं इसका वर्णन । कहे हैं स्पष्ट होंगे ऐसे गुण ।
इन गुण-राशिका है दर्शन । दैवी श्रियाका रूप ॥ १२ ॥
६४३ देवासुर-संपद्विभाग-योग
आसुरी-गुणोंकी ओर संकेत—
दुःख क्लेशकी जो पुष्ट लता । दोष-कांटोंसे भरी है पार्थ ।
वह अपनी व्याख्यामें लाता । आसुरी जो ॥ १३ ॥
त्याज्यको तजनेके हित । जान लेता है उपयुक्त ।
इसीलिये दे तू स्व-चित्त । सुननेमें यह ॥ १४ ॥
यह है नरक-व्यथा घोर । लाये दोष अति भयंकर ।
एकत्र किये हैं ये असुर- । संपदा रूप ॥ १५ ॥
नाना विष वर्गका कर गठन । बनाया जाता कालकूट महान ।
वैसे सभी दोषोंका कर मिलन । बनी आसुरी संपदा ॥ १६ ॥
दंभो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानंचाभिमानस्य पार्थ संपदमासुरीम् ॥ ४ ॥
१ आसुरी-गुण, दंभ—
आसुरी दोषमें ख्यात । गर्जेके जिसका पार्थ ।
नाम चलता सतत । दंभ ऐसा ॥ १७ ॥
अपनी जननी है पावन । रहती जो तीर्थके समान ।
किंतु जनमें करना नग्न । पतन कारण होता ॥ १८ ॥
या विद्या गुरुपदेशमें प्राप्त । चौराहे पर किया प्रदर्शित ।
इच्छा भी होती अनिष्ट हेत । वैसे ही जो ॥ १९ ॥
डूबनेको महा-पूरमें । पहुंचाती पैल तीरमें ।
वह नाव बांधे शिरमें । डुबो देती है ॥ २२० ॥
जीवनका जो साधन । अधिक खाया तो अन्न ।
वही जीवनीय अन्न । होता है विष ॥ २१ ॥
वैसे ही दृश्य-अदृश्यका मित्र । तारक होता है धर्म सर्वत्र ।
प्रसिद्ध करनेसे जो सर्वत्र । शत्रु बन जाता ॥ २२ ॥
अहंता दंभ अज्ञान क्रोध दर्प कठोरता ।
आया जो गुण ये लेके आसुरी संपदा वह ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी ६४४
तमी वाचाके चौराहे पर । फैलाया तो धर्मका विस्तार ।
कहलाता दंभ धनुर्धर । अधर्म-रूप ॥ २३ ॥
२ आसुरी-गुण, दर्प—
किंतु मूर्खकी जिव्हा पर । फैलाया तो धर्मका विस्तार ।
कहलाता दंभ धनुर्धर । वह ब्रह्म सभाको ॥ २४ ॥
या घोड़ा जो भादुरी लोगोंका । ओछा मानता गज इंद्रका ।
गिरगिट जो कांटों परका । स्वर्ग भी बौना ॥ २५ ॥
या तृणका जो ईंधन । भड़कता है गगन ।
डबरे बसा मीन । माने सिंधु तुच्छ ॥ २६ ॥
फूलता है वह क्षीधन । विद्या स्तुति पाकर मान ।
एक दिनका ही पराश्न । फुलाता अल्पको जैसे ॥ २७ ॥
जैसे मेघ छाया देख तोड़ता । दुर्दैवी घरका आसरा पार्था ।
मृग-जल देखकर तोड़ता । पानीका डबरा ॥ २८ ॥
और कहूं मैं कितना । संपत्ति-योगसे नाना ।
मदमें उन्मत्त होना । कहलाता दर्प ॥ २९ ॥
३ आसुरी-गुण, अभिमान—
तथा वेदमें जिसका विश्वास । विश्वका पूजनीय ईश ।
विश्वमें एक ही महा तेजस । सूर्य मात्र ॥ २३० ॥
विश्वमें जो है स्पर्धास्पद । एक ही सार्वभौम पद ।
न मरना है निर्विवाद । विश्वको भाता ॥ ३१ ॥
इसीलिये यदि उत्साहसे । इसका वर्णन करनेसे
फूलता वह अभिमानसे । तथा रखता डाह ॥ ३२ ॥
कहता निकालूंगा ईशको । गरल पिलाऊंगा वेदको ।
खपाता है अपने बलको । स्व-गौरवार्थ ॥ ३३ ॥
६४५ देवासुर-संपद्विभाग-योग
पतंगको दीप नहीं भाता । जुगनूको सूर्य क्लेश देता ।
तथा पंखेरू द्वेष करता । महासागरका ॥ ३४ ॥
वैसा अहं नामका मोह । ईश्वरसे करता द्रोह ।
वेदसे माने ऐसा डाह । मानो है सौत ॥ ३५ ॥
स्वयं मान्यताका दुष्ट भाव । अभिमानसे बनता देव ।
रौरवका पथ है पांडव । जो चलता आया ॥ ३६ ॥
४ आसुरी-गुण, क्रोध—
वैसे ही दूसरोंका सुख । जलता है सदा देख ।
बढे जैसे क्रोधका विष । मनोदशा यह ॥ ३७ ॥
तपा तेल जल पा कर शीतल । भड़क उठता जैसे महाज्वाल ।
या चंद्रमाको देखकर उदर-ज्वाल । उठती सियारके ॥ ३८ ॥
विश्वका जीवन जिससे उजलता । वह सूर्योदय देख विश्व खिलता ।
किंतु है उलूकका नयन फूटता । पापीके जैसे ॥ ३९ ॥
प्रातःकाळ सुख है विश्वका । किंतु मृत्युसा दुःख है चोरका ।
कालकूट बनता दूधका । सांपमें जैसे ॥ २४० ॥
अगाध सागर जल । पीकर वड़वानल ।
भडकता बन ज्वाल । न पाता शांति ॥ ४१ ॥
वैसे विद्या विनोद विभव । देखकर अन्योंका सुदैव ।
भडकता जाता शेष भाव । वह है क्रोध ॥ ४२ ॥
५ आसुरी-भाव, कठोरता—
तथा मन जिसका व्याल-विवर । आंखें मानो विष-बाणके अंकुर ।
बोलना जैसे बरसते अंगार । जलते हुए ॥ ४३ ॥
ऐसे जिसके क्रिया जात । तीखे जैसे आरेके दांत ।
सबाङ्ग खरोंचता नित । पारुष सबको ॥ ४४ ॥
ज्ञानेश्वरी ६४६
मानवोंमें उसको अधम जान । कठोरताका ही जो अवतरण ।
सुन तू अब कहता हूं लक्षण । अज्ञानका मैं ॥ ४५ ॥
६ आसुरी-भाव, अज्ञान—
शीत उष्णादि स्पर्श जैसे । न जानता पाषाण वैसे ।
या रात्र और दिवससे । अनभिज्ञ जात्यंध ॥ ४६ ॥
उठता अग्नि जैसे खाता । खाद्याखाद्य नहीं जानता ।
या पारस नहीं जानता । लोह या सोना ॥ ४७ ॥
या नाना रसोंमें जैसे । डूबती कड़ची जैसे ।
किंतु रसास्वाद ऐसे । जानती नहीं ॥ ४८ ॥
अथवा जैसे वायु होता । मार्गामार्ग नहीं जानता ।
वैसे कृत्याकृत्यमें होता । वह अंधा ॥ ४९ ॥
जैसे यह स्वच्छ है मैला । यह नहीं जानता बाल ।
जिसे देखता वह केवल । डालता मुखमें ॥ २५० ॥
खिचडी कर वैसे पाप-पुण्यकी । खाते हुए नहीं बुद्धिमें उसकी ।
भला बुरा यह नहीं जाननेकी । ऐसी जो दशा ॥ ५१ ॥
उसका नाम है अज्ञान । इस बोलसे नहीं भिन्न ।
ऐसे छ दोषोंका लक्षण । कहे सब ॥ ५२ ॥
आसुरी संपदा जीवन विनाशक होती है—
ऐसे छ दोषोंसे भरकर पूर्ण । आसुरी संपदा हुई बलवान ।
छोटीसी शुभांगीमें जैसे अर्जुन । हो विषय अतिशय ॥ ५३ ॥
अथवा तीन अग्निकी पंक्ती । देखनेमें छोटीसी लगती ।
किंतु है विश्वकी प्राणाहूती । ओछी उसको ॥ ५४ ॥
या विधाताको जाकर शरण । त्रिदोषसे न चुकता मरण ।
उन तीनोंके ये दूने हैं जान । छह दोष ॥ ५५ ॥
६४७ दैवासुर-संपद्विभाग-योग
इन छह दोषोंसे संपूर्ण । बनाया है आसुरी भवन ।
इसलिये अल्प न अर्जुन । आसुरी संपदा ॥ ५६ ॥
या क्रूर ग्रहोंका मिलन । होता एक राशिमें जान ।
या निंदकके पास पूर्ण । आते सब पाप ॥ ५७ ॥
या मरनेवालेके अंग । ग्रासते जैसे सभी रोग ।
या कुसमयमें दुर्योग । होते एकत्र ॥ ५८ ॥
या जीवन समाप्तिकी आती बेला । बकरीको डसता बिच्छू काला ।
वैसे ये छ ही दोष जिसे सकल । घेरते हैं ॥ ५९ ॥
विश्वासु जैसे चोरसे पकड़वाता । या थका हुवा महापूरमें फंसता ।
वैसे ही इन दोषोंसे अनिष्ट होता । मनुष्यका सदैव ॥ २६० ॥
यदि किसी मोक्ष-पथिक पर । इनका पडा इक छींटा भर ।
डुबाएगा उसे भव-सागर । न उठेगा वह ॥ ६१ ॥
उतरके अधम योनिकी । सीढी परसे जो अंतिमकी ।
स्थावर तक गति उसकी । पहुंचेगी ही ॥ ६२ ॥
छ दोष ये जिनमें । पाये जाते उनमें ।
बढ़ती संपदामें । आसुरी जो ॥ ६३ ॥
ऐसे हैं ये भिन्न । संपदा तू जान ।
कही स-लक्षण । तुझसे अब ॥ ६४ ॥
दैवी संपद्विमोक्षाय निबंधायासुरी मता ।
मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पांडव ॥ ५ ॥
तू दैवी संपत्तिका स्वामी है—
इन दोनोंमें पहली । दैवी संपदा जो भली ।
मोक्ष-सूर्यसे उजली । प्रभात जान ॥ ६५ ॥
मुक्तता करती दैवी आसुरी बांधती जहां ।
पायी है संपदा तूने दैवी न कर सोच तू ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ६४८