सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अध्याय १२: भक्तियोग

तथा ये जो दूसरी । संपदा है आसुरी ।
मोह-लोहकी खरी । सांखली है ॥ ६६ ॥
यह सुन कर तू अर्जुन । भय खायेगा अपने मन ।
किंतु कभी रातसे क्या दिन । भय खाता है ॥ ६७ ॥
जो है यह आसुरी संपत्ति । उसीका बंधन हो सकती ।
आश्रित होती जिनकी मति । इन दोषोंकी ॥ ६८ ॥
किंतु यहां तू अर्जुन । उपरोक्त दैवी गुण ।
लेकर आया निधान । जन्मसे ही ॥ ६९ ॥
इसीलिये तू यहांका । स्वामी दैवी-संपदाका ।
बन, पायेगा मोक्षका । सुख शाश्वत ॥ २७० ॥
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥ ६ ॥
अनादिसे ये दो मार्ग चले आये हैं—
ऐसे देव और असुर । संपदाके स्वामी जो नर ।
अनादिसे हैं चलकर । आये दो मार्ग ॥ ७१ ॥
जैसे है रातका अवसर । करते निशाचर व्यापार ।
तथा दिनमें सुव्यवहार । मनुष्यादिक ॥ ७२ ॥
वैसे ही अपना आचरण । करती है दोनों सृष्टि जान ।
दैवी तथा आसुरी अर्जुन । जन्म लेकर ॥ ७३ ॥
वैसे भी दैवी सविस्तृत । ज्ञान कथनमें पार्थ ।
कहा है मैंने यथावत । पीछे ही सब ॥ ७४ ॥
जीवोंकी सृष्टि दो भांति दैवी तथैव आसुरी ।
सविस्तार कही दैवी आसुरी कहता सुन ॥ ६ ॥
६४९ देवासुर-संपद्विभाग-योग

आसुरी संपदाका वर्णन—
अब जो मैं आसुरी सृष्टि । तथा वहांकी सभी गोष्ठी ।
कहता हूं दे पूर्ण दृष्टि । अवधानकी ॥ ७५ ॥
जैसे है बिन वाद्यका नाद । नहीं आता कोई भी साद ।
या बिन पुष्पका सुगंध । नहीं आता वैसे ॥ ७६ ॥
वैसे ही प्रकृति यह असुर । अकेली नहीं होती है गोचर ।
जब मिलता एकाधा शरीर । दीखती वह ॥ ७७ ॥
करनेसे जैसे घर्षण । देती लकड़ी अग्नि कण ।
प्राणि देहसे निर्माण । होता है इसका ॥ ७८ ॥
बढता है जैसे ऊस । वैसे ही बढता है रस ।
देहाकार होता वैसा । प्राणियोंका ॥ ७९ ॥
अब जैसे जिनका तन । रूप लेता जाता अर्जुन ।
होती है दोष वृद्धि जान । आसुरी जो ॥ २८० ॥
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥ ७ ॥
कृत्याकृत्यका अज्ञान—
तथा पुण्यके लिये हो प्रवृत्ति । या पापके विषयमें निवृत्ति ।
जाननेमें इसको है विरक्ति । होती मनमें ॥ ८१ ॥
अजी ! आने जाने में रखना भी द्वार । घर बांधनेके नशेमें भूल कर ।
मर जाता है घरमें ही फंस कर । कोशकीट जैसे ॥ ८२ ॥
दी हुई पूंजी आयेगी या नहीं । यह भी जो कभी देखता नहीं ।
और देता है चोरको वैसी ही । पूंजी मूर्ख ॥ ८३ ॥
तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति । नहीं जानती आसुरी-वृत्ति ।
स्वप्नमें भी शुचिताकी रीति । जानते नहीं ॥ ८४ ॥
कृत्य अकृत्य क्या कैसे न जाने आसुरी जन ।
न स्वच्छता न आचार जानते वे न सत्य भी ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी ६५०

कालिमा छोडेगा कभी कोयला । तथा होगा कभी काग उजला ।
राक्षस विरत होगा निर्मला । मांसाहारसे ॥ ८५ ॥
किंतु आसुरी जीवमें मात्र । शुचित्व न होता तिल-मात्र ।
जैसे न होता कभी पवित्र । पात्र मद्यका ॥ ८६ ॥
पूर्ण करना शास्त्र-विधिकी आस । या पूर्वजोंकी परंपरा विशेष ।
वैसे ही धर्माचरणकी वे भाष । जानते ही नहीं ॥ ८७ ॥
जैसे बकरीका चरना । अथवा वायुका दौड़ना ।
तथा आगका है जलना । जो मिला सो ॥ ८८ ॥
वैसे चलते सदा स्वैर । आगे बढ़ कर असुर ।
सत्यसे रख कर वैर । बरतते वे ॥ ८९ ॥
वृश्चिक अपने डंकसे । यदि गुदगुदा सकनेसे ।
बोला जायगा असुरोंसे । शायद सत्य ॥ २९० ॥
अपान-द्वारसे जब । सुगंध ले सके सब ।
सत्य पा सकेंगे सब । असुर लोग ॥ ९१ ॥
बिन कारणके जन । स्वभावसे ही है दुर्जन ।
उनके बोल विलक्षण । कहता हूं मैं ॥ ९२ ॥
अजी ! ऊंटका होना हैं चांग । कहो कौनसा रहता अंग ।
वैसे हैं असुरोंका प्रसंग । कहता ओघसे ॥ ९३ ॥
मुख जैसे रहता धुंवारा । धुंवा उगलता दिन सारा ।
इस भांति रहती वाग्धारा । उनकी सदा ॥ ९४ ॥
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥ ८ ॥
कहते जग झूठा है निराधार निरीश्वर ।
काम-मूलक है सारा बना संयोगसे यह ॥ ८ ॥
३५१ देवासुर-संपद्विभाग-योग

जीवन भोगके लिये है और सारा झूठ है—
विश्व अनादि चलता आता । ईश्वर है इसका नियंता ।
उसके आगे निर्णय होता । न्याय अन्यायका ॥ ९५ ॥
वेद जिसको अन्यायी कहता । उसे नरक भोगना पड़ता ।
उसकी दृष्टिसे जो न्यायी होता । भोगता वह स्वर्ग ॥ ९६ ॥
ऐसी है जो विश्व-व्यवस्था । अनादि कालसे ही पार्था ।
यह सब पूर्ण है वृथा । कहते ये लोग ॥ ९७ ॥
यज्ञ-मूढ जो यागमें फंसे । मूर्ति-लिंगमें पागल वैसे ।
फंसाये हैं योगी गेरुवेसे । समाधि-भ्रममें ॥ ९८ ॥
यहां अपने ही सामर्थ्यसे । भोगता है जो मिलता है उसे ।
इसके बिन कौन क्या कैसे । पुण्य है दूजा ॥ ९९ ॥
अनेक भोग जुटा न सकनेसे । अपनी शरीरकी दुर्बलतासे ।
त्रस्त होना बिन विषय-सुखसे । यह है पाप ॥ ३०० ॥
संपन्नौंकी जो हत्या करना । इसको यदि पाप मानना ।
संपदा सब हाथमें आना । यह नहीं क्या पुण्य ॥ १ ॥
सबलका निर्बलको खाना । इसको यदि अन्याय माना ।
क्यों न हुवा कहो निःसंतान । मत्स्य जात ॥ २ ॥
तथा दोनों कुलोंको देख कर । कौमार्यमें ही शुभ लग्नपर ।
ब्याहना उचित तो धनुर्धर । प्रजा-हेतुसे ॥ ३ ॥
तब पशु-पक्षादि जो है जाति । उनकी अपरमित संतति ।
उनको किसने हे प्रतिपत्ति । किये हैं विवाह ॥ ४ ॥
चोरीसे जो धन है आया । किसको कहां विष भया ।
पर-दारासे बल किया । हुआ है कौन कोढी ॥ ५ ॥
तथा ईश्वर स्वामी होता । धर्माधर्मका भोग देता ।
जो करता वह भोगता । पर लोकमें ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ६५२

किंतु परत्र औ' देव न दीखता । इसीलिये वह सब होता वृथा ।
तथा कर्त्ता जब है मर जाता । भोगेगा कहां कौन ॥ ७ ॥
सुखी है इंद्र उर्वशीके संगमें । रहता है जैसे अमरावतीमें ।
वैसे मानता है कीडा कीचडमें । अपनेको भी ॥ ८ ॥
इसलिये है नरक स्वर्ग । नहीं है पाप-पुण्यका भाग ।
दोनों स्थानमें है सुख-भोग । कामका ही ॥ ९ ॥
इसी कारणसे काम । रत स्त्री-पुरुष युग्म ।
मिलने लेता है जन्म । जग संपूर्ण ॥ ३१० ॥
तथा जो जो अभिलाषा करता । स्वार्थके लिये उसको पोसता ।
जिससे परस्पर द्वेष होता । काम करता नाश ॥ ११ ॥
तमी काम बिन कुछ भी नहीं । जगके मूलमें कुछ भी कहीं ।
इसभांति बोलते हैं जो यही । आसुरी लोग ॥ १२ ॥
रहने दो यह व्यर्थ भाषण । बढाता नहीं इसका व्याख्यान ।
होती है इससे निष्फल जान । वाचा-शक्ति ॥ १३ ॥
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥ ९ ॥
लोक-क्षयके लिये ही आसुरी लोगोंका जन्म होता है—
तथा ईश्वरका तिरस्कार । यही होता इनका विचार ।
विश्वमें नहीं कोई ईश्वर । यह निश्चय उनका ॥ १४ ॥
अथवा खुलकर बाहर । देहमें पाखंड भरकर ।
नास्तिकताकी अस्थि अंदर । रोपते हैं ॥ १५ ॥
लेकर दृष्टिको ऐसी नष्टात्मा ज्ञान-हीन जो ।
नाशार्थ विश्वके सारे निकले रिपु हिंसक ॥ ९ ॥
३५३ दैवासुर-संपद्विभागयोग

स्वर्गके लिये नहीं आदर । न नरकका तिरस्कार ।
जला है यह वासनांकुर । उनके मनमें ॥ १६ ॥
केवल खोडा-रूप यह शरीर । गंदे पानीका बुल्ला-सा बनकर ।
विषय-कीचमें उठ फूटकर । मिट जायेगा ॥ १७ ॥
नासने होते जब जल चर । वहां पहुंचते तब धीवर ।
या गिरना होता जब शरीर । उदय होते रोग ॥ १८ ॥
उदय होना धूमकेतुके जैसे । जगके अहित हेतु होना वैसे ।
जनमते ये असुर-लोग वैसे । लोक-क्षय हेतु ॥ १९ ॥
उदय होने पर अशुभ । उसमें फूटते जैसे कोंभ ।
वैसे पापका ये कीर्ति-स्तंभ । चलते फिरते हैं ॥ ३२० ॥
जो मिलता वह सब जलाना । आगका अन्य कुछ भी न जानना ।
वैसे सबका विरोध ही करना । इनका स्वभाव ॥ २१ ॥
इसका कारण यही है अर्जुन । आरंभ करते उत्साहसे जान ।
कहता इस उत्साहका कारण । सुन तू अब ॥ २२ ॥
काममाश्रित्य दुष्पूरं दंभमानमदान्विताः ।
मोहाद् गृहीत्वासद्ग्राहान् प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥ १० ॥
आसुरी-वृत्ति धर्म-धेनूका आहार तोड़ती है —
पानीसे न भरता धीवरका जाल । ईंधन पर्याप्त न माने अग्नि ज्वाल ।
वैसे अतृप्त रहता काम कराल । सदैव भूखा ही ॥ २३ ॥
ऐसे कामका ले आश्रय । जीव भावसे धनंजय ।
दंभ मानका समुदाय । जुटाता है ॥ २४ ॥
काम दुर्भर जो सेके मानी दांभिक मत्त हो ।
हठके बलसे मूढ करते पाप निर्घृण ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी ६५४

वैसे ही मद-भरा कुंजर । उसीमें चढ़ा मद्यका ज्वर ।
तब बढ़ जाता मद-भार । बुढापेका ॥ २५ ॥
बनता तब हठका स्थान । करता मूढ़ताका धरण ।
फिर क्या करना है वर्णन । उसके निश्चयका ॥ २६ ॥
पर-ताप जिससे घड़ता । दूसरोंका जीव कुचलता ।
उन्हीं कामोंमें गढ़ जाता । जीव-भावसे ॥ २७ ॥
अपने कियेका फिर बखान । तथा जगको दे धिःकार दान ।
दश दिशामें करें प्रसारण । आशा-जाल ॥ २८ ॥
ऐसे विकारसे भर । पाप-कर्म कर घोर ।
धर्म-धेनुका आहार । तोडते हैं ॥ २९ ॥
चिंतामपरिमेयां च प्रलयांतामुपाश्रिताः ।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥ ११ ॥
काम-प्रचोदनसे कर्म-प्रवृत्ति—
इसी सामग्रिपे चलती । उनकी जो कर्मकी गती ।
मृत्युसे भी नहीं छूटती । चिंता उनकी ॥ ३३० ॥
पातालसे भी होती जो निम्न । ऊंचाईमें छोटा है गगन ।
विशालतामें है त्रिभुवन । अणुसा लगता ॥ ३१ ॥
योग-पटका जैसे स्मरण । जीवमें असीम विबंधन ।
साथ देता मृत्यु तक जान । पतिव्रता जैसे ॥ ३२ ॥
चिंता वह ऐसी अपार । बढ़ाता जाता निरंतर ।
हृदयमें भर असार । विषयाधिक ॥ ३३ ॥
स्त्रियोंका गाना सुनना । उन्हें आंखोंसे देखना ।
सर्वेंद्रिय आलिंगना । स्त्रियोंके ही ॥ ३४ ॥
असीम करते चिंता मृत्युसे भी न छूटती ।
कामोपभोगमें चूर मानो सर्वस्व है वह ॥ ११ ॥
६५५ दैवासुर-संपद्विभाग-योग

अमृत भी निछावर करना । ऐसा ख्र सुनही है स्त्रीके बिना ।
करता है ऐसा उसका मन । निश्चय पार्थ ॥ ३५ ॥
फिर भी भोगके कारण । दौडते हैं तीनों भवन ।
दस दिशाओंमें अर्जुन । उसके परे भी ॥ ३६ ॥
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान् ॥ १२ ॥
सुख-भोगके लिये पापसे धन-संचय—
आमिष कौरकी बडी आशासे । न सोच निगलता मीन जैसे ।
होती है विषयाशा उन्हे वैसे । पांडुकुमार ॥ ३७ ॥
नहीं होती कभी वांछित प्राप्ति । किंतु करोडोंकी आशा-संतति ।
बढ़ते बढ़ते है वह होती । कोश-कीटक ॥ ३८ ॥
तथा फैलाते जो अभिलाश । पूर्ण न होता बनता द्वेष ।
ऐसा काम-क्रोध ही विशेष । बनता पुरुषार्थ ॥ ३९ ॥
दिनमें चलना रातमें जागना । जैसे होता चौकीदारका जीना ।
दिन-राति विश्रांति नहीं जाना । उसी भांति ॥ ३४० ॥
ऊंची चोटीसे काम है ढकेलता । नीचे क्रोध पत्थरपे पटकता ।
फिर भी राग-द्वेष नहीं छूटता । विषयोंसे उसका ॥ ४१ ॥
हृदयमें ऐसे विषयोंकी भूख । जुटाये विषय-साधन अनेक ।
भोगके लिये जो अति आवश्यक । किंतु द्रव्य है कहां ॥ ४२ ॥
तभी भोग-पूर्तिमें हो आसक्त । जुट जाते हैं धन-संचयार्थ ।
तथा लूटते हैं विश्वको नित । मनमाने जो ॥ ४३ ॥
एकको मारते समय साधकर । तो दूसरेका सर्वस्व ही छीनकर ।
तीसरेके लिये बनाते हैं आखर । अपाय तंत्र ॥ ४४ ॥
आशाके कसके पाश डूबे हैं काम-क्रोधमें ।
चाहते सुख-भोगार्थ पापसे धन-संचय ॥ १२ ॥
ज्ञानेश्वरी ६५१

जाल पाश तीर कुकर । भाला बाज छुरा लेकर ।
चला मानो चिडियामार । शिकार करने ॥ ४५ ॥
पालनेके लिये एक पेट । चिडियों पर ढाते संकट ।
ऐसा ही आचरण निकृष्ट । करते ये लोग ॥ ४६ ॥
कर पर-प्राण घात । कमाकर लाते वित्त ।
उससे हो कैसे चित्त । संतुष्ट किसका ॥ ४७ ॥
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १३ ॥
भोगार्थ असीम आशा और वैर—
कहता है आज अर्जुन । कर लिया सबका धन ।
सहज अपने स्वाधीन । धन्य हूं मैं ॥ ४८ ॥
आत्म-श्लाघा भाव यह उत्पन्न । होनेसे बहता उसका मन ।
लूटूंगा कल औरोंका भी धन । कहता ऐसे ॥ ४९ ॥
ऐसे यह जुटाया मैने इतना । इसका आधार बनाके अपना ।
लाभमें पाऊंगा रही सही नाना । संपदा विश्वकी ॥ ३५० ॥
ऐसा विश्वका सब धन । करूंगा अपने स्वाधीन ।
फिर जिसके हो नयन । मिटा दूंगा ॥ ५१ ॥
असौ मया हतः शत्रुईनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥ १४ ॥
मारे मैंने शत्रु जो कुछ । मारूंगा कल बचे जो तुच्छ ।
करूंगा शासन बन उच्च । अकेला ही मैं ॥ ५२ ॥
जुटाये आज ये लाभ जुटेंगे और भी कल ।
यह है वह भी होगा मेरी ही सब संपदा ॥ १३ ॥
मैने वह शत्रु मारा मारूंगा दूसरा फिर ।
स्वामी मैं और मैं भोक्ता सुखी मैं सिद्ध मैं बली ॥ १४ ॥
(31) ६५७ देवासुर-संपद्विभाग-योग

बनके रहेंगे यदि मेरे दास । नहीं तो करूंगा मैं उनका नाश ।
अथवा मानो विश्वमें मैं हूं ईश । चराचरका सब ॥ ५३ ॥
इस भोग-भूमिका मैं प्रधान । सब सुख-भोगका मैं हूं स्थान ।
इंद्र भी देखके मनही मन । करेगा ईर्षा ॥ ५४ ॥
चाहूंगा मैं काया वाचा मन । होगा वह निश्चित संपन्न ।
मेरे बिना नहीं कोई जान । ऐसा आज्ञा-सिद्ध ॥ ५५ ॥
न देखा जब तक मेरा बल । तब तक बली है वह काल ।
मैं हूं सुखका सदन निश्चल । एक ही एक ॥ ५६ ॥
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५ ॥
आसुरी लोगोंके अभिमानका रूप —
होगा कुबेर महा संपन्न । किंतु नहीं है मेरे समान ।
संपन्नतामें मेरे समान । लक्ष्मीपति भी नहीं ॥ ५७ ॥
मेरे कुलकी उज्ज्वलता । जाति-गोतमें जो श्रेष्ठता ।
उसके सन्मुख अल्पता । दीखती ब्रह्माकी भी ॥ ५८ ॥
अपनी बढाई वे इस प्रकार । ईश्वरादिको भी व्यर्थ मानकर ।
अपनेको सर्व-श्रेष्ठ बताकर । करते रहते हैं ॥ ५९ ॥
लोप हुवा अब अभिचार । करूंगा उसका जीर्णोद्धार ।
प्रतिष्ठा करूंगा पर-मार । यज्ञकी अब ॥ ३६० ॥
मेरे गुण-गीत जो गायेंगे । नाट्यादिसे मुझे रिझायेंगे ।
जो मांगेंगे उसे वह देंगे । सभी वस्तु ॥ ६१ ॥
मादक अन्न पेय पानमें । प्रमदाओंके आलिंगनमें ।
बनूंगा मैं तीनों भुवनमें । आनंद-रूप ॥ ६२ ॥
मैं हूं कुलीन संपन्न कौन है मुझसा कहां ।
यज्ञ-दान-विलासी मैं मानते अज्ञ मोहसे ॥ १५ ॥
ज्ञानेश्वरी १५८

कहूं मैं कितना तुझे अर्जुन । आसुरीके ऐसे पागलपन ।
सूंघा करते गगन-सुमन । ऐसे ही वे ॥ ६३ ॥
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतंति नरकेऽशुचौ ॥ १६ ॥
मोह-आंधीमें फंसकर तमांधमें चकर काटते रहते हैं—
ज्वरमें भरके जैसे । भ्रमता है रोगी वैसे ।
बांधता है संकल्पसे । मनोरथ सारे ॥ ६४ ॥
अज्ञान-धूलमें भरकर । आशाकी आंधीमें उडकर ।
नभमें घूमते गरगर । मनोरथोंके ॥ ६५ ॥
अनियमित आकाशके मेघ । या सागरके तरंग अभंग ।
वैसे कामना कामके तरंग । उठते अखंड ॥ ६६ ॥
ऐसी ही जो कामनायें अती । हृदयमें लगायें रहती ।
उसी परसे खींची जाती । कमल-कलियां ॥ ६७ ॥
या पाषाणके सिरपर । पड फूटते हैं गागर ।
जीवन वैसे निरंतर । होता है फूटा ॥ ६८ ॥
बढती जाती जैसे रात । बढता है तम सतत ।
जीवमें ऐसे मोह नित । बंधता जाता है ॥ ६९॥
तथा बढता जैसे मोह । बनता विषयोंका गृह ।
विषयोंके लेते हैं थाह । पातक सारे ॥ ३७० ॥
अपने बलसे जब पाप । आते जहां एकत्र समीप ।
सभी नरक आते हैं आप । जीवनमें ही ॥ ७१ ॥
इसीलिये जान तू पार्थ । पालते जो कु-मनोरथ ।
बसते नरकमें नित । असुरलोग ॥ ७२ ॥
भ्रममें भरके ऐसे जकडे मोह-जालमें ।
गिरते विषयासक्त नरकमें अमंगल ॥ १६ ॥
६५९ दैवासुर-संपद्विभाग-योग

वहां असि-पत्रके तरुवर । पलते अंगारके डोंगर ।
तपे हुए तेलके सागर । उछलते हैं ॥ ७३ ॥
यातनाके जो नित नये प्रकार । समझानेके वहां यही आधार ।
मिलते हैं जो सदैव भयंकर । नरक-लोकमें ॥ ७४ ॥
ऐसे नरकके लिये भयंकर । जनम लिये जो लेके अधिकार ।
करते हैं वे भ्रममे पड़कर । यज्ञ याग ॥ ७५ ॥
वैसे यज्ञादिककी है जो क्रिया । देती अपना फल धनंजय ।
किंतु नाटकका-सा स्वांग लिया । पाया कुफल ॥ ७६ ॥
पतिका करके जो आश्रय । प्रियकरकी होकर प्रिय ।
मनमें मानती धनंजय । सौभाग्यवती आप ॥ ७७ ॥
आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
यजंते नामयज्ञैस्ते दंभेनाविधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥
उपहार लूटनेके लिये यज्ञ करते हैं—
अपने आपको मन ही मन । पूजके अपना महंतपन ।
फूलता जाता है असाधारण । अहंमन्यतामें ॥ ७८ ॥
नहीं जानते झुकना कैसे । लोहेके ढले हुये स्तंभ जैसे ।
या गगन-चुंबी शिखर जैसे । खडे हैं पाषाणके ॥ ७९ ॥
अपनी ही सज्जनतासे आप । मनमें ही संतुष्ट हो अमाप ।
तिनकासा मानते परंतप । सारे विश्वको ॥ ३८० ॥
धनकी मदिरा फिर । पीनेसे मस्त हो कर ।
कृत्याकृत्य भूलकर । सबसे होते भिन्न ॥ ८१ ॥
जहां जुटी संपदा इस भांति । वहां यज्ञकी बात कैसे आती ।
किंतु पगलेको क्या न सूझती । किस समय ॥ ८२ ॥
स्वयं-पूजित गर्विष्ठ मदांध धन-मानमें ।
नामके करते यज्ञ दंभसे अन्यवस्थित ॥ १७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६०

जैसे वे कभी किसी समय । मद्य मौढ्यमें आ धनंजय ।
करते यज्ञका दंभमय । सारा स्वांग ॥ ८३ ॥
न कुंड न मंडप न वेदी । न उचित साधन समृद्धी ।
तथा उसकी न कुछ विधी । जिससे द्वेष ही सदा ॥ ८४ ॥
देव ब्राह्मणोंके नामका मान । गंध भी उसे न होता सहन ।
तब वहां आयेगा कैसे कौन । अपने मनसे ॥ ८५ ॥
बछियाका बनाकर भूत । गायके सम्मुख रख नित ।
चूस लेते हैं दूध सतत । धूर्त जैसे ॥ ८६ ॥
वैसे यज्ञका लेकर नाम । जगको दिखाकर धरम ।
लोगोंके चूस लेते हैं दाम । उपहार रूप ॥ ८७ ॥
सोचके अपना उत्कर्ष । होममें जो कुछ विशेष ।
उससे वे सर्व-नाश । चाहते औरोंका ॥ ८८ ॥
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषंतोऽभ्यसूयकाः ॥ १८ ॥
आसुरी बर्तावसे अंतरात्माको दुःख होता है—
आगे आगे भेरी फिर निशान । लगाके अपना दीक्षितपन ।
जगमें करते आप घोषण । भले रे हम भले ॥ ८९ ॥
ऐसे महत्त्वसे तब ये अधम । अहंतासे बनते महा-महिम ।
मानो काले पुटसे बनता तम । घोर अमावस काली ॥ ३९० ॥
इससे होती मूढता दृढ । बढती उद्दंडता उद्दंड ।
चढते अहंकारपे गाढ । पुट अविवेकके ॥ ९१ ॥
फिर दूसरोंकी भाष । करनेमें पूर्ण नाश ।
बल चढता विशेष । सामर्थ्यका ॥ ९२ ॥
भरके काम औ' क्रोध अहंता बल दर्पसे ।
मेरा स्व-पर देहोंमें करते द्वेष मत्सर ॥ १८ ॥
६६१ देवासुर-संपद्विभाग-योग

ऐसे अहंकार बल । मिल करके सकल ।
दर्प सागर उछल- । आता असीम ॥ ९३ ॥
ऐसे उछलता हुवा दर्प । बढ़ाता काम-पित्त-प्रकोप ।
पाकर उसका फिर ताप । भड़कता क्रोधाग्नि ॥ ९४ ॥
तब मानो जेठका जलाता आतप । तथा तेल घीका साथ ले हो प्रकोप ।
होता अग्नि-वायुका तांडव-प्रताप । उसी भांति ॥ ९५ ॥
अहंकारके साथ बल । दर्प काम-क्रोधसे मिल ।
प्रकट हुवा जिस स्थल । पांडुकुमार ॥ ९६ ॥
ले अपना वे आदेश । रखेंगे क्या रीता शेष ।
करनेमें सर्व-नाश । कौनसा कहां ॥ ९७ ॥
पहले वे धनुर्धर । अपना मांस रुधिर ।
देंगे सब परमार । अभिचारार्थ ॥ ९८ ॥
जहां जलते हैं सब तन । उसमें जो “मैं” होता अर्जुन ।
उस “मैं” आत्मापे आक्रमण । होता है वह ॥ ९९ ॥
तथा ऐसा अभिचार होता कहां । उपद्रव उसके हो जहां तहां ।
मैं रूप चैतन्य होता वहां वहां । उसे होती पीड़ा ॥ ४०० ॥
रहते हैं जो अभिचारसे भिन्न । उनपे दोष-दृष्टिके पाषाण ।
फेंकते रहते हैं जो अर्जुन । सदा सर्वत्र ॥ १ ॥
तभी मैं उनको दंड देता हूँ—
सती तथा जो है सज्जन । दानशील याज्ञिक जन ।
तपस्वी अद्भुत महान । संन्यासी भी ॥ २ ॥
भक्त या होते हैं महात्मा । होते जो मेरा निज-धाम ।
आधार लेता नित धर्म । उनके सदनका ॥ ३ ॥
द्वेषसे भर ऐसों पर । कालकूटसे भरकर ।
अपशब्दोंके तीखे तीर । चलाते रहते हैं ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी ६६२

तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ १९ ॥
इसभांति सभी प्रकारसे । बरतते हैं मेरे शत्रुसे ।
सुन तू मैं उन पापियोंसे । कैसे निपटता हूं ॥ ५ ॥
मानव-देहका ले आश्रय । करते हैं जगतका क्षय ।
वह पदवी मैं धनंजय । छीन लेता हूं ॥ ६ ॥
तथा फेंकता क्लेश-ग्रामके घूरे पर । अथवा भव-पुरके पन-घाट पर ।
उस तम-योनिमें ऐसे मूढोंको फिर । देता हूं जन्म ॥ ७ ॥
फिर आहारके नामसे जहां । घास भी नहीं उगता है वहां ।
व्याघ्र वृश्चिक सब आते कहां । वहां डालता ॥ ८ ॥
भूखके दुःखसे तडपते । अपने आपको तोड खाते ।
जनमते मरते रहते । उस स्थानपे ॥ ९ ॥
अपने ही विषसे जिनके । चर्म हैं जलते शरीरके ।
बिलमें रहते सिकुडके । सांप बन वह ॥ ४१० ॥
श्वास लेनेमें है जाता । जिनका समय पार्थ ।
आराम नहीं मिलता । उन दुर्जनोंको ॥ ११ ॥
ऐसे करोडों कल्प । गिननेमें है अल्प ।
उतना काल खप- । जाता उनका ॥ १२ ॥
उनको जिस स्थानपे है जाना । पहला पडाव है यह स्थान ।
आगेके होते हैं अति दारुण। दुःख उनके ॥ १३ ॥
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौंतेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥ २० ॥
द्वेषी क्रूर तथा पापी जगमें हीन जो जन ।
उन्हें मैं फेंकता नित्य आसुरी योनिमें फिर ॥ १९ ॥
आसुरी योनियां पाके अनेक जन्म जन्ममें ।
मुझसे न मिले ही वे पाते जाते अधोगति ॥ २० ॥
६६३ देवासुर-संपद्विभाग-योग

सुन उन्होंने इस भांति । कमाके आसुरी संपत्ति ।
पायी है ऐसी अधोगति । उसके बदलेमें ॥ १४ ॥
फिर व्याघ्रादि तामस । योनियोंमें है अल्पसा ।
देहधारण ढारस । मिलता है ॥ १५ ॥
वह भी मैं फिर छीन लेता । तब तमका ढेर बनाता ।
अंधारभी काला हो जाता । वहां पहुंचके ॥ १६ ॥
आसुरी लोगोंके लिये ज्ञानेश्वरकी करुणा—
तब उससे पाप भी घिनाता । नरक भी उससे भय खाता ।
थकान श्रमसे मूर्छित होता । थककर जो ॥ १७ ॥
इनसे मल भी मलता । ताप भी इनसे तपता ।
इनके नामसे डरता । महा भय भी ॥ १८ ॥
पाप भी इनसे उकताता । अशुभ इनसे है अशोभता ।
भ्रष्टत्व भी इनसे है डरता । भ्रष्टाचारसे ॥ १९ ॥
विश्वमें जो अति हीन । अधम तम अर्जुन ।
भोगते वे सब स्थान । तामस योनिके ॥ ४२० ॥
रोती है वाचा कहनेमें कथा । स्मरणसे मन पीछे हठता ।
मूर्खोंने कितना जोडा है पार्था । यह पाप सारा ॥ २१ ॥
इसलिये कहू ये असुर । संपत्ति पोसते भयंकर ।
होती ऐसी अधोगति घोर । केवल मात्र ॥ २२ ॥
इसलिये तुझे धनुर्धर । जहां संपदा होती आसुर ।
मुडना भी कभी उस ओर । है अनुचित ॥ २३ ॥
तथा दंभादि छ दोष । करते हैं जहां वास ।
तजना है सहवास । उनका सदैव ॥ २४ ॥
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ २१ ॥
काम क्रोध तथा लोभ करते आत्म-नाश जो ।
तीन ये नरक-द्वार टालना इनको नित ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी ६६४

काम-क्रोधसे सदा-सर्वत्र दूर रहना चाहिये—
काम-क्रोध तथा लोभ । फूटते तीनोंमें कोंभ ।
फलता वहां अशुभ । जान तू यह ॥ २५ ॥
समस्त दुःखोंका अर्जुन । करानेके लिये दर्शन ।
नियुक्त किये हैं ये तीन । पथ-दर्शक ॥ २६ ॥
या पापियोंको नरक-भोगमें । पहुँचानेके लिये जगतमें ।
पातकोंकी वीर परिषदमें । श्रेष्ठ ये तीन ॥ २७ ॥
रौरवादि नरक महान् । सुनाते नहीं कमी पुराण ।
जब तक न उठते तीन । हृदयमें ये ॥ २८ ॥
अपाय होते इससे सुलभ । होता है यातनाओंका लाभ ।
“हानी” हानी नहीं होती अशुभ । हानी ये तीन ॥ २९ ॥
क्या कहू मैं धनुर्धर । कहे ये निकृष्ट चोर ।
तथा नरकका द्वार । खुला हुवा ॥ ४३० ॥
काम-क्रोध लोभमें जीव । पोसता है जो निज-भाव ।
सम्मान पाता है पांडव । नरक-सभामें ॥ ३१ ॥
इसीलिये तू पुनःपुन । काम-क्रोध लोभ ये तीन ।
दक्ष रहके निशिदिन । तजना पार्थ ॥ ३२ ॥
एतैर्विमुक्तः कौंतेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ॥
पहले छोड इनका साथ । फिर है धर्मादि पुरुषार्थ ।
करनेकी बात है पार्थ । सोचना सारी ॥ ३३ ॥
हृदयमें ये तीन हैं जागृत । तबतक भलाई होगी प्राप्त ।
ऐसी नहीं सुनी गयी है बात । देवोंसे भी ॥ ३४ ॥
तमके द्वार ये तीन टालके छूटता जब ।
कल्याणमार्गसे जाके पाता है गति उत्तम ॥ २२ ॥
६६५ देवासुर-संपद्विभाग-योग

अपनेसे है जिसकी प्रीति । तथा है आत्म-नाशकी भीति ।
न करना उसको संगति । इन तीनोंकी ॥ ३५ ॥
गलेमें बांधा कर पाषाण । करें सिंधुका अतिक्रमण ।
या जीनेके लिये है भोजन । करना कालकूट ॥ ३६ ॥
इन काम-क्रोध लोभका साथ । कार्य सिद्धिमें ऐसा है सतत ।
इसीलिये जड़-मूलसे पार्थ । मिटाना इसे ॥ ३७ ॥
इन तीनोंकी जब । कड़ी टूटेगी तब ।
अपनी राह सब । होगी प्राप्त ॥ ३८ ॥
त्रिदोषके छोडनेसे शरीर । त्रिकूटिका मिटनेसे नगर ।
त्रिदाह मिटनेसे है अंतर । शांत होता वैसे ॥ ३९ ॥
वैसे कामादिक जो ये तीन । तजते वे सुख पाते जान ।
मोक्ष-मार्गमें वे ही सज्जन- । संग पाते हैं ॥ ४४० ॥
सत्संगसे फिर प्रबल । तथा ले सत्शास्त्रका बल ।
पार होते वन सकल । जन्म-मृत्युके ॥ ४१ ॥
जिसमें आत्मानंद पूर्ण । बसता है वह सदन ।
तथा पाता है वह पट्टन । गुरु-कृपाका ॥ ४२ ॥
प्रिय-वस्तुओंकी जो परिसीमा । मिलती है वहां माउली आत्मा ।
तथा नहीं बजता है डिंडिम । संसारका वहां ॥ ४३ ॥
ऐसे जो काम-क्रोध लोभ । झाड़कर खड़ा है तब ।
स्वामी बन पाता है लाभ । इतने सारे ॥ ४४ ॥
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परांगतिम् ॥ २३ ॥
नहीं भाता जिसे यह कुछ । कामादिक ही है सब कुछ ।
इसीमें जाता है श्वपच । आत्मघाती वह ॥ ४५ ॥
छोड जो शास्त्रका मार्ग करता स्वैर-वर्तन ।
न पाता सिद्धिका मार्ग तथा सुख न सद्गति ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी ६६६

जगमें जो समान सरूप । हिताहित दिखाता है दीप ।
वह अमान्य करता बाप- । वेदको जो ॥ ४६ ॥
आसुरी स्वैराचारी इह-परमें सुख शांति नहीं पा सकता—
नहीं करता विधिका पालन । न है जिसको आत्म-हित भान ।
बढ़ाता जाता है भूख नित अर्जुन । इंद्रियोंकी जो ॥ ४७ ॥
कामादिकका आश्रय नहीं छोड़ूँगा । अपने वचनका पालन करूंगा ।
कहकर स्वेच्छाचार रत रहेगा । कुमार्गी जो ॥ ४८ ॥
मुक्ति-प्रवाहका नीर । नहीं पा सकेगा वह नर ।
स्वप्नमें भी यह धनुर्धर । असंभव जान ॥ ४९ ॥
गया ही उसका पर-लोक । किंतु सुख भी वह ऐहिक ।
भोग नहीं सकता तू देख । भली भांति ॥ ४५० ॥
मछलीकी आशासे ब्राह्मण । बन गया जो धीवर मान ।
वहां भी उसे नास्तिक जान । न लेंगे अपनेमें ॥ ५१ ॥
विषयका लोभ धरकर । खोता पारलौकिक जो नर ।
उसको यहांसे भी सत्वर । ले जाती मृत्यु ॥ ५२ ॥
ऐसे पर-लोकमें ना स्वर्ग । यहां भी नहीं सुखोपभोग ।
तब आयेगा कैसा प्रसंग । मोक्षका वहां ॥ ५३ ॥
तमी करके काम का बल । सुख-भोग चाहते सकल ।
वे दोनोंमें होते हैं विफल । न होता उद्धार ॥ ५४ ॥
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥
वेद आज्ञाके अनुसार कर्तव्य करते जा—
इस कारणसे अर्जुन । चाहता जो अपना कल्याण ।
वेदकी आज्ञाका उल्लंघन । न करें कभी ॥ ५५ ॥
व्यवस्था जान लेनेमें यहां कार्य अकार्यकी ।
जानके शास्त्रकी आज्ञा कर तू सब कर्मको ॥ २४ ॥
३६७ देवासुर-संपद्विभाग-योग

जान कर पतिका मत । उसपे चलके सतत ।
सहज पाती आत्म-हित । पतिव्रता जैसे ॥ ५६ ॥
अथवा श्रीगुरुका वचन । करके नित परिपालन ।
कर लेना है आत्म-मंचन । अपना वैसे ॥ ५७ ॥
अंधेरेमें रखा कोई सामान । प्राप्त करलेना हो तो अर्जुन ।
सदा दीप करते हैं जान । आगे वैसे ॥ ५८ ॥
पुरुषार्थोंका संपूर्ण । स्वामी होना तो अर्जुन ।
श्रुति स्मृतिके वचन । मानना वंद्य ॥ ५९ ॥
शास्त्र कहता यदि कुछ तजना । राज्य सुख भोग भी तृण मानना ।
विष लेने कहता तो ना कहना । शब्द भी विरुद्ध ॥ ४६० ॥
ऐसी जिसकी वेदकी निष्ठा । स्थिर हुई तो देख सुभटा ।
होगी कैसी आहितकी भेट । कहां किसको ॥ ६१ ॥
अहितसे जो निकालती । हित करके जो बढाती ।
ऐसी दूसरी न दीखती । श्रुति-मातासी ॥ ६२ ॥
कराती यह ब्रह्मसे मिलन । न करना कभी अवहेलन ।
कर तू इसका सदा अर्जुन । विशेष आश्रय ॥ ६३ ॥
आज तू यहां है पार्थ । शास्त्रोंको सुनले सार्थ ।
जन्म लिया है हितार्थ । धर्म-कार्यके ॥ ६४ ॥
तथा धर्मानुज नामसे । बोध होता सहजतासे ।
इससे भिन्न कुछ ऐसे । करना नहीं ॥ ६५ ॥
कार्याकार्यका विवेक । करना शास्त्रोंको देख ।
अकृत्य जो कुछ देख । तजना उसे ॥ ६६ ॥
तथा जो कुछ है करणीय । दृढतासे उसका आश्रय ।
करके संपन्न धनंजय । करना उसको ॥ ६७ ॥
विश्व-प्रामाण्यकी जो है मुरी । आज तेरे हाथमें सुबुद्धी ।
लोक-संग्रहार्थ तू त्रिशुद्धी । योग्य है इससे ॥ ६८ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६८