ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
सोलहवे अध्यायका ज्ञानेश्वर कृत समालोचन—
ऐसे आसुरी भाव संपूर्ण । तथा उसके सब लक्षण ।
कहे मुक्त होनेके साधन । कृष्णने पार्थसे ॥ ६९ ॥
इस पर वह पुत्र पांडुका । पूछेगा भाव अपने जीवका ।
सुनो वह सब दे चैतन्यका । कान बनाकर ॥ ४७० ॥
व्यास कृपासे संजय सुनाता । तथा इसे कुरु-नृप सुनता ।
श्रीगुरु कृपासे मैं सुनाता । इसको यहां ॥ ७१ ॥
आप संत-जन मेरी ओर । कृपा-वर्षा करें यहां पर ।
मैं आपकी मान्यतानुसार । बनूंगा स्वामी ॥ ७२ ॥
इसीलिये निज अवधान । मुझको देना पसायदान ।
जिससे बनूं सामर्थ्यवान । कहता ज्ञानदेव ॥ ७३ ॥
गीता श्लोक २४
ज्ञानेश्वरी ओवी ४७३
ॐ
६६९ देवासुर-संपद्विभाग-योग
१७
श्रद्धा - निरूपण - योग
गणेशरूप गुरुवंदन—
विश्व-विकसित-मुद्रा । छोड तेरी योग-निद्रा ।
नमन जीव-गणेंद्रा । सद्गुरु तुझे ॥ १ ॥
त्रिगुण-पुरमें जो घिरा गया । जीवत्व दुर्गमें अटका गया ।
वह आत्मा-शत्रुने छुडालिया । तेरे स्मरणसे ॥ २ ॥
तभी शिवसे करके तुलना । जान लिया तू है अति महान ।
मुमुक्षु - जीव करता तारण । तभी तू है हलका ॥ ३ ॥
तेरे विषयमें जो मूढ़ । उनको है तू वक्र-तुंड ।
ज्ञानियोंके लिये अखंड । सन्मुख ही तू ॥ ४ ॥
देखनेमें छोटी देवकी दृष्टि । किंतु मिलनोन्मिलनमें सृष्टि ।
करती सृष्टि लय दोनों गोष्टि । सहज लीलासे ॥ ५ ॥
प्रवृत्ति कर्णकी हलचलसे । छूटे मद गंधानिलसे ।
पूजा करते नील कमलसे । जीव-भ्रमरोंके ॥ ६ ॥
निवृत्ति कर्णके हिलनेसे फिर । पूजा वह सहज व्यर्थ होकर ।
दिखाता तब अपना अलंकार । खुले शरीरका ॥ ७ ॥
मानो वामांगीका लास्य विलास । जो है वही जगद्रूप आभास ।
तांडव नृत्य-कलाका विलास । दिखाता है तू ॥ ८ ॥
देख होता है यह चकित । होता है तू जिसका भी आप्त ।
आप्त व्यवहारसे विरत । होता है वह ॥ ९ ॥
मिटाता तू बंधनका ठाव । तमी तू जगद्बंधु यह भाव ।
तेरे लिये योग्य यह वैभव- । युत नाम ॥ १० ॥
द्वैतके नामसे जिसको । देह भी न रहे उसको ।
अपनासा किये तुमको । देवराय ॥ ११ ॥
पानेके लिये तुझको । दौड़ते जाते उनको ।
रखता सदा दूरको । अपनेसे तू ॥ १२ ॥
ध्यानसे लाता है जो मनमें । न होता तू उसके गांवमें ।
तुझे भूलता तो स्व-बोधमें । उसका होता तू ॥ १३ ॥
तू सिद्ध है जो न जानता । दिखाता वह सर्वज्ञता ।
वेदोंकी भी ऐसी जो वार्ता । नहीं सुनता तू ॥ १४ ॥
तेरा राशि-नाम है मौन । तब कैसे करूं स्तवन ।
देखना सब मिथ्या जान । नमन वैसे कैसे ॥ १५ ॥
यदि मैं सेवक बनना चाहता । भेद करनेसे मैं द्रोही बनता ।
इसलिये कुछ भी नहीं हो पाता । आपका मैं ॥ १६ ॥
सर्वथा कुछ भी नहीं होना । तुझ अद्वयकी प्राप्ति होना ।
तेरा यह मार्ग मैंने जाना । आराध्य-लिंग ॥ १७ ॥
अपनेको पूर्ण विलीन । करके रसमें लवण ।
भजना है वैसे नमन । मौनसे मेरा ॥ १८ ॥
रीता कुंभ जैसे सिंधुमें जाता । तथा पूर्ण भरके निकलता ।
अथवा दीप संगसे है बनता । बात भी दीप ॥ १९ ॥
करके तुझे मैं प्रणिपात । पूर्ण हुवा श्रीनिवृत्तिनाथ ।
करूंगा अब वह गीतार्थ । प्रकट मैं देव ॥ २० ॥
सोलवे अध्यायका समारोप और सत्रहवीकी भूमिका—
सोलहवे अध्यायके अंतमें । उसके समाप्तिके श्लोकमें ।
ऐसा कहा निश्चितपनमें । परमात्माने ॥ २१ ॥
कार्याकार्यकी है जो व्यवस्था । आचरण करनेमें पार्था ।
मानना तुझे शास्त्र सर्वथा । प्रमाण एक ॥ २२ ॥
६७१ श्रद्धा-निरूपण-योग
तब अर्जुनका मानस । कहता यह ऐसा कैसा ।
शास्त्रके बिना नहीं ऐसा । कर्मसे मुक्ति ॥ २३ ॥
तक्षकके फन परसे । निकाल लेना मणि कैसे ।
अथवा तोडें बाल कैसे । सिंहकी नाकका ॥ २४ ॥
मणि तब उसमें पिरोना । तथा अलंकारसे सजना ।
नहीं तो क्या वैसे ही रहना । खुले गलेसे ॥ २५ ॥
शास्त्रोंकी जो मत-भिन्नता । उसे कहो कौन जानता ।
होगी कैसी एक-वाक्यता । फलदायी उसकी ॥ २६ ॥
होने पर भी एक-वाक्यता । होगी क्या आचरण शक्यता ।
तथा जीवन होगा विस्तृत । इतना कैसे ॥ २७ ॥
तथा शास्त्र अर्थ देश काल । इन चारोंका जो एक फल ।
मिलेगा ऐसा योग सकल । किसको कब ॥ २८ ॥
तभी शास्त्रोचित घड़ना । असंभव है यह जान ।
अज्ञानी जो मुमुक्षु जन । उसकी गति क्या ? ॥ २९ ॥
पूछनेमें यह अर्जुन । करता है प्रस्ताव जान ।
आरंभ कहांसे कथन । करनेका ॥ ३० ॥
सबके विषयमें जो वितृष्ण । तथा सकल कलामें प्रवीण ।
कृष्णको आश्चर्य है जो कृष्ण । अर्जुनत्वमें ॥ ३१ ॥
शौर्यसे जुड़ा हुवा आधार । तथा सोम-वंशका शृंगार ।
सुखादिके लिये उपकार । जिसकी लीला ॥ ३२ ॥
प्रज्ञाका है जो प्रियतम । ब्रह्म विद्याका है विश्राम ।
सहचर औ' मनोधर्म । देवका है जो ॥ ३३ ॥
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥
अर्जुनने कहा
शास्त्रकी विधिको छोड श्रद्धासे पूजते जन ।
कौन सी उनकी निष्ठा सत्व या रज या तम ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ६७२
An exact line-by-line transcription of the text from the image:
शास्त्ररहित श्रद्धापूर्वक पूजनेवालोंकी क्या गति होती है?--
अर्जुन कहे तमाल-श्याम । इंद्रियोंसे गोचर तू ब्रह्म ।
करते हैं तेरे शब्द-ग्राम । साशंक हमको ॥ ३४ ॥
अन्य नहीं शास्त्रके बिन । जीवका स्व-मोक्ष साधन ।
ऐसे कहता तू श्रीकृष्ण । किसभांति ॥ ३५ ॥
यदि न मिलता ऐसा देश । तथा नहीं काल अवकाश ।
करना ऐसा शास्त्राभ्यास । वह भी दूर ॥ ३६ ॥
तथा अभ्यासके जो साधन । वह भी प्राप्त नहीं है जान ।
ऐसेमें करें क्या कैसे कौन । अभ्यास उसका ॥ ३७ ॥
अनुकूल नहीं प्राचीन । प्रज्ञाका साथ जिसे जान ।
दूर है शास्त्र-संपादन । उसके लिये ॥ ३८ ॥
अजी ! मानते शास्त्रका विषय । नहीं मिलता एक भी आश्रय ।
इसीलिये जिन्होंने छोड दिया । शास्त्रका विचार ॥ ३९ ॥
किंतु निर्धार कर शास्त्र । अर्थानुष्ठानसे पवित्र ।
वास करते जो पात्र । सुख पूर्वक ॥ ४० ॥
उनका-सा हमको होना । ऐसे सोच चित्तमें जान ।
करते हैं आलंबन । उस मार्गका ॥ ४१ ॥
देखके पाठके अक्षर । करे बालक अनुसर ।
अंधा चलता आगे कर । भलेको जैसे ॥ ४२ ॥
वैसे सर्व शास्त्र निपुण । उनका देख आचरण ।
चलते हैं जान प्रमाण । श्रद्धासे आप ॥ ४३ ॥
फिर शिवाविक पूजन । तथा भूम्यादि महादान ।
अग्नि-होत्रादि जो यजन । करते श्रद्धासे ॥ ४४ ॥
उन्हे कह सत्य रज तम । किसमें गिनता पुरुषोत्तम ।
मिले उनको कौन गति हम । जाने कैसे ॥ ४५ ॥
वैकुंठ पीठका तब लिंग । निगम-पद्मका जो पराग ।
जिसकी अंग छाया है जग । जीवित जान ॥ ४६ ॥
(३२) ६७३: श्रद्धा-निरूपण-ओवि
कालसे सहज प्रचंड । तथा जो लोकोत्तर प्रौढ़ ।
अद्वितीय परम गूढ़ । आनंद-घन जो ॥ ४७ ॥
इन गुणोंसे कीर्तिमान । जहां यह सामर्थ्य पूर्ण
बोलता ऐसे जो श्रीकृष्ण । स्वमुखसे यहां ॥ ४८ ॥
भगवान उवाच
त्रिविधा भवति श्रध्दा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥
श्रध्दा भी तीन प्रकारकी होती है—
कहता है श्रीहरि पार्थ ! तेरा भाव है मुझे ज्ञात ।
बाधक होती है बात । शास्त्राभ्यासकी ॥ ४९ ॥
केवल साधन मान श्रद्धा । पाना चाहो तो परम-पद ।
नहीं वह वैसे प्रबुद्ध । अज्ञात बात ॥ ५० ॥
श्रद्धा कहनेसे ही पार्थ । नहीं पायेगा सकलार्थ ।
द्विज क्या अंत्यजके साथ । न होगा अंत्यज ॥ ५१ ॥
हुवा भी यदि गंगोदक । मद्यके मटकेमें रख ।
लायेगा तो हो सके देख । पी सकता क्या ? ॥ ५२ ॥
चंदन होता है शीतल । किंतु अग्नि-ज्वालसे मिल ।
पकडा हुवा हाथ जल- । जायेगा न ? ॥ ५३ ॥
हीन कस सोनेके साथ । पुट दिया तो वह पार्थ ।
देगा शुद्ध सोनेका अर्थ । कभी वह ? ॥ ५४ ॥
ऐसे है श्रद्धाका जो स्वरूप । होता शुद्ध अपनेमें आप ।
किंतु मिलता है परंतप । जीवको जब ॥ ५५ ॥
श्रीभगवानने कहा
पाता स्वभावसे प्राणि श्रद्धा तीन प्रकारकी ।
सुन सात्विक है होती तथा राजस तामस ॥ २ ॥
ज्ञानेश्वरी ६७५
स्वभावसे ही प्राणि जात । अनादि पापके पड हाथ ।
बन गये त्रिगुणके साथ । एक रूपसे ॥ ५६ ॥
उसमें पाते वे अवनति । तथा चाहते हैं वे उन्नति ।
होती है तब वैसी ही वृत्ति । जीवोंकी सब ॥ ५७ ॥
वृत्ति-सा तब संकल्प करते । संकल्प-सा सब कर्म करते ।
तथा कर्मानुसार ही करते । शरीर-धारण ॥ ५८ ॥
बीज मिटकर वृक्ष होता । फिर वृक्ष बीजमें समाता ।
कल्पोंसे ऐसे चलता आता । किंतु न नाशता वृक्ष ॥ ५९ ॥
उसी भांति है यहां अपार । होता रहता है जन्मांतर ।
त्रिगुणत्व अव्यभिचार । प्राणियोंके साथ ॥ ६० ॥
इसीलिये प्राणियोंके साथ । रहती है श्रद्धा जो सतत ।
जैसे होते गुण वैसे पार्थ । यह जान तू ॥ ६१ ॥
बढता कभी सत्वशुद्ध । ज्ञानकी चाह होती सिद्ध ।
किंतु दोनों होते विरुद्ध । यहां तब ॥ ६२ ॥
होती तब सत्य विषयक । श्रद्धा जो मोक्ष-फल दायक ।
किंतु रज तम सहायक । होंगे क्या कभी ॥ ६३ ॥
सत्वके बलको तोड कर । चढता रज आकाश पर ।
होती तब श्रद्धा कूडा घर । कर्म-उसका झाडू ॥ ६४ ॥
फिर उठती तमकी आग । करती है वह श्रद्धा भंग ।
तब चाहता विषय-भोग । भोगनेमें निषिद्ध ॥ ६५ ॥
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥ ३
ऐसे है सत्व रज तम । श्रद्धा-रूप जान सुधर्म ।
नहीं रखता जीव ग्राम । इससे कुछ भिन्न ॥ ६६ ॥
स्वभाव जिसका जैसे श्रद्धा वैसे मिले उसे ।
श्रद्धासे ही बना जीव श्रद्धा-सा वह भी रहा ॥ ३
६७५ श्रद्धा-निरूपण-योग
इसीलिये श्रद्धा स्वाभाविक । रहती सदा त्रिगुणात्मक ।
रज तम तथा है सात्विक । भेद यहां जो ॥ ६७ ॥
जिस भांति है जीवन उदक । किंतु होता है विषमें मारक ।
अथवा होता है मिर्चमें तीव्र । ईखमें मधुर ॥ ६८ ॥
ऐसे पाता है जो जनम । या मरण साथ ले तम ।
उसका होता परिणाम । उसीका रूप ॥ ६९ ॥
जैसे काजल या हो मसी । उसमें न भिन्नता ऐसी ।
वैसे ही श्रद्धा जो तामसी । या तममें नहीं ॥ ७० ॥
वैसे श्रद्धा तमोगुणीमें । होती है तमके रूपमें ।
पूर्ण रूपसे सात्विकीमें । होती है सात्विक ॥ ७१ ॥
ऐसे है यह सकल । बसा है ब्रह्मांड गोल ।
श्रद्धा-मात्रसे केवल । ढाल करके ॥ ७२ ॥
किंतु गुणत्रयके कारण । किया त्रिविध-रूप धारण ।
श्रद्धाने भी यह साधारण । जान तू पांडव ॥ ७३ ॥
फूलसे जैसे वृक्ष जाना जाता । या बोलसे मानस जाना जाता ।
या सुख दुःखसे जाना-जाता । पूर्व-संचित ॥ ७४ ॥
वैसे अब पांडुकुमार । जानना श्रद्धाके प्रकार ।
कहता हूं लक्ष्य दे कर । सुन तू सब ॥ ७५ ॥
यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः ।
प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजंते तामसा जनाः ॥ ४ ॥
श्रद्धाका विविध रूप—
जिनकी सात्विक श्रद्धा । लेकर बनता बांधा ।
सदैव उनकी मेधा । रहती स्वर्गपे ॥ ७६ ॥
सत्वस्थ पूजते देव यक्ष राक्षस राजस ।
मृत प्रेतादि जो सारे पूजते लोग तामस ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी ३७६
विद्या सभी वे पढ़ते । यज्ञ-क्रियायें करते ।
ऐसे वे जाके रहते । देव-लोकमें ॥ ७७ ॥
तथा श्रद्धा जो राजस । लेकर बने वीरेश ।
भजते हैं वे राक्षस । यक्षादिक सब ॥ ७८ ॥
श्रद्धा लेकर जो तामस । आये कहूंगा तेरे पास ।
केवल वे अति कर्कश । बने पापका ढेर ॥ ७९ ॥
जीव-वध कर अमंगल । बलि देके भूत-प्रेत कुल ।
स्मशानमें जाके संध्याकाल । पूजते जो ॥ ८० ॥
तमो-गुणका लेकर सार । बनाये जाते हैं जो नर ।
जान वे तमोगुणका घर । श्रद्धाका जो ॥ ८१ ॥
ऐसे हैं ये तीन लक्षण । जगमें दीखते हैं जान ।
यह मैं कहता अर्जुन । इसीलिये तुझे ॥ ८२ ॥
सात्विक श्रद्धावाला मनुष्य शास्त्रोंका अनुकरण करता है—
यह जो है सात्विक श्रद्धा । जतन करना प्रबुद्धा ।
तथा है दोनोंके विरुद्ध । खड़ी करना ॥ ८३ ॥
यह सात्विक मति जिसकी । जोपासना करता उसकी ।
उसको नहीं मोक्ष-सिद्धिकी । कमी भीति ॥ ८४ ॥
नहीं सीखा वह ब्रह्म-सूत्र । तथा नहीं पढा कोई शास्त्र ।
सिद्धांत नहीं होता स्वतंत्र । उनके पास ॥ ८५ ॥
किंतु श्रुति-स्मृतिका अर्थ । बनते हैं वे स्वयं मूर्त ।
अनुष्ठानसे वे यथार्थ । देते हैं जगतको ॥ ८६ ॥
उनके आचरणके जो चरण । देख सात्विकी श्रद्धा अनुकरण ।
करके पाते फल असाधारण । निश्चित रूपसे ॥ ८७ ॥
दीप जलाता कोई कष्टसे जैसे । दूसरा दीप जला लेता उससे ।
दीप करेगा क्या कमी प्रकाशसे । उसको वंचित ॥ ८८ ॥
तथा किसीने धन अपार । व्यय कर बांधा अच्छा घर ।
अतिथि उसमें रह कर । सुख नहीं पाता क्या ? ॥ ८९ ॥
६७७ श्रद्धा-निरूपण-योग
जाने दो कोई बांधता सरोवर । उसीकी तृषा हरता है क्या नीर ।
रसोई पाकानेवालेको ही घर । मिलता क्या अन्न ॥ ९० ॥
इससे अधिक क्या कहूंगा । गौतमकी लाई हुई गंगा ।
उससे वंचित है क्या जग । कह तू मुझसे ॥ ९१ ॥
तमी अपना अधिकार जान । करता जो शास्त्रोंका अनुष्ठान ।
श्रद्धासे उसका अनुकरण । कर तरता मूर्ख ॥ ९२ ॥
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यंते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ ५ ॥
अशास्त्रीय तामसिक श्रद्धा-तप—
शास्त्रके नामसे भी जो पार्थ । न जानते आरंभकी बात ।
शास्त्रज्ञोंको रखते सतत । गांवके बाहर ॥ ९३ ॥
देख कर बडोंकी बात । करते हैं ठठोली तात ।
तथा देखके वे पंडित । बजाते चुटकियां ॥ ९४ ॥
करके बड़ा अभिमान । आचरते तपाचरण ।
दंभसे भरकर पूर्ण । पाखंड रचते ॥ ९५ ॥
दूसरोंके शरीरमें शस्त्र । चुभाके छील उसके गात्र ।
रक्तसे लेते प्रणीत-पात्र । भर भर कर ॥ ९६ ॥
वह रक्त आगमें गिराते । भूतके मुखमें भी लगाते ।
तथा बालकोंका बलि देते । उन भूतोंको ॥ ९७ ॥
आग्रहके बलपर । क्षुद्र देवताको धर ।
करते हैं सत्र घोर । अपाचारका ॥ ९८ ॥
अजी ! करके स्वपर पीडन । तम क्षेत्रमें बीज बोते जान ।
आगे पाते हैं वही वे अर्जुन । फलके रूपसे ॥ ९९ ॥
शास्त्र-निषिद्ध जो घोर दंभसे करते तप ।
अहंतासे भरे सारे काम राग बली जन ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ६७८
पडा है समुद्रमें पार्थ । तैरने नहीं जो समर्थ ।
तथा नहीं उसके हाथ । और पांव भी ॥ १०० ॥
या वैद्यका द्वेष कर । औषध ठुकरा कर ।
होगा कैसे रोग दूर । किसीका कभी ॥ १ ॥
करके आंखोंसे विरोध । उन्हें फोडले प्रतिशोध ।
पड़ा रहता बन अंध । कोनेमें कहीं ॥ २ ॥
इसी प्रकार ये असुर । शास्त्रोंका करके धिःकार ।
करते हैं बन-संचार । अविवेकसे ॥ ३ ॥
काम जो कराता वह करते । क्रोध मरवाते उसे मारते ।
मुझे दुःखके गढेमें गाढ़ते । सभी ये लोग ॥ ४ ॥
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥ ६ ॥
अपने या पराये देहको । देते हैं वे दुःख जो उसको ।
भोगना होता मुझ आत्माको । पांडुकुमार ॥ ५ ॥
वाचाके भी अंचलसे । स्पर्श न करता जिसे ।
तजनेके लिये उसे । कहना पडा ॥ ६ ॥
स्पर्शसे जैसे प्रेत हटाते । शब्दसे चांडालको तजते ।
हाथ लगाकर जैसे धोते । मलको वैसे ॥ ७ ॥
वहां शुद्धिके ही हेतुसे । लेप नहीं मानते वैसे ।
उन्हे तजनेके हेतुसे । कहा यह यहां ॥ ८ ॥
होगा तुझे जब दर्शन । असुरोंका तब अर्जुन ।
करना मेरा ही स्मरण । प्रायश्चित्त रूप ॥ ९ ॥
तभी श्रद्धा जो सात्विक । जीव-भावसे हो एक ।
जतन करना नेक । सर्वतोपरी ॥ ११० ॥
गलाते मुझ आत्माको सोखके देह-धातुको ।
ऐसे विवेक-हीनोंकी निष्ठा है जान आसुरी ॥ ६ ॥
६७९ श्रद्धा-निरुपण-योग
करना सदैव ऐसा संग । सत्व-पोषणका हो अंग ।
तथा सत्व-वृद्धिका हो भाग । लेना ऐसा अन्न ॥ ११ ॥
साधकके लिये आहारका महत्व—
जो है अति-स्वाभाविक । स्वभाव वृद्धि कारक ।
आहारसे नहीं नेक । साधन शक्त ॥ १२ ॥
प्रत्यक्ष देख तू यहां वीर । भला मनुष्य सुरा पीकर ।
करता कैसे मत्त होकर । उसी क्षणमें ॥ १३ ॥
अथवा जो मनमाने अन्न-सेवन । करता तब वात-पित्तके कारण ।
या नव-ज्वरमें दूध होता अर्जुन । दुःख-दायक ॥ १४ ॥
अथवा अमृत जैसे । टालता मरण वैसे ।
तथा है विष लेनेसे । आती मृत्यू ॥ १५ ॥
वैसे ही लेनेसे जो आहार । लेता है धातु वही आकार ।
धातु जैसे वैसे ही अंतर । करता भाव पुष्ठ ॥ १६ ॥
या तपनेसै जैसे बर्तन । तपता अंदर जल जान ।
वैसे धातु वश है अर्जुन । चित्त-वृत्ति ॥ १७ ॥
इसीलिये सात्विक सेवन । करनेसे होगा वृद्धि सत्व-गुण ।
तथा रज तम रसका सेवन । बढाता है वही ॥ १८ ॥
तमी कौन सात्विक आहार । रज तमका क्या क्या आकार ।
कहता हूं यह धनुर्धर । आदरसे सुन ॥ १९ ॥
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥ ७ ॥
आहारका विविध रूप—
उसी भांतिसे है आहार । हुए कैसे तीन प्रकार ।
तुझसे यह धनुर्धर । कहूंगा सुन ॥ १२० ॥
आहार भी सभीका है तीन भांति यथा रुचि ।
यज्ञ दान तपमें भी कहता भेद तू सुन ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी ६८०
रुचि है कैसे खानेवालेकी । निष्पत्ति होती वैसे अन्नकी ।
तथा रुचि होती है गुणोंकी । दासी जान ॥ २१ ॥
जीव जो है कर्त्ता औ, भोक्ता । गुणोंसे वह स्वभावता ।
प्राप्त करके त्रिविधता । बरतता है ॥ २२ ॥
इसीलिये त्रिविध आहार । यज्ञ करता तीन प्रकार ।
तप दान आदि भी व्यापार । त्रिविध जान ॥ २३ ॥
पहले आहार लक्षण । कहता हूं सुन अर्जुन ।
स्पष्टतासे कर वर्णन । इस समय ॥ २४ ॥
आयुःसत्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्विकप्रियाः ॥ ८ ॥
सात्विक आहारका विवेचन—
सात्विक गुणकी ओर जब । दैवसे भोक्ता पढ़ता तब ।
उसका रस बढ़ता सब । मधुर रसमें ॥ २५ ॥
होते हैं जो रस-भरित । मधुर रसके पदार्थ ।
तथा मधुर स्निग्ध पार्थ । परिपक्व सहज ॥ २६ ॥
आकारमें होते सुंदर । स्पर्शमें भी होते मधुर ।
जीभको स्नेह मधुर । उसका स्पर्श ॥ २७ ॥
रससे जो भरित । द्रव-भावसे युक्त ।
अग्नि-स्पर्शसे मुक्त । ढीली छालका ॥ २८ ॥
अल्प-गात्र परिणाम महत्तर । होता जैसे गुरु-मुखका अक्षर ।
वैसे दीखता अल्प होता अपार । तृप्ति देनेमें ॥ २९ ॥
रुचिमें होता जैसे मधुर । स्वास्थ्यमें भी होता हितकर ।
ऐसा अन्न होता प्रियकर । सात्विकोंको ॥ १३० ॥
सत्व प्रीति सुख स्वास्थ्य आयुष्य बल-वर्धक ।
रसाल मधुर स्निग्ध स्थिर आहार सात्विक ॥ ८ ॥
६८१ श्रद्धा-निरूपण-योग
ऐसे गुण लक्षण पूर्ण । होता है सात्विक भोजन ।
आयुष्यको देता है त्राण । नित्य-नया जो ॥ ३१ ॥
इस भांति है वह सात्विक रस । देहमें बरसता रात दिवस ।
जिससे आयुष्य नदी स-उल्लास । बढ़ती देहमें ॥ ३२ ॥
उनके सत्वका है पोषण । होता इसी अन्नके कारण ।
दिनके उन्नतिका साधन । भानु होता जैसे ॥ ३३ ॥
तथा शरीर और मन । समर्थ करता है अन्न ।
तब रोगका क्या कारण । रहता यहां ॥ ३४ ॥
होता जब सात्विक भोग्य । तब भोगते हैं आरोग्य ।
शरीरको मिला सौभाग्य । उदय होकर ॥ ३५ ॥
लेन देन होता सुखका । तथा उत्कर्ष भलाईका ।
बढ़ता स्नेह आनंदका । इससे सदैव ॥ ३६ ॥
ऐसा है सात्विक आहार । परिणाममें है मधुर ।
करता महा उपकार । अंतर्बाह्य ॥ ३७ ॥
राजसिक आहारका विवेचन—
राजसकी जिसमें है प्रीति । जिस रसमें उसकी रति ।
करूंगा उसकी अभिव्यक्ति । प्रसंगसे अब ॥ ३८ ॥
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ ९ ॥
कालकूट मृत्यु बिन । इतना कटु है मान ।
या चूनेसे भी अर्जुन । अधिक आम्ल ॥ ३९ ॥
आटेमें पानीके समान । कर नमकका मिलान ।
इसी भांति रसमें मान । डालते नमक ॥ १४० ॥
खारा सूखा कटू तीखा खट्टा अत्युष्ण दाहक ।
दुःख शोक तथा रोग देता आहार राजस ॥ ९ ॥
ज्ञानेश्वरी ६८२
होता जो ऐसे नमकीन । राजसका प्रिय भोजन ।
निगलता अग्नि समान । उष्ण अतिशय ॥ ४१ ॥
भाफके छोर पर जैसे । रसके बात लगानेसे ।
बल पायेंगे दीप वैसे । भोजन उष्ण ॥ ४२ ॥
आंधीको पीछे ढकेलेगा । या साबल चुभ जायेगा ।
ऐसा तीता वह खायेगा । घावके बिन चुभता जो ॥ ४३ ॥
राखसा जो होता रूक्ष । व्यंजन होता है रूक्ष ।
जिव्हा दंशसा जो रूक्ष । भाता है उसे ॥ ४४ ॥
परस्परमें दांत । टकरायेेंगे साथ ।
ऐसे वस्तुसे पार्थ । तोषता वह ॥ ४५ ॥
पहले ही जो चटपटा होता । उसमें सरसों आदि पड़ता ।
जब उसको मुखमें डालता । नाकमें जाती बाफ ॥ ४६ ॥
आगको भी जो चुप करता । ऐसे बनता जो रायता ।
राजसको प्राणसे भी भाता । ऐसे व्यंजन ॥ ४७ ॥
कम मान जीभकी चुभन । जीभका वह पागल बन ।
भरता वह आगसा अन्न । अपने उदरमें ॥ ४८ ॥
भड़कती इससे आग अंदर । चैन न आता भूमि या सेज पर ।
पानीका पात्र नहीं होता है दूर । मुखसे कभी ॥ ४९ ॥
नहीं खाया था वह आहार । सोया हुवा व्याधि अजगर ।
चेतानेमें डाला मद्यसार । उदरमें अपने ॥ १५० ॥
होडमें उमडता परस्पर । एक साथ रोगोंको दे आधार ।
फलता ऐसे राजस आहार । दुःख रूप केवल ॥ ५१ ॥
ऐसे राजस आहार । दिखाया है धनुर्धर ।
परिणामका विचार । सविस्तृत ॥ ५२ ॥
तामसिक आहारका विवेचन—
अब तामस जिसे खाता । उसे कैसा आहार भाता ।
उसको अब मैं कहता । न कर तू घृणा ॥ ५३ ॥
६८३ श्रद्धा-निरूपण-योग
सडा गला तथा झूठना उसमें न अहित माना ।
चरती जैसे भैंस जाना वैसे खाता ॥ ५४ ॥
यातयामं गतरसं पूतिपर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १० ॥
सबेरेका पका हुवा अन्न । दोपहरका दूसरे दिन ।
ऐसे लेता है वह भोजन । प्रेमसे तामस ॥ ५५ ॥
या आधा ही पका हुवा । या संपूर्ण जला हुवा ।
रस हीन बना हुवा । ऐसा वह खाता ॥ ५६ ॥
हुई जब रस-निष्पत्ति । मिठासकी हो अभिव्यक्ति ।
वह अन्न ऐसी प्रतीति । नहीं करता तामस ॥ ५७ ॥
कभी किसी प्रसंगसे । अच्छा अन्न मिलनेसे ।
बैठता है व्याघ्र जैसे । सडने तक ॥ ५८ ॥
पक कर हुवा बहु दिन । हुवा है वह स्वादसे हीन ।
सूखा या सडा हुवा अन्न । खाता वह प्रीतिसे ॥ ५९ ॥
ऐसे सड़ा हुवा अन्न । कीचड़सा करता सान ।
सबके साथही भोजन । करता एकत्र ॥ १६० ॥
ऐसे घिनौना वह जो खाता । उसे सुख भोजन मानता ।
इससे भी संतुष्ट नहीं होता । वह पापी ॥ ६१ ॥
देख तू यह चमत्कार । शास्त्र-निषिद्ध देखकर ।
निषिद्ध ही एकेक कर । लेता कुपथ्य ॥ ६२ ॥
अपेयका वह पान । अभोज्यका भोजन ।
करनेमें है अर्जुन । होता उतावला ॥ ६३ ॥
ऐसे तामस अन्न युक्त । होता है ऐसी आशा-युक्त ।
इसका फल भी तुरंत । मिलता उसको ॥ ६४ ॥
रस हीन तथा ठंडा बासी दुर्गंध-युक्त जो
निषिद्ध और उच्छिष्ट आहार तामस-प्रिय ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी : ६८४
जमी छूता अपवित्र । अन्नको उसका वस्त्र ।
तभी वह पाप-पात्र । बनता है ॥ ६५ ॥
फिर इसके उपरांत । खानेकी उसकी रीत ।
उदर-पूर्तिकी सतत । यातना मान ॥ ६६ ॥
शिर छेदनेसे क्या मिलता । अग्नि-प्रवेशसे जो बनता ।
उसको वह नित सहता । धनुर्धर ॥ ६७ ॥
इसीलिये जो तामस अन्न । उसके फलका क्या कथन ।
उसको खाना ही दुःख जान । कहता देव ॥ ६८ ॥
यज्ञके भी तीन प्रकार हैं—
जैसे तामस आहार । वैसे हैं यज्ञके प्रकार ।
वे भी होते तीन प्रकार । कहता हूं सुन ॥ ६९ ॥
इन तीनोंमें प्रथम । सात्विक यज्ञका मर्म ।
सुन यह सुमहिम । शिरोमणि तू ॥ १७० ॥
अफलाकांक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥
सात्विक यज्ञका विवेचन—
जैसे है एक प्रियोत्तम । उसके बिन न हो काम ।
ऐसे जिसका मनोधर्म । पतिव्रताका ॥ ७१ ॥
गंगा सिंधुको छोड़कर । नहीं जाती है किसी ओर ।
तथा आत्माको देखकर । वेद होते मौन ॥ ७२ ॥
तथा स्व-हितमें जो होती । सदा निरत चित्त-वृत्ति ।
नहीं रहती अहंकृति । फल हेतु यहां ॥ ७३ ॥
पहुंच कर वृक्षका मूल । लौटना न चाहता जल ।
सूख जाता है वहीं केवल । उसी मूलमें ॥ ७४ ॥
तजके फलकी आशा मानके करणीय है ।
विधिसे मनसे जो है करते यज्ञ सात्विक ॥ ११ ॥
६८५ श्रद्धा-निरूपण-योग
वैसे ही मन और तन । यजन निश्चयके स्थान ।
होकर सदैव विलीन । न चाहते कुछ ॥ ७५ ॥
फल अभिलाषा तजकर नित । स्वधर्म बिन अन्यमें हो विरक्त ।
करता है यज्ञ-कार्य अलंकृत । सर्वांग पूर्ण ॥ ७६ ॥
देखते हैं दर्पणमें जैसे । अपनी ही आंखोंकी ओरसे ।
या हथेली पर रत्न जैसे । दीपसे देखते ॥ ७७ ॥
या उदित होते ही दिवाकर । दीखते नाना पथ चहूं ओर ।
वैसे देखके वेदका निर्धार । चलता वह ॥ ७८ ॥
वह कुंड मंडप वेदी । अन्य भी साधन समृद्धि ।
पाता जैसी कहती विधि । वैसे वह सकल ॥ ७९ ॥
जैसे सब अलंकार यथा स्थान । शरीर पर करते हैं धारण ।
वैसे रखता वह स्वस्थान । योजन पूर्वक ॥ १८० ॥
करना क्या इसका वर्णन । देती यज्ञ विद्याही दर्शन ।
मूर्तिमंत हो आयी स्वस्थान । यज्ञ-हेतुसे ॥ ८१ ॥
वैसे सांगोपांग । होता है जो याग ।
अहंकृति भाग । डुबाकर ॥ ८२ ॥
कहते हैं उत्तम लक्षण । तुलसी वृक्षका क्षण क्षण ।
न रख कोई आशा अर्जुन । फल पुष्प छायाकी ॥ ८३ ॥
या होता है जो फलाशा बिन । योजना पूर्ण यज्ञ निर्माण ।
ऐसे यज्ञ करना जान । यज्ञ सात्विक ॥ ८४ ॥
अभिसंधाय तु फलं दंभार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥ १२ ॥
राजसिक यज्ञका विवेचन—
कहना यह भी अर्जुन । यज्ञ वैसे ही सुलक्षण ।
जैसे राजाको निमंत्रण । श्राद्धमें जैसे ॥ ८५ ॥
फलका अनुसंधान रखके दंभपूर्वक ।
होता यजन लोगोंमें जान तू यज्ञ राजस ॥ १२ ॥
ज्ञानेश्वरी ६८६
राजा यदि घरमें आता । अन्य भी जो कार्य साधता ।
तथा है यश भी मिलता । होता है श्राद्ध ॥ ८६ ॥
करके ऐसा पूर्ण विचार । स्वर्ग मिलेगा मरने पर ।
तथा कीर्ति होगी यहां पर । यज्ञ दीक्षासे ॥ ८७ ॥
ऐसा फलाशासे केवल । किया यज्ञ-कर्म सकल ।
यश-कीर्ति जिसका मूल । यज्ञ है राजस ॥ ८८ ॥
विधिहीनमसृष्टान्नं मंत्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३ ॥
तामसिक यज्ञका विवेचन—
पशु-पक्षियोंके व्याहमें कमी कहीं । कामके बिना ज्योतिषीका काम नहीं ।
वैसे तामसीके यज्ञमें सर्वत्र ही । आग्रहही मूल ॥ ८९ ॥
पवन राह नहीं चाहता । मरण मुहूर्त देखता ।
निषिद्धसे नहीं है डरता । अग्नि जैसे ॥ १९० ॥
वैसे हैं तामसके आचार । न मानता विधि-व्यवहार ।
इसीलिये वह धनुर्धर । होता उच्छृंखल ॥ ९१ ॥
विधि-विधान वहां नहीं होता । मंत्र-तंत्रका स्पर्श न रहता ।
अन्न मात्र भी वह नहीं देता । भैंस भी जो खाये ॥ ९२ ॥
शत्रु-बोध है जहां ब्राह्मण । वहां आयेगी कैसे दक्षिणा ।
आंधीमें आग साथ अर्जुन । ऐसे है वहां ॥ ९३ ॥
ऐसे वहां सभी व्यर्थ होता । श्रद्धाका मुख नहीं दीखता ।
वह घर जैसे लूटा जाता । निपुत्रिकका ॥ ९४ ॥
इस भांति होता यज्ञाभास । उसका नाम यज्ञ तामस ।
कहता है यह श्रीनिवास । धनुर्धरसे यहां ॥ ९५ ॥
न है विधि न है मंत्र अन्नोत्पत्ति नहीं जहां ।
नहीं श्रद्धा नहीं त्याग वह है यज्ञ तामस ॥ १३ ॥
३८७ श्रद्धा-निरूपण-योग
जैसे गंगाका ही उदक । ले जाते भिन्न मार्गसे देख ।
तब मल एक शुद्धि एक । आता जैसे ॥ ९६ ॥
तपका स्वरूप—
तथा तीन गुणोंसे तप । हुवा है यहां तीन रूप ।
करनेसे एक है पाप । उद्धरता दूजा ॥ ९७ ॥
तपके यहां तीन प्रकार । हुए हैं जैसे पांडुकुमार ।
यह जाननेमें ही सुकर । जान तू तप क्या है ॥ ९८ ॥
कहते हैं यहां तप किसको । समझाता हूं मैं यह तुझको ।
फिर उसके तीन प्रकारको । कहूंगा मैं ॥ ९९ ॥
तप है यहां जो सम्यक । वह भी त्रिविध रूपक ।
शारीरिक औ' मानसिक । तथा वाचिक भी ॥ २०० ॥
अब त्रिविध-तपमें सुन । शारीरिक तपका लक्षण ।
जिसे जो प्रिय हो उसे मान । शंभु या श्रीहरि ॥ १ ॥
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४ ॥
शारीरिक तप सात्विक—
जिसको प्रिय देवालय । यात्रादि करनेमें समय ।
आठौ प्रहर जैसे हैं पाय । चले काल-चक्रसे ॥ २ ॥
देवांगणकी रखने स्वच्छता । पूजोपचारमें नित रहता ।
तत्पर हो वह सब करता । हाथकी शोभा जान ॥ ३ ॥
लिंग या मूर्ति है देखता । अष्टांग प्रणाम करता ।
जैसे स्वाभाविक गिरता । कोई वस्तु ॥ ४ ॥
तथा विधि-विधानसे सतत । रहते जो वृद्ध गुणी निरत ।
प्राज्ञ ब्राह्मण आदिकी जो नित । करता सेवा ॥ ५ ॥
गुरु-देवादिकी पूजा स्वच्छता वीर्य-संग्रह ।
अहिंसा ऋजुता जान देहका तप है कहा ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी ६८८