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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अजी ! होता है जब सूर्योदय । देखता जैसे सूर्यको ही सूर्य ।
वैसे मेरे ज्ञानका धनंजय । कारण मैं ही ॥ २५ ॥
सबके अज्ञानका कारण भी मैं—
या शरीर सेवामें हो तत्पर । संसार गौरवको सुनकर ।
अहंकार देहमें डूबकर । रहा है जिनका ॥ २६ ॥
वे हैं स्वर्ग संसारार्थ । दौड़ते कर्ममें पार्थ ।
तथा होते हैं दुःखार्थ । मेरे ही कारण ॥ २७ ॥
यह होता भी है अर्जुन । मेरे कारण है अज्ञान ।
जागृत ही देखता स्वप्न । या निद्रा लेता ॥ २८ ॥
जिन बादलोंने सूर्यको छिपाया । उसी सूर्यसे बादल देखा गया ।
मेरे अज्ञानसे वैसे देख लिया । विषय जीवोंने ॥ २९ ॥
जैसे निद्रा या जागृतिका । प्रबोध कारण मूलका ।
वैसे ज्ञानाज्ञान जीवोंका । कारण मैं हूं ॥ ४३० ॥
जैसे सर्पत्वका कारण डोर । वह डोर ही मूल धनुर्धर ।
वैसे ज्ञानाज्ञानका व्यवहार । मुझसे होता ॥ ३१ ॥
तभी मैं. जैसे हूं वैसे । मुझको न जाननेसे ।
वेदके न जाननेसे । उसकी हुई शाखाएं ॥ ३२ ॥
तो भी वेदोंके शाखा-भेदसे । मैं ही एक जाना जाता वैसे ।
सभी ओरकी नदियां जैसे । मिलती सिंधुमें ॥ ३३ ॥
वैसे महा-सिद्धांतके पास पार्थ । श्रुतियां खो जाती हैं शब्द सहित ।
अथवा आकाशमें गंध सहित । वायु-लहरियां ॥ ३४ ॥
वैसे हैं समस्त श्रुतिजात । होते लजाकर जैसे शांत ।
उसका मैं करता यथार्थ । अर्थ प्रकट ॥ ३५ ॥
फिर श्रुति सह जो अशेष । विश्व खो जाता यहां निःशेष ।
वह निज ज्ञान भी विशेष । जानता मैं ही ॥ ३६ ॥
६०९ पुरुषोत्तमयोग
(77)

जैसे निद्रितको कर जागृत । तब न जानता स्वप्नका द्वैत ।
किंतु करना एकत्व प्रतीत । अपना ही जो ॥ ३७ ॥
वैसे अपना अद्वयपन । जानता हूं मैं द्वैतके बिन ।
उसका भी हूं बोध कारण । जाननेका मैं ही ॥ ३८ ॥
आगसे मिला कपूर । न राख न वैश्वानर ।
न रखता धनुर्धर । उसी भांति ॥ ३९ ॥
वैसे समूल अविद्या खाता । वह ज्ञान भी जो डूब जाता ।
जब नहीं ऐसा न रहता । तब है भी कैसे ॥ ४४०॥
मार्ग सह विश्व ले गया जो अर्जुन । उस चोरको पकड़ेगा कैसे कौन ।
ऐसी व्यवस्था है जो विशुद्ध तू जान । वह मैं हूँ ॥ ४१ ॥
ऐसी जो जड़ाजड़ व्याप्ति । कहता है कैवल्यपति ।
अपने रूपकी पूर्ति । निरुपाधिक मैं ॥ ४२ ॥
वह बोध है ऐसा संपूर्ण । बिंबित हुवा पार्थमें जान ।
नभके पूर्ण-चंद्रसमान । क्षीरार्णवमें ॥ ४३ ॥
या जैसे दर्पणमें बिंबत होता । उसके सम्मुख जो चित्र रहता ।
वैसे कृष्ण औ' पार्थ अनुभावता । एक ही बोध ॥ ४४ ॥
फिर भी है वह वस्तु-स्वभाव । बढ़ता जाता प्रिय अनुभव ।
तभी वह अनुभवका राव । कहता अर्जुन ॥ ४५ ॥
कहनेमें अब व्यापकत्व । कहगया निरुपाधिकत्व ।
प्रसंगवश स्वस्वरूपत्व । कहनेमें देव ॥ ४६ ॥
कहना वह एक बार । पूर्णरूपसे कृपाकर ।
श्रीकृष्ण यह सुनकर । कहता भला ॥ ४७ ॥
हमको भी पांडुसुता । इसको कहना भाता ।
किंतु ऐसा प्रश्न कर्ता । मिलता नहीं ॥ ४८ ॥
आज मनोरथका फल । मिला है तू यहां केवल ।
खुलकर यह सकल । पूछनेको ॥ ४९ ॥
ज्ञानेश्वरी ६१०

द्वैत-गुरु-शिष्यसंवाद-से अद्वैतके पारका अनुभव—
अद्वैतके पारका जो भोगना । वह भोग-सुख अनुभवना ।
पूछ कर देता है तू अर्जुन । मुझको मेरा ॥ ४५० ॥
सम्मुख होता है जब दर्पण । आप करता अपना दर्शन ।
वैसे शुद्ध संवादमें अर्जुन । शिरोमणि है तू ॥ ५१ ॥
तेरा अजानसे पूछना । हमको कहते बैठना ।
ऐसा नहीं इसे जानना । सखा मेरे ॥ ५२ ॥
ऐसा कह दिया आलिंगन । कृपा-दृष्टिसे अवलोकन ।
फिर किया हरिने कथन । अर्जुनसे क्या ॥ ५३ ॥
जैसे दो होंठोंसे एक बोलना । दो ही चरणसे एक चलना ।
वैसे दोनोंका पूछना कहना । तेरा मेरा ॥ ५४ ॥
ऐसे हम तुम यहां । देखना एक ही जहां ।
पूछना कहना यहां । दोनों एक ॥ ५५ ॥
लुब्ध हुये देव मोहसे । अर्जुनके आलिंगनसे ।
फिर कहते संकोचसे । यह नहीं उचित ॥ ५६ ॥
इक्षुदंड रसकी भेली । नासती लवणसे भली ।
संवाद-सुख क्रीडा भली । नासेगी जैसे ॥ ५७ ॥
अजी पहलेसे हममें नहीं । नर-नारायणमें द्वैत कहीं ।
लीन हो अब मेरा मुझमें ही । यह आयेगा ॥ ५८ ॥
इस सोचसे अकस्मात । श्रीकृष्ण कहता है पार्थ ।
तूने प्रश्न किया उचित । वह कैसा ॥ ५९ ॥
अर्जुन या कृष्णमें लीन । लौट कर आया वह सुन ।
अपना ही किया हुवा प्रश्न । अब सम्मुख ॥ ४६० ॥
यहां गद्गद हो बोलता । अर्जुन जी ! जी ! कहता ।
निरुपाधिक जो होता । अपना कह ॥ ६१ ॥
६११ पुरुषोत्तमयोग

शार्गधर सुन बोला तब । वही कहने लिये अब ।
कहने लगा जो दोनों भाग । अपनी उपाधिके ॥ ६२ ॥
भगवानकी उपाधिकता—
पूछा था निरुपाधिक । कहता है उपाधिक ।
ऐसा प्रश्न स्वाभाविक । उठेगा यहां ॥ ६३ ॥
अजी ! छासको अलग करना । कहा जाता मक्खन निकालना ।
हीन कस धातु सब जलना । स्वर्ण-शुद्धि ॥ ६४ ॥
या काईको दूर करना । विशुध्द जलको पा लेना ।
तथा बादलोंका हटना । आकाश शुध्द ॥ ६५ ॥
ऊपरसे ढका चोकर । फटकके किया तो दूर ।
शुध्द अनाजका स्वीकार । होता आप ॥ ६६ ॥
वैसे उपाधि उपाहित । विचारनेसे व्यवस्थित ।
किसीसे न पूछते ज्ञात । होता निरुपाधिक ॥ ६७ ॥
जिस भांति मौन रहकर । बाला प्यारसे सकुचाकर ।
पति नाम शब्द मारकर । कहती वैसे ॥ ६८ ॥
जो है न कहने जैसा । कहना पडा है ऐसा ।
तभी उपाधिसे वैसा । कहता श्रीहरी ॥ ६९ ॥
प्रतिपदाकी चंद्ररेखा । दिखाना हो तो वृक्ष-शाखा ।
दिखाते वैसे उपाधिका । करते वर्णन ॥ ४७० ॥
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥
पुरुष लोकमें है दो क्षर तथैव अक्षर ।
क्षर हैं सब ये भूत अक्षर स्थिर है वह ॥ १६ ॥
ज्ञानेश्वरी ६१२

क्षराक्षर पुरुष विचार—
श्री कृष्णने फिर बात की । इस संसार नगरकी ।
बसति है दो पुरुषोंकी । केवल मात्र ॥ ७१ ॥
गगनमें जैसे संपूर्ण । बसते हैं रात औ, दिन ।
संसार नगरमें मान । वैसे ये दो हैं ॥ ७२ ॥
तीसरा भी एक पुरुष रहता । वह इनका नाम नहीं सहता
गांव सह वह इन्हे निगलता । होता जब प्रकट ॥ ७३ ॥
रहने दो तीसरेकी वार्ता । सुनो अब इन दोकी कथा ।
इस संसार ग्राममें पार्था । बसने आये जो ॥ ७४ ॥
एक है अंधा पगला लूला । दूजा सर्वांग पूर्ण है भला ।
ग्राम-गुणोंसे संग केवल । हुवा उनका ॥ ७५ ॥
उनमें है एक क्षर । दूसरा जो है अक्षर ।
दोनोंसे यह संसार । भरा है ठसाठस ॥ ७६ ॥
सुन अब क्षर है कौन । अक्षरका क्या लक्षण ।
अभिप्राय यह संपूर्ण । कहूंगा तुझको ॥ ७७ ॥
जहां है महदकार । वहांसे हे धनुर्धर ।
यहां है जो तृणांकुर । वहां तक ॥ ७८ ॥
जो है बड़ा या थोर । चलता या है स्थिर ।
या जो होता गोचर । मन-बुद्धिसे ॥ ७९ ॥
जो कुछ पंच-भूतसे बनता । नाम-रूपमें आकर फंसता ।
तथा टकसालसे निकलता । गुणत्रयोंकी ॥ ४८० ॥
शिक्का जो है भूताकृतिका । बनाया जाता जो स्वर्णका ।
बनता है वह कालका । द्यूत-बीज ॥ ८१ ॥
जानना ही जो विपरीत । तथा जो कुछ होता ज्ञान ।
वह प्रति-क्षण समाप्त । होता बनके ॥ ८२ ॥
६१३ पुरुषोत्तमयोग

निकाल कर भ्रांतिका नग । खड़ा किया है सृष्टिका अंग ।
पहचाना जाता है जो जग । इस नामसे ॥ ८३ ॥
जो अष्टधा भिन्न ऐसे । दिखाया सातमें जैसे ।
क्षेत्र-द्वारा छत्तीससे । दिखाया है जो ॥ ८४ ॥
पिछला कहना कितना । इसीमें कहा है अर्जुन ।
वृक्षाकार रूप कारण । प्रस्तुत यहां ॥ ८५ ॥
यह सब है जो साकार । देह-कल्पनासे नगर ।
बन गया तदनुसार । चैतन्य आप ॥ ८६ ॥
जैसे कूपमें बन आप ही बिंब । सिंह करता प्रतिबिंबसे क्षोभ ।
फिर उसी क्षेत्रसे है समारंभ । करता कूदनेका ॥ ८७ ॥
या सलिलमें पूर्वका जो होता । व्योम पर व्योम प्रतिबिंबित ।
वैसे अद्वैत होकर भोगता । द्वैत आप ॥ ८८ ॥
अर्जुन ! जो इस प्रकार । पुर कल्पनासे साकार ।
करता आत्मा निद्रा घोर । विस्मृतिकी वहां ॥ ८९ ॥
स्वप्नमें शय्या देख जैसे । स्वप्नमें सो जाते हैं वैसे ।
नगरमें शयन ऐसे । होता आत्माका ॥ ४९० ॥
फिर वह निद्रा मदमें । सुखी या दुखी माननेमें ।
अहंकारकी समाधिमें । बकता जाता ॥ ९१ ॥
यह जनक या यह माता । यह पुत्र वित्त तथा कांता ।
मैं काला गोरा हीन या शास्ता । मेरा है यह सब ॥ ९२ ॥
ऐसे स्वप्नाश्व पर हो सवार । दौड़ता जो स्वर्ग और संसार ।
उस जीवका नाम धनुर्धर । है क्षर पुरुष ॥ ९३ ॥
अब तू सुन यह पार्थ । क्षेत्रज्ञ है जो कहलाता ।
या जिसको जीव कहता । सारा विश्व ॥ ९४ ॥
अपना रूप जो भूल जाता । सर्व-भूतत्व अनुसरता ।
वह चैतन्य है कहलाता । क्षर पुरुष ॥ ९५ ॥
ज्ञानेश्वरी ६१४

वहां है आत्म-रूपसे पूर्णता । इसीलिये है पुरुषता ।
फिर वह देह-पुरमें सोता । पुरुष-नाम ॥ ९६ ॥
तथा क्षरत्वका जो व्यर्थ । उसपे आक्षेप है पार्थ ।
यह है उपाधि-ग्रथित । इसीलिये ॥ ९७ ॥
बहते पानीके साथ जैसे । चंद्रबिंब उछळता वैसे ।
उपाधिके विकारमें ऐसे । दीखता वह ॥ ९८ ॥
या बहता पानी जब सूखता । बिंबित चंद्रमा भी है लोपता ।
वैसे उपाधि-नाशमें लोपता । उपाधि-धारी ॥ ९९ ॥
ऐसे उपाधिके ही कारण । क्षणिकत्व जुडता है जान ।
उपाधि नाशके ही कारण । क्षर यह नाम ॥ ५०० ॥
ऐसे जीव चैतन्य संपूर्ण । है यह क्षर-पुरुष जान ।
अब मैं अक्षरका वर्णन । करूंगा स्पष्ट ॥ १ ॥
अक्षर पुरुषका वर्णन—
अक्षर यह दूसरा । पुरुष है धनुर्धर ।
मध्यस्थ है गिरिवर । मेरु सामान ॥ २ ॥
यह पृथ्वी पाताळ स्वर्गमें । न होता विभाजित तीनोमें ।
वैसे यह ज्ञान अज्ञानमें । पड़ता नहीं ॥ ३ ॥
यहां न यथार्थ ज्ञानमें एकत्व । या विपरीत ज्ञानमें अनेकत्व ।
ऐसे केवळ अज्ञान ही जो तत्व । वही यह रूप ॥ ४ ॥
धूलत्व संपूर्ण मिटता । किंतु घटादि नहीं होता ।
जैसा मृत्तिका पिंड होता । ऐसा मध्यस्थ जो ॥ ५ ॥
सूख जानेपे सागर । नहीं तरंग नहीं नीर ।
ऐसी यह अनाकार - । दशा जान ॥ ६ ॥
जागृति नहीं जहां अर्जुन । तथा प्रारंभ न होता स्वप्न ।
इस भांति तम-घन जान । इसका रूप ॥ ७ ॥
६१५ पुरुषोत्तमयोग

विश्वंका होता है संपूर्ण अस्त । न होता आत्म-बोध प्रकाशित ।
ऐसी अज्ञान दशा मात्र पार्थ । अक्षर नामकी ॥ ८ ॥

  • “अजा” कहनेसे जन्म नहीं । अजन्माको मृत्यु कैसी कहीं ।
    इसीलिये अक्षर सही । अज्ञान घन ॥ ९ ॥
    जैसे सर्व कला रहित । चन्द्रमा जो मूल रूपित ।
    दीखे अमावासके रात । वैसे ही यह ॥ ५१० ॥
    होते ही सर्वोपाधि विनाश । लीन होती जहां जीव-दशा ।
    फल पाकरके वृक्ष-दशा । बीजमें जैसे ॥ ११ ॥
    वैसे उपाधि उपाहित । ये दोनों होते हैं विलुप्त ।
    उसको कहते अव्यक्त । पांडुकुमार ॥ १२ ॥
    जिसको है बीज भाव । वेदांतमें दिया नांव ।
    उस पुरुषका ठाव । अक्षरका ॥ १३ ॥
    जहांसे है अन्यथा ज्ञान । फैलकर जागृति स्वप्न ।
    नानात्व-बुद्धिमें अर्जुन । घुसे हैं सब ॥ १४ ॥
    जहांसे उठता जीवत्व । तथा उठाकर जो शिवत्व ।
    इन दोनोंका जहां लयत्व । वह अक्षर पुरुष ॥ १५ ॥
    तथा अक्षर पुरुष जनमें । खेलता है जागृति-स्वप्नमें ।
    या दोनो अवस्थायें उनमें- । से प्रसवती हैं ॥ १६ ॥
    जो है आज्ञानघन सुषुप्ति । ऐसी है उसकी प्रख्याति ।
    इसे कहते ब्रह्म-प्राप्ति । यदि न्यून न होता ॥ १७ ॥
    वास्तवमें यदि यह पार्था । स्वप्न-जागृतिमें नहीं आता ।
    ब्रह्म-भाव ही कहा जाता । इसको ही ॥ १८ ॥
    किंतु प्रकृति पुरुष ये दोनों । मेघ बन आये नभमें मानो ।
    क्षेत्र-क्षत्रज्ञ ये स्वप्नमें दोनों। दीखते निद्रामें ॥ १९ ॥
  • अजामेकम् श्रुतिवचन—
    ज्ञानेश्वरी ६१६

रहने दो यह अधो शाख । संसार रूप जो यह रूख ।
उसका यह मूल-पुरुष । जो है अक्षर ॥ ५२० ॥
यह पुरुष क्यों कहलाता । अपने पूर्णत्वमें होता ।
तथा मायापुरीमें है सोता । इससे ही ॥ २१ ॥
और है विश्वका आना जाना । विपरीत ज्ञानका रूप माना ।
इसने है जिसको नहीं जाना । यह है सुषुप्ति ॥ २२ ॥
तभी यह स्वभावता । क्षरना नहीं जानता ।
तथा नाश नहीं होता । ज्ञानके बिन ॥ २३ ॥
इसीलिये यह अक्षर । वेदोंमें पांडुकुमार ।
वेदांत प्रसिद्ध डोंगर । हुवा सिद्धांत ॥ २४ ॥
ऐसे जीव कार्य कारण । जिसे माया संग लक्षण ।
अक्षर पुरुष है जान । चैतन्य जो ॥ २५ ॥
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७ ॥
तीसरे पुरुषोत्तमका विवेचन—
अब जो अन्यथा ज्ञानकी । अवस्थायें हैं दो-जनकी ।
खो जाती है वह निद्राकी । अज्ञान-स्थितिमें ॥ २६ ॥
वह अज्ञान जब ज्ञानमें डूबता । तथा वह ज्ञान भी कीर्तिमुख होता ।
जैसे काष्ठ जलाकर स्वयं जलता । वह्नी आप ॥ २७ ॥
ऐसे वह अज्ञान ले गया ज्ञान । पर-तत्व दे गया आप अर्जुन ।
जाननेके बिना रहा ऐसे ज्ञान । केवल मात्र ॥ २८ ॥
कहाता परमात्मा जो तीजा पुरुष उत्तम ।
विश्व-पोषक विश्वात्मा है विश्वेश्वरं अव्यय ॥ १७ ॥
(78) ६१७ पुरुषोत्तमयोग

वही है जो उत्तम पुरुष । तीसरा क्यों इसका निष्कर्ष ।
उन दोनोंसे भिन्न है देख । यह अंतिम ॥ २९ ॥
सुषुप्ति और स्वप्न । उससे भिन्न अर्जुन ।
जागृति जैसे जान । बोधकी जो ॥ ५३० ॥
किरण अथवा होता मृगजळ । उससे भिन्न जैसे सूर्य-मंडल ।
वैसे ही भिन्न यह अति बहुल । उत्तम पुरुष ॥ ३१ ॥
जैसे काष्ठमें काष्ठसे भिन्न । भरा रहता अग्नि अर्जुन ।
वैसे क्षर-अक्षरसे भिन्न । रहता है यह ॥ ३२ ॥
अपनी सीमाओंको निगलकर । नदी नदोंको एक करता नीर ।
पूर्णत्वमें उठता एक होकर । कल्पांतका उदधि ॥ ३३ ॥
वैसे स्वप्न या नहीं सुषुप्ति । नहीं रहती वहां जागृति ।
जैसे निगलता दिन-राति । कल्पांतका तेज ॥ ३४ ॥
फिर नहीं एकत्व या द्वैत । है या नहीं जानता है पार्थ ।
प्रतीति लोप हुई हो दीप्त । रहा नहीं कुछ ॥ ३५ ॥
इस प्रकार जो कुछ है । वही उत्तम-पुरुष है ।
इसीको सब कहते हैं । परमात्मा ॥ ३६ ॥
वह भी यहां लय नहीं होके । बोलना जीवत्वमें ही रहके ।
बोलना किनारेमें ही बैठके । डूबे हुएकी बातें ॥ ३७ ॥
वैसे विवेक तट पर । कहते खडा रहकर ।
पैल तीरकी धनुर्धर । बातें वेद ॥ ३८ ॥
तभी पुरुष क्षराक्षर । दोनों देखके इस और ।
इसके कहते हैं पर- । आत्म-रूप ॥ ३९ ॥
यहां है इस प्रकार । परमात्म शब्द पर ।
सुनाते हैं धनुर्धर । पुरुषोत्तम ॥ ५४० ॥
वैसे हे मौनसे ही बोलना । न जाननेसे वहां जानना ।
तथा न होनेसे ही है होना । वह तत्व ॥ ४१ ॥
ज्ञानेश्वरी ६१८

सोऽहम् भाव है अस्त होता । कहनेवाला कोई न होता ।
दृष्टत्व सह जाना है पार्थ । जाना दृश्य भी ॥ ४२ ॥
बिंब तथा है प्रतिबिंबकी । न ले सकते प्रभा बीचकी ।
कहना नहीं प्रभा कहांकी । ऐसे कभी ॥ ४३ ॥
घ्राण तथा पुष्पके मध्य । सुवास रहता है हृद्य ।
आंखोंसे दीखना असाध्य । उसे ना कहना ॥ ४४ ॥
वैसे दृश्यादृश्य दोनों मिटता । फिर क्या है यह कौन कहता ।
इसी अनुभवसे है देखता । वह जो रूप ॥ ४५ ॥
वह है प्रकाश बिन प्रकाश । ईशितव्यके बिना है जो ईश ।
अपनेसे भरता अवकाश । आप ही सारा ॥ ४६ ॥
नादसे जो सुनना नाद । स्वादसे है चखना स्वाद ।
अनुभवना जो आनंद । आनंदसे ही ॥ ४७ ॥
सुख ही जहां सुख पाता । तेजसे है तेज मिलता ।
शून्य भी जहां डूब जाता । महाशून्यमें ॥ ४८ ॥
पूर्णताका जो परिणाम । पुरुष वह सर्वोत्तम ।
विश्रांतिका भी है विश्राम । जहां लेता विश्रांति ॥ ४९ ॥
विकार पर भी जो रहता । ग्रासको ग्रासकर पूर्णता ।
बहुतसे जो बहुत होता । बहुत गुना ॥ ५५० ॥
चैतन्य विश्वाकार कैसे दीखता है ?—
जो अज्ञानीके प्रति । रजतकी प्रतीति ।
चांदी न होके शुक्ति । करती जैसे ॥ ५१ ॥
अथवा जो अलंकार रूपमें । न छिपके सोना छिपता उसमें ।
विश्व न होकर भी वैसे विश्वमें । वह है विश्वाधार ॥ ५२ ॥
अथवा जैसे जल तरंग । पानीसे रहता है अभंग ।
वैसे प्रतीत करता जग । वह है प्रकाश ॥ ५३ ॥
६१९ पुरुषोत्तमयोग

अपने संकोच विकास । आप ही कारण वीरेश ।
जलमें चन्द्र होता जैसा । स्वयं आप ॥ ५४ ॥
वैसे विश्वात्ममें जो कुछ होता । विश्व-लोपसे कहीं नहीं जाता ।
जैसे रात दिनमें नहीं होता । दो प्रकारका सूर्य ॥ ५५ ॥
वैसे कहीं किसी ओरसे । कम नहीं होता किसीसे ।
सदैव रहता है वैसे । अपना-सा वह ॥ ५६ ॥
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥
पुरुषोत्तमका विवेचन—
अपनेसे ही जो अर्जुन । प्रकाशता आप है जान ।
क्या कहूँ उसके समान । नहीं अन्य ॥ ५७ ॥
वह हूँ मैं निरुपाधिक । क्षराक्षरोत्तम हूँ एक ।
इसीलिये वेद और लोक । कहते पुरुषोत्तम ॥ ५८ ॥
यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ १९ ॥
ऐसा जो मैं पुरुषोत्तम । जानना मुझे प्रियोत्तम ।
उदय होते ही उत्तम । ज्ञान सूर्य ॥ ५९ ॥
होते ही जागृतिका ज्ञान । मिट जाता है जैसे स्वप्न ।
स्फुरता उसे त्रिभुवन । सारा व्यर्थ ॥ ५६० ॥
मैं क्षराक्षरसे भी जो भिन्न हूं और उत्तम ।
इससे वेद लोगोंने कहा है पुरुषोत्तम ॥ १८ ॥
हटाके मोहको दूर जाने मैं पुरुषोत्तम ।
मुझको भजते हैं वे सर्वज्ञ सर्व-भावसे ॥ १९ ॥
ज्ञानेश्वरी ६२०

अथवा माला हाथमें लेनेसे । सर्पाभास भय मिटता जैसे ।
मेरे पुरुषोत्तमत्व-बोधसे । जगाभाससे छूटता ॥ ६१ ॥
अलंकार सोनेका है जो जानता । अलंकारके मोहमें नहीं आता ।
उसी भांति मुझको जो है जानता । छूटता भिन्नत्व ॥ ६२ ॥
फिर सर्वत्र सच्चिदानंद । कहता मैं एक स्वयं सिध्द ।
अपनेमें अन्य कोई भेद । नहीं जानता ॥ ६३ ॥
उसीसे है सब जाना । अल्प है यह कहना ।
उसके लिये तू जान । नहीं रहा द्वैत ॥ ६४ ॥
इसलिये मेरा भजन । वही एक योग्य है जान ।
गगन जैसा अलिंगन । करता गगनका ॥ ६५ ॥
जैसे क्षीर-सागरको भोजन । दे सकता क्षीर-सागर बन ।
या अमृत होकर ही मिलन । अमृतसे जैसे ॥ ६६ ॥
मिलानेसे सुवर्ण शुध्द । मिलता है सुवर्ण शुध्द ।
वैसे मैं बनकर सिध्द । मेरी भक्ति ॥ ६७ ॥
अजी ! सिंधु रूप यह नहीं होती । गंगा सिंधुसे कहो कैसे मिलती ।
इसीलिये मैं न बनकर भक्ति- । में कैसा प्रवेश ॥ ६८ ॥
इसीलिये हे सभी प्रकार । कल्लोल अनन्य है सागर ।
ऐसे मुझसे हे धनुर्धर । भजता है जो ॥ ६९ ॥
जैसे सूर्य और प्रभा । एक रूप और लोभ ।
वैसे ही योग्यता लाभ । उस भजनका ॥ ६७० ॥
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुध्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ २० ॥
ऐसा गूढ कहा शास्त्र निष्पाप तुझसे यह ।
इसको जानके धीर होते हैं कृत कृत्य ही ॥ २० ॥
६२१ पुरुषोत्तमयोग

यह शब्द-ब्रह्मका नवनीत है—
जबसे किया कहना प्रारंभ । अब तक सब शाखावलंब ।
कहा है उपनिषद सौरभ । कमलका मान ॥ ७१ ॥
यह शब्द-ब्रह्मका मथित । तथा व्यास प्रज्ञाके है हाथ ।
मंथन कर जो नवनीत । सार लिया हमने ॥ ७२ ॥
ज्ञानामृतकी है जो जान्हवी । आनंद-चंद्रकी सत्रहवी ।
विचार क्षीरार्णवकी नवी । लक्ष्मी है यह ॥ ७३ ॥
तभी अपनी पद-वर्णसे । अर्थके यह जीव प्राणसे ।
मुझे छोड़ न जानती जैसे । महालक्ष्मी जो ॥ ७४ ॥
सम्मुख आया जब क्षराक्षरत्व । न कहा तब उनका पुरुषत्व ।
तथा समर्पण किया है सर्वस्व । मुझ पुरुषोत्तममें ॥ ७५ ॥
इसीलिये विश्वमें गीता । मुझ आत्मकी पतिव्रता ।
यह जो अब तू सुनता । इस समय ॥ ७६ ॥
सच बोलना तो यह नहीं शास्त्र । संसार जीतनेका है महाशस्त्र ।
तथा है आत्म अवतारका मंत्र । इन अक्षरोंमें ॥ ७७ ॥
तुझसे यह है कहा गया । यह ऐसा हुवा धनंजय ।
यह गोप्य धन निकलवाया । मुझसे आज ॥ ७८ ॥
मुझ चैतन्य शंभुका माथा । जो गीता तत्व था वह पार्थ ।
उसका गौतम बन आस्था- । निधि तू आया ॥ ७९ ॥
अपनी निर्मलतासे अर्जुन । करते सम्मुख अवलोकन ।
बन कर तू आया दर्पण । हमारे लिये ॥ ५८० ॥
अथवा भरा हुवा चंद्र तारागण । नभ सिंधुमें होता अवतरण ।
वैसे ही मैं गीता सह अंतःकरण- । में डूबा तेरे ॥ ८१ ॥
यह गीता आत्म-ज्ञानकी लता है—
त्रिविध मल निश्चित । छोड़ गया तुझे पार्थ ।
तभी तू गीता सहित । बना मम स्थान ॥ ८२ ॥
ज्ञानेश्वरी ६२२

किंतु क्या बोलूं यह गीता । मेरी ज्ञानकी है जो लता ।
जानता जो इसे समस्त । होता मुक्त मोहसे ॥ ८३ ॥
सेवन की अमृत सरिता । रोग गंवाकर पांडुसुत ।
अमरपन यह उचित । देती जैसे ॥ ८४ ॥
वैसे ही जाननेसे यह गीता । निर्मोह होना विस्मय क्या पार्थ ।
अपने आत्म-ज्ञानमें होना रत । होता सरल ॥ ८५ ॥
जिस आत्म-ज्ञानके स्थान । कर्म जो अपना जीवन ।
लय कर होगा अर्जुन । ऋण-मुक्त ॥ ८६ ॥
खोया हुआ दिखा कर जैसा । मार्ग जाता है वीर-विलास ।
ज्ञान बनता कलश वैसा । कर्म-प्रासादका ॥ ८७ ॥
इसीलिये ज्ञानी पुरुष । कर्म करता है निःशेष ।
बोलता अनाथोंका सखा । इस प्रकार ॥ ८८ ॥
इस गीता-ज्ञानकी परंपरा—
यह श्रीकृष्ण वचन-अमृत । न समानेसे छलकाता पार्थ ।
तब हुई हे व्यास कृपा प्राप्त । संजयको यहां ॥ ८९ ॥
उसने धृतराष्ट्रको दिया । धृतराष्ट्रसे पान कराया ।
इसीलिये जीवांत भया । उसका सरल ॥ ५९० ॥
आया गीता श्रवण अवसर । लगा उसको नहीं अधिकार ।
किंतु जीवनांत समय पर । उससे मिला प्रकाश ॥ ९१ ॥
द्राक्षा-लतामें दूध डाला जाता । व्यर्थ गया यह ऐसा दीखता ।
फल पाकमें वह दूना होता । जिस प्रकार ॥ ९२ ॥
वैसे हरिमुखके अक्षर । संजयने कहे स-आदर ।
उससे अंध स-अवसर । हुवा दुखी ॥ ९३ ॥
उसकी कर देश-भाषा रचना । उसको ऐसी वैसी कर सजना ।
सुना दिया उसे मैंने जैसे वह जाना । श्रीचरणोंमें ॥ ९४ ॥
६२३ पुरुषोत्तमयोग

सेवंती जब अरसिक देखते । उसमें विशेष कुछ भी न पाते ।
किंतु सौरभसे सब कुछ खाते । भ्रमर सार ॥ ९५ ॥
ज्ञानेश्वर महाराजका विनय—
वैसे तत्वका करना स्वीकार । खामी देना मुझको लौटाकर ।
कुछ न जानना स्वभाव सार । अबोध शिशुका ॥ ९६ ॥
यद्यपि यह अनजान होता । उसको देख कर माता पिता ।
आनंद विभोर होके सतत । होते हैं प्रसन्न ॥ ९७ ॥
वैसे मेरे सर्वस हैं संत । उनसे करना लाड नित ।
वैसे ही लाड है यह ग्रंथ । मानेंगे आप ॥ ९८ ॥
कव विश्वात्मक यह माझा । स्वामी है निवृत्ति राजा ।
स्वीकार करें यह वाक्पूजा । कहता ज्ञानदेव ॥ ९९ ॥

गीता श्लोक २०

ज्ञानेश्वरी ओवी ५९९.

१६
दैवासुर-संपद्विभाग-योग
चित्सूर्य श्रीगुरु वंदन-
मिटाते हुये विश्वका आभास । उदित हुआ विस्मित चंडांश ।
अद्वय-कमलिनीका विकास । नमन करें अब ॥ १ ॥
अविद्या-तम जो दूर करता । ज्ञानाज्ञान तारोंको निगलता ।
ज्ञानियोंका है सुदिन करता । स्वबोधका ॥ २ ॥
जिससे उदित होते ही दिन । खुलके आत्म-ज्ञानके नयन ।
तजता है जीव-पक्षी अर्जुन । देहभावका घोंसला ॥ ३ ॥
लिंग-देह कमल मध्यमें । फंसा चिद्भ्रमर बद्धतामें ।
बंध-मोक्ष होता है प्रकाशमें । उसके उदयसे ॥ ४ ॥
सिकुडे पथमें शष्प-शब्दोंके । दोनों किनारोंमें भेद-नदीके ।
चीखते हैं पागल विरहके । बुद्धि औ' बोध ॥ ५ ॥
उन चक्रवाकोंका मिथुन । समरसका जो समाधान ।
प्रतीत करता चिद्गगन । भुवनका दीप ॥ ६ ॥
जिसके उदयका प्रातःकाल । मिटाता है भेद-चोरका काल ।
आत्मानुभव-पथिक सकल । चलते योगी ॥ ७ ॥
जिसके विवेक-किरण संग । उन्मेष-सूर्यकांतके स्फुलिंग ।
जला देता है अरण्य-विभाग । संसारके ॥ ८ ॥
रश्मि-पुंज जिसका अति प्रखर । होते ही स्वरूप ऊसरमें स्थिर ।
आता वहां महा सिद्धियोंका पूर । मृगजलका ॥ ९ ॥
(79)

अजी प्रबोधके माथे पर । सोऽहंताका मध्यान्ह आकर ।
आत्म-भ्रांति छाया जो सत्वर । छिपती पदतलमें ॥ १० ॥
तब विश्व-स्वप्न सहित । अन्यथा मति जो निद्रित ।
न रहती जब माया रात । सम्हालेगा कौन ॥ ११ ॥
तभी अद्वय-बोध-पुरमें अति । महदानंदकी भीडभाड होती ।
फिर सुखानुभूतिकी उतरती । बात लेनदेनकी ॥ १२ ॥
अथवा माना सदा ऐसा । मुक्त-कैवल्य सुदिवस ।
देता है सदैव प्रकाश । उदयसे उसके ॥ १३ ॥
निज-धाम-व्योमका राव । उदित रहता सदैव ।
उदयास्त दिशाका ठाव । मिटाता है वह ॥ १४ ॥
न दीखना दीखने सह मिटाता । दोनोंसे ढका हुवा जो उजलाता ।
उसका प्रातःकाल ही भिन्न होता । अवर्णनीय ॥ १५ ॥
दिन-रातके जो उस पार । प्रकाश रूप ज्ञान-भास्कर ।
दीप्ति बिन दीप्ति है अपार । देखता कौन ॥ १६ ॥
मौन छोडकर गुरु-गुण-वर्णनके लिये क्षमा याचना—
श्रीनिवृत्ति वह चित्सूर्य । नमन उसे स-विनय ।
बाधक है स्तवन-कार्य । शाब्दिक जो यहां ॥ १७ ॥
गुरु-देवकी महिमा देखकर । स्तवन करना हो यदि सुंदर ।
गुरु-चरणमें लीन हो तत्पर । स्तव्य-बुद्धिसे ॥ १८ ॥
न जानते जो सब जानते । मौन निगल बखाने जाते ।
कुछ भी न होनेसे हैं आते । अपने यहां जो ॥ १९ ॥
तेरी स्तुतिमें होना जिसे तत्पर । पश्यंति मध्यमाको निगलकर ।
होती है परा सह वैखरी फिर । जहां विलय ॥ २० ॥
एसे तुझमें सेवकपनमें । शब्द-स्तोत्र-भूषण चढानेमें ।
यह सहनकर कहनेमें- । भी न्यून अद्वयानंद ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी ६२६

किंतु रंकने देखा अमृत सागर । तब जो उचितानुचित भूलकर ।
दौडा करने उसका पाहुनाचार । लेकर साग-पात ॥ २२ ॥
यहां साग-पात ही बहुत कहना । उसके हर्ष-वेगपर ध्यान देना ।
दीपसे सूर्यकी आरती उतारना । यहां देखना भक्ति ॥ २३ ॥
बालक यदि उचित जानता । उसका बालपन क्या रहता ।
किंतु होती है जो उसकी माता । तोषती बहू ॥ २४ ॥
गांवकी गंदगीसे भरा जो नीर । आता है सिर पर पैर देकर ।
तब कहती क्या गंगा हठो दूर । उससे कभी ॥ २५ ॥
अजी ! कैसा था भृगुका अपाचार । उसको मानकर प्रियोपचार ।
तब की हरिने संतुष्ट होकर । गुरुकी पाद्य-पूजा ॥ २६ ॥
आता जब गगन तमसे भर । सूर्यके सम्मुख तब देखकर ।
कहता है क्या भास्कर “तू हो दूर ।” कभी ऐसे ॥ २७ ॥
वैसे भेद-बुद्धिकी तुला पर । सूर्योपमाके शब्द डालकर ।
तोला है जो मैंने श्रीगुरुवर । सहन करें स्वामी ॥ २८ ॥
देखा जिन्होंने ध्यान-चक्षुसे । वर्णन किया है वेद-काव्यसे ।
वह सब क्षमा किया जैसे । मुझे भी क्षमा कर ॥ २९ ॥
किंतु आज मैं तेरे गुणगानमें । ललचाया दोष न मान मनमें ।
न उठूंगा कभी मैं अर्थ-तृप्तिमें । कुछ भी हो फिर ॥ ३० ॥
जन्म-जन्मांतरके सत्य-वचन-तपका फल है यह गीतार्थ —
गीताके नामसे तेरा सतत । सेवन करता प्रसादमृत ।
तभी वर्णन किया है ईप्सित । दैवसे मिला दूना ॥ ३१ ॥
किया सत्य-वचनका तप । मेरी वाणीने अनेक कल्प ।
उस फलका है महा-दीप । मिला यह स्वामी ॥ ३२ ॥
पुण्य-पोषण किया असाधारण । उससे ही हुवा तेरा गुण-वर्णन ।
यह फल देकर हुए उऋण । आज वे स्वामी ॥ ३३ ॥
६२७ दैवासुर-संपद्विभाग-योग

मैं जीव-दशाके अरण्यमें । जा फंसा था मृत्युके गांवमें ।
वह दुर्दशा इस क्षणमें । मिटाई आपने ॥ ३४ ॥
गीता नामसे जो है यह विख्यात । अविद्याको जीत हुवा दृढ गात ।
वह तेरी कीर्ति हुई है वर्णित । हृदयसे सहज ॥ ३५ ॥
जो था अकिंचनका निवास-स्थान । वहां लगाया आ लक्ष्मीने आसन ।
तब कह सकते हैं क्या निर्धन । उसको कभी ॥ ३६ ॥
अथवा देख अंधकारका स्थान । वहां आया दैवसे चंडांशु मान ।
वह अंधःकार ही प्रकाश महान । होता है जैसे ॥ ३७ ॥
देखनेसे जिस देवकी श्रेष्ठता । विश्वको न आती अणुकी योग्यता ।
भक्तके भाव-सम न हो सकता । क्या वह देव ॥ ३८ ॥
वैसे मेरा गीताका व्याख्यान । सूंघ लेता गगनका सुमन ।
पूर्ण करते जो अरमान । आप समर्थ ॥ ३९ ॥
तब तेरे ही प्रसादसे । गीता-पद अगाध ऐसे ।
स्पष्ट करूं निरूपणसे । कहता ज्ञानदेव ॥ ४० ॥
ज्ञान प्राप्तिके बाद और कुछ पाना नहीं रहता —
पंद्रहवे अध्यायमें । कहा कृष्णने अल्पमें ।
पार्थको पूर्ण रूपमें । शास्त्र सिद्धांत ॥ ४१ ॥
जो है वृक्ष रूपक परिभाषा । कहती उपाधि रूप अशेष ।
सद् वैद्य दिखाता है सभी दोष । शरीरगत जैसे ॥ ४२ ॥
तथा जो कूटस्थ अक्षर । दिखाया पुरुष प्रकार ।
जिससे उपहिताकार । चैतन्य सह ॥ ४३ ॥
फिर उत्तम पुरुष । करके शब्दका मिष ।
दिखाता है हृषीकेश । आत्मतत्त्व ॥ ४४ ॥
तथा कहा आत्म प्राप्त्यर्थ । साधन जो अति समर्थ ।
वह ज्ञान भी यथार्थ । कहा स्पष्ट ॥ ४५ ॥
ज्ञानेश्वरी ६२८