भारतकोश
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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

समाज है। इनको अतिमानव माना गया है। पुरानी पोथियोंमें गंधर्वोकी उत्पत्तिके विषयमें अनेक प्रकारकी जनश्रुतियां हैं। ऋग्वेदमें भी गंधर्वोंका उल्लेख है। गंधर्व सौंदर्य-प्रिय, अलंकार-प्रिय, तथा स्त्री-लंपट जाति है। वे फूलके पागल हैं। इनकी स्त्रियोंको अप्सरा कहते हैं। इनमें नृत्य संगीत वाद्य-कला निपुण सुंदर-कन्याओंका विवाह न करनेकी प्रथा थी। ये सामाजिक संपत्ति थी। कलोपासना ही इनका ध्येय। संभवतः इसीलिये संगीत शास्त्रको गंधर्व-वेद कहा जाता है। गंधर्वोंके आठ गण कहे गये हैं (१) हाहा, (२) हूहू (३) चित्ररथ (४) हंस (५) विश्वावसु (६) गोमायू (७) तुंबुरु (८) नंदी। अग्नि-पुराणमें ११ गण कहे गये हैं। (१) भन्नास (२) अंगारी (३) बंभारी (४) सूर्यवच (५) कृधू (६) हस्त (७) सुहस्त (८) मूर्द्धन्वान् (९) महामना (१०) विश्वावसू (११) कृशानु । चित्ररथ—कश्यप और मुनिका गंधर्वपुत्र । इसका नाम अंगारपर्ण। फिर यह चित्ररथ कहा जाने लगा। लाक्षाग्रहसे छूटकर जाते समय अर्जुनकी इससे लडाई हुई थी। अर्जुनका पराक्रम देखकर प्रसन्न होकर अंगारपर्णने अर्जुनको कई विद्याएं सिखाईं। अर्जुनसे भी कुछ सीखा। युधिष्ठिरके राज-सूय यज्ञमें इसने उन्हे १०० घोडे दिये थे। इसीने युधिष्ठिरको किसीको देखकर किस वर्णाश्रमका है यह जाननेकी विद्या सिखाई। तथा तपस्यासंपर्णाख्यान सुनाया। गीता १०. श्लो० २६-सिद्धोंमें कपिल मुनि— सिद्ध—विश्वमें जो अनेक गूढ रहस्य हैं उनमें शरीर रहित चैतन्यका संचार भी एक गूढ तम रहस्य है। यह भी एक योनि है। ये केवल मानवोंमें ही नहीं अतिमानवोंमें भी हैं जो विश्वके प्रभावी देवता या शक्तियोंके हस्तक बन कर लोकहितके कार्यमें निमग्न होते हैं। साथ साथ भक्त, ज्ञानी, योगी आदि जीवनमें कृतकृत्य होकर देहपातके बाद उपास्य देवताकी आज्ञासे उनके हस्तक बन कर काम करते हैं। इन्हे देवताके समान मान दिया जाता है। योगसाधनमें ऐसे सिद्ध अत्यंत सहायक होते हैं। पतंजल-योगके विभूति-पादमें सिद्धदर्शन भी एक विभूति है। सिद्धोंके विषयमें इनकी परंपराओंके विषयमें अध्ययन पूर्वक अनेक पुस्तकें लिखी गयी हैं। ये सिद्ध ईश्वरके समान नित्य माने गये हैं। “विश्वमें होनेवाले लोककल्याणकारी महान घटना- ओंमें सिद्धोंका हाथ रहता है” ऐसे अनेक विद्वानोंने मुक्त-कंठसे कहा है। अर्थात् देह रहित लोक हितकारी नित्य-चैतन्य शक्तिको सिद्ध कह सकते हैं और इन सिद्धोंमें— कपिल मुनि—कर्दम और देवहूतीका पुत्र । इसका स्थान सिद्धपुर या और (?) बिंदुसर । इसने अपनी माताको ब्रह्मज्ञान कहा। जब यह समाधिस्थ था पिताके अश्वमेधके घोडोंके अश्व रक्षक सगर पुत्रोंने-इसीने अश्व चुराया इस भ्रमसे-इस पर शस्त्र प्रहार किया और इसकी आंखोंसे निकली क्रोध ज्वालासे जल कर राख हो गये। इसको आदि सिद्ध माना गया है। आसुरी इसका शिष्य, यह प्रत्यक्ष शिष्य नहीं है। कपिलप्रतिपादित सिद्धांतका स्फुरण मुझमें हुवा ऐसे यह कहता है। कपिलको सांख्यशास्त्रका आदि प्रवर्तक माना जाता है। तत्त्वज्ञानके सहारे मोक्ष प्राप्त करना इस शास्त्रका उद्देश है। सांख्य शास्त्र कर्मकांडसे ज्ञानको अधिक महत्व देता है। उपनिषद् भी ज्ञानको कर्मसे श्रेष्ठ मानते हैं। ज्ञानेश्वरी ६२

कुछ विद्वानोंका कहना है कि ध्यान और चिंतनका आदि प्रर्वतक भी कपील है । इसके प्रथम, कर्म ही महत्वपूर्ण साधना अथवा उपासना थी। कपिलको निरीश्वरवादि माना गया है । इसको विष्णुका पांचवा अवतार भी कहा गया है । कपिलके नाम पर (१) सांख्यसूत्र (२) तत्वसमास (३) कपिलगीता (४) (५) कपिलपांचरात्र (६) कपिलसंहिता (७) कपिलस्मृति (८) कपिलस्तोत्र (९) व्यासप्रभाकर ऐसी कुछ पुस्तकें प्रचलित हैं । गीता अ० १०. श्लो० २७-उच्चैश्रवा अश्वोंमें मैं— देवासुरोंने जो समुद्रमंथन किया तब (१) लक्ष्मी (२) कौस्तुभ (३) पारिजातक (४) सुरा (५) धन्वंतरी (६) चंद्रमा (७) कामधेनु (८) ऐरावत (९) रंभा (१०) उच्चैश्रवा (११) कालकूट विष (१२) शाङ्गधनुष्य (१३) पांचजन्य (१४) अमृत ये चौदा वस्तु मिले। इनमें उच्चैश्रवा सात मुखोंका घोडा भी है। इसका रंग शुभ्र । इसका खाद्य अमृत । यह इंद्रका वाहन है । दशहरेके दिन जो अश्व-पूजा होती है वह वास्तवमें उच्चैश्रवाकी पूजा है । गीता अ० १०. श्लो० २७-ऐरावत गजेंद्रोंमें- भारतीय साहित्य और संस्कृतिमें हाथीको वैभव और संपन्नताका प्रतीक माना गया है । ऋग्वेदमें लक्ष्मीका वर्णन करते समय "हाथीके गर्जनसे जगनेवाली" ऐसे कहा गया है । हाथीको लक्ष्मीका भी प्रतीक माना गया है। प्राचीन शिल्पमें भी लक्ष्मीके साथ गज-अर्थात् हाथीके चित्र होते हैं। लक्ष्मीके साथ ऐरावत भी समुद्र मंथनसे प्राप्त रत्न हैं । ऐरावत-यह सफेद हाथी है। समुद्रमंथनमेंसे उत्पन्न हुवा। ब्रह्मांडके आधारभूत (१) ऐरावत (२) पुंडरीक (३) वामन (४) कुमुद (५) अंजन (६) पुष्पदंत (७) सार्वभौम (८) सुप्रतीक इन आठ दिग्गजोंमें इंद्रने इसको पूर्व दिशामें स्थापित कि। कृष्ण और इंद्रके युद्धमें यह हाथी गरुडसे पराजित हुवा था। कहीं कहीं इसकी सात सुंड होनेका उल्लेख है ! भीम अपनी मातके गजपर्वकी पूजामें इसे पृथ्वि पर लाया था ऐसी जनश्रुति है । गीता अ० १०. श्लो० २७-नरोंमें मैं नराधिप- नर शब्दका अर्थ है नेतृत्व करनेवाला । नेतृत्व करनेवालोंमें नराधिप - राजा - ईश्वरका रूप है । : वेदमें प्रत्येक शब्दके तीन अर्थ किये जाते हैं। उस प्रकार राजा-सामाजिक क्षेत्रमें इंद्र है। राजाको इंद्रका तथा विष्णुका प्रतिनिधि माना गया है। गीता अ० १०. श्लो० २८-शस्त्रोंमें वज्र मैं रहा- शस्त्र-प्रहार करनेके साधनको आयुध शस्त्र कहते हैं। इसमें पत्थर और लोहेके डंडोंसे लेकर अणुबांब तक आ जाते हैं। युद्ध-साहित्य सब आयुध शब्दमें समा जाते हैं। संस्कृतिके विकासके साथ आयुधोंका भी विकास हुवा है। स्वसंरक्षण तथा दूसरोंपर आक्रमण करनेवाले सभी साधन आयुध कहाते हैं। इनमें सतत हाथमें ले लडनेवाले आयुध, जैसे तलवार, गदा, धनुष्य, बंदूक, तमंचा आदि, फेंकके मारनेवाले आयुध, भाले, त्रिशूळ, शक्ति, तोमर, आजकल हाथ-बॉब आदि, अस्त्र, युक्तिसे चलनेवाले-मंत्रपूरित आयुध-आग्नेयास्त्र, ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र आदि, ६३ परिशिष्ट ३

वैसे ही शतघ्नि, तोप आदि। किंतु इससे भी भिन्न प्रकारके कुछ आयुध दीखते हैं जो फेंक कर मारनेके बाद अपना काम करके वे पुनः लौटकर आते हैं। जैसे विष्णुका सुदर्शनचक्र, इंद्रका वज्र। चक्रके विषयमें जो जानकारी मिलती है वह अत्यंत अद्भुत है। वह कई मील तक पीछा करके शत्रु का संहार करता है और अपना काम होते ही वह लौट पडता है! हमारे प्राचीन ग्रंथोंमें, शंकरका त्रिशूल, विष्णुका सुदर्शन, भार्गवरामका परशु, इंद्रका वज्र, वरुणका पाश, गणपतिका अंकुश-मत्रोंको छोडकर-अत्यंत प्रसिद्ध और आश्चर्यजनक आयुध रहे हैं। वज्र—यह इंद्रका अत्यंत भयंकर आयुध है। यह कभी व्यर्थ नहीं जाता। इस आयुधकी निर्मिती दधीचि ऋषिके अस्थियोंसे हुई थी। दधीचि ऋषि महा-तपस्वी सामर्थ्यवान लोकहितव्रती थे वृत्रासुरको मारनेके लिये इंद्रको ऐसे एक महान आयुधकी आवश्यकता थी। दधीचि मृत्युंजय था। इंद्रने दधीचिसे उसकी अस्थियोंकी प्रार्थना की। विश्व-हितके लिये अपनी अस्थियोंकी आवश्यकता है यह सुनते ही दधीचि ऋषिने योग-बलसे शरीर त्याग दिया। इसके बाद उसकी अस्थियां लेकर षट्कोण आयुध बनाया गया जिससे वृत्रका संहार हुवा। गीता अ० १०. श्लो० २८-मैं कामधेनु गायोंमें— कामधेनु—इच्छापूर्ति करनेवाली गाय ! यह भी समुद्रमंथनमेंसे निकली थी। कामधेनुके सभी अवयव सिर, माज, जांघ, स्तन, पुच्छ, तथा गलेका झोल, ये छ अवयव पुष्ट और ऊंचे थे। उसकी आँखें मेंडककी भांति थीं। स्तन पुष्ट थे। वह सर्वांगसुंदर थी। शिवजीका नंदी इसका बछडा। यह गाय वसिष्ठऋषिके आश्रममें थी। सूर्यवंशके दिलीप राजाने इसकी सेवा की और प्रसन्न कामधेनूकी कृपासे रघु राजाका जन्म हुवा। इस परसे सूर्यवंशको रघुकुल कहते हैं। गी. अ० १०. श्लो० २८-उत्पत्ति हेतु मैं काम— काम-ब्रह्माका मानस पुत्र। इसकी स्त्री रति। जन्मता यह अत्यंत रूपवान था। इसके शरीरमें सुवास था। जन्म होते ही इसने ब्रह्मदेवसे पूछा "मेरा जीवित-कार्य क्या है !" "तू स्त्री पुरुषोंको मोहित कर। ब्रह्मा विष्णु शंकर सहित सभी देव तेरे वश होंगे।" परिणाम स्वरूप इसने ब्रह्मा परही अपना प्रथम प्रयोग किया। एक बार शिवने इसको दग्ध किया था। फिर यह कृष्णमें प्रद्युम्नके रूपमें आया। वसंत ऋतु इसका मित्र है। (१) इसके स्पर्शसे स्त्री पुरुषोंमें मद आता है इसलिये मदन (२) ऋषियोंका भी मंथन करता है इसीलिये मन्मथ (३) शिवके उःशापसे बिना शरीरके मानवोंमें रहा इसलिये अनंग ऐसे इसके तीन नाम हैं। भाई बहनोंमें विकार निर्माण करनेसे शंकर इसको जलायेगा। शंकरको पुत्रेच्छा होगी तब कामेच्छा होगी ऐसा शाप और वर मिले हैं। गीता अ० १०. २८-१० श्लो० २९-मैं सर्पोत्तम वासुकी-नागोंमें शेष नाग मैं। नाग और सर्प--फनावाला सांप। भारतीय संस्कृतिमें अत्यंत प्राचीन कालसे नागपूजा प्रचलित है। ये नाग गेहुंआ, हरी आभा लिये पीले, पूरा पीलो, तथा काले होते हैं। इनके मुखमें विषका दांत होता है। प्राचीन भारतीयोंने उनको देवत्व दिया है। भारतके प्रत्येक प्रदेशमें नाग-पूजा प्रचलित है। ज्ञानेश्वरी ६७

पौराणिक जन-श्रुतिके अनुसार कश्यप इनका पिता और कद्रू इनकी माता है । (१) अनंत (२) वासुकी (३) तक्षक (४) कर्कोटक (५) पद्म (६) महापद्म (७) शंख (८) कुलिक नागोंकी ये आठ जातियां हैं । इनके साथ (९) कालिय भी गिनते हैं । पौराणिक जनश्रुतिके अनुसार ये जब प्रजाको बहुत सताने लगे तब ब्रह्माने शाप दिया- “प्रथम तुम्हारा ससौतेला भाई तुम्हारा संहार करेगा फिर जनमेजय राजा ।” पौराणिक जनश्रुतिके अनुसार कुछ नाग, देव और मानवोंके अनुकूल और कुछ प्रतिकूल हैं । इनमें तक्षक, कर्कोटक, कालिया ये सदैव प्रतिकूल ही रहे हैं । विश्वमें सर्वत्र नाग हैं, नागपूजा भी है । किंतु भारतमें वह जिस प्रमाणमें प्रचलित है वैसी अन्यत्र कहीं नहीं है । क्यों कि भारतमें इनकी संख्या और जातियां भी बहुत हैं । ऋग्वेदमें नाग और सर्पका उल्लेख है । किंतु नाग-पूजाका नहीं । यजुर्वेद और अथर्वण वेदमें नागपूजाका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उल्लेख है । पौराणिक कालके शिव और विष्णु दोनों महान देवताओंके साथ सर्प या नाग जुड़ गया है । काली भी नाग-भूषण है । बौद्ध या जैनोंने भी नागका महत्व गाया है । भारतीय लोक साहित्य-सभी भाषाओंका-नाग-कथाओंसे भरा पड़ा है । इन कथाओंमें अनेक प्रकारके श्रद्धा-संकेत हैं । इसमें एक महान संकेत “पूर्वजोंके आत्मा नाग रूपसे अपने परिवारमें आते हैं और गर्भधारण होनेपर उसमें प्रवेश करते हैं !” इसलिये घरमें आया हुआ साप नहीं मारा जाता ! नागोंकी कथाओंसे-भली और बुरी-पुराण साहित्य भरा पड़ा है । इनमें वासुकी और अनंत— वासुकी—सर्पोंका अधिपति । इसकी पत्नी शतशीर्षा । जनमेजयके यज्ञमें इसके पंद्रह पुत्र नष्ट हो गये हैं । यह शंकरके गलेमें भूषण बना रहता है । यह मणिधर है । अनंत—इसको आदि-नाग भी कहते हैं । आदि शेष भी कहते हैं । यह विष्णुकी शैय्या है । विष्णुको अनंतशयन भी कहा गया है जो शेषशायी है । लक्ष्मण, बलराम, तथा संकर्षणको इसका अवतार माना है । गीता अ० १०. श्लो २९-मैं हूं वरुण पानीमें— जलके कारण मनुष्य पर होनेवाले अनुकूल प्रतिकूल परिणामोंके कारण जलदेवताकी कल्पना की गयी है । साथ ही साथ जल पंच महाभूतोंमें पृथ्वी पर रहनेवाला भूत है । मनुष्यके लिये जीवन है । बिना इसके जीना असंभव है । अर्थात् जल-पूजन एक कृतज्ञता है । बृहदारण्यक उपनिषदमें “जल सभी वस्तु मात्रका मूल उत्पत्ति साधन” होनेकी बात कही है । इसलिये जलमें भी देवताओंका वास माना जाना स्वाभाविक है । जल रूपी ये देवता भिन्न भिन्न हैं । इनमें अप्सरा निम्नश्रेणी देवता है । ये सदैव जलक्रीडा करती रहती हैं । ये सात प्रकारकी हैं । इनको सप्त मातृका भी कहा गया है । गुजरातमें ये सप्तमाता मानी जाती हैं तो दक्षिणमें सप्त भगिनी मानी जाती हैं । अर्थात् जलचरमें जलमें रहनेवाले जीव जंतु मत्स्यी कूर्मी कर्कटी दुर्दुरी, जतुपी, मकरी आदि नामोंसे अप्सराओंके नाम बने हैं । अर्थात् इन देवता ओंमें— ६५ परिशिष्ट ३

वरुण—पश्चिम दिशाका, जलका, पाताल, नागलोकका स्वामी । वारुणी और गौरी इसकी पत्नियां। सुनाभ इसका मंत्री । (१) गो, (२) बछ (३) सुरा (४) अधर्म (५) पुष्कर (६) वंदिष्ट ये इसके पुत्र हैं। देवोंने इसको जलाधिपत्यका अभिषेक किया था। अर्जुनको इसने अस्त्र दिया था। गीता अ० १०, श्लो० २९-पितरोंमें अर्यमा हूं— पितर—एक देव सदृश योनि है। पितर दो प्रकारके हैं। जो मनुष्य मरनेके बाद पितृ-लोक जाते हैं वे मृत-पितर, और सृष्टिके प्रारंभसे ही जो पितृलोकमें रहते हैं वे अमृत पितर । वैदिक आर्योने यमको आदि पितर माना है। पिता देवोंसे भी आद्य है। ऋग्वेदमें भी पितरोंके विषयमें पर्याप्त जानकारी है। "सोम-प्रिय पितर, निम्नलोक मध्य लोक, तथा उच्चलोकमें वास करने वाले आत्म-सामर्थ्य प्राप्त होने परभी सौम्य, सात्विक, " ऐसे उनका वर्णन है। साथ ही साथ "हमारे पुकारते ही आकर हमारी रक्षा करते हैं।" ऐसा अनुभव भी कहा गया है। स्थान स्थान पर उनका आवाहन भी है। ब्रह्माने देवोंको उत्पन्न करके उन्हें यज्ञ करनेको कहा। देवोंने यह नहीं माना। ब्रह्मदेवने कहा 'तुम मूढ बनोगे !” देव मूढ बने । लोगोंका नाश होने लगा। देव तब ब्रह्मदेवके पास गये । ब्रह्मदेवने उन्हे अपने पुत्रोंसे प्रायश्चित्त पूछनेको कहा। देवोंने अपने पुत्रोंसे प्रायश्चित्त पूंछा। पुत्रोंने प्रायश्चित्त कहा। देवोंने प्रसन्न होकर कहा "हमें ऐसा बोध करनेवाले आप पितर हैं।" तबसे देव "पितर पुत्र" कहे जाने लगे और देव भी स्वर्गमें पितरोंकी उपासना करने लगे। सभी समाजमें भिन्न भिन्न प्रकारसे पितृ-पूजा विद्यमान है। पितृ-पूजा विश्वके सभी धर्मोंका आवश्यक अंग है। भारतीय समाजमें नित्य-पितृ-तर्पणका भी नियम है। वार्षिक पितृश्राद्ध किया जाता है। पितृपूजाके अनेक प्रकार हैं। क्षेत्रों में जाकर पिंडदान करना भी पितृ-पूजाका एक प्रकार है। यह सब मृत-पितरोंके लिये है। प्रत्येक महिनेकी अमावस्या पितरोंका दिवस माना गया है। चार दिशाओंमें चार पितृगण हैं। (१) पूर्व-अग्निष्वात्त (२) दक्षिणबर्हिषद (३) पश्चिम-आज्यप (४) उत्तर सोमप। कहीं कहीं सात गण कहे गये हैं जिनका अपना लोक है। “मानव पिता अपनी तपस्यासे देव पितरोंका स्थान प्राप्त कर सकते हैं। देव-पिता अपनी योग-साधनासे सनकादिक बनते हैं" ऐसे कहा गया है। इन पितरोंमें— अर्यमा—ऋग्वेदमें अर्यमा एक देवता है। बारह आदित्योंमें वैशाख मासका आदित्य है। इसीको पितृगणका एक कहा गया है। इसके ३०० किरण हैं। केवल महाभारतमें अत्रि-पुत्र होनेकी बात कही गयी है। घर बांधते समय इसकी पूजा करनेका प्रथान था। इसके दक्षिणमें पितृयान मार्ग होनेकी बात भी देखनेको मिलती है। भागवत पुराणमें कहा गया है कि जब पृथुने पृथ्‍वीका दोहन किया तब पितरोंने इसे वत्स बनाया था। गीता अ० १०, श्लो० २९-शासकोंमें यम हूं मैं— शासन करनेवाले शासक। राज्यकर्ताको शासक कहा जाता है। न्यायान्यायका विचार करके समाजको अनुशासनमें रखना जिससे समाज अभ्युदय और निःश्रेयसकी साधना कर ६६ ज्ञानेश्वरी

सके प्रत्येक शासकका कर्तव्य है । साथ ही साथ "सबल दुर्बल पर अन्याय नहीं कर सके" तथा "समाजका दुर्बलतम मनुष्य भी अन्याय करनेवाले सबलसे सबल व्यक्तिका 'हाथ पकड़ कर' अन्यायका कारण पूछ सके" ऐसी व्यवस्था कायम करना शासनका एकमेव पवित्र कर्तव्य है । इसी एक उद्देशसे प्राचीन कालमें अनेक प्रकारके शासन प्रणालियोंकी स्थापना होकर "अपने उद्देशमें असफल होनेसे" ऐसी शासन प्रणालियोंको समाप्त किया गया है । महाभारत और बृहदारण्यकमें "धर्मानुशासन" का इतिहास कहते हुए लिखा गया है- सबसे प्रथम समाजमें ब्रह्म विद्यमान था । विद्वानोंने इसका अर्थ करते समय लिखा है कि तब एकाकार समाज था यहां "राजा या प्रजा," अथवा "शासक या शासित" ऐसा द्वैत नहीं था सब समान थे । श्रेष्ठ कनिष्ठ भाव नहीं था । उस समाजमें स्तवन तथा यशकी महिमा थी । तब ब्रह्मके सामर्थ्यकी कमीके कारण-एकताकी कमीके कारण-समाज विकास रुक गया । तब उच्च स्वरूपके समाज की कल्पना करके "श्रेयोरूप क्षात्र" का निर्माण किया गया । श्रेयोरूप क्षात्रतंत्र राजशासन था जो सेना-प्रधान था । तब ब्राह्मण भी यज्ञमें क्षत्रियोंके नीचे बैठ कर उपासना करते थे । क्षत्रिय ही ब्राह्मणोंका यश स्थापन करते थे । क्षत्रियकी सहायतासे ब्राह्मण अपने कार्य यशस्वी करते थे । किंतु इससे समाज वैभव-संपन्न नहीं हो पाया । इससे वैश्य-शासनतंत्र निर्माण किया गया । यह वैश्यतंत्र संभवतः पूंजीशाही तंत्र रहा हो । इससे भी समाज सुखी और वैभव-संपन्न नहीं हुआ तब सबका पोषक शूद्र निर्माण किया । क्या यह शूद्र-तंत्र श्रमिक-शासन-तंत्र था ? इससे भी समाज वैभवसंपन्न नहीं हो पाया । तब सर्व मंगलकारक धर्मानुशासनका निर्माण किया जिससे "दुर्बलसे दुर्बल व्यक्ति भी अपनेपर होनेवाले अन्यायके विरुद्ध सबलसे सबल व्यक्तिका हाथ पकड़कर पूछ सके ।" इन अनेक प्रकारके शासन तंत्रमें इंद्र, सोम, वरुण, रुद्र, वसु, आदित्य, रुद्र, पूषा, यम आदिका नाम आया है । इनका अर्थ करते समय उपनिषदके चिंतनशील विद्वानोंने क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रादि गणोंका द्योतक होनेकी बात कही है । और धर्म-शासनमें यम सब प्रकारके न्याय अन्यायका विचारक है । यम—विवस्वानका पुत्र । माताका नाम संज्ञा । ऋग्वेदमें अपनी जुड़वी बहन यमीसे इसकी नीति विषयक चर्चा हुई है । इसको पहला मानव कहा गया है । इसको राजा भी कहा गया है । यमको देवता भी कहा गया है । अष्ट दिक्पालोंमें यह दक्षिण दिशाका स्वामी है । इसका स्थान, तीन द्युलोकोंमें सर्वोच्च है । इसको ब्रह्माने पितरोंका स्वामित्व और विश्वके पाप-पुण्य पर देख-भाल रखनेका काम दिया । मांडव्यके शापसे इसने शूद्रयोनीमें-विदुरके रूपमें-जन्म लिया था । युधिष्ठिर यमका मानसपुत्र माना जाता है । इसने नचिकेताको ज्ञान दिया । गौतमको माता पिताके ऋणसे मुक्त होनेका मार्ग बताया । यम और इसके दूतोंमें जो संवाद हुआ उसको यमगीता कहते हैं । यमके नामसे ( १ ) यम संहिता ( २ ) यमस्मृति ये दो ग्रंथ उपलब्ध हैं जो शासन ग्रंथ हैं । यमने अर्जुनको अस्त्र दिया । सावित्रीको उसका पति सत्यवान लौटा दिया । ३७ परिशिष्ट ३

याज्ञवल्क्य ऋषिने जिन धर्मशास्त्रकारोंके नाम लिये हैं उनमें यमका नाम है। वसिष्ठ धर्म- सूत्रमें यमके कुछ श्लोक हैं। प्राचीन पोथियोंमें स्थान स्थान नीति, धर्म, व्यवहार, अध्यात्म आदि विषय पर इसके श्लोक मिलते हैं। यह न्यायका देवता है। गीता अ० १०, श्लो० ३०-मैं हूं प्रल्हाद दैत्योंमें- दैत्य-कश्यपसे जो दितिमें उत्पन्न हुए वे। ये सदैव देवोंके शत्रु रहे हैं। उन्हें दैत्य कहा जाता है। देवोंसे इनका युद्ध होता रहा है। प्राचीन साहित्यमें स्थान स्थान पर दैत्योंका उल्लेख आया है। अमृत प्राप्तिके लिये देव और दैत्योंने समुद्र मंथन किया था। उस समुद्र मंथनमेंसे जो अप्सरा, वारुणी, सुरा उत्पन्न हुईं वह दैत्योंने ले लिया। दैत्य सदैव यज्ञ विध्वंसक रहे हैं। संभवतः दैत्य और दानव भिन्न हैं। आगे चल कर इनमें भेद नहीं रहा होगा। क्यों कि दनुको दानवकी माता कहा गया है। फिर भी विद्वानोंका मत है ये समानार्थी हैं। प्रल्हाद-हिरण्यकश्यपु और कयाधूका पुत्र । देवासुर युद्धके निमित्त वेदमें भी प्रल्हादका नाम आता है। यह महान विष्णुभक्त था और इनका पिता विष्णुद्वेष्टा । बापते पुत्रको बहुतेरा समझाया किंतु यह नहीं माना। इसको कठोर दंड दिया जाने लगा। इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। यह मरनेके लिये भी तैयार हुआ किंतु विष्णु भक्ति छोड़नेके लिये नहीं। एक बार हिरण्य- कश्यपूने पूछा तुम्हारा विष्णु कहां है ? सर्वत्र । इस खंभेमें भी ? हां इसमें भी। गदासे खंभा तोड़ दिया गया। नरसिंह प्रकट हुए। नरसिंहने हिरण्यकश्यपूका वध किया। तब प्रल्हादनेही सभी दैत्योंका सांत्वन किया। नरसिंहने वर मांगनेको कहा तब इसने "विष्णुभक्तिके बिना और कुछ भी नहीं चाहता।" कहते हुए भक्तिका ही वर मांगा। विष्णुने तब "प्रल्हादका यह अंतिम जन्म है। यह मोक्षके लिये तैयार हुआ है!" ऐसा कहा है। स्वयं विष्णुने इसको ज्ञान दिया। गीता अ० १०, श्लो० ३०-काल हूं गणितज्ञमें- गणक-गिननेवाला, शुभाशुभ बनानेवाला, जीवन गिननेवाला, यह गणना, अतीत वर्तमान व भविष्यके रूपमें की गयी है। यही-काल है। यह आयुष्य निगलता जाता है। गिन गिन कर निगलता है। हमारे प्राचीन ऋषियोंने इस गिननेको भी गिना। उन्होंने मनुष्य, पितर, देव, और ब्रह्म ऐसे चार प्रकारके दिन और रातकी कल्पना की और फिर एक सूची तैयार की। १५ स्वेदयान - १ लोमगतं १५ प्राण - १ इदम् : १५ लोमगतं - १ निमिष. १५ इदम् - १ एतर्हि : १५ निमिष - १ अन १५ एतर्हि - १ क्षिप्र : १५ अन - १ प्राण १५ क्षिप्र - १ मुहूर्त्त ३० मुहूर्त्त - १ अहोरात्र इसके बाद वार, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर, युग, कल्प आदि। इसके अलावा और एक गणना है सो सूर्य पर आधारित है। ज्ञानेश्वरी ३६

२ परमाणु - १ अणु १५ काष्ठा - १ लघु ३ ऋतु - १ अयन ३ अणु - १ त्रसरेणु १५ लघु - १ नाडिका २ अयन - १ वर्ष ५ - वर्ष - १ युग. ३ त्रसरेणु - १ त्रुटि २ नाडिका- १ मुहूर्त ब्रह्माका १ दिन - १४ मनुका काल खंड. १०० त्रुटि - १ वेधस् ७ नाडिका- १ प्रहर या याम ब्रह्माकी १ एकरात-प्रलयका कालखंड. ३ वेधस् - १ लव ४ याम - १ दिवस या रात्र. ३ लव - १ निमिष १५ दिवस और रात्र - १ पक्ष ३ निमिष-१ क्षण २ पक्ष - १ मास--या पितरोंका एक दिवस. ५ क्षण - १ काष्ठा २ मास- १ ऋतु. हमारे दर्शन कारोंने इस कालके विषयमें खूब विचार कर भी यह समस्या ही रहा है। विश्वकी अनेक गूढ समस्याओंमें काल एक गूढ तम समस्या है । इसलिये इसको साक्षात् परमेश्वर भी कहा गया है । विश्वके परमाणुसे ब्रह्मांड तक सब कुछ उसी पर आश्रित है। अमूर्त होकर भी वह सर्वव्यापी है। उसके पार किसी वस्तुके अस्तित्त्वकी कल्पना नहीं की जा सकती । प्राणिमात्र पर उसकी जो कृपा होती है वही आयुष्य है । पतंलीने इसको नित्य और विश्वका आधार माना है यद्यपि बौद्धोंने कालका अस्तित्व ही नहीं माना ! इसलिये इस पर लिखते आना कालापहरण है ! गीता अ० १०, श्लो० ३०-मृगोंमें मैं मृगराज- मृगोंको पशु भी कहा जाता है। विशेषतः न जानते हुए या आकलन न करते हुए देखते रहना यह पशु शब्दका अर्थ है । अति प्राचीन कालमें भी इन पशुओंके स्वभाव इनके शुभाशुभ लक्षण, स्वभावानुसार इनका विभाजन, इनका उपयोग, इनके रोग, उसकी चिकित्सा आदि पर अनेक ग्रंथ लिखे गये हैं। उनमेंसे कुछ आज भी उपलब्ध हैं। इनमेंसे कुछ संस्कृत ग्रंथोंका फारसीमें अनुवाद भी हुवा है। ऋग्वेद पूर्वकालसे भारतमें पशुपालन चलता आया है। सिंधुसंस्कृतिमें भी गाय, भैंस, कुत्ता, बकरे, मेड, हाथी, सूवर, गधा, ऊंट ये पालतू जानवर थे ऐसी विद्वानोंकी मान्यता है। इन सबमें गाय पर विशेष भक्ति थी । उसको खूब खिलाते थे, तीन तीन बार दुहते थे, ऐसे विद्वानोंकी मान्यता है । ऋग्वेद कालमें भी खेतीके साथ गोपालन चलता था। गाय, बैल, घोडे, बकरा, मेड, कुत्ता, ये सब आश्रमवासी भी थे । उपनिषत्कालमें आश्रमके शिष्य गायोंको चराने ले जाते थे। इस समय प्रत्येक घरके साथ कुछ पशु होते थे। कौटिल्य कालमें इन सब जानवरोंको अलग अलग पाळा जाता था और उन पर देखभाल करनेवाले प्रमुख अधिकारीको अश्वाध्यक्ष गजाध्यक्ष, गो-अध्यक्ष आदि कहा जाता था । राजकुमार भी इस विभागके अध्यक्ष होते थे। पांचवा पांडव सहदेव गो-विद्याका पंडित था तो नकुल अश्व विद्याका । बिराटके घर इन्हें यही काम मिला था! कौटिल्यके समयमें यह लाभकारी व्यवसाय भी था। इसके चमडा, चरबी, स्नायू, सींग, दांत, हड्डी, आदिका उपयोग होता था । ६९ परिशिष्ट ३

ऐसे समय इस विषयमें अनेक ग्रंथ लिखे जाय तो कोई आश्चर्य नहीं। इन पशुओंम ग्राम्य, आरण्य, तथा व्योम ऐसे तीन विभाग हैं। आकाशमें उड़नेवाले पक्षी। पशुओंमें पालतु और जंगली। अथर्ववेदमें जंगली पशुओंको भयंकर कहा है। पानीके प्राणियोंको शिशुमार कहा है। इस प्रकार वहां पांच विभाग हैं। मृगेंद्र-सिंह-पंडित हंसदेवने मृगपक्षी शास्त्र नामका एक ग्रंथ लिखा है। उसमें उन्होंने सिंहके मृगेंद्र, पंचाक्ष, हर्यक्ष, केसरी, हरी, और सिंह ऐसे छः प्रकार दिये हैं। साथ साथ इनके वैशिष्ट्य दिखाये हैं। इसमें सिंहकी दुम लंबी होती है। शरीर फूर्तिला होता है। भूखके समय ये क्रूर होते हैं। इसका रंग सोनेरी होता है। ये अत्यंत वेगसे चलता है। प्रसन्नतामें रहता है तब दुम हिलता रहता है! गीता अ० १०. श्लो० ३०-पक्षियोंमें खगेंद्र हूं— पक्षी—भारतके प्राचीन ग्रंथोंमें पक्षियोंके विषयमें भी पर्याप्त जानकारी मिलती है। दूर दूर संदेश पहुंचानेके लिये भी पक्षी पाले जाते थे । कोशल राजाके घर संदेश वाहक एक मैना थी । कौटिल्य अर्थशास्त्रमें संदेश वाहक कबूतरोंका उल्लेख है । पुराणोंमें भी ऐसे अनेक उल्लेख हैं कि पक्षियोंसे संदेश भेजनेका काम लिया गया । पालतू पक्षियोंमें शुक, मैना, मोर, चकवा, अधिक तर देखनेको मिलते हैं किंतु राज प्रासादोंमें मुरगा, क्रौंच, कपिंजल, वार्तिक, चकोर, चक्रवाक, हंस, कोयल, कादंब, आदि पक्षी पालते थे। इन पक्षि- योंके विषयमें संस्कृत साहित्यमें अनेक प्रकारके संकेत हैं। इनकी स्वतंत्र भाषा है। इनकी भाषा जाननेवाले विशिष्ट लोग भी हैं। प्राचीन भारतीय साहित्यमें पक्षियोंका संभाषण सुनकर, उनसे आवश्यक जानकारी पाकर किये गये महान कामके उल्लेख पर्याप्त हैं। इनका और देवोंका संपर्क भी है। कौवोंको अन्न डाला तो वह पितरोंको मिलता है। कौये प्राचीन ऋषि हैं। मोर सरस्वतीका वाहन है। हंस और लक्ष्मीका संबंध है। कहीं कहीं उलु लक्ष्मीका वाहन माना जाता है। गरुड—विष्णुका वाहन है। यह कश्यप-विनताका पुत्र, अरुणका छोटा भाई । वालखिल्य ऋषियोंके पुण्यसे गरुड पैदा हुआ था। पैदा होते ही वह उड़ने लगा। इसके उड़नेसे ही इसको पक्षियोंका इंद्र मान कर वालखिल्योंने इसका अभिषेक किया। उड़ते समय इसका इतना प्रखर ताप था कि सारा विश्व अकुला उठा। इससे इसको लोग अग्नि समझने लगे। तब इसने अपने तेजका संकोच किया। इसकी मां विनता सौतकी दासी थी। इससे वह दुःखी थी। इसके सवतेले भाई साप भी इसे दासी-पुत्र मानकर जो चाहे सो फर्माते थे। एक बार यह अपने सवतेले भाई सापोंको लेकर इतना ऊंचा उड़ा कि बेचारे सूर्य तापसे जल भुनकर नीचे पडे ! अपनी माताके दास्यका कारण और उससे मुक्तताका उपाय जानकर यह इंद्रसे लड़कर अमृत जीतकर ले आया और मां को दास मुक्त किया। संपूर्ण अमृतकुंभ पास रह कर भी इसने एक बूंद भी अमृत नहीं पिया। यह देखकर विष्णुने प्रसन्न होकर इससे वर मांगनेको कहा तब इसने "बिना अमृतके ही अमर" बननेका वर मांग कर विष्णुसे कहा "अब तुम भी कोई वर मांग लो !" तो विष्णुने "अपना वाहन बननेका वर मांगा !" ऐसे यह विष्णुका वाहन बना। ज्ञानेश्वरी ७०

गीता अ० १०, श्लो० ३१-वायु मैं वेगवानों में- सारा विश्व गतिशील है। विश्वकी प्रत्येक वस्तु ग्रह नक्षत्रादि सभी गतिशील है। इसकी गति भी तीव्र है। मनुष्य इसकी कल्पना नहीं कर सकता। जैसे शब्दकी गति, प्रकाशकी गति आदि, किंतु इन सबमें वायुकी गति अत्यंत तीव्र मानी गयी है। मरुद्गणोंका विचार करते समय अवकाशमें जो वायुकी गति है उसका उल्लेख होता है। तब कहा जाता है कि इससे विश्व हिलता है। अब तक इस गतिका अंकन नहीं किया गया है। गीता अ० १०, श्लो० ३१-राम मैं शस्त्र वीरोंमें- राम—पिताका नाम दशरथ। माता कौसल्या। भाई लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न। राम सबसे बडा लड़का। यह धनुर्वेदका पंडित था। विश्वामित्र इसका शस्त्र-गुरु। रामने बचपनमें ही ताटकाका वध किया। सुबाहुको मारा और मारीचको अपने बाणाग्रसे उडा दिया। जनक नंदिनी सीता इसकी पत्नी। सीताको रामने स्वयंवरमें जीता। शिवधनुपर प्रत्यंचा चढाना सीता स्वयंवरका दांव था और रामने हजारों राजाओंके सम्मुख प्रत्यंचा चढानेके लिये जब शिव-धनुष्य झुकाया तब धनुष्य टूट गया !! राजा दशरथने अपना बुढापा जानकर रामको युवराज्याभिषेक करना निश्चय किया। किंतु दशरथकी सबसे छोटी रानी कैकयीको यह अच्छा नहीं लगा। उसने दशरथको अपने पूर्व वचनका स्मरण दिलाकर भरतको योवराज्य और रामको चौदह वर्ष वनवास भेजनेकी मांग की। इससे पित्राज्ञासे राम, सीता और बंधु लक्ष्मणके साथ चौदह वर्षके लिये वनवास गया। दशरथ, रामके वनवास जानेका दुःख नहीं सह सका। वह राम राम कहता स्वर्ग सिधास। वनवासके लिये राम दक्षिणकी ओर चला। रामके साथ ही रहनेका लक्ष्मणका दृढ निश्चय था। वह भी रामके साथ रहा, एक आज्ञाधारक सेवककी भांति। किंतु वहां भरतने राज्य लेनेसे अस्वीकार कर दिया। भरत अयोध्याके कुछ प्रमुख लोगोंको साथ लेकर रामको अयोध्या लौटा ले आनेके लिये आया। तब राम चित्रकूटमें था। चित्रकूटमें सब मिले। भरतने अपनी मांग सामने रखी। राम दृढ था। चौदह वर्ष वनवासका उसका निश्चय दृढ था। भरतने रामकी पादुकाएँ लीं। रामके प्रतिनिधिके रूपमें चौदह वर्ष तक अयोध्याका राज्य देखनेका स्वीकार करके भरत अयोध्या आया। राम दक्षिणकी ओर चला। चलते चलते वह ऋषि-मुनियोंसे मिलता। उनसे ज्ञान लेता। उनका सुख दुःख सुनता और आगे बढ़ता। ऐसे चलते चलते दस वर्ष बीते। यह पंचवटी आया। वहां जटायू पक्षी मिला। कुछ दिन राम पंचवटीमें रहा। लक्ष्मणने वहां शूर्पनखाके नाक कान काटे। शूर्पनखासे सब बात सुनकर रावणने मारीचकी सहायतासे सीता हरण किया। बीचमें जटायूने रावणको रोका। जटायूका वध करके रावण सीताको लेकर चला। जटायूसे सीता हरणकी बात जानकर राम लक्ष्मण दक्षिणकी ओर चले। किष्किंधामें हनुमान और सुग्रीवका संपर्क हुआ। अग्नि साक्षीसे राम सुग्रीवकी मित्रता हुई। अपने बडे भाईके डरसे सुग्रीव राज्य छोड़कर ऋष्यमूक पर्वत पर रहता था। रामने वालीवधकी प्रतिज्ञा कर वालीको ७१ परिशिष्ट ३

मारा। उसके बाद सीता शोध हुवा। हनुमानने सीता-शोध किया। यह अशोक-वनमें सीतासे मिलकर उससे चूडामणि ले आया। राम लंका पर चढ़ायी करने आगे बढा। हनुमानके सीतासे मिलकर जानेके बाद रावण-सभामें बडी गडबड हुई। रावणके भाई बिभीषणने “सीताको रामके पास पहुंचा देनेकी मांग की!” यह रावणके विरुद्ध था। रावणने उसका धिःकार किया। इससे बिभीषण अपने चार प्रधान--अनल, पनस, संपाति और प्रमति--के साथ रामकी शरण आया। क्यों कि वालीवधसे बिभीषण समझ चुका था वीरतामें राम रावणसे श्रेष्ठ है और उसके साथ समग्र वानर-सेना है। रामने हनुमान सुग्रीवादिकी सलाहसे बिभीषणको अभय दिया। बिभीषणने भी रावण-वधमें सहायता करनेका आश्वासन दिया। वहां रावण सुग्रीवको रामसे अलग करनेका संधान कर असफल रहा। इसके बाद रामने नीलको समुद्र पर सेतु बांधनेकी आज्ञा दी। नीलने लाखो वानरोंकी सहायतासे चौदह, बीस, इकबीस, बाईस, तेईस इस क्रमसे पांच दिनमें सौ'योजनका सेतु बांधा। रामने अपनी सेनाके साथ लंकामें जा छावनी डाली। रामने सुवेल पर्वतसे लंकाका अवलोकन करके सैन्य रचना की। युद्धकी पूरी व्यूह-रचना होनेके बाद नियमानुसार रामने संघामके लिये अंगदको रावणके पास भेजा। अंगदने रावणको बहुतेरे समझाया। कोई उपयोग नहीं हुवा। रावणने अंगदको पकड़नेकी आज्ञा दी। अंगद राक्षसोंको गिराकर वहांसे चला आया। आते समय यह रावणके प्रासादका शिखर-कलश-गिराकर आया! रामने युद्धकी घोषणा की। माघ-शुद्ध द्वितीयाको इस युद्धका प्रारंभ हुवा और चैत्र शुद्ध १२ (या चै. व. १४) रावण वध हुवा। चै. व. ३० को रावणका प्रेत संस्कार हुवा। इस युद्धमें रावणके साथ उसके भाई कुंभकर्ण, पुत्र मेघनाद, अतिकाय, मामा प्रहस्त भतीजे कुंभ-निकुंभ, आदि सारा परिवार--बिभीषणको छोडकर--नष्ट हुवा। सीता ११ महीने १४ दिन रावणकी बंदी बनकर अशोकवनमें रही। विवाहके समय राम पंद्रह वर्षका था और सीता छ वर्षकी। जब रामका राज्याभिषेक हुवा तब राम ४२ वर्षका था। और सीता ३३ वर्षकी। स्कंदपुराणमें सारी रामकथा तिथि वारके साथ है किंतु विद्वानोंका कहना है यह वाल्मिकी रामायणसे मेल नहीं पाता। राम रावण युद्ध और रामके विषयमें अलग अलग पुराणोंमें अलग अलग बातें कही गयी हैं! गीता अ० १०, श्लो० ३१- मत्स्योंमें मैं बना नक्र— इसके विषयमें कोई कहने जैसी जानकारी नहीं मिली। गीता अ० १०, श्लो० ३१--नदियोंमें गंगा नदी— प्राचीन पोथियोंमें पर्वतसे उगम होकर समुद्रसे मिलनेवाले ऐसे जल-प्रवाहको, -जिसकी लंबाई आठ हजार धनु सामान्यतया १६००० मीटरसे अधिक है-नदी कहा गया है। इससे कम लंबाईवाले जल-प्रवाह "गर्त” कहे गये हैं। भारतीय ग्रंथोंमें नदी-प्रवाहोंको पवित्र माना है। ऋग्वेदमें आपोदेवता-जलदेवता-हमारा कल्याण करें, हमें पवित्र करें ऐसी प्रार्थना है। ऋग्वेदमें नदी सूक्त भी है। इस नदी सूक्तमें गंगा, यमुना, सरस्वती, शुतुद्री, विपाशा, वरुणी, असिकीती, महदूधा, वितस्ता, आर्जोकिया, ज्ञानेश्वरी ७२

सुषोमा, त्रिसामा, सुसर्तु, श्वेती, सिंधु, कुभा, गोमती, क्रमू, मेहरु इन अठारह नदियोंका उल्लेख है। ऋग्वेदकी पवित्रतम नदी गंगा नहीं सरस्वती है। महान माता, महान नदी महान देवी भादि कहकर इस नदीका वर्णन किया गया है। पुराणकालमें सरस्वतीका स्थान गंगाने लेलिया । भारतकी सभी नदियोंकी उत्पत्ति कथा है। उसके स्नानका फल कहा गया है। नदी किनारे पर बसे कई गांव, शहर, घाट, मंदिर आदिका वैशिष्ट्य कहा गया है। महाभारतमें अष्टकुल-पर्वतोंसे उद्गम होकर बहनेवाली निम्न लिखी नदियोंका उल्लेख है । हिमाचल पर्वतसे—(१) गंगा (२) सरस्वती (३) सिंधु (४) चंद्रभागा- चिनाब (५) यमुना (६) शुतुद्री-सतलज (७) वितस्ता-झेलम (८) इरावती-रावी (९) कुहू-काबुल (१०) गोमती (११) विपाशा-वियास (१२) देविका-दीग-(१३) शरयू- गोम्रा-(१४) क्षू-रामगंगा-(१५) गंडकी (१६) कौशिका-कोसी-(१७) निश्रा (१८) लोहित्या-ब्रह्मपुत्रा- । (२) परियात्र पर्वत श्रेणीसे—(१) वेदस्मृति-बनास-(२) वेदनती-बेरछ- (३) वृत्रघ्नी-अंनर्गत-(४) सिंधू-कालीसंध-(५) वेण्या, या वर्णाशा, नंदिनी या चंदना- साबरमती-(६) सदानीरा या सतिरापारा-पार्वती-(७) चर्मण्वती या धन्वती-चंबल-(८) तूपी या रूपा या सूर्या-गंभीर-(९) विदिशा-बेस-(१०) वेत्रवती-बेध्वा-(११) क्षिप्रा । (३) ऋक्ष पर्वत श्रेणीसे—(१) मंदाकिनी-(२) दशार्णा-धसान-(३) चित्रकूटा- (४) तमसा-(५) पिप्पलश्रोणी-पैसुनी-(६) पिशाचिक-(७) करमोदा-कर्मनासा-(८) चित्रोत्पला-(९) विपाशा-नेवास-(१०) मंजुला-(११) बालुवाहिनी-बघैन-(१२) सुमेरुजा- सोनरवीरमा-(१३) शुक्तिमती-(१४) शकुला-सक्री-(१५) विदिवा-(१६) क्रमु । (४) विंध्य पर्वत श्रेणीसे—(१) क्षिप्रा-(२) पयोष्णी-(३) निर्विंध्या-नेबुज-(४) तापी-(५) निबन्धा-सिंध-(६) वेणा-वैणगंगा-(७) वैतरी-(८) शितीबाहू-(९) कुमुद्वती- स्वर्णरेखा-(१०) तोया-ब्राह्मणी-(११) महागौरी-दामोदर-(१२) पूर्णा-(१३) शोणसोन- (१४) महानदी-(१५) नर्मदा । (५) सह्याद्रि पर्वत श्रेणीसे—(१) गोदावरी-(२) भीमा-(३) कृष्णा-(४) वेणा-(५) तुंगभद्रा-(६) सुप्रयोगा-हगरी-(७) वरदा-(८) कावेरी-(९) मंजुला । (६) मलय पर्वत श्रेणीसे—(१) कृतमाला-ऋतुमाला-(२) ताम्रपर्णी-(३) पुष्पजा-(४) सत्पलावती-पेरिय । (७) महेंद्र पर्वत श्रेणीसे—(१) पित्रसोमा-(२) ऋषिकुल्या-(३) इक्षुका-(४) त्रिदिवा या वेगवती-(५) लांगुलिनी-(६) वंशकरा । (८) शुक्तिमत पर्वत श्रेणीसे—(१) ऋषिका-(२) कुमारी-सुकतेल-(३) मंदगा- (४) मंदवाहिनी-महानदी-(५) कृपा-(६) पलाशिती-(७) वामन । प्रत्येक प्रदेशमें इसके अतिरिक्त भी अन्य अनेक नदियां हैं। भारतीय साहित्यमें नदियोंके विषयमें जो आदर और श्रद्धा-भक्तिके साथ पावित्र्यका भाव दीखता है वह अपूर्व ही है। व्यासने नदीको "विश्व-माता" कहा तो रवींद्रनाथ ठाकुर : "ईश्वरकी करुणा" कहते हैं। व्याससे रवींद्र- ७६ परिशिष्ट ३ (6)

नाथ तक, ऋग्वेदके सूक्तोंसे प्रादेशिक भाषाओंकी कविताओं तक, यह परंपरा सभी भाषाके कवियोंने निभाई है । देव-पूजाके समय पुजारी अपने अभिषेकके कलशमें गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी इन सप्त नदीका अधिष्ठान देखता है । भारतके प्रत्येक प्रदेशमें नदी पूजाकी परिपाठी है । पर्वकालमें सभी नदी स्नानके लिये आते हैं । वस्तुतः नदीके किनारों पर ही भारतीय संस्कृतिका जन्म और विकास हुआ है । मानो प्रत्येक नदी भारतीय संस्कृतिका एक एक प्रवाह है । इसमें गंगा नदीका विशेष महत्व है । गंगा—इस शब्दका अर्थ करनेवाले निरुक्तकारोंमेंसे किसीने “स्नान करनेवालोंको परमात्माके चरणों तक पहुंचानेवाली” ऐसा किया तो किसीने “मुमुक्षु-मोक्षार्थी जिसके पास जाते हैं वह गंगा !” ऐसा किया है। इसी नदीको विष्णुपदी, त्रिपथगा और भागीरथी कहा गया है। महादेवने अपने कमंडलुके पानीसे विष्णुके पैर धोये जिससे वह बहने लगी इस लिये इसे विष्णुपदी कहते हैं तो स्वर्ग मृत्यु पाताल इन तीनों लोकमें यह बहती है इसलिये त्रिपथगा कहते हैं और भगीरथ राजाकी तपस्यासे यह मृत्युलोक आयी थी इसलिये भागीरथी कहते हैं । सूर्यवंशके सगर राजाने कभी अश्वमेध यज्ञ किया था। इस घोडेके रक्षणमें उसके पुत्र थे । घोडा भटकते भटकते कपिल मुनिके आश्रममें गया। अश्वरक्षक उसको खोजते खोजते थक कर कपिलाश्रममें पहुंचे और मुनिने घोडेको चुराया इस भ्रमसे ध्यानस्थ मुनि पर हमला करने गये तो मुनिकी आंखें खुलतेही उस तेजसे जल कर राख हो गये । घोडेकी खोजमें सगरका पोता अंशुमान कपिलाश्रममें पहुंचा । उसको जब सारी बातकी जानकारी हुई तब उसने कपिलकी प्रार्थना की । प्रसन्न हृदय कपिलने अपने पितरोंके उद्धारके लिये स्वर्गके गंगाप्रवाहको भूतलपर लानेको कहा और अंशुमान हिमालयमें जा तपमें बैठ गया । अंशुमान तप करते करते वहीं खप गया इसके बाद योग्य समय देखकर उसके पुत्र दिलीपने पिताका अनुकरण किया और दिलीप भी हिमालयकी गोदमें सो गया तब उसके पुत्र भगीरथने पितामह और पिताके अधूरे कामको हाथमें लिया । वह इस महा कार्यमें यशस्वी हुवा । टेहरी गढवालके १३८०० फूट ऊंचे गंगोत्री पहाडसे इसका उगम होता है। इसको पुराणोंमें गोमुखी कहा है । इस प्रवाहको यहां भागीरथी कहते हैं। इसी प्रवाहसे कुछ आगे चलकर जान्हवी और अलकनंदाका प्रवाह मिलते हैं । इस स्थानका प्राचीन नाम मंदारगिरि है । आगे आगे इसमें अन्य अनेक प्रवाह आ मिलते हैं जिससे इस भागमें सप्त-संगम बने हैं । बदरीनाथमें विष्णुगंगा-सरस्वती ?-आती है । जोशी मठके पास धौलीगंगा विष्णुगंगासे आ मिलती है । विष्णु प्रयागके बाद इस संयुक्त प्रवाहको अलकनंदा कहते हैं । फिर नंदप्रयागमें मंदाकिनी अलकनंदासे आ मिलती है । कर्णप्रयागमें पिंडरगंगा इस प्रवाहमें आ मिलती है । रुद्रप्रयाग और देवप्रयागमें इन्ही नदियोंके दूसरे प्रवाह इसमें मिलते हैं । तब यह गंगाके नामसे आगे बहती है । हिमालयकी स्वर्ग भूमिसे यह हृषीकेशमें भूतलपर आती है । कनखलको गंगाद्वार कहते हैं । वहांसे यह दक्षिण वाहिनी होकर मेरठ, रोहलखंड, फरुखाबाद, अवध, प्रयाग, मिर्जापुर, वाराणसी, बलिया, पटना इस मार्गसे कलकत्तामें आकर समुद्रसे मिलती है । फरुखाबादमें रामगंगाका प्रवाह जो कूर्माचलकी ओरसे आता है गंगामें मिलता है । प्रयागमें गंगा और यमुनाका मिलन होता है । इस नदीको लोग प्रेम और पूज्य भावसे गंगा-मैया कहते हैं । सारे भारतवर्षके ज्ञानेश्वरी ७३

लोगोंको इस नदीके विषयमें आदर है। भक्ति है। आत्मीयता है। भारतके गांव गांवमें गंगाजलसे भरा कलश रहता है जिससे मरते समय गंगाजल दे सकें। भारतके आचार्योंने, संतोंने, मनीषियोंने कवियोंने, साहित्यिकोंने इसको वंदन करके इसके गुण गाये हैं। गंगानदी भारतीय संस्कृतिका तथा एकताका प्रतीक बन गयी है। गीता अ० १०. श्लो० ३२-विद्याओंमें अध्यात्म मैं— विद्या—विद्याका अर्थ है जानना। प्रयत्न पूर्वक जानकारी प्राप्त करना। जानकारी प्राप्त करनेकी इस प्रक्रियाको विद्याध्ययन कहते। देखना, सुनना, पाठ करना, स्मरण रखना, चिंतन करना, मनन करना, प्रयोग करना और अनुभवना ये अध्ययनके प्राचीन साधन। फिर इसमें और एक साधन, वाचन आ गया। सुनकर पाठ करनेके स्थानपर पढकर स्मरण रखनेकी प्रक्रिया भी इसमें जुड गयी। इस प्रकारकी विद्याके "प्राचीन पोथियोंमें चौदह प्रकार गिने हैं। किंतु आगे चलकर इसके प्रकार बदले भी हैं। प्रथम चार वेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद अथर्ववेद-छ वेदांग-छंद, शिक्षा, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, और कल्प, शास्त्र-न्याय, मीमांसा, पुराण, धर्मशास्त्र, ऐसे चौदह विद्याओंकी इस तालिकामें कुछ परिवर्तन होकर आगे (१) आत्मज्ञान, (२) वेदज्ञान (३) धनुर्विद्या, (४) लेखन, (५) गणित (६) शस्त्रविद्या (७) तैराकी (८) बुनना (९) वैद्यक (१०) ज्योतिष (११) संगीत (१२) रमल (१३) पाकविद्या (१४) गारुडी विद्या ये चौदह विद्याएँ बनीं और आगे इसमें भी परिवर्तन होकर (१) ब्रह्मज्ञान (२) रसायन (३) श्रुतिकथा (४) वैद्यक (५) नाट्य (६) ज्योतिष (७) व्याकरण (८) धनुर्विद्या (९) जलतरण (१०) कामविद्या (११) सामुद्रिकज्ञान (१२) तंत्रविद्या (१३) मंत्रविद्या (१४) चौर्य-विद्या!! ये १४ विद्याएँ बनीं! इन चौदह विद्याओंमें कब कैसे और क्यों परिवर्तन होते गये यह संशोधन करनेवालोंका काम हैं। इनमें— अध्यात्मविद्या—आत्म-स्वरूपके विषयमें जानना। आत्म-बोध होना। ब्रह्मकी अथवा आत्माकी सहज-स्थितिको अध्यात्म कहा गया है। जिस ज्ञानसे प्रापंचिक ज्ञानके परे परमात्मवस्तुका बोध होता है उसको अध्यात्म ज्ञान् कहा गया है। वैसे ही ब्रह्मांडके मूलभूत तत्वके अनुभवोंका विवेचन विश्लेषण करनेवाले शास्त्रको अध्यात्म-शास्त्र कहा गया है। उपनिषद गीता आदि अध्यात्म-विद्या और अध्यात्म शास्त्र है। समग्र ज्ञानेश्वरी अध्यात्म-विद्याका विस्तृत विवेचन करनेवाला सागर ही है। आत्मा क्या है? उस आत्माका बोध कैसे होता है? उसके लिये मनुष्यको क्या क्या करना चाहिए? यह सब उपनिषद् गीता, ज्ञानेश्वरी आदि ग्रंथोंमें भली भांति समझाया गया है। अन्य विद्याओंकी भांति यह केवल पठनसे नहीं जानी जाती। उसके लिये चिंतन और प्रयोग "अध्यात्म-विद्याके ये दो पाठ हैं"। इससे मनुष्यको आत्म-बोधकी अथवा आत्म-साक्षात्कारकी अवस्थाको प्राप्त करना है। इस अंतिम स्थितिको आत्म-ज्ञान, अपरोक्षानु- भूति, आत्म-बोध, आदि कहा गया है। गीता अ० १०. श्लो० ३३-अक्षरोंमें अकार मैं— अनेक शास्त्रोंने अक्षरके अनेक अर्थ कहे हैं। वस्तुतः जिसका क्षय नहीं होता, न पिघलने- वाला, न घुलनेवाला, अविकारी, नित्य, भावातीत्त आदि अक्षर शब्दका अर्थ है। प्रत्येक शब्दका ७५ परिशिष्ट ३

अर्थ करनेवाले नैयायिकोंने “वर्णका स्मरण कर देनेवाला लिपि प्रकार” ऐसा इसका अर्थ किया तो वेदांतमें “परब्रह्म” कहा है और स्वयं गीतामें ओंकार वेद सार तथा ईश्वर ऐसा वर्णन किया है। किंतु कुछ प्राचीन पोथियोंमें “छः महीने बाद ज्ञानके विषयमें भ्रम होता है, संदेह निर्माण होता है। इसलिये अक्षर पत्रारूढ किये।” ऐसा लिखा गया है। विश्वकी विविध भाषाओंकी ध्वनियोंको व्यक्त करनेवाले चिन्होंको अक्षर कहते हैं। साहित्यमें अक्षरके विषयमें “ध्वन्यात्मक” और “सांकेतिक” ऐसे दोनों अर्थ मिलते हैं। ऋग्वेदमें वर्णमालाको अक्षर कहा गया है। विद्वा- नोंका यह मंतव्य है कि ऋग्वेदकालमें तराशकर अक्षर लिखते होंगे ! क्यों कि वहां अक्षरका अर्थ न फैलनेवाला न पिघलनेवाला ऐसा है ! उस समयके अक्षर ध्वन्यात्मक न होकर संकेतात्मक होंगे। अक्षरोंमें स्वर और व्यंजन ऐसे दो प्रकार हैं। स्वर दीर्घ, लघु तथा प्लुत ऐसे तीन प्रकारके होते हैं। दीर्घ स्वरांत अक्षर गुरु कहलाता है तो ह्रस्व स्वरांत अक्षर लघु कहलाता है। तीन मात्राओंका अक्षर प्लुत कहाता है। ध्वन्यात्मक तथा वर्णात्मक अक्षरोंका विकास लेखन कलाका विकसित रूप है। इन वर्णोंमें शुभ अशुभ तथा दग्ध ऐसे तीन प्रकार किये गये हैं। काव्य-शास्त्र के ग्रंथोंमें कहा गया है कि काव्यारंभ अशुभ अक्षरसे नहीं होना चाहिये । सभी अक्षर अ. क. च. ट. त. प. य. श. इन आठ वर्णोंमें विभाजित किये गये हैं। प्रत्येक वर्गका एक देवता है। उसका फल है। जैसे— अ. सोम, आयुर्वृद्धि, क, अंगारक, कीर्ति, च. बुध धनप्राप्ति. ट. गु, सौभाग्य, त, शुक्र, कीर्ति प. शनि मंदता. य. सूर्य, मृत्यु, श, राहु, शून्यता इसके अलावा ज्योतिष्य आदि शास्त्रोंमें, अक्षर-संकेतादि अलग शास्त्र ही है। अ—आदिवर्ण है। वाङ्मयका आदि बीज है। प्रणवकी पहिली मात्रा है। वैसे ही अ नेति नेति सूचक भी है। देवताओंमेंसे ब्रह्मा, शिव, वायु, तथा वैश्वानर=अग्नि इनका बोधक है। नानार्थ मंजरीमें : (१) ज्वाला (२) मंत्र (३) पर्जन्य (४) रथका घोडा (५) चक्र (६) मुर्गेका सिर (७) चंद्रबिंब (८) ब्रह्मा (९) शिव (१०) विष्णु अ के इतने अर्थ कहे गये हैं। यह अ सभी भाषाओंके अक्षरोंमें प्रथमाक्षर है। वह कंठ्य अक्षर है। पाणिनीके अनुसार इसके अठारह उच्चार भेद होते हैं। तंत्र-शास्त्रानुसार अ : इस अक्षरमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा उनकी शक्तियां महासरस्वती, महालक्ष्मी तथा महाकाली विद्यमान है। चित्तकी एकाग्रताके लिये इस अक्षरका जाप कहा गया है। गीता अ० १०. श्लो० ३३-मैं हूं द्वंद्व समासोंमें— दो या दोसे अधिक शब्दोंमें आनेवाले प्रत्यय अव्यय आदि हटा कर दो या दोसे अधिक शब्दोंको जोडकर एक शब्द तैयार करनेको समास कहते हैं। और ऐसे शब्दोंको सामासिक शब्द । इस प्रकार शब्दोंको जोडनेके तीन प्रकार हैं। (१) जिसमेंसे सभी शब्द समान योग्यताके होते हैं वह (२) जिसमें पहलेके पद गौण हो कर बादके मुख्य होते हैं वह (३) तथा जिनमें पहले मुख्य हो कर बादके गौण होते हैं वह । इनमें तत्पुरुष, बहुव्रीहि, अव्ययीभाव तथा द्वंद्व ऐसे चार प्रकारके समास होते हैं। इनमेंसे प्रत्येकमें अन्य अनेक उप-विभाग हैं। ज्ञानेश्वरी ७३

द्वंद्व समास-द्वंद्व समासके तीन प्रकार हैं। समाहार द्वंद्व, वैकल्पिक द्वंद्व, इतरेतर द्वंद्व । इस समासके सर्व शब्द समान महत्त्वके होते हैं। तथा इस समाससे जो सामासिक शब्द बनता है उसमें सर्वार्थ समावेश होता है। जैसे कृष्ण और अर्जुन कृष्णार्जुन अथवा कर्ण और अर्जुन कर्णार्जुन । कृष्णार्जुन और कर्णार्जुन भावनाकी दृष्टिसे उत्तरध्रुव और दक्षिणध्रुव है। कृष्णार्जुन द्वंद्वमें प्रेमजन्य अद्वैत है। और कर्णार्जुन द्वंद्वमें विरोधजन्य द्वैत है। यह द्वंद्व समास द्वैत और अद्वैत दोनोंको अपनेमें समालेता है अथवा पचालेता है। यही परमात्म-तत्त्वकी विशेषता है। परमात्म तत्त्व द्वैत और अद्वैत दोनोंमें पूर्ण है। जीवनमरण, बंधमोक्ष, ये परस्पर विरोधी द्वंद्व उत्तरध्रुव और दक्षिणध्रुवको एकत्र लाते हैं। मानो कहते हों एकही "वस्तुके दो छोर हैं!" इसमें भी ऐक्य है। जैसे दो आँखें एक देखती हैं, दो होंठ एक बोलते हैं, दो कान एक सुनते हैं, दो पैर एक चलते हैं। विरोधमें एकता द्वंद्व समासकी विशेषता है। वैसे ही आचारविचार, मातापिता, आदि एकताका द्वंद्व है। यहां अद्वैतमें द्वैत है। और द्वैतमें अद्वैत। मैं हूं द्वंद्व समासोंमें कह कर परमात्माने द्वैत और अद्वैतको अपनेमें पचा लिया है। मै दोनोंमें और दोनोंसे परे कहा है। गीता अ० १०, श्लो० ३४-सर्वनाशक मैं मृत्यु- नाशका अर्थ रूपका बदलना। विश्वमें जो कुछ बनता है अर्थात आकार लेता है वह नष्ट होता है। इस नाशको संहार कहा गया है। जो कुछ आकार लेता है उस सबको नाश करनेवाली सर्व-नाशक जो शक्ति अथवा देवता है उसको मृत्यु कहा गया है। ब्रह्माने इसका निर्माण करके समय पर संहार कार्यकरनेकी आज्ञा दी तो मृत्युने प्राणियोंको दुःख देनेवाला कार्य मुझसे नहीं होगा कहकर तपस्या करना प्रारंभ किया। इस तपसे प्रसन्न ब्रह्माने वर मांगनेको कहा तो मृत्युने 'जगतसंहारका काम मेरे पास न हो' का वर मांगा तब ब्रह्माने तू विश्व-नाशका प्रत्यक्ष कारण नहीं बनेगी "अप्रत्यक्ष कारण" तेरा काम करेंगे! ऐसा वर दिया। इसी मृत्यु देवताने नचिकेताको ब्रह्मविद्या सिखाई। यहां मृत्युके विषयमें तात्त्विक विवेचन हुआ है। मृत्यु स्वतंत्र नहीं है। वह भी परतंत्र है। वह "बिना कोई बहाना मिले" मृत्यु अपना कार्य नहीं कर सकता। गीता अ० १०, श्लो० ३५-गायत्री सब छंदोंमें- "मानवी भाषाकी प्राथमिक अवस्था गुनगुनानेकी भांति थी" ऐसे कुछ विद्वानोंकी मान्यता है। और सामान्यतया किसी भी भाषाके प्रारंभिक ग्रंथ पद्यमय ही मिलते हैं। विश्व-साहित्यका आदि ग्रंथ ऋग्वेद पद्यमय है। छंदोबद्ध है। ग्रीक लोगोंका सर्वप्राचीन ग्रंथ भी पद्यमय अर्थात् छंदोबद्ध है। होमरके पूर्ववर्ती भी कुछ कवि हो गये थे ऐसी जानकारी होमरके "इलीयड" काव्यग्रंथमेंसे मिलती है। पर्सियाका वेदतुल्य साहित्य अवेस्ता भी छंदोबद्ध है। हिब्रू लोगोंका धर्मग्रंथ, लेटीन भाषाके प्राचीन ग्रंथ भी छंदोबद्ध हैं। भारतके प्राचीनतम ऋग्वेद संहितामें (१) अतिजगती (२) अतिधृति (३) अतिशक्करी (४) अत्यष्टि (५) अनुष्टुप (६) अष्टि (७) उष्णिक् (८) एकपाद (९) ककुभ (१०) गायत्री (११) जगती (१२) त्रिष्टुभ् (१३) द्विपाद (१४) धृति (१५) पंक्ति (१६) प्रगाथबर्हत (१७) बृहती (१८) महाबर्हत (१९) शक्करी; ये उन्नीस छंद हैं। ७७ परिशिष्ट ३

वेद मंत्रोंको ही छंदस् कहा गया है। सामान्यतया सभी वैदिक छंद अक्षरछंद हैं मात्रा छंद नहीं । अवेस्तामें भी सभी अक्षर छंद हैं। किंतु उदात्त अनुदात्त स्वर यह वेदका वैशिष्ट्य है। अर्थ निश्चितीमें इन स्वरोंका महत्व माना जाता है। साथ साथ पठनमें संगीतका भास होता है। इसके बाद वैदिक छंदःशास्त्रका पर्याप्त विकास हुआ है। आठ अक्षरोंके अनुष्टुप छंदसे आगे अनेक प्रकारके छंद बनते गये हैं। अनुष्टुप् यह सबसे छोटा और सरल छंद है। कुछ विद्वानोंका कहना हैं कि यह छंद भारतीय संस्कृति और धार्मिक साहित्यका हृदय है। पिंगलाचार्य अथवा पिंगलनागके छंदःसूत्रोंको प्राचीन छंदःशास्त्र माना जाता है। इसमें प्राचीन वैदिक छंद और अन्य लौकिक छंदोंका विचार किया गया है। इसके बाद काव्य कालमें प्रथम प्रथम यही आर्ष छंद लिये गये हैं। किंतु इस समय इसमें कुछ सुधार भी किये गये हैं। जैसे अनुष्टुपका पांचवा अक्षर लघु हो । छठा दीर्घ हो आदि ! त्रिष्टुभ जगती आदिमेंसे कुछ अन्य छंदोंका अथवा इन्हींकी शाखाओंका विकास हुआ। कालिदासादि महाकवियोंने अपने काव्योंमें वैदिक वातावरण साकार करनेके लिये त्रिष्टुभ आदि छंदोंका उपयोग किया है। इन्हीं वैदिक छंदोंमेंसे कुछ वृत्तोंका विकास हुआ जैसे वैदिक अनुष्टुपमेंसे विद्युन्माला अथवा त्रिष्टुभमेंसे इंद्रवज्रा आदि। आगे काव्य-नाटककी दृष्टिसे भरतमुनिने इसका विचार और विकास किया। आगे अनेक लोगोंने छंदःशास्त्र लिखा। भारतकी विविध भाषाओंमें अनेक विद्वानोंने उन उन भाषाओंके छंद-शास्त्र पर पुस्तकें लिखी हैं। जैसे कन्नडके प्रा. कर्की मराठीके प्रा. माधवराव पटवर्धन, हिंदीके प्रा. पुत्तुलाल शुक्ल, गुजरातीके प्रा. नारायणभाई पाठक, बंगळके श्री. मोतीलाल मुजुमदार आदि विद्वानोंने इस पर खूब विचार विमर्श किया है। अर्थात् इ० पू० ४०००-६००० वर्षोंसे आज तक इस शास्त्रका विकास होता आया है और इन सभी छंदोंमें— गायत्री— महान् है । वेदके सात विशिष्ट छंदोंमें वह पहला है। गायत्रीका अर्थ वाणीकी रक्षा करनेवाला ऐसा होता है। गायत्रीका और एक अर्थ “गानेवालेका गाना” ऐसा भी होता है। शतपथ ब्राह्मणमें “कृतकृत्य भावसे पृथ्वी गाने लगी तभी उसे गायत्री कहा गया!” ऐसा कहा है। ऐतरेयब्राह्मणमें “गायत्री सुवर्णपक्षिणीका रूप लेकर स्वर्गसे सोम लायी” ऐसा लिखा है। गायत्री छंदके तीन चरण होते हैं। प्रत्येक चरणमें आठ अक्षर होते हैं। इसलिये इसे “अष्टाक्षरी गायत्री” भी कहते हैं। कभी कभी गायत्रीके उच्चारके पहले प्रणवोच्चार करनेकी भी परिपाटी है। ऋग्वेदमें २४६७ मंत्र इस छंदमें हैं। सामान्यतया अग्नि सूक्त इसी छंदमें हैं। ऋग्वेदका महान गायत्री मंत्र इसी छंदमें हैं। वह मंत्र हिंदीमें गायत्री छंदमें ऐसा होगा। वरणीय तू सविता तेज दे अवर्णनीय। उद्बोधन कर धी को ॥ गायत्री मंत्रके प्रथम ओंकारका उच्चार होता है तथा “भूर्भुवस्स्वः” कहा जाता है। उपनयनमें गायत्री मंत्रका उपदेश दिया जाता है। गीता अ० १०, श्लो० ३५-में मार्गशीर्ष मासोंमें— लोकमान्य तिलकजीने गीतामें भगवानने मैं मार्गशीर्ष मासोंमें ऐसे क्यों कहा है? इसका विचार करते हुए ओरायनमें लिखा है “आजसे ६०००-८००० वर्ष पूर्व मार्गशीर्षसे वर्षारंभ होता था। तथा मार्गशीर्षमें वसंत ऋतु आता था।” हजारों वर्षोंकी इस कालावधीमें ऋतु मानमें पर्याप्त ज्ञानेश्वरी ५५

परिवर्तन होगया है। संभव है कि गीता युगमें इसका स्मरण रहा हो और भगवानने पूर्व परंपराके अनुसार वर्षारंभके मासको महत्व देकर "मैं मार्गशीर्ष मासोंमें" ऐसे कहा हो। गीता अ० १०. श्लो० ३५-ऋतूमें कुसुमाकर- ऋतु छ हैं और सौर-मासको ऋतु कहते हैं। इन ऋतुओंको (१) वसंत (२) ग्रीष्म (३) वर्षा (४) शरद् (५) हेमंत (६) शिशिर ऐसे नाम हैं। चैत्र-वैशाख वसंतऋतु ! ऐसी इनकी गणना होती है। वर्षके विविध मौसम इस अर्थमें ऋतु शब्द ऋग्वेदमें भी कई बार आया है। किंतु ऋग्वेदमें केवल तीन ऋतुओंकी कल्पना है। चार महीनेका एक ऋतु। वसंत ग्रीष्म शरद् ये उनके नाम हैं। आगे चल कर पांच और छ ऋतु हो गये। ऋग्वेदमें भी वसंत मुख्य ऋतु ऐसे स्वतंत्र रूपसे कहा गया है। तैत्तिरीय ब्राह्मणमें संवत्सरको एक पक्षी मानकर उसका शिर वसंत। ग्रीष्म दहिना पंख। वर्षा है पुच्छ। शरद् बायां पंख। हेमंत है मध्य। ऐसा वर्णन किया है। अर्थात् संवत्सरका शीर्षस्थ वसंत विभूति कही गयी है ! गीता अ० १०. श्लो० ३५-द्यूत मैं छलियोमें हूं- धोखे बाजीमें, धूर्तताके व्यवहारमें भी चातुरी होती है। बुद्धिकी चमक होती है। और जूआ या द्यूत इसका आदर्श है। यह अत्यंत प्राचीन खेल है। इसको द्यूत-क्रीडा कहते हैं। इस खेलके लिये अलग स्वतंत्र स्थान होते थे। जिन्हे द्यूत-सभा कहा जाता था। आज भी जूएके अड्डे स्वतंत्र होते हैं ! जुआरी लोग वहां जमते हैं। पहले इसके प्रमुखको "सभिक" कहते थे। जैसे द्यूतक्रीडा अत्यंत प्राचीन-कालसे चली आयी है वैसे ही "द्यूत-क्रीडा बुरी है!" यह भावना भी ऋग्वेद कालसे देखनेको मिलती है। ऋग्वेदका "कवष ऐलूष" नामका ऋषि द्यूत क्रीडाकी अनेक बुराइयोंका वर्णन करके द्यूत-क्रीडा त्याग कर खेती करनेका संदेश देता है। द्यूत-क्रीडाकी बुराई कहते समय "उनके हाथ नहीं किंतु जिनके हाथ हैं ऐसे पुरुषोंको वे निकम्मा बनाता है। दीन बनाता है। वह हाथको शीतल लगता है किंतु कलेजा जला देता है !" ऐसे कहा है। मनुस्मृतिमें द्यूतको अठारह निषिद्ध व्यसनोंमें एक गिना है। वहां विनोदके लिये भी द्यूतका निषेध किया है। भारतके प्राचीन साहित्यमें अक्ष-क्रीडा द्यूत-क्रीडा नामसे जूएका विस्तृत वर्णन है। साथ ही साथ इससे जिनका सर्वनाश हुवा उनका हृदयद्रावक वर्णन भी। द्यूत यह प्रभुका विनाशकारी छलनामय विभूति है अवकृपाका द्योतक ! गीता अ० १०. श्लो० ३७-वासुदेव, धनंजय परिशिष्ट पहलेमें-देखिये- गीता अ० १०. श्लो० ३७-व्यास मैं मुनियोंमें हूं- मुनि मनन करनेवाले। चिंतन मनन करके मूलभूत सिद्धांत तक जानेवालोंको मुनि कहा गया है। इन मुनियोंमें बादरायण व्यास सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। व्यास-पराशर सत्यवतीका पुत्र। पराशर वसिष्ठऋषीका पोता। इस लिये व्यास वसिष्ठ-कुलका था। इनका जन्म यमुना द्वीपमें हुवा था। इसलिये इनको द्वैपायन अथवा द्वैपायन व्यास कहते हैं। कृष्ण द्वैपायन भी कहा गया है। साथ साथ इनका जन्म बोरीवनमें हुवा था सो बादरायण भी कहा गया है। इनके गुरुका नाम विष्वक्सेन। इन्होंने सत्य शब्द पर विचार किया है। ७९ परिशिष्ट ३

इन्होंने वेदोंका संहितीकरण किया। भारतकी रचना की। हरिवंश लिखा। ब्रह्मसूत्र लिखे। सारे पुराण इन्होंने लिखे ऐसा कहते हैं। किंतु विद्वानोंका मत है यह गलत है। पुराण अर्वाचीन हैं। शुक और सूत इनके शिष्य। शुक इनका पुत्र ही था। दीर्घ तपस् नामका भी एक पुत्र था। इनके अनेक शिष्य थे। इनकी शिष्यपरंपरा भी उदण्ड है। इनकी शिष्यपरंपराने वेदकी अन्यान्य शाखाओंका संपादन किया है। व्यासने वैशंपायनको यजुर्वेद सिखाया था। वैशंपायनने यजुर्वेदकी अनेक शाखाओंकी रचना करके उनको अन्यान्य शिष्योंको दे दिया। जिससे वे पाठांतरसे उन उन शाखाओंकी रक्षा करें। याज्ञवल्क्याय वैशंपायनका शिष्य है। इनका ऋग्वेदका शिष्य पैल है। इन्होंने ऋग्वेदकी दो शाखाएँ करके अपने सात शिष्योंको दीं। जो पाठांतरसे शिष्यपरंपरा निर्माण करके वेदकी रक्षा करें। वैसे जैमिनी भी वेदव्यासका शिष्य है। जिन्होंने सामवेद वेदव्याससे पाया और अपने पुत्र और शिष्योंको इसकी शाखायें दे कर सामवेदकी रक्षा की। जैमिनीने धर्म-शास्त्रके विषयमें अध्ययन करके पूर्व-मीमांसा लिखी है। जैमिनीके धर्मसूत्र आज भी धर्म-कर्मका निर्णायक ग्रंथ है। जैमिनीने पांडवोंके अश्वमेधके विषयमें लिखा है जिसे जैमिनी भारत कहते हैं। अथर्ववेदका व्यासशिष्य सुमंतु है। सुमंतूने भी अपनीशिष्यपरंपराको अथर्ववेद दिया। इनके ब्रह्मसूत्र अत्यंत प्रसिद्ध हैं। इसमें चार अध्याय सोलह पाद पांच सौ पंचावन्न सूत्र हैं। ये सूत्र सभी उपनिषद् वाक्योंका, तथा सिद्धांतोंका सार है। भारतके चारों महान आचार्य जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य, श्रीरामानुजाचार्य, श्रीमध्वाचार्य, तथा श्रीवल्लभाचार्यने इन सूत्रों पर भाष्य लिखा है। श्रीमध्वाचार्यके भाष्यमें अपने पूर्ववर्ती एकवीस भाष्यकारोंके नाम दिये हैं। ब्रह्म-सूत्र भारतीय दर्शन-शास्त्रका अजोड ग्रंथ है। इनके जीवनका अध्ययन करते समय ऐसा लगता है कि इनका शिष्य समूह इतना अधिक था उनको अन्न वस्त्र देना भी व्यासके लिये एक बडी समस्या बन जाती! अन्यान्य पुराणोंमें इनके शिष्योंकी नामावली देखनेको मिलती है तभी पुरानी पोथियोंमें लिखा है। बिना चार मुखका ब्रह्म दो हाथका यह है हरि। भाल लोचन बिना शंभु भगवान बादरायण ॥ गीता अ० १०. श्लो० ३७—कवीमें मैं उशना कवि— संस्कृत कवि शब्दका अर्थ सर्वज्ञ, दृष्टा ऐसा होता है। कु धातुको इ प्रत्यय लग । कर यह शब्द बना है। "कु" का अर्थ विश्व, व्यास, आकाश । "कवि" को श्रुतिमें मनीषी, परिभूः, स्वयंभूः ऐसे विशेषण दिये हैं। अर्थात जो अपने दृष्टि-पथमें, अथवा अनुभवमें सारे विश्वको अथवा ब्रह्मांडको समालेता है, इस अनुभवके लिये दूसरों पर, या बाह्य साधनों पर निर्भर न हो कर अपने परही निर्भर रहता है तथा जो अपनेमें, आपसे, आप ही सारे विश्वका अनुभव करता है वह स्वयंभूः है! इसी लिये वह भाव-सृष्टिका सम्राटन बनता है। कविके अनुभव परावलंबी नहीं निरालंब हैं। वह दृष्टा है; सारे विश्वको वह अपनेमें देखता है। अपने हृदयको सारे विश्वका केंद्र बिंदु मान कर विश्वसे समरस हो कर काव्य-रचना करता है। इसी अर्थमें ऋषी शब्द भी आया है। कविको क्रांत-दर्शी कहा गया है। मानो वह काव्य-सृष्टिका प्रजापति है। अपने काव्यमें ज्ञानेश्वरी ५०

वह वही विश्व निर्माण करता है जो उसके हृदयमें होता है। सूर्य-प्रभा बाह्य विश्वको प्रकाशित करती है, तो कवि-प्रतिभा विश्वके अंतर तमको उजलाती है। इस अर्थमें काव्य सारी विद्याओं अथवा शास्त्रका सार तत्व है ! कविको अपने काव्यमें व्यक्ति, विश्व, विश्व-शिल्प और उसके शिल्पीको मूर्तिमान करके सामूहिक साक्षात्कार करना और कराना होता है। श्रुतिमें ब्रह्माको आदि कवि माना है अर्थात् यह कविका लौकिक रूप है। ऐसे कवियोंमें उशनाकवि अग्निका दूत है। वह असुरोंका कुलगुरु । वारुणी भृगु इसका पिता। पुलोमा माता। इसका काव्य उशना काव्य। काव्य और कवि एक हैं। उशनाका दूसरा नाम शुक्र है। इसकी माताको कहीं कहीं ख्याती भी कहा गया है। इसकी अनेक पत्नियां थीं। यह संजीवनी विद्याका ज्ञाता। कई सूक्तोंका द्रष्टा। इसने अपनी संजीवनी विद्यासे मृत माता, तथा प्रिय शिष्य कचको पुनर्जीवन दिया। इसीने सुरापानका निषेध किया। यह महान् राजनीतिज्ञ था। कौटिल्य अर्थ-शास्त्रमें स्थान स्थान पर इसके राजनीति शास्त्रका उल्लेख है। धर्मशास्त्र पर भी इसका ग्रंथ है ! उशना कवि और शुक्राचार्य एक हैं। गीता अ० १०, श्लो० ३८-दंड में दमवंतोंका- मानवी समाज जंगली अवस्थामेंसे विकसित होता आया है। नीति नियमोंकी दीर्घ परंपरासे वह सुसंस्कृत बना है। किंतु भारतीय समाज ज्ञात-इतिहासके पूर्वकालसे ही सुसंस्कृत था। किसी भी समाजकी संस्कृतिका दर्पण उसकी नीति है। नीति यह शब्द नी=आगे ले चलनेवाला इस अर्थका द्योतक है। और “दम” इसका आधार है। मनोनियह इस शब्दके अर्थमें “दम” शब्द आया है। समाजको सबके हितकी दृष्टिसे आगे बढनेके लिये ही नहीं सिर उठाकर स्थिर रहनेके लिये भी दमकी आवश्यकता है। अपनेको संयत रखनेकी आवश्यकता है। समाजको स्थिर रूपसे आगे बढानेवाले विचारोंको नीति कहते हैं। इस नीति शास्त्रमें अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राज्यशास्त्र, जीवनशास्त्र, तथा अध्यात्मशास्त्रका समावेश होता है। और इन सभी शास्त्रोंको एक न एक रूपसे “दम” अपनेको “संयत” रखनेकी आवश्यकता है। इंद्रियनिग्रह, मनोनियह, अनुशासन, आदि शब्दोंसे भिन्न भिन्न शास्त्रोंमें इसका विवेचन किया है। व्यक्ति, कुटुंब, जाति, वर्ग, राष्ट्र ये समाजके घटक हैं। साथ साथ सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि क्षेत्रोंमें सामूहिक उत्थानके लिये कुछ संस्थाएँ भी बनी होती हैं। इन सबमें परस्पर विरोध आनेके पहले सबका, सामूहिक और अविरोधी विकासके साधनीभूत जो गुण है, उसको “दम” कहते हैं। इस दमके दो रूप हैं। एक विवेकसे स्व-निर्मित दम, स्वानुशासन । दूसरा संस्था, समाज, राज्यादिकी ओरसे किया गया शासन । स्वानुशासनमें “दंड” प्रायश्चित्त रूप है तो परानुशासनमें सजाके रूप ! अर्थात् दममें दंड अनिवार्य है। दम और दंड समाज-धारणाके लिये अनिवार्य हैं। नीतिशास्त्रका अध्यात्मशास्त्र प्रत्येक व्यक्तिको स्वानुशासित करता है। अध्यात्मशास्त्रका अर्थ ही आत्मानुशासन है ! इसको वहां “संयम” कहा गया है। चित्तवृत्तिके निरोधको ही योग कहा गया है। इंद्रिय-निग्रहको तप कहा गया है। अथर्ववेदमें पुत्रको पित्रव्रतका पालन करना चाहिए, माताकी आज्ञा माननी चाहिए, बहनको भाईका द्वेष नहीं करना चाहिए, पत्नीको पतिसे मधुर बर्ताव करना चाहिए आदि शब्दोंमें संयम सिखाया गया है। और इस “दम” के पालनके लिये “दंड” रखा। अध्यात्म-क्षेत्रमें वह प्रायश्चित्त है। राजनैतिक शास्त्रमें दंड। दंड अनुशासन शक्ति है। इस दंडके विषयमें हमारे ८१ परिशिष्ट ३