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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

कहलाता है । (३) चित्त शुद्धि करके चिंतन शक्तिद्वारा निर्वृत्त चित्तमें समाधिमें लीन होकर आत्मसाक्षात्कार करना ध्यानयोग अथवा राजयोग कहलाता है । (४) बुद्धि शक्तिद्वारा अपने आपको जानकर उसीमें लीन होना ज्ञानयोग कहलाता है । (५) और भाव शक्तिद्वारा आत्मासे निष्काम और निःसीम प्रेम करके तद्रूप हो जाना भक्तियोग । ये पांच महान योग हैं । इसके अलावा जप-सातत्यसे अपनेमें उठनेवाली शब्दतरंगोंद्वारा जीवन शुद्ध करते करते शब्द ब्रह्ममें लीन हो जाना जपयोग कहलाता है । तथा अनेक प्रकारसे कुंडलिनी शक्तिको जगा कर तद्द्वारा आत्मदर्शन करना कुंडलिनी योग कहलाता है । इन सभी योग साधनामें यम-नियम हित-मित आहार विहार, सतत ध्येय निष्ठा साधना, चिंतन और प्रयोग, स्वाध्याय आदिकी समान आवश्यकता है । बिना इसके कोई योग संभव नहीं है । योगशब्दका धात्वर्थ जुडना है । कर्म करते करते स्वरूप लीन होना हो, अथवा चित्तवृत्ति निरोधसे स्वरूपमें लीन होना हो या भगवद्चिंतन करते करते स्वरूपमें लीन होना हो सब एक है । याज्ञवल्क्य ऋषिने “ जीवात्मपरमात्मसंयोग ही योग” कहा है । किंतु जहां दो तत्व नहीं है एक ही तत्व है वहां कौन किससे जुडेगा ? यह प्रश्न उठता है । इस प्रश्नका उत्तर देते समय अद्वैतानुभवी कहते हैं “योगका अर्थ चित्तकी निरुद्धावस्थामें स्फुरणरूप बिंबका अनुभव करना योग है !” किसी किसीने योगको मनोलय कहा है । योगमें प्राप्त समाधिका वर्णन करते समय अद्वैतावस्थाका सुंदर विवेचन किया हुवा मिलता है । पातंजल योगसूत्रोंमें कहे गये समाधिप्रकारोंके अलावा भी अन्य योग-ग्रंथोंमें अन्य अनेक समाधि प्रकार कहे गये हैं । अन्यान्य योग प्रकारोंके विवेचन इसी ग्रंथमें पाठक देख सकेंगे । रस—रस दो प्रकारके हैं । एक षड्रस दूसरा नवरस । षड्रस विषय पंचकका एक विषय है । वह रसनेंद्रिय-ग्राह्य है । रसनेंद्रिय ग्राह्य षड्रस हैं मधुर=मीठा, आम्ल=खट्टा, लवण= नमकीन, कटु=तीखा, कषाय=कसैला, तिक्त=कडुवा । ये षड्रस रसनेन्द्रियके विषय हैं। ऐसे ही साहित्यमें नवरस कहे गये हैं । ये अंतःकरणकी वृत्तियोंके कारण अंतःकरणसे अनुभव किये जाते हैं । रसका अर्थ अंतःकरणकी टीस । अंतर्मनका खिंचाव अथवा चाह भी कह सकते हैं जो उसके अनुकूल परिस्थितिमें जैसे साहित्यवाचन, दृश्यदर्शन, कथा श्रवणादिसे-उद्दीपन होते हैं । ये रस नौ हैं । शृंगार, वीर, करुणा, अद्भुत, हास्य, भयानक, बीभत्स, रोद्र और शांत । इन रसोंके स्थायीभाव भी और होते हैं । राग-द्वेष—योगशास्त्रमें इन दो शब्दोंकी परिभाषा करते समय कहा गया है “सुख दायक बातोंका चिंतन, उस विषयक लोभ तथा आसक्ति राग है तो दुःख दायक बातोंके चिंतनसेद्वेष ” उत्पन्न होता है । राजयोग—अष्टांगयोग इस शब्दके विवेचनमें इसका बाह्यविवेचन आया ही है । यहां कुछ अंतरंगका दर्शन करना है । शरीरमें स्थित अणुमय पिच्छक्ति पर अपना स्वामित्व रख कर अनंत पिच्छक्तिसे समरसैक्य अनुभव करना इस योगका उद्देश है । जिस ब्रह्मको आदि मध्य अंतमें कहीं द्वैतका स्पर्श भी नहीं होता वही विजन है । विजनका अर्थ “एकांत स्थान ।” जो साधनाका धरातल है । इस धरातल पर सभी भूतमात्रोंका जो जो अधिष्ठान है तथा सभी सिद्ध पुरुष जहां लीन होते हैं वह “सिद्धासन” डालकर योगारंभ होता है । सारे विश्वके मूलमें जो ज्ञानेश्वरी १८६

· ब्रह्म है, उसमें चित्तको लीन करना "मूल बंध" है। सर्व बाह्य ब्रह्ममें सतत क्षोभ करना "शरीरकी अचलावस्था" है। ज्ञान दृष्टिसे सब ही ब्रह्ममय देखना "दृष्टि स्थिरता" नासिकाग्र दृष्टि है। सभी वृत्तियों पर स्वामित्व रखना "प्राणायाम" है। संसारका निषेध "रेचक" है और "निरंतर अहं ब्रह्मास्मि भाव कुंभक" अन्य विषयोंको त्याज्य मानकर "चैतन्यमें लीन रहना प्रत्याहार" है। जहाँ जहाँ मन दौड़ता है वहां वहां सब ब्रह्मदर्शन करना "धारणा" तो मैं ब्रह्म है इस वृत्तिका भी लोप "ध्यान" है। तथा सारी वृत्तियोंको लय करके ब्रह्म बनकर "मैं ब्रह्म हूँ" इसको भी भूलकर "केवल ब्रह्म ही रहना समाधि" है। आद्य शंकराचार्यने अपनी अपरोक्षा- नुभूतिमें राजयोगका यह अंतरंग दर्शन कराया है।

वर्णव्यवस्था — वर्णव्यवस्था भारतकी प्राचीनतम समाज-व्यवस्था अथवा समाज संघटन- पद्धति है। बृहदारण्यक उपनिषदमें "भूमि पर जो वर्ण-व्यवस्था है वह स्वर्गीय वर्णव्यवस्थाका प्रति- बिंब" कहा गया है तो ग्रीक तत्ववेत्ता प्लेटो कहता है "इस विश्वकी जो जो वस्तु है, व्यवस्था है, वह अत्यंत सूक्ष्मतम उच्च सृष्टिकी प्रतिकृति है !" गीतामें "स्वाभाविक गुण-कर्मके कारण मैंने वर्णव्यवस्था की है" ऐसा कहा है तो इससे प्राचीन पुरुषसूक्त वर्णव्यवस्थाका रहस्य कहता है। बृहदारण्यकमें यह भी स्पष्ट कहा है राजसूयज्ञ-यज्ञमें "ब्राह्मणोंको क्षत्रियोंसे नीचे बैठना चाहिए !" केवल भारतीय तत्त्वज्ञोंने ही समाज-व्यवस्थाके रूपमें वर्ण व्यवस्था मान्य की है ऐसे नहीं हैं किंतु यूनानके प्राचीन तत्त्वज्ञोंने भी इसका स्वीकार किया है। पाथेयगोरास यूनानका एक श्रेष्ठ और उच्चकोटीका तत्वज्ञ है। विद्वानोंने इसका काल ई. पूर्व ५८६-५०६ माना है। इसके संप्रदायका काल यूनानमें धर्मके पुनरुत्थानका काल। इनकी असामान्य बुद्धिमत्ताके कारण जनतापर भी इसका असामान्य प्रभुत्व था। पाथेयगोरास पंथके "डेलिअन" भारतके ब्राह्मणकी भांति त्यागप्रधान फकीर दीखते हैं। इनके विचारसे जीवन तीन प्रकारका होता है। पहला शास्त्रीय पंडितोंका-थिओरा विकल- लायक दूसरा व्यवहार-निपुणोंका-प्रैक्टिकल लायक-तीसरा विलासियोंका-अपॉलस्टिक लायक। इनका डेलिअन लोग इससे भिन्न हैं। यहाँ गीताके "चार वर्ण सृजे मैंने गुण-कर्म विभागसे" का उद्धरण • दे सकते हैं। इसके अलावा दूसरा प्रसिद्ध ग्रीकतत्त्वज्ञ प्लेटो भी-ई. पू. ४२७. ३ ७-अपने रिपब्लिकनमें समाजके सद्गुणोंके विषयमें लिखते समय समाजके लोगोंके तीन वर्ण विभाग करता है। १ शासकवर्ग, ज्ञान, चातुर्य, यह इस वर्गविशेषका गुण, ज्ञानके कारण ये राज्य शासन भली भांति चला सकते हैं। तर्कशुद्ध विचारके कारण समाजपर इनकी सत्ता चलती है। दूसरा शूर षडाउ लोगोंका। धैर्य और उत्साह इस वर्गविशेषका गुण है। तीसरा वर्ग अन्यनागरिकोंका। इनका गुण संयम और अनुशासन। इसके अलावा भी अथेन्स नगरमें और एक वर्ग था जो गुलामोंका था। यहां फिर एक बार गीताके "चार वर्ण सृजे मैंने गुण कर्म विभागसे !" का उल्लेख करना आवश्यक लगता है। साथ साथ अठारहवे अध्यायमें जो इन वर्गोंके कार्योंका विवेचन किया है वह भी उपरोक्त गुणोंसे मिलते जुलते किंतु उससे भी अधिक विवेचक है। न गीता या उपनिषदों की वर्णव्यवस्थाओं या पाथेयगोरास पंथमें या प्लेटोके रिपब्लिकमें, कहीं भी जन्मतः वर्ण अथवा जाति प्रथाकी गंध भी नहीं है जो बादकी विकृति है। यदि पूर्व-ग्रहसे दूषित न हो कर स्वतंत्र रूपसे विचार किया जाय तो वर्ण-व्यवस्था उच्चमत्तम समाज व्यवस्था है जो किसी भी राष्ट्रका राष्ट्र-धर्म बन सके !

(18a) ३८७ परिशिष्ट ५

वाणी—वाणी चार प्रकारकी है । वैखरी, मध्यमा, पश्यंती, परा । इस वाणीके अलग अलग स्थान हैं। पश्यंतीका स्थान है जिव्हा । यह वाणी बोलनेवालेके अलावा दूसरे भी सुन सकते हैं । दूसरा स्थान है कंठ । यहांकी वाणी केवल बोलनेवाला ही सुन सकता है । यह सभी जानते हैं कि मनुष्य अकेला रह कर भी मन ही मन अपनेसे आप बोलता रहता है । यही वाणी मध्यमा कहलाती है । पश्यंतीका स्थान हृदय है । यहां अमूर्त विषय चुपचाप शब्दोंमें गुंथ जाते हैं । विचार यहां रूप लेते हैं । अथवा विचार आकार लेते हैं । वाणीकी यह निराकारत्वसे आकार पानेकी स्थिति है । मनुष्यके भाव, विचार, विकार आदि यहां रूप लेते हैं तभी मनुष्य स्वयं उसको जान पाता है । यह स्थिति पश्यंती वाणी कहलाती है । उसके पहले परावाणी है । संस्काररूपसे जो निराकार भाव पडे रहते हैं और इसका स्थान नाभी है ।

विकल्प—कभी कभी यह शब्द संकल्पके साथ आता है । संकल्पका अर्थ कुछ करनेका निश्चय और विकल्प निश्चय करते समय होनेवाला तर्क वितर्क । संदेह । करनेसे वह काम होगा या न होगाका संदेह और तज्जन्य तर्क विकल्प है । परिणामस्वरूप भ्रम होता है । किंतु अलग अलग दर्शनकारोंने इसके अलग अलग अर्थ किये हैं। योगदर्शनमें विकल्पका अर्थ करते समय “शब्द- मात्रसे जिसका बोध होता है किंतु वह वस्तु कहीं नहीं रहती” जैसे “खरगोशके सींग या बंध्या- पुत्र !” पूर्व.मीमांसा-जैमिनीदर्शनमें, विकल्पका विचार करते समय “दोषमुक्त होने पर अगतिक स्थितिमें जिसका स्वीकार किया जाता है वह !” ऐसे किया गया है । अर्थात् एकके स्थान पर वह नहीं मिलनेसे दूसरेका स्वीकार करना विकल्प है ।

विज्ञान—गीतामें ज्ञान विज्ञान शब्द आया है । गीतामें “विज्ञान सहज्ञान” ऐसा शब्द प्रयोग आया है। ज्ञानका अर्थ केवल बुद्धि नहीं। आत्मानुभवमें बुद्धि पंगु है। आत्मा सर्व ज्ञाता है। इसलिए वह “अज्ञेय” माना गया । सर्व-ज्ञाताको भला कौन जानेगा ? किंतु वह स्वयं अपनेको जानता है न ? ज्ञानेश्वर महाराज उसको “स्व संवेद्य” कहते हैं ! आत्मानुभूति अथवा आत्म- दर्शनसे-मैं ही आत्मा हूँ इसका बोध होनेसे, अपने आपको जाननेसे-उस सर्वज्ञाताका ज्ञान होता है । आत्म प्रकाशमें आत्मदर्शन करना ज्ञान है और आत्मप्रकाशमें विश्वदर्शन करना विज्ञान । इसीको (!) उन्मनी स्थिति कही गयी है। वस्तुतः आत्मा अज्ञेय होकर भी वह अपनी अद्वितीय शक्तिद्वारा अपने आपको जानता है ! अपने आपको जानकर-उस ज्ञान दृष्टिसे-विश्वको जानना “विज्ञान सह ज्ञान” है। प्रांपंचिक ज्ञानके साथ आत्मज्ञान, विश्वके ज्ञानके साथ विश्वात्माका ज्ञान, अथवा ब्रह्मांडके साथ ब्रह्मका ज्ञान विज्ञान सह ज्ञान है। अर्थात् विज्ञानका अर्थ प्रांपंचिक ज्ञान और ज्ञानका चिरंतन आत्मज्ञान है।

विधि-निषेध—सभी धर्मोंमें “यह करना चाहिए” तथा “यह नहीं करना चाहिए” ऐसे कुछ नियम हैं। इसका उद्देश्य “चित्तशुद्धि” है। अर्थात् चित्तशुद्धिकी दृष्टिसे जो करना आवश्यक है वह विधि है तथा चित्तशुद्धिकी दृष्टिसे जो नहीं करना चाहिए वह निषेध है। विधि “क्या कैसा करना चाहिए” यह सिखाती है तो निषेध “क्या क्यों नहीं करना चाहिए” यह सिखाता है। क्या करना क्या न करना, तथा कैसे करना और क्यों करना यह जाननेसे मनुष्य विवेकी बनता है तथा “कार्य अकार्यका व्यवस्थित बोध” होता है। इससे चित्तशुद्धि हो कर वह

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एकाग्र होने लगता है जो किसी भी योगकी पूर्व-पीठिका अथवा साधनाका धरातल है। इसलिए प्रत्येक धर्ममें इस प्रकार विधि निषेध कहे गये हैं। इसीको "धर्मानुशासन" कह सकते हैं। विरक्ति-वैराग्य—योगशास्त्रमें चित्तवृत्ति विरोधके साधन कहते समय "अभ्यास वैराग्यसे उसका निरोध होता है" कह कर "वृत्तियोंका निरोध वैसे ही चित्त शांत रखनेका प्रयास करना ही अभ्यास" कहते हुए "दीर्घकाल तक यह अभ्यास करनेसे वही स्वभाव बनता है!" कह कर "सामने दीखनेवाले ऐहिक तथा शास्त्रोंमें कहे गये पारलौकिक भोगोंके विषयमें मनमें कोई भावना न जगना ही वैराग्य है" ऐसी वैराग्य शब्दकी परिभाषा की है। साथ साथ इस वैराग्यसे भी "पुरुषका-ब्रह्मका-ज्ञान होनेसे गुणात्मक भोगोंकी ओर उदासीन रहना ही श्रेष्ठ प्रकारका वैराग्य है!" ऐसा कहा है। वैराग्यको मोक्षका साधन माना गया है। मोक्षके अन्य साधन भी वैराग्यसे प्राप्त होते हैं ऐसा शास्त्रोंका कहना है। संन्यास-धर्मकी दीक्षाका विचार करते समय "परम वैराग्य ही संन्यासकी परम स्थिति है!" ऐसे कहा गया है। किंतु वैराग्यकी स्थिति जाननेके लिये शास्त्रोंमें वैराग्यके प्रकार भी बताये हैं। मुख्यतया वैराग्यके अपर वैराग्य और पर वैराग्य ऐसे दो प्रकार हैं। उसमेंसे अपर वैराग्यके यतमान, व्यतिरेक, एकेंद्रिय, वशीकर ऐसे उपभेद भी हैं। इस वशीकर वैराग्यके मंद, तीव्र, तीव्रतर ऐसे तीन प्रकार हैं। मनु स्मृतिमें कहा गया है :— वैराग्य मनमें आता विश्वके सब वस्तुसे । तभी संन्यासकी सिद्धि न तो पतन निश्चित ॥ इसलिये विश्वके सभी वस्तुओंसे उनके भोगोंसे मन उदासीन होना चाहिए यही वैराग्य है। सब प्रकारके वैराग्यमें जो उत्कृष्ट तथा उत्कट प्रकारका वैराग्य है उसको परा-वैराग्य कहा है। ऐसे परा वैराग्ययुक्त मनुष्यको "परमहंस" दीक्षाका अधिकारी माना गया है। "परमहंस सदैव आत्मलोक या ब्रह्मलोकमें रहता है" ऐसा शास्त्र कहते हैं अर्थात् वह सदैव सर्वत्र ब्रह्म-चिंतनरत रहता है। उनके चिंतनमें ब्रह्मके अलावा और कुछ नहीं आ सकता। यही वैराग्यका अंतिम उद्देश्य है! विषय—पांच ज्ञानेंद्रियोंसे मनको जो अनुभव आता है उसको विषय कहा गया है। पांच ज्ञानेंद्रियोंके पांच विषय हैं। कानोंके शब्द, आंखोंके रूप, जिव्हाके रस, त्वचाके स्पर्श तथा नाकके गंध। वस्तुके ज्ञानके लिये इन इंद्रियोंकी आवश्यकता है। इसलिये इन्हें ज्ञानेंद्रिय कहते हैं। किसी वस्तुका ज्ञान करा देना मात्र इनका काम है। किंतु इंद्रियां इतना ही न करके "अपेक्षा करती हैं!" कान शब्दके लिये, आंख रूपके लिये, जिव्हा रसके लिये, त्वचा स्पर्शके लिये, नाक गंधके लिये "तरसने" लगते हैं। इस "तरसनेकी क्रियाको वासना मानकर "विषयवासना" अनुचित" कहा गया है। इंद्रियोंको कुछ प्रिय तथा कुछ अप्रिय लगता है। किंतु "प्रियाप्रियसे तटस्थ" रहकर विषयका ज्ञान मनको सौंपना इंद्रियोंका कार्य है। यह विरक्तिसे संभव है। इंद्रियोंका अपने अपने विषयोंके लिये तरसना, उनमें लिप्त हो कर प्रियाप्रियको अनुभवना आदिसे विषयोंका सही ज्ञान न होकर आत्मविस्मृति होती है। इंद्रिय-सुख ही महत्त्व-सा हो जाता है और उससे ऊंचे प्रकारके सुखका बोध नहीं होता। इसलिये इंद्रियनिग्रह कहा गया है। यह विषयोंका निषेध नहीं, किंतु विषयोंका सही ज्ञान होनेका साधन है। शब्द-ब्रह्म—शब्द आकाशमें रहता है और कानोंसे ग्रहण होता है। वह ध्वनिरूप और वर्णरूप रहता है। मिटे हुए ओंठ खुलते ही ध्वनिरूप शब्द "प्" बन कर वर्णरूप हो जाता १८९ परिशिष्ट ५

है । ध्वनि निकलते ही दश दिशाओंमें उसके दलों शब्द बन जाते हैं, नाकासमेंसे निकला हुआ ध्वनि आकाशमें विलीन होनेतक उसके कई शब्द बन जाते हैं । आकाशमें निकला हुआ ध्वनि तरंगोंके परस्पर संघातसे स्थूल अर्थ प्रेरक तथा सूक्ष्म भावोत्पादक शब्द बनते हैं । भाषा शास्त्र कहता है "सभी भाषाएं ऊपरी हैं । स्थूल हैं। किंतु जिसका वाच्य वाचक भाव स्वयंभू है ऐसी एक सहज भाषा है जिससे पशुपक्षियोंका हद्गत भी जान सकते हैं !" शब्दोंकी इस सूक्ष्म शक्तिके कारण उन्हे स्वतः प्रमाण माना है । आकाश तत्वसे पृथ्वी तक सूक्ष्म रूपसे शब्द समाया हुवा है ! वह सूक्ष्म शब्द-नाद-उत्तरोत्तर स्थूल होते होते भाषाका रूप धारण करता है । यदि मनुष्य अपने श्रवणेद्रियोंको सूक्ष्म बना लेता है तो विश्वाकाशके इन सूक्ष्म तरंगोंको भी सुन सकता है । ऋग्वेदमें इसको कहा गया है । "पहले इस ओरकी-नामरूपसे संबंध जुडी हुई-भाषा सिखाई जाती है । किंतु इसके-इस भाषाके-उस ओरकी भाषा अत्यंत गूढ और श्रेष्ठ होती है वह दिव्य वाणी, जैसे पतिव्रता स्त्री अपने पतिको निरावृत्त हो कर अंगांग दिखाती है वैसे विश्वका रहस्य खोलकर दिखाती है !" भाषा इन्ही सूक्ष्म शब्द तरंगोंका स्थूल रूप है, मानो निराकार शब्दब्रह्मका साकार उपास्य देवता है । इसीलिये प्राचीन ऋषियोंने कहा है "मनुष्यको बोलते समय विचार पूर्वक बोलना चाहिये । उसके शब्दतरंग आकाशमें सदैव रहते हैं जो हजारो सालके बाद भी कोई सुन ले !!" "शब्द एक महान शक्ति है। ब्रह्म शक्ति है। विचार पूर्वक उसका उपयोग करना चाहिए !" आकाश स्थित नाद लहरियोंके कारण ध्वनि लहरियोंका उलझकर एक रूप लेकर बनी हुई प्रतिमा ही शब्द है ! किसी भी मनुष्यके शब्द मानो उस मनुष्य द्वारा बनाई गयी प्रतिमा है ! मनुष्यको विवेकपूर्वक ऐसी प्रतिमा बनानी चाहिए । हो सकता है "शब्दमें सुप्त शक्तिके कारण उस प्रतिमाका अंतर्देह जागृत हो, जिसका सामर्थ्य वह रूप देनेवाले व्यक्तिसे अनंत गुणा अधिक है।" इससे वह शब्दप्रतिमा बनानेवालेको ही निगल जाय ! शिव-शक्ति—ज्ञानेश्वर नाथपंथी हैं । शिव-शक्ति सामरस्य नाथपंथकी अंतिम स्थिति है । शिवशक्ति दो तत्व नहीं हैं किंतु एक ही तत्वके दो पहलू हैं। जैसे दक्षिण और उत्तर ध्रुव एक ही पृथ्वीके दो छोर हैं । शिव-शक्ति विवेचनमें ज्ञानेश्वर महाराजने स्वर्ण और उसके गहने, कर्पूर और उसकी सुगंध, गुड और उसकी मिठास आदि उपमाओंसे इन दोनोंका संबंध बताये हैं । शिवशक्ति सामरस्यको ज्ञानेश्वर महाराज महायोग मानते हैं । सहज समाधि-द्वारा मनोन्लय करके इस सामरस्यका अनुभव लेना ही मुक्तावस्था है । शिवमें शक्ति और शक्तिमें शिव निहित है । इसका समरसैक्यानुभव ही अमृनानुभव है जो जीवनका एक मात्र उद्देश्य है । षट्चक्र—योग-शास्त्रके अनुसार मनुष्यकी रीडमें सुषुम्ना नाडीकी राहमें मूलाधार चक्रसे आज्ञा-चक्र तक ज्ञानतंतुके छ चक्र अथवा कमल हैं जिनकी पंखुडियां हैं । योग-शास्त्रमें इन चक्रोंका अत्यंत महत्व है । ये चक्र अथवा कमल कुंडलिनीके स्पर्शसे खिलते हैं । नहीं तो बिना खिले ही रहते हैं । इन छ चक्रोंमेंसे पहला चक्र मूलाधार कहलाता है, इसको आधारचक्र भी कहा गया है । शिश्न और गुदाकी सीवनमें पिछली ओर रीडके निचले छोर पर इस चक्रका स्थान है । इसका रंग लाल और पंखुडियां चार हैं । वैसे ही प्रत्येक चक्रका देवता होता है । उसके बीज भी ज्ञानेश्वरी १९०

होते हैं। मंत्र भी होते हैं। कुंडलिनी इसी चक्रमें सुप्तावस्थामें रहती है। इस चक्रकी देवता गणपति है और यं, शं, सं, षे बीज हैं। दूसरा चक्र स्वाधिष्ठान कहलाता है। इसको लिंग चक्र भी कहा गया है। यह लिंगके पीछे रीढमें सुषुम्ना नाडीके रास्ते पर है। इसका रंग पीला है। इसकी छ पंखुडियां हैं। ब्रह्मा इसका देवता और बं, भं, मं, यं, रं, लं, इसके बीज हैं। तीसरा चक्र मणिपुर कहलाता है। इसको नाभिचक्र भी कहते हैं। यह नाभि स्थान पर किंतु पीठकी रीढमें सुषुम्नाके रास्ते पर आता है। इसका रंग नीला है। इसकी दस पंखुडियां हैं और इस चक्रका देवता विष्णु है। इसके बीज डं, ढं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, पं, फं ये हैं। हृदयके स्थान पर पीछे सुषुम्नाके मार्ग पर अनाहत चक्र है । इसका रंग शुभ्र है। इसकी बारह पंखुडियां हैं। तथा शंकर इसका देवता है। इस चक्रके बीज हैं कं, खं, गं, घं, ङं, चं, छं, जं, झं, ञं, टं, ठं। इसीमें से अतींद्रिय अनाहत ध्वनि निकलती है। पांचवा चक्र कंठमणिके स्थान पर पीछे रीढमें है जो विशुद्धचक्र कहलाता है। यह धूम्रवर्ण, सोलह पंखुडियोंका है। जीवात्मा इसका देवता है और अं, आं, इं, ईं, उं, ऊं, ऋं, ॠं, लृं, लूँ, एं, ऐं, ओं, औं, अं, अः इसके बीज हैं। छठा चक्र आज्ञाचक्र कहलाता है। इसको अभ्रिचक्र भी कहा गया है। यह दो भौंके मध्य रीढमें पीछे सुषुम्नाकी राहमें है। इसकी दो पंखुडियां हैं। हं, क्षं इसके बीज हैं। गुरु इसकी देवता है। यहींसे गुरु आज्ञा साधक पर प्रभाव डालती है। अथवा उपनिषदके अनुसार शिष्यकोशिष्यत्वको- निःशेष कर उसको अपने जैसे बना लेती है। कुंडलिनी इन सभी चक्रोंका भेदन करके मूलाधारसे ब्रह्मरंध्र तक जाती है। योग साधनामें “बीज” का अत्यंत महत्त्व है। अलग अलग प्रकारके बीज जपके समय अलग अलग प्रकारके स्पंदनजन्य तरंग उठते हैं जो शरीरके भिन्न भिन्न स्थानको प्रभावित करते हैं। वैसे ही भिन्न भिन्न प्रकारके तरंगप्रवाह भिन्न भिन्न नाडियोंको प्रभावित करते हैं या भिन्न भिन्न नाडियोंको शुद्ध करते हैं। इससे अनायास और अज्ञात रूपसे मानसिक विकास और चित्तशुद्धिमें सहायता मिल सकती है। इनके अलावा भी अन्य अनेक बीज हैं और उन बीजोंमें विचार शक्ति निहित। बीज- मंत्र जपके साथ उस प्रकारकी मंत्र शक्ति अथवा विचार शक्तिका विकास होता है। उपरोक्त बीजोंका उन उन चक्रोंकी देवताओंका अधिष्ठान और उत्थापनमें उपयोग होता है। योगमार्गमें ध्यान तो इन्हीं चक्रस्थित देवता पर “चित्त केंद्रित” कर करना होता है। षड्गुणैश्वर्य—यश, श्री, ज्ञान, औदार्य, वैराग्य, और ऐश्वर्य ये छ ईश्वरी गुण माने गये हैं। भगवान कहलानेके लिये इन छ गुणोंकी आवश्यकता है। साथ ही साथ हरिवंशमें कर्तृत्व, नियंत्रण शक्ति, भोक्तृत्व, विभुत्व, साक्षित्व, सर्वज्ञत्व, तथा तृप्ति, अनादिज्ञान, स्वातंत्र्य, शक्ति, प्रकाशन, अनंतशक्ति, और सर्वज्ञातृत्व, ये छ गुण-श्रीकृष्णमें थे ऐसे कहा गया है। षड्दर्शन—भारतमें अनेक दर्शन हैं किंतु षड्दर्शन यह शब्द प्रसिद्ध है। इसमें “वैदिक और अवैदिक दर्शन” ऐसे भेद भी किये जाते हैं। ज्ञानेश्वरीमें जिन छ दर्शनोंका उल्लेख है वे हैं न्याय, वैशेषिक, वेदांत, बौद्ध, सांख्य, और मीमांसा। किंतु वैदिक दर्शनमें बौद्धदर्शनका उल्लेख नहीं होकर योगदर्शनका उल्लेख होता है। ज्ञानेश्वरीमें बौद्ध मत संकेत। वार्तिकोंका ॥ ज्ञा. १-१२५ ऐसे उल्लेख होनेसे बौद्धदर्शन गिना है। इसके अलावा चार्वाक, जैन, सौर, शाक्त, गाणपत्य, शैव, वैष्णव, स्कांद दर्शन भी हैं। सुश्रुतमें कहा गया है कि— १९३ परिशिष्ट ५

कपिल सांख्यका कर्ता गौतम न्याय सूत्रका । योगका पातंजली है योगीश्वर महामुनि । मीमांसा जैमिनीका है वैशेषिक कणादका । व्यास वेदांत कर्ता है स्वयं जो मधुसूदन ॥ (१) न्याय दर्शनके ५ अध्याय हैं। उनमें १० आह्निक और ८४ प्रकरण हैं। इन ८४ प्रकरणोंमें ५२८ सूत्र हैं। न्यायसूत्रोंके रचयिता गौतम हैं। उसे अक्षपाद कहा है। उनका काल विद्वानोंने ई. पू. ६०० वर्ष माना है। इस पर अनेक विद्वानोंने भाष्य लिखे हैं। न्याय दर्शन तर्कशास्त्र है। ये ईश्वरको मानते हैं। यह वैदिक दर्शन है। मोक्ष इनका अंतिम साध्य है। (२) कणाद वैशेषिक दर्शनका आद्य आचार्य है। इस दर्शनके दस अध्याय हैं। कणाद अणुवादी हैं। इसने अत्यंत योग्यतापूर्वक परमाणुका विवेचन विश्लेषण किया है। वे अणुओंके “पाकज क्रिया”-Chemical Action” के कारण विश्वोत्पत्ति हुई ऐसा मानते हैं। किंतु आगे वैशेषिकोंने ईश्वर माना है। (३) वेदांतका अर्थ ब्रह्मसूत्र है जो उपनिषदोंका निचोड़ है। ब्रह्मसूत्रोंका वर्णन अन्यत्र किया है। ब्रह्मसूत्रोंमें ४ अध्याय हैं। १६ पाद हैं। कुल मिला कर १५ अधिकरण हैं और ५४५ सूत्र हैं। ब्रह्म इसका अंतिम तत्त्व है। और मोक्ष अंतिम स्थिति। (४) कपिलको सांख्यमतका मूल आचार्य माना जाता है। महाभारत और गीतामें सांख्य दर्शनका उल्लेख है। इस परसे यह दर्शन भी अत्यंत प्राचीन होनेका बोध होता है। इस दर्शनके छ अध्याय और ५२७ सूत्र हैं। सांख्योंने २५ तत्त्व माने हैं जो अन्यत्र दिये गये हैं। पुरुष इनका अंतिम तत्त्व है और कैवल्य अथवा मुक्ति अंतिम ध्येय है। सांख्यमें ईश्वरवादी सांख्य और निरीश्वरवादी सांख्य ऐसे दो भेद हैं। ईश्वरवादी सांख्योंमें ईश्वर २६ वा अंतिम तत्त्व है। (५) बौद्धदर्शन-बुद्ध इसका आदि पुरुष है। ई. पू. ५०० वर्ष इसका काल है। यह निरीश्वरवादी दर्शन है। बौद्धदर्शन आचारशास्त्र है। बुद्धके बादवाले उनके अनुयायियोंने उसको शून्यवाद और विज्ञानवादका गूढ़-आध्यात्मिक-रूप देकर उसका दर्शन बनाया है। वैदिक पूर्व मीमांसाकी भांति मूल बौद्ध दर्शन कर्मकांड है। बुद्धके विश्वास- १ सारा संसार दुःखमय है। २ दुःखोंका कारण है। दुःखानुभवसे उसके नाशका उपाय ढूंढ सकते हैं। ३ दुःखका नाश हो सकता है। ४ दुःख नाशके भी उपाय हैं। दुःखके कारणोंको गिनाते समय बुद्धने निम्न कारणपरंपरा दी है। (१) अविद्यासे संस्कार (७) वेदनासे तृष्णा (२) संस्कारसे विज्ञान, (८) तृष्णासे उपादान=राग (३) विज्ञानसे नाम रूप (९) उपादानसे भव=सांसारिक प्रवृत्तियां (४) नाम रूपसे षडायतन- (१०) भवसे जाति (मन सहित पांच ज्ञानेंद्रियाँ) (५) षडायतनसे स्पर्श (११) जातिसे जरा (६) स्पर्शसे वेदना (१२) जरासे मृत्यु इस दुःख मुक्तिके लिये इस दर्शनमें अष्टांगमार्ग कहा है। वह है- (१) सम्यक् दृष्टि = आर्य सत्योंका ज्ञान ज्ञानेश्वरी १९२

An exact transcription of the Hindi/Devanagari text with line numbers:

(२) सम्यक् संकल्प = रागद्वेष हिंसादि सांसारिक विषयोंका त्याग-संग (३) सम्यक् वाचा = सत्यवचनकी रक्षा, झूठ, दुर्वचन, निंदादि अनुचित वचन त्याग । (४) सम्यक् कर्म = हिंसा, परद्रव्यापहरणादि दुष्कर्मोंका त्याग, सत्कर्मोंका आचरण । (५) सम्यक् आजीव = न्यायपूर्ण जीविका कमाना । अन्याय जीविकाका त्याग । (६) सम्यक् व्यायाम = बुरे कर्मोंका त्याग सत्कर्ममें उद्यत रहना । (७) सम्यक् स्मृति=चित्तशुद्धि जीविकाका त्याग । (८) सम्यक् समाधि=चित्तैकाग्रता । इस बौद्ध मतमें हीनयान और महायान ऐसे दो बडे संप्रदाय हैं । बुद्धत्व प्राप्तिसे निर्वाण (जन्म मरणसे मुक्ति) इसका उद्देश्य है । इस दर्शनका विपुल साहित्य है पालीमें और संस्कृतमें । इसमें बडे बडे दार्शनिक हो गये हैं । कुछ बुद्धसे पूर्ववर्ती हैं तो कुछ बुद्धके बादके । (६) मीमांसा, इसको पूर्वमीमांसा कहते हुए वेदांतसूत्रोंको उत्तरमीमांसा कहनेकी परिपाटी भी है । इसका आचार्य जैमिनी है । इसलिये इसको जैमिनि दर्शन भी कहा जाता है । यह जैमिनीदर्शनभी बौद्धदर्शनकी भांति ही आचार संहिता है । पूर्व मीमांसा धर्म-दर्शन है । मीमांसामें बारह अध्याय और २५०० सूत्र हैं । मीमांसाके विषय भी बारह हैं । ये हैं (१) धर्मजिज्ञासा (२) कर्मभेद (३) शेषत्व (४) प्रायोज्य-प्रयोजकभाव (५) कर्म- क्रम (६) अधिकार (७) सामान्य (८) अतिदेश (९) ऊह (१०) बाध (११) तंत्र (१२) अवाप । वेद ही इसका स्वतःप्रमाण है । इसके अन्य प्रमाणोंकी सूची बडी लंबी है । इसमें ब्राह्मण ग्रंथोंके विधिविधानों तथा निषेधोंको दार्शनिक रूप देनेका प्रयास है । मीमांसाको ईश्वर या परमात्माका कोई प्रयोजन नहीं है । इसने ईश्वर या परमात्माका खंडन नहीं किया इसलिए यह नास्तिक या निरीश्वरदर्शन नहीं कहलाता । यह संसारको जैसे है वैसे सत्य मानता है । यह मुक्तिको स्वीकार करता है । इसके भाष्यकारोंके कई मत हैं जैसे ब्रह्मसूत्रके भाष्यकारोंके. अनेक भिन्न भिन्न मत हैं । ज्ञानेश्वरीमें उल्लिखित षड्दर्शनके विचार करनेके बाद अब सुश्रुतमें कहे षड्दर्शनमें बचे योगदर्शनका विचार करें । पातंजल मुनि इसका मूल आचार्य है । इसके भी (१) समाधिपाद (५१) सूत्र, (२) साधनापाद ५५ सूत्र, (३) विभूतिपाद ५४ सूत्र (४) कैवल्यपाद ३४ सूत्र हैं । इनका रचनाकौशल्य अप्रतिम है । मानो एकमेंसे दूसरा सूत्र अपने आप निकलता है । इसका विवेचन करते समय— समाधिपाद योग उद्देश्य निर्देश उसके वृत्ति लक्षण । योग उपाय प्रभेद भेद समाधिके कहे । साधना पाद योगका ज्ञान विज्ञान रोक और निवारण । क्रम सह चित्त-मुक्ति उसके बाह्य साधन ॥ विभूतिपाद अंतस्साधनके साथ दिखाया है प्रभाव भी । तथा संयमसे ज्ञान मिलता है विवेक भी ॥ १९३ परिशिष्ट ५

कैवल्यपाद कैवल्य पादमें तीनों पादोंका सार भी कहा । कहा समाधिका पूर्ण रहस्य ध्येयके सह ॥ इन चार श्लोकोंमें योग-दर्शनका सार कह सकते हैं । संन्यासी—भारतीय आश्रम-धर्मानुसार चतुर्थाश्रम । यह आश्रम कब ग्रहण करना चाहिए ? इसकी चर्चा करते समय शास्त्रकारोंने गृहस्थाश्रममें संतानोंत्पादनद्वारा पितॄऋणसे, अध्ययन अध्यापनद्वारा ऋषिऋणसे, यथाशक्ति यज्ञयागादि करके देवऋणसे मुक्त होनेके बाद, मोक्ष प्राप्तिके लिये संन्यास लेनेकी आज्ञा दी है । अर्थात् पारिवारिक तथा सामाजिक कर्तव्य पूर्ण करनेके बादही मनुष्य संन्यास ले सकता है उसके पहले नहीं । अपने तीनों ऋणसे मुक्त होनेके बाद जब तीव्र वैराग्य प्राप्त होता है, स्वामी रामतीर्थके शब्दोंमें भूख लगी तो अन्न, प्यास लगी तो पानी, देनेवाली ईश्वरी शक्ति पर पूर्ण विश्वास होता है तथा इन दो वस्तुओंके अलावा और किसीकी आवश्यकताका अनुभव ही नहीं होता तब—संन्यास- ग्रहण करना चाहिए-उसके प्रथम कदापि नहीं । ऐसे दो प्रकारके संन्यास होते हैं । यदि स्वास्थ्य दुर्बल हो तो क्षेत्र संन्यास नहीं तो परिव्राजक । संन्यासमें “परमहंस” श्रेष्ठतम स्थिति है । ‘मैं” और ‘मेरा” इसको जो अंतःकरणमेंसे भूल गया है वही संन्यासी है । परमहंस जीवन्मुक्तावस्था है । वह जीवनकी सहजस्थिति है । वह ब्रह्मलीन हो कर ब्रह्मरूप बना हुवा सोऽहं भावमें लीन रहता है । उसके विषयमें सर्वत्र अपना ही रूप दीखता है इसलिये वह इंद्रातीत सहज स्थितिमें रहता है । सत्रहवींका स्तन्य—प्रश्नोपनिषद्में सोलह कला और उनके देवता बता कर इन कलाओं- द्वारा पुरुषमें पुरुषत्व आता है ऐसा कहा गया है । पुरुषकी ये सोलह कलायें और उनका देवता निम्न हैं—१, प्राण=वायु, २, श्रद्धा=भारती, ३, आकाश=गणेश, ४, वायु=प्रवाह ५ तेज अग्नि, ६ आप=वरुण, ७ पृथ्वी=शनैश्चर, ८, इंद्रियां=सूर्य, ९ मन=रुद्र, अथवा अनिरुद्ध १० अन्न=सोम, ११ वीर्य=वरुण, १२, तप=पावक १३, मंत्र=स्वाहा, १४ कर्म=पुष्कर, १५ लोक पर्जन्य, १६ नाम= उषा । पुरुषकी इन सोलह कलाओंके बाद सत्रहवी कला आत्म-तत्व है । सत्रहवींका स्तन्यः जो गुरुमाता देती है वह है आत्मतत्वबोध । अथवाव्योमचक्रकी आज्ञाचक्र (?) चंद्रामृतरूपी जीवनकला । सप्तधातु—शरीरके घटक, देहस्थित रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, रेत ये सात धातु । इसके उपधातु भी हैं । रसका कफ, रक्तका पित्त, मांसका नाक, कान आंखमेंसे स्त्रवनेवाला मल, मेदका पसीना, अस्थिके बाल और नख, मज्जाकी स्निग्धता चिकनाई तथा रेतका ओज ! सांख्य-योग—गीताका दूसरा अध्याय सांख्य-योग कहलाता है । इस अध्यायमें तीन महत्त्वके सिद्धांत कहे गये हैं । आत्माकी अमरताके साथ अखंड सर्वव्यापकता । देहकी नश्वरताके साथ क्षुद्रता । स्वधर्मकी अबाध्यता । स्वधर्मका अर्थ निसर्गसे प्राप्त स्वकर्तव्य है । आत्माकी अखंडता स्वधर्मकी सहजता सिखाती है । जैसे जन्मके साथ मांकी निर्मिति होती है वैसे जन्मके साथ ही स्वधर्म जुडा रहता है तथा शरीरकी नश्वरता स्वधर्माचरणमें आनेवाले कष्टोंको शांत सहन करनेकी प्रेरणा देती है । शरीरका सुख दुःख अथवा शरीर नाशकी कोई कीमत नहीं जैसे मनुष्य कपडे बदलता है वैसे आत्मा शरीर बदलता है । तेरे कपडोंकी जो कीमत वही तेरे शरीरकी है यह सिखाती है शरीरकी नश्वरता । ज्ञानेश्वरी १९४

शरीर केवल स्वधर्मका साधन है। इसी रूपमें उसका संभाल करना है। अधर्म और पर-धर्मका विचार न करते हुए केवल स्वधर्मका आचरण करना चाहिए। शरीरको क्षणिक मान कर उसको सतत स्वधर्माचरणमें लगाना, आवश्यकता हो तो उसीमें उसका त्याग भी करना और मनमें आत्माके व्यापक अखंड तत्त्वका भान रखते हुए स्व-पर भेद मिटा कर साम्य बुद्धिसे सब वर्तन करना, यह सांख्य ज्ञान है। इसको आचरणमें लानेकी कुशलता योग है। स्वधर्माचरण करते समय भी जो कुछ करना है वह फलकी इच्छासे नहीं करना। फल निरपेक्ष भावसे करना। पहले सांख्य-ज्ञान कह कर फिर उस ज्ञानका आचार-धर्म सिखाया है। आगे इसका परिणाम ? वह है स्थितप्रज्ञ सिद्धि । “सांख्य” ज्ञानके साथ “योग” की कर्म कुशलता बताकर गीतामें सांख्य- योग कहा गया है। इस योगसे स्थित प्रज्ञ स्थिति प्राप्त होकर “ब्रह्म निर्वाण” मिलता है यह कहा है। ज्ञान, कर्म और उसका फल इन तीनोंका विवेचन इस सांख्ययोगमें है। साक्षित्व-साक्षीभूत—जीवनमें होनेवाली घटनाओंसे और घटनाओंमें अपनेको अलिप्त करके उनकी ओर देखनेकी वृत्ति तथा स्थिति। सुख दुःख निरपेक्ष भावसे तटस्थ अथवा मध्यस्थ रहनेसे यह संभव हो सकता है। वस्तुतः जीव द्रष्टा है। उसके अस्तित्वके कारण प्राप्त चैतन्यसे उसकी बुद्धि, उसका मन इंद्रियादि कार्यक्षम हैं। यह वस्तुस्थिति शरीरमें अथवा शरीरकी ओरसे चलनेवाली क्रियाओंसे पहचान कर उनकी ओरसे मध्यस्थ रहना उदासीन रहना साक्षित्व कहा जाता है। अपनेको अलग रख कर देखना अपनेको घटनाओंमें या घटनाओंसे उलझाकर परेशान होते हुए तमाशा देखनेवालेकी भांति तटस्थ रहनेकी वृत्तिको साक्षित्व कहा जाता है। सुषुम्ना—सुषुम्नाको महानाडी कहा गया है। मानवी शरीर मानो नाडियोंका जाल है। उनमें सुषुम्ना सबसे महत्त्वकी नाडी है। यह मध्यनाडी है। यह रीढ़के बीचमेंसे जाती है। इसके साथ वज्रा और चित्रिणी ये दो अत्यंत सूक्ष्म नाडियां चलती हैं। ये दो नाडियां विद्युतमा- लाके समान विलसती है। अर्थात् सुषुम्ना त्रिवेणीकी भांति है। यह पूरी पोली है। इसलिये सुषुम्ना कहलाती है यह सहस्रारसे मूलाधार तक फैली है। सहस्रारसे छोटा मस्तिष्क शिरोब्रह्म कहलाता है। शिरोब्रह्मके पासवाला भाग अमरी अथवा गुंफात्रेणू कहलाता है। उसके बीचवाला भाग सुषुम्नाकंद है। सुषुम्नाकंद सुषुम्नाके ऊपरका सिरा है। वहांसे रीढमेंसे पतली पतली हो कर यह मूलाधार तक गयी है। सुषुम्नाका नीचेका सिरा बडा पतला होता है। सुषुम्नाकंद और सुषुम्नाका नीचेका सिरा देखा जाय तो ऊपरका हिस्सा सापका फना और नीचेका सांपकी दुम-सा है। वहां इससे अन्य अनेक नाडियां मिली होती हैं। नाभिकक्रके पास अनेक नाडियां सुषुम्नासे मिली हैं। सुषुम्नाकी एक ओर सहस्रार तथा शिरोब्रह्मसे जुडा हुआ सुषुम्नाकंद है तो दूसरी ओर स्वाधिष्ठानसे संलग्न इसका सुषुम्ना-मुख है। सुषुम्नाकंदसे सुषुम्नामुख तक यह रीढकी गुहामेंसे रीढके पोलेमेंसे- चलती है। उसके साथ वज्रिणी और चित्रिकणी गूंथी गयी हैं जो अत्यंत सूक्ष्म हैं। ये नाडियां भी पोली हैं। इसलिये इसे त्रिगुणार्मिका कहते हैं। सुषुम्ना गर्दनके पास विशुद्धि चक्रके पास जाकर अंतर्मुख हो कर सहस्रारतक जाती है और वहां वह शंखिनी कहलाती है। रीढमें नीचे जो सुषुम्ना है वह कुंडलिनीके साथे जुडी है और वहांसे वह टेढीमेढी आज्ञाचक्र तक जाकर फिर ऊपर ब्रह्मरंध्रसे जुडी है। इस प्रकार यह ब्रह्मरंध्रसे कुंडलिनी स्थान तक फैली है। इसके साथ इडा पिंगला-रीढके बाहरी ओरसे-चलती हैं। पिंगला दाहिनी ओरसे और इडा बाईं ओर से। पिंगलाको सूर्यनाडी और इडाको चंद्रनाडी कहा जाता है। ये दोनों मूलाधारके पाससे-गुदाकंदके अंतर्भागसे निकल कर सभी नाडीचक्रोंसे लपेटते हुई नासिका तक गयी है। १९५ परिशिष्ट ५

योगीजन अथवा सिद्धपुरुष, बिन तारायंत्रसे संदेश पहुंचानेवालोंकी भांति अपने शिष्य साधकोंको इसी सुषुम्नाके द्वारा आवश्यक संदेश देकर उनके जीवनमें परिवर्तन करा देते हैं। इसी सुषुम्नाकेद्वारा ज्ञानसंपादन किया जाता है तथा ज्ञानदान भी होता है। यद्यपि सामान्य लोगोंके लिये यह मार्ग बंद है (!) योगी आज्ञा-चक्रको प्रभावित कर अपनी शक्तिसे साधककी कुंडलिनी जागृत कर देते हैं इस क्रियाको योगमें शक्तिपात कहा जाता है । सैंतीसवा—जैसे सांख्योंके मतसे विश्वके पच्चीस तत्त्व हैं वैसे शैव तत्त्वज्ञोंके मतसे विश्वके छत्तीस तत्त्व हैं। उन छत्तीस तत्त्वोंका नीचेसे ऊपर तक (१) अचित् तत्त्व अथवा अशुद्ध तत्त्व (२) विद्या-तत्त्व अथवा शुद्धाशुद्ध तत्त्व (३) चित् तत्त्व अथवा शुद्ध तत्त्व ऐसे तीन प्रकार हैं। अशुद्ध तत्त्व २४ ५ पंचमहाभूत, ५ तन्मात्राएं ५ कर्मेंद्रियां ५ ज्ञानेंद्रियां २१ मन २२ बुद्धि, २३ अहंकार २४ त्रिगुणात्मक प्रकृति शुद्धाशुद्ध विद्यातत्त्व ७ १ पुरुष, २ विद्या, ३ राग, ४ नियति ५ काल ६ कला, ७ माया और शुद्ध अथवा चित् तत्त्व ६ शुद्धविद्या, २ ईश्वर, ३ सदाशिव, ४ शक्ति, ५ शिव ६ परशिव अथवा परा संवित्-यह परा संवित् सैंतीसवा परमोच्च तत्त्व है । स्मृति—भारतमें श्रुति और स्मृति दो प्रकारके धर्म-ग्रंथ हैं। वेदोंको श्रुति कहा गया है जो गुरुसे सुना और शिष्यने पाठ करके अक्षुण्ण रखा। स्मृति गुरुसे सुना और स्मरणसे अक्षुण्ण रखा और वे नियमादि चलते आये। गुरुमुखसे सुन कर स्मरण रखकर, आचरणमें लाये गये नियमोंके जो ग्रंथ हैं उन्हें स्मृतिग्रंथ कहा गया है जो २० हैं। (१) मनुकी मनुस्मृति (२) अत्रिकी अत्रिस्मृति (३) विष्णुकी विष्णुस्मृति (४) हारीतकी हारीतस्मृति (५) याज्ञवल्क्यकी याज्ञवल्क्यस्मृति (६) उशनाकी उशनास्मृति (७) अंगिराकी अंगिरास्मृति (८) यमकी यमस्मृति (९) आपस्तंबकी आपस्तंबस्मृति (१०) संवर्तकी संवर्तस्मृति (११) कात्यायनकी कात्यायनस्मृति (१२) बृहस्पतिकी बृहस्पतिस्मृति (१३) पराशरकी पराशरस्मृति (१४) व्यासकी व्यासस्मृति (१५) शंखलिखितकी शंखलिखितस्मृति (१६) बौधायनकी बौधायन- स्मृति (१७) दक्षकी दक्षस्मृति (१८) गौतमकी गौतमस्मृति (१९) शातातपकी शातातप- स्मृति (२०) वसिष्ठकी वसिष्ठस्मृति । ये सारे स्मृतिग्रंथ समय समय पर कही गयी भारतकी प्राचीन आचारसंहिता है। सामाजिक अनुशासन पद्धति है। इसमें भारतीय समाज शास्त्रके बीज निहित हैं। हठयोग—ईश्वरसे जुड़नेके लिये-आत्मसाक्षात्कारके लिये-हठसे शरीरको तैयार करनेकी क्रियाको हठयोग कहते हैं। इसमें शरीर शुद्ध रखनेके लिये षट्कर्म शरीरके प्रत्येक इंद्रियपर स्वामित्व रखनेके लिये मूलबंध आदिका अंतर्भाव होता है। किंतु हठयोगके ग्रंथोंमें कहा गया है। चलता सूर्यसे हकार तथा ठकार जो चंद्रसे । सूर्य चंद्रमाका जो योग कहलाता हठयोग है ॥ दाहिने और बाये नाकसे जो प्राण चलता है उस प्राणका योग हठ योग है। अपने श्वासोच्छ्वासका संयम कर सूर्यनाडी और चंद्रनाडीमेंसे चलनेवाली प्राणशक्ति पर स्वामित्व प्राप्त करना ही हठयोग है। प्राणशक्तिद्वारा आत्म-साक्षात्कार करके आत्मलीन होना हठयोग है जैसे भावशक्तिद्वारा आत्मलीन होना भक्तियोग और बुद्धिशक्तिद्वारा आत्मलीन होना ज्ञान योग है! ॐ ज्ञानेश्वरी १९६

परिशिष्ट छटा ज्ञानेश्वरीमें आये हुए कठिन शब्दोंका अर्थ ।

इस चित्र में कोई पाठ (text) दिखाई नहीं दे रहा है, यह पूरी तरह से रिक्त (blank) पृष्ठ है।

परिशिष्ट छठा अंकुरना- अंकुर आना, अंकुआ फूटना. अकर्ता- कर्मसे अलिप्त, कर्म-मुक्त, कर्तव्य रहित, करनेसे अलिप्त. अकर्म- निषिद्ध कर्म, कर्म समाप्तिकी अवस्था, करके भी न करनेकी सी स्थिति. अकल्पनाख्य कल्पतरु- कल्पना रहित ऐसी जिसकी प्रसिद्धि है ऐसे परमात्म प्राप्ति करानेवाला कल्पवृक्ष. अक्रिय- क्रिया रहित. अक्रोध- क्रोधका उपशमन, क्रोधका उदय न होने देना, क्रोधावेगको पचाना. अखंड- खंड रहित, निरंतर, दीर्घकालतक, सदैव, सतत, नित्य. अगाध- गहन, गहरा, कठिनाईसे प्राप्त होनेवाला, न समझनेवाला. अग्निस्यान-योगशास्त्रमें कहा हुवा द्विदल चक्र जो भ्रुकुटिमध्यमें रहता है. अग्र- नोक, आलंबन, अवधान, एकाग्र, नासिकाग्र आदि. अग्रहार- ब्राह्मणोंको दी हुई भूमि, केवल ब्राह्मणोंका गांव. अचक्षु- जिसकी आंखें नहीं. अचरण- जिसके पैर नहीं. अच्युत- अपने स्थानसे न गिरनेवाला, जहांसे चलन नहीं, जिसमें कच्चापन नहीं, निश्चल. अंजनांचल-काजलका पर्वत. अजत्व- जन्मरहितता, अजन्मत्व, स्वयंभू स्थिति. अडगोडा- बदमाश जानवरोंके गलेमें बांधा जानेवाला अडंगा. अड्लंग- टेढामेडा, विचित्र, ऊंचानीचा, दुर्गम. अंतरंग- अंतर्मुख, आत्मीय, गुह्य, अंतःकरण. अंतर्यामी- ईश्वर, हृदयस्थ, अंतःकरणपर अधिकार रखनेवाला. अंतवंत- नाशवान, जिसका नाश होता है वह. अतिकृतकंदर्पसर्पदपं- कंदर्परूपी सर्पका दर्प तोडनेवाला. अतीत-अतिक्रमण किया हुआ, उस पार पहुंचा हुवा, जिसका स्पर्श न हो सकता हो ऐसा, पार करके गया हुआ. अतींद्रिय- इंद्रियोंसे अगम्य, इंद्रियोंसे जिसका अनुभव नहीं होता हो वह. अद्रोह- किसीका द्रोह न करना, प्राणि-मात्रोंसे अविरोधी जीवन, स्पर्धा रहित जीवन. अद्वय- दूसरे संबंधरहित. अद्वयकमलिनी विकास- अद्वैतस्थितिरूपी कमलका विकास. अद्वयबोधपुर- जहां अद्वयबोध होता हो वह स्थान. अद्वयानुभव- एकत्वका अनुभव. अद्वितीय-निरुपम, अनुपम, अकेला, एकमात्र, बेजोड, वैसा दूसरा कोई न हो. अधिदैवत- अधिष्ठात्री देवता, अभिमानी, भोक्ता पुरुष, साहंकार जीवतत्व. अधिभूत- साकारभूत सृष्टि, पंचतत्वसे बनने बिघडनेवाला सब, विनाशी जगत्. अधियज्ञ- यज्ञाधिष्ठाता, शरीर भाव रहित आत्मा, स्थूल और सूक्ष्म यज्ञोंसे परिशुद्ध निरहंकारी पुरुष. अधिष्ठान- आश्रयरूप भूमि, आश्रयस्थान, विशिष्ट अर्थ शरीर. अधिष्ठि- अधिष्ठात्री अधेय- न ध्यान करने योग्य. अध्यात्म- आत्मनिष्ठ निरहंकारवृत्ति, आत्म संबंधी, आत्माकी सहजस्थिति, सहज नित्यत्व. अध्वर- यज्ञ.

यहाँ पृष्ठ का देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

[बायाँ स्तम्भ]

अनन्त- देशकालपरिच्छेदशून्य, अपरि- च्छिन्न, जिसका अंत न हो ऐसा, अनन्य- एकनिष्ठ, एकरूप, ईश्वरसे भिन्न अन्य कुछ भी न जाननेवाला, अनन्यचित्त, अनन्यभक्त अनन्यभाव आदि ऐसे शब्द आये हैं. अनर्गल- व्यर्थ, अंडबंड, लगातार, अप्रतिहत. अनवच्छिन्न- अखंड, अविच्छिन्न, अटूट, अनवरत- अखंड, सतत. अनवसर- कुसमय, अकाल, जब न होना चाहिए तब. अनाक्रोश- आक्रोशरहित, बिना कटूक्तिके, सहज. अनात्म- अचैतन्य, जड, असत् पदार्थ. अनाम- जिसका कोई नाम न हो, अनावरण- जिसपर कोई आवरण न हो, खुला. अनावृत्त- प्रकट, निरावृत्त, खुला. अनासक्त- असंग, कहीं न उलझाहुवा निर्लिप्त, न चिपका हुवा. अनिल- वायु. अनिष्ट- अमंगल, अकल्याणकारक, अशुभ. अनुकार- प्रतिबिंब, अनुकरण. अनुपम- उपमारहित, सर्वश्रेष्ठ, अत्युत्तम. अनुभव, अनुभूति- प्रत्यक्षदर्शन. अनुभवी, अनुभावी- प्रत्यक्ष दर्शन किया हुवा, साक्षात्कारी, मंझाहुवा, अभ्यस्त. अनुमान- कयास बांधना, अटकल लगाना, समझना. अनुरक्ति- प्रीति, प्रेम. अनुष्ठान- कार्यारंभ, विधिवत् आचरण, शास्त्र-विहित कार्य, आराधना. अनुसंधान- योग, तादात्म्य, तन्मयताके साथ किसीके पीछे लगना, खोज. अनुज्ञाता- अनुमोदनकर्ता, आज्ञा देनेवाला.


[दायाँ स्तम्भ]

अन्यथाज्ञान - विपरीत ज्ञान, उलटा समझना. अपरिग्रह- व्यर्थ के अथवा अनावश्यक वस्तुओंका संग्रह नहीं करना. अपेक्षा- आशा, अभिलाषा, चाह, इच्छा. अप्रमेय- अगम्य, प्रमाणोंसे जिसकी सिद्धि नहीं होती हो ऐसा. अंभ- पानी. अभय- नहीं डरना, निर्भय, अभिचार- जारण मारण, जादू टोना, टोटका. अभिलषित- इच्छित, फलाकांक्षी. अभिभूत- व्याप्त, वशीभूत, पराभूत, विकल. अभिव्यक्त-- प्रकाश किया हुवा, प्रकट. अभीष्ट- इच्छित. अभेदांतःकरण- एकत्वानुभूत अंतःकरण, समरसांतःकरण, हृदयसे एकत्वा- नुभव. अभोक्ता- जो भोग न करता हो. अभ्यास- मनोनिग्रहपूर्वक सतत अभ्यास, भली या अच्छी बातोंकी ओर विचार पूर्वक मनको लगाना, योग साधन, ईश्वरमें मन बुद्धि भावके अर्पणका सतत प्रयास, असद्- वृत्तिका त्याग तथा सद्वृत्तिके स्वीकारमें विचारपूर्वक तत्परता, अध्ययन. अमनस्क- मनरहित, उदासीन, तटस्थभाव इच्छा रहित. अमर्ष- क्रोध. अर्घ्य- ईश्वरको, अथवा पूज्य व्यक्तिको गंध पुष्पादि डाल कर हाथ पर दिया जानेवाला पानी. अर्चन- पूजा, आदर सत्कार. अर्चिरार्माग- देवयान, प्रकाशमय मार्ग ज्योतिर्मय मार्ग. अर्धोन्मीलन- आधी खुली, आधा खुला. अलकलट- बालोंकी लटें, बालोंका गुच्छ.


[पाद-टिप्पणी / पृष्ठ संख्या]

ज्ञानेश्वरी २००

अलिप्त- किसी प्रकारका लगाव रहित, न रहनेका सा रहना, न करनेका सा करना. अलौकिक- लोकोत्तर, अनोखा, यहां-जगतमें न मिलनेवाला. अवधान- मनोयोग, एकाग्र, चित्तैकाग्रता. अवधारणा- विचारपूर्वक, स्थिरचित्तसे सुनना. अवज्ञा- अनादर. अविकार- विकार रहित. अवहेलना-ध्यान न देना, उपेक्षा करना, अनादर करना. अवांतर- इतर, अन्य. अविकृत- न बदलनेवाला, अपरिवर्तित सदैव एकसा रहनेवाला. अव्यक्त- अगोचर, न दीखनेवाला अप्रगट, न दीखनेवाली अवस्था, बीजभूत प्रकृति, निराकार ब्रह्म. अव्यभिचार-अनन्यता, एकनिष्ठा, संपूर्ण रूपसे अर्पित. अव्यय- अविनाशी, निर्विकार, नित्य, आद्यंत रहित. अव्याहत- अवरोधरहित, निर्विवाद, सतत, ठीक. अशुभ- अमंगल, कर्मबंध, अनिष्ट. अशेष - अशोख- संपूर्ण, निःशेष, शेष न रहे ऐसा. अष्टधाप्रकृति- पृथ्वी, आप, तेज, वायु, आकाश और मन, बुद्धि, अहंकार असंग- अकेला, एकाकी, अलिप्त, किसीसे किसी प्रकार न जुडनेवाला, विरक्त. असंमोह - विवेक, मोह न होना, मोहरहित. असलग - सरल, सुगम, आसान. असिपत्र - तलवारसा पत्ता. अस्ताचल - पश्चिम ओरका पहाड. सायंकालमें सूर्य वहां विश्रांति करता है ऐसी कल्पना है. अहंकार ऊर्मिया - अहंकारके तरंग. अहंकृतिभाव - अहंकार, मैंने किया है ऐसा भाव.

  • आ- आकलन - ग्रहण करना, अपने काबूमें करना बटोरना, सही ढंगसे समझना. व्यापना. आंगिक - अंगके अवयव, शरीर विषयक. आगम - तंत्रशास्त्र, परंपरासे चलता आया हुआ. आगमोक्त - शास्त्रोक्त, आगम-साधना, शास्त्रमें जैसा कहा है वैसा. आड - ओट, परदा आड - कुंई, छांटा कुआ - मूलमराठी शब्द, प्रासके लिये लिया, और उसी अर्थका स्वीकार किया - आडंबर - अवडंबर, ऊपरी दिखाव, फल- तडक भडक. आतप - धूप, उष्णता, गर्मी, उष्णता. आत्मजा - पुत्री. आत्मविद् - आत्माको जाना हुआ, आत्म- विद्या विभूषत, आत्मज्ञानी. आत्मविदूविलास - आत्मज्ञानमें विलास करनेवाला. आत्मानात्मविचार- जड चेतन विचार, आत्मअनात्मविचार. आद्यंत- आदिसे अंत तक, आदिअंत रहित. आधारचक्र आधारशक्ति- मूलाधारचक्र आनंदमोद बहुल- आनंदरूपी सुवाससे भरा हुआ. आनंदैककला- एकत्वके आनंद कला. आप- आर्द्रता. आपोशन- भोजनपूर्वका आचमन. आप्त- अपने, नातेगोतेके लोग, किसी विषयको भलीभांति जाननेवाला, पूर्ण तत्वज्ञ, संदेहातीत ज्ञानी, ऋषि, विश्वसनीय, अनुभवी. आमोदोन्माद- आनंदोन्माद, सुगंधसे होनेवाला हर्ष. २०१ परिशिष्ट ६

आयतन- घर, सदन. आयास- श्रम, थकान. आराधन- पूजन, उपासना. आराध्य- जिसकी आराधनाकी जाती वह. आराध्यलिंग- आराधना करनेयोग्य दैवत. आरोगन- खाना, भोजन करना. आरोहण- चढ़ना. आर्जव- सरलता, ऋजुता, निष्कपटवृत्ति. आर्त- दुःखी, पीड़ित. व्यथित, दीन. आर्तबंधु- दीनबंधु, पीड़ितोंको संकटमुक्त करनेवाला. आलेख- लिपि. आह्वाहन बुलाना मंत्रोंद्वार देवताओंका. आवाहन- बुलाना चुनौती देना. आव्हेर- मराठी शब्द, अस्वीकार, तिरस्कार. आस- लालसा, लोभ. आसक्ति- प्राप्त वस्तुके विषयमें ममत | संग, अनुराग, लोभ. आसरा- आश्रय, छिपकर रहनेकी जगह. आसुरी- वृत्तिविशेष, ईश्वर विन्मुखता. भोगमयता. क्रूरकर्म, मूढ़ता. आस्था- उत्कट इच्छा, प्रेम, लगन, आदर, श्रद्धा. आहुति- मंत्रोच्चारपूर्वक हवन करना, यज्ञमें अर्पण. इ इंद्रधनुष- मेघपर सूर्यकिरण पड़नेसे दीखने वाली रंगीन कमान. इंद्रनील- नीलमणि एक नीलारत्न. इंद्रनीलसुनील- इंद्रनीलके समान सुंदर नीला. इंद्रियकंदन- इंद्रिय दमन, इंद्रिय निग्रह. इंद्रियानल- इंद्रियरूपी अग्नि. इष्ट- प्रिय, मनभाया. अग्निद्वारा प्राप्त भोग, हित कल्याण. ई ईप्सित- इच्छा किया हुवा अभीष्ठ.


ईश- नियामक, स्वामी, चालक. ईशितव्य- नियमित किये गये नियम. उ उच्चैःश्रवा- अमृतमंथनके समय समुद्रसे निकलाहुवा घोड़ा. इसके सात मुख थे, यह सूर्यके रथमें जोड़ा गया; इसीसे सात वार माने जाते हैं. उच्छेद- उन्मूलन, उखाडना, नाश करना. उत्तुंग- ऊंचा. उत्कंठोन्माद-उत्कटतासे पगलाना, लालसासे पगलाना, उतावलेपनमें आना. उत्कर्ष- उन्नति, ऊपर उठना, समृद्ध. उदास, उदासीन.-तटस्थ ऊपरकी सतह पर बैठा हुवा, अपेक्षा उपेक्षासे परे, उत् ऊपर. आसीन बैठा हुवा परस्पर विरोधी द्वंद्वोंसे उपरे उठा हुवा. उद्विग्न- व्याकुल, उद्वेगयुक्त, व्यग्र. उद्भिज- वृक्षादिक. उद्बोध- जागृति, अल्पबोध. उन्मत्त- पागल, मतवाला. उन्मन- अनमना. उन्मनि- मनरहित अवस्था. उन्मेष- ज्ञानप्रफुल्लता, प्रकाश, प्रतिभा. उन्मेषसागर-ज्ञानसागर, प्रकाशसागर आदि. उन्मेख सुलोचन } ज्ञानरूप दृष्टि रखनेवाला. उन्मेखसूक्ष्मक्षण } उन्मेषसूर्यकांतस्फुलिंग-ज्ञानरूपी सूर्यकांत मणिकी चिनगारियां. उपपत्ति- युक्तिवाद, हेतु, कारण, किसीका मेल बिठाना, मान्य होना. उपराम- निवृत्ति, विरति, शांति विराम. उपहिताकार-उपाधिविषयक चैतन्याकार. उपासना- पूजा करना, पास बैठना, तदाकार होना, शास्त्रानुसार पूजा यज्ञादि करना. उबग- उकतानेकी क्रिया, ऊबनेकी क्रिया. उर्मी- लहर, तरंग, विकार, अहंवृत्ति.


ज्ञानेश्वरी २०२

उर्वरा- उपजाऊ, भूमि. उल्लसित- उत्साहित, प्रफुल्ल, हर्षित. उष्मा- गरमी, क्रोध, ताप, धूप. ऊस- अख, गन्ना. ऋ ऋजुता- अंतःकरणकी सरलता, ज्ञानका एक लक्षण, ब्राह्मणोंका स्वभाव, इंद्रियोंको स्वैर न जाने देना, सत्कार्यतत्परता, ऋतु- कालखंड विशेष-वसंतऋतु ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर. ऋद्धि- समृद्धि, ऋद्धि-सिद्धि, समृद्धि सफलता. ऋषि- मंत्रद्रष्टा, आध्यात्मिक तथा वैज्ञानिक तत्वोंका दर्शन करनेवाला, चिंतनशील, विशिष्ट प्रकारकी जीवन-दृष्टि रखकर उसके अनुसार जीवन बितानेवाले एक- निष्ठ ऋषियोंको देवर्षि, राजर्षि, तथा ब्रह्मर्षि कहते हैं. इसके अलावा महर्षि एक सामान्य संज्ञा भी है. ए एकनिष्ठ- निश्चयात्मक, किसी एकपर पक्का निष्ठावाला. एकसर- एकदा, एकनिष्ठासे अनुकरण. एकांगुष्ठानतप-एक ही अंगूठेके बलपर खडा रह कर तप करना. एकांत- निर्जन प्रदेशमें एकाएकी रहना. एकार्णव- प्रलयकालका सर्वत्र व्याप्त पानी, केवलमात्र समुद्र, सर्वव्यापी महासागर. ओ ओप- चकाकी, चमक, तजेला. ओस- वीरान, शून्य, हवासे मिला पानी. क कंकण- हाथमें पहननेका आभूषण. किसी शुभकार्यमें, धर्मकार्यमें, कार्य निष्ठाकी प्रतिज्ञाका द्योतक मंत्र पूर्त सूतका ताग, कंकण बद्ध प्रतिज्ञाबद्ध कंगूरा- शिखर, बडे महलका ऊपरी भाग. कंचुकी- अंगिया, चोली. कंठनाल- गलेकी नली, कंठनसिका. कंदर्प- काम, मन्मथ. कंदर्पसर्पदर्प- कामरूपी अजगरका अभिमान कंदर्पशरण- कामके आधीन कदली- कदलीवृक्ष, केलेका पेड. कनकद्रुम- स्वर्णवृक्ष. कमलकोश- कमल परागका स्थान, कमल सिकुडनेके बाद वहां भ्रमर फंसता है ! कमलका मध्य भाग. करण- इंद्रिय. कर्तव्य- करनेकी आवश्यकता, विहित कर्म आवश्यक करना तथा अनावश्यक टालना, प्राप्त कर्म, समाजजीव- नमें अपने हिस्सेमें आनेवाला, तथा स्वधर्मके कारण करणीय कर्म, नैतिक प्रेरणा स्वरूप कर्म, नैतिक दृष्टिसे आवश्यक कर्म. कर्तृत्व- कर्ताका भाव, कर्म-स्वामित्व, कर्मणोंमेसे एक. कर्म- करने तथा सहज बननेवाली क्रिया गीतामें १ शुभाशुभ ज्ञानदाय कर्म, (२) क्रिया- विशेष (३) शास्त्रोक्त कर्म (४) स्वधर्मरूप कर्तव्य कर्म, (५) हलचल (६) शरीरश्रम, (७) लोकसंग्रहात्मक, (८) प्रकृतिके कार्यरूप, (९) वर्णा- श्रमानुसार आदि अनेक प्रकारके कर्म कहे गये हैं जो निष्काम भावसे फलकी अपेक्षा रहित हो कर करने चाहिए. २०३ परिशिष्ट ६

कर्म- बिना किये भी जो व्यापार होता रहता है, चलता रहता है ! कर्मनिष्ठ- कर्ममें श्रद्धा रखनेवाला. कर्मफल- कर्मके बाह्य फल. कर्मबंध- कर्मरूपी बंधन. कर्मबीज- कर्मकी प्रेरणा. कर्मविरत- कर्मसे विमुख. कर्मानुगत- कर्मानुसार. कलंदर- मदारी. कलितकाल कौतूहल- कालके चमत्कार को जिसने अपने अंकित रखा है ऐसा. कलुषकरिकेलरी- पापहस्तिरूपी हाथियोंका संहार करनेवाला सिंह. कल्पना- इंद्रियोंके संमुख अनुपस्थित वस्तुओंके रूप गुणादिको अनुभूत करानेकी अंतःकरणकी शक्ति. मनगढंत बात. कल्याण- श्रेय, हित, शुभ. काकीमुद्रा- कौवेकी चोंचसा मुख बनाकर मुखसे अंदर सांस लेनेकी क्रिया इससे साधक निरोगी बनता है. काम- संगजन्य मूलभूत विकार. विषय सुंदर लगना. विषयोंमें माधुर्यका अनुभव. विषयेच्छा, संतान कामना ऐहिक सुखाशा. भोगाकांक्षा. कामना- भोगोंकी इच्छा. काम्यकर्म- फलभोगेच्छासे किये जानेवाले कर्म. कायी-काई- जल पर अथवा शिलापर आनेवाला घासका जाला. कारस्थान- षड्यंत्र. कालकूटकल्लोलतरंग- कालकूट विषके हिलोरोंके तरंग. कालाग्निरुद्रगूढ- प्रलयकालके भयानक अग्निका सा गूढ. किरात- प्राचीन कालकी एक वन्य जाति जो क्रूर होती थी

किलनी- पशुओंके देहमें चिपकनेवाला एक कीट. संभवतः वह स्वेदज है. कुंतलालकमस्तक- जिसके सिरपर घुंगराले बाल हैं. कुमुदिनी चंद्रविकासी कमल. कुल्लापडगा- पीकदान, थूकनेका बरतन. कुश- दर्भ, घास. कुहर- गुफा. कुहराम- रोना, पीटना, क्रंदन आर्तक. कूं़चा- झाडू.-देवघरमें सफ़ाई करनेवाला. कृतांत- यम, काल, अंत लानेवाला. कृतार्थ- कृतकृत्य. सफल मनोरथ. केलिप्रिय- क्रीडाप्रिय. कैवल्यधाम- मुक्तिमंदिर. कोंचना- चुभाना, गडाना, गोदना. कोंदण- जडाव, पच्छी, मूंडा. कोपल-कोंभ, कोंभ- अंकुर कल्ला. कोपट- छोटी झोपडी. कोशकीटक- घर बनाकर अपनेको बाहर जानेका रास्ता न रखनेवाला कीडा जो अपनेलिये घर बनाकर उसी घरमें मरता है ! कोऽहं- मैं कौन हूँ इसकी जिज्ञासा. कौतुक- आश्चर्य, विनोद, कुतूहल, सराहना. कौतूहल- कुतूहल. क्रमयोगी- क्रमानुसार ब्रह्मप्राप्त करनेवाला योगी. क्रोधावर्त- क्रोधका भंवर. ख खत्ती- अनाज सुरक्षित रखनेका स्थान. खद्योत- जुगनु. खर- गधा. खुगीर- नमदा, जीन. खेचर- आकाशगामी वायु. खोडरूप- शहतीर, अडगोडा, आधार.

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खोल- ज्ञानेश्वरीका मूल मराठी शब्द, गहरा. गंगावति- ज्ञानेश्वरीका मूल मराठी शब्द सामान्य घासपात. गगन- आकाश. गंडकी- गंडकी नदी, गंडकीमें मिलनेवाले शालिग्राम. गंडस्थल- हाथीके मस्तकका नरम भाग जो ऊपर उठा हुवा रहता है. गंधर्व- अदृश्य पुरुष, स्वर्गके गानेवाले गायक. गंधर्व नगर- आकाशमें बादलोंद्वारा दीखने वाला नगरोंका भास. गंधानिल- सुगंधयुक्त हवा. गभस्ति- सूर्य. गरल- विष. गरिमा- बड़प्पन, गुरुत्व, महिमा, महत्ता. अष्टसिद्धियोंमें एक. गर्त- गढ़ा. गर्दभी- गधी. गवाक्ष- खिड़की, झरोखा. गह्वर- गुफा, कंदरा, गुप्तस्थान. गात्र- शरीर. गाभा- नया कल्ला, अंकुर, कोपल-मराठी अर्थमें, अंतरतम भाग, अर्थ रहस्य. गायत्री- एक वैदिक छंद. वेदका एक प्रसिद्ध मंत्र. गायत्री छंदमें तीन चरण और चौबीस अक्षर होतें हैं। गिरगिट- बार बार अपना रंग बदलनेवाला छिपकली जातिका एक प्राणी. गीतागम- गीतानामका साधनाशास्त्र गीताकी परंपरा. गुज-गुज- मूल मराठी शब्द गुह्य, गुप्त. गुण- मूलतः यह सांख्य शास्त्रका शब्द, मूलद्रव्य. इसके बाद इसको एक नैतिक आधार मिला है गुण लाभदायक, धर्म लक्षण सूचक, वृत्ति-विशेष. गुणातीत- गुणोंका अतिक्रमण किया हुवा. गुणानुसार- गुणके अनुसार. गुण-कर्म- गुण और कर्म. गुब्बारा- हवासे आकाशमें उड़नेवाला. गुरुगम्य- गुरुसे ही समझमें आनेवाला. गुल्फ- एड़ीके ऊपरकी गांठ. गुंगची- घुंघची, अंगारवल्ली, गुंजा रती. गूढ़- गुप्त. गेह- घर, गृह, मकान. गोफिया - गोफन. गोष्ठ- गोष्ठि. ग्रस्त - पकड़ा हुवा, पीड़ित. ग्रामसिंह - कुत्ता. घ. घट - मिट्टीका घड़ा, मटका. घंटिका - पैरके घुंगरु कण्ठमणी. घन - बादल. घना - गहरे. घाम - धूप, ताप. घिघियाना - गिड़गिड़ाना, करुणाजनक प्रार्थना घिनाना - घृणा करना. घिनौना - घृणाजनक, घृणित. घोर - ज्ञानेश्वरीका मूल शब्द - खुरटिमरना घ्राण - नाक. चकोरशावक- चंद्र किरणोंसे अमृत खाकर जीनेवाले चकोर पक्षीका पिल्ला. चक्रवाक- जिसका अपनी मादीसे दिनमें संयोग, रातको वियोग होता है ऐसा एक पक्षी. चंगुल- हाथकी अंगुलियोंकी पकड़. चंडांश- सूर्य. चतुरचित्तचकोरचंद्र- रसिकोंके चित्तको ही चकोर मानकर उनको आनंद देने- वाला चंद्र. चतुष्पाद- चार पैरवाला जानवर.

२०५ परिशिष्ट ६