ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
इन नक्षत्रोंमें २७ विशिष्ट नक्षत्रोंका उल्लेख है जिनका ज्योतिष-शास्त्रमें महत्त्वपूर्ण स्थान है। इन नक्षत्रोंमें मृग नक्षत्रका स्वामी चंद्र है। शशांक—पौराणिक आख्यानोंके अनुसार यह समुद्र-मंथनसे उत्पन्न हुआ। इसको सोम भी कहा गया है। नक्षत्रोंको चंद्रकी पत्नियां कहा गया है। इन सत्ताईस स्त्रियोंमेंसे रोहिणी पर इसका विशेष प्रेम था। इस ईर्ष्यासे अन्य स्त्रियोंने प्रजापतिसे शिकायत की। प्रजापतिने क्षयरोगी होनेका शाप देकर पुनः वृद्धि होनेका उद्धशाप दिया। इससे प्रति मास क्षय पक्ष और वृद्धि पक्ष माने जाने लगे। चंद्रके विषयमें अन्यान्य पुराणोंमें अनेक कथायें हैं। चंद्रको "आह्लाद देनेवाला" कहा जाता है। क्यों कि चंद्र शब्द "चदि" आह्लाद दायक धातुसे बना है। ज्योतिष शास्त्रमें यह ग्रह है। यह पृथ्वीका उपग्रह माना जाता है। यह पृथ्वीसे २३९००० मील पर है। इसकी परिधि २१६० मील है। २७ दिन, ७ घंटे, ४३ मिनिट १४ सेकंडमें यह पृथ्वी प्रदक्षिणा करता है। यह पर प्रकाशित है। सूर्यके प्रकाशसे चमकता है। शतपथ ब्राह्मणमें लिखा है "चंद्र किरण वास्तवमें सूर्य किरण ही हैं।" अमावास्याके दिन सूर्य और चंद्र पृथ्वीकी एक ही ओर आते हैं। ऋग्वेदके पुरुष सूक्तमें "चंद्रमा विराट पुरुषके मनसे हुआ" ऐसा कहा गया है। कुछ प्राचीन ग्रंथोंमें चंद्रमाको "पानीका पुष्प" अथवा "पानीसे बना हुआ" कहा गया है। भारतीय धर्म ग्रंथोंमें अनेक प्रकारसे चंद्र-लोककी कल्पना की गयी है। गीताके आठवे अध्यायके पच्चीसवे श्लोकमें भी दक्षिणायनकी रातके समय मृत्यु पानेवाला चंद्र-लोक जा कर पुनः जन्म पाता है ऐसा कहा गया है। उपनिषदोंमें भी यह कल्पना है। प्राचीन भारतीय साहित्यमें "चंद्र सोमरस है।" "चंद्रमा प्राण है" "चंद्रमा मन है" "चंद्रमा प्रजापति है!" "चंद्रमा मनुष्य लोक है!" "चंद्रमा अन्न है!" ऐसा वर्णन मिलता है। इस प्रकार चंद्रमाका पृथ्वीके साथ घनिष्ठ तम संबंध बताया गया है। फल ज्योतिषमें चंद्रमाको चंचल, मनका प्रतीक माना गया है। गीता अ० १०, श्लो० २२-मैं सामवेद वेदोंमें— वेद-वेद भारतके ही नहीं विश्वके प्राचीनतम ग्रंथ हैं। वेद काव्य हैं। धर्म-ग्रंथ हैं। प्रेरणा ग्रंथ हैं। वेद भारतीयोंका जीवन सूत्र है। वेद भारतीय जन-जीवनका मूल स्रोत है। वैदिक वाङ्मय विपुल है। जितनां है उससे अधिक नष्ट हुआ है। वैदिक वाङ्मयके चार विभाग हैं। (१) जो श्रुति कहाते हैं वे हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वणवेद। श्रुतिका अर्थ सुनकर पाठकुंठ-किया हुआ। बडोंसे सुना और कंठ कर रखा गया, वह श्रुति। ऋग्वेद-ऋग्वेदमें- जो आज उपलब्ध है- १० मंडल, ८ अष्टक प्रत्येक अष्टकमें ८ अध्यायके अनुसार ६४ अध्याय, उनके २०७ वर्ग और परिशिष्टके साथ १०२८ सूक्त हैं। इन सूक्तोंमें १०५७० ऋचाएं हैं। इन्हें मंत्र कहते हैं। इन मंत्रोंमें १,५३,८२८ शब्द और पूर्ण उच्चार होनेवाले ४,३२,००० अक्षर हैं। ऋग्वेद-आज जो भाग उपलब्ध हैं उसको शाकलशाखा कहते हैं। ३७ परिशिष्ट ३
प्रत्येक वेदके ब्राह्मण, आरण्यक, तथा उपनिषद् ऐसे अलग अलग भाग हैं। ब्राह्मण वेदका कर्मकांड है। इसमें यज्ञ-यागादि विधि-विधान कैसे करना चाहिए इसका सविस्तर और सूक्ष्माति- सूक्ष्म, विवरण है और आरण्यक उपासना कांड है। इसमें आध्यात्मिक चिंतनका विवेचन है। और उपनिषद् इस विश्वके मूलमें जो तत्त्व है उसको जाननेका प्रयासरूप ज्ञानकांड है। ऋग्वेदके ऐसे ५ ब्राह्मण ९ आरण्यक और ४ उपनिषद हैं। ऋग्वेदका रचनाकाल विद्वानोंके अनुसार ६००० से ८००० वर्ष प्राचीन है। यजुर्वेद-यजुर्वेद यज्ञ संबंधि अधिक है। यजन विषयक ज्ञान-यजुर्वेद है। ऐसा माना जाता है कि प्राचीन कालमें इसकी १२२ शाखायें थीं। "यजन पद्धतिके भिन्नताके कारण ही ये शाखायें हुईं" ऐसे विद्वानोंकी मान्यता है। आज, यजुर्वेदकी पांच संहिताएँ उपलब्ध हैं। (१) काठक- संहिता (२) कठ-संहिता (३) मैत्रायणी-संहिता (४) तैत्तिरीय-संहिता (५) वाजसेनीय- संहिता। वाजसेनीय संहिताकी काण्व और माध्यंदिन ऐसी दो शाखाएं हैं। तैत्तिरीय संहिताको कृष्णयजुर्वेद कहते हैं। धनुर्वेद यजुर्वेदका उपवेद माना जाता है। यजुर्वेद गद्य पद्यात्मक है। यजुर्वेदके दो ब्राह्मण, दो आरण्यक, और ७ उपनिषद हैं। प्रसिद्ध ईशावास्योपनिषद् शुक्ल यजुर्वेदका अंतिम ४० वां अध्याय है। सामवेद-प्राचीन ग्रंथोंको देखनेसे ऐसा लगताहै कि प्राचीन-कालमें इसकी अनेक संहितायें थीं। अब केवल एक ही संहिता उपलब्ध है। पुनरुक्ति छोड़ दी जाय तो उसमें १५४९ ऋचायें हैं। इनमेंसे ७५ को छोड़ कर अन्य सभी ऋचाएं ऋग्वेदमें आई हैं। सामवेद-का अर्थ गानेका वेद ! विद्वानोंका ऐसा एक मत है कि भारतीय संगीतका प्रारंभ सामवेदसे हुवा है। यज्ञादिमें वेद गानेवालोंको उद्गाता कहनेकी परिपाठी थी। वैसे सामका प्रस्ताव-प्रारंभ-प्रस्तोता करता है। इसका मुख्य भाग-उद्गीथ-उद्गाता गाता है। और प्रतिहर्ता उसकी समाप्ति करता है। प्रत्येक ऋचा पर अनेक प्रकारके साम स्वर होते हैं। इन स्वरोंको यदि वर्तमान भाषामें 'स्वरलिपि' कहा जाय तो संभवतः अत्युक्ति नहीं होगी। सामवेदमें अनेक छंद हैं। पुरानी पोथियोंको देखनेसे पता चलता है कि सामवेदकी कई शाखाएँ थीं। किंतु आज केवल दो शाखाएँ उपलब्ध हैं। इन वेद-मंत्रोंको गानेके ३६ प्रकार आज उपलब्ध हैं। इन वेद-मंत्रोंको गानेके ८ प्रकार हैं। इन्हे (१) जटा (२) माला (३) शिखा (४) रेखा (५) ध्वज (६) दंड (७) रथ (८) घन ऐसे कहते हैं। संभव है कि गीता-कालमें सामवेद सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण रहा हो। तभी भगवानने वेदोंमें साम वेद मैं ऐसे कहा। अथर्ववेद-यह सामान्य लोगोंका वेद है। इसमें उतनी उदात्तता नहीं जितनी ऋग्वेदादिमें है। इसमें अभिचार-मंत्र और अभिचार विधि भी है। इसका प्राचीन नाम अथवांगिरस ऐसा है। इसका अर्थ है अंगिरस-वंशीय अथर्वा-ऋषिका कहा हुवा है। इसका और एक नाम भृग्वंगिरस भी है। भृगु ऋषि अंगिरस ऋषिके शिष्य थे। अथर्ववेदके प्रचारमें इन भृगु ऋषियोंका बडा महत्व है। साथ साथ अथर्ववेदको क्षात्र-वेद कहनेकी भी परिपाठी है। अथर्व वेदमें यज्ञोपयुक्त भाग अत्यंत अल्प है। अथर्व-वेदको पुरोहितोंका वेद भी कहते हैं। पहले अथर्ववेदके अध्ययन किये ज्ञानेश्वरी ४५
हुए ब्राह्मणको ही पुरोहित बनानेका नियम था । प्राचीन पोथियोंमें लिखा है "जिस राज्यमें अथर्ववेत्ता रहता है उस राज्यमें सभी उपद्रव शांत होते हैं।" राजनीति और युद्धोंमें ऐसे पुरोहितोंका बड़ा महत्त्व रहता था । अथर्व-वेदमें "राजकर्माणि" ऐसा एक बड़ा सूक्तसंग्रह है। इन सबका कर्माधिकार राजपुरोहितका होता है। इस वेदकी नौ शाखाएँ आज उपलब्ध हैं। अथर्व-वेदमें २० कांड और करीब ६००० मंत्र हैं । अलग अलग शाखाओंकी मंत्र-संख्या अलग अलग है। इसका एक बड़ा अंश ऋग्वेदसे लिया गया है। यह अग्नि उपासकोंका वेद ? है। इसमें आयुर्वेदके बीज भी देखनेको मिलते हैं। इसमें कुछ रोग और उसकी चिकित्साका विधान है। इसमें राष्ट्रीयता, सेना, शस्त्रास्त्र, सेना संचालन आदिका भी विवेचन है। साथ साथ कृषि गोपालन आदिका भी वर्णन या नियमादि हैं । अथर्व-वेदका एक ब्राह्मण और तीन उपनिषद हैं। आयुर्वेद, सर्पवेद, पिशाचवदे, असुरवदे आदि इसके उपवेद माने गये हैं । गीता अ० १०, श्लो० २२-देवों में देवराज मैं- देवराज-इंद्र ऋग्वेदका प्रधान देवता है। ऋग्वेदमें इंद्र पर सबसे अधिक सूक्त हैं। इंद्रके तीन रूप हैं । आकाशस्थ इंद्र देवता । शरीरस्थ इंद्र बुद्धि । इंद्रका मानवी रूप-सामाजिक-राजा । वैदिक ऋषियोंका यह राष्ट्रीय देवता है । इंद्र दस्युओंका शत्रु है। इंद्रका जन्म-वेदमें इंद्रके माता-पिताका पर्याप्त वर्णन होने पर भी उसका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। एक स्थान पर इंद्रके पिताका नाम "द्यु" मान कर माताका नाम "पृथ्वी" कहा है । एक स्थान पर इंद्र-जन्मके विषयमें अलंकारिक भाषामें कहा गया है । कहीं कहीं "बवंडर आया और जन्म हुवा !" ऐसे कहा गया है। जहां आकाशको इंद्रका पिता कहा गया है वहीं इंद्रके जन्मके साथ आकाश कांप उठनेका उल्लेख है। इंद्रके क्रोधसे आकाश कांप उठता है । पृथ्वी कांप उठती है । एक मंत्रमें कहा गया है "इंद्र अपने माता-पिताकी पर्वाह नहीं करता ।" "वह अपने माता-पिताको त्रस्त करता है।" बवंडरके समय भी तो पृथ्वी और आकाश त्रस्त होते हैं ! संभवतः इसीका यह वर्णन है। सभी ऋचाओंका सर्व-सामान्य अर्थ लिया तो बवंडरका सुंदर और भीकर वर्णन देखनेको मिलता है । इंद्र-जन्मका जितना अधिक अध्ययन किया जाय उतना वह अधिक दुर्बोध होता जाता है । एक स्थान पर इंद्रका मानवी स्वरूप देखनेको मिलता है। "इंद्रके जन्म-समयमें उसके चारों ओर चार दासियां एकत्र हुईं !" "इंद्रने जन्मते ही सोमपान किया !" "देवियोंने उसको पालनेमें झुला झुला कर उसके पराक्रमको जगाया !" एक स्थान पर इंद्र स्वयं कहता है "मेरे पिताने मुझे अशत्रु निर्माण किया।" "एक वीर-पत्नीके गर्भसे एक वीर पुत्रका जन्म हुवा" इंद्र सोमपानसे मत्त होकर झूमता हुवा बड़बड़ाता जाता है। फिर भी वेदके गहरे अध्ययन करनेवाले कहते हैं कि इंद्र बवंडरकी देवता है। इंद्रके शत्रुगण-इंद्रके साथ लड़नेवाले सबके सब "वर्षा चुराने वाले" हैं । (१) अर्बुद-एक मंत्रमें कहा गया है । "तूने उस गंदे अर्बुदको कुचल डाला ।" अर्बुदके पहाड़ोंसे ४९ परिशिष्ट ३
गायोंको मुक्त किया।” (२) अहि-अहिका अर्थ दैत्य अथवा सर्प है। अनेक विद्वानोंने अहिको वृत्र कहा है जो इंद्रका सबसे बड़ा शत्रु है। (३) श्वघ्न-दो तीन बार इसका वर्णन आया है। कहा गया है “इंद्रने इसका निवासस्थान उध्वस्त किया।” “इंद्रने सूर्यको उदय होनेको कह कर इस लोभीका संहार किया।” (४) इलीविश-केवल एक बार इसका उल्लेख है। “इंद्रने इसको धूलमें मिला दिया।” इसको “पानीको रोकनेवाला” कहा है। (५) कांरज-यह सदैव वृत्रके साथ रहता है। इंद्रने इसका दो बार पराजय किया। (६) कुयव-यह शब्द विशेषण बनकर कई बार आया है। कुछ विद्वानोंने इसका अर्थ “बुरा बोलनेवाला” ऐसा किया है। तो कुछ विद्वानोंने इसका अस्वीकार किया है। (७) निमुचि-पाणिनीने इसका अर्थ वर्षा न होने देने वाला ऐसा किया है। इंद्रने इसका सिर उड़ाया था। (८) नववास्त्व-कई बार इस का नाम आया है। “जिसका वसति-स्थान नया वह” एक स्थान पर इसका उल्लेख “बृहद्रथ” इस नामसे आया है। इंद्रने इसके रथ और इसके टुकड़े टुकड़े कर दिये। (९) पणि-सदैव यह गायोंको भगाकर छिपा देता है। अथर्वन् अंगीरसकी प्रेरणासे इंद्रने इसको मारा। (१०) विमृ-इसको “कानून तोड़नेवाला” कहा गया है। साथ साथ यह विशालकाय है। शुष्ण और शंबरके साथ लड़ने आता है। इंद्रने इसको मारा है। (१०) वर्षिन्-यह सदैव शंबरके साथ है। इसके साथ इसकी एक खास सेना है। इसको भी इंद्रने मारा है। (११) वल-वलका अर्थ गुफा है। यह सदैव गुफामें रहता है। इंद्रने इसको तोड़कर पणीका संहार किया। एक स्थान पर “बृहस्पतिने वलका स्थान दिखाया” ऐसा उल्लेख है। (१२) शंबर-वाजसेनीय संहितामें इसको दैत्याधिपति कहा गया है। वेदमें इसको दास कहा गया है। इसको कौलीत्तर अथवा कुलत्तरका लड़का कहा गया है। पाश्चात्य विद्वानोंका मत है कि यह किसी आर्येतर जाति-कुलका नाम होगा। इंद्रने “दूसरे राक्षसके साथ शंबरका वध किया” है। “शंबर पर्वत पर रहता है चाहे वह पृथ्वी पर रहता हो अथवा अंतरिक्षमें बादलों पर रहता हो !” एक स्थान पर लिखा गया है “शंबर अपनेको देव मानता था !” पर्वतों पर इस शंबरके १०० किले थे। इसका अंतिम किला रातको गिरा। शंबरको मारनेके लिये इंद्रको ४० वर्ष लगे। इतने दिन तक इंद्र शंबरको खोजता रहा। कई विद्वानोंने इसका ऐसे अर्थ किया “४० वर्ष तक बवंडर चलता रहा।” वस्तुतः शंबरका मुख्य शत्रु दिवोदास है। दिवोदास इंद्रका भक्त है। अश्विनीने इस काममें सहायता की है। १३ शुष्ण, १४ स्वर्भानु आदि ४० इंद्र-शत्रुओंका नाम मिलता है जिन्हें इंद्रने मारा है। वैदिक ऋषि पुनः पुनः प्रार्थना करके इंद्रको “पराक्रम करनेकी प्रेरणा” देते हैं। इंद्रसे लड़नेवाले सभी “वर्षाको रोकते हैं गायको छिपा देते हैं!” इंद्रसे जब जो युद्ध हो कर इंद्र शत्रुको मारता है तब “सदैव उषा और सूर्य आकाशमें प्रस्थापित होते हैं!” विद्वानोंकी यह मान्यता है “वातावरणके नैसर्गिक संघर्षको मानवी-युद्धका रूप देकर अवकर्षणायदि राष्ट्रीय आपत्तियोंको दूर करनेवाले इंद्रको राष्ट्र-पुरुष मानकर आर्योंने राष्ट्रीय भावनाका उदय और पोषण किया है।” इससे “राष्ट्र-हितके लिये अपना जीवन उत्सर्ग करनेका भाव भर दिया है।” “वृत्र” इंद्रका महान् शत्रु है। इंद्र-वृत्र-युद्ध मानो सृष्टि चमत्कारोंका सुंदर सजीव वर्णन माना जाता है। इसमें ऋषियोंकी काव्य-प्रतिभाका सजीव दर्शन होता है। (१) वृत्र गायोंको भगाने (२) सूर्यको छिपाने (३) सूर्योदय रोकने (४) वर्षाको रोकनेका “पराक्रम” करता है। वृत्र वराह-भक्षी है। शीघ्रगामी है। त्रसका वर्णन बादलोंके आकारोंका वर्णन है। मत्र कुहरेमें छिपकर बैठ जाता है।
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कुहेरेको लपेट कर आक्रमण करता है। गडगडाहटसे इंद्रको डरानेका प्रयास करता है। इससे देव भाग जाते हैं किंतु इंद्र अपना स्थान नहीं छोड़ता। इंद्रके वज्र प्रहारसे विश्व कांप उठा। वृत्र मर गया। ऊपरका वर्णन इंद्रका स्वरूप समझनेके लिये पर्याप्त है। इंद्र आर्योंके आत्म-विश्वासकी जीती जागती मूर्ति है। इंद्रके पराक्रमका फल प्रकाश है। इंद्रके युद्धारंभ सदैव अंधकारमें होते हैं। तमावरणमें वह शत्रुको मारता है। उसके बाद आकाशमें उषा और सूर्यकी प्रस्थापना होती है ! इस लिये “ इंद्र शिवः सखा” है। वैदिक ऋषि उससे “न्याय, सामर्थ्य, तेज, दिगंतकीर्ति, और ऐश्वर्य” मांगते हैं। इंद्र भी कहता है “मैंने ही यह भूमि आर्योंको दी है।” इसलिये वह आर्योंका राष्ट्र- पुरुष है। इस पर १९९ सूक्त हैं। ऊपर वैदिक इंद्रका वर्णन है। पुराणोंमें प्रत्येक मन्वंतरोंमें एक इंद्र होता है। सौ यज्ञ सांग करनेवाला इंद्र-पद पाता है। प्रजा-संरक्षण इसका मुख्य कार्य है। असुरोंमेंसे हिरण्य-कश्यपु, प्रल्हाद, और बलि इन तीनोंने इंद्र-पद प्राप्त किया है। इससे इंद्र-पदकी राजनैतिक स्थितिका बोध होता है। त्रिशंकु, वसिष्ठ, विश्वामित्र, वामदेव, रोहित, गौतम, गृत्समद, भारद्वाज, सोम, इंदुल, अर्जुन आदिके जीवनमेंसे भी इंद्र-पदका राजनैतिक रूप स्पष्ट होता है। इंद्र कश्यप और अदितिका पुत्र। देवोंका राजा। वर्षाका देव। इंद्र-पद प्राप्तिके लिये किये जानेवाले यज्ञ नष्ट करना तपोभंग करना इसका काम। हिरण्यपुत्र महाशलिने इसको जीता है। वरुणने इसको बंधन-मुक्त किया। ऐरावत, कल्पवृक्ष, अमृत आदि पर इसका स्वामित्व। गरुडने एक बार इससे लडकर अमृत ले लिया। फिर गरुडके कहनेसे इंद्रने चालाकीसे यह पुनः पालिया। नहुष-मानव-भी एकबार इंद्र बना था! पुराणोंमें इंद्र प्रथम-स्थानका देवता नहीं है। यह अंतरिक्षमें पूर्व दिशाका स्वामी है। इंद्रने कई बार कई लोगोंसे मार खाई है। कई लोगोंके शापसे भ्रस्त हुआ है। इसका निवासस्थान स्वर्ग। अमरावती इसकी राजधानी। इसका राजप्रासाद वैजयंत। बाग नंदनवन। वाहन ऐरावत। हत्यार वज्र। घोडा उच्चैः श्रवा। रथ विमान। सारथी मातली। धनुष्य शक्र। तलवार परंज। गीता अ० १०, श्लो० २२-मन हूं मैं इंद्रियोंमें- अपने अपने विषयोंको ग्रहण करना इंद्रियोंका काम है। त्वचा, चक्षु, श्रोत्र, जिव्हा, घ्राण, ये पांच ज्ञानेंद्रिय हैं। इनके विषय हैं स्पर्श, रूप, शब्द, रस, गंध। बिना इंद्रियोंके अन्य किसी साधनसे विषयोंका ज्ञान होना असंभव है। इन्ही इंद्रियोंसे शीतोष्ण सुख दुःखादिका बोध होता है। इंद्रिय शरीरसे संयुक्त अतींद्रिय और ज्ञानका कारण है। इन पांच ज्ञानेंद्रियोंको बहिरिंद्रियां कहते हुए मनको अंतरिंद्रिय कहा गया है। मनको अणुपरिमाण और हृदयके भीतर रहनेवाला अर्थात् अंतःकरण कहा गया है। बाह्य पांच ज्ञानेंद्रियोंके साथ पांच कर्मेंद्रियां भी होती हैं। हाथ, पैर, गुदा, शिश्न, और वाचा ये पांच कर्मेंद्रिय हैं। ये पांच अपना अपना कर्म करती हैं। इन पांच ज्ञानेंद्रिय और पांच कर्मेंद्रियों पर मनका स्वामित्व है। ये इंद्रिय मनुष्यको बाह्य विषयोंका ज्ञान कर देती हैं। बाह्य कर्म करती हैं किंतु अंतर्विषयको ज्ञानके लिये आंतरिक कर्मके लिये इनकी आवश्यकता नहीं होती। अंतःकरण या मनके द्वारा आंतरिक ज्ञान सुख दुःखादि होता है। वेदांतियोंके मतानुसार वह दर्पणके समान होता है। ५१ परिशिष्ट ३
सांख्यमतके अनुसार इंद्रिय ग्यारह हैं। पांच ज्ञानेंद्रिय, पांच कर्मेंद्रिय, एक मन। मन इंद्रियोंसे अलग न माननेसे इंद्रियोंमें मन कहा गया है। गीता अ० १०, श्लो० २२-चेतना भूत मात्रमें- जो कुछ चराचर पदार्थ है उसमें जो स्मृति, बोध, सुख, या संज्ञा है, वह चेतना है। प्रकृतिमें जो कुछ है उसमें जो तत्त्व है, जिस तत्वसे जिस किसीका अस्तित्व है वह चेतना है। चेतना अथवा चैतन्यका केवल अस्तित्व है। आकार प्रकार रंग रूप नहीं। केवल एक बोध है, जो इंद्रियातीत है, उसको दिखा नहीं सकते। बता नहीं सकते। कह नहीं सकते। जिसमेंसे "मैं" का स्फुरण होता है "मैं" का बोध होता है और स्मृति रहती है, वह चेतना है। वह चैतन्य सर्व-व्यापी है। भूतमात्रोंमें है। गीता अ० १०, श्लो० २३-रुद्रोंमें मैं सदाशिव- रुद्र-एक वैदिक देवता। ऋग्वेदमें इस पर तीन सूक्त हैं। वेदका रुद्र बडा शक्तिशाली, पराक्रमी, शत्रुओंको मारनेवाला है। वह अत्यंत भयप्रद है। जटाधारी है। बलिष्ठोंमें बलिष्ठ है। वज्रबाहु है। चिर-तरुण है। त्रिशूल इसका आयुध है। यह त्रिनेत्र है। इसका पेट काला और पीठ लाल है। इसका धनुष्य शक्तिशाली होता है। ऋग्वेदमें इसको क्रूर कहा है। यह संहारक है। ज्वर पैदा करनेवाला है। रुद्र रोग हरणमें कुशल है। श्रेष्ठ वैद्य है। देवोंसे भी रक्षा करनेके लिये ऋषि इससे प्रार्थना करते हैं। ऋग्वेदके रुद्र-सूक्त देखनेसे "सदैव प्रेम-वर्षा करनेवाली माँकी लाल आंखें देख कर- "माँ ! आंख मत दिखा, प्यार कर" कहनेवाले बालकका दर्शन होता है। किंतु पौराणिक रुद्र कश्यप और सुरभिके पुत्र हैं। अलग अलग पुराणोंमें इनके विषयमें अलग अलग बातें हैं। रुद्र ग्यारह हैं। इनको एकादश रुद्र कहा जाता है। इनके नामके विषयमें भी एक-वाक्यता नहीं है। अलग अलग पुराणोंमें अलग अलग नाम हैं। महाभारतके आदि पर्वमें : (१) मृगव्याध (२) सर्प (३) निर्ऋति (४) अजैकपाद (५) अहिर्बुध्न्य (६) पिनाकी (७) दहन (८) ईश्वर (९) कपाली (१०) स्थाणु (११) भव ऐसे नाम दिये हैं। किंतु महाभारतके शांति पर्वमें (१) अजैकपाद (२) अहिर्बुध्न्य, (३) विरूपाक्ष (४) रैवत (५) हर (६) बहुरूप (७) त्र्यंबक (८) सुरेश्वर (९) सावित्र (१०) जयंत्य (११) पिनाकी है। किंतु ये नाम प्रसिद्ध हैं। (१) भूतेश (२) नीलरुद्र (३) कपाली (४) वृषवाहन (५) त्र्यंबक (६) महाकाल (७) भैरव (८) मृत्युंजय (९) कामेश (१०) योगेश (११) शंकर। शंकर-कश्यप और दनुका पुत्र। कैलासवासी, त्रिनेत्र। दक्षने इसे अपनी कन्या दी थी। दक्ष यज्ञमें इसने दक्षका संहार किया। समुद्रमंथनसे जो हलाहल विष निर्माण हुआ उसको इसने लोक-कल्याणार्थ पी लिया। इससे इसका गला नीला हो गया। इसीलिये इसको नीलकंठ कहते हैं। हालाहल विषके तापसे बचनेके लिये इसने जटामें चंद्र धारण किया। इस शंकरको शिव भी कहते हैं। शिवकी उपासना करनेवाले शैव। भारतीय संस्कृतिमें शैव-दर्शनका अत्यंत महत्त्वका स्थान है। अनेक पुराणोंमें शंकरकी कथाएँ हैं अथवा अनेक शैव-पुराण हैं। यह सदैव देवोंकी ओरसे दैत्योंसे लडने आया है ! ज्ञानेश्वरी ५२
गीता अ० १०. श्लो० २३-कुबेर यक्ष-रक्षोंमें— यक्ष—देवयोनिकी एक जाति। विद्याधरोंके निवासके निम्न भागमें मेरु पर्वत तक, जहां तक हवा चलती है यक्षोंका वास है। इन यक्ष-गणोंका स्वामी कुबेर है। कुबेर—पिताका नाम विश्रवा ऋषि। माताका नाम इडविडा अथवा मंदाकिनी। मांके नामके विषयमें मतभेद है। इडविडा विश्रवा ऋषिकी पत्नी है या माता ऐसा भ्रम होता है। ब्रह्माने इसको राक्षसगणोंके साथ लंका, पुष्पक विमान, यक्षोंका आधिपत्य, धनेशत्व, लोकपालत्व और रुद्रकी मित्रता दी थी। रावण इसका सावत्र बंधु। रावणने इससे लड़कर लंका और पुष्पक विमान छीन लिया फिर यह उत्तराधिपति बना। अलका इसकी राजधानी। मणिग्रीव और नलकूबर इसके पुत्र। इसको उत्तराधिपति कहा गया है। यह उत्तरके यक्ष लोगोंमें रहता है। ऋद्धि और सिद्धि इसकी शक्तियां हैं। मणिभद्र, पूर्णभद्र, मणिमत्, मणिकंधर मणिमूस, मणिस्रग्विन्, मणिकामुखधारक ये यक्ष इसके सेनापति हैं। कुबेर-सभा इसकी राज्यसभा है। गंधमादन पर्वतकी संपत्तिका चौथा हिस्सा इसके आधीन है और केवल सोलहवा हिस्सा मनुष्योंको मिला है। मेरु पर्वतके उत्तरमें विभावरी इसका वसति-स्थान है। इसका वन सौगंधिक है। जिस किसी राज्यमें ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी एकता रहती है उस राज्यका विकास होता है। ऐसा राज्य सुखी रहता है। यह कुबेरका राजनैतिक सिद्धांत है जो इसने मुचकुंदको कहा था ! गीता अ० १०. श्लो० २३-अग्नि मैं वसु वर्गमें— वसु—वैवस्वत मन्वंतरकी दक्ष-कन्या वसुके आठ पुत्र वसु संज्ञक देव हैं। इन अष्ट-वसु ओंका नाम अलग अलग पुराणोंमें अलग अलग है। पद्मपुराणमें—धर, ध्रुव, सोम, आप, अनिल, अनल, प्रत्यूष, प्रभास। भागवत पुराणमें— द्रोण, प्राण, ध्रुव, अर्क, अग्नि, दोष, वसु, विभावसु ऐसे दिये हैं इसमें पावक। अग्नि—अग्निका अर्थ करते समय ॥ सदैव ऊपर उठता है वह ॥ ऐसे किया गया है। अग्नि वैदिक देवता भी है किंतु यहां वसुके अग्निका विचार करना है। धर्म-और वसुका पुत्र अग्नि, इसकी पत्नी वसोर्धारा। द्रविणक पुत्र। अग्नि अनेक मिलते हैं किंतु अष्टवसुओंमें जो अग्नि है उसकी इससे अधिक जानकारी नहीं। गीता अ० १०. श्लो० २३-मेरु मैं गिरिमालामें भारतके प्राचीन ग्रंथोंमें जगह जगह पर मेरु पर्वतका वर्णन आता है। किंतु इसकी भौगोलिक जानकारी नहीं मिली। किंतु स्वर्गारोहणपर्वमें लिखा गया है कि पांडव मेरु-पर्वत पर जाने निकले। वे हस्तिनापुरसे पूर्वकी ओर चले। अनेक देशोंसे प्रवास करते करते समुद्रके किनारे गये। वहां समुद्र पार करके हिमवत् पर्वतके उस पार जो मेरु शिखर था वह चढ़नेके लिये उसके पास आये। मेरु शिखरको वंदन करके उस पर चढ़ने लगे। मेरु शिखर पर चढ़ते समय प्रथम द्रौपदीका पतन हुआ। ५३ परिशिष्ट ३
धर्मराज युधिष्ठिर और उसका एक कुत्ता छोड़कर और सबका पतन मेरुशिखर चढ़ते समय ही हुवा । मेरुशिखर चढ़नेपर स्वर्ग आया । इस वर्णनसे भी मेरुशिखरके विषयमें-उसकी भौगोलिक स्थितिके विषयमें कहने जैसी कोई जानकारी नहीं हुई । गीता अ० १०. श्लो० २४-बृहस्पति मुझे जान पुरोहित प्रधान जो— पुरोहित—प्राचीन कालमें राजाके राजकाज और धर्मकार्यमें आवश्यक सहायता और पथप्रदर्शन करनेवाले प्रमुख ब्राह्मणको पुरोहित कहा जाता था । यह पुरोहित राजाका शिक्षक, अंतरंग-मित्र, तथा पथप्रदर्शक होता था । ऋग्वेदमें ऐसे अनेक पुरोहितोंका उल्लेख मिलता है । दिवोदास भरत-वंशका प्रसिद्ध राजा । ग्रीकके इतिहासमें फिलिप और अलेक्झांडरका जो स्थान है वही स्थान भारतके प्राचीन इतिहासमें दिवोदास और सुदासका है । भरद्वाज दिवोदासका महान और कुशल राजपुरोहित था । शंबर दिवोदासका शत्रु । भरद्वाजने शंबरके विरुद्ध इंद्रकी शक्ति दिवोदासके पीछे खड़ी की । वैसे ही वरशिखाभोंसे पराजित, साधन हीन अभ्यवर्तिन् और प्रस्तोक भरद्वाजको पुरोहित बननेकी प्रार्थना करते हैं। भरद्वाज पुरोहित बन कर पथ-प्रदर्शन करता है। दोनो शक्तिसंपन्न होकर वरशिखाभोंको पराजित करते हैं। ऋग्वेदमें भरद्वाजकी भांति, श्रुतबंधु, कवष, प्रियमैध, वामदेव, कक्षीवान आदि पुरोहितोंके कर्तृत्वका उल्लेख है । वैसे ही विश्वामित्र और वसिष्ठ । दोनों सुदासके पुरोहित । सुदास दिवोदासका पुत्र । विश्वामित्रके पथ-प्रदर्शकत्वमें अश्वमेध यज्ञ करता है। इसमें अनेक राजा पराजित हो जाते हैं। पराजित राजा सब एक होकर सुदास पर आक्रमण करते हैं । तब पुरोहित वसिष्ठ ! वसिष्ठके पथप्रदर्शकत्वमें नौ राजाओंसे - जो एक साथ संगठित होकर आक्रमण करते हैं-लड़कार जीतता है । दोनों ओरकी सैन्य शक्ति देख कर आश्चर्य होता है । वेदमें “मेढने सिंहकी शिकार किया" इन शब्दोंसे इस युद्धका वर्णन किया है । आगे, न्यायदानमें भी पुरोहित सहायता देता था । कौटिलीय अर्थशास्त्रमें भी राज-पुरोहितके कर्तव्य, योग्यता, अधिकार आदिका उल्लेख है। कौटिलीय स्वयं एक प्रकारसे पुरोहित था । शुक्र जैसे दैत्योंका पुरोहित था वैसे बृहस्पति देवोंका पुरोहित था। राजा, मान्य, विद्वान, व नीतिसंपन्न ब्राह्मणोंको सम्मानपूर्वक बुलाकर अथवा उनके पास जा कर पौरोहित्य स्वीकार करनेकी प्रार्थना करते थे । बृहस्पति- बृहस्पति इस पुरोहित-वर्गका श्रेष्ठतम पुरोहित थे। बृहस्पति शब्दका अर्थ वाचस्पति-वाचाका पति अथवा महान तपोघन । बृहस्पति सूक्त द्रष्टा ऋषि हैं । बृहस्पति युद्ध विशारद भी हैं। धनुष्य, बाण, स्वर्ण, परशु इसके हत्यार हैं । ये अत्यंत पराक्रमी थे। इनके रथके घोडे लाल होते थे । ये अत्यंत चरित्रवान् सुद्याचरणी तथा परोपकारी थे। बृहस्पतिने इंद्रको ज्ञानेश्वरी ५४
राज-धर्म सिखाया था। प्राचीन धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र तथा अर्थशास्त्र पर इनके ग्रंथ हैं। अन्य अनेक शास्त्र ग्रंथोंमें इनके नाम देखनेको मिलते हैं। गीता अ० १०, श्लो० २४—स्कंद सेनाधियोंमें मैं— स्कंद—देवोंका सेनापति । शंकर-पार्वतीका पुत्र । स्कंदके जन्मके विषयमें अनेक प्रकारकी जनश्रुतियां हैं। इसकी स्त्री देवसेना। महादेवके वरप्रसादसे डम्पत्त बने हुए तारकासुरका इसने वध किया। तारकासुरने देवोंको अत्यंत कष्ट दिये थे। केवल तारकासुरके नाशके लिये इसका जन्म था। तारकासुरसे युद्ध करनेसे पूर्व देवोंने क्रौंच पर्वत पर इसका सेनापत्याभिषेक किया था। इसने विश्वकी स्त्री अपनी माताके समान मान कर व्रत लिया। विश्वामित्रने इसका उपनयन संस्कार किया। विष्णूने इसको वाहन दिया। वायुने ध्वज दिया। सरस्वतीने वीणा दी। गीता अ० १०, श्लो० २५—भृगु मैं ऋषिवृंदमें— ऋषि—इस शब्दकी उत्पत्तिका विचार किया जाय तो “उत्तमतापूर्वक गतिमान होना” ही ऋषि शब्दका अर्थ है। “दैवी स्फुरणसे स्फूर्त” अर्थात् ऋषि। यह अत्यंत प्राचीन शब्द है। वैदिक युगका शब्द है। ऋग्वेदमें सौसे अधिक बार इस शब्दका उल्लेख आया है। किंतु ऋग्वेदके सभी भाष्यकारोंने ऋषिका अर्थ “मंत्रदृष्टा” ऐसा किया है। ऋग्वेदमें एक जगह “ज्ञानघन अग्नि अत्युत्तम नियामक ऋषि” होनेकी बात कही है। ऋग्वेदमें जिन्हे ऋषि कहा गया है उनकी ओर देखनेसे ज्ञानी, प्रतिभा संपन्न, कवि, तथा तप-सामर्थ्य भी इनका लक्षण दीखता है। किंतु कोई भी ऋषि संन्यासी नहीं दीखता। सभी संसारी हैं। उद्देश्य पूर्वक-विश्वहितार्थे राजनीतिमें भी वे उतरते हैं। वे योद्धा भी होते हैं। इनमें कई धनुर्वेदके अर्थात् धनुर्विद्याके अच्छे जानकार हैं। सर्वत्र सामाजिक तथा राजनैतिक उथल पुथलमें ऋषि-प्रेरणा और कर्तृत्व दीखता है। वे सभी प्रकारके कौटुंबिक सुखकी अपेक्षा भी करते हैं। वेदकाल, ब्राह्मणकाल, उपनिषदकालमें ऋषि-जीवनका जो दर्शन होता है, जो स्वभाव धर्म दीखता है उसमें भिन्नता है। वेदकालसे लेकर जनमेजयके कालतक ऋषि दीखते हैं। किंतु नंद, गुप्त, शृंग आदि कालमें ऋषि नहीं दीखते। संभवतः जनमेजयके कालमें ही ऋषि परंपरा समाप्त हुई। इन प्राचीन ऋषियोंमें (१) भृगु (२) मरीचि (३) अत्रि (४) अंगिरा (५) पुलहः (६) क्रतु (७) मनु (८) दक्ष (९) वसिष्ठ (१०) पुलस्ति इनको महर्षि कहा गया है। कुरुयुद्धके कालमें व्यास महर्षि थे। भृगु—सर्व प्रथम भृगुको अग्नि मिला। प्रजापतिके रेतसे आदित्य, भृगु और अंगिरस उत्पन्न हुए। दक्ष-यज्ञमें भृगु था। यज्ञ-विध्वंसमें भृगुकी दाढी जली! दक्षकन्या-ख्याती भृगुकी पत्नी। शंकर इसका साडू। धातृ, विधातृ इसके दो लडके और लक्ष्मी लडकी। भृगु दैत्य गुरु। भृगु-पत्नीने देवोंसे युद्ध किया था। विष्णुने सुदर्शनसे भृगु-पत्नीका वध किया और भृगुने विष्णुको “गर्भजन्म दुःख भोग” का शाप दिया। नहुषने जब सप्त-ऋषियोंको अपने रथको जोडा तब भृगुने ही उसको शाप देकर इंद्र पदसे पदभ्रष्ट किया था। ५५ परिशिष्ट ३
दिव्या भृगुकी दूसरी पत्नी । दिव्यासे १२ देव बने । इनके नाम पर भृगुस्मृति, भृगुगीता, भृगुसंहिता, भृगुसिद्धांत, भृगुसूत्र आदि ग्रंथोंका उल्लेख है। यह गोत्रकार ऋषि है ! भृगुकुलोत्पन्न सब भार्गव कहलाते हैं । गीता अ० १०, श्लो० २५-मै एकाक्षर वाणीमें— उपनिषदोंमें ब्रह्मको प्रणव अर्थात् ओं अथवा ॐ कहा है । गीता अ० १०, श्लो० २५-जप हूं सब यज्ञोंमें— यज्ञ—अपनी इच्छानुसार अग्नि-प्रज्वलित करनेका शोध मानवी इतिहासमें अत्यंत महत्त्वका शोध है । संभव है कि यही मानवी-बुद्धिका सर्व-प्रथम सफल प्रयोग हो । इसलिये विश्व- संस्कृतिके इतिहासमें, विश्वकी प्रत्येक संस्कृतिके साहित्यमें अग्निकी उत्पत्तिकी कहानियां देखनेको मिलती हैं । अग्निके विषयमें कृतज्ञता प्रकाशन है । अग्नि-स्तवनसे ही भारतीय साहित्यका उगम है “ अग्निमीळे पुरोहितं ” भारतीय साहित्यका आद्य-चरण है। ऋग्वेदमें अग्निके करीब २०० सूक्त हैं। इन सूक्तोंको देखनेसे लगता है “ देवोंमें अग्नि मृदुहृदय ” है । वह अन्य सभी देवोंका प्रतिनिधि है । वह देवोंके पास मानवोंका प्रतिनिधि है । ऋषि अग्निद्वारा अन्य देवोंको आवाहन करते हैं । अग्निद्वारा अन्य देवोंका यजन करते हैं । वहां “ अग्निर्वै सर्वे देवताः ” है । इसलिये “ सभी देवताओंके संतोषके लिये अग्निमें आहुति देना यज्ञ ” माना जाने लगा । ऋग्वेदमें अनेक जगह पर ऐसे विचार मिलते हैं । “ अग्निकी सहायताके बिना मनुष्यको किसी भी प्रकारका सुख नहीं मिल सकता !” इसलिये “ यज्ञ-मानव- कुलके सभी सुखका साधन ” बन गया । यज्ञ जब मानव-कुलके सभी सुखका साधन बन गया तब यज्ञ-संस्थाका विकास और विस्तार होना स्वाभाविक था । पुराने ग्रंथोंको देखनेसे ऐसे लगता है कि “ यज्ञको केंद्र बनाकरही वैदिक संस्कृतिका विकास और विस्तार किया गया !” इन यज्ञोंमें नित्य, दिनमें दो बार करनेके अग्नि-कार्यसे लेकर साल साल चलनेवाले यज्ञ-सत्र तक अनेक कारणोंसे, अनेक प्रकारके यज्ञ कहे गये हैं । जैसे—प्रजाकी वृद्धिके लिये, प्रजाके सुखके लिये, युद्धमें जीतनेके लिये, एकछत्र सम्राट होनेके लिये, सामर्थ्य-वृद्धिके लिये, आयुष्य-वृद्धिके लिये, शक्ति-प्राप्तिके लिये, समाजमें प्रतिष्ठा प्राप्त करनेके लिये, किसी भी महान्-सिद्धांतकी प्रतिष्ठाके लिये, प्रायश्चित्तके लिये, शत्रु-नाशके लिये, शांतिके लिये, रोगोंसे बचनेके लिये, दीर्घायुष्यके लिये, सभी इच्छाओंकी पूर्तिके लिये, संतान प्राप्तिके लिये, ऐश्वर्य प्राप्तिके लिये, ग्रह- शांत्यर्थ, वर्षाके लिये, अन्न प्राप्तिके लिये, षोडश संस्कारों में, ऐसे अनेकानेक कारणोंसे अग्निष्टोम, सोमयाग, पंचमहायज्ञ, अश्वमेध, राजसूय, साकं प्रस्थाइयज्ञ, दाक्षायणयज्ञ, अनेक प्रकारके कामेष्टि- काम्ययज्ञ-पुत्र कामेष्टि-धन कामेष्टि, यश कामेष्टि, आदि-वाजपेययज्ञ, आप्तोर्याम यज्ञ, पंचशारदेय यज्ञ, विद्यापराधयज्ञ, ऐसे कुछ ४०-४१ प्रकारके यज्ञ हैं । यह यज्ञ-प्रक्रिया वेद-कालसे लेकर अर्थात् ई. पू० चार छ हजार वर्ष से लेकर आज तक अखंड चली आ रही है। इन यज्ञोंमें, विधि विधानोंमें की जानेवाली व्यवस्थामें, यज्ञ-संस्थाके “ अनुशासनका परमोच्च आदर्श ” का दर्शन होता है । यज्ञके कर्म-कांडके विधि-विधानोंमें पाये जानेवाले छोटी ज्ञानेश्वरी ५६
छोटी बातोंका ब्यौरा उनकी सूक्ष्म-दृष्टिका तथा स्पष्ट विचारोंका परिचायक है। वहां दर्भोके टुकडे, हवन सामग्री, आहुति देनेवाले चम्मच, आचमनादिके उपकरण, कहां, कैसे, किस ओर, किस वस्तुके, कितनी दूर रखना चाहिए आदिका भी स्पष्ट संकेत है। वैसे ही किस यज्ञकी आहुतिके लिये कौनसा हवि चाहिए, ? वह, कहां, कैसे, किसके, किस आकार प्रकारके बर्तनमें, किस प्रकारकी अग्नि पर, किन मंत्रोंको कहते हुए पकाना चाहिए इसका भी विवेचन है। किस प्रकारके यज्ञमें कैसी समिधायें होनी चाहिए ? यज्ञमें घीकी आहुति देनेवाले चम्मच कैसे होने चाहिए ? वह किस धातुके अथवा किस लकडीके होने चाहिए ? आदि सविस्तर जानकारी वेदोत्तर कालमें लिखे गये ब्राह्मण-ग्रंथोंमें देखनेको मिलती है। आजकलके कुछ विद्वान विचारक ब्राह्मण ग्रंथोंके विषयमें "अलग अलग यज्ञोंके विधिविधानोंका विस्तार पूर्वक वर्णन करनेमें ब्राह्मण- कालीन बुद्धिमत्ताका दुरुपयोग" मानकर "उनके विषयमें जुगुप्सा भरी दया" दिखाकर भी इंग्लंडके राजा अथवा रानीके सिंहासनारोहणके निःसार विधि-विधान देखकर "वंडरफुल डिसिप्लीन" कहनेमें अपनेको धन्य मानते हैं। वस्तुतः यज्ञ संस्कृति निर्माणका साधन थे। वैदिक संस्कृति यजन-संस्कृति थी। बिना अनुशासनके कोई समाज, संस्था, सभ्यता या संस्कृति अधिक समय तक टिक नहीं सकती। अनुशासन ही सातत्य और स्थायित्वका प्राण है। जिस समाज अथवा सभ्यतामें, संस्था अथवा संगठनमें अनुशासन जितना सुव्यवस्थित है वह उतने ही अधिक काल टिकेगा। भारतीय जीवनमें अनुशासनका अत्यंत महत्व रहा है। यहां अनेक प्रकारका अनुशासन चला है। धर्म के विषयमें कहते समय 'अथातो धर्म-जिज्ञासा' कहते ही धर्मानुशासनम् आया। राजनीतिकी बात आते ही दंडानुशासन आया। केवल अध्यात्म ज्ञान कहनेवाली गीता भी "आज्ञा मानके शास्त्रकी आज्ञा कर तू सब कर्मको"-कहती है। अर्थात् संस्कृतिके प्राणभूत प्रथाको अनुशासन बद्ध रखना अत्यंत स्वाभाविक था। साथ साथ यज्ञ वैदिक आर्योंकी अर्थ-वितरण व्यवस्था भी थी। ब्राह्मण नित्य-यज्ञ करते थे। उनके यज्ञ व्यक्तिगत थे। किंतु राजाओंके, वैश्योंके जो यज्ञ थे वे सामूहिक थे। उनके कोशमें इतना धनसंचय होते ही यह यज्ञ करना ऐसी अलिखित परंपरा-सी थी। इस यज्ञके द्वारा वह संचित-धन समाजके अनेक प्रकारके लोगोंके पास पहुंच जाता था। महाभारतमें राजसूय-यज्ञका वर्णन पढ़ते समय, तथा यज्ञ-व्यवस्थाको पढ़ते समय लगता है कि कथाकथनकला-पुराण अर्थात् आख्यान कहना, नृत्यकला, नाटककला, संगीतकला, वाद्यकला, चित्रकला, शिल्पकला, बढ़यी, कुम्हार, बर्तन बनानेकी कला, आदि अनेक कलायें यज्ञ द्वारा विकसित हुई हैं। साथ साथ कोई भी एक बड़ा यज्ञ करनेका अर्थ संचित धन अनेक प्रकारके कार्य करके उदर निर्वाह करनेवालोंमें बंट जाना था। धन वितरणकी इस व्यवस्थाकी दृष्टिसे भी कई प्रकारकी व्यवस्थाएँ-अनुशासन-आवश्यक था। साथ साथ केवल अग्नि-मुखमें आहुति देना ही यज्ञ नहीं रहा। आगे चल कर यज्ञके रूप बदले। अग्निके तीन रूप हैं। उसमें शरीरस्थ अग्नि वैश्वानर है। वाक् शक्ति भी अग्नितत्त्वसे संबंधित है। हम कोई भी श्रमका कार्य करते समय श्वास निरोध करते हैं। ऐसी स्थितिको उपनिषदोंमें आंतर-अग्निहोत्र कहा है। उपनिषदमें कहा है "मनुष्य जब बोलता है तब वह श्वासोच्छ्वास नहीं करता, "अपना प्राण-वायु वाचामें हवन" करता है। जब वह श्वासोच्छ्वास करता तब बोल नहीं सकता अर्थात् "वाणीका प्राणमें हवन" करता है। प्रातर्दन ऋषि इसको ५७ परिशिष्ट ३ (5)
“मानवको अमर अग्निहोत्र” कहता है “वाणीमें प्राण और प्राणमें वाणीका यह यज्ञ मानवका महान यज्ञ है। अन्य हवन कर्ममय है इसलिये वह नाशवंत है। अपने अंतर्याममें चलनेवाले इस अग्निहोत्रकी जानकारी रखनेवालेके लिये बाह्य अग्निहोत्रकी आवश्यकता नहीं।” यह इस ऋषिका मंतव्य है। तैत्तरीय उपनिषदमें वाग्यज्ञका विवेचन है। विकार रहित मन वाग्यज्ञका चम्मच है। साकार अंतःकरण घी है। वाणी यज्ञ-वेदिका है। शब्द दर्भ है। केवल ज्ञान हवनीय अग्नि है। उद्देश्य मिश्रित ज्ञान गार्हपत्य अग्नि है। वाक्-शक्ति प्राप्त वक्ता होतृ है। मन उपवक्ता है। प्राण ही आहुति है। और गान पुरोहित। गीतामें भी (१) ब्रह्मयज्ञ, (२) द्रव्ययज्ञ (३) देवयज्ञ (४) ज्ञानेंद्रिययज्ञ (५) विषययज्ञ (६) स्वाध्याययज्ञ (७) प्राणयज्ञ (८) अपानयज्ञ (९) प्राणापानयज्ञ (१०) आंतरपानयज्ञ (११) योगयज्ञ (१२) तपोयज्ञ (१३) जपयज्ञ (१४) इंद्रियप्राणयज्ञ ऐसे चौदह प्रकारके यज्ञ कहे हैं। धर्मकी भांति यज्ञका विचार भी अनेक शाखा प्रशाखाओंसे फैला है। वेदकालसे लेकर वर्तमान तक अनेक मनीषियोंने यज्ञकी अनेक व्याख्यायें करके यज्ञके अनेक प्रकार बताये हैं और अंतमें कहा है तप, भोग और यज्ञ ये तीन विश्वव्यवस्थाके आधार हैं। किसी उद्देश्यकी पूर्तिके लिये “सतत” परिश्रम करना तप है। तपसे प्राप्त फलको भोगना, उसको ग्रहण करके उससे आनंद लेना भोग है और तप और भोगसे जो घिसाई होती है क्षति होती है उसकी पूर्ति करना यज्ञ है। व्यक्तिगत तथा सामूहिक जीवनके जिन जिन क्षेत्रोंमें तप और भोगके कारण जो जो क्षति होती है, “जिन जिन तत्त्वोंकी घिसाई होती है उनकी पूर्ति करना” यज्ञ है। इसी बातको लेकर महात्मा गांधीजीने “नियमित सूत कातनेकी क्रियाको सूत्र-यज्ञ” कहा था। तथा जब किसी देशकी प्रजा पराक्रम शून्य हो जाती है उस समय प्रजामें पराक्रम वृत्ति जगानेके लिये प्रेरणाप्रद सामूहिक रचनात्मक कार्य चलता है वह राष्ट्रीय यज्ञ है। जीवनके विविध अंगोंकी क्षति-पूर्तिके इस विविध प्रकारके यज्ञोंमें जपयज्ञ सर्व श्रेष्ठ माना गया है। जप— जप तीन प्रकारका होता है। (१) वाचिक जप, (२) उपांशु जप, (३) मानसिक जप। जप करनेवाला जो उच्चार करता है वह जब सब सुन सकते हैं तब वह वाचिक जप कहता है। यह उच्चार केवल जप करनेवाला ही सुन सकता है तब उपांशु जप। और जो मन ही मन किया जाता है वह मानसिक जप। वाणी के-वाक्शक्तिके-चार प्रकार हैं। वैखरी, मध्यमा, पश्यंती, परा। ये वाक्शक्तिके स्थूलसे सूक्ष्म-रूप हैं। वाणीका रूप जैसे जैसे सूक्ष्म होता जाता है वैसे वैसे शब्द भाव-रूप बनता जाता है। शब्द-जब भाव-रूप बन जाता है तब शब्द शक्ति प्रकट होती है। जो गुप्त रूपसे जीवनको उजला देती है। मंत्रका कितना जप किया इसका उतना महत्व नहीं किंतु वह कैसा किया इसका महत्व है। शब्द भावमें परिणत नहीं हुआ शब्द ही रहा तो उसका करोडों जप होने पर भी विशेष कुछ लाभ नहीं है। जप भले ही नामजप हो अथवा सबीज मंत्र जप, वह, वाणीसे कंठ, कंठसे हृदय, हृदयसे नाभीमें जा कर मूलाधारसे सहस्रार तक सारे शरीरमें गूंजना चाहिए। शब्द आकाशतत्त्वका गुण है। आकाश तत्व अत्यंत सूक्ष्म और अविनाशी तत्व है। जप शब्दका कौर निगल कर धीरे धीरे सूक्ष्मतम भाव तत्वसे परे अव्यक्त आकाशतत्त्वसे समरस होनेकी प्रक्रिया है। शब्दका कौर निगलनेका अर्थ शरीरके जिस स्थानसे अव्यक्त आकाश तत्व उदित होकर जहां जहां आघात करते करते शब्दका रूप धारण करता है वह जानकर व्यक्त शब्दको लेकर उसको वहां वहां आघात करते करते सूक्ष्मसे ज्ञानेश्वरी ५८
सूक्ष्मतममें प्रवेश करते करते अव्यक्त आकाश तत्त्वमें विलीन होना है। जिह्वा स्थानकी वैखरी वाणीको पकड़कर, शब्दको कंठकी मध्यमामें सूक्ष्मकर वाचिक जपको उपांशु कर-हृत्कमलमें मानस जप सतत स्मरण रूपमें-अभ्यस्त होने पर वह उसीमें सूक्ष्म होकर स्थूलसे सूक्ष्म होते होते मौनमें लीन हो कर "सूक्ष्मसे सूक्ष्म अचिंत्य रूप" बन जाता है। "जो इंद्रिय बिन भोगना है।" शब्दका यह सूक्ष्मसे सूक्ष्म जो अचिंत्य रूप है वह जिस शक्तिसे श्वास प्रश्वास चलते हैं, जिस शक्तिसे हृदयका स्पंदन चलता है, जिस शक्तिसे शरीरकी हजारो नाड़ियोंसे रक्त संचार होता है, जिस शक्तिसे मन और बुद्धि कार्य करती है, जिस पर श्रद्धा आश्रित है उससे समरस होकर शरीरमें गूंजने लगता है। यह वाणीका अंतिम रूप है जो अनिर्वचनीय है। शब्दके इस सूक्ष्मातिसूक्ष्म अचिंत्य रूपके गूंजनकी जो तरंगें उठती हैं उन तरंगोंके सतत स्पंदनसे जीवके संस्कार गत सारे मल जल जाते हैं अर्थात् शरीरके अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय तथा आनंदमय कोश, स्थूलशरीर, सूक्ष्मशरीर, लिंगशरीर, कारणशरीरके सभी मल जलकर वह निर्मल होते होते देह-सिद्धि भी हो जाती है और जीवनमें सतत गूंजनेवाले वह तरंग विश्वाकाशमें भी प्रविष्ट कर विश्वके आकाश तत्त्वमें लीन हो जाते हैं। वहाँ तरंगित होने लगते हैं। उन तरंगोंका वायुमंडल बनता है। इससे न केवल जप करनेवाले-यह शब्द प्रयोग भी गलत है, जहाँ मैं जप करता हूं इस भावके बिना सहजभावसे अभ्यासके कारण जप होने लगता है-शरीरका ही नहीं किंतु सामूहिक जन जीवनमें होनेवाली क्षति भी भरने लगती है। जप अथवा जप-योग स्थूलमेंसे सूक्ष्म और सूक्ष्मसे अति सूक्ष्मकी ओर जानेकी प्रक्रिया है। शब्द-जन्य विशिष्ट प्रकारका स्पंदन सूक्ष्म और अति-सूक्ष्म हो कर शरी- रमें प्रवेश करते जाता है। तब उन स्पंदनोंसे शरीरके अणु अणु (पेशियां) हिलकर साफ होते जाते हैं। जपके सातत्यसे, प्राणको सतत विशिष्ट दिशामें गति मिलती है इससे प्राण विशिष्ट गति और विशिष्ट दिशामें शरीरके अणु अणुमेंसे-सूक्ष्म और गति शील होनेसे-प्रवेश करते जाता है। वस्तुतः शरीर १०००००००००००००००००००० सजीव और स्वतंत्र पेशियोंका अखंड संघटन है। इनमेंसे बहुत ही कम पेशियां काम करती हैं। इन पेशियोंके बीच अनेक प्रकारके सूक्ष्मातिसूक्ष्म मल होते हैं। इसलिये ये सब चिपककर, कार्य रात न होकर, आलसी निर्जीवसी पड़ी रहती हैं। यह मल भी मन, वचन, विचार, भावादिके किये गये असत्कर्मोंसे, अनृत चिंतनसे, द्वेषादिसे, कुटिल विचारोंसे, अनेक विध वासनाओंके चिंतनसे, आचारसे, तथा भाषणसे भी,-अनृत आचार, अनृत विचार, अनृत भाषण, अनृत चिंतनसे-मानवी शरीरकी सूक्ष्म नाड़ियां, सैकड़ोंकी संख्यामें, सिकुड़ जाती हैं, टूट जाती हैं, नष्ट हो जाती हैं, व्यक्ति और समाजकी इस सूक्ष्म घिसाईको क्षतिको भरना है। जब ऐसे सूक्ष्म तरंगोंसे, जप कर्ताके शरीरस्थ सभी आकाश-क्षेत्र भरकर वे विश्वाकाशमें प्रसारित होती हैं तो मनुष्य विश्वतरंगोंके प्रभावसे विश्व-शक्तिसे समरसैक्यका अनुभव करने लगता है। तब मानो उसका प्रत्येक श्वास एक नया काव्य ही बनता है। यह संत-जीवनका सार है जिससे वे अनजाने ही अपने समयमें ही नहीं युगों तक जन मन पर अपना स्वामित्व रखते रहे हैं क्यों कि उनकी वे तरंगे युगों तक विश्वाकाशमें रहती हैं। इसीलिये जप योग सभी योगमें श्रेष्ठ मान कर जप-यज्ञ-सतत क्षति पूर्तिकी साधना-सतत अपने सर्वस्वका हवन-सब यज्ञमें श्रेष्ठ मान कर परमात्म रूप माना है। ५९ परिशिष्ट ३
गीता अ० १०. श्लो० २५-स्थावरोंमें हिमालय- पीछे नदियोंके परिचय देते समय भारतकी पर्वतश्रेणियोंका सामान्य परिचय तो हुआ है उसमें हिमालय पर्वत परमात्माका रूप है। एक विभूति है। हिमालय-पर्वत भारतके उत्तरमें है। यह भारतवर्षके उत्तरी प्रहरी माना जाता है। इसी पर्वतके शिखर आज पृथ्वी पर सर्वोच्च पर्वतशिखर हैं। प्राचीन कालके लोग इन शिखरोंको हिमास अथवा हिमोवास कहा करते थे। इसके वायव्यमें सिंधुनदी इसकी वायव्यसीमा तो पूर्वमें यह ब्रह्मदेशको छूता है। कालिदासने इसको "पृथ्वीका मान-दंड" कहा है। जम्मू काश्मीरका अधिकांश भाग इस पर्वत श्रेणीमें खो गया है वैसे ही नेपाल, भूटान और सिक्कम आदि राज्य तथा पंजाबका कांग्राजिला हिमाचल प्रदेश इसी पर्वतश्रेणियोंमें बसा है। उत्तर प्रदेशका कुमायूं और टिहिरी गढवाल विभाग हिमालयमें बसे हैं। कुमायूं विभागमें तीन और टिहिरी गढवालमें तीन ऐसे छ जिले हैं। यह पर्वत भारत और तिब्बतका विभाजन करता है। इनके पर्वत-शिखर ८०००-९००० फूटसे २८-२९ हजार फूट तक ऊंचे हैं। यह पर्वत श्रेणी इतने विशाल भूभागमें फैली है कि अब तक इसके एक तिहाई भागका पत्ता भी नहीं मिल सका। १५००० फूट ऊंचाईके बाद चिरकाल हिमरेखा दिखाई देती है। इसमेंसे जो नदियां बहती हैं उसी पर पंजाब, उत्तर भारत तथा बिहारका जीवन निर्भर है। पेशावरसे आसाम तक करीब १६०० मील फैले हुए इस महा पर्वत पर (१) नंगापर्वत (२६१८२ फूट) (२) नंदादेवी (२५६६१ फूट) (३) त्रिशूल (२३२८२ फूट) (४) पंचचुल्ली (२२६७३ फूट) (५) नंदाकोट (२२५६८ फूट) (६) गौरीशंकर (२९००२ फूट) (७) धवलगिरि (२६८२६ फूट) (८) गोसईस्थान (२६३०५ फूट) (९) कांचनगंगा (२८१४६ फूट) आदि महत्त्वपूर्ण शिखर हैं। इसमेंसे कई शिखर अब तक चढना बाकी है। हिमालयके ऊंचे प्रदेशमें बौद्ध धर्मका विशेष प्रचार दिखाई देता है। १४ वीं सदीमें सिकंदर नामके राजाने काश्मीर पर आक्रमण करके वहांके लोगोंको मुसलमान बनाया, इससे वहां मुस्लीम धर्मका प्रभाव सबसे अधिक है। हिमालयके अनेक भागमें विशाल वनश्री है। इन अरण्योंमें अनेक प्रकारकी वनस्पति और घर बांधने लायक लकडी मिलती है। यहां आने जानेका कोई विशेष साधन नहीं है। यद्यपि स्वातंत्र्यके बाद और विशेषतया चीनके आक्रमणके बाद अनेक रास्ते बनाये गये हैं।
गीता अ० १०. श्लो० २६-अश्वत्थ सब वृक्षोंमें- अश्वत्थ- [जिसकी] जड़ोंको सींचनेसे दूसरे दिन पानी नहीं रहता यह अश्वत्थ शब्दकी व्याख्या है। एक इसका नाम अश्वत्थ पड़नेके लिये यहभी एक कारण बताया जाता है कि एक बार अग्नि देवोंसे अलग होकर अश्वरूपसे एक वर्ष तक इस वृक्ष पर रहा इसलिये यह अश्वत्थ कहलाया। अश्वत्थके विषयमें और भी कई जनश्रुतियां हैं किंतु अश्वत्थ वेद कालमें भी पूज्य था। ब्राह्मणमें भी इसका उल्लेख है। यज्ञ कार्यके लिये अग्नि प्रज्वलित करनेवाली उत्तरारणि अश्वत्थकी होती है। ऋग्वेदमें अश्वत्थको देव-सदन कहा गया है। सिंधु संस्कृतिमें भी अश्वत्थको पूज्य माना गया है ऐसे विद्वानोंका मत है। सिंधुसंस्कृतिके उत्खनन प्राप्त एक मुद्रामें अश्वत्थके दो डालियोंके बीच एक देवता खडी है। दूसरी एक मुद्रामें
ज्ञानेश्वरी ६०
एक सींगवाले दो देवता अश्वत्थके छोटेसे गाछकी रक्षा करते हैं। कहते हैं कि सिंधुजनकी श्रेष्ठ देवता महिष-मुंड अश्वत्थवासिनी है। अर्थात् वेद-पूर्वकालसे ही भारतमें अश्वत्थ श्रेष्ठ वृक्ष माना जाता था। ऋग्वेदमें अश्वत्थको देव-सदनके साथ पितरोंका भी निवासस्थान माना है। बुद्धोंने भी अश्वत्थको बुद्धत्वका प्रतीक माना है। प्राचीन भारतीय समाजमें अश्वत्थ पूजन, अश्वत्थ प्रदक्षिणा, अश्वत्थोपनयन आदि प्रघात प्रचलित हैं। गीता अ० १०, श्लो० २६-देवर्षि मध्य नारद— ऋषियोंमें ब्रह्मऋषि, महर्षि, राजऋषि, देवऋषीं ऐसे प्रकार हैं। नारद देवर्षी हैं। देवर्षी भी दस हैं जैसे महर्षि दस हैं। इनके नाम हैं (१) नारद (२) अत्रि (३) मरीचि (४) भारद्वाज (५) पुलस्य (६) पुलह (७) ऋतु (८) वसिष्ठ (९) प्रचेता (१०) शिव। शिव देव और असुरोंको वर देनेवाला देवर्षी है। नारद—ब्रह्माका मानस-पुत्र। सर्वविद्यासंपन्न। प्रतिभासंपन्न राजनीतिज्ञ। उसके कुटिल तंत्रके कारण उसको कई बार "तू नाश होकर पुनर्ज़न्म प्राप्त कर" ऐसा शाप मिला। नारदने नाश होकर पुनर्ज़न्म लिया। कहीं इसको बृहस्पति का शिष्य कहा गया है। यह सोम-विद्यामें सोमफका गुरु था। सदैव इसने देव और ऋषियोंकी सेवा की। इसने सावर्ण मन्को पांचरात्रनामक उपदेश दिया। नारायणको आत्मतत्त्वका उपदेश दिया। शुक्राचार्यको इसीने ज्ञानोपदेश दिया। देवलको सृष्टि उत्पत्तिके विषयमें इसीने उपदेश दिया था। इसने व्यासको भी कई ज्ञानकी बातें कहीं हैं। वसुदेवको भागवत-धर्म इसीने कहा था। इसीने श्रीकृष्णको पूज्य कौन होता है इसका बोध दिया था। धर्मराजाको इसने राजनीतिका उपदेश दिया। प्रह्लादको इसीने भक्तिका उपदेश दिया था। याज्ञवल्क्य और पाराशरने प्राचीन धर्मशास्त्रज्ञ कहकर इसका उल्लेख किया है। कई प्राचीन पोथियोंमें अनेक विषयों पर इसके विचार श्लोक-रूपमें देखनेको मिलते हैं। महाभारतमें अनेक स्थानों पर अनेक विषयों पर नारदके मत देखनेको मिलते हैं। देव, दानव, मानव, ऋषि, सबमें इसका समान प्रवेश और समान सम्मान था। कोई भी, देव हो, दानव हो, ऋषि हो, कोई हो, किसी समय हो इसकी भेंट अस्वीकार करनेका साहस नहीं कर सकता था। नारदने कई बार अपने पूर्व-जन्मकी कथा कही है। इससे एक विचार आता है कि नारद एक व्यक्ति था या पीठ ? पुराणोंमें नारदकी जो कथाएँ आती हैं, उसके जो विचार आते हैं, उन सबका संग्रह किया जाय तो कई ग्रंथ हो सकते हैं नारद इतना सर्वव्यापक है ! गीता अ० १०, श्लो० २६-चित्ररथ गंधवोंमें— गंधर्व—'संगीत और वाद्यविद्याका आनंद जिसके पास है वह' यह गंधर्व शब्दका अर्थ । इसके अलावा भी अन्य अनेक अर्थ पुरानी पोथियोंमें है। गंधर्व मनुष्योंसे उच्च और देवोंसे निम्न ६१ परिशिष्ट ३
समाज है। इनको अतिमानव माना गया है। पुरानी पोथियोंमें गंधर्वोकी उत्पत्तिके विषयमें अनेक प्रकारकी जनश्रुतियां हैं। ऋग्वेदमें भी गंधर्वोंका उल्लेख है। गंधर्व सौंदर्य-प्रिय, अलंकार-प्रिय, तथा स्त्री-लंपट जाति है। वे फूलके पागल हैं। इनकी स्त्रियोंको अप्सरा कहते हैं। इनमें नृत्य संगीत वाद्य-कला निपुण सुंदर-कन्याओंका विवाह न करनेकी प्रथा थी। ये सामाजिक संपत्ति थी। कलोपासना ही इनका ध्येय। संभवतः इसीलिये संगीत शास्त्रको गंधर्व-वेद कहा जाता है। गंधर्वोंके आठ गण कहे गये हैं (१) हाहा, (२) हूहू (३) चित्ररथ (४) हंस (५) विश्वावसु (६) गोमायू (७) तुंबुरु (८) नंदी। अग्नि-पुराणमें ११ गण कहे गये हैं। (१) भन्नास (२) अंगारी (३) बंभारी (४) सूर्यवच (५) कृधू (६) हस्त (७) सुहस्त (८) मूर्द्धन्वान् (९) महामना (१०) विश्वावसू (११) कृशानु । चित्ररथ—कश्यप और मुनिका गंधर्वपुत्र । इसका नाम अंगारपर्ण। फिर यह चित्ररथ कहा जाने लगा। लाक्षाग्रहसे छूटकर जाते समय अर्जुनकी इससे लडाई हुई थी। अर्जुनका पराक्रम देखकर प्रसन्न होकर अंगारपर्णने अर्जुनको कई विद्याएं सिखाईं। अर्जुनसे भी कुछ सीखा। युधिष्ठिरके राज-सूय यज्ञमें इसने उन्हे १०० घोडे दिये थे। इसीने युधिष्ठिरको किसीको देखकर किस वर्णाश्रमका है यह जाननेकी विद्या सिखाई। तथा तपस्यासंपर्णाख्यान सुनाया। गीता १०. श्लो० २६-सिद्धोंमें कपिल मुनि— सिद्ध—विश्वमें जो अनेक गूढ रहस्य हैं उनमें शरीर रहित चैतन्यका संचार भी एक गूढ तम रहस्य है। यह भी एक योनि है। ये केवल मानवोंमें ही नहीं अतिमानवोंमें भी हैं जो विश्वके प्रभावी देवता या शक्तियोंके हस्तक बन कर लोकहितके कार्यमें निमग्न होते हैं। साथ साथ भक्त, ज्ञानी, योगी आदि जीवनमें कृतकृत्य होकर देहपातके बाद उपास्य देवताकी आज्ञासे उनके हस्तक बन कर काम करते हैं। इन्हे देवताके समान मान दिया जाता है। योगसाधनमें ऐसे सिद्ध अत्यंत सहायक होते हैं। पतंजल-योगके विभूति-पादमें सिद्धदर्शन भी एक विभूति है। सिद्धोंके विषयमें इनकी परंपराओंके विषयमें अध्ययन पूर्वक अनेक पुस्तकें लिखी गयी हैं। ये सिद्ध ईश्वरके समान नित्य माने गये हैं। “विश्वमें होनेवाले लोककल्याणकारी महान घटना- ओंमें सिद्धोंका हाथ रहता है” ऐसे अनेक विद्वानोंने मुक्त-कंठसे कहा है। अर्थात् देह रहित लोक हितकारी नित्य-चैतन्य शक्तिको सिद्ध कह सकते हैं और इन सिद्धोंमें— कपिल मुनि—कर्दम और देवहूतीका पुत्र । इसका स्थान सिद्धपुर या और (?) बिंदुसर । इसने अपनी माताको ब्रह्मज्ञान कहा। जब यह समाधिस्थ था पिताके अश्वमेधके घोडोंके अश्व रक्षक सगर पुत्रोंने-इसीने अश्व चुराया इस भ्रमसे-इस पर शस्त्र प्रहार किया और इसकी आंखोंसे निकली क्रोध ज्वालासे जल कर राख हो गये। इसको आदि सिद्ध माना गया है। आसुरी इसका शिष्य, यह प्रत्यक्ष शिष्य नहीं है। कपिलप्रतिपादित सिद्धांतका स्फुरण मुझमें हुवा ऐसे यह कहता है। कपिलको सांख्यशास्त्रका आदि प्रवर्तक माना जाता है। तत्त्वज्ञानके सहारे मोक्ष प्राप्त करना इस शास्त्रका उद्देश है। सांख्य शास्त्र कर्मकांडसे ज्ञानको अधिक महत्व देता है। उपनिषद् भी ज्ञानको कर्मसे श्रेष्ठ मानते हैं। ज्ञानेश्वरी ६२
कुछ विद्वानोंका कहना है कि ध्यान और चिंतनका आदि प्रर्वतक भी कपील है । इसके प्रथम, कर्म ही महत्वपूर्ण साधना अथवा उपासना थी। कपिलको निरीश्वरवादि माना गया है । इसको विष्णुका पांचवा अवतार भी कहा गया है । कपिलके नाम पर (१) सांख्यसूत्र (२) तत्वसमास (३) कपिलगीता (४) (५) कपिलपांचरात्र (६) कपिलसंहिता (७) कपिलस्मृति (८) कपिलस्तोत्र (९) व्यासप्रभाकर ऐसी कुछ पुस्तकें प्रचलित हैं । गीता अ० १०. श्लो० २७-उच्चैश्रवा अश्वोंमें मैं— देवासुरोंने जो समुद्रमंथन किया तब (१) लक्ष्मी (२) कौस्तुभ (३) पारिजातक (४) सुरा (५) धन्वंतरी (६) चंद्रमा (७) कामधेनु (८) ऐरावत (९) रंभा (१०) उच्चैश्रवा (११) कालकूट विष (१२) शाङ्गधनुष्य (१३) पांचजन्य (१४) अमृत ये चौदा वस्तु मिले। इनमें उच्चैश्रवा सात मुखोंका घोडा भी है। इसका रंग शुभ्र । इसका खाद्य अमृत । यह इंद्रका वाहन है । दशहरेके दिन जो अश्व-पूजा होती है वह वास्तवमें उच्चैश्रवाकी पूजा है । गीता अ० १०. श्लो० २७-ऐरावत गजेंद्रोंमें- भारतीय साहित्य और संस्कृतिमें हाथीको वैभव और संपन्नताका प्रतीक माना गया है । ऋग्वेदमें लक्ष्मीका वर्णन करते समय "हाथीके गर्जनसे जगनेवाली" ऐसे कहा गया है । हाथीको लक्ष्मीका भी प्रतीक माना गया है। प्राचीन शिल्पमें भी लक्ष्मीके साथ गज-अर्थात् हाथीके चित्र होते हैं। लक्ष्मीके साथ ऐरावत भी समुद्र मंथनसे प्राप्त रत्न हैं । ऐरावत-यह सफेद हाथी है। समुद्रमंथनमेंसे उत्पन्न हुवा। ब्रह्मांडके आधारभूत (१) ऐरावत (२) पुंडरीक (३) वामन (४) कुमुद (५) अंजन (६) पुष्पदंत (७) सार्वभौम (८) सुप्रतीक इन आठ दिग्गजोंमें इंद्रने इसको पूर्व दिशामें स्थापित कि। कृष्ण और इंद्रके युद्धमें यह हाथी गरुडसे पराजित हुवा था। कहीं कहीं इसकी सात सुंड होनेका उल्लेख है ! भीम अपनी मातके गजपर्वकी पूजामें इसे पृथ्वि पर लाया था ऐसी जनश्रुति है । गीता अ० १०. श्लो० २७-नरोंमें मैं नराधिप- नर शब्दका अर्थ है नेतृत्व करनेवाला । नेतृत्व करनेवालोंमें नराधिप - राजा - ईश्वरका रूप है । : वेदमें प्रत्येक शब्दके तीन अर्थ किये जाते हैं। उस प्रकार राजा-सामाजिक क्षेत्रमें इंद्र है। राजाको इंद्रका तथा विष्णुका प्रतिनिधि माना गया है। गीता अ० १०. श्लो० २८-शस्त्रोंमें वज्र मैं रहा- शस्त्र-प्रहार करनेके साधनको आयुध शस्त्र कहते हैं। इसमें पत्थर और लोहेके डंडोंसे लेकर अणुबांब तक आ जाते हैं। युद्ध-साहित्य सब आयुध शब्दमें समा जाते हैं। संस्कृतिके विकासके साथ आयुधोंका भी विकास हुवा है। स्वसंरक्षण तथा दूसरोंपर आक्रमण करनेवाले सभी साधन आयुध कहाते हैं। इनमें सतत हाथमें ले लडनेवाले आयुध, जैसे तलवार, गदा, धनुष्य, बंदूक, तमंचा आदि, फेंकके मारनेवाले आयुध, भाले, त्रिशूळ, शक्ति, तोमर, आजकल हाथ-बॉब आदि, अस्त्र, युक्तिसे चलनेवाले-मंत्रपूरित आयुध-आग्नेयास्त्र, ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र आदि, ६३ परिशिष्ट ३
वैसे ही शतघ्नि, तोप आदि। किंतु इससे भी भिन्न प्रकारके कुछ आयुध दीखते हैं जो फेंक कर मारनेके बाद अपना काम करके वे पुनः लौटकर आते हैं। जैसे विष्णुका सुदर्शनचक्र, इंद्रका वज्र। चक्रके विषयमें जो जानकारी मिलती है वह अत्यंत अद्भुत है। वह कई मील तक पीछा करके शत्रु का संहार करता है और अपना काम होते ही वह लौट पडता है! हमारे प्राचीन ग्रंथोंमें, शंकरका त्रिशूल, विष्णुका सुदर्शन, भार्गवरामका परशु, इंद्रका वज्र, वरुणका पाश, गणपतिका अंकुश-मत्रोंको छोडकर-अत्यंत प्रसिद्ध और आश्चर्यजनक आयुध रहे हैं। वज्र—यह इंद्रका अत्यंत भयंकर आयुध है। यह कभी व्यर्थ नहीं जाता। इस आयुधकी निर्मिती दधीचि ऋषिके अस्थियोंसे हुई थी। दधीचि ऋषि महा-तपस्वी सामर्थ्यवान लोकहितव्रती थे वृत्रासुरको मारनेके लिये इंद्रको ऐसे एक महान आयुधकी आवश्यकता थी। दधीचि मृत्युंजय था। इंद्रने दधीचिसे उसकी अस्थियोंकी प्रार्थना की। विश्व-हितके लिये अपनी अस्थियोंकी आवश्यकता है यह सुनते ही दधीचि ऋषिने योग-बलसे शरीर त्याग दिया। इसके बाद उसकी अस्थियां लेकर षट्कोण आयुध बनाया गया जिससे वृत्रका संहार हुवा। गीता अ० १०. श्लो० २८-मैं कामधेनु गायोंमें— कामधेनु—इच्छापूर्ति करनेवाली गाय ! यह भी समुद्रमंथनमेंसे निकली थी। कामधेनुके सभी अवयव सिर, माज, जांघ, स्तन, पुच्छ, तथा गलेका झोल, ये छ अवयव पुष्ट और ऊंचे थे। उसकी आँखें मेंडककी भांति थीं। स्तन पुष्ट थे। वह सर्वांगसुंदर थी। शिवजीका नंदी इसका बछडा। यह गाय वसिष्ठऋषिके आश्रममें थी। सूर्यवंशके दिलीप राजाने इसकी सेवा की और प्रसन्न कामधेनूकी कृपासे रघु राजाका जन्म हुवा। इस परसे सूर्यवंशको रघुकुल कहते हैं। गी. अ० १०. श्लो० २८-उत्पत्ति हेतु मैं काम— काम-ब्रह्माका मानस पुत्र। इसकी स्त्री रति। जन्मता यह अत्यंत रूपवान था। इसके शरीरमें सुवास था। जन्म होते ही इसने ब्रह्मदेवसे पूछा "मेरा जीवित-कार्य क्या है !" "तू स्त्री पुरुषोंको मोहित कर। ब्रह्मा विष्णु शंकर सहित सभी देव तेरे वश होंगे।" परिणाम स्वरूप इसने ब्रह्मा परही अपना प्रथम प्रयोग किया। एक बार शिवने इसको दग्ध किया था। फिर यह कृष्णमें प्रद्युम्नके रूपमें आया। वसंत ऋतु इसका मित्र है। (१) इसके स्पर्शसे स्त्री पुरुषोंमें मद आता है इसलिये मदन (२) ऋषियोंका भी मंथन करता है इसीलिये मन्मथ (३) शिवके उःशापसे बिना शरीरके मानवोंमें रहा इसलिये अनंग ऐसे इसके तीन नाम हैं। भाई बहनोंमें विकार निर्माण करनेसे शंकर इसको जलायेगा। शंकरको पुत्रेच्छा होगी तब कामेच्छा होगी ऐसा शाप और वर मिले हैं। गीता अ० १०. २८-१० श्लो० २९-मैं सर्पोत्तम वासुकी-नागोंमें शेष नाग मैं। नाग और सर्प--फनावाला सांप। भारतीय संस्कृतिमें अत्यंत प्राचीन कालसे नागपूजा प्रचलित है। ये नाग गेहुंआ, हरी आभा लिये पीले, पूरा पीलो, तथा काले होते हैं। इनके मुखमें विषका दांत होता है। प्राचीन भारतीयोंने उनको देवत्व दिया है। भारतके प्रत्येक प्रदेशमें नाग-पूजा प्रचलित है। ज्ञानेश्वरी ६७
पौराणिक जन-श्रुतिके अनुसार कश्यप इनका पिता और कद्रू इनकी माता है । (१) अनंत (२) वासुकी (३) तक्षक (४) कर्कोटक (५) पद्म (६) महापद्म (७) शंख (८) कुलिक नागोंकी ये आठ जातियां हैं । इनके साथ (९) कालिय भी गिनते हैं । पौराणिक जनश्रुतिके अनुसार ये जब प्रजाको बहुत सताने लगे तब ब्रह्माने शाप दिया- “प्रथम तुम्हारा ससौतेला भाई तुम्हारा संहार करेगा फिर जनमेजय राजा ।” पौराणिक जनश्रुतिके अनुसार कुछ नाग, देव और मानवोंके अनुकूल और कुछ प्रतिकूल हैं । इनमें तक्षक, कर्कोटक, कालिया ये सदैव प्रतिकूल ही रहे हैं । विश्वमें सर्वत्र नाग हैं, नागपूजा भी है । किंतु भारतमें वह जिस प्रमाणमें प्रचलित है वैसी अन्यत्र कहीं नहीं है । क्यों कि भारतमें इनकी संख्या और जातियां भी बहुत हैं । ऋग्वेदमें नाग और सर्पका उल्लेख है । किंतु नाग-पूजाका नहीं । यजुर्वेद और अथर्वण वेदमें नागपूजाका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उल्लेख है । पौराणिक कालके शिव और विष्णु दोनों महान देवताओंके साथ सर्प या नाग जुड़ गया है । काली भी नाग-भूषण है । बौद्ध या जैनोंने भी नागका महत्व गाया है । भारतीय लोक साहित्य-सभी भाषाओंका-नाग-कथाओंसे भरा पड़ा है । इन कथाओंमें अनेक प्रकारके श्रद्धा-संकेत हैं । इसमें एक महान संकेत “पूर्वजोंके आत्मा नाग रूपसे अपने परिवारमें आते हैं और गर्भधारण होनेपर उसमें प्रवेश करते हैं !” इसलिये घरमें आया हुआ साप नहीं मारा जाता ! नागोंकी कथाओंसे-भली और बुरी-पुराण साहित्य भरा पड़ा है । इनमें वासुकी और अनंत— वासुकी—सर्पोंका अधिपति । इसकी पत्नी शतशीर्षा । जनमेजयके यज्ञमें इसके पंद्रह पुत्र नष्ट हो गये हैं । यह शंकरके गलेमें भूषण बना रहता है । यह मणिधर है । अनंत—इसको आदि-नाग भी कहते हैं । आदि शेष भी कहते हैं । यह विष्णुकी शैय्या है । विष्णुको अनंतशयन भी कहा गया है जो शेषशायी है । लक्ष्मण, बलराम, तथा संकर्षणको इसका अवतार माना है । गीता अ० १०. श्लो २९-मैं हूं वरुण पानीमें— जलके कारण मनुष्य पर होनेवाले अनुकूल प्रतिकूल परिणामोंके कारण जलदेवताकी कल्पना की गयी है । साथ ही साथ जल पंच महाभूतोंमें पृथ्वी पर रहनेवाला भूत है । मनुष्यके लिये जीवन है । बिना इसके जीना असंभव है । अर्थात् जल-पूजन एक कृतज्ञता है । बृहदारण्यक उपनिषदमें “जल सभी वस्तु मात्रका मूल उत्पत्ति साधन” होनेकी बात कही है । इसलिये जलमें भी देवताओंका वास माना जाना स्वाभाविक है । जल रूपी ये देवता भिन्न भिन्न हैं । इनमें अप्सरा निम्नश्रेणी देवता है । ये सदैव जलक्रीडा करती रहती हैं । ये सात प्रकारकी हैं । इनको सप्त मातृका भी कहा गया है । गुजरातमें ये सप्तमाता मानी जाती हैं तो दक्षिणमें सप्त भगिनी मानी जाती हैं । अर्थात् जलचरमें जलमें रहनेवाले जीव जंतु मत्स्यी कूर्मी कर्कटी दुर्दुरी, जतुपी, मकरी आदि नामोंसे अप्सराओंके नाम बने हैं । अर्थात् इन देवता ओंमें— ६५ परिशिष्ट ३
वरुण—पश्चिम दिशाका, जलका, पाताल, नागलोकका स्वामी । वारुणी और गौरी इसकी पत्नियां। सुनाभ इसका मंत्री । (१) गो, (२) बछ (३) सुरा (४) अधर्म (५) पुष्कर (६) वंदिष्ट ये इसके पुत्र हैं। देवोंने इसको जलाधिपत्यका अभिषेक किया था। अर्जुनको इसने अस्त्र दिया था। गीता अ० १०, श्लो० २९-पितरोंमें अर्यमा हूं— पितर—एक देव सदृश योनि है। पितर दो प्रकारके हैं। जो मनुष्य मरनेके बाद पितृ-लोक जाते हैं वे मृत-पितर, और सृष्टिके प्रारंभसे ही जो पितृलोकमें रहते हैं वे अमृत पितर । वैदिक आर्योने यमको आदि पितर माना है। पिता देवोंसे भी आद्य है। ऋग्वेदमें भी पितरोंके विषयमें पर्याप्त जानकारी है। "सोम-प्रिय पितर, निम्नलोक मध्य लोक, तथा उच्चलोकमें वास करने वाले आत्म-सामर्थ्य प्राप्त होने परभी सौम्य, सात्विक, " ऐसे उनका वर्णन है। साथ ही साथ "हमारे पुकारते ही आकर हमारी रक्षा करते हैं।" ऐसा अनुभव भी कहा गया है। स्थान स्थान पर उनका आवाहन भी है। ब्रह्माने देवोंको उत्पन्न करके उन्हें यज्ञ करनेको कहा। देवोंने यह नहीं माना। ब्रह्मदेवने कहा 'तुम मूढ बनोगे !” देव मूढ बने । लोगोंका नाश होने लगा। देव तब ब्रह्मदेवके पास गये । ब्रह्मदेवने उन्हे अपने पुत्रोंसे प्रायश्चित्त पूछनेको कहा। देवोंने अपने पुत्रोंसे प्रायश्चित्त पूंछा। पुत्रोंने प्रायश्चित्त कहा। देवोंने प्रसन्न होकर कहा "हमें ऐसा बोध करनेवाले आप पितर हैं।" तबसे देव "पितर पुत्र" कहे जाने लगे और देव भी स्वर्गमें पितरोंकी उपासना करने लगे। सभी समाजमें भिन्न भिन्न प्रकारसे पितृ-पूजा विद्यमान है। पितृ-पूजा विश्वके सभी धर्मोंका आवश्यक अंग है। भारतीय समाजमें नित्य-पितृ-तर्पणका भी नियम है। वार्षिक पितृश्राद्ध किया जाता है। पितृपूजाके अनेक प्रकार हैं। क्षेत्रों में जाकर पिंडदान करना भी पितृ-पूजाका एक प्रकार है। यह सब मृत-पितरोंके लिये है। प्रत्येक महिनेकी अमावस्या पितरोंका दिवस माना गया है। चार दिशाओंमें चार पितृगण हैं। (१) पूर्व-अग्निष्वात्त (२) दक्षिणबर्हिषद (३) पश्चिम-आज्यप (४) उत्तर सोमप। कहीं कहीं सात गण कहे गये हैं जिनका अपना लोक है। “मानव पिता अपनी तपस्यासे देव पितरोंका स्थान प्राप्त कर सकते हैं। देव-पिता अपनी योग-साधनासे सनकादिक बनते हैं" ऐसे कहा गया है। इन पितरोंमें— अर्यमा—ऋग्वेदमें अर्यमा एक देवता है। बारह आदित्योंमें वैशाख मासका आदित्य है। इसीको पितृगणका एक कहा गया है। इसके ३०० किरण हैं। केवल महाभारतमें अत्रि-पुत्र होनेकी बात कही गयी है। घर बांधते समय इसकी पूजा करनेका प्रथान था। इसके दक्षिणमें पितृयान मार्ग होनेकी बात भी देखनेको मिलती है। भागवत पुराणमें कहा गया है कि जब पृथुने पृथ्वीका दोहन किया तब पितरोंने इसे वत्स बनाया था। गीता अ० १०, श्लो० २९-शासकोंमें यम हूं मैं— शासन करनेवाले शासक। राज्यकर्ताको शासक कहा जाता है। न्यायान्यायका विचार करके समाजको अनुशासनमें रखना जिससे समाज अभ्युदय और निःश्रेयसकी साधना कर ६६ ज्ञानेश्वरी