दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
४. दोहा ४५१-५७३: राम-गुणगान, परमार्थ-तत्त्व एवं ग्रन्थ-उपसंहार
१६२ दोहावली मनुष्य आँख होते हुए भी मृत्युको नहीं देखते बिन आँखिन की पानहीं पहिचानत लखि पाय। चारि नयन के नारि नर सूझत मीचु न माय ॥४८२॥ भावार्थ—विना आँखवाली जूती पैरको देखकर पहचान लेती है; किंतु इन नर-नारियोंके चार-चार आँखें (दो बाहरकी और मन- बुद्धिरूप दो भीतरकी) होनेपर भी इन्हें मौत और माया नहीं सूझती ! ॥ ४८२ ॥ मूढ़ उपदेश नहीं सुनते जौ पै मूढ़ उपदेश के होते जोग जहान। क्यों न सुजोधन बोध कै आए स्याम सुजान ॥४८३॥ भावार्थ—यदि मूर्ख मनुष्य संसारमें उपदेशके योग्य होते तो परम चतुर भगवान् श्रीकृष्ण दुर्योधनको क्यों न समझा सके ? ॥ ४८३ ॥ सोरठा फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद। मूरख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम ॥४८४॥ भावार्थ—यद्यपि बादल अमृत-सा जल बरसाते हैं तो भी बेंत फूलता-फलता नहीं। इसी प्रकार यदि ब्रह्माके समान भी [ज्ञानी] गुरु मिल जायँ तो भी मूर्खके हृदयमें ज्ञान नहीं होता ॥ ४८४ ॥ दोहा रीझि आपनी बूझि पर खीझि बिचार बिहीन। ते उपदेस न मानहीं मोह महोदधि मीन ॥४८५॥. CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
भावार्थ—अपनी ही समझ (बुद्धि) पर जिनकी प्रीति है (अपनी ही समझको जो सबसे उत्तम मानते हैं) और जिनका रोष नासमझीको लिये हुए होता है; वे मोहके महान् समुद्रमें मछली बने हुए लोग किसीका उपदेश नहीं मानते ॥ ४८५ ॥ बार-बार सोचनेकी आवश्यकता अनसमझें अनुसोचनो अवसि समुझिए आपु । तुलसी आपु न समुझिए पल पल पर परितापु ॥४८६॥ भावार्थ—किसी बातको न समझनेपर उसे बार-बार सोचना चाहिये, ऐसा करनेसे वह बात अपने-आप समझमें आ जायगी। तुलसीदासजी कहते हैं कि वह स्वयं समझमें नहीं आयी तो [उसके अनुसार आचरण करनेसे] क्षण-क्षणमें दुःख होगा ॥ ४८६ ॥ मूर्खशिरोमणि कौन हैं ? कूप खनत मंदिर जरत आएँ धारि बबूर । बवाँहि नवहिं निज काज सिर कुमति सिरोमनि कूर ॥४८७॥ भावार्थ—जो लोग घर जलनेपर कुँआ खोदते हैं, शत्रुके चढ़ आनेपर [किले की रक्षाके लिये चारों ओर] बबूलके वृक्ष रोपना शुरू करते हैं और स्वार्थसाधनके लिये [भगवान्को छोड़कर जहाँ-तहाँ] सिर नवाते फिरते हैं, वे मूर्खोंके शिरोमणि और निकम्मे (दीर्घसूत्री और प्रमादी) हैं ॥ ४८७ ॥ ईश्वरविमुखकी दुर्गति ही होती है निडर ईस तें बीस कें बीस बाहु सो होइ । गयो गयो कहँ सुमति सब भयो कुमति कह कोइ ॥४८८॥
१६४ दोहावली भावार्थ—ईश्वरका डर छोड़कर चाहे कोई बीसों विस्वे (निश्चय ही) रावणके समान [प्रभावशाली] क्यों न हो जाय, बुद्धिमान् लोग तो उस ईश्वरविमुखको गया-गया ही (नष्ट ही हुआ) कहेंगे; कोई कुबुद्धिवाला ही उसे उन्नतिको प्राप्त हुआ बतलावेगा ॥ ४८८ ॥ जान-बूझकर अनीति करनेवालेको उपदेश देना व्यर्थ है जो सुनि समुझि अनीति रत जागत रहै जु सोइ । उपदेसिबो जगाइबो तुलसी उचित न होइ ॥४८९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो [सब बात] सुन- समझकर भी (जान-बूझकर) अनीतिमें लगा रहता है और जागते हुए भी सो रहता है, उसको उपदेश देना या जगाना उचित नहीं है अर्थात् व्यर्थ है ॥ ४८९ ॥ बहु सुत बहु रुचि बहु बचन बहु अचार व्यवहार । इनको भलो मनाइबो यह अग्यान अपार ॥४९०॥ भावार्थ—जिनके बहुत पुत्र हों, जिनकी [भाँति-भाँतिकी] अनेकों इच्छाएँ हों, जो तरह-तरहकी बातें बनाते हों, जिनके आचरण और व्यवहार अनेकों प्रकारके हों उनकी भलाई चाहना महान् मूर्खता है (अर्थात् उनका कल्याण होना बहुत ही कठिन है) ॥ ४९० ॥ जगत्के लोगोंको रिझानेवाला मूर्ख है लोगनि भलो मनाव जो भलो होन की आस । करत गगन को गँडुआ सो सठ तुलसीदास ॥४९१॥
भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो आदमी [दूसरोंके द्वारा] अपना भला होनेकी आशासे [भगवान्को छोड़कर जगत्के] लोगोंको रिझाता रहता है, वह मूर्ख आकाशका तकिया बनाना चाहता है ॥४९१॥ अपजस जोग कि जानकी मनि चोरी की कान्ह । तुलसी लोग रिझाइबो करषि कातिबो नान्ह ॥४९२॥ भावार्थ—क्या श्रीजानकीजी अपयशके योग्य थीं और क्या श्रीकृष्णने मणिकी चोरी की थी ? कदापि नहीं। अतएव तुलसी- दासजी कहते हैं कि सब लोगोंको प्रसन्न करना उतना ही कठिन है जितना जोरसे खींचकर बारीक सूत कातना ! ॥४९२॥ तुलसी जु पै गुमान को होतो कछू उपाउ । तौ कि जानकिहि जानि जियँ परिहरते रघुराउ ॥४९३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि लोगोंके सन्देहको दूर करनेका कोई उपाय होता तो क्या श्री रघुनाथजी श्रीजानकीजी- को अपने मनमें [सर्वथा निष्कलङ्क] जानते हुए भी उनका त्याग करते ? ॥४९३॥ प्रतिष्ठा दुःखका मूल है मागि मधुकरी खात ते सोवत गोड़ पसारि । पाप प्रतिष्ठा बढ़ि परी ताते बढ़ी रारि ॥४९४॥ भावार्थ—जबतक मधुकरी माँगकर खाते थे, तबतक पैर पसार- कर (निश्चिन्त रूपसे) सोते थे । परन्तु इधर यह पापमयी प्रतिष्ठा बढ़ गयी, इसीसे झगड़ा (झंझट) भी बढ़ गया ॥४९४॥ तुलसी भेड़ी की धँसनि जड़ जनता सनमान । उपजत ही अभिमान भो खोवत मूढ़ अपान ॥४९५॥
१६६ दोहावली भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मूर्ख जनताका सम्मान भेड़ियाधँसानके समान है (जहाँ एकने बड़ाई की, वहीं सब करने लगते हैं) परन्तु इस सम्मानका मिलना शुरू होते ही अभिमान उत्पन्न हो जाता है, जिससे मूर्खलोग अपनी स्थिति खो बैठते हैं (अभिमानके वश होकर गिर जाते हैं) ॥४९५॥ भेड़ियाधँसानका उदाहरण लही आँखि कब आँधरें बाँझ पूत कब ल्याइ । कब कोढ़ी काया लही जग बहराइच जाइ ॥४९६॥ भावार्थ—दुनिया बहराइचको दौड़ी जाती है, परन्तु कोई इस बातका पता नहीं लगाता कि वहाँ जाकर कब किस अंधेने आंख पायी, कौन बाँझ कब लड़का लेकर आयी और कब किस कोढ़ीने कञ्चन-सी काया प्राप्त की ? नोट—बहराइचमें सैयद सालारजंग मसऊद गाजी (गाजीमियाँ) की दरगाह है। वहाँ जेठके महीनेमें हरसाल मेला होता है। वहाँ लोग अन्धविश्वासके कारण तरह-तरहकी कामनाओंको लेकर जाते हैं। कहते हैं कि यह गाजीमियाँ महमूद गजनीका भानजा था। यह गाजी होनेकी इच्छासे अवधकी ओर बढ़ आया था और श्रावस्ती- के राजा सुहृददेवके हाथों मारा गया था ॥४९६॥ ऐश्वर्य पाकर मनुष्य अपनेको निडर मान बैठते हैं तुलसी निरभय होत नर सुनिअत सुरपुर जाइ । सो गति लखि अत अछत तनु सुख संपति गति पाइ ॥४९७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सुना जाता है, स्वर्गमें जाकर जीव निर्भय हो जाता है (समझता है कि मैं बुढ़ापे और CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
बीमारीसे रहित होकर सदा ही भोग भोगता रहूँगा; क्योंकि स्वर्गमें बुढ़ापा और बीमारी नहीं हैं)। परन्तु ऐसी दशा तो यहाँ इस शरीरके रहते भी सुख-सम्पत्ति और ऊँची पदवी पानेपर देखी जाती है (क्योंकि सुख-सम्पत्ति और ऊँचे पदको प्राप्त मनुष्य भी अभिमान- वश अपनेको निर्भय ही मानता है) [परन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है।] ॥४६७॥ तुलसी तोरत तीर तरु बक हित हंस बिडारि। बिगत नलिन अलि मलिन जल सुरसरिहु बढ़िआरि ॥४६८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि गङ्गाजी भी बढ़ जानेपर अपने किनारेके (आश्रित) वृक्षोंको तोड़ डालती हैं, बगुलों (दम्भियों) के लिये हंसोंको (सच्चे ज्ञानियोंको) भगा देती हैं, कमल और भौंरोंसे (सद्गुणोंसे) रहित और मलिन जलवाली (मलिनहृदया) हो जाती हैं। (अर्थात् पार्थिव ऐश्वर्य बढ़ जानेपर सज्जनोंमें भी दोष आ जाते हैं। वे अभिमानमें भरकर पड़ोसी आश्रितोंको मिटा देते हैं, मूर्खतावश सच्चे पुरुषोंको अपने पाससे हटाकर दम्भियोंको आश्रय देते हैं और कुसङ्गतिके कारण सद्गुणोंसे रहित और पापजीवी हो जाते हैं।) ॥४६८॥ अधिकारी बस औसरा भलेउ जानिबे मंद। सुधा सदन बसु बारहें चउर्थे चउथिउ चंद ॥४६९॥ भावार्थ—बुरा समय आनेपर भले अधिकारियोंको भी बुरा ही समझिये। चन्द्रमा अमृतका भण्डार होनेपर भी आठवें, बारहवें और चौथे स्थानमें पड़नेपर एवं भादों सुदी चौथके दिन देखनेपर हानि- कारक हो जाता है ॥४६६॥
१६८ दोहावली नौकर स्वामीकी अपेक्षा अधिक अत्याचारी होते हैं त्रिबिध एक बिधि प्रभु अनुग अवसर करहिँ कुठाट। सूधे टेढ़े सम विषम सब महँ बारहबाट ॥५००॥ भावार्थ—अवसर पड़नेपर मालिक यदि एक प्रकारसे बुराई करता है, तो उसके अनुगामी सेवक तीन प्रकारसे करते हैं। वे सीधे सज्जनोंसे भी टेढ़ा बर्ताव करते हैं, समतामें भी विषमता करते हैं और सब कामोंको नष्ट-भ्रष्ट कर देते हैं ॥५००॥ प्रभुतें प्रभु गन दुखद लखि प्रजहि सँभारै राउ। कर तें होत कृपानको कठिन घोर घन घाउ ॥५०१॥ भावार्थ—मालिककी अपेक्षा मालिकके परिवारकवर्ग विशेष दुःखदायी होते हैं; इस बातको विचारकर राजाको चाहिये कि वह स्वयं अपनी प्रजाकी सँभाल करे। क्योंकि हाथकी चोटकी अपेक्षा हाथमें पकड़ी हुई तलवार की चोट बहुत ही कठिन और भयङ्कर होती है ॥५०१॥ ब्यालहु तें बिकराल बड़ ब्यालफेन जियँ जानु। वहि के खाएँ मरत है वहि खाए बिनु प्रानु ॥५०२॥ भावार्थ—अपने हृदयमें अहिफेन ( अफीम ) को साँप ( अहि ) से भी अधिक भयङ्कर समझो। साँपके काटनेसे तो आदमी मरता ही है, परन्तु अफीमको खाकर वह [ जीता हुआ भी ] प्राणहीन (मुर्देकी भाँति) हो जाता है ॥५०२॥ कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहिँ ओर। कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर ॥५०३॥ भावार्थ—[श्रीभरतजी महाराज अपनी कठोरताका विवेचन CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
करते हुए कहते हैं कि मैं जो इतना कठोर हूँ, इसमें] मेरा दोष नहीं है; क्योंकि कार्य कारणसे कठोर होता ही है जैसे [दधीचीकी] हड्डीसे बना हुआ वज्र हड्डीसे अधिक कठोर और पत्थरसे उत्पन्न लोहा पत्थरसे भी भयानक और कठोर होता है ॥५०३॥ काल बिलोकत ईस रुख भानु काल अनुहारि । रबिहि राउ राजहि प्रजा बुध व्यवहरहि बिचारि ॥५०४॥ भावार्थ—काल (समय) ईश्वरका रुख देखता है (ईश्वरके इच्छानुसार बदलता रहता है); सूर्य कालका अनुगमन करता है (यथासमय कार्य करता), राजा सूर्यका अनुसरण करता है (सूर्यके यथायोग्य समयपर जल खींचने और बरसानेकी भाँति राजा प्रजासे कररूपमें धन लेकर उसीके हितमें लगा देता है), प्रजा राजा का अनुकरण करती है (जैसा राजा वैसी प्रजा) और बुद्धिमान् पुरुष सब व्यवहार विचारकर करते हैं (वे अपनी बुद्धिका ही अनुसरण करते हैं) ॥५०४॥ जथा अमल पावन पवन पाइ कुसंग सुसंग । कहिअ कुबास सुबास तिमि काल महीप प्रसंग ॥५०५॥ भावार्थ—जैसे निर्मल और पवित्र वायु बुरी (दुर्गन्धयुक्त) और अच्छी (सुगन्धयुक्त) वस्तुओंके संसर्गसे दुर्गन्धित और सुगन्धित कही जाती है, वैसे ही अच्छे या बुरे राजाके संसर्गसे काल भी अच्छा या बुरा कहा जाता है ॥५०५॥ भलेहु चलत पथ पोच भय नृप नियोग नय नेम । सुतिय सुभूपति भूषिअत लोह सँवारित हेम ॥५०६॥ भावार्थ—जिस प्रकार [सर्वोत्तम धातु] सोना लोहे [के हथौड़े] से पीट-पीटकर सँवारा जानेपर ही [गहना बनकर]
सुन्दर स्त्री और सुन्दर राजाको भी भूषित करता है, उसी प्रकार राजाकी [निष्पक्ष] आज्ञा, [स्वार्थरहित] नीति तथा [कड़ाईसे बर्ते जानेवाले न्यायपूर्ण] कानूनके कारण ही भले लोगोंको भी बुरे मार्गमें चलनेमें डर लगता है ॥ ५०६ ॥ राजाको कैसा होना चाहिए ? माली भानु किसान सम नीति निपुन नरपाल । प्रजा भाग बस होहिँगे कबहुँ कबहुँ कलिकाल ॥५०७॥ भावार्थ—माली, सूर्य और किसानके समान नीतिमें निपुण राजा इस कलियुगमें प्रजाके सौभाग्यसे कभी-कभी होंगे [सदा नहीं] । १—माली मुरझाये हुए पौधोंको सींचता है, बढ़े हुए जबरदस्तोंको काट-छांटकर अलग कर देता है, झुके हुए (कमजोर) पौधोंको लकड़ी का टेका देकर गिरनेसे बचा लेता है और फिर फल-फूलोंका संग्रह करता है । २—सूर्य किसीको भी प्रत्यक्षमें दुःख न देकर समुद्र और नदीसे जल खींच लेता है, उसीको अमृत-सा बनाकर यथायोग बरसा देता है । ३—किसान खेत तैयार करता है, खाद देता है, बीज बोता है, सींचता है, रक्षा करता है फिर फसल पकनेपर काटता है ॥ ५०७ ॥ बरषत हरषत लोग सब करषत लखै न कोइ । तुलसी प्रजा सुभाग ते भूप भानु सो होइ ॥५०८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सूर्य जब जलको खींचता
दोहावली १७१ है तब किसीको भी पता नहीं लगता, परंतु जब बरसाता है तब सब लोग प्रसन्न हो जाते हैं। इसी प्रकार [प्रजाको बिना सताये—यहाँतक कि कर देनेमें प्रजाको कुछ भी कष्ट न हो; इतना-सा कर उगाहकर— समयपर उसी धनसे व्यवस्थितरूपसे प्रजाका हित करनेवाला] सूर्य-सरीखा [कोई] राजा प्रजाके सौभाग्यसे ही होता है ॥५०८॥ राजनीति सुधा सुजान कुजान फल आम असन सम जानि । सुप्रभु प्रजा हित लेहिं कर सामादिक अनुमानि ॥५०९॥ भावार्थ—सुन्दर दूध, घी आदि अमृत, उत्तम अन्न, कुत्सित अन्न, लताओंके फल, आम आदि पेड़ोंके फल—इन सबको खाद्य रूपमें समान जानकर अच्छे राजा साम, दान आदि नीतियोंके अनुसार प्रजाके हितकी इच्छासे प्रजासे 'कर' के रूपमें ग्रहण कर लेते हैं ॥ ५०९ ॥ पाके पकाए बिटप दल उत्तम मध्यम नीच । फल नर लहैं नरेस त्यों करि बिचारि मन बीच ॥५१०॥ भावार्थ—उत्तम वह है जो वृक्षोंके पके फल लेता है, मध्यम वह है जो [पकनेतककी बाट न देखकर] अधपके फल ही तोड़- कर घरमें पकाता है और नीच वह है जो अधीर होकर पत्तोंको ही नोच डालता है। इसी प्रकार उत्तम राजाको भी मनमें विचारकर तभी कर वसूल करना चाहिये, जब फसल पक जाय, जिससे कि किसान आसानीसे दे सके; जो बिना ही फसल पके कर उगाहता है, वह मध्यम है और अकाल पड़नेपर भी पीड़ा पहुँचाकर किसानसे कर उगाहनेवाला स्वार्थी राजा नीच है ॥ ५१० ॥
१७२ दोहावली रीझि खीझि गुरु देत सिख सखा सुसाहिब साधु । तोरि खाइ फल होइ भल तरु काटें अपराधु ॥५७१॥ भावार्थ—गुरु, मित्र, अच्छे मालिक और साधुजन प्रसन्न होकर या [न माननेपर हमारे हितके लिये] क्रुद्ध होकर यही उपदेश देते हैं कि पका फल ही पेड़से तोड़कर खाना अच्छा है, पेड़को काट डालना अपराध है [राजाको कर उगाहनेके समय यह उपदेश ध्यानमें रखना चाहिये] ॥५७१॥ धरनि धेनु चारितु चरत प्रजा सुबच्छ पेन्हाइ । हाथ कछू नहिं लागिहै किएँ गोड़ की गाइ ॥५७२॥ भावार्थ—पृथ्वीरुपी गौ जब राजाके प्रजावत्सलता तथा धर्म- युक्त उत्तम चरित्ररूपी चारेको चरकर दुग्धवती होती है और जब प्रजारूपी सुन्दर बछड़ेके द्वारा चोंखे जानेपर पेन्हाती है [तभी उत्तम और अधिक दूध मिलता है], सिर्फ पैर बाँधकर दुहनेसे कुछ भी दूध हाथ नहीं लगता ॥५७२॥ चढ़े बबूरैं चंग ज्यों ग्यान ज्यों सोक समाज । करम धरम सुख संपदा त्यों जानिबे कुराज ॥५७३॥ भावार्थ—जो दशा बवंडरमें पड़ी हुई पतंगकी और शोकोंके समूहमें पड़े हुए विवेककी होती है (अर्थात् वे नष्ट हो जाते हैं) वही दशा बुरे राज्यमें [सत्] कर्म, [सनातन] धर्म और सुख- सम्पत्तिकी भी समझनी चाहिये ॥५७३॥ कंटक करि करि परत गिरि साखा सहस खजूरि । मरहिं कुनृप करि करि कुनय सों कुचालि भव भूरि ॥५७४॥ भावार्थ—जैसे खजूरकी हजारों शाखाएँ वृक्षमें बहुतेरे
दोहावली १७३ काँटे बना-बनाकर (स्वयं टूट-टूटकर) गिर पड़ती हैं, इसी प्रकार दुष्ट राजा भी अपनी दुष्ट नीतिसे कुचाल कर-करके संसारमें बार-बार जन्मते-मरते हैं ॥५१४॥ काल तोपची तुपक महि दारू अनय कराल । पाप पलीता कठिन गुरु गोला पुहुमी पाल ॥५१५॥ भावार्थ—काल (समय) ही गोलंदाज है, पृथ्वी ही तोप है, विकराल अनीति ही बारूद है, पाप ही पलीता है और राजा ही कठोर तथा भारी गोला है (अर्थात् बुरा समय ही दुष्ट राजाके द्वारा प्रजाका नाश कराता है) ॥५१५॥ किसका राज्य अचल हो जाता है ? भूमि रुचिर रावन सभा अंगद पद महिपाल । धरम राम नय सीय बल अचल होत सुभ काल ॥५१६॥ भावार्थ—पृथ्वी ही रावणकी सुन्दर सभा है, इसमें राजा ही अङ्गदका पैर है, धर्मरूपी राम और नीतिरूपी सीताके बदले ही वह राजारूपी अङ्गदका पैर शुभ समयमें अचल हो जाता है ॥५१६॥ प्रीति राम पद नीति रति धरम प्रतीति सुभायँ । प्रभुहि न प्रभुता परिहरै कबहुँ बचन मन कायँ ॥५१७॥ भावार्थ—भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें जिसकी प्रीति है, [प्रजाहितकी] नीतिमें जो सदा रत है और धर्ममें जिसका स्वाभाविक ही विश्वास है, उस राजाको प्रभुता मन, वचन और शरीरसे कभी नहीं छोड़ती (अर्थात् उसका राज्य सदा बना रहता है) ॥५१७॥ कर के कर मन के मनहिं बचन बचन गुन जानि । भूपहि भूलि न परिहरैं बिजय बिभूति सयानि ॥५१८॥
१७४ दोहावली भावार्थ—जिस राजाके हाथमें हाथके गुण (रक्षा करना, दान देना आदि) हों, मनमें मनके गुण (प्रजावत्सलता, उदारता आदि) हों और वचनमें वचनके गुण (मधुरता, सत्यता, हितवादिता आदि) हों उस राजाको विजय, ऐश्वर्य और बुद्धिमत्ता भूलकर भी नहीं छोड़ते ॥५१८॥ गोली बान सुमंत्र सर समुझि उलटि मन देखु । उत्तम मध्यम नीच प्रभु बचन बिचारि बिसेषु ॥५१९॥ भावार्थ—गोली, साधारण बाण और सुमन्त्रित बाण [के गुणों] को मनमें समझकर और फिंर इनके क्रमको उलटकर देखो और विचार करो कि उत्तम, मध्यम और नीच राजाके वचन क्रमशः ऐसे ही होते हैं, (अर्थात् उत्तम राजाके वचन सुमन्त्रित बाणके समान अमोघ हैं, जो कभी व्यर्थ नहीं जाते; मध्यम राजाके वचन साधारण बाणके समान हैं जो व्यर्थ भी जा सकते हैं और नीच राजाके वचन गोलीके समान होते हैं—उनका शब्द तो बहुत विकराल होता है, परंतु निशाना चूक गया तो काम कुछ भी नहीं होता) ॥५१९॥ सत्रु सयानो सलिल ज्यों राख सीस रिपु नाव । बूढ़त लखि पग डगत लखि चपरि चहूँ दिसि धाव॥५२०॥ भावार्थ—चतुर शत्रु पानीके समान शत्रुरूपी नावको सिरपर रखता है (शत्रुका ऊपरसे बड़ा सत्कार करता है), परंतु उसको डूबते हुए देखकर या पैर डगमगाते हुए देखकर तुरंत ही चारों ओरसे उसपर धावा कर देता है ॥५२०॥ रैअत राज समाज घर तन धन धरम सुबाहु । सांत सुसचिवन सौंपि सुख बिलसइ नित नरनाहु ॥५२१॥
दोहावली १७५ भावार्थ—प्रजा, राजसमाज, घर, अपना शरीर, धन, धर्म और सेना आदिको शान्त और सुयोग्य मन्त्रियोंके हाथोंमें सौंप- कर ही राजा नित्य सुखसे रह सकता है (अर्थात् जहाँ मन्त्री शान्त और योग्य नहीं होते; वहाँ राजा सुखसे नहीं रह सकता) ॥५२१॥ मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक । पालइ पोषइ सकल अँग तुलसि सहित बिबेक ॥५२२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रधान (राजा) को मुखके समान होना चाहिये, जो खाने-पीनेके लिये तो एक ही है; परंतु विवेकके साथ समस्त अङ्गोंका पालन-पोषण करता है ॥५२२॥ सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ । तुलसी प्रीति की रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ॥५२३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सेवक हाथ, पैर और नेत्रोंके समान होने चाहिये और मालिक मुखके समान होना चाहिये । सेवक-स्वामीकी प्रीतिकी रीतिको सुनकर सुकवि उसकी सराहना करते हैं। (अर्थात् जैसे हाथ, पैर, आंख आदि खाद्य सामग्रियोंके संग्रहमें और विपत्ति पड़ने पर रक्षा करनेमें सहायता करते हैं, उसी प्रकार सेवककी मालिकको सहायता करनी चाहिये । और जैसे मुख सब पदार्थोंको खाता है, परंतु खाकर सब अङ्गोंको यथायोग्य रस पहुँचाता है और उन्हें पुष्ट करता है उसी प्रकार मालिकको सबका पेट भरकर उन्हें शक्तिमान् बनाना चाहिये ॥५२३॥
१७६ दोहावली सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ॥५२४॥ भावार्थ—यदि मन्त्री, वैद्य और गुरु [अप्रसन्नताके] भयसे या [स्वार्थसाधनकी] आशासे [हितकी बात न कहकर] 'हाँ' में 'हाँ' मिलाने लगते हैं तो राज्य, धर्म और शरीर—इन तीनोंका शीघ्र ही नाश हो जाता है ॥५२४॥ रसना मंत्री दसन जन तोष पोष निज काज। उदर प्रभु कर पद सेन पदातिक बालक राज समाज ॥५२५॥ भावार्थ—राजा पेट है, मन्त्री जीभ है और अन्य कर्मचारी दांत हैं। जैसे दाँत भोजनको कुचलकर और जीभ उसका स्वाद लेकर तथा अपनी लार साथ लेकर उसे पेटमें पहुँचा देती हैं और पेट रस बनाकर सारे अङ्गोंको पुष्ट और संतुष्ट करता है, उसी प्रकार मन्त्री और अन्य राजकर्मचारी राजाके लिये सब अपना-अपना काम ठीक करते हैं और बदलेमें राजा उन सबका पोषण करता है और उन्हें संतुष्ट करता है। सेना और पदातिजन राजाके हाथ और पैर हैं। जैसे हाथ-पैर पेटकी रक्षा करते हैं और पेट हाथ-पैरको पालता-पोषता है, उसी प्रकार सेना-पदाति राजाकी रक्षा करते हैं और राजा उनका पालन- पोषण करता है। फिर राजा माता-पिताके समान है और सारा राज- समाज राजाका बालक है। जैसे माता-पिता बालकका पालन-पोषण करते हैं, वैसे ही राजा सारे राजसमाजको पालता-पोषता है ॥५२५॥ लकड़ी डौआ करछुली सरस काज अनुहारि। सुप्रभु संग्रहहिं परिहरहिं सेवक सखा बिचारि ॥५२६॥
दोहावली १७७ भावार्थ—जिस तरह कामकी सरसताके अनुसार लकड़ीके चम्मच या धातुकी करछुलका यथायोग्य संग्रह और त्याग किया जाता है (कहीं लकड़ीके चम्मचसे काम लिया जाता है तो कहीं उसका त्याग करके धातुकी करछुलीकी ही जरूरत पड़ती है) उसी प्रकार अच्छे स्वामी भी विचार करके सब प्रकारके सेवकों तथा सखाओंका यथायोग्य संग्रह और त्याग करते हैं ॥५२६॥ प्रभु समीप छोटे बड़े रहत निबल बलवान । तुलसी प्रकट बिलोकिऐ कर अँगुली अनुमान ॥५२७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मालिकके निकट छोटे, बड़े, निर्बल और बलवान्—सभी प्रकारके लोग रहते हैं। हाथकी अँगुलियोंसे अनुमान करके इस बातको प्रत्यक्ष देख लेना चाहिये (पाँचों अँगुलियाँ एक ही हाथमें हैं, परंतु बराबरकी नहीं हैं) ॥५२७॥ आज्ञाकारी सेवक स्वामीसे बड़ा होता है साहब तें सेवक बड़ो जो निज धरम सुजान । राम बाँधि उतरे उदधि लाँघि गए हनुमान ॥५२८॥ भावार्थ—वह सेवक स्वामीसे बड़ा है, जो अपने धर्मपालनमें निपुण है। भगवान् श्रीरामचन्द्रजी तो पुल बाँधकर समुद्रके पार उतरे, परंतु हनुमान्जी उसी समुद्रको लाँघकर चले गये ॥५२८॥ मूलके अनुसार बढ़नेवाला और बिना अभिमान किये सबको सुख देनेवाला पुरुष ही श्रेष्ठ है तुलसी भल बरतरु बढ़त निज मूलहि अनुकूल । सबहि भाँति सब कहँ सुखद दलनि फलनि बिनु फूल ॥५२९॥
१७८ दोहावली भावार्थ—तुलसीदासजी कहते है कि बड़का वृक्ष उत्तम है, जो अपनी जड़ ( बुनियाद ) के अनुसार ही बढ़ता है और बिना ही फूले (घमंड किये बिना ही) अपने पत्तों और फलोंद्वारा सबको सब प्रकारसे सुख देता है ॥५२६॥ त्रिभुवनके दीप कौन हैं ? सधन सगुन सधरम सगन सबल सुसाइँ महीप । तुलसी जे अभिमान बिनु ते त्रिभुवन के दीप ॥५३०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो पुरुष धनवान्, गुणवान्, धर्मात्मा सेवकोंसे युक्त, बलवान् और सुयोग्य स्वामी तथा राजा होते हुए भी अभिमानरहित होते हैं, वे ही तीनों लोकोंके उजागर होते हैं ॥५३०॥ कीर्ति करतूतिसे ही होती है । तुलसी निज करतूति बिनु मुकुत जात जब कोइ । गयो अजामिल लोक हरि नाम सक्यो नहिं धोइ ॥५३१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि कोई जीव अपने पुरुषार्थके बिना ही मुक्त हो जाता है [ तो उसकी कीर्ति नहीं होती] अजामिल श्रीहरिके लोकको चला गया, परन्तु वह अपनी बदनामीको नहीं धो सका (अब भी उसकी उपमा लोग पापियोंसे ही देते हैं) ॥५३१॥ बड़ोंका आश्रय भी मनुष्यको बड़ा बना देता है बड़ो गहे ते होत बड़ ज्यों बावन कर दंड । श्रीप्रभु के सँग सों बढ़ो गयो अखिल ब्रह्मांड ॥५३२॥
दोहावली १७९ भावार्थ—बड़ेके अपनानेसे भी मनुष्य बड़ा हो जाता है, जैसे वामन भगवान्के हाथका दण्ड उनके साथ ही बढ़कर अखिल ब्रह्माण्डतक पहुँच गया ॥५३२॥
कपटी दानीकी दुर्गति
तुलसी दान जो देत हैं जल में हाथ उठाइ । प्रतिग्राही जीवै नहीं दाता नरकै जाइ ॥५३३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जो लोग हाथ उठाकर [मछलियोंको फाँसनेके लिये] जलमें दान देते हैं (चारा डालते हैं), उस दानको ग्रहण करनेवाली मछली तो जीती नहीं और वह दाता भी नरकमें जाता है ॥५३३॥
अपने लोगों के छोड़ देनेपर सभी वैरी हो जाते हैं
आपन छोड़ो साथ जब ता दिन हितू न कोइ । तुलसी अंबुज अंबु बिनु तरनि तासु रिपु होइ ॥५३४॥* भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जिस दिन अपने ही लोग अपना साथ छोड़ देते हैं, उस दिन कोई भी हित करनेवाला नहीं रह जाता [सूर्य कमलका मित्र है, परन्तु] जब जल कमलका साथ छोड़ देता है, तब वही सूर्य कमलका वैरी बनकर उसे जला डालता है ॥५३४॥
- श्रीरामचरितमानसमें भी इसी भावकी एक अर्द्धाली मिलती है— भानु कमल कुल पोषनिहारा । बिनु जल जारि करइ तेहि छारा ।
१८० दोहावली साधनसे मनुष्य ऊपर उठता है और साधन बिना गिर जाता है उरबी परि कलहीन होइ ऊपर कलाप्रधान । तुलसी देखु कलाप गति साधन घन पहिचान ॥५३५॥ भावार्थ—मोरकी पाँख जब जमीनकी ओर नीचे पड़ी रहती है, तो वह कलाहीन हो जाती है और वही जब ऊपरको होती है तो कलाप्रधान हो जाती है (जगमगा उठती है) । तुलसीदासजी कहते हैं कि मोरकी पाँखकी गति देखो और समझो कि मेघ ही इसमें प्रधान साधन है (तात्पर्य यह कि मोरपंखकी गतिको समझकर तुम भी प्रेमघन घनश्याम श्रीरामजीके प्रेमको पहचानकर नाच उठो) ॥५३५॥ सज्जनको दुष्टोंका संग भी मंगलदायक होता है तुलसी संगति पोच की सुजनहि होति म-दानि । ज्यों हरि रूप सुताहि तें कीन्हि गोहारी आनि ॥५३६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सज्जनके लिये नीचकी सङ्गति भी मङ्गलदायिनी होती है। जैसे विष्णुरूप बने हुए बढ़ईसे विवाह करनेवाली राजकन्याकी पुकार सुनकर साक्षात् भगवान् विष्णुने आकर सहायता की । [एक राजकन्याने भगवान् विष्णुके साथ विवाह करनेकी प्रतिज्ञा की थी। एक चालाक बढ़ईने काठके दो हाथ जोड़कर विष्णुका रूप बनाया और उस राजकन्यासे विवाह कर लिया । एक बार राजकन्याके पितापर कुछ विपत्ति आयी, तब पिताके कहनेसे कन्याने भगवान् विष्णुसे प्रार्थना की और कहा कि मैं
दोहावली १८१ तो आपको ही बरना चाहती थी, बढ़ईने तो धोकेसे मुझको विवाह लिया; अतएव इस समय आप ही मेरे पिताकी रक्षा कीजिये। भगवान् विष्णुने कन्याकी सरल और सत्य प्रार्थनाको स्वीकार करके उसके पिताको विपत्तिसे मुक्त किया।] ॥५३६॥ कलियुगमें कुटिलताकी वृद्धि कलि कुचालि सुभ मति हरनि सरलै दंडै चक्र। तुलसी यह निहचय भई बाढ़ि लेति नव बक्र ॥५३७॥ भावार्थ—कलियुगकी कुचाल शुभ बुद्धिको हरनेवाली है, इसीलिये राजचक्र भी सरलस्वभावके साधुओंको ही दण्ड देता है। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह निश्चय हो गया कि कलियुगमें कुटिलता नित नयी-नयी बढ़ रही है ॥५३७॥ आपसमें मेल रखना उत्तम है गो खग खे खग बारि खग तीनों माहिं बिसेक। तुलसी पीवैं फिरि चलैं रहैं फिरैं सँग एक ॥५३८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि पृथ्वी, आकाश और जलमें रहनेवाले तीनों प्रकारके पक्षियोंमें यह विशेषता है कि वे सब अपने- अपने दल बनाकर एक ही साथ पानी पीते हैं, चलते-फिरते हैं और रहते हैं (मनुष्योंको इनसे शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये) ॥५३८॥ सब समय समतामें स्थित रहनेवाले पुरुष ही श्रेष्ठ हैं साधन समय सुसिद्धि लहि उभय फूल अनुकूल। तुलसी तीनिउ समय सम ते महि मंगल मूल ॥५३९॥