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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

अट्ठावनवाँ अध्याय

उ०ख०-अ०५८ ] * संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमाके प्रसंगमें भृशुण्डीमुनिके पितरोंके उद्धारकी कथा * १८७ अट्ठावनवाँ अध्याय संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमाके प्रसंगमें भृशुण्डीमुनिके पितरोंके उद्धारकी कथा ब्रह्माजी बोले—हे व्यासजी! मरुत्वान् इन्द्रके इस प्रकारके उत्तम वचन सुनकर और उस [भृशुण्डि मुनिकी] अमृतोपम कथाका श्रवणकर प्रसन्न हुए राजा शूरसेनने उनसे पुनः पूछा—॥ १॥ शूरसेन बोले— हे देवेन्द्र! किस उपायसे आपका विमान आकाशमें जा सकेगा? हे विभो! उस उपायको कीजिये अथवा बताइये कि मैं आपके लिये क्या करूँ? ॥ २ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे व्यासजी! इस प्रकारसे पुनः प्रश्न करनेवाले राजा शूरसेनसे सभी लोगोंके सुनते हुए देवशत्रुओंका वध करनेवाले इन्द्रने हँसते हुए-से यह वचन कहा— ॥ ३ ॥ इन्द्र बोले—हे नृपश्रेष्ठ! यदि आपके नगरमें कोई ब्राह्मण या क्षत्रिय भी संकष्टचतुर्थीका व्रत करनेवाला हो तो उसके द्वारा एक वर्षतक किये गये उस व्रतके पुण्यका सम्यक् प्रकारसे दान दिये जानेपर ही यह गमन कर सकेगा; अन्यथा हे राजन्! यह अयुत (दस हजार) पुरुषोंके प्रयत्न करनेपर भी नहीं चल सकता ॥ ४-५ ॥ राजा बोले—[हे विभो!] मुझे बताइये कि वह मंगलकर संकष्टचतुर्थीव्रत कैसा है? उसका क्या पुण्य है? उसका क्या फल है? उसकी विधि क्या है और उसमें किस देवताका पूजन किया जाता है? ॥ ६ ॥ यहाँ प्राचीनकालमें किसने इस व्रतको किया था, जिसे करनेसे सिद्धि प्राप्त हुई हो। हे इन्द्र! कृपया यह सब विस्तारपूर्वक बताइये ॥ ७ ॥ इन्द्र बोले—[हे राजन्!] इस सन्दर्भमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसमें कृतवीर्य[के पिता] और नारदजीका संवाद है ॥ ८ ॥ इस पृथ्वीतलपर कृतवीर्य नामक एक बलवान् राजा हुआ था। जो सत्यवादी, शीलसम्पन्न, दानी, यज्ञकर्ता, मानी, महारथी, जितेन्द्रिय, अल्पाहारी और देव-ब्राह्मण-पूजक था। उसके अश्वारोही, गजारोही योद्धाओं, रथियों और धनुर्धारियोंकी संख्याकी गणना नहीं हो सकती थी। हे राजन्! वे सभी सह्याद्रिक्षेत्रके निवासी थे॥ ९-१०१/२ ॥ उसके राजभवनमें सभी पलँग और पात्र सोनेके ही थे। उनके यहाँ भोजन पकानेके लिये भी कभी ताम्रपात्रका प्रयोग नहीं होता था। उसके यहाँ बारह हजार ब्राह्मण पंक्तिबद्ध होकर भोजन करते थे ॥ ११-१२ ॥ त्रैलोक्यसुन्दरी सुगन्धा उसकी पत्नी थी, जो धार्मिक स्वभाववाली, पतिव्रता और पतिको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय माननेवाली थी। वह अनेक प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत, सौभाग्यवती और ब्राह्मणों, देवताओं एवं अतिथियोंके पूजनमें रुचि रखनेवाली थी। हे राजन्! वे दम्पती (राजा-रानी) इस प्रकारके अर्थात् सर्वगुणसम्पन्न होते हुए भी पुत्रहीन थे ॥ १३-१४ ॥ पुत्रप्राप्तिहेतु उन दोनोंने सभी प्रकारके दान, व्रत और तप किये तथा अन्य नियमोंका पालन किया एवं प्रभूत दक्षिणावाले यज्ञ किये। पुत्र-प्राप्तिकी लालसासे उन्होंने अनेक तीर्थों एवं [पुण्य] क्षेत्रोंकी यात्रा की, फिर भी जन्मान्तरमें किये हुए पापोंके कारण उन्हें पुत्र नहीं हुआ ॥ १५-१६ ॥ [तब] दुखी होकर राजाने एक बार मन्त्रियोंको बुलाकर राज्य, राजमुद्रा, कोश, प्रजा और जनपद—सब कुछ उन्हें दे दिया और रानीसहित [किसी] श्रेष्ठ वनको चले गये। [वहाँ पहुँचकर] वे दम्पती वल्कल और मृगचर्म धारणकर तपमें स्थित हो गये ॥ १७-१८ ॥ केवल सूखे पत्तों तथा वायुमात्रका आहार करते हुए उन दोनोंने इन्द्रियों एवं आहारपर नियन्त्रण कर लिया था। [समस्त शरीरके वल्मीक और लताजालोंसे आवृत हो जानेके कारण] उन दोनोंके मात्र नेत्र ही परिलक्षित होते थे। उन्हें इस अवस्थामें देखकर नारद मुनिने पितृलोकमें स्थित कृतवीर्यके पितासे कहा— 'मृत्युलोक (पृथ्वी)-में तुम्हारा पुत्र कृतवीर्य पुत्रहीन होनेके कारण प्रायोपवेशन (अनशन)-पर बैठा है, वह कल या परसों मर सकता है। यदि उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाला पुत्र प्राप्त हो जाय, तभी वह कृतवीर्य

१८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ - ऊपर] जीवित रह सकेगा या मरनेपर स्वर्गलोकको प्राप्त करेगा-इस प्रकार कहकर नारदजी [वहाँसे] चल दिये, तभी उन्होंने पृथ्वीलोकमें [भृशुण्डीमुनिके गणेशजीसे सारूप्य-सम्बन्धी] अद्भुत घटना देखी ॥ १९-२२॥ [उधर] भृशुण्डीके माता-पिता, उनके दोनों पुत्र और पुत्रीसहित पत्नी-ये सभी अग्निकी ज्वालाओंसे परिपूर्ण कुम्भीपाक नामक भयंकर नरकमें नीचेकी ओर मुख करके लटक रहे थे। यमदूतोंके द्वारा पीटे जानेपर वे अनेक प्रकारसे चीख-पुकार करते हुए क्रन्दन कर रहे थे। उनके क्रन्दनको सुनकर दयानिधान नारदजीने आकर भृशुण्डीसे उनके दुःखको कहा ॥ २३-२४१/२॥ नारदजीने कहा-हे महामुने! गणेशजीके सारूप्यको प्राप्त हुए जिन आपका दर्शन करनेके लिये इन्द्र आदि देवगण तथा कपिल आदि मुनिगण आते हैं, उन आपके माता, पिता, पत्नी, पुत्र, पुत्री और सेवक आपके दोषसे यमलोकस्थ कुम्भीपाक नरकमें क्यों पकाये जा रहे हैं? आप स्वयं भी ज्ञानसम्पन्न हैं, फिर इस बातको क्यों नहीं जानते? आप अपने पूर्वजोंके उद्धारका प्रयत्न कीजिये ॥ २५-२७१/२॥ इन्द्र बोले- [हे राजा शूरसेन!] मुनिके द्वारा कहे गये वचनोंको सुनकर भृशुण्डी अत्यन्त दुखित हो गये। अपने पितरोंके दुःखसे दुखी होकर वे प्रज्वलित अग्निकी भाँति सन्तप्त हो उठे। तब उन्होंने उनके उद्धारका उपाय सोचा ॥ २८-२९॥ तदनन्तर परोक्ष तत्त्वके ज्ञाता भृशुण्डीने ध्यानद्वारा

[दायाँ स्तम्भ - ऊपर] [अपने पितरोंकी स्थिति] देखकर भगवान् गजाननका ध्यान करते हुए हाथमें पवित्र जल लेकर संकष्टचतुर्थीव्रत- जनित पुण्यफल अपने पितरोंको प्रदान किया। तदनन्तर पितरोंके उद्देश्यसे भगवान् गणेशसे प्रार्थना करते हुए कहा- ॥ ३०-३१॥ भृशुण्डी बोले-हे गणपति गणेशजी ! यदि मैंने भक्तिपूर्वक आपका व्रत किया हो, तो उसके प्रभावसे आप शीघ्र ही मेरे पूर्वजोंका उद्धार कीजिये ॥ ३२॥ ऐसा कहकर उन्होंने उस जलको गजानन गणेशजीके हाथमें डाल दिया। तब उस जलके डालते ही गणेशजीकी कृपासे उनके सभी पितर देवताओंके-से स्वरूपवाले होकर विमानोंमें आरूढ़ हो भगवान् गणेशजीके धामको चले गये। उस समय अप्सराएँ उनकी सेवा कर रही थीं, चारण उनकी स्तुति कर रहे थे और गन्धर्व उनका यशोगान कर रहे थे ॥ ३३-३४१/२॥ कुम्भीपाक नरकमें जो दूसरे भी पापी मनुष्य थे, वे भी विमानोंमें आरूढ़ होकर गणेशजीके धामको चले गये। इस प्रकार मैंने तुमसे इस व्रतकी महिमाका वर्णन कर दिया ॥ ३५-३६ ॥ जबकि उस व्रतका मात्र एक दिनका पुण्य प्रदान करनेसे वे सब सद्गतिको प्राप्त हो गये तो जिसने जन्मभर आदरपूर्वक संकष्टचतुर्थीका व्रत किया है, उसके पुण्यकी गणना करनेमें शेषजी भी सक्षम नहीं हैं। इसलिये उस व्यक्तिद्वारा दिये गये पुण्यके प्रभावसे मेरा विमान गतिमान् हो जायगा ॥ ३७-३८ ॥

[मध्य भाग] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकष्टचतुर्थीव्रत-माहात्म्य-कथन' नामक अठ्ठावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५८ ॥

उनसठवाँ अध्याय कृतवीर्यके पूर्वजन्मकी कथा, संकष्टचतुर्थीव्रतकी विधि और उसकी महिमा

[बायाँ स्तम्भ - नीचे] राजा बोले-[हे देवेन्द्र !] भृशुण्डीमुनिके उन पितरोंके कुम्भीपाक नरकसे निकलकर दिव्य लोक (गणेशजीके धाम)-में चले जानेपर कृतवीर्यके पिताने [अपनी वंश-परम्पराको बचाये रखनेके लिये] कौन- सा उपाय किया? ॥ १ ॥ इन्द्र बोले- [हे राजन् !] अपने वंश-विच्छेदकी

[दायाँ स्तम्भ - नीचे] सम्भावना सुनकर दुखी हुए कृतवीर्यके पिता शीघ्र ही ब्रह्मलोकको गये और वहाँ कमलपर आसीन ब्रह्माजीका दर्शन किया ॥ २ ॥ उन्होंने उन्हें प्रणाम करके उनसे अपने वंशके विच्छेदका कारण पूछते हुए कहा-'हे विधाता! मेरा पुत्र अत्यन्त धर्मात्मा, दानी, यज्ञकर्ता, देवताओं और

उ०ख०-अ०५९] * कृतवीर्यके पूर्वजन्मकी कथा, संकष्टचतुर्थीव्रतकी विधि और उसकी महिमा * १८९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] अतिथियोंके प्रति भक्तिभाव रखनेवाला तथा मान्यजनोंका अतिशय सम्मान करनेवाला है। उसने पुत्र-प्राप्तिके लिये अनेक प्रकारके प्रयत्न भी किये हैं॥ ३-४॥ हे सुरेश्वर! फिर भी उसके पुत्र क्यों नहीं हुआ? अपना राज्य मन्त्रियोंको सौंपकर [इस समय] वह मात्र वायुका आहार करते हुए वनमें स्थित है॥ ५॥ उसके शरीरमें मात्र हड्डियाँ ही रह गयी हैं और वह आज या कल ही मर सकता है। हे प्रभो! जिससे उसके जन्मान्तरीय पापका नाश हो जाय—उस उपायको आप मुझसे दयाकर कहिये। हे कमलासन! अपने वंशकी वृद्धिके लिये मैं उस उपायको अपने पुत्रको प्राप्त करा दूँगा। तब उनकी इस प्रकारकी मधुर वाणीको सुनकर ब्रह्माजीने भी वैसी ही मधुर वाणीमें कहा कि मेरे द्वारा कथित अपने पुत्रके पूर्वजन्मके वृत्तान्तको सुनो॥ ६-८॥ [कृतवीर्य जिस नगरका राजा है,] उसी नगरमें पूर्वकालमें साम नामका एक अन्त्यज रहता था। वह इतना अधिक पापी था कि उसको देख लेनेमात्रसे पुण्योंका नाश हो जाता था। एक बार उस [पापी]-ने लोभवश रास्तेमें [जाते हुए] सांसारिक विषय-वासनाओंके प्रति तटस्थ भाव रखनेवाले बारह ब्राह्मणोंको मार डाला और उन्हें एक गुफाके अन्दर फेंक दिया॥ ९-१०॥ हे राजन्! तदनन्तर उनका सब कुछ लेकर वह माघ कृष्ण चतुर्थीकी रात्रिमें चन्द्रमाके उदय होनेपर अपने घर आ गया। [वहाँ आकर] उसने 'गणेश! गणेश!' कहकर शीघ्रतापूर्वक अपने पुत्रको बुलाया। उस दिन पूरे दिन उसे अन्न-जल नहीं प्राप्त हुआ था, अतः उसने उसीके साथ प्रसन्नतापूर्वक भोजन किया। हे राजन्! बहुत-सा समय बीत जानेके बाद कृष्णपक्षकी चतुर्थीको ही रात्रिमें चन्द्रमाके उदय होनेके बाद उसकी मृत्यु हो गयी॥ ११-१३॥ अज्ञानपूर्वक किये गये संकष्टचतुर्थीव्रतजनित पुण्यके प्रभावसे वह श्रेष्ठ विमानमें आरूढ़ होकर भगवान् गणेशके सुखदायी धाममें चला गया। उस समय अप्सराओंके समूह उसपर पंखा डुला रहे थे तथा विमानस्थित [चारण और गन्धर्व आदि] दिव्य पुष्पोंसे अर्चनाकर उसकी स्तुति कर रहे थे॥ १४-१५॥

[दायाँ स्तम्भ] उसी पुण्यके शेष रह जानेके कारण वह पृथ्वीपर तुम्हारे पुत्र राजा कृतवीर्यके नामसे उत्पन्न हुआ, जो [पूर्वजन्मकृत ब्रह्महत्याके पापके कारण] अभीतक पुत्रहीनताको प्राप्त है। हे अनघ! उस महापापका क्षय हो जानेपर ही उसे पुत्र उत्पन्न हो सकता है॥ १६ १/२॥ हे नृपश्रेष्ठ! ब्रह्माजीके इस प्रकारके वचन सुनकर वे काँपने लगे। तत्पश्चात् उन्होंने पुनः पापनाशका उपाय पूछा— ॥ १७ १/२॥ कृतवीर्यके पिता बोले—हे विधाता! उसके द्वारा किया गया ब्रह्महत्याजनित पाप कैसे नष्ट होगा? हे करुणासिन्धु! यद्यपि वह उपाय अत्यन्त दुष्कर होगा, फिर भी उसे बताइये॥ १८ १/२॥ ब्रह्माजी बोले—यदि तुम्हारा पुत्र संकष्टचतुर्थी नामक व्रतको सम्यक् रूपसे करेगा, तो वह पापसे मुक्त हो जायगा॥ १९ १/२॥ राजा (कृतवीर्यके पिता) बोले—हे ब्रह्मन्! उस व्रतको कैसे और किस शुभ मासमें किया जाता है? हे स्वामिन्! वह सब मुझसे कहिये, जिससे वह पाप नष्ट हो सके॥ २० १/२॥ ब्रह्माजी बोले—माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी यदि मंगलवारको पड़े तो चन्द्रमाके अनुकूल होनेपर शुभ मुहूर्तमें इस व्रतका प्रारम्भ करे। पहले दातून करे, फिर इक्कीस बार [किसी पवित्र नदी या सरोवरमें डुबकी लगाकर] स्नान करे॥ २१-२२॥ तत्पश्चात् नित्य कर्मोंका सम्पादनकर [गणेशजीके] श्रेष्ठ मन्त्रका जप करे। निराहार और मौन रहते हुए परनिन्दासे दूर रहे। नियमोंका पालन करे, दुष्कर्म न करे। ताम्बूल-सेवन, जलपान, परद्रोह तथा चुगली न करे। दिनके अन्तमें अर्थात् सायंकाल तिल और आँवलेके चूर्णको शरीरमें लगाकर स्नान करे [गणेशजीके] एकाक्षर, षडक्षर अथवा वैदिक मन्त्रका जप करे॥ २३-२५॥ गणेशजीकी प्रसन्नताके लिये उनके नाम-मन्त्रका यथाविधि जप करे तथा स्थिरचित्त होकर देवाधिदेव गजानन गणेशजीका ध्यान करे। तदनन्तर एक मुहूर्तके पश्चात् गणपति गणेशजीका षोडश उपचारों और अनेक

१९० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- प्रकारके नैवेद्योंसे भी पूजन करे ॥ २६-२७ ॥ [नैवेद्यके रूपमें] पूड़ी, मोदक, पुआ, लड्डू, बड़ा, खीर, विविध प्रकारके अन्नोंसे बने हुए अनेक प्रकारके लेह्य और चोष्य व्यंजनोंसे भोग लगाये ॥ २८ ॥ [तत्पश्चात्] अनेक प्रकारके फलों, ताम्बूल, पूगीफल (सुपारी), दक्षिणा, इक्कीस दूर्वाओं, दीपकों और पुष्पोंसे उनका अर्चन करे ॥ २९ ॥ चन्द्रमाके उदय होनेके समय पहले मन्त्रपूर्वक चतुर्थी तिथिको अर्घ्य दे, फिर गजानन गणेशजीको तत्पश्चात् चन्द्रमाके लिये अर्घ्य प्रदान करे ॥ ३० ॥ तत्पश्चात् [किये गये] पूजनको गणेशजीको निवेदितकर उन्हें प्रणाम और क्षमायाचना करके भक्तिपूर्वक इक्कीस ब्राह्मणोंको यथाशक्ति भोजन कराये। आर्थिक रूपसे अशक्त होनेकी स्थितिमें दस या बारह ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उन्हें दक्षिणाएँ देकर भली-भाँति सन्तुष्ट करे। तदनन्तर सम्यक् रूपसे गणेशजीकी कथाका श्रवणकर स्वयं मौन होकर भोजन करे ॥ ३१-३२ ॥ तत्पश्चात् शेष रात्रिको गायन-वादन एवं जयघोष कर [जागरण करते हुए] व्यतीत करे। हे राजन् ! इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक एक वर्षतक यह व्रत करनेपर [तुम्हारे पुत्रके] सम्पूर्ण पापोंका क्षय हो जानेसे उसे उत्तम पुत्रकी प्राप्ति होगी। इस व्रतके करनेवाले मनुष्यकी अन्य भी जो-जो कामनाएँ होंगी, वे पूर्ण होंगी। इसके करनेसे सम्पूर्ण संकटोंका नाश होता है और शत्रुओंकी सेनासे कोई भय नहीं रहता ॥ ३३-३४ १/२ ॥ शमीवृक्षके मूल भागमें बैठकर उपवास करते हुए चन्द्रमाके उदय होनेतक गणेशजीके मन्त्रका जप करते हुए इस व्रतको भलीभाँति करे। इस व्रतको करनेसे अन्धा, गूँगा, मूर्ख, लँगड़ा भी अपने अभीष्टको प्राप्त कर लेता है। इस व्रतको करनेवाला स्त्री, पुत्र, धन और राज्यको प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं है। व्रतीको श्रावण आदि पृथक्-पृथक् मासोंमें घृत, लड्डू आदि पृथक्-पृथक् भोज्य पदार्थोंका भोजन करना चाहिये। वर्षपर्यन्त ऐसा करनेवालेको अत्यन्त उत्तम सिद्धिकी प्राप्ति होती है ॥ ३५-३७ १/२ ॥ [व्रतीको व्रतके दिन] श्रावणमासमें सात लड्डू, भाद्रपदमासमें दहीका भोजन करना चाहिये। आश्विनमासमें उपवास और कार्तिकमासमें दुग्धपान करना चाहिये। मार्गशीर्षमासमें उसे निराहार रहना चाहिये और पौषमासमें गोमूत्रका पान करना चाहिये। माघमासमें उसे तिलोंका भक्षण करना चाहिये तथा फाल्गुनमासमें शर्करायुक्त घृत खाना चाहिये। चैत्रमासमें उसे पंचगव्यका पान करना चाहिये और वैशाखमासमें शतपत्रिकाका भोजन करना चाहिये। ज्येष्ठमासमें उसे घृतका भोजन तथा आषाढ़मासमें मधुका भक्षण करना चाहिये ॥ ३८-४० १/२ ॥ कृतवीर्यके पिता बोले- हे ब्रह्मन्! अंगारक चतुर्थीका विशेष विधान क्यों कहा गया है? आपके प्रति आदरका भाव रखनेवाले मुझ विनम्र शरणागतसे यह सब कृपापूर्वक कहिये। गजानन गणेशजीकी मंगलमयी कथाको सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकटचतुर्थीव्रतकथन' नामक उनसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५९ ॥ साठवाँ अध्याय भूमिपुत्र मंगलकी उत्पत्तिकी कथा, उसकी उग्र तपस्यासे गणेशजीका प्रसन्न होकर वर देना, अंगारकचतुर्थीव्रतकी महिमा ब्रह्माजी बोले- हे राजन् ! मैं अंगारक चतुर्थीकी महिमाको संक्षेपमें कहता हूँ, तुम इसे सावधान होकर श्रवण करो ॥ १ ॥ हे राजन्! अवन्तीनगरमें भारद्वाज नामके एक महान् मुनि थे। वे वेद-वेदांगके विद्वान्, अत्यन्त बुद्धिमान्, सर्वशास्त्रविशारद, अग्निहोत्रपरायण और नित्य शिष्योंके अध्यापनमें तत्पर रहनेवाले थे ॥ २ १/२ ॥ एक समय वे मुनि नदीके किनारे बैठकर अनुष्ठानमें रत थे, तभी उन्होंने एक सुन्दर अप्सराको देखा। उसे देखकर उन्होंने उसके साथ रमण करनेका मन बनाया ॥ ३-४ ॥

उ०ख०-अ०६० ] भूमिपुत्र मंगलकी उत्पत्तिकी कथा १९१

उ०ख०-अ०६० ] * भूमिपुत्र मंगलकी उत्पत्तिकी कथा * १९१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] अकस्मात् उस कामिनीको देखकर मुनि कामासक्त हो गये। कामदेवके बाणोंसे अभिभूत होकर वे भूतलपर गिर पड़े। उनका शरीर अत्यन्त विह्वल हो गया, जिसके कारण उनका तेज स्खलित हो गया। उनका वह तेज एक बिलके मार्गसे पृथ्वीमें प्रविष्ट हो गया ॥ ५-६ ॥ तदनन्तर उससे एक कुमारका जन्म हुआ, जिसकी कान्ति जपाकुसुमके समान [अरुणवर्णकी] थी। पृथ्वीने स्नेहवश उसका आदरपूर्वक पालन किया ॥ ७ ॥ ऐसा करते हुए पृथ्वीने अपने जन्म, माता-पिता और कुलको धन्य माना। तदनन्तर वह (बालक) जब सात वर्षका हो गया, तब उसने अपनी मातासे पूछा कि मनुष्यदेहधारी होनेपर भी मेरे शरीरका वर्ण रक्तिम क्यों है? हे माता! सम्प्रति यह बतलाओ कि मेरे पिता कौन हैं ? ॥ ८-९ ॥ पृथ्वी बोली- हे पुत्र! भरद्वाजमुनिका शुभ तेज स्खलित होकर मुझमें प्रविष्ट हो गया, उसीसे तुम्हारा जन्म हुआ और मैंने तुम्हारा पालन-पोषणकर तुम्हें बड़ा किया ॥ १० ॥ वह (बालक) बोला- हे माता! तब तुम मुझे तपस्याके निधिरूप उन मुनिका दर्शन कराओ ॥ १०१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब वे पृथ्वीदेवी उसे लेकर भारद्वाजमुनिके पास गयीं ॥ ११ ॥ उन्हें प्रणामकर कहा कि [हे मुनिवर !] यह पुत्र आपके तेजसे उत्पन्न है। इसे मैंने पाल-पोसकर बड़ा कर दिया है। हे मुने! अब यह आपके समक्ष है, इसे स्वीकार करें। भारद्वाजमुनि उस पुत्रको प्राप्तकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने उसका आलिंगन किया। तदनन्तर उनकी आज्ञा लेकर पृथ्वी देवी भी अपने सुन्दर धामको चली गयीं ॥ १२-१३ ॥ मुनिने प्रसन्नतापूर्वक उस बालकका सिर सूँघा, उसे गोदमें बैठाया और शुभ मुहूर्त एवं शुभ लग्नमें उसका उपनयन-संस्कार किया। उन्होंने उसे वेद, शास्त्र और मंगलमय गणेशमन्त्रका उपदेश देकर कहा- [हे पुत्र !] तुम चिरकालतक गणेशजीकी प्रसन्नताके लिये अनुष्ठान करो, वे सन्तुष्ट होकर तुम्हारी सभी मनोकामनाओंको

[दायाँ स्तम्भ] प्रदान करेंगे ॥ १४-१५१/२ ॥ तदनन्तर वह मुनिकुमार नर्मदा नदीके किनारे पद्मासन लगाकर बैठ गया। वह शीघ्र ही अपनी इन्द्रियोंपर नियन्त्रणकर भगवान् गणेशका अन्तःकरणमें ध्यान करते हुए उनके श्रेष्ठ मन्त्रका जप करने लगा। उस समय वह मात्र वायुका ही भक्षण कर रहा था, अतः अत्यन्त कृश हो गया था ॥ १६-१७ ॥ इस प्रकार उसने सहस्र वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तप किया, तब माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको जब स्वच्छ चन्द्रमाका उदय हुआ तो उस समय गणेशजीने उसे अपने दसभुजाओंवाले स्वरूपका दर्शन कराया। उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे, उनके मस्तकपर चन्द्रमा शोभायमान था, उनके हाथ अनेक प्रकारके आयुधोंसे सुशोभित हो रहे थे। उनकी सूँड सुन्दर थी तथा [मुखमें] एक दाँत शोभायमान हो रहा था। शूर्पसदृश उनके [बड़े-बड़े] कान कुण्डलोंसे युक्त थे। उनका श्रीविग्रह करोड़ों सूर्योंकी आभावाला और अनेक प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत था ॥ १८-२० ॥ अपने इष्टदेव भगवान् गणेशके सुन्दर स्वरूपको सामने विद्यमान देखकर वह बालक उठकर उनके चरणोंमें गिर पड़ा और उन जगदीश्वरकी स्तुति करने लगा ॥ २१ ॥ भौम (भूमिपुत्र) बोला- आप विघ्ननाशकको नमस्कार है, आप विघ्नकर्ताको नमस्कार है, देवताओं एवं असुरोंके स्वामी, सम्पूर्ण शक्तियोंका उपबृंहण करनेवाले, निरामय, नित्य, निर्गुण, गुणोंका उच्छेद करनेवाले, ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ [इस जगत्की रचना] पालन और संहार करनेवालेको नमस्कार है ॥ २२-२३ ॥ हे जगत्के आधार! आपको नमस्कार है, हे त्रैलोक्यके पालक! आपको नमस्कार है। ब्रह्माके आदि कर्तारूप, ब्रह्मज्ञानी, ब्रह्मरूप, ब्रह्मरूप, लक्ष्यालक्ष्य- स्वरूप, दुर्लक्षणोंके नाशकके लिये नमस्कार है। परमेश्वर श्रीगणेशजीको बारम्बार नमस्कार है ॥ २४-२५ ॥ इस प्रकारकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए परमात्मा गजानन गणेशजीने बालकको हर्षित करते हुए मधुर वाणीसे कहा- ॥ २६ ॥

१९२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] गजानन (गणेशजी) बोले—तुम्हारी उग्र तपस्या, भक्ति और इस स्तुतिसे भी मैं बहुत प्रसन्न हूँ। बाल्यावस्था होते हुए भी तुममें [बहुत] धैर्य है। मैं तुम्हें वांछित वर देता हूँ। [गणेशजीद्वारा] ऐसा कहे जानेपर भूमिपुत्र (मंगल)-ने गजाननसे यह वचन कहा— ॥ २७ ॥ भूमिपुत्र बोला—हे विभो! हे [इन्द्रादि] देवताओंके स्वामी ! आपके दर्शनसे मेरी दृष्टि धन्य हो गयी, मेरा जन्म लेना भी धन्य हो गया; मेरा ज्ञान, मेरा कुल और पर्वतोंसहित यह [मेरी माता] पृथ्वी भी धन्य हो गयी। मेरी यह सम्पूर्ण तपस्या भी धन्य हो गयी, जो मैंने आप अखिलेशका दर्शन प्राप्त किया। मेरी यह निवास-स्थली और यह वाणी भी धन्य हो गयी, जिसके द्वारा मैंने मूढ़भावसे आपकी स्तुति की। हे देवेश ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो स्वर्गमें मेरा निवास हो जाय। हे गजानन ! मैं देवताओंके साथ अमृत पीना चाहता हूँ ॥ २८-२९ ॥ त्रैलोक्यमें मेरा नाम कल्याणकारकके रूपमें विख्यात हो जाय। हे विभो ! चतुर्थी तिथिको मुझे आपका पुण्यप्रद दर्शन प्राप्त हुआ है, अतः वह पुण्यदात्री तिथि सदा सम्पूर्ण संकटोंका हरण करनेवाली हो तथा आपके कृपाप्रसादसे यह तिथि व्रत करनेवालोंकी समस्त कामनाओंको प्रदान करनेवाली हो जाय ॥ ३०-३१ ॥ गणेशजी बोले—हे पृथ्वीपुत्र ! तुम देवताओंके साथ सम्यक् रूपसे अमृतका पान करोगे और 'मंगल'— इस नामसे लोकमें तुम्हारी ख्याति होगी ॥ ३२ ॥ [अंगारके सदृश] रक्तवर्णका होनेके कारण तुम अंगारक नामसे प्रसिद्ध होओगे। [भौम, कुज, धरापुत्र आदि भी तुम्हारे नाम होंगे] क्योंकि तुम पृथिवीके पुत्र हो। जो मनुष्य अंगारक चतुर्थीका व्रत करेंगे, उन्हें वर्षभर संकष्टचतुर्थीव्रत करनेसे होनेवाले पुण्यके समतुल्य पुण्य प्राप्त होगा। उनके सम्पूर्ण कार्योंमें निर्विघ्नता होगी, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ३३-३४ ॥ हे शत्रुओंको सन्तप्त करनेवाले! क्योंकि तुमने व्रतोंमें सर्वश्रेष्ठ [संकष्टचतुर्थी] व्रतका अनुष्ठान किया है, अतः तुम [उसके प्रभावसे] अवन्ती नगरीके राजा

[दायाँ स्तम्भ] होओगे। तुम्हारे नामके संकीर्तनमात्रसे मनुष्य अपनी सभी कामनाओंको प्राप्त करेगा ॥ ३५१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] इस प्रकार वर देकर गजानन भगवान् गणेशजी अन्तर्धान हो गये ॥ ३६ ॥ तदनन्तर मंगलने भगवान् गणेशकी सम्पूर्ण सुन्दर अंगोंवाली, शुण्डसे युक्त मुख और दश भुजाओंवाली प्रतिमाकी भक्तिपूर्वक स्थापना की। उसने भगवान् गजाननको आनन्द देनेवाले [सुन्दर] मन्दिरका निर्माण कराया और उन देवाधिदेवका 'मंगलमूर्ति' नाम रखा ॥ ३७-३८ ॥ तबसे वह क्षेत्र सभी मनुष्योंके लिये कामनाओंको पूर्ण करनेवाला हो गया। वह अनुष्ठान, पूजन एवं दर्शन करनेसे भोग और मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ ३९ ॥ तदनन्तर भगवान् विनायकने उस भूमिपुत्र मंगलको अपने पास लानेके लिये अपने गणोंके साथ एक सुन्दर और श्रेष्ठ विमान भेजा। हे राजन् ! वे गणेशजीके दूत उस भूमिपुत्र मंगलके पास जाकर आग्रहपूर्वक उसे उसी देहसे गणेशजीके निकट ले आये। यह एक अद्भुत- सी घटना घटित हुई ! ॥ ४०-४१ ॥ तत्पश्चात् वह भूमिपुत्र स्थावर-जंगमात्मक इस जगत्- सहित तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध हो गया; उस भूमिपुत्रने मंगलवारसे युक्त संकष्टचतुर्थीका व्रत किया था, इसलिये उसे स्वर्गकी प्राप्ति हुई और उसने देवताओंके साथ अमृतपान किया। तभीसे मंगलवारसे युक्त चतुर्थी तिथि भी पृथ्वीपर अंगारकचतुर्थीके नामसे प्रसिद्ध हो गयी ॥ ४२-४३ ॥ मनमें चिन्तित वस्तु (मनोकामना)-को प्रदान करनेके कारण सबपर अनुग्रह करनेवाले मंगलमूर्ति गणेशजी 'चिन्तामणि'—इस नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ ४४ ॥ पारिनेर नगरसे पश्चिममें स्थित सम्पूर्ण विघ्नोंका निवारण करनेवाले गणेशजी चिन्तामणि [विनायक] नामसे प्रसिद्ध हुए। आज भी [कृष्णपक्षकी चतुर्थीको] चन्द्रमाके उदय होनेके समय सिद्धों और गन्धर्वोंद्वारा उनकी पूजा की जाती है। वे [चिन्तामणि विनायक] पुत्र-पौत्र, धन-सम्पत्ति आदि सभी मनोकामनाओंको पूर्ण करते हैं ॥ ४५-४६ ॥

[पाद-टिप्पणी / अध्याय समाप्ति] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'अंगारकचतुर्थीव्रतोपाख्यान' नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६० ॥

इकसठवाँ अध्याय

उ०ख०-अ०६१ ] * गणेशजीद्वारा चन्द्रमाको शाप देना * १९३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

इकसठवाँ अध्याय गणेशजीद्वारा चन्द्रमाको शाप देना तथा देवताओंकी प्रार्थनापर पुनः अनुग्रह करना, चन्द्रमाद्वारा वरद विनायककी स्थापना

ब्रह्माजी बोले—हे राजन् ! एक बार मैं गिरिशायी भगवान् शंकरके निवास-स्थान कैलासपर्वतपर गया हुआ था। वहाँ सभाके मध्यमें बैठे हुए मैंने नारदजीको आते हुए देखा। उन्होंने शंकरजीको एक अद्वितीय फल निवेदित किया, तब उस (फल)-के विषयमें गणेश और कुमार कार्तिकेय—दोनोंने शम्भुसे याचना की ॥ १-२ ॥ उस समय भगवान् शंकरने 'यह फल मुझे किसे देना चाहिये'—ऐसा मुझसे भी पूछा। तब मैंने उनसे कहा कि कुमार बालक हैं, अतः उन्हें यह फल दे दीजिये ॥ ३ ॥ तब शिवजीने उस फलको कुमारको दे दिया, [इसपर] गणेशजी क्रुद्ध हो गये। तदनन्तर जब मैंने अपने निवास ब्रह्मलोकमें जाकर सृष्टि करनेकी इच्छा की तो विघ्नकर्ता [उन] गणेशजीने एक अत्यन्त अद्भुत विघ्नकी सृष्टि कर दी, और वे उग्ररूप धारणकर मुझे भयभीत करने लगे ॥ ४-५ ॥ [उस रूपको देखकर] मेरे भ्रमित हो जानेपर चन्द्रमा गजानन गणेशजीके क्रूरतर रूपको देखकर अपने गणोंसहित हँस पड़े। तब अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन्होंने चन्द्रमाको शाप दे दिया कि मेरे वचनानुसार [अब] तुम तीनों लोकोंमें अदर्शनीय हो जाओगे ॥ ६-७ ॥ कदाचित् यदि कोई तुम्हें देख लेगा तो वह महापातकी हो जायगा। इस प्रकार शाप देकर वे देवाधिदेव अपने गणोंके साथ अपने धामको चले गये। चन्द्रमा भी मलिन, दीन और चिन्ता-समुद्रमें लीन हो गये कि अणिमादि सिद्धियोंसे समन्वित, जगत्के कारणके भी कारण उन भगवान् गणेशके प्रति अज्ञानवश बालककी भाँति मैंने दुष्टता क्यों की; जिसके कारण मैं सभीके लिये अदर्शनीय, विवर्ण और मलिन हो गया हूँ!॥ ८-१०॥ अब मैं [पुनः] कैसे स्वरूपवान्, वन्दनीय और अपनी कलाओंसे देवताओंको प्रसन्नता प्रदान करनेवाला बनूँगा ? इसी बीचमें देवताओंने चन्द्रमाको प्राप्त महान् शापके विषयमें सुना। तब अग्नि, इन्द्र आदि [देवता] वहाँ गये, जहाँ गजानन गणेशजी थे। उन देवगणोंने सम्पूर्ण विघ्नोंका प्रवर्तन एवं हरण करनेवाले गणेशजीसे प्रार्थना की— ॥ ११-१२ ॥ देवताओंने कहा—हे देवाधिदेव ! आप सम्पूर्ण संसारके लिये वन्दनीय हैं। हे ईश! आप अपनी इच्छासे इस संसारका सृजन, पालन और संहार करते हैं। हे त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश)-के स्वामी! आप निर्गुण [स्वरूप] होते हुए भी गुणवानोंके गुणोंके कर्ता हैं। हे देव ! आज हम आपकी ही शरणमें आये हैं ॥ १३ ॥ हे ईश ! सम्पूर्ण जगत् आपके शापसे भयभीत है, आप हमारी रक्षा करें। चन्द्रमाके अपराधके कारण हम सबपर यह महान् कष्ट कैसे आ गया है? हे जगदीश ! हे भुवनेश ! अतः आप ऐसा विधान करें, जिससे हम सब, यह सम्पूर्ण संसार और चन्द्रमा भी शान्ति प्राप्त कर सकें ॥ १४ ॥ हे प्रभो ! चन्द्रमाके अदृश्य हो जानेसे यह संसार कष्टमें पड़ गया है, इसलिये आप इन चन्द्रमापर अनुग्रह करके तीनों लोकोंपर कृपा करें ॥ १५ ॥ [हे प्रभो!] आपके जिस स्वरूप और महिमाको वेदत्रयी भी नहीं जान सकती, उसका स्तवन कोई कैसे कर सकता है, तथापि हम सभी आपकी स्तुति कर रहे हैं। आपका दर्शन करके और आपसे सम्भाषण करके हम सब कृतकृत्य हो गये। हे शरणागतोंके कष्टका हरण करनेवाले अविनाशी [प्रभु!] हम सब आपकी शरणमें आये हैं ॥ १६-१७ ॥ [तब] उनके इस प्रकारके वचन सुनकर और उनके द्वारा किये हुए स्तवनसे अत्यन्त प्रसन्न हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको देनेवाले गजानन गणेशजी बोले— ॥ १८ ॥

१९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- विकट* (गणेशजी) बोले—हे देवताओ! मैं आप सबकी स्तुतिसे प्रसन्न हूँ; आप लोग अपना मनोऽभिलषित वर माँगें। यदि वह तीनों लोकोंमें महान् असाध्य होगा, तो भी उसे आप लोगोंको प्रदान करूँगा॥ १९॥ देवताओंने कहा—[हे प्रभो!] हम सब लोग अमृतमयी किरणोंवाले चन्द्रमापर आपका अनुग्रह चाहते हैं, आपके द्वारा उसे अनुगृहीत किये जानेपर हम सबपर आपका अनुग्रह हो जायगा॥ २०॥ गणेशजी बोले—एक वर्ष या उसका आधा यानी छः मास या उस आधेका आधा तीन मासतक चन्द्रमा अदर्शनीय हो जाय। हे देवताओ! अब आप लोग कोई दूसरा वर भी माँगें॥ २१॥ तदनन्तर उन सबने गजानन गणेशजीको दण्डवत् प्रणाम किया [शापनिवारणकी प्रार्थना की]। तब उन प्रणतजनोंसे गणेशजीने भावपूर्वक कहा—अहो! आश्चर्य है कि मैं अपने ही वचनको अप्रमाणित करनेके लिये कैसे उद्यत हो गया हूँ? शरणमें आये हुए प्रपन्नजनोंका त्याग करनेकी भी मेरी इच्छा नहीं हो रही है, जबकि चाहे सुमेरुपर्वत चलायमान हो जाय (अपना स्थान छोड़ दे), सूर्य [आकाशसे पृथ्वीपर] गिर पड़े, अग्नि शीतल हो जाय, समुद्र अपनी मर्यादा छोड़ दे, परंतु मेरा वचन असत्य नहीं हो सकता, फिर भी हे श्रेष्ठ देवताओ! मेरे द्वारा कही जा रही बातोंको सुनो। [मैं अपने शापको सीमित कर रहा हूँ, मात्र] भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको ज्ञानमें अथवा अज्ञानमें भी जो अभिशप्त चन्द्रको देख लेगा, वह महान् दुःखका भाजन होगा। उनके इस प्रकारके वचन सुनकर सभी देवता प्रसन्न हो गये। उन सब देवताओंने [स्वीकारसूचक] 'ओम्' शब्दका उच्चारणकर उनके चरणोंमें प्रणिपात किया और उनपर पुष्पवृष्टि की तथा उनसे अनुज्ञा लेकर चन्द्रमाके पास चले गये॥ २२—२७॥ [वहाँ जाकर] उन सबने [चन्द्रमाको उलाहना देते हुए] उनसे कहा कि तुम बड़े मूर्ख हो, जो तुम गजानन गणेशजीपर हँसे। श्रेष्ठोंके प्रति अपराध करनेवाले तुमने तीनों लोकोंको संकटमें डाल दिया॥ २८॥ तुमने तीनों लोकोंके स्वामी, तीनों लोकोंके विधाता, अविनाशी, निर्गुण, नित्य, परम ब्रह्मस्वरूप, अखिलगुरु भगवान् गजानन गणेशजीके प्रति अपराध किया है, अतः सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छा रखनेवाले गणेशजीने तुम्हें दण्डित किया था॥ २९-३०॥ हम लोगोंके द्वारा अत्यन्त कष्टपूर्वक वे परमात्मा प्रसन्न किये गये। [तदनन्तर उन्होंने कहा—] भाद्रपद मासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको तुम कभी दर्शनीय नहीं होगे। [अतः हे चन्द्र!] तुम भी उन देवाधिदेव गजाननकी शरणमें जाओ। उनकी कृपासे तुम शुद्ध शरीरवाले होकर परम ख्यातिको प्राप्त करोगे॥ ३१-३२॥ देवताओंके इस प्रकारके हितकारी वचनको सुनकर चन्द्रमा शिव आदि देवताओंद्वारा वन्दित शरणागतवत्सल देवेश्वर भगवान् गजानन गणेशजीकी शरणमें गये और पापोंका नाश करनेवाले श्रेष्ठ एकाक्षर मन्त्रका जप करने लगे॥ ३३-३४॥ इन्द्रद्वारा उपदिष्ट [मन्त्रका जप करते हुए] चन्द्रमाने परम समाधिमें स्थित होकर सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान करनेवाली गंगाजीके दक्षिणी किनारेपर बाईस वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तप किया। तब [उनकी तपस्यासे] प्रसन्न होकर भगवान् गजानन उनके सम्मुख आये॥ ३५-३६॥ [वे भगवान् गणेश] लाल रंगके पुष्पोंकी माला और लाल रंगके वस्त्र धारण किये हुए थे। उनके शरीरमें लाल चन्दनका आलेप लगा हुआ था। चार भुजाओंसे युक्त, विशाल शरीरवाले उनका श्रीविग्रह सिन्दूरसे लिप्त होनेके कारण अरुण वर्णका था॥ ३७॥ करोड़ों सूर्योंसे भी अधिक प्रभाववाले वे अपनी आभासे सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित कर रहे थे। उस तेजःपुंजको देखकर चन्द्रमा अत्यन्त [भयभीत होकर]

  • मुद्गलपुराणके अनुसार कामासुरका पराभव करनेके लिये गणेशजीने 'विकट' नामका अवतार लिया था।

उ०ख०-अ०६१ ] * गणेशजीद्वारा चन्द्रमाको शाप देना * १९५ कम्पायमान हो उठे ॥ ३८ ॥ तदनन्तर वे अत्यन्त धैर्य धारण करके उनके सम्मुख हाथ जोड़कर मनमें यह विचार करने लगे कि ये गजानन गणेशजी ही हैं, जो मुझे वर देनेके लिये यहाँ आये हैं—ऐसा मानकर उन्होंने उन्हें नमन किया और अपनी परमभक्तिसे उन देवाधिदेव गजानन गणेशजीको प्रसन्न किया ॥ ३९-४० ॥ चन्द्रमा बोले—मैं उन भगवान् गजानन गणेशजीको प्रणाम करता हूँ, जो लोगोंके सम्पूर्ण विघ्नोंका हरण करते हैं। जो सबके लिये धर्म, अर्थ और कामकी उपलब्धि कराते हैं, उन विघ्नविनाशकको नमस्कार है ॥ ४१ ॥ हे कृपानिधान ! हे विश्वका विधान करनेमें दक्ष ! आप ब्रह्ममय, विश्वात्मा, विश्वके बीजरूप, जगन्मय, त्रैलोक्यका संहार करनेवाले हैं; हे देव ! आपको नमस्कार है। वेदत्रयीस्वरूप, अखिल बुद्धिदाता, बुद्धिप्रदीप, सुरेश्वर, नित्य, सत्य, नित्यबुद्ध, नित्य निष्काम आपको नित्य नमस्कार है ॥ ४२-४३ ॥ हे महात्मन् ! मैंने अज्ञानदोषके कारण जो अपराध किया है, दया करनेवाले आप उसे क्षमा करें। मुझपर दया कीजिये; क्योंकि शरणागतके त्यागसे आपको भी दोष होगा ॥ ४४ ॥ ब्रह्माजी बोले—चन्द्रमाके इस प्रकारके वचन सुनकर गजानन गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन देवाधिदेवने चन्द्रमाके स्तवन और नमस्कारसे सन्तुष्ट होकर उन्हें अनेक वरदान दिये ॥ ४५ ॥ गजानन बोले—[हे चन्द्र !] तुम्हारा स्वरूप जैसे पहले था, वैसा ही हो जायगा; परंतु भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको जो मनुष्य तुम्हें देखेगा, उसे निश्चय ही अभिशाप और पाप लगेगा। उसे हानि और मूर्खताकी प्राप्ति होगी। जैसा कि मैंने देवताओंके साथ वार्तालापमें पहले ही कह दिया है, तुम उस [चतुर्थी तिथि]-को अदर्शनीय होओगे ॥ ४६-४७ ॥ [भाद्रपदमासके] कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको मनुष्योंद्वारा जो व्रत किया जायगा, उसमें तुम्हारे उदय होनेपर ही मेरी पूजा होगी और तुम भी प्रयत्नपूर्वक पूजे जाओगे। उस तिथिपर तुम प्रयत्नपूर्वक दर्शनीय होओगे, इसके विपरीत होनेपर व्रत (संकष्टचतुर्थी) व्यर्थ हो जायगा। हे शशि! तुम मुझे प्रसन्न करनेवाले हो, अतः तुम अपनी एक कलासे मेरे ललाटपर स्थित रहो। तुम प्रतिमासकी [शुक्लपक्षकी] द्वितीया तिथिको सबके लिये प्रणम्य होओगे ॥ ४८-४९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर इस प्रकार वर प्राप्त करके चन्द्रदेव पहलेकी ही भाँति [स्वरूपवान्] हो गये। उन्होंने देवताओं और ऋषियोंके साथ वरद विनायक नामक मूर्तिकी स्थापना की। देवताओं और मुनियोंने उस मूर्तिका 'भालचन्द्र' यह नाम रखा ॥ ५०-५१ ॥ चन्द्रमाने उस मूर्तिके लिये रत्नजटित स्वर्णमन्दिरका निर्माण कराया और आदरपूर्वक उसका षोडश उपचारोंसे पूजन किया ॥ ५२ ॥ सम्पूर्ण देवताओं और मुनियोंने भी उस मूर्तिका पूजन किया और यह वरदान दिया कि संसारमें यह स्थान सिद्धक्षेत्रके रूपमें विख्यात होगा। यहाँ अनुष्ठान करनेवालोंके लिये यह स्थान सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला होगा ॥ ५३१/२ ॥ तदनन्तर उन देवताओं और मुनियोंने गजानन गणेशजीको नमस्कार किया और प्रसन्न मनसे अपने- अपने स्थानको हर्षपूर्वक चले गये। उन देवताओं और मुनियोंके चले जानेपर देवाधिदेव गणेशजीने भी अपने शरीरको अन्तर्धान कर लिया ॥ ५४-५५ ॥ तदनन्तर उन भालचन्द्र गणेशजीके अन्तर्धान हो जानेपर चन्द्रमा भी अपने तेजको प्राप्तकर प्रसन्न मनसे अपने धामको चले गये ॥ ५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'चन्द्रशापानुग्रहवर्णन' नामक इकसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६१ ॥

बासठवाँ अध्याय

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण एवं सटीक लिप्यंतरण (Transcription) दिया गया है:

१९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बासठवाँ अध्याय भाद्र शुक्ल चतुर्थीव्रतके अन्तर्गत गणेशजीको दूर्वार्पणके माहात्म्यका वर्णन

[बायाँ स्तम्भ / Left Column] कृतवीर्यके पिताने पूछा—[हे ब्रह्मन्!] 'भाद्रपद मासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको चन्द्रमाके उदय होनेपर ही गणेशजीकी पूजा क्यों की जाती है'—यह मैंने आपसे पूछा था, जिसे आपने निरूपित किया। अब मैं उन गणेशजीको दूर्वांकुरके अर्पणका कारण सुनना चाहता हूँ, बताइये कि गणेशजीको दूर्वांकुर क्यों प्रिय हैं?॥ १-२॥ ब्रह्माजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! गणेशजीको दूर्वांकुर- समर्पणका जो फल होता है, उसे कहता हूँ, सुनो॥ ३॥ दक्षिण देशमें जाम्ब नामकी एक नगरी थी, वहाँ सुलभ नामका क्षत्रिय रहता था, जो अत्यन्त गुणवान्, दानशील, धनवान्, बलशाली, विवेकसमपन्न, सम्मान्य जनोंका सम्मान करनेवाला, शान्त, इन्द्रियजित्, सम्पूर्ण शास्त्रोंके तात्त्विक अर्थको जाननेवाला और सभी वेदोंके तत्त्वार्थका ज्ञाता था॥ ४-५॥ वह विकट नामवाले गणेशजीके प्रति नित्य भक्तिमान् और स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुतिमें रत रहता था। उसकी पत्नी सुमुद्रा नामसे अत्यन्त विख्यात थी॥ ६॥ वह अत्यन्त सुन्दरी और पतिव्रता थी। उसने अपने रूप-सौन्दर्यसे अप्सराओंको भी पराभूत कर दिया था। वह देवताओं, ब्राह्मणों और अतिथियोंकी सेवामें रत रहनेवाली और पतिके मनोभावोंके अनुकूल आचरण करनेवाली थी॥ ७॥ हे नृप! वह सम्पूर्ण पतिव्रताओंमें सर्वमान्य और श्रेष्ठतम थी। एक दिन वे दोनों दम्पती स्नानसे निर्मल हो जब पुराणार्थकी विवेचनामें मन लगाये बैठे थे, तभी मधूसूदन नामक एक ब्राह्मण वहाँ आया॥ ८-९॥ निरन्तर परमेश्वरका चिन्तन करते रहनेवाला वह भिक्षाका अभिलाषी था। दारिद्र्यके कारण उसने मलिन वस्त्र धारण कर रखे थे। वस्त्र धारण किये होनेपर भी वह प्रायः दिगम्बर ही था॥ १०॥ सुलभने उसे देखकर प्रसन्नतापूर्वक नमस्कार किया,

[दायाँ स्तम्भ / Right Column] तत्पश्चात् उन [मलिन वस्त्रधारी] श्रेष्ठ द्विजको देखकर वह सहसा अज्ञानवश हँस पड़ा॥ ११॥ [यह देखकर] उन मुनिके नेत्र क्रोधसे लाल हो उठे, ऐसा लगता था, मानो वे तीनों लोकोंको जला डालेंगे। उन्होंने अत्यन्त क्षुब्ध होकर उसे शाप देते हुए कहा—'हे दुर्बुद्धि! तुम दाँत निकालकर मुझपर हँस रहे थे, अतः प्रतिदिन हलमें जोते-जानेवाले बैल हो जाओ और नित्य दुखी रहो'॥ १२-१३॥ पतिके प्रति दिये गये शापको सुनकर सुमुद्रा क्रोधसे मूर्च्छित हो गयी। पदाघातसे घायल सर्पिणीकी भाँति क्रुद्ध होकर उसने उस ब्राह्मणको शाप दिया—हे दुष्ट ब्राह्मण! तुमने जो अविवेकपूर्ण ढंगसे मेरे पतिको शाप दिया है, अतः तुम भी विष्ठाको भोजनरूपमें ग्रहण करनेवाले, गाड़ीका बोझ ढोनेवाले गधे बनोगे॥ १४-१५॥ इस प्रकार दिये गये क्रूर शापको सुनकर उस ब्राह्मणने भी उसे शाप दिया कि स्त्री होनेपर भी तुमने मुझे शाप दिया, अतः तुम चाण्डाली होओगी; साथ ही तुम दरिद्र, अनेक दोषोंसे युक्त, मल-मूत्रका भोजन करनेवाली और अशुभ कार्य करनेवाली होगी। इस प्रकार परस्पर शाप देकर उन्होंने अपने अतिदुर्लभ शरीरोंका त्याग कर दिया॥ १६-१७॥ [तदनन्तर] सुलभ वृषभके रूपमें उत्पन्न हुआ और हल खींचनेका दुःख भोगता रहा। ब्राह्मणके शापके कारण उसे एक क्षणके लिये भी विश्राम नहीं मिलता था। वह ब्राह्मण मधूसूदन भी गर्दभयोनिमें उत्पन्न हुआ और सुमुद्रा प्राणियोंकी हिंसा करनेवाली दुष्ट चाण्डाली हुई॥ १८-१९॥ [वह] पिशाचवृत्तिवाली, दरिद्र, विष्ठा और मूत्रका भक्षण करनेवाली, अत्यन्त शुष्क शरीरवाली, बाहर निकले दाँतोंसे युक्त विकराल मुखवाली थी। किसी समय भ्रमण करते हुए उसने नगरके दक्षिण भागमें स्थित गणेशजीके परम अद्भुत मन्दिरको देखा॥ २०-२१॥

उ०ख०-अ०६२ ] * भाद्र शुक्ल चतुर्थीव्रतके अन्तर्गत गणेशजीको दूर्वार्पणके माहात्म्यका वर्णन * १९७

वह अनेक प्रकारके वृक्षों और लताजालोंसे आच्छादित | श्रवणकर निद्रामें लीन लोग भी जग गये। सावधान तथा अनेक प्रकारके पक्षिसमूहोंसे युक्त था। वहाँपर कुछ | होकर उन्होंने दण्ड, मुष्टिका और कुहनीका प्रहारकर योगीश्वर सदा अनुष्ठानमें रत रहते थे॥ २२॥ | उन्हें बाहर भगा दिया॥ ३३-३४॥ वहाँ गणेशजीकी उपासना करनेवाले लोग [शास्त्रोक्त] | भागनेके लिये तत्पर उस चाण्डालीपर भी लोगोंने नियमोंका पालन करते हुए निवास कर रहे थे। [उनमेंसे] | कंकड़-पत्थरोंसे प्रहार किया। चाण्डाली और गधेद्वारा कुछ मनोरथपूर्तिकी इच्छावाले और कुछ पुत्र, कुछ मोक्ष | [गणेशप्रतिमाके] स्पर्शकी शंकासे आकुल लोगोंने और कुछ धनप्राप्तिकी इच्छावाले थे। किसी समय | अभिमन्त्रित तीर्थजलसे गजानन गणेशजीको स्नान कराया भाद्रपदमासकी चतुर्थी तिथिको उस नगरके प्रत्येक घरमें | तथा अनेक प्रकारके द्रव्योंसे उनका अनेक बार पूजन गणेश-महोत्सवका आयोजन हो रहा था॥ २३-२४॥ | किया॥ ३५-३६॥ उसी समय महाप्रलयकी-सी सूचना देनेवाली | उस अत्यन्त दुष्टा चाण्डाली और गर्दभ एवं अतिवृष्टि प्रारम्भ हो गयी, वह चाण्डाली भी उस वृष्टिसे | वृषभको लोगोंने पुनः लाठी, कुहनी और थप्पड़ोंसे भयभीत होकर जिस-जिस घरमें जाती, वहीं-से लोगोंद्वारा | पीटा। मन्दिरका द्वार बन्द होनेसे वे भागकर बाहर भी मार-पीटकर भगा दी जाती, तब वह हाथमें अग्नि लेकर | नहीं जा सकते थे। दौड़ते और दारुण स्वरमें क्रन्दन करते मन्दिरके अन्दर चली गयी॥ २५-२६॥ | उन तीनोंके स्वरसे देवाधिदेव गणेशजीका मन उनकी तब वहाँ भी कुछ लोग उसे मारने-पीटने लगे, परंतु | ओर आकृष्ट हो गया॥ ३७-३८ १/२॥ योगियोंने उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया। तब वह | [गणेशजी सोचा कि अहो!] इन्हीं (चाण्डाली, चाण्डाली [दूबके] तिनकोंको अग्निमें जलाकर उससे | वृषभ और गर्दभ)-के कारण मेरी पुनः पूजा हुई है। अपने शरीरको सेंकने लगी॥ २७॥ | इन्होंने दूर्वांकुरोंद्वारा मेरी एक बार पूजा भी कर दी। अकस्मात् वायुके वेगसे उड़ा हुआ एक दूर्वांकुर | यद्यपि ये तीनों दुष्ट हैं, फिर भी इन्होंने मेरी बहुत-सी दैवयोगसे गणनायक गणेशजीके मस्तकपर गिर पड़ा॥ २८॥ | प्रदक्षिणा भी कर ली। भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी उसी समय वह गर्दभ भी शीतसे भयातुर होकर | तिथिको जो मुझे एक भी दूर्वा समर्पित करता है और उस देवालयमें चला आया। तत्पश्चात् वह वृषभ भी | मेरी प्रदक्षिणा करता है, वह मेरे लिये मान्य और पूज्य हलसे मुक्त होकर दैवयोगसे वहीं गणेशजीके मन्दिरमें | होता है॥ ३९-४१॥ भावीवश चला आया और उन दोनोंने उस चाण्डालीके | इसलिये मैं इन सबको विमानसे अपने धामको भेज तृणोंका भक्षण कर लिया॥ २९-३०॥ | देता हूँ, ऐसा सोचकर उन्होंने एक विमान भेजा, जो वहाँ लोगोंके सो जानेपर गजानन गणेशजीके | उनके गणोंसे युक्त था। वे गण गणेशजीके जैसे समीप ही उन दोनों (वृषभ और रासभ)-में सींग और | स्वरूपवाले थे और गन्धर्वों एवं अप्सराओंके समूहसे पाद-प्रहारसे युद्ध प्रारम्भ हो गया॥ ३१॥ | घिरे हुए थे। वह विमान विविध वाद्ययन्त्रों एवं उस समय उन दोनोंके मुखसे निकलकर दूर्वाके | परागसमन्वित पुष्पोंसे युक्त था॥ ४२-४३॥ अंकुर गणेशजीकी सूँड़ तथा उनके पैरपर गिर गये, | वह विमान दिव्य भोगोंसे परिपूर्ण और ध्वज- जिससे गजानन गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ ३२॥ | पताकाओंसे शोभायमान था। गणेशजीके स्वरूपवाले वे तदनन्तर वह चाण्डाली लाठी लेकर गणेशजीकी | गण दिव्य देहसम्पन्न और प्रसन्न मनवाले उन (तीनों)- प्रतिमाके समीप आयी और उसने गर्दभ एवं वृषभको | को उस विमानमें बैठाकर गजानन गणेशजीकी आज्ञासे खूब पीटा तथा पूजामें अर्पित नैवेद्यको स्वयं खा गयी। | उनके धामको शीघ्रतापूर्वक ले गये॥ ४४-४५॥ उन दोनों [गर्दभ और वृषभ]-के खुरोंके शब्दोंको | यह घटना सब लोगोंके देखते-देखते घटित हुई,

१९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 इससे सभीके हृदयमें आश्चर्यका भाव भर गया। वे लोग | प्राप्त हुई-यह हमसे बतलाइये ॥ ४८ ॥ कहने लगे कि इन (तीनों)-को [न जाने किस] | हम सब भी अपने अनुष्ठानका त्याग करके शीघ्र पूर्वपुण्यसे इस प्रकारकी गति प्राप्त हुई ॥ ४६ ॥ | ही उसका आचरण करेंगे; क्योंकि असंख्य कालावधि तब कुछ योगीश्वर ध्यानका त्यागकर गणोंके पास | बीत जानेपर भी हमें उन देवाधिदेवका दर्शन नहीं गये और उनसे पूछा कि इन तीनोंकी ऐसी पुण्यमयी ध्रुव | हुआ ॥ ४९ ॥ सद्गति कैसे हुई-यह बतलाइये ॥ ४७ ॥ | केवल वायुका भक्षणकर अनुष्ठानमें लगे रहनेवाले हे निष्पाप गणो! इन अत्यन्त पापियोंका लेशमात्र | हम विरक्तजनोंको गणेशजीके धामकी प्राप्ति कब भी पुण्य नहीं था, फिर यह अत्यन्त दुर्लभ गति इन्हें कैसे | होगी ?-यह हमें बतलाइये ॥ ५० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वोपाख्यान' नामक बासठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६२ ॥

तिरसठवाँ अध्याय गणेश-पूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके आतंकका वर्णन

गणेशजीके गण बोले-हे योगिजनो! आप | मुनि बोले-[हे देवेन्द्र !] उत्तम दूर्वा-माहात्म्य सभी अपने चंचल मनको स्थिरकर श्रवण करें। | जैसा मुझे ज्ञात है, वह मैं कहता हूँ। पूर्वकालमें स्थावर [गणेशजीकी] जिस महिमाका कथन करनेमें [सहस्रमुख] | नामक नगरमें कौण्डिन्य नामवाले एक महामुनि हुए थे। वे शेष तथा चतुर्मुख ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, उसका | गणेशजीके उपासक और तपोबलसे सम्पन्न थे। नगरके वर्णन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है, फिर भी हम | दक्षिण भागमें उन मुनिका अत्यन्त रमणीय महान् आश्रम शक्तिके अनुसार उसका वर्णन करते हैं ॥ १ १/२ ॥ | था, जो लताओं और वृक्षोंसे समन्वित था ॥ ८-१० ॥ ब्रह्मा और शिव आदि जिनका सर्वदा स्तवन करते | उसमें अत्यन्त विशाल सरोवर थे, जो पुष्पित हैं, उन गणनांथ गणेशजीकी महिमाका स्पष्ट वर्णन कौन | कमलोंसे युक्त थे, उनपर भ्रमर बैठे रहते थे तथा [उन कर सकता है ? तथापि हे निष्पाप [योगिजन !] उनकी | सरोवरोंमें] हंस, बत्तख, चकवा, बगुला, कच्छप और इस प्रकारकी लीलाका श्रवण करो ॥ २-३॥ | जलमुर्गे क्रीडा करते थे। वहाँ उन कौण्डिन्यमुनिने उत्कट दूर्वांकुरोंकी महिमा मुनियों और देवताओंको भी | तप करना प्रारम्भ किया ॥ ११-१२ ॥ ज्ञात नहीं है। [देवाधिदेव गणेशजीको दूर्वादिसे अर्चनका | वे अपने सम्मुख गणेशजीकी चतुर्भुज स्वरूपवाली, जो पुण्य प्राप्त होता है;] वह यज्ञ, दान, तप, व्रत और | अत्यन्त प्रसन्न मुखमुद्रावाली, सुन्दर, वरद मुद्रावाली, हवनसे भी नहीं प्राप्त होता। इस विषयमें यहाँ एक | दूर्वासे युक्त और सुपूजित महामूर्तिकी स्थापनाकर भगवान् प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसमें इन्द्र | गणेशजीको प्रसन्नता प्रदान करनेवाले षडक्षर परम और महात्मा नारदके संवादका वर्णन है ॥ ४-५ ॥ | मन्त्रका जप करने लगे। तब उनकी आश्रया नामवाली एक बार नारदजी इन्द्रको देखनेकी इच्छासे | पत्नीने आश्चर्यचकित हो उनसे पूछा- ॥ १३-१४॥ [स्वर्गलोकमें] आये। वहाँ [उनके द्वारा] परम भक्तिसे | आश्रया बोली-हे स्वामिन् ! आप भगवान् पूजित होकर आसन ग्रहण कर लेनेपर बलसूदन इन्द्रने | गजाननको दूर्वाका भार क्यों चढ़ाते हो ? क्योंकि घासके आदरपूर्वक मुनिसे दूर्वाका माहात्म्य पूछा ॥ ६ १/२ ॥ | तिनकोंसे तो कोई प्रसन्न होता नहीं। यदि इससे कोई इन्द्र बोले-हे ब्रह्मन् ! हे मुने ! यह बतलाइये कि | पुण्य होता हो तो आप कृपया मुझसे कहिये ॥ १५ १/२ ॥ देवाधिदेव महात्मा गणेशजीको दूर्वांकुर विशेष रूपसे | कौण्डिन्य बोले-हे प्रिये ! सुनो, मैं दूर्वाके उत्तम क्यों प्रिय हैं ? ॥ ७ १/२ ॥ | माहात्म्यको कहता हूँ ॥ १६ ॥

उ०ख०-अ०६३ ] * गणेश-पूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके आतंकका वर्णन * १९९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] पूर्वकालकी बात है, धर्मराजके नगरमें एक उत्तम उत्सव हो रहा था। उसमें सभी देवता, गन्धर्व, अप्सराएँ, सिद्ध, चारण, नाग, मुनि, यक्ष और राक्षस आमन्त्रित किये गये थे। वहाँ नृत्य करती हुई तिलोत्तमाका उत्तरीय भूमिपर गिर पड़ा, [जिससे] यमने उसके सुन्दर और विशाल स्तनयुगलको देख लिया। [इससे] वे काम- सन्तप्त, बेचैन और लज्जाहीन-से हो गये॥ १७-१९॥ उन्होंने उसके आलिंगन आदिकी इच्छा की। तदनन्तर [बोध होनेपर] वे धर्मराज लज्जासे मुख नीचे करके सभासे बाहर निकल गये। जाते समय उनका तेज स्खलित होकर भूमिपर गिर पड़ा; उससे एक विकृत मुखवाला पुरुष उत्पन्न हुआ, जो ज्वालामालाओंसे युक्त था। वह अपने क्रूर दंष्ट्रारव (दाँत पीसनेकी आवाज)- से तीनों लोकोंको भयभीत कर रहा था, सम्पूर्ण पृथ्वीको जलाये डाल रहा था तथा अपनी जटाओंसे आकाशका स्पर्श कर रहा था॥ २०-२२॥ उसके [भयंकर] नादसे तीनों लोकोंके प्राणियोंके मन अत्यन्त कम्पित हो उठे, तब सभी सभासद् [भगवान्] विष्णुके पास गये। उन सबने अपनी-अपनी मतिके अनुसार अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे उनका स्तवन किया और सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये शान्तभावसे उनकी प्रार्थना की॥ २३-२४॥ [तब] वे भगवान् विष्णु उन सबके साथ अनामय गणेशजीके पास गये। उस (यमपुत्र)-की मृत्यु उन्हींके हाथसे जानकर उन सबने उन्हें प्रसन्न किया॥ २५॥ देवता और मुनि बोले-आप विघ्नस्वरूपके लिये नमस्कार है, आप विघ्नहारीके लिये नमस्कार है, आप सर्वरूपके लिये नमस्कार है; हे सर्वसाक्षी! आपको नमस्कार है। महान् देवताके लिये नमस्कार है, जगत्के आदि कारण आपके लिये नमस्कार है; हे कृपानिधान! आप जगत्का पालन करनेवाले हैं, आपके लिये नमस्कार है॥ २६-२७॥ पूर्ण तमोगुणारूप आपको नमस्कार है, आप सर्वसंहारकारीको नमस्कार है, हे भक्तवरद! आपको नमस्कार है, सर्वदाताके लिये बारम्बार नमस्कार है॥ २८॥

[दायाँ स्तम्भ] हे अनन्यशरण! हे समस्त कामनाओंको परिपूर्ण करनेवाले! आपको नमस्कार है। वेदके ज्ञाता आपको नमस्कार है, वेदके कर्ता आपको नमस्कार है॥ २९॥ [आपको छोड़कर] हम किस दूसरेकी शरणमें जायें? कौन दूसरा हमारे भयको दूर कर सकता है? [आपकी] प्रजा [हम सब]-पर अकालमें ही प्रलय कैसे आ गयी ? हा देवेश्वर गजानन ! हा विघ्नहर ! हा अव्यय ! हम सब मृत्युको प्राप्त होने जा रहे हैं, आप हमारी उपेक्षा क्यों कर रहे हैं?॥ ३०-३१॥ उनका इस प्रकारका वचन सुनकर शत्रुभयका नाश करनेवाले करुणासागर भगवान् गजानन उन सबके सम्मुख शिशुरूपमें प्रकट हो गये॥ ३२॥ उनके नेत्र कमलके समान थे तथा उनके मुखकी आभा सैकड़ों चन्द्रमाओंकी आभाके समान थी। उनके श्रीविग्रहकी आभा करोड़ों सूर्योंके आभासमूहके समतुल्य थी तथा उनका सौन्दर्य करोड़ों कामदेवोंके सौन्दर्यको पराभूत करनेवाला था॥ ३३॥ उनके दाँत कुन्दकी कलीकी और अधर बिम्बाफलकी शोभाको जीतनेवाले थे। उनकी नासिका उन्नत, भृकुटी और नेत्र सुन्दर तथा कण्ठ शंखके समान था॥ ३४॥ उनका वक्षःस्थल विशाल था, दोनों भुजाएँ घुटनोंतक विस्तृत थीं, उदरप्रदेश गम्भीर नाभिसे सुशोभित था, उनका कटिप्रदेश अत्यन्त सुन्दर था तथा वे बलशाली थे। उनकी स्थूल जंघाएँ केलेके तनेकी शोभासे प्रतिस्पर्धा कर रही थीं। सुन्दर घुटनों, जंघा और एड़ीसे उनके चरण-कमल सुशोभित हो रहे थे॥ ३५-३६॥ वे अनेक प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित और महामूल्यवान् वस्त्र धारण किये हुए थे। इस प्रकारके [रूप-सौन्दर्यवाले] उन भगवान् गणेशको अपने सम्मुख उस नगरकी भूमिपर प्रकट हुआ देखकर देवता और मुनिगण जय-जयकार करते हुए उठकर खड़े हो गये। तदनन्तर उन सबने उनको वैसे ही भूमिपर लेटकर दण्डवत् प्रणाम किया, जैसे देवगण इन्द्रको प्रणाम करते हैं॥ ३७-३८॥ देवता और ऋषि बोले-हे विभो! आप कौन

२०० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 हैं ? कहाँसे आये हैं ? क्या कार्य है ? हमसे कहिये। हम पराक्रमको नहीं जानते हैं ॥ ४४-४५ ॥ लोग तो यही जान रहे हैं कि बालकका रूप धारण किये क्या ईश्वरने ही इसका वध करनेके लिये और आप दुष्टसंहारक परम ब्रह्म परमात्मा हैं, जो अनलासुरके पीड़ित तीनों लोकोंकी रक्षा करनेके लिये बालकके रूपमें सन्त्राससे अपने कर्मोंका त्यागकर बैठे हुए हम लोगोंको अवतार लिया है ? ऐसा कहकर उन सबने उन्हें सादर त्राण देनेके निमित्त प्रकट हुए हैं ॥ ३९-४० ॥ प्रणाम किया। उसी समय कालानलका स्वरूप धारण उनके इस प्रकारके वचन सुनकर शिशुरूपधारी किये वह अनलासुर दसों दिशाओंको जलाता हुआ, गजानन गणेशजीने प्रसन्नमुख होकर हँसते हुए उन मनुष्य-लोकका भक्षण करता हुआ वहाँ आया। उस देवताओं और मुनियोंसे इस प्रकार कहा - ॥ ४१ ॥ समय वहाँ क्रन्दन करते हुए मनुष्योंका महान् कोलाहल बालक [ -रूपधारी गणेशजी ]-ने कहा- हे व्याप्त हो गया ॥ ४६-४८ ॥ देवताओ एवं ऋषियो! आप लोग ज्ञानसम्पन्न हैं। आप उसे देखते ही सभी मुनिगण भागनेको उद्यत हो लोगोंने जो कहा, वह सत्य ही है। मैं उस परपीडाकारी गये। उन सबने बालरूपधारी उन गणेशजीसे भी कहा (दूसरोंको कष्ट देनेवाले) दुष्टके वधके लिये अपनी कि 'शीघ्र पलायन करो, नहीं तो यह अत्यन्त प्रचण्ड इच्छासे बालकका रूप धारण करके शीघ्रतापूर्वक आया अनलासुर निश्चित ही आज वैसे ही तुम्हारी हिंसा कर हूँ। हे पुण्यात्माओ ! मैं उसके वधका जो उपाय बताता देगा, जैसे तिमिंगल नामक मत्स्य छोटी मछलियोंकी हूँ, तुम लोग उसे करो ॥ ४२-४३ ॥ और गरुड़ सर्पोंकी [हिंसा कर देते हैं] ॥ ४९-५० ॥ उसे देखकर आप सब मुझे प्रयत्नपूर्वक प्रेरित उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर बालकरूपधारी करना, तब उसके और मेरे महान् आचरणको कौतुकपूर्वक परमात्मा गजानन गणेशजी हिमालयपर्वतकी भाँति अचल देखियेगा। उनके इस प्रकारके कृपापूर्ण वाक्य सुनकर वे होकर वहाँ खड़े हो गये। देवता और ऋषि उन सब हर्षमें भरकर आपसमें कहने लगे कि हम सब इनके बालरूपधारी गणेशजीको वहीं छोड़कर दूर चले गये ॥ ५१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वांकुरमाहात्म्यके अन्तर्गत अनलासुरोत्पत्ति' नामक तिरसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६३ ॥ चौंसठवाँ अध्याय गणेशपूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके शमनकी कथा आश्रया बोली- हे महामुनि! देवताओं और सहित चलायमान हो गयी ॥ ३-४ ॥ ऋषियोंके पलायन कर जानेपर जब बालकरूपधारी आकाशमें बादलोंके गरजनेके समान ध्वनि होने गणेशजी पर्वतके समान स्थित रहे, तब उस बालक और लगी। वृक्षोंकी शाखाओंसे पक्षियोंके समूह भूतलपर गिर अनलासुरके मध्य कौन-सी आश्चर्यजनक घटना घटित पड़े। समुद्र जलहीन हो गये, वृक्ष जड़से उखड़ गये। हुई; उसे मुझसे विस्तारपूर्वक शीघ्र कहिये ? ॥ १ १/२ ॥ कम्पनकी प्रबलताके कारण कुछ भी ज्ञात नहीं हो पा नारदजी बोले- हे शचीपति ! उसके इस प्रकार रहा था ॥ ५-६ ॥ प्रश्न करनेपर मुनिश्रेष्ठ कौण्डिन्यने जो कहा, वह मैं उसी क्षण बालकरूपधारी भगवान् गजाननने उस बतलाता हूँ, उसे सुनो ॥ २१/२॥ अनलरूप धारण किये दैत्यको मायाबलसे पकड़ लिया बालरूपधारी गजाननके पृथ्वीपर पर्वतकी भाँति और सबके देखते-देखते उसे वैसे ही निगल गये, जैसे स्थिर हो जानेपर वह अनलासुर दुर्दमनीय कालाग्निकी अगस्त्यजीने समुद्रको पी लिया था। तदनन्तर उन भाँति वहाँ आया; उस समय अचला पृथ्वी भी पर्वतों परमात्मा गणेशजीने विचार किया कि यदि यह दैत्य मेरे

उ०ख०-अ०६४ ] * गणेशपूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके शमनकी कथा * २०९ उदरमें चला गया तो मेरे उदरमें स्थित तीनों भुवनोंको जला डालेगा, जिनका कि मैंने रक्षण किया है। [इसके कारण] सभी ब्रह्माण्डोंका नाश हो जायगा, इसलिये मैं इसको कण्ठमें ही रख लेता हूँ। इसी बीचमें देवाधिदेव गणपति की परमाश्चर्यमयी लीलाको देखनेके लिये अग्नि, इन्द्र आदि देवगण वहाँ आ पहुँचे। तब इन्द्रने उस अग्नि (-रूप असुरके दाह)-को शान्त करनेके लिये चन्द्रमाको उन्हें प्रदान किया॥ ७-१०॥ तब उस चन्द्रमाको मस्तकपर धारण किये हुए भगवान् गणेशका देवताओं और मुनियोंने भी 'भालचन्द्र' इस नामसे स्तवन किया, परंतु फिर भी कण्ठके मध्य भागमें स्थित वह अग्नि शान्त नहीं हुई॥ ११॥ तदनन्तर ब्रह्माजीने उनको सिद्धि-बुद्धि नामवाली दो मानस कन्याएँ प्रदान कीं। वे केलेके सदृश जंघावाली, कमलनयनी, शैवलसदृश सघन केशोंवाली, चन्द्रमुखी, अमृतसदृश मधुरभाषिणी, कूपसदृश गम्भीर नाभिवाली, सरिताओंसदृश त्रिवलीसे युक्त, कमलनालसदृश मध्यभागवाली (कटिप्रदेशवाली), प्रवालके सदृश अरुणम आभासे युक्त हाथोंवाली और [उत्तापको] शीतल करनेमें समर्थ थीं ॥ १२-१३॥ तदनन्तर ब्रह्माजीने [गणेशजीसे] कहा कि इन दोनोंका सम्यक् रूपसे आलिंगन करनेसे तुम्हारे कण्ठमें स्थित अग्नि शान्त हो जायगी। परंतु उन दोनोंका आलिंगन करनेपर भी गणेशजीकी कण्ठस्थित अग्नि कुछ ही शान्त हुई। तत्पश्चात् कमलापति भगवान् विष्णुने उन्हें एक अत्यन्त कोमल कमल पुष्प प्रदान किया। तबसे वे [भगवान् गजानन] देवताओं और मनुष्योंद्वारा 'पद्मपाणि' कहे जाने लगे॥ १४-१५॥ तब भी अग्निके शान्त न होनेपर वरुणने शीतल जलसे उनको सिंचित किया और गिरिशायी भगवान् शंकरने उन्हें सहस्र फणवाला नाग प्रदान किया॥ १६॥ उससे उदरको बाँधनेके कारण वे 'व्यालबद्धोदर' नामवाले हुए, परंतु तब भी उनका अग्नियुक्त कण्ठ शीतल नहीं हुआ ॥ १७॥ तदनन्तर अठ्ठासी सहस्र मुनिजन उनके समीप आये और उनमेंसे प्रत्येकने इक्कीस-इक्कीस दूर्वाएँ उनके मस्तकपर रखीं, जो अमृतके तुल्य [गुणकारी] थीं। इससे उनके कण्ठमें स्थित अग्नि शान्त हो गयी। तब दूर्वांकुरोंके भारसे अर्चित वे परमात्मा गणेशजी भी प्रसन्न हो गये॥ १८-१९॥ [गणेशजी दूर्वांकुरसे प्रसन्न होते हैं—] ऐसा जानकर उन सभी [देवताओं और मुनियों]-ने अनेक दूर्वांकुरोंसे उन गजानन गणेशजीका पूजन किया, जिससे वे गजानन हर्षित हुए ॥ २० ॥ उन्होंने देवताओं और मुनियोंसे कहा कि भक्तिपूर्वक की गयी मेरी पूजा चाहे अल्प हो या महान्, किंतु वह दूर्वांकुरोंके बिना व्यर्थ है ॥ २१ ॥ बिना दूर्वांकुरोंके की गयी पूजाका फल किसीको भी नहीं प्राप्त हो सकता। इसलिये मेरे भक्तको उषाकालमें की गयी पूजामें एक या इक्कीस दूर्वा चढ़ानी चाहिये ॥ २२ ॥ भक्तिपूर्वक समर्पित की गयी दूर्वा जो महान् फल देती है, [वह फल] सैकड़ों यज्ञों, दानों, व्रतों और अनुष्ठानसमूहोंसे नहीं प्राप्त हो सकता॥ २३ ॥ हे देवताओ और मुनिगण! करोड़ों जन्मोंतक की गयी उग्र तपस्या और नियम-पालनसे भी उतना पुण्य फल नहीं उपार्जित होता, जितना कि दूर्वा समर्पित करनेसे प्राप्त होता है॥ २४॥ [मुनि] कौण्डिन्य बोले—[हे प्रिये!] गणेशजीके इस प्रकारके वचन सुनकर देवताओंने देवाधिदेव परमात्मा गजाननका पुनः दूर्वांकुरोंसे अर्चन किया॥ २५॥ तब उन गणेशजीने पृथ्वी और आकाशको निनादित करते हुए उच्च स्वरसे आनन्दयुक्त गर्जन किया। तदनन्तर हर्षित हुए सम्पूर्ण देवताओं, मुनियों और मनुष्योंको भी अनेक वरदान देकर वे बालरूपधारी गणेशजी अन्तर्हित हो गये। तब उन सभीने उन गणेशजीका 'कालानल- प्रशमन'—यह नाम रखा। [तत्पश्चात्] उन सबने वहाँ मन्दिरका निर्माणकर उसमें गजानन गणेशजीकी मूर्तिकी स्थापना की और देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक उनका 'विघ्नहर्ता'—यह नाम रखा ॥ २६-२८ ॥ इन विघ्नहर्ता गणेशजीकी कृपासे वहाँ किये हुए

२०२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

स्नान, दान, तप और अनुष्ठानसे अनन्त पुण्यफलकी प्राप्ति होती है ॥ २९ ॥ वहाँपर गणेशजीने [कालानलपर] विजय प्राप्त की थी, इसलिये वह नगर विजयनगर नामसे प्रसिद्ध हुआ और वहाँपर [गणेशजीने] सभीके विघ्नोंका नाश किया था, इसलिये वे [स्वयं] 'विघ्नहर्ता' नामसे विख्यात हुए ॥ ३० ॥ [मुनि] कौण्डिन्य बोले—हे प्रिये ! दूर्वाके उत्तम माहात्म्यसे सम्बन्धित यह सारा प्रसंग मैंने तुमसे कह दिया; इसके श्रवण और पठनसे सम्पूर्ण पापोंका क्षय हो जाता है। अब मैं एक अन्य पुरातन इतिहासका वर्णन कर रहा हूँ, उसका श्रवण करो ॥ ३१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वामाहात्म्यवर्णन' नामक चौंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६४ ॥

पैंसठवाँ अध्याय गणेशजीद्वारा राजा जनकके दानशीलताजनित अभिमानका मर्दन

[मुनि] कौण्डिन्य बोले—हे देवि ! किसी समय गजानन गणेशजी सुखासनमें बैठे हुए थे। [उसी समय] नारदमुनि उनका दर्शन करनेके लिये आये। वे बहुत दिनोंके पश्चात् उनके पास आये थे ॥ १ ॥ उन्होंने [उन्हें] साष्टांग प्रणामकर कहा—'हे गजानन ! हमारा जन्म सफल हो गया, जो पुण्य-समूहों [-के उदय] -के फलस्वरूप आपका दर्शन हुआ है ॥ २ ॥ ऐसा कहकर मुनि हाथ जोड़कर उनके सम्मुख स्थित हो गये, तब महाभाग गजाननने उन महान् भाग्यशाली महामुनि नारदजीका हाथ पकड़कर आसनपर बैठाया। गणेशजीद्वारा किये हुए उस सत्कारसे मुनिश्रेष्ठ नारदजी भी प्रसन्न हो गये ॥ ३-४ ॥ तदनन्तर नारदजीने उन गणाधिपति गणेशजीसे कहा कि 'मेरे हृदयमें जो आश्चर्य व्याप्त है, उसे निवेदन करनेके लिये मैं आया हूँ, तत्पश्चात् आपको प्रणामकर मैं पुनः चला जाऊँगा ॥ ५ ॥ गजानन बोले— [हे मुनिवर !] तुमने कौन-सा आश्चर्य देखा है ? तुम्हारे हृदयमें क्या है ? उसे तुम विशेष रूपसे बतलाओ; तदनन्तर अपने आश्रमको चले जाना ॥ ६ ॥ नारदजी बोले—हे देव ! मिथिलापुरीमें जनक नामके एक श्रेष्ठ राजा हैं; वे अत्यन्त प्रतिष्ठासम्पन्न, दानी तथा वेद-वेदांगोंके पारगामी विद्वान् हैं ॥ ७ ॥ वे नित्य अन्नदानमें संलग्न रहते हैं और ब्राह्मणोंका अनेक प्रकारके अलंकारों, वस्त्रों और दक्षिणाओंसे पूजन करते हैं। वे दीन-दुखियों, अन्धों और दरिद्रोंको बहुत- सा धन प्रदान करते हैं। याचक उनसे जो-जो माँगते हैं, वे वह सब कुछ उनको प्रदान करते हैं ॥ ८-९ ॥ फिर भी उन महान् आत्मावाले [राजा]-का धन समाप्त नहीं होता ! क्या गजानन गणेशजीकी कृपासे ही उनका धन बढ़ रहा है ? इस महान् आश्चर्यको देखनेके लिये मैं उनके राजभवन गया, [परंतु] उन्होंने ब्रह्मज्ञानके अभिमानसे मेरा अपमान किया ॥ १०-११ ॥ मैंने उनसे इस प्रकार कहा कि हे नृपश्रेष्ठ ! तुम धन्य हो, [तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न होकर] भगवान् गजानन तुम्हारे द्वारा चिन्तित वस्तुको तुम्हें प्रदान करते हैं। तब उन्होंने गर्वसे कहा—'हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं ही त्रिलोकीका ईश्वर हूँ। मैं ही दान देनेवाला और मैं ही दान दिलानेवाला हूँ; मैं ही भोक्ता तथा मैं ही पालनकर्ता हूँ। मेरे स्वरूपसे [मुझसे] अतिरिक्त त्रिभुवनमें दूसरा कुछ है ही नहीं। कर्ता, कारण और कार्यका साधनस्वरूप- सब कुछ मैं ही हूँ' ॥ १२-१४ ॥ नारदजी बोले—[हे गजानन !] मैंने उनके इस प्रकारके वचन सुनकर क्रोधपूर्वक कहा—'ईश्वरके अतिरिक्त जगत्‌का कर्ता अन्य कोई नहीं है ॥ १५ ॥ हे राजन् ! तुम यह धर्मका दम्भपूर्ण आचरण क्यों कर रहे हो? हे पुण्यात्मन् ! थोड़े ही समयमें मैं तुम्हें इसका प्रमाण दिखला दूँगा।' हे गजानन ! उनसे इस प्रकार कहकर मैं आपके पास चला आया ॥ १६१/२ ॥

उ०ख०-अ०६५ ] * गणेशजीद्वारा राजा जनकके दानशीलताजनित अभिमानका मर्दन * २०३ [मुनि] कौण्डिन्य बोले- [हे प्रिये !] नारद मुनिके इस प्रकारके वचन सुनकर उन परमात्मा गणेशजीने अर्घ्य, अलंकार और चन्दनसहित दिव्य पुष्पोंसे उनका पूजन किया। मुनि भी उनसे आज्ञा लेकर वैकुण्ठमें भगवान् विष्णुके पास चले आये ॥ १७-१८ ॥ [उधर] गजानन गणेशजी सर्वज्ञ होते हुए भी राजा जनककी भक्तिकी परीक्षा करनेके लिये निन्दनीय वेश धारणकर मिथिला गये। उनका अमांगलिक शरीर अनेक प्रकारके घावोंसे संयुक्त था और उनमेंसे रक्तस्राव हो रहा था। वे मक्खियोंके समूहसे आक्रान्त, दन्तहीन और अत्यन्त आतुर प्रतीत हो रहे थे ॥ १९-२० ॥ उन्हें मार्गमें जाते देखकर कुछ लोग नाक दबा लेते थे, कुछ लोग कपड़ेसे मुख ढक लेते थे और कुछ लोग इधर-उधर थूकने लगते थे ॥ २१ ॥ [इस प्रकार] लड़खड़ाते, गिरते-पड़ते, मूर्च्छित होते तथा पुनः उठकर चलते हुए वे [कुत्सित वेशधारी गणेशजी] बालकोंकी टोलियोंके साथ राजभवनके द्वारपर पहुँचकर द्वारपालोंसे बोले- हे दूतो ! राजासे जाकर निवेदन करो कि मैं वृद्ध भूखा ब्राह्मण अतिथि इच्छानुकूल भोजनकी आकांक्षासे आया हूँ ॥ २२-२३ ॥ तब उन दूतोंने उनके इस तरहके वचनको सुनकर राजा जनकके पास जाकर उन वचनोंको वैसे ही कह सुनाया। तब वे राजा जनक [दूतोंसे] बोले- 'हे दूतो ! उन्हें ले आओ, मैं उन कौतुकी ब्राह्मणको देखना चाहता हूँ।' तब उन दूतोंने उस मलिन वस्त्रधारी और मलिन शरीरवाले ब्राह्मणको राजा जनकके पास पहुँचा दिया। राजाने दूरसे ही देखा कि वह मक्खियोंसे घिरा हुआ काँप रहा है ॥ २४-२५ ॥ पसीनेसे भीगे और घावोंसे रक्त स्रवित होते वृद्ध ब्राह्मणको देखकर राजा जनकने मनमें विचार किया कि क्या ये स्वयं परमात्मा ही हैं, जो मुझे छलनेके लिये ऐसा रूप धारण करके आये हैं। यदि मेरा पुण्य होगा तो मैं इनका मनोवांछित समाधान करूँगा, नहीं तो जो कुछ भविष्यमें होनेवाला है, वह अन्यथा नहीं होता ॥ २६-२७ ॥ नृपश्रेष्ठ जनकजी ऐसा विचार कर ही रहे थे कि उन्होंने द्वारपालोंके साथ उस ब्राह्मणको अपने सम्मुख [कक्षमें] प्रवेश करते देखा ॥ २८ ॥ ब्राह्मण बोला- हे राजन् ! चन्द्रमाकी किरणोंके सदृश तुम्हारी उज्ज्वल कीर्ति सुनकर मैं यहाँ आया हूँ। मुझे भोजन प्रदान कीजिये, मैं चिरकालसे अत्यन्त क्षुधित हूँ। हे नरेश्वर ! जबतक मेरी तृप्ति न हो जाय, तबतक अन्न प्रदान करते रहिये, इससे तुम्हें सौ यज्ञ करनेका पुण्यफल प्राप्त होगा ॥ २९-३० ॥ [मुनि] कौण्डिन्य बोले- उन ब्राह्मणदेवताके इस प्रकारके वचन सुनकर राजाने उन्हें अपने राजभवनके भीतर ले जाकर उनका सम्यक् प्रकारसे विधिवत् पूजनकर [उनके लिये] स्वादिष्ट अन्नका परिवेषण किया ॥ ३१ ॥ उनके द्वारा दिया गया [वह अन्न] वे तत्काल उनके सम्मुख ही भक्षण कर गये। [तब] असंख्य पात्रोंमें [उन ब्राह्मणरूपी गजाननके भोजनार्थ] पकनेके लिये उत्तम प्रकारके चावल डाले गये ॥ ३२ ॥ [इस प्रकार] जो भी पका हुआ चावल उनके सामने परिवेषित किया गया, उस सबका वे [ब्राह्मण देवता] भक्षण कर जाते। तब प्रजाजनोंने राजासे कहा- [हे राजन्!] यह तो राक्षस प्रतीत होता है। इसे इतना अधिक [अन्न] क्यों दिया जा रहा है? [क्योंकि] राक्षसोंको [अन्नादि] प्रदान करनेसे किंचिन्मात्रकी भी पुण्यप्राप्ति नहीं होती ॥ ३३-३४ ॥ कुछ लोगोंने कहा- हे राजन्! त्रैलोक्यका भक्षण कर लेनेपर भी इसकी परम तृप्ति नहीं हो सकती। इसलिये इसे अब धान्य* (अनाज) प्रदान करें ॥ ३५ ॥ तदनन्तर सम्पूर्ण ग्रामों और नगरोंसे, घरों तथा भूमिके नीचे दबाकर रखे गये समस्त धान्यको उस सर्वभक्षी द्विजरूपधारी अतिथि-पुरुषके सम्मुख लाकर डाल दिया गया, परंतु उन धान्योंको खा लेनेपर भी उसे

  • शस्यं क्षेत्रगतं प्राहुः सतुषं धान्यमुच्यते । आमान्नं वितुषं प्रोक्तं सिद्धमन्नं प्रकीर्तितम् ॥ अर्थात् खेतमें जो भी तैयार फसल खड़ी है, उसे शस्य कहते हैं। तुष (छिलका)-युक्त अनाजको धान्य कहते हैं। छिलकारहित अनाजको आमान्न (कच्चा अन्न) तथा आगमें पके हुए अनाजको सिद्ध अन्न कहते हैं। Kalyana Visheshank 2021_Section_8_1_Front

२०४ * पुराणे हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- तृप्तिकी प्राप्ति नहीं हुई ॥ ३६-३७ ॥ तत्पश्चात् दूतोंने राजासे कहा कि [ हे राजन् !] धान्य भी कहीं नहीं प्राप्त हो रहा है। दूतोंके इस प्रकारके वचन सुनकर राजा जनकके मुखके नीचे कर लेनेपर वे ब्राह्मणदेवता 'स्वस्ति' कहकर वहाँसे चले गये। वे तृप्त नहीं हुए थे, अतः घर-घर जाकर 'अन्न दीजिये'—ऐसा लोगोंसे कहने लगे। इसपर लोगोंने उनसे कहा— 'हे ब्रह्मन् ! हम सबके घरका सारा धान्य राजाने मँगवा लिया और उस सम्पूर्ण धान्यका आपने भक्षण कर लिया, इसलिये अब आपकी जहाँ रुचि हो, वहाँ आप जायें' ॥ ३८-४० ॥ ब्राह्मण बोले—मैंने लोगोंसे इस राजाकी इस प्रकारकी कीर्ति सुनी थी कि 'राजा जनकसे श्रेष्ठ दानी कोई नहीं है।' अतः तृप्तिकी कामनासे मैं यहाँ आया हूँ, बिना तृप्त हुए कैसे चला जाऊँ ? ॥ ४१ ॥ [ कौण्डिन्य बोले— हे प्रिये ! ]— लोगोंके मौन हो जानेपर भ्रमण करते हुए उन द्विजश्रेष्ठने विरोचना और त्रिशिरा नामक ब्राह्मण-दम्पतीके सुन्दर भवनको देखा ॥ ४२ ॥ [ गणेशजीके गणोंने कहा— ] हे श्रेष्ठ [योगिजनो!] [तदनन्तर] वे [द्विजरूपधारी भगवान् गजानन] सभी प्रकारके गृहोपकरणोंसे रहित और धातुपात्रोंसे हीन उस भवनमें गृहस्वामीकी भाँति प्रविष्ट हुए ॥ ४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'जनकके सत्त्वका हरण' नामक पैंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६५ ॥ छाछठवाँ अध्याय कुष्ठी ब्राह्मणके वेशमें गणेशजीका अपने भक्त द्विज-दम्पतीके यहाँ जाना और उनके द्वारा भक्तिपूर्वक प्रदत्त दूर्वाङ्कुरमात्रसे तृप्त होना कौण्डिन्य बोले— [हे प्रिये !] उन दोनों (द्विजदम्पती)-के लिये पृथ्वी ही आसन (बिछावन) और आकाश ही ओढ़ना था। सभी प्रकारकी धातुओंके स्पर्शतकसे रहित उन दोनोंके लिये दिशाएँ ही वस्त्र थीं। द्विजरूपधारी [गजानन]-ने देखा कि वे दोनों अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये बिना याचनाके जो मिल जाय, वही खानेवाले और जलमात्रसे ही सभी धार्मिक क्रियाओंको सम्पन्न करनेवाले थे ॥ १-२ ॥ उनका घर चारों ओरसे मच्छर और मक्खियोंके समूहोंसे भरा हुआ था। उन्होंने देखा कि उन दोनों (द्विजदम्पती)-के द्वारा अनन्य भक्तिभावसे गणेशजीकी मूर्तिकी पुष्पों और पल्लवोंसे पूजा की गयी है तथा वे दोनों उनकी भक्तिमें निरत हैं। तब उन्होंने उन दोनोंसे कहा— 'हे निष्पाप [द्विज-दम्पती !] जो बात मैं कह रहा हूँ, उसे सुनो ॥ ३-४ ॥ मिथिलाधिपति [महाराज जनक]-की [दान- विषयक] कीर्ति सुनकर मैं भूखसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण तृप्तिकी कामनासे यहाँ आया था, किंतु उन्होंने मुझे तृप्त नहीं किया। दम्भपूर्ण कार्योंसे सत्त्व (धर्म)- की रक्षा नहीं होती। तुम्हारे घरमें मेरे लिये कुछ तृप्तिकर हो तो दो' ॥ ५-६ ॥ [ द्विज-] दम्पती बोले— [राजा जनक] जो चक्रवर्ती सम्राट् थे, जब वे आपकी तृप्ति न कर सके तो हम दोनों दरिद्र आपको तृप्तिकारक क्या दे सकेंगे ? ॥ ७ ॥ जो समुद्र असंख्य नदियों और नदोंके जलसे भी पूर्ण नहीं होता, भला बताओ कि वह बिन्दुमात्र जलसे कैसे पूर्ण होगा ? ॥ ८ ॥ द्विज [-रूपधारी गणेशजी ] बोले—भक्तिपूर्वक दिया हुआ अत्यन्त अल्प पदार्थ भी मुझे बहुत तृप्ति प्रदान करनेवाला होता है, जबकि बिना भक्तिके अथवा दिखावेके लिये बहुत अधिक मात्रामें दिया हुआ भी व्यर्थ होता है ॥ ९ ॥ उन दोनों (द्विज-दम्पती)-ने कहा—हे द्विज- श्रेष्ठ ! हम शपथपूर्वक कहते हैं कि हमारे घरमें कुछ भी नहीं है। गणेशजीकी पूजाके लिये हम लोग प्रातःकाल दूर्वांकुर लाये थे। हमने उनसे गणेशजीकी पूजा की थी। उन्हींमेंसे एक दूर्वा बची हुई है ॥ १० १/२ ॥ द्विज [ रूपधारी गणेशजी ] बोले—भक्तिपूर्वक Kalyana Visheshank 2021_Section_8_1_Back

उ०ख०-अ०६६ ] * कुष्ठी ब्राह्मणके वेशमें गणेशजीका अपने भक्त द्विज-दम्पतीके यहाँ जाना * २०५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ]

दिया हुआ एक दूर्वांकुर भी मेरे लिये तृप्तिकारक होगा, अतः उसे ही दे दीजिये ॥ ११ ॥ कौण्डिन्य [मुनि] बोले—[हे प्रिये !] तब [द्विजपत्नी] विरोचनाने उनके इस कथनको सुनकर उस एक दूर्वांकुरको उनको भक्तिपूर्वक प्रदान कर दिया, जिससे वे द्विज तृप्त हो गये ॥ १२ ॥ विरोचनाने उस दूर्वांकुरमें शालि चावल और गोदुग्धसे निर्मित खीर, अनेक प्रकारके पक्वान्नों, व्यंजनों तथा चाटकर एवं चूसकर खाये जानेवाले विभिन्न भोज्य पदार्थोंकी भावना करके उन्हें उसे दिया था, उसे ग्रहण करके उन ब्राह्मण [-श्रेष्ठ]-ने उसका परम प्रसन्नतासे भक्षण किया ॥ १३-१४॥ [विरोचनाके द्वारा] भक्तिपूर्वक दिये हुए उस एक दूर्वांकुरसे उन द्विज [श्रेष्ठ]-की जठराग्नि तत्क्षण शान्त हो गयी। उन्हें तत्काल परम शान्तिकी प्राप्ति हो गयी। तदनन्तर तृप्त हुए उन द्विजने हर्षपूर्वक त्रिशिराको गले लगा लिया ॥ १५-१६॥ [तत्पश्चात्] उन द्विजने अपना वह कुत्सित रूप त्याग दिया और गजानन गणेशजीके रूपमें प्रकट हो गये। उनका वह स्वरूप चार भुजाओंसे युक्त, कमलके समान नेत्रवाला और दण्डसदृश सूँड़से सुशोभित था ॥ १७ ॥ उन्होंने अपने हाथोंमें कमल, परशु, माला और दाँत धारण कर रखा था। उनके सिरपर महामूल्यवान् मुकुट सुशोभित हो रहा था और उनके कान स्वर्ण-कुण्डलोंसे अलंकृत थे। उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे और उनका श्रीविग्रह दिव्य चन्दनसे अनुलिप्त था। प्रसन्न मनवाले उन गजानन गणेशजीने उन दोनों द्विजदम्पतीसे कहा कि 'जो-जो तुम्हारे मनमें इच्छित कामनाएँ हों, उनके लिये शीघ्र वर माँग लो' ॥ १८-१९ १/२ ॥ उन दोनों (द्विज-दम्पती)-ने कहा—हे देव! हम दोनोंका जहाँ भी जन्म हो, वहाँ [हमारी] आपमें दृढ़ भक्ति बनी रहे अथवा हमें इस अत्यन्त दुस्तर संसार- सागरसे मुक्ति प्रदान कर दीजिये। हे गजानन ! हम दोनोंके


[दायाँ स्तम्भ]

मनमें अन्य किसी वस्तुकी अपेक्षा नहीं है ॥ २०-२१॥ कौण्डिन्य [मुनि] बोले—[हे प्रिये !] उन द्विज- दम्पतीके इस प्रकारके वचन सुनकर गजानन गणेशजीने 'तथास्तु' कहा और प्रसन्नतापूर्वक [अपने] भक्त त्रिशिराका पुनः आलिंगन करके अन्तर्धान हो गये ॥ २२ ॥ हे आश्रये ! असंख्य व्यंजनोंका भक्षण करनेपर भी जो परमात्मा तृप्त नहीं हुए, उन्हें एक दूर्वांकुरमात्रसे परम तृप्तिकी प्राप्ति हो गयी। इसी कारणसे मेरे द्वारा गणेशजीको दूर्वाका भार (इक्कीस दूर्वांकुर) अर्पित किया जाता है। इस प्रकार मैंने दूर्वांकुरसमर्पण-सम्बन्धी मंगलमयी महिमाका तुमसे सम्यक् रूपसे वर्णन कर दिया, जिसका श्रवण सम्पूर्ण मनोभिलषितोंको प्रदान करनेवाला है। जो इस आख्यानको भक्तिपूर्वक सुनता या सुनाता है, वह इहलोकमें पुत्र, धन एवं मनोभिलषित वस्तुओंकी प्राप्ति करता है और परलोकमें भी आनन्दित रहता है तथा गणेशजीकी भक्ति प्राप्त करता है। निष्काम भक्त मुक्तिकी प्राप्ति करता है ॥ २३-२६ ॥ [गणेशजीके] गण बोले—[हे योगीश्वरो !] इस आख्यानका श्रवण करनेपर भी आश्रयाके हृदयमें पुनः सन्देह उत्पन्न हुआ, जिसे जानकर [मुनिवर] कौण्डिन्यने पुनः कहा—हे आश्रये ! अपने सन्देहका निवारण करनेहेतु मेरे कथनका श्रवण करो। हे निष्पाप [प्रिये !] तुम्हारे हृदयमें जो [संशय] स्थित है, वह मुझे ज्ञात है, उसीके [निराकरणके] विषयमें कहता हूँ—एक दूर्वांकुर लेकर तुम शीघ्र इन्द्रके पास चली जाओ। पहले तुम उन्हें आशीर्वाद दो, तत्पश्चात् उनसे सुवर्णकी याचना करो ॥ २७-२९ ॥ दूर्वांकुरसे तौलकर उस स्वर्णको ग्रहणकर यहाँ ले आओ। हे शुभानने ! उस (दूर्वांकुर)-के भारसे न तो कम और न ही अधिक सुवर्ण ग्रहण करना चाहिये ॥ ३० ॥ [गणेशजीके] गणोंने कहा—[हे योगीश्वरो !] तदनन्तर मुनिवर कौण्डिन्यके इस कथनका श्रवणकर पतिके वचनका पालन करनेवाली आश्रया एक दूर्वांकुर लेकर शतक्रतु इन्द्रके पास गयी ॥ ३१ ॥


[पाद-टिप्पणी / समापन]

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वाके माहात्म्यका वर्णन' नामक छाछठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६६ ॥

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सड़सठवाँ अध्याय

२०६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सड़सठवाँ अध्याय दूर्वाङ्कुरकी महिमाके प्रति संशयग्रस्त आश्रयाको कौण्डिन्यमुनिका इन्द्रके पास दूर्वाङ्कुरके भारके बराबर स्वर्ण लानेके लिये भेजना और एक दूर्वाङ्कुरपर त्रैलोक्यकी सम्पदाका भी न्यून होना

[गणेशजीके] गण बोले—[हे योगीश्वरो!] उन मुनि कौण्डिन्यके द्वारा आज्ञा दिये जानेपर अपने अभिप्रायकी सिद्धिके लिये आश्रया एक दूर्वांकुर लेकर इन्द्रके पास गयी और उनसे कहा—‘हे शक्र! हे सुरेश्वर! मैं अपने पतिकी आज्ञासे तुम्हारे पास याचना करने आयी हूँ; मुझे शुद्ध स्वर्ण प्रदान कीजिये’॥ १-२॥ इन्द्र बोले—[हे साध्वि!] तुम यहाँ क्यों आयी हो? तुम्हारे पतिकी जो आज्ञा थी, उसे तुम मुझे प्रेषित कर देती तो मैं अपनी शक्तिके अनुसार तुमको स्वर्ण भिजवा देता॥ ३॥ आश्रया बोली—हे देव! हे शचीपते! मैं [इस] दूर्वाङ्कुरकी तौलभर ही स्वर्ण लूँगी, न उससे कम और न ही उससे अधिक॥ ४॥ इन्द्र बोले—हे दूत! तुम इन्हें शीघ्र ही कुबेरके भवनमें ले जाओ। वे [इस] दूर्वाङ्कुरके परिमाणभर शुद्ध स्वर्ण दे देंगे॥ ५॥ [गणेशजीके] गण बोले—तदनन्तर देवराज इन्द्रकी आज्ञासे वह देवदूत आश्रयाके साथ कुबेरके भवन गया॥ ६॥ दूत बोला—[हे धनाधिपति!] इन साध्वी मुनिपत्नीको इन्द्रने मेरे साथ भेजा है, मैंने इन्हें आपके भवन पहुँचा दिया। इन्हें आप [इस] दूर्वांकुरके परिमाणभर स्वर्ण प्रदान कर दें। हे देव! आपको नमस्कार है, अब मैं जाता हूँ॥ ७१/२॥ कुबेर बोले—[हे दूत!] मैं अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गया हूँ कि मुनि कौण्डिन्य, इन्द्र तथा आश्रया भी अज्ञानके वशीभूत हो गये; वे यह नहीं जानते कि दूर्वांकुरका परिमाण कितना होगा? उतने सोनेमें क्या होगा? उन्होंने अधिक स्वर्णकी माँग क्यों नहीं की?॥ ८-९॥ [गणेशजीके] गण बोले—[इस प्रकार कहकर] कुबेरने उसे बहुत-सा स्वर्ण दे दिया, परंतु आश्रयाने पतिके भयसे उस स्वर्णको ग्रहण नहीं किया; क्योंकि उसे शंका थी कि यह सुवर्ण [दूर्वांकुरके परिमाणसे] कम या अधिक हो सकता है॥ १०॥ उसने [उस] दूर्वांकुरको स्वर्णकारकी तुलापर रखा, परंतु [कुबेरप्रदत्त] वह स्वर्ण उसके तौलके बराबर न हुआ। तदनन्तर वणिक्-तुला लायी गयी, फिर भी [स्वर्ण और दूर्वांकुरकी] समतुल्यता नहीं हुई। तब तैलकारकी तुलाद्वारा तोलनेका कार्य किया गया, परंतु फिर भी स्वर्ण और दूर्वांकुरकी समतुल्यता नहीं हो सकी॥ ११-१२॥ तत्पश्चात् वहाँ धट (बड़ा तराजू) बाँधा गया। उसके एक पलड़ेमें स्वर्ण रखा गया और दूसरे पलड़ेपर दूर्वांकुर रखा गया। यहाँपर भी दूर्वांकुरवाला पलड़ा भारी होनेके कारण नीचे चला गया। तब कुबेरने अन्य बहुत- सा स्वर्ण [स्वर्णवाले पलड़ेपर] रखा, परंतु वह भी उस दूर्वांकुरके समतुल्य नहीं हो पाया॥ १३-१४॥ तब उन्होंने अपने कोशका पर्वतराज हिमालयकी भाँति [बृहदाकार] सम्पूर्ण द्रव्य दे दिया, फिर भी उस द्रव्यसे दूर्वांकुरकी समता न हो सकी॥ १५॥ तदनन्तर आश्चर्यचकित कुबेरने पत्नीको बुलाया और उनसे कहा कि हे शुभ्रु! मेरे आदेशसे पहले तुम इस धट [-के पलड़े]-पर चढ़ो, यदि तब भी यह दूर्वांकुरके समतुल्य नहीं हुआ, तो अपने सत्त्वकी रक्षाके लिये मैं भी इसपर आरूढ़ हो जाऊँगा। तब वह पतिव्रता पतिकी आज्ञासे उस धट [-के पलड़े]-पर चढ़ गयी॥ १६-१७॥ जब वह भी उस दूर्वांकुरकी समतुल्यता न कर सकी, तो कुबेरने स्वयंसहित अपनी सम्पूर्ण (अलका)- पुरीको उस धटके (पलड़ेके) मध्यमें रखवा दिया, परंतु

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