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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

२२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐


[बायाँ स्तम्भ]

लिये शेषनागने [भी पूर्वकालमें] वहाँ अनुष्ठान किया था॥ २१-२३॥ उस अनुष्ठानके फलस्वरूप उन्होंने गणेशजीसे पृथ्वीको धारण करनेकी सामर्थ्य, सर्वज्ञता, सहस्र सिर और नौ नागकुलोंमें श्रेष्ठता आदि बहुत-से वरदान प्राप्त किये। चूँकि प्राचीन कालमें अत्यन्त प्रसन्न मनसे उन्होंने इसे स्थापित किया था, इसलिये 'धरणीधर' — यह इसका दूसरा नाम प्रसिद्ध हो गया, जो सुनने और स्मरण करनेसे भी समस्त कामनाओंको फलीभूत करनेवाला है॥ २४-२६॥ सहस्रबाहु सम्पूर्ण श्रेष्ठ द्विजोंका पूजनकर और राजाओंसे पूछकर माता-पिताको देखने अपने नगरको गया। उसे इस प्रकारका (सर्वांगपूर्ण, सुन्दर और सहस्रभुज) देखकर माता-पिता तथा नगरनिवासी अत्यन्त हर्षित हुए और उन्होंने सभी श्रेष्ठ द्विजोंको अनेक प्रकारके दान दिये ॥ २७-२८॥ इन्द्र बोले— [हे राजन्!] मैंने तुमसे संकष्टचतुर्थी [व्रत]-की अद्भुत महिमाका वर्णन किया, यह शुभ व्रत मृत्युलोकमें राजा कृतवीर्यद्वारा प्रचलित हुआ ॥ २९ ॥ देवगणों और चन्द्रसेन आदि राजाओंने भी इस


[दायाँ स्तम्भ]

व्रतकी महिमाका अनुभव किया। यह व्रत अत्यन्त पुण्य प्रदान करनेवाला और स्मरणमात्रसे भी सिद्धि देनेवाला है। इसी व्रतके प्रभावसे रावणने सर्वज्ञता प्राप्त कर ली थी। पाण्डवोंने [पूर्वकालमें] इसी व्रतके प्रभावसे पुनः राज्य प्राप्त किया था ॥ ३०-३१॥ [हे शूरसेन!] इस व्रतके अनुष्ठानका जो पुण्य है, वह यदि मेरे हाथमें दिया जाय, तभी यह विमान अमरावतीके लिये प्रस्थान कर सकेगा ॥ ३२ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यास !] शतयज्ञकर्ता इन्द्रके मुखसे इस संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमा सुनकर राजा शूरसेन स्वात्मानन्दरूपी महासागरमें अवगाहन करने लगे, तदनन्तर प्रसन्न मनवाले उन नृपश्रेष्ठ शूरसेनने [देवराज] इन्द्रके चरणकमलोंकी वन्दनाकर कहा— ॥ ३३-३४१/२ ॥ वे [राजा शूरसेन] बोले—मेरे किसी पूर्वजन्मका पुण्य उदय हुआ है, जिसके फलस्वरूप मैंने इस प्रकारके [पुण्यप्रदायक] व्रतके विषयमें सुना। तीनों लोकोंमें इससे अधिक पुण्य देनेवाला कोई कर्म नहीं है ॥ ३५१/२ ॥ [ब्रह्माजी बोले]—इन्द्रसे ऐसा कहकर वे राजा शूरसेन तबसे स्वयं व्रत करने लगे ॥ ३६ ॥


॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'चतुर्थीव्रतमाहात्म्य' नामक तिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७३ ॥


चौहत्तरवाँ अध्याय संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमाके सन्दर्भमें एक गलत्कुष्ठा चाण्डालीकी कथा


[बायाँ स्तम्भ]

व्यासजी बोले—हे ब्रह्मन् ! उन राजा शूरसेनने आदरपूर्वक इन्द्रके मुखसे इतिहाससहित संकष्टचतुर्थी व्रतको सुनकर उस उत्तम व्रतको कैसे किया था ? ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यास !] तब उस राजा शूरसेनने अपने दूतोंको यह कहा कि नगरमें जाओ और किसी संकष्टचतुर्थी व्रत करनेवालेको ले आओ ॥ २ ॥ [राजाके ऐसा कहनेपर] वे दूत शीघ्रतापूर्वक नगरमें गये और घर-घर जाकर पूछने लगे। [इस प्रकार] इधर-उधर भ्रमण करते हुए उन्होंने एक सुन्दर मंगलमय विमानको देखा, जिसमें एक दुष्ट चाण्डाली बैठने जा रही थी। उसके अंग कुष्ठसे गल गये थे।


[दायाँ स्तम्भ]

उसके मुखसे [कफ और लारका] स्राव हो रहा था। उसका शरीर दुर्गन्धयुक्त और मक्खियों एवं कीड़ोंसे भरा था। उसका उदर शुष्क, बाल बड़े और दाँत, आँख एवं नासिका [भी] शुष्क थे। वह अत्यन्त मलिन और बड़े- बड़े कर्णछिद्रोंवाली थी। उसका स्वर ऐसा था, मानो बादल गरज रहे हों ॥ ३-५ ॥ ऐसे स्वरूपवाली उस भक्त चाण्डालिनीको ले जानेके लिये आये हुए गणेशदूतोंको देखकर राजदूत उन्हें प्रणामकर कहने लगे कि 'यह तो बड़ा ही आश्चर्यजनक है' ॥ ६ ॥ राजाके दूतोंने देवदेव गणेशजीके सेवकोंसे कहा—

उ०ख०-अ०७४] * संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमाके सन्दर्भमें एक गलत्कुष्ठा चाण्डालीकी कथा * २२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 यह अत्यन्त निन्दित और हीन जातिकी होकर भी कैसे स्वर्ग जा रही है? हे दूतो! यह पूर्वकालमें कौन थी? इस प्रकारकी यह कैसे हो गयी? किस पुण्यके फलस्वरूप यह आप लोगोंके द्वारा स्वर्ग ले जायी जा रही है? यदि यह सब बताना सम्भव हो, तो हमें बतलायें॥ ७-८ १/२॥ देवदूत बोले-बंगाल प्रान्तमें सारंगधर नामके एक क्षत्रिय थे, उनकी सुन्दरा नामकी सुन्दर कन्या थी। वह कोयलके समान मधुर स्वरवाली, चन्द्रमाके सदृश सुन्दर मुखवाली और अपने सौन्दर्यसे रतिकी सुन्दरताको भी जीत लेनेवाली थी। प्रसिद्ध अष्ट नायिकाएँ इसकी दासी बननेके भी योग्य नहीं थीं। वह अपनी तिर्यक् दृष्टिसे योगियोंके भी चित्तको विमोहित कर देती थी॥ ९-११॥ उसके रूप-सौन्दर्यके दर्शनमात्रसे कुछ तरुणोंके तेजकी हानि हो जाती थी। विश्वको मोह लेनेवाली वह [सुन्दरा] व्यभिचारमार्गमें प्रवृत्त हो गयी॥ १२॥ महामूल्यवान् वस्त्रों और अलंकारोंसे अलंकृत रहनेवाली और अनेक प्रकारके विषयोंका भोग करनेवाली वह निर्लज्जा बंगाल नगरमें वेश्याकी भाँति चर्चित हो गयी थी। पिताने असंख्य द्रव्य व्यय करके जिससे उसका विवाह किया था, 'चित्र' नामवाले पतिकी वह सदैव वंचना करती रहती थी॥ १३-१४॥ किसी समय शयन करते हुए उसे छोड़कर वह अर्धरात्रिमें सुन्दर वेष धारणकर जाने लगी तो उसने क्रुद्ध हो हाथसे उसे पकड़ लिया॥ १५॥ तदनन्तर चित्र नामवाले उस पतिने उसे डाँटते हुए कहा-'अरी पापाचारिणी! तुझे धिक्कार है, जो तू निरन्तर परपुरुषमें ही आसक्त रहती है'॥ १६॥ तब उसके इस प्रकारके वचनको सुनकर उस समय तो उसने [अपने] क्रोधको शान्त कर लिया, परंतु अभक्ष्य- भक्षणके कारण वह अत्यन्त कामोन्मत्त हो उठी थी। अतः जब अन्धकार घना हो गया तो उस बलशालिनीने अपने दाहिने हाथमें एक छुरी ली और उससे अपने चित्र नामवाले पतिका उदर-विदारणकर चहेते जार पुरुषके पास रमण करनेके लिये चली गयी॥ १७-१८ १/२॥ जबतक वह वहाँ रमण कर रही थी, उसी समय उसके पड़ोसमें रहनेवाले व्यक्तिने, जो जग रहा था, उसका सारा चरित जानकर राजासे निवेदन कर दिया। उस (राजा)-के दूत [उस व्यभिचारिणीके घरके निकट] अन्धकारमें स्थित हो गये और वह जैसे ही घर आयी तो राजाके वे दूत उसे पकड़कर राजाके समीप ले गये। राजाकी आज्ञासे दूतोंने उसे [नगरके] बाहर ले जाकर मार डाला॥ १९-२१॥ तदनन्तर यमराजकी आज्ञासे वह उनके दूतोंद्वारा भयंकर नरकमें ले जायी गयी। उलटी लटकी हुई वह कृमियोंद्वारा खूब डँसी गयी। वहाँ पूर्वजन्ममें किये गये दुष्कृत्योंका स्मरण करते हुए उसने अत्यन्त दुःख भोगा और कल्पके अन्तमें वह मृत्युलोकमें (पृथ्वीपर) अत्यन्त दुर्भाग्यशालिनी चाण्डाली हुई॥ २२-२३॥ एक बार वह मद्यपान करके मत्त होकर दिनमें ही सो गयी, तदनन्तर रात्रिके प्रथम प्रहरमें जगनेपर वह भूखसे बहुत पीड़ित हुई। तब वह भिक्षा माँगनेके लिये [संकष्टचतुर्थीका] व्रत करनेवालेके घर गयी। उस (व्रती)-ने उसे (चाण्डालीको) जो अन्न दिया, उसे उसने चन्द्रमाके उदय होनेके बाद खाया॥ २४-२५॥ दैवयोगसे भोजन करते समय स्वेच्छासे ही उसके मुखसे 'गणेश'-ऐसा उच्चारित हुआ, तभी [अन्तकालमें] गणाधिपति गणेशजीने [इसे लानेके लिये] यह सुन्दर विमान भेजा है॥ २६॥ ब्रह्माजी कहते हैं-[हे व्यासजी!] देवदूतोंका वचन सुनकर राजाके दूतोंने उन्हें नमस्कार करके पुनः कहा-॥ २६ १/२॥ राजदूत बोले-[हे देवदूतो!] हम कार्यकर्त्ताओंने यह अत्यन्त अद्भुत घटना देखी॥ २७॥ राजाने हमें जो आज्ञा दी है, उसे सुनिये-इन्द्र एक श्रेष्ठ विमानमें बैठकर देवताओंके साथ गृत्समदको देखनेके लिये आये थे। वहींसे वे भृशुण्डिके पास आये। उन्हें देखकर [इन्द्रने उनको] प्रणामकर भली प्रकारसे पूजन किया तथा उनसे पूजा ग्रहणकर एवं उनकी अनुमति ले वे अपनी पुरीको चल दिये। गमन करता हुआ उनका विमान कुष्ठग्रस्त [पापी] वैश्यपुत्रकी दृष्टि पड़ते ही उसी क्षण

२२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

उस [राजा] शूरसेनके नगरमें गिर पड़ा ॥ २८-३०॥ [तब] शूरसेनने वहाँ जाकर उन्हें नमस्कारकर और उनका भलीभाँति पूजनकर [उनसे] विमानके पतनका कारण और उसके [पुनः] गमनका उपाय पूछा ॥ ३१ ॥ इन्द्रके यह कहनेपर कि 'संकष्टचतुर्थीव्रत-जनित पुण्यसे ही यह विमान प्रस्थान करेगा, अतः इसके लिये प्रयत्न कीजिये' हम दूतगण राजाकी आज्ञासे संकष्टचतुर्थीव्रत करनेवालेको खोजने यहाँ आये हैं। हे देवदूतो! यदि इसने यह व्रत किया है, तो इसे भूपति शूरसेनके पास ले चलिये। जब यह चाण्डाली संकष्टीव्रत- जनित पुण्यका दान करेगी तो इसका पुण्य द्विगुणित हो जायगा और यह पुनः इस विमानसे प्रस्थान करेगी, साथ ही इन्द्रका विमान भी अपने लोकके लिये प्रस्थान कर जायगा ॥ ३२-३५ ॥ इससे आप सबका, इस चाण्डालीका, हमारा, राजा शूरसेनका और शचीपति इन्द्रका कार्य सम्पन्न हो जायगा, यदि आप सबको रुचिकर लगे तो ऐसा करें। उनका इस प्रकारका वचन सुनकर भगवान् गणेशके सेवकोंने कहा—'इसे दूसरोंको देनेकी आज्ञा गणेशजीद्वारा हमें नहीं हैं' ॥ ३६-३७ ॥ ऐसा कहकर उन्होंने [जब] उस चाण्डालीको उठाकर विमानमें चढ़ाया, तभी वह दिव्य कान्तिसे सम्पन्न, दिव्य वस्त्राभूषणसे युक्त शरीरवाली हो गयी। तदनन्तर वह दिव्य वाद्योंकी ध्वनिके साथ देवदूतोंके द्वारा गजानन गणेशजीके समीप ले जायी गयी और राजाके दूत जैसे आये थे, वैसे ही राजा शूरसेनके पास लौट गये और सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे कहा ॥ ३८-३९१/२ ॥ राजाके दूत जब उस वृत्तान्तका वर्णन कर रहे थे, उसी समय दसों दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ वह विमान उस चाण्डालीको ले जाते हुए उन सबको दिखायी दिया। तभी उस चाण्डालीकी दृष्टि शचीपति इन्द्रके उस विमानपर पड़ी। उनका विमान उसके विमानकी वायुके स्पर्शसे सभी लोगों, देवताओं और ऋषियोंके आश्चर्यपूर्वक देखते-देखते ऊपरकी ओर चला गया ॥ ४०-४२ ॥ इन्द्रके अमरावतीपुरी चले जानेपर सभी अपने- अपने स्थानको चले गये। संकष्टचतुर्थीव्रतके पुण्यसे पापोंका नाशकर वह चाण्डाली भी दिव्य शरीरसे सम्पन्न होकर भगवान् गणेशजीके धामको चली गयी। इस संकष्टनाशक वृत्तान्तको जो मनुष्य सम्यक् रूपसे श्रवण करता है अथवा प्रयत्नपूर्वक दूसरेको सुनाता है, वह [अपने] सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त करता है ॥ ४३-४४॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकष्टचतुर्थीकी महिमाका वर्णन' नामक चौहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७४ ॥


पचहत्तरवाँ अध्याय

राजा शूरसेनका संकष्टचतुर्थीव्रत करना और उसके प्रभावसे सम्पूर्ण प्रजासहित उनको ले जानेके लिये गणेशलोकसे विमान आना

ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी!] संकष्ट- चतुर्थीव्रतजनित [पुण्य]-की महिमाको सुनकर और देखकर राजा शूरसेनने उस व्रतको करनेका मन बनाकर मुनिवर वसिष्ठसे कहा— ॥ १ ॥ राजा [शूरसेन] बोले—[हे मुनिश्रेष्ठ !] संकष्ट- चतुर्थीव्रतहेतु मुहूर्त बतलाइये। मैं यहाँ (पृथ्वीलोकमें) इस सद्यः फल देनेवाले व्रतको करना चाहता हूँ ॥ २ ॥ **वसिष्ठजी बोले—**हे नृपश्रेष्ठ! माघमासके कृष्ण पक्षकी चतुर्थीको जब मंगलवार हो, तब तुम इस सर्वसिद्धिकारक और सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाले इस उत्तम व्रत (संकष्टचतुर्थी)-का अनुष्ठान करो ॥ ३ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यास!] तदनन्तर वसिष्ठजीद्वारा बतलाये गये शुभ दिनके शीघ्र आ जानेपर [गणेशजीके प्रति] भक्तिभावान्वित राजाने पत्नीसहित

उ०ख०-अ०७५ ] * राजा शूरसेनका संकटचतुर्थीव्रत करना * २२५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] व्रतहेतु समस्त आवश्यक सामग्रीका संग्रह किया और उत्तम चतुर्थी व्रतको करनेकी इच्छासे प्रातः स्नानकर नित्यकर्मका समापन किया ॥ ४-५ ॥ तत्पश्चात गणेशजीका पूजन और स्वस्तिवाचन करके, श्रेष्ठ द्विजों और वसिष्ठजीका पूजनकर और उनकी अनुज्ञा लेकर गणेशजीको मनमें धारण करके उनके नाम-जपमें तत्पर हो गये और वे पैरके एक अँगूठेपर तबतक स्थित रहे, जबतक कि सूर्य अस्त [नहीं] हुआ ॥ ६-७ ॥ तदनन्तर पुनः स्नानके बाद [राजाने] सायं सन्ध्योपासना की और वसिष्ठजीके सहित [गणेशजीका] पूजन करना प्रारम्भ किया ॥ ८ ॥ [राजाने] केलेके खम्भोंसे सुसज्जित एक विशाल मण्डपिकाका निर्माण कराकर उसे अनेक प्रकारके वस्त्रों और अलंकारोंसे समन्वित तथा छत्र एवं चामरसे सुशोभित कराया। वह महामण्डपिका पुष्पमालाओंसे विभूषित अनेक प्रकाशमान मणियोंसे युक्त, दीपावलियोंसे सुशोभित और दर्पणोंकी पंक्तिके कारण मनोहर लग रही थी ॥ ९-१० ॥ उस महामण्डपिकाके मध्यभागमें सोनेके कलशपर गजानन गणेशजीकी सर्वांगसुन्दर सुवर्णनिर्मित सुन्दर प्रतिमा स्थापित करके उसे अनेक अलंकारोंसे सुसज्जित और अनेक रत्नोंसे विभूषित किया। उस समय श्रेष्ठ द्विजगण [वेद-] पाठ कर रहे थे और गायक [भगवान् गणपतिका] गुणगान कर रहे थे ॥ ११-१२ ॥ राजाने तुरही आदि सभी प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि और नर्तकोंके नृत्यके मध्य वैदिक एवं पौराणिक मन्त्रोंसे उस मूर्तिका सम्यक् प्रकारसे पूजन किया ॥ १३ ॥ उन्होंने पंचामृतसे उस गणेशमूर्तिको स्नान कराते हुए षोडशोपचार पूजन किया। मोदक, पुआ, लड्डू, शर्करायुक्त खीर, पंचामृतसहित अनेक प्रकारके व्यंजनोंसे सुशोभित नैवेद्य एवं सुगन्धयुक्त जलको उस गजाननमूर्तिके सम्मुख रखकर गणेशजीकी प्रसन्नताके लिये राजाने उन्हें समर्पित किया। तदनन्तर उन्होंने अनेक प्रकारके फल, सुपारीयुक्त पान, रत्न और स्वर्णकी दक्षिणा तथा

[दायाँ स्तम्भ] दूर्वा अर्पित करके आरती की और नाना प्रकारके पुष्पोंसे मन्त्रपुष्पांजलि दी। तत्पश्चात् चतुर्थी तिथि, गणेशजी और चन्द्रमाके लिये अर्घ्य प्रदान किया ॥ १४-१७ ॥ तदनन्तर उन्होंने आदरपूर्वक ब्राह्मणोंका पूजन किया और उन्हें भोजन कराया तथा उन्हें वस्त्र, अलंकार और दक्षिणासहित दस हजार गायें प्रदान कीं ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् सुहृज्जनों और बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वयं राजाने भोजन किया। रात्रिमें उन्होंने गणेशजीसे सम्बन्धित कथाओं और वाद्य-ध्वनिके साथ उनके गुणगानका श्रवण करते हुए जागरण किया ॥ १९ ॥ प्रभातकालमें निर्मल जलमें स्नानकर राजाने पहलेकी भाँति पुनः सम्यक् प्रकारसे पूजनकर गणेशजीकी उस मूर्तिको दक्षिणा एवं उपस्करोंसहित वसिष्ठजीको प्रदान किया। इससे गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने सभी प्रकारकी सम्पत्तियोंसे युक्त विमान भेज दिया ॥ २०-२१ ॥ गजाननके स्वरूपवाले गणेशजीके दूतोंने वहाँ ले जाकर उस विमानको स्थापित किया। वह विमान देखनेवाले सभी लोगोंके मनको आनन्दित कर रहा था ॥ २२ ॥ राजा जब गणेशचतुर्थीव्रतके पुण्यप्रभावसे देव- लोकके लिये जाने लगे, उस समय अनेक प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित और सिरपर मुकुट धारण किये हुए गणेशजीके स्वरूपवाले देवदूतोंने उनसे कहा कि [आपके द्वारा किये गये इस व्रतसे] गणेशजी प्रसन्न हुए हैं, उन्होंने आपके दर्शनकी उत्सुकताके कारण यह विमान भेजा है, तभी हम लोग यहाँ आये हैं, उनके इस प्रकारके वचन सुनकर राजा [गणेशजीकी कृपाका स्मरणकर] अश्रुपात करने लगे ॥ २३-२५ ॥ उस समय उनका गला भर आया और शरीर रोमांचित हो उठा। तदनन्तर राजा शूरसेनने आश्चर्यचकित होते हुए उनसे कहा- ॥ २६ ॥ हे दूतो ! अव्यक्त, अप्रमेय, नित्य, वाणी और मनसे भी अगोचर जगदीश्वरको मेरे दर्शनका कोई हेतु नहीं है। जिनका निरूपण करनेमें वेद और शास्त्र भी समर्थ नहीं हैं, ब्रह्मा और शंकर आदि देवगण जिनका निरन्तर स्मरण करते हैं। उन्होंने मेरा स्मरण किया-यह मेरा

२२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] महान् भाग्य है। राजाकी यह बात सुनकर दूतोंने पुनः उनसे कहा- ॥ २७-२९ ॥ हे राजन्! हम भक्तोंकी महिमाको नहीं जानते, जिनके कारण वे निर्गुण-निराकार परमात्मा साकार होते हैं॥ ३०॥ राजा बोले-देवाधिदेव गणेशजी और आप सबके प्रसन्न होनेपर मेरी एक महती इच्छा यह है कि मैं अपनी नगरीको छोड़कर गणेशजीके पास कैसे जाऊँ? इन लोगोंके बिना तो मैंने कभी हलाहल विषका भी भक्षण नहीं किया है, तो हे निष्पाप [दूतो]! इन सबको साथ लिये बिना मैं परमानन्दका भोग कैसे कर सकता हूँ? ॥ ३१-३२ ॥ तब उन [गणपति] दूतोंने पुनः कहा कि तुम्हारी इच्छा पूरी होनी चाहिये, नहीं तो गणेशजी हम सभीको क्रोधपूर्वक दण्डित करेंगे ॥ ३३ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास!] हे ब्रह्मन्! तदनन्तर उन्होंने चारों वर्णोंके सभी लोगों और सभी प्राणियोंको ले जानेके लिये क्षणभरमें विमानमें बैठा लिया। वे सभी दिव्य वस्त्र धारण किये हुए थे और सभी दिव्य अलंकारोंसे सुशोभित थे। वे सब आपसमें कहने लगे कि 'यह कैसी महान् अद्भुत घटना है, हम लोगोंने तो कोई पुण्य किया नहीं, फिर यह विमान कैसे ?' ॥ ३४-३५॥ [उस विमानमें बैठे] अन्य लोग कहने लगे कि यह सब राजाके पुण्य-प्रतापसे हुआ है, जैसे पारसके

[दायाँ स्तम्भ] स्पर्शसे धातुमात्र सुवर्ण हो जाती है ॥ ३६ ॥ जैसे अत्यन्त पापी भी साधु पुरुषके वचनसे सिद्धि प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार राजाके पुण्यसे हम सबका सम्यक् उद्धार हुआ है। तदनन्तर गणेशजीके दूतोंने विमानको ऊर्ध्व गति दी, परंतु वह जड़ीभूत हो गया और पृथ्वीतलसे ऊपर नहीं उठा ॥ ३७-३८ ॥ तब तो सभी लोग इस विषयमें संशयग्रस्त हो गये कि यह कैसे अन्तरिक्षमें जायगा और वे आपसमें कहने लगे कि [हम] भाग्यहीनोंको निधि कैसे प्राप्त होगी? भिक्षापात्र महत्तर छींकेपर कैसे चढ़ सकता है? [यह कहते हुए लोगोंके] सब ओर देखनेपर कोई [महापापी] कुष्ठरोगी दिखायी पड़ा। तब किसीने राजासे कहा कि आप इस कुष्ठीका त्याग करें। इसके नीचे उतरनेपर यान ऊर्ध्व गति करेगा (उड़ान भरेगा) ॥ ३९-४१ ॥ उस कुष्ठीको त्यागनेकी इच्छावाले उन दूतोंसे शूरसेनने कहा- 'मैं पापी और त्याज्य हूँ न कि ये सब; इन्हें आप ले जायें अथवा इस कुष्ठीके पूर्वजन्ममें किये पापको कहिये। आप सब सब कुछ जाननेवाले हैं, मेरे प्रति आप सबका स्नेह है, अतः कृपा करके [विमानके उड़नेका] उपाय बतलायें ॥ ४२-४३ ॥ दूतोंने कहा- हे नृप ! आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये, हम आपको इस कुष्ठीके [पूर्व-] जन्मके पाप, दुष्कर्म तथा [विमानके उड़नेका] उपाय भी बतायेंगे ॥ ४४॥


॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शूरसेनकृत संकटचतुर्थीव्रताचरणका वर्णन' नामक पचहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७५ ॥

छिहत्तरवाँ अध्याय श्रीगणेशजीके चार अक्षरवाले 'गजानन' नाम-मन्त्रके माहात्म्यमें ब्राह्मण-पुत्र बुधका आख्यान, शापवश वैश्यकुलमें उत्पन्न बुधका कुष्ठी होना और 'गजानन' नाम-मन्त्रके श्रवणसे उसे विनायकधामकी प्राप्ति


[बायाँ स्तम्भ] दूत बोले-प्राचीनकालकी बात है, गौड़ देशके गौड़ नामक नगरमें [दूर्व नामक] एक ब्राह्मण निवास करता था। वह तपस्वी, ज्ञानी, बुद्धिमान् तथा देवता और ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाला था ॥ १ ॥ उसका ही यह पुत्र उत्पन्न हुआ था। इसकी

[दायाँ स्तम्भ] माताका नाम शाकिनी तथा पत्नीका नाम सावित्री था, जो सावित्रीके समान पतिव्रता थी ॥ २ ॥ माता-पिताका अकेला पुत्र होनेके कारण उनके स्नेहवश वह अनेक आभूषणोंसे अलंकृत रहता था। वह अत्यन्त सुन्दर था और रतिके स्वामी कामदेवके समान

उ०ख०-अ०७६] * श्रीगणेशजीके 'गजानन' नाम-मन्त्रके माहात्म्यमें ब्राह्मण-पुत्र बुधका आख्यान * २२७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सुशोभित होता था॥ ३॥ उसके माता-पिता एक क्षणके लिये भी उसका वियोग नहीं चाहते थे। जब वह युवावस्थाको प्राप्त हुआ तो अपनी उस भार्याका परित्यागकर वह नित्य ही परायी स्त्रीमें निरत रहने लगा। वह दूसरेकी निन्दामें परायण, पापकर्ममें निरत तथा पिता-माताकी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाला हो गया॥ ४-५॥ एक दिनकी बात है, उस गौड़नगरमें पुरुषोंको मोहित करनेवाली एक वेश्या आयी। उस वेश्याके प्रति आसक्त मनवाले उसने जो किया, उसे तुम सुनो॥ ६॥ उसने अपने माता-पिताके समक्ष ही अपने आभूषणोंको बलपूर्वक उतारकर एक पेटिकामें रखा और फिर छिपकर उन आभूषणोंको उस वेश्याको प्रदानकर उसने बहुत समयतक उसके साथ रमण किया। वह सुगन्धित द्रव्योंका अनुलेपनकर सभी ऐन्द्रिय विषयोंका परित्यागकर केवल उसीमें उसी प्रकार निष्ठावान् हो गया, जैसे कि एक योगी ब्रह्मपरायण हो जाता है। वह कामाग्निसे उसी प्रकार विह्वल हो गया, जैसे मद्यपानके प्रभावसे व्यक्ति मतवाला हो जाता है॥ ७-९॥ अत्यन्त दुखी तथा भूख-प्यासकी परवाह किये बिना उसका पिता नगरके प्रत्येक घरमें अपने पुत्रको खोजने लगा॥ १०॥ पुत्रके कहीं नहीं दिखायी पड़नेपर उसका पिता लम्बी-लम्बी साँस लेता हुआ आधी रातमें घर पहुँचा और अपनी पत्नीसे बोला- 'हमारा पुत्र बुध न जाने कहाँ चला गया। उस पुत्रके बिना हमारा घर वैसे ही व्यर्थ हो गया है जैसे दीपकके बिना रात्रि, जलके बिना बावड़ी और सन्तानके बिना स्त्री निरर्थक हो जाती है। हमारे प्राणोंकी रक्षा करनेवाले उसका दर्शन अब हमें कब होगा?'॥ ११-१२१/२॥ शाकिनी बोली- मैं भूख तथा प्याससे अत्यन्त व्याकुल और चिन्ता तथा शोकसे ग्रस्त हो गयी हूँ, हे नाथ! न जाने हमारा वह प्रिय पुत्र कहाँ चला गया है, यदि मुझे उसका दर्शन हो जाय, तभी मैं जीवित रहूँगी अन्यथा मैं मृत्युको प्राप्त हो जाऊँगी॥ १३-१४॥ [तब] वह दूर्व नामक ब्राह्मण हाथमें लाठी लेकर पुनः अपने पुत्रको ढूँढ़ने निकल पड़ा। रास्तेमें जिस- जिसको वह देखता, उस-उससे अपने पुत्रके विषयमें पूछता जाता था॥ १५॥ जब वह अत्यन्त थक गया और भूखसे व्याकुल हो उठा तो उसे चक्कर आने लगा, उसी समय उसे अन्त्यवर्णमें उत्पन्न एक अत्यन्त वृद्ध तथा महाभयंकर भीम नामवाला पुरुष दिखायी पड़ा, उसने [जब] उससे [भी] अपने पुत्रके विषयमें पूछा तो उसने अत्यन्त स्पष्ट शब्दोंमें उत्तर दिया॥ १६॥ भीम बोला- बुध नामक तुम्हारा वह बुद्धिमान् पुत्र वेश्याके घरमें है और वह कामासक्त होकर सुखपूर्वक क्रीड़ा कर रहा है। इस संसारमें कौन किसका पुत्र है, कौन माता है तथा कौन पिता है? अर्थात् कोई किसीका नहीं है। हे द्विजश्रेष्ठ! तुम व्यर्थ ही कष्ट उठा रहे हो॥ १७॥ दूर्व बोला- मेरा पुत्र बुध कैसे वेश्यामें आसक्त हो गया? तब वह शीघ्र ही उस वेश्याके घर गया, और वहाँ उसने अपने उस पुत्रको देखा॥ १८॥ वह अत्यन्त मदोन्मत्त था, मदिराका सेवन करनेसे उसकी आँखें लाल-लाल थीं और वह नशेमें चूर था, पिताने हाथ पकड़कर उसे उठाया तथा क्रुद्ध होकर उस पुत्रको डाँटा- 'अरे दुष्ट! तुमसे तो यह काँटेवाला वृक्ष अच्छा है अथवा यह पत्थर अच्छा है, तुम प्राणोंका परित्याग क्यों नहीं कर देते ? तुम्हारे जीवित रहनेसे क्या लाभ?' ॥ १९-२०॥ ब्रह्माजी बोले- पिताका वचन सुनकर वह बुध नामक पुत्र क्रोधाविष्ट हो गया और उसने पिताके मुखपर चाँटा मार दिया॥ २१॥ उसने कहा- 'अरे नराधम ! कृमि-कीट आदि भी जिसमें मनुष्योंके समान ही सुख मानते हैं, उस रति- क्रीड़ाके समय तुमने मेरे सुखमें बाधा क्यों पहुँचायी? अथवा मेरे ऊपर अकस्मात् कौएकी विष्ठा कैसे गिर पड़ी?' - ऐसा कहकर उसने पुनः पितापर लातसे प्रहार किया और उसके प्राणोंको हर लिया॥ २२-२३॥

२२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- पिताके द्वारा प्राण त्याग दिये जानेपर वह 'हर- ईश्वर' ऐसा कहने लगा। [अपनी इच्छापूर्तिमें पिताको कण्टकरूप माननेके कारण] वह पुत्र प्रसन्न हो गया। पाँवोंमें रस्सी बाँधकर उसने उसे दूर फेंक दिया ॥ २४ ॥ मदिरापान करके पुनः उसने उस वेश्याके साथ यथेच्छ रमण किया। प्रातःकाल होनेपर वह अपने घर गया और तब माताने उसे देखा ॥ २५ ॥ उसने हर्षपूर्वक पुत्रको अपने हृदयसे लगाया और स्नेहवश उसके स्तनोंसे दूध निकलने लगा। वह बोली- 'तुम कहाँ चले गये थे, कहाँ ठहरे हुए थे, वहाँ तुमने क्या किया? हे वत्स! यह सब तुम मुझे विस्तारसे बतलाओ, तुम्हारे पिता अत्यन्त दुखी हैं। मैं भी निराहार और निर्जल होकर रातभर जागती रही हूँ ॥ २६-२७॥ हे वत्स ! मैं यहाँ तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी और तुम्हारे पिता तुम्हें खोजनेके लिये बहुत समयसे गये हुए हैं, अब तुम अपने पिताको खोजनेके लिये जाओ'- ऐसा वह बार-बार कहने लगी। इसके द्वारा मुझे आज्ञा दी जा रही है-ऐसा समझकर वह पुत्र क्रुद्ध हो उठा और उसने एक सूखी लकड़ीसे उसके सिरपर प्रहार किया, जिससे वह भूमिपर गिर पड़ी ॥ २८-२९ ॥ उसको चेतनाशून्य जानकर उसने उसके [भी] पाँवोंमें रस्सी बाँधकर उसे घरसे बाहर फेंक दिया और स्वयं वेश्याके घरमें जाकर अत्यन्त प्रसन्न होकर काम- क्रीड़ामें निरत हो गया ॥ ३० ॥ सज्जन पुरुषोंने अपने-अपने घरसे काष्ठ ले जाकर उस ब्राह्मण-दम्पतीका दाह-संस्कार किया। दण्डनीय होनेपर भी ब्राह्मण होनेके कारण राजाने उस द्विजाधमको दण्डित नहीं किया। पुनः घरमें आये हुए उससे उसकी पत्नी धीरे-धीरे बोली ॥ ३१ १/२ ॥ सावित्री बोली- हे प्राणनाथ! हे महामते! मैं एक बात कहती हूँ, उसे आप सुनें ॥ ३२ ॥ आपका जन्म अत्यन्त प्रसिद्ध तथा अत्यन्त पवित्र ब्राह्मणकुलमें हुआ है, किंतु आपका आचरण सर्वथा उसके विरुद्ध दिखायी देता है, अतः उस दुराचारका आपको विवेकपूर्वक परित्याग कर देना चाहिये ॥ ३३ ॥ इस लोकमें वही कार्य करना चाहिये, जिससे परलोकमें सुख प्राप्त हो। [वृद्धावस्थासे] पूर्वकी अवस्था अर्थात् युवावस्थामें ऐसा करना चाहिये, जिससे कि वृद्धावस्थामें सुख प्राप्त हो ॥ ३४ ॥ [वर्षभरमें] आठ मासतक वह कर्म करना चाहिये, जिससे कि वर्षाकालमें सुख प्राप्त हो और दिनमें वही कार्य करना चाहिये, जिससे रातमें सुख प्राप्त हो सके। पिताके प्रिय होने तथा ब्राह्मण होनेके कारण राजा भी आपको क्षमा कर दे रहे हैं; सर्वाङ्गसम्पूर्ण, अत्यन्त सुन्दर तथा आपके मनके अनुसार चलनेवाली मुझ धर्मपत्नीको छोड़कर आप क्यों उस वेश्यामें आसक्त हैं? लोकमें सर्वत्र आपकी निन्दा हो रही है, किंतु आपके भयसे आपको कोई कुछ नहीं कहता ॥ ३५-३७ ॥ वे सभी लोग मुझसे कहते हैं, हे शुभे ! तुम्हारा पति कैसा है? तब लज्जाके मारे मुँह नीचे करके मैं उसी क्षण अपना प्राण त्याग करना चाहती हूँ ॥ ३८ ॥ हे स्वामिन्! यदि आप अहर्निश मेरे साथ यथेष्ट रमण करें तो आपसे कोई कुछ भी नहीं कहेगा और आपको महान् पाप भी नहीं लगेगा ॥ ३९ ॥ यदि आप इसमें हित समझें तो विवेकपूर्वक उस वेश्याका परित्यागकर मेरे वचनका पालन करें। विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि वह अज्ञानमें किये गये अथवा प्रमादवश किये गये कर्मका सर्वथा परित्याग कर दे ॥ ४० ॥ [मनुष्यको] निश्चय करना चाहिये कि यह जो [प्रिय अथवा अप्रिय परिणाम उपस्थित] है, वह मेरे ही कर्मका परिणाम है। यदि मैंने अपना इष्टसाधन नहीं किया, तो मेरा अनिष्ट होना सर्वथा निश्चित है, इसलिये जो इष्ट न हो, वैसे परिणामका जनक कार्य नहीं करना चाहिये ॥ ४१ ॥ इसके विपरीत कर्म करनेपर पुरुषको न तो इस लोकमें सुख मिलता है और न परलोकमें ही। अपनी स्त्रीके द्वारा कहे गये इस प्रकारके वचनरूपी बाणोंसे विद्ध हुए मर्मस्थलवाला महान् क्रूर वह बुध अत्यन्त रोषमें भर गया और जलता हुआ-सा बोला ॥ ४२ १/२ ॥ बुध बोला- अरी निर्लज्ज ! निष्ठुर ! प्रगल्भ !

उ०ख०-अ०७६] * श्रीगणेशजीके 'गजानन' नाम-मन्त्रके माहात्म्यमें ब्राह्मण-पुत्र बुधका आख्यान * २२९ दुष्टे! मुझपर स्पष्ट रूपसे रुष्ट हुई तुम भी उसी | कोई भी व्यक्ति कहीं भी तुम्हारा नामतक नहीं लेगा ॥ ५२- गतिको प्राप्त होओगी, जो गति मेरे माता-पिताकी हुई | ५४॥ है ॥ ४३१/२ ॥ | ब्रह्माजी बोले- तब भयभीत हुआ वह बुध पुनः सावित्री बोली- जिसने अनुकूल शिक्षा देनेवाले | वेश्याके घर चला गया और वहाँ सुरापान करके कुछ तथा स्वतन्त्र अपने माता-पिताकी मर्यादाका पालन नहीं | भी चिन्ता न करते हुए उसने उसके साथ रमण किया। किया, तो फिर विपरीत बोलनेवाली मुझ स्त्रीकी रक्षा | इस प्रकारके उसके दुष्कर्मोंका मैं कैसे वर्णन करूँ; करनेवाला वह कैसे हो सकता है ? पतिव्रता स्त्रीके लिये | क्योंकि जो दूसरेके दोषोंका बखान करता है, उसके तो पतिके हाथोंसे मृत्यु प्राप्त करना भी इस लोक तथा | पुण्यका क्षय हो जाता है ॥ ५५-५६ ॥ परलोकमें कल्याणकारक है ॥ ४४-४५ ॥ | समय आनेपर वह मृत्युको प्राप्त हुआ और यमदूत ऐसा कहती हुई उस अपनी पत्नीके बालोंकी | उसको यमराजके यहाँ ले गये। यमराजने (दूतोंसे) कहा- चोटीको उसने सहसा पकड़ लिया और लकड़ी, ढेलों, | इसे यहाँ क्यों लाये हो, इसे सीधे नरकमें ले जाओ। मुष्टियों तथा पत्थरोंसे वह उसे पीटने लगा ॥ ४६ ॥ | यमराजका वचन सुनकर दूत उसी समय उसे ले गये और उस स्त्रीने पूर्वजन्मके पुण्यके प्रभावसे पतिरूपमें | प्रलयपर्यन्तके लिये उसे नरकमें डाल दिया ॥ ५७-५८ ॥ भगवान् श्रीरामका स्मरण किया और उसके द्वारा | नारकीय यातना भोग लेनेके अनन्तर उसने वैश्यके मर्मस्थानोंमें चोट किये जानेके कारण उसने सहसा | घरमें जन्म लिया और ऋषिपत्नीके शापसे वह महान् प्राणोंका परित्याग कर दिया। दिव्य देह धारणकर स्वर्गमें | कुष्ठरोगसे ग्रस्त हो गया। जो पिता-माता, स्त्रीका वध जाकर उसने परम सुखका उपभोग किया। इधर उसे मरा | करनेवाला है, सुरापान करनेवाला है तथा गुरुपत्नीके जानकर उसके पतिने रात्रिमें उसके पैरोंको खींचकर दूर | साथ गमन करनेवाला है, उसका स्पर्शमात्र हो जानेपर ले जाकर फेंक दिया ॥ ४७-४८ ॥ | वस्त्रोंसहित स्नान करना चाहिये ॥ ५९-६० ॥ तब निरंकुश हो अत्यन्त आनन्दमें निमग्न हो, वह | ऐसे प्राणीका नाम भी नहीं लेना चाहिये; क्योंकि उस वेश्याके साथ रमण करने लगा। वह बुध उससे | इससे महान् दोष होता है। इस प्रकारके इस पापात्माको कहने लगा कि तुम्हारे लिये ही मैंने अपने माता-पिता | हम इधर छोड़ देंगे तो यह विमान ऊपरको उड़ चलेगा, और पत्नी सभीको मार डाला है ॥ ४९ ॥ | इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ६११/२ ॥ तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर वह बुध कालभि | ब्रह्माजी बोले- उन देवदूतोंका इस प्रकारका नामक मुनिके घर गया। उस समय कालभिमुनिके | वचन सुनकर राजा शूरसेन अत्यन्त कम्पित हो उठे और स्नानके लिये गये हुए होनेपर उस दुष्टने मुनिकी भार्याके | उनसे बोले कि मुझे इसके दुष्कर्मोंका ज्ञान नहीं था। बालोंको पकड़ लिया ॥ ५० ॥ | तदनन्तर अत्यन्त व्याकुल हुए राजा शूरसेनने पुनः उसने अत्यन्त रमणीय मुनिपत्नीके साथ कामुक चेष्टाएँ | उठकर उन देवदूतोंको प्रणाम किया और उनसे कहा- कीं। तदनन्तर उस स्त्रीने उसे शाप दे दिया ॥ ५११/२ ॥ | 'आप मेरे ऊपर कृपा करके इस पापीके सभी दोष- सुलभा बोली- मेरे माता-पिताने मेरा यह | पापोंको दूर करनेका उपाय मुझे बतायें' ॥ ६२-६४ ॥ 'सुलभा' दुष्ट नाम क्यों रखा? हे दुष्टबुद्धि ! हे नराधम ! | दूत बोले- हे राजन् ! हे नृपश्रेष्ठ ! उठिये! मैं तुम्हारे लिये सुलभ अर्थात् सरलतासे प्राप्त हो गयी | उठिये, हम इसके पापोंके विनाशका उपाय बताते हैं, हूँ। मेरे पति कालभि नामक मुनिश्रेष्ठ जब स्नान करने | आप एकाग्रचित्त होकर उसका श्रवण करें ॥ ६५ ॥ गये हुए थे, तब तुमने मेरे साथ बलपूर्वक दुराचार किया, | गणेशजीका जो चार अक्षरवाला प्रसिद्ध नाम है, अतः जाओ, तुम कुष्ठरोगसे ग्रस्त हो जाओगे, जन्मान्तरमें | उसका आप इसके कानमें जप करें, इससे सभी दोष-

२३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- पापोंका उसी प्रकार विनाश हो जायगा, जिस प्रकार | विनष्ट हो जानेपर वह सभी दिशाओं तथा देशोंको कि भगवान् सूर्यके उदय हो जानेपर सम्पूर्ण अन्धकार | प्रकाशित करते हुए विमानमें आरूढ़ हो गया ॥ ७० ॥ विनष्ट हो जाता है। नाम-जपके अतिरिक्त किसी | तदनन्तर विघ्नराज गणेशजीकी आज्ञा पाकर उनके अन्य उपायमें इसका अधिकार नहीं है, अतः [यह] | दूतोंने सभी लोगोंसे समन्वित उस विमानको क्षणभरमें ही नामका ही जप [तथा श्रवण] करे ॥ ६६-६७ ॥ | गणेशजीके धाममें पहुँचा दिया ॥ ७१ ॥ ब्रह्माजी बोले-देवदूतोंके कथनानुसार राजा शूरसेनने | हे निष्पाप ! जो-जो आपने पूछा, वह सब मैंने बता 'जय' शब्दका उच्चारण करते हुए उस कुष्ठी वैश्यके | दिया है। यह श्रेष्ठ संकटचतुर्थीव्रत अत्यन्त पुण्यप्रद, कानमें गणेशजीका जो चार अक्षरवाला नाम (गजानन) | धर्मकी प्राप्ति करानेवाला और यश तथा आयुष्यको है, उसका तीन बार जप किया ॥ ६८ ॥ | प्रदान करनेवाला है। इसके माहात्म्यका श्रवण सभी 'गजानन' इस नाममन्त्रको सुनते ही वह कुष्ठी | प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त करानेवाला है। यह व्रत सभी दिव्य देहवाला हो गया। वह अपने तेजसे उसी प्रकार | पीड़ाओंको दूर करनेवाला तथा सभी प्रकारके विघ्नोंका सर्वत्र प्रकाश कर रहा था, जैसे कि भगवान् सूर्य अपने | विनाशक है। मैंने दूर्वाके माहात्म्य तथा गणेशजीके तेजसे समस्त लोकको प्रकाशित करते हैं ॥ ६९ ॥ | नामका प्रभाव भी तुम्हें बतलाया, अब आगे और क्या नामके सुननेमात्रसे ही सभी प्रकारके पापोंके | सुनना चाहते हो ? ॥ ७२-७३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वा-नाममहिमावर्णन' नामक छिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७६ ॥ सतहत्तरवाँ अध्याय श्रीपरशुरामजीके आविर्भावके प्रसंगमें महर्षि जमदग्निका आख्यान, कार्तवीर्यार्जुनका महर्षि जमदग्निके आश्रममें आना और महर्षिद्वारा कामधेनुके प्रभावसे ससैन्य राजाका सत्कार करना व्यासजी बोले-[हे ब्रह्मन् !] अन्य किसके | भयभीत रहते थे ॥ ३-४ ॥ द्वारा इस व्रतको किया गया था, उसे बताइये, इस | उनकी पत्नी रेणुका नामसे विख्यात थीं। जिनके विषयमें मुझे महान् कौतूहल हो रहा है ॥ १ १/२ ॥ | गुंजा (घुँघुची)-के बराबर लावण्यकी भी तुलना कामदेवकी ब्रह्माजी बोले-प्राचीनकालकी बात है, महर्षि | पत्नी रतिके लावण्यसे नहीं हो सकती ॥ ५ ॥ जमदग्निके पुत्र परशुरामने इस व्रतको किया था, उन्हें | इसी कारणसे वे रेणुका लोकोंमें 'रति' इस नामसे भी इस व्रतके करनेसे यश, विजय, ज्ञान तथा दीर्घ | विख्यात थीं। जो अपनी सुन्दरतासे सबको मोहित कर आयुकी प्राप्ति हुई थी ॥ १ १/२ ॥ | देनेवाली थीं; ऐसी उन रेणुकाका वर्णन करनेमें कौन व्यासजी बोले-हे पितामह ! उन परशुरामजीका | समर्थ है ? ॥ ६ ॥ आविर्भाव कैसे हुआ था और वे किसके द्वारा किससे | जिनके नेत्रोंकी शोभाको प्राप्त करनेके लिये चकोर उत्पन्न हुए थे ? मेरे पूछनेपर आप यह सब विस्तारपूर्वक | पक्षी जलमें निवास करते हुए और हरिण स्वच्छन्दतापूर्वक मुझे बतलाइये ॥ २ १/२ ॥ | तृणोंका भक्षणकर वनमें रहते हुए तपस्या करते हैं ॥ ७ ॥ ब्रह्माजी बोले-अत्यन्त विख्यात श्वेतद्वीपमें | जिनके मुखमण्डलकी शोभाको प्राप्त करनेके लिये महामुनि जमदग्निजी निवास करते थे। वे त्रिकालज्ञ मुनि | चन्द्रमा भी भगवान् शिवकी सेवा करते हैं। वे देवी आदि अपनी मानसिक शक्तिसे सृष्टि, संहार, निग्रह तथा | और अन्तसे रहित तथा मूलप्रकृतिरूपा ईश्वरी हैं ॥ ८ ॥ अनुग्रह करनेमें समर्थ थे। इसी कारण देवता भी उनसे | उन्हीं रेणुकादेवीसे साक्षात् शिवस्वरूप महाभाग

उ०ख०-अ०७७] * श्रीपरशुरामजीके आविर्भावके प्रसंगमें महर्षि जमदग्निका आख्यान * २३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 जमदग्निके द्वारा इन परशुरामका प्रादुर्भाव हुआ, जो साक्षात् योगेश्वर विष्णुके समान हैं॥ ९॥ वे अत्यन्त सुन्दर शरीरवाले तथा साक्षात् कामदेवके मनको भी मथ देनेवाले थे। वे माता-पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले थे, उनका बल-पराक्रम अत्यन्त विख्यात था। वे देवता, ब्राह्मण, गुरु, विद्वान्, गौ आदिके पूजनमें निरत रहते थे। वेदों, वेदांगों (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द तथा ज्योतिष) तथा स्मृतियोंका स्वाध्याय वे सदा किया करते थे ॥ १०-११ ॥ वे बोलनेमें बृहस्पतिके समान, क्षमामें पृथ्वीके समान, गाम्भीर्यमें समुद्रके समान थे और माता-पिताकी आज्ञाका पालन करनेमें तत्पर रहते थे। अनेक विद्याओंके अध्ययनके लिये अत्यन्त दृढमति होकर माता-पिताकी आज्ञा लेकर वे नैमिषारण्यमें चले आये ॥ १२-१३ ॥ उनके नैमिषारण्यमें चले जानेपर उस समय कृतवीर्यके पुत्र महान् बलशाली राजा कार्तवीर्य वहाँ आये। उनके तेजके प्रभावसे समस्त भूमण्डल सदाके लिये उनके वशीभूत हो गया था ॥ १४ ॥ भगवान् विष्णुके अंशावतार तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले उन राजा कार्तवीर्यके पास लक्ष्मी स्थिर रूपसे निवास करती थी। वे युद्धमें शत्रुओंका विनाश करनेवाले पाँच सौ बाणोंको एक साथ छोड़ते थे ॥ १५ ॥ उनका बल तथा पौरुष अत्यन्त विख्यात था। इन्द्रादि देवता उनकी सेवामें उपस्थित रहते थे। उनके पास असंख्य हाथी, रथ, घोड़े तथा पैदल सैनिक थे। युद्धके लिये प्रस्थान करते समय उनकी सेनाके द्वारा समस्त पृथ्वीमण्डल उसी प्रकार आच्छादित हो जाता था, जिस प्रकार कि वर्षाकालमें मेघमण्डलकी धाराओंद्वारा समस्त नभमण्डल आच्छादित हो जाता है ॥ १६-१७ ॥ उनके शंखनादका श्रवणकर शत्रु उसी प्रकार दसों दिशाओंमें भाग जाते, जैसे कि सिंहनादको सुनकर करोड़ों मदोन्मत्त हाथी भाग जाते हैं ॥ १८ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! जब वे राजा (अपने हजार हाथोंसे) स्वेच्छापूर्वक पाँच सौ ताली बजाते, तो उसके निनादसे घोषपूर्ण समस्त ब्रह्माण्ड काँप उठता ॥ १९ ॥ एकबार वे राजा स्वेच्छापूर्वक अपनी चतुरंगिणी सेना लेकर [वन-विहारको] निकले। उस समय वे नीले रंगके वस्त्र धारण किये हुए थे, उनका छत्र भी नीले रंगका था तथा उनके सैनिक भी उन्हींकी भाँति नीले वस्त्र धारण किये थे। वे वनों, नदियों, पर्वतोंको रौंदते हुए, विविध प्रकारके मृगगणोंको देखते हुए तथा कुछका शिकार करते हुए जा रहे थे। तदनन्तर सह्याद्रिके शिखरपर उन्होंने एक श्रेष्ठ आश्रमको देखा। वह आश्रम उसी प्रकारका था, जैसे कि कैलासशिखरपर भगवान् शंकरका आवास- स्थान हो। राजाने अपने सेवकोंसे पूछा- 'यह उत्तम स्थान किसका है?' ॥ २०-२२ १/२ ॥ सेवक बोला- हे महाभाग! यहाँ प्रसिद्ध जमदग्नि मुनि निवास करते हैं। वे साक्षात् सूर्यके समान [तेजस्वी] हैं तथा शाप और कृपा करनेमें समर्थ हैं। उनके दर्शनसे करोड़ों पापराशियाँ विनष्ट हो जाती हैं। यदि आपकी इच्छा है तो वहाँ जाना चाहिये, आपको अवश्य दर्शन होंगे। आपकी कृपासे हम सभीका भी कल्याण हो जायगा ॥ २३-२४ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- सेवकका इस प्रकारका वचन सुनकर राजा वहाँ जानेके लिये उद्यत हो गये, उन्होंने अपनी सम्पूर्ण सेनाको मना कर दिया और [चार] श्रेष्ठजनोंको साथ लेकर वे तत्क्षण ही तपोनिधि मुनिश्रेष्ठ जमदग्निके आश्रमके लिये गये ॥ २५-२६ ॥ राजाने कुशके आसनपर विराजमान उन मुनिको देखा, जो प्रज्वलित अग्निकी भाँति दिखायी दे रहे थे। राजाने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया तथा साथमें आये सभी सैनिकों आदिने भी उन्हें प्रणाम किया ॥ २७ ॥ अनेक विशाल पर्णशालाओं, लताकुंजों तथा वृक्षोंकी छायामें वे सैनिक बैठ गये और राजा मुनिके समक्ष स्थित हो गये। कृतवीर्यके पुत्र महान् पराक्रमी राजा कार्तवीर्य चार [श्रेष्ठजनों]-से घिरे मुनिवर जमदग्निद्वारा निर्दिष्ट आसनपर बैठ गये ॥ २८-२९ ॥ मुनि जमदग्निने पाद्य, अर्घ्य तथा विष्टर (आसनके प्रतीकरूपमें कुशमुष्टि) प्रदानकर उन सभीका सत्कार किया और गायें भी प्रदान कीं तथा शिष्योंद्वारा अन्य

२३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

(बायाँ स्तम्भ) सभी सैनिकोंका स्वागत-सत्कार करवाया ॥ ३० ॥ तदनन्तर आखेटसे परिश्रान्त हुए सभी सैनिकोंने विविध सरोवरोंके अत्यन्त रमणीय, शीतल तथा निर्मल जलमें डुबकी लगाते हुए स्नान किया ॥ ३१ ॥ मुनि जमदग्निके शिष्योंद्वारा निनादित की जाती हुई वेदध्वनि, शास्त्रोंके बहुत-से शब्दों तथा चारों ओर हो रहे शास्त्रार्थके वचनोंको सुनते हुए कमलनयन राजाने उन मुनिश्रेष्ठ जमदग्निसे कहा—'आज मेरे माता-पिता धन्य हो गये हैं; आज मेरा जन्म लेना सफल हो गया, मेरा ज्ञान धन्य हो गया तथा मेरी तपस्या फलीभूत हो गयी ॥ ३२-३३ ॥ आज [मेरे द्वारा लगाया गया] पुण्यरूपी वृक्ष फलित हो गया, जो कि मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ। आज मेरी समस्त सम्पदा धन्य हो गयी। मेरा कुल तथा मेरी कीर्ति भी धन्य हो गयी। परब्रह्म परमात्मा जिसे कहा गया है, निश्चय ही आप वही हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। आपका इस प्रकारका आतिथ्य-सत्कार देखकर मेरा मन अत्यन्त सन्तुष्ट हो गया है' ॥ ३४-३५ ॥ इस प्रकारकी सुसंस्कृत वाणीको सुनकर वे मुनि अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गये और सब कुछ जानते हुए भी मुनिवर मुस्करा उठे और उन्होंने राजासे पूछा—आप कौन हैं? किसके पुत्र हैं? आपका क्या नाम है, और किस प्रयोजनसे आप यहाँ आये हैं? ॥ ३६१/२ ॥ राजा बोले—स्वधर्मका पालन करनेवाले राजाओंके लिये आप-जैसे महापुरुषोंके दर्शनके अतिरिक्त कोई दूसरा महान् प्रयोजन नहीं हो सकता। मैं राजा कृतवीर्यका पुत्र हूँ और कार्तवीर्य इस नामसे विख्यात हूँ। आपकी आज्ञा प्राप्तकर मैं अपने नगरकी ओर लौट जाऊँगा ॥ ३७-३८१/२ ॥ मुनि बोले—हे राजश्रेष्ठ! मैंने आपके महान् यशका श्रवण किया है। मुझे भी आपके दर्शनकी इच्छा थी, आज महान् पुण्यसे वह सफल भी हो गयी है। मेरी देह, आत्मा, तपस्या, ज्ञान तथा यह मेरा आश्रम आज सफल हो गया है। हे राजन्! आज आपके आगमनसे मेरी समस्त सम्पदाएँ सार्थक हो गयी हैं, आप कुछ भोजन

(दायाँ स्तम्भ) किये बिना कैसे जानेकी इच्छा करते हैं? ॥ ३९-४१ ॥ यद्यपि आपको कोई कमी नहीं है, फिर भी आपके द्वारा भोजन करनेसे लोकमें मेरी कीर्ति होगी। हे विभो! कुछ भोजन करनेके अनन्तर आप जायँ, हे प्रभो! आज आप मुझे सनाथ बनायें ॥ ४२ ॥ राजा बोले—निश्चित ही यह भोजन करनेका समय है, आपकी आज्ञासे कुछ भोजन अवश्य करना चाहिये। श्रोत्रिय ब्राह्मणोंके यहाँ यदि अन्नका अभाव हो तो माँगकर भी जल अवश्य पीना चाहिये। तथापि अपने इन असंख्य सैनिकोंको छोड़कर मैं जल भी नहीं पी सकता हूँ, फिर भोजन कैसे कर सकता हूँ? ॥ ४३-४४॥ हे ब्रह्मन्! मैं अनुमानसे यह जानता हूँ कि सभीको भोजन करानेकी शक्ति आपमें नहीं है। आपके दर्शनमात्रसे मैं कृतकृत्य हो गया हूँ और इस समय जाना चाहता हूँ॥ ४५ ॥ मुनि बोले—हे राजर्षे! आप चिन्ता न करें, मैं सम्पूर्ण सेनासहित आपको चार प्रकारके व्यंजनोंसे युक्त (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य तथा चोष्य) भोजन कराऊँगा। तपस्वियोंके लिये क्या असाध्य है? ॥ ४६ ॥ हे प्रभो! यहाँके अतिरिक्त घरमें भी जो आपकी सेना हो, उसे भी बुला लें। आप क्षणभर इस नदीके अत्यन्त रमणीय शुभ तटपर तबतक विश्राम करें, जबतक कि भोजन पक नहीं जाता, फिर आप आश्चर्य हुआ देखेंगे ॥ ४७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—मुनि जमदग्निके उन वचनोंको सुनकर अपने अन्तर्मनमें अत्यन्त आश्चर्यचकित होते हुए कृतवीर्यके पुत्र वे राजा कार्तवीर्य नदीके अत्यन्त सुन्दर तटपर चले गये। इधर जमदग्निजीने अपनी पत्नी रेणुकाको बुलाकर समस्त वृत्तान्त उसे सुनाया ॥ ४८-४९ ॥ उन दोनोंने कामधेनुको बुलाकर क्षणभर उसकी पूजा की और दोनोंने उससे प्रार्थना की कि हे धेनुके! हमारी लज्जाकी रक्षा करना। हे कल्याणि! हमने असंख्य सेनासे समन्वित राजाको भोजनके लिये निमन्त्रित किया है, अतः सेनासहित उस राजाकी रुचिके अनुसार भोजनकी व्यवस्था होनी चाहिये। आप क्षणभरमें ही वैसी व्यवस्था करें। अन्यथा सत्यकी मर्यादा नष्ट हो

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उ०खं०-अ०७८] * मुनि जमदग्निद्वारा ससैन्य राजा कार्तवीर्यका आतिथ्य * २३३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 जायगी और संसारमें हमारा अपयश भी होगा, अतः आप जैसा ठीक समझें, वैसा करें ॥ ५०-५२ ॥ उन दोनोंके द्वारा इस प्रकार प्रार्थित की गयी कामधेनुने अपने प्रभावके द्वारा एक महान् नगरकी रचना की, जो नाना प्रकारके सुन्दर भवनोंसे सुसज्जित था। वह विविध प्रकारके रत्नमय खम्भोंसे सुशोभित था, वहाँ विविध प्रकारके सभागृह बने थे। नाना प्रकारके पुष्पों तथा लताओंसे समन्वित सुन्दर वाटिकाओं और उपवनोंसे वह सुशोभित था ॥ ५३-५४ ॥ वह नगर विविध प्रकारकी ध्वजा-पताकाओंसे मण्डित था तथा अनेक प्रकारके वाद्योंकी ध्वनियोंसे गुंजित हो रहा था। वह स्वर्णके पात्रोंकी विविध पंक्तियोंसे सुशोभित था। चारों प्रकारके व्यंजनोंसे युक्त विविध प्रकारकी पंक्तियोंसे सुसज्जित था। वह नगर विशाल तोरणद्वारोंसे सुशोभित तथा चारों ओर परिखाके घेरेसे युक्त था ॥ ५५-५६ ॥ उस नगरके रमणीय चबूतरे अनेक दास-दासियोंसे समन्वित थे। वहाँ जहाँ-तहाँ स्थित पुरवासी जन आने- जानेवाले लोगोंको इधर-उधर हटा रहे थे और कह रहे थे कि मुनि जमदग्निकी आज्ञा है कि इससे आगे कोई न जाय ॥ ५७१/२॥ वहाँ चारों ओर असंख्य पात्रोंमें भोजन परोसा गया था। वे पात्र दीपोंके प्रकाशसे प्रकाशित हो रहे थे, उनमें विविध प्रकारके व्यंजन परोसे गये थे। पात्रोंमें सूप, खीर, पक्वान्न तथा पंचामृत रखा हुआ था, वे पात्र खाद्य, लेह्य (चाटनेयोग्य), चोष्य (चूसनेयोग्य) तथा विविध प्रकारके पेय पदार्थोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित थे। सामुद्र लवणसे युक्त पका हुआ नीबू, आम, अमृत फल, बिल्व आदि पदार्थ भी उन पात्रोंमें सजाये गये थे ॥ ५८-६०॥ श्रीकामधेनुके महान् कृपाप्रसादके प्रभावसे अन्न- पात्रोंमें पक्वान्नोंके परोस दिये जानेपर कृतवीर्यके पुत्र राजा कार्तवीर्यको उसकी सेनाके साथ भोजन करानेके लिये मुनि जमदग्निजीने उस समय अपने शिष्योंको बुलवाया ॥ ६१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कार्तवीर्योपाख्यान' नामक सतहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७७ ॥ अठहत्तरवाँ अध्याय मुनि जमदग्निद्वारा ससैन्य राजा कार्तवीर्यका आतिथ्य; कामधेनुका अद्भुत प्रभाव देखकर राजाका बलपूर्वक उसे ग्रहण करनेकी इच्छा करना ब्रह्माजी बोले- मुनि जमदग्निने अपने शिष्योंसे कहा—'तुम लोग नदीके तटपर निवास कर रहे राजा कार्तवीर्यको बुलानेके लिये शीघ्र ही वहाँ जाओ' ॥ १॥ उन शिष्यगणोंने राजाके समीप जाकर और उनके समक्ष उनका अभिवादन स्वीकारकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया और उनसे मुनिकी आज्ञा इस प्रकार निवेदित की-हे राजन्! आप अपनी सेनाके साथ सावधानीपूर्वक भोजनके लिये चलें। षड्रसोंसे समन्वित भोजनके असंख्य पात्र परोसे गये हैं ॥ २-३ ॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर उठकर उस राजाने अपने सभी सैनिकोंको बुलवाया और भलीभाँति स्नान करके राजा कार्तवीर्यने वहाँके लिये प्रस्थान किया ॥ ४ ॥ वहाँ राजाने मुनिके भवनको देखा तो वैसा दृश्य उसने न कभी सुना था और न देखा ही था। उस प्रकारका गृहका तोरण तीनों लोकोंमें उसे नहीं दिखायी दिया था ॥ ५ ॥ मुनि जमदग्निके संकेतकी अभिलाषा करनेवाले तथा हाथमें बेंत धारण करनेवाले द्वारपालोंने राजाको जब आगे जानेसे मना किया तो मुनिके शिष्यगणोंने द्वारपालोंको वैसा करनेसे रोका, तदनन्तर राजा भोजनालयमें गये ॥ ६ ॥ वहाँ जाकर भोजनालयके मध्यमें स्थित होकर राजाने मुनि जमदग्निकी सम्पदाको देखा, उस समय

शीर्षक (Header): २३४ | * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * | [ श्रीगणेशपुराण-


[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

राजाने अपने मनमें सोचा कि ऐसी सम्पदा तो न विष्णुजीके पास है और न ही शंकरजीके पास। संसारका पालन-पोषण करनेवाले विष्णु, संहार करनेवाले भगवान् शिव तथा इस जगत्की सृष्टि करनेवाले ब्रह्माजीके पास भी ऐसी समृद्धि नहीं है। तदनन्तर मुनि जमदग्निने आगे जाकर राजाकी अनुमति प्राप्तकर सभी सैनिकोंको भोजनपात्रोंके पास पंक्तिबद्ध बैठाया और जो भोजनालयसे बाहर भोजन करनेवाले थे, उनके लिये भी भोजनपात्रोंको भिजवाया॥ ७-९॥ आसनोंपर उन सभीके बैठ जानेपर मुनि जमदग्निने राजाको बैठाया। तदनन्तर वाद्यके बजनेपर उन सभीने भोजन किया। इस प्रकारके अन्नों तथा स्वादिष्ट फल- मूलोंको उनके द्वारा पहले कभी नहीं देखा गया था। वे सभी आपसमें ही इस प्रकार पूछने लगे कि 'यह क्या है? यह क्या है?'॥ १०-११॥ सब लोग आश्चर्य करने लगे कि एक पहरमें ही ऐसी सब व्यवस्था मुनिने कैसे कर दी? इच्छापूर्वक सबने भोजन किया और जब वे तृप्त हो गये तो शेष भोजन उन्होंने पात्रोंमें छोड़ दिया॥ १२॥ तदनन्तर मुनिके शिष्योंने प्रत्येक भोजनपात्रके पास हाथ-मुँह धोनेके लिये प्रक्षालनपात्र भी प्रदान किया और दाँतोंमें लगे अन्नकणोंको निकालनेके लिये सुन्दर सींक (शलाका)-भी प्रदान की। शिष्योंने अवशिष्ट अन्नको हाथी, घोड़े तथा बैलोंको प्रदान किया। तदनन्तर वे सभी बिस्तर बिछाये हुए दूसरे घरमें गये, वहाँ उन्होंने ईख, दाख, आम, कटहल तथा दाडिम आदि फलोंका सेवन किया। मुनि जमदग्निद्वारा प्रदत्त इलायची, लौंग, कपूर, खैरके चूर्ण (कत्था) एवं सुपारीसे समन्वित पानके पत्तोंको ग्रहण किया॥ १३-१५१/२॥ इसके पश्चात् मुनिने अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उन सभीको यथायोग्य मूल्यवान् वस्त्र एवं आभूषण प्रदान किये। राजाको तो और भी अधिक मूल्यवान् वस्त्राभूषण प्रदान किये॥ १६१/२॥ मुनि बोले-[हे राजन्!] साक्षात् विष्णुरूपी तथा सभी प्रकारके मनोरथोंसे परिपूर्ण आप राजाके लिये


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

मुझ वनवासी मुनिके द्वारा कौन-सा भोजन देय है। मेरे वचनोंका पालन करते हुए आपने तीनों लोकोंमें मेरे यशकी अभिवृद्धि की है॥ १७-१८॥ लोकमें लोग ऐसा कहेंगे कि मुनि जमदग्निके यहाँ ससैन्य राजा कार्तवीर्यने भोजन किया। अत्यन्त पुण्यशाली व्यक्तिके लिये ही लोकमें 'साधु' शब्दका प्रयोग होता है। यदि कोई महापुरुष क्षुद्र व्यक्तिके वचनानुरोधका पालन करता है, तो वह भी साधुताको प्राप्त करता है और सभी लोकोंमें अत्यन्त उत्कर्षयुक्त विशद यशको प्राप्त करता है। मेरे वचनका परिपालन करनेसे आपका महान् अरिष्ट भी दूर हो गया है॥ १९-२०१/२॥ ब्रह्माजी बोले-महर्षि जमदग्निद्वारा कही गयी इस प्रकारकी वाणीको सुनकर राजा उस समय अपने मनमें अत्यन्त विस्मयको प्राप्त हुए और उन्होंने उनसे पूछा॥ २११/२॥ राजा बोले-हे सुव्रत! यहाँ पहले तो कुछ भी मैंने नहीं देखा था, क्या यह सब मायाके प्रभावसे हुआ है अथवा तपस्याके प्रभावसे हो सका है, इसे मुझे सच- सच बतलाइये॥ २२१/२॥ मुनि बोले-हे राजन्! मैंने कभी पहले परिहासमें भी झूठ नहीं बोला है, अतः मैं आपसे सत्य कहता हूँ कि यह सब कुछ कामधेनुके द्वारा ही किया गया है॥ २३१/२॥ ब्रह्माजी बोले-हे मुने! जिसका भाग्य विपरीत हो जाता है, उसकी बुद्धि भी विपरीत हो जाती है, दुष्ट ग्रहके द्वारा बलपूर्वक अनिष्ट उत्पन्न हो जाता है। अपनी सेना तथा वाहनोंसहित भोजनसे भलीभाँति संतृप्त हो जानेपर भी राजा कार्तवीर्यने कामधेनुको ले जानेका निश्चय किया और वे मुनिसे इस प्रकार कहने लगे॥ २४-२५१/२॥ राजा बोले-मैं समझता हूँ कि शान्त चित्तवाले, कन्दमूल तथा फलका सेवन करनेवाले, मनसे ही सृष्टि तथा संहार करनेकी क्षमता रखनेवाले, प्रत्येक प्रकारकी कामनासे रहित और इन्द्रियोंको सर्वथा जीत लेनेवाले, आप-जैसे ज्ञानीजनोंके लिये इस प्रकारकी गौका कोई प्रयोजन नहीं है॥ २६-२७॥ वनमें प्राप्त वस्तुओं, फल-मूल आदिका और

उ०ख०-अ०७९ ] * जमदग्निद्वारा कामधेनुको देनेसे मना करना * २३५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

वायुमात्रका सेवन करनेवाले, मोक्षकी साधना करनेवाले और निरन्तर वेदके स्वाध्यायमें परायण रहनेवालोंको सम्पत्तिसे क्या प्रयोजन ? शास्त्रोंके अध्यापनमें निरत, धर्मशास्त्रके तत्त्वको जाननेवाले और योगाभ्यासपरायण जनोंका कामधेनुसे क्या प्रयोजन है ? ॥ २८-२९ ॥ महान् पुरुषोंको प्राप्त महान् वस्तु महान् कार्यको सम्पन्न करनेके लिये ही होती है, आप-जैसे अरण्यवासीके पास यह महान् रत्नरूपी गौका विद्यमान रहना उचित नहीं प्रतीत होता ॥ ३० ॥ इसलिये हे ब्रह्मन् ! आप इस कामधेनुको प्रसन्नतापूर्वक मुझे प्रदान कर दें। आप मनमें यह निश्चय कर लीजिये कि मेरे पास रहनेपर भी यह गौ आपकी ही होगी ॥ ३१ ॥ अतः ब्रह्मन् ! मेरी उस मर्यादाकी रक्षा कीजिये, जो मैंने आपके समक्ष रखी है। अन्यथा बलशाली राजाओंके लिये संसारमें ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो दुर्लभ है। अपना राष्ट्र हो अथवा पराया राष्ट्र हो, राजा अपनी चतुरंगिणी सेनाके साथ अपनी मनोभिलषित वस्तु प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३२१/२ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे द्विज ! उस दुर्मति राजा कार्तवीर्यके इन वचनोंको सुनकर महामुनि जमदग्नि क्रोधसे उसी प्रकार अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे, जैसे कि अत्यधिक घीकी आहुति पड़नेपर अग्नि देदीप्यमान हो उठती है। लाल- लाल आँखोंवाले वे ब्राह्मण जमदग्नि उन राजाको अनुशासित करते हुए इस प्रकार बोले - ॥ ३३-३४१/२ ॥ मुनि बोले- हे राजन् ! मैंने तुम्हें सदाचारी, शुद्धचित्त एवं राजा होनेके कारण आदरणीय समझकर ही भोजनके लिये आमन्त्रित किया था, किंतु तुम्हारे हृदयमें बगुलेके समान जो कुटिलता व्याप्त थी, उसे मैं जान न सका। जैसे कोयल छल करके अपने बच्चेका पालन कौवेसे करवाती है, किंतु अन्तमें वह कोयलका बच्चा कौआ होकर भक्ष्य तथा अभक्ष्य सब कुछ खानेमें अनुरक्त हो जाता है, इसी प्रकार मैं भी भूलमें पड़ गया था, जो कि मैंने इस प्रकारके राजाके साथ मित्रता की। ऐसी मैत्री लोकमें न देखी गयी है, 'न सुनी गयी है और न किसीके द्वारा अनुभूत ही की गयी है ॥ ३५-३७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कार्तवीर्योपाख्यान' नामक अठहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७८ ॥

उन्यासीवाँ अध्याय जमदग्निद्वारा कामधेनुको देनेसे मना करनेपर कार्तवीर्यका क्रुद्ध होकर अपने सैनिकोंको युद्धका आदेश देना, इधर कामधेनुद्वारा अनेक वीरोंका प्रादुर्भाव और उनके द्वारा कार्तवीर्यकी सेनाका पराभव, क्रुद्ध कार्तवीर्यद्वारा महर्षि जमदग्निका वध, रेणुकाका कार्तवीर्यको शाप देना

मुनि बोले- [हे राजन् ! ] पहले तो तुमने सज्जनोंके आचरणका अनुपालन करते हुए उपकारका भाव दिखाया, किंतु अब तुम अपने विनाशको बुलाकर कामधेनुको प्राप्त करनेकी इच्छा कर रहे हो ॥ १ ॥ हे नृप ! तुम निश्चित ही भ्रममें हो; क्योंकि जो वस्तु अप्राप्य है, उसकी तुम अभिलाषा कर रहे हो। निश्चित ही तीनों लोकोंको विनष्ट करनेसे जो पाप होता है, वह तुम्हारे सिर लगेगा ॥ २ ॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारके वचनरूपी बाणोंसे विद्ध वह राजा प्रलयाग्निके समान प्रज्वलित हो उठा, और क्रुद्ध होकर अपने मुखसे आग उगलता हुआ परम क्रुद्ध होकर उस समय मुनि जमदग्निसे कहने लगा ॥ ३१/२ ॥ राजा बोला- हे शठ ! किसीके भी मुखसे मैं कटु- वचन नहीं सुन सकता। क्या करूँ, तुम ब्राह्मण हो- ऐसा विचार करके मैं कटु वचनोंको सहन कर रहा हूँ ॥ ४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर उठकर उस राजाने अपने दूतोंको शीघ्र ही आज्ञा देते कहा- 'तुम लोग खूँटेसे बँधी हुई कामधेनुको छुड़ाकर शीघ्र ही मेरे

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२३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] पास ले आओ। उसकी आज्ञासे दूतोंने उस समय [चित्र] कामधेनुको चारों ओरसे घेर लिया ॥ ५-६ ॥ [परंतु] कामधेनुकी फूत्कारमात्रसे वे दूत अपने प्राण गवाँकर स्वर्ग चले गये। अन्य राजदूतोंको उसने अपनी क्रोधाग्निसे भस्म कर डाला। दूसरे वीर उसकी श्वासरूपी वायुके तीव्र वेगसे आकाशमें उड़ गये। उस समय उनके द्वारा सूर्यमण्डल आच्छादित हो जानेके कारण कुछ भी दिखायी नहीं पड़ रहा था ॥ ७-८ ॥ सभी दिशाएँ अन्धकारसे व्याप्त हो गयीं, आकाश भी नहीं दिखायी पड़ रहा था। पृथ्वी हिलने-डुलने लगी, प्रकम्पित होकर वृक्ष गिरने लगे ॥ ९ ॥ सभी सैनिक भयभीत होकर दशों दिशाओंमें भाग उठे। किसीने दूर स्थित होकर चाबुकके आघातसे उस कामधेनुको प्रताड़ित किया। तब वह गौ उड़-उड़कर उस सेनाके पीछे उसी प्रकार दौड़ पड़ी, जैसे कि हाथियोंके समूहपर सिंह और सर्पोंपर गरुड़ टूट पड़ता है ॥ १०-११ ॥ भागते हुए उन वीरोंमें महान् हाहाकार मच गया। तब महान् बलशाली कार्तवीर्यने उनसे कहा—'तुम लोगोंको भयभीत नहीं होना चाहिये। प्रसन्नतापूर्वक मेरे द्वारा शंखध्वनि किये जानेपर वह कामधेनु भयभीत

[दायाँ स्तम्भ] होकर अपने घर वापस लौट जायगी। उसकी सामर्थ्य ही क्या है? तुम लोग मेरे कौतुकको देखो ॥ १२-१३ ॥ तदनन्तर उसने अपना महान् शंख बजाया, जिसके नादसे त्रैलोक्य गूँज उठा। किंतु तब भी वह कामधेनु भयभीत नहीं हुई, तदनन्तर उन सभी राजसेवकोंने लाठियों, लोहेके डण्डोंसे बड़े वेगसे उसे पीटना प्रारम्भ किया। उसके शरीरपर जहाँ-जहाँ प्रहार हुआ उस-उस स्थलसे अनेक वीर उत्पन्न हुए, जो सभी प्रकारके शस्त्रोंसे समन्वित थे और युद्धके लिये सन्नद्ध थे। उस कामधेनुके केशोंसे शक और बर्बर प्रादुर्भूत हो गये ॥ १४-१६ ॥ इसी प्रकार उसके पैरोंसे पटच्चर जातिवाले सैनिक, विविध जातिके यवन तथा अन्य भी सभी वीर उत्पन्न हुए। ऐसे ही कामधेनुसे घोड़े, हाथी तथा रथोंपर सवार अनेक वीरोंके समूह उत्पन्न हुए, उन्होंने भी कार्तवीर्यके सैनिकोंके साथ युद्ध किया ॥ १७-१८ ॥ उनके प्रहारसे राजा कार्तवीर्यके सैनिक भूमिपर गिरने लगे। उसके अन्य सैनिक जैसे रात्रिमें पक्षी वृक्षमें छिप जाते हैं, वैसे ही कामधेनुके सैनिकोंमें मिलकर छिप गये। परस्पर आघातसे सैकड़ों पुरुष घायल होकर गिर पड़े। शस्त्रोंके द्वारा शस्त्रोंके काट दिये जानेपर कुछ वीर मल्लयुद्ध करने लगे ॥ १९-२० ॥ इस प्रकारका भीषण युद्ध छिड़ जानेपर तथा शस्त्रोंके गिर जानेपर यह नहीं पता चल पा रहा था कि कौन अपने पक्षका है और कौन पराये पक्षका ॥ २१ ॥ धूलके द्वारा सूर्यके आच्छादित हो जानेसे वे सैनिक परस्परमें ही एक-दूसरेको मारने लगे। 'मारो-मारो'- ऐसा कहते हुए महान् कोलाहल व्याप्त हो गया ॥ २२ ॥ घोड़ोंकी हिनहिनाहट, हाथियोंके चिंघाड़, सैनिकोंके निनाद, रथोंके नेमिकी ध्वनि, मृदंग, ताल, वेणु और भेरीके शब्दोंसे अत्यधिक कोलाहल हो उठा ॥ २३ ॥ इस प्रकार उस कामधेनुसे आविर्भूत वीरों तथा कार्तवीर्यके रथारोही, अश्वारोही, गजारोही और पैदल सैनिकोंके मध्य अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ, जो भूतों तथा राक्षसोंको भी भय प्रदान करनेवाला था ॥ २४ ॥

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उ०ख०-अ०७९ ] * जमदग्निद्वारा कामधेनुको देनेसे मना करना * २३७ वह युद्ध चील, कौवे आदि पक्षियोंके लिये सुख प्रदान करनेवाला और वीरोंकी पत्नियोंको भय प्रदान करनेवाला था। युद्धमें किसीकी जाँघें टूट गयीं और किसीके सिर कट गये। उस युद्धमें टूटे हुए खड्ग, खेटक, भाले, बाण तथा धनुषों और वीरों एवं रथारूढ़ोंकी तो गिनती ही नहीं की जा सकती थी ॥ २५-२६ ॥ उस समय राजा कार्तवीर्यके जो बचे हुए सैनिक थे, वे भागने लगे और कामधेनु गौके सैनिकोंने हँसकर उन्हें दौड़ाया, किंतु मारा नहीं। उन सैनिकोंने कार्तवीर्यके सैनिकोंकी निन्दा की और कहा- 'मुनि जमदग्निने तुम सबका क्या अनिष्ट किया था? [लगता है,] किसी जन्मान्तरीय दोषके कारण उस समय राजा कार्तवीर्यको दुर्बुद्धि पैदा हो गयी थी' ॥ २७-२८ ॥ इस प्रकार अपनी सम्पूर्ण सेनाके विनष्ट हो जानेपर कृतवीर्यका पुत्र वह राजा कार्तवीर्य युद्धके लिये उठ खड़ा हुआ। उसने अपने हाथोंमें पाँच सौ धनुष तथा पाँच सौ बाण धारण कर लिये ॥ २९ ॥ महान् भुजाओंवाले उस कार्तवीर्यने भूमिपर बायाँ घुटना टेककर बड़े वेगसे धनुषोंकी प्रत्यंचाओंको खींचकर कामधेनुसे उत्पन्न सेनाओंपर बाणोंकी वर्षा की ॥ ३० ॥ किंतु राजाद्वारा की गयी वह बाणोंकी वर्षा उसी प्रकार निष्फल हो गयी, जैसे कि नीतिरहित व्यक्तिका उद्यम विफल हो जाता है और जैसे वन्ध्या स्त्रीका सहवास विफल हो जाता है। उस समय उस राजश्रेष्ठ कार्तवीर्यने बार-बार उतने ही बाणोंको छोड़ा, किंतु कामधेनुसे उत्पन्न एक वीर भी घायल नहीं हुआ ॥ ३१-३२ ॥ अपने बाणोंके विफल हो जानेपर उस समय राजा अत्यन्त संतप्त हो उठा, 'मेरा सामर्थ्य कहाँ चला गया' इस प्रकार चिन्ता करता हुआ वह व्याकुल हो गया ॥ ३३ ॥ 'व्याकुल व्यक्तिपर प्रहार नहीं करना चाहिये'- ऐसा समझकर वे सभी सैनिक स्वर्गलोकको चले गये और कामधेनु भी प्रसन्न हो गयी तथा सोचने लगी कि तुच्छ व्यक्तिके साथ युद्ध करनेसे क्या लाभ? ॥ ३४ ॥ कामधेनुके स्वर्ग चले जानेपर वह राजा कार्तवीर्य मुनि जमदग्निके समीप गया और क्रुद्ध होकर उनसे बोला- 'हे ब्रह्मन्! मैंने तुम्हारा कपट भाव जान लिया है, जिसके हृदयमें छल-कपट हो, उसे ब्राह्मण नहीं समझना चाहिये।' ऐसा कहकर उसने एक बाणके द्वारा मुनिश्रेष्ठ जमदग्निको विद्ध कर डाला ॥ ३५-३६ ॥ उस महान् बाणके हृदयमें लगते ही मुनिने प्राण त्याग दिया। तब मुनिपत्नी रेणुकाने उस राजासे कहा- 'तुमने व्यर्थमें ही ब्रह्महत्या की है' ॥ ३७ ॥ आँखें लाल किये हुए वह राजा क्रोधके आवेशमें होकर उस रेणुकासे बोला- 'अरे मुनिकी प्रिय पत्नी! चुपचाप खड़ी रहो, नहीं तो मैं तुम्हें भी मार डालूँगा' ॥ ३८ ॥ तदनन्तर उस दुष्ट राजा कार्तवीर्यने क्रोध करते हुए इक्कीस बाणोंसे रेणुकापर भी प्रहार किया। उस समय मुनिपत्नीने अपने मनमें मुनि जमदग्निका स्मरण किया ॥ ३९ ॥ तदनन्तर रेणुकाने उस राजासे कहा- 'अरे दुष्ट चाण्डाल! तुमने यह क्या कर डाला? बिना अपराधके हम दोनोंको तुमने क्यों मारा है? तुम्हारा और तुम्हारी भुजाओंका विनाश हो जायगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है' ॥ ४० १/२ ॥ रेणुकाका ऐसा वचन सुनकर वह राजा वापस चला गया। वह अपने थोड़े-से बचे हुए सैनिकोंको लेकर चिन्तामग्न होते हुए अपने नगरको लौट गया। उस समय वह अपने मनमें अपनी ही निन्दा कर रहा था और मरे हुए सैनिकोंके लिये शोक कर रहा था। उत्साहहीन तथा निश्चेष्ट होकर उसने अपने भवनमें प्रवेश किया ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कार्तवीर्योपाख्यानमें' उन्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७९ ॥

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अस्सीवाँ अध्याय

२३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अस्सीवाँ अध्याय माता रेणुकाके स्मरण करनेपर परशुरामका आगमन, माताद्वारा सारा वृत्तान्त जानकर परशुरामका दुखी होना और माताद्वारा प्राप्त इक्कीस बार पृथिवीको क्षत्रियविहीन बनानेकी आज्ञाको स्वीकार करना, परशुरामद्वारा माता-पिताका और्ध्वदैहिक संस्कार करना

ब्रह्माजी बोले—राजा कार्तवीर्यके चले जानेपर मुनिपत्नी रेणुका शोकग्रस्त तथा अत्यन्त विह्वल हो उठी। इस युद्धके उपस्थित होनेपर वे मेरे पुत्र कहाँ चले गये— ऐसा वह कहने लगी॥ १॥ पतिके मृत्युप्राप्त हो जानेपर बाणोंसे आबद्ध मैं इस समय क्या करूँ? मेरा अत्यन्त क्रोधी वह प्रिय पुत्र परशुराम भी न जाने कहाँ चला गया?॥ २॥ उसे देख लेनेपर ही मेरे प्राण देवलोकको जायेंगे। तदनन्तर स्मरणमात्र करनेसे ही उस समय परशुराम माताके पास उपस्थित हो गये॥ ३॥ उन्होंने माताको बाणसमूहोंसे बँधा हुआ तथा पिताको मृत-अवस्थामें देखा, जिन्हें दुष्ट कार्तवीर्यने हृदयमें कठोर बाण मारकर आहत कर दिया था॥ ४॥ परशुराम उस समय मूर्च्छासे उसी प्रकार भूमिपर गिर पड़े, जैसे कि आँधीके द्वारा वृक्ष भूमिपर गिरा दिया जाता है। वे अत्यन्त दुखी होकर अपने माता-पिताके लिये विलाप करने लगे॥ ५॥ परशुराम बोले—आज सभी ओर मुझे अन्धकार दिखायी पड़ रहा है। आज मेरे लिये दसों दिशाएँ शून्य- सी हो गयी हैं। जिस प्रकार पृथ्‍वी सुमेरुपर्वतसे रहित हो जाती है, और जिस प्रकार अमरावतीपुरी देवराज इन्द्रसे रहित हो जाती है, वैसे ही पिताके बिना मेरे लिये आज यह आश्रम सुशोभित नहीं हो रहा है। जिस प्रकार तीनों लोक गंगाके बिना शून्य हो जाते हैं, वैसे ही यह आश्रम-मण्डली भी सूनी-सूनी-सी हो गयी है॥ ६-७॥ माता रेणुकाके बिना यह आश्रम-मण्डली शोभित नहीं हो रही है। अब देवताओंका भय दूर चला गया है और सभी मुनिगण अनाथ हो गये हैं। देवताओंको यह भय था कि ये जमदग्नि तपस्याके प्रभावसे न जाने हमारा क्या ग्रहण कर लेंगे॥ ८॥

इस प्रकारसे उन्होंने बहुत विलाप किया। वे परशुराम उसी प्रकार चेष्टाहीन हो गये, जैसे कि मछली जलके बिना हो जाती है। तदनन्तर रोते हुए वे पुनः माताके समीप चले आये और माताकी गर्दनको गोदमें रख करके उसके शरीरसे बाणोंको निकालने लगे॥ ९-१०॥ माताके दुखसे दुखित हो परशुराम पुनः रुदन करने लगे। तीनों लोकोंको भस्म कर देनेकी क्षमता रखनेवाली मेरी माता आज उस दुष्टके बाणोंसे पीड़ित होकर भूमिपर पड़ी हुई है। [हे मातः!] कुछ समय पूर्वकी बात है, मेरे खेलनेके लिये जानेपर तुम क्षणभर भी मेरा विस्मरण नहीं करती थी, आज वही तुम मुझे छोड़कर कहाँ जानेको उद्यत हो? हे शोभने! तुम मुझे दुग्ध तथा अनेकों वस्त्र, अन्न प्रदान करती थी, सुन्दर-सुन्दर फल- मूलोंको देती थी, आज वही तुम मुझे छोड़कर कहाँ जा रही हो? माता-पितासे हीन मेरे जीवनको आज धिक्कार है!॥ ११-१४॥ ब्रह्माजी बोले—पुत्रके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर माता रेणुका अत्यन्त दुःखमें भर गयीं, उन्होंने पुत्रके आँसू पोंछकर बहुत व्याकुल होते हुए कहा॥ १५॥ [हे पुत्र!] मैं तुम्हारे निकट ही रहूँगी, अतः तुम शोक न करो। अब तुम पूर्वमें घटी हुई घटनाको सुनो। कुछ समय पहलेकी बात है कि कृतवीर्यका पुत्र राजा कार्तवीर्य मध्याह्नकालमें अपनी सेनाके साथ इस आश्रम- मण्डलमें आया। तुम्हारे पिताने उसका बहुत स्वागत- सत्कार किया और सेनासहित उसे भलीभाँति भोजन कराया॥ १६-१७॥ कामधेनुके कृपा-प्रसादसे वैसी व्यवस्था देखकर भोजन करनेके अनन्तर राजाने मुनिसे कामधेनुकी याचना की। मुनिके मौन रहनेपर उसने क्रोध करके कामधेनुको बन्धनसे मुक्त कर दिया॥ १८॥

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उ०ख०-अ०८१ ] * परशुरामका माता-पिताका दाह-संस्कार करना * २३९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सैनिकोंद्वारा स्पर्श हो जानेमात्रसे उस धेनुने अत्यन्त | करना चाहिये। चूँकि उसने मेरी देहमें इक्कीस बाण बलशाली चतुरंगिणी सेनाको उत्पन्न किया। तदनन्तर | मारे हैं, अतः तुम भी इक्कीस बार इस पृथ्वीको राजाके सैनिकोंके साथ कामधेनुके द्वारा उत्पन्न सैनिकोंका | क्षत्रियोंसे विहीन बना दो। हे पुत्र! तुमको मैं एक महान् युद्ध छिड़ गया ॥ १९ ॥ | बात और कहती हूँ, तुम मेरी आज्ञाका पालन करते घायल होकर राजाके वे सैनिक जब भाग उठे तो | हुए अवश्य करो ॥ २३-२४ ॥ स्वयं राजा कार्तवीर्य युद्धके लिये आ डटा। उसने पाँच- | तुम ऐसे स्थानपर हम दोनोंका और्ध्वदैहिक संस्कार पाँच सौ बाणोंको कई बार छोड़ा ॥ २० ॥ | करो, जहाँपर किसीका दाहसंस्कार न हुआ हो। उसके जब वह भी पराजित हो गया तो वह घरकी | बाद तुम सर्वज्ञ मुनिश्रेष्ठ दत्तात्रेयजीको बुलाकर उनसे ओर लौट चला। कामधेनु भी स्वर्गको चली गयी। | त्रयोदशाहपर्यन्त हम दोनोंके और्ध्वदैहिक कर्म कराओ। पुनः आकर उस दुष्टने एक बाणसे तुम्हारे पिताके | उन दत्तात्रेयमुनिके समान कोई वक्ता नहीं है, तभी हम वक्षःस्थलपर प्रहार करके उन्हें मार डाला और इक्कीस | दोनों सद्गतिको प्राप्त करेंगे ॥ २५-२६ ॥ बाणोंद्वारा मुझ निरपराधको विद्ध करके वह दुष्ट | इतना कहकर रेणुका अपने शरीरको छोड़कर दुर्गम वापस चला गया ॥ २१-२२ ॥ | [परम] धामको प्राप्त हुईं। तब महामना परशुरामने इसलिये आज तुम्हें उस दुष्टका शीघ्र ही विनाश | माताकी आज्ञाके अनुसार ही सभी कर्मोंको किया ॥ २७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'परशुरामोपाख्यानमें' अस्सीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८० ॥ इक्यासीवाँ अध्याय परशुरामका माता-पिताका दाह-संस्कार करके महर्षि दत्तात्रेयजीको आमन्त्रित करने उनके आश्रमपर जाना और अपने आगमनका प्रयोजन बताना, तदनन्तर दोनोंका वापस आश्रमपर आना, दत्तात्रेयजीके निर्देशानुसार परशुरामद्वारा त्रयोदशाहपर्यन्त अपने माता-पिताका और्ध्वदैहिक संस्कार सम्पन्न करना और पिता-माताकी सद्गति ब्रह्माजी बोले-परशुरामजीने मुण्डन कराकर | परशुरामजीने उन मुनिश्रेष्ठके पास जाकर उन्हें प्रणाम भलीभाँति विधि-विधानसे स्नान किया, तदनन्तर उन्होंने | किया। परशुरामजी आधे पहरतक हाथ जोड़े हुए उनके ब्राह्मणोंके कथनानुसार उत्थान श्राद्ध* (मृतिस्थानपर किया | समक्ष स्थित रहे। सर्वज्ञ मुनि दत्तात्रेयने उनके आगमनके जानेवाला श्राद्ध) किया। तत्पश्चात् विश्रामस्थानपर किये | प्रयोजनको भलीभाँति जान लेनेपर भी परशुरामजीको जानेवाले श्राद्धसे लेकर चितादाहतकके सभी श्राद्धोंको | अपने समीप बुलाकर कहा- 'यद्यपि मैं तुम्हारे आगमनका किया और मन्त्रपूर्वक दोनोंको मुखाग्नि दी। तदनन्तर शीघ्र | प्रयोजन जान चुका हूँ, तथापि मैं पूछता हूँ, कि तुम किस ही वे दत्तात्रेयमुनिके पास गये ॥ १-२ ॥ | कारणसे यहाँ आये हो ?' ॥ ३-५ ॥ ध्यानपूर्वक उन्होंने देखा कि दत्तात्रेयजी कुत्सित | ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर परशुरामजीने प्रारम्भसे वेश धारण करके शिष्योंके साथ बैठे हैं, उन्होंने हाथमें | लेकर अन्ततकका सम्पूर्ण वृत्तान्त उन्हें स्पष्टरूपसे बता कुत्तेको पकड़ रखा है, वे मलिन तथा कृशकाय हैं, तब | दिया ॥ ५ १/२ ॥

  • 'मृतस्योत्क्रान्तिसमयात् षट्पिण्डान् क्रमशो ददेत्'-पिण्डदानके छः स्थान इस प्रकार हैं-१-मृतस्थान, २-द्वारदेश, ३-चत्वर (चौराहा), ४- विश्रामस्थान, ५-काष्ठचयन तथा ६-अस्थिसंचयन। मृतस्थाने तथा द्वारे चत्वरे तार्क्ष्य कारणात् ॥ विश्रामे काष्ठचयने तथा सञ्चयने च षट् । (ग० पु०, प्रेतखण्ड १५ । ३०-३१)

२४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

उ०ख०-अ०८२] * परशुरामजीको माता रेणुकाद्वारा कार्तवीर्य-विजयका उपाय बतलाना * २४१

पुत्रस्नेहके वशीभूत होकर आ गयीं। यदि परशुरामजीके द्वारा द्वादशाहके बाद अर्थात् सपिण्डीकरणके बाद उनका आवाहन किया गया होता, तो वे सम्पूर्ण अवयवोंसे सुशोभित होकर उपस्थित होतीं। माता उनसे बोलीं—हे वत्स! मुझे किस कारणसे बुलाया, प्रयोजन बतलाओ ? पुत्रस्नेहके वशीभूत हो उनके स्तनोंसे दूध टपकने लगा। उन्होंने उन्हें गले लगाया ॥ २४-२५१/२॥ छठे दिन मुनि दत्तात्रेयजी पुनः वहाँ आये और उन्होंने उस अवस्थामें अर्थात् अपूर्ण गात्रवाली उन रेणुकाको देखा तो वे परशुरामसे बोले—'तुमने दशगात्रके बीचमें ही अपनी माताको क्यों बुलाया, ये असम्पूर्ण गात्रवाली होकर आ गयी हैं ॥ २६-२७ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! यदि सपिण्डीकरण श्राद्ध अर्थात् द्वादशाहके बाद बुलाया होता तो तुम्हारे स्नेहके वशीभूत हो ये रेणुका पूर्ण शरीरवाली होकर आतीं' ॥ २८ ॥ परशुराम बोले—हे ब्रह्मन्! मैंने भयभीत होकर बालभावसे स्वभाववश 'हे मातः' इस प्रकारसे पुकारा था, तब हे मुनिश्रेष्ठ ! मैंने इन्हें इस अवस्थामें देखा ॥ २९ ॥ परशुरामजीने एकादशाहके दिन वृषोत्सर्ग किया तथा बारहवें दिन माता-पिता दोनोंका सपिण्डीकरण श्राद्ध किया। तदनन्तर दूसरे दिन अर्थात् त्रयोदशाह श्राद्धको पाथेय अर्थात् वर्षाशन प्रदानकर ब्राह्मणोंद्वारा पुण्याहवाचन कराया और ब्राह्मणोंको यथायोग्य अनेक प्रकारके दान प्रदान किये ॥ ३०-३१ ॥ उनके पिता जमदग्नि (श्राद्धसे संतृप्त होकर) दिव्य देह धारणकर ब्रह्मलोकको गये और माता रेणुका उसी रूपमें पृथ्वीपर अनेक स्थानोंपर स्थित हो गयीं ॥ ३२ ॥ जो लोग श्रद्धा-भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करते हैं, वे उन लोगोंके सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण कर देती हैं। हे मुनिश्रेष्ठ ! इन रेणुकाजीका विशेष माहात्म्य स्कन्दपुराणमें विस्तारपूर्वक कहा गया है। अत्यन्त विस्तारके भयसे उसे मैंने यहाँ नहीं बतलाया ॥ ३३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें रामोपाख्यानमें इक्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८१ ॥


बयासीवाँ अध्याय

परशुरामजीद्वारा पूछे जानेपर माता रेणुकाद्वारा उन्हें कार्तवीर्य-विजयका उपाय बतलाना, परशुरामद्वारा महादेवजीकी आराधनासे उन्हें गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका उपदेश प्राप्त होना, मन्त्रजपसे गणेशजीका उन्हें दर्शन देना, गणेशजीका उन्हें अपना परशु प्रदान करना और परशुराम नामकी प्रसिद्धि, परशुरामद्वारा कार्तवीर्यका वध तथा इक्कीस बार पृथिवीको क्षत्रियविहीन बनाना

व्यासजी बोले—[हे ब्रह्मन्!] परशुरामजीने बालक होते हुए भी हजार हाथोंवाले तथा बहुत विशाल सेनावाले कृतवीर्यके पुत्र कार्तवीर्यके साथ अकेले ही कैसे युद्ध किया और उस महापराक्रमशालीपर कैसे विजय प्राप्त की, उसे आप मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइये ॥ १ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—एक दिनकी बात है, परशुरामजीने अपनी माता रेणुकासे पूछा—॥ २ ॥ परशुराम बोले—हे मातः! जिस कार्तवीर्यके डरसे इन्द्र आदि देवता भी भयभीत होकर काँप उठते हैं, जिसके पास असंख्य मात्रामें चतुरंगिणी सेना है, उसपर मैं किस प्रकार विजय प्राप्त कर सकूँगा, आप मुझे वह उपाय विस्तारपूर्वक बतलाइये। मैं किस प्रकार इक्कीस बार इस धराको क्षत्रियहीन बना सकूँगा, उसे भी बतलाइये। आपके कृपा-प्रसादसे निश्चित ही मेरी विजय होगी और सभी लोकोंमें मेरी अतुलनीय कीर्तिका विस्तार होगा ॥ ३-५ ॥ माता बोली—हे पुत्र! तुम्हारी विजय अवश्य होगी, तुम भगवान् शंकरकी आराधना करो। उन महादेवजीके सन्तुष्ट हो जानेपर सभी मनोकामनाओंकी पूर्ति हो जायगी ॥ ६ ॥