भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

३१४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

इसमें भी आपको अनिष्ट प्रतीत हो रहा है। विधाताके द्वारा रची घटनाका कोई भी उल्लंघन नहीं कर सकता और न उससे कुछ अन्यथा ही कर सकता है ॥ ३१ ॥ हे राजन्! उस बालकको आप मुझे दिखलायें, मैं उसके लक्षण बताऊँगा। तब राजाने सभी बालकोंको बुलवाया। सबसे पहले विनायक पहुँचे, उनके पीछे अन्य सभी बालक भी दौड़ते हुए आ पहुँचे। बालक विनायकने उस ज्योतिषीको प्रणाम किया और पूछा आप कहाँसे आये हैं? ॥ ३२-३३ ॥ आप सामुद्रिकशास्त्रके अनुसार शरीरके लक्षणोंको जानते हैं, ज्योतिःशास्त्रमें पारंगत हैं तथा भूत, भविष्य एवं वर्तमानकी सभी बातोंके जाननेवाले हैं, आप मेरे भाग्यका फल बताइये ॥ ३४ ॥ ब्रह्माजी बोले— तदनन्तर उस कपटी ब्राह्मणने बालक विनायककी बातोंको धैर्यपूर्वक सुनकर मनमें यह विचार किया कि मेरे कल्याणका रास्ता कौन-सा है? इसने तो अनेक रूप धारण करनेवाले बहुत-से बलवान् दुष्टोंको मार डाला है। तब उस ज्योतिषीने बालक विनायकका हाथ पकड़कर शुभ तथा अशुभ फल बताना प्रारम्भ किया ॥ ३५-३६ ॥ आजसे चार दिनके बाद तुम कुएँमें गिर पड़ोगे, कदाचित् वहाँसे बचकर निकल आओगे, तो तुम समुद्रमें डूब जाओगे। वहाँसे भी अगर बच निकलोगे तो अन्धकारपूर्ण किसी गहन गड्ढेमें गिर पड़ोगे। अगर वहाँसे बच गये तो तुम्हारे ऊपर कोई पर्वत गिर पड़ेगा ॥ ३७-३८ ॥ फिर भी अगर तुम बच जाओगे तो दो बहुत विशाल कालपुरुष तुम्हें खा जायेंगे। इस प्रकारके अरिष्ट तुम्हारे लिये होनेवाले हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। अब मैं तुम्हें इन अरिष्टोंके निवारणका उपाय भी बताता हूँ। निर्भय रहनेके लिये इस उपायको करो। यहाँसे कहीं अन्यत्र चलकर मेरे साथ चार दिन रहो ॥ ३९-४० ॥ मैं तुम्हारे चरणकमलोंकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हें पुनः यहाँ ले आऊँगा। बालक विनायक ज्योतिषीकी बात सुनकर धीरे-से घरके अन्दर प्रविष्ट हो गये। तदुपरान्त बालक विनायकने शीघ्र ही राजाके हाथसे रत्ननिर्मित अँगूठी लेकर उसे अपने हाथमें छिपाकर उस द्विजसे कहा— ॥ ४१-४२ ॥ अरे ज्योतिषी ! शीघ्र आप बतायें कि हमारी कौन- सी वस्तु खो गयी है, किसने उसे लिया है और वह पुनः कब प्राप्त होगी? आपके सत्य-सत्य बतानेपर ही आपकी बातोंपर विश्वास होगा ॥ ४३ ॥ बालक विनायकद्वारा इस प्रकार कहा गया वह ज्योतिषी विचार करके लोगोंकी सभामें मुसकराकर इस प्रकार बोला— 'यदि वह अँगूठी मिल जाती है तो मुझे ही देनी होगी, तभी मैं उसके विषयमें बता सकता हूँ।' बालक विनायकके द्वारा 'ठीक है, ऐसा ही होगा' कहनेपर वह बोला— 'वह अँगूठी तुम्हारे ही हाथके अन्दर है'। उस छद्मवेषधारी ज्योतिषीके द्वारा ऐसा कहे जानेपर बालक विनायकने उस अभिमन्त्रित अँगूठीसे तत्काल ही उसके हृदयमें आघात किया ॥ ४४-४६ ॥ उस अँगूठीके प्रहारसे वह गणक उसी प्रकार छिन्न-भिन्न हृदयवाला हो गया, जैसे कि वज्रके प्रहारसे पर्वत विदीर्ण हो जाता है। वह गणक पृथ्वीको अत्यन्त कँपाते हुए भूतलपर गिर पड़ा ॥ ४७ ॥ गिरते हुए उसके शरीरसे नगरका कुछ हिस्सा भी चूर-चूर हो गया। उस समय काशिराजके साथ ही सभी लोग भी अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गये ॥ ४८ ॥ सभी देवता अत्यन्त हर्षित हो उठे और फूलोंकी वर्षा करने लगे। उस समय स्वर्गलोक तथा भूलोकमें बजाये जानेवाले वाद्योंके निर्घोषसे आकाश तथा पृथ्वीमण्डल प्रतिध्वनित हो उठा ॥ ४९ ॥ लोग कहने लगे— इस बालक विनायकने यह कैसे जान लिया कि यह तो अत्यन्त दुष्ट दैत्य है, जो ब्राह्मणका वेष धारणकर आया है, दैवयोगसे यह अच्छा हुआ कि राजाने भी उस दुरात्माकी बात नहीं मानी ॥ ५० ॥ इसे सामान्य बालक नहीं समझना चाहिये। पृथ्वीके भारको हलका करनेके लिये कोई करुणासागर देवता ही महर्षि कश्यपके घरमें अवतीर्ण हुआ है ॥ ५१ ॥ केवल अँगूठीके प्रहारसे इसने इस बलवान्‌के प्राण

क्री०ख०-अ०१९ ] * विनायककी बाललीलाके प्रसंग * ३१५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 किस प्रकार हरण कर लिये ? ऐसा कहकर उन सभीने | अनेक वस्तुएँ समर्पित कीं ॥ ५३॥ बालक विनायकका पूजन किया, उन्हें प्रणाम किया, | तदनन्तर राजाने नागरिकोंका सम्मानकर उन्हें विदाकर उनकी स्तुति की और वे उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ ५२॥ | सभाका विसर्जन किया। बालक विनायक भी पहलेके कमललोचन काशिराजने ब्राह्मणोंको विविध दान | समान ही सामान्य बालक बनकर अन्य बालकोंके साथ दिये और अन्य द्विजों, चारणों, बन्दीजनों तथा दीनोंको | खेलने चले गये ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'कपटी दैत्यके वधका वर्णन' नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८॥ उन्नीसवाँ अध्याय विनायककी बाललीलाके प्रसंगमें दैत्य नरान्तकद्वारा दो दैत्यों कूप तथा कन्दरको काशीनगरीमें भेजना, कूपका कुआँ और मेढक बनकर तथा कन्दरका बालक बनकर विनायकको मारनेका प्रयत्न करना, विनायकद्वारा लीलापूर्वक दोनोंका परस्पर वध कराना ब्रह्माजी बोले-महादैत्य नरान्तकने बालक | कूप नामक असुरने काशिराजके आँगनमें एक विशाल विनायकके द्वारा ब्राह्मणका वेष धारण किये हुए | कुएँका रूप धारण कर लिया और कन्दर नामक असुर ज्योतिषी असुरके वधका समाचार सुनकर कूपक नामक | छोटा बालक बन गया और बालकोंके साथ खेलनेकी असुर तथा ब्रह्माके द्वारा वर प्राप्त किये हुए पराक्रमी | इच्छा करने लगा ॥ ७-८॥ कन्दरासुरको बहुत-से वस्त्र तथा विविध प्रकारके | काशिराजने जब अत्यन्त निर्मल जलवाले उस रत्नोंकी भेंट देकर काशिराजके नगरमें भेजा ॥ १-२॥ | कुएँको देखा तो वे बड़े प्रसन्न हो गये। फिर उन्होंने दैत्य नरान्तक बोला-तुम दोनों शीघ्र ही शुभ | कुएँके अन्दर झाँका तो उन्हें वहाँ एक मेढक दिखायी मुहूर्तमें उस बालक विनायकके वधके लिये जाओ। | दिया। वह मेढक सुन्दर वाणीमें ध्वनि कर रहा था। उसके द्वारा विविध उपायोंसे मारे गये असुरोंका तुम लोग | उसका वर्ण पीला था और वह देखनेमें अत्यन्त भयानक बलपूर्वक बदला लो ॥ ३॥ | था। इधर बालकोंके बीचमें स्थित, बालक बने कन्दर ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार उससे आज्ञाप्राप्त वे | नामक असुरने उन विनायकसे कहा- ॥ ९-१०॥ दोनों कूप और कन्दर नामक असुर चतुरंगिणी सेना | हे महाबाहो ! बाहर चलो, और उस सुन्दर कुएँको लेकर दो कोशकी दूरीपर चले गये ॥ ४ ॥ | देखो। तब उसी समय उन्होंने बालकोंके साथ बाहर पुनः वहाँसे सेनाको लौटाकर बड़ी प्रसन्नताके साथ | आकर उस कुएँको देखा। उस अत्यन्त रमणीय कुएँको वे आगे बढ़े। दोनों मार्गमें विचार करने लगे, तदनन्तर | देखकर बालक विनायक अन्य बालकोंके साथ विविध कूपने कन्दरसे कहा- 'मैं कुआँ बन जाऊँगा और तुम | भावोंके प्रदर्शनका खेल तथा छुपने और पकड़नेका खेल बालक बन जाना, तब तुम खेलते-खेलते उस विनायकको | खेलने लगे ॥ ११-१२ ॥ प्रयत्न करके मेरे अन्दर अर्थात् कुएँमें ढकेल देना। मैं | मध्याह्नकालमें वे सभी बालक जलके अन्दर मेढक बनकर तत्क्षण ही उसे खा जाऊँगा ॥ ५-६॥ | उतरकर आपसमें जल-फेंकनेकी क्रीडा करने लगे, फिर इस बहुत बड़े कार्यको करके हम दोनों अन्तर्धान | वे जलमें डुबकी लगाने, फिर बाहर निकलने तथा हो जायँगे।' इस प्रकारका मनमें निश्चय करके वे | दूसरेको डुबकी लगवाने और बाहर निकालनेका खेल काशिराजके महान् नगर काशीमें पहुँचे। वहाँ पहुँचकर | खेलने लगे ॥ १३ ॥

३१६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 वे दूरसे दौड़ते हुए आकर छलाँग लगाते हुए | सकता है', इसपर राजा बोले कि 'निश्चित ही जो कोई जलमें कूदने लगे, वहाँपर इस प्रकारके खेल खेलकर वे | जो कुछ भी माँगेगा, उसे वह अवश्य ही दिया जायगा, सभी बालक अपने-अपने घर जानेके लिये तैयार | इतना ही नहीं मैं अपना जीवन भी दे दूँगा ॥ २४-२५ ॥ हुए ॥ १४ ॥ | आप लोग इस बालकको पूरा बल लगाकर उसी समय बालक विनायकने जलके अन्दर अपनी | वेगपूर्वक बाहर निकालिये।' राजाके द्वारा कहे गये इस परछायीं देखी। वे तैरना जानते हुए भी जलमें तैरते हुए | प्रकारके वचनोंको सुनकर तीन व्यक्ति कुएँके अन्दर सभी बालकोंको देखते हुए बाहर ही खड़े रहे। इसी | प्रविष्ट हो गये। वे तीनों दैत्यद्वारा की गयी मायाके बीच दुष्ट असुर कन्दरने उन्हें जलके अन्दर ढकेल | प्रभावसे जलमें डूब गये। यह देखकर अन्य किसीने उस दिया। उस जलको अगाध जानकर वे लीलापूर्वक | कुएँमें जानेका मन नहीं बनाया। तब राजा बालक जलका आलोडन करने लगे। वे आधे मुहूर्ततक जलके | विनायकके लिये शोक करने लगे ॥ २६-२७ ॥ अन्दर रहते और फिर आधे मुहूर्ततक जलके बाहर | राजा बोले—मैंने ऐसा कौन-सा दुष्कर्म किया रहते ॥ १५-१७ ॥ | था, जिससे कि मुझे इस प्रकारका दुःख भोगना पड़ रहा तदनन्तर वे जलमें डूबनेकी लीला करने लगे और | है। इस बालकको मैं अपने सुखके लिये क्यों लाया, यह एक सामान्य शिशुकी भाँति डूबनेसे बचनेके लिये पैरों | तो दुःखदायी हो गया है ॥ २८ ॥ तथा करकमलोंको बार-बार इधर-उधर फेंकने लगे ॥ १८ ॥ | मैं उसके माता-पिताको तथा लोगोंको अब अपना यह देखकर सभी बालक इधर-उधर भाग-दौड़ | मुख कैसे दिखलाऊँगा, इस (कलंक)-का परिमार्जन करने लगे। तभी बालक विनायकने उस असुर कन्दरके | कैसे हो सकता है? इस बालकने तो अभीतकके आये पैरोंको दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और वे प्रयत्नपूर्वक उसे | हुए अतिप्रबल अरिष्टोंको दूर कर दिया था, फिर आज उस कुएँके अन्दरतक खींच ले गये। बालक विनायकने | यह किस प्रकार इस अरिष्टके वशीभूत हो गया ! उस असुर कन्दरको बलपूर्वक पानीके अन्दर डुबोया तो | विधाताकी चेष्टाको जाना नहीं जा सकता ॥ २९-३० ॥ वह 'छोड़ो-छोड़ो' ऐसा कहने लगा। विनायकने भी | सभी स्त्री, बाल, वृद्ध जब इस प्रकार शोक कर उससे कहा- 'तुम भी मुझे छोड़ो-छोड़ो' ॥ १९-२० ॥ | ही रहे थे कि उसी बीच कुएँके अन्दर स्थित मेढकका वे दोनों समान बलवाले थे, कभी डूबते थे तो कभी | रूप धारण किया हुआ वह दैत्य अपना मुख खोलकर ऊपर आ जाते थे। हिरण्यकशिपु तथा भगवान् लक्ष्मीनृसिंहके | वहीं स्थित हो गया। उसी समय जब वे बालक विनायक समान ही दोनों अपराजेय थे। बहुत समयतक असुर तथा | ऊपर आये तो दैत्य कन्दरने उन्हें धक्का देकर फिर कुएँमें बालक विनायक दोनों उस कुएँके अन्दर ही रह गये तो | गिरा दिया, बालक विनायकने भी कन्दरको धक्का देकर यह देखकर सभी बालक आर्त स्वरमें रोने लगे और | कुएँमें गिरा दिया, वह दुष्ट कन्दर सीधे जाकर उस कूप कहने लगे कि बालक विनायककी मृत्यु हो गयी है। उस | नामक दैत्यके मुखके अन्दर गिरा ॥ ३१-३२ ॥ प्रकारके अपशकुनके शब्दको सुनकर नगरकी स्त्रियाँ, वृद्ध | कूप नामक दैत्यने उस कन्दरको उसी प्रकार निगल तथा बालक वहाँ आ पहुँचे। काशिराज भी विलाप करने | लिया, जैसे एक बड़ा मत्स्य छोटे मत्स्यको निगल जाता लगे और बोले- 'अब क्या किया जाय?' ॥ २१-२३ ॥ | है। मैंने बालक विनायकको निगल लिया है, ऐसा कोई कहने लगा- 'अगाध जलवाले कुएँमें वह | समझकर उस कुएँका रूप धारण किये कूप नामक बालक विनायक जीवित कैसे रहेगा? दूसरा कहने लगा | असुरने अपना वास्तविक रूप प्रकट कर लिया ॥ ३३ ॥ कि यदि इसे शीघ्र ही जलसे बाहर निकाल लिया जाय | तदनन्तर वह कूप नामक असुर अपने यशसे अर्जित तो, इसके बचनेका निश्चित ही कोई उपाय किया जा | गगनचुम्बी आत्मप्रशंसाका स्वयं गान करने लगा कि

क्री०ख०-अ०२० ] * बालक विनायककी बाललीलाके सन्दर्भमें दैत्योंके वधका वर्णन * ३१७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

आज मैं सभी दैत्योंके ऋणसे उऋण हो गया हूँ ॥ ३४ ॥ इसके साथ ही बालक विनायकको बलहीन भी मानकर वह मन-ही-मन प्रसन्नतासे भर उठा। उसी समय कन्दर नामक असुर अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस कूपके विशाल उदरको चीरकर बाहर निकल आया। यह देखकर बालक विनायक शीघ्र ही क्षणभरमें अन्तर्हित हो गये। मेरा उदर इसने फाड़ डाला, यह समझकर कूपने भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर उसके गलेमें तबतक काटा, जबतक उसके प्राण नहीं निकल गये, इस प्रकार आपसमें ही अत्यन्त व्याकुल होकर एक-दूसरेका वध कर देनेसे वे दोनों दैत्य भूमिपर गिर पड़े ॥ ३५-३७ ॥ उन दोनोंके परस्पर हाथ तथा पैरोंके मसलनेसे काशी नगरीका कितना ही हिस्सा चूर-चूर हो गया। जिस प्रकार सुन्द और उपसुन्द दोनों दैत्य आपसमें ही युद्ध करते हुए मर गये थे, वैसे ही वे कूप तथा कन्दर नामक असुर भी परस्पर युद्ध करते हुए मृत्युको प्राप्त हुए, राजसेवकोंने मरे हुए उन दोनों असुरोंको खींचकर नगरसे बाहर फेंक दिया ॥ ३८-३९ ॥ उसी क्षण राजाके प्रांगणमें स्थित वह कुआँ विलीन हो गया और लोगोंने देखा कि बालक विनायक सभी बालकोंके साथ पूर्ववत् क्रीडा कर रहे हैं ॥ ४० ॥ उस समय सभी बालक, राजा तथा अन्य सभी लोग आश्चर्यान्वित हो गये। कुछ लोग आपसमें कहने लगे कि जो कपटपूर्ण व्यवहार करता है, वह निःसन्देह स्वयं भी उसी प्रकार समूल विनष्ट हो जाता है, जैसे दीपक बुझानेके लिये आया हुआ पतिंगा स्वयं भस्म हो जाता है ॥ ४१-४२ ॥ साक्षात् काल भी इस बालक विनायकके एक रोमको भी हिलानेमें समर्थ नहीं है, इस अवतारी पुरुषके सामर्थ्यको हम लोगोंने भलीभाँति परख लिया है। कामदेव भगवान् शंकरपर विजय प्राप्त करने गया, लेकिन स्वयं ही भस्म हो गया। ये सब बातें सुनकर काशिराज भी कहने लगे कि यह सत्य है, सत्य है ॥ ४३-४४ ॥ तदनन्तर काशिराजने ब्राह्मणोंको दान दिया और उनकी पूजाकर उन्हें विदा किया। बालक विनायकको प्रणाम करके सभी लोग अपने-अपने घरोंको गये ॥ ४५ ॥ कुछ लोग काशिराजद्वारा भलीभाँति पूजित उस बालक विनायकका आलिंगनकर अपने घरोंको गये। उस समय देवता पुष्प बरसाने लगे तथा लोग विनायककी स्तुति करने लगे ॥ ४६ ॥ ब्रह्माजी बोले-हे ब्रह्मन् व्यासजी ! हे मुने ! इस प्रकार यह निश्चित होता है कि कर्तव्य और अकर्तव्य, वायुका वेग, मायाका स्वरूप, पुरुषका भाग्य तथा राक्षसका आचरण-ठीकसे जाना नहीं जा सकता है, ऐसे ही परमात्माके अवतारके गुणोंको भी जाना नहीं जा सकता है ॥ ४७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'कूप और कन्दरके वधका वर्णन' नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १९ ॥


बीसवाँ अध्याय बालक विनायककी बाललीलाके सन्दर्भमें विनायकद्वारा अम्भासुर आदि तीन दैत्योंके वधका वर्णन

व्यासजी बोले-हे चतुर्मुख ब्रह्माजी ! हे ब्रह्मन् ! हे भगवन् ! काशिराजके घरमें उनके पुत्रका विवाह कब सम्पन्न हुआ, उसे आप मुझे विस्तारसे बतलाइये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले-एक अरिष्ट जबतक विनष्ट होता, तबतक दूसरा अरिष्ट पुनः आ पहुँचता, काशिराज जबतक यह सोचते कि इस अरिष्टके दूर होनेपर पुत्रका विवाह करूँगा, तबतक दूसरा अरिष्ट आ उपस्थित होता। कूप तथा कन्दर नामक असुरोंका वध हो जानेपर तीन अन्य राक्षस आ उपस्थित हुए, जिनके नाम थे—अन्धक, अम्भासुर और तुंग। ये तीनों ही देखनेमें अत्यन्त क्रूर थे। ये तीनों

३१८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] बालक विनायकके वधकी इच्छासे आये थे। तब [विनायकके साथ उनका] युद्ध हुआ। उनके युद्धका समाचार सुनकर ब्रह्मा आदि देवता भी भाग गये थे॥ २-४॥ उन राक्षसोंने दिशाओंके हाथियोंका भी मर्दन कर दिया था, फिर देवताओंकी क्या बात! कश्यपका वह पुत्र कब हमें दिखायी देगा, उसे हम अनेक प्रकारसे मार डालेंगे। ऐसा निश्चितकर वे राक्षस आये थे। अभीतक जितने भी वीर उसके वधके लिये भेजे गये, सभी मृत्युको प्राप्त हुए हैं, लेकिन हम इसे मार डालेंगे, उसे जीते बिना हम अपने घर वापस नहीं लौटेंगे। हम लोग अग्निका स्वरूप धारणकर कश्यपमुनिके इस पुत्रको मार डालेंगे ॥ ५-७॥ उस समय अन्धक बोला—'मैं सम्पूर्ण दिशाओं तथा आकाशको अन्धकारसे व्याप्तकर पृथ्वीमें भी सर्वत्र अन्धकार-ही-अन्धकार कर दूँगा। तब लोगोंको परस्परमें एक-दूसरा कोई भी दिखायी नहीं देगा' ॥ ८ १/२ ॥ तदनन्तर अम्भासुर बोला—'मैं उस काशिराजकी नगरीसहित सम्पूर्ण पृथ्वीको जलसे आप्लावित कर दूँगा। तब कोई भी इधर-से-उधर नहीं जा सकेगा' ॥ ९ १/२ ॥ तुंग बोला—'मैं बहुत ऊँचा पर्वत बनकर उस काशीनगरीको पीसकर उसी प्रकार चूर्ण-चूर्ण कर डालूँगा जैसे कि पूर्वकालमें पंखयुक्त पर्वत [ग्राम- नगरादिको] चूर-चूर कर डालते थे ॥ १० १/२ ॥ सर्वत्र अन्धकार हो जाने, जल भर जाने, अग्निके व्याप्त हो जाने तथा पर्वतोंके छा जानेसे कोई भी बाहर जानेमें समर्थ नहीं हो सकेगा, तो फिर वह बालक कैसे बाहर चला जायगा ?' इस प्रकारका विचार निश्चित करके वे तीनों अत्यन्त जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ११-१२॥ उनकी गर्जनाकी ध्वनिसे तीनों लोक काँप उठे। क्षुब्ध हो उठे जलवाले समुद्रोंने अपने तटका अतिक्रमण प्रारम्भ कर दिया। तदनन्तर सूर्यको आच्छादित करके असुर अन्धक वहाँ स्थित हो गया। महान् घोर अन्धकारके छा जानेसे कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था ॥ १३-१४॥ अकस्मात् असमयमें रात हो गयी। जो लोग व्यापार आदि कर्मोंमें लगे थे, स्नान कर रहे थे, जपमें संलग्न थे, हवन कर रहे थे, तपस्या कर रहे

[दायाँ स्तम्भ] थे, वेदोंका स्वाध्याय कर रहे थे, विवाह, उपनयन आदि संस्कारोंको सम्पन्न कर रहे थे, भगवन्नामसंकीर्तनमें तल्लीन थे, पुराणोंका पाठ कर रहे थे, ब्राह्मणों तथा देवोंका पूजन आदि कर्म सम्पन्न कर रहे थे और नाना प्रकारके कर्मोंको कर रहे थे तथा व्रत आदिके अनुष्ठानमें लगे थे, उन्होंने यह देखा कि रात हो गयी है, वे लोग कहने लगे कि क्या विन्ध्यपर्वतने सूर्यमण्डलको रोक दिया है ? अथवा प्रलय होनेवाला है या सूर्यग्रहण लग गया है? ऐसी ही बातें सभामें विराजमान राजासे पण्डितोंने भी कहीं ॥ १५-१८॥ जबतक वे लोग इस प्रकारका विचार कर ही रहे थे कि गायें अपने-अपने घरोंको लौट आयीं। अकल्पित समयमें ही लोगोंने अपने-अपने घरोंमें (सान्ध्य) दीप जला दिये ॥ १९ ॥ अभी सूर्यास्त कैसे हो गया, न तो भोजन बना है और न किसीने भोजन ही किया है। ऐसा कहते हुए स्त्रियाँ अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गयीं, कुछ स्त्रियाँ दूध दुहने लगीं। उस समय लोग दीपक तथा लकड़ीके दीपक (मशाल) जलाकर अपना कार्य कर रहे थे। व्यापारीजन तथा ब्राह्मण आदि बड़े कष्टपूर्वक कार्योंको पूरा कर रहे थे ॥ २०-२१ ॥ उस समय सेवकों, कामीजनों, आलसियों, सोये हुओं तथा निद्रालुजनोंको बड़ा ही आनन्द प्रतीत हुआ ॥ २२ ॥ इस प्रकार अन्धकासुरके द्वारा सर्वत्र अन्धकार कर दिये जानेपर अम्भासुर नामक दैत्यने मेघ बनकर हाथीकी सूँड़के समान मोटी वर्षाकी धारा प्रारम्भ कर दी ॥ २३ ॥ उस समय क्षणमात्रके लिये बिजलीके चमकनेपर ही लोग अपनी वस्तुओंको देख पा रहे थे। वर्षाकी मोटी धारासे भयभीत होकर लोग अपने घरके अन्दर ही बैठे रह गये ॥ २४ ॥ उस भारी पानीकी धारासे बड़े-बड़े कई भवन गिर गये, घरोंकी दीवारें टूट गयीं, जनसमूहमेंसे कुछ लोग घरोंके अन्दर तो कुछ बाहर रहकर मर गये ॥ २५ ॥ झंझावातसे आहत वृक्ष भूमिपर गिर पड़े। कड़कती बिजलीने बहुतसे घरों तथा वृक्षोंको जला डाला ॥ २६ ॥

क्री०ख०-अ०२० ] * बालक विनायककी बाललीलाके सन्दर्भमें दैत्योंके वधका वर्णन * ३१९ लोगोंसे परिव्याप्त तथा सभी प्राणियोंसे भरी हुई वह काशीनगरी उफान मारती हुई नदियोंके कारण समुद्रोंद्वारा डुबायी जाती हुई-सी लग रही थी॥ २७॥ ब्रह्माजी बोले—उस प्रलयको दैत्योंद्वारा उत्पन्न माया जानकर करुणासागर उन विनायकने अपनी योगमायाके बलसे तत्क्षण ही एक बहुत ऊँचे वटवृक्षको उत्पन्न किया। जो अनेक प्रकारकी लताओं तथा गुल्मोंसे सुशोभित था। वह सौ योजन विस्तारवाला था और जटाओं तथा शाखाओंसे समन्वित था॥ २८-२९॥ तदनन्तर वे विनायक एक बहुत बड़े पक्षीके रूपमें वहाँ स्थित हो गये। उस पक्षीने अपने गगनचुम्बी पंखोंको भूमिमें लगा लिया और सिरसे आकाशको छू लिया। और काशीनगरीको प्रकाशयुक्त बना दिया। उस विशाल जलराशिको अपनी चोंचसे पक्षीरूपी विनायकने उसी प्रकार पी डाला, जैसे कि कोई जंगली हाथी छोटे-से गड्ढेके जलको अपनी सूँड़से पी डालता है॥ ३०-३१॥ उस समय लोग प्रसन्न होकर कहने लगे—'विघ्न दूर हो गया है और जल भी समाप्त हो गया है।' अन्धकारके दूर हो जानेपर उन्होंने उस गहन वटवृक्षको देखा। साथ ही उन्होंने एक अद्भुत स्वरूपवाले पक्षीको भी देखा, जैसा कि न तो देखा गया था और न सुना ही गया था। सभी लोग उसकी शरण लेनेकी दृष्टिसे उस वटवृक्षके समीपमें गये॥ ३२-३३॥ अश्वों, हाथियों, रथों, ऊँटों, पालकियों, स्त्रियों तथा दासोंसहित काशिराज भी उस वटवृक्षके नीचे चले आये। दूसरे पशु, कुत्ते, बिल्लियाँ तथा वन्य पशु भी वहाँ आ गये। बालक विनायकके प्रभावसे न तो वृष्टि ही हो रही थी और न वहाँ अन्धकार ही था॥ ३४-३५॥ सभी वर्णोंके लोग पूर्ववत् अपने-अपने कर्मोंको यथाविधि करने लगे। नगरनिवासी पूर्वकी भाँति अपने- अपने व्यवसायोंमें लग गये॥ ३६॥ [वे लोग सोचने लगे कि] क्या जगदीश्वर गणेशने ही सभीकी रक्षा करनेके लिये पक्षीका रूप धारण किया है? इस विषयमें हम लोग कुछ भी नहीं जान पा रहे हैं। [अवश्य ही] उन्होंने दैत्यद्वारा उत्पन्न वृष्टिको अपने पंखोंको फैलाकर रोक लिया और उल्कापात तथा ओला- वृष्टिको स्वयं सुखपूर्वक सहन किया है॥ ३७-३८॥ इस प्रकारसे विचार करके लो ! वहाँपर सुखपूर्वक रहे। उन्हें वहाँ रहते हुए ग्यारह दिन व्यतीत हो गये। हे द्विज व्यासजी! बालक विनायकको बालकोंके समूहके साथ खेलते हुए देखकर उन्हीं विनायकद्वारा की गयी इस लीलाको कोई भी नहीं जान सका॥ ३९-४०॥ तदनन्तर अन्धकासुर तथा अम्भासुर नामक उन दोनों दैत्योंकी शक्ति क्षीण हो गयी और वे निश्चेष्ट हो गये। तब तुंग नामक दैत्य दिशाओं तथा विदिशाओंको निनादित करते हुए बहुत जोरसे गरजा॥ ४१॥ मैं पर्वतका रूप धारणकर इस पक्षीको क्षणभरमें ही मार डालूँगा—ऐसा कहता हुआ वह तुंग नामक दैत्य उसी क्षण एक विशाल पर्वत बन गया। पाँच योजन विस्तारवाला वह पर्वत अनेक सरोवरों तथा नदियोंसे समन्वित था, वह पर्वत अपनी दिव्य औषधियोंके द्वारा आकाश तथा दिशाओंको प्रकाशित कर रहा था॥ ४२-४३॥ उस पर्वतमें विविध प्रकारके पक्षी थे तथा वह ब्राह्मणोंके आश्रमोंसे सुशोभित था। तब वह पक्षिराज भी पंखयुक्त उस पर्वतको गिरता हुआ देखकर स्वयं भी उड़ते हुए घूमने लगा और उसने उस जलको रोक लिया तथा वह अपने पंखोंकी हवासे चराचर जगत्को घुमाने लगा॥ ४४-४५॥ उस समय पर्वतोंकी चोटियाँ इधर-उधर भूमिमें गिरने लगीं। पक्षीरूपी विनायकने अपनी चोंचके द्वारा उस तुंग पर्वतको उसी प्रकार पकड़ लिया, जैसे कश्यप- पुत्र गरुड़ सर्पको पकड़ लेते हैं। उस पर्वतको पकड़े हुए पक्षीरूपी विनायक आकाशमें घूम रहे थे। उन्होंने अपने एक पैर (पंजे)-से अन्धकासुरको तथा दूसरे पैर (पंजे)-से अम्भासुरको पकड़ रखा था॥ ४६-४७॥ महान् पक्षीरूप वे विनायक उसी रूपमें घूमते हुए भुवर्लोकको भी पार कर गये। वे दैत्य बहुत अधिक भ्रमण करा देनेसे अत्यन्त खिन्न हो गये और सूर्यकी तेज किरणोंद्वारा संतप्त हो गये॥ ४८॥ पर्वतके समान विशाल वे तीनों असुर प्राणोंसे रहित हो जानेपर भूमिपर गिर पड़े। गिरते हुए उन्होंने अनेक

३२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- वनों तथा उपवनोंको चूर-चूर कर डाला ॥ ४९ ॥ उन दैत्योंके शरीरोंको देखनेके लिये स्त्रियों तथा बच्चोंके साथ वहाँके लोग नगरीके समीपमें गये और उन्हें देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए ॥ ५० ॥ उन दैत्योंके शरीरोंके टुकड़े चट्टानोंके समान लग रहे थे। इस प्रकार दैत्योंकी माया को देखकर सभी लोग अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये ॥ ५१ ॥ वहाँसे लौटनेपर लोगोंने देवरूपी उस वटवृक्षको नहीं देखा। वटवृक्षके अन्तर्धान हो जानेपर बालक विनायकने वह पक्षीका रूप भी त्याग दिया। तब काशिराजने बालक विनायकका आलिंगन किया। नगरके निवासियों तथा स्वयं काशिराजने उनसे कुशल-समाचार पूछा और परम प्रसन्नतापूर्वक उन विघ्ननाशक विनायकका पूजन किया। लोगोंने महर्षि कश्यपजीके पुत्र उन विनायककी बड़ी ही प्रसन्नतासे प्रशंसा की ॥ ५२-५४ ॥ हे देव! हम लोग उन दैत्योंद्वारा उत्पन्न की गयी उस महान् मायाको नहीं जानते हैं और आपके सामर्थ्य तथा गुणोंको भी हम नहीं जानते हैं, जिनका वर्णन करनेमें वेद भी कुण्ठित हो जाते हैं। आपने लीलापूर्वक हम सबकी रक्षा की है और महान् संकटसे मुक्त कराया है। आँधी- तूफान समाप्त हो गया है, अनेक प्रकारके उत्पात दूर हो गये हैं तथा वृष्टि भी रुक गयी है। अन्धकारके विनष्ट हो जानेपर सूर्यका बिम्ब दिखायी दे रहा है। उस समय सभी लोगोंके मन प्रसन्नतासे खिल उठे ॥ ५५-५७ ॥ नदियाँ पहलेकी भाँति निर्मल जलवाली हो गयीं, जैसा पहले था, वैसा ही सब कुछ हो गया। देवताओंने देवाधिदेव उन विनायकके ऊपर फूलोंकी वर्षा की ॥ ५८ ॥ विविध प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिके साथ सभी लोगोंने उस सुसज्जित काशीनगरीमें प्रवेश किया। उन्होंने ब्राह्मणोंको बहुत-सा दान यह कहते हुए दिया कि इस दानसे विनायकदेव हमपर प्रसन्न हों ॥ ५९ ॥ काशिराजने शान्तिहोम सम्पन्न करके बहुत-सा गोधन दानमें दिया। तदनन्तर सभीको विसर्जित करके काशिराजने विनायकके साथ स्वयं भी भोजन किया ॥ ६० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत '[अम्भासुर, अन्धकासुर तथा तुंगासुर नामक] तीन दैत्योंके वधका वर्णन' नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥ इक्कीसवाँ अध्याय भ्रमरा राक्षसीका अदितिका रूप धारणकर बालक विनायकके पास आना, बालक विनायकद्वारा उसका वध, देवताओं आदिके द्वारा विनायककी स्तुति ब्रह्माजी बोले- हे द्विज व्यासजी! मेरे द्वारा कहे जानेवाले बालक विनायकके महान् आश्चर्यजनक चरित्रका आप श्रवण करें, वह मनुष्योंके सभी पापोंको दूर करनेवाला है। अम्भासुरका जो सिर कटकर उसके घरमें जाकर गिरा था, उसे उसकी माता भ्रमराकी सखीने देखा और भ्रमराको बतलाया ॥ १-२ ॥ उस समय भ्रमरा सोनेसे बने पलंगपर सोयी थी, वह झटसे उठकर आँगनमें आयी और अपने पुत्रके सिरको देखकर मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ी ॥ ३ ॥ शोकमें निमग्न होकर वह अपने दोनों हाथोंसे अपनी छाती पीटने लगी। उसके आभूषण गिरने लगे, वह हाथीके द्वारा कुचली हुई कमलिनीके समान खिन्न हो गयी। उसके हाथोंके कंगन बिखर गये। उसकी चोली फट गयी, वह अत्यन्त दुर्बल-सी हो उठी। कपड़ोंके बिखर जानेसे उसका विशाल शरीर कुछ-कुछ नग्न-सा दिखलायी पड़ने लगा। वह विह्वल होकर भूमिपर लोट-पोट करने लगी ॥ ४-५ ॥ सखियों, भाइयों तथा स्वजनोंके द्वारा वैसा करनेसे रोकी जाती हुई उसे तीन मुहूर्त बीत जानेपर होश आया और वह कुछ बोलने लगी। वह उठ पड़ी और अपने दोनों हाथोंसे पुनः अपना सिर पीटने लगी ॥ ६ १/२ ॥ भ्रमरा बोली- जिसने अमरावतीसहित सम्पूर्ण

क्री०ख०-अ०२१] * भ्रमरा राक्षसीका अदितिका रूप धारणकर बालक विनायकके पास आना * ३२१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

यहाँ पृष्ठ पर दी गई सामग्री का अक्षरशः लिप्यंतरण (Transcription) प्रस्तुत है:

[पृष्ठ शीर्ष] ३२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐


[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

उसके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर उसके प्रति सम्मानका भाव दिखलाती हुई रानीने बड़ी शीघ्रतासे उस बालकको खोजनेके लिये दूतोंको प्रेषित किया। कुछ दूसरे लोगोंने काशिराजको बतलाया कि महर्षि कश्यपजीकी भार्या यहाँ आयी हुई हैं। वे स्नान करके घरमें आये और उसे देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ २८-२९॥ अत्यन्त श्रद्धाभक्तिके साथ हाथ जोड़कर प्रणामकर राजा बोले—'आज मेरा जन्म लेना धन्य हो गया, मेरी विद्या धन्य हो गयी, मेरी दृष्टि, मेरा राज्य, मेरे माता- पिता और मेरा तप धन्य हो गया। मैंने आज देवताओंकी माता, संसारको उत्पन्न करनेवाली शक्तिस्वरूपाका दर्शन किया है। आपके गुणोंका सम्यक् रूपसे वर्णन करनेकी मेरी शक्ति नहीं है॥ ३०-३१॥ आपका यह बालक विनायक इन्द्रसे भी अधिक बलशाली है। उसने अनेक प्रकारके प्रशस्त कर्म किये हैं और अनेकों राक्षसोंका वध किया है। उस बालक विनायकके गुणोंका वर्णन करनेमें मेरी अल्प सामर्थ्य अवश्य ही समर्थ नहीं है॥ ३२-३३॥ हे माता! आप क्षणभर यहाँ विश्राम करें। आज मेरे महान्‌से भी महान् भाग्यका उदय हुआ है। इसने योगमायाके प्रभावसे अनेकों दानवोंका वध किया है, किंतु इसके शरीरमें बिलकुल भी चोट नहीं लगी। आपका यह बालक यहाँ सुखपूर्वक रह रहा है। किस कारणसे आपका यहाँ आगमन हुआ है, आप यहाँ आ ही गयी हैं तो अब क्षणभरके लिये यहाँ रुकें। पुत्रका विवाह सम्पन्न हो जानेपर मैं आप दोनोंको आपके घर पहुँचा दूँगा'॥ ३४-३५१/२॥ **वह बोली—**हे राजन्! आप यह क्या बोल रहे हैं, इसके वियोगसे मुझे महान् दुःख हुआ है, मुझे कहीं भी कुछ भी सुख नहीं मिला है॥ ३६१/२॥ **ब्रह्माजी बोले—**जब वह ऐसा कह ही रही थी कि उसी समय वे बालक विनायक वहाँ आ पहुँचे॥ ३७॥ सभी बालकोंने विनायकको यह कहकर भेजा कि तुम्हारी माता आयी हुई हैं। तदनन्तर आँखोंमें आँसू भरी हुई उस भ्रमराने बालक विनायकका आलिंगन किया और प्रसन्नतापूर्वक बोली-॥ ३८॥


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

हे अतिनिष्ठुर बालक! तुम मुझे छोड़कर चिरकालसे यहाँ रह रहे हो, तुम्हारे वियोगसे मैं अत्यन्त कष्टमें हूँ और सब कुछ छोड़कर यहाँ आयी हूँ॥ ३९॥ मैंने अपने जीनेकी आशा छोड़कर तुम्हें प्राप्त करनेके लिये तपस्या की थी। मैंने बड़े ही कष्टसे तुम्हें प्राप्त किया है, मेरे उन कष्टोंको भगवान् ही जानता है। तुम्हारे बिना मेरे लिये एक क्षणका समय भी युगके समान हो गया था, इस प्रकारसे उस भामिनीने अत्यन्त दुष्ट भावसे बड़े ही मधुर शब्दोंमें उनसे कहा॥ ४०-४१॥ तदनन्तर अत्यन्त स्नेहके वशीभूत हो उसने बालक विनायकको अपने कटिदेशमें बैठाया, बालक विनायकने भी उसके प्रयत्नोंको जानकर उसके अपराधको समझते हुए अपने गूढ़ अभिप्रायसे उससे पहले यह कहा कि तुम मेरे लिये क्या लायी हो? उसके इस प्रकार कहते ही उसने बालक विनायकको एक लड्डू प्रदान किया॥ ४२-४३॥ उस लड्डूके खा जानेपर उसने महान् विष मिला हुआ दूसरा लड्डू बालकको खानेके लिये दिया। उस लड्डूको भी खा जानेपर बालक विनायकने बलपूर्वक उससे एक और लड्डू माँगा॥ ४४॥ तदनन्तर काशिराज और उनकी भार्याने उनसे प्रार्थना करते हुए कहा—'हे मातः! उठिये-उठिये, इस बालकके साथ आप भोजन कीजिये।' जब वह उठनेको हुई तो बालक विनायकने पर्वतराज हिमालयके समान भारी शरीरवाला बनकर उसे जोरसे दबा दिया, इससे वह अत्यन्त व्याकुल हो उठी॥ ४५-४६॥ वह कहने लगी 'अरे बालक! मुझे छोड़ो-छोड़ो, मैं तो तुम्हारी माता हूँ। मैं स्नेहके पाशमें बँधी हुई बहुत समयके बाद तुम्हें देखने तुम्हारे पास आयी हूँ॥ ४७॥ तुम मुझे एक पर्वतके समान दबाकर क्यों चूर-चूर करनेमें लगे हो?' वह अपने हाथोंसे बालकको हटाने लगी, किंतु वह बालक विनायक उस समय सो गया और अपने हाथों तथा पैरोंको फैलाकर जोर-जोरसे श्वास लेने तथा छोड़ने लगा। तदनन्तर काशिराजने भारसे दबी हुई उस व्याकुल स्त्रीको उठनेसे रोका॥ ४८-४९॥ इस बालककी निद्रा इतनी जल्दी भंग मत करो, आप तो इसकी स्नेहमयी माता हैं, उस समय कुछ दूसरे

क्री०ख०-अ०२१] * भ्रमरा राक्षसीका अदितिका रूप धारणकर बालक विनायकके पास आना * ३२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 लोगोंने दया करके उस बालकको अन्यत्र सुलानेके लिये उठानेका निश्चय किया। उस समय कोई भी उस बालकको न उठानेमें समर्थ हुआ, न हिलाने-डुलानेमें ही। कुछ दूसरे लोग उस कमललोचन बालक विनायककी प्रार्थना करने लगे ॥ ५०-५१ ॥ 'अरे बालक! दया करो, तुम्हारी ये माता मर जायगी।' वह स्त्री अपने पैरों, हाथों तथा गर्दनको हिलाने लगी। लोग बोल उठे—'अरे बालक! यह तुम क्या कर रहे हो, अपने पितासे तुम क्या कहोगे?' लोग ऐसा कह ही रहे थे कि वह निशाचरी मृत्युको प्राप्त हो गयी ॥ ५२-५३ ॥ उसकी देहने दस योजनकी भूमिको आच्छादित कर लिया। उस अत्यन्त भयानक निशाचरीको देखकर कुछ लोग भाग उठे। कौतूहलभरे कुछ लोग उसे देखनेके लिये दौड़ पड़े। उस निशाचरीको देखकर सभी लोग तथा काशिराज भी आश्चर्यचकित हो गये ॥ ५४-५५ ॥ बालकोंकी हत्या कर डालनेवाली यह निशाचरी कपटवेष धारणकर कैसे यहाँ आ पहुँची ? हम लोग तो इसे महर्षि कश्यपकी पत्नी ही समझ रहे थे, न कि राक्षसी! इस बालकके अद्भुत ज्ञान तथा सामर्थ्यको हमने देख लिया-ऐसा कहते हुए वे सभी लोग प्रसन्नतापूर्वक उन (विनायक)-के समीपमें गये ॥ ५६-५७ ॥ उस निशाचरीके ऊपर बैठे बालक विनायकको उठाकर वे कहने लगे, 'यह तो फूलके समान भारवाला है', साथ ही वे यह भी बोले कि 'इस दुष्ट स्वरूपवाली दुष्ट निशाचरीको यहाँसे दूर हटाओ ॥ ५८ ॥ जो दूसरेके अनिष्टकी कामना करता है, वह स्वयं मृत्युको प्राप्त होता है।' तदनन्तर काशिराज एवं अन्य जनोंने तथा ऋषियों एवं लोकपालोंने भी विनायकदेवकी भक्तिपूर्वक स्तुति की ॥ ५९ ॥ सभी बोले- हे देव विनायक ! आप देवताओं, मनुष्यों, नागों, राक्षसों, यक्षों, गन्धर्वों, ब्राह्मणों, हाथियों, घोड़ों, रथों तथा पक्षियोंके एकमात्र स्वामी हैं। भूतकाल, भविष्यत् तथा वर्तमान-तीनों कालों, बुद्धि, समस्त इन्द्रियों, हर्ष, शोक, दुःख, सुख, ज्ञान, मोह, अर्थ, समस्त कार्यों और हानि तथा लाभके आप ही स्वामी हैं। स्वर्ग, पाताल आदि लोकों, पृथ्वी, समुद्र, नक्षत्रों, ग्रहों, पिशाचों, लताओं, वृक्षों, नदियों, समस्त पुरुषों एवं स्त्रियों और बालकोंके स्वामी आप ही हैं। सृष्टि, स्थिति तथा संहार करनेवाले आपको बार-बार नमस्कार है ॥ ६०-६४ ॥ पशुओंके पति आपको नमस्कार है, तत्त्वका ज्ञान प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है। विष्णुस्वरूप आपको नमस्कार है, रुद्ररूप आपको नमस्कार है ॥ ६५ ॥ ब्रह्मारूप आपको नमस्कार है। अनन्त स्वरूपवाले आपको नमस्कार है। मोक्षके कारणरूप आपको नमस्कार है। विघ्नोंका हरण करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ६६ ॥ अभक्तोंका विनाश करनेवाले आपको नमस्कार है। भक्तोंको प्रिय लगनेवाले अथवा भक्तोंको प्रिय माननेवाले आपको नमस्कार है। हे अधिदैव ! हे अधिभूतात्मन् ! आप तीन प्रकारके तापोंका हरण करनेवालेको नमस्कार है। सभी प्रकारके उपद्रवोंको विनष्ट करनेवाले तथा लीलास्वरूप धारण करनेवालेको नमस्कार है। आप सर्वान्तर्यामीको नमस्कार है। आप सर्वाध्यक्षको नमस्कार है ॥ ६७-६८ ॥ देवी अदितिके गर्भसे उत्पन्न हे देव विनायक ! आपको नमस्कार है। परब्रह्मस्वरूप महर्षि कश्यपके पुत्रको नमस्कार है। अप्रमेय मायासे समन्वित पराक्रमवाले, मायास्वरूपी, मायायुक्त जनोंको मुग्ध करनेवाले, अपरिमित मायाका विनाश करनेवाले और मायाके महान् आश्रयस्वरूप आपको बार-बार नमस्कार है ॥ ६९-७० ॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारसे स्तुति करनेके अनन्तर उस राक्षसीको काटकर टुकड़े-टुकड़े करके नगरसे दूर ले जाकर फेंककर वे सभी प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घरोंको गये। हे अनघ ! तीनों प्रकारके उपद्रवोंको नष्ट करनेवाले इस स्तोत्रका जो पाठ करता है, उसको महान् उत्पात, विघ्नबाधा तथा भूतोंसे भय नहीं होता। जो तीनों सन्ध्याओंमें इस स्तोत्रको पढ़ता है, वह सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और देव विनायक सदा उसकी रक्षा करते हैं ॥ ७१-७३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'अदितिरूपा राक्षसीके वधका वर्णन' नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २१ ॥

बाईसवाँ अध्याय

३२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

बाईसवाँ अध्याय

काशीनगरीके निवासियों तथा शुक्ल नामक ब्राह्मणद्वारा विनायकको अपने-अपने घर ले जानेके लिये राजासे प्रार्थना करना और स्वीकृति प्राप्तकर विनायकके स्वागतकी तैयारी करना

ब्रह्माजी बोले—दूसरे दिनकी बात है, जब | है, वह इन्हें अपने घर ले जाकर इनकी पूजा करे और काशीनरेश प्रातःकालीन स्नान-सन्ध्या आदि नित्यकर्मोंमें | इन्हें भोजन भी कराये ॥ ८-९१/२ ॥ लगे हुए थे, उस समय सभी नगरवासी आपसमें यह | हे नागरिको ! सत्त्व, रज तथा तम—इन तीनों तर्क-वितर्क करने लगे कि ये विनायक न तो देवता हैं | गुणोंके आधारपर लोग सात्त्विक, राजस तथा तामस तीन और न मनुष्य ही हैं अथवा यदि ये देवता न होते तो | प्रकारके होते हैं। जो दुष्ट लोग हैं, वे देवताओंकी परीक्षा इन्होंने इन्द्र तथा विष्णुके द्वारा भी अजेय तथा अन्य | लेते हैं और जो पुण्यात्मा होते हैं, वे उनकी पूजा करते देवताओंके लिये भी सर्वथा अपराजेय पाँच महान् बल- | हैं। कुछ लोग इन विनायककी निन्दा करते हैं और कुछ शाली एवं पराक्रमी दैत्योंका वध कैसे किया ? ॥ १-२ ॥ | इनकी प्रशंसा करते हैं ॥ १०-११ ॥ यदि ये देवता ही हैं, तो [बालक बनकर] | जिस व्यक्तिका जैसा स्वभाव होता है, वह वैसा बालकोंके मध्य क्रीडा कैसे कर रहे हैं? इस प्रकार तर्क- | ही व्यवहार करता है। जैसे घिसे जानेपर भी चन्दन वितर्क करके वे सभी पुरवासी राजाके दर्शनके लिये | अपने सुगन्धरूपी स्वभावको नहीं छोड़ता है और आये। राजाने भी भद्रासनमें विराजमान होकर उन सभीसे | कस्तूरीपंकसे सना होनेपर भी प्याज अपने स्वाभाविक कहा—'आप लोगोंका जो कार्य हो, उसे बतायें, वह | गुण दुर्गन्धको नहीं छोड़ता। इन मुनिपुत्रपर यदि आपकी निश्चित ही पूर्ण होगा ॥ ३-४ ॥ | अनन्य भक्ति हो तो अपनी प्रसन्नताके लिये तथा इन्हें हे नगरनिवासियो ! आप लोग प्रातःकाल ही किस | भोजन करानेके लिये शीघ्र ही अपने घर ले जायें और प्रयोजनसे यहाँ आये हैं?' इसपर वे बोले—'हमारे | इनकी पूजा करें। इन्हें शक्ति-परीक्षणके लिये अपने घर निवेदनयोग्य अभीष्टके अतिरिक्त और अन्य कारण | न ले जायें, ये मेरे माता-पिताके समान हैं ॥ १२-१४ ॥ आनेका नहीं है। आप जिन मुनिपुत्र विनायकको यहाँ | मैं लोगोंसे कैसे कहूँ कि वे इन्हें अपने घर ले जाकर लाये हैं, हमारे द्वारा कहीं भी, कभी भी कुछ भी उनकी | इनकी पूजा करें। इनकी दृढ़ शक्ति देखकर मेरी इनपर सेवा-शुश्रूषा नहीं हो सकी है ॥ ५-६ ॥ | विशेष भक्ति हो गयी है। यदि इन्होंने मेरे नगरकी रक्षा न आपने तो अपने घरमें स्थित उनकी अनेक बार | की होती तो कहाँ आप होते और कहाँ मैं ? ॥ १५१/२ ॥ पूजा की है, आपके घरमें जो कुछ भी आता है, उसे | राजाके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर नगरके आप हमारे घर [भी] भेज देते हैं, किंतु बड़े आश्चर्यकी | लोग पुनः बोले—हे कल्याणकर्ता राजन् ! आप जैसा बात है कि हे राजन् ! फिर आपने इन विनायकको क्यों | कह रहे हैं, वह ठीक ही है, अनुचित नहीं है। हे नहीं हमारे पास भेजा ?' ॥ ७१/२ ॥ | राजन् ! हमारी कार्यसिद्धि जिस प्रकार हो, आप वैसा राजा बोले—हे नागरिको ! आप लोगोंने ठीक ही | ही करें ॥ १६-१७ ॥ कहा है कि जो वस्तु आपसमें बाँटकर खायी जाती है, | हम लोग इस बालकको अपने घर ले जाकर वह यदि विष भी हो तो अमृतके समान हो जाती है। | इसकी यथायोग्य पूजा करेंगे। इसी बीच संसारके इसके विपरीत अकेले खानेपर अमृत भी विष हो जाता | गुरुरूप सबके साक्षीस्वरूप वे बालक विनायक उन है। ये चाहे देवता हों या मनुष्य, इनपर जिसकी भक्ति | सबके अन्तर्भावको जानते हुए सभामें स्थित उन

क्री०ख०-अ०२२ ] * काशीवासियोंकी विनायकको अपने-अपने घर ले जानेकी राजासे प्रार्थना * ३२५ लोगोंसे बोले - ॥ १८ ॥ विनायक बोले- आप-जैसे महान् लोग मुझे ले जानेके लिये क्यों प्रार्थना कर रहे हैं ? मैं मुनिका पुत्र एक सामान्य बालक हूँ। मेरी पूजाके लिये बहुत-सा धन व्यय करनेवाले आप लोगोंको मेरी पूजासे क्या फल मिलेगा, इसे मैं नहीं जान पा रहा हूँ ॥ १९-२० ॥ जब कभी विवाह, यज्ञोपवीत, यज्ञ अथवा कोई महोत्सव होगा या देवकार्य अथवा पितृकार्य होगा, तब मैं आप लोगोंके घर चलूँगा ॥ २१ ॥ आप लोग असंख्य हैं और मैं अकेला हूँ, फिर मैं आप सबके घर कैसे जा सकता हूँ? आप-जैसे लोग दूध देनेवाली गायको छोड़कर जिस गौने दूध देना बन्द कर दिया है, ऐसी वकेशिनी गौको क्यों दुहना चाहते हैं ? जिस प्रकार माँगनेवाला कोई व्यक्ति कल्पवृक्षको छोड़कर सामान्य वृक्षसे अपनी मनोभिलषित वस्तुको माँगे अथवा कोई तुच्छ वस्तु माँगे, उसी प्रकार आपलोग भी उत्सुक हो रहे हैं ॥ २२-२३॥ ब्रह्माजी बोले- विनायकके वचनोंको सुनकर प्रधान-प्रधान नागरिक पुनः कहने लगे। राजाके पुत्रके इस विवाहके सम्पन्न हो जानेपर आप एक क्षण भी यहाँ नहीं रुकेंगे। राजाकी कृपासे हमें आपका दर्शन हुआ है, अब आप हमारी भक्तिको सफल बनायें। आप सर्वथा पूर्णकाम हैं, सृष्टि, स्थिति तथा संहार करनेवाले हैं, सर्वान्तर्यामी हैं, सबकी मनोवृत्तिको जाननेवाले हैं, कर्तुं (करनेमें) अकर्तुं (न करनेमें) एवं सर्वथा अन्यथाकर्तुं (विपरीत करनेमें) समर्थ हैं, फिर आप चिदानन्दको हमारे द्वारा की गयी पूजासे कोई प्रयोजन नहीं है। 'देव विनायक' भक्तिप्रिय हैं, वेदोंके इस वचनको आप मिथ्या न करें ॥ २४-२७ ॥ उन नागरिक जनोंके वचनोंको सुनकर विनायक उनसे बोले- 'आप लोगोंकी यदि ऐसी भक्ति है, तो मैं राजाकी आज्ञा मिलनेपर आप लोगोंके घर चलूँगा' ॥ २८ ॥ विनायककी यह बात सुनकर वे सभी नगरवासी अपने-अपने घरको चले गये। घर पहुँचकर किसीने विनायकके स्वागतके लिये मण्डपोंका निर्माण किया, किसीने वस्त्रोंसे आच्छादितकर [विशेष प्रकारके] मण्डप बनाये। उन्होंने श्रद्धा-भक्तिसे तोरणद्वार बनाये, जो दर्पणोंसे सुशोभित तथा अद्भुत थे। अत्यन्त मूल्यवान् पात्र, सुगन्धित द्रव्य, चन्दन-कस्तूरीसे युक्त सुगन्धित द्रव्य, फल तथा विभिन्न प्रकारके वस्त्र एवं आभूषण और पंचामृतसे समन्वित विविध पक्वान्न वहाँ स्थापित किये। साथ ही विविध प्रकारकी मुक्ताकी मालाओंसे विभूषित मूर्तियोंको भी वहाँ स्थापित किया। इस प्रकार सभी लोग इन सामग्रियोंको अपने घरोंमें सुसज्जितकर अत्यन्त प्रफुल्लित थे ॥ २९-३२१/२ ॥ काशीनगरीकी सीमाके पास वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता एक ब्राह्मण निवास करते थे। उनका नाम शुक्ल था। उनकी वृत्ति - आजीविका अत्यन्त पवित्र थी। वे शान्त प्रकृतिके, इन्द्रियोंपर संयम रखनेवाले, क्षमाशील, श्रौत तथा स्मार्तकर्मोंमें परायण और ब्रह्मनिष्ठ थे, अतिथियोंका सत्कार करना उन्हें अत्यन्त प्रिय था ॥ ३३-३४ ॥ उनकी पत्नीका नाम विद्रुमा था, जो महाभाग्यशालिनी थीं, वे सब प्रकारकी इच्छाओंसे रहित और ज्ञानसे सम्पन्न थीं। उनके शरीरके सभी अंग बहुत ही सुन्दर थे ॥ ३५ ॥ धनसे हीन होनेपर भी वे ज्ञाननिष्ठ थीं। पतिव्रता थीं और पतिको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय माननेवाली थीं। उनके घरसे ऊपरकी ओर देखनेपर ताराओंसे सुशोभित आकाशमण्डल स्पष्ट दिखलायी पड़ता था ॥ ३६ ॥ उनके गृहमें सोने, चाँदी, ताँबे तथा पीतलके पात्र नहीं थे। विद्रुमा गौरवर्णकी थीं, वे वल्कल वस्त्रोंको धारण करनेवाली तथा तेजकी दीप्तिसे अत्यन्त सुशोभित रहती थीं। उनकी देहकान्तिसे व्याप्त रहनेके कारण दृश्यमान वस्तु भी दिखलायी नहीं पड़ती थी। अपने पतिकी सामान्य-सी आजीविकासे सन्तुष्ट वे विद्रुमा घरकी शोभाको बढ़ानेवाली थीं ॥ ३७-३८ ॥ शुक्ल नामके वे ब्राह्मण अपनी पत्नीकी सन्तोषकी प्रवृत्ति तथा उसके विनयी स्वभाव और सेवासे बहुत प्रसन्न रहते थे। वे भोजनसे रहित होनेपर भी अपनी आत्मामें स्थित तथा ज्ञाननिष्ठ रहते थे ॥ ३९ ॥ एक बार जब वे भिक्षाके लिये निकले तो

३२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- विनायकके निमित्त महोत्सवमें संलग्न रहनेके कारण लोगोंने उन्हें अपने-अपने घरसे वापस लौटा दिया ॥ ४० ॥ उन्हें भिक्षामें जो कुछ भी मिला, उसीसे सन्तुष्ट हुए उन्होंने अपनी भार्यासे आकर कहा—'हे धर्मपत्नी ! सुनो, आज नगरीके प्रत्येक घरमें मैं भिक्षा दिये बिना ही लौटा दिया गया ॥ ४१ ॥ पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये उद्यत जो विनायक मुनि कश्यपके घरमें अवतरित हुए हैं, वे ही आज पूजा ग्रहण करनेके लिये प्रत्येक घरमें आयेंगे ॥ ४२ ॥ यदि वे पूजा ग्रहण करनेके लिये हमारे घर भी आयेंगे तो तुम उनकी पूजाकी व्यवस्था करो।' इसपर विद्रुमा बोली—'दूसरे घरोंमें महान् पूजाको छोड़कर वे आपके घरमें अन्न ग्रहण करने कैसे आयेंगे ? ॥ ४३ ॥ अथवा आप-जैसे नितान्त निर्धनोंके घरमें वे कैसे आयेंगे, हे मुने ! गन्ध, पुष्प, बासी पक्वान्न, कन्दमूल, फल आदि जो कुछ भी अल्प मात्रामें उचित-अनुचित होगा, उसीसे उनका सत्कार किया जायगा अथवा हे प्रभो ! उनका आपके घरमें आनेका क्या प्रयोजन हो सकता है ?' ॥ ४४-४५ ॥ अपनी प्रिय पत्नी विद्रुमाके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे मुनि पुनः अपनी पत्नीसे बोले—'दीनों तथा अनाथोंके स्वामी वे प्रभु विनायक मुझे अपना भक्त समझते हैं। वे देव विनायक भक्तिप्रिय हैं, वे प्रभु तनिक भी लोभके वशीभूत नहीं होते। वे जल, पत्र-पुष्पसे ही प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ४६-४७ ॥ दम्भपूर्वक समर्पित की गयी सुवर्णकी अकूत धनराशिसे भी वे प्रसन्न नहीं होते।' पतिके ऐसे वचन सुनकर विद्रुमाने पुनः कहा— ॥ ४८ ॥ यदि ऐसी बात है तो जो कुछ पकाया गया अन्न है, वही उन्हें निवेदित करें। तब विद्रुमाने अठारह प्रकारके धान्योंको पीसकर उसे पकाया ॥ ४९ ॥ पुराने चावलोंका अधिक जलवाला भात बनाया। वे प्रतिदिन एक मुट्ठीभर आटेको दोनेमें रखकर शेषका भोजन बनाकर उसे ग्रहण करती थीं ॥ ५० ॥ प्रतिदिन मुट्ठीभर बचाये गये उस आटेको बेचकर प्राप्त धनसे वे वस्त्र खरीदकर लायीं। गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, महाआरती, वन्य फल तथा वल्कल वस्त्रोंको उन्होंने एक स्थानपर स्थापित किया। भोजनके अनन्तर मुखको सुगन्धित करनेके लिये उन्होंने सूखे आँवलेके टुकड़ोंको भी रखा ॥ ५१-५२ ॥ जलसे अच्छी प्रकार सींचे गये अपने आँगनमें उन्होंने कुशोंको फैलाकर ध्वजकी स्थापना की और आसनको बिछाया। तदनन्तर वे मुनि सर्वप्रथम नैवेद्यको स्थापित करके बलिवैश्वदेव करनेके अनन्तर ध्याननिष्ठ हो गये ॥ ५३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २२ ॥ तेईसवाँ अध्याय कुमार सनक तथा सनन्दनका बालक विनायकके दर्शनके लिये काशीनरेशकी सभामें आना, बालक विनायकका शुक्ल नामक ब्राह्मणके घरमें उसका आतिथ्य स्वीकार करने जाना तथा शुक्ल-दम्पतीको विविध वरोंकी प्राप्ति ब्रह्माजी बोले—वे बालक विनायक बालकोंके साथ बड़े ही कौतूहलके साथ खेल खेलने लगे। राजा भद्रासनपर आसीन होकर सभी जनोंके साथ वारांगनाओंका नृत्य देखने लगे। उसी समय देवलोकसे सनक तथा सनन्दन दो कुमार राजाकी उस रमणीय सभामें आये ॥ १-२ ॥ उन दोनोंकी सूर्य एवं अग्निके समान दीप्तिसे वह सम्पूर्ण सभा दीप्तिमान् हो उठी। अकस्मात् उन दोनों कुमारोंको आया हुआ देखकर वे राजा अपने आसनसे उठ खड़े हुए ॥ ३ ॥ उन दोनोंके चरणकमलोंमें अपना सिर रखकर राजाने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और वे दोनों हाथ जोड़कर कहने लगे—आज मेरा कुल धन्य हो गया।

क्री०ख०-अ०२३ ] * कुमार सनक तथा सनन्दनका विनायक-दर्शनहेतु काशीनरेशके पास आना * ३२७ मेरा राज्य, ज्ञान, देह, पत्नी तथा पुत्र आदि जो कुछ भी है, वह सब धन्य हो गया। ऐसा कहकर राजाने हाथ पकड़कर उन दोनोंको अपने आसनपर बैठाया ॥ ४-५ ॥ तदनन्तर राजाने सोलह उपचारोंके द्वारा भक्तिपूर्वक उनका पूजन किया और उनके चरणोंको दबाना आदि सेवाओंके द्वारा उन्हें विश्राम कराया। वे बार-बार उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहने लगे ॥ ६ १/२ ॥ राजा बोले—दण्डका त्याग किये हुए तथा नित्य निष्काम मुनियोंको कभी भी कोई कामना नहीं होती, तथापि मैं अपने तप, राज्य, कुल तथा शीलको सार्थक बनानेके लिये आप लोगोंकी सेवाकी इच्छा करता हूँ ॥ ७-८ ॥ वे दोनों बोले—महर्षि कश्यपके पुत्र विनायक जो आप्तकाम, परब्रह्मस्वरूप, लीलावतारी भगवान् आपके घरमें स्थित हैं, वे अद्भुत पराक्रमशाली हैं और नाना प्रकारके कौतुक करनेवाले हैं। उनके अद्भुत कर्मोंके विषयमें सुनकर हम दोनों उनका दर्शन करनेके लिये यहाँ आये हैं ॥ ९-१० ॥ इसके अतिरिक्त इन्द्रभवनसे यहाँ आनेका हमारा दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है। जिसके घरमें ही कल्पवृक्ष है, वह दूसरोंसे क्या याचना करेगा ? ॥ ११ ॥ हे राजन् ! उनके चरणकमलोंमें प्रणाम करके हम अपने स्थानको चले जायँगे। उनके वहाँ आकर इस प्रकारके कहे गये वचनोंको सुनकर बालक विनायक खेल छोड़कर हाथमें मोदक लेकर वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने अपने हाथमें पाँच खाद्य पदार्थोंसे बना हुआ भक्षणीय मोदक लीलापूर्वक धारण किया हुआ था ॥ १२-१३ ॥ राजाने उन दोनोंको मधुर हास्य करते हुए बालक विनायकको दिखाया और कहा—वे ये देव विनायक आ गये हैं, जिनके दर्शनोंके लिये आप लोग उत्सुक हैं। वे आ गये हैं, अब आप लोगोंका जो अभीष्ट करणीय है, उसे सम्पन्न करें। उनका दर्शन करके वे दोनों मुनि सनक तथा सनन्दन आपसमें कहने लगे ॥ १४-१५ ॥ इसने निश्चित ही मुनिश्रेष्ठ कश्यपजीको भी दूषित कर डाला है; क्योंकि उनका पुत्र होते हुए भी इसने अपने सदाचारका परित्याग कर दिया है ॥ १६ ॥ स्पृश्य तथा अस्पृश्यके विषयमें इसका कोई विचार नहीं है और न इसे भक्ष्याभक्ष्यकी विधि ही ज्ञात है। इसके दर्शन करने तथा इसका स्पर्श करनेमें भी निश्चित ही महान् दोष है ॥ १७ ॥ यह अपने ब्राह्मणवर्णोचित नियमोंका परित्यागकर क्षत्रियके घरमें किसलिये रह रहा है ? स्वधर्ममें स्थित हम लोगोंका इसके दर्शनसे क्या फल है ? ॥ १८ ॥ उस समय राजाके समीप स्थित उन विनायकदेवने उन दोनोंके वचनोंको सुना। तब वाक्यार्थको जाननेवाले साक्षात् दूसरे बृहस्पतिके समान वे विनायक बोल पड़े। हे मुनियो ! व्यर्थ ही श्रम करनेवाले आप लोगोंका ज्ञान कहाँ चला गया ? आप लोग स्वर्गलोकका परित्यागकर एक सामान्य व्यक्तिकी भाँति यहाँ कैसे आये हैं ? ॥ १९-२० ॥ तदनन्तर मायामय देव विनायककी मायासे अत्यन्त मोहित वे दोनों कुमार विनायकका इस प्रकारका वचन सुनकर राजासे कहने लगे— ॥ २१ ॥ हमें अनुज्ञा प्रदान कीजिये, हम अपने आश्रम- मण्डलको जाते हैं। तब नृपश्रेष्ठ काशीनरेश उन दोनोंके प्रति दृढ़ भक्तिसे प्रेरित होकर उन दोनोंसे बोले—आप मेरी बात सुनें और कुछ देरके लिये ठहर जायँ। पुनः उन्होंने भक्तिपूर्वक प्रार्थना की कि आपलोग स्नान करके भोजन करें, तदनन्तर ही जायँ ॥ २२-२३ ॥ राजाकी प्रार्थना सुनकर वे दोनों मुनिश्रेष्ठ बोले— राजाका अन्न भक्षण करना वर्जित है, अतः हम दोनों यहाँसे जा रहे हैं ॥ २४ ॥ तदनन्तर राजाकी अनुमति प्राप्तकर वे दोनों मणिकर्णिकातीर्थमें गये। इधर बालक विनायक अपने साथ आ रहे सभी बालकोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक क्रीडा करते हुए स्नान करनेके अनन्तर उन शुक्ल नामक ब्राह्मणकी भक्तिका आदर करके उनके घरमें उसी प्रकार प्रविष्ट हुए, जैसे कि कोई गौ अपने बछड़ेके पीछे दौड़ती है, जैसे माता रोते हुए शिशुके समीप जाती है और जैसे कौरवोंकी सभाके मध्यमें स्थित शरणागत द्रौपदीके पास भगवान् कृष्ण गये थे ॥ २५-२६ १/२ ॥ उन विनायकदेवका दर्शन करके वे दम्पती उनके

३२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 चरणोंपर गिर पड़े। आनन्दके कारण अपने नेत्रोंसे आँसू गिराते हुए उन दोनोंने गद्गद वाणीमें बोलते हुए बड़ी ही प्रसन्नताके साथ उनका आलिंगन किया और हर्षनिर्भर होकर वे दोनों नाचने लगे ॥ २७-२८ ॥ उन्हें अपनी देहकी सुध-बुध नहीं रही, इस समय क्या करना चाहिये—इसे वे जान न सके। उन दोनोंके शरीरमें रोमांच हो आया और वे अपने नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाने लगे ॥ २९ ॥ मुहूर्तमात्र बीत जानेपर जब उन्हें होश आया तो उन्होंने उन जगदीश्वरको प्रणाम किया। तदनन्तर मुनि शुक्ल उन देव विनायकसे कहने लगे—आपका 'दीनानाथ' यह जो अत्यन्त कल्याणकारी तथा पापोंका हरण करनेवाला नाम तीनों लोकोंमें विख्यात है, उसे आज आपने सार्थक कर दिया है और अपने चरणोंका दर्शन कराकर हमारा जन्म लेना भी सार्थक कर दिया है ॥ ३०-३१ ॥ आप बड़े-बड़े गगनचुम्बी भवनोंको छोड़कर हमारी इस पर्णकुटीमें आये हैं। आज मेरा वंश धन्य हो गया। मेरा जीवन धन्य हो गया। मेरा ज्ञान धन्य हो गया। मेरी तपस्या धन्य हो गयी और मेरी आयु धन्य हो गयी। तदनन्तर उन मुनिने उन विनायकदेवको कुशासनमें विराजमान कराकर उनकी पूजा की। उनके युगलचरणोंका प्रक्षालन करके उस जलको अपने सिरमें धारण किया ॥ ३२-३३ ॥ तदनन्तर गन्ध, अक्षत, पुष्पमाला, धूप, दीप, दूर्वांकुर, शमीपत्र, सुगन्धित तेल तथा शुभ केतकी पुष्प अर्पित किया। इसके अनन्तर उनके सामने अल्पमात्रामें खाद्य नैवेद्य तथा वन्य फलोंको निवेदित किया। तदनन्तर मन्त्रोंसे पवित्र की गयी पुष्पांजलि देकर और उन्हें प्रणाम करके वे मुनि लज्जित हो उठे। यह सोचकर कि किस प्रकार इन्हें हम निकृष्ट अन्न भोजनके लिये प्रदान करें! ॥ ३४-३५१/२ ॥ उनके अभिप्रायको जानकर देवाधिदेव विनायकने उन ब्राह्मणकी पत्नीसे भोजनकी याचना करते हुए कहा—हे मातः! आपके घरमें कौन-सा भोजन बना है। उसे मुझे प्रदान करें। भक्तिपूर्वक दिया गया क्षुद्र अन्न भी मुझे अमृतसे बढ़कर प्रिय लगता है और जो भोजन श्रद्धारहित होकर दम्भपूर्वक दिया जाता है, वह विषके समान हो जाता है ॥ ३६-३७१/२ ॥ तदनन्तर मुनिपत्नीने अत्यन्त लज्जाके साथ पात्रमें फैला हुआ भात और बहुतसे अन्नोंके मिश्रणसे बनायी गयी सूखी पीठीको विनायकके आगे स्थापित किया। भोजनके लिये उपस्थित उस तेल (-के समान तरल पदार्थ)-को देखकर अन्य सभी बालक विनायकपर हँस पड़े ॥ ३८-३९ ॥ विनायकदेवने वह निवेदित भोजन स्वादिष्ट पक्वान्नकी भाँति बड़े ही आदरभावसे ग्रहण किया। वे प्रत्येक ग्रासके अनन्तर जल पीकर बलपूर्वक उसे निगल रहे थे। तदनन्तर मुनिने सारा गीला भात उनके भोजनपात्रमें डाल दिया। तब वह गीला भात पात्रकी चारों दिशाओंमें फैलकर बहने लगा और वे बालक विनायक उसे रोकनेमें असमर्थ हो गये ॥ ४०-४१ ॥ तब बालक विनायकने दस भुजाओंवाला बनकर उन हाथोंसे वह सारा भात ग्रहण किया। लोगोंने आश्चर्यपूर्वक उन्हें देखा और वे हँसते हुए हाथसे ताली पीटने लगे ॥ ४२ ॥ घुटनेतक पानीमें पकाया गया यह अभूतपूर्व

क्री०ख०-अ०२४] * काशीमें विनायकद्वारा एक ही समयमें अनेक घरोंमें भोजन करना * ३२९ भोजन है—ऐसा कहते हुए वे बालक बड़ी ही रुचिसे उस भोजनको खीरके समान समझते हुए खाने लगे॥ ४३ ॥ जिन बालकोंने उन विनायकके साथ वह भोजन किया, वे देवोंके समान (तेजोमय) हो गये थे और दूसरे जिन्होंने भोजन नहीं किया और जो दाँत खोलकर उन विनायककी हँसी उड़ा रहे थे, वे बादमें पश्चात्ताप करने लगे। उस समय काशीनगरीमें यह कोलाहल होने लगा कि 'बालक विनायक कहाँ चला गया?' कुछ लोगोंने बताया कि वे विनायक शुक्ल नामक ब्राह्मणके घरमें शीर्ण भात खा रहे हैं॥ ४४-४५ ॥ उन्होंने उस गीले भातको बहनेसे रोकनेके लिये अपने दस हाथ बना लिये और उन्हीं हाथोंसे वे भोजन कर रहे हैं। बालक विनायकद्वारा भोजन कर लिये जानेके अनन्तर मुखशुद्धिके लिये ब्राह्मण शुक्लने उन्हें सूखे आँवलेके टुकड़े दिये॥ ४६॥ तब जगदात्मा विनायकने उनके द्वारा मुखशुद्धि की। तदनन्तर प्रसन्न होकर उन्होंने ब्राह्मण शुक्लसे कहा—हे अनघ! मैं आपके प्रीतिभावसे अत्यन्त प्रसन्न हुआ हूँ। हे महाभाग! आप जो भी वर चाहते हैं, वह मुझसे माँग लें॥ ४७१/२ ॥ शुक्ल बोले—आप सभी नगरनिवासियोंको छोड़कर मेरे यहाँ रूखा-सूखा भोजन करनेके लिये आये। मेरे लिये यही वरदान है, जो कि मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ है। तथापि आपके कथनानुसार मैं आपकी अखण्ड भक्तिकी अभिलाषा करता हूँ॥ ४८-४९॥ हे विनायक! अन्तमें मुझे मोक्ष प्राप्त हो, जिससे कि पुनः इस संसारमें मुझे आना न पड़े। मेरा मन सांसारिक सुखोंमें नहीं लगता है॥ ५०॥ ब्रह्माजी बोले—'ऐसा ही होगा' कहकर वे विनायक पहलेकी भाँति दो हाथोंवाले बालक बन गये। उन्होंने उनके घरको इन्द्रके भवनसे भी सुन्दर, उत्तम रत्नोंसे युक्त तथा सुवर्णमय बना दिया। उन्हें उत्तमोत्तम स्वरूप, ज्ञान तथा धन-वैभव प्रदान किया। तदनन्तर उन ब्राह्मण-दम्पतीसे अनुमति लेकर बालकोंसे घिरे हुए वे विनायक अन्यत्र चले गये॥ ५१-५२॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालचरित्रके अन्तर्गत शुक्ल ब्राह्मणको वर प्रदान करनेका वर्णन' नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २३॥ चौबीसवाँ अध्याय काशीनगरीमें विनायकके द्वारा एक ही समयमें अनेक घरोंमें भोजनादि सम्पन्न करना तथा सनक-सनन्दनको अपने विविध स्वरूपोंका दर्शन कराकर विवेकज्ञानकी प्राप्ति कराना ब्रह्माजी बोले—काशीनगरीके समस्त लोग पूजाकी सामग्री तथा अनेक प्रकारकी भोजन-सामग्रीको एकत्रित करके उन विनायककी प्रतीक्षा करने लगे॥ १॥ वे लोग उस समय प्रत्येक घरमें, राजभवनमें तथा सभी अमात्योंके घरोंमें भी कश्यपनन्दन उन विनायकको ढूँढ़ने लगे॥ २॥ वे सभी लोग यही पूछ रहे थे कि क्या विनायकको कहीं देखा है? जिनके विषयमें वेद भी 'नेति-नेति' कहते हैं, क्या किसीने उन्हें देखा है? वहाँ उपस्थित सभी लोग कहने लगे कि हमने उन्हें नहीं देखा है। उस काशीनगरीकी सीमामें स्थित लोगोंने जब यह बात सुनी तो उन्होंने बताया कि वे विनायक शुक्ल नामक ब्राह्मणके घरमें आये हुए हैं। तदनन्तर सब लोग उनके घर गये। जब उन्होंने वहाँ भी विनायकको नहीं देखा तो उन्होंने उन ब्राह्मणसे पूछा, तो उन्होंने बताया कि वे यहाँसे चले गये हैं॥ ३-५॥ वे मायामय विनायक वहाँके लोगोंको वंचित करनेके लिये उत्सुक होकर साथके बालकोंको छोड़कर पीछेके दरवाजेसे आकर घरमें सो गये॥ ६॥ किसीने उन्हें गुफामें सिंहकी भाँति सोया हुआ

३३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- देखा। कुछने क्रोधित होकर उनकी निन्दा करते हुए कहा-यह तुच्छ बालक पिशाचके समान उस दरिद्र ब्राह्मणके घरमें क्यों गया? यदि यह ईश्वर है और सभीके मनोभावोंको जाननेवाला है, तो इसे सभीका प्रिय करना चाहिये। तदनन्तर उन (विनायक)-को उठाकर हाथमें पकड़कर उन्होंने कहा- हमारे शुभ भवनमें चलें और हमने आपके लिये जो सामग्री एकत्रित की है, उसे सफल करें ॥ ७-९॥ आपके चरणकमलोंका दर्शन करके हमें जो आपको ढूँढ़नेमें कष्ट हुआ था, वह दूर हो गया है। अब आप बालकोंके साथ भोजन करनेके लिये हमारे घरोंको चलें। उन्होंने कहा-इस समय तो मैंने भोजन कर लिया है, तब उन लोगोंने पुनः उनसे कहा- उस भिक्षा माँगनेवाले ब्राह्मणके घरमें आपने क्या खाया होगा? हे विभो! ऐसे व्यक्तिके घरमें तो जलतक नहीं पिया जाता, फिर आपने वहाँ भोजन क्यों किया? ॥ १०-१११/२॥ गणेशजी बोले- मेरा पेट बहुत भरा हुआ है, इस समय मुझमें चलनेकी भी शक्ति नहीं है ॥ १२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर यह जानकर कि इन्होंने शुक्ल ब्राह्मणके घरमें भोजन किया है, वे सभी निराश, भग्न- मनोरथ, रुष्ट, अनाथ तथा चेतनाहीन-से हो गये ॥ १३ ॥ हमारे द्वारा बड़े कष्टपूर्वक तथा धन व्यय करके संग्रह की गयी सब सामग्री व्यर्थ चली गयी। ऐसा कहते हुए उन दुष्टजनोंने; जो कि दाम्भिक थे और भक्तिसे रहित थे, सब सामग्री स्वयं खा ली ॥ १४ ॥ जो लोग विनायकके वास्तविक भक्त थे, वे निराहार रहकर और उनके ध्यानमें निरत हो गये। इस प्रकार सभी लोगोंको ध्यानपरायण जानकर वे विनायक एक होते हुए भी उसी प्रकार नाना स्वरूपवाले हो गये, जैसे कि एक ही आकाश विभिन्न घटोंमें विभिन्न स्वरूपोंवाला हो जाता है और जैसे एक ही सूर्य जलसे भरे अनेक कलशोंमें अनेकविध दिखायी देता है ॥ १५-१६ ॥ वे विनायक कहीं पलंगपर सो रहे थे, कहीं जपमें तल्लीन थे, कहीं दान देनेमें निरत दिखायी दे रहे थे, तो कहीं भोजन करनेके लिये उत्सुक दिखायी दे रहे थे। कहीं वे शिष्योंको शिक्षा, कल्प आदि वेदांगोंके सहित वेदोंके अर्थको पढ़ा रहे थे, कहीं शास्त्रकी व्याख्या करते दिखायी दे रहे थे, तो कहीं स्वयं अध्ययनमें निरत दिखायी दे रहे थे ॥ १७-१८॥ इस प्रकार वे विविध स्वरूपोंके द्वारा विभिन्न घरोंमें स्थित हुए। सभी लोग यही समझ रहे थे कि ये विनायक सबसे पहले हमारे ही घर आये ॥ १९ ॥ उन्होंने उन विनायकको तेल, उबटन, स्नानकी सामग्री तथा भोजन प्रदान किया। इस प्रकार काशिराज- सहित समस्त नगरवासी अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ २० ॥ उन विनायकदेवका दर्शनकर लोगोंने परम प्रसन्नताके साथ उनका पूजन किया। उन्हें भोजन कराया, साथ ही ब्राह्मणों तथा बन्धु-बान्धवोंको भी भोजन कराया ॥ २१ ॥ सभी लोगोंने अपनी-अपनी रुचिके अनुसार पंचामृत, पक्वान्न, विविध व्यंजन, खीर और ओदन तथा जो-जो भी अच्छा लगा, उसका भोजन किया। इस प्रकार ब्राह्मणों, देवताओं, काशिराज तथा मित्रगणोंके भी भोजन कर चुकनेपर सभामें विराजमान काशिराज अनेक स्वरूप धारण करनेवाले मुनि कश्यपके पुत्र उन विनायककी मायासे मोहित होकर इस प्रकार पूछने लगे - ॥ २२- २३१/२ ॥ राजा बोले- वे विनायकदेव भोजन करनेके लिये अनेक घरोंमें गये हैं - यह तो स्पष्ट है, किंतु ये तो मेरे समीपमें ही स्थित हैं। फिर घर-घरमें जाकर कौन भोजन कर रहा है? कहीं ये विनायक डोलीमें चढ़कर भोजन करनेके लिये जा रहे हैं, तो कहीं हाथीमें आरूढ़ होकर जा रहे हैं और कहीं घोड़ेपर सवार होकर जा रहे हैं। इस प्रकारसे जब [काशिराज ऊहापोहमें पड़े थे और] सभी लोग बालक विनायककी पूजामें संलग्न थे, उसी समय दोनों कुमार सनक और सनन्दन स्नान करनेके अनन्तर सम्पूर्ण नित्यकर्म सम्पन्न करके भिक्षाके लिये उस काशीनगरीमें भ्रमण करने लगे ॥ २४-२७ ॥ वे दोनों सनक तथा सनन्दन जिस-जिस घरमें भिक्षा माँगने गये, वहाँ-वहाँ उन्होंने विनायकको भोजन

क्री०ख०-अ०२४ ] * काशीमें विनायकद्वारा एक ही समयमें अनेक घरोंमें भोजन करना * ३३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] करते हुए देखा ॥ २८ ॥ किसी घरमें वे आसनपर शयन करते हुए दिखायी पड़े। कहीं फलोंका भक्षण करते हुए दिखायी दिये। कहीं ताम्बूलका सेवन करते हुए तो कहीं गन्ध आदि द्रव्योंसे अनुलेपित दिखायी दिये ॥ २९ ॥ कहीं अपने गणोंके साथ गणिकाओंका नृत्य देखते हुए दिखायी दिये। कहीं अपने बुद्धि-कौशलसे अक्षक्रीडा करते हुए दिखायी दिये ॥ ३० ॥ कहींपर वे विविध प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत तो कहीं दिव्य वस्त्रोंको धारण किये हुए दिखायी दिये। कहींपर वे स्वयं अध्ययन करते हुए, कहींपर जप करते हुए तो कहींपर ध्यानपरायण दिखायी दिये ॥ ३१ ॥ कहींपर भक्तोंद्वारा उनकी स्तुति की जा रही थी। कहींपर वे विनायक जगदीश्वरकी स्तुति कर रहे थे। कहींपर अपने भक्तोंको अपनी विविध विभूतियोंका दर्शन कराते हुए वे दिखलायी पड़े ॥ ३२ ॥ उन सनक-सनन्दनाने कहींपर अपनी मनोरम पत्नियोंके साथ रमण करते हुए युवा पुरुषके रूपमें उनको देखा। कहींपर वे वृद्धजनोंकी चिकित्सा करते हुए चिकित्सकके रूपमें तो कहीं-कहीं उत्तम रसायनोंका सेवन करते हुए उन्होंने विनायकको देखा ॥ ३३ ॥ कहींपर वे विनायक आँगनमें रेंगते हुए मिट्टी खाते हुए दिखायी दिये, तो कहीं वे गेंद आदिकी क्रीड़ासे थककर जल पीते हुए दिखायी दिये ॥ ३४ ॥ इस प्रकार वे दोनों कुमार सनक और सनन्दन घर- घर घूमते हुए अत्यन्त थकित तथा भूखे हो गये थे। सभी घरोंमें उन विनायकको देखकर वे आपसमें ही इस प्रकार कहने लगे— ॥ ३५ ॥ इस काशीनगरीमें शुक्ल नामक ब्राह्मण अत्यन्त पवित्र तथा निर्मल हैं, अतः हम लोग भोजनके लिये वहाँ चलें, ऐसा कहकर वे दोनों उनके घर गये ॥ ३६ ॥ वहाँ भी उन दोनोंने उनके आँगनमें स्थित उन

[दायाँ स्तम्भ] विनायकको देखा, यहाँ विनायकके बिना कोई घर बचा नहीं है, अतः इस नगरमें भोजन नहीं करना चाहिये ॥ ३७ ॥ ऐसा कहकर जब वे बाहर आये तो अपने सामने विनायकको स्थित देखकर वे दोनों तिरछे चलने लगे, वहाँ भी उन्होंने अपने सामने उन विनायकको देखा ॥ ३८ ॥ उन्होंने पूर्व, पश्चिम आदि चारों दिशाओंमें तथा ऊपर और नीचे सर्वत्र विनायकको ही व्याप्त देखा ॥ ३९ ॥ तदनन्तर उन्होंने विनायकके विश्वरूपको देखा। उन्होंने जगत्की समस्त वस्तुओंको विनायकमय देखा ॥ ४० ॥ अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर जब उन्होंने विष्णु तथा शंकरका ध्यान किया तो अपने हृदयमें भी उस समय उन विनायकको ही स्थित देखा ॥ ४१ ॥ फिर उन मुनिश्रेष्ठोंने जब अपने नेत्रोंको बन्द किया तो अपने हृदयमें वे ही विनायक स्थित दिखायी दिये और नेत्रोंको खोलनेपर भी अपने हृदयके भीतर उन विनायकको ही स्थित देखा ॥ ४२ ॥ उस समय वे विनायक मुकुट, कुण्डल तथा मोतियोंकी मालाको धारण किये हुए थे। श्रेष्ठ बाजूबन्द, सुवर्णमय कटिसूत्र तथा मुद्रिकाओंसे वे विभूषित थे। वे सिंहपर विराजमान थे। उनकी दस भुजाएँ थीं। वे सिद्धि तथा बुद्धि नामक पत्नियोंसे समन्वित थे। उनका स्वरूप अत्यन्त मंगलमय था। उन्होंने अपने मस्तकपर चन्द्रमाको धारण कर रखा था और कस्तूरीका तिलक लगाया हुआ था। उन विनायकने सर्पको आभूषणके रूपमें धारण किया हुआ था। करोड़ों सूर्योंके समान उनकी आभा थी। वे सृष्टि, स्थिति तथा संहारके कारणरूप थे ॥ ४३-४४१/२ ॥ उन्हींकी कृपासे उन दोनों मुनीश्वरों सनक तथा सनन्दनने विवेक-ज्ञान प्राप्त किया। तदनन्तर उन दोनों तत्त्वज्ञानियोंने भेददृष्टिका परित्यागकर उन विनायकदेवके चरण-कमलोंमें प्रणाम किया और अत्यन्त भक्तिभावसे उन देवदेव विनायककी स्तुति की ॥ ४५-४६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'काशीमें विनायकके [द्वारा एक ही समयमें अनेक गृहोंमें] भोजनादि [क्रियाओंको सम्पन्न करना तथा सनक-सनन्दनको बोधकी प्राप्ति]-का वर्णन' नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥ ❖ ─── ❖

Kalyana Visheshank 2021_Section_12_1_Front

पच्चीसवाँ अध्याय

३३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पच्चीसवाँ अध्याय कुमार सनक तथा सनन्दनद्वारा की गयी विनायक-स्तुति, उनके द्वारा काशीमें गणेशकुण्डका निर्माण तथा मन्दिर बनाकर उसमें वरदविनायक नामक विनायक-मूर्तिका प्रतिष्ठा, भक्तिकी महिमा

सनक-सनन्दन बोले-आप सभी कारणोंके कारण और कारणोंसे अतीत हैं। आप ब्रह्मस्वरूप, ब्रह्माण्डके कारण, व्यापक और [परसे भी] परे हैं॥ १ ॥ हे अनघ! आप ही विश्वकी रचना करते हैं, इसका पालन-पोषण करते हैं और आप ही इसका संहरण करनेवाले हैं। आप विविध स्वरूपोंवाले हैं और रूपरहित भी हैं। आप विविध प्रकारके मायाबलसे समन्वित हैं। आप ही पृथ्वी आदि पंचमहाभूत, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस हैं। आप चराचरस्वरूप हैं, अतः आपकी स्तुति करनेमें कौन समर्थ है? ॥ २-३ ॥ आपके यथार्थ स्वरूपको न जाननेके कारण वेद ‘नेति-नेति’ कहकर आपको पुकारते हैं। हम दोनों भी आपकी मायासे विमोहित होनेके कारण आपके श्रेष्ठ स्वरूपको जाननेमें समर्थ नहीं हो सके ॥ ४ ॥ हे विभो ! अनेक रूप धारण करनेवाले आपकी महिमाको हम नहीं जानते हैं। हे प्रभो! इस समय हम आपके चरणोंका दर्शन करके कृतकृत्य हो गये हैं। आप अपनी अनन्त शक्तियोंके द्वारा नाना अवतारोंको धारणकर पृथ्वीके भारका हरण करते हैं॥ ५१/२॥ ब्रह्माजी बोले-उन दोनोंके द्वारा की गयी इस प्रकारकी स्तुतिको सुनकर मायावी और अत्यन्त कौतुकी बालरूपी वे विनायक प्रसन्न होकर उनसे बोले-आप दोनों मेरी कृपासे तत्त्वका ज्ञान रखनेवाले और सर्वज्ञ हो जाओगे॥ ६-७॥ इस प्रकारका वर प्रदानकर वे विनायकदेव वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर उन दोनों कुमारों सनक तथा सनन्दनने भलीभाँति विनायककी अतुलनीय मूर्तिका निर्माणकर तथा रत्नों एवं सुवर्णसे निर्मित एक अद्वितीय मन्दिर बनाकर उसमें उस मूर्तिकी स्थापना की ॥ ८-९ ॥ उन्होंने उस मूर्तिका ‘वरदविनायक’ यह नाम

रखा। उन दोनोंने वहींपर ‘गणेशकुण्ड’ नामसे एक सरोवर भी बनवाया॥ १०॥ इस गणेशकुण्डमें स्नानकर जो वरदविनायककी पूजा करता है। वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करता है और अनेक भोगोंका भोग करता है॥ ११॥ वह पुत्र-पौत्रों, विद्या, आयु, महान् यश, धन, धान्य, कीर्ति और शाश्वत तत्त्वज्ञानको प्राप्त करता है। अन्तमें वह विनायकके धामको प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १२१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-उसी समय गन्धर्वों, यक्षों तथा अप्सराओंके साथ सभी देवता वहाँ आये और उन देवेश वरदविनायकका दर्शन तथा पूजनकर वहीं क्षणभरमें अन्तर्धान हो गये। वे दोनों कुमार सनक तथा सनन्दन भी अत्यन्त आश्चर्यान्वित होते हुए उत्तम देवलोकको चले गये ॥ १३-१४॥ काशिराज भी अपने अमात्यों तथा प्रजाजनोंके साथ वहाँ आये और उन्होंने विविध द्रव्यों, अलंकारों, विविध उत्तरीयों तथा अधोवस्त्रों, अनेक प्रकारके पक्वान्नों, नानाविध फलों, रत्नों, मोतियों, पुष्पों तथा बहुत प्रकारकी दक्षिणाओंके द्वारा ब्राह्मणोंके साथ मन्त्रोच्चारपूर्वक परम भक्तिसे उन वरदविनायकका पूजन किया। तदनन्तर उन्होंने वस्त्रों तथा स्वर्णाभूषणोंसे ब्राह्मणोंका पूजन किया ॥ १५-१७॥ आशीर्वाद ग्रहणकर वे पुनः अपने नगरको आये। राजाके समान ही उन मन्त्रियों आदिने भी उन वरदविनायकका पूजन किया। उन्होंने भी उसी प्रकार ब्राह्मणोंका भी पूजनकर उनसे उत्तम आशीर्वाद ग्रहण किया। तदनन्तर प्रजाजनोंने भी यथाशक्ति उन विनायकका पूजन किया ॥ १८-१९॥ सभीने प्रसन्नमन होकर नगरमें प्रवेश किया। [हे व्यासजी!] इस प्रकार मैंने विनायकद्वारा की गयी

Kalyana Visheshank 2021_Section_12_1_Back

वृत्तिवाले शुक्ल नामक ब्राह्मणके चरित्रका श्रवण किया।

क्री०ख०-अ०२६ ] * व्याध तथा राक्षसद्वारा अनजानेमें ही गणेशजीपर शमीपत्रका गिर जाना * ३३३ चेष्टाओंको पूर्णरूपसे आपको बतलाया, इसका श्रवण करनेसे सभी पापोंका विनाश तथा पुण्यकी प्राप्ति होती है। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ २०१/२ ॥ मुनि व्यासजी बोले- [हे ब्रह्मन् !] मैंने न्यायोचित वृत्तिवाले शुक्ल नामक ब्राह्मणके चरित्रका श्रवण किया। वे अपने घरमें धातुके किसी भी पात्रके न होनेके कारण धातुके स्पर्शसे रहित थे। उनके घरमें देव विनायक गये। उन्होंने गीले भातको बहनेसे रोकनेके लिये अपने दसों हाथोंसे उसे उठाकर जलके साथ ग्रहण करके अपनी थकान दूर की और पूर्ण संतृप्त होकर उनकी दरिद्रता दूर कर दी ॥ २१-२२१/२ ॥ उन्होंने उन शुक्ल ब्राह्मणको इन्द्रके भवनसे भी श्रेष्ठ भवन प्रदान किया और जो सम्पदाएँ अलकाधिपति कुबेरके पास नहीं थीं, उन्हें उनको प्रदान किया। मकरध्वज कामदेवके पास भी जो सौन्दर्य नहीं था, वह उन्हें प्रदान किया। चतुर्मुख ब्रह्माजीके पास भी जो ज्ञान नहीं था, वह उन्हें दिया। हे ब्रह्मन् ! इसमें क्या कारण है, उसे मुझको आप बतानेकी कृपा करें ? ॥ २३-२५ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे व्यासजी! आपने बहुत अच्छी बात पूछी है; क्योंकि परमेश्वर विनायकदेवकी कथाको भक्तिपूर्वक सुननेसे वह प्रश्न करनेवाले, सुननेवाले तथा बतानेवाले कथावाचकको भी पवित्र कर देती है ॥ २६ ॥ हे मुने ! आपने जो कुछ पूछा है, उसे बतानेके लिये मेरा मन भी उत्सुक हो रहा है। भक्तिभावसे प्राप्त होनेवाले विनायकदेवके चरित्रको मैं सम्यक् रूपसे आपको बताऊँगा। वे विनायकदेव सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, सर्वत्र व्याप्त तथा सभीके चित्तकी वृत्तिको जाननेवाले हैं। वे देव भक्तिके द्वारा ही प्रसन्न होते हैं; क्योंकि भक्तिभाव ही उनकी सन्तुष्टिका कारण है ॥ २७-२८ ॥ भक्तिपूर्वक समर्पित किये गये पत्र, जल, मनोहर पुष्पसे भी वे परम प्रसन्न होकर स्वयं अपनेको ही भक्तको समर्पित कर देते हैं ॥ २९ ॥ दम्भपूर्वक, अवहेलनापूर्वक अथवा दूसरेको देखकर लज्जापूर्वक समर्पित की गयी महान् सम्पत्ति अथवा महान् वस्तु या विविध रत्न, स्वर्ण, चाँदी या मोती आदि सब व्यर्थ होता है, केवल शमीपत्रमात्र समर्पित करनेवाले व्याधको उन्होंने अपना सालोक्य प्रदान कर दिया। हृदयमें दृढ़ भक्तिभाव रखकर किसी प्रसंगवश अनायास उपलब्ध पत्र-पुष्पादि अर्पित करनेसे भी वे प्रसन्न हो जाते हैं, अतः भक्ति श्रेष्ठ है ॥ ३०-३२॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालचरितके अन्तर्गत सनक-सनन्दनद्वारा की गयी विनायक-स्तुति एवं भक्तिकी प्रशंसाका वर्णन' नामक पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २५ ॥ छब्बीसवाँ अध्याय व्याध तथा राक्षसद्वारा अनजानेमें ही गणेशजीके ऊपर शमीपत्रके गिर जानेसे प्रसन्न विनायकद्वारा उन दोनोंको अपने लोककी प्राप्ति कराना मुनि व्यासजी बोले- [हे ब्रह्मन् !] व्याधने कौन-सा कर्म किया था? उसने कैसे शमीपत्र चढ़ाया ? उसका क्या नाम था और कैसे उसने विनायकके सालोक्यको प्राप्त किया? यह सब आप मुझे बतलाइये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले- विदर्भ नामक देशमें मदिष नामवाला एक नगर था। वह नगर तीनों लोकोंमें विख्यात था और कुबेरकी नगरी अलकापुरीके समान था ॥ २ ॥ उस नगरमें भीम नामका एक व्याध था, जो मांसका विक्रय करता था। यद्यपि दूसरेके दोषोंका कथन करनेमें दोष होता है, तथापि पूछे जानेपर यथार्थरूपसे उसका वर्णन करना चाहिये, ईर्ष्या-द्वेषवश नहीं ॥ ३१/२ ॥ बहुत-से दोषोंसे व्याप्त वह भीम नामक व्याध बाण, धनुष, बाणोंसे भरा तरकश, खड्ग, चाप तथा छूरी लेकर नित्य वनमें जाता था और प्राणियोंका वधकर अपने कुटुम्बके भरणमें परायण रहता था ॥ ४-५ ॥ वह निर्दयी व्याध निर्जन वनमें पथिकों तथा ब्राह्मणोंका भी वध कर डालता था। किसी समयकी बात है, उस मदिष नामक नगरमें एक महोत्सव प्रारम्भ हुआ। Kalyana Visheshank 2021_Section_12_2_Front