गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
८७ बालकाण्ड धारण किये हैं । उनकी पेंजनी और किङ्किणीकी ध्वनि सुनकर मन आनन्दित होता है और सर्वदा उनके समीप रहता है ॥ १ ॥ भुजाओंमें सुन्दर पहुँची तथा अङ्गद (बिजायठ) धारण किये हैं, वक्षःस्थलपर पदिक और हार सुशोभित हैं तथा उनके कुण्डल और तिलककी छवि कविके हृदयमें गड़ी जाती है । सिरपर लाल टोपी है, नेत्रकमल अति विशाल हैं तथा मुख अति सुन्दर है । ऐसे रूपसे भगवान् कल्पवृक्षकी छायामें खड़े हुए हैं ॥ २ ॥ अनुज और अन्य बालकोंके सहित सर्वाङ्गसुन्दर भगवान् रामको नर-नारी इस प्रकार एकटक देखते रह जाते हैं जैसे हरिण दीपकको । इस प्रकार अवधकी गलियोंमें गोली, भँवरा, लट्टू और डोरीसे खेलती हुई प्रभुकी वह मधुर मूर्ति तुलसीदासके हृदयमें निवास करे ॥ ३ ॥ [ ४४ ] छोटिए धनुहियाँ, पनहियाँ पगनि छोटी, छोटिए कछौटी कटि, छोटिए तरकसी । लसत झँगूली झीनी, दामिनिकी छबि छीनी, सुंदर बदन, सिर पगिया जरकसी ॥ १ ॥ बय-अनुहरत बिभूषन बिचित्र अंग, जोहे जिय आवति सनेहकी सरक सी । मूरतिकी सूरति कही न परै तुलसी पै, जानै सोई जाके उर कसकै करक सी ॥ २ ॥ हाथोंमें छोटा-सा धनुष, पैरोंमें छोटी-छोटी जूतियाँ तथा कमरमें छोटी-सी कछनी और एक छोटा-सा तरकस सुशोभित है । [अति सुन्दर श्याम शरीरमें] पीले रंगकी महीन झँगुली है, जिसने मानों
गीतावली ८८ बिजली छवि छीन ली है। मुख सुन्दर है तथा सिरपर जरीके कामकी पगिया विराजमान है ॥ १ ॥ शरीरमें अवस्थाके अनुसार अनेक प्रकार के आभूषण हैं, जिन्हें देखकर हृदयमें प्रेमकी लहर-सी आती है। भगवान्की मनोहर मूर्तिकी सूरत तुलसीदाससे नहीं कही जाती। वही जान सकता है जिसके हृदयमें वह पीड़ाके समान कसकती है ॥ २ ॥ राग तोड़ी [ ४५ ] राम-लषन इक ओर, भरत-रिपुदवन लाल इक ओर भये । सरजुतीर सम सुखद भूमि-थल, गनि-गनि गोइयाँ बाँटि लये ॥ १ ॥ कंदुक-केलि-कुसल हय चढ़ि-चढ़ि, मन कसि कसि ठोंकि ठोंकि खये । कर-कमलनि बिचित्र चौगानें, खेलन लगे खेल रिझये ॥ २ ॥ ब्योम बिमाननि बिबुध बिलोकत खेलक पेखक छाँह छये । सहित समाज सराहि दसरथहि बरषत निज तरु-कुसुम-चये ॥ ३ ॥ एक लै बढ़त, एक फेरत, सब प्रेम-प्रमोद-बिनोद-मये । एक कहत भइ हार रामजूकी, एक कहत भइया भरत जये ॥ ४ ॥ प्रभु बकसत गज बाजि, बसन-मनि, जय धुनि गगन निसान हुये । पाइ सखा-सेवक-जाचक भरि जनम न दुसरे द्वार गये ॥ ५ ॥ नभ-पुरपरति निछावरि जहाँ तहँ, सुर-सिद्धनि बरदान दये । भूरि-भाग अनुराग उमगि जे गापत-सुनत चरित नित ये ॥ ६ ॥ हारे हरष होत हिय भरतहि, जिते सकुच सिर नयन नये । तुलसी सुमिरि सुभाव-सील सुकृती तेइ जे एहि रंग रए ॥ ७ ॥ एक ओर राम और लक्ष्मण तथा दूसरी ओर भरत एवं शत्रुघ्नलाल हुए। उन्होंने सरयूतीरकी सुखदायक और समतलभूमिमें
८६ बालकाण्ड जाकर गिन-गिनकर साथी बाँट लिये ॥ १ ॥ फिर खेलमें रीझे हुए चारों भाई गेंदके खेलमें सधाये हुए घोड़ोंपर चढ़ फेंटा कसकर खम ठोंकते हुए करकमलोंसे विचित्र चौगान खेलने लगे ॥ २ ॥ आकाश- में देवतालोग विमानोंमें चढ़कर देख रहे हैं और खेलनेवालों तथा देखनेवालोंपर छाया किये हुए हैं । देवता लोग दशरथजीकी—उनके समाजके सहित—प्रशंसा करते हैं और कल्पवृक्षके पुष्पोंकी लड़ियाँ बरसाते हैं ॥ ३ ॥ सब बालक प्रेम, आनन्द और विनोदमें मग्न हैं। उनमेंसे एक ओरके बालक गेंदको लेकर आगे बढ़ते हैं तो दूसरी ओर के उन्हें लौटा देते हैं। कोई कहते हैं रामकी हार हुई और कोई कहते हैं भैया भरत जीते हैं ॥ ४ ॥ प्रभु हाथी, घोड़े, वस्त्र और मणियां बख्शते हैं; आकाशमें विमानोंसे जयध्वनिके सहित दुन्दुभियाँ बजायी जा रही हैं। प्रभुसे पारितोषिक पाकर सखा- सेवक और याचकगण जन्मभर दूसरेके द्वारपर नहीं गये ॥ ५ ॥ आकाशसे तथा नगरमें जहाँ-तहाँ निछावरकी वर्षा हो रही है तथा देवता और सिद्धगण 'आशीर्वाद दे रहे हैं। प्रभुके इन नित्य नवीन चरित्रोंको जो लोग प्रेममें भरकर गाते या सुनते हैं वे बड़े ही भाग्यशाली हैं ॥ ६ ॥ भरतजीको खेलमें हार जानेपर तो हर्ष होता है और जीतनेपर सङ्कोचवश उनके सिर और नयन नीचे हो जाते हैं। [ अतः भगवान् बार-बार उन्हींकों जिता देते हैं। ] तुलसीदास कहते हैं प्रभुके ऐसे शील और स्वभावकों स्मरणकर जो इसी रङ्गमें रँगे हुए हैं वे लोग बड़े पुण्यशाली हैं ॥ ७ ॥ [ ४६ ] खेलि खेल सुखेलनिहारे । उतरि उतरि, चुचुकारि तुरंगनि, सादर जाइ जोहारे ॥ १ ॥
गीतावली ६० बंधु-सखा-सेवक सराहि, सनमानि सनेह सँभारे। दिये बसन-गज-बाजि साजि सुभ साज सुभाँति सँवारे ॥ २ ॥ मुदित नयन फल पाइ गाइ गुन सुर सानंद सिधारे। सहित समाज राजमंदिर कहँ राम राउ पगु धारे ॥ ३ ॥ भूप-भवन घर-घर घमंड कल्यान कोलाहल भारे। निरखि हरषि आरती-निछावरि करत सरीर बिसारे ॥ ४ ॥ नित नए मंगल-मोद अवध सब, सब बिधि लोग सुखारे। तुलसी तिन्ह सम तेउ जिन्हके प्रभुतें प्रभु-चरित पियारे ॥ ५ ॥ खेल खेलनेवालोंने खेल समाप्त कर अपने घोड़ोंसे उतर-उतरकर उन्हें चुचकारते हुए श्रीरघुनाथजीको आदरपूर्वक प्रणाम किया ॥ १ ॥ प्रभुने अपने बन्धु, सखा और सेवकोंकी सराहना तथा सम्मान करते हुए उनके प्रति प्रेम प्रकट किया तथा बहुत-से वस्त्र और सुन्दर साजसे अच्छी तरह सजाये हुए अनेक हाथी-घोड़े दिये ॥ २ ॥ फिर अति आनन्दित हो, नेत्रोंका फल पा देवतालोग भगवान्का गुणगान करते हुए आनन्दपूर्वक अपने लोकोंको गये, और रामचन्द्रजीने भी अपने समाजसहित राजमन्दिरको प्रस्थान किया ॥ ३ ॥ राजभवन तथा घर-घरमें अति महान् मङ्गलमय कोलाहल छाया हुआ है। प्रभुको देख-देखकर कौसल्या आदि माताएँ शरीरकी सुध भूलकर हर्षित चित्तसे आरती तथा निछावर कर रही हैं ॥ ४ ॥ इस प्रकार अवधमें नित्यप्रति नया-नया मङ्गल और आनन्द हो रहा है। तुलसीदास कहते हैं, जिन्हें प्रभुसे भी प्रभुके चरित्र अधिक प्रिय हैं वे लोग भी उन (अवधवासियों) के ही समान हैं ॥ ५ ॥
६१ बालकाण्ड विश्वामित्रजीका आगमन राग सारङ्ग [ ४७ ] चहत महामुनि जाग जयो । नीच निसाचर देत दुसह दुख, कृस तनु ताप तयो ॥ १ ॥ सापे पाप, नये निदरत खल, तब यह मंत्र ठयो । बिप्र-साधु-सुर-धेनु-धरनि-हित हरि अवतार लयो ॥ २ ॥ सुमिरत श्रीसारंगपानि छनमें सब सोच गयो । चले मुदित कौसिक कोसलपुर, सगुननि साथ दयो ॥ ३ ॥ करत मनोरथ जात पुलकि, प्रगटत आनंद नयो । तुलसी प्रभु-अनुराग उमगि मग मंगल-मूल भयो ॥ ४ ॥ महामुनि विश्वामित्रजी यज्ञ पूर्ण करना चाहते हैं, परन्तु नीच निशाचरगण दुःसह दुःख देते हैं । अतः उस चिन्तासे सन्तप्त रहनेके कारण उनका शरीर सूख गया है ॥ १ ॥ वे यदि शाप देते हैं तो उन्हे पाप लगता है और यदि झुकते हैं तो दुष्ट निशाचरादि उनका तिरस्कार करते हैं । अतः उन्होंने यह विचार किया—'ब्राह्मण, साधु, देवता, गौ और पृथ्वीके हितके लिये इस समय श्रीहरिने अवतार लिया है' ॥ २ ॥ इस प्रकार श्रीशार्ङ्गपाणिकी याद आते ही क्षणभरमें उनका सारा शोक दूर हो गया । अतः मुनिवर कौशिक प्रसन्न चित्तसे अयोध्यापुरीको चल दिये । इन समय शकुनोंने भी उनका साथ दिया ॥ ३ ॥ वे मार्गमें तरह-तरहके मनोरथ करते जाते थे; उस समय उनके शरीरमें पुलकावली हो आनेसे नया-नया आनन्द प्रकट होता था । तुलसीदास कहते हैं—प्रभु-प्रेमके अनुरागकी उमङ्गमें उन्हें वह मार्ग बड़ा मङ्गलमय हो गया ॥ ४ ॥
गीतावली ६२ [ ४८ ] आजु सफल सुकृत फलु पाइहौं । सुखकी सींव, अवधि आनँदकी अवध बिलोकि हौं पाइहौं ॥ १ ॥ सुतनि सहित दसरथहि देखिहौं, प्रेम पुलकि उर लाइहौं । रामचंद्र-मुखचंद्र-सुधा-छबि नयनचकोरनि प्याइहौं ॥ २ ॥ सादर समाचार नृप बुझिहैं, हौं सब कथा सुनाइहौं । तुलसी ह्वै कृतकृत्य आश्रमहिं राम लखन लै आइहौं ॥ ३ ॥ आज मैं सम्पूर्ण शुभ कर्मोंका फल पा लूंगा, क्योंकि सुखकी सीमा तथा आनन्दकी अवधि अवधपुरीको देख पाऊँगा ॥ १ ॥ मैं पुत्रोंके सहित दशरथजीको देखूंगा और प्रेमसे पुलकित हो उन्हें हृदयसे लगाऊँगा तथा रामचन्द्रजीके मुखचन्द्रकी छविरूप सुधाका अपने नेत्ररूप चकोरोंको पान कराऊँगा ॥ २ ॥ महाराज आदरपूर्वक मुझसे सारे समाचार पूछेंगे और मैं उन्हें सारी कथा सुनाऊँगा । तुलसीदास कहते हैं फिर मैं कृतकृत्य होकर राम और लक्ष्मणको अपने आश्रमपर ले आऊँगा ॥ ३ ॥ राग नट [ ४९ ] देखि मुनि ! रावरे पद आज । भयो प्रथम गनतीमें अबतें हौं जहाँ लौं साधु समाज ॥ १ ॥ चरन बंदि, कर जोरि निहोरत, “कहिय कृपा करि काज । मेरे कछु न अदेय राम बिनु, देह-गेह सब राज” ॥ २ ॥ भली कही भूपति त्रिभुवनमें को सुकृती-सिरताज ? तुलसि राम-जनमहितें जनियत सकल सुकृतको साज ॥ ३ ॥
६३ बालकाण्ड [ महाराज दशरथ कहते हैं ] हे मुनिवर ! आज आपके चरणकमल देखकर मैं जहाँतक साधुसमाज है वहाँतक गिनतीमें सबसे आगे हो गया हूँ ॥ १ ॥ फिर चरणवन्दना कर, हाथ जोड़, निहोरा कर कहने लगे—'मुनिवर ! कृपा करके अपना कार्य बतलाइये; एक रामको छोड़कर और देह, गेह तथा सम्पूर्ण राज्यादिमेंसे कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसे मैं न दे सकूँ' ॥ २ ॥ [विश्वामित्रजी बोले—] राजन् ! तुमने बहुत ठीक कहा । त्रिलोकीमें तुम्हारे सिवा और कौन पुण्यवानोंमें शिरोमणि है ? क्योंकि सम्पूर्ण सुकर्मोंका साज तो भगवान् रामके जन्मसे ही जाना जा रहा है । [ तात्पर्य, जब आप सुकृतसींव हैं तभी तो साक्षात् परब्रह्म परमात्माने आपके यहाँ जन्म लिया है ] ॥ ३ ॥ [ ५० ] राजन ! राम-लषन जो दीजै । जस रावरो, लाभ ढोटनिहूँ, मुनि सनाथ सब कीजै ॥ १ ॥ डरपत हौ साँचे सनेह-बस सुत-प्रभाव बिनु जाने । बूझिय बामदेव अरु कुलगुरु, तुम पुनि परम सयाने ॥ २ ॥ रिपु रन दलि, मख राखि कुसल अति अलप दिननि घर ऐहैं । तुलसिदास रघुबंसतिलककी कबिकुल कीरति गैहैं ॥ ३ ॥ हे राजन् ! यदि आप राम और लक्ष्मण कों दे दें तो आपका तो यश हो और बालकोंका बड़ा लाभ हो । अतःआप सब मुनियोंको सनाथ कर दीजिये ॥ १ ॥ तुम अपने पुत्रोंका प्रभाव न जाननेसे जो स्नेहवश डरते हो वह ठीक ही है, किन्तु इनके विषयमें तुम वामदेवजी और अपने कुलगुरु वसिष्ठजीसे तो पूछो । इसके सिवा
गीतावली ६४ तुम स्वयं भी बड़े चतुर हो ॥ २ ॥ ये अपने शत्रुओंका युद्धमें दलन कर मेरे यज्ञकी रक्षा करेंगे और थोड़े ही दिनोंमें कुशलपूर्वक घर लौट आयेंगे । तुलसीदासजी कहते हैं, इन रघुवंशतिलककी कीर्तिका कविजन गान करेंगे ॥ ३ ॥ [ ५१ ] रहे ठगिसे नृपति सुनि मुनिबरके बयन । कहि न सकत कछु राम-प्रेमबस, पुलक गात, भरे नीर नयन ॥ १ ॥ गुरु बसिष्ठ समुझाय कह्यो तब हिय हरषाने, जाने सेष-सयन । सौंपि सुत गहि पानि, पाँय परि, भूसुर उर चले उमगि चयन ॥ २ ॥ तुलसी प्रभु जोहत पोहत चित, सोहत मोहत कोटि मयन । मधु-माधव-मूरति दोउ सँग मानो दिनमनि गवन कियो उतर अयन ॥ ३ ॥ मुनिवर विश्वामित्रके वचन सुनकर महाराज दशरथ ठगे-से रह गये । वे भगवान् रामके प्रेमवश कुछ कह न सके । उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया तथा नेत्रोंमें जल भर आया ॥ १ ॥ तब गुरु वसिष्ठजीने उन्हें समझाया । इससे उन्होंने भगवान् रामको शेषशायी भगवान् जाना तथा मनमें हर्ष माना । फिर उन्होंने पुत्रोंका हाथ पकड़कर विश्वामित्रजीके चरणोंमें गिरकर उन्हें सौंप दिया । इससे मुनिवरके हृदयमें आनन्द उमड़ने लगा ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं—भगवान् करोड़ों कामदेवोंके समान शोभायमान एवं मनोमोहक हैं, वे दृष्टि पड़ते ही चित्तको अपनेमें बाँध लेते हैं । वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो सूर्यदेवके उत्तरायणमें गमन करते समय, साथमें चैत्र और वैशाख दोनों मासोंकी मूर्तियाँ विराजमान हैं ॥ ३ ॥
६५ बालकाण्ड राग सारङ्ग [ ५२ ] ऋषि सँग हरषि चले दोउ भाई । पितु-पद बंदि सीस लियो आयसु, सुनि सिष आसिष पाई ॥ १ ॥ नील पीत पाथोज बरन बपु, बय किसोर बनि आई । सर धनु-पानि, पीत पट कटितट, कसे निखंग बनाई ॥ २ ॥ कलित कंठ मनि-माल, कलेवर चंदन खौरि सुहाई । सुंदर बदन, सरोरुह-लोचन, मुखछबि बरनि न जाई ॥ ३ ॥ पल्लव, पंख, सुमन सिर सोहत क्यों कहौं बेष-लुनाई ? मनु मूरति धरि उभय भाग भइ त्रिभुवन सुंदरताई ॥ ४ ॥ पैठत सरनि, सिलनि चढ़ि चितवत खग-मृग-बन-रुचिराई । सादर सभय सप्रेम पुलकि मुनि पुनि-पुनि लेत बुलाई ॥ ५ ॥ एक तीन तकि हती ताड़का, बिद्या बिप्र पढ़ाई । राख्यो जग्य जीति रजनीचर, भइ जग-बिदित बड़ाई ॥ ६ ॥ चरन-कमल-रज-परस अहल्या निज पति-लोक पठाई । तुलसिदास प्रभुके बूझे मुनि सुरसरि कथा सुनाई ॥ ७ ॥ ऋषिवरके साथ दोनों भाई प्रसन्न होकर चले । पिताजीके चरणोंकी वन्दना कर उनकी आज्ञाको शिरोधार्य किया तथा उनकी शिक्षा सुन आशीर्वाद लिया ॥ १ ॥ दोनों भाइयोंके शरीर नीले और पीले कमलोंके रङ्गके हैं तथा किशोर अवस्था है। उनके हाथोंमें धनुष-बाण तथा कमरमें पीताम्बर एवं तरकस शोभायमान हैं ॥ २ ॥ मनोहर कण्ठमें मणियोंकी माला है, शरीरमें चन्दनकी खौर शोभायमान है तथा उनके मनोहर शरीर, कमल-जैसे नयन एवं मुखकी छबिका वर्णन नहीं किया जाता ॥ ३ ॥ सिरपर नवीन पत्ते, पङ्ख और पुष्प
गीतावली ६६ शोभायमान हैं । उनके वेषकी सुन्दरता किस प्रकार वर्णन करूँ ? मानो त्रिभुवनकी सुन्दरता ही मूर्तिमती होकर दो भागोंमें बँट गयी है ॥ ४ ॥ दोनों भाई सरोवरोंमें घुसते तथा शिलाओंपर चढ़कर पक्षी, मृग और वनकी सुन्दरता निहारते हैं। तब मुनिवर भययुक्त और प्रेमपुलकित हो उन्हें आदरपूर्वक बारम्बार बुला लेते हैं ॥ ५ ॥ विश्वामित्रजीने उन्हें बाणविधि सिखायी । प्रभुने ताड़काको निशाना बनाकर एक ही तीरसे मार डाला । फिर भगवान्ने राक्षसोंको जीतकर यज्ञकी रक्षा की, इससे संसारमें उनकी प्रशंसा फैल गयी ॥ ६ ॥ तदनन्तर रघुनाथजीने अपने चरणकमलसे स्पर्श करके ही अहल्याको अपने पतिलोकमें पहुँचा दिया । तुलसीदासजी कहते हैं, इसी समय प्रभुके पूछनेपर मुनिने गङ्गाजीकी कथा सुनायी ॥ ७ ॥ राग नट [ ५३ ] दोउ राजसुवन राजत मुनिके संग । नखसिख लोने, लोने बदन, लोने लोने लोयन, दामिनि-बारिद-बरबरन अंग ॥ १ ॥ सिरनि सिखा सुहाइ, उपबीत पीत पट, धनु-सर कर, कसे कटिनिखंग । मानो मख-रज निसिचर हरिबेको सुत पावकके साथ पठये पतंग ॥ २ ॥ करत छाँह घन, बरषै सुमन सुर, छबि बरनत अतुलित अनंग । तुलसी प्रभु बिलोकि मग-लोग, खग-मृग प्रेममगन रँगे रूप-रंग ॥ ३ ॥ मुनिके सङ्ग दोनों राजकुमार शोभायमान हैं। वे नखसे सिखतक सुन्दर हैं, उनके मुख और नयन भी अत्यन्त मनोहर हैं तथा शरीर बिजली और मेघके समान अति सुन्दर गौर एवं श्यामवर्ण हैं ॥ १ ॥
६७ बालकाण्ड उनके मस्तकोंपर शोभायमान है, गलेमें यज्ञोपवीत है, अङ्गमें पीताम्बर सुशोभित है, हाथमें धनुष-बाण हैं तथा कमरमें तरकस कसा हुआ है, मानो यज्ञके रोगरूप राक्षसोंका नाश करनेके लिये सूर्यदेवने अग्निके साथ अपने पुत्र दोनों अश्विनीकुमारोंको भेजा हो ॥ २ ॥ बादल छाया कर रहे हैं, देवतालोग फूल बरसाते हैं तथा उनकी छबिको कामदेवसे भी अतुलित बतलाते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुको देखकर मार्गके मनुष्य, पक्षी और मृग भगवान्के रूप-रंगमें रँगकर प्रेममें मग्न हो रहे हैं ॥ ३ ॥ राग कल्याण [ ५४ ] मुनिके संग बिराजत बीर । कालपच्छ धर, कर कोदंड-सर, सुभग पीतपट कटि कटि तूनीर ॥ १ ॥ बदन इंदु, अंभोरुह लोचन, स्याम गौर सोभा-सदन सरीर । पुलकत ऋषि अवलोकि अमित छबि, उर न समाति प्रेमकी भीर ॥ २ ॥ खेलत, चलत, करत मग कौतुक, बिलंबत सरित-सरोबर-तीर । तोरत लता, सुमन, सरसीरुह, पियत सुबासम सीतल नीर ॥ ३ ॥ बैठत बिमल सिलनि बिटपनि तर, पुनि पुनि बरनत छाँह, समीर । देखत नटत केकि, कल गावत मधुप, मराल, कोकिला, कीर ॥ ४ ॥ गी० ७-
गीतावली ६८ नयननिको फल लेत निरखि खग, मृग, सुरभी, ब्रजबधू, अहीर। तुलसी प्रभुहि देत सब आसन निज निज मन मृदु कमल कुटीर ॥ ५ ॥ मुनिवर विश्वामित्रके साथ दोनों भाई शोभायमान हैं। वे सिरपर काकपच्छ (जुल्फें), हाथोंमें धनुष-बाण तथा कमरमें सुन्दर पीताम्बर और तरकस धारण किये हुए हैं ॥ १ ॥ उनका मुख चन्द्रमाके समान, नेत्र कमलपुष्पवत् तथा शोभाके धाम श्याम-गौर शरीर हैं। उनकी अतुल छवि देखकर विश्वामित्रजी पुलकित होते हैं और उनके हृदयमें प्रेमकी उमंग नहीं समाती ॥ २ ॥ वे मार्गमें तरह- तरहके कौतुक करते खेलते चलते हैं तथा नदियों और सरोवरोंके तटपर लता, पुष्प और कमलोंको तोड़ते एवं उनका अमृतके समान शीतल जल पान करते हुए देरतक ठहरते हैं ॥ ३ ॥ वृक्षोंके नीचे स्वच्छ शिलाओंपर बैठ-बैठकर वे बारम्बार वहाँकी छाया और वायुकी प्रशंसा करते हैं। उन्हें देखकर मयूर नाचने लगते हैं एवं भ्रमर तथा कोयल और शुक आदिपक्षी बड़े सुन्दर ढंगसे गाने लगते हैं ॥ ४ ॥ प्रभुको देख-देखकर मृग, पक्षी, गौएँ, ग्वालिनी और ग्वाले अपने नेत्रोंका फल पाते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, सभी लोग अपने मनरूप कोमल कमलकी कुटियामें प्रभुको आसन देते हैं ॥ ५ ॥ राग कान्हरा [ ५५ ] सोहत मग मुनि सँग दोउ भाई। तरुन तमाल चारु चंपक-छबि कबि-सुभाय कहि जाई ॥ १ ॥
४४ बालकाण्ड
भूषन बसन अनुहरत अंगनि, उमगति सुन्दरताई। बदन मनोज सरोज लोचननि रही है लुभाइ लुनाई ॥ २ ॥ अंसनि धनु, सर कर-कमलनि, कटि ससे हैं निखंग बनाई। सकल भुवन सोभा सरबसु लघु लागति निरसि निकाई ॥ ३ ॥ महि मृदु पथ, घन छाँह, सुमन सुर बरष, पवन सुखदाई। जल-थल-रुह फल, फूल, सलिल सब करत प्रेम पहुनाई ॥ ४ ॥ सकुच सभीत बिनीत साथ गुरु बालनि-चलनि सुहाई। खग-मृग-चित्र बिलोकत बिंच बिच, लसति ललित लरिकाई ॥ ५ ॥ बिद्या दई जानि बिद्यानिधि, बिद्यहु लही बड़ाई। ख्याल दली ताड़का, देखि ऋषि देत असीस अघाई ॥ ६ ॥ बूझत प्रभु सुरसरि-प्रसंग कहि निज कुल कथा सुनाई। गाधिसुवन-सनेह-सुख-संपति उर-आश्रम न समाई ॥ ७ ॥ बनबासी बटु, जती, जोगि-जन साधु सिद्ध-समुदाई। पूजत पेखि प्रीति पुलकत तनु, नयन लाभ लुटि पाई ॥ ८ ॥ मख राख्यो खलदल दलि भुजबल, बाजत बिबुध बधाई। नित पथ-चरित-सहित तुलसी-चित बसत लखन रघुराई ॥ ६ ॥ मार्गमें विश्वामित्रजीके साथ दोनों भाई शोभायमान हैं। कवि- स्वभावसे उनके अङ्गोंके लिये तरुण तमाल तथा मनोहर चम्पक वृक्षकी उपमा कही जाती है [निकल पड़ती है] ॥ १॥ भगवान्के वस्त्र और आभूषण उनके अङ्गोंके अनुरूप ही हैं, जिनसे सुन्दरता उमड़ पड़ती है, मानो उनके मुखमण्डलमें कामदेवकी तथा नेत्रोंमें कमलकी सुन्दरता लुभाकर रह गयी है ॥ २ ॥ उनके कन्धोंपर धनुष, करकमलोंमें बाण और कमरमें भलीभाँतिसे तरकस कसा हुआ है। भगवान् की सुन्दरताको देखकर चौदहों भुवनोंकी सारी
गीतावली १०० शोभा तुच्छ जान पड़ती है ॥ ३ ॥ पृथ्वी सुकोमल मार्ग देती है, बादल छाया कर रहे हैं, देवतालोग फूलोंकी वर्षा करते हैं तथा वायु सुखदायक हो रहा है। इस प्रकार जल एवं स्थलमें उत्पन्न होनेवाले फल, फूल और जल आदि सभी प्रेमपूर्वक भगवान्की पहुनाई कर रहे हैं ॥ ४ ॥ गुरुजीके साथ भगवान्का संकोच, भय और विनयके सहित बोलना एवं चलना-फिरना बड़ा सुन्दर जान पड़ता है। बीच- बीचमें जब चित्र-विचित्र पक्षी और मृगों को देखते हैं तो उनका मनोहर बाल-चापल्य सुहावना जान पड़ता है ॥ ५ ॥ तदनन्तर गुरुजीने भगवान्को विद्यानिधि जानकर भी विद्या दी और विद्याने भी उन्हें प्राप्तकर बड़ाई पायी। उन्होंने खेलमे ही ताड़काको मार डाला, जिसे देख ऋषिने भगवान्को जी खोलकर आशीर्वाद दिया ॥ ६ ॥ भगवान्ने गङ्गावतरणका प्रसंग पूछा तो ऋषिने उसके साथ ही उनके कुलकी कथा भी कह सुनायी। इस समय विश्वामित्रजीके स्नेह और आनन्दकी सम्पत्ति उनके हृदयरूप आश्रममें नहीं समाती थी ॥ ७ ॥ वनमें रहनेवाले ब्रह्मचारी, सन्यासी, योगिजन, साधु और सिद्धसमूह प्रभुको देखकर प्रीतिसे पुलकितशरीर हो नेत्रोंके लाभकी लूट पाकर उनकी पूजा करते थे ॥ ८ ॥ भगवान्ने अपने भुजबलसे दुष्टोंका दमन कर यज्ञकी रक्षा की है, यह जानकर देवताओंमें बधाई बजने लगी। तुलसीदासजी कहते हैं, हमारे चित्तमें तो मार्गके चरित्रोंके सहित श्रीराम और लक्ष्मण सर्वदा निवास करते हैं ॥ ९ ॥ [ ५६ ] मंजुल मंगलमय नृप-ढोटा। मुनि, मुनितिय, मुनिसिसु विलोकि कहें मधुर मनोहर जोटा ॥ १ ॥
१०१ बालकाण्ड नाम-रूप-अनुरूप बेष बय, राम लखन लाल लोने। इन्ह तें लही है मानो घन-दामिनि दुति मनसिज, मरकत, सोने ॥ २ ॥ चरनसरोज, पीतपट, कटितट, तून-तीर-धनुधारी। केहरिकंध काम-करि-करवर बिपुल बाहु, बल भारी ॥ ३ ॥ दूषन-रहित समय सम भूषन पाइ सुअंगनि सोहैं। नव-राजीव-नयन पूरन बिधुबदन मदन मन मोहैं ॥ ४ ॥ सिरनि सिखंड, सुमन, दल-मंडन बाल सुभाय बनाये। केलि-अंक तनु-रेनुपंक जनु प्रगटत चरित चोराये ॥ ५ ॥ मख राखिबे लागि दसरथ सों माँगि आश्रमहि आने। प्रेम पूजि पाहुने प्रानप्रिय गाधिसुवन सनमाने ॥ ६ ॥ साधन-फल साधक सिद्धिनिके, लोचन-फल सबहीके। सकल सुकृत-फल, मातु-पिताके, जीवन-धन तुलसीके ॥ ७ ॥ दोनों राजकुमार अति सुन्दर और मङ्गलमय हैं। मुनिजन, मुनिपत्नियाँ और मुनिकुमार उन्हें देखकर कहते हैं—यह जोड़ी बड़ी मधुर और मनोहर है ॥ १ ॥ राम और लक्ष्मण—ये दोनों भाई अपने नाम और रूपके अनुरूप वेष और अवस्थामें भी बड़े सुन्दर हैं, मानो इन्हींसे मेघ और विद्युत्, कामदेव तथा मरकतमणि और सुवर्णने भी कान्ति पायी है ॥ २ ॥ इनके चरण कमलके समान हैं, कटिप्रदेशमें पीत वस्त्र हैं तथा ये तरकस, धनुष और बाण धारण करनेवाले हैं। इनके कन्धे सिंहके समान हैं तथा भुजाएँ कामदेवके हाथीकी सूँड़के समान सुन्दर एवं बड़ी तथा बलशालिनी हैं ॥ ३ ॥ इनके निर्दोष और समयानुकूल भूषण सुन्दर अंगोंको पाकर शोभायमान हो रहे हैं तथा नवीन कमलके समान नेत्र और पूर्णचन्द्रसदृश मुख कामदेवके मनको मोहे लेते हैं ॥ ४ ॥ इन्होंने बालस्वभावसे
गीतावली १०२ ही सिरपर मयूरपिच्छ तथा पुष्पदलके आभूषण बनाये हैं तथा शरीरमें लगी हुई खेल-कूदकी चिह्नस्वरूप रज तथा कीच मानो [मुनिजनसे] चुराकर किये हुए इनके बालचरित्रोंको प्रकट करती है ॥ ५ ॥ विश्वामित्रजीने यज्ञरक्षाके लिये दशरथजीसे माँगकर अपने आश्रमपर लाये हुए अपने प्राणप्रिय पाहुनोंको प्रेमपूर्वक पूजकर सम्मानित किया ॥ ६ ॥ ये साधक और सिद्धजनोंके साधनोंके फल हैं, सभीके नेत्रोंको सफल करनेवाले हैं, माता-पिताके सम्पूर्ण सुकृतोंके फल हैं तथा तुलसीदासके जीवनधन हैं ॥ ७ ॥ अहल्योद्धार राग सूहो [ ५७ ] रामपद पदुम-पराग परी । ऋषितिय तुरत त्यागि पाहन-तनु छबिमय देह धरी ॥ १ ॥ प्रबल पाप पति-साप दुसह दव दारुन जरनि जरी । कृपासुधा सिंचि बिबुध-बेलि ज्यों फिरि सुख-फरनि फरी ॥ २ ॥ निगम-अगम मूरति महेस-मति-जुबति बराय बरी । सोइ मूरति भइ जानि नयनपथ इकटकतें न टरी ॥ ३ ॥ बरकति हृदय सरूप, सील, गुन प्रेम-प्रमोद-भरी । तुलसिदास अस केहि आरतकी आरति प्रभु न हरी ? ॥ ४ ॥ ऋषिपत्नी अहल्याके सिरपर जैसे ही भगवान् रामके चरण- कमलोंका पराग पड़ा, वैसे ही उसने पत्थरका शरीर त्याग कर अति छबिमय शरीर धारण कर लिया ॥ १ ॥ अपने प्रबल पापके कारण पतिके शापरूप दुःसह अग्निके कठोर तापसे जलती हुई कल्पलता
१०३ बालकाण्ड मानो कृपारूप अमृतसे सींची जाकर पुनः सुखरूप फलीसे सम्पन्न हो गयी ॥ २ ॥ वेदोंके लिये भी अगम जिस मूर्तिको भगवान् शंकरकी बुद्धिरूपा युवतीने अन्य भगवन्मूर्तियोंको त्याग कर वरण किया है, उसीको नेत्रपथमें आयी हुई देख वह (अहल्या) एकटक होकर उससे विचलित न हुई ॥ ३ ॥ वह प्रेम और आनन्दसे भरकर मन-ही-मन उनके रूप, शील और गुणोंका बखान करने लगी। तुलसीदास कहते हैं, इसी प्रकार प्रभुने किस दीनकी दीनता नहीं हरी ॥ ४ ॥ [ ५८ ] परत पद-पंकज ऋषि-रवनी । भई है प्रगट अति दिब्य देह धरि मानो त्रिभुवन-छबि-छवनी ॥ १ ॥ देखि बड़ो आचरज, पुलकि तनु कहति मुदित मुनि-भवनी । जो चलिहैं रघुनाथ पयादेहि, सिला न रहिहि अवनी ॥ २ ॥ परसि जो पाँय पुनीत सुरसरी सोहै तीनि-गवनी । तुलसिदास तेहि चरन-रेनुकी महिमा कहै मति कवनी ॥ ३ ॥ प्रभुके चरणकमल पड़ते ही मुनिपत्नी अहल्या अत्यन्त दिव्य देह धारणकर प्रकट हो गयी है, मानो तीनों लोकोंकी छविकी पुत्री ही हो ॥ १ ॥ यह परम आश्चर्य देखकर मुनिपत्नियाँ प्रसन्न होकर कहने लगीं कि यदि रघुनाथजी पैदल चलेंगे तो पृथ्वीतलपर शिला नहीं रहने पावेंगी ॥ २ ॥ जिन चरणोंका स्पर्श करके पवित्र हुई गङ्गाजी त्रिपथगामिनी होकर सुशोभित हो रही हैं, तुलसीदासजी कहते हैं, ऐसी कौन-सी बुद्धि है जो उनकी महिमाका वर्णन कर सके ? ॥ ३ ॥
गीतावली १०४ [ ५९ ] मूरिभाग-भाजनु भई । रूपरासि अवलोकि बंधु दोउ प्रेम-सुरंग रई ॥ १ ॥ कहा कहैं, केहि भाँति सराहँै, नहि करतूति नई । बिनु कारन करुनाकर रघुबर केहि-केहि गति न दई ? ॥ २ ॥ करि बहु बिनय, राखि उर मूरति मंगल-मोदमई । तुलसी ह्वै बिसोक पतिलोकहि प्रभुगुन गनत गई ॥ ३ ॥ आज अहल्या परम सौभाग्यशालिनी हुई है। वह रूपकी राशि दोनों भाइयोंको देखकर प्रेमके रँगमें रँग गयी है ॥ १ ॥ कहिये, कवि किस प्रकार वर्णन करे, किस प्रकार उनकी सराहना करे ? उनकी यह करतूत कुछ नयी भी नहीं है। बिना कारण ही कृपा करनेवाले रघुनाथजीने भला किस-किसको शुभ गति नहीं दी ? ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इसी प्रकार बहुत-सी विनय कर और प्रभुकी मङ्गल तथा आनन्दमयी मूर्तिको हृदयमें धारण कर शोकहीन हो वह प्रभुका गुणगान करती पतिलोक- को चली गयी ॥ ३ ॥ राग कान्हरा [ ६० ] कौसिकके मखके रखवारे । नाम राम अरु लखन ललित अति, दसरथ-राज-दुलारे ॥ १ ॥ मेचक पीत कमल कोमल कल काकपच्छ-धर बारे । सोभा सकल सकेलि मदन-बिधि सुकर सरोज सँवारे ॥ २ ॥ सहस समूह सुबाहु सरिस खल समर सूर भट भारे । केलि-तून-धनु-बान-पानि रन निदरि निसाचर मारे ॥ ३ ॥
१०५ बालकाण्ड ऋषितिय तारि स्वयंबर पेखन जनकनगर पगु धारे। मग नर-नारि निहारत सादर, कहैं बड़ भाग हमारे ॥ ४ ॥ तुलसी सुनत एक-एकनि सों चलत बिलोकनिहारे। मूकनि बचन-लाहु, मानो अंधनि लहे हैं बिलोचन-तारे ॥ ५ ॥ [मार्गमें जाते समय पथिक जन कहते हैं—] ये दोनों विश्वामित्रजीके यज्ञकी रक्षा करनेवाले हैं। इनके अति सुन्दर राम और लक्ष्मण नाम हैं तथा ये महाराज दशरथके प्रिय पुत्र हैं ॥ १ ॥ ये काकपक्ष धारण किये हुए अति कोमल और सुन्दर श्याम एवं पीतवर्ण कमलके समान जान पड़ते हैं, मानो कामदेवरूप विधाताने सारी शोभाको एकत्रित कर इन्हें स्वयं अपने ही करकमलोंसे रचा हो ॥ २ ॥ इन्होंने युद्धमें सुबाहुके समान सहस्रों दुष्ट, समरशूर और भारी राक्षसयोद्धाओंका तिरस्कार कर उन्हें हाथमें खेलके ही धनुष-बाण लेकर खेलका ही तरकस धारण कर मार डाला है ॥ ३ ॥ अब ये मुनिपत्नीका उद्धार कर स्वयंवर देखनेके लिये जनकपुरीको जा रहे हैं। मार्गमें 'हमारे बड़े भाग्य हैं' ऐसा कहकर सब स्त्री-पुरुष आदरपूर्वक इन्हें निहारते हैं ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इस समाचारको एक-एकसे सुनकर अन्य दर्शकलोग भी चलते हैं, मानो मूक पुरुषोंको वाणी प्राप्त हो जाती है तथा अन्धोंको नेत्रोंके तारे मिल जाते हैं ॥ ५ ॥ जनकपुर-प्रवेश राग तोड़ी [ ६१ ] आये सुनि कौसिक जनक हरषाने हैं। बोलि पुर भूसुर, समाज सों मिलन चले, जानि बड़े भाग अनुराग अकुलाने हैं ॥ १ ॥
गीतावली १०६ नाइ सीस पगनि, असीस पाइ प्रमुदित, पाँवड़े अरघ देत आदर सों आने हैं। ससन, बसन, वासकै सुपास सब बिधि, पूजि प्रिय पाहुने, सुभाय सनमाने हैं ॥ २ ॥ बिनय बढ़ाई ऋषि-राऊ परस्पर करत पुलकि प्रेम आनँद अघाने हैं। देखे राम-लखन निमेषै बिथकित भईं प्रानहु ते प्यारे लागे बिनु पहिचाने हैं ॥ ३ ॥ ब्रह्मानंद हृदय, दरस-सुख लोयननि अनभये उभय, सरस राम जाने हैं। तुलसी बिदेहकी सनेहकी दसा सुमिरि, मेरे मन माने राउ निपट सयाने हैं ॥ ४ ॥ मुनिवर विश्वामित्रजी आये हैं—यह जानकर जनकजी बड़े प्रसन्न हुए और गुरुजी तथा ब्राह्मणोंको बुलाकर समाजसहित उनसे मिलने- के लिये चले। इस समय उन्होंने अपने बड़े भाग्य जाने और वे अनुरागसे विह्वल हो गये ॥ १ ॥ जनकजी विश्वामित्रजीके चरणों सिर नवा, उनसे आशीर्वाद पा, उन्हें प्रसन्न-चित्तसे पाँवड़े तथा अर्घ्यदान देकर आदरपूर्वक ले आये तथा भोजन, वस्त्र और निवासस्थानका सुभीता कर, अपने प्रिय पाहुनोंको सब प्रकार पूज स्वभावसे ही सत्कार किया ॥ २ ॥ ऋषि और महाराज जनक आपसमें विनय और बड़ाई करते हैं। [अर्थात् जनकजी मुनिवरके प्रति विनीत होते हैं तथा मुनि महाराजकी बड़ाई करते हैं।] इस प्रकार प्रेमसे पुलकित हो वे आनन्दमें मग्न हो रहे हैं। राम-लक्ष्मणको देखकर वे पलक मारना भूल गये। बिना पहचाने हुए भी उन्हें वे दोनों भाई