हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
हम्मीररासो ९७ कहै खाँन कुम्मार वैनं हँकारी । सुनो सबै सथ्यं करो जुद्ध भारी ॥५४९॥ रहै नाँम लोकं महा मुक्ति मिल्लै । रहै नाहिं कोई सदा आय१ भिल्लै॥ चलाए गजं कोपि२ कुम्मार सोई । उतै आरबी मीर जम्माल३ होई ॥५५०॥ तबै वीर बालन्नसी कोप किन्नौ । महा४ तेग जम्माल कै मध्य (सीस) दिन्नौ ॥ कट्यौ टोप ओपं लगी जाय मध्यं । तबै मीर बालन्न भय लुब्ध वध्यं ॥५५१॥ कटार' कुमार' चलायौ५ सु भारी६ । पर्यौ मीर जम्मील भू मैं७सु थारी ॥ सबै सथ्थ जम्माल की कोपि८धायौ । तहाँ बालन्नं मारि धरनी गिरायौ९ ॥५५२॥ तबै खाँन कुम्मार धायौ१० रिसाई । घनी सेन आरब्ब धरनी मिलाई११ ॥ तबै बीर संखोदरं जंग१२ कीनौ । किते आरबी खेत पार्यौ नबीनौ ॥५५३॥ किते सेल खेलं करैं वार पारं । भभक्कैं घटैं घाव छुट्टैं पनारं । बहैं तेग बेगं परे१३ सीस भारी । उड़ैं घोर रुंडं परैं मुंड कारी ॥५५४॥ १ आप । २ कुप्पि । ३ जम्मीर । ४ तबै तेग (खग्ग) जम्मील कै अंग दीनौ । ५ लगायौ । ६ भुम्मिः । ७ धारी । ८ कुप्पि, जम्मील को देखि । ६ मिलायौ । १० धाये । ११ गिराई । १२ जुद्ध । १३ परी । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
९८ हम्मीररासो परे दोय कुम्मार किन्नी१ अकत्थं । बरी अच्छरी सूर लोकं सु मध्यं ॥ परे मीर आरब्ब कै पोन लक्खं । तहाँ हिंद की भीर सौरा सुभक्खं२ ॥५५५॥ परे दो कुमार महाबीर बंके । परे एक३ संखोदर कीन४ हंके ॥ तहाँ आठ५ हज्जार चहुवाँन जाँनं६ । परे तीन हज्जार कमधवज्ज७ माँनं ॥५५६॥ पँमारं परे पाँच८ हज्जार सोई । परे बीर सोला सहस्रं सुजोई ॥ परे स्वामि कै कज्ज९ कुम्मार दोई । सुनी राव हम्मीर जीते सु सोई ॥ भजे आरबी ज्यों बचे१० जंग तेयं । कहै साह देखो सु हिंदू अजेयं ॥५५७॥ दोहरा छंद परे सहस सत्तरि तहाँ, मीर अरब्विय११ संग । हय गय पाँच हजार परि, सत जमाल से अंग१२ ॥५५८॥ छप्पय छंद तब सु राव रणधीर साहि पै१३ तेग समाही । १ कीनी । २ सोरा सुसत्थं । ३ इक्क । ४ किन्न । ५ अष्ट । ६ ज्वाँनं । ७ राठ्यौर, रट्ठौर । ८ पंच । ९ काम । १० रहे । ११ आरबी । १२ तहाँ परे सोरह सहस दुहूँ कुँवर कै सत्थ । बरी इते तहँ अप्छरा (अच्छरी) धरे हार हर मत्थ । पाँच बरस गढ़ छाड़ि कै लरे राव रणधीर । तब अलावदी कोपि कै कहे बचन तजि नीर । १३ साहि सों । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ९९
.समो¹ सु पहौँच्यौ आय सु तो मिट्टै नहीँ काही ॥ चढ़े खेत रणधीर साहि दोनू² बतराए । तजै न हठ हम्मीर कहा जो तुम सत³ आए ॥ रणधीर राव इम उच्चरै समुझि साहि चित लिजिए । . गढ़ रणथंभ हमीर को हजरति हठ न किजिए ॥५५६॥ कहै साहि रणधीर राव कौ किन सम्झावो । करो राज रणथंभ सेख⁴ कौ कद्मौँ लावो ॥ होनहार सो भई मिटे मेटी न मिटाई । घटै हटै हठ राव तबै हमारी पतिसाई ॥ नहिँ तजै⁵ राव हठ मैं तजौँ कौन⁶ साह मो सौँ कहै । यह प्रगट बत्त७ संसार८ महिँ भिरैँ दोय एकै९ रहै ॥५६०॥ कहै राव पतिसाह सुणो रणधीर अमानो । इतो राज तुम करो जितो हम सौँ नहिँ छानो ॥ ये१० गढ़ च्यारि सु धीर हुकुम किसकै तुम पाए । कबहुँक ११ फिरे रकेब सीस कबहुँ नहिँ १२ नाए ॥ गिरि सूरज पलटै पहुमि कोटि (रि) बचन कह कोय१३ । सेख छाड़ि उलटौ फिरै यह कबहुँ नहिँ होय१४ ॥५६१॥
दोहरा छंद
चढ़े साहि दल बिपुल जब, छे़किव१५ गढ़ रणधीर । तब चहुवाँन रिसाय कै, संमुख जुड़े१६ सु बीर ॥५६२॥
१ संमत । २ दोउ । ३ बतराए । ४ सेख गहि कद्मु लाओ । ५ नन तजै । ६ कै सहाय मोसों ( हमसन ) । ७ बात । ८ सारी मही । ९ इक्कै । १० यह । ११ कबहुँन । १२ ननवाए । १३ कोऊ कहो । १४ सेख छंडि उलटौ फिरौं तौ मोहिं साहि जग को कहो । १५ छिकिव । १६ जुट्टिग, जुट्टिय ।
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१०० हम्मीररासो छंद त्रोटक रणधीर चढ़े करि कोप मनं । सब सामँत सूर सजे अपनं ॥ गजराजन उप्पर डंबरयं । उछले¹ लगिं बीर सु अंवरयं ॥५६३॥ . बहु चंचल बाजि सु बग्ग² लियं । किय अग्ग³ सु पैदल लाग कियं ॥ गढ़ तैँ बहु भाँति⁴ सु तोप चली । पतिसाह⁵ समेत सु कोप चली ॥५६४॥ रणधीर सु बंधन⁶ दुग्ग⁷ कियं । करि मंगल बिप्रन दाँन दियं ॥ रबि कौ परणाम सु कीन⁸ तबै । कर जोरि सु आयसु माँगि९ जबै ॥५६५॥ अरु राव हमीर जुहार कियं । हर्षे¹⁰ चहुवाँन सु मोद हियं¹¹ ॥ बहु दुंदभि ढोल सुभेरि बजै । कसि आयुध सायुध बीर सजे ॥५६६॥ हलका करि बीर बढ़ै दल पैँ¹² । मनु राघव कोपि कियौ खल पैँ¹³ ॥ उत साहि हुकम्म कियौ रिस मैँ । सब सेन जु आय जुरयौ छिन मैँ¹४ ॥५६७॥ बिफरे सब बीर सुधीर मनं । सब स्वामि सु धर्म्म सु कीन¹५ पनं ॥
१ उससे । २ बाग । ३ अग्र । ४ भाँतिन । ५ पतिसाहि सुसैन सुकंप हली । ६ वंदन । ७ दुर्ग । ८ किन्न । ६ मंगि । १० वरखे । ११ दियं, जियं । १२ मैं । १३ पल मैं । १४ जुर्यौ निस मैं । १५ किन्न । . CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १०१ दुहुँ ओर सु तोप सु कोप¹ छुटे। गढ़ कोट न रूंधत² पार फुटे ॥५६८॥ वरषै घर आगि³ सु धूम उठा। झर अंबर भुम्मि कराल बुठी ॥ बहु गोलन गोलन गोल परे। गजराजन सौँ गजराज जुरे४ ॥५६९॥ हय सौँ हय पयदल पयदल सौँ। जुरे५ बहु जोध महाबल सौँ ॥ बहु६ बाँन दुहूँ दल माँझ परैं। धर सीस कहूँ कर पाँव भरैं ॥५७०॥ बहु सोर अँधार सु घोर भयौ। निसि बासर काहु न जानि७ लयौ ॥ कर कुंडिय८ बीर कमान कसैँ। गज बाजिन फुट्त पार लसैँ ॥५७१॥ वरषैँ मनु पावस बुंद अयं। बहु फुट्त पक्खर९ कंगलयं ॥ तहँ लागत१० सेल सु पार हियं। मनु श्रोन पनारन तैँ बहियं ॥५७२॥ लगि तेग करैँ दुव दुक्क११ तनं। जिमि१२ सीस परैँ तरबूज मनं ॥ तहँ साह सु सेन मुरकि चली। चहुवाँन तबै करि कोप बली ॥५७३॥ मुरकी पतसाह तनी जु अनी। १ कोपि । २ रुकत । ३ अग्गि । ४ भिरे । ५ जुरिये, जुटिये । ६ चहुवाँन । ७ ज्ञान लह्यौ । ८ कुंडल, कुंडलि । ६ पाखर । १० लगत । ११ टूक । १२ जिन, जिहिं । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१०२ हम्मीररासो मुख१ बात सबै पतसाह भनी ॥ करि कोप तबै पतिसाह कहै । मुहिं जीवत सेन सु भज्जि२ चहै ॥५७४॥ बकसी तब आय सलाँम कियं । लख रूमिय अप्प३ सु संग दियं४ ॥ रणधीर तबै सनमुख पिलै५ । बकसी करि कोप सु ओप मिले ॥५७५॥ गुरजैं रणधीर कै सीस दईं । तिन ढल्ल सु उप्परि६ ओट लईं ॥ बरछी रणधीर सु अंग दियं । धर फुट्टि७ सु बाजि८ कौ पार कियं ॥५७६॥ हय९ तैं बकसी धर माँहि पर्यौ । तिहिं१० संग सु मीर पचास गिरचौ११॥ इक रूमिय धीर सूँ आय जुरचौ । किरवाँन लिये मन नाहिं मुरचौ१२॥५७७॥ रणधीर इतैं उत खाँन बलं । लथ वत्थ भए दुख देखि दलं ॥ रणधीर कटार सूँ पार कियौ । बलखाँन सु तेग जु कंध दियौ ॥५७८॥ सिर तुट्टत१३ धीर उठ्यौ धड़यं । बलखाँनहिं आय गह्यौ करयं ॥
१ मुख वाह सुवाह सु साह भनी ! २ भाजि । ३ आप । ४ सनमुख सुई दिय (सुहिंदुव) पिल्लि दियं (पैपिलियं) । ५ लियं । ६ ऊपर । ७ फूट । ८ सुबाज कै । ६ गज तैं । १० तब सोंगी (संगी) सुधीर सु मीर अर्यौ । ११ परे, गिरे—अंत्यानुप्रास । १२ लख पाँच लिये मन माहिं मुर्यौ । १३ टूटत । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १०३ अरि बत्थ सु हत्थ पछारि बलं । हिय पार कटार किये सु खलं ॥५७९॥ लख एक स रूमिय खेत परे । रणधीर सुरंड भरे खपरे ॥५८०॥ चौपाई छंद पर्यौ खेत बकसी बड़ भारी । और संग दल बीस हजारी ॥ मीर पचास संग तहँ सूते । इक लख रूमि बिहस्त¹ पहूँचे² ॥५८१॥ तीस सहस रणधीर सु³ संगी । परे खेत बर बीर उमंगी ॥ धीर⁴ रुंड द्वै पहर सु नच्यौ । एक सहस हनि गज जस संच्यौ ॥५८२॥ टूट्यौ गढ़ सु छाड़ि कौं सोई । सुनी श्रवण हम्मीर सु जोई ॥ तब आपन तन मन पन जान्यौ । छत्री मंगल मरन बखान्यौ ॥५८३॥ दोहरा छंद पक्ख ऊजरो⁵ चैत्र सुद्धि, तिथि नौमी सनिबार । बीस सहस छत्री परे, अबला जरीं हज़ार ॥ ५८४ ॥ जो कनवज काकै करी, करी छाड़ि रणधीर । हरष सोच सम करि दोऊ, चक्रत भए⁶ जु मीर ॥ ५८५ ॥ गज इकसठि दो लष तुरी, छप्परि⁷ बीस अमीर । जो कहता सोई करी, धन्य राव रणधीर ॥ ५८६ ॥ १ मिस्ति । २ पहुंचे । ३ कै । ४ धीर जुद्ध करि रुंड न नच्यौ । ५ पाख उजारी । ६ भयउ । ७ छपरि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१०४ हम्मीररासो छप्पय छंद इते मीर रण परे साहि षट मास सम्हारे । तबै दूत इक आय साहि सौँ बचन उच्चारे ॥ जिते देव हिंदवाँन डिंगत को धीर बँधावै । जिनकौ पूजन करै राव निस दिन मन लावै ॥ बर दियव राव हम्मीर कौं आपन मुख संकर सरिस । टूटै न गढ़ढ रणथम्भ सुनि अभै किये चौदह बरिस ॥५८७॥ दोहरा छंद दल लख, सत्ताइस तहाँ, धर(न)नि समावत मीर । सूखत १ सर सरिता बिमल, कूप बावरी नीर ॥५८८॥ तिथि नौमी आसोज सुदि, कर गहि तेग रिसाइ । सुरमंदिर करि कोप सब, चढ़ढि २ अलावदि साइ ॥५८९॥ हाथ जोरि गन्नेस कूँ, कहै राव हम्मीर । करो मदति चाहत जवन, अलादीन दलभीर ॥५९०॥ चौपाई छंद सुनत ३ बचन हमीर कै सोई । कोपे ४ जुद्ध देव कौं जोई ॥ जब संकर काली हरषानी । निज ५ समाज बोले मृदु बानी ॥ ५९१ ॥ चोंसठि जोगनि भैरव नच्चैं । कर धरि चक्र त्रिसूल सु रच्चैं ॥ बाजे ६ डिमरु बीर चढ़ि ७ आए । तबै साहि सौँ जंग रचाए ॥ ५९२ ॥ १ सुक्रत । २ चढब्यव । ३ सुन तब बत्त राव की सोई । ४ कुप्पिय देव जुद्ध कौं जोई । ५ निज मुख सुबुल्यिय मृदु वानी । ६ बजिय, बजिवं । ७ जुरि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १०५ चल्लै चक्र त्रिसूल सु नेजा। सक्ति पास धनु बाँन घरेजा ॥ हल मूसल अंकुस मुद्गर बर। परिघ सेल लै धाए परिकर ॥ ५६३ ॥ कीनौ जुद्ध बीर सब सज्जे। संकर सरस कतूहल¹ सज्जै ॥ सबै साहि की सैन सुभाई। सबै परस्पर करैँ लराई ॥ ५६४ ॥ बजि बाजंत्र अनेक स बीरं। डैरव संख भेरि पट हीरं ॥ मार मार चहुँ दिस सुनि बानी। कटे लाख² आल्हन पुर जानी ॥ ५६५॥ छप्पय छंद तब सब देव गणेश बिघ्न बड़ दल मैं किन्नव। कितौ म्लेच्छ को संग सब्र अप अप्पसु³ किन्निव ॥ उठे सकल ललकारि कीन्ह घमसाँन⁴ सुभारिय। रुंड मुंड परि दंड सेन दो लक्ख संघारिय ॥ देखंत नयन पतसाह तब अति अद्भुत कौतुक भयउ। हिम्मत बहादुर अली पर उभै लक्ख सेनह हयउ ॥५६६॥ यह चरित्र लखि साहि कूँच⁵ आल्हनपुर⁶ तैँ करि। तब फिर पलटे आय घेरि रणथम्भ सरिस भरि ॥ करि देवन से दोष कहो कौने सुख पाए। आगे⁷ लख दल किते मारि हरि असुर खिपाए।
१ कुतूहल। २ लक्ख अल्हन। ३ आपस मैं। ४ घमसाण। ५ कुच्च। ६ अल्हणपुर। ७ अग्नै। १२-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१०६ हम्मीररासो अब लरै मनुस मानुसन सोँ देव दैत्य आगे१ किते। यह जानि साहि सिर नाय करि आय२ किए३ डेरा उते ॥५६७॥ दोहरा छंद हठ४ हमीर छाड़ै नहीं, हजरति तजै५ न टेक। सात मीर पतसाह कै, गए बिसरि करि टेक॥५६८॥ महरम खाँ तब इम कही, अब पछितावति साहि। हम बरजत रणथम्भ गढ़, चढ़ि आए तुम चाहि६ ॥५९९॥ हजरति हिमति न छाड़िये, धरिये मन मैं धीर। गढ़ नरगह चहुँ दिसि करो, कब लग लरै हमीर ॥६००॥ पद्धरी छंद महरम्म आपनो७ तजि सुसाहि। ध्याए सुदेव हिंदवाँन जाहि॥ बहु बोलि विप्र पूजा कराहिं। करि धूप दीप आरति बनाहिं८ ॥६०१॥ पद परसे दरसे सकल देव। नैवेद्य पुज्य नाना सु भेव॥ करं जोरि साहि बंदन सुकीन९। यह भाँति गवन डेरा सु लीन१० ॥६०२॥ करि आल्हण११ पुर तैँ कूँच ध्याय। रण कै पहार डेरा कराय॥ गढ़ की निगाह कीनी१२ सु साहि। आसंग नाहिं कीनी१३ सताहि॥६०३॥ करि मंत्र एलची दिय पठाय। १ अगैँ। २ आनि। ३ किन्न, कियउ, किते। ४ हट्ठ हमीर न छंडही। ५ तजी। ६ साहि। ७ अप्पनो। ८ कराय, बनाय अंत्या- नुप्रास। ९ किन्न। १० दिन्न। ११ अल्हण। १२ किन्ही। १३ किन्नौ। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १०७ तुम कौ सुकहत समुझाव¹ राय ॥ दै सेख छाड़ि² हठ मिलि सुराव । परसो सुआय पतसाह पाँव ॥६०४॥ इम सुनत राव प्रजरचौ सु अंग । ब्रत टरै केमि छत्री अभंग ॥ तुव कहा कहूँ दूतै सुजानि । नन टरै वैन छत्री सुबानि ॥६०५॥ नहिं देहु सेख घन³ करै केमि । पसु पंछी जे तजि सरण जेमि ॥ रणधीर कुँवर दोउ अति उदार । बालणसी तीजो खाँन सार ॥६०६॥ ते परे खेत रावत अभंग । अब कौन मिलि⁴ राख्यो प्रसंग ॥ तब दूत द्रव्य लै जाहु ओर । कहँ⁵ रही बात६ फरमाँन तोर ॥६०७॥ मति आव फेरि भेजे सुसाहि । अब बिना जुद्ध नहिं उचित ताहिं ॥ लै चल्यौ दूत ये खबरि ऐन । जा कहे साहि सों सकल बैन ॥६०८॥ सुनि बचन बाँचि फरमाँन सोइ । कहि साहि राव समुझै न कोइ ॥ उज्जीर देखि तजबीज कीन⁷ । रण को पहार अपनाय लीन⁸ ॥६०९॥ चढ़ाय तोप तिहिं पर प्रचंड । १ समुभाव । २ छंदि । ३ प्रण(न) । ४ मिलि, मील, मेल । ५ कहा । ६ बत्त । ७ किन्न । ८ लिन्न । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१७८ हम्मीररासो कीनी तयार गढ़ कौ अखंड ॥ पतसाह कहै महरम सुबत्त । तुम सुनो एक हम करी १ चित्त ॥६१०॥ हम्मीर राव की तोप देखि । दग्गो सु आपनी तोप लेखि ॥ यह तोप फुटे गढ़ फ्ते होय । संदेह कौन या मैं न सोय ॥६११॥ गोलम्मदाज तब करि सलाँम । दागी २ सुतोप लखि ताव ताँम ॥ लग्यौ सुतोप कै गोल जाय । नुकसाँन भयौ तिहिं कछुक जाय ३ ॥६१२॥ यह सुनी श्रवण हम्मीर राय ४ । ततकाल तोप पै गयौ धाय ॥ देखी सुतोप साबूत जानि । तब कह्यौ राव तुम सुनो कानि ॥६१३॥ पतसाह तोप खंडै सुकोय । हौं करौं बड़ो ताकौ सुजोय ५ ॥ गोलम्मदाज कीनौ ६ जुहार । पतसाह तोप फूटी ७ सुपार ॥६१४॥ तब कही साह महरम सुदेखि । गढ़ विषम बीर छंडै न टेक ८ ॥ अब करो ९ क्यों न तजबीज और । किहिं भाँति हाथि आवै सुजोर ॥६१५॥ कर जोर कही महरम्म खाँन ।
१ धरी । २ दग्गी । ३ ताय । ४ राव, धाव अंत्यानुप्रास । ५ सजोय । ६ किन्वउ । ७ फुट्टी । ८ पेखि । ९ करै कौन । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १०९ पुल बाँधि¹ तोरि गढ़ करो आँन ॥ तब महरम खाँ तजबीज कीन । इक राह बाँधि गढ़ को जु लीन ॥६१६॥ पुल² बाँधि कीन गढ़ की जु राह । सुनि राव चित्त चिंता सु आह ॥ नहिं रहौ मरम³ गढ़ को सकोई । बहु फिकर राव कीनौ⁴ सु जोइ ॥६१७॥ तिहिं रैन पदम सागर सुआय(इ) । दीनौ सुसुप्न हम्मीर धाय(इ) ॥ नहिं करो कोन चिंता हमीर । सब नदी समुद्दन कौ सुसीर ॥६१८॥ तुम रहो अभै गढ़ अभै⁵ आय । इक छिन्न माहिं पुल द्यौं बहाय ॥ तब प्रात राव जग्गे हमीर । फूटि गयौ सकल बंध्यो सुनीर ॥६१९॥ सुनि साह बात⁶ अचरिज्ज मानि । टूटै न गढ़ जिय बिषम जानि ॥ पुच्छिउ⁷ उजीर तबै सुबोलि । कीजे इलाज किम कहौं खोलि ॥६२०॥ रण⁸ कै पहार कहा कीन आय । डेरा सुकीन्ह उज्जीर थाय⁹ ॥ मजबूत मोरचा तहाँ कीन्ह । बहु परी रारि दुहुँ ओर चीन्ह¹⁰ ॥६२१॥ १ बंधि । २ पुल बंधि किहूँ गढ़ को सराह । ३ मगज । ४ किबो । ५ अबै । ६ बत्त । ७ पुच्छी सुतबौ उजीर बोलि । ८ रण को पहार परि साहि आय ( आप ) । ९ थाप । १० किन्ह, चिन्ह अंत्यानुप्रास । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
४. चतुर्थ भाग: शाका-जौहर, अन्तिम महासंग्राम, हम्मीर देव वीरगति व उपसंहार
११० .हम्मीररासा हम्मीर राव ऊपरि$^१$ प्रसाद । तहाँ करयौ अखारौ इंद्रबादि ॥ तहाँ चंद्रकला पातुर प्रबीन । सो नृत्य करै सुंदर नबीन ॥६२२॥ बाजत मृदंग बीना सितार । कट तार तार सहनाइ सार ॥ महुवरी सु खंजरि तास संग । श्रीमंडल सुर औ जलतरंग ॥६२३॥ षट तीस राग रागनि सुसुद्ध । सो सुनै नृपति$^२$ चहुवाँन उद्ध ॥ गंधार देव भैरव सुजाँन$^३$ । अरु राँम कली बिम्भा समाँन$^४$ ॥६२४॥ बजि ललित बिलावल गिरी देव । सुर आसा टोडी सकल भेव । हिंडोल और सारँग अनूप । नट और स्त्रोयुत राग भूप ॥६२५॥ करि गौरी को अलाप आनि । तब दीपग अरु सगरे कल्याँन ॥ सुर गावत पंचम अति प्रबीन । सुनि केदारो मारो सुमीन ॥६२६॥ खंभाच रू मारू परज पाइ । सुम सोर उड़ैसी जैत गाइ ॥ अड्याणी$^५$ कन्हर बहु सुभेव । बंगाल गौड़ मालव सुदेव$^६$ ॥६२७॥ ————————— १ उप्पर । २ भूप । ३ सुजानि । ४ मानि । ५ अड्याणो । ६ एव । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १११
सिंधुव बिहाग षट राग पेखि। काफी अनूप सुर मधुर लेखि॥ सब कला जीति संगीत रीति। नृतंत बाल गावंत गीति॥६२८॥ सुर सप्त गाँम तीनूँ सु भेव। इक्कीस मूर्छिना करत¹ एव॥ बहु लागडाक² गावत प्रबंध। तिहिं सुनै होत आनंद फंद॥६२९॥ हम्मीर राव राजत मसंद। दुहुँ ओर चौर ढारैँ³ अमंद॥ यहि⁴ देखि साहि गरि गयौ गब्ब। हम्मीर इंद्र पदवी सु सब्ब⁵॥६३०॥ अभिमाँन तजत नहिं⁶ मिल्यौ मोहिं। नहिं सेख देय⁷ संका न कोहि॥ यह चंद्रकला पातुर सुभेव। बहु हाव भाव हस्तक सुदेव⁸॥६३१॥ बर्षत कटाक्ष ऊपरि सुराव। मोहिं⁹ गिनत नाहि कल्लु ¹⁰रहत चाव॥ तब ताँन गाँन¹¹ गावंत मानि¹²। एडिय सुबाल मोहिं फिरत¹³ बानि॥६३२॥ अपमाँन बाल कीन्हौ अनंत। एड़ी दिखाय मुझ¹⁴ कौ हसंत॥ करि कोपि कहै पतिसाह एम।
१ घरत। २ डाठ। ३ ठोरैं। ४ तिहिँ। ५ गर्व, सर्व अंत्यानुप्रास। ६ मिल्यौ न मोहिं। ७ देत। ८ सुमेद। ६ मुहिं। १० जनु। ११ ताँन माँन। १२ जानि। १३ करत। १४ मुहिं सौं। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
११२ हम्मीररासो मैं करौँ बड़ो १ जिस कौ सुप्रेम ॥६३३॥ जो हनै बाल कहि तीर पाहि। रसभंग करै मैं गिनौं ताहिं २ ॥ सुनि बचन मीर गभरू सुसेख । कर जोरि कीन्ह ३ बानी बिसेष ॥६३४॥ यह धर्म्म पुरुष को कितहु ४ नाहिं । तिय ऊपर ऊँचो करत ५ बाँहि ॥ तब कहत साहि यम सजो बाँन । नुकसाँन होय अरु बचै ज्याँन ॥६३५॥ सुनि बचन श्रवन कम्माँन लीन । सो ऐंचि स्रवण तिय चरण दीन ॥ तब परी बाल ह्वै बिकल भूमि । रसभंग भयौ सब लखत पूमि ६ ॥६३६॥ लगि तीर सभा मैं परी ७ जाव । तब बढ़यौ सोच हम्मीर राव ८ । अब लौं न तीर दुग्गहिं पहुँचि । यह कौन औलिया आय सञ्चि ९ ॥६३७॥ दोहरा छंद देखि तीर अचिरज हुए, १० गढ़ मैं आवत सीर । चक्रत चहुँ दिस चाहि कै, रह्यौ ११ राव हम्मीर ॥६३८॥ मुरझि तिरिय १२ धरणी परी, भए राव चित भंग । राव कहै १३ ऐसे बली, किते साह कै संग ॥६३९॥ १ बड़ा जिसकौ रतेम । २ पाय, साय अंत्यानुप्रास । ३ कही । ४ कहत । ५ करस बाँहि । ६ भुम्मि, घुम्मि अंत्यानुप्रास । ७ परयौ । ८ जाय, राय अंत्यानुप्रास । ६ उँचि । १० भयौ । ११ रहे । १२ त्रिया । १३ कहह । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ११३ महिमा साहि हमीर सैं, कही बात कर जोर । सकल साह कै हसम मैं, है लघु भैया मोर ॥६४०॥ नहिं दूजो कोड साह कै, सबरे १ दल मैं और । मीर गभरू अनुज मम, जामैं इतनो जोर ॥६४१॥ छप्पय छंद नाहिं जती बिन जोग सूर बिन तेग २ न होई । इते साह कै संग मीर सरभर नहिं कोई ॥ करो हुकम मोहि राव साह कौ हनौँ ततच्छिन । मिटै सकल उतपात भाज सत्रु सेन जाय बिन ३॥ हँसि कही राव हम्मीर तब यह खुदाय दूजो दुनी। सिर बचै साह छत्र जु उड़ै यह कौतुक कीजे गुनी ॥६४२॥ करि ४ साहिब कौ याद सीस हम्मीरहिं नायौ । कियौ हुक्म तब ५ राव कोपि कै बाँन ६ चलायौ । अनल ७ पंख मनु परिय टूटि ८ आकास धरन्निय ९ । भयौ सोर बर सद्द पर्यौ महि छत्र बरन्निय १०॥ मुरझाय साह भू मैं परे ११ उड्यौ छत्र आकास दिस । तब कही उजीर पतसाह सौं तजी ज्याँन परिहरि सु रिस ॥६४३॥ पिछले निमक १२ की दोस्ती, करी जाँन बकसीस । जो दूजो सर छंदिहै, हनिहै १३ बिस्वा बीस ॥६४४॥ जा गढ मैं महिमा रहै, किम आवै वह हथ्थ । अहि ज्यूँ गही छहूँदरी, यौं हजरत की गथ्थ ॥६४५॥ छप्पय छंद कह महरम खाँ बात इसी १४ हजरति सुनि आवै । १ सिगरे । २ तेज । ३ धन । ४ करि जगदीसहिं याद; इष्टदेव निज सुमिरि । ५ हम्मीर । ६ परसु । ७ अनिल । ८ द्विट्टि । ६ वरन्निय । १० धरन्निय । ११ भुम्मी गिर्य्यड । १२ निमष । १२ हनै जु । १४ इती । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
११४ हम्मीररासो वह$^१$ महिमा बर बीर राव का हुकम जु पावै ॥ गहै तुम्हें ततकाल पाँव लंगर गहि मेलै : उसै दिल्ली बैठाय जोर मरजात सु-पेलै । हठ छाड़ि साहि रणथंभ का करो कूच चालिये दिली । जै रही राव हम्मीर की पतिसाही मारी गिली ।६४६॥ तब$^२$ सु साह हठ छाड़ि उलटि दिल्ली दिस आए । पिता बैर करि याद साह सुरजन पछिताए ॥ रतन पंच लै संग$^३$ साह कै पाँव सु लग्यौ । तात बैर हिय जानि कोप उर मैं अति जग्यौ ॥ कर जोरि साह सुरजन कहै सुगम दुग्ग मो हथ्थ गनि । यह जितो राज$^४$ रणधीर को मोहिं दैन की बाच भनि ।६४७॥ दोहरा छंद हँसि हजरत ऐसे कही$^५$, सुरजन आगे$^६$ आव । दियौ राज रणधीर कौं, करूँ बड़ा उमराव ॥६४८॥ करि सलाँम सुरजन तबै, बीरा खायौ कोपि । आप$^७$ भवन हिकमति रची, स्वामि धर्म्म सब लोपि ॥६४९॥ जौरा भौंरा खास में$^८$, भरे जु कोरे चाँम । फजणि आनि हाजरि भयौ, सुरजव करी$^९$ सलाँम ॥६५०॥ हाथ$^{१०}$ जोरि हम्मीर सों, सुरजन कही सुजाँन । मिलो राव पतिसाह सों, गढ़ बीत्यौ$^{११}$ सामाँन ॥६५१॥ बिनती$^{१२}$ सुनत$^{१३}$ हमीर तब, कियौ कोपि रत नैन । छंडि टेक छत्री तनी, रे कपूत गनि$^{१४}$ ऐन ॥६५२॥ १ यह । २ तब अलाउदी छंडि हठ दिल्ली दिसि आए । ३ भेंट । ४ राव हम्मीर को । ५ कहै । ६ अगु, अग्गै । ७ आय । ८ द्वै । ९ किय । १० हथ्थ । ११ बित्यौ । १२ विनति । १३ सुनि । १४ गति । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ११५ चौपाई छंद कहैँ राव हँसि सुरजन सुनिजै । मिलो छाड़ि¹ पन² यह न गुनिजै ॥ सुनि कापुरुप कपूत अयानै । छाड़ि³ टेक को⁴ छत्री जानै ॥६५३॥ फिर हमीर सुज्जन सों पूछी⁵ । तेरी बात लगत मुहिं झूछी⁶ ॥ जौँरा भौँरा खास सु दोई । कैसे निबरै जानत सोई ॥६५४॥ कहै साह यह तो हैँ⁷ छानी । प्रगट देखि निज नैनन जानी ॥ पाथर⁸ डारि खास मैं जोई९ । सुनिए श्रवण सद्द१० सब कोई ॥६५५॥ दोहरा छंद पाथर¹¹डारयौ खास महँ, खुड़क्यौ चाँम¹२अपार¹३ । जिस सब्द¹४ नीचै रही, राव यहै¹५ निरधार ॥ ६५६ ॥ खुड़क्यो¹६ सुनि दुव¹७ खास को, चढ़यौ सोच उर राव । तब महिमा हम्मीर सों, कहै बचन गहि पाँव ॥ ६५७ ॥ छप्पय छंद कहै¹⁸ जु महिमा सेख राव मुहिं हुकुम सु दीजै१९ । मिलो साह कौ जाय फिकर इतनो नहिं कीजै२० ॥ १ छंडि । १२ प्रन । ३ छंडि । ४ नहिं । ५ पुच्छी । ६ छुच्छी । ७ नहिं । ८ पत्थर । ६ सोई । १० सब्द । ११ पत्थर । १२ चर्म्म । १३ अधार । १४ सबै । १५ येह । १६ खुड़को । १७ दोउ । १८ कह महिमा तब सेख । १६ दिज्जै, दिजिय । २० किज्जै, किजिय । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
११६ • हम्मीररासो अब¹ दिल्ली कौ कूँच² साहि कौ तुरत कराऊँ। तुम राजो रणथंभ जुद्ध मैं सकल सिराऊँ ॥ हम्मीर राव हँसि यौं³ कहै⁴ सदा कोन॒ जग थिरि रहै। छिन⁵ भंग अंग लालच कहा सुजस एक⁶ जुगजुग रहै ॥६५८॥ दोहरा छंद अल्लादीन पतिसाह सौं, गही⁷ खग्ग⁸ करि टेक । दुख मैं बिरले मित्त⁹ हैं, सुख मैं मित्त अनेक ॥ ६५९ ॥ हठ तौ राव हमीर को, औ¹⁰ रावण की टेक। सत राजा हरिचंद को, अर्जुन बाण अनेक ॥ ६६० ॥ गही टेक छाड़ै नहीं, जाभ चौंच करि जाय । मीठो¹¹ कहा अँगार कौ, ताहिं चकोर चुगाय¹² ॥ ६६१॥ छप्पय छंद सब¹³ बातैं यह कही सेख अपनै घर आयौ। भई¹⁴ राति सुरजन्न निकट हजरति कै आयौ¹⁵ ॥ हाथ¹⁶ जोरि सिर नाय कह्यौ छल राव भुलायौ । द्वादस कै सामानँ रक्खि गढ़ तोरि हलायौ ॥ ये¹⁷ कहिय बात¹⁸ सुर्जन सकल रणत भँवरटूट्यौ¹⁹ अबै। हजरति प्रताप महा बंक गढ़ सहल भयौ²⁰ सद्कै सबै ॥६६२॥ दोहरा छंद चंदकला देवलि कँवरि²¹, पारसि महिमा साह। माँगत साह अलावदी, अबै लै मिल्यौ आय²² ॥६६३॥ १ अबै दिली। २ कुच्च। ३ इमि। ४ कह्यौ। ५ क्षण। ६ इक। ७ गहिय। ८ तेग। ६ मीत जुग। १० अरु। ११ मिठ्ठौ। १२ जु खाय। १३ राव बात (बत्त) ये (इमि) कहिय सेख अप्पन घर आयव (आयउ)। १४ भइय रत्ति। १५ धायौ। १६ हथ्थ। १७ यह। १८ बत्त। १६ टुट्यौ। २० लयौ। २१ कुँमरि। २२ साय, आय अंत्यानुप्रास। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri