भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

[ विष्णुपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः ३०९

मुझसे जैसा कहा था, उसी तरह मैं इस प्रसंगका वर्णन करूँगा ॥ ४२ ॥

आगतः शक्रसदनात् स वै शक्रसखो मुनिः ।
चन्द्रांशुशुक्लवसनो जटामण्डलमुद्वहन् ॥ ४३ ॥

वे मुनि नारद देवराज इन्द्रके सखा हैं। एक दिन चन्द्रमाकी किरणोंके समान श्वेत वस्त्र पहने और सिरपर जटा-मण्डलका भार धारण किये वे इन्द्रभवनसे मेरे यहाँ आये ॥

कृष्णाजिनोत्तरीयेण रुक्मयज्ञोपवीतवान् ।
दण्डी कमण्डलुधरः प्रजापतिरिवापरः ॥ ४४ ॥

उनके कंधेपर काले मृगचर्मकी चादर पड़ी थी। वे सुवर्णमय यज्ञोपवीतसे विभूषित थे और दण्ड-कमण्डलु धारण किये दूसरे प्रजापतिके समान जान पड़ते थे ॥ ४४ ॥

गाता चतुर्णां वेदानां विद्वान् गान्धर्ववेदवित् ।
स नारदोऽथ देवर्षिर्ब्रह्मलोकचरोऽव्ययः ॥ ४५ ॥

नारदजी वेदोंके विद्वान् तो है ही, गान्धर्ववेद (संगीत-विद्या) के भी पूर्ण पण्डित हैं, अतः चारो वेदोंका गान किया करते हैं। ब्रह्मलोकमे विचरनेवाले वे अविनाशी देवर्षि नारद ही मेरे यहाँ पधारे थे ॥ ४५ ॥

तमागतमृषिं दृष्ट्वा पूजयित्वा यथाविधि ।
पाद्यार्घ्यमासनं दत्त्वा सम्प्रवेश्योपवेश्य ह ॥ ४६ ॥

अपने यहाँ आये हुए उन महर्षिको देखकर मैने पाद्य-अर्घ्य और आसन समर्पित करके उनकी विधिपूर्वक पूजा की और महलके भीतर ले जाकर उन्हे बिठाया ॥ ४६ ॥

सुखोपविष्टोऽथ मुनिः पृष्ट्वा च कुशलं मम ।
उवाच च प्रीतमना देवर्षिर्भावितात्मवान् ॥ ४७ ॥

जब सुखपूर्वक बैठ गये, तब मुझसे कुशल-प्रश्न करनेके अनन्तर प्रसन्नचित्त हुए उन शुद्ध अन्तःकरणवाले देवर्षिने इस प्रकार कहा ॥ ४७ ॥

नारद उवाच
पूजितोऽहं त्वया वीर विधिवद्दृष्टेन कर्मणा ।
इदमेकं मम वचः श्रूयतां प्रतिगृह्यताम् ॥ ४८ ॥

नारदजी बोले— वीर ! तुमने शास्त्रीय विधिके अनुसार मेरा पूजन किया है; अतः मेरी यह एक बात सुनो और इसे ग्रहण करो ॥ ४८ ॥

गतोऽहं देवसदनं सौवर्णं मेरुपर्वतम् ।
सोऽहं कदाचिद् देवानां समाजे मेरुमूर्धनि ॥ ४९ ॥

सुवर्णमय मेरुपर्वत देवताओंका निवास-स्थान है। उस पर्वतके शिखरपर एक दिन देवताओका समाज जुटा हुआ था। उसीमें मैं भी गया था ॥ ४९ ॥

तत्र मन्त्रयतामेवं देवतानां मया श्रुतः ।
भवतः सानुगस्यैव वधोपायः सुदारुणः ॥ ५० ॥

वहाँ देवतालोग, अनुचरोंसहित तुम्हारे वधके अत्यन्त दारुण उपायपर विचार कर रहे थे। वहीं उनके मुखसे यह बात मैंने सुनी थी ॥ ५० ॥

तत्र यो देवकीगर्भो विष्णुर्लोकनमस्कृतः ।
योऽस्या गर्भोऽष्टमः कंस स ते मृत्युर्भविष्यति ॥ ५१ ॥

कंस ! इस देवकीका जो आठवाँ गर्भ है, उसमें विश्ववन्दित भगवान् विष्णु निवास करेंगे; अतः वह गर्भ तुम्हारी मृत्युका कारण होगा ॥ ५१ ॥

देवानां स तु सर्वस्वं त्रिदिवस्य गतिश्च सः ।
परं रहस्यं देवानां स ते मृत्युर्भविष्यति ॥ ५२ ॥

वे विष्णु ही देवताओंके सर्वस्व हैं। स्वर्गलोकके आश्रय हैं तथा देवगणोंके परम रहस्य है। वे ही तुम्हारी मृत्युमें कारण होंगे ॥ ५२ ॥

यत्नश्च क्रियतां कंस गर्भाणां पातनं प्रति ।
नावज्ञा रिपवे कार्या दुर्बले स्वजनेऽपि वा ॥ ५३ ॥

कंस ! तुम देवकीके गर्भोको मार गिरानेके लिये यत्न करो। शत्रु दुर्बल अथवा स्वजन हो तो भी उसके प्रति उपेक्षा नहीं करनी चाहिये ॥ ५३ ॥

न चायमुग्रसेनः स पिता तव महाबलः ।
द्रुमिलो नाम तेजस्वी सौभस्य पतिरूर्जितः ॥ ५४ ॥

ये उग्रसेन तुम्हारे पिता नहीं हैं। सौभ विमानका स्वामी ओज और तेजसे सम्पन्न महाबली द्रुमिल तुम्हारा पिता है ॥

श्रुत्वाहं तद् वचस्तस्य किंचिद् रोषसमन्वितः ।
भूयोऽपृच्छं कथं ब्रह्मन् द्रुमिलो नाम दानवः ॥ ५५ ॥
मम मात्रा कथं तस्य ब्रूहि विप्र समागमः ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन ॥ ५६ ॥

नारदजीकी यह बात सुनकर मुझे कुछ रोष आ गया। मैने पुनः पूछा—'ब्रह्मन् ! द्रुमिल नामक दानव किस तरह मेरा पिता हुआ ? तपोधन विप्र ! बताइये, मेरी माताके साथ उसका समागम कैसे हुआ ? मैं यह सब विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ' ॥ ५५-५६ ॥

नारद उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु राजन् यथार्थतः ।
द्रुमिलस्य च मात्रा ते संवादं च समागमम् ॥ ५७ ॥

नारदजीने कहा—राजन् ! बहुत अच्छा, द्रुमिलका तुम्हारी माताके साथ जो संवाद और समागम हुआ था, वह सब मैं तुम्हें यथार्थ रूपसे बता रहा हूँ, सुनो ॥ ५७ ॥

सुयामुनं नाम नगं तव माता रजस्वला ।
प्रेक्षितुं सहिता स्त्रीभिर्गता वै सा कुतूहलात् ॥ ५८ ॥

एक समयकी बात है, तुम्हारी माता जब रजस्वला

३१० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

(होनेके पश्चात् स्नान कर चुकी) थी, कौतूहलवश दूसरी स्त्रियोंके साथ सुयामुन नामक पर्वतका दर्शन करनेके लिये गयी ॥ ५८ ॥

सा तत्र रमणीयेषु रुचिरद्रुमसानुषु ।
चचार नगशृङ्गेषु कन्दरेषु नदीषु च ॥ ५९ ॥
वह वहाँ पर्वतके रमणीय शिखरोंपर, जो मनोहर वृक्षोंसे सुशोभित थे, विचरने लगी। उसने वहाँकी कन्दराओंमें तथा नदियोंके तटोंपर भी भ्रमण किया ॥ ५९ ॥

किन्नरोद्गीतमधुराः प्रतिश्रुत्यभिनादिताः ।
शृण्वती कामजननीर्वाचः श्रोत्रसुखावहाः ॥ ६० ॥
वहाँ उसे कानोंको सुख देनेवाली कुछ ऐसी बातें सुननेको मिलीं, जो कामोद्दीपन करनेवाली थीं। वे बातें किन्नरोंके गाये हुए गीतोंके रूपमें उपलब्ध होनेके कारण बड़ी मधुर प्रतीत होती थीं और प्रतिध्वनिसे सब ओर गूँजती रहती थीं ॥ ६० ॥

वर्हिणां चैव विरुतं खगानां च विकूजितम् ।
अभीक्ष्णमभिशृण्वती स्त्रीधर्ममभिरोचयत् ॥ ६१ ॥
मयूरोंकी मधुर केकाध्वनि तथा विहंगमोंके कलरवोंको निरन्तर सुनती हुई तुम्हारी माताके मनमें स्त्रीधर्म (पुरुष-सहवास) की रुचि जाग्रत् हो उठी ॥ ६१ ॥

एतस्मिन्नन्तरे वायुर्वनराजीविनिःसृतः ।
हृद्यः कुसुमगन्धाढ्यो ववौ मन्मथबोधनः ॥ ६२ ॥
इसी बीचमें वनश्रेणियोंसे निकलकर फूलोंकी सुगन्धसे भरी हुई मनोरम वायु चलने लगी, जो कामभावको जगानेवाली थी ॥ ६२ ॥

द्विरेफाभरणाश्चैव कदम्बा वायुघट्टिताः ।
मुमुचुर्गन्धमधिकं संततासारमूर्च्छिताः ॥ ६३ ॥
खिले हुए कदम्बोंपर भ्रमर छाये हुए थे, जो उनके आभूषणसे जान पड़ते थे। वायुके झोंके खाकर और निरन्तर गिरती हुई जलधाराओंसे मूर्च्छित-से होकर वे कदम्ब अधिकाधिक गन्ध छोड़ने लगे ॥ ६३ ॥

केसराः पुष्पवर्षैश्च ववृषुर्मदबोधनाः ।
नीपा दीपा इवाभान्ति पुष्पकण्टकधारिणः ॥ ६४ ॥
मदोन्मादको जगानेवाले नागकेसर अपने फूलोंकी वर्षा कर रहे थे। पुष्पमय कण्टक धारण करनेवाले नीप दीपके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ६४ ॥

मही नवतृणच्छन्ना शक्रगोपविभूषिता ।
यौवनस्थेव वनिता स्वं दधारार्तवं वपुः ॥ ६५ ॥
नयी-नयी घासोंसे ढकी और वीरबहूटीसे विभूषित हुई वसुधा नवयुवती नारीके समान मानो रजस्वला-रूप धारण किये हुए थी ॥ ६५ ॥

अथ सौभपतिः श्रीमान् द्रुमिलो नाम दानवः ।
भविष्यद्दैवयोगेन विधात्रा तत्र नीयते ॥ ६६ ॥
ऐसे समयमें सौभविमानका अधिपति द्रुमिल नामक दीप्तिमान् दानव भावी दैवयोगसे विधाताद्वारा प्रेरित होकर वहाँ आ पहुँचा ॥ ६६ ॥

कामगेन रथेनाशु तरुणादित्यवर्चसा ।
यदृच्छया गतस्तत्र सुयामुनदिदृक्षया ॥ ६७ ॥
इच्छानुसार चलनेवाला उसका विमान प्रभातकालके सूर्यकी भाँति तेजःपुञ्जसे प्रकाशित हो रहा था। उसके द्वारा वह वहाँ सुयामुन पर्वतकी शोभा देखनेकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक सहसा आ गया ॥ ६७ ॥

विहायसा कामगमो मनसोऽप्याशुगामिना ।
स तं प्राप्य पर्वतेन्द्रमवतीर्य रथोत्तमात् ॥ ६८ ॥
मनसे भी तीव्र गतिवाले उस विमानद्वारा आकाशमार्गसे इच्छानुसार चलनेवाला वह दानव पर्वतराज सुयामुनपर आकर उस श्रेष्ठ रथसे नीचे उतरा ॥ ६८ ॥

पर्वतोपवने न्यस्य रथं पररथारुजम् ।
अथासौ सूतसहितश्चचार नगमूर्धनि ॥ ६९ ॥
शत्रुओंके रथको तोड़ डालनेवाले उस रथ (विमान) को उस पर्वतके उपवनमें खड़ा करके वह विमानचालकके साथ पर्वत-शिखरपर विचरण करने लगा ॥ ६९ ॥

ततो बहून्यपश्येतां काननानि वनानि च ।
सर्वर्तुगुणसम्पन्नं नन्दनस्येव काननम् ॥ ७० ॥
उन दोनोंने वहाँ बहुत-से वन और कानन देखे। वहाँकी वनस्थली नन्दनवनके समान सभी ऋतुओंके गुणोंसे सम्पन्न थी ॥ ७० ॥

चेरतुर्नगशृङ्गेषु कन्दरेषु नदीषु च ।
नानाधातुपिनद्धैश्च शृङ्गैर्र्बहुभिरुच्छ्रितैः ॥ ७१ ॥
नानारत्नविचित्रैश्च काञ्चनाञ्जनराजतान् ।
नानाकुसुमगन्धाढ्यान् नानासत्त्वगणैर्युतान् ॥ ७२ ॥
नानाद्विजगणैर्घुष्टान् नानापुष्पफलद्रुमान् ।
नानौषधिसमायुक्तान्नृपसिद्धानुसेवितान् ॥ ७३ ॥
वे दोनों उस पर्वतके शिखरोंपर, कन्दराओंमें और नदियोंके किनारे-किनारे घूमने लगे। उस पर्वतके बहुत-से ऊँचे-ऊँचे शिखर नाना प्रकारकी धातुओंसे आवृत्त थे। भाँति-भाँतिके रत्नोंसे उनकी विचित्र शोभा हो रही थी। उन दोनोंने देखा, पर्वतके विभिन्न शिखर सुवर्णमय, रजतमय तथा अञ्जनमय दिखायी दे रहे हैं। नाना प्रकारके फूलोंकी सुगन्ध वहाँ व्याप्त हो रही है। भाँति-भाँतिके जीव-जन्तुओंके समुदाय वहाँ निवास करते हैं। अनेक प्रकारके पक्षी अपने कलरवोंसे उन शिखरोंको कोलाहलपूर्ण कर रहे हैं। भाँति-भाँतिके पुष्प

विष्णुपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः ३११

और फलोंसे सम्पन्न वृक्ष वहाँ लहलहा रहे हैं। नाना प्रकारकी ओषधियोंसे संयुक्त उन शिखरोंपर ऋषि और सिद्ध पुरुष निवास करते हैं ॥ ७१-७३ ॥

विद्याधरान् किम्पुरुषानृक्षवानरराक्षसान्। सिंहान् व्याघ्रान् वराहांश्च महिषाञ्छरभाञ्छशान् ॥ सूमरांश्चमरान् न्यङ्कन् मातङ्गान् यक्षराक्षसान्। एवं बहुविधान् पश्यंश्चरमाणो नगोत्तमम् ॥ ७६ ॥

विद्याधर, किन्नर, रीछ, वानर, राक्षस, सिंह, व्याघ्र, वराह, भैंसे, शरभ, खरगोश, सूमर (मृगविशेष), चमर (चँवरी गाय), न्यङ्कु (बारहसिंगा), हाथी, यक्ष, निशाचर तथा ऐसे ही नाना प्रकारकी जातिके प्राणियोंको देखता हुआ वह दानव उस उत्तम पर्वतपर भ्रमण कर रहा था ॥ ७४-७५ ॥

दूराद् ददर्श नृपतिदेवीं देवसुतोपमाम्। क्रीडमानां सखीभिश्च पुष्पं चैव विचिन्वतीम् ॥ ७६ ॥

इसी समय उस दानवराजने दूरसे ही उग्रसेनकी रानीको देखा, जो सखियोंके साथ क्रीडा करती तथा फूल चुनती हुई देवकन्याके समान सुशोभित हो रही थी ॥ ७६ ॥

ततश्चरन्तीं सुश्रोणीं सखीभिः सह संवृताम्। दृष्ट्वा सौभपतिर्दूराद् विस्मयन् सूतमब्रवीत् ॥ ७७ ॥

सखियोंसे घिरी हुई उस सुन्दर कटिप्रदेशवाली रमणीको दूरसे ही वहाँ विचरती देख सौभ विमानका स्वामी द्रुमिल चकित हो उठा और अपने विमानचालकसे इस प्रकार बोला— ॥ ७७ ॥

कस्येयं मृगशावाक्षी वनान्तरविचारिणी। रूपौदार्यगुणोपेता मन्मथस्य रतिर्यथा ॥ ७८ ॥

'सूत ! इस वनके भीतर विचरनेवाली यह मृगनयनी बाला किसकी स्त्री है, जो रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न होकर कामपत्नी रतिके समान शोभा पा रही है ॥ ७८ ॥

शचीव पुरुहूतस्य उताहो वा तिलोत्तमा। नारायणोरुं निर्भिद्य सम्भूता वरवर्णिनी। ऐलस्य दयिता देवी योषिद्रत्नं किमुर्वशी ॥ ७९ ॥

'अहो ! क्या यह देवराज इन्द्रकी पत्नी शची है या तिलोत्तमा है अथवा जो भगवान् नारायणके ऊरुका भेदन करके प्रकट हुई और पुरूरवाकी प्यारी महारानी बनी थी, वह सुन्दर कान्तिवाली रमणीरत्न उर्वशी है ? ॥ ७९ ॥

क्षीरार्णवे मथ्यमाने सुरासुरगणैः सह। मन्थानं मन्दरं कृत्वामृतार्थमिति नः श्रुतम् ॥ ८० ॥ ततोऽमृतात् समुत्तस्थौ देवी श्रीर्लोकभाविनी। नारायणाङ्कललिता किं श्रीरेषा वराङ्गना ॥ ८१ ॥

'हमने सुना है—देवताओंने असुरोंके साथ मिलकर अमृतकी प्राप्तिके लिये मन्दराचलको मेथानी बनाकर जब क्षीरसागरका मन्थन किया था, उस समय उसके अमृतमय दुग्धसे लोकभाविनी लक्ष्मी देवीका प्रादुर्भाव हुआ था, जो भगवान् नारायणके अङ्कमें सुशोभित होती हैं, यह सुन्दरी अङ्गना वही लक्ष्मी देवी तो नहीं है ॥ ८०-८१ ॥

नीलमेघान्तरगता द्योतयन्त्यचिरप्रभा। तथा योषिद्गणान् मध्ये रूपं प्रद्योतयद् वनम् ॥ ८२ ॥

'जैसे थोड़ी-थोड़ी देरमें चमकनेवाली बिजली नील मेघके भीतर रहकर अपना प्रकाश फैलाती है, उसी प्रकार यह स्त्रियोंके बीचमें रहकर अपने रूप और वनको प्रकाशित करती हुई यहाँ विचर रही है ॥ ८२ ॥

अतीव सुकुमाराङ्गी सुप्रभेन्दुनिभानना। दृष्ट्वा रूपमनिन्दाङ्ग्या विभ्रान्तो व्याकुलेन्द्रियः ॥ ८३ ॥

'इसके अङ्ग बड़े ही सुकुमार हैं, मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर कान्तिसे उद्भासित हो रहा है। इस निर्दोष अङ्गोंवाली रमणीका रूप देखकर मैं पागल हो गया हूँ। मेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठी हैं ॥ ८३ ॥

कामस्य वशमापन्नो मनो विह्वलतीव मे। भृशं कृन्तति मेऽङ्गानि सायकैः कुसुमायुधः। भित्त्वा हृदि शरान् पञ्च निर्दयं हन्ति मे मनः ॥ ८४ ॥

'मैं कामके अधीन हो गया हूँ। मेरा मन विह्वल-सा हो रहा है। पुष्पधन्वा कामदेव अपने सायकोंसे मेरे अङ्गोंको बड़े वेगसे छिन्न-भिन्न कर रहा है। मेरे हृदयमें अपने पाँचों बाणोंका प्रहार करके वह बड़ी निर्दयताके साथ उसे विदीर्ण कर रहा है ॥ ८४ ॥

हृदयाग्निर्वर्धयति आज्यसिक्त इवानलः। कथमद्य भवेत् कार्यं शमार्थं मन्मथाग्निना ॥ ८५ ॥ केनोपायेन किं कुर्मो भजेन्मां मत्तगामिनी।

'मेरे हृदयके भीतर कामाग्नि बढ़ रही है। वह घीकी आहुति पाकर बढ़ी हुई आगके समान प्रज्वलित हो उठी है। इस कामाग्निसे शान्ति पानेके लिये इस समय कैसे कौन-सा यत्न किया जाय ? अहो ! किस उपायसे हम क्या करें, जिससे यह मतवाली चालसे चलनेवाली रमणी मुझे अङ्गीकार कर ले' ॥ ८५ ॥

एवं बहु चिन्तयानो नोपलभ्य च दानवः ॥ ८६ ॥ सूतमाह मुहूर्त्तं तु तिष्ठस्व त्वमिहानघ। अहं यास्यामि तां द्रष्टुं कस्येयमिति योषितम् ॥ ८७ ॥

इस प्रकार बहुत सोचनेपर भी जब कोई उपाय नहीं सूझा, तब उस दानवने अपने सारथिसे कहा—'अनघ ! तुम दो घड़ी यहीं ठहरो, मैं स्वयं ही उसे देखने तथा यह किसकी स्त्री है, इस बातका पता लगानेके लिये जाता हूँ ॥ ८६-८७ ॥

प्रतीक्षमाणस्तिष्ठस्व यावदागमनं मम। श्रुत्वा तु वचनं तस्य तथास्त्विति वचोऽब्रवीत् ॥ ८८ ॥

३१२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

'जबतक मैं लौटकर न आऊँ, तबतक तुम यहीं मेरी प्रतीक्षा करते हुए खड़े रहो।' द्रुमिलकी यह बात सुनकर उसके सारथिने कहा, 'बहुत अच्छा ! ऐसा ही होगा'॥ ८८॥

एवमुक्त्वा दानवेन्द्रो गमनाय मनो दधे।
वार्युपस्पृश्य बलवान् ध्यानमेवान्वचिन्तयत् ॥ ८९ ॥

सारथिसे उपर्युक्त बात कहकर बलवान् दानवराज द्रुमिल-ने उसके पास जानेका विचार किया। फिर उसने जलसे आचमन किया और ध्यान लगाकर उसके विषयमें चिन्तन करने लगा ॥

मुहूर्तं ध्यानमात्रेण दृष्टं ज्ञानबलात् ततः।
उग्रसेनस्य पत्नीति ज्ञात्वा हर्षमुपागतः ॥ ९० ॥

दो घड़ीतक ध्यान करनेमात्रसे उसने ज्ञानबलसे देख लिया कि यह राजा उग्रसेनकी पत्नी है। यह जानकर उसे बड़ा हर्ष हुआ ॥ ९० ॥

उग्रसेनस्य रूपं वै कृत्वा स्वं परिवर्त्य सः।
उपासर्पन्महाबाहुः प्रहसन् दानवेश्वरः ॥ ९१ ॥
स्वयमानम्रय शनकैर्जग्राहामितवीर्यवान् ।
उग्रसेनस्य रूपेण मातरं ते व्यधर्षयत् ॥ ९२ ॥

फिर तो उसने अपना रूप बदलकर उग्रसेनका रूप धारण कर लिया। तत्पश्चात् वह अमितपराक्रमी महाबाहु दानवराज हँसता हुआ उसके पास गया, फिर धीरे-धीरे मुसकराते हुए ही उसने उसे अपनी भुजाओंमें कस लिया। इस प्रकार उग्रसेनके ही रूपसे उसने तुम्हारी माताका सतीत्व भङ्ग किया ॥ ९१-९२ ॥

सा पतिस्निग्धहृदया तं भावेनोपसर्पती।
शङ्किता चाभवत् पश्चात् तस्य गौरवदर्शनात् ॥ ९३ ॥

पतिके प्रति हृदयमें अत्यन्त स्नेह रखनेके कारण वह देवी बड़े प्रेमसे उसकी सेवामें उपस्थित हुई। पीछे उसके शरीरके भारीपनका अनुभव करके वह शङ्कित हो उठी ॥

सा तमाहोत्थिता भीता न त्वं मम पतिर्ध्रुवम् ।
कस्य त्वं विकृताचारो येनास्मि मलिनीकृता ॥ ९४ ॥

उठकर भयभीत हो उसने उससे कहा—'निश्चय ही तू मेरा पति नहीं है; अतः बता, तू किसका दुराचारी पुत्र है, जिसने मुझे कलङ्कित कर दिया ? ॥ ९४ ॥

एकभर्तृव्रतमिदं मम संदूषितं त्वया।
पत्युर्मे रूपमास्थाय नीच नीचेन कर्मणा ॥ ९५ ॥

'नीच ! तूने मेरे पतिका रूप धारण करके अपने नीच कर्मसे मेरे पातिव्रत्यको दूषित कर दिया ॥ ९५ ॥

किं मां वक्ष्यन्ति रुषिता बान्धवाः कुलपांसनीम् ।
जुगुप्सिता च वत्स्यामि पतिपक्षैर्निराकृता ॥ ९६ ॥

'अब रोषमें भरे हुए मेरे बन्धु-बान्धव मुझ कुल-कलङ्किनीको क्या कहेंगे ? मुझे पतिपक्षके लोगोंसे निन्दित और तिरस्कृत होकर रहना पड़ेगा ॥ ९६ ॥

धिक्त्वामीदृशमक्षान्तं दुष्कुलं व्युत्थितेन्द्रियम् ।
अविश्वास्यमनार्यं च परदाराभिमर्शनम् ॥ ९७॥

'तू ऐसा असहनशील, दूषित कुलमें उत्पन्न, अजितेन्द्रिय, अविश्वसनीय, अनार्य तथा परस्त्रीको कलङ्कित करनेवाला है, तुझे धिक्कार है' ॥ ९७ ॥

स तामाह प्रसञ्जन्तीं क्षिप्तः क्रोधेन दानवः।
अहं वै द्रुमिलो नाम सौभस्य पतिरूर्जितः ॥ ९८ ॥
किं मां क्षिपसि रोषेण मूढे पण्डितमानिनि ।
मानुषं पतिमाश्रित्य नीचं मृत्युवशे स्थितम् ॥ ९९ ॥

जब इस प्रकार धिक्कार देती हुई वह उससे उलझ पड़ी, तब उसके आक्षेप सुनकर उस दानवने क्रोधपूर्वक कहा—'मूढ़ नारी ! तू अपनेको बड़ी विदुषी मानती है ? अरी ! मैं सौभ विमानका अधिपति ओजस्वी दानव द्रुमिल हूँ, तू मृत्युके वशमें रहनेवाले तुच्छ मानव पतिका आश्रय लेकर रोषपूर्वक मेरे ऊपर आक्षेप क्यों करती है ? ॥ ९८-९९ ॥

व्यभिचारान्न दुष्यन्ति स्त्रियः श्रीमानगर्विते ।
न ह्यासां नियता बुद्धिर्मानुषीणां विशेषतः ॥१००॥

'स्त्रीके सम्मानपर गर्व करनेवाली नारी ! (देवताओं और दानवोंके साथ) विवशतापूर्वक व्यभिचार घटित होनेसे स्त्रियाँ दूषित नहीं होती हैं। इन स्त्रियोंकी विशेषतः मानवी स्त्रियोंकी बुद्धि निश्चल नहीं होती ॥ १०० ॥

श्रूयन्ते हि स्त्रियो बह्व्यो व्यभिचारव्यतिक्रमैः।
प्रसूता देवसंकाशान् पुत्रान् निश्चलविक्रमान् ॥१०१॥

'सुननेमें आता है कि बहुतेरी स्त्रियाँ व्यभिचाररूप दोष बन जानेपर भी अविचल पराक्रमी देवोपम पुत्रोंकी जननी हुई हैं ॥ १०१ ॥

अतीव हि त्वं स्त्रीलोके पतिधर्मवती सती।
शुद्धा केशान् विधुन्वन्ती भाषसे यद्यदिच्छसि ॥१०२॥

'स्त्री-जगत्में एक तू ही तो बड़ी पतिधर्म-परायणा और दूधकी धोयी हुई शुद्ध सती है, जो अपने केश-कलापोंको कम्पित करती हुई जो-जो चाहती है, बकती चली जा रही है ॥१०२॥

कस्य त्वमिति यच्चाहं त्वयोक्तो मत्तकाशिनि ।
कंसस्तस्माद् रिपुध्वंसी तव पुत्रो भविष्यति ॥१०३॥

'मतवाली स्त्री ! तुमने जो मुझसे यह पूछा है कि—'कस्य त्वम्—तू किसका पुत्र है' इससे तुम्हें कंस नामक शत्रुनाशक पुत्र प्राप्त होगा' ॥ १०३ ॥

सा सरोषा पुनर्भूत्वा निन्दन्ती तस्य तं वरम्।
उवाच व्यथिता देवी दानवं धृष्टवादिनम् ॥ १०४॥

विष्णुपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः [ ३१३


यह सुनकर वह देवी पुनः रोषमें भरकर उसके उस वरकी निन्दा करने लगी और ढिठाईके साथ बात करनेवाले उस दानवसे व्यथित होकर बोली—॥ १०४॥

धिक् ते वृत्तं सुदुर्वृत्त यः सर्वा निन्दसि स्त्रियः।
सन्ति स्त्रियो नीचवृत्ताः सन्ति चैव पतिव्रताः ॥१०५॥

'दुराचारी दानव ! तेरे इस घृणित आचारको धिक्कार है, जो तू संसारकी सारी स्त्रियोंकी निन्दा कर रहा है। माना कि जगत्में नीच आचार-विचारवाली स्त्रियाँ भी हैं, परंतु पतिव्रताएँ भी कम नहीं हैं ॥ १०५ ॥

यास्त्वेकपत्न्यः श्रूयन्तेऽरुन्धतीप्रमुखाः स्त्रियः।
धृता याभिः प्रजाः सर्वा लोकाश्चैव कुलाधम ॥१०६॥

'कुलाधम ! अरुन्धती आदि जो पतिव्रता स्त्रियाँ सुनी जाती हैं, उनका स्मरण कर ! जिन्होंने समस्त प्रजाओं तथा सम्पूर्ण लोकोंको अपने सतीत्वके बलसे ही धारण किया है ॥ १०६ ॥

यस्त्वया मम पुत्रो वै दत्तो वृत्तविनाशनः।
न मे बहुमतस्त्वेवं शृणु चापि यदुच्यते ॥१०७॥

'तूने जो मुझे सदाचारनाशक पुत्र प्रदान किया है, इसके प्रति मेरे मनमे अधिक आदर नहीं है। इस विषयमें मैं जो कुछ कहती हूँ, उसे सुन ले ॥ १०७ ॥

उत्पत्स्यति पुमान् नीच पतिवंशे ममाद्य यः।
भविष्यति स ते मृत्युर्र्यश्च दत्तस्त्वया सुतः ॥१०८॥

'नीच ! अद्य मेरे पतिके कुलमें परमपुरुष परमेश्वर अवतार लेंगे, जो तेरी तथा तूने जो पुत्र दिया है, उसकी भी मृत्युके कारण होगे' ॥ १०८ ॥

द्रुमिलस्त्वेवमुक्तस्तु जगामाकाशमेव तु।
तेनैव रथमुख्येन दिव्येनाप्रतिगामिना ॥१०९॥

उसके ऐसा कहनेपर द्रुमिल उसी अनुपम गतिवाले दिव्य विमानद्वारा पुनः आकाशको ही चला गया ॥ १०९ ॥

जगाम च पुरीं दीना माता तदहरेव ते।
मामेवमुक्त्वा भगवान् नारदो मुनिसत्तमः ॥११०॥
दीप्यमानस्तपोवीर्यात् साक्षादग्निरिव ज्वलन्।
वल्लकीं वाद्यमानो हि सप्तस्वरविमूर्च्छिताम् ॥१११॥
गायनो लक्ष्यवीथीं स जगाम ब्रह्मणोऽन्तिकम्।

तुम्हारी माता अत्यन्त दीन होकर उसी दिन मथुरापुरीको चली गयीं ! महावत ! मुझसे इस प्रकार कहकर मुनिश्रेष्ठ भगवान् नारद अपने तपोबलसे प्रकाशित तथा साक्षात् अग्निके समान देदीप्यमान हो, सात स्वरोंकी मूर्च्छनाका विस्तार करनेवाली वीणा बजाते और गाते हुए लक्ष्यवीथी (अथवा अलक्ष्यवीथी) देवयान मार्गसे ब्रह्माजीके पास चले गये ॥ ११०-१११½ ॥

शृणुष्वेदं महामात्र निबोध वचनं मम ॥११२॥
तथ्यं चोक्तं नारदेन त्रैलोक्यज्ञेन धीमता।

महावत ! मेरी वह बात सुनो और समझो। तीनों लोकोंकी बातें जाननेवाले बुद्धिमान् नारदने सब कुछ ठीक ही कहा था ॥ ११२½ ॥

अलं बलेन वीर्येण नयेन विनयेन च ॥११३॥
प्रमाणैर्वापि वीर्येण तेजसा विक्रमेण च।
सत्येन चैव दानेन नान्योऽस्ति सदृशः पुमान् ॥११४॥

अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता—बल, वीर्य, नय, विनय, प्रमाण, शक्ति, तेज, पराक्रम, सत्य और दानके द्वारा मेरी समानता करनेवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं है॥११३-११४॥

विदित्वा सर्वमात्मानं वचनं श्रद्दधाम्यहम्।
क्षेत्रजोऽहं सुतस्तस्य उग्रसेनस्य हस्तिप ॥११५॥

महावत ! अपनेको सर्वथा इन गुणोंसे युक्त समझकर मै नारदजीकी बातपर श्रद्धा करता हूँ, इसमें संदेह नहीं कि मैं उग्रसेनका क्षेत्रज पुत्र ही हूँ ॥ ११५ ॥

मातापितृभ्यां संत्यक्तः स्थापितः स्वेन तेजसा।
उभाभ्यामपि विद्विष्टो बान्धवैश्च विशेषतः ॥११६॥

माता-पिताने तो मुझे त्याग ही दिया है। मैं अपने तेजसे ही इस सिंहासनपर बैठा हूँ। मेरे माता-पिता तथा विशेषतः सभी बन्धु-बान्धव मुझसे द्वेष रखते हैं ॥ ११६ ॥

एतानपि हनिष्यामि यादवान् कृष्णपक्षिणः।
तदिमौ घातयित्वा तु हस्तिना गोपकिल्बिषौ ॥११७॥

ये सभी यादव श्रीकृष्णके पक्षमें मिल गये हैं, अतः मैं इन दोनों गोपकुलकलंकोंको हाथीके द्वारा मरवाकर इन यादवोंका भी वध कर डालूँगा ॥ ११७ ॥

तद् गच्छ गजमारुह्य सांकुशप्रासतोमरः।
स्थिरो भव महामात्र समाजद्वारि मा चिरम् ॥११८॥

अतः महावत ! तुम जाओ ! कुवलयापीड़ हाथीपर आरूढ़ हो अंकुश, भाला और तोमर लिये रङ्गशालाके द्वारपर दृढ़तापूर्वक डट जाओ, विलम्ब न करो ॥ ११८ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कंसवाक्येऽष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कंसका वाक्यविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥

३१४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

एकोनत्रिंशोऽध्यायः

नागरिकॉसे भरी रङ्गशालामें मञ्चों तथा प्रेक्षागृहोंकी शोभा, कंस तथा मल्लोंका आगमन, श्रीकृष्ण और बलरामका रङ्गद्वारपर पदार्पण, कुवलयापीड, महावत तथा हाथीके पादरक्षकोंका वध और दोनों बन्धुओंका रङ्गस्थलमें प्रवेश

वैशम्पायन उवाच

तस्मिन्नहनि निर्वृत्ते द्वितीये समुपस्थिते।
आपूर्यत महारङ्गः पौरैर्युद्धदिदृक्षुभिः॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! वह दिन समाप्त होकर जब दूसरा उपस्थित हुआ, तब युद्ध देखनेकी इच्छावाले पुरवासियोंसे वह महान् रङ्गस्थल भर गया॥ १ ॥

सचित्राष्टास्रिचरणाः सार्गलद्वारवेदिकाः।
सगवाक्षार्धचन्द्राश्च सुतल्पोत्तमभूषिताः॥ २ ॥

वहाँ जो मञ्च रखे गये थे, वे चित्रोंसे सुशोभित तथा आठ कोणवाले पायोंसे अलंकृत थे। जिन घरोंमें वे मञ्च थे, उनके द्वारोंपर वेदियाँ बनी थीं और कुण्डीके साथ किवाड़ें भी थीं। उनमें झरोखोंके रूपमें अर्धचन्द्राकार छिद्र रखे गये थे। वे मञ्च और मञ्चागार उत्तमोत्तम बिछौनोंसे विभूषित थे॥ २ ॥

प्राङ्मुखैश्चारुनिर्मुक्तैर्माल्यदामावतंसितैः।
अलंकृतैर्विराजद्भिः शारदैरिव तोयदः॥ ३ ॥
मञ्चागारैः सुनिर्यक्तैर्योद्धाय सुविभूषितैः।
समाजवाटः शुशुभे समेघौघ इवार्णवः॥ ४ ॥

उन मञ्चागारोंके द्वार पूर्वाभिमुख थे। वे सब-के-सब सुन्दर और खुले हुए थे (अथवा उनमें झीने सूतके मनोहर परदे लगे थे)। फूलोंकी मालाओं तथा मोती आदिकी लड़ियोंसे उन सबको सजाया गया था। वे शोभासम्पन्न एवं अलंकृत मञ्चागार शरद्-ऋतुके बादलोंके समान शोभा पाते थे। उनमें सुन्दर मल्ल आदि यथास्थान बैठे थे, जिन्हें युद्धके लिये भलीभाँति विभूषित किया गया था। उन सबके द्वारा वह समाजवाट या रङ्गस्थल मेघोंकी घटासे युक्त महासागरके समान शोभा पा रहा था॥ ३-४ ॥

स्वकर्मद्रव्ययुक्ताभिः पताकाभिर्निरन्तरम्।
श्रेणीनां च गणानां च मञ्चा भान्त्यचलोपमाः॥ ५ ॥

वहाँ एक ही शिल्पसे जीवननिर्वाह करनेवाले श्रेणी नामक कारीगरों तथा एक जातिके समुदायोंके लिये पृथक्-पृथक् मञ्च थे। उन मञ्चोंपर जो पताकाएँ निरन्तर फहराती रहती थीं, उनमें उन कारीगरोंके उपकरण-द्रव्यके चिह्न अङ्कित थे। उन पताकाओंसे वे मञ्च पर्वतोंके समान शोभा पाते थे॥ ५ ॥

अन्तःपुरचराणां च प्रेक्षागाराण्यनेकशः।
रेजुः काञ्चनचित्राणि रत्नज्वालाकुलानि च॥ ६ ॥

अन्तःपुरकी स्त्रियोंके लिये अनेक प्रेक्षागार सुशोभित हो रहे थे, जो सुवर्णसे चित्रित तथा रत्नोंकी प्रभासे व्याप्त थे॥ ६ ॥

तानि रत्नौघक्लृप्तानि ससानुप्रग्रहाणि च।
रेजुर्जवनिकाक्षेपैः सपक्षा इव खे नगाः॥ ७ ॥

रत्नराशिसे निर्मित उन प्रेक्षागारोंके ऊपरी भागमें पताकाएँ फहरा रही थीं और उनके निचले भागमें परदे पड़े हुए थे। इससे वे आकाशमें पंखयुक्त पर्वतके समान शोभा पाते थे॥ ७ ॥

तत्र चामरहारैश्च भूषणानां च सिञ्जितैः।
मणीनां च विचित्राणां विचित्राश्चेरुरर्चिषः॥ ८ ॥

उन प्रेक्षागारोंमें चामरों, हारों, झनकारते हुए भूषणों तथा विचित्र मणियोंकी चित्र-विचित्र प्रभाएँ सब ओर फैल रही थीं॥ ८ ॥

गणिकानां पृथङ्मञ्चाः शुभैरास्तरणाम्बरैः।
शोभिता वारमुख्याभिर्विमानप्रतिमौजसः॥ ९ ॥

गणिकाओंके लिये पृथक् मञ्च बने थे, जो सुन्दर बिछौनों और वस्त्रोंसे ढके हुए थे। वे सब-के-सब विमानके समान कान्तिमान् दिखायी देते थे और मुख्य-मुख्य वाराङ्गनाएँ उनकी शोभा बढ़ाती थीं॥ ९ ॥

तत्रासनानि ख्यातानि पर्यङ्काश्च हिरण्मयाः।
प्रकीर्णाश्च कुथाश्चित्राः सपुष्पस्तवकैर्वृताः॥ १० ॥

वहाँ विख्यात आसन, सोनेके पलंग तथा बिछे हुए विचित्र एवं पुष्पगुच्छोंसे युक्त कालीन सुशोभित थे॥ १० ॥

सौवर्णाः पानकुम्भाश्च पानभूम्यश्च शोभिताः।
फलावदंशपूर्णाश्च चाङ्गेर्यः पानयोजिताः॥ ११ ॥

वहाँ सोनेके घड़ोंमें पीनेके लिये जल रखे गये थे। जलपानके जो स्थान थे, उन्हें भी शोभासे सम्पन्न किया गया था। वहाँ फलके टुकड़ोंसे भरी हुई चँगेरियाँ (टोकरियाँ) रखी गयी थीं, जिन्हें जलपान या कलेवेके उपयोगके लिये वहाँ स्थापित किया गया था॥ ११ ॥

अन्ये च मञ्चा बहवः काष्ठसंचयबन्धनाः।
रेजुः प्रस्तरणास्तत्र शतशोऽथ सहस्रशः॥ १२ ॥

विष्णुपर्व ] एकोनत्रिंशोऽध्यायः ३१५ और भी बहुत-से मञ्च थे, जो लकड़ियोंके ढेरसे आवद्ध थे। उनपर भी अच्छे बिछावन डाले गये थे। इस तरहके सैकड़ों-हजारों मञ्च वहाँ शोभा पा रहे थे ॥१२॥ उत्तमागारिकाश्चैव सूक्ष्मजालावलोकिनः । स्त्रीणां प्रेक्षागृहा भान्ति राजहंसा इवाम्बरे ॥ १३ ॥ घरोंके ऊपर जो घर थे, उनमें स्त्रियोंके लिये प्रेक्षागृह बने थे। उनके दरवाजोंपर महीन जालीदार परदा पड़ा था, जिससे वहाँ बैठे हुए लोग बाहरकी सारी वस्तुएँ देख सकते थे। वे प्रेक्षाभवन आकाशमें राजहंसोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ १३ ॥ प्राङ्मुखश्चारुनिर्मुको मेरुशृङ्गसमप्रभः । रुक्मपत्रनिभस्तम्भश्चित्रनिर्यूहशोभितः ॥ १४ ॥ प्रेक्षागारः स कंसस्य प्रचकाशेऽधिकं श्रिया । शोभितो माल्यदामैश्च निवासकृतलक्षणः ॥ १५ ॥ कंसके लिये जो प्रेक्षागार (दृश्य देखनेका स्थान ) बना था, वह अधिक शोभासे प्रकाशित हो रहा था। उसका दरवाजा पूर्वकी ओर था। उसपर मनोहर जालीदार पर्दा पड़ा था। वह भवन मेरुपर्वतके शिखरके समान सुनहरी प्रभासे उद्भासित होता था। उसके खम्भे स्वर्णपत्रसे जटिल होनेके कारण विशेष शोभासे सम्पन्न थे तथा वह भवन चारु चित्रोंके संनिवेशसे सुशोभित था। मालाओंकी लड़ियोंसे भी उसे सजाया गया था। राजाकी बैठक या निवास-स्थानके लिये जो आवश्यक लक्षण होने चाहिये, उन सबसे वह सम्पन्न था ॥ १४-१५ ॥ तस्मिन् नानाजनाकीर्णे जनौघप्रतिनादिते । समाजवाटे संस्तब्धे कम्पमानाणर्वप्रभे ॥ १६ ॥ राजा कुवलयापीडः समाजद्वारि कुञ्जरः । तिष्ठत्विति समाज्ञाप्य प्रेक्षागारमुपाययौ ॥ १७ ॥ नाना प्रकारके मनुष्योंसे भरा-पूरा और जनसमुदायके शब्दोंसे प्रतिध्वनित होता हुआ वह समाजवाट या रङ्गस्थल चञ्चल लहरोंवाले विक्षुब्ध महासागरके समान प्रतीत होता था। थोड़ी ही देरमें वहाँ सन्नाटा छा गया और 'कुवलया- पीड नामक हाथी रङ्गशालाके द्वारपर खड़ा रहे'—यह आज्ञा देता हुआ राजा कंस अपने प्रेक्षागारमें आ पहुँचा ॥१६-१७॥ स शुक्ले वाससी बिभ्रच्छुक्लव्यजनचामरः । शुशुभे श्वेतमुकुटः श्वेताभ्र इव चन्द्रमाः ॥ १८ ॥ उसने दो श्वेत वस्त्र धारण कर रखे थे। उसपर श्वेत चँवर और व्यजन डुलाये जा रहे थे तथा उसके मस्तकपर श्वेत मुकुट प्रकाशित होता था, अतः वह श्वेत बादलोंसे युक्त चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा था ॥ १८ ॥ तस्य सिंहासनस्थस्य सुखासीनस्य धीमतः । रूपमप्रतिमं दृष्ट्वा पौराः प्रोचुर्जयाशिषः ॥ १९ ॥ जब वह सिंहासनपर सुखपूर्वक विराजमान हुआ, उस समय उस बुद्धिमान् नरेशके अनुपम रूपको देखकर समस्त पुरवासी उसकी 'जय' बोलते हुए उसे आशीर्वाद देने लगे ॥ ततः प्रविविशुर्मल्ला रङ्गमावलिताम्बराः । तिस्रश्च भागशः कक्षाः प्राविशन् बलशालिनः ॥ २० ॥ तदनन्तर मल्लोंने रङ्गभूमिमें प्रवेश किया। उनके कपड़े फहरा रहे थे। वे बलशाली मल्ल अलग-अलग तीन कक्षाओं- में प्रविष्ट हुए ॥ २० ॥ ततस्तूर्यनिनादेन क्ष्वेदितास्फोटितेन च । वसुदेवसुतौ दृष्टौ रङ्गद्वारमुपस्थितौ ॥ २१ ॥ तत्पश्चात् वाद्योंकी तुमुल ध्वनिके साथ मल्लोंके गर्जने और ताल ठोंकनेके शब्द सुनायी देने लगे। इसी समय हर्षमें भरे हुए दोनों वसुदेव-पुत्र रङ्गशालाके द्वारपर उपस्थित हुए ॥ २१ ॥ बल्लवौ वस्त्रसंवीतौ सुरचन्दनभूषितौ । ऊर्ध्वपीडौ स्रगापीडौ बाहुशस्त्रकृतौ यमौ ॥ २२ ॥ आस्फोटयन्तावन्योन्यं बाहू चैवार्गलोपमौ । वे दोनों बन्धु ग्वालवालोंके ही वेषमें थे। उनके अङ्ग सुन्दर वस्त्रोंसे आच्छादित एवं सुशोभित थे। वे दिव्य चन्दन (अङ्गराग) से विभूषित थे। सिरके ऊपर पुष्पमाला और गलेमें गजरे शोभा दे रहे थे। उन्होंने अपनी भुजाओंको ही आयुध बना रखा था। वे दोनों जुड़वें-से जान पड़ते थे और एक दूसरेकी अर्गलाके समान मोटी बाँहोंपर ताल ठोंक रहे थे ॥ २२ ॥ तावापतन्तौ त्वरितौ प्रतिषिद्धौ वराननौ । तेन मत्तेन नागेन चोद्यमानेन वै भृशम् ॥ २३ ॥ वे दोनों सुन्दर मुखवाले वीर बड़ी उतावलीके साथ रङ्गशालाकी ओर आ रहे थे, किंतु महावतके द्वारा अत्यन्त प्रेरित किये गये उस मतवाले गजराजने उन्हें सहसा रोक दिया ॥ २३ ॥ स मत्तहस्ती दुष्टात्मा कृत्वा कुण्डलिनं करम् । चकार चोदितो यत्नं निहन्तुं बलकेशवौ ॥ २४ ॥ वह मदमत्त हाथी बड़ा ही दुष्ट था। महावतके हाँकने- पर उसने अपनी सूँड़को सिकोड़कर श्रीकृष्ण और बलरामको मार डालनेका प्रयत्न किया ॥ २४ ॥ ततः प्रहसितः कृष्णस्त्रास्यमानो गजेन वै । कंसस्य तन्मतं चैव जगर्हे स दुरात्मनः ॥ २५ ॥ उस हाथीके त्रास देनेपर श्रीकृष्ण हँस पड़े और दुरात्मा कंसके उस मनसूबेकी निन्दा करने लगे ॥ २५ ॥

३१६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

त्वरते खलु कंसोऽयं गन्तुं वैवस्वतक्षयम्।
यो मामनेन नागेन प्रधर्षयितुमिच्छति ॥ २६ ॥

वे बोले—'निश्चय ही जान पड़ता है कि यह कंस यमलोक-में जानेके लिये उतावला हो उठा है, इसीलिये इस हाथीके द्वारा वह मुझे कुचल देना चाहता है' ॥ २६ ॥

संनिकृष्टे ततो नागे गर्जमाने यथा घने।
सहसोत्पत्य गोविन्दश्चक्रे तालस्वनं प्रभुः ॥ २७ ॥

तदनन्तर मेघके समान गम्भीर गर्जना करता हुआ वह हाथी जब बहुत निकट आ गया, तब भगवान् गोविन्द सहसा उछलकर ताली पीटने लगे ॥ २७ ॥

क्ष्वेडितास्फोटितरवं कृत्वा नागस्य चाग्रतः।
करं ससीकरं तस्य प्रतिजग्राह वक्षसा ॥ २८ ॥

हाथीके सामने ही गर्जने और ताल ठोंकनेकी आवाज करके उन्होंने जलके फुहारे छोड़नेवाली उसकी सूँड़को अपनी छातीपर दबा लिया ॥ २८ ॥

विषाणान्तरगो भूत्वा पुनश्चरणमध्यगः।
बबाधे तं गजं कृष्णः पवनस्तोयदं यथा ॥ २९ ॥

फिर श्रीकृष्ण उसके दोनों दाँतोंके बीचसे होकर पैरोंके मध्यभागमें आ गये और जैसे हवा बादलोंको इधर-उधर उड़ाती रहती है, उसी प्रकार वे उस हाथीको सताने और व्याकुल करने लगे ॥ २९ ॥

स हस्ताग्राद् विनिष्क्रान्तो विषाणाग्राच्च दन्तिनः।
विमुक्तः पदमध्याच्च कृष्णो द्विपमपोधयत् ॥३०॥

वे उस हाथीकी सूँड़के अग्रभागसे निकलकर, दाँतोंके भी अग्रभागसे बचकर तथा पैरोंके भी बीचसे छूटकर बाहर आ गये। फिर श्रीकृष्णने उस हाथीको पीछेसे ऊँचाईकी ओर खींचकर घसीटना आरम्भ किया ॥ ३० ॥

सोऽतिकायस्तु संमूढो हन्तुं कृष्णमशक्नुवन् ।
गजः स्वेष्वेव गात्रेषु मथ्यमानो ररास ह ॥३१॥

वह विशालकाय हाथी व्याकुल हो उठा और श्रीकृष्णको मारनेमें असफल हो अपने ही अङ्गोंमें मथित होता हुआ जोर-जोरसे चिग्घाड़ने लगा ॥ ३१ ॥

पपात भूमौ जानुभ्यां दशनाभ्यां तुतोद च।
मदं सुस्राव रोषाच्च घर्मापाये यथा घनः ॥ ३२ ॥

फिर तो वह दोनों घुटनोंके बल गिर पड़ा, दोनों दाँत भूमिसे टकरा जड़से हिल गये, जिससे उसको बड़ी व्यथा हुई। वह रोषसे मदकी धारा बहाने लगा, मानो पावसमें मेघ पानी बरसा रहा हो ॥ ३२ ॥

कृष्णस्तु तेन नागेन क्रीडित्वा शिशुलीलया।
निधनाय मतिं चक्रे कंसद्विष्टेन चेतसा ॥ ३३ ॥

श्रीकृष्णने उस हाथीके साथ बालकोंके समान खिलवाड़ करके कंसके प्रति मनमें द्वेष लेकर कुवलयापीडको मार डालने का विचार किया ॥ ३३ ॥

स तस्य प्रमुखे पादं कृत्वा कुम्भादनन्तरम्।
दोर्भ्यां विषाणमुत्पाट्य तेनैव प्राहरत् तदा ॥ ३४ ॥

उन्होंने उसके ललाटमें कुम्भस्थलसे नीचे पैर लगाकर दोनों हाथोंसे एक दाँत उखाड़ लिया और उस समय उसीसे उसको पीटना आरम्भ किया ॥ ३४ ॥

स तेन वज्रकल्पेन स्वेन दन्तेन कुञ्जरः।
हन्यमानः शकृन्मूत्रं सुमोचार्तो ररास ह ॥ ३५॥

उस वज्रतुल्य दाँतसे पीटा जाता हुआ वह हाथी मल-मूत्र त्यागने और आर्तभावसे चीत्कार करने लगा ॥ ३५ ॥

कृष्णजर्जरिताङ्गस्य कुञ्जरस्यार्तचेतसः।
कटाभ्यामति सुस्राव वेगवद् भूरि शोणितम् ॥ ३६ ॥

श्रीकृष्णने जिसके अङ्गोंको पीट-पीटकर जर्जर बना दिया था, उस आर्तचित्त हाथीके दोनों गालोंसे वेगपूर्वक भूरि-भूरि रक्तकी धारा बहने लगी ॥ ३६ ॥

लाङ्गूलं चास्य वेगेन निष्प्रकर्ष हलायुधः।
शैलपृष्ठार्धसंलीने वैनतेय इवोरगम् ॥ ३७ ॥

इधर बलरामजी उसकी पूँछ पकड़कर बड़े वेगसे खींचने लगे, मानो शिलापृष्ठमें आधे शरीरसे छिपे हुए किसी सर्पको गरुड़ खींच रहे हों ॥ ३७ ॥

तेनैव गजदन्तेन कृष्णो हत्वा तु दन्तिनम्।
जघानैकप्रहारेण गजारोहणमुल्बणम् ॥ ३८ ॥

हाथीको मारकर श्रीकृष्णने उसके उसी दाँतसे एक प्रहार करके मतवाले महावतको भी मौतके मुखमें डाल दिया ॥ ३८ ॥

सोऽऽर्तनादं महत् कृत्वा विदन्तो दन्तिनां वरः।
पपात सहमामात्रो वज्रभिन्न इवाचलः ॥ ३९ ॥

तदनन्तर दाँतवाले हाथियोंमें श्रेष्ठ वह कुवलयापीड दन्तहीन हो महान् आर्तनाद करके वज्रसे विदीर्ण हुए पर्वतके समान महावतसहित गिर पड़ा ॥ ३९ ॥

ततस्तौ तोरणाङ्गानि प्रगृह्य रणकर्कशौ।
गजस्य पादरक्षांश्च जघ्नतुः पुरुषर्षभौ ॥ ४० ॥

फिर उन दोनों पुरुषप्रवर रणकर्कश वीरोंने फाटकके खम्भे आदि लेकर हाथीके पादरक्षकोंको भी मार डाला ॥४०॥

तांश्च हत्वा विविशतुर्मध्यं रङ्गस्य तावुभौ।
नासत्यावश्विनौ स्वर्गादवतीर्णाविवેચ્છया ॥ ४१ ॥

उन सबका संहार करके वे दोनों भाई रङ्गस्थलमें प्रविष्ट हुए, मानो दोनों अश्विनीकुमार इच्छानुसार स्वर्गसे भूतलपर उतर आये हों ॥ ४१ ॥

विष्णुपर्व ] त्रिंशोऽध्यायः ३१७ वृष्ण्यन्धकाश्च भोजाश्च ददृशुर्वनमालिनौ । पौराणामनुरागं च हर्षं चालक्ष्य भारत ॥ ४३ ॥ क्ष्वेडितोत्कृष्टनादेन बाहोरास्फोटितेन च । भारत ! व्यर्थ बुद्धिवाला भोजराज कंस उन दोनों सिंहनादैश्च तालैश्च हर्षयामासुतूर्जनम् ॥ ४२ ॥ भाइयोंको उपस्थित देख, उनके प्रति पुरवासियोंके अनुराग उस समय वृष्णि, अन्धक तथा भोजकुलके यादवोंने और हर्षको लक्ष्य करके विषादमें डूब गया ॥ ४३ ॥ वनमालाधारी श्रीकृष्ण-बलरामको देखा । उन दोनों वीरोंने तं हत्वा पुण्डरीकाक्षो नदन्तं दन्तिनां वरम् । गर्जने, किलकारने, भुजाओंपर ताल ठोकने, सिंहोंके समान अवतीर्णोऽर्णवाकारं समाजं सहपूर्वजः ॥ ४४ ॥ दहाड़ने और ताली पीटने आदिके द्वारा वहाँके जनसमुदायको इस प्रकार कमलनयन श्रीकृष्णने गरजते हुए गजश्रेष्ठ हर्षसे उत्फुल्ल कर दिया ॥ ४२ ॥ कुवलयापीडको मारकर अपने पूर्वज बलरामजीके साथ तौ दृष्ट्वा भोजराजस्तु विषसाद वृथामतिः । उस समुद्रके समान विशाल जनसमुदायमें प्रवेश किया ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कुवलयापीडवधे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कुवलयापीड हाथीका वधविषयक उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥ त्रिंशोऽध्यायः रङ्गशालामें मल्लयुद्धके विषयमें श्रीकृष्णके विचार, श्रीकृष्ण और बलदेवके द्वारा चाणूर और मुष्टिक आदिका वध, कंसका संहार तथा पिता-माताके चरणोंमें प्रणाम करके दोनों भाइयोंका उनके घरमें जाना वैशम्पायन उवाच भुजासक्तेन शुशुभे गजदन्तेन केशवः । प्रविशन्तं तु वेगेन मारुतावलिताम्बरम् । चन्द्रार्धविम्बसंसक्तो यथैकशिखरो गिरिः ॥ ५ ॥ पूर्वजं पुरतः कृत्वा कृष्णं कमललोचनम् ॥ १ ॥ अपने हाथमें सटे हुए उस गजदन्तसे सुशोभित होने- गजदन्तकृतोल्लेखं सुभुजं देवकीसुतम् । वाले श्रीकृष्ण अर्धचन्द्रके विम्बसे संयुक्त हुए एक शिखर- लीलाकृताङ्गदं वीरं मदेन रुधिरेण च ॥ २ ॥ वाले पर्वतके समान जान पड़ते थे ॥ ५ ॥ वल्गमानं यथा सिंहं व्यूहमानं यथा घनम् । वल्गामाने तु गोविन्दे स कृत्स्नो रङ्गसागरः । बाहुशब्दप्रहारेण चालयन्तं वसुंधराम् ॥ ३ ॥ जनौघप्रतिनादेन पूर्यमाण इवावभौ ॥ ६ ॥ औग्रसेनिः समालोक्य दन्तिदन्तोद्यतायुधम् । श्रीकृष्णके उछलते-कूदते आते ही वह समुद्र-जैसा सम्पूर्ण कृष्णं भृशायस्तमुखः सरोषं समुदैक्षत ॥ ४ ॥ रंगस्थल जनसमुदायके हर्षनादसे परिपूर्ण हुआ-सा प्रतीत होने वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! कमलनयन लगा ॥ ६ ॥ श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलरामको आगे करके बड़े वेगसे ततः क्रोधाभिताम्राक्षः कंसः परमकोपनः । रंगशालामें घुसे थे। उस समय उनके वस्त्र हवाके झोंकेसे चाणूरमादिशद् युद्धे कृष्णस्य सुमहाबलम् ॥ ७ ॥ फहरा उठे थे। हाथीका दाँत उनकी पहचान करानेवाला अन्ध्रं मल्लं च निकृतिं मुष्टिकं च महाबलम् । चिह्न या उपलक्षण बन गया था। उनकी भुजाएँ बड़ी सुन्दर बलदेवाय संक्रोधो दिदेशाद्रिच्योपमम् ॥ ८ ॥ थीं। देवकीनन्दन वीर श्रीकृष्णकी बाहोंमे हाथीके मद और तदनन्तर क्रोधसे लाल आँखें किये परम क्रोधी कंसने रुधिर इस तरह लिपटे थे कि उनमें लीलापूर्वक अङ्गद (बाजू- महाबली अन्ध्र मल्ल चाणूरको जो कपटयुद्ध करनेवाला था, बंद) की रचना हो गयी थी। वे सिंहकी तरह उछलते तथा श्रीकृष्णके साथ लड़नेका आदेश दिया और जिसका शरीर कंसवधकी युक्ति सोचते हुए आकाशमें बादलकी भाँति रंग- प्रस्तरसमूहके समान सुदृढ़ था, उस कपटी महाबली मुष्टिक- शालामें विचर रहे, थे। भुजाओपर ताल ठोककर जब वे को रोषमें भरे हुए कंसने बलदेवके साथ जूझनेकी उसकी ध्वनि फैलाते थे, तब पृथ्वीको भी हिला देते थे। उन्हे आज्ञा दी ॥ ७-८ ॥ हाथीके दाँतको ही आयुध रूपसे हाथमें लिये देख उग्रसेन- कंसेनापि समाजस्थाश्चाणूरः पूर्वमेव तु । कुमार कंस अत्यन्त मलिन हो गया और वह बड़े रोषमें योद्धव्यं सह कृष्णेन त्वया यत्नवतेति वै ॥ ९ ॥ भरकर उनकी ओर देखने लगा ॥ १-४ ॥

३१८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे कंसने चाणूरको तो पहलेसे ही यह आज्ञा दे रखी थी, कि तुम्हें श्रीकृष्णके साथ यत्नपूर्वक युद्ध करना चाहिये ॥९॥ स रोषेण तु चाणूरः कषायीकृतलोचनः । अभ्यावर्तत युद्धार्थमपां पूर्णो यथा घनः ॥ १० ॥ अतः रोषसे लाल आँखें किये चाणूर युद्ध करनेके लिये श्रीकृष्णके निकट आया। उस समय वह जलसे भरे-पूरे मेघके समान जान पड़ता था ॥ १० ॥ अवघुष्टे समाजे तु निश्शब्दस्तिमिते जने । यादवाः सहितास्तत्र इदं वचनमब्रुवन् ॥ ११ ॥ राजाकी ओरसे शान्त रहनेकी घोषणा होते ही वहाँ- का सारा जनसमुदाय नीरव तथा निश्चल हो गया, तब वहाँ एक साथ बैठे हुए यादव इस प्रकार कहने लगे - ॥११॥ बाहुयुद्धमिदं रंगे सप्राश्निकमकातरम् । क्रियावलसमाज्ञातमशस्त्रं निर्मितं पुरा ॥ १२ ॥ 'पूर्वकालमें विधाताने मल्लयुद्धके विषयमें यह नियम बनाया था कि यह युद्ध रङ्गस्थलके अखाड़ेमें केवल भुजाओं द्वारा हो । इसमें किसी प्रकारके अस्त्र-शस्त्रका प्रयोग न किया जाय। इसमे (दो व्यक्तियोंका जोड़ निश्चित करनेके लिये ) कोई-न-कोई परीक्षक रहना चाहिये। इसमें कायर या डरपोकको सम्मिलित नहीं करना चाहिये। इसमें क्रिया ( दाँव-पेंच आदि ) और बल (शारीरिक शक्ति ) के द्वारा ही विपक्षीको परास्त करनेकी आज्ञा दी गयी है ॥ अद्भिश्चातिश्रमो नित्यं विनेयः कालदर्शिभिः । करीषेण च मल्लस्य सततं सक्रिया स्मृता ॥ १३ ॥ 'समयोचित कर्तव्यको देखने और समझनेवाले पुरुषोंको उचित है कि वे सदा योद्धाओंके लिये जल प्रस्तुत करके उनकी भारी थकावट दूर करें और गोबरका चूर्ण सुलभ करके पहलवानका सदा सत्कार करना चाहिये ॥ १३ ॥ स्थितो भूमिगतेनैव यो यथा मार्गतः स्थितः । संयुज्यतश्च पर्यायः प्राश्निकैः समुदाहृतः ॥ १४ ॥ 'युद्धपरीक्षकोंने यह बताया है कि जो जिस मार्ग (दाँव-पेंच) से लड़े, उसके साथ उसीके अनुरूप दाँव लगाकर भूमिपर खड़े हुएके साथ खड़ा होकर ही लड़ना चाहिये और एक-एक योद्धाको क्रमशः एक-एकके साथ ही लड़ाना चाहिये॥ १४ ॥ बालो वा यदि वा वृद्धो मध्यो वापि कृशोऽपि वा । बलस्थो वा स्थितो रंगे ज्ञेयः कक्षान्तरेण वै ॥१५॥ 'कोई बालक हो, वृद्ध हो, मध्य अवस्थाका हो, दुर्बल हो, अथवा बलवान् हो, वह यदि अखाड़ेमें उतरे तो उसके जोड़का विचार उसीकी कक्षाके लोगोंमेंसे ही करना चाहिये ॥ १५ ॥ वलतश्च क्रियातश्च बाहुयुद्धविधिर्भुवि । • निपातानन्तरं किंचिन्न कर्तव्यं विजानता ॥ १६ ॥ 'शारीरिक बल और क्रिया ( दाँव-पेंच ) से ही बाहुयुद्ध करनेका विधान है। विज्ञ पुरुषको चाहिये कि प्रतिद्वन्द्वीको गिरा देनेके बाद उसके साथ और कुछ न करे ॥ १६ ॥ तदिदं प्रस्तुतं रंगे युद्धं कृष्णान्ध्रमल्लयोः । बालः कृष्णो महानन्ध्रः कथं न स्याद् विचारणा ॥ १७ ॥ 'इस समय रंगस्थलमे श्रीकृष्ण और अन्ध्र मल्ल चाणूर- का युद्ध प्रस्तुत है, परंतु इनमें श्रीकृष्ण तो अभी बालक हैं और यह चाणूर विशालकाय पहलवान है, इस विषमतापर विचार क्यों नहीं किया जाता ?' ॥ १७ ॥ ततः किलकिलाशब्दः समाजे समजायत । प्रावल्गत च गोविन्दो वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ १८ ॥ यह सुनकर उस जनसमाजमे कोलाहल मच गया। तब भगवान् श्रीकृष्ण उछल पड़े और इस प्रकार बोले- ॥१८॥ अहं बालो महानन्ध्रो वपुषा पर्वतोपमः । युद्धं ममानेन सह रोचते बाहुशालिना ॥ १९ ॥ 'मैं बालक हूँ और यह महामल्ल अन्ध्र शरीरसे पर्वत- जैसा दिखायी देता है, तथापि इस बाहुशाली वीरके साथ मेरा युद्ध हो, यह मुझे पसंद है ॥ १९ ॥ युद्धव्यतिक्रमः कश्चिन्न भविष्यति मत्कृतः । न ह्यहं बाहुयोधानां दूषयिष्यामि यन्मतम् ॥ २० ॥ 'मेरी ओरसे युद्धसम्बन्धी नियमका कोई उल्लङ्घन नहीं होगा। बाहुयुद्ध करनेवाले योद्धाओंका जो मत है, उसे मैं कलंकित नहीं करूँगा ॥ २० ॥ योऽयं करीषधर्मश्च तोयधर्मश्च रंगजः । कषायस्य च संसर्गः समयो ह्येष कल्पितः ॥ २१ ॥ 'गोवरके चूर्णको उबटनके समान शरीरमें मलना, जल- से धोना और गेरूके रंगका लेपन करना रंगस्थल (अखाड़ेमें. उतरनेवालों) का धर्म है, यह मह्लोंका बनाया हुआ आचार है ॥ २१ ॥ संयमः स्थिरता शौर्यं व्यायामः सक्रिया बलम् । रंगे च नियता सिद्धिरेतद् युद्धविदां मतम् ॥२२॥ 'संयम ( एक दूसरेको पीछे हटाना ), स्थिरता ( अपने स्थानसे न हटना ), शौर्य, व्यायाम ( स्थिर रहते हुए भी हाथ-पैर चलाना ), सक्रिया ( सद् बर्ताव - मर्मस्थानोंमें चोट न पहुँचाना), असद् व्यवहारसे बचते हुए भी अधिक-से-अधिक बल प्रकट करना, इन छः साधनोंके द्वारा रङ्गभूमिमे विजय- रूप सिद्धिका प्राप्त होना निश्चित है; यह मल्लयुद्धके विद्वानों- का मत है ॥ २२ ॥

[ विष्णुपर्व ] त्रिंशोऽध्यायः ३१९


अवैरेमेवं यदयं सवैरं कर्तुमुद्यतः।
अत्र वै निग्रहः कार्यस्तोपयिष्याम्यहं जगत् ॥ २३ ॥

‘यह (चाणूर अथवा कंस) इस वैररहित युद्धको भी वैरयुक्त कर देनेपर तुला हुआ है, अतः यहाँ इसका निग्रह करना आवश्यक है, ऐसा करके मैं सम्पूर्ण जगत्‌को संतुष्ट करूँगा ॥ २३॥

करूषेषु प्रसूतोऽयं चाणूरो नाम नामतः।
बाहुयोधी शरीरेण कर्मभिश्चात्र चिन्त्यताम् ॥ २४ ॥

‘यह चाणूर नामक बाहुयोधी मल्ल करूष देशमें उत्पन्न हुआ है। इसके शरीर और कर्मसे जो घटनाएँ घटित हुई हैं, उनपर भी आपलोग विचार कर लें ॥ २४ ॥

एतेन बहवो मल्ला निपातानन्तरं हताः।
रङ्गप्रतापकामेन मल्लमार्गश्च दूषितः ॥ २५ ॥

‘इसने रंगभूमिमें अपना प्रताप प्रकट करने या दबदबा जमानेकी इच्छासे बहुतेरे पहलवानोंको भूमिपर गिरानेके बाद मार डाला और इस प्रकार मल्ल-मार्गको कलंकित किया है ॥ २५॥

शस्त्रसिद्धिस्तु योधानां संग्रामे शस्त्रयोधिनाम्।
रङ्गसिद्धिस्तु मल्लानां प्रतिमल्लनिपातजा ॥ २६ ॥

‘शस्त्रद्वारा युद्ध करनेवाले योद्धाओंके लिये संग्राममें शत्रुको विदीर्ण कर देना ही सिद्धि है, परंतु मल्लोंकी प्रतिद्वन्द्वी मल्लको गिरा देनेमात्रसे ही रंगस्थलमे विजयरूप सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥ २६ ॥

रणे विजयमानस्य कीर्तिर्भवति शाश्वती।
हतस्यापि रणे शस्त्रैर्नाकपृष्ठं विधीयते ॥ २७ ॥

‘शस्त्रयुद्धमे विजय पानेवालेको अक्षय कीर्ति प्राप्त होती है। यदि वह रणक्षेत्रमे शस्त्रोंद्वारा मारा गया तो भी उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है ॥ २७ ॥

रणे ह्युभयतः सिद्धिर्हतस्येह मृतोऽपि वा।
सा हि प्राणान्तिकी यात्रा महद्भिः साधुपूजिता ॥ २८ ॥

‘शस्त्रयुद्धमें मारे जानेवालेकी तथा मारनेवाले दोनोंकी ही सिद्धि प्राप्त होती है, क्योंकि वह प्राणान्तक यात्रा है, जिसकी महान् पुरुषोंने भलीभाँति पूजा (प्रशंसा) की है ॥ २८ ॥

अयं तु मार्गो बलतः क्रियातश्च विनिःसृतः।
मृतस्य रङ्गे क्व स्वर्गो जयतो वा कुतो रतिः ॥ २९ ॥

‘परंतु यह मल्ल-युद्धका मार्ग शारीरिक बल और दाँव-पेंचके कौशलसे प्रकट हुआ है। अखाड़ेमे मरनेवालेको कहाँ स्वर्ग मिलता है ? अथवा जीतनेवालेको कहाँका सुख प्राप्त होता है ? ॥ २९ ॥

ये तु केचित् स्वदोषेण राज्ञः पण्डितमानिनः।
प्रतापार्थे हता मल्ला मल्लहन्तुर्वधो हि सः ॥ ३० ॥

‘किसी पण्डितमानी राजाका प्रताप बढ़ानेके लिये जो कोई भी मल्ल किसी पहलवानके द्वारा अपने अपराधसे मारे गये हैं, वहाँ उस मल्ल-हत्यारेको हत्याजनित पाप ही लगता है'॥ ३०॥

एवं संजल्पतस्तस्य ताभ्यां युद्धं सुदारुणम्।
उभाभ्यामभवद् घोरं वारणाभ्यां यथा वने ॥ ३१ ॥

जब श्रीकृष्ण ऐसा कह रहे थे, उसी समय उनमें और चाणूरमें—दोनोंमें ही अत्यन्त दारुण एवं भयानक युद्ध होने लगा, जैसे वनमें दो हाथी लड़ पड़ें ॥ ३१ ॥

कृतप्रतिकृतैश्चित्रैर्बाहुभिश्च सकण्ठकैः।
सन्निपातादवधूतैश्च प्रमाथोन्मंथनैस्तथा ॥ ३२ ॥

उनमेसे जब एक-दूसरेका कोई अङ्ग जोरसे दबाता, तब दूसरा तुरंत उसका प्रतीकार करता—उस अङ्गको उसकी पकड़से छुड़ा लेता था। दोनों एक-दूसरेके हाथोंको मुष्टीसे पकड़कर विवश कर देते और विचित्र ढंगसे परस्पर प्रहार करते थे। दोनों ही एक-दूसरेको अपनी भुजाओंमे बाँधकर रोक लेते, कभी दोनों आपसमें गुँथ जाते और फिर, धक्के देकर दूर हटा देते थे। कभी एक दूसरेको जमीनपर पटककर रगड़ता तो दूसरा नीचेसे ही कुलँचकर ऊपरवालेको दूर फेंक देता, या लिये-दिये खड़ा हो अपने शरीरसे दबाकर उसके अङ्गोंको भी मथ डालता था ॥ ३२ ॥

तावुभावपि संश्लिष्टौ यथा शैलमयौ तथा।
क्षेपणैर्मुष्टिभिश्चैव वराहोद्धर्तनैःस्वनैः ॥ ३३ ॥

वे दोनों ही एक-दूसरेसे सटकर ऐसे जान पड़ते थे, मानो दो पर्वत परस्पर भिड़ गये हों। कभी दोनों दोनोंको बलपूर्वक पीछे हटाते और मुक्कोसे एक-दूसरेकी छातीपर चोट करते थे, कभी एकको दूसरा अपने कंधेपर उठा लेता और उसका मुँह नीचे कर घुमाकर पटक देता था, जिससे ऐसा शब्द होता, मानो किसी शूकरने चोट की हो ॥ ३३ ॥

कीलैर्वज्रनिपातैश्च प्रसृष्टाभिस्तथैव च।
शलाकानखपातैश्च पादोद्धूतैश्च दारुणैः ॥ ३४ ॥


१. प्रमाथ तथा उन्मथन आदि मल्ल-युद्धके दाँव-पेंचोंके नाम हैं। मल्ल-शास्त्रके अनुसार इनके लक्षण नीचे दिये जाते हैं। इनका भाव मूलश्लोकके अनुवादमें आ गया है—
निपात्य पेषणं भूमौ प्रमाथ इति कथ्यते।
यत् त्वायाताङ्गमथनं तदुन्मथनमुच्यते ॥
२. क्षेपणं कथ्यते यत् तु स्थानात् प्रच्यावनं हठात् ॥
३. उभयोर्भुजयोर्मुष्टिरुरोमध्ये निपात्यते ।
मुष्टिरित्युच्यते तज्ज्ञैर्मल्लविद्याविशारदैः ॥
४. अवाङ्मुखं स्कन्धगतं भ्रामयित्वा तदैव यः।
क्षिप्तस्य शब्दः स भवेद् वराहोद्धूतिःस्वनः ॥
५. अङ्गुल्यः प्रसृतायास्तु ताः प्रसृष्टा उदीरिताः ॥

३२०श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

कभी वे दोनों योद्धा एक-दूसरेके शरीरपर कोहनियों और घुटनोंसे चोट करते थे, कभी हाथकी अँगुलियोंको फैलाकर एक दूसरेको पीटते थे, कभी आपसमें पंजे लड़ाते थे, कभी रोषपूर्वक अँगुलियोंके नखोंसे बकोट लेते थे, कभी पैरोंमें उलझाकर दोनों दोनोंको गिरा देते। इस प्रकार भयंकर दाँव-पेंचका प्रयोग करते थे॥ ३४॥

जानुभिश्वाश्मनिर्घोषैः शिरोभ्यां चावघट्टितैः।
तद् युद्धमभवद् घोरमशस्त्रं बाहुतेजसा॥ ३५॥
बलप्राणेन शूराणां समाजोत्सवसंनिधौ।
अरज्यत जनः सर्वः सोत्कृष्टनिनदोत्थितः॥ ३६॥

कभी घुटनों और सिरसे टक्कर मारते थे, जिससे पत्थरोंके टकरानेके समान शब्द होता था। जनसमुदायके समक्ष किये जानेवाले उस उत्सवमें शूरवीरोंके निकट उन दोनोंमें केवल बाहुबल, शारीरिक बल तथा प्राणबलसे किसी अस्त्र-शस्त्रके बिना ही बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। उस युद्धके रंगमें सब लोग रँग गये। सभी दर्शक विजेताका उत्साह बढ़ानेके लिये जोर-जोरसे हर्षनाद कर उठते थे॥ ३५-३६॥

साधुवादांश्च मञ्चेषु घोषयन्त्यपरे जनाः।
ततः प्रस्विन्नवदनः कृष्णप्रणिहितेक्षणः।
न्यवारयत् तूर्याणि कंसः सव्येन पाणिना॥ ३७॥

दूसरे लोग मञ्चोंपर बैठे-बैठे ही 'साधु-साधु' (बहुत अच्छा, बहुत अच्छा) की घोषणा करते थे। यह सब देख-सुनकर कंसके वदनसे पसीना छूटने लगा। उसकी आँखें श्रीकृष्णकी ओर ही लगी थीं। उसने बायें हाथसे संकेत करके बाजे बंद करा दिये॥ ३७॥

प्रतिषिद्धेषु तूर्येषु मृदङ्गादिषु तेषु वै।
खे संगतान्यवाद्यन्त देवतूर्याण्यनेकणः॥ ३८॥

कंसने जब मृदङ्ग आदि वाद्योंका बजाना रोक दिया, तब आकाशमें देवताओंके अनेक प्रकारके वाद्य स्वतः एक साथ बज उठे॥ ३८॥

युद्ध्यमाने हृषीकेशे पुण्डरीकनिभेक्षणे।
स्वयमेव प्रवाद्यन्त तूर्यघोषास्तु सर्वशः॥ ३९॥

कमलनयन श्रीकृष्णके युद्ध करते समय सब प्रकारके वाद्य स्वयं ही बजने लगे और उनकी ध्वनि सब ओर छा गयी॥

अन्तर्धानगता देवा विमानैः कामरूपिभिः।
चेरुर्विद्याधरैः सार्द्धं कृष्णस्य जयकाङ्क्षिणः॥ ४०॥

देवता अदृश्य होकर श्रीकृष्णकी विजय चाहते हुए अपने कामरूपी विमानोंद्वारा विद्याधरगणोंके साथ वहाँ आकाशमें विचर रहे थे॥ ४०॥

जयस्व कृष्ण चाणूरं दानवं मल्लरूपिणम्।
इति सप्तर्षयः सर्वे ऊचुश्चैव नभोगताः॥ ४१॥

समस्त सप्तर्षि यहाँके आकाशमें स्थित हो कहने लगे— 'श्रीकृष्ण! तुम्हें इस मल्लरूपधारी दानव चाणूरपर विजय प्राप्त हो'॥ ४१॥

चाणूरेण चिरं कालं क्रीडित्वा देवकीसुतः।
बलमाहारयामास कंसस्याभावदर्शिवान्॥ ४२॥

कंसकी मृत्युको समीप देखनेवाले देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने चाणूरके साथ चिरकालतक युद्धकी लीला करके अपनेमें अनन्त बलका समावेश किया॥ ४२॥

ततश्चचाल वसुधा मञ्चाश्चैव जुघूर्णरे।
मुकुटाच्चापि कंसस्य पपात मणिरुत्तमः॥ ४३॥

फिर तो धरती डोलने लगी। वहाँ बिछे हुए मञ्च झूमने लगे और कंसके मुकुटसे भी उत्तम मणि गिर पड़ी॥ ४३॥

दोर्भ्यामानम्य कृष्णस्तु चाणूरं शीर्णजीवितम्।
प्राहरन्मुष्टिना मूर्ध्नि वक्षस्याहत्य जानुना॥ ४४॥

चाणूरकी जीवनीशक्ति अथवा आयुक्षीण हो चुकी थी। श्रीकृष्णने अपनी दोनों भुजाओंसे चाणूरको झुकाकर उसकी छातीमें घुटनेसे चोट करके उसके मस्तकपर मुक्केसे प्रहार किया॥ ४४॥

निःसृते साश्रुरुधिरे तस्य नेत्रे सबन्धने।
तापनीये यथा घण्टे कक्षोपरि विलम्बिते॥ ४५॥

इससे स्नायु-बन्धन तथा आँसू और रक्तके साथ उसकी दोनों आँखें बाहर निकल आयीं और ऐसी दिखायी देने लगीं मानो हाथीको कसनेवाली रस्सी या जंजीरमें दो सोनेकी घंटियाँ लटक रही हों॥ ४५॥

पपात स तु रङ्गस्य मध्ये निःसृतलोचनः।
चाणूरो विगतप्राणो जीवितान्ते महीतले॥ ४६॥

आँखें निकल जानेपर जीवनके अन्तमें प्राणशून्य हुआ चाणूर अखाड़ेके बीचमे गिर पड़ा॥ ४६॥

देहेन तस्य मल्लस्य चाणूरस्य गतायुषः।
संनिरुद्धो महारङ्गः स शैलेनेव लक्ष्यते॥ ४७॥

जिसकी आयु समाप्त हो गयी थी, उस चाणूर मल्लके शरीरसे वह विशाल रंगस्थल इस प्रकार अवरुद्ध दिखायी देता था, मानो किसी पर्वतसे रुँध गया हो॥ ४७॥

रौहिणेयो हते तस्मिंश्चाणूरे बलदर्पिते।
जग्राह मुष्टिकं रङ्गे कृष्णस्तोशलकं पुनः॥ ४८॥

बलाभिमानी चाणूरके मारे जानेपर रोहिणीनन्दन बलरामने उस रंगभूमिमें मुष्टिकको पकड़ लिया तथा श्रीकृष्णने पुनः तोशलकको धर दबाया॥ ४८॥

सन्निपाते तु तौ मल्लौ प्रथमे क्रोधमूर्च्छितौ।
समेयातां रामकृष्णौ कालस्य वशवर्तिनौ।
निर्घातावनतौ भूत्वा रङ्गमध्ये चवल्गतुः॥ ४९॥

विष्णुपर्व ] त्रिंशोऽध्यायः ३२१

युद्ध आरम्भ होनेपर पहले तो कालके अधीन हुए वे दोनों असुर मल्ल क्रोधसे मूर्च्छित हो बलराम और श्रीकृष्णसे भिड़ गये, परंतु जब उन दोनों वीरोंकी मार पड़ी, तब वे सिर झुकाकर अखाड़ेमें इधर-उधर उछल-कूद मचाने लगे ॥

कृष्णस्तोशलमुद्यम्य गिरिशृङ्गोपमं बली।
भ्रामयित्वा शतगुणं निष्पिपेष महीतले ॥ ५० ॥

बलवान् श्रीकृष्णने पर्वतशिखरके समान विशालकाय तोशलको दोनों हाथोंसे उठा लिया और सौ बार घुमानेके बाद पृथ्वीपर पटककर उसे पीस डाला ॥ ५० ॥

तस्य कृष्णाभिपन्नस्य पीडितस्य बलीयसः।
मुखाद् रुधिरमत्यर्थमुज्जगाम मुमूर्षतः ॥ ५१ ॥

श्रीकृष्णके द्वारा आक्रान्त एवं पीड़ित होकर मरणासन्न हुए उस महाबली मल्लके मुखसे बहुत अधिक रक्त निकलने लगा ॥ ५१ ॥

संकर्षणस्तु सुचिरं योधयित्वा महाबलः।
आन्ध्रमल्लं महामल्लो मण्डलानि व्यदर्शयत् ॥ ५२ ॥

इधर महाबली महामल्ल संकर्षण आन्ध्रदेशीय मल्ल मुष्टिकके साथ देरतक युद्ध करके उसे कुश्तीके अनेक पैंतरे दिखाने लगे ॥ ५२ ॥

मुष्टिनैकेन तेजस्वी साशानिस्तनयित्नुना।
शिरस्यभ्यहनद् धीरो वज्रेणेव महागिरिम् ॥ ५३ ॥

फिर उन तेजस्वी वीरने उसके मस्तकपर एक मुक्का मारा। उससे वज्रपातके समान शब्द हुआ। मानो किसी महान् पर्वतपर वज्रसे आघात किया गया हो ॥ ५३ ॥

स निष्पतितमस्तिष्को विस्रस्तनयनो भुवि।
पपात निहतस्तेन ततो नादो महानभूत् ॥ ५४ ॥

इससे उसका मस्तक फटकर गिर पड़ा, आँखें निकल आयीं और बलरामजीके द्वारा मारा गया वह मल्ल पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय बड़े जोरसे धमाकेका शब्द हुआ ॥

आन्ध्रतोशलकौ हत्वा कृष्णसंकर्षणावुभौ।
क्रोधसंरक्तनयनौ रंगमध्ये ववल्गतुः ॥ ५५ ॥

आन्ध्र-देशीय मुष्टिक और तोशल इन दोनोंको मारकर श्रीकृष्ण और बलराम दोनों भाई क्रोधसे लाल आँखें किये अखाड़ेमें उछलने-कूदने लगे ॥ ५५ ॥

समाजवाटो निर्मल्लः सोऽभवद् भीमदर्शनः।
आन्ध्रे तदा महामल्ले मुष्टिके च निपातिते ॥ ५६ ॥

उस समय महामल्ल चाणूर और मुष्टिकके मारे जानेपर वह समाजवाट (रंगभवन) मल्लोंसे सूना हो गया और अत्यन्त भयंकर दिखायी देने लगा ॥ ५६ ॥

ये च सम्प्रेक्षका गोपा नन्दगोपपुरोगमाः।
भयक्षोभितसर्वाङ्गाः सर्वे तत्रावतस्थिरे ॥ ५७ ॥

नन्द आदि जो-जो गोप यह सब देख रहे थे, उनके सारे अङ्ग भयसे क्षुब्ध हो उठे थे। वे सब लोग वहाँ चुपचाप बैठे रहे ॥ ५७ ॥

हर्षजं वारि नेत्राभ्यां वर्षमाणा प्रवेपती।
प्रस्रुवोत्पीडिता कृष्णं देवकी समुदैक्षत ॥ ५८ ॥

उधर देवकी थर-थर काँपती और दोनों नेत्रोंसे हर्षजनित आँसुओंकी वर्षा करती हुई स्तनोंमें दूधकी बाढ़ आ जानेसे पीड़ित हो श्रीकृष्णकी ओर देख रही थी ॥ ५८ ॥

कृष्णदर्शनजातेन बाष्पेणाकुलितेक्षणः।
वसुदेवो जरां त्यक्त्वा स्नेहेन तरुणायते ॥ ५९ ॥

श्रीकृष्ण-दर्शनजनित आँसुओंसे भरे हुए नेत्रोंवाले वसुदेवजी मानो अपनी वृद्धावस्था त्यागकर वात्सल्य-स्नेहसे परिपुष्ट हो तरुण हो रहे थे ॥ ५९ ॥

वारमुख्याश्च ताः सर्वाः कृष्णस्य मुखपङ्कजम्।
पपुर्हि नेत्रभ्रमरैर्निमेषान्तरगामिभिः ॥ ६० ॥

वहाँ जो मुख्य-मुख्य वाराङ्गनाएँ उपस्थित थीं, वे सब-की-सब निमेषके भीतर चलनेवाले नेत्ररूपी भ्रमरोंद्वारा श्रीकृष्णके मुखारविन्दका रस पान करने लगीं ॥ ६० ॥

कंसस्याथ मुखे स्वेदो भ्रूभेदान्तरगोचरः।
अभवद् रोषनिर्यासः कृष्णसंदर्शनेरितः ॥ ६१ ॥

तदनन्तर श्रीकृष्णको देखनेसे कंसके मुखमें दोनों भौंहोंके बीच रोषवश पसीना निकल आया ॥ ६१ ॥

केशवाय सधूमेन रोषनिश्वासवायुना।
दीप्तमन्तर्गतं तस्य हृदयं मानसाग्निना ॥ ६२ ॥

श्रीकृष्णके प्रति कंस जो कठोरता प्रकट करता था, वही जिसका धुआँ था तथा रोषरूपी उच्छ्वास-वायु जिसे प्रज्वलित कर रही थी, उस मानसिक चिन्तारूपी आगने कंसके आन्तरिक हृदयको जलाना आरम्भ किया ॥ ६२ ॥

तस्य प्रस्फुरितौष्ठस्य स्विन्नालिकतलस्य वै।
कंसवक्त्रस्य रोषेण रक्तसूर्यायते वपुः ॥ ६३ ॥

जिसके ओठ फड़क रहे थे और ललाटमे पसीना निकल आया था, कंसके उस मुखमण्डलका स्वरूप रोषके कारण लाल सूर्यके समान प्रतीत होता था ॥ ६३ ॥

क्रोधरक्ताननस्यास्य निःसृताः स्वेदबिन्दवः।
यथा रविकरस्पृष्टा वृक्षावश्यायबिन्दवः ॥ ६४ ॥

क्रोधसे लाल हुए कंसके मुखसे जो पसीनेकी बूँदें निकली थीं, वे वृक्षोंके पत्तोंपर पड़े हुए उन ओसकणोंके समान सुशोभित होती थीं, जिन्हें सूर्यकी किरणोंका स्पर्श प्राप्त हुआ हो॥

सोऽज्ञापयत संक्रुद्धः पुरुषान् व्यायतान् बहून्।
गोपावेतौ समाजाद्वान्निष्क्राम्येतां वनेचरौ ॥ ६५ ॥

म० ह० ११

An accurate line-by-line transcription of the text in the image:

३२२ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे उसने अत्यन्त कुपित होकर बहुत-से व्यायामशाली पुरुषोंको आज्ञा दी कि 'इन दोनों वनेचर गोपोंको इस जन- समुदायसे बाहर निकाल दो ॥ ६५ ॥ न चैतौ द्रष्टुमिच्छामि विकृतौ पापदर्शनौ । गोपानामपि मे राज्ये न कश्चित्स्थातुमर्हति ॥ ६६ ॥ 'ये दोनों विकृत हो गये हैं। इन्हें देखना भी पाप है। मैं इनकी ओर दृष्टिपात करना नहीं चाहता। गोपोंमेंसे भी कोई मेरे इस राज्यमें नहीं रह सकता ॥ ६६ ॥ नन्दगोपश्च दुर्मेधाः पापेष्वभिरतो मम । आयसैर्निगडत्कारैर्लोहपाशैर्निगृह्यताम् ॥ ६७ ॥ 'खोटी बुद्धिवाला नन्दगोप सदा मेरे प्रति कपटपूर्ण बर्तावोंमें ही तत्पर रहा है, अतः इसे लोहेकी बेड़ियों और हथकड़ियोंमें बाँधकर कैद कर लो ॥ ६७ ॥ वसुदेवश्च दुर्बुत्तो नित्यं द्वेषपरो मम । अवृद्धार्हेण दण्डेन क्षिप्रमद्यैव शास्यताम् ॥ ६८ ॥ 'दुराचारी वसुदेव सदा मुझसे द्वेष रखता है। इसे आज ही शीघ्र-से-शीघ्र ऐसा कठोर दण्ड दो, जो अवृद्ध ( नौजवान ) पुरुषोंके योग्य हो ॥ ६८ ॥ ये चेमे प्राकृता गोपा दामोदरपरायणाः । ह्रियन्तां गाव एतेषां यच्चास्ति वसु किंचन ॥ ६९ ॥ 'ये जो दामोदरका आश्रय लेकर रहनेवाले गँवार गोप हैं, इन सबकी गौओंको तथा इनके पास जो कुछ धन हो, उसको भी छीन लो' ॥ ६९ ॥ एवमाज्ञापयानं तं कंसं परुषभाषिणम् । ददर्शात्यन्तनयनः कृष्णः सत्यपराक्रमः ॥ ७० ॥ इस तरह आज्ञा देते और कठोर बातें कहते हुए उस कंसकी ओर सत्यपराक्रमी श्रीकृष्णने आँखें फाड़कर देखा ॥ क्षिप्ते पितरि चुक्रोध नन्दगोपे च केशवः । ज्ञातीनां च व्यथां दृष्ट्वा विसंज्ञां चैव देवकीम् ॥ ७१ ॥ स सिंह इव वेगेन केशवो जातविक्रमः । आरुरुक्षुर्महाबाहुः कंसनाशार्थमच्युतः ॥ ७२ ॥ रङ्गमध्यादुत्पपात कृष्णः कंसासनान्तिकम् । असज्जद्वायुनाऽऽक्षिप्तो यथा खस्थो घनाघनः॥ ७३ ॥ पिता वसुदेव तथा नन्दगोपपर आक्षेप होते ही केशव कुपित हो उठे। उन्होंने बन्धु-बान्धवोंकी व्यथा और माता देवकीकी अचेत अवस्था देखकर कंसका विनाश करनेके लिये उसके मञ्चपर चढ़नेका विचार किया। उस समय केशवका पराक्रम जाग उठा और अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले महाबाहु श्रीकृष्ण उस रंगस्थलसे सिंहके समान वेगपूर्वक उछले और कंसके सिंहासनके पास जा पहुँचे, ठीक उसी तरह जैसे आकाशवर्ती महामेघ वायुसे फेंका जाकर दूर पहुँच जाता है ॥ ७१-७३ ॥ ददृशुर्न हि तं सर्वे रङ्गमध्यादवप्लुतम् । केवलं कंसपार्श्वस्थं ददृशुः पुरवासिनः ॥ ७४ ॥ वे कब अखाड़ेसे कूदे हैं, इसको सब लोगोंने नहीं देखा। पुरवासियोंको वे केवल कंसके पास खड़े दिखायी दिये ॥७४॥ सोऽपि कंसस्तथाऽऽव्यस्तः परीतः कालधर्मणा । आकाशादिव गोविन्दं मेने तत्रागतं प्रभुम् ॥ ७५ ॥ कालधर्म ( मौत ) से घिरा हुआ कंस भी व्याकुल हो उठा और उसने यही समझा कि भगवान् गोविन्द आकाशसे ही मेरे पास उतर आये हैं ॥ ७५ ॥ स कृष्णेनायतं कृत्वा बाहुं परिघसंनिभम् । मूर्धजेषु परामृष्टः कंसो वै रङ्गसंसदि ॥ ७६ ॥ श्रीकृष्णने अपनी परिघ-जैसी मोटी एक बाँह बढ़ाकर रंगशालामें कंसकी चोटी पकड़ ली ॥ ७६ ॥ मुकुटश्चापतत् तस्य काञ्चनो वज्रभूषितः । शिरसस्तस्य कृष्णेन परामृष्टस्य पाणिना ॥ ७७ ॥ उस समय श्रीकृष्णके हाथसे पकड़े गये कंसके सिरसे उसका वज्रमणिसे विभूषित सुवर्णमय मुकुट खिसककर गिर पड़ा ॥ ७७ ॥ स ग्रहग्रस्तकेशश्च कंसो निर्यत्नतां गतः । तथैव च विसम्मूढो वैकल्यं समपद्यत ॥ ७८ ॥ जैसे किसी ग्रहने केश पकड़ लिये हों, उस अवस्थामे पड़ा हुआ कंस निश्चेष्ट हो गया तथा किंकर्तव्यविमूढ़ हो व्याकुलतामें पड़ गया ॥ ७८ ॥ निगृहीतश्च केशेषु गतासुरिव निःश्वसन् । न शशाक मुखं द्रष्टुं कंसः कृष्णस्य वै तदा ॥ ७९ ॥ केश पकड़ लिये जानेपर कंस मुर्दा-सा हो गया। वह लंबी साँस लेता हुआ उस समय कृष्णके मुखकी ओर दृष्टि न डाल सका ॥ ७९ ॥ विकुण्डलाभ्यां कर्णाभ्यां छिन्नहारेण वक्षसा । प्रलम्बाभ्यां च बाहुभ्यां गात्रैर्विस्तृतभूषणैः ॥ ८० ॥ भ्रंशितेनोत्तरीयेण सहसावलिताननः । चेष्टमानः समाक्षिप्तः कंसः कार्ष्णेन तेजसा ॥ ८१ ॥ उसके कानोंसे कुण्डल खिसक गये। वक्षःस्थलका हार छिन्न-भिन्न हो गया। दोनों भुजाएँ लटक गयीं। सारे अङ्गोंके आभूषण गिर गये। चादर खिसक गयी और उसने सहसा उसके कण्ठको आवेष्टित कर लिया। श्रीकृष्णके अनुपम तेजसे झटकेके साथ नीचे डाला गया कंस पृथ्वीपर गिरकर छटपटाने लगा ॥ ८०-८१ ॥ चकर्ष च महारङ्गे मञ्चान्निष्क्रम्य केशवः । केशेषु तं वलाद् गृह्य कंसं क्लेशार्हतां गतम् ॥ ८२ ॥

[ विष्णुपर्व ] \hfill एकत्रिंशोऽध्यायः \hfill ३२३


उस समय श्रीकृष्ण मञ्चसे निकलकर बाहर आ गये। कंस क्लेशयुक्त शोचनीय अवस्थामें पड़ गया था। श्रीकृष्ण पुनः बलपूर्वक उसके सिरके बाल पकड़कर उस महान् रंगस्थलमे उसे घसीटने लगे ॥ ८२ ॥

कृष्यमाणः स कृष्णेन भोजराजो महाद्युतिः ।
समाजवाटे परिखां देहक्षुण्णां चकार ह ॥ ८३ ॥

श्रीकृष्णके द्वारा घसीटे जाते हुए महातेजस्वी भोजराज कंसने उस रंगशालामें अपनी देहकी रगड़से खाई-सी बना दी ॥

समाजवाटे क्रीडित्वा विकृष्य च गतायुषम् ।
कृष्णो विसर्जयामास कंसदेहमदूरतः ॥ ८४ ॥

रंगशालामें खिलवाड़ करते हुए घसीटकर निर्जीव हुए कंसके शरीरको श्रीकृष्णने पास ही छोड़ दिया ॥ ८४ ॥

धरण्यां मृदितः शिष्ये तस्य देहः सुखोचितः ।
क्रमेण विपरीतेन पांसुभिः परुषीकृतः ॥ ८५ ॥

उसका जो शरीर सुख भोगनेके योग्य था, वह मर्दित होकर पृथ्वीपर सो गया। शूरवीरोंके लिये अयोग्य विपरीत विधिसे धूलमें सनकर वह कोमल अङ्ग कठोर हो गया ॥ ८५ ॥

तस्य तद् वदनं श्यामं सुप्ताक्षं मुकुटं विना ।
न विभ्राति विपर्यस्तं विपलाशं यथाम्बुजम् ॥ ८६ ॥

गर्दन टूट जानेसे उसका शरीर अस्त-व्यस्त हो गया था। उसके नेत्र बन्द हो गये थे तथा उसका श्याम मुख मुकुटके बिना दलरहित कमलके समान सुशोभित नहीं हो रहा था ॥ ८६ ॥

असंग्रामहतः कंसः स बाणैरपरिक्षतः ।
केशग्राहान्निरस्तासुर्वीरमार्गान्निराकृतः ॥ ८७ ॥

कंस बिना युद्धके मारा गया था। उसके शरीरपर बाणोंसे घाव नहीं होने पाया था। उसको केश पकड़कर घसीटा गया था, इस अवस्थामें उसके प्राण निकले और वह वीरोचित मार्गसे भ्रष्ट हो गया ॥ ८७ ॥

तस्य देहे प्रकाशन्ते सहसा केशवार्पिताः ।
मांसच्छेदघनाः सर्वे नखाग्रा जीवितच्छिदः ॥ ८८ ॥

उसके शरीरमें श्रीकृष्णद्वारा सहसा गड़ाये गये उनके सभी नखाग्र कंसके जीवनका उच्छेद करके प्रकाशित हो रहे थे। वे उसके मांसको छेद-छेदकर सघन रूपसे वहाँ अङ्कित हो गये थे ॥ ८८ ॥

तं हत्वा पुण्डरीकाक्षः प्रहर्षाद् द्विगुणप्रभः ।
ववन्दे वसुदेवस्य पादौ निहतकण्टकः ॥ ८९ ॥

उसका वध करके कमलनयन श्रीकृष्णको इतना अपार हर्ष हुआ कि उनके अङ्गोंकी प्रभा द्विगुण दीप्तिसे प्रकाशित हो उठी। उन्होंने जगत्के लिये कण्टकरूप कंसका विनाश करके पिता वसुदेवके दोनों चरणोंमें प्रणाम किया ॥ ८९ ॥

मातुश्च शिरसा पादौ निपीड्य यदुनन्दनः ।
सास्रैश्चक्षुःप्रस्रवोत्पीडैः कृष्णमानन्दजैः स्स्रुतैः ॥ ९० ॥

तत्पश्चात् यदुनन्दन श्रीकृष्णने माताके दोनों चरणोंमें अपना मस्तक रखकर उनकी वन्दना की। उस समय देवकी आनन्दातिरेकसे निकले हुए अपने स्तनोंके दूधसे उन्हें सींचने लगी ॥ ९० ॥

यादवांश्चैव तान् सर्वान् यथास्थानं यथावयः ।
पप्रच्छ कुशलं कृष्णो दीप्यमानः स्वतेजसा ॥ ९१ ॥

तदनन्तर अपने तेजसे उद्दीप्त हुए श्रीकृष्णने वय और स्थितिके अनुसार उन समस्त यादवोंकी कुशल पूछी ॥ ९१ ॥

बलदेवोऽपि धर्मात्मा कंसभ्रातरमूर्जितम् ।
बाहुभ्यामेव तरसा सुनामानमपोथयत् ॥ ९२ ॥

इधर धर्मात्मा बलदेवने भी कंसके ओजस्वी भ्राता सुनामाको अपनी दोनों भुजाओं द्वारा ही वेगपूर्वक मार गिराया ॥ ९२ ॥

तौ जितारी जितक्रोधौ चिरविप्रोषितौ व्रजे ।
स्वपितुर्भवने वीरौ जग्मतुर्हृष्टमानसौ ॥ ९३ ॥

शत्रु और क्रोध दोनोंको जीतकर व्रजमे चिरकालतक रहे हुए वे दोनो वीर मन-ही-मन हर्ष और उल्लाससे भरकर अपने पिताके भवनमे गये ॥ ९३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कंसवधे त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कंसवधविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥


एकत्रिंशोऽध्यायः

कंसकी स्त्रियों और माताका विलाप

वैशम्पायन उवाच
भर्तारं पतितं दृष्ट्वा क्षीणपुण्यमिव ग्रहम् ।
कंसपत्न्यो हतं कंसं समन्तात् पर्यवारयन् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! जिसका पुण्य क्षीण हो गया हो, उस ग्रहके समान भूमिपर गिरे हुए पतिको देखकर राजा कंसकी पत्नियाँ उसके मृतक शरीरको सब ओर-से घेरकर बैठ गयीं ॥ १ ॥

तं महीशयने सुप्तं क्षितिनाथं गतायुषम् ।
भार्याः स्म दृष्ट्वा शोचन्ति मृग्यो मृगपतिं यथा ॥ २ ॥

३२४श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

जो कभी पृथ्वीके स्वामी और संरक्षक थे, वे ही पतिदेव आयु समाप्त होनेपर भूमिमयी शय्यापर सो रहे हैं, यह देख राजा कंसकी रानियाँ उसके लिये उसी तरह शोक करने लगीं, जैसे हरिणियाँ यूथपति हरिणके लिये शोकमग्न हो जाती हैं ॥

हा हताः स्म महाबाहो हताशा हतबान्धवाः ।
वीरपत्न्यो हते वीरे त्वयि वीरव्रतप्रिये ॥ ३ ॥

(वे विलाप करती हुई कहने लगीं—) 'हाय ! महाबाहु वीर ! आपको वीरव्रत प्रिय था। आपके मारे जानेपर हम सब वीर-पत्नियों मारी गयीं। हमारी आशाओंकी हत्या हो गयी। हमारे बन्धु-बान्धव भी (अनाथ होनेके कारण) मारे ही गये ! ॥ ३ ॥

इमामवस्थां पश्यन्त्यः पश्चिमां तव नैष्ठिकीम् ।
कृपणं राजशार्दूल विलपामः सबान्धवाः ॥ ४ ॥

'राजशिरोमणे ! आपकी मृत्युसम्बन्धिनी इस अन्तिम अवस्थाको देखती हुई हम सब (आपकी पत्नियाँ) अपने बान्धवोंसहित दीनतापूर्ण विलाप कर रही हैं ॥ ४ ॥

छिन्नमूलाः स्म संवृत्ताः परित्यक्तास्त्वया विभो ।
त्वयि पञ्चत्वमापन्ने नाथेऽस्माकं महाबले ॥ ५ ॥

'प्रभो ! आप हमारे महाबली प्राणनाथ थे, आपके मारे जानेसे हमारी तो जड़ कट गयी। हाय ! आपने हमें त्याग दिया ! ॥ ५ ॥

को नः कोपपरीताङ्गी रतिसंसर्गलालसाः ।
लता इव विचेष्टन्तीः शयनीयानि नेष्यति ॥ ६ ॥

'हा प्राणाधार ! हम मनमें रतिसंसर्गकी लालसा रखकर भी (मानावस्थामें) प्रणयकोपसे युक्त हो जब पृथ्वीपर लताओंकी भाँति लोटकर विपरीत चेष्टा करने लगतीं, उस समय आप हमें प्रेमपूर्वक मनाकर शय्याओंपर सुलाते थे। अब हमें कौन इस तरह उठाकर सेजोंतक ले जायगा ? ॥ ६ ॥

इदं तेऽसदृशं सौम्य हृद्यनिःश्वासमारुतम् ।
दहत्यर्को मुखं कान्तं निस्तोयमित्र पङ्कजम् ॥ ७ ॥

'सौम्य ! जिससे मनोरम निःश्वास वायु निकला करती थी, आपके उस कान्तिमान् मुखको सूर्य जलरहित (तालाबमें उगे हुए) कमलकी भाँति अपनी दुःसह किरणोंसे दग्ध कर रहे हैं। यह दुरवस्था आपके योग्य नहीं है ॥ ७ ॥

इमे ते श्रवणे शून्ये न शोभेते विकुण्डले ।
शिरोधरायां संलीने सततं कुण्डलप्रिये ॥ ८ ॥

'ये आपके कुण्डलरहित सूने कान, जिन्हें सदा ही कुण्डल धारण करना प्रिय रहा है, इस समय कण्ठमें विलीन होकर शोभा नहीं पा रहे हैं ॥ ८ ॥

क्व ते स मुकुटो वीर सर्वरत्नविभूषितः ।
अत्यर्थं शिरसो लक्ष्मीं यो दधारार्कसप्रभाम् ॥ ९ ॥

'वीर ! सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित आपका वह मुकुट कहाँ है, जो आपके मस्तकपर सूर्यकी प्रभाके समान अतिशय शोभाका आधान करता था ! ॥ ९ ॥

अनेन हि कलत्रेण त्वदन्तःपुरशोभिना ।
कथं दीनेन कर्तव्यं त्वयि लोकान्तरं गते ॥ १० ॥

'प्राणनाथ ! आपकी ये रानियाँ जो अन्तःपुरकी शोभा बढ़ाती थीं, आपके लोकान्तरमें चले जानेसे अब दीन और अनाथ होकर कैसे निर्वाह करेंगी ॥ १० ॥

ननु नाम स्त्रियः साध्व्यः प्रियभोगैश्चवञ्चिताः ।
पतीनामपरित्याज्याः स त्वं नस्त्यज्य गच्छसि ॥ ११ ॥

'नाथ ! सुना था, साध्वी स्त्रियाँ न तो प्रिय भोगोंसे कभी वञ्चित होती हैं और न उनके पति उनका परित्याग ही करते हैं; परंतु आप तो हमें छोड़कर चले जा रहे हैं (हाय ! अब हम कैसे रहेंगी ) ॥ ११ ॥

अहो कालो महावीर्यो येन पर्ययकर्मणा ।
कालतुल्यः सपत्नानां त्वं क्षिप्रमपनीयसे ॥ १२ ॥

'अहो ! काल महान् बलसे सम्पन्न है, जो अपनी उलट-फेरकी क्रियाद्वारा शत्रुओंके लिये कालके समान आपको भी शीघ्रतापूर्वक यहाँसे लिये जा रहा है ॥ १२ ॥

वयं दुःखेष्वनूचिताः सुखेष्वेव त्वयैधिताः ।
कथं वत्स्याम विधवा नाथ कार्पण्यमाश्रिताः ॥ १३ ॥

'नाथ ! आपने हमें सदा सुखोंमें ही रखकर पाला-पोसा और बड़ी किया है। हम दुःख भोगनेके योग्य नहीं हैं; किंतु आज आपसे बिछुड़कर विधवा होकर दयनीय दशाको पहुँच गयी हैं। अब हम कैसे यहाँ रह सकेंगी ? ॥ १३ ॥

स्त्रीणां चारित्रलुब्धानां पतिरेकः परा गतिः ।
त्वं हि नः सा गतिश्छिन्ना कृतान्तेन बलीयसा ॥ १४ ॥

'जिनके मनमें सदाचारके पालनका लोभ हो, उन साध्वी स्त्रियोंके लिये एकमात्र पति ही परम गति है—सबसे बड़ा सहारा है, किंतु महाबली कालने हमारे उस सहारेको काट डाला ॥ १४ ॥

वैधव्येनाभिभूताः स्मः शोकंसंतप्तमानसाः ।
रोदितव्यह्रदे मग्नाः क्व गच्छामस्त्वया विना ॥ १५ ॥

'हम वैधव्यसे अभिभूत हो गयी हैं। हमारा मन शोकसे संतप्त हो उठा है। हम विपत्तिके उस गहरे कुण्डमें डूब गयी हैं, जहाँ केवल रोना-ही-रोना रह जाता है। अब हम आपके बिना कहाँ जायँगी ? ॥ १५ ॥

सह त्वया गतः कालस्त्वदङ्के क्रीडितं कृतम् ।
क्षणेन तद्विहीनाः स्म अनित्या हि नृणां गतिः ॥ १६ ॥

'हमारा समय आपके साथ ही बीता है। हमने जबतक

विष्णुपर्व ] एकत्रिंशोऽध्यायः [ ३२५


आपके अङ्गमे ही क्रीड़ाएँ की हैं; किंतु एक ही क्षणमें हम उस सौभाग्यसे वञ्चित हो गयीं । सचमुच ही मनुष्योंकी गति अनित्य है—क्षणभङ्गुर है ॥ १६ ॥

अहो वलविहीनाः स्म विपन्ने त्वयि मानद ।
एकदुष्कृतकारिण्यः सर्वा वैधव्यलक्षणाः ॥ १७ ॥

'दूसरोंको मान देनेवाले महाराज ! आपके निधनसे हम सब-की-सब निर्बल हो गयीं । जान पड़ता है, हम सबने एक समान ही पाप किया था, जिससे सबको वैधव्यका चिह्न धारण करना पड़ा ॥ १७ ॥

त्वया स्वर्गप्रतिच्छन्दैर्लालिताः स्म रतिप्रियाः ।
त्वयि कामवशाः सर्वाः स नस्त्यक्त्वा क्व गच्छसि ॥ १८॥

'आपने हम रतिप्रिया रमणियोंको स्वर्गके समान सुख-भोग देकर सदा हमारा लालन-पालन किया था । हम सभी आपके प्रति कामासक्त रही हैं, फिर आप हमें छोड़कर कहाँ चले जा रहे हैं ॥ १८ ॥

अस्माकं त्वमनाथानां नाथो ह्यसि सुरोपम ।
आसां विलपमानानां कुररीणामिव प्रभो ।
प्रतिवाक्यं जगन्नाथ दातुमर्हसि मानद ॥ १९ ॥

'देवोपम प्रभो ! आप ही हम अनाथाओंके नाथ हैं । जगन्नाथ ! मानद ! कुररीके समान विलाप करनेवाली अपनी इन पत्नियोंको कुछ उत्तर देनेकी कृपा करें ॥ १९ ॥

एवमार्तकलत्रस्य शाम्यमानेषु बन्धुषु ।
गमनं ते महाभाग दारुणं प्रतिभाति नः ॥ २० ॥

'महाभाग ! जब कि आपके सभी बन्धु मारे जा रहे हैं और स्त्रियाँ शोकसे पीड़ित हैं, ऐसे अवसरपर आपका परलोक-गमन हमें बड़ा दारुण प्रतीत होता है ॥ २० ॥

नूनं कान्ततराः कान्त परलोके वरस्त्रियः ।
यतस्त्वं प्रस्थितो वीर विहायेमं गृहे जनम् ॥ २१ ॥

'प्रियतम ! वीर ! निश्चय ही परलोककी सुन्दरियाँ बड़ी ही कमनीय हैं, जिससे आप अपने घरकी इन रानियोंको छोड़कर उनके पास जानेके लिये प्रस्थित हो गये ॥ २१ ॥

किं नु ते कारणं वीर भार्यास्वेतासु भूरिद ।
आर्तनादं रुदन्तीषु यन्मोहान्नावबुध्यसे ॥ २२ ॥

'अधिक-से-अधिक (सुख-सुविधा) प्रदान करनेवाले महाराज ! क्या कारण है, जो अपनी इन पत्नियोंके रोने और आर्तनाद करनेपर भी आप मोहवश इनके दुःखको समझ नहीं पाते अथवा इस मोहनिद्रासे जाग नहीं उठते हैं ॥ २२॥

अहो निष्करुणा यात्रा नराणामौर्ध्वदेहिकी ।
यत् परित्यज्य दारान् स्वान् निरपेक्षा व्रजन्ति हि ॥ २३ ॥

'अहो ! पुरुषोंकी यह पारलौकिक यात्रा बड़ी ही निर्दय होती है; क्योंकि वे अपनी पत्नियोंको छोड़कर उनकी कोई अपेक्षा न रखते हुए चल देते हैं ॥ २३ ॥

अपतित्वं स्त्रियाः श्रेयो न तु शूरः पतिः स्त्रियाः ।
स्वर्गस्त्रीणां प्रियाः शूरास्तेषामपि च ताः प्रियाः ॥ २४॥

'स्त्रियोंका बिना पतिके ही रह जाना अच्छा, किंतु उनके लिये शूरवीर पतिका होना अच्छा नहीं है; क्योंकि वे शूरवीर स्वर्गलोककी सुन्दरियोंको प्रिय होते हैं और वे सुन्दरियाँ भी उन शूरवीरोंको प्रिय होती हैं ॥ २४ ॥

अहो क्षिप्रमदृश्येन नयता त्वां रणप्रियम् ।
प्रहृतं नः कृतान्तेन सर्वासामन्तरात्मसु ॥ २५ ॥

'अहो ! जिन्हें युद्ध ही प्रिय था, उन आपको अदृश्य-भावसे शीघ्रतापूर्वक ले जानेवाले कालने हम सबकी अन्त-रात्माओंपर एक साथ ही प्रहार किया है ॥ २५ ॥

हत्वा जरासंधबलं जित्वा यक्षांश्च संयुगे ।
कथं मानुषमात्रेण हतस्त्वं जगतीतले ॥ २६ ॥

'वीरवर ! आप युद्धमें जरासंधकी सेनाका विनाश करके यक्षोंको भी हराकर इस भूतलपर एक मनुष्यमात्रके हाथसे किस तरह मार डाले गये ? ॥ २६ ॥

इन्द्रेण सह संग्रामं कृत्वा सायकविग्रहम् ।
अमर्त्यैरजितो युद्धे मर्त्येनासि कथं हतः ॥ २७ ॥

'इन्द्रके साथ बाणोंद्वारा युद्ध करके जो समराङ्गणमें अमरोंसे भी पराजित न हो सके, वे ही आप एक मरणधर्मा मनुष्यके हाथसे कैसे मारे गये ? ॥ २७ ॥

त्वया सागरमक्षोभ्यं विक्षोभ्य शरवृष्टिभिः ।
रत्नसर्वस्वहरणं जित्वा पाशधरं कृतम् ॥ २८ ॥

'आपने अपने बाणोंकी वर्षासे पाशधारी वरुणको परास्त करके अक्षोभ्य महासागरको भी विक्षुब्ध करते हुए उसके रत्नरूपी सर्वस्वका अपहरण कर लिया था ॥ २८ ॥

त्वया पौरजनस्यार्थे मन्दं वर्षति वासवे ।
सायकैर्जलदाञ्जित्वा बलाद् वर्षं प्रवर्तितम् ॥ २९ ॥

'एक बार इन्द्रने जब वर्षांमें कमी कर दी थी, तब आपने अपने सायकोंसे बादलोंको जीतकर पुरवासियोंके हितके लिये बलपूर्वक वर्षा करवायी थी ॥ २९ ॥

प्रतापावनताः सर्वे तव तिष्ठन्ति पार्थिवाः ।
प्रेषयन्तो वरार्हाणि रत्नान्युपच्छादनानि च ॥ ३० ॥

'भूमण्डलके समस्त भूपाल आपके प्रतापसे नतमस्तक रहा करते थे और उपहारके रूपमें आपके पास बहुमूल्य रत्न एवं वस्त्र भेजते रहते थे ॥ ३० ॥

तथैवं देवकल्पस्य दृष्टवीर्यस्य शत्रुभिः ।
कथं प्राणान्तकं घोरमीदृशं भयमागतम् ॥ ३१ ॥

३२६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

'इस प्रकार आप देवताओंके समान तेजस्वी थे। शत्रुओंने आपके बल-पराक्रमको प्रत्यक्ष देखा था तो भी आपके ऊपर ऐसा प्राणान्तकारी घोर भय कैसे आया ॥ ३१ ॥

प्राप्ताः स्मो विधवाशब्दं त्वयि नाथे निपातिते।
अप्रमत्ताः प्रमत्तेन कृतान्तेन निराकृताः ॥ ३२ ॥

'हा नाथ! आपके मारे जानेसे आज हमें विधवाकी पदवी प्राप्त हुई है। हम सदा प्रमादसे दूर रहती थीं; परंतु मतवाले कृतान्तने हमको भी मिट्टीमें मिला दिया ॥ ३२ ॥

यद्येवं नाथ गन्तव्यं यदि वा विस्मृता वयम्।
वाङ्मात्रेणापि यामीति वक्तव्ये कः परिश्रमः ॥ ३३ ॥

'नाथ ! यदि इस प्रकार आपको जाना ही था अथवा यदि हमें भुला ही देना था तो वाणीमात्रसे भी 'मैं जा रहा हूँ'—ऐसा कहकर विदा ले लेनेमें आपके लिये क्या परिश्रम था ॥ ३३ ॥

प्रसीद नाथ भीताः स्म पादौ ते याम मूर्द्धभिः।
अलं दूरप्रवासेन निवर्तस्व नराधिप ॥ ३४ ॥

'प्राणनाथ ! प्रसन्न होइये। हम भयभीत हैं। आपके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रार्थना करती हैं। नरेश्वर ! दूर देशमें जाने और रहनेसे कोई लाभ नहीं। आप घरको ही लौट चलिये ॥ ३४ ॥

अहो वीर कथं शेषे निषण्णस्तृणपांसुषु ।
शयानस्य हि ते भूमौ कस्मान्नोद्विजते वपुः ॥ ३५ ॥

'वीर ! हमें आश्चर्य है, आप तिनकों और धूलोंमें लोटकर कैसे सो रहे हैं? इस तरह पृथ्वीपर सोये हुए आपके शरीरको उद्वेग क्यों नहीं प्राप्त होता है ? ॥ ३५ ॥

केन सुप्तप्रहारोऽयं दत्तोऽस्माकमकर्कितः।
प्रहृतं केन सर्वासु नारीष्वेवं सुदारुणम् ॥ ३६ ॥

'जैसे किसीपर सोते समय आघात किया जाय, उस प्रकार किसने हमलोगोंको यह अप्रत्याशित (जिसकी हमें कोई आशा नहीं थी, ऐसा) घोर दण्ड दिया है? किस निष्ठुरने हम सब नारियोंपर इस तरह अत्यन्त दारुण प्रहार किया है? ॥ ३६ ॥

रुदितानुशयो नार्या जीवन्त्याः परिदेवनम्।
किं वयं सति गन्तव्ये सह भर्त्रा रुदामहे ॥ ३७ ॥

'अहो ! विधवा नारी जबतक जीवित रहती है, उसे विलाप ही करना पड़ता है। उसका अन्तःकरण रोता रहता है। हमें तो पतिके साथ ही चलना है, ऐसे अवसरपर हम रो क्यों रही हैं?' ॥ ३७ ॥

एतस्मिन्नन्तरे दीना कंसमाता प्रवेपती।
क्व मे वत्सः क्व मे पुत्र इति रोरूयती भृशम् ॥ ३८ ॥

इसी बीचमें कंसकी दुखिया माता काँपती हुई वहाँ आयी और 'कहाँ है मेरा बच्चा ? कहाँ है मेरा बेटा ?' ऐसा कहकर जोर-जोरसे रोने लगी ॥ ३८ ॥

सापश्यन्निहतं पुत्रं निष्प्रभं शशिनं यथा।
हृदयेन विदीर्णेन भ्राम्यमाणा पुनः पुनः ॥ ३९ ॥

उसने अपने मरे हुए पुत्रको देखा। वह कान्तिहीन चन्द्रमाके समान प्रतीत होता था। उसकी ऐसी दशा देखकर माताका हृदय विदीर्ण हो गया। उसे बार-बार चक्कर आने लगा ॥ ३९ ॥

पुत्रं समभिवीक्षन्ती हा हतास्मीति वाशती।
स्नुषाणामार्तनादेन विललाप रुरोद च ॥ ४० ॥

वह पुत्रके मुखकी ओर देखती हुई चीखने लगी—'हाय ! मैं मारी गयी!' पुत्रवधुओंके आर्तनादके साथ रोने-बिलखने लगी ॥ ४० ॥

सा तस्य वदनं दीनमुत्सङ्गे पुत्रगृद्धिनी।
कृत्वा पुत्रेति कारुण्यं विललापार्तया गिरा ॥ ४१ ॥

पुत्रके जीवनकी इच्छा रखनेवाली राजमाता उसके दीन मुखको अपनी गोदमें रखकर आर्त वाणीमें 'हा पुत्र' कहकर करुणाजनक विलाप करने लगी— ॥ ४१ ॥

पुत्र शूरव्रते युक्त ज्ञातीनां नन्दिवर्द्धन ।
किमिदं त्वरितं वत्स प्रस्थानं कृतवानसि ॥ ४२ ॥

'बेटा ! तुम तो वीर-व्रतमें तत्पर रहते थे और अपने बन्धु-बान्धवोंका आनन्द बढ़ाते थे। वत्स ! तुमने क्यों इतनी जल्दी यहाँसे प्रस्थान किया है ? ॥ ४२ ॥

प्रसुप्तश्चातिविवृते किं पुत्र नियमं विना।
वत्स नैवंविधा भूमौ शेरते कृतलक्षणाः ॥ ४३ ॥

'पुत्र ! तुम बिना किसी नियम (नियन्त्रण) के इस अत्यन्त खुले हुए स्थानमें क्यों सो रहे हो ? वत्स ! तुम्हारे-जैसे शुभ-लक्षण-सम्पन्न नरेश इस तरह भूमिपर नहीं सोते हैं ॥ ४३ ॥

रावणेन पुरा गीतः श्लोकोऽयं साधुसम्मतः ।
बलज्येष्ठेन लोकेषु राक्षसानां समागमे ॥ ४४ ॥

'तीनों लोकोंमें जो बलमें सबसे बढ़ा-चढ़ा था, उस रावणने प्राचीनकालमें राक्षसोंके समुदायमे इस सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित श्लोकका गान किया था ॥ ४४ ॥

एवमूर्जितवीर्यस्य मम देवनिघातिनः।
बान्धवेभ्यो भयं घोरं दुर्निवार्यं भविष्यति ॥ ४५ ॥

'मैं इस प्रकार बल और पराक्रममे बढ़ा हुआ हूँ तथा देवताओंका वध करनेमें समर्थ हूँ तो भी मुझे अपने ही भाई-बन्धुओंसे घोर एवं अनिवार्य भय प्राप्त होगा ॥ ४५ ॥

विष्णुपर्व ]एकत्रिंशोऽध्यायः३२७

तथैव ज्ञातिलुब्धस्य मम पुत्रस्य धीमतः ।
ज्ञातिभ्यो भयमुत्पन्नं शरीरान्तकरं महत् ॥ ४६ ॥
'उसी प्रकार मेरा बुद्धिमान् पुत्र अपने सजातीय बन्धुओंपर लुभाया रहता था तो भी इसे भाई-बन्धुओंसे ही यह देह-विनाशक महान् भय प्राप्त हुआ है' ॥ ४६ ॥

सा पतिं भूपतिं वृद्धमुग्रसेनं विचेतसम् ।
उवाच रुदती वाक्यं विवत्सा हरिणी यथा ॥ ४७ ॥
एह्येहि राजन्शुद्धात्मन् पश्य पुत्रं जनेश्वरम् ।
शयानं वीरशयने वज्राहतमिवाचलम् ॥ ४८ ॥
वह अपने पति बूढ़े राजा उग्रसेनसे, जो उस समय अचेत-से हो रहे थे, बछड़ेसे बिछुड़ी हुई हरिणीके समान रोती हुई बोली—'शुद्ध अन्तःकरणवाले महाराज ! आइये, आइये ! अपने पुत्र राजा कंसको देखिये, जो वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति वीरशय्यापर सो रहा है ॥ ४७-४८ ॥

अस्य कुर्मो महाराज निर्याणसदृशीं क्रियाम् ।
प्रेतत्वमुपपन्नस्य गतस्य यमसादनम् ॥ ४९ ॥
'महाराज ! अब हमलोग इसके लिये मृत्युकालोचित कर्म करें; क्योंकि यह यमलोकमें जाकर प्रेतत्वको प्राप्त हुआ है ॥ ४९ ॥

वीरभोग्यानि राज्यानि वयं चापि पराजिताः ।
गच्छ विज्ञाप्यतां कृष्णः कंससत्कारकारणात् ॥ ५० ॥
'राज्यका उपभोग तो वीर पुरुष ही करते हैं। हमलोग तो अब पराजित हो गये; अतः जाइये, कृष्णको यह सूचित कीजिये कि कंसके अन्त्येष्टि-संस्कारकी व्यवस्था होनी चाहिये ॥ ५० ॥

मरणान्तानि वैराणि शान्ते शान्तिर्भविष्यति ।
प्रेतकार्याणि कार्याणि मृतः किमपराध्यते ॥ ५१ ॥
'शत्रुके मरनेतक ही वैर रहता है। उसके शान्त हो जानेपर अब वैरकी भी शान्ति हो ही जायगी। इसके प्रेत-कार्य तो करने ही चाहिये। मरा हुआ क्या अपराध करता है' ॥

एवमुक्त्वा पतिं भोजं केशानालुप्य दुःखिता ।
पुत्रस्य मुखमीक्षन्ती विललापैव सा भृशम् ॥ ५२ ॥
अपने पति भोजराजसे ऐसा कहकर दुःखिनी राजमाता पुत्रका मुख निहारती हुई अपने केश खींच-खींचकर अत्यन्त विलाप करने लगी ॥ ५२ ॥

इमास्ते किं करिष्यन्ति भार्या राजन् सुखोषिताः ।
त्वां पतिं सुपतिं प्राप्य या विपन्नमनोरथाः ॥ ५३ ॥
'राजन् ! ये सुखमें पली हुई तुम्हारी रानियाँ अब क्या करेंगी। तुम्हारे-जैसे श्रेष्ठ पतिको पाकर भी इन बेचारी बहुओंका सारा मनोरथ नष्ट हो गया ॥ ५३ ॥

इमं ते पितरं वृद्धं कृष्णस्य वशवर्तिनम् ।
कथं द्रक्ष्यामि शुष्यन्तं कासारसलिलं यथा ॥ ५४ ॥
'ये तुम्हारे बूढ़े पिता अब श्रीकृष्णके अधीन हो गये। सूखते हुए पोखरेके जलकी भाँति अब मैं इन्हें परतन्त्र दशामें कैसे देख सकूँगी ॥ ५४ ॥

अहं ते जननी पुत्र किमर्थं नाभिभाषसे ।
प्रस्थितो दीर्घमध्वानं परित्यज्य प्रियं जनम् ॥ ५५ ॥
'बेटा ! मैं तुम्हारी जननी हूँ। मुझसे क्यों नहीं बोलते हो ? क्यों आज अपने प्रियजनोंका परित्याग करके तुमने परलोकके विशाल पथको प्रस्थान किया है ? ॥ ५५ ॥

अहो वीराल्पभाग्यायाः कृतान्तेनाभिचर्तिना ।
आच्छिद्य मम संदायो नीयसे नयकोविदः ॥ ५६ ॥
'अहो वीर ! तुम नीतिकुशल नरेश थे, मेरी सम्पत्ति थे; किंतु सदा समीप रहनेवाला काल आज तुम्हें मुझ अभागिनीकी गोदसे छीनकर लिये जा रहा है ॥ ५६ ॥

दानमानगृहीतानि तृप्तान्येतानि तैर्गुणैः ।
रुदन्ति तव भृत्यानां कुलानि कुलयूथप ॥ ५७ ॥
'कितने ही कुलों (परिवारों) के समुदायका पालन करनेवाले मेरे वीर पुत्र ! तुमने जिन्हें दान और मानसे अनुगृहीत कर रखा था, जो तुम्हारे उन गुणोंसे अत्यन्त संतुष्ट थे, वे ही ये तुम्हारे भृत्योंके कुलोंके लोग आज तुम्हारे लिये रो रहे हैं ॥ ५७ ॥

उत्तिष्ठ नरशार्दूल दीर्घबाहो महाबल ।
त्राहि दीनं जनं सर्वं पुरमन्तःपुरं यथा ॥ ५८ ॥
'नरश्रेष्ठ ! उठो ! महाबाहो ! महाबली वीर ! इन दीन-दुखी लोगोंकी और समस्त नगरकी अन्तःपुरके समान ही रक्षा करो' ॥ ५८ ॥

रुदतीनां भृशार्तानां कंसस्त्रीणां सुविस्तरम् ।
जगामास्तं दिनकरः संध्यरागेण रञ्जितः ॥ ५९ ॥
अत्यन्त आर्त होकर उसके विस्तृत गुणोंको याद करके कंसकी स्त्रियों और माताके रोते-रोते संध्या हो गयी और संध्याकालीन अरुण-रागसे रंजित हुए दिवाकर (सूर्य) अस्ताचलको चले गये ॥ ५९ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कंसस्त्रीविलापे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कंसकी स्त्रियोंका विलापविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥

३३८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


द्वात्रिंशोऽध्यायः

श्रीकृष्णका कंसवधके लिये पश्चात्तापपूर्वक उसके औचित्यका समर्थन, उग्रसेनका श्रीकृष्णको सर्वस्व-समर्पणके पश्चात् कंसका अन्त्येष्टि-संस्कार करनेके लिये अनुरोध, श्रीकृष्णका उन्हें समझा-बुझाकर राज्यपर अभिषिक्त करना और समस्त यादवोंके साथ जाकर कंस आदिका अन्त्येष्टि-संस्कार कराना

वैशम्पायन उवाच
उग्रसेनस्तु कृष्णस्य समीपं दुःखितो ययौ।
पुत्रशोकाभिसंतप्तो विषपीत इव श्वसन् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! राजा उग्रसेन पुत्रशोकसे संतप्त एवं दुखी होकर श्रीकृष्णके समीप गये। उस समय वे इस प्रकार लंबी साँस खींच रहे थे, मानो उन्होंने विष पी लिया हो ॥ १ ॥

स ददर्श गृहे कृष्णं यादवैः परिवारितम्।
पश्चात्तापाद् ध्यायन्तं कंसस्य निधनाविलम् ॥ २ ॥

उन्होंने देखा, पिताके घरमें श्रीकृष्ण यादवोंसे घिरे हुए बैठे हैं और कंसके निधनसे मलिन-मुख हो पश्चात्ताप करते हुए चिन्तामग्न हो रहे हैं ॥ २ ॥

कंसनारीविलापांश्च श्रुत्वा स करुणान् बहून् ।
गर्हमाणस्तथाऽऽत्मानं तस्मिन् यादवसंसदि ॥ ३ ॥

वे कंसकी पत्नियोंके बहुतेरे करुण विलाप सुनकर उस यादव-समाजमें अपनी निन्दा करते हुए बोले—॥ ३ ॥

अहो मयातिबाल्येन रोषाद् दोषानुवर्तिना।
वैधव्यं स्त्रीसहस्राणां कंसस्यास्य वधे कृतम् ॥ ४ ॥

'अहो ! मैंने अत्यन्त अविवेकके कारण रोषवश दोषका ही अनुसरण किया और इस कंसका वध करके हजारों स्त्रियोंको विधवा बना दिया है ॥ ४ ॥

कारुण्यं खलु नारीषु प्राकृतस्यापि जायते।
एवमार्तं रुदन्तीषु मया भर्तरि पातिते ॥ ५ ॥
परिदेवितमात्रेण शोकः खलु विधीयते।

'साधारण मनुष्योंको भी स्त्रियोंपर दया हो आती है; परंतु मेरे द्वारा अपने पतिके मारे जानेपर जो इस प्रकार आर्त होकर रो रही हैं, उन रानियोंके प्रति केवल पश्चात्ताप प्रकट करके मैं अपना शोक प्रकाशित कर रहा हूँ ॥ ५½ ॥

कृतान्तस्यानभिज्ञानां स्त्रीणां कारुण्यसम्भवः ॥ ६ ॥

'इन भोली-भाली स्त्रियोंके विलापको सुनकर तो यमराजके हृदयमें भी करुणाका संचार हो सकता है ॥ ६ ॥

कंसस्य हि वधः श्रेयान् प्रागेवाभिमतो मम।
सतामुद्वेजनीयस्य पापेष्वभिरतस्य च ॥ ७ ॥
लोके पतितवृत्तस्य परुषस्याल्पमेधसः।
अक्लिष्टं मरणं श्रेयो न विद्दिष्टस्य जीवितम् ॥ ८ ॥

'मैंने तो पहले ही यह निश्चय कर लिया था कि कंसका वध ही श्रेष्ठ है। जो सदा पापोंमें तत्पर रहनेके कारण साधु पुरुषोंकी दृष्टिमें भी उद्वेजनीय (उद्वेगमें डालने योग्य ) हो गया हो, संसारमें सदाचारसे गिर गया हो तथा सब लोग जिससे विद्वेष रखने लगे हों, ऐसे मन्दबुद्धि पुरुषका मर जाना ही श्रेयस्कर है। वही उसे क्लेशसे छुटकारा दिलानेवाला है, जीवित रहना नहीं ॥ ७-८ ॥

कंसः पापपरश्चैव साधूनामप्यसम्मतः।
धिक्छब्दपतितश्चैव जीविते चास्य का दया ॥ ९ ॥

'कंस सदा पापोंमें ही लगा रहता था, साधु पुरुष भी (उसे दुष्ट समझकर) उसका आदर नहीं करते थे तथा वह सबका धिक्कार पाकर पतित हो गया था, अतः उसके जीवनपर क्या दया हो सकती है ? ॥ ९ ॥

स्वर्गे तपोभृतां वासः फलं पुण्यस्य कर्मणः।
इहापि यशसा युक्तः स्वर्गस्थैरवधार्यते ॥ १० ॥

'तपस्वी पुरुषोंको जो स्वर्गलोकमें निवास प्राप्त होता है, वह उनके पुण्यकर्मका ही फल है। पुण्यात्मा पुरुष इस जगत्में भी यशस्वी होता है और स्वर्गवासी देवता भी उसे सादर ग्रहण करते हैं ॥ १० ॥

यदि स्युर्निर्वृता लोकाः स्युश्च धर्मपराः प्रजाः।
नरा धर्मप्रवृत्ताश्च न राजानमयः स्पृशेत् ॥ ११ ॥

'यदि सब लोग संतुष्ट हों, सारी प्रजा धर्ममें तत्पर रहे और मनुष्योंकी केवल धर्ममें ही प्रवृत्ति हो तो राजाओंको अन्याय छू भी नहीं सकता ॥ ११ ॥

निग्रहे दुष्टवृत्तीनां कृतान्तः कुरुते फलम्।
इष्टधर्मेषु लोकेषु कर्तव्यं पारलौकिकम् ॥ १२ ॥

'यदि राजा इस लोकमें दुष्ट वृत्तिवाले पुरुषोंका दमन करे तो परलोकमें धर्मराज उसे उसका फल देते हैं। सम्पूर्ण लोकोंको धर्म (उसके फलस्वरूप सुखकी प्राप्ति ) ही अभीष्ट है, इसलिये उनमें रहनेवाले पुरुषोंको परलोकमें सुख देनेवाले पुण्यकर्मोंका ही अनुष्ठान करना चाहिये ॥ १२ ॥

अतीव देवा रक्षन्ति नरं धर्मपरायणम्।
कर्तारः सुलभा लोके दुष्कृतस्य हि कर्मणः ॥ १३ ॥

'देवता धर्मपरायण मनुष्यकी विशेषरूपसे रक्षा करते हैं, क्योंकि लोकमें अधिकतर पाप कर्म करनेवाले ही सुलभ होते हैं ॥ १३ ॥