हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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को भी भलीभांति ज्ञात था कि यदि हम पश्चिमी समुद्र तट पर शिवाजी के समय से शान्तिपूर्वक आबाद हैं, तो इसलिये नहीं कि मरहठे हमसे प्रसन्न हैं या हमारा यहां पर रहना उन्हें पसन्द है, वरन् हम यहां शांति पूर्वक इसलिये पड़े हुये हैं कि इस समय मरहठे अपने शक्तिशाली शत्रुओं से लड़ने में उत्तरी भारतवर्ष में लगे हुये हैं और हमें एक 'साधारण शत्रु समझ कर इस समय कुछ ध्यान नहीं देते हैं। जिस समय हम सिर उठायेंगे, वे अवश्य हमारा सत्यानाश कर देंगे। इस के साथ ही अंग्रेज़ अपनी सूक्ष्म राजनैतिक अंतर्दृष्टि द्वारा यह भी भलीभांति समझते थे कि उन के अधीन जो बम्बई का प्रदेश है उसका कारण यह नहीं है कि वे मरहठों के गढ़ में उस पर अपना आधिपत्य रख सकते थे पर इसका एकमात्र कारण यह है कि मरहठे दूसरे स्थानों पर लड़ाई में उलझे होने के कारण इस ओर ध्यान नहीं देते। इसलिये वे भी हर समय मरहठों को हानि पहुंचाने की इच्छा करते हुये भी डर के मारे उनसे छेड़छाड़ नहीं करते थे। आंगरे की शक्ति को नष्ट करने के लिये नानासाहब उनकी शक्ति को काम में लाये थे, परन्तु यह भी इस शर्त पर कि इस कार्य द्वारा समस्त मरहठा जाति को किसी प्रकार से भी सैनिक अथवा सामुद्रिक हानि पहुंचने की संभावना न हो। यदि ईश्वर की इच्छा प्रतिकूल न हुई होती, जिस की कि किसी भी मरहठा व्यक्ति को आशा न थी—आंगरे के सत्यानाश के पश्चात् मरहठों की जलसेना भी बड़ी शक्तिशाली हो गई होती। इतना होते हुये भी अंग्रेजों को कम से कम पश्चिमी किनारे पर भी कुछ विशेष लाभ प्राप्त न हुआ। शिवाजी के समय में जो कुछ उनके अधीन था वही उनके अधीन रहा उसमें वे कोई और वृद्धि न कर सके। लेकिन बंगाल में अंग्रेजों ने मैदान खुला पाया। क्लाईव के समय में अंग्रेज़ प्रथम बड़े शान्त थे, किन्तु जब विजय प्राप्त करके जगे, तब यदि मरहठे न होते तो उन्होंने अपनी विजयश्री को दिल्ली तक बढ़ा
[ १५८ ] देती हैं और अपनी जाति तथा समाज के प्रति विश्वासघात करने तथा लोभ के कारण अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता बेचने को धार्मिक दृष्टि से पाप समझती है इत्यादि । तथापि हमें वर्त्तमान समय को देखकर भूतकाल का बिल्कुल ठीक-ठीक पता चलाने में बहुत कुछ बुद्धिमत्ता से विचार करना चाहिये । बात हो जाने पर प्रत्येक मनुष्य को बुद्धि आती है । पर यदि हम उन कारणों और स्थितियों पर ध्यान दें, जिनका ठीक अनुभव कार्यपूर्ण होने से पहिले हो जाये, तो वे दो सेनायें जो सुसज्जित होकर लड़ने जा रही हो, उनमें से कौन पराजित और कौन विजयी होगा, इस बात को जानने वाले केवल भविष्य-वक्ता ही हो सकते हैं । कोई भी राजनैतिक पुरुष इस विषय में ठीक-ठीक भविष्यवाणी नहीं कर सकता था । जितनी वैज्ञानिक तथा संगठन-शक्ति उस समय अंग्रेजों की थी, वह इतनी बढ़ी-चढ़ी न थी कि मर्हठों को भारतवर्ष के राज- नैतिक क्षेत्र में सदैव के लिये या बिल्कुल अयोग्य ठहरा सकती । इसके अतिरिक्त अंग्रेज़ों को स्वाभाविक बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ उपस्थित थीं। यहां तक कि उनको विदेश में लड़ना पड़ता था, जो कि उनकी मातृभूमि और उनके मुख्य युद्ध केन्द्र से कई हज़ार मील दूर था । जापान ने, जिसने कि अपनी कमर एक शताब्दी से कसनी शुरू की थी, अपनी वैज्ञानिक और राजनैतिक शक्ति की बड़ी भारी त्रुटि को आधी ही शताब्दी के भीतर अपने योरोपीय प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबिले में बहुत अंशों में पूरा कर लिया था । मरहठे भी और बातों में जापानियों के बराबर होने के कारण ऐसे ही सफल हुए होते और विशेषतः जिस समय की बात लिखी जा रही है, उस समय अंग्रेज़ मरहठों से इतने बढ़े-चढ़े न थे कि वे मरहठों को भारत के प्रधान पद से, जिसके द्वारा उन्होंने उस समय के मुग़ल, अफ़गान, फ़ारसी, पुर्तगीज़ों और अंग्रेज़ों का घोर लड़ाइयों में सामना करके परास्त किया था, हटा देते । अंग्रेज़ भी भली-भांति इस बात को जानते थे। इसलिये जब तक मरहठे एकता के सूत्र में बंधे रहे उन्होंने कभी भी खुल्लम-खुल्ला
[ १५६ ] मरहठों के अधिकारों में हस्तक्षेप करने का साहस नहीं किया। जब मरहठों में परस्पर वैर विरोध पैदा हो गया और गृहकलह का आरम्भ हो गया तब भी अंग्रेजों के अतिरिक्त और किसी का साहस न हुआ कि उनकी शत्रुता की क्रोधाग्नि को जगाए, पर अँगरेज अपनी सफलता का अवसर समझ कर उनका सामना करने को उद्यत हो गये। बङ्गाल और मद्रास की भूमि में अधिक भोजन करके वे इतने मोटे हो गए थे कि बम्बई प्रान्त में मरहठों को आपस में लड़ते देखकर वे शीघ्र ही उनसे लड़ने का साहस करने लग गये। यह बात नीच राघोवा को भी अनुभव हुई इसलिये जब वह हार गया और उसके साथियों ने उसका परित्याग कर दिया और उसके देश- वासियों ने उसे निकाल दिया तो उसके सिर पर, प्रजा के उसे न चाहते हुए भी, महाराष्ट्र के ऊपर राज्य करने का भूत सवार हुआ। इसी धुनमे उसने अंग्रेजों की शरण लेने का विचार दृढ़ किया और इस प्रकार वह अपनी जातीय स्वतन्त्रता को, अपने सबसे बड़े शत्रुओं के हाथ बेचने पर तुल गया, और उन्हें अवसर दिया कि वे मरहठों के ही हाथों से, जिन्हें उसने इस समय अपने भाइयों का लहू बहाने को उठाया था, मरहठा-राज्य के दुर्ग की दीवारो को तोड़ दें। अंग्रेजों ने बड़ी उत्सुकता के साथ अपने भाइयों की हत्या करने वाले राघोबा के हाथ को इस शर्त पर पकड़ा कि वह उनको इसके बदले २० से २५ लाख वार्षिक आय वाला प्रदेश देगा। सन्धि हो जाने पर ज्यों ही अंग्रेज सेनापति ने खुले दिल से राघोबा को साथ लेकर मरहठों पर आक्रमण कर दिया सालसिट, वर्सन और भड़ोच निवासियों ने राघोबा को महाराष्ट्र का पेशवा स्वीकार कर लिया। उसी समय जितनेभी छोटे-छोटे राज्य मरहठों के आधीन थे उन्होंने यह समाचार पाकर कि अंग्रेज और मरहठों में युद्ध प्रारम्भ हो गया है, मरहठों के विरुद्ध सारे भारतवर्ष में, बगावत कर दी। लेकिन नाना फड़नवीस, जो इस समय राज्यक्रांतिकारियों की बागडोर अपने हाथ में लिये हुए था, बड़ी दृढ़ता
[ १६० ] के साथ सारी कठिनाइयों का सामना करने के लिये तैयार हुआ। यद्यपि पूना का नवीन राज्य प्रबन्ध बहुत असंगठित दशा में था उस पर भी जो कुछ सेना एकत्रित हो सकी, उसे नाना फड़नवीस ने इकट्ठी करके हरिपन्त पाडके की अध्यक्षता में अंगरेज़ी सेना को, जो कर्नल कीटिङ्ग के सेनापतित्व में बढ़ी आ रही थी, रोकने के लिये भेजा। हरिपंत और उसकी सेना ने इस कार्य को बड़ी योग्यता के साथ पूर्ण किया। नापर और दूसरी जगहों पर उन्होंने शत्रुओं को बड़ी हानि पहुंचाई, यद्यपि कीटिंग ने उन्हें बड़ी बहादुरी के साथ आगे बढ़ने से रोक रक्खा। सन् १७७७ ई० में अंगरेजों के भारत के राज्य-प्रबन्ध में कुछ परिवर्त्तन हुआ जिसके अनुसार बंगाल का गवर्नर सारे भारतवर्ष के अंगरेज़ी राज्य का प्रधान समझा जाने लगा। उसने बम्बई के गवर्नर के इस कार्य को अर्थात् मरहठों के साथ लड़ाई छेड़ने को नापसन्द किया और मरहठा-राज्य के साथ सन्धि करने के लिये अपने राजदूत को पूना भेजा। नाना ने, जो कि उस समय समस्त भारत में अपने विरुद्ध उठी हुई बगावतों को दबाने के लिये अवसर की ताक में अत्यन्त उत्सुक हो रहा था, तुरन्त अंगरेजों के साथ सन्धि करली, जिसके अनुसार अंगरेज़ों को सालसीट और भड़ोच मिल गये और उन्होंने राघोबा को उनके हवाले करने का वचन दिया। ज्योंही अंगरेज़ों से सुलह हुई नाना ने महादाजी शिन्दे को महाराष्ट्र के अन्तर्गत पैदा हुये विप्लव को दबा देने के लिये नियुक्त किया और पाडके और पटवर्धन, हैदरअली को, जिसने कि मरहठों के राज्य पर आक्रमण किया था, दण्ड देने के लिये भेजे गये। परन्तु जब सारे मरहठे-सेनापति भिन्न २ कार्यों पर नियुक्त हो कर, उन्हें पूरा करने के लिये चले गये तब अंगरेज़ों ने सन्धि की अवहेलना कर के राघोबा को मरहठों के हवाले करने से इन्कार कर दिया और फिर इस विचार से युद्ध की घोषणा कर दी कि जब तक बाहर भेजी हुई
[ १६१ ] मरहठी सेनाएं आकर नाना की सहायता करेंगी, उसके पहले ही हम पूना में चल कर उसे कुचल डालेंगे । मरहठों को भयभीत और व्याकुल करने की इच्छा से सन् १७७६ ई० में कर्नल एजर्टन की अध्यक्षता में कुछ फ़ौजें पूना के लिये रवाना हो गईं। मरहठों ने भी, जो कि पुरंधर के सुलहनामे को पसंद नहीं करते थे, सारी भीतरी बग़ावतों से, जिन्हें महदजी ने दबा दिया था, छुट्टी पाकर अंग्रेज़ों को ललकारा और अपनी परम्परागत गुरेला लड़ाई की नीति का अवलम्बन किया। अंग्रेज़ों को फुसलाते हुये उन्हें इतनी दूर आगे ले गये कि उनका संबन्ध बम्बई से टूट गया । भिमराव पांसे अंग्रेज़ी सेना के किनारे २ लगा हुआ आगे बढ़ता चला गया और लगातार उसे लाचार करता गया और ऐसी चालाकी के साथ उसने अपने आप को बचाये रखा कि अंग्रेज़ी सेना उस पर धावा नहीं कर सकती थी, परन्तु मरहठे जब कभी उन्हें पहाड़ों के किनारे पाते थे तो अचानक उन पर आक्रमण कर देते थे, जिसे अंग्रेज़ बचा भी नहीं सकते थे। उनकी सेना बारम्बार तितर-बितर कर दी जाती थी और उनकी रसद के पहुंचने में भी हस्त क्षेप किया जाता था। अन्त में जब एजर्टन दर्रे के सिरे पर पहुंच गया तो उनका सम्बन्ध बम्बई से बिल्कुल टूट गया। मरहठों ने जब देखा कि उनका दुश्मन उनकी राजधानी के समीप पहुंच गया है तो वे भी सर धड़ की बाज़ी लगा कर पूर्ण शक्ति से लड़ने लग पड़े । इन लोगों ने यहां तक निश्चय कर लिया कि तेलगांव से पूना तक की सारी भूमि उजाड़ और सुनसान कर दी जाय और यदि आव- श्यकता पड़े तो राजधानी तक को भी फूंक दिया जाय, किन्तु उसे किसी प्रकार शत्रु के हवाले न किया जाय । इस भयानक जातीयता के दृढ़ विचार का अंग्रेज़ों पर भी बड़ा प्रभाव पड़ा । खान्डाला के युद्ध में कर्नल के को मरहठों ने बड़ी बुरी तरह घायल किया और खिर्की की लड़ाई में कैप्टन स्टीवर्ट को मार डाला जिससे अंग्रेज़ बहुत दुःखी हुए । पग-पग पर अंग्रेज़ों की हानि अधिकाधिक होने लगी। लेकिन योग्यतापूर्ण और नियमों के पालन में अद्वितीय अंग्रेज़ आगे बढ़ते ही
० [ १६२ ] गये और अन्त में तेलगांव जा पहुंचे। लेकिन वहां उन्हें महादजी शिन्दे और हरिपन्त पाडके की बड़ी भारी सेना का सामना करना पड़ा। अंग्रेज़ों ने बड़े उत्साह के साथ आक्रमण किया। अन्त में मरहठों की सेना पीछे हटी और भिन्न २ हिस्सों में बंट गई और फैले हुए अंग्रेज़ों पर चारों ओर आक्रमण करती रही, उस पर भी वे बिल्कुल सुरक्षित रहे। न तो शत्रु को खाना मिलता था, न उनके घोड़ों को चारा मिलता था। अंग्रेज़ों के पास किसी प्रकार यह खबर भी पहुंच गई कि ज्यों २ उनकी सेना आगे बढ़ती जायगी, उन्हें और भी सुनसान स्थान मिलेंगे। बहादुर तथा हठी अंग्रेज़ तब भी आगे बढ़ने का प्रयत्न करते रहे। लेकिन चपल मरहठों ने उन्हें अच्छी प्रकार घेर लिया था तथा उन्हें भली-भांति सूचित कर दिया था कि वह अपनी राजधानी को फूंक देंगे, किन्तु अंग्रेज़ों के हाथ न जाने देंगे। अंग्रेज़ सेनापति ने मरहठों के कर्तव्यों को देखकर भलीभांति जान लिया कि पूना की ओर बढ़ना सांसी की ओर बढ़ने के समान आसान नहीं है। उसने अब इस उलझन से निकलने का केवल यही उपाय देखा कि वह बम्बई लौट चले। यद्यपि यह उनके लिये बड़ा अपमानजनक विचार था तथापि इसके अलावा और कोई चारा भी न था। पीछे की ओर लौट जाना भी असम्भव था इसलिये अंग्रेज़- सेनापति ने मरहठों को विस्मित करने के लिये अपनी फ़ौज को मरहठों पर अचानक आक्रमण करने की आज्ञा दी और कहा कि इसके पश्चात् धीरे धीरे पीछे हटो। लेकिन मरहठों को हैरान करने का विचार वैसा ही था, जैसा कि बच्चा अपनी दादी को दूध पिलाना सिखावे। मरहठे यह सब बातें पहले से ही जानते थे। ज्योंही अंग्रेज़ों ने आक्रमण किया, उन्होंने घेरा तंग कर लिया और इशारा पाते ही बड़े वेग से शत्रुओं पर टूट पड़े। अंग्रेज़ बड़ी ही वीरता के साथ लड़े, लेकिन मरहठे तिलमात्र भी न हिले। अन्त में बड़गांव में पूर्णतया पराजित होकर अंग्रेज़ों की ६ हज़ार सेना ने बिना किसी शर्त के मरहठों के सामने अपने हथियार
[ १६३ ] कर दिये। नाना, बापू और शिन्दे ने कहा कि राघोबा को शीघ्र हमारे हवाले करो और उन सारे जिलों को जो तुम्हें पुरंधर के संधिपत्र के अनुसार मिले हैं, हमें वापिस कर दो। इस के अतिरिक्त दो अंग्रेज अधिकारियों को, उस समय तक धरोहर रूप में रोक लिया गया जब तक कि अंग्रेज इस सुलहनामे की शर्तें पूरी नहीं करते। अंग्रेज सेनापति ने लगभग एक महीना तक मरहठों के हाथ में कैदी रह चुकने के पश्चात् सुलहनामे की सब शर्तों को स्वीकार कर लिया ताकि उसकी सेना किसी प्रकार बम्बई लौट जाय। इस बड़ा विजय के समाचार को सुनकर सारे महाराष्ट्र के भीतर प्रसन्नता बिजली की तरह दौड़ गई। विशाल "यूनियन- जैक" (अंग्रेजी झंडा) मरहठों के पीले और सुनहरी झंडे (जरीपताका) के सामने झुक गया। यद्यपि पारिवारिक झगड़े हो रहे थे और मरहठे असंगठित दशा मे थे, पर समय पड़ने पर सारी जाति खड़ी होगई और उनके इस प्रजा-तंत्र ने अपने इतने घोर और बलवान् शत्रु को भली भांति हरा दिया। केवल यही एक बचा हुआ विपक्षी था जिसने इससे पहले मरहठों की प्रधानता के सम्बन्ध में कभी भी किसी प्रकार प्रश्न नहीं उठाया था। ज्योंही उसने ऐसे प्रश्न करने का साहस किया, उसी समय उसे नम्र होकर उनको सर्वश्रेष्ठ शक्ति के रूप में मानना पड़ा। उस समय के पत्रों में लिखा मिलता है—'हमारी जाति ने अंग्रेजों को वह पाठ पढ़ाया जैसा कि दूसरा कोई नहीं पढ़ा सकता था। इससे पहले उन्हें कभी इतना अपमानित नहीं होना पड़ा था"। सब लोग पेशवा के परम भक्त थे। वह ही जनता के उद्देश्यों का केंद्र था। वे अपनी विजय भी उसी राजा-बनने वाले शिशु के महा भाग्य के कारण ही समझते थे। "जन्मकाल ही से हमारे प्यारे शिशु- राजकुमार का जीवन वैसा ही चमत्कारपूर्ण हुआ है जैसा कि महाराज आनन्दकंद श्रीकृष्ण जी का हुआ था। हमारे शत्रु मिट गये और परमात्मा ने हमारी जाति के महान् उद्देश्य और हिन्दू-धर्म के पवित्र युद्ध में हमें आशीर्वाद दी है"।
An exact transcription of the Hindi/Marathi text from the page, line by line:
१६४ ] १६ अंग्रेज भी झुके ☸ "प्रतापमहिमा थोरजलामधि परि जलचर बुडविला ॥" "नवि मोहिम दरसाल देउनी शाह टीपू तुडविला ॥" एक बड़ी अंग्रेजी सेना के पराजित होकर हथियार रख देने का समाचार ज्योंही कलकत्ता पहुंचा, अंग्रेज क्रोध से भड़क उठे। उन्होंने बड़गाँव की संधि को उस समय प्रमाणित करने से इन्कार कर दिया, जिस पर कि उनके सेनापति ने, अपनी सेना को वापिस आने की आज्ञा पाने पर, हस्ताक्षर कर दिये थे। फिर वे मरहठों के साथ अधिक द्वेष के साथ नई शत्रुता करने के लिये उद्यत हो गये। रघुनाथराव यदि किसी दूसरे राज्य में होता, तो राज-विद्रोही होने के अपराध में मार डाला गया होता, किन्तु सब कुछ होते हुए भी उस के साथ एक राजकुमार जैसा व्यवहार किया जाता था, परन्तु वह अपने नीच स्वभाव के कारण इसका दुरुपयोग करके फिर भाग कर अंग्रेजों से जा मिला। फिर भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया। गोडार्ड गुजरात से आया और बसीन की ओर बढ़ा। उस को रामचन्द्र गणेश मरहठे-सेनापति ने रोका और घमसान का युद्ध होने लगा। अन्तिम बार उसने ऐसी वीरता और साहस के साथ आक्रमण किया कि उसके दुश्मन भी उसकी प्रशंसा करने पर विवश हो गये। विजय ध्रुव थी, किन्तु अभाग्यवश एक गोली इस बहादुर सेनापति को लगी, वह घोड़े से गिर पड़ा जिस से गोडार्ड ने सन् १७८० ई० में बसीन पर अधिकार कर लिया। इस विजय से प्रोत्साहित होकर अंग्रेजों ने बड़गाओं के स्थान पर लड़ाई में हथियार डाल देने के अपने कलंक को मिटाने के लिये मरहठों की राजधानी पूना ही को लेने का विचार किया, जिस के लेने में पहली बार वे बुरी तरह असफल हो चुके थे। ☸ यद्यपि टीपू मगरमच्छ के समान पराक्रमी था पर मरहठों ने प्रतिवर्ष आक्र- मण करके उसे मिट्टी में मिला दिया।
[ १६५ ] इसलिये अंग्रेज़ी सेना शीघ्र ही पूना के लिये चल पड़ी ताकि वह नाना तथा उनके साथियों को भयभीत करके उनके हाथ से हथियार रखवाले । लेकिन महाराष्ट्र के उस निपुण राजनीतिज्ञ नाना ने पहिले ही अंग्रेजों को फंसाने के लिये सारे भारतवर्ष में एक भयंकर जाल बुन लिया था । उसने हैदरअली से मद्रास और भोंसले से बंगाल पर आक्रमण करने की प्रतिज्ञा ले ली थी, और अपने हाथ में उसने बम्बई में अंग्रेजों की शक्ति को नष्ट करने का काम लिया । तदनुसार हैदरअली नेफ्रांस गवन- र्मेण्ट की सहायता से मद्रास में सुविख्यात सफलता प्राप्त की । परशराम भाऊ १२ सहस्र सेना के साथ उस अंग्रेज़ी सेना के इर्द गिर्द मंडराता हुआ उनकी बगलों और पीछे वाली सेना पर आक्रमण करता हुआ उनको पूना की ओर प्रगति में बाधायें डालता रहा । नाना, तुकोजी होल्कर और हरिपन्त पाडके ने तीस सहस्र सेना लेकर अंग्रेज़ी सेना का सामना किया । अब जनरल गोडार्ड ने भी अपने आप को जनरल एज- रटन की अवस्था में फंसा हुआ पाया । यदि वह आगे बढ़ता तो उसे भी अपने पूर्ववर्ती जनरल की तरह दुर्भाग्य का शिकार होना पड़ता, तो भी यह इतना आगे बढ़ आया था कि अब पीछे लौट जाना उस के लिये हानिकारक और अपमानजनक था । इस लिये वह उसी जगह पर जम कर अपनी शक्ति बढ़ाने लगा । लेकिन वह इस प्रकार भी देर तक न कर सका । मरठों ने कैप्टन मैके और करनैल ब्राउन को, जो गोडार्ड को सामान पहुंचा रहे थे, आक्रमण करके हैरान कर दिया और ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि अंग्रेज़ी सेना का सम्बन्ध ही बम्बई से टूट गया । अन्त में निराश होकर करनैल गोडार्ड को पूना पर धावा करने का विचार त्याग कर लौट जाने का निश्चय करना पड़ा । ज्यों ही निराश होकर अंग्रेज़ी सेना ने पीछे की ओर मुड़कर चलना आरम्भ किया त्योंही भाऊ और तुकोजी होल्कर अपनी सेना का घेरा तंग करके उन पर टूट पड़े । यद्यपि अंगरेज़ बड़ी शूरता और वीरता के साथ लड़े तथापि मरहठों ने उन्हें बुरी प्रकार हराया । जो सेनापति मरहठों की राजधानी
पर विजय प्राप्त करके बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिये आया था वह किसी प्रकार अपने अच्छे ग्रहों के कारण से भाग कर, अपना लगभग सारा बारूद, बन्दूकें, खीमें तथा सामान और हजारों तोपों के गोलों और सहस्रों बैलों को छोड़ कर, बम्बई पहुंचा । यह सारा सामान विजयी मरहठों के हाथ लगा। धृष्टता से दो बार अंग्रेजों ने पूना को जीतने का जी तोड़ कर प्रयत्न किया, किन्तु दोनों ही बार बुरी तरह हार खाई और अन्त में अपमानित और निराश होकर बम्बई लौट गये। इस के पहिले अंग्रेज इतने अपमानित हो कर कभी भी घर नहीं लौटे थे। उत्तर भारत में भी अङ्गरेज ढंग से अच्छी तरह न लड़ सके। प्रारम्भ में गोहाद् के राना की सहायता से अङ्गरेजों ने सींधिया के ग्वालियर के क़िले को घेर लिया; किन्तु महादजी सींधिया के घोर आक्रमण करने पर इसे देर तक अपने हाथ में न रख सके। कर्नल मूर भी अपने मित्र की सहायता के लिये शीघ्र वहां पहुंचा, किन्तु वह भी कुछ न कर सका। दक्खिन में हैदरअली से हारकर और बम्बई में तुकोजी और पटवर्धन से नीचा देखकर और उत्तर में सींधिया से परास्त होकर अङ्गरेजों ने उस मित्रता की जाल को, जिसे नाना ने तैयार किया था, तोड़ने का प्रयत्न किया और महादजी सींधिया से प्रार्थना की कि वह उन लोगों के साथ एक अलग सुलहनामा पर हस्ताक्षर करें। नाना फड़नवीस ने अलग सुलह करने से साफ़ उत्तर दे दिया और कहा कि बिना हैदरअली की राय के वह किसी प्रकार की संधि नहीं कर सकते। मरहठों की जलसेना ने भी अच्छी सफलता प्राप्त की थी। उनके सेनापति आनन्दराव धुलाप ने अङ्गरेज़ों पर एक सुविख्यात विजय पाकर उनके 'रेंजर' नामी बेड़े को पकड़ लिया और इसे युद्ध में लूटा हुआ माल समझ कर अपने साथ लेगया। ठीक इसी समय जबकि संधि की बातचीत हो रही थी, हैदरअली मर गया। इसलिये नाना ने १७८२ ई० में संधि कर ली। इस संधि के अनुसार अङ्गरेजों ने रघुनाथराव को
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मरहठों के हवाले किया और मालमिट को छोड़ कर जो देश वे मरहठों दवा बैठे थे तथा पुरन्धर के सुलहनामे में पाये थे, मरहठों को लौटा दिये उन्होंने यह भी प्रण किया वे किसी भी राजा को मरहठों के विरोध सहायता न देंगे। मरहठों ने भी प्रतिज्ञा की कि वे कोई कार्य ऐसा नह करेंगे जिस से अङ्गरेजों की हानि पहुंचे। सब से महत्वपूर्ण बात इ सुलहनामा में यह हुई कि दिल्ली के राजनैतिक क्षेत्र में हस्ताक्षेप न करने क अङ्गरेजों ने प्रतिज्ञा की और इस पर मरहठों का पूर्ण अधिकार माना क वे जो चाहें सो कर सकते हैं। इस प्रकार मरहठों और अङ्गरेजों की पहली लड़ाई का अ- हुआ। मरहठों ने योरुप की उस शक्ति के साथ, जो अभी तक मरह से नहीं लड़ी थी रण में लड़कर तथा उन्हें पराजित कर के उ को यह पाठ पढ़ा दिया कि यद्यपि वे बङ्गाल और मद्रास में शक्तिशा हैं तथापि यदि वे लोग सह्याद्रि के दुर्ग की ओर कुदृष्टि फेरेंगे औ मरहठों के हिन्दू-साम्राज्य का अहित सोचेंगे तो उनका सिर कुच दिया जायगा। सालबाई के संधि-पत्र के थोड़े ही दिन बाद राघोबा ने भी अप चाल को बदल दिया। उसने अपनी जाति को शत्रुओं के हाथ में फंसा उचित न समझा। इसने अपने नीच विचारों और कर्मों द्वारा मर को उनके उस उच्च आदर्श से गिरा दिया था जिसके लिये उनके पूर्व लड़ते हुए मरे थे; अब वे आपस में ही लड़ने के लिये तत्पर हो ग थे। इसका जीवन महाराष्ट्र के लिये वैसा ही हानिकारक सिद्ध हुआ जै पानीपत की लड़ाई। सालबाई की संधि के थोड़े ही समय बाद रघुनाथ राव मर गया। मरता हुआ भी वह अपनी जाति के लिए अपने भी अधिक एक और कलंक छोड़ गया। मरहठों के अभाग्यव रघुनाथराव के एक पुत्र पैदा हुआ, जिसका नाम उसके पितामह नाम पर बाजी राव द्वितीय रखा गया। यह लड़का उन नीच कर्मों
[ १६८ ] करने में तत्पर हुआ जिनको छोड़ने के लिये इसका पिता विवश किया गया था । यह महाराष्ट्र की स्वाधीनता को एक ठीकरे के मूल्य पर बेचकर महाराष्ट्र-राज्य के नाश का कारण हुआ । लेकिन जब तक नाना फड़नवीस और महादजी जीवित थे, तब तक ऐसा नहीं हो सका था । ———— २०. सर्व-प्रिय पेशवा—सवाई माधोराव ꕤदैन्य दिवस आज सरले सवाई माधवराव प्रतापि कलियुगिं अवतरले ॥धृ०॥ सुन्दररुप रायाचें कुणावर नाहिं रागें भरतों ॥ कलगितुरा शिरपेंच पाचुचीं पडत होति मुखावर किरणें ॥ महोत्साह घरोघर लागले लोक करायाला ॥ परशराम प्रत्यक्ष आले जणुं छत्र धारायाला ॥ नाना और महादजी क्रमशः हिन्दू-धर्म के मस्तिष्क और तलवार थे । वे महाशक्तिशाली राज्य का विशाल भार अपने प्रशांत कंधों पर उठाने के लिये ही उत्पन्न हुये थे । इङ्गलैण्ड, फ्रांस, हालैण्ड और पुर्तगाल ने राज्य-स्थापन के लिये जितने भी राजनीतिज्ञ भेजे उनमें से कोई भी इन दोनों महापुरुषों को बल और बुद्धि में नीचा न दिखा सका । हेस्टिंग्स, वेलजली और कार्नवालिस की उनके सामने एक भी न चली । दोनों ने ही हिन्दू-राज्य के बढ़ते हुये वैभव को देखा था । दोनों ने ही महाराष्ट्र ———————————————————————————————— ꕤ प्रतापवान् सवाई माधोराव कलियुग में पैदा हुये तब, हमारी दरिद्रता के दिन समाप्त हो गये यह परम-सुन्दर और शान्त स्वभाव थे । सिर पर मणि जड़ित कलगी की ज्योति उनके मुख पर पड़ती थी । घर-घर खुशियां मनायी जाने लगीं और लोग यह समझने लगे कि साक्षात् परशुराम राज्य सम्भालने के लिये पैदा हुये हैं ।
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की नीति, उसका, उद्देश्य, और अपने कर्त्तव्य की शिक्षा नानासाहब और सदाशिवराव भाऊ से पाई थी। दोनों ने ही पानीपत का मैदान देखा था और वहां से लौटकर उस रक्त-रञ्जित भूमि पर पड़े हुये वीर पुरुषों के उद्देश्य को पूरा करने का उन्होंने दृढ़ निश्चय किया था। उस पर उन्हें ऐसे राज्य का भार उठाना पड़ा जो उस समय गृह-कलह से जर्जर हो रहा था; जो नाश के तट पर खड़ा था। जिसका राजा भी नाम मात्र का था, और जिसका प्रधान मंत्री था एक निर्बोध बालक; और जिसको नष्ट करने के लिए एक महा-शक्तिशाली यूरोपीय शत्रु अपनी राज्यलिप्सा के लिये समग्र शक्तियों का उपयोग कर रहा था। फिर भी उन्होंने अदम्य उत्साह और विलक्षण बुद्धि से सम्पूर्ण कठिनाइयों का सामना किया; राज्य के सब विद्रोहियों को शान्त किया और अपने विशाल बाहुबल तथा सुदूरदर्शिता से समस्त यूरोपीय और एशियाई शत्रुओं को पराजित करके नीचा दिखाया।
राज्य की दशा सुधारने के लिये उन्हें एक ऐसी क्रांति पैदा करने तथा उसे संयत रखने का कठिन उत्तरदायित्व लेनापड़ा, जिसका परिणाम बिल्कुल अनिश्चित था। किन्तु इस क्रांति ने सारे शत्रुओं और सरकार पर विजय पाई। अतः यह सर्वथा स्वाभाविक और राजनीति के अनुकूल था कि इस विजय को किसी महोत्सव द्वारा संसार को विदित कराया जाता। बालक पेशवा—सवाई माधोराव—का विवहोत्सव इस राष्ट्रीय आनन्द को मानने के लिये अत्यन्त उपयुक्त अवसर था। वह प्रजा का मनोनीत था, उसी के लिये राष्ट्र ने युद्ध भी ठाना था। जिस पेशवा की हत्या के लिये शत्रुओं ने युद्ध ही नहीं किया वरन उसे गुप्त और नीच प्रयत्नों द्वारा विष देकर मार भी डालना चाहा, आज उसे सब संकटों से सुरक्षित पाकर राष्ट्र के आनन्द का क्या ठिकाना ! जिस प्रकार कंस के अत्याचारों से कृष्ण को सुरक्षित पाकर गोकुल वालों ने आनन्द मनाया था, उसी प्रकार सारी प्रजा अपने प्यारे पेशवा को जीवित पाकर आनन्द में मग्न हो गई। इस राजकीय महोत्सव में सम्मिलित होने के
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लिये लोगों के चारों ओर से झुण्ड-के-झुण्ड आने लगे। राजकुमार, सरदार, कवि, प्रसिद्ध ग्रंथ-कर्त्ता, सेनापति तथा कूटनीतिज्ञ तथा राजनीति सब पूना शहर में अपने प्यारे और प्रतापी राजकुमार का दर्शन पाने तथा विवाहोत्सव मनाने के लिये एकत्र हो गये। संसार में महाराष्ट्रमंडल की धाक जमाने के लिये और विदेशियों तथा शत्रुओं की इस दुराशा को, कि महाराष्ट्रमंडल शीघ्र ही गृहकलह से छिन्न-भिन्न होकर नष्ट-भ्रष्ट होने वाला है, दूर करने के लिये नाना ने स्वयं महाराष्ट्र छत्रपति को निमन्त्रित किया, और जब वे प्रधान मंत्री के विवाहोत्सव की शोभा बढ़ाने के लिये पूना के पास पहुंचे तो अत्यन्त राजकीय समारोह के साथ उनका स्वागत किया। भव्य राज-भवन में छत्रपति सिंहासन पर विराजमान थे। उनके चारों ओर वाइसराय, सेनापति, जेनरल, राजनीतिज्ञ और राजकुमारगण बैठे थे। इनमें से कितने तो इतने बड़े प्रान्तों के शासक थे जो दूसरे महाद्वीपों के एक राज्य के बराबर थे। उस सभा में पटवर्धन, रास्ते, और पाडके जाति के लोग वर्तमान थे। वहां पर होल्कर, सीन्धिया, पवार, गायकवाड और भोंसला के प्रतिनिधि उपस्थित थे। वहां पर हरिद्वार से लेकर रामेश्वर तक के विद्वानों का जमघट लगा हुआ था। जयपुर, जोधपुर और उदयपुर के महाराजे सादर निमन्त्रित किये गये थे और उनके प्रतिनिधि राजदूत सभा में उपस्थित थे। निज़ाम, मुग़लराज और भारत की यूरोपीय शक्तियों ने अपने २ राजकुमार और राजदूतों द्वारा भेंट भेजी थी। राजधानी से मीलों दूर तक घोड़ों, तोपों और पैदल सेनाओं का पड़ाव पड़ा था, जिसके देखने से महाराष्ट्र की युद्ध-शक्ति का अच्छा परिचय मिलता था। आंगरे और धुलाप जल-सेना के अधिनायक थे। पेशवा की ओर से आंगरे अतिथियों के स्वागत का प्रबन्ध बड़ी योग्यता से कर रहा था। उस विशाल जनसमुदाय के ऊपर बड़े-बड़े सुनहले गेरुवा झंडे फहराते थे, मानों राष्ट्र को स्वधर्म-राज्य अथवा हिन्दू- पद-पादशाही के महान् कर्त्तव्य की ओर संकेत कर रहे थे।
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एक नियत संकेत पर पैदल, अश्वारोही और तोपों की सेना के बाजे बजने लगे और "प्यारे राजकुमार की जय हो, जय हो" के उच्च निनाद से दिशायें गूँज गईं। इसी समय परम सुन्दर और नव कुमार पेशवा ने राज-कर्मचारियों के साथ अत्यन्त धूमधाम से धीरे २ राजभवन में प्रवेश किया। सारा राज-समाज खड़ा हो गया और सिर झुकाकर पेशवा को राष्ट्र के प्रति अपनी दृढ़ राज-भक्ति का परिचय दिया। किन्तु लोगों के आश्चर्य की सीमा न रही जब उन्होंने बालक पेशवा को जो भारत का वास्तविक शासक था, सितारापति छत्रपति की ओर, जो सभा के मध्य में सिंहासन पर बैठे थे, फूलों की माला से तीन बार लपेटे हाथों को जोड़ कर जाते हुये देखा। यही नियम था कि पेशवा राजा के सामने उपस्थित हो और हाथ जोड़ कर उसकी अधीनता स्वीकार करे। इस दृश्य से बड़े-बड़े वीरों की आँखों से आनन्दाश्रु बहने लगे; यहाँ तक कि शांत तथा विज्ञ मन्त्री के गम्भीर मुख पर भी प्रसन्नता झलकने लगी और उनकी आँखों से आंसूओं की घड़ी २ बूँदें टपकने लगीं।
इस महोत्सव ने फिर से मरहठों में नवीन जीवन फूंक दिया और महाराष्ट्र फिर से एकता के सूत्र मे बंध गया। अन्य भारतीय राजा और यूरोपीय शक्तियाँ, जो मरहठोंकी फूट पर फूली न समाती थीं, आज नाना और अन्य महाराष्ट्र नेताओं की सफलता देख कर निराश हो गयीं। इस उत्सव का महाराष्ट्र के नेताओं पर भी कम प्रभाव न पड़ा। प्रजातन्त्र के गौरव ने मन में एक तरह का अभिमान भर दिया और अकेले २ राज्य- स्थापन की महत्ता इसके आगे कितनी तुच्छ है—इसे उन्होंने अच्छी तरह समझ लिया।
जैसे २ गृहकलह की अग्नि बुझती गई, महाराष्ट्र उन्नति के शिखर पर चढ़ता गया। नाना फड़नवीस और उनके सहायकों न शासन, आय-व्यय और न्याय की ऐसी व्यवस्था की थी कि सारे भारतवर्ष में महाराष्ट्र तथा उसके अन्तर्गत प्रांतों का शासन ही सर्वोत्तम था। भूमि कर नियत करने और
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उसके वसूल करने की विधि, न्यायालयों में छोटे बड़े सबके साथ समान व्यवहार का समुचित प्रबन्ध; और इन सबके उपरान्त लोगों को यह अनुभव कराना कि उस महान कर्त्तव्य की पूर्ति, जिस के लिये उनके पिता-पिता- मह और देवताओं तक ने अपना रक्त बहाया था, कितनी आवश्यक है; और उनका संबन्ध एक ऐसी जाति से है जो हिन्दू-धर्मकी रक्षा और स्वा- धीनता के लिये अपने विशाल कन्धे पर एक महान राष्ट्र का वहन कर रही है—इन सब विचारों को लेकर कोई भी हिन्दू ऐसा न था जो ऐसे शुभ समय में पैदा होने में अपना अहोभाग्य न समझता हो। राष्ट्र का प्रत्येक व्यक्ति एक ऊंची भावना से प्रभावित हो रहा था। नित्य प्रति एक-न-एक विजय अथवा कोई अन्य शुभ समाचार पहुंचता ही रहता था। तुच्छ-से-तुच्छ मनुष्य भी इस देश के लिये यह अत्यन्त गौरव का समय समझता था, और उसके विचार में यह सारी उन्नति बालक पेशवा सवाई माधोराव के शुभ-ग्रह की कृपा का ही परिणाम थी। यह प्रसिद्ध जनश्रुति थी कि स्वयं पहले माधोराव पेशवा ने ही मुस्लिम तथा अन्य विदेशी अत्याचारियों को नष्ट करके आसमुद्र शक्तिशाली हिन्दू-साम्राज्य- स्थापन की इच्छा पूर्ण करने के लिये दूसरे माधोराव के रूप में जन्म ग्रहण किया है। यही कारण था कि जब से बालक पेशवा का जन्म हुआ, राष्ट्रीय झण्डे पर भाग्यदेवी की सदैव कृपा रहती थी। ऐसे प्रच- लित अन्धविश्वास भी कभी २ राष्ट्र की आत्मा के अस्पष्ट उद्गार होते हैं और राष्ट्रीय कार्यों एवं उसकी विजयों पर उनका प्रभाव भी कम नहीं पड़ता। सालबाई के सुलहनामे के पश्चात् ही नाना ने हैदरअली के उत्तरा- धिकारी और महाराष्ट्र के भयानक शत्रु टीपू को ठीक करने के लिये परशुराम भाऊ और पटवर्धन को आज्ञा दी। सन् १७८४ ई० में युद्ध के कारण उपस्थित होने लगे। टीपू ने नारगुन्द के हिन्दू-राज्य पर अत्या- चार करना प्रारम्भ कर दिया और राजा ने मरहठों से सहायता मांगी। पटवर्धन और होल्कर के सेनापतित्व में निज़ाम की सहायता से मरहठों
४. अटक से कटक तक साम्राज्य विस्तार व महादजी शिन्दे
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ने टीपू को हराया और उसे सन्धि करने पर विवश किया, जिसके अनुसार टीपू को चौथ का पिछला सारा बकाया चुकाना पड़ा और उसे नारगुन्द पर अत्याचार न करने की प्रतिज्ञा करनी पड़ी। किन्तु मरहठों के पीठ फेरते ही उसने सारी प्रतिज्ञा पर पानी फेर दिया। नारगुन्द का क़िला ले लिया और अपने पूर्वजों का अनुकरण करते हुए राजा तथा उनके समस्त परिवार को निर्दयतापूर्वक मरवा डाला और राजा की लड़की को अपने अन्तःपुर में ले गया। तत्पश्चात मानो स्वर्ग के समस्त सुखों पर एकाधिपत्य प्राप्त करने और पाक मौलवियों तथा मुसलिम इतिहास-लेखकों से दीनरक्षक, ग़ाज़ी, औरङ्गज़ेब और तिमूर इत्यादि महान् पदवियाँ पाने के लिये उसने कृष्णा और तुङ्गभद्रा के बीच की हिन्दू-जनता पर घोर पाशविक अत्याचार करने आरम्भ कर दिये। इसलाम मज़हब क़बूल कराने के लिये जितने प्रकार के कष्ट देते बन पड़े, टीपू ने एक को भी न छोड़ा; और धर्म-रक्षा में तत्पर मरहठों को मानों धत्ता बताने के लिये ही उसने बलपूर्वक हज़ारों मनुष्यों की सुन्नत करा डाली तथा उन पर हर प्रकार के पाशविक अत्याचारों का प्रयोग किया। हमें इस बात की ओर विशेष ध्यान देना चाहिये कि जो लोग मुसलमानों द्वारा युद्ध में मारे गये, यद्यपि उन्होंने अपने प्राण शिवाजी और श्री स्वामी समर्थ रामदास जी के उपदेशानुसार संगठित होकर लड़ते हुए समर्पण न किये थे तथापि यह तो अवश्य था कि इन लोगों ने अपमानित होने की अपेक्षा मृत्युमुख में जाना अधिक अच्छा समझा, क्योंकि एक दो नहीं बल्कि दो सहस्र से भी अधिक ब्राह्मणों ने, जिन्हें टीपू हठात् मुसलमान बनाना चाहता था, अपने धर्म से च्युत हो घृणा- स्पद बनने की अपेक्षा बलिदान हो जाने में गौरव समझ कर अपने को धर्म पर निछावर कर दिया। मरहठों के आन्दोलन से पहले ही धर्म पर बलिदान होना लोगों की प्रतिदिन की दिनचर्या थी, अर्थात् हिन्दुओं ने मुसलमानी धर्म ग्रहण करने की अपेक्षा शरीर त्याग कर देना उचित समझ रक्खा था। श्री स्वामी रामदास जी ने सह्याद्रि
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पर्वत की चोटी पर खड़े होकर उच्च स्वर से कहा कि ऐसा करना भूल है; क्योंकि यद्यपि यह बात सत्य है कि मुसलमान होने की अपेक्षा मर जाना अधिक श्रेयस्कर है तथापि इससे भी बढ़ कर यह बात श्रेयस्कर है कि हम लोग प्रयत्न करें कि हमें कोई मुसलमान न बना सके और न हम मारे जायं। हमें अत्याचार करने वाली शक्ति को ही नष्ट कर देना चाहिये। मर जाना अच्छा है, पर विधर्मियों को मारते हुए प्राण दे देना इस से भी श्रेष्ठ है। उनके सैकड़ों चेले इस सिद्धान्त को छिपे २ मठों में जा जा कर लोगों को समझाने लगे। घर २ में इसका प्रचार होने लगा और उन्होंने लोगों को समझाया कि केवल कांटों के छत्र की ही इच्छा मत रक्खो, बल्कि असली विजय के ताज के लिये भी उसके साथ ही प्रयत्न करते जाओ। इन सब बातों को जानते हुए भी टीपू सुल्तान ने औरङ्गजेब की भांति जबर्दस्ती हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का कार्य आरम्भ कर दिया जबकि महाराज शिवाजी के वंशज अभी तक पूना में राज्य कर रहे थे। सहस्रों ब्राह्मणों तथा आन्ध्र, करनाटक और तामिल प्रान्त के हिन्दुओं का करुण आर्तनाद पूना पहुँचा; उन लोगों ने मुसलमानों के हाथों से मुक्ति दिलाने के लिये मरहठों से प्रार्थना की। क्या ब्राह्मण-राज्य इस बात को सहन कर सकता था ? क्या मरहठों का हिन्दू-राज्य कृष्णा नदी के पार रहने वाले अपने धर्म-सब- न्धियों की इस दुर्दशा को सुनकर कभी चुप बैठा रह सकता था ? नहीं; यह सर्वथा असम्भव था। टीपू का ऐसा करना मरहठों को युद्ध के लिये ललकारना था; जिसे उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार कर लिया, और यद्यपि उनकी सेना उत्तरी भारतवर्ष में लड़ने में व्यस्त थी, तोभी नाना ने अपने सधर्मियों की सहायतार्थ तुरन्त ही कर्णाटक की ओर प्रयाण कर दिया। निज़ाम को भी उसने अपनी ओर इस शर्तपर मिला लिया कि टीपू के राज्य का जो भाग वे जीतेंगे, उसका तीसरा भाग उसको देंगे। इस के बाद उसने मरहठी सेना को अपनी सम्पूर्ण शक्ति से धर्मांध टीपू पर आक्रमण करने की आज्ञा दी, जिसके अनुसार पटवर्धन बेहरे तथा
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अन्य मरहठे सेनापतियों ने एकत्रित होकर अपनी सेना को १० करने तथा भागों में विभाजित कर दिया, तथा शत्रुके बदामी आदि किलों २७ देने अधिकार कर लिया और उन्हें इतना तंग कर दिया कि ये विवश हो गये के तथा उन बेचारों ने भागकर पर्वतों की खोहों में शरण ली; पर हिन्दू सेना ने उस मुसलिम धर्मवीर टीपू को, जिसने हिन्दू-स्त्रियों, बच्चों और शांतिप्रिय साधुओं को सताने तथा उनकी बालिकाओं को धर्मभ्रष्ट करने में भारी ख्याति प्राप्त करली थी, वहां पर भी सुखपूर्वक न रहने दिया। जब टीपू ने देखा कि एक शक्तिशाली हिन्दू राज्य उसका सत्यानास कर के संसार में कहीं भी उसे शान्तिपूर्वक नहीं रहने देता तो उसने सुलह की प्रार्थना की। यद्यपि सहस्रों हिन्दू और उनकी बालिकाओं ने धर्मरक्षा के लिये अपने प्राण निछावर कर दिये तथापि टीपू सुलतान की तलवार की धार मुड़ने की अपेक्षा और तेज होती गई, यहां तक कि विवश होकर उनके (हिन्दुओं के) धर्मरक्षक को उनकी सहायता के लिये सेना भेजनी पड़ी। इस प्रकार हर तरह से विवश होकर टीपू ने नारगुन्द, कित्तूर और बादामी की रियासतों को मरहठों के हवाले किया तथा बकाया लगान का तीस लाख रुपया भी उसी समय दे दिया और उसी वर्ष पन्द्रह लाख रुपया और देने की प्रतिज्ञा की। अगर चाहते तो मरहठे भी अपनी शक्ति के जोर से मुसलमानों को हिन्दू बना कर उन मौलवी-मौलानाओं को, जो टीपू की आज्ञानुसार हिन्दुओं पर भांति-भांति के अन्याय और अत्याचार कर उनकी शिखा कटवा रहे थे, शिखा धारण करने पर विवश करते, परन्तु उन्होंने न तो मस्जिदें गिरवायीं और न बलपूर्वक मुसलमान लड़कियों को उनके घरों से निकाला या अन्य धर्मावलम्बियों को संगीनों के जोर से हिन्दू-धर्म में लाने का प्रयत्न किया। ऐसी सभ्यता और वीरता के काम तो मरहठों की शक्ति से बाहर थे क्योंकि इन लोगों ने तैमूर, टीपू, अल्लाउद्दीन और औरङ्गजेब की तरह कुरान की शिक्षा न पाई थी, इसलिये
[ १७६ ] वे न्यायोचित सत्कार्यों के करने में भी धर्म की हानि समझते थे। धर्मान्धक मुसलमानों को छोड़कर ऐसे निष्ठुरता और अत्याचार के कामों को करने का भला कौन काफ़िर (हिन्दू) साहस कर सकता है ? दक्षिण के हिन्दुओं को दुराग्रही टीपू के क्रोध से मुक्त करने के बाद अपनी सम्पूर्ण सैनिक शक्ति को एकत्रित करके मरहठों ने उत्तर के शत्रुओं को दबाने का अवसर पाया, जिन्हें अकेले महादजी सींधिया ही अबतक रोके हुये थे। सालबाई के सुलहनामे के अनन्तर महादजी उत्तर को चले गए थे। उनके हृदय पर अग्रेज़ सेनापति के मातहत सुशिक्षित फौज का बड़ा प्रभाव था। उन्होंने भी पान पत के वीर सदाशिवराव भाऊ के उपाय को प्रयोग में लाने का निश्चय किया। सदाशिवराव ने ही सर्वप्रथम अपनी सेना को युरोपियनों की तरह बाक़ायद क़वायद और डिसिप्लन की शिक्षा दी थी-महादजी ने डा०बोइन नामक एक फ्रांसीसी जैनरल को रखकर एक विशाल सेना इस भांति सुसज्जित की जो किसी भी यूरोपियन सेना का भलीभांति सामना कर सकती थी इस प्रकार उन्होंने अपने आपको इस योग्य बना लिया कि उत्तर के सारे शत्रुओं को अपनी शर्तों पर संधि करने पर विवश किया। यद्यपि अंगरेज़ों ने यह प्रतिज्ञा की थी कि भारतवर्ष के बादशाह अर्थात् दिल्ली की राजनीति से उनका कोई सम्बन्ध न रहेगा और मरहठे जो चाहें कर सकेंगे, तो भी वे लोग असन्तोष फैलाते रहे और छिपे २ शाह आलम को अपने हाथ में रखने और उसे मरहठों के पास जाने से रोककर महादजी के रास्ते में रोड़े अटकाने से बाज़ न आये। यह सब कुछ होते हुये भी महादजी बादशाही राजनीति की बागडोर बड़ी मज़बूती के साथ अपने हाथों में पकड़े रहे। उन्होंने बादशाह को दिल्ली में लाकर वज़ीर की जगह के लिये मुसलमान प्रतिद्वं- द्वियों को हराया। मुसलमान और अङ्गरेज़ों को यह जानकर बहुत ही अधिक दुःख हुआ कि अन्त में बादशाह को महादजी को ही अपना