कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
वेद पशु
स्वाती शब्द कबीरका, सो हम पिया आघाय ।
मनकी प्यासा सब मिठी, दादू रहे समाय ॥
जैसे मिरगा^१^ नाद^२^ सुन, तन मन भूले प्रान ।
दादू भूले देह गुन, सुन कबीरको ज्ञान^३^ ॥
केवल नैन कबीरका, उज्ज्वल रूप अनूप ।
दादू अन्तर निर्मला, देखे सहज स्वरूप ॥
शोभा देखि कबीरकी, नैन रहे ललचाय ।
कहा कहूँ छवि रूपकी, दादू कही न जाय ॥
एकै रोम कबीरका, कोटिभानु^४^ छवि छाया ।
दादू^५^ कौतुक चन्द ते, शीतलता अधिकाय ॥
बन्दों चरनकबीरके, कोटि बार पल माँहि ।
दादू हवस मनमें रही, कोटिक रसना नाँहि ॥
कोटि कर्म पलमें कटें, नाम कबीर जो लेह ।
दादू सच्चे होत है, सुफल मनोरथ देह ॥
परमारथके कारनै, आप स्वार्थी नाहि ।
कबीर आए भगति लै, दादू भवजल माहि ॥
भगति करै संसारमें, युग युग नाम धराय ।
दादू तारन जीवको, काशी प्रगटै आय ॥
बहुत जीव अटके^६^ रहे, विन सद्गुरु भव माहि ।
दादू नाम कबीर विन, छूटे एकौ नाहि ॥
सद्गुरु बहियाँ जीवको, मंशधार भवसिन्ध ।
दादू नाम कबीरका, छोड़ आवे भवफंद ॥
साचा शब्द कबीरका, मीठा लागै मोय ।
दादू सन्ता परम सुख, कीता^७^ आनंद होय ॥
साचा शब्द कबीरका, सब सुखदाई सोय ।
दादू गुरु परतापते, कीता भरोसा होय ॥
साचा शब्द कबीरका, सन्त सुना चित लाय ।
दादू भ्रम सब मिटगया, कर्मकाल नहि खाय ॥
साचा शब्द कबीरका, सबका होय सहाय^८^ ।
रोग दुःख तरे ताप सब, दादू दूर पराय^९^ ॥
त्रिया पशु
साचा शब्द कबीरका, तोल, मोलमें नौहिं ।
दाढ़ दूसर ना मिलै, जो खोजे' घट' माँहिं ॥
साचा शब्द कबीरका, युग युग अटल अभूल ।
दाढ़ पावै पारखू', परम पुरुष निजमूल ॥
गरीबदासजीकी साखियाँ
गरीब- नमो नमो सत्पुरुषको, नमस्कार गुरु कीन ।
सुरनर मुनि जन साधुवा, सन्तों सर्वश' दीन ॥
गरीब, पुर पठन सतलोक है, "अदली सद्गुरुसार ।
भगति हेत सो ऊतरे, पाया हम दीदार ॥
गरीब, ऐसा सद्गुरु हमे मिला, सुन्न विदेशी आप ।
रोम रोम परकाशहै, दीना अजपा' जाप ॥
गरीब, ऐसा सद्गुरु हमे मिला सुरत'सिन्धुके सैन ।
उर' अन्तर परकाशिया', जअव सुनाए वैन' ॥
गरीब, ऐसा सद्गुरु हमे मिला, सुरतसिन्धुके नाल' ।
गौन' किया सतलोकसे, अनलपंखकी चाल ॥
गरीब, ऐसा सद्गुरु हमे मिला, सुरतसिन्धुके तीर ।
सब संतन "शिरताज है, सद्गुरु, अटल कबीर ॥
गरीब, ऐसा सद्गुरु हमें मिला, वेपरवाह अबंध' ।
परम हंस पुरन पुरुष, रोम रोम रविचंद ॥
गरीब, ऐसा सद्गुरु हमें मिला है जिन्द ' जगदीश ॥
सुन्न विदेशी मिल गया छत्र मुकुट है शीश ॥
गरीब, जिन्दा जोगी जगत गुरु, मालिक मुरशिद पीव ।
कालकर्म लागै नहीं, "सनका नाही शीव ॥
गरोब जिन्दा जोगी जगत गुरु मालिक मुरशिद पीव ।
दोहूं' झगरा पड़ा, पाया नहीं शरीर ॥
गरीब, ऐसा सद्गुरु हमें मिला, तेज पुञ्जको अङ्ग ।
झिलमिल नूर जहूर है, रूप रेख नहिं रङ्ग ॥
१ ढूँढे, २ दिलमें ३ पारखी, ४ सब कुछ, ५ कबीर, ६ दर्शन, ७ शवासपर होने वाला हंस
सोहम् आदि स्वाभाविक जप, ८ स्मृति, ९ हृदय, १० प्रकाश ११ वाणी, १२ ऊपर,
१३ गमन, १४ श्रेष्ठ, १५ वन्धनरहित, १६ नदीमें नानकदेवजीको दर्शन देनेवाला, १७ डर,
१८ हिन्दू मुसलमान दोनोंमें ।
उद्धारकी दवा
गरीव, ऐसा सद्गुरु हमें मिला, खोले वज्रकपाट ।
अगम भूमिकी गम करे, उतरे औघट घाट ॥
गरीव, सद्गुरु मारचो वान कसि, महवर गाँसी खींच ।
कर्म भरम सब हीनसे, ज्ञानीको ब्रूधि सब एँच ॥
गरीव, सद्गुरु आय दया करि, ऐसे दीन दयाल ।
बन्दीछोर विरद किया, जठराग्नी प्रतिपाल ॥
गरीव, यम जोरा, जासे डरे, धरमराय धर धीर ।
ऐसा सद्गुरु एक है, अदली अदल कवीर ॥
गरीव यम जोरा जास डरे, मिटे करमको रेख ।
अदली अदल कवीर है, कुलका सद्गुरु एक ॥
गरीव, ऐसा सद्गुरु हम मिला, भवसागरके बीच ।
खेवट सबको खेवता, क्या उत्तम क्या नीच ॥
गरीव, मायाको रस पीयके, डूब गए दो दीन ॥
ऐसा सद्गुरु हम मिला, ज्ञान योग परवीन ॥
गरीव, साहबसे सद्गुरु भये, सद्गुरुसे भय साध ।
ये तीनों एक अङ्ग हैं, गति कुछ अगम अगाध ॥
गरीव, अंधे गूंगे गुरु घने, लोभी लँगड़े लाख ॥
साहबसे परिचय नहीं, काहि बनवावैं साख ॥
गरीव, ऐसा सद्गुरु सेविये, शब्द समाना होय ।
भौसागरमें डूवते, पार लँघावैं सोय ॥
गरीव, सद्गुरु पूरण ब्रह्म हैं, सद्गुरु आप अलेख ।
सद्गुरु रमता राम हैं, यामें मीन न मेख ॥
गरीव बङ्कनालके अन्तरै, तिरवेणीके तीर ।
जहाँ हमें सद्गुरु लेगया, बन्दी छोड़ कवीर ॥
गरीव, शून्यमण्डल अनुराग है, शून्यमण्डल रह थीर ।
दाम गरीव उधारिया, वंदीछोड़ कवीर ॥
गरीव, या मुखते मुख सगुण, ब्रह्म शब्दके माँहि ।
सद्गुरु मिले कवीरसे सतलोकलें जाँहि ॥
गरीव, जैसे ब्रादल गगनमें, चलतें हैं बिन पाँय ।
ऐसे पुरुष कबीर हैं, शून्यमें रहे समय ॥
गरीब, गगनमण्डलसे ऊतरे, साहब पुरुष कबीर ।
चोला धरा खवासका, तोड़े यम जञ्जीर ॥
गरीब, आदौ आदि कबीर हैं, चौदह भुवन विशाल ।
हीरे मोती बहुत हैं, कबीर लालनके लाल ॥
गरीब, ऐसा निर्मल ज्ञान है निर्मल करे शरीर ।
और ज्ञान मण्डल सबै, चक्के ज्ञान कबीर ॥
चौपाई— दास गरीब कबीर को चेरा । सत्य लोक अमरपुर डेरा ॥
अमृत पान अमिय रस चोखा । पीवे हंसा नाही धोखा ॥
पर प्रकट हो कि, समस्त सिद्ध साधु ऋषि मुनि पीर पैगम्बर जिस किसी सत्यगुरुको पहचाना उसकी श्रेष्ठताको जाना, वो मृत्युजित् हो गया । तीनों कालके औलिया अम्बिया साधु ऋषि मुनि बराबर इसी प्रकार उसकी प्रशंसा करते चले आते हैं । भली भाँति जाँच करते और पवित्र पुस्तकों तथा हदीसों इत्यादिसे मालूम हो जावेगा । चारों वेद पुराण आदि सब सत्यगुरुकी प्रशंसा किया करते हैं । कबीर साहबके भिन्न भिन्न नामोंसे सब ग्रंथों तथा पुस्तकोंमें उसकी प्रशंसा लिखी हुई है । जो सत्यगुरुका हंस अड़कुरी जीव होगा सो तुरन्त इस सत्यगुरुको पहचान लेगा तनिक विलम्ब न लगेगा, कोई सन्त जौहरीही मणिकी पहचानमें होता है । घेदों और पुस्तकोंमें कबीर साहबकी प्रशंसा तो अनेक स्थानोंमें लिखी देखते हैं । कोई पण्डित पढ़कर सोचता हुआ अर्थ लगाता है कि, कबीर नाम रामचन्द्रका है । कोई कहा है कि, कबीर नाम विष्णु किम्बा राम चन्द्रका है । पण्डितोंमेंसे कोई यों कहता है कि, इन महाशयोंमें कोई कबीरके नामके योग्य नहीं दिखाई देता; पर शून्य चैतन जो ब्रह्म है उसको कबीर कहते हैं । अब विचारना उचित है कि, यदि चैतन्य ब्रह्म उस सर्वशक्तिमान् जगदीश्वरका नाम है तो वह कौन है कौन गुरु उससे मिलता है, कौन शास्त्र उससे संयुक्त होनेका पथ दिखाता है ? यदि उसको निर्गुण निराकार ठहराते कि, जिसके श्वाससे चारों वेद निकले तो यह बात भी नहीं दीखती सो कि, वेदकी आज्ञाएँ, स्पष्ट प्रकट करती है कि, वह पुण्यात्मा परमेश्वर जिसकी, आज्ञाएँ नितान्तही स्वच्छ तथा निर्दोष होनी चाहिँएँ वह कलुषित कार्योंके करनेकी आज्ञा कदापि नहीं देगा । वह किसीको धोखा तथा दगा नहीं देता । किसीसे मैत्री वर नहीं रखता । इस प्रकारके कार्य तो मायाके हैं । शुद्ध ब्रह्म कदापि ये काम नहीं
करता, वह सब दोषोंसे विशुद्ध है उसका नाम कबीर है, दूसरेका नहीं हो सकता । यदि वह कबीर रामचन्द्रका नाम होता तो रामचन्द्रका उपासना करनेवाले कबीरका नाम जपते । यदि वह शुद्ध ब्रह्म कृष्ण अथवा विष्णु होता तो विष्णुके उपासकोंमेंसे कोई कदापि कबीरका नाम लेते । यदि कबीर नाम निर्गुण ब्रह्मका होता तो योगी लोग कभी कबीरका नाम लेते । इसी प्रकार प्रत्येक धर्मावलम्बियोंसे भली-भाँति जाँच कर लेना चाहिये कि, शुद्ध ब्रह्मका नाम कबीर है क्या इस ब्रह्मकी उपासना कौन लोग करते हैं ? जिस धर्मका मनुष्य उस कबीरका नाम लेता है, उसकी चाल चलन कैसी है ? हों वास्तवमें जो उस शुद्ध ब्रह्म कबीरका नाम लेता है उसके समस्त कार्य विशुद्ध हो जावेंगे कुछ दोष तथा भ्रष्टता न रहती । प्रत्यक्ष प्रगट है कि, उस शुद्ध ब्रह्म कबीरके उपासक केवल कबीरपंथी है दूसरा कोई नहीं, वही विद्वान वही सुविज्ञ तथा बुद्धिमान् और बहुत तात्त्विक है जो इस सत्यगुरुको पहचानकर कालपुरुषके धोखे तथा धूर्ततासे दूर भागे, फिर उधर कभी दृष्टि न करे शुद्ध ब्रह्म, कबीरका चरण दृढ़ताके साथ पकड़े फिर कभी न छोड़े । जिस किसीने इस सत्यगुरुको पहचान लिया फिर भी उसके शरणमें नहीं आया तो उसके दुर्भाग्यने उसको दूर कर दिया । उसका कोई वश नहीं, ऐसा समझना चाहिये । जितने नाम सत्यपुरुषके हैं उन सब नामोंसे कालपुरुषने आपको प्रकट किया वही नाम अपना रक्खा, सत्यपुरुषका नाम छिपाया, सत्यपुरुषकी भक्ति तथा मुक्तिकी राह रोक ली । समस्त मनुष्योंको अपनी भक्तिमें लगाया, वेद तथा उसकी आज्ञाओंमें फँसा लिया । सत्यपुरुषका पथ किसीसे पहचाना नहीं जाता । वे नहीं जान सकते कि, कालपुरुषका पंथ किसीसे पहचाना नहीं जाता । वे नहीं जान सकते कि, कालपुरुष कौन है, सत्यपुरुष कौन है ? दिनरात वेद पुस्तक पढ़ा करते हैं कभी किसीका स्वच्छ हृदय नहीं हुआ है, दिन प्रतिदिन बरबादी और हैरानी होती है, सबके सब अन्धकारमें चले जाते हैं । समस्त ऋषि मुनि स्वसंवेदकी बराबर प्रशंसा करते चले आते हैं पर स्वसंवेदके पहचाननेवाले लोग बहुत थोड़े हैं, बहुत कम आदमी इस पर चलते हैं । इसे बिना पढ़े किसीको सुख नहीं मिलेगा । कोई वेद अथवा पुस्तक पढ़ो पर स्वसंवेदके पाठसे ही हृदयका संतोष होगा, बिना इसके कालपुरुष तथा सत्यपुरुषकी तनिक भी भिन्नता न मालूम होगी । उन्हींका हृदय तथा मस्तक प्रकाशित होता है जो स्वसंवेदकी आज्ञाओंपर चलते हैं, उसको पढ़कर भलीभाँति सोचते समझते हैं । वेही बुद्धिमान् दूरदर्शी मनुष्य हैं जो कालकी दुष्टता और जालसाजियोंको जानकर उससे दूर भागते हैं वेही लोग
महम्मद साहबकी मांग भृंगीकीटका दूष्णंतकी कविता
सच्चे मनुष्य हैं जिनमें बुद्धि है, जिनमें बुद्धि नहीं वे सब मनुष्यत्वसे परे हैं वे सब पूरे पशु समझे जाते हैं। इन्हीको डांगर ढोर कोड़े मकोड़े इत्यादि कहा गया है—
तमीजो अकल वनइसां अताय खुदावन्दी ।
वशकल आदम अलीं खुवासतो नरिन्दी ॥
बरुं खलोकु दरुं देख उसकी नीयत क्या ।
अगर तमीज नहीं फिर तो आदमियत क्या ॥
यह मनुष्य ज्ञानअन्ध हो एक ओरसे भागकर दूसरी ओर जाता है जिसमें कि, उसको सुख तथा आराम मिले, जब उधर भागकर जाता है तो देखता है कि, वही आग जिसमें पहले जल रहा था, वही उधर भी दिखाई देती है। यहाँ तक दशोंदिशा है यह दौड़ता फिरता है। जिधर जाता है उधर वही आग वही शूली और वही कसाई छूरी लिये गला काटनेको उपस्थित है, जब वह दूढ़ते दूढ़ते थक जाता है तब कहीं पड़कर आँख बंदकर बैठ रहता है, अपने मनमें सोचता है कि, अब मैं किधर भाग कर जाऊँ? कहीं पता ठिकाना नहीं लगता न कोई सत्य तथा सन्तोषका उपाय ही दिखाई देता है? इसी प्रकार षट्दर्शनके लोग, एक मतको छोड़ कर दूसरे मतको पसंद करते हैं। वही अग्नि उधर भी देखते हैं। हिन्दुओं तथा सैकड़ोंही पंथके लोगोंकी यही दशा है। कितने लोग हिन्दू धर्म छोड़कर मुसलमान तथा ईसाई आदि हो जाते हैं जब उधरका वृत्तान्त भलीभाँति मालूम हो जाता हो तो उनके अग्निस्वरूप दिखाई देता है। फिर क्या करें कोई वश नहीं रहा। जिस किसी भाग्यवान्को पारखगुरु मिलजाता है वो उसकी शिक्षा स्वीकार करता है तो सुख पाता है; इसी प्रकार इन तीनों लोकोंके समस्त जीव कालपुरुषकी अग्निमें जल रहे हैं वह सबको भून भूनकर खाया करता है। उसके धोखे दगाओंसे कोई किसी प्रकार भी नहीं बच सकता।
सारे स्वसंवेद का यह कथन है कि, सत्यपुरुषने कालपुरुषको तीनों लोकका राज्य प्रदान किया है यह अपने पूजा पाठसे बड़ाही बलिष्ठ हो गया है यहाँ तक कि, जब कबीर साहबके हंस पृथ्वीपर देह धरते हैं मनुष्योंको मुक्ति-प्रदानार्थ उनका पृथ्वीपर अवतार होता है तो कालपुरुष उनको धोका तथा दगा देता है। जब वे धोखेमें पड़ जाते हैं, तब स्वयम् कबीर साहब शरीर धारण करके इनको मुक्त कराकर कालकी पहुँचसे बाहर खींचकर सत्यस्वरूपी देह प्रदान करते हैं जिससे कालपुरुषका कोई वश नहीं चल सकता है। वे लोग सत्य-
पुरुषकी भक्तिके प्रचार संसारमें करते हैं । जो शिक्षा स्वयम् कबीर साहबकी है वही शिक्षा उनके हंसोंकी भी है ।
वेदोंसे तो भलीभाँति प्रमाणित हो चुका कि, संस्कृत भाषामें किसको कबीर कहते हैं ? वह अद्वितीय तथा बेजोड़ है ।
अब मैं कबीरशब्दके माअनी अरबीमें प्रगट करता हूँ—कबीर किन्निया कुबरा अकबर एकही बात है । कबीर उसे कहते हैं जिसमें किन्न, (गौख) हो उसका किन्न सदैव एक रस रहे न कभी घटे एवं न बढ़े । कबीर साहबने स्वसंबेदमें ऐसीही आज्ञा की है कि केवल मैंही एक कबीर हूँ दूसरा कोई नहीं हो सकता जिस किसी दूसरेमें किन्न होवेगा उसका शिर मैं तोड़ूंगा । अतः तीनों लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ निरञ्जन है । जब उनके मनमें किन्नसमाया कबीर साहबसे सामना करनेके निमित्त प्रतुस्त हुआ तब कबीर साहबने एकही ऐसी चोट लगाई जिससे वे झोंझरी द्वीपको छोड़कर पातालको भाग गए । फिर दूसरा किन्न आदि भवानीमें पाया गया । तब कबीर साहबने उनको ऐसा ललकारा कि चरणों पर गिर पड़ी । फिर ब्रह्मा यम और शिवका किन्न (घमण्ड) दूर किया रामचन्द्रने जब राजा रावणको विजय किया तब उनमें कुन्न समाया अपनी भुजा पुजवाने लगे तब उनका भी कुन्न जाता रहा । कृष्णचन्द्रका किन्न नौसाल जरासिंधकी लड़ाईमें दूर हो गया । ऐसाही हिरण्यकशिपु, रावण, कंस, नमरुद, शदाद, फिरञ्जन इत्यादिका कुन्न दूर हो गया, किसीका न रहा । जिस किसीमें तनिक भी कुन्न होगा उसका छुटकारा कभी न होगा । निश्चय उसका शिर टूटेगा । केवल कबीरही कबीर है, दूसरा कोई कदापि नहीं हो सकता । इसीका कुन्न सदैव समान रहता है दूसरे किसीका नहीं । इस संसारमें जितनी सृष्टि है सब कबीर है । कुन्नसे खाली कोई नहीं, जिसपर वह सत्यगुरु दयालु हो वही कुन्नसे खाली हो सकता है । जिसको वह कुन्नसे खाली करता है उसको वह अपने तेजसे भर देता है । इस कारण किन्न उसीके योग्य है दूसरेके नहीं ; क्योंकि, कुन्नहीसे इस संसारका खेल खुल रहा है । इस कबीरके गुणकी तीनों कालके सिद्ध साधु और ऋषि मुनि इत्यादि बराबर बढ़ाई और प्रशंसा करते आए हैं । कोई कोई उनकी कृपासे उसको पहचान सकता है, उसकी प्रशंसा तो केवल वह स्वयम्ही जानता है, मैं तुच्छ दुर्बुद्धि मनुष्य क्या लिख सकूँ एवं क्या कह सकूँगा ? यदि मेरी अनगिनती जिह्वाएँ होतीं तो कुछ कह सकता । अतः मेरे निमित्त इतनाही यथेष्ट है कि इस विशुद्ध जगदीश्वरके चरणोंपर गिर अपने अपराधोंके निमित्त क्षमाप्रार्थी हो जाऊँ ।
मनुष्यताका उपदेश
गजल—ऐरूप शब्द अबद बः तकवीर । कौनेन तु नुक्तः एक तफ़सीर ॥
शरमिन्दः सरेम दर गरेवाँ । तरादामन तर बतर बतकसीर ॥
मामूरहूं सर बसर व असियाँ । तरसाँ हूं जे मालिकाने तहरीर ॥
रख अपने शरण चरणके नजदीक । कर चाक तु फ़ेल नामे तकदीर ॥
अफज्रू जे अदद मेरे गुनाहों । दे वख्श बफजल कर न ताखीर ॥
म निगर फेलम ब रह्य ब निगर । कर नेक नजर ब बन्दए पीर ॥
अज विसविसए जे नफ़स शैतों । रख अपने पनः गुनह बताफीर ॥
बस मेरी नजुस्तजू अवस है । मल्लाह मेरे जहाज़ कर तीर ॥
ले देख बचशम चार गुलाखार । वख्शिन्दः है सत्रका सत्य कबीर ॥
तुझ विन न किसीका है ठिकाना । करे कोई अमल हज़ार तदवीर ॥
हरशै भरी साई की लहर है । सब मुरदः हुए ज़हर की तासीर ॥
मैं मुरदा जला पिला पेयाला । भर दीजे अपनी अब शकर शीर ॥
है लोक व वेदमें खबर जो । सो कालपुरुष की सारी जागीर ॥
सब हस्त रसी उनसे जबरदस्त । दिल खौफोखतरसे उसके दिलगीर ॥
तन तेरे कदम पड़ा फ़िरोतन । आजिज को न छोड़ ऐ खबरगीर ॥
अध्याय १४.
कबीर साहिबके शिष्यजन
कबीर साहिबके शिष्योंको हंस कहते हैं । क्योंकि, हंसका नियम है कि, वो जल तथा दुग्धको पृथक् पृथक् कर देता है, दूधको पी जाता है, जलको छोड़ देता है । उसमें और भी अनेक गुण हैं । ऐसेही हंस कबीर हैं कि, यह जगत् जो मिथ्या तथा सत्यसे मिला हुआ है वे अपनी बुद्धि एवं ज्ञानसे पहचानकर मिथ्याको छोड़ देते हैं, सत्यको ग्रहण कर लेते हैं । हंस तथा बकुले इस संसारमें एक साथ घूमते फिरते हैं दोनों बुद्धि तथा ज्ञानसे पहचाने जाते हैं । इसी विषय पर कबीर साहिबने एक साखी कही है—
कबीर, हंसा 'बक' लखे एक सँग, चरै हरि'अरे ताल' ।
हंस क्षीरते 'जानिये, बक 'उधरें तेहि काल ॥
जिनको सत्यगुरुका पूरा पता लग चुका है वो कदापि वासना बन्धनमें नहीं फँसते, उनका आवागमन नहीं होता, उनको तनिक भी कालका भय नहीं ।
१ बगुला, २ देखे, ३ कमलोंके सर सज, ४ तालाब, ५ पानीसे दूधके अलग करनेपर,
६ मालूम हो ।
एक हंस कबीर परमेश्वरका पूजन जानते हैं अन्य किसीको सुध नहीं है । कबीर साहबके हंस दो प्रकारके हैं—एक तो वे लोग हैं, जो सत्यलोकमें हंस आनन्दमग्न हो रहे हैं । दूसरे वे जो लोमश ऋषि तथा कागभुशुण्ड इत्यादिके सदृश हैं जो सदैव संसारमें रहकर संसारके हेरफेरको देखा करते हैं । पर संसारकी कामनाओंसे पृथक् हैं । सांसारिक आनन्दोंकी कांक्षाओंका प्रभाव उनपर तनिक भी नहीं होता । जैसे जलमें कमल रहता है पर उस पर जल असर नहीं करता, ऐसेही हंस कबीर सदैव स्वच्छ निर्विकार रहते हैं । हंस कबीरोंका शरीर पक्के तत्त्वका है । इस कारण उनका कभी भी आवागमन नहीं होता । इसी विषय पर कबीर साहिबने कहा है कि—
शब्द—हंस उड़े बक बैठे आई । रैन गई दिन हूँ चल जाई ।
काचे करवे टिकै न पानी । हंस उड़े काया कुम्हलानी ॥
हंस सत्यलोक चला जाता है, बगुला संसारी यहीं रह जाता है । क्योंकि कच्चे करुएमें पानी नहीं टिकता, हंस उड़ जाता है, शरीर यहीं रह जाता है ।
लोमश ऋषि ।
लोमश ऋषि भी कबीर हंस हैं । सहस्रों बेर ब्रह्मा विष्णु और शिवका जन्म मरण होता है, सहस्रों बेर उत्पत्ति स्थित तथा विनाश हुआ करता है पर आप सदैव एकही तरह रहते हैं । आपका जन्म मरण कभी नहीं होता, आप सदैव आनन्दसे रहते हैं, आपको कभी किसी प्रकारका कष्ट नहीं होता है । जब अग्निकी वर्षा होती है, तब आप अग्निस्वरूप हो जाते हैं । जब वायु अधिक हो जाती है, तब वायुस्वरूप हो जाते हैं । जब जल अधिक होता है, तब आप जल बन कर जलपर तैरते फिरते हैं । ये लोमश ऋषि बड़े प्रसिद्ध हैं । आप सदैव पृथ्वी पर रहते हैं । प्रायः लोग आपको जानते हैं । जब यह जगत् शून्यमें समा जाता है, सब कुछ शून्य हो जाता है तब आप शून्यस्वरूप होकर शून्यमें समा जाते हैं । जब सृष्टिकी उत्पत्ति होती है तब फिर आप पृथ्वीपर आ विराजते हैं । आप सदैव संसारकी सैर किया करते हैं । जब जब कबीर साहब पृथ्वीपर प्रगट होते हैं, तब तब आप सत्यगुरुके चरण चूमते हैं । जब आप प्रगट होकर घूमा करते हैं, तब सब कोई आपका दर्शन कर सकते हैं । जब आप छिप रहते हैं, तब आपका दर्शन दुर्लभ हो जाता है । कभी कभी अजनबीके सदृश कहीं कहीं प्रगट होते हैं और छिप जाते हैं । इस कलियुगमें ऐसे ऋषि मुनि अब छिप रहे हैं । क्योंकि यह समयही बड़ा पापिष्ट है । संस्कृत भाषामें लोम नाम बालका है । महाप्रलयमें एकही लोम इनका गिरता है इस कारण आपका नाम लोमश ऋषि है । (मैंने
सुना था कि, दक्षिणदेशकी किसी वस्तीमें बड़ाही तेजमय एक ऋषि प्रगट हुवा था। कुछ कालपर्यन्त लोगोंको दिखाई दिया फिर अन्तर्धान हो गया। इस ऋषिके शरीरपर बड़े बड़े बाल थे।)
कुष्ठम् ऋषि ।
कुष्ठम् ऋषि अन्तरिक्षमें रहते हैं, आपका वृत्तान्त कबीर साहबके ग्रंथ अम्बुसागर चतुर्थ तरंगमें इस प्रकार लिखा है कि, जलरङ्गजी और कबीर साहबकी पातालमें वार्तालाप हो रही थी जिस युगमें यह बातचीत हुई इस युगका नाम पुरमन युग है, पचास लाख वर्षकी इस युगकी उमर थी। तब कबीर साहबने कहा कि, अन्तरिक्षद्वीपमें एक ऐसा पक्षी रहता है कि, सहस्रों-उत्पत्ति स्थित और विनाश हुआ करता है कुष्ठ पक्षी सदैव समान भावसे रहता है उसको किसी प्रकारका कष्ट नहीं पहुँचता। वह पक्षी बड़ाही तपस्वी तथा साधु है। वह पक्षी बड़ा तेजस्वी है। कहा है कि, समस्त सृष्टिका कौतुक महा-प्रलयके समय कुष्ठमजीके मुहमें समा जाता है। यह कुष्ठम ऋषि हंस कबीर है। सत्यगुरुकी आज्ञासे किसी प्रकार मुंह फेरा इस कारणही उनकी सूरत पक्षीकी हो गई। कबीर साहबद्वारा कुष्ठम ऋषिकी बड़ाई तथा श्रेष्ठता सुनकर जलरङ्गजी आदि अनेक हंसोंके मनमें प्रबल कामना हुई कि, कुष्ठमजीका दर्शन करें। सबोंने कबीर साहबसे निवेदन किया। कबीर साहबने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और सब हंसोंको जलरङ्गजी सहित लेकर चले। उसी प्रकरण में अम्बुसागरसे यहाँ उद्धृत करते हैं -
जलरंग वचन ।
चौ० -कह जलरङ्ग सुनो मम बानी । पक्षी दर्शन सुरत समानी ॥
अब तुम मोहि सङ्गले जाई । पक्षी मो कहैं देहु देखाई ॥
तब जलरंग भेज शठहारा । चलो हंस सब संग हमारा ॥
ज्ञानी वचन ।
यह सुन ज्ञानी वचन उचारा । शब्द विमान होहु असवारा ॥
उभय विमान चढे मिल ओई । चले विनोद हंस सँग सोई ॥
ज्ञानी अंश चले सब आगे । और जलरङ्ग सङ्ग सब लागे ॥
छिन्नमें गए पंछीके पासा । लोक निरन्तर जहाँ निवासा ॥
द्वै अंश तहाँ ठाढ रहाये । पक्षीको तब खबर जनाये ॥
पंछी बैठे आसन मारी । युग पचासकी लागी तारी ॥
निर्बुद्धिताके अंगकी साखियां
गण वचन ।
शब्दके गुण दीन जगाई । खुलगई तारी देखन लाई ॥
तब गण अस्तुति बिनने लीना । बारबार दंडवत सो कीना ॥
ज्ञानी अंश पुरुषके आगर । अरु जलसङ्गसाथ तेहि नागर ॥
कोटिन हंस संग तिन लाए । पुरी तुम्हार ठाढ़ भय आए ॥
कुण्टम् वचन ।
ज्ञानी जलरैगहि लेओ बुलाई । तिनके सङ्ग और नहिं आई ॥
गण वचन ।
दोनों हंस सुनो मतिवाना । पंछी वचन सुनहु परमाना ॥
सेना सकल छोड़ तुम देहू । द्वै अंश दर्शन तब लेहू ॥
उभय अंश पहुँचे तब जाई । पंछी दर्शन तत्छिन जाई ॥
आदर बहुत भौति तिन कीन्हा । सिंहासन रचि बैठक दीन्हा ॥
दृष्टि पसार देख्यो जलरङ्गा । बहुत ज्योति छीके अङ्गा ॥
देखि देह शोभा अधिकाई । रवि शशि कोटिन राम लजाई ॥
कुण्टम् वचन ।
पंछी कहै सुनो हो ज्ञानी । केहि कारण तुम इहवा आनी ॥
तुम तो अंश पुरुषके आगर । केहि कारण पगधारैउ नागर ॥
बडे भाग हम दर्शन पावा । अति आनन्द मोहिंचित आवा ॥
हम पंछी सुमति नहिं जाना । तब कीरति प्रभु आदि पुराना ॥
तुम्हरी सुद्धि न कोई पाई । कीन किरतारथ मन्दिर आई ॥
जलरङ्ग वचन ।
तब जलरङ्ग बूझ चित लाई । केतिकयुग इहवों भए भाई ॥
ऐते संशय हम चित लाओ । सत्य वचन मोहिं भाष सुनाओ ॥
आदि अन्त तुम जानो बाता । मोसे भाष कहो विख्याता ॥
महापुरुष परलय जब कीना । कौन अधार कहाँ तुम लीना ॥
उलड पलट नभ धरनी जाई । तब सब जीव कहाँ ठहराई ॥
कुण्टम् वचन ।
सुन जलरङ्ग वचन हम भाखौं । युगकी कथा गोई नहिं राखौं ॥
महाप्रलय होवै जेहि बारा । तीनों लोक होहिं जरि छारा ॥
पृथ्वी जरि होवे भर पानी । स्वर्ग पताल जलाहल आनी ॥
दश योजनलों उठे तरङ्गा । महाप्रलय होवे जिव भङ्गा ॥
तीन लोक जब परलय कीन्हा । हम तब जलमें पग नहिं दीन्हा ॥
जैसे फेन जलहि उतराना । ऐसे बैठि पुरुष धर ध्याना ॥
उतपति परलय भाष सुनाई । हम कबीरके अंश कहाई ॥
साखी- जब पक्षी मुख बोलिया, अचरज भया प्रसंग ।
कोट रूप लखि आपनो, दृष्टि देख जलरङ्ग ॥
चौ०- कला देखि चक्रित तब भयऊ । मनको गर्व टूट सब गयऊ ॥
तब कबीर निरखै चितलाई । कौतुक लखि जलरङ्ग जनाई ॥
जलरङ्ग बचन ।
लीला देखि शीश धरदीना । तब कबीरकी अस्तुति कीना ॥
देही धरि हम रहे भुलाना । सत्य पुरुष हम तुमहिं न जाना ॥
आदि अन्त तुम पुरुष हमारा । अस्तुतिकर जलरङ्ग अपारा ॥
हम अपने मनमें बड होई । नाम कबीर पुरुष है सोई ॥
यह कौतुक हम देखा जाना । तुमही पुरुष और नहिं आना ॥
हंस वचन ।
अस्तुति करत हंस सब ठाडे । कौतुक देखि हर्ष चित बाढे ॥
धन्य धन्य तुम आदि गोसाई । पंछी देखि कहो किमिपाई ॥
यही वचन तुम कहो विचारा । तब तुम कर्ता सर्जनहारा ॥
कुष्ठम् वचन ।
पंछी कहै सुनो हो भाई । पूरब कथा कहूं समझाई ॥
हम कबीर आज्ञा नहिं कीन्हा । ताते पंछी तनु धरलीन्हा ॥
देह धरे भा युग दश लाखा । सत्य वचन हम तुमते भाखा ॥
सहस सताइस परलैंकीता । हम आगे इतना युग बीता ॥
हो जलरङ्ग कहाँ लगि कहूं । शून्य असंख्य दीपमें रहूं ॥
वहाँ बैठि परलय हम देखा । बूढे सब जीव परलैं पेखा ॥
पुरमनि युगकी कथा सुनाई । देखि हंस हरष मन आई ॥
हीरा यान जलरंगहि दीन्हा । कुष्ठम दरश जोहि दिन कीन्हा ॥
हिल मिल भेद एक करजाना । तीनों अंश बहुत सुखमाना ॥
अब पंछी को नाम सुनाऊ । सात नाम मैं प्रकट बताऊं ॥
साखी- जीवसागर आनन्द सुख; हंस उबारण धाम ।
परलय देखे विविधविधि, दायर कुष्ठम नाम ॥
जलरङ्ग वचन ।
चौ०—जलरंग पायो हीरा पाना । संशय गत हर्षित मन आना ॥
तुम लीला स्वामी अवगाहा । अंश हंस नहीं पावैं थाहा ॥
छन्द—तव चरित अगम अपार पावन लिखि न काहूको पन्यो ।
मम चित्त गर्व घटावनो वे गुण देह पंछीको धन्यो ॥
तुम कला जान परी न हमको धरयो अमित स्वरूप हो ।
वहां पुरुष यहां अंशहौ हमजान हसन भूप हो ॥
सोरठा—चरणकमल बलिहार, कीह दंडवत विनय करि ॥
हरषित भये अपार, रङ्ग महानिधि जिमि लह्यो ॥
चौ०—हंस खडे सब पौरि द्वारा । तिन सबही मिलि विनती धारा ॥
कारण कवन दरश नहीं पाये । तुम हंसन नायक प्रभु आये ॥
गए सठिहार हंस लै आवा । तब पीछेको दरश करावा ॥
देखि रूप अति हरष समाना । तब ज्ञानीकी अस्तुति ठाना ॥
छन्द—तुम आदि पुरुष अखण्ड अविचल पतित पावन नाम हो ।
जीव बंधन काटि फंदन जात ले निज धाम हो ।
योगजीत कबीर ज्ञानी नाम जग महँ गाह्यौं ।
अकह अभय अपार तुम गति भाग जिन पद पाह्यौं ॥
सोरठा—जोरें हंस बहुवृन्द, भूलिरहे अरविन्द जिमि ।
गति यामिनि सुखकन्द अरुण चरण लिखि अमिय कर ॥
विनय कीन बहुवार, पदपंकजको ध्यान धर ।
हे प्रभु तुम बलिहार, करें दण्डवत हंस सब ॥
जलरंग वचनसे लेकर अन्तके सोरठा तक जलरंगजी ज्ञानीजी कुष्ठम्
ऋषि गण और हंसोंका वार्तालाप आया है इसका तात्पर्य साधारण रूपसे
नीचे कहे देते हैं —
जलरङ्गजी पातलमें रहते हैं सत्य पुरुषके पुत्रोंमें हैं । उनको आज्ञा
मिली है कि जो कोई पृथ्वीपर जावे वो जलरङ्गजी को सूचित करके पृथ्वीके
मनुष्योंको मुक्तिका पान दे परमधामको पहुँचावे । साहबने जलरङ्गजीकी बड़ी
मर्यादा बढ़ाई है ।
जब कबीर साहब पृथ्वीपर आए सात लाख हंसोंको मुक्तकर अपने साथ
लेकर लोकको चले उस समय जलरङ्गजीके स्थानको गये । जलरङ्गजीने
पूछा कि आप कौन अंश हो यहाँ कैसे आये हो ? कबीर साहबने कहा कि हम
मिथ्यात्व प्रतिपादन
ज्ञानी अंश हैं । पृथ्वीपर मनुष्योंको मुक्ति देनेके निमित्त गया था । अब सात लाख हँसोंको लेकर सत्यलोक चला हूँ । इस बातपर जलरङ्गजीके मनमें कुछ अहङ्कार आया कि मैं सत्यपुरुषका अंश हूँ बिना मेरी आज्ञाके कबीर साहब पृथ्वीपर कैसे गए तथा पृथ्वीके हँसोंको लेकर चले हैं । कबीर साहबसे कहा कि सत्यपुरुषकी आज्ञाके विरुद्ध आपने ऐसा कार्य क्यों किया ? ऐसा घमंड कबीर साहबने जलरङ्गजीके मनमें देखा जान लिया कि इसने मुझको नहीं पहचाना इस कारणही ऐसा कहता है । समस्त कौतुक वह सत्यगुरु आपही करता है । इस कारण जलरङ्गजीका घमंड तोड़नेके निमित्त उन्होंने कुष्ठम पक्षीका प्रसंग छेड़कर कहा कि मैं कुष्ठम नामक एक पक्षीके पास गया था वह सत्यगुरुका हंस है पक्षीकी सूरतमें है । वह मुझसे अनगिनती युगों सैकड़ोंही उत्पत्ति स्थिति और विनाशकी कथाएँ कहने लगा । वह पक्षी बड़ाही तेजोमय है । जब कुष्ठ-मजीके इस विवरणको सुनकर जलरङ्गजीके मनमें दर्शनकी बड़ी उमङ्ग उत्पन्न हुई । कबीर साहबसे कहा कि अब आप मुझको उनका दर्शन कराओ आपने आज्ञा दी कि विमान प्रस्तुत कराओ । उसी समय विमान प्रस्तुत हुए । जलरङ्गजी समस्त हँसोंको लिए कुष्ठम ऋषिके दर्शनको चले एक पलमें कुष्ठम-ऋषिके आश्रम निरन्तर द्वीपमें जा पहुँचे वहाँ पहुँचर देखा तो कुष्ठम ऋषिके द्वारपर दो द्वारपाल खड़े थे उन्होंने भीतर जाकर पक्षीको समाचार दिया । पक्षीकी समाधि लग रही थी । कबीर साहबने अपने शब्दसे पक्षीकी समाधि खोलदी । द्वारपालोंने कहा कि महाराज ज्ञानीजी और जलरङ्गजी करोड़ों हँसोंसहित आपके द्वार पर दर्शनार्थ खड़े हैं । जलरङ्ग तथा ज्ञानीको भीतर आनेकी आज्ञा दी दूसरे किसीको नहीं दी । ज्ञानी और जलरङ्गजी भीतर गए । जलरङ्गने देखा तो उस पक्षीका ऐसा तेज था कि मानों करोड़ों सूर्य तथा चन्द्र उसके प्रकाशके सामने तुच्छ हैं । बड़ा प्रकाशित तथा तेजस्वी मुख देखकर जलरङ्गने स्तुति करके पूछा कि आप पक्षीस्वरूप क्यों हो ? तब कुष्ठमने कहा कि मैं कबीर साहबका चेला हूँ उनकी आज्ञाका उल्लंघन किया इस कारण मेरा स्वरूप इस प्रकारका हो गया । यह बात सुनतेही जलरङ्गजीका घमंड पृथक् हो गया । जान लिया कि कबीर साहब स्वयम् सत्य पुरुष हैं इसमें तनिक भी संदेह नहीं । जलरङ्गजी कबीर साहबकी बंदना स्तुति करते हुए अपनी बुद्धि पश्चात्ताम करके सत्यगुरुके सेवक बनगये । यह इस उद्धृत प्रकरणका तात्पर्य है ।
धनुष मुनि ।
ग्रंथ अम्बुसागर आठवें तरंगमें धनुष मुनिकी कथा इस प्रकार लिखी है कि जिस युगमें धनुष मुनि थे उस जुगका नाम भ्यामन्त युग था । उस युगकी अवधि दशलाख वर्षकी थी । बारह सौ वर्ष मनुष्यकी आयु होती थी । इस ग्रंथमें सतरह युगोंकी कथा है । सतरह युगोंमें एक युगका नाम भ्यामन्त युग है । इसी समय यह ऋषि था जिसे कि धनुष मुनि कहते हैं । धर्मदासने चार प्रश्न किये हैं उन्हींके उत्तरमें यह प्रकरण आया है ।
सत्य कबीर वचन ।
चौ०—नाम धनुष मुनि ऋषी रहाई । तहाँ जाय दीनों हम पाई ॥
तिनकी गति भाखों परतीती । त्रयोदश सहस्र गये युग बीती ॥
ऊरध मुख पञ्चाग्नि तपाई । प्राण पुरुष ब्रह्माण्ड चढ़ाई ॥
बैठ लीन देह अतिछीना । साहब देख बहुत बल हीना ॥
तब हम ताहि बूझ चितलाई । केहि कारण तुम कष्ट कराई ॥
केहिकी सेवा काकर जप करहू । काहि ध्यान अन्तरगत धरहू ॥
सो तुम मोहि सुनाओ भाई । अगम अगोचर भेद बताई ॥
धनुष मुनि वचन ।
मूल वस्तु कारण तप कीन्हा । अगम पुरुष सेवा चित दीन्हा ॥
अजपा जाप जपौं मन लाई । सत्य हि अन्तरध्यान धराई ॥
मारकण्डेय बहु प्रलय हो जाहीं । धनुष मुनी हम देखा ताहीं ॥
उत्पति परलय देखि बहु वारा । कीन कष्ट नहि सौंच विचारा ॥
सत्य कबीर वचन ।
कीन तपस्या कष्ट अपारा । तुम तो चोर कालके चारा ॥
तपते राज नरक है भाई । फिर फिर जन्म धरे भव आई ॥
बहुतेक तपसी भये संसारा । अन्त काल यम कीन्ह अहारा ॥
मूल भेद तुम नाहि न जानी । कष्ट करत देह भइ हानी ॥
वह साहब नहि कष्ट बतावा । सुखदाई होय अग्नि बुझावा ॥
होइ निःकर्म नाम आराधै । सत्य गमन सतगुरुकी साधै ॥
अमरलोकमें पहुँचे जाई । अमर पुरुषके दर्शन पाई ॥
धनुष मुनि वचन ।
तुमतो और लोक रचि लीन्हा । तप अरु योग झूठ सब कीन्हा ॥
और पुरुष तुम तहाँ बतावा । हमरे चित एकौ नहि आवा ॥
शब्दका विषय
लोक आपनो मोहि दिखाओ । वचन प्रतीत सत्य मन लाओ ॥
तब मैं गहुँ तुम्हारे वचना । छूटै मोर जनम औ मरना ॥
सतगुरु वचन ।
यह सुनि साहब चले रेंगाई । मुनिको लेकर लोक सिध्दाई ॥
देखा दृष्टि हंसकी पाँती । युत्थ युत्थ बैठे बहु भाँती ॥
धनुष मुनि वचन ।
तब मुनि गहे धनीके पाई । अब साहब मोहि लोक दिखार्ई ॥
सुफल जन्मममकीन्ह कृतारथ । पावन कोन भयोशुभ स्वार्थ ॥
चलो गोसाई अब हम चीन्हा । देहु पान आपन करलीन्हा ॥
सत्य कबीर वचन ।
मुनि कहलाय बेग भवसागर । ततक्षण शब्द गहै चितनागर ॥
माला ताहि गलेमें दीन्हा । श्रवण सरवनी बाधन लीना ॥
यमसे तिनका तोच्यो भाई । हिरदय शुद्धकर पान पवाई ॥
धनुष मुनि लीन्हों परवाना । चाखत पारस कीन्ह पयाना ॥
देह तजिके दीन रेंगाई । पुरुष लोकमें बैठे जाई ॥
हंसहि हंस मिले सब संगा । शब्द पाय भए निरमल अंगा ॥
धनुष मुनि वचन ।
भूलचूक अब मेटु हमारा । तुम जीवनके तारनहारा ॥
यह तो लोक अच्छय तुम राखा । अगम निगम जेहि गम न भाखा ॥
सुर नर मुनि कोई भेद न पाई । तीन लोक जीवकाल सताई ॥
यह जग मायामोह फंदाना । राग रङ्ग निशिबासर साना ॥
चेतत नाहीं मूढ गँवारा । पकड़ पकड़ यम मारि संधारा ॥
निर्गुन नाम भाषि तुम दीन्हा । ताहि नाग विरला कोई चीन्हा ॥
तीनों गुणका बड़ा पसारा । जप तप योग यज्ञ मन धारा ॥
पुरुषकी भक्ती कोई न जाने । आप आपको ब्रह्म बखाने ॥
घटमें काल विषम बटपारा । कैसे हंस पहुँचे दरबारा ॥
लोक लोक भाखै नर लोई । लोक मरम नहि जानै कोई ॥
साखी— धन्य नारि नर नाम धन्य, सर्वे वीच निजपान ।
जा परताप यहि लोकमें, पहुँचे लोक ठिकान ॥
तात्पर्य—यह धनुष मुनि अपने समयके बहुत बड़े योगी थे । जो अपने योग तथा प्राणायामके बलसे बहुत कालपर्यन्त जीवित रहे थे । उन्होंने अनेकानेक
उत्पत्ति स्थिति तथा विनाशोंको देखा था । जब कबीर साहब उनको मिले तब कबीर साहबने तबसे क्षीणकाय हुए धनुष ऋषिसे पूछा है कि आप किस लिए इतना कष्ट उठा रहे हैं ? यह सुन कर उक्त ऋषिने उत्तर दिया है कि, मैं मूल वस्तुके लिये तप करता हूँ अजपा जाप जपता हूँ । यह सुनकर कबीर साहबने कहा है कि इस बखेड़ेको छोड़ दो सत्यपुरुषकी भक्ति करो । पीछे उन्हें सत्यलोक दिखाया गया है वहाँ धनुष ऋषिने चरण पकड़कर बड़ी प्रशंसा की है । इसी बातका विवरण कहे गये अम्बुसागरके इन वचनोंमें हैं ।
गुप्त मुनि ।
अम्बुसागरके ग्यारहवें तरंगमें नंदी युगकी कथा आयी है उसीमें गुप्त-मुनिका वृत्तान्त आया है । कबीर साहब धर्मदासजीसे कहते हैं कि, मैं नन्दी युगमें कौंवहीपमें पहुँचा, वहाँ मुझे गुप्तमुनि मिले मैंने उनके साथ गोष्ठी की वो कैसे हुई यह यहाँही उद्धृत करते हैं —
सत्य कबीर बचन ।
युग नन्दी हम कीन पयाना । पुरुष आज्ञाते तहाँ सिधाना ॥
कौंच द्वीपमें पहुँच्यो जाई । जहाँ काल दधि सिन्धु बताई ॥
तहवाँ एक हंस निर्वाना । तासे गुष्টি जाय हम ठाना ॥
बैठ अरम्भ । गुफा अनुरागा । मायामोह छोड़ चित पागा ॥
नाम गुप्त मुनि तासु रहाई । दृष्टी मूँदि ध्यान मन लाई ॥
जाय निकट बैठे हम जाके । खोल चक्षु मुनि हम कहि ताके ॥
बूझे तिन तुम को हौ भाई । अपनो नाम कहो समझाई ॥
सुन्दर रूप अधिक तनशोभा । देखत रूप उठत अति लोभा ॥
अङ्ग अङ्ग तुम्हरो चमकारा । शोभामुनि जिमि अगम अपारा ॥
कोट बरस हम इहवां तप कीना । ऐसो रूप न कबहूँ चीना ॥
अब तुम कहो आपनो नामा । कौने देश बसो केहि ग्रामा ॥
सत्य कबीर बचन ।
सतगुरु कहे सुनो मुनि राऊ । आपन भेद तोहि समझाऊँ ॥
हम तो अमरलोकके वासी । जहवाँ अजर पुरुष अविनासी ॥
तहाँ काल नहि व्यापै फँदा । हंस तहाँ बहु करें अनन्दा ॥
अमियपुरुष तहाँ आपविराजा । अनहद बाजा बाजै छाया ॥
जीव कष्ट जब देख अपारा । आयसु दीन आय संसारा ॥
ल्यावहु जीव काटि यम फँदा । देओपान मेटो दुःख द्वंदा ॥
तब हम चलैं यहाँ पगधारी । जो चेतो तो लेउं उवारी ॥
गुप्त मुनि वचन ।
तब मुनि ठाढ़ भए कर जोरी । हम चीन्हा तुम बन्दी छोरी ॥
यह बड़ा भाग हमारा जागा । काल कष्ट सब दूरहि भागा ॥
जेहि विधि जीव होय समतूला । सो भाखौ जीवनके मूला ॥
अध तम पूज तुम हरहु अपारा । तुम तो आहु पारसे पारा ॥
एक बार मैं देखौ ठामौ । जहवौ बसत हंसकर धामौ ॥
तब तुम पद गहिहौ दूढ़ पावन । करो अनुग्रह हम चित भावन ॥
सत्य कबीर वचन ।
देखि आधीन शब्द मुनि पागा । तब ले चल्यौ ताहि वह जागा ॥
प्रथम दिखायो मान सरोवर । सकल कामिनी एक बरोवर ॥
चार भानुजिमि अङ्ग लपेटा । करै कुतूहल युथ युथ भेटा ॥
मान सरोवर देख तडागू । सीढ़ि २ रवि शशि जनु लागू ॥
सो जल देखत जीव जुडाना । उठे तरंग दूर जिमि भाना ॥
तहवा कामिनी मज्जन करहीं । मज्जन करत रूप बड़ धरहीं ॥
कामन खण्ड महा अति पावन । युथ २ बैठि राग तहैं गावन ॥
वह छवि देखि कीन्ह बड़ लोभा । व्याकुल भै चित लिखि वह शोभा ॥
नाना भांति फूल फुलवारी । जिमि उडुगण रवि रुचि वैठारी ॥
गुप्तमुनि वचन ।
देख दृष्टि तब पद लपटाना । जस जल पाय मीन मन माना ॥
करहु अनुग्रह हम नहि जाइव । ऐसी ठौर बहुरि नहि आइव ॥
सत्य कबीर वचन ।
जबलग पुरुष नाम नहि भेटै । तब लगि काल त्रासको भेटै ॥
अब तुम चलो आपने ठामौ । पावहु पुरुष नाम विशरामौ ॥
सद्गुरु मुनिवर आयऊ तहवौ । गुप्त मुनि आशरम रह जहवौ ॥
गुप्तमुनि वचन ।
निरगुण सरगुन दोनों भाखू । है प्रभु श्रवण सुनन अभिलाखू ॥
कौन ज्ञानते तुमको पाउब । सतगुरु तासु युगति फरमाउब ॥
सत्य कबीर वचन ।
निर्गुण ज्ञान मुक्ति कर बासा । सरगुण ज्ञान देह परकासा ॥
सद्गुरु ज्ञान परख हम पावा । निर्गुण ज्ञान मोहि चित भावा ॥
सगुणहु नाम अनन्त बतावत । निर्गुण नाम रहत घर पावत ॥
सरगुण नाम सकल संसारा । निर्गुण है एक नाम हमारा ॥
सरगुण नाम सकल भरमावै । निर्गुण नाम हंस घर आवै ॥
सरगुण निरगुन रहे अकेला । ताके संग गुरु नहि चेला ॥
मारग झीन सुनो मुनि ज्ञानी । लगवत मकर तार जो तानी ॥
गुप्त मुनीको चौका कीना । लखिके पान तुरत तेहि दीना ॥
युगनन्दीकी अवधि बखानो । एक करोड़ बरस परमानो ॥
मानुष अवधि सहस रह तीना । तहाँ गुप्त मुनि भये अधीना ॥
सद्गुरु मुनिवर लै चले डोरी । टूट घाट अठासि करोरी ॥
देखत मुनि हंसन युथ आवा । सकल साज मंगल भल गावा, ॥
अनहद बाजन बाजे लागा । मंगल भौति भौति उठ रागा ॥
हंस परछ संग गहिलीना । धन्य हंस सद्गुरु भल चीना ॥
विषय वास छाडे भल हेता । पद परताप काल तुम जीता ॥
तात्पर्य —यह मुनि बड़ा तपस्वी था करोड़ों वर्षपर्यन्त एक स्थानपर तप किया । कबीर साहबने उनको लोकको पहुँचाया जिस समय नन्दीयुगकी स्थिति एक करोड़ वर्षकी थी, उस समय मनुष्योंकी आयु तीन सहस्र वर्षकी होती थी, जैसे गुप्त मुनिको पहले सत्यगुरुने अंतरिक्षकी सैर करवाई फिर परमधामको भेज दिया । ऐसेही अनेकों लोगोंको लोक दिखलाकर पलटा लाये प्रारब्ध भोगके पीछे लोक ले गये ।
दत्तात्रेय और कबीर ।
आठवी अध्यायमें कह दिया है कि, दत्तात्रेय भी पराभविरूपा प्रेम-मदिराके दीवाने थे उनकी उत्पत्ति भी कही है जैसी कि, भागवतने कही है तथा जैसा कि, कबीर सागर १० आगम निगमबोधमें लिखी हुई है वहाँ केवल उतना ही अन्तर हुआ है कि, गुरुओंकी जगह २४ चेला कह दिये हैं । अब कबीर साहिब और उनकी सत्संगचर्याको लिखते हैं—
देवदत्त वचन—स्वामी ! मन, पवन शब्द नाद, ब्रह्म, हंस, शिव, शून्य और काल कौन है ?
अविनाशी वचन मन चञ्चल पवन निराकार, शब्द नाद, अनहद ब्रह्म, हंस और अकेला है ।
देवदत्त वचन—कहाँ बसे मन, कहाँ बसे पवन, कहाँ बसे शब्द, कहाँ बसे
समस्त धर्मोंका वृत्तान्त
नाद, कहाँ बसे ब्रह्म, कहाँ बसे हंस, कहाँ बसे जीव, कहाँ बसे शिव, कहाँ बसे अविनाशी, कहाँ बसे काल ?
अविनाशी वचन—हृदय बसे मन, नाभि बसै पवन, कण्ठ बसै शब्द, श्रवणबसे नाद, नासिका बसे हंस, जिह्वा बसे जीव, नेत्र बसे शिव अकेला बसै अविनाशी और कुबुद्धिमें काल बसता है ।
देवदत्त वचन—हृदय न होता तो कहाँ होता मन, नाभि न होती तो कहाँ होता पवन, कण्ठ न होता तो कहाँ होता शब्द, श्रवण न होता तो कहाँ होता नाद, ब्रह्माण्ड न होता तो कहाँ होता ब्रह्म, नासिका न होती तो कहाँ होता हंस, इंगला न होती तो कहाँ होता शिव, नेत्र न होता तो कहाँ होता निरञ्जन और काया न होती तो काल कहाँ होता ?
अविनाशी वचन—हृदय न होता तो मन निर्नेव होता, नाभि न होती तो शब्द निराकार होता, श्रवण न होता तो नाद निराधार होता, मुख, न होता तो ब्रह्म मध्यमें होता, नासिका न होती तो हंस सत्यमें होता, इङ्गला न होती तो चन्द्रमें जीव होता, पिंगला न होती तो शिव सूर्यमें होता, पुत्र न होता तो निरञ्जन होता, निरन्तर काया न होती तो काल शून्यमें होता ।
देवदत्त वचन—हे स्वामी ! मनका कौन जीव है ? पवनका कौन जीव है कालका कौन जीव है ।
अविनाशी वचन—पवनका जीव शब्द, शब्दका जीव नाद, नादका जीव बीज, बीजका जीव हंस, हंसका जीवना जीव ।
देवदत्त वचन—स्वामी कहाँ से निरञ्जनकी उत्पत्ति है ? कहाँसे पवनकी उत्पत्ति ?
अविनाशी वचन — आदिते सत्य उत्पन्न है । सत्यते तत् उत्पन्न तत्त्वं शब्द । शब्दते उत्पन्न अलेख है । अलेखते उत्पन्न अलील है । अलीलते उत्पन्न निरञ्जन है । निरञ्जनते उत्पन्न शिव है । शिवते उत्पन्न जीव है । जीवते उत्पन्न हंस है । हंसते उत्पन्न ब्रह्म है । ब्रह्मनादते शब्द उत्पन्न है । शब्दते पवन और पवनते मन उत्पन्न है ।
देवदत्त वचन—हे स्वामी ! तन छूटे मन कहाँ समाना, पवन कहाँ समाना, शब्द कहाँ समाना, नाद कहाँ समाना, ब्रह्म कहाँ समाना, हंस कहाँ समाना, जीव, कहाँ समाना, निरञ्जन कहाँ समाना और अलील कहाँ समाना है ।
अविनाशी वचन—तन छूटे मन पवनमें समाना, पवन शब्दमें समाना, शब्द नादमें समाना, नाद ब्रह्ममें समाना, ब्रह्म हंसमें समाना, हंस जीवमें