कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
औलिया आदि पदको प्राप्त होता है, सदाचारसेही यज्ञ, योग, जप, तप, ज्ञान आदिको प्राप्ति होती है, सदाचारसेही गुरु मिलता है, जिससे मोक्ष प्राप्त होती है । सदाचारही कर्तव्य है, जिसमें सदाचार नहीं है वह मनुष्यही नहीं पशु है ।
मुसद्दस
अमल कर ऐ अमल वारा अमल तुझको छुड़ावेगा ।
अमलही फर्ज है तुझपर अमल सद्गुरु मिलावेगा ॥
अमलही दाग सब तेरे गुह्नकी धों बहावेगा ।
अमलगर होश कर कोई हमल मसकन् छुड़ावेगा ॥
जगतमें भरमका फेरा अमल तेरा हटावेगा ।
अमल करले अमल करले अमलही काम आवेगा ॥ १ ॥
अमसे यह जमीं और दीद मंजर सब समावी है ।
कवाकिब और सवाबित मेहरो महकी रोशनाई है ॥
जहाँ यह और जहाँदारो जो कुछ खुद अकल आई है ।
तबक चौदह बनाई है अमलकी सब कमाई है ॥
मकॉ सब पार जावे लामकॉ घरमें बसावेगा ।
अमल करले अमल करले अमलही काम आवेगा ॥ २ ॥
यही मादर पिदर तेरा मिहरवों बहिन और भाई ।
यही फर्जन्द दिलबन्द यही दादा यही दाई ॥
यही ोर्छ अकरवाखुद बतिलफी जोफो बरनाई ।
तेरे आमाल हसनः सब मिलावे मुल्क मोलाई ॥
अमलके वास्ते इनसॉ अमल कर चैन पावेगा ।
अमल करले अमल करले अलमही काम आवेगा ॥ ३ ॥
अमलसे पीर पैगम्बर अमलसे वेद और बानी ।
अमलसे इब्तादा महशर अमलसे रहम रहमानी ॥
अमलसे योग और जुगती अमलसे ब्रह्म ब्रह्मज्ञानी ।
अमलसे सूर गूनागूं वर नक्स हयूलानी ॥
अमल कर नेक सद्गुरु टेक सोई रह बतावेगा ।
अमल करले अमल करले अमलही काम आवेगा ॥ ४ ॥
अमल मखलूक और खालिक अमल का सब पसारा है ।
अमल के वास्ते आदम वशकले खुद सँवारा है ॥
हुआ आदम अल्लाह सूरत अमलका हुक्म धारा है ।
पाँच देहके नाम, पाँचों वाणियोंके नाम धर्मकी खोज
अमलसे आदमी है वरनः चौपाया विचारा है ॥
अमल कर नेक गर आज्जिज अमल नस्क मिटावेगा ।
अमल करले अमल करले अमलही काम आवेगा ॥ ५ ॥
ईश्वर विषयक सिद्धान्त
पुरुष सूक्तका सिद्धान्त
एक पुरुष है जिसके बहुतसे शिर, नाक, आँखें, कान, मुंह, जिह्वा, पद और अङ्ग हैं, गुप्त प्रकट असंख्य ही इन्द्रियाँ हैं, सारे संसारमें वही व्यापक है। सब जीवधारी उसीकी आँखोंसे देखते हैं, उसीके कानोंसे सुनते हैं, वही सबके अन्तःकरणमें है, वह तीनों कालमें समान है, सबका स्वामी है, अद्वैत और अनुपम है, अनाम है, अक्रिय है, उसका कोई स्थान नहीं सब स्थानोंमें वही है, यह संसार उसके प्रकाशका लघुसे लघु किरण है, ऋग, यजु और साम ये तीनों वेद रज, सत, तम ये तीनों गुण उसीके प्रागटच का परमाणु है, उसीसे उत्पत्ति स्थिति और लय है। प्रणवके तीनों अक्षर उसीसे प्रगट होते हैं वह पुरुष जब स्वांस नीचेको छोड़ता है तो सारा संसार जीवित हो जाता है ऊपर को खींचता है तो प्रलय हो जाता है, ये सब क्रियाएँ होती रहती हैं पर वह पुरुष आप निलैप रहता है।
जब वह सृष्टि उत्पन्न करनेकी इच्छा करता है तो प्रथम हिरण्यगर्भको प्रगट करता है इससे सब जड़ चैतन्य और विराट पुरुष प्रगट होते हैं।
हिरण्यगर्भ अर्थात्-प्रजापति उससे मनु-अर्थात् आद'म और मनरूप-अथवा हौवा होते हैं जिससे सृष्टि होती है।
यज्ञ और जगतका एकही अर्थ है। पुरुष यज्ञ स्वरूप है, सब वस्तुयज्ञसे हुआ करते हैं उसीमें हवन होनेसे लय हो जाते हैं। वेदके ज्ञाता लोग इसी कारण अङ्गोंके समान है। ज्ञानी, पण्डित, वेद और शास्त्रके ज्ञाता, शास्त्रज्ञ, शास्त्रानुसार कर्म करनेवाले, सदाचरणमें बरतनेवाले, पापोंसे घृणा करनेवाले, दैवी सम्पत्तिसहित अपनी आयुको जगत्के उपकारमें बितानेवाले, ऋषि और मुनियोंके समान शरीरयात्रा करते हुये सर्वदा पुरोपकारमें रहनेवाले, विराट पुरुषके शिर हैं। राजा, तन्त्री, ज्योतिषी, वैद्य आदि जिनसे जगत्की रक्षा होती है जिसके द्वारा सब अपनी मर्यादापर चलते हैं, वाँह हैं। वाणिज्य करनेवाले,
१ समष्टि सूक्ष्म अभिमानी देवताको हिरण्यगर्भ कहा करते हैं। २ समष्टि स्थूलके अभिमानी देवताको विराट कहते हैं। ३ मानवी सृष्टिके प्रवर्तकोंको पाश्चात्य साहित्यकवाबा आदम और भी हौवा कहते हैं।
खेती करनेवाले, कारीगरी प्रगट करने नानाप्रकारकी वस्तुओंद्वारा लाभ पहुँचानेवाले, पेटके समान हैं । सब प्रकारकी सेवा करनेवाले सेवक, जिनको कि न विद्या है न बुद्धि है वे बैलोंके समान कमाते हैं दूसरोंके आश्रय जीवन व्यतीत करते हैं, कुर्तोंके समान द्वार द्वार फिरते हैं वे उसके विराट रूपके पग हैं । पशू मांस, अस्थि और चर्मके समान हैं । वनस्पती उसके नख केश हैं, चन्द्रमा मन है, सूर्य आंख है, वायु प्राण हैं, अग्नि वाक्य है, पृथिवीनाभि है, वैकुण्ठशिर है, पाताल पगका तलवा है, दश दिशा कान हैं । इस प्रकार समष्टि स्थूलका नाम विराट है, समष्टि स्थूलही पुरुषका रूप है । इस यज्ञकी सामग्री यह है कि वसन्त ऋतु घोंके समान है, ग्रीष्म लकड़ी है, शरद ऋतु शाकल्य है, सात समुद्र सात काष्ठ हैं, जिससे हवन कुण्डका घेरा बनाते हैं, वेदमन्त्र उसके समान है जिससे अग्निमें शाकल्य छोड़ते हैं ।
प्राचीन कालमें देवता लोग इस यज्ञ को करके परम आनन्दको प्राप्त कर शोकसे छूट जाते थे । हिरण्यगर्भ समष्टि सूक्ष्मका नाम है, उसीसे तत्व प्रगट हुये, उसीमें लय हो जाते हैं, वैसे सूर्यकी किरण सूर्यमें समा जाती हैं, उसी प्रकार सब उसी पूर्ण अनन्त प्रकाशमें लय होजाते हैं । इस भेदको जो समझे वह अज्ञान सागरसे पार हो जावे और सत्यज्ञान पावे । प्रजापति स्थूल समष्टिसे आशय है; हिरण्यगर्भ समष्टि सूक्ष्म है जो इनको परमात्मा समझते हैं वे भूलमें हैं । सभस्त संसार प्रजापतिमें । प्रजापति हिरण्यगर्भमें और हिरण्यगर्भ उस पुरुषमें हैं । इसभेदको ब्रह्मज्ञानी समझते हैं जो समझते हैं वे भली प्रकार जानते हैं कि, हिरण्यगर्भ मैं ही हूँ सभस्त संसार जिससे प्रगट हुआ है वो मैं ही हूँ ।
जो कुछ कहा सुना और लिखा गया है उस अनन्त प्रकाशका वह एक किरण है, उसीको वारम्बार नमस्कार है । जो उस भेदको समझे वैसाही निश्चय करे उसको लोक परलोकका सब आनन्द प्राप्त होता है सब देवते उसकी आज्ञा मानते हैं ।
सारे संसारमें सूर्य श्रेष्ठ है । सबको उचित है कि, अपनेमें और अपनेको सबमें समझे, जैसा विराट पुरुषका वर्णन लिखा गया है वैसाही अपनेमें ध्यान करे ।
जैन धर्मका सिद्धान्त — निरञ्जन परमात्मा वैकुण्ठमें रहता है, वह न कुछ करता है न कराता है, उसको न किसीसे मित्रता है न शत्रुता, सर्व जीव अपने २ कर्म्मोंका फल पाते हैं, परमात्मा निलैप और अकर्त्ता है ।
योगी और संन्यासियोंका सिद्धान्त — निरञ्जन परमात्मा सहस्रदल कमलमें रहता है, प्रणवकी उपासनासे उसका दर्शन होता है ।
१ कंवलयसूत्रमें प्रतिपादित है ये आज केवलनाथ और केवली करके भले ही कुछ मानते हों पर निरंजनका तो जिक्र भी नहीं हैं ।
अज्ञानकी सात भूमिका
कबीर पन्थियोंका सिद्धान्त ।
शब्द – साधू सद्गुरु अलख लखाया । जाते आप आप दरसाया ॥
बीज मध्य ज्यों तरवर दरशे, वृक्ष मध्य ज्यों छाया ।
आतममें परमात्म दरशे, परमात्ममें माया ॥
ज्यों नाभीमें शून्य देखिये, शून्यमें अण्डाकारा ।
निःअक्षरसे अक्षर ऐसा, क्षर अक्षर विस्तारा ॥
ज्यों रवि मध्य किरण देखिये, किरण ज्योति परकाशा ।
पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, जीव ब्रह्मसे स्वाँसा ॥
स्वाँसा मध्ये शब्द देखिये, शब्द अर्थके माहीं ।
पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, न्यास है वह साँई ॥
आपे बीज वृक्ष अंकुर, आपे पुष्प फल छाया ।
सूर्य किरण परकाश आपही, आप ब्रह्म जिव माया ॥
आतममें परमात्म दरशे, परमात्ममें झाँई ।
झाँईमें एक झाँई दरशे, लखे कबीरा साँई ॥
साखी – हम वासी वहि देशके, जहां पारब्रह्मको खेल ।
दीवा बले अगम्यका, बिनु बाती बिनु तेल ॥
राम जपत हैं नामको, नाम जपत हैं थीर ।
ताहूते कछु अपर है, ताको जपे कबीर ॥
हजरत मूसाका सिद्धान्त ।
मूसाका खुदा आसमानी रङ्गका है, वह नबियोंको मनुष्यके रूपमें दिखाई देता है, ध्रुवाँ बादल तथा आगकी लहरोंमें प्रगट होकर भले और बुरेका ज्ञान देता है ।
हजरत ईसाका सिद्धान्त ।
आदिमें एक शब्द था दूसरा कुछ न था, वही तीन भागोंमें विभक्त होकर पिता, पुत्र और पवित्रात्माके रूपमें हुआ, इसीको तसलीस खुदा कहते हैं ।
मुहम्मद शाहका सिद्धान्त ।
तौहीदकी चार श्रेणियाँ हैं । तौहीदका एक सार है, उसका भी एक सार है, उसका एक छिलका है उसका भी एक छिलका है । उसीकी उपमा अखरोटसे
अशुचि जाग्रत् भूमिका, जाग्रत भूमिका महा जाग्रत भूमिका जाग्रत स्वप्न भूमिका
देते हैं; जैसे अखरोटके दो छिलके होते हैं एक (सार) गिरी होती है उसका तेल दूसरा सार है ।
प्रथम वह श्रेणी है कि, आदमी मुखसे — (लाइला इलिइल्लाह) लाइला इलिइल्लाह कहे और हृदयमें विश्वास न रखे, यह संसारी लोगोंका सिद्धान्त है ।
दूसरी श्रेणी यह है कि, उस कलमेके अर्थको जैसे दूसरे लोग मनाते हैं वैसेही मानें उसीको प्रमाणित करनेके लिये नाना प्रकारकी युक्ति और प्रमाण दे यह सिद्धान्त वाचक ज्ञानियोंका है ।
तीसरी यह श्रेणी है कि, मनुष्य विचार करके निश्चय करे कि, सबका मूल एकही है; सब कम्मोंका एकही कर्त्ता है, दूसरा कोई कुछ करही नहीं सकता । यह विश्वास कहे दोनों विश्वासोंके समान नहीं है । इसीसे अज्ञानताकी गॉठ छूट जाती है, यह सब गॉठोंको खोलकर बन्धनोंको छुड़ा देता है ।
कोई पुरुष किसी मकानके द्वारपर जाकर किसीसे सुनले पर यह निश्चय करे कि, अमुक पुरुष घरमें है, यह साधारण लोगोंका विश्वास है कि, उन्होंने अपने माता पितासे अथवा उपदेशकोंसे सुन रखा है । दूसरा पुरुष घोड़ा और नौकरोंको देखकर विश्वास करे कि, अमुक सरदार घरमें है, यह विद्वानोंका सिद्धान्त है कि, उन्होंने युक्ति और अनुमानसे जाना तीसरेने सरदारको घरमें देख लिया । यह ब्रह्मज्ञानियोंका सिद्धान्त है, वे लोग प्रत्यक्ष देखते हैं । इन तीनोंमें बड़ा भेद है सबसे बड़ा पद ज्ञानियोंका है । पर इस श्रेणीपर भी पहुँचकर द्वैत होता है क्योंकि, इस अवस्थामें भी दो भासते हैं जानता कि, ईश्वरसे सृष्टि है, यहां तक एक अनन्त काही बखेड़ा है । जबतक ज्ञानी द्वैतको न नष्ट कर दे, तब तक भेद रहता है कि, उसको तौहीद (अद्वैत) नहीं कह सकते ।
चतुर्थ श्रेणी यह है कि, आदमी एकके अतिरिक्त दूसरा न देखे । जो कुछ देखे एकही देखे एकही कहे, द्वैतका लेश भी न रहे । ऐसे पुरुषको सूफी कहते हैं, सूफी (फनाफी अल्लाह) (ईश्वरमें लय) कहलाता है ।
प्रथम तौहीदको मनाफिक कहते हैं (सुनी सुनी बातोंको निश्चय करना) उसी प्रकार साधारणोंकी तौहीद, अनुमानिक है । चतुर्थ श्रेणीकी तौहीद का समझना कठिन । इस श्रेणीमें केवल ईश्वरही ईश्वर होता है, वरन् मनुष्य आपको भी भूल जाता है । तबकुल (विश्वास) को चौथी श्रेणीकी तौहीद नहीं चाहिये वरन् तीसरे श्रेणीकी तौहीद आवश्यक है, चतुर्थ श्रेणीकी तौहीदकी व्याख्या कोई करही नहीं सकता । इस दरजेमें पहुँचा हुआ, सब कुछ एकही देखता है, आपही प्रेमी और आपही प्रीतम होता है, स्वभावमें स्थित हो जाता है । वह कुछ कर्तव्य
स्वप्न जाग्रतवाला जीव स्वप्न भूमिका सुषुप्ति ज्ञानकी सात भूमिकाएँ शुभ इच्छा भूमिका स्वविचारना भूमिका तनुवानसा भूमिका सत्वापत्ति भूमिका असंशक्त भूमिका पदार्था भाविनी भूमिका तुरीया भूमिका हंस देहका विशेष वर्णन
नहीं करता सब प्रकृतिके ऊपर छोड़ देता है। तीन प्रकारके कर्म होते हैं। एक तो वह है जो अपने इच्छाके आधीन है, जैसे बोलना, चिल्लाना। दूसरा वह है जिसमें इच्छा भी होती है पर पूर्ण बल नहीं होता। तीसरा वह है जिसमें अपना अधिकार नहीं; जैसे पानी पर पैर रखनेसे अवश्य तहको चला जायगा। पानी पर रख कर कोई नीचे जाना चाहे अथवा न चाहे पर अवश्य पानीको चीरता हुआ नीचेको चला जायगा।
शरणागत तथा ईश्वर विश्वास।
तवकुल जिसका नाम है, वह ईश्वरके सच्चे निकटवर्तियोंके स्थानोंमें से एक स्थान तथा महान् उच्च पद है। तवकुलका ज्ञान यथार्थमें बहुत सूक्ष्म और कठिन है। तवकुल पर चलना बहुत दुस्तर है। जिसके मनमें ऐसा संदेह हो कि किसी कर्मका भी कर्ता ईश्वरके अतिरिक्त कोई दूसरा है तो वह ईश्वरका विश्वासी नहीं हो सकता। यदि सब सामग्री छोड़ दी जाय तो अशर (कर्मकाण्ड) के विरुद्ध होगा, यदि कोई कारण प्रत्यक्ष न पावेगा तो बुद्धिके विरुद्ध करेगा। यदि कारण पावेगा तो संदेह है कि प्रत्यक्ष सांसारिक किसी पदार्थपर विश्वास कर लेगा। इन अवस्थाओंमें उसके ईश्वरवादी (आस्तिक) होनेमें बाधा पड़ेगी। अतः बुद्धि, शास्त्र आदि जैसे तवकुलकी व्याख्या करते हों, उनको पूर्ण रीतिसे समझता हो वरन् उसका स्वरूप बन गया हो, वही तवकुलको धारण कर सकता है। नहीं तो तवकुल बहुत दुस्तर और अगम्य है। इसको विरलाही जान सकता है। खुदा (ईश्वर) तवकुलों (विश्वासीयों) को ही प्रीतम बनाता है। तवकुलके ऊपर ही ईमान है।
आदमको सब फिरिश्तोंने नमस्कार की, इस कारण आदम सब फिरिश्तों से श्रेष्ठ है। उसीकी संतान सब मनुष्य हैं। इस कारण मनुष्य भी फिरिश्तोंसे उच्चपद पर स्थित हैं। अतः जो कोई आदमकी संतान (मनुष्य) होकर फिरिश्तों अथवा किसी दूसरोंको खुदा (ईश्वर) के अतिरिक्त, माथा टेकेगा, उनसे कुछ कल्याण चाहेगा, अथवा किसी प्रकारकी आशा रखेगा तो वह मनुष्य नहीं वरन् पशुके पदको पावेगा। जो जिस प्रकार खुदा विश्वम्भर पर विश्वास करेगा, वह उसी प्रकार उसे भोजन देगा। जिस प्रकार पक्षी प्रातःकाल भूखे उठते हैं पर संध्याको अधाकर घर आते हैं। जो कोई ईश्वरकी शरणमें सच्चे दिलसे प्राप्त होता है, उसकी वही (ईश्वर) पूर्ण रीतिसे रक्षा करता है। इस प्रकार ऐसी जगह उसे भोजन पहुंचाता है कि उसकी समझमें भी नहीं आता जो संसारकी शरण लेता है उसको परमात्मा संसारके साथही छोड़ देता है।
हंस देहके पक्के तत्त्व धैर्यकी पाँच प्रकृतियाँ दयाकी पाँच प्रकृतियाँ शीलकी, बिचारकी पाँच प्रकृतियाँ सत्यकी पाँच प्रकृतियाँ स्थूलदेह, पाँच कञ्चेतत्त्व तीन गुण, पञ्चीस प्रकृति, कञ्चेतत्त्वकी पञ्चीस प्रकृतियाँ
जो मंत्र यंत्र तंत्र आदि पर विश्वास रखता है, वह ईश्वरका प्रेमी नहीं। उसने परमात्माकी शरण नहीं लिया जो परमात्माकी शरणमें प्राप्त होता है यदि सारा संसार भी उसका शत्रु बन जाये तो भी उसकी कुछ भी हानि नहीं होती । चाहे कौसा भी कष्ट क्यों न पड़े पर ईश्वरके बिना किसीसे किसी प्रकारकी आशा न रखे । यदि तनिक भी दूसरेका ध्यान आवेगा तो शरणागतके पदसे गिरा देगा । प्रह्लादको अनंत कष्ट पड़ा तो भी उसका मन न चलायमान हुआ, शरणागति न छोड़ी तो परमात्माने सब अवस्थाओंमें उसकी रक्षा की । प्रह्लादजीकी सात और ध्रुवकी केवल पांच वर्षकी आयु थी ये दोनों सब विश्वासियों (शरणागत परा-यणों) में श्रेष्ठ हैं । इसी प्रकार हजरत इबराहीम भी शरणागत प्राप्तोंमें श्रेष्ठ हैं। क्योंकि, जब नमरुद बादशाहने उनको अग्निमें डाला तो यद्यपि अग्नि ऐसी तेज थी कि, फिरिस्ते भयखाते थे, पर इबराहीमको कुछ भी भय नहीं था । वे केवल खुदाकी ओर ध्यान लगाये बैठे थे, यहांतक कि, उसी अवस्थामें जिबराईलने खुदाकी आज्ञा लेकर इब्राहीमसे कहा कि, ऐ इब्राहीम ! मैं तुझको बचाता हूँ तब इब्राहीमने पूछा, खुदातआलाका हुक्म है ? कि, तुम मुझको बचाओ । जबराईलने कहा कि, खुदाका तो हुक्म नहीं वरन् मैं अपनी ओरसे बचाता हूँ । इब्राहीम ने कहा कि, यदि खुदाका हुक्म नहीं है तो मैं बचना नहीं चाहता । जबराईल यह बात सुनकर पीछे चले गये । तब क्रमशः इसराफील इजराईल आदि फिरिश्ते आकर इब्राहीमको बचानेके लिये कहा पर इब्राहीमने वही उत्तर दिया । उसी समय खुदाकी कुदरतसे आग सुन्दर वाटिका बन गयी अग्निका कहीं पता न लगा । जो कोई ईश्वरको शरणागत हो उसीको उभयलोकका आनन्द प्राप्त होगा ।
साखी - कबीर - सौ वर्ष सेवा करे, एक दिन सेवे आन ।
सो अपराधी आतमा, निश्चय नरक निधान ॥ १ ॥
कबीर - सत्यनामको छोड़िके, करे आनकी आस ।
कह कबीर ता दासका, होय नकमें बास ॥ २ ॥
कबीर-आन भजे सो आँधरा, हरिहिं भजे सो साधु ॥
सत्य भजे सो वैष्णव, ताको मता अगाधु ॥ ३ ॥
कबीर-देवी देवता ढह पड़े, हमको ठौर बताव ।
जो कोई हरि सो विमुख है, तिनको तुम ले खाव ॥ ४ ॥
कबीर-मढ़ी मसानी शीतला, भैरों औ हनुमन्त ।
साहेब सो न्यारा रहे, जो उनको पूजन्त ॥ ५ ॥
स्थूल सृष्टि
गजल — जिनको है जहानमें बखुदाबन्द तवक्कुल ।
उनको न खतर कर दफा दुःख द्वन्द तवक्कुल ॥
प्रह्लादको पर्वतसे दिया डाल जमीं पर है ।
और आगकी सोजिशको किया बन्द तवक्कुल ॥
इब्राहीमके खातिर आतश हुई गुलजार ।
सब दुःख रफा कर किया आनन्द तवक्कुल ॥
इससे न कोई दूसरा है सरवते शीरीं ।
शीरीं है सो अजमिसरी अज कन्द तवक्कुल ॥
जुजहक्कु न किसीसे रख उमरीद ऐ लोन ।
कर दीन व ईमान पुन पायबन्द तवक्कुल ॥
तफक्कुर (मनन)
एक क्षणका तफक्कुर (मनन) वर्षभरकी तपस्याके समान है । यथार्थमें चिंतन और मननका पद सबधर्मोंके अनुसार बहुत ऊँचा है ? पवित्र पुस्तकोंको पढ़ना, उसके अर्थ और आशयपर विचार करना, चिंतन करनेके समय ऐसा हो जाना कि, दूसरा संकल्प भी मनमें न आने पावे । जो बेफिकरीके साथ काम करता है वह अन्तमें लज्जा और हानि उठाता है ।
प्रथम मनुष्यकी दशापर विचार करना चाहिये कि, यह किस अवस्थासे पतित होकर किस अवस्थाको पहुँचा है ! अपनी सत्य स्वरूपी देहसे किस प्रकार विलग हो, किस प्रकार दुःखमें फँसा । इसने अपनेको अच्छा जाना, रूपका अभिमान किया, पतित हुआ अनन्त दुःखोंको भोगने लगा । यद्यपि वेदके अनुसार ऋषि मुनियोंने भजन करके ईश्वरके पदको भी प्राप्त किया तो भी सब उस पर कायम न रह सके । यदि स्वसंबेदकी शिक्षानुसार भजन करते तो पारख गुरुको प्राप्त हो अक्षय पदमें स्थित हो जाते । इसी प्रकार वो बड़े २ विद्वान् पण्डित विद्याके अभिमानमें किसीको कुछ न समझते थे, वे सब भी अभिमानके कारण पतित हुए. जो बड़े २ बादशाह, राजा, महाराजा आदि ईश्वर होने तकका दावा करते थे, वे कुत्तोंकी मौत मरे ।
इन बातोंके विचारसे सिद्ध होता है कि, हमारी तबाहीका कारण केवल अहंकारही है । अहंकारही बुरे होनेपर हमको दूसरोंसे अच्छा समझना सिखाता है । जिसने हमको सत्यस्वरूपी देहसे पतित किया, वह सर्वदा छः देहों और चौरासी लाख योनियोंमें भी लगा रहता है । जब तक यह न छूटेगा, कदापि स्थिति न होगी । जीव झूठे अहंकारमें फँसा हुआ छः देहोंमें अनेक दुःखोंको भोगता भटकता फिरता
प्रपञ्चसे छूटनेके साधन
है । ब्रह्म, जीव, माया, ईश्वर आदि सब अहंकारके ही भ्रममें हैं । सत्यगुरुकी दया विना अहंकारसे छूटकर निर्व्रम पदमें स्थिति होना अत्यन्त कठिन है । जितने मुक्तिके देनेवाले और मुक्ति चाहनेवाले हैं सब धूरकी रस्सी बाँटकर आकाशकी कूँआसे जल पीना चाहते हैं । जब तक इनको सद्बिचार न आवेगा तब तक इनका ठिकाना नहीं लगेगा । जो पशु धर्म (विषय विलास) में भूल जावे वे तो पशु हैं, उसको कभी सत्य पथ न मिलेगा, न वह मनुष्यत्वकी ओर जा सकता है । मनुष्य आपही अपना मित्र, आपही अपना शत्रु है । अपना कोई शत्रु नहीं, सब भला, अपने मनकी ओरसे ही बुरा प्रस्ताव होता है, किसको बुरा कहा जावे किसको भला ।
साखी — बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न देखा कोय ।
जो दिल खोजा अपना, मुझसा बुरा न होय ॥
शुद्ध विचार और चिन्ताके बिना जीव कुत्तोंके समान दर दर भटकता फिरता है । सब कुछ आपही है, पर ज्ञान और बुद्धि कहें कि, आपको पहचान सके । आपही आशिक (प्रेमी) है आपही माशूक (प्रीतम) सुखी है, आपही दुःखी । आपही बन्ध और आपही मोक्ष है ।
अहंकारसे ही इसकी दुर्गति हो रही है । इस शत्रुके दो हथियार हैं, एक स्त्री और दूसरा अहंकार है । इसने ही नाना प्रकारके धर्म रीति व्यवहार प्रगट कर जगत्को फँसा रहा है ।
जब तक मनुष्य “सर्वं खलिबंद ब्रह्म” नहीं देखता, तबतक उसके भजनका तार लगा रहता है, जबतक पूर्ण परमात्माका साक्षात्कार न हो तबतक प्राणा-पन्न सदाचारमें रहकर भजन भक्तिमें लगा रहना चाहिये । जब “सर्वं वही है अर्थात् सब परमात्माही है” का ज्ञान हो जाता है, तब आपही आप अहंकार छूट जाता है । ऐसोंमें धैर्य आदि गुण स्वभावसे ही वर्तते हैं । कौसा भी कष्ट क्यों न पड़े, कभी अधीर नहीं होते तीन लोकका राज्य भी मिल जावे तो भी आनन्द नहीं मानते । कठिन तपस्या अथवा किसी नियमको हठसे धारण करनेसे मुक्ति नहीं होती वरन् विचार विवेक, द्वारा आत्मचिन्तन करनेसे मोक्ष होता है । सत्य और असत्यका निर्णय न करेगा, सार शब्दको न पावेगा । अज्ञानी लोग यह नहीं विचारते कि, “जिन देवी देवताओंकी हम पूजा करते हैं वे स्वयं बन्धनमें फँसे हैं, हमें क्या मोक्ष देंगे” वे स्वयं दूसरोंके आश्रयमें भटकते हैं मुझे क्या आश्रय देंगे ?
शब्द — भूली मालिन आयो सतगुरु, जागता है देव ।
ब्रह्म पाती विष्णु डाली, फूल शंकर देव ॥
पक्के तत्त्वकी प्राप्ति, हंसकबोर और दूसरेमें भेद प्रामाणिकता कथन
तीन देव प्रत्यक्ष तोड़े, करे किसकी सेव ॥
पाथर गढ़के मूरति कीनी, धरिक्छे छाती लात ।
जो वह मूरति साँची होती, गढ़नहारको खात ॥
भाँति बहुत और लापसी, करि करि पूजा सार ।
भोगन हारा भोगिया, मूरतिके मुख छार ॥
पाती तोड़े मालिनी, और पाती पाती जीव ।
जा पाहनको पाती तोड़े, सो पाहन निर्जीव ॥
मालिन भूली जगत् भुलाना, हम भुलावे नाहिं ।
कहें कवीर हम राम राखे, कृपा करि हरि राय ॥
जबतक जीव पांचों अहंकारोंको न छोड़ेगा तबतक कल्याण न होगा, अहंकारही सब कर्मोंका मूल एवं बन्धनका कारण हैं। जिसने अहंकार छोड़ा वह उभय लोकमें सुखी हुआ। निरहंकारी पुरुष कभी मूर्खोंकी संगति स्वीकार नहीं करता, क्योंकि, मूर्खलोग मिथ्या अहंकारमें पड़े पक्षापक्षमें फँसे होते हैं। पक्षापाती और अहंकारी तथा धर्मद्वेषियों की संगतिसे सत्यगुरु नहीं प्राप्त होते बरन् निर्पक्ष, सत्याचारी, सद्गुणसम्पन्न विद्वानोंकी संगतिसे सत्यगुरु प्राप्त होते हैं।
हे अधिकारी जनो ! नम्रता धारणकर सबके साथ प्रेमहीका बरताव करो, दीन दुखियोंको तुच्छ न समझो। क्योंकि, सत्यगुरु इन्हीं लोगोंपर प्रसन्न होता है उन्हींके स्वरूपमें वन्दीछोर मिलता है। अहं त्वमें पड़कर अपने यथार्थको हाथसे मत खोओ। शरीरके अभिमानमें न पड़ो।
सारा संसार अनित्य है, अनित्यका सब खेल है, देहाभिमानमें पड़ना अज्ञानता और मूर्खताके सिवा दूसरा क्या है ? इसीको अविद्या सागर कहते हैं। देहाभिमानी कभी सुख नहीं पाता, सर्वदा दुख सागरमें गोता खाया करता है। यद्यपि यह मनुष्यशरीर सर्वोत्कृष्ट है, पर इसके अभिमानमें पड़कर इसीके पोषण पालनमें रहनेके लिये नहीं किन्तु आत्मविचार कर सत्यपदको प्राप्त करनेके लियेही श्रेष्ठता है। यदि मनुष्य शरीर पाकर आत्मविचार न हुआ तो इससे बढ़कर नीच और तुच्छ कोई भी नहीं। क्योंकि, दूसरे शरीरोंमें पड़ा हुआ जीव स्वप्न सुषुप्ति अवस्था के कारण स्वाभाविक ही अविद्याके वशमें पड़ा होता है। केवल मनुष्य शरीर पाकर जीव जाग्रत अवस्था पर अधिकृत होता है। इसमें भी जाग्रत नहीं हुआ यानी आत्मज्ञान प्राप्त नहीं किया तो पशुसे भी तुच्छ हुआ। देहाभिमानमें पड़ा हुआ जीव सदा काल फाँसमें पड़ा रहता है, जबतक देहाभिमान न छोड़ेगा तबतक सुखका दर्शन भी न होगा। यदि लोक परलोककी सर्व सामग्री और सुख प्राप्त हो
समस्त संसार और उसके कार्य निर्गुण सगुण अम्र छाया वासना, उसका साथ
जावे तो भी देहाभिमानमें पड़ा, काल पुरुषकी आज्ञासे कभी बाहर नहीं हो सकता । यदि एक कँदीको उत्तम उत्तम पदार्थ देवें तो क्या वह अपनी स्वतंत्रताको भुलाकर कभी उनकी ओर दृष्टि डालेगा ? इसी प्रकार देहाभिमानमें कभी सुख नहीं प्राप्त हो सकता । बन्धनके समान दूसरा कौन दुख है ? देहाभिमान छोड़ देनाही मनुष्यत्व का चिह्न है । जो देहाभिमानमें फँसकर नाना प्रकारकी संसारिक विषयवासनाओं को ग्रहण करता है, उसे कभी सत्यगुरु नहीं मिल सकता ।
ये पिण्ड और ब्रह्माण्ड दोनों फूटे हैं । जो कुछ पिण्ड ब्रह्माण्डके सम्बन्धी हैं सब मिथ्या हैं । जीव संसारिक सब पदोंको प्राप्त करके भी बन्धनसे नहीं निकलता, फिर इसे पदार्थोंका प्राप्त होना कौनसे काम आया ।
गजल—पहले मैं शाहंशाहा था, आलमका क़िबले गाह था ।
फिर भी गदा दर्गाह था, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥
पहले मैं रमता राम था, नज्में दुनि दीन काम था ।
यह भी ख्याले खाम था, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥
मैं साहेब तदबीर था, जगका गुरु और पीर था ।
ताहमपुर अज्र तक्रसीर था मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥
मुझसेही नाद और बिन्द था, मैंही गुरु गोबिन्द था ।
सूफी कलन्दर रिन्द था, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥
आकाश आतश पौन हूँ, कहूँ मैं कौन हूँ ? ।
इसही लिये मैं मौन हूँ, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥
बाज़ार सौदा गर्म है, लेनेसे मुझको शर्म है ।
यह दिलका मेरे भर्म है, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥
ऋषिरायने सब कुछ कहा, कुछ भेद दर पर्दे रहा ।
मैं खोलकर बतला दिया, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥
मुझहीसे पाप और पुण्य है, सब ध्यान और सब धुन है ।
वेद और कुतुब सब सुन्न है, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥
मैं भ्रमका पुतला बना, खुदको बन्दा गिना ।
मुझहीसे पैदाइश फना, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥
नादान बखुद मगरूर है, घेरे शवे दैजूर है ।
ज़ाहिर कहाँ वह नूर है, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥
होवे भलाई यारसे, देखे अगर वह प्यारसे ।
रखले अज़ावुननारसे, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥
कर्म उपासना अम्र वटमार, चार प्रकारके आनन्द, अज्ञानानन्द
मैं जीव ब्रह्म माया बना, सब दीदनी काया बना ।
सब धर्म और दाया बना, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥
मुशिद कदमकी खाक हो, आवागमनसे पाक हो ।
उसकी मिहर बेबाक हो, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥
वे वृक्षके इनसाँ मरे, आवागमनका दुख भरे ।
आजिज विचारा क्या करे, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥
जो बोलता है तो परमात्माकी बात, जो मौन होता है तो सोचता है परमात्माका ज्ञान, जो देखता है परमात्माका दर्शन, सच्चा साधु वही है । जिसने विचार नहीं किया वह साधु पद नहीं पा सकता । विवेकही सबका सार है, साधुके लक्षणोंमेंसे विवेकही मुख्य लक्षण है । विचार विवेक वह पदार्थ है कि, सब पापों और बुरे संकल्पोंको जड़से नाश कर देता है ।
अध्याय २२
मतोंका विशेष विचार
मनुष्य मात्रके धर्म ।
बुद्धिमान् विवेकी, विचारवानोंको विचार करना चाहिये कि, मनुष्यका क्या धर्म है ? किस कारण परमात्माने अपने स्वरूपमें प्रगट किया है ? जब सोचेगा तब ज्ञान हो जावेगा कि, पंतूक पदको प्राप्त करनेके लियेही यह उत्पन्न किया गया है । इसका धन वही है, जिससे आत्मस्वरूप जाना जाता है । इस कारण मनुष्यको उचित है कि, सांसारिक प्रपंचसे मन हटाकर अपने यथार्थ कर्तव्यमें लग जाय । ईश्वरने इसे अपना स्थानापन्न बनाया है । क्योंकि, सृष्टिमें कोई भी जीव-धारी ऐसा नहीं है, जिसको कि, ईश्वरने अपने स्वरूपमें बनाया हो । मनुष्यका कर्तव्य भी सबसे भिन्नही नियत किया है; इसकी बनाबटही ऐसी बनाई है कि, जिससे इसको विवश हो ईश्वरकी आज्ञा माननी पड़े । यथार्थमें परमात्माने भक्ति का भण्डार मनुष्यको दिया है, यदि इसकी पूर्ण रीतिसे रक्षा न करेगा तो दण्डका अधिकारी होगा ।
१ जंगम, २ स्थावर, ३ वनस्पति ये तीन प्रकारोंकी सृष्टि है; १ चलने, फिरने और संकल्पादि करनेवाला जंगम, २ केवल बढ़ने और पुष्ट आदि होनेकी शक्तिवाला वनस्पति और २ जड़, स्थावर है । सदाचार देवताओंका गुण है । मनुष्य बुद्धि रखता है । इस कारण उचित है कि; पशुधर्मको छोड़ दे । देवधर्मों को धारण करे । दैवी वह धर्म है, जो कि, सर्वथाही शुद्ध हो अर्थात् दैवी सम्पत्तिसे
ज्ञानानन्दका स्वरूप विज्ञानानन्द, परमानन्द, तत्त्वमसि इत्यादिका विशद वर्णन त्वम् पदसे दो प्रकारके अज्ञानका कथन
र्ण हो । आसुरी सम्पत्तिका त्याग करे । जहाँतक होसके निषिद्ध घृणित व्यवहार
प्रीका संकल्प न भी करे । किसी जीवधारीको किसी प्रकार भी कष्ट न पहुँचावे ।
परमात्माने मनुष्यका पद देवतोंसे भी श्रेष्ठ बनाया है। क्योंकि, देवतालोग
स्वर्गमें रहतेही हैं उनको स्वर्ग प्राप्तिके लिये कुछ भी यत्न नहीं करना आता ।
इसके बिना वे मोक्षको भी प्राप्त नहीं कर सकते, मनुष्य असंख्य रुकावटोंको पारकर
स्वर्ग तथा मोक्षको प्राप्त कर लेता है । यही कारण है कि, खुदाने आदमका पुतला
बनाकर सब फिरिस्तोंको आज्ञा दी थी कि, आदमको नमस्कार करो । शैतानने आदम
से अपनेको अच्छा समझा इसी कारण लोकसे निकाला गया । मनुष्य पदके सन्मुख
स्वर्गादि सब तुच्छ हैं पर जिस प्रकार शैतानने आदमसे आपको अच्छा समझा,
वह पतित हुआ । उसी प्रकार जो अहं लावेगा अपनेको अच्छा और दूसरोंको तुच्छ
समझेगा वह अवश्य नीचेकी ओर गिरेगा । अथवा जो पक्षपात करके अपनेकी
अथवा किसी दूसरोंको देहाभिमानमें फँसावेगा, वह शैतान और शैतानका भाई
है । न जाने किस स्वरूपमें सत्यगुरु मिल जाय । इस कारण सबसे नम्र और अधीन
होकर दास भावमेंही वर्तें, यही मनुष्यका श्रेष्ठ धर्म है ।
अहंकारहीके कारण जीव अपने सत्य और सुखमय स्वरूपसे पतित हुआ
है । चौरासी लाख योनिमें भटकने और नाना प्रकारके दुःख सहनेका मूल कारण
देहाभिमान ही है । मनुष्यका पद सब पदोंसे उच्च है। क्योंकि, जीव मुक्त होकर
मिल जावे । सब देवते उसके आगे दण्डवत नमस्कार करते हैं । मनुष्यपद सब पदों
में श्रेष्ठ पद है ।
इस कारण जो मनुष्य बनना चाहता है उसको मनुष्यका लक्षण धारण
करना चाहिये । यदि राजाका कोई भी ओहदेदार, अपना कर्तव्य ठीक २ न करे
तो दरबार से निकाल देने और पदसे गिरा देने लायक होता है वह पतित भी हो
जाता है । इसी प्रकार मनुष्य अपने लक्षणको न धारण करेगा, तो किस प्रकार
मनुष्य के पदका अधिकारी हो सकेगा ।
जो चाहता है कि, मनुष्य पदको यथार्थ प्राप्त करूँ तो उसे मनुष्यके लक्षणों
को धारण करना चाहिये । मनुष्य लक्षणको धारण करकेही, परमात्माका
कृपापात्र बननेसे सर्वोत्कृष्ट मनुष्यपद पा सकता है । उदारता १, वीरता २, न्याय
३, शील ४ और गुरुकी आज्ञाकारिता येही लक्षण अपने यथार्थस्वरूपको प्राप्त
करनेके हैं । जिसने इन चार लक्षणोंको प्राप्त कर लिया उसे नाना शास्त्र पढ़नेकी
तत्पदसे दो प्रकारके ज्ञानका कथन
आवश्यकता नहीं है। शास्त्र पढ़ा हो अथवा नहीं पर उपरोक्त चारों गुणोंके आशय किो भली प्रकार समझता एवं उसीके अनुसार चलता हो तो वही सब विद्वानोंमें वद्वान् और संतोंमें संत शिरोमणि है।
जिसने अपने इन्द्रियोंको दमन कर लिया है, आसुरी सम्पत्ति क्रोध आदि को अन्तःकरणसे निकाल दिया है, दैवी सम्पत्ति शील, संतोष, धैर्य आदिको सम्यक् प्रकार धारण कर लिया है, वेही विद्वान् हैं, वेही सन्त हैं, चाहें शास्त्र पढ़े हों अथवा नहीं पढ़े हों। जिनको दैवी सम्पत्ति सम्यक् प्रकार प्राप्त है, उनको शास्त्रावलोकन के लिये समयविशेष नहीं लगाना पड़ता। हाँ ! जब आवश्यकता हो तो शास्त्र देख लेना अवश्य चाहिये पर उसीमें पचा रहकर अपने भजनको छोड़ बैठना उचित नहीं।
सारी विद्या, कला, कौशल आदिके प्रगट कर्ता शिवजी हैं। शास्त्रोंमें लिखा है कि, जब शिवजीने अपना डमरू बजाया तो उसके शब्दसे नौ स्वर ९ (अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ प्रकट हुये। प्रथम येही नौ प्रगट हुये पीछे इन्हींसे सोलह स्वर बने, जिनमें से १२ बारहका विशेष प्रयोग हुआ उसीसे वर्णमालाके सब अक्षर प्रगट हुये, जिससे अनन्त शब्द प्रवृत्त हुये। इनके बिना सब अक्षर तुच्छ हैं सबके प्रकाशक येही हैं।
वाणी वेदसे लेकर, दूसरी जो कुछ संसारमें है, चाहे गुप्त हो अथवा प्रगट, सब शिवजीसे प्रगट हुये हैं। इस कारण शब्द, पुस्तक पोथी कोही सर्वस्व समझने उन्हींके ऊपर भरोसा करनेवाले शिवजीके शिष्य हैं। शिव तमोगुणी देवता है, इसी कारण शब्दोंकेही भरोसे अपना कल्याण चाहनेवाले भी वैसेही हैं क्योंकि यह नियम है कि, जैसा गुरु होता है वैंसा चेला भी होता है।
साखी — जल प्रमाणे माछली, कुल प्रमाने बुद्धि।
जाको जैसा गुरु मिला, ताको तैंसी शुद्धि ॥ १ ॥
ऐसे शब्दोंके आधारवालों वा पुस्तकोंके आश्रय करनेवालोंमेंसे विरलाही कोई इन्द्रिय दमन करनेवाला होता है। नहीं तो विषय वासनामें ही निमग्न रहते हैं, चाहे वह किसी रूपांतरमें क्यों न हों। ऐसे लोग सच्चे सन्तों, तथा इन्द्रियजित निष्कामी पुरुषोंकी निन्दा करते हुए ठट्ठा उड़ाते हैं। यही कारण है कि, सच्चे वैराग्यवान् संत और विषयी मायामें बद्ध हैं, देहाभिमानियों विद्याभिमानियोंका कभी मेल नहीं मिला। समस्त संसार त्रिगुणात्मक है। १ सत्तोगुण २ रजोगुण ३ तमोगुण; येही तीन गुण हैं इन्हींके आधारपर सृष्टि खड़ी है।
सत्तोगुणी स्वर्गी रजोगुणी मध्यम लोकवासी अर्थात् मृत्युलोकवासी
असिपदसे दो प्रकारके विज्ञानका कथन
हैं और तमोगुणी नरकमें रहते हैं । संत सतोगुणी, सांसारिक मनुष्य रजोगुणी और विद्याभिमानी, देहाभिमानी पक्षपाती सभी तमोगुणी हैं ।
यद्यपि विद्याभिमानी तथा देहाभिमानियोंमेंसे भी कितनेक शुभ कर्ममें प्रवृत्त होते हैं पर केवल राजभय अथवा लोकभयसे । जो सतोगुणी विद्वान् हैं, वे लोक परलोकके भय अथवा शारीरिक अपमानके कारण नहीं बरन् अपने अंतरीय प्रकाश और ज्ञानसे करते हैं । वे संसारको तुच्छ जानते हैं तो भी विद्वान् और सच्चे विचारवानोंके सामने उनका कार्य माननीय और प्रशंसनीय होता है ।
भारतीय मत ।
सबसे प्रथम धर्म (मजहबों) के स्थापित करनेवाले भारतवर्षकेही ऋषि मुनि और महात्मा हुये हैं । भजन, भक्ति, ज्ञान, तथा पारलौकिक मार्गके पथ-दर्शकोंमें सबसे बढ़कर श्रेष्ठ उच्चपद भारतवासियोंका ही है । इस कारण प्रथम हिन्दू धर्मके ऊपरही कुछ लिखता हूँ ।
सहस्रों, ऋषि, मुनि, सिद्ध, साधुओंने भारतवर्षमें नाना प्रकारके मत मतांतर प्रचलित किये । षट् दर्शन छ्चानवे पाखण्ड हुए । इसी देशसे नाना सिद्धांतों को लिये हुये सहस्रों धर्म (मजहब) दूसरे देशोंमें फैले, इन्हीं (भारतवासियों) केही धम्मों और रीतिओंकी अन्य देशके पैगम्बरों और आचार्योंने नक़ल करके अपना २ धर्म स्थापित किया ।
सृष्टिकी आदिमें मनुष्य शुद्ध, छल कपटसे रहित देवतोंके समान होते हैं पाप पुण्य उनकी दृष्टिमें कुछ होताही नहीं स्वभावमेंही स्थित होते हैं । क्रमशः राग द्वेष बढ़कर लोगोंका अंतःकरण अशुद्ध होने लगता है इसीलिये मजहबकों आवश्यकता होती है; भजन, भक्ति, तप आदिकी रीति स्थापित होती है । इसी ढंग पर संसार चलता रहता है । ब्रह्माण्डमें एकही वेद अनेक रूप होकर संसारमें फैलता है । संसारके मनुष्य वेदकी ही आज्ञापर चलते हैं । अपने २ विचार और धर्मके अनुसार वेदके प्रमाण लेकर उसको पुष्ट करते हैं ।
कबीर साहिबका सत्यशब्द टकसारका शब्द ।
संतो दुविधा कहांते आई ॥
नाना भांति विचार करत है कौने मति बौराई ॥
तुरिया रूप ॥
ऋगु कहे निराकार निरलिप्ती अगम अगोचर साई ॥
आवे न जाय मरे नहिं जीवे रूप बरण कछु नाहीं ॥
पारख पद, जन्ममरणकी सात शाखाएँ कर्मकी सात शाखाएँ
सुषुप्ति रूप ॥
अथर्वण कहे प्रपंचे दीसे सत्य पदारथ नाहीं ॥
जो उठिजाये बहुरि नहि आवे मरि मरि कहां समाहीं ॥
स्वप्न रूप ॥
यजुर कहे सगुण परमेश्वर दश अवतार धराया ॥
गोपिनके संग रहस रम्यो है बहु प्रकारसे गाया ॥
जाग्रत् रूप ॥
साम कहे यह ब्रह्म अखंडित दुतिया और न कोई ॥
आपे आप रमे परमेश्वर सत्य पदारथ सोई ॥
सत्यवेदके मसला ॥
यह प्रमाण सबन मिलि कीन्हा ज्यों अँधरेको हाथी ॥
आदि बापका भर्म न जाने पूत होत नहि साखी ॥
अँधरेकी हाथी सांच है, सांचे है सगरे ॥
हाथनकी टोई कहें आँखिनके अँधरे ॥
अँधरनको हाथी भयो, कियो सबनही ध्यान ।
अपनी अपनी सब कहें, को काको कहे अज्ञान ॥
अँधरनको हाथी भ्यों, सांचो करके मान ।
हाथनकी टोई कहें, शब्दन ते पहिचान ॥
आँखन केरी आँधरे, बूझे विरला कोय ।
कहै कबीर सतगुरुकी सैना, आप मरे तब ओय ॥
झूलनासे निर्णय ॥
मिमांसा कहे सब कर्मही है, वैशेषिक समयको ध्यावता है ॥
न्यायवादी कर्तार ठाने, पातञ्जलि योग बतावता है ॥
सांख्यवादी नित्यानित्य कहे, वेदांती ब्रह्म अनुमानता है ॥
ये द्वन्द्व चहुँ दिशि मची, सो द्वन्द्वहीको सब गावता है ॥ १७ ॥
साखी - भर्मजाल जो जगतके, ताके अंग अनेक ॥
यक यक अंग दृढ इष्टकरि, गावहि निज निज टेक ॥ १८ ॥
वेद किताबकी जहांतक पहुँच है वहांही तक कहते हैं, उनका क्या अपराध । अपराध उसका है जो उनका विचार नहीं करता ।
यथा-वेद स्मृति कहै किन झूठा, झूठा जो न विचारे ॥
वेदका आशय और होता है, शब्दसे औरही अभिप्राय टपकता है पर पक्ष-
उपासनाकी सात शाखाएँ, योगकी सात शाखाएँ, ज्ञानकी सात शाखाएँ, उत्प- त्तिकी सात शाखाएँ
पाती लोग अपना अभीष्ट सिद्ध करनेके लिये नाना प्रकारकी युक्ति और प्रमाणों के आग्रहसे अपनी सत्यता प्रगट करते हैं ।
यह साधारण नियम है कि, जो जिसका पक्षपाती होता है वह अपनी आशक्तिके कारण उसके अवगुणोंको भी गुण करकेही जानता है । जैसे अपना मुंह आपसे नहीं देखा जाता वरन् दृश्यसेही देखा जाता है । अथवा जैसे कोई ऊँचे स्थानपर चढ़े बिना नीचेके सब पदार्थोंको भली प्रकार नहीं देख सकता । उसी प्रकार जबतक निरपेक्ष होकर किसी मतको नहीं देखेगा, तबतक उसके गुण अवगुणोंको नहीं जान सकेगा ।
योगियोंका मत ।
वेदहीसे योग समाधि तथा षट् दर्शन निकले माने जाते हैं । योगियोंको योग पमाधिका बड़ा अभिमान है । योगसे वे अपनेको अमर समझते हैं ।
भोगी योगीकी समता ।
भ्रममें पड़कर वे अपनेको कृतार्थ समझते हैं पर यह नहीं समझते कि, जैसा भोग बैसाही योग भी है । दोनों निर्मूल और तुच्छ हैं । योगी नादकेद्वारा ऊपरको चढ़ता है, भोगी बिन्दुके द्वारा नीचे आता है । अतः—
आधारचक्रो भेद—योगी अपान वायुके द्वारा गणेश क्रिया करता है । आधार चक्रको साधता है अर्थात्—गुदा द्वारसे जल खींचकर ऊपर चढ़ाता है फिर गिरा देता है, फिर चढ़ाता और गिराता है । ऐसेही बारंबार करनेसे आधार चक्र टूट जाता है और उससे योगी ऊपरको चलता है तब आधार चक्र सिद्ध कहलाता है ।
छः चक्रोंमें यह प्रथम चक्र है ।
स्वाधिष्ठान चक्र भेद—आधार चक्रके ऊपर स्वाधिष्ठान चक्र है । जब आधार चक्र सिद्ध होजाता है तब स्वाधिष्ठान चक्र भेदनेकी चिंता बढ़ती है इसके लिये युक्ति करता है । बारह अंगुलकी सलाका बनाकर लिङ्ग द्वारमें उसे बार बार चलाता है, जिससे उपस्थेन्द्रियका छिद्र शुद्ध और साफ हो जाता है । फिर उपस्थ इन्द्रियसे जल खींचकर चढ़ाता है । जल अच्छी तरह चढ़ाने और उतारनेका अभ्यास पड़ जाता है । तब क्रमशः दूध और मधुको चढ़ाता है । जब मधुके चढ़ाने उतारनेका अभ्यास पूरा हो जाता है तो स्वाधिष्ठान चक्र सिद्ध होता है । फिर योगी आगेको बढ़ता है ।
यह क्रिया, प्रायः वाममागी और अघोरी तथा गुसाई ब्रह्मचारी नामके भेषधारी अन्य विषयी लोग साधते हैं ।
मणिपूरक चक्र भेद—फिर योग अपान और समान वायुका सम्मिलन
स्थितिकी सात शाखाएँ
करके धातु क्रिया करनेका समय आता है। नौ गज लम्बा (कहीं कहीं पन्द्रह हाथ लिखा है) चार अंगुल चौड़ा बारीक और नम्र वस्त्र लेता है। उसको मुखके राहसे निगलकर बाहर निकालता है। पानी पीकर भीतर आंतोंको साफ करता है। फिर कपड़ेमें लगे हुये कफ आदिको साफ करके फिर निगलता है। ऐसेही वारम्बार करनेसे अभ्यास पड़ जाता है, तो गज २ भर चौड़ा और नौगज लम्बा भी निगलता और निकाल देता है। इस प्रकार जब यह क्रिया पूरी होती है तो योगी नाभीसे वायुको उठाकर मणिपूरक चक्रमें भरता है।
अनाहत चक्र — तब योगी अपान और प्राणको एक करता है। सवा हाथ की एक दातून बनाकर कण्ठके मार्गसे पेटमें चलाता है। पेटभर पानी पीकर बाहर निकालता है, जिससे अन्दर पेट, कलेजे और फेफड़ोंके, कफ आदि निकल जाते हैं इस क्रियाको कुंजर क्रिया कहते हैं। इस क्रियासे बड़ी आनन्दता और प्रकाश मिलता है। इसी क्रियासे योगी अनाहत शब्द सुनने लग जाता है। यद्यपि अनाहत शब्दमें बहुत प्रकारके शब्द सुनाई देते हैं पर सभोंमें दशप्रकारके शब्द प्रधान हैं।
१ घण्टका शब्द; २ शंखका शब्द; ३ छोटी २ घण्टियोंका शब्द; ४ भंवरेकी गुंजारका शब्द; ५ पहाड़से पानी नीचे गिरनेके समय जैसा शब्द होता है वैसा शब्द; ६ बांसुरीका शब्द; ७ शहनाईका शब्द; ८ छोटे २ पक्षियोंका शब्द; ९ वेणुका शब्द; १० चंग (सीटीका) शब्द; यही दश प्रकारके प्रधान अनाहत शब्द हैं। इनके अतिरिक्त नाना प्रकारके बाजे आदिके शब्द भी सुनाई देते हैं, जिससे मनको बड़ा आनन्द होता है। फिर इसको भी वेधके आगेको बढ़ता है।
विशुद्ध चक्र भेद — प्राण, अपान और समान तीनों वायुको कण्ठस्थानमें योगी एकत्रित (समान) करता है। इस साधनको लम्बिका योग कहते हैं। इसके साधनेके समय केवल दूधही पीकर रहना होता है, नाज नहीं खाना पड़ता। मक्खन और सँधे नमकसे जिह्वा को नित्य रगड़के पतला करना और जिह्वाकी जड़की रगोंको शनैः शनैः काटके (जिह्वाको) इतना बढ़ाना पड़ता है कि, दशवें द्वार तक पहुँच सके। जिह्वाको उलट कर ब्रह्मरंध्रके मार्गको रोककर ऊपरसे टपकते हुये अमृतको पीता है। इसके पीनेमें शरीरकी कांति तेजोमय हो जाती है। इस प्रकार अमृत पीनेका आनन्द प्राप्त हो जाता है तो योगीको लम्बिकायोग का साधन पूरा हो जाता है।
अग्नि चक्र—इस विशुद्ध चक्रके आगे अग्नि चक्र है । इसे सिद्ध करनेके लिये योगीको नेति क्रिया करनेकी आवश्यकता होती है । सूतकी एक वितेभरकी बत्ती बनाकर नाकमें चला, ब्रह्माण्डको भली प्रकार साफ करके अपने कण्ठकी वायुको अग्नि चक्रमें स्थापित करना होता है । योगी अग्निचक्रमें वायुकोस्थापित करके बड़ा आनन्द प्राप्त करता है । वायुको ऊपर चढ़ा कर जिह्वासे मार्गको रोकके कुम्भक कर समाधिको प्राप्त करता है, शरीर शक्तिहीन मृतक समान हो जाता है । दशवें द्वारमें पहुँचकर योगी निर्विकल्प समाधिको प्राप्त हो जाता है । इस स्थानपर पहुँचकर योगी अष्टसिद्धि और नव निधिको प्राप्त करता है ।
अष्टसिद्धि ।
१ अणिमा; २-महिमा; ३-गरिमा; ५-लघिमा; ५ - प्राप्ति; ६-प्रकाशिका । (काम); ७-ईशता; ८-वशीकरण ।
१ अणिमा - उसको कहते हैं कि, योगी जिस सिद्धिसे अपने शरीरको जितना छोटा चाहे बना लेता है । २ महिमाके द्वारा योगी अपनी देहको जितना चाहे बड़ा कर सकता हैं । ३ गरिमाके द्वारा जितना चाहे भारी हो जाता है । ४ लघिमाके बलसे अपने शरीरको हलकेसे हलका बना सकता है । ५ प्राप्तिसे ही योगी जहाँ चाहता है चला जाता है । ६ प्रकाशितासे मनवाञ्छित प्राप्त हो जाता है । ७ ईशतासे अपनेको सबसे श्रेष्ठ प्रमाणित करा सकता है । ८ वशीकरणके द्वारा विश्वको अपने वशमें कर सकता है ।
नवनिधि ।
१-महापद्म; २-पद्म; ३-कच्छप; ४-मकर; ५-मुकुन्द; ६-खर्व; ७-शंख; ८-नील; ९-कुन्द ॥ इन ९ के भिन्न २ गुण हैं । प्रत्येक निधि पर देवताओंकी चौकी रहती है जब इन ९ निधियोंके अभिमानी देवते वशमें हो जाते हैं तो योगी इनको प्राप्त कर लेता है वह अपनी शक्तिसे जिसको चाहे राजा बना सकता है अथवा दरिद्र करदे उसमें सब ऐश्वर्य आजाते हैं । इसी स्थानको सहस्रदल कमल कहते हैं । यहाँ ही निरञ्जनका वास है । इस स्थानपर पहुँच कर योगी, निरञ्जनसे एकता कर परमानन्दका अनुभव करता है । इसी अवस्थामें आपको अजर, अमर, सर्व शक्तिमान् समझता है । इसकी सब सिद्धियाँ दासी हो जाती हैं ।
१ नेती धोता वस्ती आदि क्रियाएं शरीरकी शुद्धि के लिये हैं, चक्र भेद तो प्राण वायुसे होता है, पाठक स्वामीजीके चक्र भेदनको इससे सुधार कर पढ़लें ।
श्लोक— महापद्मश्च, पद्मश्च, शंखो, मकर, कच्छपो ।
मुकुन्द, कुन्द, नीलाश्च. खर्वश्च, निधयो नव ॥
अपनी विद्याके बलसे त्रिकालज्ञ हो जाता है। ईश्वरके समान ऐश्वर्यको प्राप्त हो जीवसे ईश्वर हो जाता है, संसारमें ईश्वरके समान पूज्य हो जाता है। पर जब तक ब्रह्माण्ड स्थित है; तबही तक योगी भी स्थित है। जब तक योगीका ज्ञान है तबही तक उसको सब कुछ प्राप्त है। उपरोक्त सब साधना गुरुके द्वारा प्राप्त होती हैं। गुरुकोही शरण प्राप्त कर सफल काम होता है।
उपरोक्त योग क्रिया बाजीगरका कौतुक है। योगियोंको अपनी योग क्रियाका बड़ा अभिमान होता है। सब भूलमें पड़कर बन्धनमें पड़े। जिस वायुके द्वारा योगी अपना सब कुछ प्राप्त करते हैं वह स्वयं नाशमान है, गोरखनाथने योगको भली प्रकार जाँच बूझकर देख लिया तब कबीर साहब की शरण गही। योग भोग दोनोंही भ्रम और अनित्य हैं। योग भोग दोनोंकी क्रिया समानही हैं जिस प्रकार योगी छः चक्र वेधता है उसी प्रकार भोगी भी छः चक्र तोड़कर ही आनन्दको प्राप्त करता है, केवल उतनाही भेद है कि, योगी नीचेसे ऊपरको चढ़ता है। भोगी ऊपरसे नीचेको आता है। पर दोनोंही परमानन्दको प्राप्त करते हैं।
भोगियोंका चक्र भेद।
भोगका वर्णन लिखता हूँ, जिसके विचारनेसे जान पड़ेगा कि, योगी और भोगीमें कुछ भेद नहीं है जिस प्रकार योगी षट् चक्रको वेध कर योग सिद्ध हो अमर मानता है उसी प्रकार भोगी भी षट् चक्र वेधकर योग सिद्ध और अमर होता है। भोगी स्त्री पुरुष मिलकर सिद्धि प्राप्त करता है यानी भोग करनेके समय—जब मत्थासे मत्था मिलता है तो पहिला चक्र टूटता है।
जब आंखसे आंख मिलतेही द्वितीय चक्र विद्ध होता है। मुहसे मुह मिलते ही तृतीय चक्र टूटता है छातीसे छाती मिलाते ही चतुर्थ चक्र टूटता है। नाभीसे नाभी मिलते ही पञ्चम चक्र विद्ध होता है भग और लिंगका संयोग होनेसे छठा चक्र वेधा जाता है।
जब भोगी उपरोक्त रीतिसे छः चक्रोंको भेद चुकता है तब वायु और अग्निके बलसे नीचेको वीर्य उत्तरता है। वह छः चक्रोंको वेधता हुआ सातवें स्थान गर्भाशयमें जा स्थित होता है। भोगी आपको अमर जानता है क्योंकि, जबतक भोगीकी संतान पृथ्वीपर वर्त्तमान है तबतक वह अमरही है।
समन्वय—जैसे योगीको ज्ञान और सिद्धि उत्पन्न होती हैं, वैसेही भोगीको संन्तान मिलती है। जो माता पिता थे वेही पुत्री और पुत्रके रूपमें वर्त्तमान रहते हैं। दोनों (योगी और भोगी) सातवें चक्रमें आपको अमर अनुमान करते हैं। (योग भोग दोनोंही मिथ्या भ्रम हैं)।