कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
दे जमीनो जमात आम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
तूही जेरीन् दरमयों बाला । मनका मनका तुही माला ॥
तूही पैदा किया तुही पाला । तूही सबजा हुआ तूही जाला ॥
कौन पहचान अकल खाम तुम्हें । अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
इन्द्र ब्रह्मा व विष्णु भी भूले । अपने अमलोंके झोंकमें झूले ॥
कहीं पजमुरदा और कही फूले । हिसँ हैवों घर बघर डोले ॥
देरहीमो करीम नाम तुम्हें । ऐ अमल हाय सद सलाम तुम्हें ॥
आशकोंको दिखाया राहे सवाब । फासिकों के लिये शहीद अजाब ॥
सारा आलम बना खयालो खाब । कोई न देरीना सारे नकश बरआब ॥
सारे जान्दार दे गुलाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
सारे जान्दारको फँसा मारा । नहीं इस जीवका रहा चारा ॥
करके तदबीर तुमसे सब हारा । जिन्दा कर करके फिर फिर मारा ॥
देमुकद्दर बदस्त दाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
तूही बख्शिदा है अम नोअमाँ । मातहत तेरे सब हैं जिसभो जाँ ॥
तुझसे पैदा है वाणी वेदो कुराँ । अविदानो जाहिदाने जमाँ ॥
याद करते हैं सुबहो शाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
सारे मजहब जहामें जारी हैं । पीर मुरशिदकी राह दारी हैं ॥
अर्श फशोंकी सब तयारी है । आजिज इसरारसे सब आरी है ॥
पेशवा भी किये इमाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
कर्मोंके चिन्ह
कालपुरुषने जीवधारियोंके शरीरमें कर्मोंके चिन्ह हैं । इस जीवने पूर्वजन्ममें जैसे कर्म किये हैं उसकी देहमें वैसेही चिन्ह बने हैं । सब जीवोंके शरीरपर चिन्ह होते हैं परन्तु मनुष्यके शरीरपर भली भाँति स्पष्ट प्रगट होते हैं । इसी कारण मनुष्यकी देहहीसे इसके कर्मोंका भली प्रकार हिसाब किताब हो जाता है । मनुष्यके शरीरके चिन्ह देखनेसे भलाई बुराई जानी जासकती है । जिस समय स्त्री के गर्भमें वीर्य स्थिर होता है उसके भीतर जीव होता है उसजीवके साथ उसके पहलेके किये हुए कर्म बन रहते हैं उसके भाग्यके अनुसार उसका शरीर प्रस्तुत होता है, समस्त रंग डील डौल पूर्वकर्मोंके अनुसारही होता है । जब यह माता गर्भसे निकलता है तो उसके पूर्वजन्मके कर्मोंके चिन्ह उसके शरीर पर होते हैं, पाँच वर्षके भीतर ये चिन्ह स्पष्ट प्रगट नहीं होते, जैसे जैसे यह बड़ा होता जाता है वैसेही वैसे इसके पूर्व कर्मके चिन्हभी दिखाई देते जाते हैं । तिल और मत्सा
इत्यादि भी पूर्वकर्मानुसार ही प्रगट होते हैं, बहुतेरे चिन्ह छिपे रहते हैं। शिरसे लेकर पैरतक सुकर्म तथा दुष्कर्मके चिन्ह भरे हुये हैं, कहीं दुर्भाग्यके तो कहीं सौभाग्यके चिन्ह होते हैं। यदि एक स्थानपर दुर्भाग्य और दूसरे स्थानपर सौभाग्य का एकही बातपर चिन्ह हो तो उसका मध्यम फल होता है। जो सामुद्रिक जानते हैं ये बातें उनको मालूम होती हैं। सामुद्रिक विद्या अत्यन्त कठिन है। जो सामुद्रिकमें प्रवीणहो वह मनुष्यका आकार देखकर सब कुछ कह सकता है।
कबीर साहबने इस सामुद्रिकके विषयमें बहुत कुछ कहा है कर्मोंके चिन्ह देखकर सामुद्रिकका ज्ञाता सब कुछ कह सकता है। इसी विषयपर एक उदाहरण देता हूँ—मैंने किसी अंग्रेजी पुस्तकमें पढ़ा था कि, हकीम सुकरात एक पाठशालामें अपने शिष्योंको पढ़ा रहे थे। उसमें एक सामुद्रिक जाननेवाला आगया, जब सुकरातके शिष्योंने जान लिया कि, यह पुरुष इस प्रकारकी विद्या रखता है तो उसको वे अपने उस्तादके निकट लेगये और कहा कि, इस पुरुषके दोष और अवगुण कहो। वह सामुद्रिक जाननेवाला इस बातको नहीं जानता था कि, वही हकीम सुकरात है। उस समय उस सामुद्रिकीने सुकरातकी देहके सभस्त चिन्ह देखे पहचानकर बोला कि, यह मनुष्य बड़ा पाजी, दुष्ट व्यभिचारी, झूठा, ठग, दगाबाज और दुष्कर्मों है। यह बातें सुनकर सुकरातके शिष्योंने उसके ठट्ठे उड़ाये हँसते हँसते बोले कि, यह मनुष्य झूठा है। तब सुकरात जो स्वयम् सामुद्रिक विद्या जानता था कहने लगा कि, तुम लोग इसको झूठा मत समझो। यह मनुष्य जो कहता है वह सत्य कहता है। उसमें कोई सन्देह नहीं क्योंकि, उसने जो कुछ कहा उन सब बुराइयोंके चिन्ह मेरे शरीरमें परिलक्षित हैं। मेरे शरीरमें वे सब चिन्ह ज्योंके त्यों बने हुये हैं मेरा स्वभाव वैसेही था परन्तु मैंने अपनी विद्या और योग्यतासे अपनी वासनाओंको भलीप्रकार दमन किया है। अपने हृदयको दुष्कर्मोंकी ओर हिलने नहीं दिया है भली प्रकार दृढ़ कर लिया है जिसमें तनिकभी हलचल न हो। ऐसा वासना दमन किया है कि, वे मूरदेकी तरह होगई हैं। परन्तु ये चिन्ह जली हुई रस्सीकी ऐंठनके समान शेष हैं। तब सुकरातके शिष्योंको निश्चय हुआ कि, हमारा उस्ताद सत्य कहता है, इस प्रकार पुरुषार्थ प्रारब्धपर जय पाता है। मनुष्य के अतिरिक्त कितनेही हाथी, घोड़ा बैल इत्यादि पशुओंमें भी ये चिन्ह देखे जाते हैं कि, जो लोग उनको मोल लेते हैं उनके भले बुरे चिन्होंको पहचान कर दुर्भाग्य तथा सौभाग्य जान लेते हैं। उनके कर्मोंके चिन्ह साधारणतः जड़ स्थावर पदार्थ पर प्रगट नहीं होते, गुप्त रहते हैं, परन्तु कभी कभी किसी चिन्हसे उनके पूर्व जन्मोंका चिन्ह प्रगट होजाता है। सर्व साधारण देखकर जान लेते हैं। सुतरां
फुटकर उपदेश
लगभग पैंतालौस वर्ष होते हैं जब मैं चुनारगढ़ जो कि, काशीके समीप है वहाँ गया। वहाँके पर्वतपर जाके मैंने एक प्रकारका वृक्ष देखा। उस वृक्षके जड़से लेकर डालियोंतक नागरी अक्षरोंमें राम राम लिखा था। वहाँ इस प्रकारके अनेक वृक्ष थे। समस्त वृक्षोंकी यही दशा थी कि, सबमें राम राम लिखा हुआ था, जब सब वृक्षोंकी यही दशा देखी तब भली भाँति दृष्टि दौड़ाई जड़से ऊपरतक समानही देख पड़ा। अनुमान किया कि, इन वृक्षोंपर कोई आकर लिख गया होगा। इन वृक्षोंमेंसे एक वृक्षकी छाल हटाकर देखा तो छालके भीतर भी वही राम राम सुन्दरताके साथ लिखा हुआ था। तब निश्चय होगया कि, यह किसी मनुष्यके हाथोंका लिखा हुआ नहीं बरन् प्राकृतिक लिखावट है। उसके उत्पत्ति कालसेही यह गुण उसमें आगया है। उन वृक्षोंकी यह दशा देखकर मैं गांवमें गया, लोगोंसे पूछा इस वृक्षका क्या नाम है? तब लोगोंने कहा कि, इसे रामनामी वृक्ष बोलते हैं। उस वृक्षकी जड़में जो अक्षर थे उनकी स्याही बहुत काली थी और जैसे जैसे वे ऊपर जाते थे वैसेही वैसी स्याही फीकी पड़ती जाती थी। पतली डालोंकी स्याही बड़ी फीकी थी परन्तु पत्तोंके नाम तो अत्यन्त फीकी स्याहीमें होंगे कि, वे दिखाई भी न दे। उस वृक्षका वह रङ्ग ढङ्ग देखकर मैंने जाना कि, पूर्वकालका यह कोई भक्त है और किसी दोषवश वृक्ष हो गया है।
उस समय यमलार्जुन कुबेरके पुत्र याद आये जो नारद मुनिके शापसे वृक्ष हो गये थे। श्रीकृष्ण जीने उनका उद्धार किया था। उस वृक्ष की अवस्थासे उन्हें छुड़ाकर उनको यथार्थ स्वरूप प्रदान किया था। इसी प्रकार गौतम ऋषि की स्त्री (अहिल्या) गौतमके शापसे पत्थर हो गयी थी, श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे अपनी पूर्वावस्थामें, प्राप्त हुई। इसी प्रकार सब जीव कर्मके बन्धनमें पड़े हैं, जड़ और चैतन्य सब फँसे हुये हैं। कदापि किसी योग यत्नसे नहीं छूटते, उलटा दिन प्रतिदिन और अधिक फँसते जाते हैं। इसी विषयपर कबीर साहबने रमैनी कही हैं उन्हें यहीं लिखे देता हूँ।
कर्मखण्डका सत्यकबीर वचन
रमैनी-कर्म कथा अब कहूँ बखानी। जौन फाँस अटके नर प्राणी ॥
चारों खानि कर्म अधिकाई। चहूँ खानि मिलि कर्म दृढ़ाई ॥
कम्महि धरती पवन अकासा। कर्महि चन्द सूर परकासा ॥
कम्महि ब्रह्मा विष्णु महेश। कम्महि भये गौरि गणेश ॥
सातबार पन्द्रह तिथि साजा। नौग्रह ऊपर कर्म विराजा ॥
कम्महि रामकृष्ण औतारा। कर्महि रावण कंस संहारा ॥
कर्महि ले बसुदेव घर आवा । कर्म यशोदा गोद खिलावा ॥
कर्महि ते बन गऊ चराई । कर्म ते गोपी कोलि कराई ॥
कौशल्य तप कर्म जो करिया । कारण कर्म राम औतरिया ॥
कर्महि दशरथ कीन्ह उदासा । कर्महि राम दीन्ह बनबासा ॥
कर्म जाय जब धनुष चढ़ावा । कर्महि जनक सुता सिरनावा ॥
कर्म रेखते कोई न मुक्ता । लछिमन राम करम फल भुगता ॥
कर्म हरी सीता कहैं आई । दुख सुख कर्म ताहि भुगताई ॥
कर्म सागर बाँधेउ बन्ध कहिया । कर्महि जल जीवन दुख सहिया ॥
रुद्र राम की कीन्ह लडाई । भल मिलाप हनू भेंट चढ़ाई ॥
कर्म रेख नहिं मिटे मिटाई । जिव पपील लंका होय आई ॥
कर्म रेख लंकापति गयो । लंकापति बिभीषण भयो ॥
कर्म रेख सबहिन पर छाजा । कहाँ राम कहाँ रावण राजा ॥
कर्म रेख सबहिन पर होई । देखो शब्द बिलोय बिलोई ॥
कर्म रेख सागर बँध हीना । बिरला कोई चीन्हें चीन्हा ॥
साखी—कर्म रेख सागर बँध्यो, सौ योजन मर्याद ।
बिन अक्षर कोई ना छुटे, अक्षर अगम अगाध ॥
रमैनी—सागर भव सागर की धारा । नहिं कुछ सूझे वार न पारा ॥
तहवां बावन अक्षर लेखा । कर्म रेख सबहिन पर देखा ॥
कर्म रेख बँधा सब कोई । खानी बानी देखि बिलोई ॥
वेद कितेब करम कहि गाया । कर्महि को निःकर्म बताया ॥
सद्गुरु मिले तो भेद बतावें । कर्म अकर्म मध्य दिखलावें ॥
कर्म अकर्म मध्य है सोई । सो निःकर्म अकर्म न होई ॥
अक्षर सागर निर्भय वाणी । अक्षर कर्म सबन पर जानी ॥
गोरख भरथरि गोपीचन्दा । कर्म फाँस सबही पुनि फन्दा ॥
नौ औ सात चौदह एककीसा । ब्रह्मा के चौरासी भेसा ॥
कर्म फाँस तहवाँ लग राखा । जहँ लग वेदव्यास कछु भाखा ॥
दस औ द्वादस कर्म बखाना । जिन जाना तिनहीं पहिचाना ॥
कर्म अकर्म भूल जो करई । गहे मूल सो कर्म न परई ॥
अक्षर सागर मूल भँडारा । अक्षर मूल भेद उँजियारा ॥
अक्षर मूल भेद जो जाने । कर्मी होय निःकर्म बखाने ॥
साखी—कबीर—कर्म डोर चारों युगनि, सुनो सन्त सब दास ॥
तत्वभेद निःतत्व लहि, जगते रहो उदास ॥ २ ॥
गोरखजीका प्रश्न
रमैनी—सतयुग तप कीन्हे रघुराजा । कारन कर्म नन्द घर गाजा ॥
एक नांरि रघुवर दुख पावा । सोलह सहस गोपि निरमावा ॥
कारन कर्म केलि भव कीन्हा । कुञ्ज कुञ्ज गोपिन सुख दीन्हा ॥
जहँ तहँ गोरस जाय चुरावा । जहँ जहँ कर्म तहाँ ले खावा ॥
कर्म कंस ठीका आयो जबहीं । मारन कृष्ण विचान्यो तबहीं ॥
कर्म पूतना भेष बनायो । कर्म पयोधर कृष्ण लगायो ॥
कर्म कारण जो तहाँ सिधारा । कारन कर्म पीव विषधारा ॥
मारि तासु कीन्ही गति चारा । कर्म फाँस बोन्यो संसारा ॥
कर्म इन्द्र बरस्यो दिन साता । कर्म कृष्ण गिरि लीन्यो हाथा ॥
कर्महि मारि विध्वंस जो कीना । कर्म फाँस सबही आधीना ॥
कुबजा कछु कर्म जो कीन्हा । कारन कर्म कृष्ण गति दीन्हा ॥
कर्म पाताल कालेश्वरनाथा । साँवर अङ्ग भयो तेहि साथा ॥
अश्वमेध यज्ञ करत बलिराजा । कर्म ते जाय पाताल विराजा ॥
कर्महि बावन रूप बनाया । बलि राजापै दान दिवाया ॥
कर्म अहूठ नापि पग लीन्हा । तीनैं पग तीनों पुर कीन्हा ॥
आधा पाँव कर्म अधिकारी । बाँधि नृपति पातालहि डारी ॥
जहँ लगि जीव जन्तु उत्पानी । तहँ लगि कर्म राय परबानी ॥
कर्म फाँसते कोई न छूटे । कर्म पाँस सबहिन घर लूटे ॥
साखी—कर्म फाँस छूटे नहीं, केतौ करो उपाय ।
सद्गुरु मिले तो ऊबरै, नहीं तो परलय जाय ॥ ३ ॥
रमैनी—जो कुछ कर्म जगतमें करई । करि करि कर्म बहुरि भवपरई ॥
एक न होय यज्ञ व्रत ठाना । एक न पाप पुण्य पहचाना ॥
एक कर्म कुल लीन्ह उठाई । कर्म अकर्म न जानै भाई ॥
एक छापा और तिलक बनावै । पहिरि मेखला साधु कहावै ॥
वैष्णव होय करे षट् कर्मा । वेद विचार सदा शुचि धर्मा ॥
कथा पुराण सुनै चितलाई । कर्महि सुमिरै बहुविधि भाई ॥
विष्णु सुमिरि तब बहुविधिकियो । सो निःकर्म विष्णु नहीं भयो ॥
कर्मकी डोरि बँधा संसारा । क्यों छूटे उतरे भवपारा ॥
एक अभङ्ग एकादशी करई । तन छूटे वैकुण्ठहि तरई ॥
यह वैकुण्ठ न स्थिर होई । अन्त कर्मगति परलय सोई ॥
करै कर्म वैकुण्ठहि जाई । कर्म घटे भव जल फिरि आई ॥
योगी योग कर्मको साथे । किरिया कर्म पवन आराधे ॥
योगी कर्म पवनको किरिया । भुगतै कर्म देहु पुनि धरिया ॥
संन्यासी जो बन बन फिरही । होय निःकर्म कर्म फिर परही ॥
जीयत दग्ध देहको करई । जटा बढाय व्यसन परिहरई ॥
कोई नगन कोई वज्र कछोटा । भरमत फिरै सहे पग ढोटा ॥
राजद्वार पावै औतारा । भुगतै कर्म अकर्म व्यवहारा ॥
पण्डित जन सब कर्म बखानी । नख शिख कर्म फाँस अरुझानी ॥
कर्म धर्मकी युक्ति बतावे । दान पुण्य बहुविधि अरथावे ॥
वज्र दानले जन्म गँवावे । होई ऊँट बहु भार लदावे ॥
एक जो करे बरत अवतारा । होइहै शूकर स्वान सियारा ॥
शूकर श्वान हो कर्म जो भुगता । विन निःकर्म न होईहैं मुकता ॥
साखी-कबीर-बहुबन्धनसे बांधिया, एक विचारा जीव ।
जीव बेचारा क्या करे, जो न छुडावे पीव ॥
रमैनी-शब्द भेद निःशब्द बताओं । करि निःकर्म हंस मुकताओं ॥
निरालम्ब अवलम्ब न जाने । शब्द निरन्तर भेद बखाने ॥
पाप पुण्यकी छोड़े आशा । कर्म धर्मते रहे उदासा ॥
रहे उदास नाम लौ लाई । तत्त्वभेद निःतत्त्व समाई ॥
तीरथ व्रतके निकट न जाई । भरम भूतको दर्ई बडाई ॥
सुख सम्पति नहिं विपत्तिविचारे । काम क्रोध तृष्णा परचारे ॥
क्रिया कर्म आचार विसारे । होय निःकर्म कर्म निरवारे ॥
सो ग्रहै जो निग्रह काया । अभि अन्तरकी मेटै माया ॥
शील स्वभाव शरीर बसावे । अन्तर स्थिर ध्यान लगावे ॥
ब्रह्म अग्नि मनमें परजाले । ताको विष्णु चरन परछाले ॥
गहै तत्व निःतत्व विचारा । काम क्रोधको करै अहारा ॥
सहज योग सो योगी करई । कर्म योग कबहुँ नहिं परई ॥
धन योवनकी करै न आशा । कामिनि कनकसे रहे उदासा ॥
चहुँ दिशि मंसा पवन ककोले । ज्ञान लहर अभ्यन्तर डोले ॥
उन मुनि रहे भेद नहिं कहई । तत्वभेद निःतत्वहिं लहई ॥
जो कोई आय अग्नि होय दहई । आप नीर होय नीचा बहई ॥
मन गयन्द गुरुमतसे मारा । गुरु गम लूटे ज्ञान मँडारा ॥
भरा होय सो सन्मुख जूझै । भोदू शब्द भेद नहिं बूझै ॥
कबीरजीका उत्तर प्रासांगिक
दुखिया होय रैन दिन रोई । भोगी भोग करे सुख सोई ॥
दुर सुख भोग सोग सम जाने । भली बुली कछु मन नहि आने ॥
भली बुरीका करे सो त्यागा । निश्चय पावै पर बैरागा ॥
सोंगी अक्षय रैन दिन बाजै । सिद्ध साधु तहैं आसन छाजै ॥
साखी—आसन साधे आपमें, आपा डारै खोय ।
कहैं कबीर सो योगी, सहजै निर्मल होय ॥
भावार्थ—इस प्रकार सब जीव बन्धनमें पड़े हैं । कर्मकी फौसी सब जीवों को लगी हुई है । इससे छूटना असम्भव हुआ है । सहस्रों युक्तियाँ करता है परन्तु प्रतिदिन बँधा जाता है । ये तीनों लोक भवसागर (उत्पत्ति सागर) कर्मने बनाये हैं, इसी कर्मने यह भवसागर बनाया है । यही कर्म उस पर अधिकार कर रहा है । कर्मसे ब्रह्माण्ड और पिण्ड दोनोंकी स्थिति है । अनगिनती ब्रह्माण्ड हैं जिनकी कि, सीमाही नहीं है । यह ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनों अनगिनती नानाप्रकारके जीवोंसे परिपूर्ण हैं । जीवोंका अनगिनती स्वरूप तथा स्वभाव है । कि, जिनका कुछ विवरण हो ही नहीं सकता । किसीका वय लाखों वर्षका है । कोई ऐसे हैं कि, एक बार स्वोंसके आने जानेसे बहुत बार उत्पन्न होते और मर जाते हैं । कोई गरम हैं कोई अत्यन्त ठण्डे हैं ये सब जीव वासनासे भरे हुए हैं । इस भवसागरमें पड़े गोता खाया करते हैं । कभी स्वर्ग कभी नरक और कभी मृत्युलोकमें रहते हैं । इस चौरासी लाख योनिके जीवोंको सुख नहीं मिलता सदैव दुखी सुखी हुआ करते हैं चारों खानिके जीवोंमें न कोई सुखी और न सन्तुष्ट हैं, कर्मोंके बन्धनसे इनका आवागमन हुआ करता है । यह भवसागर पशुओंसे बसा हुआ है, इसमें प्रायः सच्चे मनुष्यका अभाव है, जीवोंके ही कर्मोंसे प्रेरित होकर ईश्वरको अवतार धारण करना पड़ता है, जीवोंके सुख दुखोंकी व्यवस्था उनके कर्मोंके अनुसार ही होती है, गोपियोंको गोपियोंके कर्मोंके अनुसार तथा कंसको कंसके कर्मोंके अनुसार फल मिला है । साहिबका हंस वही है जो कर्म जालको कच्चे धागेकी तरह काट दे क्योंकि, जबतक अपनेको कर्मोंके बखेड़ेसे नहीं बचाता उस समयतक साहिबके हंसोंमें नहीं संभाला जा सकता इस कारण कर्मोंपर विजय पाना प्रत्येक मुमुक्षुका कार्य होना चाहिये ।
नौ कोष
१ अन्नमयी कोष । २ शब्दमय कोष । ३ प्राणमय कोष । ४ आनन्दमय
१ दर्शनशास्त्रमें, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, और आनन्दमय ये पाँच कोष प्रसिद्ध हैं । कबीर सागर नं. ११ बोध सागर जीव धर्म बोधमें लिखा है कि—“पंचकोष यहि-
कोष । ५ मनोमय कोष । ६ प्रकाशमय कोष । ७ ज्ञानमय कोष । ८ आकाशमय कोष और ९ विज्ञानमय कोष । ये नौ कोषोंके नाम हैं ।
अब इनका संक्षेप विवरण सुनो :-
१. जो अन्नसे उत्पन्न हो और अन्नहीमें फँसा रहे वह अन्नमय कोष कहाता है ।
२-जो शब्दसे उत्पन्न हुआ और शब्दहीमें बन्द रहे वो शब्दमय कोष है ।
३-जो प्राणसे उत्पन्न होकर प्राणमें ही फँसा रहा वह प्राणमय कोष है ।
४-जो आनन्दसे उत्पन्न हो आनन्दमें ही फँसा रहा वह आनन्दमय कोष है ।
५-जो मनसे उत्पन्न हो मनमें ही बन्द रहे वह मनोमय कोष है ।
६-जो प्रकाशसे उत्पन्न होकर प्रकाशमेंही बन्द रहे वह प्रकाशमय कोष है ।
७-जो ज्ञानसे उत्पन्न हो एवं ज्ञानकेही बन्धनमें रहे वह ज्ञानमय कोष है ।
८-जो आकाशसे उत्पन्न हुआ होकर आकाशमेंही बन्द रहा हो वह आकाशमय कोष है ।
९-जो विज्ञानसे उत्पन्न हुआ विज्ञानमेंही बँधा,रहा वह विज्ञानमय कोष है ।
इन नौ कोषोंमें फँसा हुआ पारख पद नहीं पासकता, शरीर छूटतेही पुनः मातृगर्भमें प्रवेश करेगा । ये नौ कोष इस जीवके संकल्पसे हुए हैं । इन नौ कोषों को भली भाँति पहचानकर इन्हें छोड़ दे । पारखगुरुको पहचानकर उसकी ओर झुके, अपनेको पारखगुरुकी कृपाके योग्य बनावे तब पारखगुरु उसपर कृपा करके सब कोषोंके दोष गुण दिखा करके पारखपदपर स्थिर कर देंगे ।
अन्नमय तथा प्राणमयके बीच शब्दमय कोष है प्राणमय तथा मनोमयके बीचमें आनन्दमय कोष है । मनोमय और ज्ञानमयके बीचमें प्रकाशमय कोष है । ज्ञानमय और विज्ञानमय के बीचमें आकाशमय कोष है ।
मनुष्य जब समस्त उद्योग जप, तप, पूजा वन्दना योग समाधि, तीर्थ व्रत, आचार क्रिया इत्यादि जितनी युक्तियाँ हैं उनके और गुरुवोंके द्वारा दृढ़कर थक गया, छुटकारेका कोई पथ नहीं मिला तब इन नौ कोषोंमें उसने अपनी स्थिति की । इन घरोंके अतिरिक्त और किसी घरका पता नहीं लगा तब विवश होकर इन नौ कोषोंमें ही रहने लगा । इसकी कोई युक्ति काम न आई कि, जिससे कि आवागमनकी राह बन्द हो, इसमें किसका दोष है ॥
—विधि पहिचानी । प्रथम, अन्नमय, कोष बखानी ॥” इस तरह पाँचों कोषोंको पहिचान ले, सबसे पहिले अन्नमय कोषका वर्णन करते हैं । इस तरह कबीरपन्थके भी सांप्रदायिक ग्रन्थोंमें ५ ही कोष मिलते हैं । ये शब्दमय, प्रकाशमय, ज्ञानमय और आकाशमय चार और कहाँसे और कैसे बढ़ गये ? यह कबीरपन्थी और दार्शनिकजन अवश्य विचार करेंगे ।
नौ कोषोंका विवरण
१-अन्नमय कोष देह स्थूल । २-शब्दमय कोष देह विराट् । ३-प्राणमय कोष देह लिङ्ग । ४-आनन्दमय कोष देह हिरण्यगर्भ । ५-मनोमयकोष देह कारण । ६-प्रकाशमय देह अव्याकृत । ७-ज्ञानमय देह महाकारण । ८-आकाशमय देह मूल प्रकृति । ९-विज्ञानमय देह कैवल्य ।
१ अन्नमय कोष-जाग्रित अवस्था । क्षिमाभूमिका । पपील मार्ग । पृथ्वी-तत्त्व । रजोगुण । मुद्रा खेचरी । त्रिकुटी स्थानके जठराग्नि । घट आकाश काम जल । प्रध्वंसाभाव । ये इस कोषको हैं ।
२ शब्दमय कोष-स्वयं सिद्धि अवस्था । विराट् देह । पृथ्वी तत्त्व । गुण ब्रह्मा । मुद्रा सम्मुखी । कण्ठस्थान । विविध भूमिका । निर्मर्ग । महद अन-घट । जलपर्व । विम्बाकाश । सत्यलोक स्थान । महाप्रध्वंसाभाव । महाजल । ये इस कोशके हैं । अपना शरीर छोड़कर * योगी लोग दूसरे शरीरमें घर बना लेते हैं । सो शब्दमय कोष है ।
३ प्राणमय कोष-श्रीहठ स्थान । स्वप्नावस्था । सूक्ष्म जल तत्त्व । सतो-गुण । मुद्रा भूचरी । कामाग्नि । मठ आकाश । उद्यान वायु । विहङ्ग मार्ग । लिङ्ग देह ।
४ आनन्दमय कोष-आनन्दमय कोष-हिरण्य गर्भ देह । विशिष्टाद्वैत-भाव । गोलाहठस्थान । विष्णुलोक । मनभूमिका । तुरिया अवस्था (स्वप्न और सुषुप्तिके मध्य) योग अग्नि । रेचक वायु जल मार्ग । चाचरी मुद्रा । विष्णु-गुण । अभराकाश ।
५ मनोमय कोष-कारण देह । हृदय स्थान । सुषुप्ति अवस्था । स्वलिष्टा भूमिका । मन्दाग्नि । महदाकाश । अनन्य भाव कपिमार्ग । मुद्रा उत्मोलिनी । अग्नि तत्त्व । तमोगुण । प्राण वायु ।
६ प्रकाशमय कोष-हेठ पीठस्थान । अव्याकृत देह । शिवलोक । शिवगुण । चित्त भूमिका । प्रातः सन्धि अवस्था । ज्ञान अग्नि । अहम्भाव । पोहर्ष वायु । सूर्य मार्ग । शाम्भवी मुद्रा । चिद् चिद् विशिष्टाकाश । अनिमादिक आठ सिद्धि ।
७ ज्ञानमय कोष-नाभिस्थान । महाकारण देह । शुद्ध सतोगुण । तुरिया अवस्था । सुलिष्टता भूमिका । अत्यन्ताभाव । बड्वाग्नि । समान वायु । मन मार्ग । अगोचरी मुद्रा । चिदाकाश । सविकल्प समाधि ।
- योग शास्त्र विभूति पादके ३८ वें सूत्रमें तो यह लिखा हुआ है कि, चित्तके बन्धनके जो शरीरमें कारण हैं उनके ढीला करनेसे एवं चित्तके जाने आनेके मार्गके साक्षात्कारसे चित्त दूसरे शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है इसके साथ सभी दूसरे शरीरमें घुस जाते हैं ।
८ आकाशमय कोष—मूल प्रकृति । देह पूर्णगिरी । स्थान निराश्रय लोक । ईश्वरगुण । अहम् भूमिका । मध्याह्न अवस्था । ब्रह्म अग्नि । कुम्भकवायु । आत्म भावनी मुद्रा । आनन्दाकाश । तुरियावस्था ये हैं ।
९ विज्ञानमय कोष—कैवल्य देह । भ्रमर गुफास्थान । तुरियातीत अवस्था । अन्तःकरण भूमिका । सर्वाधिष्ठान कलातीत कला । भावातीत भाव । पूर्ण बोधनी मुद्रा । निजाकाश । स्फूर्ती वायु । जैसाका तैसा । आत्मा आत्मा गुण । निर्गुण निर्गुण ब्रह्म । ये नौ कोष इस जीवके घर ठहरे । इन्हींमें यह भ्रमा करता है । जिस घरमें पहुँचता है वँसाही बन जाता है ।
आयु
इन पाँचों अहंकार तथा नौओं कोषोंमें जितने परमेश्वर और सेवक फँसे हैं सबकी आयु धन बल और विद्या आदि सभौका अन्त होता है । अंत रहित इसमें कोई नहीं । इस पर मैं कबीर साहबका वचन लिखता हूँ —
छन्द — जग चारो चल जाय चौकड़ी एक कहावे ।
तेउ बहत्तर जाँय इन्द्र यकराज करावे ॥
जाँय अठाइस इन्द्र विरञ्ची कोर भजीजे ॥
ऐसे दिनन सौ बरस विधि की आयु सुनीजे ॥
ब्रह्मा सहस व्यतीत विष्णुको घण्ट बजीजे ।
विष्णू द्वादश जाँय रुद्रकी पलक पुरीजे ॥
रुद्र एकादश जाँय ईशकी निमिष कहीजे ॥
ईश सहस चलजाँय शक्ति संहार करीजे ॥
शक्ति सहस चलजाँय कल्पका भेद जो लीजे ॥
विधि पति सोई कहत हैं भयाकल्प परमान ॥
कहैं कबीर अनगणित हैं गणित न आवे ज्ञान ॥
इन आयु और श्रेणियोंके ऊपर जो बड़ी बड़ी श्रेणियोंके प्रतिष्ठित पुरुष हैं उनका क्या हिसाब कहा जाय ? वो मनुष्य की समझमें क्या आवे । यह सब सीमाके भीतर हैं । इन सभोंका अन्त है । अनन्तको कौन जाने ?
सत्त्व तीन लोककी परमेश्वरी कर रहे हैं । सत्त्वकी उच्चश्रेणीपर कितने सन्त अधिकृत हैं उसकी इनको कुछ खबर नहीं है इन ऋषियोंसे बढ़ कर और भी ऋषि हैं उनसे बढ़कर भी और हैं । उनसेभी बढ़कर और हैं । इस प्रकार कितने ऋषि मुनि एक दूसरेसे उच्च श्रेणीपर अधिकृत हैं । केवल शक्ति तथा प्रभावमें सीमाबद्ध हैं । इन ऋषीश्वरोंके सामने मनुष्य क्या वस्तु और क्या बल रखता है।
जैसे मनुष्योंके समीप कीड़े मकोड़े ऐसेही उनके समक्ष मनुष्य क्या वस्तु हैं। बरन् इससे भी तुच्छ है इन सभोंका अन्त है, अनन्त कैसे जाना जावे ?
वेदके सिवा दूसरी पुस्तकोंकी सामर्थ्य नहीं कि, इन सूक्ष्म बातोंको प्रगट करें सूक्ष्म बातोंकी उनको तनिकभी सुध नहीं। साधुओंमेंभी कदाचितही कोई ऐसा होगा जो इन बातोंको समझे और सोचे, ये बातें बड़ी सूक्ष्म हैं। इन बातोंके समझनेवाले केवल हंस कबीर हैं, दूसरेकी ऐसी बुद्धि नहीं कि, भली प्रकार इसको जान सके। इन अहंकारी और नौ कोषोंमें सब कौतुक क्रीड़ा होरही है।
मनुष्यके सोचने समझने तथा कार्य करनेके लिये यह सब सूक्ष्म बातें दिखाई गई हैं। जो मनुष्य हो वो इन बातोंपर ध्यान देकर विचार करे। जिस किसीकी समझमें ये बातें ठीक मालूम होंगी अपनेको अन्धकारमें फँसा देखेगा वह अवश्यही प्रकाशमय पथको ढूँढ़ेगा। इन पांचों अहंकारों तथा नौ कोषोंसे बाहर निकालनेवालेका उपदेश जब पावेगा तब यह सब बातें जो लोक और वेदमें प्रबलित हैं सभी यथार्थ रूपसे जैसीकी तैसी दिखाई देंगी।
उनपर अत्यन्त खेद है जिनके कि, विचारमें इन पांचों अहंकारों और नौ कोषकी बातें नहीं आईं। फिरभी वो आपको पण्डित तथा ज्ञानी समझते हैं। अपने बन्धनपर तनिक भी ध्यान नहीं करते और दूसरेके छुटकारेके लिये उद्योग किया करते हैं। जिसका गुरु स्वयम् राह भूला हो तो उसका शिष्य किधर जायगा ? ऐसा कौन भाग्यवान् है जो पारख गुरुको ढूँढ़कर उसके चरणकी धूल हो जावे ? संसारकी गन्दगियोंसे विशुद्ध हो जावे ? धन्य वह मनुष्य है जिसने पारख गुरुको शीघ्रातिशीघ्र पा लिया।
वासनाओंकी बाढ़से कोई विशुद्ध तथा स्वच्छ हो नहीं सकता। सब गुरु पुकारते हैं कि, विषय वासना नरककी राह है, इनसे दूर भागो। परन्तु तो भी गुरु तथा शिष्य विषय वासनाके बन्धनमेंही फँसे हुए हैं बिना पारखगुरुके किसीमें छुडानेका सामर्थ्य नहीं। वैद्य तो रोगीसे कहता है कि, तुम संयमसे रहो नहीं तो मर जाओगे। वैद्यका कहना सुनते तो हैं पर उसपर कोई स्थिर नहीं है। इसपर मैं एक दृष्टांत लिखता हूँ।
एक राजाने आम खाया वो उस आमके खानेसे बीमार हो गया तब वैद्यने बहुत औषधि की अत्यन्त कठिनाईसे आरोग्य हुआ वैद्यने राजासे कह दिया कि, अब आप भविष्यमें फिर कभी आम न खाना, यदि आम खाओगे तो मर जाओगे। आपका यह रोग ऐसाही है। राजाने यह जान ली। एक दिवस राजा अपने बागमें सैरके लिये गया बगीचेका माली अच्छे अच्छे भीठे आम राजाके सामने लाया।
मंत्रियों तथा निकटवर्तियोंने मना किया कि, महाराज ! आप इसको मत खाओ क्योंकि, वैद्यने मना किया है पर राजाने कहा कि, मैं खाता नहीं देखता हूँ जब देखा और बास लिया तब राजाके मनमें इच्छा हुई और आमको खागया अमीरों का कहना न माना । दो चार आम जो मनमें आया खालिया और बीमार हो गया । फिर बहुत कुछ औषध की गई पर आरोग्य न हुआ अन्तमें मर करही पीछा छूटा ।
इसी प्रकार सब गुरु मना करते हैं पर विषय वासनाओंसे कोई बच नहीं सकता, इसने सबको मार लिया है । हृदयसे लेकर ये सब बन्धनके कारण हैं, बिना इन सब पर विजय पाये बन्धन नहीं कट सकता ।
अध्याय १८
पुनर्जन्म
भवसागरमें चारों खानके जीव चौरासी लाख योनिमें आवागमन किया करते हैं । इस कारण अब मैं पुनर्जन्मका वर्णन करता हूँ । यह सत्यगुरु कबीर साहब का कथन है कि, सब जीवोंको आवागमन हुआ करता है । समस्त भारतवासी इस बातको स्वीकार करते हैं । कदाचित्ही कोई इस बातको स्वीकार न करे पर मूसई, ईसाई तथा मुसलमान इस बातको नहीं मानते । कोई कोई उनमेंसे भी मान लेते हैं । इस कारण मैं पुनर्जन्मको उनकी पुस्तकोंसे प्रमाणित किया चाहता हूँ जिसमें उनकी अज्ञानता नष्ट हो वे इस बातको मानें । विशेषतः जिस बातको स्वसंवेद स्पष्ट कहता है उस बातके ऊपर शंका करनेवाला सच्चा कैसे ठहर सकता है ?
नज्रम-तनासुख कहें सत्य साहब कबीर ।
मिहर जिसके इनसां हो रोशन ज़मीर ॥
मुकद्दस स्वसंवेद उसका कलाम ।
बर्रा नस्त नामे अलेहुस्ललाम ॥
तीनों धम्मोंके महाशयगण और सिद्ध साधु तथा समस्त पृथिवीके विद्वानों और समस्त पुनर्जन्म न माननेवालों को विदित हो कि, बिना पुनर्जन्मके माने एवं आवागमनके अस्वीकार किये पापोंकी अधिकता और वासनाओं पर कभी भी विजय नहीं पासकते । जीवोंपर दया दृष्टि न होगी, विवेक विचार तथा सोचनेकी बुद्धि न होगी तो बन्ध और कण्ठही रहेगा ।
गज़ल-बकौले सतगुरु सच है तनासुख ।
कि चौरासी करे जीव तँ तनासुख ॥
करे परवाज जब इस कालबुदसे ।
हो सदहा बार पै दरपै तनासुख ॥
कभी छूटे न इस खुमकी खुमारी ।
जो फिर फिर नोश करता मैं तनासुख ॥
जो बदखसमी अमलकी हो रही है ।
तो करता बारहा यह कैं तनासुख ॥
न सूझे और न यह रह रास्त बूझे ।
रही है घेर हर रुख दिये तनासुख ॥
जो खींच और धुवाँ दिलसे उठावे ।
कि पीता शौकसे यह नय तनासुख ॥
बहर सिमतो बहर सूरत बहर हाल ।
बहर जानिव नगर हर शय तनासुख ॥
कि वरकत मिहवां मुरशि इसे आजिज ।
हुआ लारेव तू निर्भय तनासुख ॥
पश्चिमके देशवासी जिनका कि, कामही मांसाहार तथा निर्दयताका है, वे जीवके पुनर्जन्मको अस्वीकार करते हैं। इसका कारण यह है कि, उस देशके पैगम्बरोंमें से किसीको आवागमनका ज्ञान मालूम नहीं था। यद्यपि प्रकाशकी हलकी झलक कभी कभी उनके मनपर भी आजाती थी परंतु उस प्रकाशकी स्थित नहीं होती थी। बिजलीके समान प्रकाशका प्रागटच हुआ और फिर अतर्धनि हो गया। सभी नबियोंमें हजरत आदम सबसे बड़े थे। अब पहले में उनके ज्ञानका वृत्तान्त लिखता हूँ। इसके साथही पश्चिम देशके पैगम्बरोंके आवागमनका हाल न जाननेके कारण सभी बात सप्रमाण लिखूंगा।
हजरत आदम—परमेश्वरके पुत्र थे। उनकी कांति तथा तेज सारे पैगम्बरोंसे बढ़ चढ़कर था कबीर साहबने कहा है कि, आदम ब्रह्माके औतार थे। इस खुदाके प्यारे पुत्रके साथ स्वयम् खुदा तथा फिरिश्ते वार्तालाप किया करते थे। हजरतको अनेक बार खुदाका दर्शन हुआ था। आपको लड़नी विद्या नहीं थी, न आपको खुदाकी पहचान थी। खुदासे जो आज्ञा पाते उसको व्यवहारमें लाते थे आपको खुदाका दर्शन तो मिलताही था परन्तु खुदाकी पहचान नहीं थी, क्योंकि, अन्तर प्रकाश बिना खुदाकी पहचान असम्भव है। आपको केवल शारीरिक दर्शन प्राप्त था, मानसिक दर्शन नहीं था। क्योंकि जिसको मानसिक दर्शन होता है वह वार्तालापके अधीन नहीं होता ऐसे प्रकाशित हृदयवालेको कोई धोखा भी नहीं दे
१७ अध्याय । बन्धनके कारण
सकता । यदि आपको खुदाकी पहचान होती तो आपको सांपकी सूरतमें शैतान कद पि न बहका सकता तौरीतमें उत्पत्तिके तीसरे बाबकी आठ आयत पर्यन्त लिखा है कि, सर्पके स्वरूपमें शैतान आया और आदम तथा हौवाको बहकाया । जिस फलके लिये खुदाने मना किया था, दोनोंने उसी फलको खाया इसी कारण दोषी होकर वैकुण्ठसे निकाला गया । यहांतक कि, इस सापने अपने विचित्र रङ्ग ढङ्ग दिखाये अनुमानसेभी मालूम नहीं किया कि, यहां तो दालमें काला है, खुदाकी आजोललंघन करके फल खालिया ।
लिखा है कि, पहले शैतानने हौवाको बहकाया । भला यदि हजरतको आत्मिक प्रकाश तथा भीतरी विद्या होती तो इतना भी न जानते कि, शैतान मेरी पत्नीको बहकाने आता है मैं इसकी रक्षा करूँ उसके पाजीपनेसे विज्ञ करूँ उसको आपत्तिसे सचेत करूँ । नबियोंके प्रतिष्ठित नबीको इतनी दूरदर्शिता एवं अन्तर-दृष्टि नहीं थी । फिर आपको आवागमनकी सुधि कैसे मिले, जान बूझकर भी कोई धोखा खाता है ? अपनेको तथा अपनी सन्तानको दीनता तथा दुर्बस्थामें डालता है ? यदि आप सर्परूपी शैतानको नहीं पहचान सके तो मनुष्यरूपी खुदाको कैसे पहचान लिया कि, वह वास्तवमें खुदा था अथवा अन्य न जाने कौन था ।
कुरान शरीफके टीकाकारोंने लिखा है कि, जब प्रथम बार गर्भिणी हुई तब शैतान उसके समीप जाकर पूछने लगा कि तेरे पेटमें यह क्या है किस पथसे बहिर्गत होगा । यह बात सुनकर हौवाने उत्तर दिया कि, मैं नहीं जानती । तब शैतानने कहा कि, कदाचित तेरे पेटमें कोई पशु हो वो तेरा पेट फाड़कर निकले । इतनी बात कहकर शैतान तो चला गया । हौवाने आदमसे सब हाल कहा । दोनों बहुत चिन्तित हुये । दोनों इसी चिन्तामें पड़े थे कि, कुछ दिवसोंके पीछे पुनः शैतान आया पूछा कि, तुम दोनों चिन्तित क्यों हो ? उन्होंने अपने दुःखका हाल कहा, तब शैतानने कहा कि भयभीत मत हो, मैं इसमें आजम जानता हूँ मेरी प्रार्थना स्वीकार हुआ करती है । मैं खुदासे प्रार्थना करूँगा कि हौवाके पेटसे तुम्हारे स्वरूप का पुत्र उत्पन्न हो, एवं सुखसे बाहर आवे । परन्तु बात उतनी है कि, तुम उस पुत्रका नाम अब्दुलहारिस रखना । आदम और हौवाने शैतानके धोखेको न जाना जब उनका प्रथम पुत्र उत्पन्न हुआ तब उसका नाम वही (अब्दुलहारिस) रखा और कुफ्रके भागी हुये ।
हसनकी तफसीरमें लिखा हुआ है कि, जिस समय शैतान वैकुण्ठमें था; उस समय उसका नाम अब्दुलहारिस था । जानना चाहिये कि, वही हजरत आदम हैं जिसके कि भीतर खुदाने अपनी रूह फूँककर अपने स्वरूपका बनाया और
समस्त फिरिश्तोंने दण्डवत किया, वे तनिकभी शैतानी धोखेको नहीं समझ सके उसके बहकानेसे धोखेमें आ गये ।
हजरत नूह-हजरत आदमके पीछे हजरतनूह (जो दूसरे आदम कहलाते हैं) बड़े प्रतिष्ठित नबी हुये । उनको भी खुदाका दर्शन हुआ करता था एवं खुदासे वार्तालाप भी हुआ करता था । खुदाके आज्ञानुसार बाढ़के समय (जल प्रलयके समय) आप नावपर सवार हुये ।
तौरीतमें उत्पत्तिके पुस्तकका (८) बाब (३ स १३) आयत पर्यन्त लिखा है कि, बाढ़के उपरान्त आपका नाव अरारात पर्वतपर ठहरी । नूहने खिड़की खोल देखकर जानना चाहा कि, पृथ्वीका जल शुष्क हुआ अथवा नहीं, इस अभिप्रायसे आपने नावपरसे एक कौवा उड़ाया और वह उड़कर गया । जबतक पृथ्वी का जल शुष्क न हुआ वह काग आया जाया करता था । फिर नूहने एक कबूतर उड़ाया जिसमें मालूम करें कि पृथ्वीका जल अभीतक सूखा है वा नहीं । कबूतर पृथ्वीपर अपने पंज्जे लगानेका स्थान न पाकर फिर नावमें आया । क्योंकि, समस्त पृथ्वीपर जल था, उस कबूतरके आनेपर नूहने उसको अपने हाथोंपर ले लिया उसने सात दिवसोंतक सन्तोष किया । आगे फिर कबूतरीको उड़ाया वह सौझके समय जैतून की पत्ती मुँहमें दबाकर फिर उसके पास पलट आयी । तब नूहने जान लिया कि, अब पृथ्वीपर जल कम हुआ है । इसके पीछे कबूतरीको उड़ाया । वह फिर कभी न आयी तब नूहने जान लिया कि, अब पृथ्वी सूख गयी, तब और भी सात दिन ठहरा । इसके पीछे उसने नावकी छत खोलकर देखा कि, भूमि शुष्क हो गई अथवा नहीं । खुदाकी आज्ञासे नूह समस्त मनुष्यों और जीवोंसहित पृथ्वीपर आ खेतीमें लग गया ।
समीक्षा-अब जानना चाहिये कि, जिस मनुष्यको परमेश्वरका दर्शन हो उससे वार्तालाप हुआ करे उसमें इतना सामर्थ्य भी न हो कि, बिना पशुओंके सहायताके वह पृथ्वीका सूखा और गीला होना जान सके, यदि तीक्ष्ण दृष्टिवाला मनुष्य पर्वतसे पृथ्वीकी ओर देखे तो पृथ्वीकी तरी और उसका सूखापन देख सकता है । यदि नङ्गी आंखोंसे नहीं देखे तो दूरबीनसे तो अवश्यही देख लेगा । जिसको पृथिवीके गीला और सूखा होनेका हाल न मालूम हो उसको आवागमन की विद्या कैसे ज्ञात हो सकती है ।
३ हजरत इबराहीम-नूहके पीछे खुदाके प्यारे और श्रेष्ठ नबी हुए । आप भी खुदाका दर्शन किया करते थे । आपसे खुदा वार्तालाप किया करता हुआ मिहमानी कबूल किया करता था । जब खुदा आपके घर मिहमान आया तब
हृदय हृदयकी व्याख्या
आपने बड़ी मिहमानी दिखाई । देखो तौरीतमें उत्पत्तिके (३८) बाब (१) से (८) आयत पर्यन्त लिखा है कि, इबराहीमको मनुष्यके स्वरूपमें तीन फिरिश्ते मिले जब हजरतने उन फिरिश्तोंको देखा तब आपने पृथ्वी पर्यन्त झुककर दण्डवत् करके कहा कि, ऐ मेरे खुदा ! ऐ मेरे खुदा ! ! और आपने तीनों खुदाओंकी बड़ी आवभगत की । एक बछरा मारकर तला मांस रोटी लिया । तीनों खूदाओं ने इबराहीमको आशीर्वाद दिया अपना भेद प्रगट किया कितने ईसाई समझते हैं कि इन तीनों फिरिश्तोंमें दो फिरिश्ते थे तीसरा स्वयम् यह बाह् था जिसका कि नाम अत्यन्त प्रतिष्ठापूर्वक लिया जाता है ।
फिर कुरानके (१४) सिपारा सूरे कहफके सातवें स्कूअमें लिखा है कि, अब इब्राहीमके समीप तीन रिफिश्ते आये तब आपने मिहमान समझकर एक बछरेको मारकर तला इन तीनों मेहमानोंके सामने धर दिया । उन्होंने भोजनसे अपना हाथ खींच लिया न खाया तब इबराहीमने अनुमान किया कि, वे तीनों चोर हैं क्योंकि, उस देशकी यह परिपाटी थी कि, जो कोई किसीका धन अपहरण किया चाहता था वह उसका नमक न खाता था । यदि नमक खाये तो उसके घर चोरी न करे । इबराहीमके पास माल तथा पशु अधिक थे इससे जाना कि, ये तीनों निस्सन्देह चोर हैं । इस कारण मेरा नमक नहीं खाते हैं । जब इबराहीमके मनमें यह सन्देह हुआ तब उन तीनोंने जान लिया और बोले कि, ऐ इबराहीम ! हम तीनों फिरिश्ते हैं चोर नहीं । सद्मम तथा अमूरा दोनों नगरोंका नाश करने आये हैं । इससे इबराहीमने विश्वास कर लिया कि, ये निश्चयही फिरिश्त हैं । जब तीनोंने अपना भेद कहा तब फिरिश्ता जाना, नहीं तो चोरही समझा था । यह बात उस समयकी है जब इबराहीम वय एक सौ बीस वर्षका था । आपके पहिले उम्रके वृत्तान्त कुरानमें इस प्रकार लिखा है कि, आप लड़कपनमें जब दिनको देखते थे तब आप कहते थे कि, यह मेरा खुदा है, जब दिन बीतकर रात आती थी तब कहते थे कि, वह तो मेरा खुदा नहीं था पर यह मेरा खुदा है । जब रातभी बीतजाती तब कहते कि, यह तो मेरा खुदा नहीं, जब सूर्य को देखते तब उसको अपना खुदा बताते । जब वह छिप जाता तब कहते कि, वह मेरा खुदा नहीं, कारण यह कि, वह तो अस्त होगया । जब चन्द्रमाको देखते तब कहते कि, यह मेरा खुदा है जब वह भी छिप जाता तब उससे भी निराश होते । फिर तारोंको खुदा कहते । फिर उनसे भी निराश होजाते ।
रोजतुस्सफामें हजरतकी अन्तिम वयका विवरण इस प्रकार लिखा है । इबराहीमने खुदासे प्रार्थनाकी थी कि, ऐ खुदा ! मेरी इच्छा बिना मेरे प्राण नाश
न हों मैं स्वेच्छा पूर्वक मरूँ। खुदाने आपकी प्रार्थना स्वीकार की। जब आपकी मृत्युका समय आया तब आपकी आत्मा निकालने, अत्यन्त बृद्ध मनुष्यका स्वरूप धारण करके इजराईल फिरिश्ता आया। आपने उस मनुष्यको देखा तो बड़ी प्रतिष्ठा और सम्मानसे बैठ गया। बड़ी मय्यर्था सहित उसके समक्ष भोजन रखे, खाना खानेको कहा। वह बृद्ध जब भोजन करने लगा तब उसका हाथ बहुत कौपता था। जब वह कोई ग्रास उठाता और मुँहकी ओर ले जाता तो कैंपकैंपीके कारण कभी वह ग्रास उसके कानमें जा पड़ता कभी आँखोंमें कभी नाकपर यदि कभी कोई ग्रास मुँहमें पड़ जाता तो उसी समय वह पायखाना फिर देता था। इस बूढ़े की यह अवस्था देखकर इबराहीमने उससे पूछा कि, आपका वय क्या है, तब वह बोला कि, तुमसे मेरा वय दो वर्ष अधिक है। यह बात सुनकर इबराहीमके मनमें बड़ी चिन्ता हुई कि, दो वर्षके उपरान्त मेरी भी यही दशा होगी। इस जीवनसे तो मरनाही उत्तम होगा। तब आपने भयभीत होकर खुदासे प्रार्थना की "हे खुदा ! अब मेरी आत्मा मेरे शरीरसे निकाल"। उसी समय इजराईलने कपट करके इबराहीमकी जान निकाल ली। इबराहीम इजराईलके छलसे पूर्णतया अनभिज्ञ रहे अन्त तक उसको न पहचान सके ?
४ हजरत इसहाक-इबराहीमके पीछे उनके पुत्र इसहाकको पेंगम्बरकी पदवी मिली। देखो तौरीतमें उत्पत्ति के (२७) और (२८) बाबमें लिखा है कि, जब हजरत इसहाकके बुढ़ापेका समय था। आपको आँखोंसे दिखाई न देता था आपके दो पुत्र थे, बड़ेका नाम ईसू और छोटे का नाम याकूब था। एक दिन बड़े बेटे ईसूसे कहने लगे कि, ऐ बेटे ! आज तू मेरे वास्ते भोजन लेआ जिसमें मैं भोजन करके तुझे बरकत दूँ। यह बात सुनकर ईसू शिकारके लिये चला। कारण यह कि, ईसूको शिकारका मास प्रिय था और वह बड़ा शिकारी भी था।
५ हजरत याकूब या इसराईल इसहाककी स्त्री रबका थी उसने जाना कि, आजके दिन इसहाक ईसूको बरकत देगा। रबका अपने छोटे पुत्र याकूबको ईसूसे अधिक चाहती थी। उसने याकूबसे कहा कि, ऐ पुत्र ! आजके दिवस तुम्हारा पिता ईसूको बरकत देगा इस कारण तू जा और बकरीका एक बच्चा ले आ क्योंकि, याकूब एक चरवाहा था। याकूब तुरन्त ले आया, रबकाने तुरन्तही उस बकरीके कें बच्चेको मार कर पका डाला। बड़ा स्वादिष्ट मांस बनाया अच्छे स्वादिष्ट भोजन बनाये। याकूबको ईसूका वस्त्र पहनाया, ईसूके शरीरमें बाल थे, याकूबका शरीर साफ था इस कारण याकूबकी देह जहाँ खुली थी हाथ और गरदन इत्यादि उस जगह पर रबकाने बकरीके बच्चेकी खाल लपेट दी। जिसमें
ईसूकीसी देह मालूम हो । फिर याकूबके हाथमें खाना देकर कहा कि, अब तू अपने पिताके निकट जाकर कह दे कि, ऐ पिता ! मैं तेरा पुत्र ईसू हूँ भोजन ले, खाकर मुझको बरकत दे । तब इसहाकने उसको अपने समीप बुलाया उसके समस्त शरीरको टटोला और कहा कि, बोली तो याकूबकीसी है पर शरीर ईसूकासा है । तब इसहाकने भोजन किया याकूबको बरकत दी । इधर तो याकूब अपने पिताको भोजन कराके और बरकत लेकर चला गया । इधर ईसूभी आखेट मारकर लाया बहुत स्वादिष्ट भोजन पकाकर अपने पिताके निकट लेकर गया कहा कि, ऐ पिता ! भोजन कर और मुझे बरकत दे । यह बात सुनकर इसहाक बोला कि, ऐ पुत्र ! अभी तो तू बरकत लेकर गया था । अब पुत्रः कैसे पलट कर आया । फिर अफसोससे कहने लगा कि, तेरा भाई याकूब धोखा देकर तेरे नामसे बरकत ले गया । यह बात सुनकर ईसू चिल्ला चिल्लाकर रोया और कहा ऐ पिताजी ! मुझको भी बरकत दो । उसका रोना तथा चिल्लाना किसी काम न आया दोनों भाइयोंमें बड़ा विरोध उत्पन्न हुआ ईसूने याकूबको मार डालनेका विचार किया । आगे रक्काकी सलाहसे याकूब घर छोड़कर भाग गया अपने मामू लाबनके घरमें रहने लगा ।
याकूबका व्याह—जब अपने मामू लाबनके घर गया तब लाबनने कहा कि, यदि तू सातवर्षतक मेरी सेवा करेगा तो मैं तुझको अपनी पुत्री दे दूंगा । याकूब अपने मामू लाबनकी सात वर्षतक भेड़ बकरियां चराता रहा । सातवर्ष बीतनेके बाद लाबनने अपनी बड़ी पुत्री, जो कि, आँखोंसे चौँधली थी, रातको धोखा देकर याकूबसे विवाहदी जबरान्तबीत गई और सबेरा हुआ तब याकूबने देखा तो मालूम किया कि, मेरे मामूने तो मेरे साथ धूर्तता की अपनी चौँधरी पुत्री मुझको दी । राहील जो सुन्दरी थी, जिसकी आशापर मैंने सेवा की थी वह नहीं दी । इस बातसे अत्यन्त दुःखी होकर लाबनसे शिकायत प्रगट की । तब लाबनने कहा कि, यदि तू सातवर्षतक मेरी सेवा और करे तो मैं तुझको अपनी दूसरी बेटीभी विवाह दूंगा । तब हजरत सातवर्षतक और अपने मामूकी सेवाकी भेड़ियां चराते रहे । तब उसने अपनी दूसरी पुत्री राहिलको भी याकूबके हवाले किया, इन दोनों पत्नियोंके लिये याकूबने अपने मामूकी चौदह वर्षतक भेड़ें चराई थी । याकूबका ग्यारहवां पुत्र बड़ा सुन्दर था । उसके भाइयोंने उसे ईर्षा वश मारकूटकर कुएँमें डाल दिया । उसका वस्त्र रक्त्तसे भिगोकर याकूबके समीप लेजाकर कहा कि, तेरे पुत्र यूसुफ को किसी हिंसक जन्तुने फाड़ खाया, यह रक्त्तसे भीगा हुआ उसका कुरता देखो । यह बात सुनकर याकूब बधाई मार मारकर रोने लगा हाय हाय करते और रोते
रोते अन्धा होगया । क्योंकि, वह यूसुफको बहुत ज्यादा प्यार करता था । उसे यह तनिक भी ज्ञात नहीं हुआ कि, उसका पुत्र मारकूटा निकटही कूएमें पड़ा है । बिल्कुल नहीं जान सका कि, उसपर कैसी आपत्ति आयी । उनको भी खुदाका दर्शन होता था, खुदासे बातें भी हुआ करता थीं, आप खुदाके प्रियपत्र थे । आपका दूसरा नाम इसराईल था । आपके बारह पुत्रोंसे बारह सरदार, बनीइसराईलके नामसे प्रख्यात हुये । बारहोंकी बहुतेरी सन्ताने हुई । तौरीतमें उत्पत्तिके (३२) बाब(२४) से (३१) आयत पर्यन्त लिखा है कि, याकूब अकेला रह गया था । वहां प्रातःकाल तक एक मनुष्य उससे कुशती लड़ता रहा जब इसने देखा कि वह मनुष्य उसपर विजय नहीं, हुआ, तब इसने उसकी जाँघको भीतरकी ओरसे छुआ और याकूबकी जाँघ उससे कुशती लड़नेमें चढ़ गयी । तब वह बोला कि, मुझको जाने दो सबेरा हो गया । तब वह बोला कि, जब तक तू मुझे बरकत नहीं देगा तबतक मैं तुझको न जाने दूंगा । उससे इसने पूछा कि, तेरा नाम क्या है, वह बोला याकूब वह बोला कि, भविष्यमें तेरा नाम याकूब न रहेगा बरन् इसराईल होगा कि, तून खुदा और सृष्टिमें प्रतिष्ठा पाई । विजयी हुआ । याकूबने कहा कि, मैं तेरी प्रार्थना करता हूँ तू अपना नाम मुझे बता । वह बोला कि, तू मेरा नाम क्यों पूछता है ? उसने उसको वहां बरकत दी । याकूबने उस जगहका नाम फनीआईल रखा कहा कि, मैंने परमेश्वरको स्पष्ट देखा मेरे प्राण बच रहे हैं । जब वह फनी-आईलसे जा रहा था तब सूर्य्य उसपर प्रकाशित हुये, वह लँगड़ा था । इसी कारण बनी इसराईल उस नसको जो जाँघमें भीतरकी ओर है आजतक नहीं खाते क्यों कि, उसने उसको छुआ था जो कि, याकूबके जाँघकी नसके भीतरवाली है । नज्म-नबी ऐसे और ऐसा परवरदिगार । तो फिर क्यों न हों पैरुवा रुस्तगार ।। भरो पेट अपना करो ऐशा जैश । कि, चूँ और चिंगूसे तुझे क्या है कार ।
६ हजरत मूसा-हजरत याकूबके पीछे हजरत मूसाको पैगम्बरीकी पदवी मिली । यद्यपि इस बीचमें दूसरे दूसरे नबी भी हुये, पर हजरत मूसाको अन्यान्य नबियोंसे अधिक श्रेष्ठता है । खुदाने सीना पर्वतपर आपसे वार्तालाप की । जितना खुदा कहता था उतनाही मूसा जानता था । अपने भीतरी प्रकाशका बल कुछ भी नहीं रखता था ।
अहादीससहीहा और सूर किसीमें लिखा है कि, दस वर्षतक मूसा, शईब पैगम्बरकी पुत्रीके साथ विवाह करनेके लिये उसकी भेड़ बकरियां चराता हुआ सेवा करता रहा । उसने अपनी पुत्री सफूराके साथ मूसाका विवाह कर दिया । तौरीतमें लिखा है कि, जब मूसा सीना पर्वतपर खुदासे बातें कर रहा था, उस
समय सब यहूदी सोनेका बछड़ा बनाकर पूज रहे थे । जब वह पर्वतसे नीचे उतरा कुछ पटिया लिखकर लाया । यहूदियोंको बछड़ा पूजता देखकर क्रुद्ध हुआ । और उन पटियोंको पटक दिया वे फूट गयीं अपने बड़े भाई हारूनकी दाढ़ी पकड़कर खींची ।
कुरानमें लिखा है कि, जब मूसाने झाड़ीमें आग लगी देखी तब उसने अपने घरवालोंसे कहा कि, मैं जाता हूँ इस झाड़ीसे आग लाता हूँ जब वह उसके समीप गया तब उसमेंसे आवाज आयी “ऐ मूसा ! मैं तेरा तेरे बाप दादोंका खुदा हूँ” । मूसा अनभिज्ञ था कि, वह खुदा था या आग थी ।
हजरत मूसा और खयाजा खिज्ज—फिर कुरानके सूरै कहफके (१५) सिपारः (९) रूकूअकी (५९) आयतसे (८१) आयत तक मूसा और खयाजा खिज्जका किस्सा बराबर चला है, मूसाने खिज्जसे कहा है कि, मैं तेरे साथ चलूंगा । तब खिज्जने कहा कि, मेरे साथ न चल. क्योंकि, तू मेरे साथ चलने योग्य नहीं । कारण यह कि, तेरी बुद्धि शुद्ध नहीं है, तू मेरे काय्योंमें हस्तक्षेप करेगा । तब मूसाने उत्तर दिया कि, मैं तेरे कार्यमें कदापि हस्तक्षेप न करूँगा । तू मुझे अपने साथ चलने दे । खिज्जने मूसाको अपने साथ लिया कहा कि सावधान, तू मेरे काय्योंमें कभी हस्तक्षेप न करना जबतक मैं स्वयम् तुझसे कुछ न कहूँ । तब कुछ दूर चलकर दोनों एक नावपर सवार हुए । खिज्जने उस नावको फाड़ डाला । मूसाने कहा कि यह तूने क्या किया यह काम अच्छा नहीं किया । नाव फाड़कर तू लोगोंको डुबाया चाहता है तब खिज्जने कहा कि, क्या मैंने तुझसे पहले नहीं कहा था कि, तू मेरे, साथ चलने योग्य नहीं । क्योंकि, तू मेरे काय्योंमें हस्तक्षेप करेगा । तब मूसाने प्रार्थना की कि, अबकी बार तो तू मेरा अपराध क्षमाकर, फिर मैं हस्तक्षेप न करूँगा । अबका प्रथमही अपराध हुआ है क्षमा करने योग्य है ।
फिर दोनों आगे चले । एक बस्तीमें एक लड़का मिला उसको खिज्जने मार डाला । फिर मूसा बोला कि, यह तूने क्या काम किया कि, एक निरपराध बालकको मार डाला । खिज्जने कहा कि, क्या मैंने तुझसे पहलेही नहीं कहा था कि, तू मेरे साथ चलने योग्य नहीं फिर मूसाने विनय भी कि, अबकी बार तो मेरा दोष क्षमा करो, अब मैं तेरे काय्योंमें हस्तक्षेप न करूँगा ।
फिर दोनों आगे चले । एक गांवमें पहुँचे । वहाँके मनुष्योंसे भोजन माँगा, किसीने न दिया । फिर खिज्जने उस गांवमें एक दीवार बनाई जो जीर्ण होकर गिरा चाहती थी । खिज्जने भली भाँति परिश्रम करके उस दीवारको उठा सुदृढ़ कर दिया । मूसाने कहा कि, यदि तू चाहता तो अपनी मजदूरी लेता । खिज्जने कहा