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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

स्थूल शरीर या कञ्चे तत्त्वकी देह लिंग देह या सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर

दुख देकर, चोरी और धूर्तता आदि नाना प्रकारके निषिद्ध पाप कर्मोंसे धनको कमावेगा, या परतन्त्र होकर नाना प्रकारकी झिड़कियोंको सहता हुआ दासपनसे कुछ प्राप्त करेगा । जो शरीरके ही पोषण पालनमें लगा रहेगा वह सत्यको नहीं प्राप्त कर सकता क्योंकि, सारे विकारोंका मूल आशक्ति है । शरीरकी आशक्ति छोड़े बिना अपने स्वरूपकी सुधि नहीं होती । शरीरकी आशक्तिमें पड़ा हुआ सारा संसार कोल्हूके बेलके समान दिनरात चढकर खा रहा है, इसको कभी भी सुख नहीं होता । इस पर कबीर साहिबने एक शब्द कहा है—

शब्द — खसम विन तेलीके बेल भये ।

बैठत नाहीं साधुकी संगति नांधे जनम गये ॥

बहि बाँह मरे पचे निज स्वार्थ यमको दण्ड सहे ।

सुत दारा धन राज काज हित माथे भार गहे ॥

खसमहिं छोड़ि विषय रंग राचे पापके बीज बोये ।

झूठ मुक्ति नर आश जिवनकी प्रीतिको झूठ खोये ॥

लख चौरासी जिया जन्तुमें सायर जात बहे ।

कहैं कबीर सुनो भाई साधो उन स्वानकी पूछ गहे ॥

जीव विषयवासनामें पड़ा हुआ चौरासी लाख योनियोंमें मारा मारा फिरता है, उसको ज्ञान विवेकका अवकाशही नहीं मिलता, सदा भय और आशामें फँसा हुआ सन्देह सागरमें गोते खाया करता है ।

साखी—कबहुँ चित्त संसारमें, कबहुँ लोकको भीति ।

क्षणहूँ सुख पावे नहीं, कहा हार कहैं जीति ॥

यह अपने मनमें तनिक भी नहीं सोचता समझता कि, मातृगर्भमें पोषण करनेवाला कौन था ? किसने वहाँ भोजन पहुँचाया ? किसने रक्षा की ? किसने सुखपूर्वक बाहर निकाला ? जन्म लेनेके प्रथमही माताके स्तनोंमें दूध भर दिया । जब तक मातृगर्भमें उलटा लटकता था तबतक किसने किस युक्तसे पेटमें खानेको पहुँचाया ? गर्भसे बाहर निकालने पर किसने दो सेवक प्राणापन्न सेवा करनेवाले उपस्थित कर दिये । वे प्राण जाय तो जाय पर बालककी रक्षामें किसी प्रकारसे उत्साह नहीं हारते थे जब तक युवावस्थाको न पहुँचे तब तक अपना जान माल सब उसके ऊपर निछावर करते रहे जिस विश्वम्भर सर्व रक्षक माताके गर्भमें पोषण और रक्षा की, सुखपूर्वक जन्म दिया वो सर्वदा रक्षा किया करता है । ऐसे दयालु सर्व रक्षक सर्व शक्तिवान पिताको भूल कर असत्य संसारसे प्रेम करना मनुष्यत्व नहीं है इस संसारमें कोई किसीका नहीं होता, सब अपने २ स्वार्थके चाहनेवाले हैं ।

महाकारण, ज्ञान देह

माता पिता पुत्रकी रक्षा सेवा स्वार्थ जानकर करते हैं, पुरुष स्त्रीको अपने सुखके लिये चाहता है, स्त्री पुरुषको स्वार्थवश हो प्यार करती है, सांसारिक प्रेम कोई न कोई स्वार्थसेही हुआ करता है । निःस्वार्थ हर समय रक्षा करता है वही सत्य परमात्मा अपना है, नहीं तो कोई किसीका नहीं है । माता पिताके अन्तःकरणमें बालककी सेवा करनेका अङ्कुर डालनेवाला भी वही है । यदि उसकी कृपा न हो तो माता पिता अथवा कोई भी प्रेम न करे । सारे जीवधारी अपने बच्चोंको प्रेम और प्रीतिके साथ पालते हैं । किसी प्रकारकी आशा नहीं रखते । ऐसा प्रत्यक्ष देखनेमें आता है कि, जबतक बच्चा स्वयं अपना व्यवहार चलाने योग्य नहीं होता तबतक (मनुष्यके अतिरिक्त सब जीवधारी उसका पोषण और पालन करते हैं, पीछे कोई सम्बन्ध नहीं रहता, पर मनुष्य अपने बच्चोंकी सेवा और पोषण पालन करके उससे बदलेकी इच्छा रखते हैं । जिसने उनके (माता पिता) अन्तःकरणमें बालकका प्रेम और प्रीति वही बदला भी दिला सकता है, परमात्माको धन्य है जो सर्व कुछ करनेपर भी किसीसे कुछ नहीं चाहता । पशु अपने बच्चोंसे इतनी प्रीति करते हैं कि, मनुष्य उनकी समता नहीं कर सकते, जैसा कि, इसी पुस्तकके देखनेसे प्रगट होगा कि, पशु अपने बच्चोंसे कितनी मुहब्बत करते हैं पर वे कुछ भी बदला नहीं चाहते । उससे उल्टा मनुष्य नाना प्रकारकी आशाओंसे घिरा हुआ अपनी सन्तानसे बहुत कुछ चाहता है । प्रत्येक जीवधारी कामके वशमें होकर स्त्रीसे सम्भोग करता है, जिससे सन्तानकी उत्पत्ति होती है । जिस प्रकार अपना सुख विचार कर सम्भोग करता है उसी प्रकार प्रेमके वश होकर उसकी रक्षा और पोषण पालन करता है, यह ईश्वरी नियम है । माता इस कारण भोजन नहीं करती कि, वह बच्चेको पहुँचे, वरन् वह भूखको मिटानेके लिये भोजन करती है पर विश्वम्भर स्वयं बच्चेको गर्भमें भी भोजन पहुँचाता है, जिसको विश्वम्भर पर विश्वास है वह संसारकी आशाओंसे मुक्त होता है । जो सर्व रक्षक परमात्माको सत्य जानता है, वह सांसारिक प्रेम और प्रीतिसे निर्मूल होजाता है । सांसारिक स्नेहको मूर्खता । अज्ञानता समझकर त्याग देता है ।

गजल

मुहब्बत देह और दिलबर नहीं होता नहीं होता ।
कि, दो मिहमानका एक घर नहीं होता नहीं होता ॥
चढ़े मन्सूर और ईसा हजारों दारके ऊपर ।
कि रौशन रोजमें शब्रे पर नहीं होता नहीं होता ॥

षष्ठ विज्ञान देह

नहीं मैं तुही तू है जब हूँ मैं तब तू नहीं हरगिज ।
भजन विन वह सुजन दरबर नहीं होता नहीं होता ॥
सनमके खालो ख़तको देख जिसने हज उठाया है ।
कि, इस दिल पर हजे दीगर नहीं होता नहीं होता ॥
नहीं रूईदगी बाकी रहे कोई तुख्म बिरियामें ।
कभी बरपा कोई अशजर नहीं होता नहीं होता ॥
जमुरंद नीलमो मिर्जा और लाले बढुखाशॉनी ।
गोहर गंजों मेहर दरबर नहीं होता नहीं होता ॥
जो होवे खाने खंजीर और फिर तैर तारीकी ।
कि, वह मंजिल परी पैकर नहीं होता नहीं होता ॥
यह जान बाजी न हो हरगिज वज्रज कोई मर्द गाजीके ।
कि, बुजहिल फौजका सरवर नहीं होता नहीं होता ॥
न करत खीर तन मन धन तसद्दुक करनेमें आजिज ।
कि, आशिक धडके ऊपर सर नहीं होता नहीं होता ॥

मनकी इच्छाओंको पूरा करनेसे यह मोटा और प्रबल हो जाता है ।
जब यह प्रबल हो गया तो फिर वशमें लाना बहुत कठिन हो जाता है । इसी
कारण साधु लोग मनकी इच्छाओंको पूरी नहीं होने देते, वरन् इसके उलट
करके मृतक तुल्य बान लेते हैं । जब यह इच्छा पूर्वक पदार्थोंको नहीं पाता तो
शनैः शनैः आपही मुर्वके समान हो जाता है । जो बुद्धिमान् हैं वह शरीरसे
आसक्ति करके इसीमें नहीं लगे रहते वरन् जैसे होता है संसारकी मुख्य वास-
नाओंको ठिकाने लगाते हैं अर्थात् संसार मुख्यवृत्तिका निरोध करके सत्पुरुषमें
जोड़ते हैं । इसी विषय वासनाकी इच्छाने सारे संसारको खा लिया है ।

शब्द — नर तेरी कबकी बैरिन जवानी ।

विषया लीन भयो मतवारो निर्गुन भक्ति न जानी ।
बीस बरसकी घरमें सुन्दरी रहे अलमस्त दिबानी ॥
निसिवासर वाहीसे लुबधे ज्यों माँखी मिष्ठानी ॥
उड़ते बार उड़ा नहिं जाई नारी नरककी खानी ॥
कहें कबीर सुनो भाई साधो यही विधि बहुत दिवानी ॥

शब्द — सन्तो बाधिनका खायो लोई ।

तीन लोकमें पड़ गई बाधिन खात न जाने कोई ॥
काजल नैन दशन चमकावे कसकस बाँधे गाढ़ी ।

हिन्दुओंकी तरह मुसलमान भी अम्रमें

लुकि २ अन्तरगत पैठी खाय करेजा काढी ॥
कान गहू काजी नाक गहू मुल्ला औलिया भेष है प्यारी ।
राज कुमार रङ्गपति सुन्दर मोहि लिये नरनारी ॥
जेहि स्वाद षट्दर्शन मोहे पण्डित कियो खिहोड़ी ।
सुखदेव स्वामी कन फट्टा गुरु उनहूँकी नाड़ि मरोडी ॥
शिव सनकादिक औ ब्रह्मादिक बाधिन मुख सब आये ।
गिरि गोवर्द्धन नखपर लीन्ह्यो तेहि बाधिन धर खायै ॥
उत्तपति परलय दोउबिच बाधिन सतगुरु भली विचारे ।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो हरिजन बाधिन मारे ॥

बाधिनने सबको खा लिया, जिसको सतगुरुका पता मिला कायाके मार्ग-
मेंही उनको प्रकाश मिला है ।

नजम — जो तन मनो धनके हंकारसे । न टूटा न जूटा निरंकारसे ॥
सो तनोमन धनसे गिरफ्तार है । न कोई राह्रास्त रफ्तार है ॥
सो यह तन सरासर त अफुन भर । फिक गौरसे उसको देखो जरा ॥
कोधानो सोई सातसो पूर हैं । यह नापाक है गन्दगी धूर है ॥
मिलेगी सो जा खाक्रमें अन्तको । तजो नेह देही भजो कंतको ॥
गलत इसको जाने है जाहिद वही । सो पावे खुदापाक वाहिद वही ॥
बलैयात आफादका घर यही । महल आमदो रफदका दर यही ॥
निगह कीजसे कृष्ण और रामको । करो गौर आगाज न अनजाम को ॥
यह दुनियाँका दुख भोगकर चले । कैरो जादव और पांडो अमर कले ॥
धरे तन कहाँ कोन जगमें सुखी । गूही और तपी सिद्ध योगी दुखी ॥
जमीन आसमानके जो बाशिदगान । गिरफ्तार गम है सब बे गुमान ॥
धरे तन लगी सङ्ग तेरी बला । कनक कामिनी रङ्गमें जारुला ॥
परख दोनों तलवारकी धार है । मिले इनसे उनका गला पार है ॥
यह जड़ देह तो आत्माराम है । तू चैतन गुनों सारेका धाम है ॥
किया जड़की संगततू चैतन्य हो । निराकार निराधार तू धन्य है ॥
त्रिगुण पाँच पञ्चीसके कोटमें । पुराने डुराने इसी ओटमें ॥
सो तदबीर कर कर्म फन्दा कटे । कि जड़ संग देहीका गन्दा कटे ॥
तू मनके मते जो करे कामको । पड़े नर्कमें ना लखे रामको ॥
यही मन निरञ्जन निराकार है । यही खींच नफ़सानीमें डार है ॥
यही लोक तीनोंका भूपाल है । यही जगत कारन महाकाल है ॥

सब अम्रमात्र, हंस देह

छले ज्ञानी ध्यानी हटा ध्यानको । छले सिद्ध मारे विषेवानको ॥
जो धनका तुझे ध्यान दिलमें बड़ा । गिरफ्तार लज्जातमें जा पड़ा ॥
यही धन सभी पाको साज है । धरे सो धरे देख जमराज है ॥
इन्ही तानको फाँस तू जानले । हमलमें दर आना नरक मानले ॥
दिया गुरुको तीनों तू अपनी बला । तेरो पापका भार सर सेटला ॥
जहर देके तूने अमी लेलिया । बताओ भलाजी न बदला किया ॥
कहो कौन है जगमें ऐसा कोई । सुधा देके लेवे जहरको जोई ॥
सिवा एक गुरु देवके कौन है । अगम ज्ञान दाता दया भौन है ॥
दिया जिसने सत् नामका जाप है । गई भ्रम पहचाने तब आप है ॥
सभी रिद्धि और सिद्धि इसके गुलाम । जो मुश्दिद मिहरबानीसे लेवेनाम ॥
कहो गुरुसे कहाले मिलेंगे वहीँ । बदल नामकी पास मेरे नहीं ॥
न गुरु देवसा जगतमें मीत है । पचेगा जिन्हे गुरु चरण प्रीति है ॥
मेरी आजिजी खाक सारी तमाम । हमः उग्रकर शुक्र उसका मदाम ॥
मेरी इन कसारीको कीजे कबूल । मिहरबान मुश्दिद मुकद्दस रमूल ॥
मैं आजिज फिरोतन न तनमें है जोर । तू क्रादिर खुदाको बन्द है बन्दी छोर ।

संसारियोंको उपदेश ।

उसकी बुद्धि और विवेकको धन्य है जिसने अपनेको अज्ञानतामें फँसा हुआ देखकर, शीघ्रही सत्सङ्ग खोज अपने आचारको ठीक कर सदाचारी बन गया । उस पर शोक है जो देख जानके भ्रममें फँसा उसीके पक्षपातमें पड़कर सत्य असत्यका विचार न करके झूठको सच्चा कर दिखलाता है उसको सिद्ध करनेके लिये नानाप्रकारके प्रमाणों और युक्तियोंको काममें लाता है । आप सत्य-पथ भूला है, दूसरोंको भी कुमार्गमें डालता है । उसका जीवन तुच्छ है जिसने सत्य भेदको न पाया, जिसने विवेक ज्ञानको प्राप्त न किया । जिसको ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ, वह वेदपाठी हुआ तो क्या ? कुरान और हदीस पढ़ा तो क्या ? पूजा निमाज और व्रत रोजा रखा तो क्या ? सत्यको न पा पक्षपातमें पड़ा मूर्ख कहता है । मेराही धर्म सबसे बड़ा है, इसके बराबर दूसरा कोई नहीं, यह हमारे गुरुने बतलाया, हमारे पुरुषाओंने इसका आचरण किया, मैं इसको न छोड़ूँगा । इसी पक्षपातमें पड़ा हुआ मूर्ख कहता है, मैं जो कहता हूँ, जिस धर्मको मानता हूँ, जो कुछ मेरे गुरुने बतलाया है वही मोक्षमार्ग है, इसके बिनासब बन्धनमें हूँ, अपने आचार्य गुरुके वचनमें किसी प्रकारका सन्देह करना अथवा विचार करना पाप है । ऐसे मूर्ख पक्षपातीको कभी ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता, ऐसा

पाँचों भूमिकाओंके नाम

अज्ञानी डरकर भटकता फिरता है पर कहीं भी सुख नहीं पाता, स्वप्नमें भी प्रतिष्ठाका दर्शन नहीं होता, ऐसा पक्षपाती किसी प्रकार भी किसीको सन्तोष नहीं दिला सकता । पक्षपाती धर्म द्वेषमें पड़ा हुआ एकही हृदमें कोल्हूके बेलकी तरह फिरा करता है, वह कभी उस असीम अनन्त परमात्माका ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता, जहाँ वेदवाणी भी नहीं पहुँच सकती, जिसके भेदको बड़े २ ज्ञानी ऋषि मुनि नहीं पा सकते, ऐसा पक्षपाती सूर्य उसको कैसे पा सकता है ? ऐसा पक्षपाती पुरुष अपनी बुद्धि और विवेकको कभी काममें नहीं लाता, इस कारण उसे सद्गुण और उत्तम पदकी प्राप्ति नहीं होती, वह अभागही रहता है ।

गजल—यह अबस मर्द जिन्दगानी है । अस्ल इसरार गर न जानी है ॥

कुछ तफक्कुर नहीं न दिलमें तमीज । यह सब अज्ञानकी निशानी है ॥

कहीं रोजा निमाज और पूजा । कहीं कोरे आँ वेद ख्वानी है ॥

मैं बड़ा और मेरा धर्म है बड़ा । और न इसके कोइ सानी है ॥

कभी अगला धर्म न हम छोड़ें । यह हमारी रविश पुरानी है ॥

हम हैं हरदो जहाँमें तजावर । मेरे मुशिदकी मिहरवानी है ॥

ऐसे इनसानको न हो इल्म कभी । झूठको सच जिसने जानी है ॥

कोह जंगल अबस फिरे मारा । दशत सेहराकी खाक छानी है ॥

आदमी जाद के याके द्वाब । शाखेदम अब तलक न आनी है ॥

पढ़के माकूल मन मगन जो होवे । दिल लगन किससा और कहानी है ॥

सिर उसका न हो कभी मालूम । वहाँ पहुँचे न वेद बानी है ॥

गर करे फिक्र कौल आजिज पर । बदो दारैन हुकम रानी है ॥

बुद्धिमान् मनुष्य वही है जो दोषोंको देखकर पक्षपात न करे । शीघ्रही अज्ञानताके मार्गको छोड़ दे ।

दृष्टान्त—एक आदमी व्यापारके लिये परदेश गया । वहाँ से कुछ उपा-
जंन करके जब लौटा तो उसने मार्गमें एक लोहेकी खान देखी । सभोंने लोहा
उठा लिया, कुछ और आगे चलनेपर ताँबेकी खान मिली, लोहाको फँककर
ताँबा उठा लिया पर उनमेंसे एकने न लोहा फँका न ताँबा लिया । यद्यपि उसके
साथियोंने बहुत समझाया पर उसने किसीका कहना नहीं माना । कुछ और
आगे चलनेपर एक चाँदीकी खान मिली, वहाँसे सभोंने ताँबा फँककर चाँदी
उठाली पर लोहेवालेने लोहाही रखा, चाँदी न ली । वहाँ भी उसके साथियोंने
बहुत समझाया पर उसने किसीका कहना न माना । कुछ और आगे चलनेपर
सोनेकी खान मिली सभोंने चाँदी फँक दी सोना ले लिया, पर उस लोहेवालेने

अपना हठ न छोड़ा, उसी लोहेको लिये रहा । कुछ और आगे चलनेपर एक रत्नोंकी खान मिली, सबोंने सोना फँककर रत्न बाँध लिया, पर उस दुराग्रही लोहेवालेने वहाँ भी रत्नोंका अनादर करके लोहाहीके बोझकोही अच्छा समझा । सब अपने अपने घर पहुँचे, जो लोग रत्न लाये थे वे एक एक रत्नको बेचकर अपना व्यवहार चलाने लगे । आनन्द पूर्वक दिन व्यतीत करने लगे, धनी होगये देश देशमें सबका वाणिज्य फैल गया, दिन दिन उत्पत्ति होने लगी । पर वह अभागा लोहेवाला प्रथम तो कुछ दिनों लोहा बेचकर सूखी रुखी खाकर दिन बिताता रहा । फिर दरिद्र हो भूखों मरने लगा । तब दूसरे साथियोंके पास मँगने गया । उन लोगोंने उत्तर दिया कि, हे मूर्ख ! हम लोगोंने तुझे कितना समझाया तूने एकका भी कहना न माना, लोहेको फँककर जवाहिरात तक नहीं ली अब हम क्या करें ? यह तेरे कम्मोंका ही फल है, जो जैसा बोता है वैसाही फल मिलता है ।

साखी – करै बुराई सुख चहै, कैसे पावे कोय ।

रोपे पेड़ वबूलका, आम कहाँ ते होय ॥

जो कोई सज्जनोंकी रीति द्वारा शुभकम्मोंमें अपना मन लगाता है उसका सब कष्ट दूर होता है । वही सद्गुरुका कृपापात्र बनता है । सज्जनोंकी रीति अनुसार शुभकम्मोंमें लगा रहनाही सुखका मार्ग है जो असज्जनोंवत् अशुभ कम्मोंमें प्रवृत्त होगा वह कभी भी सुख न पा सकेगा । जो सद्गुरुकी शरण हो शुभ कम्मोंमें लगेगा वह दोनों लोकोंमें भाग्यवान होगा । इस कारण शुभ कम्मोंही सज्जनोंकी रीतिके अनुसार करना उचित है, यही मनुष्यका कर्तव्य है । शुभ-कम्मोंसे सद्गुरु मिलते हैं, शुभ कम्मोंसेही पापोंसेभी छूट जाता है, शुभकम्मोंसेही जठराग्निकी अग्निसे बचता है, शुभकम्मोंमें प्रवृत्तिही अज्ञानताको दूर कर ज्ञानका प्रकाश प्रगट करती है, शुभकम्मोंही करना उचित है ।

कम्मोंही द्वारा सब जगतकी उत्पत्ति हुई है, कम्महीके आधारसे ग्रह, नदी, पहाड़, समुद्र आदि खड़े हैं, कम्मोंहीसे सूर्य, चन्द्र, भ्रमण करते हैं, कम्मोंही द्वारा ईश्वर और जगत प्रगट हुए हैं, कम्मोंहीसे तीन लोक चौदह भुवन बने हैं, कम्मोंहीसे इन्द्रको छोड़ निद्रन्द पदमें स्थित होता है ।

सदाचरणही माता पिता है, बहन भाई है, यही पुत्र मित्र और सहायक है । सदाचरणसेही लोक परलोकका सुख प्राप्त होता है, सदाचारही उच्चसे उच्चपदको प्राप्त कराता है, सदाचारही संसारमें माननीय और प्रतिष्ठित बनाता है, यही है, जिससे मनुष्य ऋषि, मुनि, सन्त, साधु, पीर, पैगम्बर

औलिया आदि पदको प्राप्त होता है, सदाचारसेही यज्ञ, योग, जप, तप, ज्ञान आदिको प्राप्ति होती है, सदाचारसेही गुरु मिलता है, जिससे मोक्ष प्राप्त होती है । सदाचारही कर्तव्य है, जिसमें सदाचार नहीं है वह मनुष्यही नहीं पशु है ।

मुसद्दस

अमल कर ऐ अमल वारा अमल तुझको छुड़ावेगा ।
अमलही फर्ज है तुझपर अमल सद्गुरु मिलावेगा ॥
अमलही दाग सब तेरे गुह्नकी धों बहावेगा ।
अमलगर होश कर कोई हमल मसकन् छुड़ावेगा ॥
जगतमें भरमका फेरा अमल तेरा हटावेगा ।
अमल करले अमल करले अमलही काम आवेगा ॥ १ ॥
अमसे यह जमीं और दीद मंजर सब समावी है ।
कवाकिब और सवाबित मेहरो महकी रोशनाई है ॥
जहाँ यह और जहाँदारो जो कुछ खुद अकल आई है ।
तबक चौदह बनाई है अमलकी सब कमाई है ॥
मकॉ सब पार जावे लामकॉ घरमें बसावेगा ।
अमल करले अमल करले अमलही काम आवेगा ॥ २ ॥
यही मादर पिदर तेरा मिहरवों बहिन और भाई ।
यही फर्जन्द दिलबन्द यही दादा यही दाई ॥
यही ोर्छ अकरवाखुद बतिलफी जोफो बरनाई ।
तेरे आमाल हसनः सब मिलावे मुल्क मोलाई ॥
अमलके वास्ते इनसॉ अमल कर चैन पावेगा ।
अमल करले अमल करले अलमही काम आवेगा ॥ ३ ॥
अमलसे पीर पैगम्बर अमलसे वेद और बानी ।
अमलसे इब्तादा महशर अमलसे रहम रहमानी ॥
अमलसे योग और जुगती अमलसे ब्रह्म ब्रह्मज्ञानी ।
अमलसे सूर गूनागूं वर नक्स हयूलानी ॥
अमल कर नेक सद्गुरु टेक सोई रह बतावेगा ।
अमल करले अमल करले अमलही काम आवेगा ॥ ४ ॥
अमल मखलूक और खालिक अमल का सब पसारा है ।
अमल के वास्ते आदम वशकले खुद सँवारा है ॥
हुआ आदम अल्लाह सूरत अमलका हुक्म धारा है ।

पाँच देहके नाम, पाँचों वाणियोंके नाम धर्मकी खोज

अमलसे आदमी है वरनः चौपाया विचारा है ॥
अमल कर नेक गर आज्जिज अमल नस्क मिटावेगा ।
अमल करले अमल करले अमलही काम आवेगा ॥ ५ ॥

ईश्वर विषयक सिद्धान्त

पुरुष सूक्तका सिद्धान्त

एक पुरुष है जिसके बहुतसे शिर, नाक, आँखें, कान, मुंह, जिह्वा, पद और अङ्ग हैं, गुप्त प्रकट असंख्य ही इन्द्रियाँ हैं, सारे संसारमें वही व्यापक है। सब जीवधारी उसीकी आँखोंसे देखते हैं, उसीके कानोंसे सुनते हैं, वही सबके अन्तःकरणमें है, वह तीनों कालमें समान है, सबका स्वामी है, अद्वैत और अनुपम है, अनाम है, अक्रिय है, उसका कोई स्थान नहीं सब स्थानोंमें वही है, यह संसार उसके प्रकाशका लघुसे लघु किरण है, ऋग, यजु और साम ये तीनों वेद रज, सत, तम ये तीनों गुण उसीके प्रागटच का परमाणु है, उसीसे उत्पत्ति स्थिति और लय है। प्रणवके तीनों अक्षर उसीसे प्रगट होते हैं वह पुरुष जब स्वांस नीचेको छोड़ता है तो सारा संसार जीवित हो जाता है ऊपर को खींचता है तो प्रलय हो जाता है, ये सब क्रियाएँ होती रहती हैं पर वह पुरुष आप निलैप रहता है।

जब वह सृष्टि उत्पन्न करनेकी इच्छा करता है तो प्रथम हिरण्यगर्भको प्रगट करता है इससे सब जड़ चैतन्य और विराट पुरुष प्रगट होते हैं।

हिरण्यगर्भ अर्थात्-प्रजापति उससे मनु-अर्थात् आद'म और मनरूप-अथवा हौवा होते हैं जिससे सृष्टि होती है।

यज्ञ और जगतका एकही अर्थ है। पुरुष यज्ञ स्वरूप है, सब वस्तुयज्ञसे हुआ करते हैं उसीमें हवन होनेसे लय हो जाते हैं। वेदके ज्ञाता लोग इसी कारण अङ्गोंके समान है। ज्ञानी, पण्डित, वेद और शास्त्रके ज्ञाता, शास्त्रज्ञ, शास्त्रानुसार कर्म करनेवाले, सदाचरणमें बरतनेवाले, पापोंसे घृणा करनेवाले, दैवी सम्पत्तिसहित अपनी आयुको जगत्के उपकारमें बितानेवाले, ऋषि और मुनियोंके समान शरीरयात्रा करते हुये सर्वदा पुरोपकारमें रहनेवाले, विराट पुरुषके शिर हैं। राजा, तन्त्री, ज्योतिषी, वैद्य आदि जिनसे जगत्की रक्षा होती है जिसके द्वारा सब अपनी मर्यादापर चलते हैं, वाँह हैं। वाणिज्य करनेवाले,


१ समष्टि सूक्ष्म अभिमानी देवताको हिरण्यगर्भ कहा करते हैं। २ समष्टि स्थूलके अभिमानी देवताको विराट कहते हैं। ३ मानवी सृष्टिके प्रवर्तकोंको पाश्चात्य साहित्यकवाबा आदम और भी हौवा कहते हैं।

खेती करनेवाले, कारीगरी प्रगट करने नानाप्रकारकी वस्तुओंद्वारा लाभ पहुँचानेवाले, पेटके समान हैं । सब प्रकारकी सेवा करनेवाले सेवक, जिनको कि न विद्या है न बुद्धि है वे बैलोंके समान कमाते हैं दूसरोंके आश्रय जीवन व्यतीत करते हैं, कुर्तोंके समान द्वार द्वार फिरते हैं वे उसके विराट रूपके पग हैं । पशू मांस, अस्थि और चर्मके समान हैं । वनस्पती उसके नख केश हैं, चन्द्रमा मन है, सूर्य आंख है, वायु प्राण हैं, अग्नि वाक्य है, पृथिवीनाभि है, वैकुण्ठशिर है, पाताल पगका तलवा है, दश दिशा कान हैं । इस प्रकार समष्टि स्थूलका नाम विराट है, समष्टि स्थूलही पुरुषका रूप है । इस यज्ञकी सामग्री यह है कि वसन्त ऋतु घोंके समान है, ग्रीष्म लकड़ी है, शरद ऋतु शाकल्य है, सात समुद्र सात काष्ठ हैं, जिससे हवन कुण्डका घेरा बनाते हैं, वेदमन्त्र उसके समान है जिससे अग्निमें शाकल्य छोड़ते हैं ।

प्राचीन कालमें देवता लोग इस यज्ञ को करके परम आनन्दको प्राप्त कर शोकसे छूट जाते थे । हिरण्यगर्भ समष्टि सूक्ष्मका नाम है, उसीसे तत्व प्रगट हुये, उसीमें लय हो जाते हैं, वैसे सूर्यकी किरण सूर्यमें समा जाती हैं, उसी प्रकार सब उसी पूर्ण अनन्त प्रकाशमें लय होजाते हैं । इस भेदको जो समझे वह अज्ञान सागरसे पार हो जावे और सत्यज्ञान पावे । प्रजापति स्थूल समष्टिसे आशय है; हिरण्यगर्भ समष्टि सूक्ष्म है जो इनको परमात्मा समझते हैं वे भूलमें हैं । सभस्त संसार प्रजापतिमें । प्रजापति हिरण्यगर्भमें और हिरण्यगर्भ उस पुरुषमें हैं । इसभेदको ब्रह्मज्ञानी समझते हैं जो समझते हैं वे भली प्रकार जानते हैं कि, हिरण्यगर्भ मैं ही हूँ सभस्त संसार जिससे प्रगट हुआ है वो मैं ही हूँ ।

जो कुछ कहा सुना और लिखा गया है उस अनन्त प्रकाशका वह एक किरण है, उसीको वारम्बार नमस्कार है । जो उस भेदको समझे वैसाही निश्चय करे उसको लोक परलोकका सब आनन्द प्राप्त होता है सब देवते उसकी आज्ञा मानते हैं ।

सारे संसारमें सूर्य श्रेष्ठ है । सबको उचित है कि, अपनेमें और अपनेको सबमें समझे, जैसा विराट पुरुषका वर्णन लिखा गया है वैसाही अपनेमें ध्यान करे ।

जैन धर्मका सिद्धान्त — निरञ्जन परमात्मा वैकुण्ठमें रहता है, वह न कुछ करता है न कराता है, उसको न किसीसे मित्रता है न शत्रुता, सर्व जीव अपने २ कर्म्मोंका फल पाते हैं, परमात्मा निलैप और अकर्त्ता है ।

योगी और संन्यासियोंका सिद्धान्त — निरञ्जन परमात्मा सहस्रदल कमलमें रहता है, प्रणवकी उपासनासे उसका दर्शन होता है ।


१ कंवलयसूत्रमें प्रतिपादित है ये आज केवलनाथ और केवली करके भले ही कुछ मानते हों पर निरंजनका तो जिक्र भी नहीं हैं ।

अज्ञानकी सात भूमिका

कबीर पन्थियोंका सिद्धान्त ।

शब्द – साधू सद्गुरु अलख लखाया । जाते आप आप दरसाया ॥

बीज मध्य ज्यों तरवर दरशे, वृक्ष मध्य ज्यों छाया ।

आतममें परमात्म दरशे, परमात्ममें माया ॥

ज्यों नाभीमें शून्य देखिये, शून्यमें अण्डाकारा ।

निःअक्षरसे अक्षर ऐसा, क्षर अक्षर विस्तारा ॥

ज्यों रवि मध्य किरण देखिये, किरण ज्योति परकाशा ।

पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, जीव ब्रह्मसे स्वाँसा ॥

स्वाँसा मध्ये शब्द देखिये, शब्द अर्थके माहीं ।

पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, न्यास है वह साँई ॥

आपे बीज वृक्ष अंकुर, आपे पुष्प फल छाया ।

सूर्य किरण परकाश आपही, आप ब्रह्म जिव माया ॥

आतममें परमात्म दरशे, परमात्ममें झाँई ।

झाँईमें एक झाँई दरशे, लखे कबीरा साँई ॥

साखी – हम वासी वहि देशके, जहां पारब्रह्मको खेल ।

दीवा बले अगम्यका, बिनु बाती बिनु तेल ॥

राम जपत हैं नामको, नाम जपत हैं थीर ।

ताहूते कछु अपर है, ताको जपे कबीर ॥

हजरत मूसाका सिद्धान्त ।

मूसाका खुदा आसमानी रङ्गका है, वह नबियोंको मनुष्यके रूपमें दिखाई देता है, ध्रुवाँ बादल तथा आगकी लहरोंमें प्रगट होकर भले और बुरेका ज्ञान देता है ।

हजरत ईसाका सिद्धान्त ।

आदिमें एक शब्द था दूसरा कुछ न था, वही तीन भागोंमें विभक्त होकर पिता, पुत्र और पवित्रात्माके रूपमें हुआ, इसीको तसलीस खुदा कहते हैं ।

मुहम्मद शाहका सिद्धान्त ।

तौहीदकी चार श्रेणियाँ हैं । तौहीदका एक सार है, उसका भी एक सार है, उसका एक छिलका है उसका भी एक छिलका है । उसीकी उपमा अखरोटसे

अशुचि जाग्रत् भूमिका, जाग्रत भूमिका महा जाग्रत भूमिका जाग्रत स्वप्न भूमिका

देते हैं; जैसे अखरोटके दो छिलके होते हैं एक (सार) गिरी होती है उसका तेल दूसरा सार है ।

प्रथम वह श्रेणी है कि, आदमी मुखसे — (लाइला इलिइल्लाह) लाइला इलिइल्लाह कहे और हृदयमें विश्वास न रखे, यह संसारी लोगोंका सिद्धान्त है ।

दूसरी श्रेणी यह है कि, उस कलमेके अर्थको जैसे दूसरे लोग मनाते हैं वैसेही मानें उसीको प्रमाणित करनेके लिये नाना प्रकारकी युक्ति और प्रमाण दे यह सिद्धान्त वाचक ज्ञानियोंका है ।

तीसरी यह श्रेणी है कि, मनुष्य विचार करके निश्चय करे कि, सबका मूल एकही है; सब कम्मोंका एकही कर्त्ता है, दूसरा कोई कुछ करही नहीं सकता । यह विश्वास कहे दोनों विश्वासोंके समान नहीं है । इसीसे अज्ञानताकी गॉठ छूट जाती है, यह सब गॉठोंको खोलकर बन्धनोंको छुड़ा देता है ।

कोई पुरुष किसी मकानके द्वारपर जाकर किसीसे सुनले पर यह निश्चय करे कि, अमुक पुरुष घरमें है, यह साधारण लोगोंका विश्वास है कि, उन्होंने अपने माता पितासे अथवा उपदेशकोंसे सुन रखा है । दूसरा पुरुष घोड़ा और नौकरोंको देखकर विश्वास करे कि, अमुक सरदार घरमें है, यह विद्वानोंका सिद्धान्त है कि, उन्होंने युक्ति और अनुमानसे जाना तीसरेने सरदारको घरमें देख लिया । यह ब्रह्मज्ञानियोंका सिद्धान्त है, वे लोग प्रत्यक्ष देखते हैं । इन तीनोंमें बड़ा भेद है सबसे बड़ा पद ज्ञानियोंका है । पर इस श्रेणीपर भी पहुँचकर द्वैत होता है क्योंकि, इस अवस्थामें भी दो भासते हैं जानता कि, ईश्वरसे सृष्टि है, यहां तक एक अनन्त काही बखेड़ा है । जबतक ज्ञानी द्वैतको न नष्ट कर दे, तब तक भेद रहता है कि, उसको तौहीद (अद्वैत) नहीं कह सकते ।

चतुर्थ श्रेणी यह है कि, आदमी एकके अतिरिक्त दूसरा न देखे । जो कुछ देखे एकही देखे एकही कहे, द्वैतका लेश भी न रहे । ऐसे पुरुषको सूफी कहते हैं, सूफी (फनाफी अल्लाह) (ईश्वरमें लय) कहलाता है ।

प्रथम तौहीदको मनाफिक कहते हैं (सुनी सुनी बातोंको निश्चय करना) उसी प्रकार साधारणोंकी तौहीद, अनुमानिक है । चतुर्थ श्रेणीकी तौहीद का समझना कठिन । इस श्रेणीमें केवल ईश्वरही ईश्वर होता है, वरन् मनुष्य आपको भी भूल जाता है । तबकुल (विश्वास) को चौथी श्रेणीकी तौहीद नहीं चाहिये वरन् तीसरे श्रेणीकी तौहीद आवश्यक है, चतुर्थ श्रेणीकी तौहीदकी व्याख्या कोई करही नहीं सकता । इस दरजेमें पहुँचा हुआ, सब कुछ एकही देखता है, आपही प्रेमी और आपही प्रीतम होता है, स्वभावमें स्थित हो जाता है । वह कुछ कर्तव्य

स्वप्न जाग्रतवाला जीव स्वप्न भूमिका सुषुप्ति ज्ञानकी सात भूमिकाएँ शुभ इच्छा भूमिका स्वविचारना भूमिका तनुवानसा भूमिका सत्वापत्ति भूमिका असंशक्त भूमिका पदार्था भाविनी भूमिका तुरीया भूमिका हंस देहका विशेष वर्णन

नहीं करता सब प्रकृतिके ऊपर छोड़ देता है। तीन प्रकारके कर्म होते हैं। एक तो वह है जो अपने इच्छाके आधीन है, जैसे बोलना, चिल्लाना। दूसरा वह है जिसमें इच्छा भी होती है पर पूर्ण बल नहीं होता। तीसरा वह है जिसमें अपना अधिकार नहीं; जैसे पानी पर पैर रखनेसे अवश्य तहको चला जायगा। पानी पर रख कर कोई नीचे जाना चाहे अथवा न चाहे पर अवश्य पानीको चीरता हुआ नीचेको चला जायगा।

शरणागत तथा ईश्वर विश्वास।

तवकुल जिसका नाम है, वह ईश्वरके सच्चे निकटवर्तियोंके स्थानोंमें से एक स्थान तथा महान् उच्च पद है। तवकुलका ज्ञान यथार्थमें बहुत सूक्ष्म और कठिन है। तवकुल पर चलना बहुत दुस्तर है। जिसके मनमें ऐसा संदेह हो कि किसी कर्मका भी कर्ता ईश्वरके अतिरिक्त कोई दूसरा है तो वह ईश्वरका विश्वासी नहीं हो सकता। यदि सब सामग्री छोड़ दी जाय तो अशर (कर्मकाण्ड) के विरुद्ध होगा, यदि कोई कारण प्रत्यक्ष न पावेगा तो बुद्धिके विरुद्ध करेगा। यदि कारण पावेगा तो संदेह है कि प्रत्यक्ष सांसारिक किसी पदार्थपर विश्वास कर लेगा। इन अवस्थाओंमें उसके ईश्वरवादी (आस्तिक) होनेमें बाधा पड़ेगी। अतः बुद्धि, शास्त्र आदि जैसे तवकुलकी व्याख्या करते हों, उनको पूर्ण रीतिसे समझता हो वरन् उसका स्वरूप बन गया हो, वही तवकुलको धारण कर सकता है। नहीं तो तवकुल बहुत दुस्तर और अगम्य है। इसको विरलाही जान सकता है। खुदा (ईश्वर) तवकुलों (विश्वासीयों) को ही प्रीतम बनाता है। तवकुलके ऊपर ही ईमान है।

आदमको सब फिरिश्तोंने नमस्कार की, इस कारण आदम सब फिरिश्तों से श्रेष्ठ है। उसीकी संतान सब मनुष्य हैं। इस कारण मनुष्य भी फिरिश्तोंसे उच्चपद पर स्थित हैं। अतः जो कोई आदमकी संतान (मनुष्य) होकर फिरिश्तों अथवा किसी दूसरोंको खुदा (ईश्वर) के अतिरिक्त, माथा टेकेगा, उनसे कुछ कल्याण चाहेगा, अथवा किसी प्रकारकी आशा रखेगा तो वह मनुष्य नहीं वरन् पशुके पदको पावेगा। जो जिस प्रकार खुदा विश्वम्भर पर विश्वास करेगा, वह उसी प्रकार उसे भोजन देगा। जिस प्रकार पक्षी प्रातःकाल भूखे उठते हैं पर संध्याको अधाकर घर आते हैं। जो कोई ईश्वरकी शरणमें सच्चे दिलसे प्राप्त होता है, उसकी वही (ईश्वर) पूर्ण रीतिसे रक्षा करता है। इस प्रकार ऐसी जगह उसे भोजन पहुंचाता है कि उसकी समझमें भी नहीं आता जो संसारकी शरण लेता है उसको परमात्मा संसारके साथही छोड़ देता है।

हंस देहके पक्के तत्त्व धैर्यकी पाँच प्रकृतियाँ दयाकी पाँच प्रकृतियाँ शीलकी, बिचारकी पाँच प्रकृतियाँ सत्यकी पाँच प्रकृतियाँ स्थूलदेह, पाँच कञ्चेतत्त्व तीन गुण, पञ्चीस प्रकृति, कञ्चेतत्त्वकी पञ्चीस प्रकृतियाँ

जो मंत्र यंत्र तंत्र आदि पर विश्वास रखता है, वह ईश्वरका प्रेमी नहीं। उसने परमात्माकी शरण नहीं लिया जो परमात्माकी शरणमें प्राप्त होता है यदि सारा संसार भी उसका शत्रु बन जाये तो भी उसकी कुछ भी हानि नहीं होती । चाहे कौसा भी कष्ट क्यों न पड़े पर ईश्वरके बिना किसीसे किसी प्रकारकी आशा न रखे । यदि तनिक भी दूसरेका ध्यान आवेगा तो शरणागतके पदसे गिरा देगा । प्रह्लादको अनंत कष्ट पड़ा तो भी उसका मन न चलायमान हुआ, शरणागति न छोड़ी तो परमात्माने सब अवस्थाओंमें उसकी रक्षा की । प्रह्लादजीकी सात और ध्रुवकी केवल पांच वर्षकी आयु थी ये दोनों सब विश्वासियों (शरणागत परा-यणों) में श्रेष्ठ हैं । इसी प्रकार हजरत इबराहीम भी शरणागत प्राप्तोंमें श्रेष्ठ हैं। क्योंकि, जब नमरुद बादशाहने उनको अग्निमें डाला तो यद्यपि अग्नि ऐसी तेज थी कि, फिरिस्ते भयखाते थे, पर इबराहीमको कुछ भी भय नहीं था । वे केवल खुदाकी ओर ध्यान लगाये बैठे थे, यहांतक कि, उसी अवस्थामें जिबराईलने खुदाकी आज्ञा लेकर इब्राहीमसे कहा कि, ऐ इब्राहीम ! मैं तुझको बचाता हूँ तब इब्राहीमने पूछा, खुदातआलाका हुक्म है ? कि, तुम मुझको बचाओ । जबराईलने कहा कि, खुदाका तो हुक्म नहीं वरन् मैं अपनी ओरसे बचाता हूँ । इब्राहीम ने कहा कि, यदि खुदाका हुक्म नहीं है तो मैं बचना नहीं चाहता । जबराईल यह बात सुनकर पीछे चले गये । तब क्रमशः इसराफील इजराईल आदि फिरिश्ते आकर इब्राहीमको बचानेके लिये कहा पर इब्राहीमने वही उत्तर दिया । उसी समय खुदाकी कुदरतसे आग सुन्दर वाटिका बन गयी अग्निका कहीं पता न लगा । जो कोई ईश्वरको शरणागत हो उसीको उभयलोकका आनन्द प्राप्त होगा ।

साखी - कबीर - सौ वर्ष सेवा करे, एक दिन सेवे आन ।

सो अपराधी आतमा, निश्चय नरक निधान ॥ १ ॥

कबीर - सत्यनामको छोड़िके, करे आनकी आस ।

कह कबीर ता दासका, होय नकमें बास ॥ २ ॥

कबीर-आन भजे सो आँधरा, हरिहिं भजे सो साधु ॥

सत्य भजे सो वैष्णव, ताको मता अगाधु ॥ ३ ॥

कबीर-देवी देवता ढह पड़े, हमको ठौर बताव ।

जो कोई हरि सो विमुख है, तिनको तुम ले खाव ॥ ४ ॥

कबीर-मढ़ी मसानी शीतला, भैरों औ हनुमन्त ।

साहेब सो न्यारा रहे, जो उनको पूजन्त ॥ ५ ॥

स्थूल सृष्टि

गजल — जिनको है जहानमें बखुदाबन्द तवक्कुल ।
उनको न खतर कर दफा दुःख द्वन्द तवक्कुल ॥
प्रह्लादको पर्वतसे दिया डाल जमीं पर है ।
और आगकी सोजिशको किया बन्द तवक्कुल ॥
इब्राहीमके खातिर आतश हुई गुलजार ।
सब दुःख रफा कर किया आनन्द तवक्कुल ॥
इससे न कोई दूसरा है सरवते शीरीं ।
शीरीं है सो अजमिसरी अज कन्द तवक्कुल ॥
जुजहक्कु न किसीसे रख उमरीद ऐ लोन ।
कर दीन व ईमान पुन पायबन्द तवक्कुल ॥

तफक्कुर (मनन)

एक क्षणका तफक्कुर (मनन) वर्षभरकी तपस्याके समान है । यथार्थमें चिंतन और मननका पद सबधर्मोंके अनुसार बहुत ऊँचा है ? पवित्र पुस्तकोंको पढ़ना, उसके अर्थ और आशयपर विचार करना, चिंतन करनेके समय ऐसा हो जाना कि, दूसरा संकल्प भी मनमें न आने पावे । जो बेफिकरीके साथ काम करता है वह अन्तमें लज्जा और हानि उठाता है ।

प्रथम मनुष्यकी दशापर विचार करना चाहिये कि, यह किस अवस्थासे पतित होकर किस अवस्थाको पहुँचा है ! अपनी सत्य स्वरूपी देहसे किस प्रकार विलग हो, किस प्रकार दुःखमें फँसा । इसने अपनेको अच्छा जाना, रूपका अभिमान किया, पतित हुआ अनन्त दुःखोंको भोगने लगा । यद्यपि वेदके अनुसार ऋषि मुनियोंने भजन करके ईश्वरके पदको भी प्राप्त किया तो भी सब उस पर कायम न रह सके । यदि स्वसंबेदकी शिक्षानुसार भजन करते तो पारख गुरुको प्राप्त हो अक्षय पदमें स्थित हो जाते । इसी प्रकार वो बड़े २ विद्वान् पण्डित विद्याके अभिमानमें किसीको कुछ न समझते थे, वे सब भी अभिमानके कारण पतित हुए. जो बड़े २ बादशाह, राजा, महाराजा आदि ईश्वर होने तकका दावा करते थे, वे कुत्तोंकी मौत मरे ।

इन बातोंके विचारसे सिद्ध होता है कि, हमारी तबाहीका कारण केवल अहंकारही है । अहंकारही बुरे होनेपर हमको दूसरोंसे अच्छा समझना सिखाता है । जिसने हमको सत्यस्वरूपी देहसे पतित किया, वह सर्वदा छः देहों और चौरासी लाख योनियोंमें भी लगा रहता है । जब तक यह न छूटेगा, कदापि स्थिति न होगी । जीव झूठे अहंकारमें फँसा हुआ छः देहोंमें अनेक दुःखोंको भोगता भटकता फिरता

प्रपञ्चसे छूटनेके साधन

है । ब्रह्म, जीव, माया, ईश्वर आदि सब अहंकारके ही भ्रममें हैं । सत्यगुरुकी दया विना अहंकारसे छूटकर निर्व्रम पदमें स्थिति होना अत्यन्त कठिन है । जितने मुक्तिके देनेवाले और मुक्ति चाहनेवाले हैं सब धूरकी रस्सी बाँटकर आकाशकी कूँआसे जल पीना चाहते हैं । जब तक इनको सद्बिचार न आवेगा तब तक इनका ठिकाना नहीं लगेगा । जो पशु धर्म (विषय विलास) में भूल जावे वे तो पशु हैं, उसको कभी सत्य पथ न मिलेगा, न वह मनुष्यत्वकी ओर जा सकता है । मनुष्य आपही अपना मित्र, आपही अपना शत्रु है । अपना कोई शत्रु नहीं, सब भला, अपने मनकी ओरसे ही बुरा प्रस्ताव होता है, किसको बुरा कहा जावे किसको भला ।

साखी — बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न देखा कोय ।

जो दिल खोजा अपना, मुझसा बुरा न होय ॥

शुद्ध विचार और चिन्ताके बिना जीव कुत्तोंके समान दर दर भटकता फिरता है । सब कुछ आपही है, पर ज्ञान और बुद्धि कहें कि, आपको पहचान सके । आपही आशिक (प्रेमी) है आपही माशूक (प्रीतम) सुखी है, आपही दुःखी । आपही बन्ध और आपही मोक्ष है ।

अहंकारसे ही इसकी दुर्गति हो रही है । इस शत्रुके दो हथियार हैं, एक स्त्री और दूसरा अहंकार है । इसने ही नाना प्रकारके धर्म रीति व्यवहार प्रगट कर जगत्को फँसा रहा है ।

जब तक मनुष्य “सर्वं खलिबंद ब्रह्म” नहीं देखता, तबतक उसके भजनका तार लगा रहता है, जबतक पूर्ण परमात्माका साक्षात्कार न हो तबतक प्राणा-पन्न सदाचारमें रहकर भजन भक्तिमें लगा रहना चाहिये । जब “सर्वं वही है अर्थात् सब परमात्माही है” का ज्ञान हो जाता है, तब आपही आप अहंकार छूट जाता है । ऐसोंमें धैर्य आदि गुण स्वभावसे ही वर्तते हैं । कौसा भी कष्ट क्यों न पड़े, कभी अधीर नहीं होते तीन लोकका राज्य भी मिल जावे तो भी आनन्द नहीं मानते । कठिन तपस्या अथवा किसी नियमको हठसे धारण करनेसे मुक्ति नहीं होती वरन् विचार विवेक, द्वारा आत्मचिन्तन करनेसे मोक्ष होता है । सत्य और असत्यका निर्णय न करेगा, सार शब्दको न पावेगा । अज्ञानी लोग यह नहीं विचारते कि, “जिन देवी देवताओंकी हम पूजा करते हैं वे स्वयं बन्धनमें फँसे हैं, हमें क्या मोक्ष देंगे” वे स्वयं दूसरोंके आश्रयमें भटकते हैं मुझे क्या आश्रय देंगे ?

शब्द — भूली मालिन आयो सतगुरु, जागता है देव ।

ब्रह्म पाती विष्णु डाली, फूल शंकर देव ॥

पक्के तत्त्वकी प्राप्ति, हंसकबोर और दूसरेमें भेद प्रामाणिकता कथन

तीन देव प्रत्यक्ष तोड़े, करे किसकी सेव ॥
पाथर गढ़के मूरति कीनी, धरिक्छे छाती लात ।
जो वह मूरति साँची होती, गढ़नहारको खात ॥
भाँति बहुत और लापसी, करि करि पूजा सार ।
भोगन हारा भोगिया, मूरतिके मुख छार ॥
पाती तोड़े मालिनी, और पाती पाती जीव ।
जा पाहनको पाती तोड़े, सो पाहन निर्जीव ॥
मालिन भूली जगत् भुलाना, हम भुलावे नाहिं ।
कहें कवीर हम राम राखे, कृपा करि हरि राय ॥

जबतक जीव पांचों अहंकारोंको न छोड़ेगा तबतक कल्याण न होगा, अहंकारही सब कर्मोंका मूल एवं बन्धनका कारण हैं। जिसने अहंकार छोड़ा वह उभय लोकमें सुखी हुआ। निरहंकारी पुरुष कभी मूर्खोंकी संगति स्वीकार नहीं करता, क्योंकि, मूर्खलोग मिथ्या अहंकारमें पड़े पक्षापक्षमें फँसे होते हैं। पक्षापाती और अहंकारी तथा धर्मद्वेषियों की संगतिसे सत्यगुरु नहीं प्राप्त होते बरन् निर्पक्ष, सत्याचारी, सद्गुणसम्पन्न विद्वानोंकी संगतिसे सत्यगुरु प्राप्त होते हैं।

हे अधिकारी जनो ! नम्रता धारणकर सबके साथ प्रेमहीका बरताव करो, दीन दुखियोंको तुच्छ न समझो। क्योंकि, सत्यगुरु इन्हीं लोगोंपर प्रसन्न होता है उन्हींके स्वरूपमें वन्दीछोर मिलता है। अहं त्वमें पड़कर अपने यथार्थको हाथसे मत खोओ। शरीरके अभिमानमें न पड़ो।

सारा संसार अनित्य है, अनित्यका सब खेल है, देहाभिमानमें पड़ना अज्ञानता और मूर्खताके सिवा दूसरा क्या है ? इसीको अविद्या सागर कहते हैं। देहाभिमानी कभी सुख नहीं पाता, सर्वदा दुख सागरमें गोता खाया करता है। यद्यपि यह मनुष्यशरीर सर्वोत्कृष्ट है, पर इसके अभिमानमें पड़कर इसीके पोषण पालनमें रहनेके लिये नहीं किन्तु आत्मविचार कर सत्यपदको प्राप्त करनेके लियेही श्रेष्ठता है। यदि मनुष्य शरीर पाकर आत्मविचार न हुआ तो इससे बढ़कर नीच और तुच्छ कोई भी नहीं। क्योंकि, दूसरे शरीरोंमें पड़ा हुआ जीव स्वप्न सुषुप्ति अवस्था के कारण स्वाभाविक ही अविद्याके वशमें पड़ा होता है। केवल मनुष्य शरीर पाकर जीव जाग्रत अवस्था पर अधिकृत होता है। इसमें भी जाग्रत नहीं हुआ यानी आत्मज्ञान प्राप्त नहीं किया तो पशुसे भी तुच्छ हुआ। देहाभिमानमें पड़ा हुआ जीव सदा काल फाँसमें पड़ा रहता है, जबतक देहाभिमान न छोड़ेगा तबतक सुखका दर्शन भी न होगा। यदि लोक परलोककी सर्व सामग्री और सुख प्राप्त हो

समस्त संसार और उसके कार्य निर्गुण सगुण अम्र छाया वासना, उसका साथ

जावे तो भी देहाभिमानमें पड़ा, काल पुरुषकी आज्ञासे कभी बाहर नहीं हो सकता । यदि एक कँदीको उत्तम उत्तम पदार्थ देवें तो क्या वह अपनी स्वतंत्रताको भुलाकर कभी उनकी ओर दृष्टि डालेगा ? इसी प्रकार देहाभिमानमें कभी सुख नहीं प्राप्त हो सकता । बन्धनके समान दूसरा कौन दुख है ? देहाभिमान छोड़ देनाही मनुष्यत्व का चिह्न है । जो देहाभिमानमें फँसकर नाना प्रकारकी संसारिक विषयवासनाओं को ग्रहण करता है, उसे कभी सत्यगुरु नहीं मिल सकता ।

ये पिण्ड और ब्रह्माण्ड दोनों फूटे हैं । जो कुछ पिण्ड ब्रह्माण्डके सम्बन्धी हैं सब मिथ्या हैं । जीव संसारिक सब पदोंको प्राप्त करके भी बन्धनसे नहीं निकलता, फिर इसे पदार्थोंका प्राप्त होना कौनसे काम आया ।

गजल—पहले मैं शाहंशाहा था, आलमका क़िबले गाह था ।

फिर भी गदा दर्गाह था, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

पहले मैं रमता राम था, नज्में दुनि दीन काम था ।

यह भी ख्याले खाम था, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

मैं साहेब तदबीर था, जगका गुरु और पीर था ।

ताहमपुर अज्र तक्रसीर था मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

मुझसेही नाद और बिन्द था, मैंही गुरु गोबिन्द था ।

सूफी कलन्दर रिन्द था, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

आकाश आतश पौन हूँ, कहूँ मैं कौन हूँ ? ।

इसही लिये मैं मौन हूँ, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

बाज़ार सौदा गर्म है, लेनेसे मुझको शर्म है ।

यह दिलका मेरे भर्म है, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

ऋषिरायने सब कुछ कहा, कुछ भेद दर पर्दे रहा ।

मैं खोलकर बतला दिया, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

मुझहीसे पाप और पुण्य है, सब ध्यान और सब धुन है ।

वेद और कुतुब सब सुन्न है, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

मैं भ्रमका पुतला बना, खुदको बन्दा गिना ।

मुझहीसे पैदाइश फना, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

नादान बखुद मगरूर है, घेरे शवे दैजूर है ।

ज़ाहिर कहाँ वह नूर है, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

होवे भलाई यारसे, देखे अगर वह प्यारसे ।

रखले अज़ावुननारसे, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

कर्म उपासना अम्र वटमार, चार प्रकारके आनन्द, अज्ञानानन्द

मैं जीव ब्रह्म माया बना, सब दीदनी काया बना ।

सब धर्म और दाया बना, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

मुशिद कदमकी खाक हो, आवागमनसे पाक हो ।

उसकी मिहर बेबाक हो, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

वे वृक्षके इनसाँ मरे, आवागमनका दुख भरे ।

आजिज विचारा क्या करे, मैं कुछ नहीं मैं कुछ नहीं ॥

जो बोलता है तो परमात्माकी बात, जो मौन होता है तो सोचता है परमात्माका ज्ञान, जो देखता है परमात्माका दर्शन, सच्चा साधु वही है । जिसने विचार नहीं किया वह साधु पद नहीं पा सकता । विवेकही सबका सार है, साधुके लक्षणोंमेंसे विवेकही मुख्य लक्षण है । विचार विवेक वह पदार्थ है कि, सब पापों और बुरे संकल्पोंको जड़से नाश कर देता है ।

अध्याय २२

मतोंका विशेष विचार

मनुष्य मात्रके धर्म ।

बुद्धिमान् विवेकी, विचारवानोंको विचार करना चाहिये कि, मनुष्यका क्या धर्म है ? किस कारण परमात्माने अपने स्वरूपमें प्रगट किया है ? जब सोचेगा तब ज्ञान हो जावेगा कि, पंतूक पदको प्राप्त करनेके लियेही यह उत्पन्न किया गया है । इसका धन वही है, जिससे आत्मस्वरूप जाना जाता है । इस कारण मनुष्यको उचित है कि, सांसारिक प्रपंचसे मन हटाकर अपने यथार्थ कर्तव्यमें लग जाय । ईश्वरने इसे अपना स्थानापन्न बनाया है । क्योंकि, सृष्टिमें कोई भी जीव-धारी ऐसा नहीं है, जिसको कि, ईश्वरने अपने स्वरूपमें बनाया हो । मनुष्यका कर्तव्य भी सबसे भिन्नही नियत किया है; इसकी बनाबटही ऐसी बनाई है कि, जिससे इसको विवश हो ईश्वरकी आज्ञा माननी पड़े । यथार्थमें परमात्माने भक्ति का भण्डार मनुष्यको दिया है, यदि इसकी पूर्ण रीतिसे रक्षा न करेगा तो दण्डका अधिकारी होगा ।

१ जंगम, २ स्थावर, ३ वनस्पति ये तीन प्रकारोंकी सृष्टि है; १ चलने, फिरने और संकल्पादि करनेवाला जंगम, २ केवल बढ़ने और पुष्ट आदि होनेकी शक्तिवाला वनस्पति और २ जड़, स्थावर है । सदाचार देवताओंका गुण है । मनुष्य बुद्धि रखता है । इस कारण उचित है कि; पशुधर्मको छोड़ दे । देवधर्मों को धारण करे । दैवी वह धर्म है, जो कि, सर्वथाही शुद्ध हो अर्थात् दैवी सम्पत्तिसे

ज्ञानानन्दका स्वरूप विज्ञानानन्द, परमानन्द, तत्त्वमसि इत्यादिका विशद वर्णन त्वम् पदसे दो प्रकारके अज्ञानका कथन

र्ण हो । आसुरी सम्पत्तिका त्याग करे । जहाँतक होसके निषिद्ध घृणित व्यवहार
प्रीका संकल्प न भी करे । किसी जीवधारीको किसी प्रकार भी कष्ट न पहुँचावे ।

परमात्माने मनुष्यका पद देवतोंसे भी श्रेष्ठ बनाया है। क्योंकि, देवतालोग
स्वर्गमें रहतेही हैं उनको स्वर्ग प्राप्तिके लिये कुछ भी यत्न नहीं करना आता ।
इसके बिना वे मोक्षको भी प्राप्त नहीं कर सकते, मनुष्य असंख्य रुकावटोंको पारकर
स्वर्ग तथा मोक्षको प्राप्त कर लेता है । यही कारण है कि, खुदाने आदमका पुतला
बनाकर सब फिरिस्तोंको आज्ञा दी थी कि, आदमको नमस्कार करो । शैतानने आदम
से अपनेको अच्छा समझा इसी कारण लोकसे निकाला गया । मनुष्य पदके सन्मुख
स्वर्गादि सब तुच्छ हैं पर जिस प्रकार शैतानने आदमसे आपको अच्छा समझा,
वह पतित हुआ । उसी प्रकार जो अहं लावेगा अपनेको अच्छा और दूसरोंको तुच्छ
समझेगा वह अवश्य नीचेकी ओर गिरेगा । अथवा जो पक्षपात करके अपनेकी
अथवा किसी दूसरोंको देहाभिमानमें फँसावेगा, वह शैतान और शैतानका भाई
है । न जाने किस स्वरूपमें सत्यगुरु मिल जाय । इस कारण सबसे नम्र और अधीन
होकर दास भावमेंही वर्तें, यही मनुष्यका श्रेष्ठ धर्म है ।

अहंकारहीके कारण जीव अपने सत्य और सुखमय स्वरूपसे पतित हुआ
है । चौरासी लाख योनिमें भटकने और नाना प्रकारके दुःख सहनेका मूल कारण
देहाभिमान ही है । मनुष्यका पद सब पदोंसे उच्च है। क्योंकि, जीव मुक्त होकर
मिल जावे । सब देवते उसके आगे दण्डवत नमस्कार करते हैं । मनुष्यपद सब पदों
में श्रेष्ठ पद है ।

इस कारण जो मनुष्य बनना चाहता है उसको मनुष्यका लक्षण धारण
करना चाहिये । यदि राजाका कोई भी ओहदेदार, अपना कर्तव्य ठीक २ न करे
तो दरबार से निकाल देने और पदसे गिरा देने लायक होता है वह पतित भी हो
जाता है । इसी प्रकार मनुष्य अपने लक्षणको न धारण करेगा, तो किस प्रकार
मनुष्य के पदका अधिकारी हो सकेगा ।

जो चाहता है कि, मनुष्य पदको यथार्थ प्राप्त करूँ तो उसे मनुष्यके लक्षणों
को धारण करना चाहिये । मनुष्य लक्षणको धारण करकेही, परमात्माका
कृपापात्र बननेसे सर्वोत्कृष्ट मनुष्यपद पा सकता है । उदारता १, वीरता २, न्याय
३, शील ४ और गुरुकी आज्ञाकारिता येही लक्षण अपने यथार्थस्वरूपको प्राप्त
करनेके हैं । जिसने इन चार लक्षणोंको प्राप्त कर लिया उसे नाना शास्त्र पढ़नेकी