कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
न्यायकी प्रार्थना, विशेष बात धर्मात्मा भैंसा, भैंसकी कामात्मता, भैंसका प्रेम
पुकारते दोहाई देते कि “दोहाई बाबा धारीरामकी” जिससे धारीराम का नाम सुनतेही सांप भाग जाता। बैर छोड़ देते। सांप काटनेके समय मैं सदैव सुना करता था कि, लोग बाबा धारीरामकी दोहाई दिया करते थे और सांपके विषसे बच जाते थे। उसके भाईयोंने उसके मरनेपर बहुत शोक किया। उसकी श्राद्धादि सब क्रियाएं मनुष्योंकी तरह ही की।
सांप और बालक—पञ्जाब देश जिला लुधियाना जिगरावें गाँवके विषयमें सुना गया था कि, एक छोटा लड़का रोटी खाते २ एक सर्पको पकड़ उसका शिर रोटीके साथ लगाकर कहता कि, ओ तू रोटी खा। सब लोग खड़े देख रहे थे उसके माता पिता खड़े पुकारते कि, तू सांपको छोड़ दे पर वह लड़का न छोड़ता था। सांपका शिर पकड़कर रोटीको लगा लगाकर कहता कि, तू रोटी खाले, लोग देख कर चकित हो रहे थे। अन्तमें लड़केने सांपका शिर छोड़ा, सांप भाग गया लड़के को कुछ भी कष्ट न पहुँचाया।
मानुषी भाषापर तौरीत—तौरीतमें उत्पत्तिकी पुस्तकका (३) बाब देखो। सर्प होवासे मनुष्यके समान बातें करता था, इससे प्रमाणित होता है कि, उस समय पशु मनुष्योंके समान वार्तालाप किया करते थे। मनुष्योंके समान ही एक दूसरेका कहा भी मान लेते थे। यह बात आश्चर्यकी नहीं है, यदि यह बात आश्चर्यकी होती तो आदम धोखा न खाता।
हदीस मुहम्मदीमें—इस प्रकार लिखा है कि, पहले शैतान कूदकर बिहिश्तकी दीवार पर बैठ गया पर वैकुण्ठके भीतर न जाता। सोचने लगा कि, अब मैं बिहिश्तके भीतर कैसे बैठूँ। उस समय उसने मयूरको देखा उससे प्रार्थना की कि, मुझको वैकुण्ठकी सैर करवा दो। मयूरने कहा कि, मुझमें सामर्थ्य नहीं पर मेरा मित्र एक सांप है तेरे पास उसको बुलाता हूँ, वह तेरा काम अवश्य करेगा। मयूर अपने मित्रके समीप गया। उससे सलाह की सर्पको लेकर शैतानके पास गया। वह सर्प शैतानके समीप गया वह शैतान अपना अतिलघुस्वरूप करके उस सर्पके मुँहमें बैठ गया। सर्प बिहिश्तके भीतर गया। उसके साथ शैतान भी बिहिश्त के भीतर गया सांपके मुँहसे बाहर निकल आया हौवाको बहकाया। आदम तथा हौवा दोनों कलुषित हुये।
खुदाका शाप—खुदाने उन पाँचोंको शाप दिया। शैतानको तुच्छ ठहराया। उस समय सर्पके ऊँटके समान चार पाँव थे उसके याकृतके होठ तथा कस्तुरी की जीभ थी। वह बड़ा सुन्दर था आगे परमेश्वरने उसके समस्त गुण पृथक् कर दिये। वह विषसे भर गया पेटके बल चलने लगा। मयूरके भी बहुत प्रकाशित छः पंख छीन लिये गये। उसका सौन्दर्य जाता रहा।
महात्मा भैंसा
आदमका दश दण्ड—काशितने आदमपर दश दण्ड किये थे, वे ये हैं कि, १ अमृत फल न खाओगे। २ अब बिहिस्त वस्त्र न मिलेगा। ३ स्त्रीके पास नङ्गे जाओगे। ४ बिहिस्तके बाहर जाओ। ५ काम कामना प्रबल होगी। ६ तुझपर शैतान अधिकृत होगा। ७ शैतानके भयसे तू भयभीत रहेगा। ८ अब तू पापिष्ठी हो गया। ९ तुमको बहुत दुःख होगा। १० ललचाया करेगा।
हौवाको पंद्रह दण्ड—आदमको शाप देनेके बाद हौवाको शाप दिया कि, १ रजस्वला होओ। २ नौ मासमें बच्चा जनो। ३ दुःख दर्दसे बालक जनो। ४ अपने पतिके अधीन रहो। ५ अपने पतिकी आज्ञाकारिणी रहो। ६ तुझे थोड़ा भाग मिलेगा। ७ स्त्रियोंके नामसे तलाक (त्यागपत्र) न होगा। ८ अपने पतिकी सेवा किया करो। ९ स्त्रीकी साक्षी न मानी जायगी। १० स्त्रीको सलाम न की जायगी। ११ स्त्रियोंका कुछ विश्वास न होगा। १२ पुरुषके बुद्धिके दशवें भागकी बुद्धि होगी। १३ जहाद न कर सकोगी। १४ जूमाकी नमाज न पढ़ सकोगी। १५ नबी न हो सकोगी ये पन्द्रह दण्ड हौवाको दिये गये थे।
निष्कर्ष—इससे यह सिद्ध हुआ कि, सारे पशु मनुष्योंके समान हैं। दूसरी बात नहीं है।
विरोध—जबसे यह समस्त घटना हुई है तबसे उनमें वैर हो गया। सर्पको मनुष्य मारने लगे सर्प मनुष्योंको काटने लगे मयूर जहाँ सर्पको पाता है पकड़ कर खा जाता है यही इनके विरोधका कारण है।
हीरा पुत्र होनेका आशीर्वाद—पञ्जाब गुरदासपुरके कानूवाल थाना नामक गाँवमें एक सरदारकी स्त्री रामकुँवरि अपने द्वारपर बैठी, दासीसे पांव धुलवा रही थी। इसी समय सहसा एक सांप दौड़ता आया उसकी कोठरीके भीतर घुस गया। मनुष्यके स्वरमें बोला कि, माई ! मुझको योगीके हाथ से बचा। मैं तेरी शरण आया हूँ। स्त्रीने कहा कि, ऐ भाई ! सांप कब किसीके साथ भलाई करते हैं ? साँपने कहा कि, मैं तेरे साथ भलाई करूँगा जो कुछ तू मागेगी वही दूंगा। उसने कहा कि, मेरे पुत्र नहीं है। उसने कहा कि, तेरे पुत्र होगा उसका नाम हीरा रखना तेरी सन्तानपर सर्पके विषका कभी असर न होगा। वे जिसपर हाथ रखेंगे उसपर भी सर्पका विष असर न करेगा।
इतनेमें योगी साँपके पीछे दौड़ा आया, स्त्रीने कोठरीका द्वार बंदकर लिया। साँपको उसके हाथसे बचाया। यद्यपि उस योगीने साँप पकड़नेका बहुत उद्योग किया पर स्त्रीने पकड़ने नहीं दिया उसे पांच रुपया देकर विदा कर दिया। साँपने स्त्रीसे जो कुछ प्रण किया था वह पूरा किया। उसी स्त्रीकी सन्तानोंमेंसे एक मनुष्यने मुझसे यह कहानी कही थी।
गदहा
विषैला सॉप—फिरोजपुर जिला भोगह थाना कोपरीवाले मौजेकी यह बात है कि, पुरानी घास फूस और कूरे कुरकुटसे एक ढेर लगा हुआ था। उसको बारह वर्ष बीत चुके। उसमें एक मनुष्य आग लगाने लगा। लोगोंने बहुत निषेध किया कि, यह पुराना ढेर है इसमें अनेक जीव हैं, तू आग न लगा। पर उसने न माना आग लगाही दी। आग लगी करोड़ों जीव जलने लगे। उस ढेरमें सॉपोंका भी घर था वे सब जलने लगे। कोई जल मरे कोई अधजला होकर तड़पने लगा। उन सॉपोंमें बड़ा सॉप भविष्यका हाल जानता था वह आगसे बचकर पहलेही निकल गया। उसने आकर उस मनुष्यके बेटेको ऐसा काटा कि, वह उसी समय मर गया। उसका विष ऐसा तीक्ष्ण था कि, जब उसने उसके पुत्रको काटा तो उसका रङ्ग कोयलेके समान काला हो गया। अन्तमें लोगोंने उस सॉपको बन्दूकसे मारा क्योंकि, वह बहुत विषैला था। लाठी मारनेसे विषकी तीक्ष्णतासे लाठी फट जाया करती थी। जो लाठी मारता वही उसके विषसे मर जाया करता कभी भी जीवित नहीं रह सकता था।
विच्छू मरानेवाला अजगर—मैंने सुना था कि, सौझके समय कुछ कुम्हार अपने गदहोंके साथ एक पर्वतके पास ठहरे। रातको सो गये एक बड़ा सर्प आया चारों ओरसे घेरा मारकर उनको घेर लिया। सबेरके समय कुम्हार उठे देखा तो अपनेको सॉपसे घिरा पाया। वे सब विवश हुए अजगरने उनको एक ओरसे राह दी। जिससे कुम्हार तथा गदहे निकल गये। एक मनुष्य रह गया सॉपने उसको फिर उसी तरह घेर लिया। उसने कुम्हारके दोनों पैरोंके बीचमें अपना शिर चला उसे अपनी पीठपर चढ़ाकर एक स्थानपर ले गया। वहाँ उस मनुष्यने देखा कि, बकरीके बच्चेके बराबर एक बहुत विषैला विच्छू है उस विच्छूसे अजगर बहुत भयभीत रहता था। उस मनुष्यने उस विच्छूको देखा तो जान लिया कि, यह अजगर इसीके भयसे मुझको यहाँ ले आया है। उसने बड़ा पत्थर उठाकर उस विच्छूपर ऐसे जोरसे मारा कि, वह उसी समय मर गया। जब वह विच्छू मरा तब उसकी देहसे छीटें उछलकर उस मनुष्यके ऊपर पड़े तो अजगरने उसी समय वे विषैली छीटें इस भयसे चाटलीं कि, वह उस मनुष्यके लिये घातक थीं।
छीटोंके विषसे कुम्हार अचेत हो गया। सॉपने कुम्हारके मुंहपर मणि लगादी। विषका प्रभाव तुरंत दूर हो गया मनुष्य भला चङ्ग हो गया। (सॉपकी मणिमें मृतकको जीवित करनेकी भी सामर्थ्य होती है।)
उस विच्छूके मरनेपर अजगर मनुष्यको किसी दूसरी जगह पर लेगया,
गाना सुननेका शौकीन, न्यायकी प्रार्थना सुअर रीछ, रीछकी मैत्री
एक धनभण्डार दिखा दिया। उसने देखा कि भण्डार धनसे परिपूर्ण है, कुम्हारसे जितना धन उठाया गया उठा लिया फिर अजगरने कुम्हारको उसी स्थान पर पहुँचा दिया, कुम्हार कुशल पूर्वक अपने घर पहुँच गया।
भैंसके थनको पीनेवाला—फिरोजपुर जिलाके भागसर मौजेके समीप तालाबके किनारेके बिलमें एक सोंप रहा करता था। वह भैंसके बच्चे कीसी आवाज किया करता था। जब कोई भैंस उस तालाबमें गिरे तो वह जाकर भैंसकी पिछली टाँगोंमें लपटकर उसके दूधको भली प्रकार चूस परितृप्त होकर ही पृथक् होता था।
मोटा छोटेमें—इसी पुस्तकमें लिखा है कि, एक स्त्री बहुत बड़ा सर्प देखकर चिल्लाने लगी। लोग दौड़े सोंपको मारनेके लिये पत्थर उठाया। सोंप भागकर एक कोनेमें छिप गया, लोगोंने बहुत दृढ़ता पर उसका पता न मिला। एक स्थानपर एक छोटा बिल दिखाई दिया। लोग आश्चर्य करने लगे कि, इतने छोटे बिलमें इतना बड़ा तथा मोटा सोंप कैसे समा गया? सोंप मनुष्योंको काटा नहीं चाहते, बड़े उदार प्रकृतिके होते हैं पर जब मनुष्य उसे मारनेको घेरते हैं तो भूमि उसको जगह देती है अत्यन्त छोटे बिलमें भी बड़ा सोंप समा जाता है।
रागसे प्रेम—सोंपोंको राग तथा बाजेसे बहुत प्रेम होता है। जहाँ कहीं अच्छा राग अच्छा बाजा हो वहाँ जाकर सुनते हुए प्रसन्न होते हैं मस्तीमें अपनी दुमपर खड़े होकर नाचते हैं।
एक मनुष्यने सर्पका शिर सावधानीसे पकड़ लिया उसको कोई उपाय न दिखाई दिया। सोंपने बहुत जोरसे हाथको कसा। जब नसोंपर जोर पड़ा तो वे दब गईं, उस मनुष्यकी मुट्ठी आपसे आप खुल गई सोंपका शिर छूट गया। उसने उस मनुष्यको काट खाया। मनुष्य मर गया सोंप चला गया उस मनुष्यकी कोई भी युक्ति काम न आई।
शत्रुको मरानेवाला—एक मनुष्य कहीं चला जाता था। राहमें उसको सोंपने घेर लिया। वह मनुष्य जिधर जाता था उधरही फुंफकार मारकर खड़ा हो जाता था पर चोट न करता था। मनुष्यने देखा कि, सोंप मुझे कष्ट पहुँचाना नहीं चाहता बरन् पथ रोकता है। उसने सोंपसे कहा कि, तू क्या चाहता है? इतना कहतेही सोंप एक ओर चला वह मनुष्य उसके ईशारेको समझकर उसके पीछे हो लिया। थोड़ी दूर पर वे दोनों एक मैदानमें गये, वहाँ पहुँचतेही सोंप एक प्रकारका शब्द करने लगा जिसके सुननेसे दूसरा सोंप बाँबीमेंसे निकल उसके साथ लड़ने लगा। वह मनुष्य समझ गया कि, यह सोंप इसका वैरो है
बोरनियोंका रीछ, शाही शोक यीसनका रीछ
इसीको मारनेके लिये यह मुझको यहाँ लाया है । उसने उसके बैरी सर्पको मार डाला । इसके बाद सर्प जिस मनुष्यको अपने साथ लाया था उसके आगे आगे चला, एक दूसरी बाँबीपर ले गया । जहाँ कि, उसका घर था । अपने बिलके भीतर जाकर एक रुपया निकाल लाया उस मनुष्यके आगे धर दिया । फिर भीतर गया फिर एक रुपया निकाल लाया, वह सॉप इसी प्रकार सौबेर बाँबीके भीतर जा सौ रुपया लाकर उसके आगे धर दिये । फिर वह सॉप मनुष्यके आगे आगे चला, उसी पथपर उसको ले आया, जिस पथसे वह पथिक जाता था । सॉप उससे बिदा हो एक टीलेपर चढ़ गया । अपना शिर उठाकर पथिककी ओर देखने लगा पीछे पथिकने अपनी तथा सॉपने अपनी राह ली ।
बच्चोंके लिये क्रोध—एक सांपिन बच्चोंको छोड़कर किसी दूसरी जगह चली गई थी । एक जमींदार हल जोते २ उस जगह आया, हलकी राहसे बच्चोंको उठाकर दूसरी जगह रख हल निकाल ले गया । सांपिन उस जगह आई, अपने बच्चोंको नहीं पाया । जान लिया कि, इसी जमींदारने मेरे बच्चोंको क्षति पहुँचाई है । उस जगह जमींदारके पानीका घड़ा धरा था, उसने उसमें विष मिला दिया आप कहीं चली गई । कुछ कालके पीछे जमींदार अपने हलका फेरा कर चुका तो उस जगह आया । सांपिनके बच्चोंको लाकर उसी जगह रख दिया । कुछ कालके पीछे वह सांपिन भी यह देखने आई कि, जमींदार विषैला जल पीकर मर गया वा जीवित है । जब वह उस जगह आई तो बच्चोंको अपने स्थानपर पाया जान लिया कि, यह जमींदार निर्दोष है । उसने विषजलसे भरे घड़ेको शरीरको लपेट कर घड़ा औंधा कर दिया, सारा जल गिर गया घड़ेमें कुछ भी पानी न रहा ।
रेटॉलिंग स्नेक—एक पुस्तकमें लिखा है कि, अमेरिका देशमें एक बहुत बलिष्ठ सर्प होता है । उसको अङ्ग्रेजी भाषामें रेटॉलिंग स्नेक कहते हैं । इसके चलतेवार खर खराहटका शब्द होता है । यह पशुओंके शरीरमें लिपट कर उनको ऐसा कसता है कि, उनकी हड्डियां चकनाचूर हो जाती हैं और तोड़ कर उनको निगल जाता है । कप्तान स्टण्डमन साहब कहते हैं कि, मैंने उस सॉपको देखा वह घूरकर तीक्ष्णदृष्टिसे मुझको देखने लगा । उस सॉपकी आँखोंमेंसे इस प्रकारकी आग थी, उसके ताकनेसे मेरा सारा शरीर ठण्ढे पसीनेसे भर गया । न आगे चला जाता था, न पीछे हटा जाता था । मैंने वीरता की उसके निकट जाके उसे सोटोंसे मार डाला ।
सॉपसे खेल—एक मनुष्यने उसी प्रकारके सॉपको पाला था । उसके लड़के सॉपके साथ खेला करते थे । उसको कभी गलेमें डाल लेते तो कभी कमर-
रीछकी प्रतिष्ठा, स्तुतिसे खुशी यांत्रिक उपाय
बन्द बना लेते वह साँप न तो कभी काटता एवं न किसी प्रकारकी पीड़ा ही पहुँचाता ।
चेमरलेन—एक प्रकारका साँप होता है । उसकी यह दशा होती है कि, वह केवल वायु खाकर ही रहता है और अनेक दिवसों तक कुछ नहीं खाता । एकही स्थानपर पड़ा रहता है । दूसरा गुण उसमें यह है कि, पलके पलमें अपना रङ्ग बदल लेता है । पहले एक रङ्ग फिर दूसरा रङ्ग बदला करता है ।
चेमरलेनके रङ्गपर मत—विद्वानोंने उसकी ऐसी बात जाँच की है कि, उसकी जिह्वा बहुत लम्बी होती है, वह अपनी जिह्वाको दूर तक बढ़ा सकता है । उसके द्वारा कुछ खाता पीता रहता है । पर इस विचारमें कुछ पुष्टता नहीं है रंग बदलनेका भी कारण यह बताते हैं कि, जहाँ चेमरलेन रहता है उस स्थानपर रङ्ग विरङ्गके दाने तथा कड़कड़ आदि पड़े रहते हैं उसकी चमकसे उसका रङ्ग भौंति भौंतिका दिखाई देता है । वास्तवमें उसके अनेक रंग नहीं हैं ।
बिच्छू ।
सापोंकी तरह बिच्छूओंमें भी अनेक जातियाँ होती हैं इनके भी विषके उतार चढ़ाव साँपके विषोंकी तरह ही होता है, गोबरसे पैदा होनेवाले सूत्र बिच्छूओंसे लेकर इतने बड़े जहरी होते हैं कि, जिनका डंक लगनेसे पहाड़की बड़ी चट्टान भी संखिया विषके रूपमें परिणत हो जाती है । यह दो अंगुलसे लेकर बकरिये बच्चके बराबर बड़ा होता है इन सबमें पहाड़ी बिच्छू अत्यन्त ही विषैला होता है ।
बादशाहका जहर—मैंने अपने पितासे सुना था कि, एक बार एक बड़ा साँप भागा जाता था । मानो वह सर्प अत्यन्त भयसे भागा जाता हो । समीपही एक बागमें किसी नौव्वाबका लशकर पड़ा था । पड़ाव पर बहुतेरे देग आदि रक्खे थे । साँप भागता हुआ गया एक देगमें छिप गया । वह सर्प कुण्डल मारकर बैठ गया । नौव्वाबके नौकरोंने देग उलट दी, साँप उसीके भीतर पड़ा रहा । कुछ कालके बाद वहाँ बिच्छूओंकी सैन्य आपहुँची । सहस्रों बिच्छूओंने आकर उस देगको चारों ओरसे घेर लिया । जितने बिच्छू आते जाते थे सबके सब उसी देगको घेरते जाते थे । अन्तमें सबसे पीछे काले बिच्छूपर सवार श्वेत वर्णका एक छोटा बिच्छू आया । बिच्छूओंके बादशाहके आपहुँचनेपर सारे बिच्छू अत्यन्त प्रतिष्ठा पूर्वक पीछे हट गये उसको पथ दे दिया । वह देगके निकट गया । देगके चारों ओर फिरा उसको भीतर जानेका कोई मार्ग नहीं मिला । वह देगक ऊपर चढ़ गया तीन बार अपना डङ्का देग पर मार कर उतर आया, अपनी सवारी
मानुषी भोगी, भेड़िया शाह एम्यूल्स तथा एम्स नरकन्या
पर सवार होकर चला गया । उसके पीछे बिच्छुओंकी सारी फौज उसके पीछे चली, सब अपने २ सकानको गये, एक बिच्छु भी उस जगह नहीं रहा । उनके जाने पर नौव्वाबके सेवकोंने उस देगको उलट कर देखा वह सौंपसहित राखका ढेर हो गया था ।
रेशमका कीड़ा ।
बीटन साहबकी नेचरल डिक्शनरीमें एक प्रकारके रेशमी कीड़ेका वृत्तान्त लिखा है कि, रेशमी कीड़ा पहले चीन देशसे आया, यह मल.ईकी तरह श्वेत वर्णका होता है इसका रंग शीघ्रही बदल जाता है । उसका भोजन वृक्षोंकी पत्तियों हैं यह छः सप्ताहमें पूरी अवस्थाको पहुँच जाता है, बीच बीचमें चार पाँच बार अपना रङ्ग बदलता है फिर सुस्त हो जाता है कुछ खाता नहीं फिर इसका रङ्ग भूरा होता है; चार पाँच बार रङ्ग बदल चुकनेके बाद डेढ़ इञ्चसे लेकर दो इञ्चतक लम्बा हो जाता है । दस दिनतक बहुत खाता जाता है, जिससे मोटा तथा बड़ा होता जाता है । समय बीत जानेपर ढाई इञ्चसे लेकर तीन इञ्च तक हो जाता है उस समय भोजनकी कामना घट जाती है, पत्तियोंको कुतर २ कर पृथिवी पर डाल देता है भोजनादि छोड़कर बेचैन हो जाता है, जिस समयसे अपना भोजन छोड़ देता है उस समयसे पतला रेशमी कपडासा बनाता है । उसकी देह पतली और नरम होनेके साथ स्वच्छ तथा उज्ज्वल होती जाती है, प्रायः तीन चार दिनोंमें बहुत सुन्दर रेशमी परदे तयार होते हैं वे गोल गोलीके समान होते हैं । रेशमी गोलियों कोई सूतके रङ्गकी, कोई सुनहरी, कोई फूलके रङ्गकी और कोई श्वेत होती है । इस कठिनपरिश्रमसे निवृत्त होते ही यह अपना चर्म एकवार छोड़ता है उसका पहला स्वरूप बदल कर गोल हो जाता है । उस अवस्थामें दो अथवा तीन सप्ताह रहता है इसके पीछे परदा फट जाता है उसका स्वरूप और ही ढङ्गका हो जाता है, उस समय कीड़ा अपने मुखसे एक प्रकारका गोंदके समान पतला पदार्थ निकालता है—उसमें केवल तार ही तार होते हैं, वे छः सौ फीटसे सहस्र फीट तक लम्बे होते हैं । रेशमी कीड़ा सारे कीड़ोंका राजा होता है, राजों तथा रहीसोंकी तरह बार बार कपड़े बदलता रहता है ।
गिरगिट ।
इस प्रकारका एक गिरगिट भी मैंने देखा कि, वह अपना रङ्ग बदलता
भेड़ियेका पाला मनुष्य, चरक स्मार
था एवं शिर हिलाते हुये बड़ी आन बानसे चलता था, चेमलेन सोंपकी तरह वह भी कपड़ा बदलता रहता है।
मकड़ी ।
मकड़ी एक प्रकारका कीड़ा है। प्रत्यक्षमें उसका शिर बाहर नहीं जान पड़ता। उसके अङ्ग उसके शरीरमें इस प्रकार लगे हुये होते हैं कि, तनिक छूनेसेही गिर पड़ते हैं। नरके पाँव अनेक लटकन होते हैं। मकड़ीके पाँव बहुत छोटे २ होते हैं इसी कारण वह गिर पड़ती है। उसके पाँव कुण्ठयाके समान होते हैं सामने पाँवमें टेढ़ी कठिया होती है जो हिलती है। नीचेकी ओर टेढ़ी हैं उसके नीचेकी ओरका एक टेढ़ा छिद्र होता है जिस पथसे कि, वह बिष निकालती है विष अपने पास रखती है उसके ऊपर एक पाँतर है उसमें बही प्रभाव है जो कि, शिरके स्थान प्रगट करती है। इसमें एक और टुकड़ा मिला होता है वह हिला करता है वह उसका नरम पेट हैं। इस देहके टुकड़ेमें चार अथवा छः गोली निकली हुई होती है। वह मांससे गठीली होती है सभी गोल तथा एक दूसरेसे मिली हुई होती हैं उनके सिरपर अनेक छोटे छोटे छेद होते हैं इनही स्थानोंसे रेशमी तार निकालती हैं। एक प्रकारका मसाला है—जो कि, उसके पेटके भीतर की झोलीमें रहता है। रेशम ऊँचे नीचे बर्तनोंमें रहता है वे बर्तन बहुत मोटे और बहुत छोटे कदके होते हैं। उनकी जड़ एक दूसरेसे जमी हुई होती हैं वे बाहरी समानके साथ मिली हुई होती हैं। जो मसाला भीतरी बर्तनोंमें प्रगट होता है वह स्वच्छ गोंद और लेईके समान होता है। तीक्ष्ण मदिरा अथवा जलसे नहीं गल सकता जब झुकाया जाय तो टूट जाता है। वह दुमदार तथा लचीला तभी होता है वह पतला पतला तार बनाया जावे यह गुण उससे निकलता है। बराबरसे अनेक छोटे २ बाल होते हैं, उनकी राहसे वह मसाला निकलता है, वे शून्य सूत काटनेवालेके स्थानपर लगे हुये होते हैं, एक कातनेके स्थानपर सहस्र २ बाल अथवा बूँद रहती हैं। इनहीसे गाढ़ा लार बूँद २ करके निकलता है, जिस समय वह बाहर निकलता है तो वायु लगतेही सुन्दर तथा महीन बन जाता है। प्रत्येक कातनेवालेके तार पहले मिले रहते हैं। जब वह किसी वस्तुसे लटकाती है उसमें बहुतेरे पदार्थ संयुक्त रहते हैं। पहले मकड़ीका तात्पर्य यह रहता है कि, वह अपने तारको किसी स्थानमें लगादे। इसके बाद अपना जाल बना किसीसे लगा देती है। इससे लगाकर अपने प्रत्येक चरखोंसे निकालती है। मकड़ी अपने पिछले पाँवको तकमेकी तरह काममें लाती है। उसके द्वारा वह अपने शरीरसे बराबर तार निकालती जाती है, इस मकड़ीकी तारकी बनावटमें भेद होता है।
कुता, रामकालका श्वान
एक प्रकारका तार तो चपचपा होता है दूसरा स्वच्छ तथा वारीक होता है । जो चपचपा होता है उसको तो वह वृक्ष अथवा दीवार इत्यादिसे लगा देती है वे दूर दूर तक तने रहते हैं । दूसरे तार जालके लिये हैं । इन्हीं तारों द्वारा मकड़ी अपना जाल बनाती है, इन्हीं जालोंसे आखेटको पकड़ती है । चिपचिपे तार तो घेरा करते हैं स्वच्छ तार केन्द्रके समान मध्यमें होते हैं । मकड़ियोंकी अनेक जातियाँ हैं ।
आठ आंखोवाली—कारसिका भूमिमें आठ आंखोवाली काली मकड़ी होती है । यह बहुत बलिष्ठ होती है, यह जानवरों तथा टिड़ियोंको पकड़ पकड़कर खाया करती है । मकड़ियोंके तारकी बनावट तथा सजावटके बारेमें अंग्रेजी पुस्तकोंमें बहुत कुछ लिखा हुआ है ।
चींटी
चींटी बड़ी परिश्रमी होती हैं । पूर्वकालसे विख्यात है कि, लड़ने तथा घरोंआ काम काज करनेमें यह बहुत निपुण होती हैं । यद्यपि ये छोटी हैं पर बहुत बलिष्ठ तथा दृढ़ हैं, जितना उसका शरीर अधिक है उससे दशगुणा बोज़ा उठाती है बहुत चुस्त चालाक होती हैं । शिर छोटा होता है, जाड़ बहुत दृढ़ होती है । उनका नीचेका होंठ छोटा और गोल चमचेके समान होता है । उसका पेट अण्डाकार होता है उसमें एक अथवा दो गोंठें होती हैं । नरके चार पर होते हैं । नरकी अपेक्षा मादा डील डीलमें बड़ी होती है व सम्भोग कालमें परदार होते हैं उनमें कितनीही मजदूरी तथा परिश्रम करनेवाली चींटियाँ होती हैं उनके जन्मभर पर नहीं निकलता । चींटियोंके घर बहुत अच्छे ढङ्गसे बने हुए होते हैं, उनकी बनावट बहुत विचित्र है । यदि बहारके आधे मौसमसे लेकर पतझड़के मौसम तक चींटियोंका घर देखा जावे तो पर तथा परहारसे भरा होगा । जो नर तथा मादा चींटियाँ हैं उनके पर चमकते होते हैं मिहनती चींटियोंके पर नहीं होते । परिश्रमी चींटियोंमें राजा तथा रानी कोई नहीं, केवल वे दास हैं ।
परवाली चींटियोंमें बादशाह बेगम तथा अमीर—भी होते हैं । राजा तथा अन्यान्य श्रेष्ठ चींटियाँ घरोंमें रहा करती हैं । जब वे बाहर निकलती हैं तो उनकी अरदलीमें सैन्य हुआ करती है । बाहर अकेले कदापि नहीं फिरती समस्त सैन्य उनकी प्रबन्ध तथा सेवामें रहा करती है, जिसमें वे अकेले बाहर न जावें यदि अमीरोंमें कोई अकेला बाहर निकल भी पड़े तो चौकीदार चींटियाँ उनको खींचकर भीतर कर देती हैं । ऐसी अवस्थामें तीन या चार चींटियाँ
उस भगोड़े अमीरको खींचकर भीतर करती हैं। पहरेदार चीँटियोंमें एक तरहका भाग जानेका स्वभाव होता है कि वे अपनी जन्मभूमिको छोड़कर भाग जाती हैं।
सहबास—जोड़ खानेके पीछे फिर कदापि पलट कर नहीं आतीं। उनका घर मादा विहीन होनेके कारण शीघ्रही उजाड़ हो जाता है। उनका जोड़ खाना विशेषतः घरके भीतर नहीं होता देखा गया है कि, चारों ओर जासूस फिरा करते हैं कि, जहाँ कहीं वे बच्चा जननेवाली मादा पावें पकड़ लावें। जासूस विशेषतः इसी विषयके लिये नियत किये गये हैं। यह बात जाँचसे जानी गई है कि, झुण्डके झुण्ड इधर उधर तितर बितर हो जाते हैं। जिसमें अच्छी मादा ढूँढ़कर ले आवें। उनके मकानके समीप न मिले तो दूर दूरकी यात्रा करती हैं। बहुत दूर दूर चली जाती हैं फिर लौटकर नहीं आतीं। समय पाकर नवीन बस्ती बसाने लगती हैं।
सहवासके बाद मौत—जोड़ खानेपर निश्चयही मर जाती हैं। दूसरे भी अन्यान्य कितने कीड़े मकोड़ोंके नर जोड़ा खानेके पीछेही मर जाते हैं। ऐसाही नियम चीँटियों का भी है। क्योंकि सेवक चीँटियाँ उनको पुनः अपने घर नहीं लातीं न उनकी ओर ध्यानही देती हैं। एक बार चीँटियाँ घरको छोड़ जाती हैं तो वे अवश्यही मर जाती हैं। क्योंकि, उनके पास न पर होता है न भोजन प्राप्तिका यंत्रही होता है।
चीँटियोंके पर—प्राचीन कालके मनुष्य ऐसा अनुमान करते थे कि चीँटियोंको नियत समयपर, पर निकलते हैं। वर्तमान कालके जानवरोंकी विद्याके प्रख्यात विद्वान परह्वेरेके विचारसे जान पड़ा कि, मादाके नियत समय-पर निकलते हैं, उगकर फिर गिर जाते हैं।
बच्चे—चीँटियोंके अण्डे ऐसे छोटे होते हैं कि, उनका नज़्ज़ी आँखोंसे देखना कठिन हो जाता है। दूसरे कीड़ोंके विपरीत चीँटियाँ अण्डे देती हैं उसी समय स्वेच्छापूरवक अपने पर गिरा देती हैं। जो मजदूर चीँटियाँ हैं वे समस्त अण्डोंको एक स्थानपर इकट्ठा करती हैं। जिस समय वे अंडे देतीं हैं उस समय बहुतेरी चाकर चीँटियाँ उनके चारों ओर एकत्रित रहती हैं। वे अण्डोंको एकत्रित करके पृथक् पृथक् मकानकी कोठड़ियोंमें पकनेके लिये सावधानीसे धर-देती हैं और पालती हैं। उनके पकनेके लिये वायुकी आवश्यकता होनेसे दिनके समय चीँटियाँ घरके टीलेके मुँहके समीप रखती जाती हैं। पर ऐसे स्थानोंमें धरती हैं जिसमें कि, सूर्यकी तपन आवश्यकतासे अधिक न होने पावे जितनी गर्मीकी आवश्यकता है उससे अधिक न लगने पावे, जब रात होती है उस समय
मनुष्यकीसी बात
अनुभवो चिटियाँ अण्डोंको उठाकर गरम करके चारों ओर रख देती हैं। जिसमें ऐसा न हो कि, उनकी प्राकृतिक उष्णता उनमेंसे निकल जावे। समस्त दाइयाँ अण्डोंकी रक्षामें बहुतही सचेत रहती हैं। जबतक सारे अण्डोंसे बच्चे नहीं निकल आते तबतक वे सब बराबर सेवामेंही लगी रहती हैं। रातके समय अपने घरके द्वारोंको चारों ओरसे बन्द कर लेती हैं। जिसमें कि किसी ओरसे वायुका प्रवेश न हो, सबेरा होतेही घरके बाहर धूपमें अण्डोंको धर देतीहैं, जिसमें उनको न बहुत धूप लगे न बहुत ठण्डकही सतावे, वे किसी समय कड़ी धूपमें भी धर देती हैं।
बच्चोंका भोजन—जबतक छोटे छोटे बच्चे बाल्यावस्थामें रहते हैं तबतक उनकी दाईं अथवा माता अपने पेटसे एक प्रकारका पतला पतला भोजन निकालकर खिलाया करती हैं। जब वे बच्चे बड़े हो जाते हैं तो वे सब एक प्रकारका झिल्लीदार श्वेतरङ्गका जौके समान सूत कातते हैं जिसको लोग भ्रमवश समझते हैं कि, यह वस्तु चीँटियोंका भोजन है। जो गरमीके समय ठण्डे दिनोंके निमित्त एकत्रित करती हैं
चीँटियोंका भोजन—यह बात भी जानी गई है कि, यूरोपकी चीँटियाँ मांसाहारी हैं। पादरी जेजी उड साहबका कथन है कि, चीँटियाँ शरदीके लिये संग्रह नहीं करतीं बरन जाडेके दिनोंमें वे अचेत होकर सुस्त पड़ी रहा करती हैं। उनके वास्ते भोजनकी आवश्यकता नहीं। इसके अतिरिक्त उस सैन समयमें भोजन पचाना इतना कठिन है कि, जैसे मनुष्यको सूखी घासका पचाना। चीँटियोंका विशेष भोजन चीनी है। जहाँ, कहीं चीनी होती है वहाँ वे अपने सृंघनेके बलकी सहायतासे पहुँच जाती हैं। मिठास वृक्षोंकी जड़ अथवा पुष्प इत्यादिसे मिठास प्राप्त करती हैं। चीँटियाँ इस मिठासको स्वयन् अपनी वस्तु समझती हैं
भोजनपर युद्ध—यदि कोई चीँटी बाधा दे तो उससे बहुत युद्ध होता है। यहाँतक कि, कितनीही चीँटियाँ इस लड़ाईमें मारी जाती हैं।
चीँटियोंके घर—चीँटियोंकी बुद्धिकी कहानियाँ बयानके बाहर ह। चीँटियोंके काम अत्यन्त आश्चर्य्यमें डालनेवाले हैं। मनुष्यकी बुद्धि कुछ काम नहीं करती। चीँटियोंके मकान बड़ीही कारीगरीके साथ बने हुए होते हैं नदीके समीप वे अपने घरोंको बनाती है। लाल श्वेत काले भूरे रङ्गकी चीँटियाँ होती हैं। श्वेत चीँटियोंको दीमक कहते हैं वे नदी किनारे अपने मकान बनाती हैं जिसमें उनको मकान बनानेके लिये पानी शीघ्रही मिल जावे। वह मकान गाव-
नानी कुतिया, डब्बू दूसरा, डब्बू, अन्तर्धामिनी कुतिया
डुम और ऊँचा होता है लकड़ी मिट्टी और पत्तियों आदिसे बना होता है। सहस्रों परिश्रमी मकान बनानेका सामान ढूंढते हुये, इधर उधर घूमा करते हैं। लकड़ियाँ पत्तियाँ लाकर अत्यन्त स्वच्छता पूर्वक मकान बनाते हैं, प्रत्यक्ष देखनेमें तो उनके घरोंमें किसी प्रकारकी कारीगरी नहीं देख पड़ती पर सूक्ष्म दृष्टि के साथ जाँचकर देखनेसे जान पड़ता है कि, बहुत हिकमत तथा गुणके साथ बने हुये हैं। उनपर वैरीका आक्रमण नहीं हो सकता, प्रचण्ड वायु क्षति नहीं पहुँचा सकती, धूपकी तपन नहीं तपा सकती। जब कभी वर्षाकी अधिकतासे उनके घरमें कोई छेद भेद हो जाता है तो, वे अत्यन्त परिश्रम पूर्वक तुरन्तही उसको बन्द कर लेती हैं। मकान इस स्वच्छता तथा निर्मलतासे बनाते हैं कि, मानो बहुत सावधानी तथा परिश्रम किया गया हो। कहीं कोई छेद इत्यादि रहने नहीं देते। वर्षा जल तथा मिट्टी इत्यादि लेकर भली प्रकार गूँधते हैं गूँध गूँधकर बराबर लगाते जाते हैं, सुन्दर मेहराब तथा पील पाये खम्भे बनाते हैं, जिनकी प्रशंसा नहीं कही जाती।
जंगी लड़ाई—चीटियों बहुत क्रोधयुक्त होती हैं, उनमें बहुत भयानक युद्ध हुआ करता है, लड़ते लड़ते इस प्रकार मरती और कटती हैं कि, उनका शिर तथा धड़ पृथक् पृथक् हो जाता है। फिर भी अपने वैरीके साथ जुटी रहा करती हैं। शिर शिरके साथ और धड़ धड़के साथ चिमटे हुयेही मर जाती हैं। इनमें एक अनूठी बात यह है कि, एक जातिकी चींटी दूसरी जातिकी चींटियोंके अण्डे बच्चे पकड़ लाती हैं। उनको पकड़ने जाती हैं तो आक्रमण करके उनको पकड़कर कैंदी बना लाती हैं उनको दास बनाती हैं, वे दास सैन्यके पीछे पीछे चलते हैं अनेकों प्रकारकी सेवा किया करते हैं
चुराने और चुरानेवालोंका रंग—एक विचित्र बात यह है कि, जो डाकू चीटियोंके अण्डे बच्चे पकड़ने जाते हैं उनको पकड़कर अपना दास बनाते हैं वे सब पीतवर्णके होते हैं जिनको लूटकर वे सब चुरा लाते हैं वे सब काले रङ्गकी होती हैं, पीले रङ्गवाले अत्याचारी डाकू जब चलते हैं तब उनके साथ उनकी अरदलीमें बहुतेरी चींटियाँ भी चलती हैं। डाका मारने अथवा धावा करने पर उद्भूत होते हैं दोनों जातियों में घोर युद्ध होता है। हबशी अर्थात् काली चीटियोंपर बहुत कठिनाई उपस्थित होती है। विजयी सैन्य उनके दुर्गोंको ढाह देती हैं उनकी शहर पनाहको गिराकर उनके बच्चोंको पकड़ लेती हैं, विजय-डङ्गा बजाते हुये लौट आती हैं। विजयी सैन्यके लोग दासोंके साथ कुव्यवहार नहीं करते जैसे मनुष्य अपने गुलामोंसे करते हैं, उनके साथ भी ठीक वही सलूक
मोती राम, पठानका कुता
होती हैं उनके रहनेको वैसाही घर मिलता है जैसा कि, उनका स्वामी उनके लिये पसन्द करे । कितनीही अंग्रेजी पुस्तकोंमें चींटियोंकी बुद्धिमानकी अनेक कहानियाँ लिखी हैं । हन्श तथा आमेजनकी चींटियोंकी बहुतसी विचित्र बातें लिखी हैं । लिटरेली और कबरली साहबों की रची पुस्तकोंके देखनेसे चींटियोंके विचित्र कौतुक तथा न्यारी २ लीलाएँ मालूम हो सकती हैं ।
हन्शकी चींटियाँ—जैसा डाक्टर गोल्ड स्मिथ साहबने अपनी नेचर हिस्ट्रीमें लिखा है । हन्श देशमें चींटियोंके ऐसे बड़े बड़े घर होते हैं कि, जिसको पहले न देखनेवाला कभी अनुमानही नहीं कर सकता है कि, वे ऐसी छोटी चींटियोंकी बनाई होंगी । एक एक टीले पन्द्रह पन्द्रह फीट ऊँचे होते हैं । उन टीलोंके भीतर घर तथा ऊपरी घर आदिक अनेक सुघर घर बने होते हैं । बादशाही महल, तथा रईसोंके अलग और सेवकों तथा दासोंके निमित्त न्यारे न्यारे घर तैयार करती हैं । बादशाह तथा बेगम अपने अपने महलोंमें रहती हैं, चौकीदार तथा द्वारपाल द्वारपर खड़े होकर पहरा चौकी देते हैं । पहरेमें सचेत रहते हैं वैरीसे सामना करनेको सब हथियार बांधकर प्रस्तुत रहते हैं । चींटियाँ बहुत बच्चा जननी हैं जब उनको गर्भ रहता है । तो उनके हिजड़े गुलाबों पर सेवाका समस्त बोझ रहता है । वे गर्भिणी होती हैं तो उनका पेट इतना फुलता है कि, जितना उनका शरीर होता है उससे दो सहस्र गुनेसे अधिक बढ़ जाता है, जब अण्डे देती हैं तो दास रक्षामें तत्पर होते हैं । चौबीस घण्टोंके बीचमें एक चीटी आठ लाख अण्डा देती है । यदि पशु पक्षी और मक्खी इत्यादि उनको चुन चुनकर न खाजाये तो उनकी संख्यासे समस्त पृथिवी भर जावे । वे बड़ी २ चींटियाँ होती हैं वहाँके लोग उन्हें भून भूनकर खाते हैं उनका कबाब बनाते हैं । डाक्टर लाइस्टन् साहब इत्यादि उनकी युक्तियों और गुणोंकी बहुत प्रशंसा किया करते हैं । उनके देखनेसे मनुष्योंकी सारी युक्तियाँ निष्फल जान पड़ती हैं ।
चींटियोंका बादशाह और सुलेमान—मुसलमानी पुस्तकोंमें लिखा है चींटियोंके बादशाहने सुलेमान बादशाहको ससैन्य निमंत्रण दिया । चींटियोंके बादशाहका न्याय सुविचार सुलेमान बादशाहके न्यायकी अपेक्षा उत्कृष्ट रहा । चींटियोंका बादशाह सुलेमान शाहके सिंहासन पर चढ़ गया । सुलेमानको यह प्रमाणित करके दिखा दिया कि, मेरा न्याय तुमसे बढ़कर है । सुलेमानने मान लिया कि ऐ चींटियोंके बादशाह ! वस्तुतः आपका न्याय मुझसे बढ़कर है ।
दीमक—चींटियोंकी अनेक जातियाँ होती हैं । भारतवर्षकी श्वेत चींटियाँ लकड़ियोंको खा जाती हैं । उन्हें दीमक कहते हैं ।
कुताकी योनिमें कर्जी
राजा भोज और चैंटी, काशीके बकरियाकुंडका इतिहास ।
मैंने सुना था कि, सुलेमान शाहके समान राजा भोजभी पशुओंकी बातें समझ सकता था, एक दिन ऐसी घटना हुई कि, राजा भोज भोजन कर रहा था । एक चूरा पृथ्वीपर गिर पड़ा, जिसको एक चैंटी उठा ले चली । आगे एक दूसरी चैंटी मिली । उसने उससे कहा कि यह दाना मुझको दे, तू जाकर दूसरा उठा ला । चैंटीने कहा कि, मैं तुझको क्यों दूँ ? तू आपही जाकर ले आ । उसने कहा कि, मैं तो जातिकी चमारी हूँ, मैं राजाके थालके पास कैसे जा सकती हूँ ? तू ब्राह्मणी है तू जाकर लेआ यह बात जानकर राजा भोज हँसा । रानीने हँसीका कारण पूछा राजाने दोनों चैंटियोंका हाल कहा । रानीने कहा कि, मुझको भी यह विद्या सिखा दो । राजाने कहा कि, यह मुझको आज्ञा नहीं, यदि कहूँगा तो भर जाऊँगा । यद्यपि बहुत कुछ मना किया पर रानीने न माना, राजा विवश हुआ कहा कि, अब मुझको मरनाही पड़ेगा, अच्छा है कि, काशी चलकर बताऊँ क्योंकि, वहाँ मरनेसे मुक्ति प्राप्त होगी । बनारसमें पहुँचा तो देखा कि, एक, बकरी बकरा चरते फिरते हैं । एकस्थान पर एक फूटा कुवाँ था, उसके चहुँओर हरी २ घास उगी थी । बकरीने कहा, कि, मुझको यह हरी घास लादे तो मैं इसे खाऊँ । बकरेने कहा कि, मैं यह कार्य नहीं करूँगा । मैं राजा भोजके समान मूर्ख नहीं हूँ कि, एक स्त्रीके कहनेसे अपना प्राण गवाँ दूँ । बकरा बकरीकी यह बात सुनकर राजा चैतन्य हुआ, अपनी रानीको भली प्रकार डाँटा मारा, यह भी कह दिया कि, यदि तू फिर मुझसे पूछेगी तो मैं तुझको मार डालूँगा रानी चुप हो रही कोई बात नहीं कही । जहाँ पर राजाने बकरा बकरीकी बातें सुनी थी उसका नाम बकरियाकुण्ड है । मैंने उस स्थानको अपनी आँखोंसे देखा है, मैं उस बकरियाकुण्डके समीप छः माससे भी अधिक रहा था प्रत्येक वर्ष बकरियाकुण्डका मेला लगता है । अनेक मसखरे और कामीपुरुष तथा स्त्रियाँ वहाँ एकत्रित होती हैं । यह काशीका प्रसिद्ध मेला है ।
पक्षी ।
अब यहाँ पर एम्. आर एसली साहब और अन्यान्य अंग्रेजी पुस्तकों तथा अपनी बुद्धिके अनुसार पक्षियों की बातें भी लिखता हूँ ।
गिद्धकी—मुदूढ़ तीक्ष्णदृष्टि होती है, यह बहुत ऊँचा उड़ सकता है । इसमें तीन गुण हैं । प्रथम तो इसको देखनेकी शक्ति अत्यन्त तीक्ष्ण होती है । दूसरे इसकी सृंघलनेकी बड़ी शक्ति होती है । तीसरे सुननेके बलसे अपने आखेट पर टूटता है । इसके इन तीनों बलोंको स्वभाव वादियोंनेभी भली प्रकार जाँच कर देख लिया है । गिद्ध तीनों गुणोंसे विभूषित है । इन्हीं तीनों गुणोंद्वारा जान
कुता और संन्यासी
लेता है कि, इसका आखेट कहाँ है ? जहाँ कहीं प्रगट हो वहाँ तो आँखसे देख लेता है । जहाँ कहीं शिकार छिपी हो वहाँ गँधसे पहचान लेता है । उसके कानका बलभी इतना तीक्ष्ण है कि, मरनेके समीप पहुँचे हुये चिल्लाते पशुओंकी आवाज तुरन्तही सुन लेता है, तुरन्तही वहाँ पहुँच जाता है ।
मिश्रीकयरू—गिद्धकी जातियोंमें एक प्रकारका मिश्र देशी कयरू होता है । यह बहुत सुन्दर होता है । यह सारे देशमें पाया जाता है । अङ्गरेजी पुस्तकोंमें पूर्णरूपसे इसका हाल लिखा है, उसे मैं यहाँ संक्षेपसे लिखता हूँ । इसको फिर उनकी सन्तान कहते हैं । मिश्रके प्राचीन निवासी उसको पवित्र जानकर प्रतिष्ठा किया करते थे, अपने कबरोंपर स्मारक चिह्न के भाँति उसकी तसबीर खोदते थे । यह शांतिके साथ शीघ्र गतिते चलता है । हबशी लोग उसकी पूजा करते हैं । अनेक प्रकारके दूसरे रङ्गके गिद्ध भी हैं, पर सबकी बादशाह फिरउनकी संतानही हैं, यह बहुत सुन्दर होती है । उसका शिर तथा उसकी ग्रीवा बहुत चमकदार होती है । नारंगीके रंगके पर शरीर होते हैं ।
गिद्धोंका बादशाह—एक अथवा अधिक आखेटपर बड़ी आनवानसे आपहुँचता है । उस समय समस्त गिद्ध नम्रता तथा प्रतिष्ठा सहित वहाँसे पृथक हो जाते हैं उसके चारों ओर घेरा बाँधकर खड़े रहते हैं । बादशाह भलीप्रकार खाकर सन्तुष्ट हो जाता है, दूर जाकर वृक्ष अथवा पर्वतपर बैठता है तो दूसरे गिद्ध आखेटके पास जाते हैं नहीं तो सब बादशाहके सन्मुख दूर खड़े रहते हैं । जबतक बादशाह भलीप्रकार खाकर परितृप्त न हो जावे तबतक किसी गिद्धकी शक्ति नहीं है कि, आखेटके निकट जायें । सब भी प्रतिष्ठापूर्वक दूर खड़े रहते हैं । यहाँ तक कि, जबतक राजाके घरानेका कोई भी खाता रहेगा समस्त गिद्ध नम्रता पूर्वक दूर खड़े रहेंगे । बादशाहसे कोई असभ्यता नहीं कर सकता । अङ्गरेजी पुस्तकोंमें इनकी बुद्धि तथा समझकी अनेक बातें लिखी हैं । पर मैं विस्तारके भयसे लिखना नहीं चाहता ।
जटायु तथा सम्पाती—दो भाई बड़ी जातिके गिद्ध थे । ये मनुष्यों तथा पशुओंको पकड़के खा जाते थे । उनकी कहानी रामायणमें लिखी है कि, वे दोनों युवा वस्थाके घमण्डमें आये । उनकी इच्छा हुई कि, अब हम चलकर सूर्यको देखें । आकाशको उड़े, सूर्यकी गरमी बढ़ी । जटायु तो पृथिवीपर लौट आया पर सम्पाती अपने घमण्डवश ऊपर चढ़ता गया, सूर्यके अत्यन्त निकट पहुँचा तो उसके पर भस्म हो गये जिससे भूमिपर गिर पड़ा । पीछे एक पर्वतकी कन्दरामें पड़ा रहा, विश्वम्भर उसको वहाँ ही भोजन पहुँचाने लगा ।
विदुषी कुती, बुलहाउण्ड
राजा रावण सीताजीको चुराये लिये जाता था, सीताजी ढाड़े मार मारके रोती हुई राम राम करती जाती थी । जटायुने पहचाना कि, महाराजा रामचन्द्रजीकी स्त्री सीताजीको रावण लिये जाता है, वह दौड़ कर पहुँचा ललकारा कहा कि, दुष्ट रावण ! तू सीता माताको कहाँ लिये जाता है । सावधान खड़ा हो, दोनोंमें महायुद्ध होने लगा । जटायुने रावणको अचेत कर दिया, उसके रथको तोड़ डाला, सीताजीको छीन लिया । रावणने देखा कि, यह बहुत बलिष्ठ वंरी है किसी प्रकार नहीं मरता तो अग्निबाणसे मारा । जटायुके समस्त पर भस्म हो गये, राम २ कहकर वह पृथिवीपर गिर पड़ा तो रावण सीताको रथपर चढ़ा लङ्काको ले गया । रामचन्द्र तथा लक्ष्मणजी सीताको ढूंढते हुये उसी जगह पहुँचे जहाँ कि, जटायु पड़ा हुआ था । रामचन्द्रने पूछा कि तुम्हारी यह क्या दशा है ? जटायुने सारा हाल कहा कि, रावण मेरी ऐसी दशा करके सीताजीको लेगया । रामचन्द्रसे यह बात कहकर जटायु मर गया, रामचन्द्रजी महाराजने जटायुकी किया कर्म अपने हाथोंसे उसी प्रकार किये जैसे अपने प्यारे मित्र अथवा निकटस्थ सम्बन्धीकी किया करते हैं, भगवान् रामकी कृपासे जटायु दिव्यधामको चला गया ।
उक्ताब ।
यह बहुत सुन्दर तथा अत्यन्त बलिष्ठ होता है । यह दक्षिणी अमेरिकामें होता है जिस प्रकार मैंने फिरोजकी सन्तानकी बात लिखी है वैसेही उसकी भी है । यह जब आखेटके ऊपर आता है उस समय सारे मांसभक्षी पक्षी घेरा बांधकर दूर खड़े रहते हैं । जब तक यह राजा मांस खाकर पृथक न हो जाय तब तक कोई भी नीच जातिका मांसाहारी पक्षी आखेटके समीप नहीं जाता, यह भी सुदृढ़ तथा सुन्दर होता है ।
लगलग ।
व्यर्थका द्वेष—जीनबर्ग कालेजके घेरावके भीतर एक घरेला लगलग रहता था उसके निकटके घरके ऊपर एक घोंसला था । उसमें प्रत्येक वर्ष लगलग आया करते थे, अण्डे देकर पालते थे । एक दिन कालेजके लड़केने उस घोंसलेके पास आकर बन्दूक मारी, घोंसलेमें बैठा हुआ लगलग आहत हुआ । क्योंकि इसके बाद वह लगलग कई सप्ताह तक बाहर उड़ता दिखाई न दिया । अपने नियत समयपर दूसरे साथियोंके साथ चल दिया । इसके पीछे वसन्त ऋतुके आरम्भमें एक लगलग कालेजकी छत पर दिखाई दिया, वह परोंको खड़खड़ाता था शायद वह परोंके शब्दसे घरौवे लगलगको बुलाता था । पर घरौवे लगलगने
क्विसरोट जानका, कथन, स्केमेक्सका कुता, अनुचितकी लज्जा, बेंडका लानेवाला
अपने परोंके कतरे जानेके कारण उसकी बुलाहट स्वीकार नहीं की । कुछ, दिनोंके पीछे वह जड़ली लगलग कालेजके आँगनमें आगया, घरेलूको देखनेके लिये अपने पर खड़खड़ाये । घरेला लगलग उसकी अगवानीके लिये चला पर जंगली लगलग अत्यन्त रुष्ट होकर घरेलूके ऊपर दौड़ा । घरके लोगोंने बचाया । पर वह जड़ली सारी गरमीकी ऋतुभर उस घरेलूको कष्ट पहुँचाता तथा आक्रमण करता रहा दूसरे गरमीके मौसममें चार लगलग उसी कालेजके आँगनमें आये, चारोंने एक बारगी ही घरेलू लगलग पर आक्रमण किया । घरेला लगलग इस योग्य नहीं था कि, अकेला अपने वैरियोंका सामना करे, उस घरके रहनेवाले समस्त मुर्गे मुर्गियों और बत्तख इत्यादि घरेलू लगलगकी सहायता करने आये, उसको उसके वैरियोंके हाथसे बचा लिया । सब लोग उस घरेलू लगलगको विशेष सतर्कतासे रखने लगे कि, इस वर्ष वह फिर किसी प्रकारका कष्ट न पावे । पर तीसरे वसन्त ऋतुके आरम्भमें बीससे अधिक लगलग आये, कालेजके आँगनमें पहुँचके किसी मनुष्य अथवा पक्षीकी सहायता पहुँचनेके पूर्व ही उसको मारकर चले गये ।
देखो निबलको सब मारते हैं बलिष्ठको कोई नहीं मारता । लड़केने बन्दूक मारी थी उससे तो बदला ले नहीं सके पर घरेलू लगलगको व्यर्थ ही मार गये ।
घरेलू और बनैलेकी ईर्षा—हम्बर्ग नगरके निकट एक किसान रहता था । उसके पास एक घरेला लगलग था । एक दिन वह जड़लसे एक लगलग लाया अपने घरमें रक्खा । तब वह घरेला उस जड़लीसे बहुत विरोध करने लगा । घरेलूने बनैलेसे ऐसी ईर्षा की कि, उसको मार भगाया । चार मासके पीछे बनैला लगलग चार लगलगों सहित आया घरेलू लगलगको मारकर चला गया ।
लगलगोंका न्याय—फ्रांस देशका एक जर्जाह था । उसने चाहा कि, कहींसे एक लगलग मिल जावे तो अच्छा है । तुर्क लोगोंके लगलगकी प्रतिष्ठा करनेके कारण यह बात असंभव प्रतीत हुई । उसने एक लगलगके घोंसलेके सारे अण्डोंको चुरा लिया । उसके बदले मुर्गेके अण्डे रख दिये । अण्डे फूटे उनसे बच्चे निकले । लगलग स्त्री पुरुष दोनोंको बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि, बच्चे मुर्गेके थे । कुछ दिवसोंके पीछे नर लगलग चला गया, तीन दिनोंके पीछे लगलगोंकी बूहत मण्डली लेकर आया उसके सारे साथी लगलग घेरा बांधकर बैठ गये । वहाँ लगलगोंका बड़ा झुण्ड बैठा, सहस्रों मनुष्य यह कौतुक देखनेको एकत्रित हुये । लगलगी उस सभाके बीचमें बुलाई गई उसकी जाँच होनेके पीछे सब लगलग उस मादापर टूट पड़े, उसको मारकर चले गये ।
डूबनेसे बचानेवाला
लगलगके राजाका न्याय—ऐसीही एक और कहानी है, बर्लीन नगरके निकट एक मनुष्यके धुवोंकशर्म एक लगलगने अपना खोता लगाया। वहाँ पर एक मनुष्य चढ़ गया उस घोंसलेमें एक अण्डा पाकर उठा लाया, उसकी जगह एक राजहंसका अण्डा रख आया। वह लगलग उस दगाबाजीसे अनभिज्ञ था। वह अण्डा जब पका उसमें से बच्चा निकला। नर लगलगने बच्चेके रङ्ग ढङ्गमें विभिन्नता देखी, अपने घोंसलेके चारों ओर चिल्लाता फिरा, अपने खोतेके चारों ओर कई बेर फिरकर अन्तर्धान हो गया, मादा लगलग तीन दिनोंतक उस अजनबी सन्तानकी रक्षा करती रही। चौथे दिन लोगोंने बहुत चिल्लाहट सुनी, देखा कि, उस मकानके समीप खेतमें पाँच सौ लगलग एकत्रित हैं। उनमेंसे एक बीस गजके अन्तर पर खड़ा ऐसा जान पड़ता था, मानो वह अन्यान्य लगलगोंसे बातें कर रहा है। सारे लगलग उसकी बातको ध्यान पूर्वक सुन रहे थे। जब वह बात सुनाकर अलग हुआ फिर दूसरा निकला उसी प्रकार वह भी बातेंकरने लगा—सब उसकी बातोंको सुनते रहे। फिर उसके हटनेपर तीसरा आया, उसी प्रकार अपनी बात कह अलग होकर खड़ा हुआ, इसी प्रकार और कई आते रहे और अपनी २ बात कहकर हट जाया करते थे। इसी प्रकार ग्यारह बजेतक मुकद्दमा होता रहा, बराबर रूपकारी जाँच होती रही। वह मादा लगलग अपने घोंसलेमें बैठी सारी बातें सुन रही थी। इसके पीछे समस्त लगलग भयानक शब्द करते हुए उठे समस्त लगलगोंका अगुवा और मुद्दी लगलग जो जाना जाता था उसने बड़े जोरसे तीन चार बार उस मादा लगलगको मारके घोंसलेके नीचे गिरा दिया। इसके पीछे सारे लगलग उस मादापर टूटे उसको उसकी अजनबी सन्तान सहित मारके नष्ट कर दिया। उस मादा लगलगने न कुछ कहा न अपवाद किया न वह वहाँसे भागी। समस्त लगलगोंने उस जगह घोंसलेका नाम निशान न रहने दिया पीछे सब वहाँसे चले गये। इसके पीछे कोई भी लगलग वहाँ दिखाई न दिया।
अनुमान—अलीमानके लोग ऐसा अनुमान करते हैं कि, लगलग बुरे मनुष्योंके घरके समीप अपना घोंसला नहीं बनाता। यदि किसी घरवालेके निकट घोंसला बनावे वह गृहस्वामी उसको मार डाले तो लोग उसको म्याजिस्ट्रेटके सामने लेजाकर उसके खूनका दावा करते हैं। एक बड़ा अस्पताल सारस तथा लगलगोंके लिये बना हुआ है। इस औषधालयमें रोगी सारस तथा लगलगको रखते हैं, जब वे मर जाते हैं तो उनको गाड़ देते हैं। लोग ऐसा अनुमान करते हैं कि, वे सब मनुष्य हैं। दूरके टापुओंमें रहते हैं। बरबर देश देखनेको
रोटी खरीदनेवाला
लगलगका स्वरूप धारण करके आते हैं वे अपने देशको पलट जाते हैं फिर व मनुष्यके स्वरूपमें हो जाते हैं मिश्री मनुष्य उनको पवित्र पक्षी मानते हैं ।
राजहंस ।
पूर्वोक्त पुस्तकमें राजहंसका हाल लिखा है कि, यह पक्षी अत्यन्त सुन्दर होता है, एक श्वेत तथा दूसरी काली ये उनमें दो जातियाँ हैं । राजहंस ऐसे शीघ्रगामी होते हैं, एक घण्टेमें एकसौ मीलतक उड़ जाते हैं । उथले जलमें तैरते फिरते हैं अथवा बहुतसे इकट्ठे उड़ते फिरते हैं, उनके पङ्खोंकी लेखनी बनाई जाती है । जहाँ वे चरते हैं वहाँ एक चौकीदार खड़ा रहता है जो बड़ी चौकशीसे इधर उधर देखता रहता है । जब कहीं कुछ आपत्ति दीखती है तो तुरंतही अङ्गरेजी बिगुलकी तरह शब्द करता है उसी समय सब सचेत हो बरीसे बच जाते हैं ।
राजहंसिनीकी सावधानी—प्टारफोर्ड नगरकी बात है कि, एक राजहंसिनी अठारह वर्षसे रहती थी, उसने अनेक अण्डे बच्चे दिये थे । उसके पड़ोसी लोग उसे अच्छा मानते थे । वह एक बार अपने चार पाँच अण्डोंपर बँठी थी । बहुत घास फूस जमा करनेमें लगीसी जान पड़ती थी । अपने घोंसलेको ढाई फीट ऊँचा कर लिया उसमें अपने अण्डोंको सुरक्षित रूपसे रक्खा । उसी रात ऐसी वर्षा हुई और इतना जल बढ़ा कि, सब कुछ डूब गया । इस विषयसे समस्त मनुष्य अनभिज्ञ थे, वर्षाका चिह्नभी कहीं नहीं था कि, वे लोग उससे बचनेका प्रबन्ध करते । एक बारही महावेगसे वर्षा हुई, सब कुछ डूब गया । पक्षीने पूर्व-सेही सब प्रबन्ध कर रक्खा था । उसके अण्डे जलसे ऊपर रहकर बच गये । देखो इस पक्षीका भी भविष्यदज्ञान और सावधानी मनुष्यसे कितनी बढ़कर है ।
मयूर ।
एक स्थानपर जहाँ मैं रहता था वो बस्तीसे दूर एक उजाड़ था । मेरी झोपड़ीके ईर्दगिर्द लोग जानवरोंके लिये दाने बिखेर जाते थे वहाँपर छोटे छोटे पशु पक्षी आह्लाद पूर्वक चरा करते थे । एक दिन एक मयूर अपने आनन्दमें मग्न हो डुम पसारने नाच रहा था । उस समय एक मनुष्य छिपकर धीरे धीरे आया । मोरको पकड़ लिया । आगे कहनेसे फिर उसको छोड़ दिया । छोड़ते ही वह उड़कर दूर भागा । उसने अपने सजातियोंको यह समाचार पहुँचाया, उस दिनसे कोई भी मोर वहाँ नहीं आया । बहुतेरे मोर प्रत्येक दिन दाना चुनने आते इस दिनसे समस्त मोरोंने एक एक करके वहाँका आना छोड़ दिया । इस मोरने अपने सजातियोंको सूचित किया कि, उधर न जाओ प्राणाघातका जाल बिछा हुआ है ।
बुद्धिमान् दण्डी गड़रियेका कुता
पेरू ।
सौतेली मांसे कष्ट—एक मादह पेरू जिसको कि, अङ्ग्रेजी भाषामें टर्को कहते हैं मारी गई । उसके बच्चे पल गये थे पर उड़ने योग्य नहीं हुए थे । कुछ दिनों तक उनका पिता उनको पालता रहा । जो कोई मनुष्य उसके घोंसलेके निकट आता तो वह चिल्लाता हुआ शब्द करता था । अन्तमें वह वहाँसे चला गया, दो तीन दिनतक अन्तर्धान रहा । फिर वह दूसरी मादा लेकर आया । इस अवसरमें वे बिचारे बच्चे भूखसे अधमुवे हो गये थे । उनकी सौतेली माँ आई तो उन बच्चोंको अत्यन्त आहत करके वृक्षके नीचे डाल दिया, उनमें दो बच्चे वृक्षकी जड़से लगे पड़े थे । उनमें थोड़ी जान थी । उनको लोगोंने ले जाकर एक स्थानमें पाला । उनके पर और बाल आये उनको स्वतंत्र कर दिया । वे कदापि दूर न जाते वहाँही रहा करते थे । पर दुष्ट सौतेली माता तथा पिताने उन्हें शीघ्रही पहचान लिया । वे उनपर आक्रमण किया करते थे । सौतेली माताके मेलसे उनका पिता भी वंरी हो गया था । वे दोनों तीन दिनतक उनपर बराबर आक्रमण करते रहे । बड़े सबेरे आकर बहुत बल तथा कड़ाईसे उनपर टूटते थे ।
गिनी फाउल ।
अङ्ग्रेजीमें गिनी फाउल नामका एक बड़ी जातिका मुर्ग है । उसकी एक मादा थी उसका नर मर गया । क्योंकि, उसको किसीने मार दिया था । कारण यह कि, वह छोटे-छोटे पक्षियोंकी बहुत हानि किया करता था । एक एक मादा बतख थी उसके कितनेही बच्चे थे । उस बतखको बाजने मार डाला उसके बच्चे अनाथ हो गये । उन अनाथ बच्चोंपर मादा गिनीफाउलने दया करके उनको पालना आरम्भ किया । यहाँतक कि, उनके मृत माता पितामे भी अधिक सावधान रहा करती थी । अत्यन्त आश्चर्यका विषय तो यह है कि, मादा गिनी फाउलने अपने स्वभावको छोड़कर बतखका स्वभाव धारण कर लिया था । बतखके छोटे छोटे बच्चे उसके पीछे पीछे फिरा करते । वह उन्हें एक क्षणके लिये भी पृथक् न किया करती । वे बच्चे अपने घोंसलेमें विश्राम करते तो वह पृथक् होती जब कभी कुत्ते समीप आते अथवा बालक उनको कष्ट देते तो समस्त बतखें चिल्लाने लगतीं, उस समय उनकी धर्ममाता जहाँ कहीं दूर होती वहाँसे दौड़कर शीघ्रही उनके निकट आ पहुँचती । इसी प्रकार उन बच्चोंकी अत्यन्त रक्षा तथा रखवाली किया करती । यद्यपि वह जड़ली चिड़िया थी तो भी यदि कोई लड़का उन बच्चोंके समीप जावे तो उसके पांवपर चोंच मारती थी, जिससे लड़कोंको बहुत भय रहता था । वह अपने धर्मके बच्चोंकी बहुत