कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
परधर्म और विद्यामें श्रद्धा रखनेसे हानि।
फारसीके पढ़नेमें यह भी रीति है कि, प्रथम बिसमिल्लाह पढ़ाते हैं पर अंगरेजी पढ़नेमें तो बसभिल्लाही नदारद है।
<!-- image: A decorative flourish or calligraphic mark. -->जिस विद्या अथवा व्यवहारमें प्रथम ईश्वरका नाम न लिया जावे उस विद्या और व्यवहारसे अंतःकरणमें अन्धकार फैलता है। आजकल अंग्रेजी राज्यमें कोई भी ऐसा नहीं वर्तमानके विद्या जाननेवालोंमें जो ईश्वरका नाम लेकर कोई पुस्तक अथवा काम आरम्भ करता हो। आजकल किसी पुस्तकके माथा (होर्डिंग) पर कभी भी ईश्वरका नाम नहीं लिखा जाता यही कारण है कि, ईश्वर नाम विहीन पुस्तकोंसे किसीको ज्ञान नहीं प्राप्त होता। म्लेच्छ विद्या पढ़नेसे सबकी बुद्धि भ्रष्ट होगई। प्रथमसेही आजकलकी अवस्थाको जानकर सन्तोंने पहिलेहीसे भविष्यत् कथन कर दिया है कि, कलियुगमें लोगोंकी सत्य बुद्धि नष्ट हो जावेगी।
नानक शाह वचन।
“क्षत्रियोंने धरम छोडे म्लेच्छ भाषा गही सृष्टि सब एक बरन हुई।”
उचित कर्तव्य।
इस लिये उचित है कि, प्रथम धर्मकी शिक्षा देकर तब दूसरा कुछ सिखावें, प्रथम परमेश्वरका नाम लें पीछे, किसी कामको आरम्भ करें।
कितने लोग ऐसे कहा करते हैं कि, जिन सन्तोंका वर्णन शास्त्रों और ग्रन्थोंमें लिखा है, वैसे संत अब कहाँ हैं? पर यह नहीं समझते कि, संत और ईश्वरका कभी अभाव नहीं होता। जब कोई विशेष कारण उपस्थित होता है तो सन्त प्रगट होते हैं अपना काम करके गुप्त हो जाते हैं।
कथा—एक राजा बड़ा अभिमानी था, अपनेसे सबको तुच्छ समझता था। एक दिन आखेटको चला। अच्छे २ घोड़े और उत्तम २ वस्त्र मँगवाकर पहने कुछ सेना साथ लेकर रवाना हुआ। चलते २ एक मंदानमें पहुँचा। वहाँ मंले कपडे पहने हुये एक दरिद्री मनुष्य मिला प्रणाम करके दुःखीरूप मनुष्यने कहा कि, यदि आज्ञा दो तो कुछ विनय किया चाहता हूँ राजाने आज्ञा दी। उसने कहा कि, मैं केवल तुम्हारेही कानमें कहूँगा। राजाने इस बातको भी स्वीकार किया। जब उपरोक्त मनुष्यने राजाके कानमें आकर कहा कि, मैं यमदूत हूँ तुम्हारा प्राण निकालने आया हूँ। इतना सुनते ही तो राजाका चेहरा पीला पड़ गया। यमदूतसे कहा कि, मुझे अपने परिवारोंसे तो मिललने दो।
(उस यमदूत) ने कहा कि, अब यह बात नहीं हो सकती । राजाने कहा कि, घोड़ेसे उतरने दो । उसने यह भी स्वीकार नहीं किया राजा घोड़े परही मर गया । सब अहंकार धूलमें मिल गया । यह संसारी वैभव मनुष्यको अन्धा बना देता है ।
यही दशा शद्वाह बादशाह की हुई थी । उसने बारह वर्षमें स्वर्ग बनवाया पर जब उसे देखने चला तबही यमदूत मिला उसके साथियोंके साथ उसे पाताल भेज दिया ।
जो लोग नमरुद और फिरऊनके समान ईश्वर विमुख हैं उनको कभी चेत नहीं होता । लाखों प्रकारकी युक्ति की जावें । नानाप्रकारकी सिद्धियाँ और भय उपजानेवाली लीला दिखाई जावें पर वे नहीं समझते, जहाँ सांसारिक वैभव होता है उसकी अधिकता पाकर मनुष्य अवश्य ही अन्धा हो जाता है ।
कँसा धर्म स्वीकार करना चाहिये ।
जो कोई किसी (मजहब) को स्वीकार करना चाहे उसे उचित है कि, प्रथम छः बातोंको विचार करले, भली प्रकार परीक्षा कर पीछे स्वीकार करे । वे छः बातें ये हैं ।
१ गुरु, २ आचार्य, ३ शास्त्र, ४ देव, ५ नाम और ६ धाम ?
जैसे १ गुरु पारख, २ आचार्य कबीर साहब, ३ शास्त्र स्वसंवेद, ४ देव सत्त पुरुष, ५ नाम शब्दसार अथवा मुक्तिकाद्वार शब्दसार, ६ धाम सत्यलोक । जो कोई उपरोक्त विषयोंके बिना विचारे किसी धर्मको स्वीकार करेगा वह अवश्य बन्धनमें पड़ेगा ।
यह सारा संसार माया है, स्वामी सेवक सब माया है । अकली और नकली सब माया है जो कुछ कहा और सुना जाता है । सब माया है, मायाकी ही आटेमें ब्रह्म है । जैसे माताकी ओटमें पिता छिपा है, माताको सब देखते हैं पर पिताको कोई नहीं देखता, माताने आपको प्रगट किया, पिताको गुप्त रक्खा । यह देह छःधातुओं से बनता है जिसमेंसे तीन धातु चर्म, मांस, लोह, माताका अंश हैं शेष तीन अस्थि (हाड) गूद (मज्जा) विन्द (वीर्य) पिताका अंश है । जो कोई पिता से मिलना चाहता है उसको चाहिये कि, अन्तःकरणसे माताका स्नेह निकाले । तात्पर्य यह कि, जब-चर्म, मांस, रक्त परसे दृष्टि उठावेगा तब हाड और गूद विन्दको देखेगा । दोनोंसे जो कोई भिन्न हो सो अद्वैत अनुपमका दर्शन पावे । सब मनुष्य माया और ब्रह्मके ध्यानमें लगे हैं, इसी प्रकार मायाके बन्धनसे बाहर नहीं जा सकते । वेद, किताब, शरअ, शास्त्र सब मायामें ही है, इनके पार होना कठिन है ।
पांच तत्व और तीनों गुणोंसे यह शरीर बना है। चौदह इन्द्रियां भी पांच तीनकेही विचार हैं। जितने कहनेवाले हैं, सब इन्होंके भोतर बात कर सकते हैं। जब पूछा जाता है कि, जिसके आश्रय ये सब खड़े हैं, जो सबकी आधार है उसका क्या रूप है? क्यों जितने नाम रूप हैं वो सब माया है। तीनलोक भव-सागर माया सृष्टि है। जो मायासे पार होना चाहता हो संसार अर्थात् मायाके किसी पदार्थमें भी आसक्त हो तो उसे सत्यकी कुछ भी सुधि नहीं, ऐसा जानना चाहिये केवल गुरुही उस अद्वैतकी सुधि बता सकता है दूसरा कोई नहीं बता सकता।
संसारके सभी लोग उन्मत्तोंके समान कर्म करते हैं स्वप्न और जाग्रतमें विशेष भेद नहीं। संसारमें फँसा हुआ मनुष्य अचेत होता है उसके जितने कम होते हैं सभी अचेतताके होते हैं। यदि इनकी बुद्धि ठीक होती तो उन्मत्तोंकेसे कर्म क्यों करे? जहाँ बुद्धिको भ्रमही नहीं हो सकता उसको अनुमानकर निश्चय करना मूर्खता नहीं तो दूसरा क्या है? सब ऋषि, मुनि, महात्मा, तत्वज्ञ, विद्वान, ज्ञानी आदि सर्वदासे कहते आये हैं कि ईश्वरीय भेदमें बुद्धि कुछ काम नहीं कर सकती। जो बुद्धि और इन्द्रियोंकी पहुँच वहाँतक बतलावे वह विक्षिप्त है। समस्त इन्द्रियोंमें बुद्धि सबसे श्रेष्ठ है। यदि बुद्धिही वहाँ नहीं पहुँच सकती तो दूसरीइन्द्रियों कैसे पहुँच सकती हैं? जब बुद्धि सत्यतक नहीं पहुँच सकती फिर उसका निश्चय असत्यही हुआ। जिसने असत्यको स्वीकार कर सत्पुरुषकी भक्तिको छोड़ दिया वह मनुष्य नहीं, यही क्या मनुष्यत्वका उसमें लेश भी नहीं है।
साखी—कबीर तिनका जन्म अकार जो, विन भक्ति मरि जाँय।
मुरगीकेसे वचा ज्यों, फिरसी जगके माहिं ॥
जितने लोग और किताबोंके ऊपर भरोसा रखते हैं, उनको प्रकाशका मार्ग मिलना कठिन है। क्योंकि, किताबादि उन्हीं लोगोके लिये हैं जिनको ज्ञानका का कुछ भी प्रकाश नहीं।
बीजककी रमैनी।
बंधको दर्पण वेद पुराना। दर्वी कहाँ महारस जाना ॥
जस खर चन्दन लादे भारा। परिमल वास न जान गँवारा ॥
कहै कबीर खोजा असमाना। सो न मिला जेहि जाय अभिमाना॥
वेदके टीकाकारोंमें किता झगडा पडा है। कोई कुछ कोई कुछ कहता है। किसीको यथार्थकी सुधि नहीं है जिससे शुद्ध और सत्य टीका करे। इसी कारण कबीरसाहब कहते हैं—
अंधको दर्पण वेद पुराणा
संसारको लोग जो वेद पुराण पढ़ते हैं उनका पढ़ना अन्धोंकी आरसीके समान है । जैसे अन्धोंको आरसी दिखलानेसे कोई लाभ नहीं होता, वह अपना न तो मुँह देख सकता है, न उससे कुछ आनन्द प्राप्तकर सकता है । यदि अंधा दर्पण हाथमें लेकर उसका अभिमान करे कि, मेरे पास दर्पण है, तो उसका ऐसा अभिमान देखकर आँखवाले लोग हँसते हुए मूर्ख जानते हैं । ऐसेही अशुद्ध अन्तः-करणवाले अज्ञानी पुरुषोंका वेद पढ़ना है । ऐसे लोग वेदपाठसे कुछ भी लाभ नहीं उठा सकते, मिथ्या अभिमान करते हैं । जैसे अन्धा हाथोंसे टटोलकर पदार्थको छू सकता है पर उसके स्वरूपके आनन्दको नहीं प्राप्त कर सकता । उसी प्रकार अशुद्धान्तःकरणवाला यदि वेदको पाठकर जावे तो भी उससे कुछ पा नहीं लेता न वेदके यथार्थ आशय और गुणको ही जान सकता है ।
दर्बी कहाँ महारस जाना ।
इसी प्रकार दर्बी अर्थात् कड़छी जो कि दाल, चावल, हलुआ, शाक आदि सर्व व्यञ्जनमें फिरती पर उसको उनके स्वादका कुछ भी ज्ञान नहीं
जस खर-गंवारा ।
ऐसेही यदि गदहेके ऊपर चन्दनका भार लाद दिया जावे तो उस चन्दनकी सुगन्धि और गुणसे उसको कुछ लाभ नहीं होता ऐसाही अशुद्धान्तःकरण, मनुष्यत्व, गुणशून्य, पुरुष कड़छीके समान सब वेदोंका दिन रात अभ्यास करता रहे अथवा गदहेके समान वेद पाठके अभिमानका बोझ उठाये फिरे तो उसको कुछ लाभ नहीं हो सकता
कहै कबीरअभिमाना
कबी साहब कहते हैं कि, आकाशको खोजता फिरता है पर वह मिलता जिसका कि अभिमान नष्ट हुआ हो ।
परमात्मा जिसको स्वयम् मार्ग दिखावे वही उससे मिले उसको पहचाने जिससे अभिमान दूर हो । यह गुण तो केवल सत्यगुरुमेंही है, जिसके कि मिलनेसे शाह सिकन्दर लोदी जैसे अभिमानी धर्म द्वेषीका सब अहंकार नष्ट हो गया, सत्यगुरुके चरणोंका रज बन गया । कबीर प्रसङ्गमें गरीब दासजीकी वाणी देखो—
“चरण धोइ पिये सिकन्दर सिताब । तुम्ही अशंमका तुही है किताब ॥”
ब्राह्मणका कत्तल — सिकन्दर लोदी इतना बड़ा धर्मद्वेषी धर्माभिमानी पुरुष था कि, एलफिन्स्टन नामक इतिहास लेखक अङ्गरेज अपने इन्डियन् हिस्ट्रीमें एक हाल इस प्रकार लिखता कि एक समय मुसलमान लोग किसी स्थानपर
मुहम्मदी धर्मकी प्रशंसा कर रहे थे, उस समय एक ब्राह्मण कह उठा कि, हिन्दू धर्म (आर्य धर्म) इस्लाम धर्मसे कम नहीं बरन् तुल्य है। उसकी इतनीही बातपर काजी और मुल्ताओंने शाह सिकन्दरके निकट जाकर नालिश की। सिकन्दरने तत्कालही ब्राह्मणके बधकी आज्ञा दी। जिस समय ब्राह्मणका बध होने लगा दयालू मुसलमान फकीरने कहा कि, निरपराध प्रजापर अत्याचार न करना चाहिये। इस बातपर फकीरके ऊपर बादशाह बहुत क्रोधित हुआ, ब्राह्मणको कतल करवा दिया। फकीरसे कहा कि, बुतपरस्तकी सिफारिश मत किया कर।
गुरुपदके योग्य — धन्य है उस सच्चे सद्गुरु जिसके मिलनेसे ऐसा धर्म-द्वेषी मनुष्य नम्र हो गया, उसकी कठोरता नष्ट होगई। सब श्रेष्ठता और प्रशंसा उसी सद्गुरुसे है मनुष्यके अभिमानको नष्ट करके अधीनता और नम्रता प्राप्त करानेवाला दूसरा कोई नहीं। उसीकी शिक्षासे सब गुरुपदके योग्य होते हैं।
ईश्वरार्पण दान — संसारी पुरुषोंको उचित है कि, अपनी कमाईमेंसे कुछ अंश दानपुण्यमें खर्च करे तथा संत और गुरुकी सेवामें अर्पण करे जो ऐसा नहीं करता है वह कारूनके समान नर्कका भागी होता है।
जिस प्रकार प्रजा राज्यका कर न चुकावे तो वह अवश्य राजाके कोधानल का ईंधन बनेगी कारागारका कण्ट सहेगी इसी प्रकार जो ईश्वरार्पण दान पुण्य नहीं करता वह अवश्य ईश्वरका अपराधी हो नर्कका भागी बनता है। जिस प्रकार राज्यके सिपाही कर वसूल करनेके लिये प्रजाके पास जाते हैं उसी प्रकार साधु, संत, दुःखी, लाचार; ईश्वरके सेवक मनुष्योंसे ईश्वरी कर लेने आते हैं। राज्यके सेवकोंको प्रजाप्रतिष्ठाके साथ अधीनतासे कर दे देती है तो सुखपूर्वक अपना व्यवहार चला सकती है नहीं तो अड़चन होगी। उसी प्रकार ईश्वरी सेवक संत और साधु जब गृहस्थोंके निकट जावें तो उन्हें उचित है कि, उनको सत्कार पूर्वक अपनी शक्ति अनुसार जो कुछ ईश्वरार्पण देना हो सो दे, यदि ऐसा न करेगा तो ईश्वरी कोपका अधिकारी होगा।
१ कारूनका हाल—मुसलमानी किताबोंमें लिखा है कि, उसके पास इतना धन था कि चालीस गज लम्बी, चालीस गज चौड़ी एवं इतनीही ऊँची, चालीस कोठनिर्या उसके खजानेकी कुञ्जियोंसे भरी हुई थीं, पर वह ऐसा कृपण था कि, कभी भी एक पैसा किसीको नहीं देता था। मूस़ा पैगम्बरने उसे बहुत उपदेश किया पर उसने कुछ भी न सुना। अन्तमें वह अपने द्रव्योंको शिरपर लिये हुये पातालमें धँसने लगा। ऐसा कहते हैं कि, वह वैसाही अव तक पृथ्वीमें धसता चला जाता है। क्यामतके रोज पातालमें गिरेगा उसके द्रव्योंके शब्दसे संसारभरमें लोग चकित होंगे। चाहे जैसी असम्भव और दंतकथा हो पर उसका सार यही है कि, कृपण पुरुषको आदि अन्त और मध्यमें सर्वदा दुःखही रहता है उसका जीवन कभी सुखसे नहीं बीतता, चिंता भय और शोक तो उसके सदाकेही साथी हैं।
कबीर साहब कहते हैं कि, संसार ठगोंको अपना ईश्वर जानकर पूजता है । उसके परिणाममें जन्म जन्म दुःख पाते हैं, जिस प्रकार बकरा कसाईसे प्रीति कर उसके निकट जाता है, उसका शिर काटा जाता है । यदि उसे इस बातका ज्ञान होता कि, यह तो मेरा अधिक है तो क्यों पास जाता ? उससे क्यों प्रीति करता, बरन् उससे वो पृथक् होकर भाग जाता गला कटानेसे बड़िचत रहता ।
कबीर साहब और हंस कबीर चारों युगोंसे समझाते चले आते हैं । पर प्राकृतिक संसारी जीव ऐसे अज्ञानान्ध हो रहे हैं कि, उसपर ध्यान नहीं देते । बारम्बार उसीसे प्रीति करते हैं जो कि, अपने जालमें फँसाकर मार लेता है । मनुष्य और पशुका विवेक ।
मनुष्यको विचार करना चाहिये कि, मनुष्य और पशुमें किस बातका भेद है । शारीरिक व्यवहारमें सब समान हैं । लौकिक पारलौकिक सब सामग्री दोनों की एकसी प्राप्त हैं । यदि भेद है तो इतनाही कि, मनुष्यको वह ज्ञान प्राप्त हो सकता है, जिससे मुक्ति हो सकती है, क्योंकि मुक्तिका कारण ज्ञान मनुष्य शरीर में ही प्राप्त हो सकता है, प्रकृतिने केवल मनुष्य शरीरकोही वो श्रेष्ठता दी है जिससे कि, सारशब्दको प्राप्तकर सत्यपदको प्राप्त हो ।
सांसारिक धन वैभवके लिये लड़ना, झगड़ना, मरना, मारना, जीत हार पाना सब पशु धर्म हैं । विषय वासनाकी अपेक्षा करके एक चक्रवर्ती राजा व महान् दुःखी दरिद्री पुरुष दोनों तुल्य हैं । एक राजा अथवा जाति दूसरेसे लड़ते, भला बुरा कहते और द्वेष करते हैं वो सब पशु बुद्धिसेही करते हैं, क्योंकि, ये गुण पशुओं में देखे जाते हैं ।
जंगली घोड़ोंका झुण्ड और उनके चरनेके खेत अलग अलग होते हैं यदि एक झुण्डका कोई घोड़ा दूसरे झुण्डमें आजाय तो परस्पर घोर युद्ध करते हैं । इसी प्रकार बन्दरोंमें भी है कि, जब एक झुण्डके बन्दरको अथवा उनके किसी पदार्थको दूसरे झुण्डके बन्दर कुछ दुःख देते अथवा कुछ लेलेते हैं तो दोनों मण्डलियोंमें तुमूल युद्ध होता है ।
बटेरोंके पकड़नेवाले अपने पालक बटेरको लेजाकर ऐसे खेतोंमें बाँध देता है जहाँ बहुतसे बटेर हों, उसके चारों ओर दूरतक जाल फैला देता है । जब वह पालक बटेर शब्द करता है तो उसके शब्दको सुनकर उस खेतके रहनेवाले जंगली बटेर दौड़कर उसे मारने आते हैं क्योंकि, उनको इस बातपर क्रोध आता है कि, हमारी जागीरमें यह दूसरा बटेर क्यों आया । उसके निकट जाते २ सबके सब जालमें फँस जाते हैं । इसी प्रकार जो मनुष्य परस्पर राग द्वेष करके
नाशमान पदार्थों के लिये लड़ा करते हैं वे पशु पक्षीसे न्यून नहीं, उनमें मनुष्यता की गंध भी नहीं होती ।
मनुष्य वही है जो पशुधर्मसे रहित शुद्ध मनुष्यधर्मको धारण करने वाला हो । जिस प्रकार चिड़ीमार पक्षियोंको पकड़ २ कर मारता खाता है, उसी प्रकार काल पुरुष सर्व जीवोंको विषयवासनामें फँसाकर मार डालता है ।
मनुष्यको परमत्माने सब जीवधारियोंमें श्रेष्ठ इस कारण बनाया है कि, ये सब जीवधारियोंकी यथार्थ अवस्थाको जानकर यथाशक्ति उनकी रक्षा करे उनसे उनकी शक्ति अनुसार काम ले । इस कारण श्रेष्ठ नहीं बनाया कि, उनको मार मार कर खावे । पिछले अध्यायोंमें भली प्रकार युक्ति और प्रमाणोंद्वारा सिद्ध कर आया हूँ कि, एकही आत्मा सब जीवधारियोंमें व्यापक है, केवल उनको कर्मोंने उनको भिन्न २ रूपोंमें प्रकट किया है । मनुष्यका मुख्य भोजन अंकुरज पदार्थ है बरन् उसमें भी विचार करके अपने लाभदायक पदार्थोंकोही ग्रहण करनेकी आज्ञा है ।
कुरान्में तो ईमान (धर्म) का सार दया बतलाया फिर अन्याय और अत्याचार बतलाना पिशाचोंकी धोखेबाज़ी है ।
यजुर्वेदमें विराट् पुरुषकी व्याख्यामें स्पष्ट लिखा है कि, सब जीवधारी विराट् पुरुषके अस्थि, मांस और चर्म हैं, अंकुरज केश और नख हैं । देखो केश और नखके काटनेसे किसी प्रकारका कष्ट नहीं होता बरन् मांस और हड्डीको काटो तो कष्ट होता है । जो मांस चर्म और अस्थि निकालेगा वह विराट् पुरुषका शत्रु है । सारे मांसाहारी और हिंसक ईश्वरके शत्रु और सदाचारविनाशक हैं वे अवश्य नरकको जायेंगे ।
धर्मोंके इष्टदेव—संसारमें जितने धर्म प्रचलित हैं सबके नियामक ब्रह्मा विष्णु और महेश येही तीन देव हैं । कोई किसी धर्मको क्यों न ग्रहण करे इन तीन देवोंके शासनसे बहिर्गत नहीं होसकता । ईसाईयोंने बड़े परिश्रम और व्ययसे इन तीनों देवोंके औगुणोंको लिखा है उनकी निन्दा करके हिन्दुओंके खिझानेकी किसी युक्तिको भी शेष नहीं रखा है पर उनको यह नहीं मालूम कि उनने कभी इस बातका विचार नहीं किया है कि, आदमका खुदा इन तीनों देवोंसे श्रेष्ठ नहीं था । इबराहीमको जो तीन फिरिश्तः मिले थे वे कौन ? कैसे थे ? वे तीन फिरिश्ते जिन्होंने मुहम्मद साहबका पेट चाक करके शैतानी रक्त निकाला था वे कौन थे ? यदि वे विचार करें तो जान पड़ेगा कि, ब्रह्मादि तीन देवताओंसे भी छोटे थे जितने धर्मवाले हैं सब परस्पर राग द्वेष करके एक दूसरेके इष्टोंकी निन्दा
करते हुये अज्ञानता वश, अपनेही इष्टकी निन्दा करते हैं। इसी कारण उनके विश्वासमें न्यूनता होती है।
मूर्खोंकी मूर्खता — ये तीनों देव परस्पर ऐसे मिले हुये हैं कि, पर मनुष्य धोखेमें पड़कर अज्ञानतामें पड़ा हुआ अत्याचारोंमें फँसा हुआ भी अपने २ धर्मको सर्व श्रेष्ठ समझता है। वैष्णव शिवकी और शैव विष्णुकी सदा निन्दा किया करते हैं। ग्रन्थोंमें भी यही विरोध लिख रखा है जिनको पढ़ २ कर मिथ्या पक्षपातमें पड़ा हुआ मूर्ख यथार्थसे वंचित हो सर्वनाश करता है। ब्रह्माकी पूजा तो कहीं होती ही नहीं बरन् शिव विष्णु आदिकोंके पूजकोंमें परस्परका इतना विरोध है कि, इसका अबतक ठीक २ स्पष्टीकरण हुआही नहीं कि, दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है।
भागवत—भवव्रतधरा ये च ये च तान्सममनुव्रताः ।
पाखण्डिनस्ते भवन्तु सच्छास्त्रपरिपंथिनः ॥
मुमुक्षुवो घोररूपान् हित्वा भूतपतीनथ ।
नारायणकलां शान्तां भजन्ति ह्यनसूयवः ॥
जो सच्चे शास्त्रोंके दुश्मन शिवजीकी तरह भस्म रमाते हैं वे पाखण्डी होते हैं ॥ मुमुक्षु जन घोररूप भूतपतिओंको छोड़कर निन्दा न करते हुए भगवान् नारायणकी शान्तकलाको भजते हैं। इसी प्रकार दक्षिण देशके रामानुजसम्प्रदायी वैष्णवलोग भूलसे भी शिवका दर्शन नहीं करते। ऐसाही पद्मपुराणमें शिवजीके विषयमें यह श्लोक है।
विष्णुदर्शनमात्रेण शिवद्रोहः प्रजायते ।
शिवद्रोही न संदेहो नरकं याति दारुणम् ॥
अर्थ—विष्णुके दर्शनमात्रसे शिवद्रोह उत्पन्न होता है और इसमें कुछ सन्देह नहीं कि, शिवका द्रोही अवश्य नरकमें पड़ता है।
इसी प्रकार मूर्खोंके बिना तात्पर्य समझे परस्पर विरोध मान रखा है। तीनों देव परस्पर मित्र रहते हैं पर मूर्खलोग परस्पर राग द्वेष करके लड़ते झगड़ते हैं।
तुलसीदासजी—तुलसीकृत रामायणमें लिखा है कि, रामचन्द्रने सेतुबांध-पर शिवका रामेश्वर नामक लिंग स्थापन कर पूजन किया और कहा—
चौ०— शिव द्रोही मम दास कहावे । सो नर मोहि सपनेहु नहि भावे ॥
दो०— शिव द्रोही दास मम, मम द्रोही शिवदास ।
सो नर करे कल्प भर, घोर नरकमें बास ॥
इसी प्रकार मूर्तिपूजाकी कहीं कहीं स्थापना है और कहीं कहीं तो बड़ी मोक्ष देनेवाली बतलाई है।
कालपुरुष सबकी बुद्धियोंपर अधिकृत हो उसपर इस प्रकार शासन करता है कि, सर्व धर्मवाले परस्पर विरोधमें पड़ राग द्वेषमें ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं किसी उपायसे भी सत्पुरुषकी भक्तिकी ओर नहीं लगते। जब कोई सत्य भक्तिकी ओर लगता है तब नानाप्रकारकी युक्ति उपायों द्वारा उसमें विघ्न डालता है। क्योंकि, काल पुरुष भयमें रहता है कि, कोई मेरे शासनसे बाहर न जावे। इसी धोखे और छलसे सब मनुष्योंको अपने पाशमें फँसा रक्खा है। पूर्वीय अज्ञान और विचार और पश्चिमीय चार किताब मनुष्यके फँसानेके हेतु महाजाल हैं। इन महाजालोंसे बाहर निकलना बहुत कठिन है। सबके सब इसीमें भटक भटककर मर जाते हैं।
भवतारणका उपाय — सब मनुष्योंको जानना चाहिये कि, जिसको वे निराकार निर्लिप्त परमात्मा कहते हैं वह केवल एक ठीकादार है बाकी सब परमेश्वर उसकी ओरसे कारबारी हैं। ठीकादार तो अपने ठीकेका दिन पूराकरके लुप्त-होजावेगा उसके कारबारी तो उससे भी प्रथम अपने कर्मानुसार प्रस्थान कर जावेंगे। सर्वश्रेष्ठ प्रभु, अजर, अमर, एक रस आदि गुणोंवाला परमात्मा इन सबोंसे भिन्न है, वो केवल सत्गुरुकी कृपा द्वाराही जाना जाता है। एक लाख अस्सी सहस्र पैगम्बर हो गये वो सब उसी ठीकेदारके पुत्र हैं, सबके सब उसी एककी साक्षी देते आये हैं। किसीने ठीकेदारकी सुधि बतलाई, किसीने दूसरे खुदाओं का पता बतलाया। इस प्रकार सब झूठे भ्रमकोही बतलाते आये, यदि उनको सच्चे परमात्माकी खबर होती तो ऐसी झूठी साक्षी न भरते।।
सत्य पुरुषके जितन पुत्र ह सबमें कालपुरुष महान् बलिष्ठ हैं। उसने अपने तप और भक्तिके बलसे तीनों लोकोंकी ठीकेदारी प्राप्त की है सत्तर असंख्य युगतक ठीकेदारी करके फिर चला जावेगा, दूसरे ईश्वरभी लय हो जावेंगे, शेष शुद्धपरमात्मा जिसकी सत्तामें सब हैं उसीकी भक्ति करनेसे मुक्ति प्राप्त होगी। सबका हर्ता कर्ता वही है। ब्रह्म, जीव, ईश्वर, माया उसीके शासनमें हैं। वह कहने, सुनने, बुद्धि, अनुमान सबसे परे हैं। सत्गुरुकी दया बिना उसका मिलना असम्भव है जो कहने सुनने, जानने, विचारने और निश्चय करनेमें आता है वो सब माया है मिथ्या भ्रम है। धन्य है वह पुरुष जो सच्चे परमात्माको दृढ़ता है, उसकी भक्ति का अनुरागी तथा प्रेमी होकर अपना सर्वस्व उसके ऊपर निछावर करता है। उसीकी कृपासे भवसागर तरा जा सकता है, दूसरा कोई भी उपाय नहीं है।
कालकी फांसीसे त्राण।
जो कोई कालकी फांसीसे बचा चाहता है वो साधुकी सेवा और संगति
करे अपनेको सत्गुरुकी कृपा योग्य बनावे । सेवा और भक्ति बिना सत्गुरुकी दया नहीं हो सकती । इस कारण सत्गुरुके दर्शनको, साधुके मिलनेको, सत्संगको जब जाना हो तब कुछ न कुछ भेंट ले जाना चाहिये द्रव्य नाज बस्त्र अथवा कोई दूसरा पदार्थ अवश्य कुछ न कुछ लेकरही साधुके दर्शनको जाना चाहिये । रीते हाथ जाना उचित नहीं । यदि दरिद्र है तो चार दातन अथवा फलही लेकर जावे । सन्त सेवाका सदा ध्यान रखे । संतोंमें किसी प्रकारकी भेददृष्टि न करे, तबही संत और गुरुकी दयाका पात्र हो सकता है । खाली जाकर हाथ केवल संतगुरुसे बकबक करके व्यर्थ समय नष्ट करता है सेवा नहीं करता वह नारकी है ।
इतिहासोंसे प्रमाणित होता है कि, पूर्वकालमें इसाइयोंमें भी भजन और तपादि ईश्वर संबंधी कार्योंकी उत्तम उत्तम रीतियाँ थीं । हिन्दू और मुसलमान सन्तोंके समान उनको भी ज्ञान प्रकाश प्राप्त होता था, जबसे ईसाई लोगोंने सन्तों की निन्दा करनी आरम्भ कर दी, तबसे ईश्वरका नाम स्मरण जप ध्यान आदि सब प्रकारका भजन छूट गया भजन भक्तिका तो नाम भी न रहा । यही कारण है कि, इसाइयोकी बुद्धि संसार विमुख होगई, ईश्वरसे इतनी विरोधता करने लगी कि, उसका नाम लेना भी निरर्थक समझने लगे ।
जबसे सन्तोंका अभाव हुआ तबसे गृहस्थोंसे दान पुण्य और उदारता नष्ट होगई । वर्तमानमें ईसाइयोंके धर्म गुरु लोग जो पादरी नामसे पहचाने जाते हैं भजनसे रहित विषय वासनामें लुब्ध हो रहे हैं । वर्तमान कालके लोगोंकी बुद्धि ऐसी स्थूल हो रही है कि, यदि समझाने पर भी नहीं समझते । सब अपने हानि लाभसे अज्ञात हैं, जो मन कहता है उसीके ऊपर चलकर अपना सर्व नाश करते हैं । ईश्वरका भय और धर्मानुरागका तो नाम भी बाकी नहीं रहा है ।
वर्तमानके लोग (भारतवासी) अङ्गरेजी शिक्षा पाकर भक्ति और धर्म श्रद्धासे ऐसे हीन होगये कि, साधु सन्तों तथा धर्मज्ञ सज्जनोंको देखकर नमस्कार तक नहीं करते । कोट, बूट, सूटके अभिमानमें ऐसे घमण्डसे चलते हैं मानों आजही बिलायतसे आये हैं । जो लोग धर्मादामें विद्या पढ़ते हैं सकारि शिक्षकों को वेतन देती है मूषतमें विद्या प्रदान करती है, ऐसी गुरुभक्ति और सेवाहीन विद्या प्राप्त करनेवाले गुरुकी प्रतिष्ठा और सेवा भक्ति कब कर सकते हैं ?
यदि भारतवासी अपनी गई हुई सुखमय अवस्थाको प्राप्त करना चाहते हैं तो उचित है कि, प्रत्येक पिता अपने २ बंशोंको प्रथम धर्मशिक्षा दें । गुरु, साधु, सन्त और श्रेष्ठोंकी सेवा भक्ति सिखलावें । पीछे दूसरी लौकिक और पारलौकिक विद्या सिखलावें ।
अध्याय २४.
प्रश्नोत्तर ।
ब्रह्म और माया ।
१ प्रश्न-ईश्वर क्या है ?
उत्तर - ईश्वर, खुदा, गाड़, एवाह, रहीम, राम, करीम, अल्लाह, आदि ईश्वरके जितने नाम जगमें प्रसिद्ध हैं वे सब मायाके नाम हैं क्योंकि, नाम रूप माया है । सृष्टिको उत्पन्न करनेवाली भी माया है । ईश्वर भी मायासे है । वही माया सृष्टिमें शासन करती है । सब खेल उसीका है ।
२ प्रश्न-माया क्या है ?
उत्तर - माया ब्रह्मकी अर्द्धांगिनी है । ब्रह्म शुद्ध और चैतन्य है । माया अचेत और जड़ है । माया सर्वदा ब्रह्मके सङ्ग रहती है जैसे कि, वृ के साथ छाया रहती है । जिस प्रकार नदीमें वृक्षका प्रतिबिम्ब पड़ता है उसी प्रकार ब्रह्म जीव में रहता है इसी कारण ब्रह्म जीवसे लिप्त और अलिप्त है अर्थात् भिन्न और अभिन्न है । मायासे पार ब्रह्मही ब्रह्म है दूसरा कुछ नहीं है । सर्वव्यापक ब्रह्म है, उसीके सङ्ग माया रहती है । जिस प्रकार वायुसे जलमें तरङ्ग उठते हैं जबतक वायु नहीं डोलती तबतक तरङ्ग नहीं उठते उसी प्रकार ब्रह्ममें माया अर्थात् फुरना उठती है तब सब कुछ होता है । जब शान्त हो जाती है तब रचनाभी शान्त हो जाती है ।
३ प्रश्न - ब्रह्मका नाम क्या और मायाका नाम कौनसा है ?
उत्तर - ब्रह्मके पाँच नाम हैं । ब्रह्म, काल, कर्म, जीव, स्वभाव । जो अखण्ड है, अविभाज्य और अविनाशी है उसको ब्रह्म कहते हैं । स्वयम् होनेवाले को काल कहते हैं । समस्त कर्मोंको कर्म कहते हैं । जो अपनेको न जाने उसे जीव कहते हैं । स्वभाव उसको कहते हैं जिससे शुभ अशुभ दुःख सुखका ज्ञान हो ।
ऐसेही मायाके पाँच नाम हैं । शून्य, शक्ति, माया, आकाश और प्रकृति । माया इस कारन कहते हैं कि, ब्रह्मके सङ्ग रहती है । आकाश इससे कहते हैं कि, शरीरकी आदि सृष्टि उसने की है । इस लिये शून्य बोलते हैं कि, जड़ हैं । शक्ति इस वास्ते कहते हैं कि, सब सृष्टिपर प्रबल है । सबपर अधिकारिणी है । प्रकृति इस कारण कहते हैं कि, यह ब्रह्मकी अर्द्धाङ्गिनी है ।
४ प्रश्न - प्रथम आपने कहा था कि, जो कुछ जाननेमें आता है सो सब नाम रूप माया है । अब ब्रह्मकी और मायाकी भिन्न भिन्न व्याख्या बतलाते हो इसका क्या कारण है ?
उत्तर — उसका यही कारण है कि, मायाके दो रूप हैं । एकको ब्रह्म एवं दूसरेको माया कहते हैं । जैसे पुरुष और स्त्री दोनों माया हैं । संसारका व्यवहार जोड़ेके बिना नहीं चलता । द्वैतही संसारका मूल कारण है । मायानेही अपने दो स्वरूप बनाकर संसारको खड़ा किया है । माया और ब्रह्मके संयोगसे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और नाश है । प्रथम पुरुषसे प्रकृति, प्रकृतिसे महात्त्व, महात्त्वसे अहंकार, अहंकारसे तीनों गुण, तीनों गुणोंसे आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल और जलसे पृथिवी होती है । मायाही शरीरका कारण है । ब्रह्म चैतन्य है । जो आपको जानता है (ज्ञानस्वरूप) चैतन्य है । जो आपको जाने, अन्तःकरणको जाने, ज्ञान इन्द्रियको जाने, पाँचतत्त्व और तीनों गुणोंको जाने, सर्वको जाने वो चैतन्य ब्रह्म है । जड़ माया है दोनोंका सदाका सम्बन्ध है ।
दर्शन हुआ या नहीं ।
५ प्रश्न — लोग कहते हैं कि, आदम, नूह, इब्राहीम, मूसा तथा भारतवर्षके भक्तलोगोंने ईश्वरका दर्शन पाया । यह उनका दर्शन पाना सत्य है अथवा असत्य ?
उत्तर — समस्त संसार पठित अपठित मृतकके समान है । जिसको ज्ञान है वही जीवित है । मृतक दर्शन नहीं करते जीवितही दर्शन करपाते हैं । हाँ, सदाचारियोंने जो कुछ अपनी आँखोंसे देखा है वो उनका शुद्ध अन्तःकरण होनेके कारण उन्हींका संकल्प उनके ईश्वरके रूपमें देख पड़ा । वह संकल्प मात्रही हुआ । इस कारण जो उनने देखा सब मायाही देखी । ब्रह्म जो आवाङ्ग-मनसगोचर है उसको आत्मज्ञानके बिना जानना दुर्लभ है । जो कुछ बहिर्दृष्टिसे देखनेमें आता है वो असत्य जड़ माया मात्र है । मूसा और दूसरे नबियोंका ईश्वर आत्म ज्ञानसे रहित था । उसको अन्तर्दृष्टि नहीं थी । हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी, पारसी, आदि सभी धर्मवाले ईश्वरके यथार्थ स्वरूपको जाने बिना परस्पर रागद्वेष करके एक दूसरेसे लड़ते झगड़ते हुए सुखी दुखी होते हैं । सारे संसारमें जो ईश्वरको व्यापक नहीं जानता वह पशु है । पशुमें और उसमें कुछ विभिन्नता नहीं है । जैसे पशु अज्ञानतासे मृतकके समान हैं उसी प्रकार आत्मज्ञान रहित सभी मनुष्य अविद्याके अन्धकारमें पड़े मृतक हो रहे हैं ।
दृष्टान्त — जब मुसलमानोंका राज्य हुआ तो धर्म द्वेषमें पड़कर उन्होंने हिन्दुओंके ऊपर बहुत अत्याचार करना आरम्भ कर दिया । हिन्दुओंके यज्ञोपवीत तोड़ लिये जाते थे, मायेके तिलक चाटलिये अथवा मिटा दिये जाते थे, इसी प्रकार अनेक उपद्रव और अत्याचारोंसे हिन्दुओंके धर्म और वैभवको नाशकर अनन्त दुःख पहुँचाये जाते थे । यह बात प्रसिद्ध है कि, उसी समय मुथरेशाह नामक एक
हिन्दू साधू दिल्लीमें गया। उसने छोटे बालकके माथामें विष्ठेकी तो तिलक लगाई और चमड़ेका यज्ञोपवीत गलेमें पहिन लिया। इसी रूपसे फिरता फिरता काजीके सन्मुख गया। काजीने उसे देखतेही उसकी तिलक चाटी पर तिलकके स्वादसे जान गया कि, यह तो मिट्टीकी नहीं बरन् विष्ठेकी तिलक है। फिर यज्ञोपवीत तोड़ा, यज्ञोपवीत तोड़ते समय भी जान लिया कि, यज्ञोपवीत चमड़ेका है। तब तोबा ! तोबा ! करता हुआ अलग हो गया। सुथरेशाहने कहा कि, अलग क्यों जाता है ? तिलकको खूब चाट, यज्ञोपवीतको भी दांतसे काट, अब क्यों भागता है ? जैसे पहले हलाल समझकर यज्ञोपवीत तोड़ना और तिलक चाटना स्वीकार किया था आज भी क्यों नहीं करता !
फिर सुथरेशाहने एक जोड़ा जूता रत्न जटित बहुमूल्य बनवाया। वह जूता सवा हाथ लम्बा था एक कटोरा भी लिया। समय पाकर कटोरेमें पिशाब करके और एक जूता लेकर बड़ी मसजिदमें गुप्तचुप रख दिया कि, किसीने रखते न देखा। सबेरे सब लोग निमाज पढ़नेको आये मसजिदमें ऐसा बड़ा बहुमूल्य जूता देखकर सबोंने बहुत आश्चर्य माना। तमाम शहरमें धूम मच गई। काजी और मुल्लाओंने परस्पर विचार करके निश्चय किया कि, आजरातको खुदा मसजिदमें उतरा था। उसीका यह जूता और प्याला है। ऐसा लम्बा पैर किसी दूसरेका तो होही नहीं सकता। जरूर खुदाहीका है। फिर क्या था शीघ्रही यह समाचार शहर भरमें फैल गया कि, मसजिदमें खुदा उतरा था। उस जूतेको सब मुसल्मानोंने छातीसे लगाया और उस प्यालेमें जो पानी था उसको वजूका बचा हुआ पानी समझकर आखों और माथोंमें लगाया तथा आचमन किया। पिशाब तो यों काममें आ गया और जूता तथा कटोरा पवित्र समझकर बादशाही तोशः खानेमें बड़ी प्रतिष्ठासे रखा गया। मुसल्मान लोगोंको इस बनावसे बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। सबके सब ऐसे फूले कि, सब प्रकारकी चिन्ता और फिकिरोंको भूलकर उत्सव मनाने लगे। कई एक दिनोंके पश्चात् सुथरेशाहने दूसरा जूता हाथमें लेकर शहरमें फिरना आरम्भ किया प्रत्येक मनुष्यसे कहने लगा कि, मेरे जूतेका जोड़ा दूसरा जूता और पिशाब करनेका प्याला कोई चुराकर ले गया है। जिस किसीने लिया हो मुझे दे दो। क्रमशः यह समाचार बादशाहको पहुँचा बादशाहने सुथरे शाहको बुलाकर पूछा कि, तुम्हारा जूता और प्याला कौसा था ? सुथरे शाहने अपना जूता दिखलाकर कहा कि, इसीका जोड़ा था प्यालेका सब रङ्ग ढङ्ग बतलाकर कहा कि, वह मेरा पिशाब करनेका प्याला था बादशाहने जूता और प्याला मँगाकर सुथरेशाहको सामने रखकर कहा कि, इसको पहनकर दिखलावो तो
विश्वास हो । सुथरे शाहने उसे पहन लिया, वह पैरमें बराबर आगया । यह कौतुक देखकर सब आश्चर्यमें आये कि, यह सवा हाथका लम्बा जूता इस साधुके पगमें कैसे अट गया ? बादशाहको विश्वास होगया कि, यह जूता और प्याला सुथरेशाह काही है, उन्हींको दे दिया । पहले वह जूता खुदाका था तब सबने उसको महान् पवित्र और ईश्वरका प्रसाद समझा । पीछे जब सुथरे शाहका होगया तब सब लोगोंको घृणा हुई, सब तोबः तोबः और बहुत पश्चात्ताप करने लगे क्योंकि, उन्होंने सुथरेशाहके पिशाबको आंख और माथोंमें लगाया तथा आचमन किया था ।
समीक्षा — सोचना चाहिये कि, मुसलमानोंका बेचून बेचरा खुदा महजिदमें आवे एवं लोगोंके भयसे जूता छोड़कर भाग जावे । शोक है ऐसी समझ बूझपर । यही सांसारिक तथा प्राकृतिक जनोंकी बुद्धि और समझ है ऐसाही उनका खुदा है । कितने पीर, पैगम्बर, ऋषि, मुनि, सिद्ध ईश्वर करके जगतमें पूजित हैं उनमेंसे कितने पशुओंकी योनिमें मारे मारे फिरते हैं । मनुष्योंसे भी बहुत दुःखी और हीनावस्थामें हैं ।
किसका भजन करे ।
६ प्रश्न — जब ईश्वरोंकी यह दशा है तो किसका नाम जपना चाहिये, अंतरङ्ग और बहिरङ्ग भजन किस प्रकार और किसका करना चाहिये ? ईश्वरका नाम क्या है ?
उत्तर — जितने नाम हैं वे सब उन्हींके हैं, जिनका रूप संसारमें प्रगट है । जितने रूप हैं सब नाशमान हैं जो नाशमान हैं वह ईश्वर नहीं । भजनके चार स्थान हैं । नाभि, हृदय, जिह्वा और मस्तिष्क । यह सब मिथ्या है पर जैसे दूध पीता बच्चेको छोड़कर उसकी माता कहीं बाहर जाती है वह बच्चा भूखा होजाता है वह चार प्रकारका कर्म करता है यानी रोता है चिल्लाता है, मुँह पसारता है और हाथ पाँव मारता है यद्यपि भूखका नामभी नहीं जानता, न दूधको अपना भोजन समझता है, न कोई उपाय कर सकता है, पर उसके रोने चिल्लाने और मुँह पसारनेसे उसका कार्य सिद्ध होता है । उसकी ऐसी क्रियाको देखकर माता दौड़के आती है दूध पिलाकर उसको सन्तुष्ट करती है बालक सुखको प्राप्त होता है, इसी प्रकार भजनके चारों स्थान असत्य हैं पर उन्हींके द्वारा अभ्यास करनेसे ईश्वरका कृपापात्र बनता है । इस कारण ईश्वरके चाहनेवालोंकी भजन करना चाहिये । उसीसे इष्टकी प्राप्ति होती है । जैसे माता पिता देखते हैं कि, बच्चा रोटी खाने योग्य हुआ तो उसको नानाप्रकारसे स्वादिष्ट भोजन देते हैं । फिर कुछ समय बीतने पर उसको पढ़ाते हैं लौकिक पारलौकिक विद्याकी शिक्षा देते हैं ।
जब अपनी युवास्थाको पहुँचता है सर्व प्रकारसे योग्य होता है तब अपना सर्व अधिकार देकर स्वयं अलग हो जाते हैं। जबतक वह किसी बातका अधिकारी नहीं होता तबतक उसकी सब प्रकार रक्षा करते हैं। क्योंकि, यदि दूध पीते बच्चे को कठिन पदार्थ खानेको देदिया जावे तो वह बीमार हो जावेगा यही नहीं वरन् मर जावेगा इसीप्रकार सब जीवधारी भजनमें एक समान हैं पर मुक्तिका पथ केवल मनुष्य शरीरमें है वह सत्यपुरुषकी भक्तिही है। यदि मनुष्य शरीर पाकर भी सत्यपुरुषकी भक्तिके मार्गको न जाना, उसका अस्तित्व और श्रेष्ठताको न पहिचाना, यथार्थ रीतिको छोड़ अन्यथा रीतिसे भजन करे तो पशु और मनुष्यमें क्या भेद हो? केवल सत्यपुरुषकी भक्तिही मनुष्यत्व है। जितने कर्मकाण्डी लोग हैं वे दूध पीते हुए बच्चोंके समान हैं वे ईश्वरीय भेदकी यथार्थताको क्या जानें? अल्पबुद्धिके कारण दूसरोंसे मिथ्याही लड़ते झगड़ते और वाद विवाद करते फिरते हैं।
विचारोंका तत्त्व निर्णय।
७ प्रश्न—सब तत्वज्ञानी विद्वान् तथा माकूलात् व मनकूलात् सत्य हैं कि असत्य?
उत्तर—समस्त मनकूलात् तो सत्य हैं पर उनका यथार्थ आशय विरलाही समझता है। जिनको दिनहीमें न सूझे, अन्धे हों उनको रात को क्या सूझेगा? अनेक (चश्मा) और दूरबीन अन्धोंको क्या लाभ दायक होंगे? पठित अपठित जो देहाभिमानमें पड़कर शरीरकेही पोषण पालनको अपना सर्वस्व समझे बैठे हैं उनको पुस्तकावलोकनसे माकूलात् और मनकूलात्केजाननेसे क्या लाभ हो सकता है?
तीन प्रकारके आनंद।
आनन्द तीन प्रकारका है। विषयानन्द, भजनानन्द, और ब्रह्मानन्द। जो विषयानन्द यानी सांसारिक विषयवासनाकी कामनाको छोड़ दे, वह भजनानन्दके पदको पासकता है। जब तक विषयके स्वादकी तनिक भी हृदयमें चाहना हो तब तक भजनानन्दके पदको पाना कठिनही नहीं बरन् दुर्लभ कार्य है। विषया-
१ जो बुद्धि विचार और प्राकृतिक नियम तथा अनुभव सबसे ठीक हो उसमें कोई ऐसी बात न हो जो कि, बुद्धि और विवेक के प्रतिकूल और प्राकृतिक नियमके विरुद्ध हो, उसे माकूलात् कहते हैं।
२ जिसमें बहुतसी ऐसी बातें होती हैं जो बुद्धिसे बाहर प्राकृतिक नियमके विरुद्ध और असम्भव जान पड़ती हैं, जैसे नानाप्रकारके मत मतान्तरकी पुस्तकोंमें अनेक ऐसी कथायें और बातें लिखी हैं जो असम्भव प्रतीत होती हैं। वे सब मनकूलात् कहाती हैं।
नन्दके अभिलाषी चाहे पठित अथवा अपठित कैसे भी क्यों न हो सब समानही हैं। जबतक मनुष्य विषयवासनाकी कामना देहाभिमान और जगतकी आपत्तिको उठा न दे तब तक भजनानन्द प्राप्त नहीं कर सकता। ईश्वरकी भक्ति और भजनमें ब्रह्मज्ञान नहीं मिल सकता जिसको ब्रह्मज्ञान न प्राप्त हो उसकी ब्रह्मज्ञानविषयक बातें करनी मिथ्या और मूर्खता है।
कर्मकाण्ड, योग, उपासना, ज्ञान ये चारों ब्रह्मज्ञानरूपी अटारी पर चढ़ने की सीढ़ीके ढण्डे हैं। विद्याभिमानी पहलेही (कर्मकाण्ड) ढण्डेपर खड़े हैं उनको चौथे ज्ञानके ढण्डेकी क्या सुधि है? सन्त तो चारों ढण्डोंके पार पहुँचे हैं। वे माकूलातके आशयको भली प्रकार समझते हैं। दूसरोंकी क्या शक्ति है कि उसके यथार्थको सङ्गम सकें? वे अपनी क्षुद्र बुद्धिके अनुसार अर्थ लगाते हैं। जैसी बुद्धिसे अर्थ लगाते हैं वैसेही उसका फल पाते हैं। अपनी बुद्धि और समझसे बढ़ कर कहाँसे लावें? और क्या लिखें?
८ प्रश्न—यथार्थ क्या है? उसको प्रगट क्यों नहीं करते? क्योंकि, सभी सत्यके चाहनेवाले हैं। सत्यको पुकार २ कर कहना चाहिए, जिससे सब लोग उसको जानकर सत्यपथ पर चले हुए मुक्ति पावें।
उत्तर—जो सत्य है वह असत्यके ओटमें इस प्रकार छिपा हुआ है कि, उसको देखते हुये भी नहीं देखते। जो सत्यकी इच्छा करेगा, उसके प्राप्त करनेका अधिकारी होगा उसको सत्य दिया जायेगा। सत्यका मार्ग कठिन जानकर उससे भागते हैं असत्यको स्वीकार करते हैं। मनुष्य पक्षपातमें पड़जाता है तो नीचसे नीच, निषेधसे निषेध कार्य्यको अज्ञानता वश नहीं छोड़ना चाहता। सत्य तो प्रत्यक्ष प्रगट सब स्थानमें सर्वदा पुकार रहा है पर असत्यके प्रेमी उसके परम तेजको नहीं सह सकते। सत्य प्रत्यक्ष, और प्रगट होने पर भी ऐसा गुप्त है, जैसे जबहरि-योंकी दूकान पर रत्न पेटियोंमें बन्द रहता है पर उसके ग्राहक जभी आते हैं तभी पेटी खोलकर उसको देखाते हैं। जो पारखी है उनके लिये रत्न सर्वदाही प्रत्यक्ष होता है। यद्यपि रक्षाके लिये पेटीमें रखा हो तो क्या? जो पारखसे रहित हैं उनके लिये यदि रत्नको बाहरही रखा जावे तब भी उनको कुछ लाभ नहीं हो सकता। इस कारण उचित है कि, जब कोई रत्नपारखी मिले तभी उसका सन्दूक खोलना चाहिये। हर एकके सामने खोलना ठीक नहीं, क्योंकि, सबके सामने खोलनेसे भय है कि, चोर डाकू नष्ट कर दें।
शब्द—जो कोई रत्न पारखी पेंये, हीरा जाय भँजये।
पलरा मूल तत्वकी ढाँडी, प्रेमको बांट बनये॥
वस्तु हमारी अगम अगोचर, लेके सराफ़ी जैये ।
लगी हाट यम जाल पसारा, तब वह वस्तु भजैये ॥
तौल तालकी जमा सुलाखी, तब वाको घर पैये ।
केतिक चोर फिरें गलियनमें, तिनते मत लुटवैये ॥
वस्तु अगोचर शब्द अनाहत, यहि विधि ध्यान लगैये ।
कहैं कबीर भावे सौदा, सद्गुरु होय लखैये ॥
साखी— हीरा रतनकी कोठड़ी, बार बार मत खोल ।
जो कोई आवे रतन पारखी, तब हीराका मोल ॥
९ प्रश्न—प्रत्येकमतमें मुक्तिका विचार—किसी धर्ममें (मजहब) कोई क्यों न हो यदि वह पुण्य करे, सर्वदा सदाचरणसे वरते तो मुक्त हो कि, नहीं ?
उत्तर—सुकृत पुरुषोंको उनके पुण्यका फल अवश्य मिलेगा पर पाप और पुण्य दोनोंही बन्धनके कारण हैं एकसे स्वर्ग दूसरेसे नर्ककी प्राप्ति होती है किन्तु मुक्ति नहीं होती। क्योंकि वो सद्गुरुके बिना कदापि नहीं मिलती जिस प्रकार ए नजिनके बिना रेल नहीं चलती उसी तरह गुरुज्ञानके बिना सत्यपद मिलना कठिन है। हाँ, इतना तो अवश्य है कि, जो अपने पुण्यको पूर्ण करते हैं उनपर सत्यगुरुकी कृपादृष्टि होती है, क्योंकि इस जीवको सदा सत्यगुरुकी अपेक्षा है।
कोई मनुष्य पूर्णपुण्य स्वरूप नहीं हो सकता। क्योंकि, पूर्वके अनेक जन्मोंसे इनके पाप पुण्यका सम्बन्ध होरहा है वरन् तौरेतके अनुसार मनुष्य जिसकी सन्तान है वह सबका पिता आदमही ईश्वरकी अवज्ञासे पापी हुआ। यही बात नहीं, वह ईश्वरकी अवज्ञासे प्रथम भी पापी था। उसके पापोंका सम्बन्ध अनेक जन्मोंसे चला आता था, जिसके कारण वह पीछे न भी अवज्ञाकारी और पापी हुआ। यद्यपि आदमकी उत्पत्तिमातृगर्भसे नहीं तो भी उसमें पाप थे। क्योंकि उसका अन्तःकरण विषय वासना और शारीरिककामनाओंसे भरा हुआ था। यही कारण है कि, उसका मन सांसारिक भोग विलासकी ओर आकर्षित हुआ। उसे स्त्री मिलने की बड़ी अभिलाषा थी जो उसके पतित होनेका कारण हुआ यदि उसमें पाप न होता तो वासना भी न होती वह निरपराधी दुःखमें न पड़ता इससे यह सिद्ध होता है कि, पहलेही पापसे दूषित था पूरा पुण्यस्वरूप नहीं था। मनुष्यको उचित है कि, पुण्यको पूर्णतापर पहुँचानेके लिये पूर्ण उपाय करे सत्यगुरुसे उसके फलकी आशा रखे। सर्वदा दृढ़ताके साथ यही विश्वास हृदयमें धारण करें कि, सत्यगुरुही बेडा पार करनेवाला है ?
१०—प्रश्न प्यारेकी मिलनेकी क्या युक्ति कौनसी—करनी चाहिये ?
उत्तर—प्रथम सच्चे धर्म (महजब) की खोज करनी चाहिये, फिर उसके सन्तोंकी सेवा और सङ्ग करना चाहिये जब साधुओंमें कोई ऐसा दृष्टि आवे कि, जो धर्मके मार्गको भलीप्रकार बतला सकता हो, संशयको दूर कर सकता हो, पारखपदको दिखला सकता हो आत्मज्ञानका मार्ग सुझा सकता हो तो, ऐसे सन्तको पाकर अपनेको धन्य जाने उसीको गुरु बनावे । श्रद्धा और प्रेमके साथ गुरुकी सेवा भक्ति करे उससे कभी न फिरे । गुरु करनेके पीछे उससे श्रद्धाहीन हो जानेकी अपेक्षा पहलेही गुरुको भली प्रकार पहचान कर उसके गुणदोषकी परीक्षा कर लेना चाहिये । गुरु करलनेके बाद पीछे दोषदृष्टी उचित नहीं । अपने गुरुके चरणकी धूल हो जाना उचित है । इस बातको श्रद्धा और विश्वास पूर्वक भली प्रकार निश्चय रखे कि, गुरुकी कृपासे गोविन्द मिलेगा गुरुकीही मूर्तिमेंसे गोविंद प्रगट होगा ।
शब्द—साईं तेरा अर्श तख है दूर ।
विन मुरसिद कोई भेद न पावे, भटकि मुये सब कूर ॥
चौदह तबक ख्वाबकी रचना, आतशकासा फूल ।
राज छोड़ि जिन काज किया है, भये चरणकी धूल ॥
नासूतमें माया खड़ी, मलकूत गुण अस्थूल ।
जो कोई निजको समझे बूझ, तामें नाहिं शऊर ॥
जबरूतमें सब यम जाल है, लाहूत अक्षर फूल ।
हाहूतमें अचिन्त पुरुष, बजत अनहद तूर ॥
वेद पुराण कुराण किताबा, यहां लगि खबर जहूर ।
सोहं इच्छा वहांसे आई, सब घट व्यापक नूर ॥
सब जीवनको त्रास देखिये, समरथ वचन कुबूल ।
कहे कबीर हम खुदके अहदी, लाये हुकुम हजूर ॥
११ प्रश्न—गुरु और चेलेकी पहचान, क्या चिन्ह और है ?
उत्तर—गुरुके चार लक्षण हैं । चेलेके भी चार चिन्ह हैं । गुरुके चार चिन्ह ये हैं कि, १—पूर्ण भक्तिसे सम्पन्न हो, २—अपने धर्म ग्रन्थ तथा शास्त्र और वेदोंके आशयको समझनेवाला हो, ३—समदृष्टि अर्थात् ईश्वरको सबमें
१ पीछे छवि अर्थ किया था जो तात्पर्यार्थ है क्योंकि जब अनहद बाजे बजेंगे तबही अनहदकी छवि सुन पड़ेगी ।
व्यापक देखनेवाला हो, ४—चलेको ईश्वरसे मिलाने, भक्तिमें लगा देने और उसकी शङ्काओंके दूर करनेकी शक्ति रखता हो।
जिसके अन्तःकरणमें विषय वासनासे उपरामता आगई हो, अपने मनको वश कर लिया हो, सब जीवोंके कल्याणकी चिन्ता हो, परोपकारी हो, वेद शास्त्रके आशयको खूब समझता हो, दूसरोंको समझा सकता हो वही गुरु-पदका अधिकारी है। ऐसे विद्वान्, सत्य असत्यको भलीप्रकार समझते हैं, अपने स्वरूपके ज्ञानको संशय रहित धारण करते हैं। वे जानते हैं कि, समस्त संसार मेराही रूप है, दूसरा कोई नहीं है। आत्मा को छोड़ कभी उनके हँत दृष्टि नहीं होती, सब मनुष्योंको सत्य पुरुषकी भक्ति और प्रेममें दृढ़ कराते हैं। श्रद्धा, भक्ति प्रेम, शौर्य, आदि देवी गुणोंके स्वरूपही होते हैं धन्य है वे पुरुष जिनको ऐसे गुरु मिलते हैं।
गुरु शब्दका अर्थ।
दोहा— गु आधियारे जानिये, रु कहिये परकाश।
मिटि अज्ञानहि ज्ञानदे, गुरु नाम है तामु॥
अर्थ—गु-शब्दका अर्थ है अन्धकार—अर्थात् अज्ञान। रु—का अर्थ है प्रकाश अर्थात् ज्ञान। तात्पर्य यह कि, अन्धकार रूप अज्ञानको नष्ट करके हृदयमें ज्ञानरूप प्रकाशको प्रगट करे वो गुरु कहलाता है गुरुके सब गुणोंमें श्रेष्ठ गुण शिष्यको ईश्वरपरायण कर देता है।
चलेके लक्षण—इसी प्रकार हैं। १ अहङ्कारका त्याग कर देना, २ विषय वासनासे रहित होना, ३—तन मन धनसे गुरुकी सेवा करना, ४—गुरुके वचन पर पूर्ण श्रद्धा विश्वास रखना इन चारों गुणोंमें दो गुण गुरुकी सेवा और गुरुपर विश्वास अत्यावश्यक है। जिसमें यह दो गुण हों उसमें शेषके दो गुण और भी आजावेंगे। गुरुकी सेवा और गुरुका विश्वास येही दो गुण भक्ति और मुक्तिके चिह्न हैं। यदि ये दो गुण न हों तो शिष्य अवश्य कालके गालमें जावे एवं उनका आवागमनसे छूटना दुर्लभ होवे।
सर्व कालमें गुरुकी स्तुति करना उचित है। गुरुसे विमुखता नरकका मार्ग है। जो कोई गुरुके विमुख हुआ, उसका ज्ञान विचार सब नष्ट हो जाता है यह कालका आखेट हुआ है इसके ऊपर एक दृष्टान्त है।
बाजीगर और चरवाहा—किसी समय एक बाजीगर कहीं कौतुक दिखला रहा था। उसके मध्य उसने यह कौतुक दिखलाया कि, तीन छुरे परस्पर एकही समयमें ऊपरसे फँकता उसे हाथोंसे पकड़ता था। यह देखकर एक चरवाहेने
कहा कि तू, तो हाथोंसे पकड़ता है, मैं इन छुरियोंको दांतोंसे पकड़ सकता हूँ । बाजीगरने कहा तू अपनी कला प्रगट दिखला. उस चरवाहेने एक छुरीको लेकर इस प्रकारसे फँकना और दांतोंसे पकड़ना आरम्भ किया कि, जब वह छुरी फँकता तब नीचे आते आते उसकी मूठही दांतपर आके गिरती. चरवाहेकी यह लीला देख लोगोंको बहुत आश्चर्य हुआ । बाजीगरने चरवाहेसे पूछा कि, तूने यह विद्या कहाँसे सीखी ? उसने कहा मैंने किसीसे सीखी नहीं बरन् स्वयं मुझे आगई है । बाजीगरने बहुत प्रकारसे पूछा पर उसने गुरु स्वीकार नहीं किया, तब बाजीगरने कहा जब तू गुरु स्वीकार नहीं करता तो अच्छा फिर तू यही कौतुक दिखला उस चरवाहेने फिर कौतुक दिखलाना चाहा पर अबकी बार मूठके बलसे गिरनेके बदले छुरी नोकके बल गिरी जो गिरतेही कण्ठके अन्दर घुस गई । वह मरने लगा उस बाजीगरने उससे फिर पूछा कि, अब भी तू कहदे तूने यह विद्या कहाँसे सीखी ? । चरवाहेने उस अवस्थामें स्वीकार किया कि, मैंने बगुलेको देखा था कि मछलियोंको ऊपर फँकता उनके नीचे आते आते मुँहमें निगल जाता. मैंनेभी वैसेही अभ्यास करना आरंभ कर दिया बाजीगरने कहा तेरा गुरु तो अवश्य था, तूने इनकार क्यों किया ? गुरुसे विमुख होनेका यही फल है अब तेरी मृत्यु आगई । थोड़ी देरमें वह चरवाहा मर गया ।
निष्कर्ष—भली प्रकार स्मरण रखना चाहिये कि, गुरु विमुखजन कभी सफलता नहीं पावेंगे और गुरुमुख गुरुकी सेवा और भक्ति करके अपनी मनो कामना सिद्ध कर लेते हैं, उनका प्रभाव बढ़ता है, सब प्रकारकी कला कौशल और विद्या प्राप्त होती है । इसीपर एक कथा है ।
द्रोणाचार्य और भील—एक समय पांडव और कौरवोंके बाण विद्याके गुरुद्रोणाचार्यके पास एक भीलने आकर कहा कि, मुझे बाण विद्या सिखलावो । द्रोणाचार्यने उत्तर दिया मैं तुझे बाण विद्या नहीं सिखलाऊँगा, तू भील है, इस विद्याको सीखकर बहुत अत्याचार और हिंसा करेगा । वह निराश होकर चला गया, बनमें पहुँचकर उसने द्रोणाचार्यकी एक मूर्ति स्थापित करके बड़े प्रतिष्ठा श्रद्धाके साथ उसीके सन्मुख अभ्यास करना आरम्भ किया । बड़ी प्रेम भक्तिसे नित्य प्रति मूर्तिको नमस्कार करता पूजन करके अभ्यास आरम्भ करता । थोड़ेही दिनोंमें उसने अपने अभीष्ट को सिद्ध कर लिया बाण विद्यामें ऐसा प्रवीण हुआ कि अर्जुनने भी उसकी प्रशंसा की । गुरुकी मिट्टीकी ही मूर्तिमें पूर्ण विश्वास होना, चाहिये । जबतक गुरुमें पूरा विश्वास न हो तबतक कदापि सफलता नहीं होती । गुरु कँसाही क्यों न हो शिष्य अपनी दृढ़ताके कारण उच्च पदको प्राप्त करेगा ।