कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
थे पर वह स्त्रीके लिये चिन्तित था। तब उसके पिताने उसे एक जोरू भी ला दी, वे दोनों प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे। वे दोनों मूर्खताके तिमिरमें फँसे हुये थे, वे दोनों अज्ञानतावश निर्दोष तथा भोले भाले कहलाते थे। पिताको चिन्ता हुई की, मेरी सन्तान मूर्ख न रह जावे, इनको विद्या सिखाना आवश्यक है जिसमें वे जाने कि, वे किस लिये उत्पन्न किये गये हैं? ऐसा न हो कि, वे सदैव मूर्खावस्थामें ही पड़े रहें। इस कारण उसने एक विवेकका वृक्ष लगाया कि, उसके खानेसे कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान हो जावेगा और भला बुरा जाना जावेगा, इसके पीछे उसके पिताने शैतान गुरुको शिक्षार्थ भेजा, जिस फलके खानेको खुदाने मना किया था उसे उसने उभाड़ कर फलको उन दोनोंको खिला दिया। जैसे प्रत्येक मनुष्यको इसीकी चिन्ता होती है कि, किसी प्रकार मैं उभार कर अपने शिष्योंको विद्या तथा सभ्यता सीखने पर प्रस्तुत करूं, इसी प्रकार शैतानने फुसलाकर उन्हें फल खिलाया, जिससे आदमको विद्या हुई, वे वैकुण्ठसे निकाले गये। क्यों कि, वे सर्व पदार्थ मूर्खोंके लिये हैं जबतक मनुष्यमें मूर्खता है तब तक नरक तथा वैकुण्ठमें ही फँसा रहता है, जब जीवको विद्या होती है तब नरक तथा वैकुण्ठके दुःख सुखको मिथ्या तथा क्षणभंगुर जानता है। जब नरक तथा वैकुण्ठको तुच्छ समझकर भजनमें लगता है तब उसके मनसे सभी वासनाएं पृथक् हो जाती हैं, उनके पृथक् होनेसे सर्वज्ञताके योग्य होजाता है। महाप्रलयमें सब जीव निरञ्जनमें समा जाते हैं, ब्रह्मा तथा कीड़े मकोड़े आदि सभी अपने कम्मोंके साथ निर्जीवके समान निरञ्जनमें रहते हैं। उत्पत्तिके समय पूर्वके कम्मोंके अनुसार फिरसे शरीर धारण करते हैं। संसारमें प्रत्येक अपनी भलाई बुराईके अनुसार स्वरूप पाते हुए उसीके अनुसार दुःख सुख भोगते हैं। मनुष्यके बच्चोंके सब रङ्ग ढङ्ग आदममें प्रगट थे। इससे यही परिणाम निकला कि, आदम अनगिनती बार पहले भी जन्म ले चुका था, वही अब आदम हुआ, भविष्यमें भी अनेक बार जन्म धरेगा। यद्यपि आदम खुदाके सामर्थ्यसे उत्पन्न हुआ था तो भी अपने पूर्वजन्मोंके कार्यको प्रगट करता था। यह सम्भव नहीं कि, पवित्र आत्मा जब सशरीर हो तब दुःख सुखके बन्धनमें फँसे। यदि वह आत्मा अपने पूर्वजन्मोंके कम्मोंसे अशुद्ध न होती तो यह अवस्था कदापि न होती, इस कारण जानना चाहिये कि, अनगिनती जन्मोंसे यह जीव बराबर आवागमन करता चला आता है और भविष्यमें भी करता जावेगा। जब तक उसको शुभ और अशुभका सम्बन्ध न टूटे तबतक पिता तथा पुत्रका कर्तव्य है, तहां तक तो खुदाने आदमको सिखलाया परन्तु गुरु बिना ज्ञान नहीं होता, इस कारण अबलीस (शैतान) को भेजा, जिसमें उसके द्वारा ज्ञान पावे। यदि हजरत अबलीसकी दया न होती तो
हजरत आदम पाशविक अवस्थासे कभी पृथक् न होते । केवल शैतान गुरुकी दयासे आदमको पैगम्बरी मिली, आजतक सब विद्याओंके सीखनेका उद्योग करते हैं । यदि अबलीस गुरु न होता तो सब आदम और सारे आदमजाद निकम्मे होते । अतः उस गुरुको हमें धन्यवाद देना उचित है । जिसने हमको सभी आनन्दोंको दिया और अचेतनासे पृथक् करके परिभ्रम और भजनमें लगा दिया हम विद्या प्राप्त करके कथन करने लगे कि —
बर सरे दारम कुलाहे चरा तर्क ।
तर्क दुनियाँ तर्क उकबा तर्क मौला तर्क तर्क ॥
तात्पर्य—मनुष्य कहता है मैं अपने शिर पर चार तर्क (त्यागोंकी) टोपी धारण करता हूँ । मुझको संसारमें ही खुदाने वैकुण्ठका आनन्द दिया था । जबसे मुझको कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान न हुआ तबसे जिनको छोड़ना यद्यपि कठिन था, ऐसे संसारिक आनन्द परित्याग कर दिये । जब संसारको छोड़ा तब दूसरे लोकको ढँढ़ने लगा, परलोकके सर्व आनन्द प्राप्त हो चुके तब बुद्धि तथा सोचसे परलोक के भी सर्व पदार्थ अस्थाई तथा तुच्छ प्रतीत होने लगे, उनको भी देख भाल कर छोड़ दिया । दो तर्क हो चुकी । फिर मौलाको ढूँढ़ने लगा । मौलाकी खोजमें जब अपना प्राण अर्पण कर चुका खुदामें लीन हो गया तब खुदासे मिला । अब तो बूंद तथा नदीमें कोई विभिन्नताही नहीं रह गई दोनोंही एक हो गये । फिर तो आपही आप रह गया फिर कौन मैं हूँ, जो कुछ संसारमें होता है सो सब कुछ मैं करता हूँ और मैं भोगता हूँ, किसीका तर्क करूँ ? तर्कहीका तर्क हो गया अथवा दूसरा इसका यह भी अर्थ है कि, हे मनुष्य ! तू संसार, स्वर्ग और विज्ञताके अभिमानको छोड़ दे एवं इस अभिमानको भी छोड़ दे कि मैंने सब छोड़ दिया ।
९ तौरीतमें उत्पत्तिका—(२५) बाब (२१ से २६) आयत तक देखो । इसहाकने अपनी स्त्री रबकाके लिये प्रार्थना की कि, उसके पुत्र उत्पन्न हो क्योंकि, वह बाँझ थी । खुदाने उसकी प्रार्थना स्वीकार की, उसकी स्त्री गर्भिणी हुई उसके पेटमेंके दो पुत्र आपसमें लड़ने लगे । तब वह खुदासे पूछने गई कि, यदि यों है तो ऐसा क्यों है ! खुदाने उससे कहा कि, तेरे पेटसे दो बहुत बड़ी जातियां उत्पन्न होंगी बड़ा पुत्र छोटेकी सेवा करेगा ।
समीक्षा—वे दोनों लड़के माताके गर्भसेही लड़ते झगड़ते चले आये । वही वैर दोनोंमें प्रगट हुआ । यदि उनके पूर्व जन्मका वैर उनको ढाँवाडोल न करता तो वे आपसमें क्यों लड़ते ? केवल प्रारब्धिने उनको उसी तराजू पर धरकर तौला । जैसा कि, उनके पूर्वजन्मोंके कर्मोंने इनको गति दी थी पूर्वजन्मके कर्मानुसार इस अवस्थाका स्वरूप प्रगट हुआ इससे आवागमन स्पष्टरूपसे प्रमाणित हो गया ।
१०-देखो ! (१०४) जंवर (२९ से ३०) आयत पर्यन्त लिखा है कि तू अपना मुँह छिपाता है वे हैरान होते हैं। तू उनका दम फेर लेता है तब वे मर जाते हैं, अपनी मिट्टीमें मिल जाते हैं। तू अपना दम भेजता है तब वे फिर उत्पन्न होते हैं तू पृथिवीको फिरसे सुसज्जित करता है।
तात्पर्य-तू अपना मुँह छिपाता है-आत्मा जो प्रकाशरूप है जब उस पर परदा पड़जाता है तब अन्धकारमें पड़कर वे हैरान होते हैं, सब जीव दुःखित होते हैं कहीं राह नहीं मिलती। तू उनका, दम फेर लेता है उससे वे मर भी जाते हैं तब तू उनके आत्माकी शरीरसे अलग करता है तो वे सब शरीर मर जाते हैं, अपनी मिट्टीमेंसे उत्पन्न होकर फिर मिट्टीमें ही मिल जाते हैं, तू अपना स्वास भेजता है प्रकाशरूप आत्माही अपने स्वासरूप जीवको भेजता है क्योंकि, सब कुछ आत्मासेही हुआ है। पांच तत्त्व तीन गुण तथा चौदह इन्द्री इसीसे हैं, आत्मा जब स्वास भेजता है तब वे जीव पुनः उत्पन्न होते हैं यही आवागमन सदा प्रचलित रहता है।
११-(१२१) जंवरमें (७ से १८) आयत तक देखो। खुदा प्रत्येक कुकर्म से तुझको बचावेगा। खुदा तेरे आनेजानेमें उस समयसे लेकर सर्वदा तेरा रक्षक रहेगा।
तात्पर्य-आने जानेसे तना सुखका तात्पर्य है चिरकालतक आने जानेका तात्पर्य आवागमनके अतिरिक्त दूसरी बात नहीं ठहर सकती। जबकि, मनुष्यके आयुकी सीमा है तो सर्वदा इसका आना जाना तनासुख के अतिरिक्त और कुछ ठहरही नहीं सकता। जिस खुदाकी वन्दना जो कोई करता है वह देवता पूर्वके प्रेमके कारण सर्वदा यथाशक्ति अपने पूजनेवालेकी सहायता किया करता है। जिस योनिमें वह जाता है वहाँही रक्षक होता है।
राजा विपश्चितका उदाहरण-वसिष्ठपुराणमें इस प्रकार एक कहानी लिखी है कि, विपश्चित नामक एक बड़ा राजा था। वह राजा अग्नि देवताकी पूजा किया करता था। एकबार ऐसा हुआ कि, चारों ओरसे उसके बैरी चढ़ आये उनकी सैन्य चारों ओर से उन्हें देखकर घबरायी। आगका एक कुण्ड बनाया और भली भाँति अग्नि प्रज्वलित करके उसमें अपना शिर तथा शरीर पृथक् पृथक् करके डाल दिया। जब उसने अपना शिर और शरीर अग्निदेवताको हवन दिया तो वो दयालु हुआ, उस एक विपश्चितके चार विपश्चित होकर उस अग्निकुण्डमें से बाहर निकल पड़े, वे चारों बड़े बलिष्ठ साहसी तथा प्रतापशाली थे। उनके तेज के सामने किसी बैरीको ठहरनेका साहस नहीं हुआ। जैसे कि, शेरके सामनेसे भेड़ोंका गोल भागता है उसी प्रकार उसके सामने कोई बैरी न ठहरा। वे चारों
विपश्चित चारों और प्रबल सैन्य लेकर चढ़ गये समुद्र तक बराबर मारते चले गये । चारों और समस्त पृथिवीको आसमुद्र विजय कर लिया कहीं कोई बैरी न छोड़ा । पृथिवी पर तो कोई राजा उनका सामना करने योग्य नहीं रहा । तब चारों के मनमें घमण्ड उत्पन्न हुआ । उन्होंने चाहा कि, हम मायाकी सीमाको तोड़ दें । देखें मायाके पार क्या है ? इच्छा की कि, समुद्रमें गोता मारें । तब राजाके कर्म-चारियोंने मना किया, रोने लगे कि, आप समुद्रमें गोता न मारें । क्योंकि, मायाकी सीमाको कभी कोई पा नहीं सकता । परन्तु उन चारोंने किसीका कहना न मान समुद्रमें गोता लगाया । चारों समुद्रमें गोता मारकर चले तो समुद्री जीवोंने उनको खा लिया । सहस्रों योनिमें वे जन्म लेने लगे, परन्तु जिस योनिमें वे शरीर धरते वहाँही अग्नि देवता इन चारोंका सहायक होता । कितने जन्म धरते धरते अन्त उन चारों विपश्चितमेंसे एक विपश्चित हिरण हो गया । वह हिरण महाराजा रामचन्द्रजीके अजायब घरमें आया । रामचन्द्रके अधीन राजाओंमेंसे एकने उसको पकड़ा सुन्दर देखकर महाराजाको भेंट किया । उस समय वशिष्ठजी, राजा दशरथ रामचन्द्र, भरत और शत्रुहण आदि सब लोग उपस्थित थे । वशिष्ठजी अपनी कथा, सुना रहे थे । उस समय उदाहरणकी भांति राजा विपश्चितका वृत्तान्त आया । वशिष्ठजीने कहा कि, हे रामचन्द्र ! इन चारों विपश्चितमेंसे एक हिरण हो गया है वह इस समय आपके अजायबघरमें बँधा हुआ है । तब रामचन्द्र इत्यादि सब लोगों को इसके देखनेकी उत्सुकता हुई । वशिष्ठजीके चिन्ह देने के अनुसार वह हिरण महल में मँगाया गया । वशिष्ठजीके अपनी बातकी सत्यता प्रगट करनेको अग्नि देवताका ध्यान किया, अग्निदेव आकर अग्निस्तम्भमें सभाके बीच खड़े हो गये । जब वह अग्नि देवता सामने आ खड़ा हुआ तब पूर्व प्रेमने उस हिरणके मनमें ऐसी उत्तेजना प्रगट की कि, वह उछाल मारकर उस आगमें जा पड़ा । जब वह हिरण आगमें जा पड़ा तब उसकी देह पलट गयी और वह असली राजा विपश्चित हो गया अग्निदेवताकी दयासे अपने शिरपर राजसी मुकुट धरे बड़े प्रतापके साथ अग्निसे निकल आया, वशिष्ठ तथा राजा रामचन्द्रको प्रणाम करके सभामें बैठ गया । वशिष्ठजीने उसको उपदेश दिया वह जीवनन्मुक्त होगया । इसी प्रकार जो कोई जिस परमेश्वरको पूजता है वही उसका परमेश्वर है और चिरकालतक वही उसका सहायक रहता है इसमें कोई सन्देह नहीं है ।
अब जानना चाहिये कि, समस्त परमेश्वरोंके पूजन से इतना तो होता है कि, मानुषिक शरीर मिल जाता है । पर जीव आवागमनसे रहित नहीं होता । मनुष्यके शरीरमें आवे सत्यपुरुषकी भक्ति करे तो वास्तवमें आवागमनका सिल-सिला टूटे, नहीं तो पूर्ववत् चला जायगा, दूसरी कोई युक्ति नहीं होगी ।
कर्मके चिन्ह
१२- (१२९) जबूरकी (१५) और (१६) आयतमें लिखा है कि, जब मैं परदेमें बनाया जाता था तब मेरा स्वरूप तुझसे छिपा नहीं था। तेरी आंखों ने मेरे कुट्टुङ्गे सांचेको देखा तेरेही दफ्तरमें सब बातें लिखी गईं। उनके हृदयोंका हाल है कि, कब सुनंगे उनमेंसे कोई न था। इससे प्रारब्ध और प्रारब्धसे आवागमन प्रमाणित होता है।
१३-वायजकी किताब (६) बाब और (६) आयतमें लिखा है कि यद्यपि वह दूना एक सहस्र वर्ष जीवित रहा तो भी उसने कुछ विशेषता न देखी। क्या सबके सब एकही स्थानमें नहीं जाते ?
तात्पर्य-सबके सब एकही स्थानमें जाते हैं। वह एक स्थान मातृगर्भ है सर्व जीव मातृगर्भमें प्रवेशकर चौरासी लाख योनिमें आवागमन किया करते हैं। क्योंकि, जब कोई जीव मर जाता है तब अपनी देह छोड़कर दूसरा चोला धारण करता है, सब जीव एकस्थानमें कदापि नहीं जाते वरन् भिन्न भिन्न स्थानोंको जाते हैं। कोई नरक, कोई वैकुण्ठ तथा कोई मध्यमें ही रह जाता है पर एक स्थान पर सबका जाना सम्भव नहीं है। इससे स्पष्टरूपसे प्रमाणित होता है कि, सबके सब मातृगर्भमें आवागमन किया करते हैं। वही एक स्थान सबके लिये नियत है। यदि कोई कहे कि, वह एक स्थान पृथ्वी है तो यह बात भी कदापि नहीं है। क्योंकि, मिट्टीमें तो मिट्टी मिल जाती है। आत्मा तथा शेषतत्त्व मिट्टीमें नहीं मिल सकते। अतः एक स्थान गर्भमें जानेके अतिरिक्त और कोई नहीं है कि, जहां कर्म कल्मष युक्त जीव जाया करता हो।
सुलेमानके बाबमें ईश्वरी प्रेमकी झलक
१४-सुलेमानके गजलुलगजलातके (३) बाब (४) आयतमें लिखा है कि, अपने पलंगपर मैंने उसको दूँढ़ा जिसको कि, मेरा जी चाहता है मैंने उसको दूँढ़ा पर वह नहीं मिला। अब मैं उठूँगी और नगरकी गलियों तथा सड़कोंपर फिरूँगी उसको दूँढ़ूँगी जिसको मेरा जी चाहता है मैंने उसको दूँढ़ा पर वह न पाया। जो नाकेबन्दी नगरमें फिरते हैं मुझको मिले। क्या तुमने उसको देखा जिसको मेरा जी चाहता है। जब मैं दुःखी होकर उससे बढ़ गयी थी वह जिसको मेरा मन चाहता है मिला। मैंने उसको पकड़ रखा है उसे न छोड़ूँगी जब तक कि, मैं अपने माताके घर न लेजाऊँ।
तात्पर्य-उसको अपने पलंगपर मैंने दूँढ़ा जिसको मेरा जी चाहता है। अन्धकारमय रजनी अज्ञानकी निशामें अपने मनके पलंगपर दूँढ़ा पर वह नहीं पाया। क्योंकि, प्रकाश नहीं था। अब मैं नगरकी गलियोंमें फिरूँगी यह देह नगर
है, उसके भीतर बहुतेरी गलियाँ (हृदय आदि) हैं उन गलियोंमें फिर्लेंगी । सब गलियोंमें फिरी परन्तु मेरा प्यारा प्रेमी नहीं मिला । बावन जो नाकाबन्दी शब्द आया है उसका तात्पर्य इन्द्रियोंके देवतोंसे है शरीरके भीतर बहुतेरी मूर्तियाँ दिखाई देती हैं वे स्थान स्थानपर शरीरमें स्थित हैं । वे मुझको मिलीं । क्या तुमने उसको देखा जिसे मेरा जी चाहता है वे सब मेरे प्रेमीसे अनभिन्न थे । जब मैं उनसे दुःखी होके आंगे बढ़ी; अर्थात् इन्द्रियोंके देवताओंसे आगेको चली क्योंकि, सब देवता वासनासे भरे हुये हैं—जब तक वासनाका बन्धन है तब तक प्रेमी नहीं मिलता न उससे प्रेम होता है । यही बात कबीर साहिबने भी कहा है कि—
कबीर—जब लगि आशा देहकी, तब लग भगति न होय ।
आशा त्यागी हरि भजे, भगत कहावे सोय ॥
जब वो वासनाओंको छोड़कर आगे चली तब मेरा प्यार मिला, मैंने उसको पकड़ रखा है । उसको न छोड़ूँगी । जब तक कि मैं उसको अपनी माताके महलमें न लेजाऊँ ।
माताका गृह अपना महल गर्भ है अर्थात् जब तक यह मनुष्य माताके गर्भमें नहीं आता तबहीं तक प्यारीका सम्बन्ध रहता है अपने प्रेमीको कदापि नहीं छोड़ता, पकड़ रखता है । परन्तु जिस समय वह वीर्यमें प्रवेश कर माताके गर्भमें जाता है उस समय उसको अपने प्रेमीका तनिक भी ध्यान नहीं रहता । अचेतावस्थामें निर्जीव पदार्थके समान लटकता रहता है जब जब यह आवागमन करता है तब तब अपने प्यारको भूल जाता है जब ज्ञान होता है तो बुरी तरह छटपटाता है ।
१५ बादशाह बनूकदनजरका पशु होना—दानियाल नबीकी पुस्तकके चौथे बाबमें लिखा है कि, एक दिवस बनूकदनजर बादशाह बाबलने अपने मनमें ऐसा घमण्ड किया कि, मैंने इस राज्यको अपने बाहुबल द्वारा लिया है. इस बातसे उसपर खुदाका कोप भड़का, वह मनुष्यसे पशु हो बेलोंके समान घास चरता फिरता था । उसके नख पक्षियोंकी तरह बढ़ गये, उसकी सारी आदतें पशुओंकी उसके वह जीतेजीही पशु होगया । परन्तु उसपर खुदाई दया हुई कि. वह फिर अपने मनुष्यके स्वरूपमें आगया, अपने राजासन पर बैठकर राज्य करने लगा । यह जीवनमें आवागमन देखो, इस बनूकदनजर बादशाह बाबलका वृत्तान्त पढ़कर मनुष्यको आवागमनसे इनकार करना न चाहिये । जो केवल थोडासा घमण्ड करनेसे बेल होगया जो लोग भौतिभौतिकी बुराइयाँ करते हैं उनकी क्या दशा होगी ।
कर्मपर कबीर वचन
सच्चे झूठेका न्याय
१६-वायजकी किताब (२) बाब (१७) से २१ आयत तक यह लिखा हुआ है कि खुदा सच्चों तथा धूर्तोंका न्याय करेगा। क्योंकि, प्रत्येक अभिप्राय तथा प्रत्येक कार्यके लिये एक समय है। मैंने अपने मनमें कहा बनीआदमकी अवस्थाकी बात खुदा उनपर प्रगट करदे वे आपको पशुके सदृश जानने लगे, जो मनुष्य पर बीतता है वही पशुपर भी बीतता है, दोनों पर समान घटना संघटित होती है। जिस प्रकार यह मरता है वैसेही वह भी मरता है सबमें एकही स्वाँस है। मनुष्यमें पशुसे अधिकता नहीं है, क्योंकि, सब अनित्य हैं, सबके सब एकही स्थान पर जाते हैं सबके सब मिट्टीसे हैं, सबके सब मिट्टीमें मिलजाते हैं। मनुष्योंकी आत्माका ऊपर चढ़ना तथा पशुओंकी आत्माओंका नीचे उतरना कौन जानता है।
इसका तात्पर्य-खुदा सच्चोंका सुख तथा धूर्तोंका नियत समय पर दण्ड देगा। मनुष्यको जानना चाहिये कि, वे पशुके समान हैं। दोनोंमें एकही आत्मा और स्वाँस है। मनुष्यको पशुपर बड़ाई नहीं है। सब मरकर एकही जगह जाते हैं। इस कारण मिट्टी ही न समझना चाहिये। क्योंकि, मिट्टी ही केवल मिट्टीमें जाती है। आत्मा तथा स्वाँसादिक मिट्टीमें नहीं जाते। यहां मिट्टीसे तात्पर्य चौरासी लाख योनिसे है। क्योंकि, सर्वयोनि तथा सर्व शरीर मिट्टीसे बने हैं मिट्टी हैं, यहां मिट्टी नाम सर्व शरीरोंका है। अतः जीवके लिये एक शरीरसे दूसरेमें जाना आवश्यक है सब जीवोंके लिये यही नियुक्त गृह है कि, एक घर छोड़कर दूसरेमें जाया करे। सुकर्मों मनुष्य है, दुष्कर्मों पशु हैं। अच्छोंकी आत्मा स्वर्ग तथा बुरोंकी नरक में जाया करती है।
१७-दाऊदका पुनर्जन्म-पहले सलातनिके दूसरे बाब की पहली और दूसरे आयतमें लिखा है कि, दाऊद बादशाहके जब मृत्युके दिन निकट आये तब उसने अपने पुत्र सुलेमानको शिक्षा देकर कहा कि, मैं समस्त संसारका पथ जानता हूँ इस कारण तू दृढ़ हो अपने को मर्द दिखला।
फिर देखो इज्जीलमें आमालके दूसरे बाबकी २४ आयतमें लिखा है कि, दाऊद आकाशपर न गया और मौलवी अमादुद्दीन तालीम मुहम्मदी लिखितके (१३९) पृष्ठमें लिखा है कि, दाऊद पैगम्बरकी कब्रको अप्रतिष्ठापूर्वक खुदवा डाला।
हिरोदेश बादशाहने सुना था कि, पैगम्बरीकी लाश सड़ती नहीं। इसी परीक्षाके निमित्त उसने दाऊदकी लाश को ठीक नहीं पाया। उसने उसे सड़ती
हुई देखा था । इससे प्रमाणित हुआ कि, दाऊद न आकाश पर गया न पृथ्वीपर जीवित रहा और न कन्नमें रहा वह अवश्यही समस्त संसारके पथमें गया, उसका आवागमन हुआ ।
१८-मतीकी इञ्जीलमें आवागमन-मतीकी इञ्जीलका (१२) बाब (४६) से (४५) आयत तक उसमें लिखा है कि, जब अपवित्र आत्मा मनुष्यके शरीर से निकल जाती है । तब सूखे स्थानोंमें विश्राम दूँदती है, जब जगह नहीं पाती तब कहती है कि, मैं अपने घरमें जहाँ से निकली हूँ पुनः जाती हूँ । जाती है जब उसको देखती है कि, वह खाली और साफ है । तब वह सात आत्माओंको जो उससे अधम हैं अपने साथ ले आती है वे भीतर जाकर स्थिर हो जाती हैं । इस समय मनुष्यकी पिछली दशा अगली दशासे बुरी हो जाती है ।
अब इन आयतोंका तात्पर्य मैं अक्षर अक्षर लिखता हूँ । जब अपवित्र आत्मा मनुष्यके शरीरसे निकल जाती है तथा सूखे स्थानोंमें विश्राम दूँदती है । इसका तात्पर्य यह है कि, मृत्युके मूच्छाके पीछे इसलिये कि, आत्मा पवित्र होनेके कारण है । उसका स्थान तथा श्रेणी ऊँची है इस कारण यह ऊपरको चलती है, सूखे स्थानसे यह तात्पर्य है कि, जहाँ तरी तथा गीलापन कुछ न हो । आकाश इत्यादि की उँचाईमें जाकर अपने लिये विश्रामका स्थान दूँदती है । परन्तु वह तो विश्राम का स्थान नहीं । वह तो शून्य है । आत्माके निमित्त तो कोई अवश्यही शरीर चाहिये । शरीरके लिये कोई भूमि और भूमिके लिये बस्ती होनी चाहिये । बस्तीके लिये कुछ जल जिसमें जीवोंका भरणपोषण हो । बिना भोजनके किसी जीवकी स्थिति नहीं । ये एक दूसरेका भोजन होते हैं । समस्त स्वर्गों तथा वैकुण्ठोंमें बस्ती हैं । इस अपवित्र आत्माको तो वहाँ स्थान नहीं मिलता । न यह वहाँ जाही सकती है । इस कारण यह अपवित्र आत्मा सूखी जगहोंमें अपनी स्थिति दूँदती है । क्योंकि, अपवित्र आत्मा तो वैकुण्ठमें जा न सकेगी, सूखी जगहोंमें आनन्द नहीं मिलता ; जब शून्यमें स्थान नहीं मिलता तब कहती है कि, जहाँसे मैं निकली हूँ फिर वहाँ जाऊँगी । जब आती और उसको देखती है तब उस स्थानको स्वच्छ तथा साफ पाती है इससे यह तात्पर्य है कि, वह आत्मा जब अपने मृतदेहके निकट आती है तब देखती है कि, मेरा शरीर अब मेरे रहने योग्य नहीं, वह स्वच्छ तथा झाड़ा और खाली है, क्योंकि शरीरकी सहायक चौदह इन्द्रियाँ और उनके चौदह देवतें पाँच तत्व और तीन गुण कुछ न रहे, इन साथियों बिना इस शरीरमें मेरी स्थिति कैसे हो सकती है ? वह जो कल बनी थी वो बिगड़ गयी । वह घर उजड़ गया । केवल मिट्टीका एक स्थूल भाग रह गया है । उसको कोई गाड़ दे अथवा जलादे उसके
अधीन है। पाँच तत्व और तीन गुणके मेलसे यह शरीर प्रस्तुत होजाता है। विरुद्धता से मिट जाता है, मृत्युके पीछे अपवित्र आत्मा कई बार अपने शरीरके समीप आती है, उसमें बसनेकी इच्छा करती है, पर इस शरीरमें वासका कोई उपाय न देखकर निराश हो जाती है, पलटकर सात आत्मायें जो उससे भी बुरी होती हैं अपने साथ लाती है वे भीतर जाकर रहती हैं। तब मनुष्यकी पिछली अवस्था अगली अवस्थासे बुरी हो जाती है। वह सात आत्मायें जो इससे बुरी हैं वे ये हैं १—वायु। २—अग्नि। ३—जल। ४—पृथ्वी। ५—गुण। ६—सत्तोगुण। ७—तमोगुण। यह सात आत्मायें अपवित्र आत्माओं से भी बुरी हैं। क्योंकि, सातों आत्मायें वासनाकी कामनासे सिरसे पाँवतक भरी हैं। ये वासनाओंसे ऐसी भरी होती हैं, कि कभी कम नहीं होतीं। दिन प्रति दिन भरती ही रहती हैं। इन्हीं सातोंकी संगति और संयोगसे इस आत्माकी बुरी दशा है। ये ही सातों इस जीवको घेर घारकर आवागमनमें डालती हैं। इन्हीं सात निकृष्ट आत्माओंके सम्बन्धने सारे जीवोंको आवागमनके बन्धनमें डाल रखा है। जैसे कि, चोरके साथ साधु भी फँस जाता है इन्हीं सातके सम्बन्धसे आत्माकी निकृष्ट अवस्था हो रही है। इनकी कभी मुक्ति नहीं होती। इन्हीं सातों द्वारा समस्त रचनाएँ खड़ी हैं। जब तक इनका सङ्ग है तबतक जीवका यही ढङ्ग रहेगा। उनका उससे इसका कदापि छूटकारा नहीं हो सकता।
यह आत्मा अपने पूर्वकर्मोंके अनुसार इन्हीं सातोंको साथ लाती है। इन्हींके साथ मातृगर्भमें स्थिर होती है। वीर्यके साथ यह जीव अपनी प्रारब्ध सहित स्थिर होकर फिर गर्भका नियत समय सम्पूर्ण कर शरीरके साथ बहिर्गत होता है। तब जीवकी पिछली अवस्थासे अगली अवस्था बुरी होती है। क्योंकि, आत्मा जो पहिले कुत्सित तथा अपवित्र थी इस कारण उसकी पिछली अवस्था अगली अवस्थासे बुरी होती है। पहले वह मनुष्यके शरीरमें थी। मनुष्यका शरीर पाकर उसने जो कुकर्म किया तो अवश्य ही उसकी पिछली अवस्था अगली अवस्थासे बुरी होगी मानुषिक शरीरसे पृथक् गई और पशु आदिके शरीरमें उसका गमन हुआ। यह अपवित्र आत्मायें पशु तथा जड़ पदार्थ अथवा नरकमें जाती हैं। सहस्रों बार उनके आवागमनका सिलसिला चला जाता है। जिसने मनुष्यदेह पाकर अपनी मुक्तिका उपाय न किया वह बड़ा अभाग है।
१९—मती की इञ्जीलका २५ बाब १४ से ३० आयत पर्यन्त लिखा है और वहाँ कयामतका वृत्तान्त और तोड़ेका उदाहरण दिया है उसे यहाँ लिखते हैं—एक मालिकने यात्रा करनेके समय अपने एक भृत्यको पाँच तोड़े दिये, दूसरे को दो तोड़े तथा तीसरेको एक तोड़ा देकर चला गया। कुछ कालके पीछे उन नौक-
रोंका म लिक आया, उनसे हिसाब लेने लगा । जिसने पाँच तोड़े पाये थे वह उन तोड़ों सहित उपस्थित हुआ कहा कि, ऐ स्वामिन् ! मुझे आपने पाँच तोड़े दिये थे उससे मैंने पाँच और कमाये हैं । मालिकने कहा भले सेवक ! चिरजीवी हो, तू थोड़ेमें भला निकला, मैं तुझे बहुत बड़ा अधिकार दूंगा । वैसाही वह दो तोड़ेवाला भी चार तोड़े लेकर उपस्थित हुआ, मालिकने वही बात उससे भी कही तीसरा जिसको स्वामीने केवल एक तोड़ा दिया था वह वही एक तोड़ा लेकर उपस्थित हुआ कहा कि, हे स्वामिन् ! मैं आपको कठिन स्वभावका जानता था इस कारण यह तोड़ा पृथ्वीमें दबाकर रखवा था । मालिकने उस नौकरसे कहा कि, अये अयोग्य आलसी नौकर ! तूने कुछ नहीं कमाया । यदि तू मेरा तोड़ा सर्फीकों पास भी रखता तो मुझको उसका सूद मिलता, फिर उसका तोड़ा छीनकर जिसके पास दश तोड़े थे उसी को दे दिया, क्योंकि, जिसके पास कुछ है उसको और भी दिया जायगा उसकी बढ़ती होगी । जिसके पास कुछ नहीं उसके पास जो कुछ है वह भी ले लिया जायगा । उस निकम्मे नौकरको बाहर अँधेरेमें ड.ल दिया । वहाँ वह रोता और दाँत पीसता रहा ।
तात्पर्य—परमेश्वरका मनुष्यसे गुप्त रहना मानों यात्रा करना है । जिस समय मनुष्य गर्भमें उलटा लटका रहता है उससे प्रतिज्ञा करता है कि, हे परमेश्वर ! इस नरक यंत्रणासे मुझको बाहर निकाल, मैं तेरी भक्ति करूँगा । परमेश्वर दयालु होता है वह गर्भसे बाहर आता है । उस समय परमेश्वर उसकी दृष्टिसे अन्तर्धान हो जाता है । प्रत्येक मनुष्यको उसने पृथक् पृथक् बुद्धिका तोड़ा बाँट दिया है, किसीको पाँच भाग और किसीको एक भाग । इस प्रकार बुद्धिका तोड़ा अपने प्रत्येक भूत्योंको देकर यात्रा करने गया अर्थात् अन्तर्धान हो गया । जब यह मनुष्य गर्भसे बाहर निकल ज्ञानमान होकर भक्ति बन्दनामें संलग्न होता है, वह पाँच तोड़ेवाला अपने सुकार्य तथा भक्तिद्वारा परमेश्वरको प्रसन्न करता है । दो तोड़ेवाला भी अपने मालिकको राजी करता है पर एक तोड़ेवाला मूर्ख उसे रुष्ट करता है ।
जब मनुष्य मर जाता है पिण्ड प्रलय होता है तब सब मनुष्य परमेश्वरके सामने अपनी भलाई बुराईका हिसाब करानेको उपस्थित होते हैं, सबकी भलाई बुराईका हिसाब होता है । तब परमेश्वर सबका हिसाब लेकर सबको दण्ड पारितोषिकादि देता है । वह तोड़ा मानुसिक चोलाकी बुद्धि है । जिसने शुभ काम किया अपना कर्तव्य पालन किया वह भला भूत्य है, उसकी बुद्धि होगी, जिस किसीने मानुषिक शरीर पाकर मनुष्यत्वके धर्मका प्रतिपालन न किया
नौ कोष
उससे मनुष्यका शरीर छुड़ा लिया जावेगा। उस एक तोड़ेवालेका फल उस दश तोड़ेवालेको दिया जायगा और उसकी बढ़ती होगी। भले भूत्यको वह कमाईका बल अधिक दिया जायगा, जो सीमाबद्ध मानुषिक बलके बाहर है। सर्पिकाको तोड़ा देनेका तात्पर्य यह है कि, सर्पिका साधु तथा गुरु हैं। यदि वह गुरुओंके शरण जाता तो भी कुकर्मोंसे बचता। क्योंकि, शरणागति भी बहुत उच्चपद है व यथार्थ शरणागति होनेपर उससे अधिक परिश्रम न कराया जाता। वह निकम्मा नौकर जिसके पास कुछ नहीं है जो कुछ उसके पास होगा वह भी ले लिया जावेगा। इसका यह तात्पर्य है कि, उससे मनुष्यका शरीर ले लिया जावेगा। क्योंकि, उसके पास मानुषिक शरीर ही है जो विद्या तथा गुणका भण्डार है वह है वह भी छीन ली जावेगी।
जागृत अवस्था स्वप्नावस्था और सुषुप्ति यह तीनों अवस्था जीवके लिये हैं, तुरिया ईश्वरके निमित्त है, जो ये चारों अवस्था नियत हुई हैं, उनमेंसे प्रथम जागृतावस्था तो मनुष्यके लिये है। क्योंकि, यह मनुष्य जाग्रितावस्थामें स्थित है। यह जाग्रितावस्था बुद्धिकी अवस्था है, इसीमें भलाई तथा बुराईका हिसाब है। जाग्रितकी अवस्थासेही मनुष्य तुरियावस्थाको प्राप्त करके ईश्वर पदको प्राप्त कर सकता है स्वप्नकी अवस्था पशुओंके लिये है। क्योंकि, सब पशु अनजान तथा निर्बुद्धिताकी अवस्थामें हैं यदि कोई दोष करें तो उनके पापकी कोई गणनाही नहीं की जासकती। इसी प्रकार सभी पशु अचेत निद्राकी अवस्थामें हैं, उनके पापोंका कोई हिसाब नहीं किया जाता। जड़ पदार्थ तो सुषुप्तिकी ही अवस्थामें हैं। जो कोई जाग्रत्वस्थामें आकर सुकार्थ न करे तो वह निश्चय स्वप्न तथा सुषुप्ति अवस्थामें डाल दिया जावेगा। जो कोई नङ्गाही मनुष्य शरीरके अतिरिक्त और कुछ न रखता हो उससे क्या लिया जावेगा। निस्संदेह उससे मनुष्यका चोला ही छीन लिया जावेगा। क्योंकि, उसके पास केवल मनुष्यकी देह मात्रही रह गई है, दूसरा कुछ नहीं। इसके अतिरिक्त उससे कुछ लिया नहीं जासकता न कोई अन्य वस्तु उसके पासही है।
वह बाहर अन्धकारमें डाला जायगा। बाहरके अन्धकारसे यह तात्पर्य है कि, जो देह बुद्धि तथा ज्ञानके बाहर है, वो देह अज्ञानी पशु तथा जड़ पदार्थोंकी है, जब जीव मनुष्यकी देहसे अलग होता है तब अन्धकारमें पड़ता है। जप, तप, ज्ञान, करने अथवा सीखने योग्य नहीं रहता। क्योंकि इस निकम्मे नौकरने मनुष्यका चोला पाकर कुछ कमाई न की न तोड़ा सर्पियों (गुरु) को दिया।
इससे मानुषिक शरीरको छोड़कर पशुओंमें परिभ्रमण किया करता है । वहाँ रोना तथा दांत पीसना होता है । क्योंकि, पशुकी देहसे किसीकी मुक्ति नहीं हो सकती । अन्तमें नरकमें प्रवेश करता है जहाँ रोना तथा दांत पीसनेके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं रह जाता ।
२०—योहन्नाकी इंजीलमें आवागमन—योहन्ना की इञ्जीलका (१०) बाब (८) आयत देखो । सब जितने मुझसे आगे आये वे सब चोर और बटमार हैं । पर भेड़ोंने उनकी नहीं सुनी । द्वार मैं हूँ यदि कोई मनुष्य मुझसे प्रवेश करे तो मुक्ति पावेगा । भीतर बाहर आवे जावेगा और चरनेकी जगह पावेगा । अर्थात् हजरत मसीह फरमाते हैं कि, जितने मुझसे आगे आये हैं वे सब चोर तथा बटमार थे, मनुष्योंको भटकानेवाले थे । मैं द्वार हूँ यदि कोई मुझसे प्रवेश करेगा तो वह मुक्ति पावेगा भीतर बाहर आवे जावेगा । द्वार मैं हूँ इससे यह तात्पर्य है कि, मुझे बिना किसीको मार्ग न मिलेगा । क्योंकि, समस्त कार्योंका उत्तर दाता मैं ही हूँ । इसी कारण मसीह सारे नबियोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं । यहाँ मुक्तिके अर्थ एक शरीरके कर्मोंसे छूट जानेका है, एक देहके कर्मोंसे छूटा और दूसरा देहके कर्मोंमें लबक रहा । भीतर बाहर जानेसे तात्पर्य तना सुखसे है । अर्थ यह कि, जीव पिता होकर भीतर जाता है और पुत्र होकर बाहर निकलता है । जब एक शरीरको छोड़ता है तब दूसरा शरीर अपने लिये बनाता है और सदैव आवागमन किया करता है । चरनेकी जगह पानेसे यह तात्पर्य है कि, चरनेका स्थान चौपायोंके निमित्त है । मनुष्यके निमित्त नहीं । जिसके आवागमनका सम्बन्ध टूट गया वही मनुष्य है । शेषके समस्त पूर्ण पशु हैं, यद्यपि मनुष्यके स्वरूपमें दिखाई देते हैं । जितने लोग मुक्तिके निमित्त उद्योग नहीं करते न मुक्तिकी सुधि रखते हैं वो सब पूरे पशु हैं ।
२१—कयामतसे भी पहिले आवागमन—लूकाकी इञ्जीलका (१६) बाब (१९ से ३१) आयत पर्यन्त यह है कि, लाजर नामक एक दरिद्री था । उसके समस्त शरीरमें घाव थे वह बिचारा विवश होकर एक धनाढ्यके द्वारपर पड़ा रहता था, कुत्ते उसके घावोंको चाटा करते थे । अमीरके नौकर उस अमीरके रसोईसे जो जूठा चूर चार गिरता था उन सबको इकठठा करके उस लाजरके सामने रखते । लाजर वही जूठा तथा चूरचार खाकर जीता था, अन्तमें लाजर मर गया, जब वयस समाप्त हुआ तब वह अमीर भी मर गया । लाजर तो मरकर बँकुण्ठको एवं वह अमीर नरकको गया । उसने जो नरकमेंसे दृष्टि उठाकर देखा तो लाजरको बँकुण्ठमें इबराहीमके गोदमें बैठे पाया । उसको देखकर
नौ कोषोंका विवरण
ईर्षा हो आई नरकसे उस अमीरने पुकारकर कहा कि, ऐ मेरे पिता! ऐ मेरे पिता !! ऐ इबराहीम !!! तू कृपा करके लाजरको मेरे समीप भेज दे । क्योंकि, मैं नरककी अग्निसे जल रहा हूँ, यदि लाजर मेरे समीप आवे मेरे मुंहमें उंगली दे तो मेरे शरीरकी जलन कम हो जाय । यह बात सुनकर इबराहीमने उत्तर दिया कि, ऐ पुत्र ! तूने संसारमें बड़े बड़े सुख भोगे हैं, लाजरने केवल दुःखही दुःख उठाया है । अब इसकी पारी सुखभोगने तथा तेरी दुःख उठाने की है उस नरकके अमीरने कहा कि, ऐ पिता ! लाजरको संसारमें भेज दे कि, वह जाकर मेरे भाइयोंको समाचार दे कि मैं तो नरकमें आ पड़ा, अब वे लोग किसी तरहका पाप न करें, पुण्यमें चित्त लगावें, ऐसा न हो कि, उनको भी नरकमें आना पड़े । वह बात सुनकर इबराहीमने उत्तर दिया कि, मूसा वहाँ उपस्थित है, यदि लोग उसकी बातें मानेंगे तो वे नरकमें न पड़ेंगे । उस नरकमेंके रईसने कहा कि, यदि मुरदोंमें से कोई जीवित होकर जावे संसारमें समाचार दे तो वे लोग कदापि दुष्कर्म न करेंगे, पर मूसाकी बातका उनको विश्वास न होगा । इस कारण लाजरको भेजना आवश्यक है । तब इबराहीमने उत्तर दिया कि, यदि उनको मूसाकी बातोंका विश्वास न होगा तो वे लाजरकी बातें भी नहीं मानेंगे ।
अब इस लाजरकी कहानीसे नरक तथा वैकुण्ठका जाना क्यामतके पहिलेसे प्रचलित होना प्रमाणित हो चुका । फिर महाप्रलयमें भलों और बुरोंके हिंसाबकी क्या आवश्यकता । केवल भ्रम तथा धोखा है । जिस समय कोई मरता है उसके लिये वैकुण्ठ, नरक तथा अन्यलोक उसी समय मिलते हैं, दूसरी क्यामत और हशरगाहके समयकी कोई आवश्यकता नहीं जब भलाई बुराईका हिंसाब हुआ तब आवागमन स्वतः ही सिद्ध होगया ।
२२-आवागमनपर कुरान-कुरानमें सुरतआराफ (८) सिपारा (४) रकूअ (२९) आयतमें लिखा है कि, तू कह मेरे रबने फरमाई दीनदारी और सीधे करो अपना मुंह हर एक नामजके समय केवल उसीके आज्ञाकारी होकर उसको पुकारो । जैसा तुमको पहली बेर बनाया फेर बनोगे ।
२३-कुरान सूरत नखल (१४) सिपारा (८) रकूअ (६५) आयतमें लिखा है कि, और अल्लाःने उतारा आकाशसे जल, फिर उससे जिलाया पृथ्वीको इससे मरने पीछे उसमें देते हैं उन लोगोंका जो मुनते हैं ।
अब इस आयतसे पृथ्वीका दूसरी बार पुनः जलसे प्रगट होना स्पष्ट होता है । उसमें पते हैं उनको जो मुनते हैं इससे तात्पर्य उन मनुष्योंसे है जिनका हृदय प्रकाशित है कि, पृथ्वीके पूर्व तथा वर्तमान अवस्थाओंसे विज्ञ हैं ।
आयु
२४—कुरानमें सूरै रुम (२१) सिपारा (२) रकूअ (११) आयतमें लिखा है कि, अलबत्तः बनता है प्रथम बार फिर उसको दोहरावेगा फिर उसके ओर फिर जाओगे ।
२५—कुरानमें देखो सुरै रूप (२१) सिपारा (२) रकूअ (११) आयत में लिखा हुआ है कि, निकलता है जीता मुरदेसे, निकलता है मुरदा जीतेसे, जिलाता है पृथ्वीको उसके मरे पीछे । इसी प्रकार तुम निकाले जाओगे ।
२६—कुरान सूरै रुम (२१) सिपारा (३) रकूअ (२७) आयतमें लिखा है कि, वही है जो प्रथम बार बनाता है । फिर उसको दोहरावेगा, आसान है उस पर उसकी कहावत, सबसे ऊपर आकाशमें और पृथ्वीमें वही है जबर-दस्त हिकमत वाला ।
२७—रोजतुलअहबाबमें लिखा है कि—
أَوَّلُ مَا خَلَقَ اللَّهُ نُوْرُ مُحَمَّدٍ
प्रथम खुदाने नूरमुहम्बदको पैदा किया दूसरी हदीसमें है कि—
أَوَّلُ مَا خَلَقَ اللَّهُ الْقَلَمَ
अर्थात् पहले खुदाने कलमको बनाया जिसमें लोगोंके भाग्यको लिखा तीसरे हदीसमें है कि—
أَوَّلُ مَا خَلَقَ اللَّهُ النَّقْلَ
अर्थात् सबसे पहले खुदाने बुद्धिको उत्पन्न किया जिसमें सोच समझ भाग्यको ठहरावें ।
इन तीनों हदीसोंसे तीन बातें प्रमाणित हुई हैं । इनमें से यदि एक सत्य मानोगे तो दूसरी मिथ्या ठहर जाती है । यदि तीनोंको सत्य मानोगे तो तीन बार उत्पत्तिका होना प्रमाणित होता है । जिससे अनगिनती बेर भी कहा जा सकता है क्योंकि, किसी सृष्टिमें मुहम्मदी तेज पहले उत्पन्न हुआ, किसीमें बुद्धि और किसीमें लेखनी पहिले उत्पन्न हुई ।
२८—आत्माका मोर और फल होनेके बाद बीबी एमनाके गर्भमें जाना—मुहम्मद साहबके नूरनामः में लिखा है कि, खुदाने मुहम्मद साहबकी आत्माको मयूरके स्वरूपमें बनाकर विश्वासके वृक्षपर बैठे दिया । पहले तो मुहम्मदके
तेजने मोरके देहमें प्रवेश किया, फिर उस आत्माने एक फलमें गमन किया, वह फल जिबराईल द्वारा अब्दुल्लाके समीप पहुँचा। वह फल अब्दुल्लाके वीर्यके मार्गसे बीबी एमनाके गर्भमें पहुँचा बीबी एमनाके गर्भसे आहजरत (मुहम्मद) पैदा हुये।
गुलजार मुहम्मद तथा हदीसोंमें यह कहानी लिखी है कि, एकबार खुदाने जिबराईलसे कहा कि, एक फल ला, तब जिबराईलने पूछा कि, ऐ खुदा! कौनसा फल लाऊँ। कुछ उत्तर नहीं मिला। फिर तीसरी बार आवाज आई कि, ऐ जिबराईल! एक फलला, फिर जिबराईलने कहा कौन फल लाऊँ। इतनेमें एक ऐसी आँधी आई कि, जिबराईल उड़ गया। न जाने वह किस देशमें जा पहुँचा। एक बगीचेके द्वार पर जा खड़ा हुआ। जब जिबराईलने अपनेको इस बगीचेके द्वारपर खड़ा पाया तब बगीचेके द्वारपालसे प्रार्थना की कि, मुझे बगीचेके भीतर जाने दे। बगीचेके द्वारपालने पूछा कि, तू कौन है? उसने उत्तर दिया मैं जिबराईल हूँ। द्वारपालने कहा कि, सहस्रों जिबराईल हैं उनमेंतू कौन है। जिबर ईलने अपना पता बताया कि, मैं वह जिबराईल हूँ जो खुदाके समीप खड़ा रहता है। उस द्वारपालने बगीचेके भीतर जाने दिया। जब जिबराईल बगीचेके भीतर गया तब क्या देखता है कि, सहस्रों प्रकारके फल लटक रहे हैं वह बगीचा भली-भाँति हरा भरा हो रहा है। सब फल तथा मेवे जो वहाँ हैं सो सब खुदाकी वन्द-नामें संलग्न हैं, खुदाका नाम ले रहे हैं। सब फलोंमें एक फल सबका सरदार तथा गुरु जान पड़ता था। उसी श्रेष्ठ फलके आदेशसे सब फल खुदाका नाम लेते हुए वन्दनामें संलग्न थे। जब जिबराईलने यह कौतुक देखा तब अपने मनमें ऐसा विचार किया कि, यह फल जो सब फलोंमें बड़ा है उसीको तोड़कर ले चलूँ। उस फलको तोड़कर ले आकाशपर उड़ गया उड़ते हुये राहमें वह फल उसके हाथसे गिर गया अरबके मक्का नामक नगरमें जा पड़ा बड़े तड़के अब्दुल्ला नामक एक मनुष्य सड़क परसे चला जाता था, उसने उस फलको देखा, उठाकर अपनी जेबमें रख लिया जेबमेंसे वह फल अब्दुल्लाके शरीरमें समा गया अथवा उसने खा लिया। उस समय उसका शरीर तथा चेहरा कान्तिसे दमकने लगा अब्दुल्लाके वीर्य द्वारा बीबी एमनाके गर्भमें मुहम्मदी तेज आया, बीबी एमनाका शरीर तेजमय होगया, कान्तिसे जगमगाने लगा। नियत समयपर मुहम्मद साहिबने जन्म लेलिया।
अब उधरका वृत्तान्त सुनो कि, जिस समय वह फल जिबराईलके हाथसे छूटकर गिरा खाली हाथ जिबराईल खुदाके निकट गया निवेदन करने लगा कि,
१८ अध्याय । पुनर्जन्म
ऐ खुदा ! मैं अमुक स्वरूपका एक फल लाता था । वो फल मेरे हाथसे छूटकर गिर पड़ा । तब खुदाकी ओरसे आवाज आई कि, ऐ जिबराईल ! मत घबरा, क्योंकि, वह फल जहाँ पहुँचने को था पहुँच गया, तेरा काम हो चुका । वे सब फल जो उस बागमें थे वे तो मुहम्मदके पीछा करनेवाले हैं सबसे श्रेष्ठ फल स्वयम् मुहम्मद साहब रसूल अल्लाह हैं ।
पहले मुहम्मदसाहबकी आत्मा मयूर पक्षीके शरीरमें गयी, फिर उस फलमें, इसके उपरान्त बीबी एमनाके गर्भमें । यह तीनों बेरका आवागमन प्रत्यक्ष हदीसोंमें लिखा है इनके अतिरिक्त जो अनगिनती बेर उनकी आत्माने किन किनके बीचके समय समयपर आवागमन किया है उसका हाल परमात्मा जाने ।
२९—शैतानका आवागमन—तफसीर अजीजी इत्यादिसे प्रगट है कि, जिस समय खुदाने आदमको अदनकी वाटिकामें रखा था उस समय जिबराईलको ऐसी आज्ञा दी थी कि, आदमका पेट फाड़ डाले आधा रक्त तथा शैतानी हृदय पृथक करे । जिबराईलने ऐसाही किया । आधा शैतानी रक्त और आधा हृदय आदमके पेटसे पृथक किया, आधा उसके भीतर रहने दिया । जब वह आधा रक्त तथा कलेजा आदमके पेटसे निकालकर अदनकी वाटिकाके एक कोनेमें गाड़ दिया । उसी शैतानी रक्त तथा हृदयसे गेहूँका वृक्ष उत्पन्न हुआ । उसीके फल खानेके लिये खुदाने वर्ज्य था । वह आधा शैतानी रक्त तथा हृदय आदमके भीतर रह गया था । जिससे शैतानी धूर्त और अत्याचारिणी सृष्टि उत्पन्न हुई । वह दूसरा आधा जो स्वच्छ हुआ था उससे अच्छे लोग उत्पन्न हुये । इससे प्रमाणित हुआ कि पहले शैतान आदमके भीतर था, इसके उपरान्त रक्त तथा हृदयके साथ गेहूँमें प्रवेश कर गया । जब आदमने उस गेहूँके दानेको खाया—तब शैतानने आदमकी बुद्धि विलुप्त कर दी, विजयी हुआ आज़ोल्ले—घनके पहले शैतान बाहरी स्वरूप धरकर धोका देता था फिर भीतर तथा बाहर ये आदम तथा आदमजादको धोका देने लगा वे सब शैतानके वशीभूत हुये ।
३०—समीक्षा—पूर्व लिखित प्रमाणके अनुसार खुदाने सबसे पहले मुहम्मदके तेजको उत्पन्न किया, एक विश्वासका वृक्ष भी उत्पन्न किया । उसके ऊपर मुहम्मदकी आत्माको मयूरके स्वरूपका बनाकर बैठा दिया, वह उस वृक्षपर बैठकर सत्तर सहस्र वर्ष पर्यन्त तपस्या करता रहा, पहले तो यही असम्भव है कि, पवित्रात्मा खुदाकी वन्दना करे क्योंकि, उसे प्रार्थना की आवश्यकताही नहीं होती, खुदावन्दना तथा आशिक और माशूक, केवल अपवित्र आत्माओंमें हैं । जब आत्मा अपने पूर्वकम्मासे अपवित्र होती है तब उसे प्रार्थनाकी
हजरत आदम
आवश्यकता होती है। जब कर्मका पाश होती है तब देहके साथ सब काम और बन्दना किया करती है। बिना देहके आत्मा कुछ कर नहीं सकती। दूसरे यह लिखा हुआ है कि, मुहम्मदकी आत्माको फानूसमें रक्खा। यह बात भी असम्भव है कि, पवित्रात्मा फानूसमें कैंद रहे, आत्मा कदापि कैंद नहीं हो सकती। यह कदापि सम्भव नहीं कि, पवित्रात्मा एक नियमित समय तक अधीन और बन्धनमें पड़ी रहकर बन्दना किया करे। आत्मा सदैव स्वतंत्र और स्वाधीन है इसको केवल इसके कर्मोंकी अपवित्रताही बन्धनमें डालती है। तीसरे यह लिखा है कि, मुहम्मदके चारों ओर सब आत्मायें फेरा दिया करती थीं। तीसरी यह कि, सब रूहें रसूल खुदाकीरूहके चारों ओर सत्तर सहस्र वर्ष पर्यन्त फिरा करती थीं। कोई आवश्यक नहीं कि, अन्यान्य आत्मायें मुहम्मदकी आत्माके चारों ओर घूमें। क्योंकि, उत्पत्तिके आरम्भमें किसी आत्मामें उँचाई निचाई नहीं होती। सब समान रूपकी पवित्र तथा स्वच्छ होती हैं। चौथे यह लिखा है कि, उत्पत्तिके पहले समस्त आत्माओंने मुहम्मदकी ओर देखा। मुहम्मदकी आत्माके अङ्गकी ओर सभीोंने जब देखा तब जिसकी दृष्टि जिस अङ्गपर पड़ी उसका स्वरूप तथा स्वभाव वैसा ही हो गया। देखो ग्रन्थ कबीर भानुप्रकाशमें मैं पहले लिख चुका हूँ।
यह बातभी बेजड़ जान पड़ती है। क्योंकि, आत्माके तो कोई अङ्ग नहीं। फिर आत्मायें देखेंगे क्या? पाँचवें लिखा है कि, उत्पत्तिसे पचास सहस्र वर्ष पूर्व सब आत्माओंका भाग्य स्थिर हुआ। मुहम्मद साहबकी आत्माकी ओर देखनेसे वे कैसे भले बुरे हो सकते हैं? उनका भाग्य तो पहले ही स्थिर हो चुका है, मुहम्मदकी आत्माकी ओर देखनेसे कोई लाभ तथा हानि नहीं है। छठवेंमें लिखा है कि, मुहम्मदकी आत्मा दश भागोंपर विभक्त हुई। जिससे पृथ्वी तथा आकाशादि सब कुछ बनाया गया। यह बात भी बुद्धिमें नहीं बैठती कि, पवित्र आत्माके भाग हो सके। पवित्रात्मा बांटी नहीं जाती, उसको कोई विभक्त नहीं कर सकता। खुदा अथवा बन्दा किसीमें सामर्थ्य नहीं कि, उसको बाँटे। इस आत्मामें लम्बाई चौड़ाई गहाराई इत्यादि कुछ नहीं यह भेदी भी नहीं जा सकती। इस कारण इन प्रमाणों द्वारा यह बात भलीप्रकार सिद्ध हो चुकी कि जिसे मुसलमान मुहम्मदी तेज कहते हैं वह कर्मोंसे शुद्ध नहीं था। पूर्वजन्मके कर्म तथा भलाई बुराईसे भरा हुआ था। वह मुहम्मदी तेज सूक्ष्म शरीर था। क्योंकि, दो प्रकारके शरीर हैं। एक स्थूलशरीर तथा दूसरा सूक्ष्म शरीर है। इसीको आधिभौतिक और अन्तर्वाहक देह भी कहते हैं। यह स्थूल और लिंगदेह
दोनों कर्मोंके बन्धन हैं, उनका सदैव आवागमन हुआ करता है। आधिभौतिकसे अन्तर्वाहक और अन्तर्वाहकसे अधिभौतिक हुआ करता है। इसी प्रकार इसका सदैव आवागमन हुआ करता है। इसस अब स्पष्ट प्रमाणित हो चुका कि जिसको मुहम्मदी पवित्रात्मा समझते हैं वह अपने पूर्वजन्मोंके कर्मोंसे अशुद्ध लिंग देही थी, अनगिनती जन्मोंके कर्मोंमें बराबर बँधी चली आती थी। कर्मका बन्धन देहके बिना नहीं हो सकता। कितने जन्म पूर्वसे मुहम्मदकी आत्मा आवागमन करती चली आती है एवं भविष्यको भी करेगी इसको भ्रम तथा भूलसे मनुष्य पवित्रात्मा समझते हैं।
३१-भाग्यानुसारी वस्तु-मुहम्मद साहबने अपनी उम्मतको यह सिखलाया कि, खुदाने सबके भाग्यको पृथ्वी और आकाशकी उत्पत्तिसे पचास सहस्र वर्ष पूर्वसे ही स्थापित किया है। यह वृत्तान्त मशकात बाबुलतकदीर अबदुल्लाह, इब्र मुसल्लमकी हदीस और उनके विश्वासमें यों लिखा है :—
وَالْقَدَرُ بِأَخْلَدٍ حَتَّى مِنْ اللَّهِ تَقَالِي
अर्थात् भलाई तथा बुराई भाग्यमें खुदाकी ओरसे होती है। इसी बातम मुसल्लमसे यह हदीस है।
قَالَ كُتِبَ عَلَى الْإِنْسِ أَدَمُ نَصِيبُهُ مِنَ الزَّانِ مَدَّةُ الْأَحَالَةِ
अर्थात् लिखा गया है खुदाकी ओरसे मनुष्यका भाग। व्यभिचारमें सो वह अवश्यही करेगा। फिर इसी बाबमें अबीदरबाका कथन है :—
اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ دَرَجَةٌ إِلَى كُلِّ عَبْدٍ مِنْ خَلْقِهِ مِنْ حُسْنِهِ مِنْ الْجَلِيلِ وَعِلْمِهِ وَمَجْدِهِ وَآثَارِهِ وَرِزْقِهِ
अर्थात् वन्दाके विषयमें पाँच बातोंमें खुदा निश्चित हो चुका है। मृत्यु, कर्म, स्थिति, फिरनेका स्थान, रोजी। इस विश्वासको हृदयस्थ करनेके निमित्त इतना आग्रह है कि, तकदीरसे विमुखता करनेवालोंसे मुसलमानका व्यवहार रखना भी अनुचित है। इसी विषयमें इब्रउम्रका कथन है। फरमाया हजरतने कि, तकदीरको न माननेवाले लोग मेरी उमतके मजूसी (एक फिरका) लोग हैं यदि वे रोगी हों तो उनका हाल भी न पूछो यदि वे मर जाय तो उनके शवके साथ भी मत जाओ।
हजरत नूह
तफसीर काबानीमें आया है कि, खुदा प्रतिदिवस तीन सौ साठ बार लौह महफूज पर दृष्टि करता है। जो चाहता है वह मिटा डालता है जो चाहता है बना देता है।
तफसीर हुसेनीमें लिखा है कि, जिस समय कुछ रात शेष रह जाती है तब खुदा लौह महफूज पर दृष्टि डालकर जो चाहता है वही बना देता है।
अबदुल्ला बिन अब्बास भी कहता है कि, खुदाने जो मुकद्दर किया है उसमें कदापि बदल बदल नहीं हो सकती। परन्तु रिजक, भौनस, सआदत और शकावतमें।
फखरुद्दीनने तफसीर कबीरमें लिखा है कि, आयत महो और असबातमें दो कौल हैं। प्रथम तो यह कि, महो और असबात दो वस्तुओंमें संयुक्त हैं। जैसे खुदाताला महो करता है रोजी और ज्यादा करता है। रोजी अजल, सआदत, शकावत, कुफ्र और ईमानकी भी यही दशा है। दूसरी यह कि, खुदा बन्दोंका हिसाब लिखता है। अतः जिस समय बन्दाने तोबा की तो वह तुरन्त ही उसका दोष मिटा देता है। जब वह दान देता है तुरन्त ही उसका कष्ट निवारण कर देता है।
समीक्षा—अब यहाँ विचार करना चाहिये कि, ऊपर लिखी पाँच बातोंपर समस्त व्यवहार परमार्थका आधार है। इन पाँच बातोंसे खुदाका कोई सम्बन्ध नहीं है। फिर किन बातोंसे उसका सम्बन्ध रखना समझा जावे, पाँचों बातें हमारे मायानुसार हैं फिर खुदा कौन है और हमसे क्या सम्बन्ध रखता है। किस बातमें हमारी सहायता कर सकता है? यह नहीं मालूम कि, मुहम्मदी भाग्यको क्या समझते हैं। आपहीतो खुदाको हमारे कार्योंसे अलग और बेत-अलुक बताते हैं आपही कहते हैं कि, खुदाने उत्पत्तिसे पचास सहस्र वर्ष पूर्व सबका भाग्य ठहरा दिया है। यह कैसे भ्रम तथा भूलकी बात है। फिर ऐसे अन्यायी खुदाकी बन्दना कौन करे। जब खुदाने पूर्वसे मनुष्यका भाग्य लिख रक्खा तो फिर अलग अलग कैसे ठहरा। किसीको भला तथा किसीको बुरा किस कारण बनाया यह अन्याय, क्यों किया। मुसलमान बेसमझीके धोखेमें पड़े हैं। यदि वे पूर्व देहसे उस देहमें आवागमन भी स्वीकार करें तो वस्तुतः उनकी बातें ठीक ठहरतीं।
३२—कयामतके दिनकी तीनबातें—कयामतके दिनके विषयके बाबमें तीन बातें लिखी हैं। प्रथम कहा है कि, कयामत (महाप्रलय) का एक दिन
पचास सहस्र वर्षके समान होगा । दूसरे स्थानमें लिखा है कि, एक सहस्र वर्षका होगा । फिर तीसरे स्थानमें लिखा है कि, पल झपकते कयामत (महाप्रलय) बीत जावेगी । यह तीनों बातें स्वीकार की नहीं जा सकतीं । जबतक तीन बार उत्पत्तिका होना स्वीकार किया न जावे । इसका तात्पर्य तो यह है कि, कयामत (महाप्रलय) का दिवस तो अवश्य ही पलके पलमें बीत जावेगा । कभी तो कयामत (महाप्रलय) के पीछे पचास सहस्र वर्षके उपरान्त संसारकी उत्पत्ति होती है और कभी सहस्र वर्ष पीछे । कभी कयामत (महाप्रलय) के उपरान्त उसी समय तनिक भी विलम्ब नहीं लगता । नवीन सृष्टि प्रगट होती है । अनेक कालतक शून्य रह जाता है । यही बात स्वीकार किये जाने योग्य है । इसी प्रकार बारम्बार उत्पत्ति स्थिति तथा विनाश हुआ करता है । सब जीवोंका आवागमन लगातार चलता रहता है ।
३३—सालिग्राम पूजनेकी प्रतिज्ञा—तफसील मदारकमें लिखा है कि, मीसाकका अर्थ प्रतिज्ञा है । खुदाने आदमको उत्पन्न करके बैकुण्ठमें प्रविष्ट होनेको पहिले बैकुण्ठके द्वारके सामने यह प्रतिज्ञा कराई थी । पर मुबारजुलन-बौवतमें लिखा है कि, भिहिश्तसे निकालनेके समय यह प्रतिज्ञा कराई गई थी । मदारकके अनुसार कदाचित् यह प्रतिज्ञा नाअमानमें ली गयी थी जो उरफातके निकट मक्कामें है, अथवा स्थान नेहारमें लीगई थी जो भारतवर्षमें कोई स्थान है । मआलमबकौलकलबी मक्का और तायफमें यह प्रतिज्ञा ली गई थी । उस प्रतिज्ञाका स्वरूप यह है कि, जब आदम मक्कामें हूज्ज करने गया तब उरफान पर्वतके पीछे मानमें सो गया । खुदाने अपनी कुदरतका हाथ उसकी पीठपर लगाया । आदमके समयसे महाप्रलय तक जो मनुष्य उत्पन्न हुये होते और होंगे चिउंटीके स्वरूपमें सृष्टि कर्मानुसार सब तुरंत बाहर निकल पड़े । उसी समय वे सब युवक बुद्धिमान हो गये । जब वे सब तरुणावस्थाकी पहुँचे उस समय खुदाने पूछा कि, क्या मैं तुम्हारा पालक नहीं हूँ ? वे बोले, कि, तू हमारा पालक है । अतः प्रतिज्ञा यही थी कि, तू हमारा खुदा और हम तेरे सेवक हैं । सभीोंने यह बात स्वीकार करली । खुदाने यह प्रतिज्ञा आदमजादसे ली । उस काले पत्थरको जो काबा घरमें है उनके हाथमें दिया । उस पत्थरको उनके हाथमें सौंपके फिर सभीसे कहा कि, अब तुम मुझको दण्डवत् करो । काले पत्थरको हाथ लगाओ । पर बहुतोंने दण्डवत् किया, बहुतोंने नहीं किया, यह पहली दण्डवत् हुई । दूसरी दण्डवत्में कितनोंने जो नहीं किया था पछताकर दूसरी दण्डवत् की, उनमेंसे कितनोंने : १ पहले किया दूसरोंने नहीं किया । इस कारण चार