कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
५९
जीवधर्मबोध
( १९६७ )
शरणागतको धर्म यह तन मन करिये भेट ।
गुप्त प्रकट सब आपिये पुनि यम गहे न फेट ॥
फेट गहे तब कौन सकल तेरौ नहिं मेरो ।
बाहर भीतर पौर ठौर सब तेरौ डेरो ॥
तेरौ डेरो भयो वस्तु तामें सब तेरी ।
तूही तहैं रखवाल छुटी सब संशय मेरी ॥
चौपाई
अब कलिमें आयू नर थोरी । को चित योग युक्तिमें जोरी ॥
पुण्यदान कह ध्यान अगाधू । कर्मविहीन गृही अरु साधू ॥
ताते शरनागत सुखदाई । और यतन कलिमें नहिं पाई ॥
कलिके जीव अनन्त अपारा । शरण कबीर होय भवपारा ॥
मूर्ख पुरोहित जस बिन ज्ञाना । ताको दान देत यजमाना ॥
दृढ़ है सतगुरु शरण गहीजै । सकल भर्मभय ताते छीजै ॥
सत्यकबीर बचन-शब्द
बिरिजमें महारि न खेले सिकार ।
चारपांच दश बीश महाभट संग लीने तीनो भरतार ।
मीनरूप है रहै जगतमें डारि बहावै तिरगुन जार ॥
जलरूपी है रहै संत कोई गहि पकरे गुरुचरण करार ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो यहि ते रहियौ सदा होशियार ॥
इति शरण
अथ सतसंग कुसंगका वर्णन-चौपाई
सर्व शास्त्रको यामें एका । बिनसतसंग न उपजे विवेका ॥
बिनविवेक नहिं उज्जल करनी । जाते मुक्तिपन्थ पग धरनी ॥
सतसंगतकी महिमा भारी । लिखते शेष शारदा हारी ॥
वेद कतेब पार नहिं पावैं । संतनको नित गुन गन गावैं ॥
( १९६८ )
बोधसागर
६०
विधिहरि हर नितजाको ध्यावै । संतको भेद सोऊ नहि पावै ॥
सतसंगत सब सुखकी खानी । सर्वलाभ ताहीते जानी ॥
जो तप कीजै वर्ष हजारन । छनसतसंगत कष्ट नेवारन ॥
सत्यस्वरूपी ईश्वर कहिये । ताके भक्तन संगत गहिये ॥
तासु नाम सतसंग कहावै । सो संगतगहि जिव तरिजावै ॥
साधुनकी सेवा मन लावै । तब सतसंगतको नर पावै ॥
सतसंगत कह विविधि प्रकारा । तामें द्वैविधि मुख्य उचारा ॥
हरिभक्तन ढिग बैठन ढंगा । दुतिये वेद पाठ सतसंगा ॥
जोकर भगवतभक्तन सेवा । ताते मिलै परम गुरु देवा ॥
सदशास्त्रन पढ़ि तिनहि बिचारे । कंठ पाठ सुख तिनको धारे ॥
तेहि अनुसार कर्म सब करई । सार असार तहां निरुबरई ॥
सोई शास्त्र है जिव सुखदाई । जाते भक्ती सुक्ती पाई ॥
जाहि शास्त्रपढ़ितन मन भटके । ताको ले पानीमें पटकै ॥
जैसे साधन अरु सतसंगा । वर्णन वेदकीन बहु ढंगा ॥
हरिभक्तनकी सङ्गत जोई । तेहि समान कहु तुलै न कोई ॥
सतसङ्गत जो टूटन चहई । सबही ठौर ताहिको लहई ॥
अपने पापको कारण आही । सतसङ्गत जेहि दरसे नाहीं ॥
अपनी दृष्टि दोष जो धारे । तेहि कारण परदोष निहारे ॥
निजु दग दोष चंद द्वै दरसै । अंधेको अन्धेर सब सरसै ॥
भक्तीमें दृढ हो न जबलों । सतसंगत करते रह तबलों ॥
मनक्रम साधुकि सेवा गहिये । गाहीते सबही सुख लहिये ॥
साहिब सदा सन्तके साथ । विन सतसङ्ग न आवे हाथा ॥
सन्तजान साहिबकी देही । भक्तन सङ्ग पाइये तेही ॥
भक्तन सुख हरि भोजन करही । सदा सो तिनके सङ्ग विचरही ॥
वरन विवेक एक नहि करिये । साधु जानि सेवा चित धरिहे ॥
६१
जीवधर्मबोध
( ११६९ )
साधु सेवके वैरी पाँचा । तामें भटक जाय जिव काँचा ॥
रूप वरन विद्या बल धनमद । ताने जीवन लहै सेवापद ॥
जेते सुख श्रुति संत बखानी । तातो स्वर्ग मुक्ति सुखदानी ॥
ताहुते सुख अधिक जो होई । सत संगत सम तुलै न कोई ॥
सतसंगतसे ईश्वर पावै । ताते अधिक और कह गावै ॥
जहैं ईश्वर तहैं सुरगन छाया । सब दयाल जब प्रभुकी दया ॥
गुन गन युक्ति मुक्ति जिन पाई । जहैं लगिलखो विभूति भलाई ॥
सो सबही सतसंग प्रतापा । यह पद सब संतन मिलिथापा ॥
अब कुसंगको वर्णन करिये । दुष्ट देखि ततछन परिहरिये ॥
भरुअहि निज उर लेहु लगाई । दुष्ट संग याते दुखदाई ॥
सर्प तो एक प्रानकर घाता । कूंग संग ले नरक निपाता ॥
दोहूँ लोकमें काज विभंगा । मति मलीन हो किये कुसंगा ॥
इति
अथ मनमायाको वर्णन—कविच
यह मन महाराज मनहीहै यमराज मन कीने सब काज मन
पोषत भरत है । ठाकुरवो ठग मन फैला सब जग मन कालवो
दयाल मन तारत तरतहै ॥ मनसो न खोट मन कीने हरि ओट
जिव भवमें डुबाय बरमायके छरत है । अकथ अनूप मन ईश्वर
स्वरूप मन तिहुँ पुर भूप जो उपायके हरत है ॥
चौपाई
यह मन तीन लोकको नाथा । तीन देव इंद्री तेहि साथा ॥
गुन इंद्री याते प्रकटाही । पुनि यार्हमें लय है जाही ॥
यहि मनको कोइ भेद न जाना । सुर नर मुनि परे बंदीखाना ॥
ऊपर मन अरु हेठ है माया । तासुमध्य जग जीवनिकाया ॥
( १९७० )
बोधसागर
६२
चक्की चले दल सब जिवको । होहि पिसान न पावै पिवको ॥
कहा बापुरा जीव कडारा । सुरनरमुनिसबछलिछलिमारा ॥
कुंडलिया
चलती चक्की देखिके दिया कबीरा रोय ।
दोपट भीतर आनिके साबित गया न कोय ॥
साबित गया न कोय मिले नाहिं सन्त सनेही ।
कठिन कालको घेर फेर पर समुझावै तेही ॥
समुझाये जौंचेतसो किले सतगुरु अटको ।
फेर न पीसो जाय देख तेहि यमगनसटको ॥
चौपाई
यह मन सकलजक्त बिस्तारा । यहि मनको कछु वारन पारा ॥
मनको रचना सकल जहाना । सात प्रकार सृष्टि जग नाना ॥
मानुष देव नाग कहि देता । किन्नर पशु पच्छी अरु प्रेता ॥
सात जीव हैं सृष्टिके साता । तिनकी अब सुनिये यह बाता ॥
दोहा-स्वप्ना जाग्रत प्रथमपुनि, संकल्प जाग्रित होय ॥
केवल जाग्रत त्रितयकह, चिरजाग्रत चौथो होय ॥
पंचम दृढ़ जाग्रित कहै, छठे जाग्रत सुपनाहि ॥
सतय छोन जाग्रत कहो, सात सृष्टि यह आहि ॥
चौपाई
स्वपने विषे जो जाग्रत होई । स्वप्ना जाग्रत कहिये सोई ॥
पुनि संकल्प जाग्रतकह जोई । अजौं नींद नाहिं आई होई ॥
तामैं जो मनराज फुराना । तेहि मनराजमें जग दरसाना ॥
दृढ़ वासना भई तेहिमाही । पूर्व वासना बिसरी जो जाही ॥
यहि मनराजको रचित जो देही । अभिभूतकता दृढ़ गहयेही ॥
६३
जीवधर्मबोध
( १९७१ )
केवल जागृत तृतीये होई। परमात्म ततसे फूरोई ॥
सङ्कल्प मात्र जक्त जो गहई। निश्चय आत्म पदमें रहई ॥
चौथे चिर जागृत कह लाया। आत्मतत्त्वसे जो फुरिआया ॥
निश्चय करि जो ताको गहेऊ। जन्मांतरको प्राप्ति जो भयऊ ॥
पंचम सुषुप्ति जागृत नाना। हृद घनभूत जो होय वासना ॥
पाप कर्म करि नो मन लाया। ताते थावर यूनी पाया ॥
षष्ठहि स्वपना जागृत कहिये। जब संतनकी सङ्ग्नत गहिये ॥
पट्टि सच्छास्त्र भयो जो बोधा। नहिं विचारनिज मनकोशोधा ॥
तबसो जागृत स्वपना होई। शुद्धबोध उर थपना होई ॥
सप्तम बोध विषे हृद जोई। तुरिया नाम कहावे सोई ॥
छौंन जागृत सो नाम बखाना। परमानंद प्राप्ति जिव जाना ॥
सप्त सृष्टि मन राजा केरो। मन जीते न करे भव फेरो ॥
सत्यकबीर वचन
सारखी-कबीर मन गोरख मन गोविंदा, मनही औघड होय।
जो मनराखै जतनकरि, तो आपै करता होय ॥
कबीरकीटिकर्मपलमें, करे यह मन विषयास्वाद।
सतगुरु शब्द माना नहीं, जन्म गँवाया बाद ॥
कबीर मन पंछी भया, बहुत चढ़ा आकाश।
ऊहाँ हांत गिर पड़ा, मन मायाके पास ॥
कबीर-मन जो गया तो जानदे, गहिके राख शरीर।
उतरी परी कमान है, कयोंकर लोंगै तीर ॥
छन्द भुजंगप्रयात
महामत्त मातंग निर्द्भन्द गाजा।
गहै कौन पावै मनी रामराजा।
लियौ योगमा छन्दरा नाथ केरा।
( १९७२ )
बोधसागर
६४
तपी सूर सिद्धा जपी नर्क गेरा ॥
यही जीवको नित्य बहकावता है ।
यही ज्ञानी ध्यानीको डहकावता है ॥
महाकाल अन्याइया जो कही है ।
यही है यही है यही है यही है ॥
इति मन
अथ बाकुंडीको दमन-चौपाई
शम दमादि यह जिवको कर्मा । गहे सुचाल बहे सब भर्मा ॥
प्रथम वाक इंद्दी वश करना । सुधा वचनते जगमन हरना ॥
भलिविधि बूझिविचारिके बोले । जीनबाक विष अमृत घोले ॥
कटुकवचनविषे कबहुँ न कहिये । जाते श्रोताको उर दहिये ॥
काहूसे बोलो मति करुई । ऐसो ऊंच न ऐसो हरुई ॥
मध्य बोल तोलके आनो । धर्म नीतिमय वचन बखानो ॥
द्वै नर जबहि करे कनफुसकी । कान लगावन तब दिश उसकी ॥
जब द्वै मानुष बात कराही । बात न काटो तिनके माही ॥
वचन पै तर्क करे जो कोई । शुद्ध होय तो मानो सोई ॥
वृथा पक्ष निज बात न करिये । शुद्धको गह अशुद्ध परहरिये ॥
तर्क करत जो आपते ऊंचा । तो तामें ही रहिये नीचा ॥
मिथ्या निन्दा तजो भदेशा । सत्य वचन कर हित उपदेशा ॥
वेदपाठ कर विद्या दाना । पात्र कुपात्र भले पहिचाना ॥
वेद पाठ सच्छास्त्र उचारी । धर्म की विद्या कर्म सुधारी ॥
श्रुति ज्ञान विज्ञान कि पौरी । तासु प्रताप विदित सब ठौरी ॥
कथनी मती महम्मदको है । विद्या सहित साधु किमि सोहै ॥
पूर्णचन्द्र जिमि तारागनमें । विद्वज्जन तिनि तपसिन घनमें ॥
निद्रावश जो पंडित होऊ । सूरखके तपते भल सोऊ ॥
६५
जीवधर्मबोध
( १९७३ )
विद्या होय विनय संपन्या । ता पंडितको कहिये धन्या ॥
विद्या पढ़ि अभिमान भुलाना । सो जिव कीनो यमपुर थाना ॥
रसना सब संशयको छेदा । परमपंथको पावै भेदा ॥
रसना द्वार ज्ञान गुन आवै । रसना द्वार अगनि गति पावै ॥
इति रसना
अथ नेत्र और श्रवणका दमन—चौपाई
निज दृग दमन करो यहि लेखे । अन देखनी वस्तु मति देखे ॥
गुप्तस्थान मनुष्य पशु केरा । अति विशेष नहिं तादिशहेरा ॥
नरपशु परदा देख न जैसो । परे कुवानि जाहिमें ऐसो ॥
काल पाय निज दृष्टि गवावै । सो अवश्य अंधा है जावै ॥
जो परिच्छिद्र निहारन हारे । दुःखी होहिविन सुमति विचारे ॥
करता कृत निज दृष्टि निहारी । प्रभुहि सराह जीव तप भारी ॥
काम अरु कोध कुदृष्टि न हरे । सहज सुभाव नैन निज फेरे ॥
कामदृष्टि परतियपर डाले । जनु मैथुन करि धर्महि चाले ॥
निज पत्रिका लिखत जब कोई । ताहि न पढ़ो न निज दृगजोई ॥
जब तिय संग अनंग बिहारी । तब न गुप्त अस्थान निहारी ॥
जौ तादिश तेहिकालमें देखे । जन्मे पुत्र अंध यहि लेखे ॥
नैन न माह निरंजन थाना । स्वसंवेद इमि करे बखाना ॥
दृगन सपक्षी माह बसेरा । भोग हेत निज नैनन फेरा ॥
भोगे भोग दृगन आसीना । ताको छल नहिं कोई चीन्हा ॥
मन चंचल नैनन चपलाई । मन थिर हो तिनकी थिरताई ॥
नेत्रनमें है यमको बासा । सोइ जीव गल डारे फांसा ॥
जब जिव रोग सोग तन छावै । सबही अंग छीन है जावै ॥
नैन होहि कबहु नहिं छीना । सदा एकरस देखी पीना ॥
कैसहु कुशित रोग मल घेरी । ज्योति अघट्ट निरंजन केरी ॥
( १९७४ )
बोधसागर
६६
अंधी आंख निरंजन जूझे । विन देखे मुनि सब कछु बूझे ॥
ताते साधु प्रथम दृग बांधे । पीछे मन इंद्दीको साधे ॥
श्रवणको ऐसे कीजै दमना । अनमुनती बातें मति मुनना ॥
चुगली चाई निंदा वानी । सुने न श्रवण जीव जो ज्ञानी ॥
महा प्रबल इंद्दी हैं येही । जीवहि दुःखसुख व्यापे जेही ॥
गुरुपदेश कि कथा बताया । जीयत कैदी हाड तोडाया ॥
देखन ताहि जुरे नारीनर । एक गर्भिणी रहे तिहि ठाहर ॥
कैदी हाड लगा जब टूटे । निरखि गर्भिणी धीरज छूटे ॥
फिर देखी जब लोग लोगाई । सबही निजुनिजु भौन सिधाई ॥
निजघर जाय गर्भिनी बाला । कैदी सुरति कीन कछु काला ॥
मुनि ताको दोन्हो बिसराई । गर्भ कि थित सरनता पाई ॥
जन्मौ पुत्र तिहि औसर नारी । ता शिशुकी यह दशा निहारी ॥
कैदी अस्थि टुटी रह जेतो । बालक हाट टुटा सब तेतो ॥
हस्पताल सो शिशुले गयऊ । बीसवर्ष लो जीअत रहेऊ ॥
टूटा हाड़ बाल सो जीया । औषध ताहि न कछु गुनकीया ॥
मातु दृष्टि बालक दुःख पाया । गर्भहि निजु हाड़ तोड़ाया ॥
ऐसो नैन महाबलवाना । व्यासदृष्टि सुत तीनउपाना ॥
ऐसहि श्रवन प्रबलकहि गानो । एकबारकी कथा बखानो ॥
बंधा परा रहै जिहि ठाई । एक कलावत तहैं चलि आई ॥
गावन और बजावन लागा । सुनते बौरा मन अचुरागा ॥
बौरा रागको भेदी रहई । मुनि सुर ताल प्रीति अतिगहई ॥
परे परे निज अंग हलावै । ज्यों सुरताल कि गतिसुनि पावै ॥
परे परे निज अंग हलावै । खाट से खोलि दियौ पुनि वाको ॥
गुंगे बहिरे चंगे होई । श्रवण नयन हारे ते जोई ॥
६७
जीवधर्मबोध
( १९७५ )
प्राण देत मृग मधुरीबानी । ऐसहि प्रबल नासिका जानी ॥
इंद्री सकल अकलको हरही । ले सब जिव भवसागर भरही ॥
इति नेत्र श्रवण दमन
अथ हाथ पांवको दमन-चौपाई
उत्तर कर्म करनते कीजै । काहूको मति दुःख कछु दीजै ॥
पंथमें पाहन कंटक होई । करते दूर डार गह सोई ॥
दान पुन्य हाथन ते करिये । दुःखी दीनको सुखते भरिये ॥
मन्दे कर्मन हाथ उठाये । परधन परतिय दिस न चलाये ॥
चरननको यह कर्म बखाना । हरितीरथ सतसंगत जाना ॥
संतदरस रोगी सोगी पह । यथा योग चलके दुःखदलतह ॥
हरुये हरुये महि पग धरई । देखत चले न जिव कोइ मरई ॥
लाखन जिव पायनतर आवै । दाया करिके तिनहि बचावै ॥
इति हाथ पांवको दमन
अथ श्रेष्ठ पुरुषनकी सभा प्रवेश वर्णन-चौपाई
श्रेष्ठ सभामें जब पग दीजै । तहैं सब कर्म विचारते कीजै ॥
सभामध्य जेहिँ औसर पैठे । आज्ञा पाय तहां तब बैठे ॥
त्रिन बोले नहिँ बोलो बोला । बिन पूछे कछु भेद न खोला ॥
बुद्धि विरुद्ध न बोलो बानी । जाकी कोई प्रतीत न आनी ॥
बहुत बड़ाई अस्तुति छोड़ो । निंदा चुगुलीते सुख मोड़ो ॥
कबहुँ न निजगन बुद्धि सराहा । दुःखमतिभाषो सभा उच्छाहा ॥
ऐसो वचन कहो जनि ताही । मनभायक नरनायक नाही ॥
इति सभाप्रवेश
अथ मद्यमांस अभक्ष्यवर्णन-चौपाई
मद्य मांस भक्षमलिनबखानी । ताहि न ग्रहन करे नर ज्ञानी ॥
निज निजहृदय विचारो येहा । मल अरु मूत्र कि जेती देहा ॥
( १९७६ )
बोधसागर
६८
सकल अभक्ष धिनावन सोई । चहुँ खानि जलमलते होई ॥
शुद्ध अशुद्ध ताहि पहिचानी । जलकृत शुद्ध अशुद्ध मलानी ॥
मलकृत जो जिव जंतु उपाये । हो अज्ञान ताहिके खाये ॥
जलकृत जो फल अन्न अंकुरा । ताते भूखको दुःख कर दूरा ॥
नरपशु जीव जंतु खग नाना । सबको दुःख सुख एक समाना ॥
नरपशु खग जो मासके भक्षक । सो नहिं कबहु जीवके रक्षक ॥
जिनके हृदये दाया नाही । सोई अधोगति मांह समाहीं ॥
मांसु अहारीके कस दाया । एकखाय बहु मारि गिराया ॥
जो कोई काहूको दुःख देहै । बदला तासु आप शिर लेहै ॥
सुरापान अरु मांसु अहारी । नरकधाम सो अवश्य सिधारी ॥
सत्यकबीर वचन
साखी-कबीर-मासुअहारीमानुवा, परतख राक्षस जान ।
ताकोसंगत मतिकरो, होयभक्तिमें हान ॥
कबीर-काजी को बेटा सुवा, उरमें सालै पीर ।
वह साहिब सबको पिता, भला न मानै वीर ॥
कबीर काटाकृटि जे, करे यह परखण्डको भेस ।
निश्चयराम न जानही, कहै कबीर संदेह ॥
कबीर-करता हूँ कहि जातहो, कहा जो मान हमार ।
जिसका गलातुकाटिसो, फिर गलाकाटितुमार ॥
चौपाई
मुसलमान आदिक ईसाई । कबहु मदामि अशुचि बताई ॥
ईसाइनमें एक जमाती । अमली नहिं बैठे तिन पाती ॥
अथ टेम्पेरिस मुसैटीको वर्णन-चौपाई
टीटो टलर मुसैटी नाऊ । टेम्पेरिस बहुरी बतलाऊ ॥
दोऊ नाम अंगरेजी भाषा । अमल त्यागियोंकी यह सापा ॥
६९
जीवधर्मबोध
( १९७७ )
जगमें जेते अमलको नामा । तिनके लेखे सकल हरामा ॥
तिहि मंडली मिलै जो कोई । यह सौगंध करावे सोई ॥
आजते कौल करार हमारा । कोई अमल मुखमें नहीं डारा ॥
आप न खाय न औरहि देही । नहीं बेचै न बेचावै येही ॥
कबहुँ न करे तासु व्यौहारा । अमल निकट नहीं निजु पगधारा ॥
जो कोइ ऐसो नियम गहावै । कागज परवाना लिखपावै ॥
सो परवाना निजु ढिग राखे । मूलि कबहुँ कछु अमल न चाखे ॥
जिनके मते ग्रंथ बहुतेरा । विषहू ते विष अमल बडेरा ॥
सबही अमलकि निंदा करही । टीटो टलर धर्म आचरही ॥
जो कोइ क्रियामें होय न पक्का । तेहि जमातिसे पावै धक्का ॥
यूरुम नर केते यहि माही । टीटो टलरको धर्म धराही ॥
सुसलमान साधू बहुतेरे । मांसअहार कबहु ना हेरे ॥
धर्म अहिंसा सम नहीं आना । वेदविदित सब संतन जाना ॥
नानकशाह वचन
क्या बकरी क्या भेड है क्या आपन जाया ।
रक्तमासु सब एक है तुके किन फरमाया ॥
नानक घट परचै भई सबही घट पीरा ॥
सकलजत्तके आतमा महबूब कबीरा ॥
इति मयमांस अमल सर्वथा अभक्ष
अथ विचार जीवहितकारी वर्णन
कवित्त-बोलत विचार कर डोलत विचार कर सुक्तिद्वार
पालन विचार सरदार है । बैठत विचार कर उठत विचार कर
हाट बाट घाटहू विचार घरबार है ॥ योगहू समाधि माँह ज्ञानहू
अगाध माँह साथक अरु सिद्धको विचार सब सार है । रनवन
घन यज्ञदान सुमिरन महँ जहँ तहँ देखिये विचार जिव तार है ॥
( १९७८ )
बोधसागर
७०
सोरठा-जीवधर्म है येह, बारहि बार बिचार कर ।
मैं कह कह मम देह, केहि कारण फंदेशरा ॥
चौपाई
करत बिचार होय उजियारा । तेहि प्रकाश निज दोष निहारा ॥
जब आपनो दोष लखि लीजै । तासु नाश हित उद्यम कीजै ॥
स्वसंवेद वद भेद अनूषा । प्रथमै जिवको सत्य स्वरूपा ॥
सो सब प्रथमहि कहे बखानी । जाते जीव अमै चहुँ खानी ॥
अपने फन्दमें आप फँसाई । आपै आप रहा भरमाई ॥
सत्यकबीर वचन-शब्द
अपनेको आपही बिसरो ।
जैसे श्वान काँचि मंदिरमें भर्मत भूसि मरो ॥
ज्यों केहरि वपु निरखिकूप जल प्रतिमा देखि परो ।
ऐसेही गज लखि स्फटिकशिलामें दूरसन हीते अरो ॥
मरकट मूठी स्वाद न छोड़ै घर घर रटत फिरो ।
कहै कबीर नलनिके सुगना कौने तोहि पकरो ॥
दोहा-मनकी वृत्ती पंच है, प्रथम कहे परमान ॥
बीपरजयो विकल्पकह, निद्रास्मृति मान ॥
चौपाई
मनकी वृत्ती पंच उच्चार । मनहीको है सकल पसारा ॥
सुन स्वरूप भर्म यह मन है । तेहि कारण सब योग जतन है ॥
मन बिनसात जक्त बिनसाना । अंडर्पिंड दोउ शून्य समाना ॥
जड़ शरीर चेतन चित्त संगा । कर्म फन्द जिव ज्ञान विभंगा ॥
जड़चेतन जन होय मिलौनी । दुःखसुख भोगे सुर नर मौनी ॥
द्वंद्वते परा जीव को धोखा । कौन भांतिसे पावै मोखा ॥
जिव निरद्वंद्व दोहू ते न्यारा । सत्य स्वरूपी अगम अपारा ॥
७१
जीवधर्मबोध
( ११७१ )
पांच तत्त्वको जानन वारा । सदा सो इन पांचोंते न्यारा ॥
मन इन्द्री निरगुनते पारा । आप भूलि गल फन्दा डारा ॥
सोरठा-फन्दपरा जब जीव, अपनो रूपबिसारके ।
दृढन लागा पीव, विविधि प्रकारकी यतनकरि ॥
चौपाई
जिमि कपिकण्ठलगी जंजीरा । बँधा रहै बांसके तीरा ॥
कबहुंके बांस ऊपर चढ़ि आवै । कबहुंके हेठ उतरि सो आवै ॥
उतरा चढ़ि न छूटै ताकौ । दृढ़ जंजीर परी गल वाको ॥
तिमि जिव कमहीक्रम लहदेही । बिनसतगुरु पद पाव न येही ॥
जब जंजीर गलेकी छूटै । तब जिवरूप आपनो जूटै ॥
वपु विज्ञान शिखरकी चोटी । देही थूल मूल महि मोटी ॥
मूलते जब चोटी चढ़ि जावै । निज प्रतिबिंबै ध्यान लगावै ॥
ऊपर हेठ लख मोर स्वरूपा । झाँई भेद न जाने गुपा ॥
यही देहु विज्ञान कहावै । झाँई निरखि अपनको गावै ॥
जैसे तप्त तीख अंगारा । पर ताहीपर क्रमक्रम छारा ॥
ज्ञान अग्नि जब अन्त बुझाई । थूल शरीर बहुरि जिव पाई ॥
पुनि करि यत्न अग्नि उदगारा । तब विज्ञान देह सौ धारा ॥
होय जाय इमि कालहि पाई । आवागौन सूत्र नहि जाई ॥
जब कपि कंठ कड़ी गुरु छोरै । तब भ्रम धोखा होय न भोरै ॥
बन्धन सो विज्ञान कि देही । आवागौन न छूटै जेही ॥
इहां लगि वेद पुरान बखाना । आगे मरम न कोई जाना ॥
दशों दिशा दश सूरज होई । तब छाया नहि दूरसै कोई ॥
छाया माया होय विनाशा । जीवहि निजुस्वरूप तब भासा ॥
दशों दिशा जब रवि खरधारा । प्रलय होय तबही संसारा ॥
जहँ संसार तहाँ नहि ज्ञाना । जहाँ ज्ञान तहँ जक्त नसाना ॥
( १९८० )
बोधसागर
७२
जबलों पारख पद नहिं पावै । तबलों आवागौन समावै ॥
ताते मनहिं विचार करीजै । कच्छी तत्त्वदेह किमि छीजै ॥
पक्की तत्त्व बहुरि जिहि पैये । कह संग्रह कह त्याग करैये ॥
पांचो तत्त्व पचीस प्रकृती । भर्म रूप सबही ये बर्ती ॥
जाग्रित स्वप्न सुषुप्ति तुरिया । सो सब भर्म भावकी पुरिया ॥
जैसे जीव त्याग निज भूमी । चार खानिमै रहा सो झूमी ॥
ब्रह्मजीव जग दीसो माया । इत्यादिक बहु नाम धराया ॥
तैसे स्वसंवेद की बानी । धरि बहुरूप जक्त बिहरानी ॥
इति
अथ तत्त्वमसि तीनोंपद मिथ्यावर्णन-चौपाई
जान ज्ञान द्वैभेद बखाना । स्वसंवेद अस करे प्रमाना ॥
मलसंयुक्त ज्ञानको वरना । सर्वजीवमें सो संचरना ॥
ज्ञान अमल विकार कहावै । ज्ञानहि मात्र जीव बतलावै ॥
मेघ झंप जिमि भानु लोपाई । मुख न दीख दरपन लगिकाई ॥
तैसे जान भर्मकी ओटा । सत्य न भासै भासै खोटा ॥
पौन प्रसंग पटल घन बूरी । स्वतह भानु बहुडिस रह पूरी ॥
भानुउदय नहिं दरसै तारा । ज्ञानउदय नहिं यह संसारा ॥
अमल अखंड उदय दिनकरके । रहे न भर्मत तच्छन सरके ॥
जानति माया झंपन जबही । ज्ञान नाम कहिये सो तबही ॥
ज्ञानहि मात्र जीवको कहई । विना ज्ञान सब भूत्तक अहई ॥
जक्त मांह जेते वैपारी । जीव जमावै पार पसारी ॥
बिना जमावै पार न होई । खर्च कहांते करिहै कोई ॥
सत्यकबीर बचन
सारसी-कहै कबीर विचार, यह निर्णय परमान ।
जीव जमा जाने बिना, सबै खरचमें जान ॥
७३
जीवधर्मबोध
( १९८१ )
चौपाई
जो दीसै सबही विनसाई । जो विनसै सो जिव न कहाई ॥
जीव सोई जीवै तिहुकाला । जड़ चेतन ते सदा निराला ॥
आप मानि बंधनमें आया । भ्रमकरि तत्त्वमसी ठहराया ॥
तत्त्वमसी तिहुँपद है जोई । आवागौन मूल है सोई ॥
ततपद ईश्वर त्वं जिवरासी । असि पदक है ब्रह्म अविनासी ॥
ततपद ज्ञान है त्वं अज्ञाना । असि पद वेद ब्रह्म अज्ञाना ॥
वस ब्रह्मांड ब्रह्मसो ईसा । जिव अभिमानी पिंडमें दीसा ॥
असि पद जो दोनोंमें सनई । यमअनंद कछु कहत न बनई ॥
ज्ञानी अज्ञानी विज्ञानी । ततसागर त्वं सर असि पानी ॥
नामरूप मिथ्या है दोई । आत्मा एक जल सबमें सोई ॥
मानन्दी यह तीन प्रकारा । मानि मानि निज बन्धन डारा ॥
यही तीन है जिवको फांसा । षट्देहीमें कीनो बासा ॥
दोविधि ज्ञान द्वैविधि अज्ञाना । दोय भांति विज्ञान बखाना ॥
यक विशेष अपरोक्ष बतावो । दुतियोको परोक्ष कहि गावो ॥
निर उपाधि अपरोक्ष बखाना । सहित उपाधि परोक्ष प्रमाना ॥
इति
अथ त्वंपद द्वैभांतिको अज्ञानवर्णन-चौपाई
जो विशेष अपरोक्ष कहावै । विषयी जीवनके मन भावै ॥
विषय आसक्त जीव जब रहई । जाति पांति कुलकानि न गहई ॥
भोग मदामिष परतिय संगा । विषयिन सङ्ग अनंग तरंगा ॥
वेद शास्त्र मानै नहीं कोई । गति अपरोक्ष कहावे सोई ॥
सो अपरोक्ष दोय विधि वरना । परइच्छा निज इच्छा चरना ॥
परइच्छा जो हो अज्ञाना । सो समान अधिकरण बखाना ॥
निज इच्छा अज्ञान गहीजै । सो विशेष अधिकरण कहीजै ॥
( १९८२ )
बोधसागर
७४
गुरुजनकी कछु कानि न माने । वेद शास्त्रकी निन्दा ठाने ॥
गुरु सतगुरुको आदर नाही । ईश्वर देव कौन कह आहीं ॥
वामपंथ इच्छा आचरई । बाद अन्यथा सबसे करई ॥
जो कोइ ताको ज्ञान सुनावै । ताते उठिके झगरन धावै ॥
रस शृङ्गार गीत भल गावै । विषय सराह स्वाद मन लावै ॥
निंदै ज्ञान भक्ति सतसंगा । सदाकाल विषयन रतिरंगा ॥
मृगनैनी तजि भे बैरागी । इन समान नहिं कोउ दुर्भागि ॥
साधु संग करि नर बौराना । ताते विषय स्वाद नहिं जाना ॥
कर्महीन दारिद्री येहा । हम ज्ञानी सब गुनको गेहा ॥
जो कछु है सो है यह देही । इन्द्री भोग देह भल हेही ॥
मुये पिछार मुक्ति सब पाई । और सबहि जग भ्रम उपजाई ॥
जैसे वृक्षते पत्ता टुटता । फेर न सो तरुवरमें जुटता ॥
जैसे मुये मुक्त सब होई । और मुक्ति कतहुँ नहिं कोई ॥
यह बिसे अपरोक्ष अज्ञाना । विषयी जीवनके मनमाना ॥
अब दुतियेको वरनन कीजै । तेहि परोक्ष अज्ञान कहीजै ॥
सो परोक्ष अज्ञान है जोई । समान अधिकरन कहावे सोई ॥
जो समान अधिकरन कहावै । कर ताको दूजा बतलावै ॥
यंत्र मंत्र अरु देवी देवा । विविधि प्रकार करे सो सेवा ॥
तीरथ व्रत अस मूरत पूजा । कर्म करहि ईश्वर लखि दूजा ॥
वेदकि विधि सब करे अचारा । क्रम उपात्ताको व्यौहारा ॥
कर्मोमाह दोय विधि जाना । यक विशेष कह एक समाना ॥
मुन धन धान्यलाभ जग हेता । पूजा सेवामें चित देता ॥
निज मनोर्थहिन जो मन लावै । सो विशेष अधिकरण कहावै ॥
कर्ता हेत कर्म जो करिये । मुक्ति वासना चितमें धरिये ॥
शम दमादि अरु योग समाधू । तन मन बहुविधि साधे साधू ॥
७५
जीवधर्मबोध
( १९८३ )
यही कर्म भक्तन मन भावै । कोइ बड़भागी तेहि मन लावै ॥
नाम समान तासुको धरते । सुक्तिवासना जिवमें बरते ॥
दोय प्रकार कहे अज्ञाना । अकरम करम करै विधिनाना ॥
अकरम सकल अकरमी केरा । करमिष्टी कर कर्म घनेरा ॥
परइच्छा निज इच्छा होई । समान विशेष कहावै सोई ॥
याहीको त्वंपद कर जानी । तामें बैँधे सकल अज्ञानी ॥
द्वै प्रकार अज्ञान उचारी । तामें फँसे सकल संसारी ॥
इति त्वंपद अज्ञान
अथ ततपद द्वैविधिको ज्ञानवर्णन-चौपाई
ततपद द्वै विधि कह सविवेका । एक विशेष समान है एका ॥
सहित उपाधि विशेष बखाना । निरउपाधि है मुक्त समाना ॥
ज्ञान विशेष ते ईश बखानी । ज्ञान समान कहावै ज्ञानी ॥
निज जनकी उपाधि सब जाना । पर उपाधि सबही पहिचाना ॥
तीन अवस्था दुःख सुखसारा । इन्द्री अरु इन्द्रिन व्यौहारा ॥
सब मिथ्यामृगजलवत जाना । सब असत्य मैं सत्य सुजाना ॥
तीन देह माया भ्रम माना । बारम्बार फुरै अज्ञाना ॥
सोई ज्ञान परोक्ष प्रमाना । ताहूमें द्वै भेद बखाना ॥
सर्व समर्थ गहे सब सत्ता । ऋद्धि सिद्धि युत जगमें वर्त्ता ॥
जो षट्गुन ईश्वर जग होई । सोई सिद्धि ईश कह सोई ॥
होनी अनहोनी करि डारा । अब समान करिये निरधारा ॥
निरउपाधि कहियत है ताही । ऋद्धि सिद्धि कछु मानत नाहीं ॥
सकल उपाधि नास्ति करिभाषी । मैं आस्तीक सर्वको साखी ॥
त्रिगुणातीत मोर व्यौहारा । विधि हरिहर नहि पावत पारा ॥
ऐसो ज्ञान जाहिके तीरा । सोई ज्ञानी ज्ञान गंभीरा ॥
यह परोक्ष द्वैविधि चितधरिये । अब अपरोक्षकि निर्णय करिये ॥
( १९८४ )
बोधसागर
७६
तीन काल कोई नहिं भासा । त्रिपुटी सकलको होय बिनासा॥
ज्ञानाज्ञान गेय नहिं कोई । ध्याता ध्यान ध्येय ना होई ॥
आपन भाव रहै तिहुँ काला । द्वैत उपाधि नास्ति जंजाला ॥
यही ज्ञान अपरोक्ष कहावा । सो ज्ञानी शिवरूप बतावा ॥
योग समाधिसे जो मन मारे । मध्यम पक्ष सो वेद उचारे ॥
तामे कसर वेद निर्धारा । परो अविद्याको अंधियारा ॥
इति तत्पद
अथ अस्तिपद विज्ञान द्वैविधि वर्णन चौपाई
जानि बूझि जड़ वृती जो धारा । जस उनमत्त महा मतवारा ॥
यहिविधि सहजदसा जब गहई । एक अनेकन भ्रम कछु रहई ॥
महदानन्द मगन मन होई । याहूमें प्रकार है दोई ॥
जहँ विज्ञान दशा रह आई । सो विज्ञान हंस कहलाई ॥
कहवे मात्र बानीको ज्ञाना । सो मिथ्या विज्ञान बखाना ॥
दुतिये सो विज्ञान कहाई । जहां तहां आपै रह छाई ॥
द्वैतभाग कहुँ नहिं रहई । कारन कारज आपै रहई ॥
आपै बोले आप बोलावै । आपै डोलो आप डोलावै ॥
करे करावै आपै आपू । द्वैतभाव कतहुँ नहिं थापू ॥
इति
अथ स्वसंवेदमते चतुर्थपारखपदवर्णन-चौपाई
यहि विधि तीन भूमिका भाषी । चौथि भूमि पारखपद राखी ॥
तीन भूमिका है भ्रम भासा । चौथे परख काटे जिव फांसा ॥
तत्त्वमसीको ज्ञान जो गहता । तावमसीसे न्यारा रहता ॥
जैसे गुँगेने गुड़ खाया । बाक बिना कह स्वाद बताया ॥
तत्त्वमसाको ज्ञान जो धारी । जानि बूझि सो भयो सुखारी ॥
गुंगा गुड़को स्वाद जो गहई । सो तो गुड़से न्यारा रहई ॥
७७
जीवधर्मबोध
( १९८५ )
स्वादी स्वादसे भिन्न सदाई । क्या गूँगा गुड़ही है जाई ॥
नयन समस्त जत्तको देखे । अपनो रूप न सो पै पेखे ॥
मुखको भास परे दरपनमें । पै मुख नहीं विचारो मनमें ॥
तत्त्वमसीगह ज्ञान जो कोई । अपनो भास आपना होई ॥
झाँई निरखी भूलि सो जाई । ताहीको आपा बतलाई ॥
जाते आवा गौनमें रहई । पारख बिना न सो पद लहई ॥
सब ऊपर गुरु पारख पद है । यह जीवके ज्ञानको हद है ॥
घट प्रकारकी भूमि कहावै । पारख गुरु सकल परखावै ॥
छिप्रा प्रथम गतागत दोई । तृतीये सो लेष्टा कह सोई ॥
चौथी भूमि शूलनी गाई । पंचम भूमि आप भौराई ॥
छठई सत्य भूमि कहि दीजै । सप्तम पारख भूमि भनीजै ॥
पारख पा कोइ पद नहीं जाना । ताकी कृपाते भय भ्रम भाना ॥
पारख बिन जीव यह भूला । ताते सहे त्रिविध तन शूला ॥
सत्यकबीर बचन—शब्द
यह जग पारख बिना भूलाना ।
निर्गुण सर्गुण द्वै कर थापै अजपा धरि धरि ध्याना ॥
द्वैतहि ब्रह्म सकल घट व्यापै निर्गुणमें लपटाना ।
आवै जाय उपै फिर बिनशै जरि मरि कहा समाना ॥
सहस पाखुरी कमल विराजै मन मधुकर लपटाना ।
जलके सूखे कमल कुमिलाना तब कहु कहा ठेकाना ॥
छवो चक्र व्रत चार चतुर्दश वेद मते अरुज्ञाना ।
बंक नालकी डोरी खैंचे योगिन युक्ति बखाना ॥
घटमें करता लोग बोलत है पाँचों तत्त्व बीलाना ।
सर्गुन विनशी निर्गुन गुन रहि तमगुन बिन कहाँ समाना ॥
( १९८६ )
बोधसागर
७८
करहु विचार सकल मिलि ऐसो भेष विविधि बिधि बाना ।
कहै कबीर कोइ गुरुगम पावै पहुँचे ठौर ठिकाना ॥
इति पारखभूमि
सोरठा-ज्ञानको मूल विचार, बिन विचारको ज्ञान गह ।
हृदय घोर अँधियार, सार असार न परखकर ॥
ताते बारहि बार, मनमें भूले विचारकर ।
कोहें को संसार, कौनि भाँति कहते भया ॥
करता कारण कौन, यह समूह जो दृश्य है ।
परखी लीजिये तौन, निज विचार द्वारे सकल ॥
देह सदा जडरूप, चित्त फुरित चैतन्य है ।
कर्मकिया भ्रमकूप, जड़ चैतनते मैं अलग ॥
चौपाई
अस विचार आवै हिय जनही । तब गह सार भर्म भय भनही ॥
जहैं लगि जगमें कथा कहानी । सकल जीवकी बात बखानी ॥
सर्वज्ञौ अलपज्ञ समाजा । जीवहि रंक जीव ही राजा ॥
जीवहि गिरही जीव भिखारी । जीवहि पुरुष जीवही नारी ॥
जीव ब्रह्म माया जगदीशा । जीवहि स्मर लक्ष्म रजनीशा ॥
जीवहि क्रूर सुगम सुरबाना । जीवहि जल थलमें बिहराना ॥
जीवहि काल युवा अरु बूढ़ा । जीवहि ज्ञानी जीवहि मूढ़ा ॥
जीव समष्टि व्यष्टि कहलावै । जीवहि पोषै सोष उपावै ॥
जीवते इतर कतहुँ कछु नाहीं । उर्थ मध्य अथ जीवहि आहीं ॥
जीवको सबहीं खेल विहारी । ताकी दशा अवस्था न्यारी ॥
ब्रह्म कहूँ बिन जीव न होई । जीव बिना जिव जिये न कोइ ॥
जौपै ब्रह्म जीव बिन होता । कैसे जीव बीज सो बोता ॥
जीवकर्म निर्जीव न करई । जीव बिना जिवकाज न सरई ॥