कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १०२ )
मुसलमानबोध
आगे जाकर देखा तो एक नेक खो । उंगलियोंसे मांजता है दांतको ॥ हाथसे मिर्वांक भी तब फकदी । मिसल ईसों एक सोजनही रखी ॥ सैर करते करते आखिरं एक जाँ । एक पहाड पर गुजर उनका हुआ ॥ आदमी वाँ था न वाँ है वाँन था । यातो था वह कोहँ या मैदान था ॥ दूरसे एक झोपडी आयी नजर । देखा एक दुवैशों को उस कोह पर ॥ करके इश्क अल्लाह पर बैठे वहाँ । बैठना इनका हुआ उस पर गिराँ ॥ बोला वह दुवैशों ऐ दुवैश ? तू । रातको रहना न याँ दिलरेशें तू ॥ याँ न दाना है न पानी है कहीं । मसल्लैहत तेरा यहाँ रहना नहीं ॥ तब यह बोले उससे ऐ हौसिला । रिज्केंका हरैगिज न करियो तू गिलैं ॥ तेरा मैं महिमाँ नहीं ऐ तकियेद्वार । जिसका महिमा हूँ वही हैगमगुसाँर ॥ जिसने दी है जान वह देवेगा नानँ । गर नहीं बावँर तो करले इमतहौन ॥ जो किसीके पास आता है अंजीज । किस्मत अपनी साथ लाता है अंजीज ॥ है खुदा सबका नहीं करता शरीकँ ।
बोधसागर
( १०३ )
रिजकमें बाहँम किसीको लाशरीकँ ॥ देख आते मत किसीको सहँम जा । उसकी किंसमतका है साथ उसके धरा ॥ कहके यह और हँट वहाँसे जा रहे । सामने तकियाँके जा सुस्ता रहे ॥ शामको एक लोटा और दो रोटियाँ । तकियाँवालेको वहाँ पर उतरियाँ ॥ और उनके वास्ते खँवाने तआम । यक पुलाओंकी रिकाबी एक जाम ॥ जर्फ चीनी और उनपर ख्वाँन पोश । यक तकल्लुँफसे उनमें नाय नोश ॥ खाके इब्राहीमने पानी पिया । शुक्नेने आमतकाफिरकसिजदा किया ॥ यह तो ने अमत लेकबस चलते रहे । वह जो तकियादार थे जलते रहे ॥ शाम जब आयी वही फिर उतरियाँ । साथ यक लोटाके वा दो रोटिया ॥ मारे गुस्साके उन्होंने यों कहा । मैं नहीं खानेका खाना आपका ॥ एकको तुम भजो कुलियाँ और पुलाँओं । मुझको जौकी रोटियाँ रुखी खिलाओ ॥ जैसा वह दुवैश मैं दुवैश हूँ । जैसा वह दिलरेश मैं दिलरेश हूँ ॥ क्यों बढ़ायी एककी यह इज्वैशाँ । है फकीर आपसमें सब एकसा ॥
( १०४ )
मुलतानबोध
जब किया यह शिकंवः उसने आशकार । तब हुआ उसपर खताँबे किर्दगाँ ॥ कि ऐ फकीर ! इतना न भूल अपने तई । तुझको शरैम इस बात पर आती नहीं ॥ उसकी गर पछे तो वह तो बादशाह । मेरी खाँतिर तज दिया ताजो कुलाह ॥ छोड़ कर लज्जात दुनियाकी तमाम । वह शर बऔवहकबाब औवहत आँम ॥ वह हुकूमत साहिबी सब अपनी छोड़ । बन्दगीमें मेरी आया हाथ जोड़ ॥ साहिबी जो छोड़ कर होवे गुलाम । क्यों न दूँ मैं उसको यकरुँवाने तआम ॥ तेरी इस रोटीसे यह खाना है कम । याद कर उसके वह नाँजो नअम ॥ और अपना वक्त भी तू याद कर । किस तरह औकात होती थी बसर् ॥ एक घसियारा था तू मदें गरीब । खोदता था घास तू ऐ बेनसीब ॥ जड़लोंमें खोदता फिरता था घास । एक टका आता था उसका तेरे पास ॥ तू हुआ था छोड़कर उसको फकीर । माँ न बेगम थी न बाबा था अमीर ॥ उस मुशकूँत से बसर् करता था तू । सर पर गट्टे लेके नित मरता था तू ॥ तुझको मैं पक्की पकायी रोटियाँ ।
बोधसागर
( १०५ )
भेजता हूँ साथ पानीके यहाँ ॥ गर राजा पर मेरी तू राजी नहीं । तो ठिकाना अपना कर याँसे कहीं ॥ दिल फकीरीसे अगर तेरा फिरा । जाली और खुरपा यह है तेरा धरा ॥ आशकीसे तू हमारे बाज आ । लेके खुरपा घास अपनी खोद खा ॥ जो खुदा किस्मतमें देवे बेश ओ कम । मत रजोंसे उसकी रख बाहर कदम ॥ तरफ से अपने कर बाहर तलब । खींच मतले फायदा रंजो तअब ॥ उसने जो समझा है सोई खूब है । तालिंबोंको नित रजा मतलूँब है ॥ अपने तई सबके बराबर तू न जान । फहँम कर यह मोलबीकी बात मान ॥ हम भी ऐसे हैं यह कहना है बुरा । इज्जमें वह आदमी गर है भला ॥ यां खुदीमें और खुदामें बैर है । किस तरफ भटका फिरे है खैर है ॥ वन्दैगान हक हैं मिसकीनों गरीब । कुब्रसे दूर और जिह्ण्त से करीब ॥ इज्जत ब गुरबत ही वहाँ मंजूर है । कुब्र है जिसम सो हकेस दूर है ॥
( १०६ )
सुलतानबोध
पकके गिर पड़ता है मेवा खाकें पर । खौम है जब तक रहे इफलाकें पर ॥
साखी
दास गरीबी बन्दगी, सतगुरुका उपकार । मान बढ़ाई गर्बका, पचि पचि मरै गवौर ॥ मान बढ़ाई कूकरी, धरमराय दरबार । दीन लकुटिया बाहिरै, सब जग खाया फार ॥ मान बढ़ाई कूकरी, संतन पाई जान । पाण्डव जग पान न भई, सुपच विराजे आन ॥
१ राज्य । २ पहाड । ३ जंगल । ४ स्थानापन्न । ५ टाट । ६ सूर्य । ८ गुडडी । ९ जमीन मिट्टी । १० पानी । ११ अहली । १२ लज्जा, शरम । १३ बोल । १४ नेक = अच्छा । खो = स्वभाव । अर्थात् अच्छे स्वभावको मलेमानस आदमी । १५ ईसा पंगम्बर इसाई धर्मके प्रवर्तक मूल पुरुष । १६ अन्तम । १७ जगह । १८ वहाँ, उस जगह । १९ फकीर दो प्रकार के होते हैं । एक तो गदा (भीख मांगनेवाले) जिनको संसारी बंधवकी बहुत लालसा है मगर उनको मिलता नहीं । दूसरे दुर्बेस जिन्होंने संसारको अपने विचार द्वारा त्याग दिया है । २० इस जगह । २१ विल = हृदय ; रेश = जखम घाव । जाशय हृदय पर बोट खाये हुआ अर्थात् संसारसे उदास हुआ पुरुष । २२ विहतरी, भलाई, नसीहत, उपदेश, उत्तम उपाय । २३ हौसला = हिम्मत, उत्साह, कम हौसला = कमहिम्मत, अनउदार ॥ २४ रोजी, भोजन । २५ कदापि नहीं ; कभी नहीं । २६ शिकायत, उलाहना । २७ अतिथि । २८ दुःख मिटाने वाला । २९ सहानुभूति दिखाने वाला । ३० रोटी । ३१ विश्वास, यकीन । ३२ परीक्षा ३३ निकट । ३४ प्यास । ३५ भाग्य । ३६ एकसाथ । ३७ साथ । ३८ उरता । ३९ हटकर । ४० मठ । ४१ बाल । ४२ गिलास । ४३ वर्तन । ४४ थालीका ढकन । ४५ तैयारी, बनावट । ४६ खानेपीने के सामान । ४७ धन्यवाद । ४८ मुसलमानों एक खाना । ४९ प्रतिष्ठा । ५० बराबर, समान ५१ निन्दा, शिकायत । ५२ जाहिर प्रकट । ५३ कोध, कोप । खतावे किंदगार = ईश्वर का कोप । ५४ कर्ता ५५ लेना । ५७ खुशोके लिये । ५८ लज्जात = स्वाद । लज्जात बहुवचन है लज्जातको अर्थात् बहुतसे स्वाद । लज्जात दुनिया ॥ संसारी विषय वासनाका मुख । ५९ पीनेकी चीज । ६० भोजन, खाना । ६१ लाड । ६२ प्यार । ६३ समय । ६४ करना ; गुजरना । ६५ परिश्रम । ६६ अधिक । ६७ मर्जी, इच्छा, आज्ञा । ६८ दुख । ६९ चाहने वाला । ७० चाह । ७१ समझ । ७२ यहाँ मौलवीसे मतलब है मौलाना रुम । ७३ अधीनता । ७४ अभिमान । ७५ ईश्वरके भक्त । ७६ गरीब । ७७ अभिमान ७८ अपमान । ७९ निकट । ८० गरीबी, दीनता । ८१ सत्य । ८२ कच्चा । ८३ आसमान ।
बोधसागर
( १०७ )
माया तजे तो क्या भया, मानहिं तजा न जाय । मानहिं बड सुनिवर गले, मान सबन को खाय ॥ कविरा अपने जीवते, ये दो बातों धोय । मान बडाई कारने, अच्छता मूल न खोय ॥
वार्ता ३
शाह इब्राहीम अद्वम संसार त्याग देनेके पश्चात् मस्त फकीरों के वेषमें इधर उधर फिरा करते थे। न कोई उनका विशेष वेष था न चिह्न। इसलिये लोग उनको पहचान नहीं सकते थे। एकबार ऐसेही फिरते हुए किसी अमीर आदमीने उन्हें पकड़कर अपने बाग में माली के काम पर लगा दिया। सदगुरु की इच्छा जानकर वे अच्छी तरह बाग का काम करने लगे। एक वर्ष जब बागवानी करते उनको होगया तब एकदिन बाग का मालिक अपने कई मित्रोंको साथ लिये हुए बागमें आया। शाह इब्राहीम साहबने उस समय बागमें जितने फल फूल थे सबमें से थोडा थोडा लेकर एक डाली बनायी और मालिक बेगके पास ले गये। जब उस अमीर ने डाली में से अनारों को लेकर खाया तब सब अनार खट्टे निकले। उसने शाहसाहब को बुलाकर पूछा कि, मेरे लिये ये खट्टे अनार क्यों लाया ? उन्होंने जवाब दिया कि, मुझे खट्टे मीठे की कुछ खबर नहीं है। उस अमीरने कहा कि, तुम कितने दिनसे इस बाग में रहते हो ? उन्होंने कहा एक वर्षसे। अमीरने कहा एक वर्षसे बागवानी करके भी तुमने आजतक बागके खट्टे मीठे अनारों को नहीं पहचाना ? शाह इब्राहीमने उत्तर दिया तुमने मुझे बागकी रक्षा करने के लिये रखा था कि, फलों को खाने के लिये ? अमीरने
( १०८ )
सुलतानबोध
कहा रक्षाके लिये ? उन्होंने कहा तब मैं फल कैसे खा सकता था ? अगर रक्षक भक्षक बन जाय तब तो रक्षाका नामही संसारसे उठ जाय । आपकी बातको सुनकर वह अमीर बड़े आश्चर्य में आया । फिर जाँच करने पर उस अमीरको मालूम हुआ कि, वह तो शाह इब्राहीम अह्मद हैं तब तो वह हाथ जोड़कर उनके पैर पर गिर पड़ा और अपना अपराध क्षमा कराने लगा । तब वे हँसकर उस अमीरको उपदेश देकर चल दिये ।
वार्ता ४
कहते हैं कि, बादशाहत त्याग देने के पश्चात् सुलतान इब्राहीम अह्मद शाह दस वर्ष तक नेशापुर जंगल की एक गुफा में रहकर भजन करते रहे । आठवें दिन गुफा से निकल कर जंगलकी लकड़ियाँ इकट्ठी करके वस्तीमें ले जाकर बेच आते और उससे जो कुछ मिलता उतनेही में आठ दिनके भोजन का सामान खरीद कर ले आते और आठ दिनतक बैठे भजन करते.
लिखा है कि, इस दस वर्षकी तपस्या और एकान्त बाससे उन्होंने अपने मन तथा इंद्रियोंको पूर्ण रीतिसे जीत लिया था । इसके प्रमाणमें लिखा है कि, जब नेशापुरसे शाह इब्राहीम अह्मद रवाना हुए तब एक जहाज पर चढ़ कर अरब को चले । संयोगसे उस जहाज पर एक अमीर भी जा रहा था । उस अमीरके साथ सब अमीराना सामान नाचराग वगैरह थे । ठट्ठा मसखरीसे अमीरों को खुश करने वाले भांड भी उसके साथ थे । एक रातको भाँड़ोंने कहा अगर कोई आदमी मिलता तो उसपर से हमलोग अपनी मसखरी उतारते । उस अमीरने हुक्म दिया कि, देखो
बोधसागर
( १०९ )
जहाज में कोई गरीब भूखा मिल जाय तो उसे रुपया दो रुपया देकर अपना काम निकाल लो । आखिर कार हूँढते हूँढते उस अमीर के आदमियोंने शाह इब्राहीम अह्मको किसी कोने में बैठा हुआ पाया । इनका विचित्र वेष और बढी हुई दाढी वगैरह देखकर सबने पागल समझ कर उन्हें पकड़ लिया और अमीरके मजलिस में लाकर बैठा दिया । फिर तो भाँडों ने मनमानी की । जितने खेल खेलते अन्तमें सब उन्हीं पर उतारते अंतमें जब उन्हें बहुत तकलीफ हुई तब आकाश बानी हुई कि, अगर तुम कहो तो इस जहाजको डुबाकर इन सब मूर्ख बदमाशोंको इनके किये का दण्ड देदूँ । शाह इब्राहीमने बड़े धीरज के साथ कहा कि,
खींच कर सीनेमें अपने एक आह । बोला इब्राहीम ऐ मेरे अल्लाह ॥ कुछ नहीं हस अमरमें इनकी खता । करता अगरबसीरत इनको तू अता ॥ कजरवी क्यों करते ऐ दानायराज । फेल बदसे आप करते एहतराज ॥ राह में गर बेबसर के चाहहो । जो न रोके उसको वह गुमराह हो ॥ मर्द बीना को है लाजिम दे बता । वरन गया उसका खून उसने लिया ॥ वह है या रण्ब जूर्म असियासे बरी । कुछ नहीं उसमें खता उनकी जरी ॥ क्योंकि गफलतसे है मसल्लुबुल हवास । जेहल नादानी से मकल्लुबुल हवास ॥
( ११० )
मुलतानबोध
फिर उनने कहा कि, हे प्रभु ! क्या मैं तेरा बन्दा इसका बिलहूँ और ऐसा नापाक हूँ कि, मेरे स्पर्श के पाप से इतने बड़े जहाज को डुबाकर इतने निष्पापोंका अन्त करेगा । प्रभु ! तू तो दयालु है अथम धारन है ऐसा क्यों नहीं करता कि यदि केवल मेरे ही लियेतुझे इतनी हत्या करनी पड़ती हो तो मुझको ही डुबादे अगर नहीं तो इन सबोंको वह ज्ञान दे कि ये तेरी बड़ाईको समझे और इनका हृदय दया और ज्ञानसे पूर्ण हो जावे । उनके इस प्रकार आशिर्वाद करने के पश्चात् तत्काल ही अमीर सहित समाज के सब आदमियों का हृदय शुद्ध और ज्ञान से पूर्ण हो गया । उस समय सबने उनको पहचाना । फिर तो सब उनके पगपर गिरकर क्षमा कराने लगे । उन्होंने सबको उपदेश देकर संतोष दिलाया ॥
वार्ता ५ ।
एक बार एक स्मशान में बैठे हुए शाह ईब्राहीम अख्मसे किसीने पूछा कि, बादशाही छोड़कर मरघटों में क्यों बैठते फिरते हो ? उन्होंने उत्तर दिया कि, संसार के मनुष्यों को मैं चार प्रकार का देखता हूँ ॥ १ ॥ कोई तो जीता है और संसार में मौजूद है ॥ २ ॥ कोई मांके पेटमें है ॥ ३ ॥ कोई अपना कर्म पूरा करके आनेही चाहता है ॥ ४ ॥ कोई मर गये हैं इनमें से मेरे हुए लोग पुकार रहे हैं कि ओ संसार के आदमियों ! जल्दी जल्दी मरो कि, क्यामत जल्दी हो और हमलोग कब्रकी कष्ट से छूटें । जो माताके पेट में आचुके हैं और जो आने वाले हैं वे पुकार रहे हैं कि, ओ संसार के मनुष्यों ! जल्दी संसारको छोड़ो कि, हमारे आनेको स्थान मिले । आशय यह है कि एक ओर से भागते हैं और
बोधसागर
( १११ )
दूसरी ओरसे बुलाते हैं। इस दशा में संसारमें रहने की इच्छा किस प्रकार हो सकती है। इसलिये मैंने मौतको और मरघट को अन्तिम स्थान जानकर सेवन करना आरम्भ किया है।
वार्ता ७
एक बार फकीर हो जाने के बहुत दिन पीछे शाह इब्राहीम अद्दम बलखमें गये और शहरसे बाहर एक जलाशय के किनारे बैठे। आने जाने वालों ने उन्हें देख कर पहचाना और उनके बेटे को जो उस समय वहाँ के बादशाह थे उनके आने की खबर दी।
बादशाह बापके आने की खबरको सुनकर चट सवारी मँगाकर बहुतसे मुसाहेब और नौकर चाकरों को साथ लिये हुये वहाँ पहुँचा। शाह इब्राहीम के आनेका समाचार जैसे ही बलख के लोगों को पहुँचा वैसे ही जो जिस दशामें था अपना अपना काम छोडकर दौड पडा। थोडी ही देरमें शाह इब्राहीम के निकट बडा भारी मेला लग गया।
सुलतान इब्राहीम के पास में सिवाय एक गुदडी के दूसरा वस्त्र या पात्र आदि कुछ नहीं था। कठिन तपस्या के कारणसे उनका शरीर भी बहुत दुबला पतला और कमजोर देख पडता था। बापकी वह दशा देखकर बादशाह बने हुए आत्म दृष्टिसे शून्य बेटेने कहा पिताजी ! आपने बादशाहत छोडकर संसार भरका कष्ट अपने शिर उठाके क्या लाभ उठाया ?।
जो आपका शरीर मखमल और फूलोंकी शय्या पर सोने-वाला था अब उसके लिये टाट भी आपके पास नहीं है जिसके सम्मुख हजारों दास दासियाँ सेवा करनेके लिये हाथ जोड़े खड़े रहते थे आज वही इस प्रकार बेकस और लोचारक समान
(११२)
सुलतानबोध
भूखे प्यासे जमीन पर सोता और दुःख उठाता फिर रहा है । पूज्य पिताजी ! एक चीज को छोड़कर मनुष्य दूसरी वस्तुको उन्नति की आशासे स्वीकार करता है । आपने तो उलटा प्राप्त सुख को भी खोकर अपनी ऐसी दशा बना ली है जिसे देखकर मुझे शरम आती है और आपकी यह प्यारी प्रजा आठ आठ आसूं रो रही है । इसी लिये मैं आपसे पूछता हूँ कि, आपको इस त्याग में क्या प्राप्त हुआ है ? ।
बेटेकी बातको सुनकर उसे कुछ उपदेश देने के विचारसे सुलतान ने कहा, बेटा ! मैंने जो कुछ कमाया है वह तो पीछे बतलाऊंगा पहले तू बतला कि, बादशाही पाकर तूने अपनी उन्नति कहाँ तक की है ? बापकी बात को सुनकर बेटा हँसकर बोला कि, देखिये आपके राज्य छोड़कर चले जानेके पश्चात् मैंने अमुक अमुक देश अपने बाहु बलसे जीतकर स्वाधीन कर लिया है और अमुक अमुक सुधार राज्य में फैलाया है । मेरे अधिकारमें क्या नहीं है ? जिसको चाहूँ आज गरीब बना हूँ जिसको चाहूँ आज कुबेर कहला हूँ । जिसको चाहूँ उसका जान बखशी कर हूँ जिसको चाहूँ मार डालूँ । मेरे नाम को सुनकर शत्रु डरते हैं । मेरी आज्ञा को कोई तोड़ नहीं सकता ।
इतना सुनकर सुलतानने कहा कि, बेटा ! अगर सच मुच तुममें ऐसी सत्ता आगयी है तो ले मेरी यह सुई इस तलाब मेंसे निकलवा दे । इतना कहकर गुदडी सीनेकी सूईको तालाबमें फेंक दिया ।
यह देखकर बेटा ( बादशाह ) ने हँसकर कहा यह कौन-बड़ी बात है । एक नहीं लाखों सुई आपको मँगवा देता हूँ । सुलतान ने कहा मुझे दूसरी सुई नहीं चाहिये मुझे तो मेरी ही सुई चाहिये ।
बोधसागर
( ११३ )
बादशाह ने उसी समय वजीर को आज़ादी और आनन फानन में देखते ही देखते हजारों पानी में डुबकी मारनेवाले और जाल डालने वाले हाजिर हो गये। यद्यपि सूर्यका निकाल लेना बादशाह सहल काम समझता था तथापि सब उपाय करने पर भी सूर्यका पता नहीं लगा। तालाब के तह में जमें हुए सब काँदों कीच साफ हो गये। मगर सूर्यका पता नहीं लगा। तब तो बादशाह अपने मनमें शरमाकर पिताके पास जाकर कहने लगा कि, वह सूर्य तो नहीं मिली उसका मिलना असम्भव है दूसरी सुइयाँ हाजिर हैं जितनी चाहिये लीजिये। सुलतान हन्नाहीमने कहा कि, बेटा तूने यह क्या उन्नति की कि, एक सूर्य भी तालाबसे नहीं निकलवा सकता? खैर अब मेरी कमाई को भी देख और अपनी कमाई से मिला। इतना कहकर सुलतान ने आँख बन्द करली एक क्षण के बाद आँख खोल कर तालाबकी ओर देखा तब अगनित जलचर मछली आदि जीवधारियों को किनारे जलमें खड़ा देखा। बादशाहने उनसे कहा प्यारी ईश्वरकी स्तुतिकी मछलियों! क्या तुम मेरा एक काम कर सकोगी? सब जलचरोंने एक जवान होकर कहा जो आपकी आज़ा हो करने को तैयार हैं। जलचरों को बोलते सुनकर बादशाहसे प्रजा तक सब आश्चर्य में आगये। सुलतानने मछलियोंसे कहा कि मेरी एक सूर्य पानीमें है उसे दूँढकर ला दो। इतना सुनते ही मछलियाँ गोता लगा गयीं। थोड़ी देरमें एक मछली सूर्य मुँहमें लिये हुई किनारे आयी। बादशाहने अपने हाथ से सूर्य लेकर देखी तो वही सूर्य थी। फिर तो वह बापके पगपर गिरकर रोते और अपनी अज्ञानता के अपराध को क्षमा कराने लगा। प्रजा
( ११४ )
सुलतानबोध
चारों ओर से जय जयकार वाणी उच्चारने लगी । इतने में सुलतान इब्राहीम अद्वमसाहब वहाँ से अन्तरध्यान हो गये ।
वार्ता ८
कहते हैं कि, जब सुलतान इब्राहीम अद्वम मक्का के निकट पहुँचे तब सुना कि मक्काके पुजारी और यात्री लोग उनकी अगुवानी को आ रहे हैं । तब वो जमात से निकल कर अलग होकर आगे चले गये जिसमें उनको कोई पहचान न सके मक्का के महात्माओंके सेवक लोग जो अपने अपने मालिकों से आगे आरहे थे पहले सुलतान इब्राहीम अद्वमसे मिले । उन लोगोंने आपसे पूछा क्या सुलतान इब्राहीम अद्वम यहाँसे नजदीक हैं ? सब महात्मा लोग उनसे मिलनेको आरहे हैं । आपने उत्तर दिया कि, वे उस अधर्मीसे क्या चाहते हैं ? सेवकोंने गाली देते सुनकर आपको खूब मारा और गरदनियां दीं और कहने लगे कि, तू ऐसे महात्मा को अधर्मी कहता है ? असलमें तूही अधर्मी है । आपने कहा हाँ भाई सोई तो मैं भी कह रहा हूँ वे सब तो आपको मारकूटके आगे बढे और आप अपने मनसे कहने लगे कि, क्यों ओ दुष्ट तूने अपने किये का फल पाया या नहीं ? अभी कैसा खुश हो रहा था कि, मक्का के महात्मा लोग हमारी अगुवानी को आ रहे हैं । इसी प्रकार से आप ही आप अपने मनको समझा रहे थे इतने में लोग आगये और आपको पहचान कर आपसे क्षमा मांगने लगे । फिर आप मक्का में जाकर बहुत दिनों तक रहे । आपके बहुत से चेले भी हो गये । आपके चेले गुदड़ी ओढते और खड़ी टोपी पहनते थे ।
बोधसागर
(११५)
वार्ता ९
जब आप बलख छोड़ कर फकीर हुए थे उस समय आपका एक छोटा पुत्र था जब वह लड़का बड़ा हुआ तब उसने अपनी मांसे पूछा कि मेरा बाप कहाँ है ? माने सब हाल कह सुनाया और यह भी कहा कि सुननेमें आता है कि, आजकल मक्कामें रहते हैं । लड़केने मांसे कहा “अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं भी मक्का जाऊँ तीर्थ भी करूँगा और पिताको दूँढकर उनका दर्शन भी करूँगा” माने कहा अकेले तू क्यों जायगा मैं भी मक्का की जेयारत को जाऊँगी । फिर तो लड़केने वजीरों को हुकम दिया कि, शहर भर में ढौड़ीं पिटवा दा कि, जिसको मक्का चलना हो वह चले उसका सब खर्च मेरी ओरसे दिया जायगा । फिर चार हजार आदमी मक्का जाने को तैयार हुये । सबको साथ लेकर लड़का मक्का पहुँचा । वहाँ जाकर गुदडी वाले फकीरों की एक जमात देख कर उनसे पूछा कि, तुम लोग इब्राहीम अद्दम साहब को जानते हो ? उन्होंने कहा वे तो हमारे गुरु हैं । फिर पूछा वो कहाँ हैं ? उत्तर मिला कि वो लकड़ियों के गढ़ठे लाने जंगलमें गये हैं । क्योंकि जब वो जंगल से लकड़ी लेकर आयेंगे और बेचकर रोटी लायेंगे तब हम लोग खायेंगे । इतना सुनकर लड़का जंगल की ओर रवाना हुआ । आगे जाकर एक बुढ़ठे को लकड़ियोंका गढ़र शिर पर रखे हुए आते देखा । लड़का मुलतानकी वह दशा देखकर रोने लगा । फिर उनके पीछे पीछे बाजार तक गया । जहाँ जाकर उन्होंने लकड़ी रखकर पुकारा कि कोई है जो माल हलाल (सुकृति की कमाई) को माल हलालके बदले लेवे । एक आदमी आया उसने
( ११६ )
सुलतानबोध
आपसे लकड़ियाँ लेलीं और उसके बदले में रोटियाँ दे दीं । आप रोटी लेकर जमातमें आये और साथियों के आगे रख दीं । लोग रोटी खाने लगे और आप भजन में लगे ।
सुलतान इब्राहीम अह्मद साहेब सदा अपने चेलोंसे कहा करते थे कि, 'देखो बेदाढी मूँछके लड़के और स्त्रियों से सदा सचेत रहना उनकी ओर कभी ध्यान देकर मत देखना" । उनके शिष्यवर्ग सदा उनकी आज्ञाका पालन करते थे ।
काबाकी परिक्रमाके समय संयोगसे सुलतान इब्राहीम अह्मद का लड़का उनके सन्मुख आगया । आपने दृष्टि भरकर उसकी ओर देखा । शिष्य लोग उनके उस कामसे आश्चर्यमें आये । जब परिक्रमा कर चुके तब आपके शिष्योंने आपसे हाथ जोड़कर विनय किया कि दीनबन्धु हमको तो आपने आज्ञा दी है कि बिना मूँछ डाढी वाले बालकों और स्त्रियोंकी ओर दृष्टि मत करना किन्तु परिक्रमाके समय आपने स्वयम् एक बालककी ओर टकटकी लगाकर देखा था इसका क्या कारण है ?
शिष्योंकी बातको सुनकर आपने उत्तर दिया कि जिस समय मैं बलख छोड़कर चला था उस समय मेरा एक छोटा लड़का था मुझे इस लड़केको देखते ही ऐसा जान पडा कि यह वही लड़का है । आपकी बात सुनकर आपके शिष्योंमें से एक शिष्य यात्रियोंके स्थानमें गया और बलखके यात्रियोंको दूँदते दूँदते आपके पुत्रके पास पहुँचा । उस समय वह लड़का अपने खीमें बैठा हुआ पुस्तक पढ़ रहा था और रो रहा था उस शिष्यने जाकर उस लड़केसे पूछा कि आप कहाँसे आये हैं । लड़केने कहा—बलखसे आया हूँ । फिर उसने पूछा आप
बोधसागर
( ११७ )
किसके लड़के हैं ? उत्तर मिला कि, इब्राहीम अब्दमके उसने पूछा कि, आपने उनको देखा है ? लड़केने कहा कलके सिवाय मैंने उनको कभी नहीं देखा किन्तु मुझे यह भी निश्चय नहीं है कि, जिनको मैंने देखा है वह मेरे पिता हैं कि, नहीं । उनसे इस डरके मारे कि वो तो हम ही लोगोंसे भाग कर यहाँ आये हैं कहीं हमको जानकर यहाँसे भी कहीं भाग न जावे कुछ न पूछा । आपके उस शिष्यने कहा कि, आप मेरे साथ आइये मैं आपको आपके पितासे मिला दूँ । फिर तो दोनों माँ बेटे और बहुतसे आदमी उस शिष्यके साथ चले जब सब आपके सामने आये तब आपकी स्त्रीने आपको देख लिया देखते ही वह विकल होगयी और रोने लगी । फिर लड़केसे बतलाया कि, देखो तुम्हारे बाप यही हैं ? लडका भी रोने लगा । उस समयकी दशा ऐसी करूणापूर्ण थी कि आपके सब शिष्य भी उनके साथ रोने लगे । मोहने करूणाके स्वरूपमें सबके ऊपर अपना जाल फैलाया ।
लडका रोते रोते बेहोश होकर गिर पडा जब चेतमें आया तब बापके पग पर गिरकर प्रणाम किया । आपने उसे गले लगाया फिर उससे उसके पढने लिखने और धर्मकी बातोंको पूछकर आपने चाहा कि, वहाँसे उठकर चले जावें किन्तु आपके स्त्री और पुत्रने न छोडा तब थोडी देरतक चुप रहनेके बाद आपने आसमानकी ओर मुहँ करके कहा हे प्रभु ! तू मेरी सहायता कर आपका इतना कहना था कि, पुत्र आपहीके गोदमें मृत्युको प्राप्त हुआ ।
शिष्योंने लडकेको मरते देखकर पूछा या सतगुरु ! यह क्या हुआ ? आपने कहा जिस समय मैंने इस लडके को गले
( ११८ )
मुलतानबोध
लगाया था उस समय मेरे हृदयमें मोहका संचार हो आया था तब परमात्माकी ओरसे आज्ञा हुई थी कि, ऐ इब्राहीम तू मेरे प्रेम और भक्तिका दम भरता है और स्नेह दूसरोंसे करता है । जिस बातके लिये शिष्योंको सबसे अलग रहनेको कहता है उसीको तू आप पकड़ता है । जब मैंने यह सुना तब मैंने आशीर्वाद किया कि, हे प्रभु मेरी रक्षा तेरे ही हाथमें है, यदि मेरे पुत्रका मोह सुझे तुझसे अलग करनेवाला है तो सुझे मृत्यु दे दे या उसीको । बस जो कुछ साहबने किया सब ठीक किया । इतना कहकर आप वहाँसे शिष्यों सहित उठकर चले गये बलखवाले लोग रोते पीटते लाशको दफन करनेके लिये ले गये *
वार्ता १०
एकवार हजरत इब्राहीम अल्लमके पास कोई आदमी एक हजार दिरम लाया और विनय पूर्वक प्रार्थना की कि आप इसे स्वीकार कर लीजिये आपने उससे कहा कि मैं मँगतोंसे कुछ नहीं लेता । उस आदमीने कहा मैं मँगता नहीं हूँ बल्कि बड़ा धनवान हूँ । तब आपने उससे पूछा कि, जितना तेरे पास है उससे अधिक मिलनेकी इच्छा तेरे हृदयमें है कि नहीं ? उसने कहा हाँ अधिक तो जरूर चाहता हूँ । तब आपने कहा कि, तब तो तू बड़ा भिखमैंगा है इसलिये मैं तुझसे कुछ नहीं ले सकता । मैं उसीसे लेता हूँ जो इतना पूरा है कि, कुछ नहीं चाहता ।
- वर्तमानके त्यागके अभिमानी साधु और महंतोंको विचार करना चाहिये क्यों कि, ये भी तो अपनेको मुलतान इब्राहीम अल्लमसे बढ़कर त्यागी बतलाते हैं ।
बोधसागर
( ११९ )
वार्ता ११
एकबार एक आदमी दसहजार अशरफियाँ लेकर आपके पास आया और उनको स्वीकार करानेके लिये हठ करने लगा। आपने उससे कहा कि, तू इस थोड़ेसे सोनेके बदले मेरी साधुता मोल लेके मुझे त्यागियोंकी जमाअतसे निकलवाना चाहता है ? इतना कहकर आप वहाँसे उठकर चले गये।
धन्य है इस त्यागको। आजकलके वैरागी भी अपनेको महान त्यागी मानते हुए भी एक एक पैसाके लिये संसारी तुच्छ जीवोंके पास दीनता करते और झूठी खुशामद किया करते हैं क्या कोई सच्चा विचारवान उन्हें वैरागी कह सकता है कदापि नहीं।
वार्ता १२
एक आदमी ने आपसे विनय किया कि, आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये जिसपर अमल करके मैं सन्त पदवी को पा सकूँ। आपने उससे कहा-सन्त बनने के लिये सबसे पहली बात यह है कि, लोक और परलोक दोनोंसे चित्त उठा करके-वल साहबमें लगादे। साहब के सिवाय अपने हृदयसे दूसरा सब कुछ निकाल दे। दूसरे-हरामकी कमाई छोड़कर सुकृति कमाईसे उदर निर्वाह कर। क्योंकि जिसका आहार शुद्ध है उसका हृदय शुद्ध होता, और जिसका हृदय शुद्ध होता है, उसीके अन्तःकरणमें साहबका सच्चा प्रकाश प्रकट होता है जिसने अपना आहार शुद्ध किया है वह अवश्य अपने पदको पहुंचा है। तीर्थ व्रत और नाना प्रकारके ऊपरी तपस्यासे चित्त शुद्ध नहीं होता बरन आहार शुद्ध होनेसे ही अन्तःकरण शुद्ध होता है।
( १२० )
सुलतानबोध
वार्ता १३
एक बार लोगोंने हजरत इब्राहीम अख्दमसे कहा कि अमुक सन्त बड़ा सिद्ध और ईश्वरतक पहुँचा हुआ है। वह सदा ध्यान में ही रहता है और दूर दूर देशकी बातोंको कह देता है। और सदा तपस्या में ही रहता है। आपने उन लोगोंसे कहा कि, मुझे उसके पास लेचलो मैं उसका दर्शन करूँगा। लोग आपको उसके पास ले गये। आपने वहाँ जाकर देखा कि, वह उससे भी बढकर सिद्धिवाला है। उस सिद्धिने आपसे प्रार्थना की कि; आप तीन दिन तक यहाँ रहिये आप रह गये। उसके व्यवहारको देखकर आपने विचार किया तो मालूम हुआ कि, उसका भोजन आदि निर्वाह दम्भकी कमाईसे चलता है। तब आपको उसकी दशा पर दया आयी। तीन दिनके बाद आपने उस सिद्ध को नेवता देकर अपने कुटी पर बुलाया जब वह आप के पास आया तब दूसरे ही दिन उसकी सिद्धि लुप्त होने लगी तीसरे दिन तो वह कोरा सन्त रह गया। तब उसको बड़ा आश्चर्य हुआ उसने आपसे कहा कि आपने मेरे ऊपर क्या कर दिया मेरा सब चमत्कार जाता रहा ? आपने उसको उत्तर दिया कि; पहले तुम हरामकी कमाईसे अपना पेट भरते थे इस कारण कालने तुम्हारे हृदयमें प्रवेश करके तुम्हें अनेक प्रकारकी सिद्धिका लालच दिखाकर साहब के देशसे काल देशमें लेगया था। अब तुम तीन दिनसे सुकृति की कमाई का भोजन करते हो इस कारण कालका राज्य तुम्हारे हृदयसे उठ गया है। अब तुम चाहो तो साहिबका भजन कर सत्य लोक का साधन कर सकते हो।
सुलतान इब्राहीम की बात उस समय तो उसको अच्छी नहीं
बोधसागर
( १२१ )
लगी परन्तु जब वह लौटकर अपने स्थानपर आया और सुल- तान इब्राहीम अह्म साहेब के आचार विचार को अपने कर्तव्यों से मिलाने लगा तब उसे प्रत्यक्ष ज्ञात होगया कि, वह तो अपने उचित परिश्रम द्वारा अपनी संसार माया चलाते हैं और वह अपनी संसार यात्राके लिये नाना प्रकार के वेश और दम्भकी बातोंसे संसार को बहकाकर अपना नाम बढ़ाता है। जिन बातोंके भेदको वह स्वयम् नहीं जानता उसको जानने का डौल बनाकर लोगोंको ठगता और भ्रममें डालता है। इस प्रकार से बोध होते ही उसने पश्चात्ताप करके अपने सब स्वाँगों को तिल्लौजली देकर काल देशसे निकलने और सत्यराज्य में प्रवेश करनेके लिये सच्चे संतोंका संग करना आरम्भ किया।
वार्ता १४
एक दिन परिश्रम करने पर भी आपको भोजन नहीं मिला। आपने साहिब को धन्यवाद दिया। इसी प्रकार सात दिन तक आपको भोजन नहीं मिला और बराबर आप साहिब को धन्यवाद करते रहे। आठवें दिन निर्बलता बहुत बढ़ गयी तब आपके मनमें कुछ भोजन मिलने की इच्छा हुई। साहिब की कृपासे एक मनुष्य आकर खड़ा हुआ और विनय करने लगा कि, आप मेरे यहाँ भोजन करने चलिंये उसके प्रेम और भक्ति भावको देखकर आप उसके साथ गये जब आप उस आदमी के घर पर पहुँचे तब उसके अमीराना ठाट और मकानात के देखनेसे मालूम हुआ कि, कोई बड़ा धनी आदमी है। उसने आपको एक सजी हुई कोठरीमें ले जाकर बैठाया फिर वह आपके पैरों पर गिरकर विनय पूर्वक कहने लगा कि, मैं