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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

❊ औपनिषद आत्मतत्त्व ❊ ११३ ( ३ ) औपनिषद आत्मतत्त्वसम्बन्धी निम्न प्रकारकी विप्रतिपत्तियाँ उपस्थित की जा सकती हैं— १—औपनिषद आत्मतत्त्व शरीरादि (भौतिक तत्त्व) से विलक्षण है या नहीं ? २- ,, विभु किंवा अणु ? ३- ,, परिणामी सावयव किं वा नहीं ? ४- ,, ज्ञानादिका आश्रय किं वा तत्स्वरूप ? ५- ,, जगत्का उपादानकारण किंवा निमित्त ? ६- ,, अद्वितीय ही कारण, किं वा अनेक अन्य भी ? ७- ,, का जीवसे भेद किं वा अभेद ? १. आत्मतत्त्व शरीरादिसे विलक्षण पूर्वपक्ष— ‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतः समाः ।' ( ईश० २ ) कर्म करते हुए ही सैकड़ो वर्ष जीवनेच्छाका आदेश देते हुए यह श्रुति बतलाती है कि 'जीवन ही सब कुछ है और मरनेके बाद कुछ नहीं है।' इसलिये इस प्रकारके कर्म करो जिससे तुम्हारा जीवन, जो कि पृथिव्यादि जड़तत्त्वोंके समुदाय- में 'किण्वादिभ्यो मदशक्तिवत्' है, बहुत समयतक रहे। यदि शरीरादिसे विलक्षण आत्मा हो और मरनेपर भी वह विद्यमान हो, तो फिर सैकड़ों वर्ष जीवित रहनेकी इच्छाका क्या महत्त्व ? जब कि वृद्धावस्था भी सन्निकट ही रहती है। शरीरमें कष्ट होनेपर उसके रक्षणका भी क्यों उपाय करें, यदि आत्माका कुछ बिगड़ता न हो। 'यदेतद्रेतस्तदेतत्सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यः तेजः समुद्भूतम्, स्त्रिया सिञ्चति सास्यैतमात्मानम् अत्रगतं भावयति।' ( ऐतरेय० ) 'वीर्यस्वरूप आत्मा स्त्रीमें सिञ्चित होता है और स्त्री उसे ( पतिकी ) आत्मा मानकर पालती है।' • 'सस्यमिव मर्त्यं पच्यते' ( कठोपनिषद् ) 'अथ चैनं नित्यजातम्' ( गीता २ । २६ ) 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म' ( गीता २ । २७ ) उपर्युक्त वचनोंसे भी यही ज्ञात होता है कि आत्मा भौतिक तत्त्व है, शरीरादिसे विलक्षण नहीं है। उत्तरपक्ष—'कुर्वन्नेवेह' इस श्रुतिका पूर्वोक्त तात्पर्य नहीं है। आत्मतत्त्वको समझकर पुत्रैषणादिको छोड़कर ससार उ० अ० १५— से परे जो निरतिशय सुख प्राप्त नहीं कर सकता, वह अनात्मज्ञ पुरुष यज्ञादि शुभ कर्म करते हुए ही अपना आयुष्य पूर्ण करे। यही तात्पर्य है । रेत:सिञ्चनको प्रथम जन्म एव उत्पत्तिको द्वितीय जन्म जो कहा है, वह आत्माके प्राकट्यके अवच्छेदक शरीरके सम्बन्धमें है, आत्मामें औपचारिक कथन है। इसी शरीरात्माका निराकरण यमराजने नचिकेताके प्रश्नोत्तरमे किया है— ‘येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीतिचैके।' ( कठोपनिषद् १ । १ । २० ) 'मनुष्य मरनेके बाद रहता है या नहीं ?' इस प्रश्नका उत्तर यमराजने यही दिया कि— तत्ते पदँ संग्रहण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥' न जायते म्रियते वा विपश्चि- न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् । अजो नित्य शाश्वतोऽय पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ ( कठोपनिषद् १ । २ । १५, १८ ) यहाँ यही आत्माका लक्षण बतलाते हुए सिद्ध कर दिया कि शरीरादि भौतिक तत्त्व सब विनाशी हैं । वे आत्मा नहीं है, क्योकि आत्मा अजर-अमर है । अर्थात् वह 'जायते' आदि षड्भावोसे रहित है । इन्द्रियेभ्य परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च पर मन । मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ ( कठोपनिषद् १ । ३ । १० ) वह आत्मा इन्द्रिय, पृथिव्यादि विषय, अन्त:करणादि सबसे भिन्न है । शरीरसे सुतरा विलक्षण है । २. औ० आत्मतत्त्व विभु पूर्वपक्ष—शरीरादि विलक्षण आत्मा अणु है, ऐसा सम्प्रदायाचार्यादि मानते हैं । उनका आशय है कि— ‘अणोरणीयान्' ( कठोपनिषद् १ । २ । २० ) यह आत्माका स्वरूप है । अङ्गुष्ठमात्र पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनाना हृदये सन्निविष्ट । ( कठोपनिषद् २ । ३ । १७ ) एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा तमात्मस्थम् ॥ ( कठोपनिषद् २ । २ । १२ ) इन श्रुतियोंसे आत्माका परिमाण अङ्गुष्ठमात्र ही मालूम होता है ।

११४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *


'बालाग्रशतभागस्य' (श्वेताश्वतर० ५ । ९) इस मन्त्रमे आत्माका अणु परिमाण स्पष्ट ही बतलाया है, एव अणु परिमाण आत्माका तत्तल्लोकगमन भी सम्भव है । अतः आत्मा-का परिमाण अणु है—

उत्तरपक्ष—'अणोरणीयान्' इस मन्त्रवर्णमे जो 'अणुमे भी अणु ऐसा आत्माका स्वरूप कहा है, यह उसकी स्तुतिमात्र है, परिमाण निर्णय नहीं ।

अणिमा महिमा चैव गरिमा लघिमा तथा । प्राप्ति प्राकाम्यमीशित्व वशित्व चाष्टसिद्धय ॥

ये अष्टसिद्धियाँ आत्मामे बतलायी गयी है । इसीलिये आगे 'महतो महीयान्' (बड़े से-बड़ा) यह वाक्य-शेष भी सगत होगा, अन्यथा परस्पर व्याघात उपस्थित होगा । जो अणु है वह महान् कैसे ? यदि माना जाय तो परिमाणभेदसे आत्मामे भी भेद माना जायगा, जिससे कि आत्माको अनित्य मानना अनिवार्य हो जायगा । अस्तु, अङ्गुष्ठादिमात्रस्वरूपका जो कथन है वह लिङ्ग शरीरादिके तात्पर्यसे है । आत्मामे औपचारिक है । इस प्रकार विपक्षका बाधन करके स्वपक्ष-(विभुत्व) माधवार्य श्रुतियोंको प्रमाणरूपेण देते है—

'एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा' (कठोपनिषद् १ । ३ । १२)

यहाँ बतलाया गया है कि प्रच्छन्नतया सर्वभूतोमे आत्मा स्थित है । यह बात विना आत्माके विभु माने नहीं घटित हो सकती है । इसलिये आत्मा विभु है ।

ईशा वास्यमिद५ सर्वं यत्किञ्च जगत्या जगत् । (ईशोपनिषद १)

साग जगत् परमेश्वरेण (ईशा) व्याप्त है—आच्छादित है (वास्यम्) ।

'एतस्मादात्मन आकाश सम्भूत ।'

आत्मासे विभु आकाश प्रकट हुआ । अणु आत्मासे विभु आकाशका होना सम्भव नहीं है ।

'अयमात्मा ब्रह्म' 'एकमेवाद्वितीयम्'

ब्रह्म शब्दका ही अर्थ व्यापक है । ब्रह्मपदाभिधेय आत्मा अणु कैसा ? अद्वितीयता तथा एकताके विना विभुताका सम्भव नहीं है ।

'तमाहुरग्र्य पुरुष महान्तम्' (श्वेताश्वतरोपनिषद्)

उस पुरुषको अनादि और महान् कहा है ।

'अस्थूलमनण्वह्रस्वम्' (बृहदारण्यक०)


यहाँ अणुताका शब्दशः प्रतिषेध भी मिलता है । अत औपनिषद आत्मा अणु नहीं, प्रत्युत विभु है, सर्वान्तर्यामी है ।

३. आत्मा परिणामी तथा सावयव नही

पूर्वपक्ष—कायाकार परिणामी आत्मा है । यह सावयव होनेपर भी कथञ्चित् नित्य ही है । उनका कहना है कि जिस पदार्थके गुण जहाँ उपलब्ध हो, उस परिधिमे ही वह पदार्थ मानना उचित है । आत्माके ज्ञानादि गुणोकी उपलब्धि यदि शरीरावच्छेदेन ही है तो शरीरव्यापी ही आत्मा मानना चाहिये । न अणु और न विभु । अवयवोमे सकोच-विकास होता है, अत. चींटीकी आत्मा हस्ति शरीरमे व्याप्त हो सकती है और हस्तीकी आत्मा चींटीमे भी । ये उपनिषद्‌को प्रमाण न माननेवाले कुतार्किकोंमेंसे हे । (जैन)

उत्तरपक्ष—यह सिद्धान्त युक्त्या और श्रुत्या दोनोके विरुद्ध है । सकोच विकास ये परिमाणभेद एक वस्तुमे सम्भव नहीं । यदि माना जाय तो आत्माको उत्पाद विनाशशाली मानना पडेगा । जिसमे कृतहानि और अकृताभ्यागमरूप दोष आ सकेंगे ।

अवस्थान्तरापत्ति‌को परिणाम कहते ह । नित्य आत्माका अवस्थान्तर प्राप्त करना भी सगत नहीं है । उपनिषदोमे कूटस्थता बतायी है ।

'ध्रुव तत्' (कठोपनिषद) 'न जायते म्रियते वा०' (कठोपनिषद् १ । २ । १८) 'अविकार्योऽयमुच्यते' (गीता २ । २५)

इस प्रकार औपनिषद आत्मतत्त्व आत्मा परिणामी किंवा सावयव भी नहीं है, यही ठीक है ।

४. आत्मा ज्ञानस्वरूप, ज्ञानाश्रय नहीं

पूर्वपक्ष—न्यायादि दर्शनोंमें आत्माका यही मुख्य लक्षण माना गया है कि आत्मा वही है जो ज्ञानाधार है । आत्मा स्वतन्त्र द्रव्य है, उसमे समवायसे ज्ञान, सुख, दुःख, इच्छा आदि चतुर्दश गुण उत्पन्न होते है और कार्यकारणभावके पौर्वापर्य नियमके (Theory of Causation) अनुसार युक्ति भी सङ्गत है । प्रमाण, प्रमिति, प्रमेय, प्रमाता—इनमे भेद आवश्यक है । इसी प्रकार यदि ज्ञान ही आत्मा है तो घटविषयक ज्ञान आत्मा है या पटूविषयक ? यह प्रश्न निरुत्तर रहेगा ।

'य सर्वज्ञ सर्ववित्' इस श्रुतिमे 'सर्वज्ञ शब्दका यही अर्थ है कि 'सर्वपदार्थविषयक ज्ञानवान्' । यहाँ आधारका

ः औपनिषद आत्मतत्त्व ः ११५

वाव अनिवार्य है। इसी प्रकार 'असुखम्' इस श्रुतिका भी 'आत्मा सुखभिन्न है' यह अर्थ मानना चाहिये । उत्तरपक्ष—आत्मा ज्ञानस्वरूप ही है। ज्ञानभिन्न सभी पदार्थ जड़ होते हैं और आत्माको जड़ मानना महामूर्खताका लक्षण है। उपनिषदोंमें कहा है— 'अत्रायं पुरुष स्वयं ज्योति.' (बृहदारण्यकोपनिषद्) 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीयोपनिषद्) 'अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभू.' (बृहदारण्यकोपनिषद्) 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (" ") इन वाक्योंमें आत्माको ज्ञानस्वरूप कहा है। 'विज्ञानम्' इस वाक्यमें विशेषेण ज्ञान जिसका है, इत्यादि रीतिसे व्याख्यान स्वरशास्त्रके विपरीत होनेके कारण नहीं माना जा सकता। इसलिये औपनिषद आत्मा ज्ञानस्वरूप है यह मानना उचित है। घटविषयक विज्ञान आत्मा है किंवा पटविषयक ? इस प्रश्नका यही उत्तर है कि—'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय०) यहाँपर सभी पद लक्षणवृत्तिसे स्वार्थतर- व्यावृत्त वस्तुस्वरूपके बोधक हैं । ज्ञान शब्द जानेतरव्यावृत्त ब्रह्मका बोधक है । अर्थात् ब्रह्म अज्ञानरूप नहीं है अथवा सर्वविषयक ज्ञानको आत्मा कहा जाय तो कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि प्रत्येक सर्वज्ञ इसलिये नहीं हो सकेगा कि वह उपाधिपरिच्छिन्न है । एव ज्ञानके साधन जो कि अन्तःकरणवृत्त्यादिक हैं, वे सन्निहित नहीं होते, जिस विषयके लिये सामग्री होती है उस विषयमें ज्ञान अवश्य ही होता है। ५. आत्मा उपादान-कारण और निमित्त-कारण पूर्वपक्ष—'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद् ब्रह्म ।' —इत्यादि श्रुतियोंसे जगत्‌का कारण 'ब्रह्मात्मतत्त्व' है, यह अवगत हुआ। यहाँ यह शङ्का हो सकती है कि घटकी मृत्तिकाके समान उपादान-कारण है कि वा घटके प्रति कुलालके समान निमित्तकारण है ? उचित यही होगा कि उसे 'निमित्त-कारण' माना जाय । क्योंकि उस ब्रह्मके विषय- में उपनिषद्‌में कहा गया है कि—'स ऐक्षत ईक्षाञ्चक्रे' (प्रश्नोपनिषद्) (सृष्टिकी उसने इच्छा की) । इच्छा तथा मननपूर्वक कार्य करना यह निमित्त कारणका ही लक्षण है। आदान कारणके गुणधर्मोंकि कार्यमें अनुवृत्ति पायी जाती है। यदि चेतन आत्माको जगतका उपादान कहा जाय तो जगतम कुछ भी जड़ न होकर सब चेतनस्वरूप ही होना चाहिये ।

उत्तरपक्ष—यह ठीक है कि ईक्षण करनेवाला ब्रह्म जगत- का कारण है, किंतु उपादान भी मानना चाहिये । जो गुणधर्मके अनुवर्तनका प्रश्न है वह विवर्त माननेसे समाहित हो सकता है। जगत् अविद्याका परिणाम है और ब्रह्मात्मतत्त्वका विवर्त्त है। किसी निश्चयात्मक वस्तुका यदि अन्य रूपसे भान होने लगे तो उसे 'विवर्त्त' कहते हैं। जिस प्रकार रज्जुका सर्पाकार भान होता है। उपादानके जानसे कार्यका भी ज्ञान सरल होता है, यह विषय आत्माके सम्बन्धमे भी उपपन्न है। उपनिषद्में प्रश्न किया गया है कि— 'कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति ।' 'किसके जानसे यह सब जाना जा सकता है।' इस प्रश्नका उत्तर यही है कि— आत्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इद५ सर्वं विदितं भवतीति । आत्मतत्त्वके श्रवण-मननादिसे यह सर्व जगत् ज्ञात हो सकता है। यह भान बिना आत्मानुवृत्ति (आत्माव्यतिरिक्ता) के नहीं हो सकता, और अव्यतिरिक्तिा आत्माको उपादान माने बिना नहीं आ सकती। अतः आत्माको उपादान मानना भी आवश्यक है। ६. औपनिषद् आत्मा ही केवल जगत्कारण जो भी यह कार्यजाल दिखायी दे रहा है इस सबका कारण वह एक आत्मा ही है और कोई अन्य उसे अपेक्षित नहीं है। ऐतरेयोपनिषद्‌मे कहा गया है कि— ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत, नान्यत्किञ्चन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति । (१।१।१) 'यह सारा जगत् पूर्वम आत्मा ही था, अन्य कोई और तत्त्व नहीं था, उस आत्माने अपनी इच्छासे लोकका सर्जन किया ।' इससे यह सिद्ध है कि सृष्टिके मूलम एक ब्रह्म तत्त्व ही रहा है। सर्व जगत् उसका विवर्त्त है, इसलिये उससे विरूप है। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ (कठोपनिषद) यह एक कारणवाद युक्तिसङ्गत भी है, दर्शनशास्त्रका उद्देश्य मूलतत्त्वका परिचय कराना ही है, क्योंकि मानव-

११६ ४ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह अनेकोंमे एकता देखना चाहता है। अनेक वस्तुओंका भी किसी रूपसे एकीकरण चाहता है। उदाहरणके रूपमे देखिये- राम, शिव, यज्ञदत्त, देवदत्त नामके व्यक्ति जब हमारे सम्मुख आते हैं तो हमारे अन्तस्तलमे प्रश्न उपस्थित होता है कि 'ये भिन्न ही हैं कि या किसी रूपसे एक भी हैं ?' उत्तर मिलेगा-'ये सब पुरुष ह।' इसी प्रकार सीता, सावित्री, गोमती, रम्भा आदिमें भी शङ्का होगी। फलतः स्त्रीरूपमे उन्हें एक मान सकते हैं। इन स्त्री पुरुषसमुदायम भी मनुष्यत्वेन एकता मिलती है। यह मनुष्यसमूह, दूसरी ओर पशुसमूह, अन्य पक्षिसमूह और कुक्कुरसमूह-इनमे यदि भेद-शङ्का हो तो उसका समाधान है-'ये सब सजीव हं', अर्थात् प्राणित्वेन ( आत्मत्वेन ) सबको एक कहेंगे। इस ओर आत्मा है, कुछ जड़ पदार्थ भी हैं, इनमें भेदाभेद विचारमे ही समस्त दार्शनिकोंका मस्तिष्क स्फोट है। कोई भी इनका एकीकरण नहीं कर पाते तथा जडोंके लिये एक प्रकृति-तत्त्व पृथक् भी मानते हैं, किंतु उपनिषद्की विचारधारामें-इसमे सन्तोष करना उचित नही माना गया तथा जड और आत्मा-इनमे भी एकताका अनुभव चाहा और सकल जडकोभी 'आत्मैवेदमग्र आसीत्' कहकर आत्मामें समाविष्ट किया गया। इस प्रकार आत्मा एक ही मूल कारण सिद्ध हुआ, यह श्रुति सिद्धान्त ही नही, बल्कि युक्तियुक्त भी है। जैसा कि पूर्वमे आत्माको कारण सिद्ध किया जा चुका है। लोक- व्यवहारमे भी यह 'न्यूनतम कारणवाद' (Law of parsimony of causes) तथा सृष्टिकी मितव्ययिता (Law of economy of nature) प्रसिद्ध ही है। हम किसी कार्यकी उत्पत्ति यदि स्वल्प कारणोंसे कर सके तो अधिक एकत्रित ( सामग्री) करना उचित नहीं मानते। प्रत्युत ऐसा करनेवालेको 'अविद्वान्' कहते हैं। इस प्रकार आत्मतत्त्व ही केवल जगत्का उपादान माना जाय, यह श्रुतिसम्मत ही नहीं, प्रत्युत युक्तिसम्मत भी है। ७. आत्मा और जीवमें अद्वैत उपनिषत्प्रतिपाद्य आत्मतत्त्वका उसके कार्यभूत जगत्से तथा जीवमे भेद है अथवा अभेद ? इस दिशामे उपनिषत्- सिद्धान्त तो यही है कि आत्मतत्त्व और जीवतत्त्व-इनमें भेद नहीं है और जगत् भी उसमे वस्तुत भिन्न नहीं है। इस विषयमें महान् मतभेद हैं- पूर्वपक्ष-कुछ दार्शनिक प्रत्येक शरीरमे भिन्न-भिन्न आत्मा हैं और ईश्वर नहीं है, ऐसा मानते हैं। उनका कहना है कि यदि आत्मा एक हो तो एक ही आत्मामे एक काल- में भिन्न-भिन्न विरोधी गुण कैसे आ सकते हैं। कुछ अन्य दार्शनिक ईश्वरको मानते हुए भी आत्माओंसे उसी प्रकार भिन्न मानते हैं, जिस प्रकार आत्माएँ सब परस्पर भिन्न हैं। मुण्डकोपनिषद्में कहा है कि- 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया' (३।१।१) यहाँपर ईश्वर और जीवके अभिप्रायसे ही 'द्वि' शब्दका प्रयोग किया गया है। 'निरञ्जन' परम साम्यमुपैति' आत्मा निरञ्जन होकर परमेश्वरकी समानता प्राप्त करता है। वह समानता दो भिन्न तत्त्वोंके ही व्यवहारमें आ सकती है। ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे। छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ (कठोपनिषद् १।३।१) संसारमे सुकृतके फलका पान करते हुए यद्यपि जीव और ईश्वर-ये दोनों ही फल पान नहीं करते, तथापि जीवसे सम्बन्ध होनेके कारण 'पिबन्तौ' कहा है। छाया तथा आतपके समान विलक्षण अर्थात् जीव संसारी और ईश्वर असंसारी है-ऐसा ब्रह्मज्ञजन कहते हैं। इस अर्थमें जीवेश्वर-भेद स्फुट बतलाया है। X X X इसी प्रकार अन्य उपनिषदोंमें भी अनेक प्रकारसे आत्मतत्त्वका निर्देश है। १ कर्ता भोक्ता संसारी पुरुष है। २ साक्षी जीव कर्मफलदाता ईश्वर है। ३ 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह, नेति नेति' आदि वचनोंसे बोध्य असंसारी आत्मा। (ऐतरेयोपनिषद्- शाङ्करभाष्यके अनुसार) X X X १. विश्व-जागरितावस्थामें जिसको बाह्यका ज्ञान होता है। (माण्डूक्योपनिषद्) २ तैजस-स्वप्नावस्थामें जिसको आभ्यन्तरका ज्ञान होता है। (माण्डूक्योपनिषद्)

  • औपनिषद आत्मतत्त्व * ११७

३ प्राज्ञ-सुषुप्तावस्थामे जिसे कुछ भी भान नहीं होता है । ( माण्डूक्योपनिषद् ) ४ तुरीय-सर्वथा ईश्वर सर्वज्ञ अन्तर्यामी चतुर्थ है । ( माण्डूक्योपनिषद् )

जब कि आत्माके ये भेद उपलब्ध हैं, तो एकात्मवाद ( अद्वैत ) कैसे समझा जाय ? यदि कहा जाय कि— 'तत्सत्यम् ... स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो'

इस छान्दोग्योपनिषद्मे तत्=ब्रह्मके साथ 'त्वम्' पदार्थ जीवका अभेद बताया है, तो द्वैत कैसे माना जाय ? ठीक है, किंतु यह अर्थ ठीक नहीं है। तत् शब्द सत्यका परामर्श करता है और 'तत्त्वमसि'का प्रसङ्गसे यही अर्थ होगा कि—'हे श्वेतकेतो ! तू सत्य है, तेरे बिना यह शरीर आदि सब शून्य हैं। अब अद्वैत कैसे माना जाय ?'

यदि कहा जाय कि—'एकमेवाद्वितीयम्' यहाँ अद्वितीय तत्त्वका उल्लेख है, तो फिर जीव भिन्न कहाँसे रहेंगे ? यह भी ठीक नहीं। यहाँ 'एक' शब्दसे एक जातीय भी ले सकते हैं, जैसे समस्त घट एकजातीय मृत्तिकासे जायमान हैं न कि एक ही मृत्तिकासे समस्त घट बनें । यह अनुचित भी है, क्योंकि एक ही मृत्तिकासे नाना घट कैसे बन सकते हैं ?

उत्तरपक्ष—पूर्वोक्त विषय उपनिषत्-सिद्धान्तके प्रतिकूल है तथा आपातरमणीय भी है। जो हमें प्रति शरीरमें आत्मभेदको अनुभव होता है वह शरीरके भेदसे ही है, जैसा कि एक ही आकाशके घट, मठ आदि उपाधि-भेदसे भेद व्यवहारमें आता है, वस्तुतः भेद नहीं होता है ।

जो यह कहा गया कि विपरीत गुणोंका समावेश कैसे ? उसका उत्तर पहले ही दिया जा चुका है कि आत्मा निर्गुण है। सभी गुण अन्तःकरणके ही आत्मामें प्रतिफलित होते हैं। आत्माके लिये कहा गया है कि 'असङ्गो हि सः' ( वह असङ्ग=गुणादि धर्मरहित है । ) बृहदारण्यकोपनिषद्में कहा है कि—

'कामो विचिकित्सा धीर्ह्रीरित्येतत्सर्वं मन एव ।'

इससे यह सिद्ध है कि—आत्मामें ये सब धर्म नहीं हैं, सुख-दुःखादि सब गुण अन्तःकरणमें ही हैं।

'द्वा सुपर्णा' आदि वाक्योंमें जो जीवेश्वर-भेदकी कल्पना बतलायी है, वह भी औपचारिक है, वास्तविक नहीं है ।

कर्ता, ईश्वर, असंसारी, प्राज्ञ, विश्व, तैजस, तुरीय आदि एक ही आत्माकी औपाधिक दशाएं हैं, न कि इन नामवाले कोई भिन्न आत्मा हैं ।

तत्सत्यम् ... ... स आत्मा तत्त्वमसि ।' —का जो आधुनिक आर्यजन अर्थ करते हैं, वह ठीक नहीं है, क्योंकि उससे प्रकरणसङ्गति नहीं बैठती ।

तत् सत्यम्=वह ब्रह्म सत्य है ( असत्यव्यावृत्त है ) । स आत्मा=वही ब्रह्म आत्मा है । तत्त्वम्=तुम भी वही ब्रह्म हो, तत् शब्दसे विशेषणवाचक सत्यका परामर्श करना अनुचित है । इससे जीवब्रह्मैक्य सिद्ध है ।

'एकमेवाद्वितीयम्' यहाँ 'एक' शब्दका अर्थ 'कैवल्य' है, जो कि 'सजातीय, विजातीय और स्वगतभेदशून्य' अर्थमें आता है । यदि पूर्वोक्त ही अर्थ माना जाय तो 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि वचन भी असङ्गत होंगे । निम्नलिखित वाक्योंसे भी अद्वैत कथित है—

'यथाग्ने क्षुद्रा स्फुलिङ्गा व्युच्चरन्ति, एवमेवा- स्मादात्मन सर्वे आत्मानो व्युच्चरन्ति ।' ( बृहदारण्यकोपनिषद् )

प्रथमावस्थामें एक ही आत्मतत्त्व है और उसीके समस्त अग्निकणके समान भेद है ।

'सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ।' ( छान्दोग्योपनिषद् ) 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् ।' ( ,, ) 'अहं ब्रह्मास्मि ।' ( ,, ) 'अयमात्मा ब्रह्म ।' ( ,, )

इन वाक्योंसे जीव और ब्रह्मकी वास्तविक एकता स्फुट ही है ।

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'नेति' 'यतो वाचो निवर्तन्ते' आदि वाक्योंसे भी पूर्वोक्त अद्वितीय आत्मतत्त्व ही प्रतिपाद्य है । जैसे—एक अपराधी मुग्ध-पुरुषसे उसका स्वामी कह दे कि 'तुझे धिक्कार है, तू मनुष्य नहीं है।' यह सुनकर मुग्ध पुरुष सन्दिग्ध होकर अन्य किसी विज्ञके पास जाकर अपने स्वरूपके सम्बन्धमें पूछने लगे कि 'कृपया मुझे बतलाइये मैं कौन हूँ ।' वह विज्ञ पुरुष उसकी मुग्धतापर मन ही मन हँसकर उससे कहेगा कि—'मै क्रमशः तुझे समझा दूँगा।' इतना कहकर वह विज्ञ पुरुष मुग्ध पुरुषको समझायेगा कि 'तू घट, पट, पृथिवी, शरीर आदि नहीं है, न पाषाण है, न जल है और

११८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * न तेन हे अर्थात् तू अमनुष्य नहीं है।' इस प्रकार विज्ञ युष्मद्भाग अमनुष्य प्रतिषेधरूपसे 'तू मनुष्य है' यह समझाया जा सकता है किंतु वह मुग्ध पुरुष यदि समझदार होगा तभी समझ सकेगा न कि मुग्धावस्थासे । इसी प्रकार 'नेति' शास्त्र मसारकी दृश्य सकल वस्तुओ- का प्रतिषेध करते हुए ब्रह्मस्वरूपका परिचय कराते हैं। किंतु इन वाद्योंसे आत्मावबोध अन्तःशुद्धि होनेपर ही होगा, १ कि उम मुग्ध पुरुषकी तरह जिसे 'तू अमनुष्य नहीं' यह कहनेपर तो क्या, किंतु 'तू मनुष्य है' यह कहनेपर भी बोध नहीं हो पाता, अपवित्र रहनपर । इस प्रकार पूर्व शङ्का-समाधानोंसे औपनिषद आत्मतत्त्वका सक्षिप्त परिचय कराया जा सकता है। वस्तुत वह अससारी, अनिर्वचनीय अद्वितीय हे । लेखके क्लेवरवृद्धिके भयसे इस विषयको यहीं समाप्त किया जाता है। यदि इस लेखके द्वारा पाठकोंका किञ्चिन्मात्र भी लाभ होगा तो लेखक अपना परिश्रम सफल समझेगा । उपनिषदोंका महत्त्व और उद्देश्य ( लेखक—श्रीताराचन्द्रजी पाण्ड्या, बी० ए० ) वेदोंके कर्मकाण्ड-भागकी तो गीताने अप्रशंसा-सी ही की है ( श्रीमद्भगवद्गीता २ । ४२-४५, ९ । २०-२१), परन्तु उपनिषदोंसे ही तो गीताकी उत्पत्ति हुई है—वह उपनिषद्- रूपी गायोंका दूध है और जैसा कि गीताके प्रत्येक अध्यायको समाप्त करनेवाले शब्दोंसे सूचित है, गीता स्वय भी एक उपनिषद् है। उपनिषदोंके अनेक मन्त्र प्राय' ज्यो के त्यो गीतामें गुम्फित हे । अशाश्वत, जड, परम्परूप सासारिक पदार्थोंको छोड़कर शाश्वत, विज्ञानघन आनन्दमय, निजस्वरूप आत्माको पहचाननेका और उसमे तन्मय हो जानेका जो दिव्य और सनातन ज्ञान आदिम कालमे उद्भूत—अवतरित—हुआ था, वह उपनिषद्दोमे निहित है। उपनिषदोंका लक्ष्य है—'आत्मान विद्धि'—आत्माको-अपने आपको जानो-पहचानो। जो इस आत्माको नहीं जानते और उसके स्वरूपसे विमुख रहते हैं। वे आत्मघाती हैं, उनकी अधोगति होती हे— असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता । ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जना. ॥ ( ईशावास्योपनिषद् ३ ) आत्मज्ञानको ही विद्या माना है और शेषको अविद्या। अविद्यामे मोहजनक विनश्वर लौकिक सुख भले ही प्राप्त हो जायँ, परन्तु अनन्त और वास्तविक आनन्द (अमृतत्व) तो विद्यासे ही उपलब्ध हो सकता है। जो विद्यासे रहित है, वह न तो म्वय कल्याण पथपर चल सकता है और न दूसरोंका ही मार्ग-प्रदर्शन कर सकता है— अविद्यायामन्तरे वर्तमाना स्वयं धीरा पण्डितम्मन्यमाना। दन्द्रम्यमाणा परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धा ॥ ( कठोपनिषद् १ । २ । ५) किंतु विद्या वही सुफल दे सकती है जो सच्ची और हार्दिक हो; मिथ्या या कपटपूर्ण (Hypocritical) होने- पर तो वह विद्या (या विद्याभास) अविद्यासे भी अधिक अनर्थकारिणी हो जाती है— अन्धं तम प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया ँरता. ॥ ( ईशावास्योपनिषद् ९ ) विद्या श्रेय है और अविद्या प्रेय है। प्रेयसे श्रेय अधिक उपादेय है। जो विद्या और अविद्याकी भिन्न-भिन्न सिद्धियोंको समझता है और अपने उच्चतर एव एकमात्र लक्ष्य आत्मो- पलब्धिसे च्युत नहीं होता, वह दोनोंका सदुपयोग करके लाभ उठा सकता है अर्थात् अविद्यासे मृत्यु अर्थात् लौकिक कष्टोको दूर करके और इस प्रकार अपेक्षाकृत सुखपूर्वक विद्याका साधन करके अमृतत्वको प्राप्त कर सकता है— अविद्यया मृत्यु तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते । ( ईशावास्यो० १४) परतु यथार्थ और एकमात्र उद्देश्य तो अमृतत्वकी प्राप्ति ही रखना चाहिये और अन्य सब कामनाओंको हेय ही समझना चाहिये । पराच कामाननुयन्ति बाला- स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् । अथ धीरा अमृतत्व विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ ( कठोपनिषद् २ । १ । २)

~ उपनिषद्-ग्रन्थोंका रचनाकाल * ११९


यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिता । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ ( कठोपनिषद् २ । ३ । १४ )

आत्माके लिये शरीर है, न कि शरीरके लिये आत्मा । शरीर तो आत्माकी गति (ऊर्ध्वगति या अधोगति) के लिये एक साधन है । इसका उपयोग करनेवाला इससे भिन्न है ।

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मन प्रग्रहमेव च ॥

नचिकेता, जाबाल आदिकी अनेक कथाओंसे उपनिषदोंकी प्रभावक्ता और भी अधिक बढ़ी हुई है । ये सुन्दर, सरल और हृदयस्पर्शी कथाएँ जिस मार्मिक प्राचीन कालकी घटनाओंका वर्णन करती हैं, उसे मानो हजारो और लाखो वर्षोंके व्यवधानको दूर करती हुई आँखोंके सामने ले आती ह और उसकी पवित्रताकी सुगन्ध हृदयमे भर देती हैं ।

उच्च आध्यात्मिक ज्ञानके विषयवाले होनेपर भी उपनिषदोंके अनेक वाक्य निम्नस्तरके दैनिक जीवनके लिये भी अत्युपयोगी हैं । 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृध कस्यस्विद्धनम्' 'मा विद्विषावहै' आदि वचनोंके अनुसरणकी वर्तमान जगत्के हित, सुख तथा रक्षाके लिये कितनी आवश्यकता है, यह सूर्य प्रकाशवत् इतना सुस्पष्ट है कि इसको बतानेकी आवश्यकता नहीं है ।


उपनिषद्-ग्रन्थोंका रचनाकाल

(लेखक---ज्यो० भू०प० श्रीइन्द्रनारायणणी द्विवेदी )

संस्कृत साहित्यमे उपनिषद् ग्रन्थोका स्थान बहुत ऊँचा है । यहाँतक कि वेदोंके शिरोभागके नामसे उपनिषदोंका परिचय दिया जाता है और अध्यात्मज्ञानके लिये उपनिषद्-ग्रन्थ ही एकमात्र साधन हैं । वेदान्तसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता आदि समस्त गीताएँ उपनिषदोंके ही ज्ञानरत्नोंसे परिपूर्ण हैं । अवश्य ही हमारे उपनिषद् ग्रन्थोंमे सबम अधिक मान उन उपनिषदोंका है जो संहिता अथवा ब्राह्मणरूप वेदाके अन्तर्गत हैं, किंतु उन उपनिषदोंका भी मान है, जिनके मूल वेद और ब्राह्मणके उपलब्ध भागोंमे हमको वर्तमान समयम नहीं मिलते और वदानुयायी पौराणिक साहित्यमे जिनके प्रमाण मिलते हैं । ये सब उपनिषद् ग्रन्थ, संस्कृत-साहित्यमे हम भारतीयोंके ज्ञानकाण्डके भण्डार माने जाते हैं ।

हमारे उपनिषद् ग्रन्थोंका इस प्रकार मान देखकर किसी चाटुकारने अकबरके समयमे 'अल्लोपनिषद्' नामकी एक छोटी सी पुस्तिका लिखी थी, जिसमे अरबी और संस्कृतकी मिश्रित भाषामे दम गद्य ह और रसूल, महम्मद, अकबर आदि शब्द आये हैं, किंतु इतने स्पष्ट प्रमाणोंके होते हुए भी इस समयके एक इतिहासके विद्वानके मुखसे उसकी गणना वैदिक साहित्यम कराके मुसलमानोंके पुष्टीकरणकी नीतिमे चाटुकारी दोहगयी गयी हैं--यह कितन आश्चर्यकी बात है । इतना ही नहीं, हमारे उपनिषद् ग्रन्थाकी ओरसे श्रद्धा हटाने के अभिप्रायम प्रो० मेक्समुलर जैसे विद्वानने एक 'मक्सोपनिषद्' नामकी पुस्तिका रची थी और लोगोंके आपत्ति करनेपर प्रोफेसर माहबने लिखा था कि हमन मजाकके तौरपर इसकी रचना की है । प्रोफेसर माहवका वह पत्र 'सरस्वती' मासिक पत्रिका (प्रयाग) मे छपा था । सम्भवत उसी प्रकार दूसरे चाटुकार, मज़ाकी अथवा अपने धार्मिक मतके समर्थनमे उपनिषद्नामसे कुछ पुस्तके लिखनेकी चेष्टा करनेवाले और भी हुए हो अथवा भविष्यम हो, जिनकी रचनाम लोगोंको उपनिषद् ग्रन्थोंके विषयम सन्देह हो । अतएव केवल उपनिषद् नामपर नहीं--उसके आधार ओर ज्ञानोपदेशपर विचार करके हमको निश्चय करना चाहिये कि ये ग्रन्थ वस्तुत उपनिषद्-ग्रन्थ हैं अथवा चाटुकारों और धूर्ताकी कपोल-कल्पना है ।

जिन उपनिषद् ग्रन्थोंका हमारे संस्कृत साहित्यम सर्वोच्य स्थान है और जिनका अस्तित्व हमारे वैदिक साहित्यमे उपलब्ध है, आज हम उन्हीं उपनिषद् ग्रन्थोंके रचना कालपर विचार करना चाहते हैं । मैत्रायणीशाखामे अपाणिनीय शब्दोंको देखकर कुछ लोगोंका मत है कि वह शाखा पाणिनिके पूर्वकी है । अतएव मैत्र्युपनिषद् भी पाणिनिके पूर्वकालकी है, किंतु भाषातत्त्वके विद्वानांके इस मतसे हम सहमत नहीं कि किसी ग्रन्थमे अपाणिनीय शब्दके प्रयोगसे उसको हम पाणिनिसे पूर्वका ग्रन्थ मान लें, अथवा उसके आधारपर पाणिनिके समयको हम पीछे हटानेकी चेष्टा करें, क्योकि संस्कृत-साहित्यमें न जाने कितने आधुनिक ग्रन्थ भी ऐसे हैं, जिनमें अपाणिनीय शब्दोंके प्रयोग अधिकतामे मिलते हैं ।

१२० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

अवश्य ही मैत्र्युपनिषद् (६।१४) मे ज्योतिष सम्बन्धी 'मघाद्य श्रविष्ठार्द्धम्'के रूपमें दक्षिणायनका वर्णन आया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि उस समय आधे धनिष्ठासे उत्तरायण (मकरका आरम्भ) होता था । स्व० बा० लोकमान्यतिलकने गीतारहस्य (पृ० ५५२) मे लिखा है कि 'मैत्र्युपनिषद् ईसाके पहले १८८० से १६८० वर्षके बीच कभी न-कभी बना होगा । क्योंकि लोकमान्यके मतसे वेदाङ्ग ज्योतिष- कालका उदगयन, मैत्र्युपनिषद् कालीन उदगयनकी अपेक्षा लगभग आधे नक्षत्रसे पीछे हट आया था । ज्योतिर्गणितसे यह सिद्ध होता है कि वेदाङ्ग ज्योतिषमे कही गयी उदगयन स्थिति ईसाई सनके लगभग १२०० या १४०० वर्ष पहलेकी है' (गीतारहस्य पृ० ५५२) । साराश यह कि लोकमान्यके मतसे मैत्र्युपनिषद् ग्रन्थका रचनाकाल, ईसासे पूर्व कम से-कम १२०० वर्ष सिद्ध होता है । मैत्र्युपनिषद् ग्रन्थमे अनेक स्थलोमे छान्दोग्य, बृहदारण्यक, तैत्तिरीय, कठ और ईशावास्य-उपनिषदोंके वाक्य तथा श्लोक प्रमाणार्थ उद्धृत किये गये हैं । अतएव यह स्वयंसिद्ध है कि छान्दोग्य, बृहदारण्यक, तैत्तिरीय, कठ और ईशावास्य उपनिषद्ग्रन्थ ईसाके पूर्व १२०० १४०० वर्ष (मैत्र्युपनिषद् ग्रन्थ रचनाकाल) के भी बहुत पहलेके हैं । अवश्य ही ज्योतिप्रगणितके अनुसार लोकमान्यतिलकने जो समय निश्चित किये हैं, वे समय वस्तुत निश्चित ही है—यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि आधुनिक गणितज्ञोंके मतमे ज्योतिषकी वही स्थिति जो मेन्युपनिषद् ग्रन्थमे कही गयी है—आधे धनिष्ठासे उत्तरायणका आरम्भ, ईसासे पूर्व जिस प्रकार १८८० १६८० वर्ष पूर्व हुई होगी, ठीक उसी प्रकारकी स्थिति ईसासे २७८८० २७१६८० वर्ष पूर्व भी थी और उसके पूर्व भी २६००० २६००० वर्ष पूर्व होती रही है। अतएव हम इस बातको माननेके लिये बाध्य नहीं कि हमारे वैदिक साहित्यके शिरोभाग उपनिषद् ग्रन्थ ईसासे पूर्व १८८०-१६८० वर्षमे ही रचे गये है । अवश्य ही जिन पाश्चात्य विद्वानोंके धर्म-ग्रन्थानुसार मानव सृष्टिका आरम्भ ही ईसासे पूर्व लगभग ४००० वर्षसे माना जाता है, वे उपनिषद्-ग्रन्थोंके उत्तरायण- वर्णनसे अन्तिम काल ईसासे पूर्व १८८०-१६८० उपनिषद्- ग्रन्थोंका रचनाकाल मानें तो इसमें आश्चर्यकी बात नहीं है, किंतु वैदिकधर्मके माननेवाले भारतवासी हम जिनके सृष्टिका आरम्भकाल इस समय विक्रम संवत् २००५ के १९५५८८५०४९ वर्ष पूर्व माना गया है, और जिनके सिद्धान्त ज्योतिषके गणित सहस्र चतुर्युगीय कल्पके आधारपर किये गये हैं, अपने उपनिषद्-ग्रन्थोंका रचनाकाल नही, आविर्भावकाल उस समयको मानेंगे जो मघा-नक्षत्रसे दक्षिणायन और आधे वनिष्ठा नक्षत्रसे उत्तरायणका समय वर्तमान सृष्टिमें (जिसके छः मन्वन्तर बीत चुके हैं और सातवें मन्वन्तरके अठाईसवें कलियुगके ५०४९ वर्ष भी बीत चुके हैं) सबसे प्रथम आया होगा । साराश यह कि हमारे उपनिषद् ग्रन्थोका रचनाकाल, आधुनिक गणितज्ञोंके गणितसे ही अतिप्राचीन सिद्ध होता है और यदि पुरातत्त्वज्ञानके प्रचारसे पाश्चात्य विद्वानोको अपने मानव-सृष्टिकालके आरम्भकालकी त्रुटि विदित हो गयी और वैदिक सृष्टिकी ओरसे अविश्वास हट गया तो वे भी यह बात मान लेंगे कि हमारे वैदिक साहित्यके शिरोभाग-उपनिषद् ग्रन्थो का रचनाकाल शताब्दियोंमे नहीं गिना जा सकता । हम आशा करेंगे कि पक्षपात और धर्मविरोधी भावनाको त्यागकर ऐतिहासिक जन हमारे इस विचारकी ओर अवश्य ध्यान देंगे कि उपनिषदग्रन्थोंके समय निरूपणमें सबसे प्रथम धनिष्ठार्द्धके उत्तरायणको न मानकर सबसे अन्तके धनिष्ठार्द्धके उत्तरायण- को माननेके लिये क्या कोई प्रमाण है ? और यदि नहीं तो, हमारा मत अवश्य सर्वमान्य होना चाहिये ।

औपनिषद सिद्धान्त

ब्रह्म, सगुण, निर्गुण तथा निराकार, साकार । परमात्मा, परमेश, विभु, विश्व, विश्व आधार ॥ प्रणव, यज्ञ, यज्ञेश, सब प्रकृति, पुरुष, पर, वेद । भेदरहित, नित भेदमय, संयुत भेदाभेद ॥ सर्वरूप, शुचि, सर्वमय, शाश्वत, सर्वातीत । शुद्ध सत्त्व, पुनित्रिगुणमय, यद्यपि त्रिगुणातीत ॥ नारायण, नरसिंह, श्रीकृष्ण, राम, गोपाल । सूर्य, शक्ति, गणनाय, शिव, रुद्र, स्वयम्भू, काल ॥ नाम-रूप-लीला विविध तत्त्व एक वेदान्त । वाणी-मन-मतिसे परे औपनिषद सिद्धान्त ॥

वेदों और उपनिषदोंमें मांस-भक्षण और अश्लीलता नहीं है ( लेखक—पाण्डेय पं० श्रीरामनायणदत्तजी शास्त्री 'राम' )

वेद अपौरुषेय हे—परमात्माके निःश्वासरूप हैं। वे ज्ञानके अक्षय एव अगाध भण्डार हैं। वेदवेद्य परमात्मा और वेद दोनो ही 'ब्रह्म' नामसे प्रतिपादित होते हैं। वेद ज्ञानमय हैं और ज्ञान ही ब्रह्मका स्वरूप है। अतः वेद ब्रह्मसे भिन्न नहीं हैं। ब्रह्मके लिये विज्ञान, आनन्द, सत्य एव अनन्त आदि विशेषण प्रयुक्त होते हैं, ये सभी वेदमे भी गतार्थ हो जाते हैं। यद्यपि ब्रह्म निर्विशेष है—अनिर्वचनीय है, तथापि जब हम वाणीद्वारा उसके स्वरूपके सम्बन्धमें कुछ कहने- को प्रस्तुत होते हैं, तब हम उसे सविशेष कर ही देते हैं। यह ब्रह्मकी न्यूनता नहीं, हमारी अपनी असमर्थता है। जैसे ब्रह्म अनवद्य और अनामय है, वैसे ही वेद भी हैं; अतः वेदमें कोई ऐसी बात नहीं हो सकती जो मनुष्यके लिये परम कल्याणमयी न हो। जब ब्रह्म ही शान्त और शिवरूप है तब उसीका ज्ञान वेद अशिवरूप कैसे हो सकता है ? वेदका शिरोभाग है उपनिषद्, जो केवल ज्ञानप्रधान होनेसे 'ज्ञानकाण्ड' कहलाती है। वेदोंका अन्त अथवा वेदोंका चरम सिद्धान्तरूप होनेसे उपनिषद्को वेदान्त शास्त्र भी कहते हे। जीवमात्रके अकारण सुहृद् परमात्माने अपने स्वरूपभूत वैदिक ज्ञानका आलोक इसीलिये प्रकाशित किया कि सब लोग इस तमोमय जगत्‌से निकलकर प्रकाशमय परमात्मपदकी ओर बढ़ें। असत्‌से सत्‌की ओर और मृत्युसे अमृतपदकी ओर प्रगति कर सकें। इतनेपर भी कुछ लोगोंने वेदोंपर लाञ्छन लगानेकी चेष्टाएँ की हैं, उनपर दोषारोपणका दुःसाहस किया है। उनकी समझमें वेदोंसे मास-भक्षणकी प्रवृत्तिको प्रोत्साहन मिलता है और वेदोंमें उन्हें अश्लीलता भी दिखायी देती है। यह तो निर्विवाद सिद्ध है कि प्रकाशमे तम नहीं रह सकता। फिर भी, जब हम प्रकाशमें खड़े होते हैं तो हमें वहाँ अपनी ही छाया दीख पड़ती है। निर्मल जल या स्वच्छ दर्पणमें निकटसे देखनेपर हमे अपने ही प्रतिबिम्बका दर्शन होता है। यदि हम उस काली छायाको भी प्रकाशका अङ्ग तथा प्रतिबिम्बको भी जल और दर्पणका अवयवविभाग मान लें तो इससे हमारे ही अज्ञानका परिचय मिलेगा, इससे उन प्रकाशादि वस्तुओंकी निर्मलतामें दोष नहीं आ सकता। यही दशा उपर्युक्त आरोपोंकी भी है। वेदोंमें न मासकी विधि है, न अश्लीलताका नग्न चित्रण ही। यह सब हमे अपने परिवर्तित दृष्टिकोणके कारण दृष्टिगोचर होता है। जैसे सब प्रकारकी आसक्तियोंके त्यागपूर्वक भगवान्‌के अनन्यशरण होनेसे ही श्रद्धालु भक्तको उनके यथार्थ तत्त्वका बोध या साक्षात् उनके स्वरूपकी प्राप्ति होती है, उसी प्रकार मत-मतान्तरोंके आग्रहसे रहित हो भक्तिभावसे वेद भगवान्- की शरणमे जानेमे ही वेदके यथार्थ तत्त्वकी उपलब्धि हो सकती है। 'यमेवैष वृणुते तेन लभ्य'—'वेद अथवा भगवान् स्वय ही दया करके जिसे अपना ले, उसीको वे प्राप्त होते हैं।' अतः केवल मेधावी पण्डित होनेसे या बहुतसे शास्त्रोंका अध्ययन कर लेनमात्रसे अहङ्कारवश कोई वेदके यथार्थ तत्त्वको पूर्णतया नहीं जान सकता—'न मेधया न बहुना श्रुतेन ।' मनुष्योंमें अनेक प्रकृतिके लोग होते हैं, गीतामे उनको दो भागोंमें विभक्त किया गया है—एक दैवी प्रकृति और दूसरी आसुरी प्रकृति— द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च। भयका अभाव, अन्तःकरणकी स्वच्छता, तत्त्वज्ञानके लिये ध्यानयोगम निरन्तर स्थिति, दान, इन्द्रियसंयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, क्रोधका अभाव, त्याग, शान्ति, चुगली न खाना, समस्त प्राणियोंपर दया, अलोलुपता, मृदुता, लज्जा, अचञ्चलता, तेज, क्षमा, धृति, शौच, कहीं भी वैरभाव न होना तथा अभिमानका अभाव— ये सब दैवी प्रकृतिके लोगोंमें विकसित होनेवाले सद्गुण हैं। आसुरी प्रकृतिके लोग इनसे सर्वथा विपरीत होते हैं। कौन-सा काम करना चाहिये और कौन-सा नहीं—हम किसमे लगें और किस कार्यसे अलग रहें—इन सब बातोंको वे बिल्कुल नही समझते। शौच, सदाचार और सत्य तो उनमे रहता ही नहीं। वे जगत्‌को बिना ईश्वरके ही उत्पन्न हुआ मानते हैं। इसके मूलमें कोई सत्य है, इसका कोई नित्य चेतन आधार है—इन सब बातोंको वे नहीं स्वीकार करते। उनकी समझमे केवल काम ही इस जगत्‌का हेतु है और यह स्त्री- पुरुषके संयोगसे ही सतत उत्पन्न होता है। इस मिथ्या ज्ञान- का आश्रय लेनेसे उनका सस्वरूप आत्मा तिरोहित-सा हो जाता है, वे अल्पबुद्धि होनेके कारण सबका अहित करनेवाले

उ० अं० १६—

१२२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

[बायाँ स्तम्भ]

क्रूरकर्मी बन जाते हैं और जगत्के विनाशमे ही कारण बनते हैं। वे अपने मनमे ऐसी-ऐसी कामनाएँ पालते हे, जो कभी पूर्ण न हो सके । वे दम्भ, मान और मदसे उन्मत्त होते हैं और मोहवश मिथ्या सिद्धान्तोंको ग्रहण करके भ्रष्टांचारसे संयुक्त हो स्वेच्छाचारपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं। मरण- पर्यन्त अनन्त चिन्ताओंमे डूबे रहते हैं। सदा कामोपभोगमे संलग्न होकर—इतना ही सुख हे—ऐसा मानते रहते हैं। सैकड़ों आशाके वन्धनोंमें बँधकर, काम क्रोधपरायण हो, काम भोगके लिये ही वे अन्यायपूर्वक धनसचय करना चाहते हैं। आज यह पा लिया, कलको अमुक मनोरथ सिद्ध करूँगा, इतना धन तो मेरे पास है ही, फिर यह भी मेरा ही हो जायगा। अमुक शत्रुको तो मार डाला और दूसरे जो बचे हैं, उनका भी सफाया करके छोडूंगा। मेरी शक्ति किसीसे कम नहीं है—मै ईश्वर हूँ, मै भोगी हूँ, मैं सिद्ध, बलवान् और सुखी हूँ। धनी और जनताका नेता हूँ; ससारमे दूसरा कौन है जो मेरी बराबरी कर सके । मैं इच्छानुसार यज्ञ, दान और आनन्दोपभोग करूँगा। ये ही सब उनके मुखसे निकले हुए उद्‌गार हैं। वे अपने ही बड़प्पनकी डींग मारनेवाले, घमंडी तथा धन और मानके मदसे उन्मत्त होते हैं, और पाखण्डपूर्ण नाममात्रके यज्ञों- द्वारा अविधिपूर्वक यजन करते हैं। अहङ्कार, बल, दर्प, काम और क्रोधका आश्रय ले अपने और दूसरेके शरीरमें स्थित अन्तर्यामी परमेश्वरसे द्वेष करते और उनकी नित्य निन्दा करते हैं। तथा इसीलिये वे अन्ततोगत्वा बार-बार आसुरी योनि और नरकमे पड़ते हैं। (गीता अध्याय १६)

कहनेकी आवश्यकता नहीं कि प्राय. ऐसे आसुरी प्रकृतिके लोग ही मास और अश्लील सेवनकी रुचि रखते हैं और अधिकांशमे ऐसे ही लोगोने अर्थका अनर्थ करके सर्वत्र मद्य, मास और मैथुनकी प्रवृत्तियोको प्रसारित करने- की चेष्टाएँ की हं ।* कहा जाता है, वेदोंमे यज्ञके लिये


* यह सत्य है कि इधरके कुछ परम आदरणीय आचार्यों और महानुभावोंने भी किन्हीं-किन्हीं शब्दोंका मासपरक अर्थ किया है । इसका प्रधान कारण यह है कि उनमेसे अधिकांश परमार्थवादा महापुरुष थे । गूढ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विषयोंपर विशेष दृष्टि रखकर उनका विशद अर्थ करनेपर उनका जितना ध्यान था, उतना लौकिक विषयोंपर नहीं था। इसीसे उन्होंने ऐसे विषयोंका वही अर्थ लिख दिया जो देशकी परिस्थितिविशेषके कारण उस समय अधिकांशम प्रचलित था ।


[दायाँ स्तम्भ]

पशुहिंसाकी विधि है। अतः वेदोंका मान रखनेके लिये कुछ लोग 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति।' वेदविहित हिंसाका नाम हिंसा ही नहीं है, ऐसा कहा करते हैं। परंतु हिंसा हिंसा ही है, फिर वह चाहे कैसी ही हो। वेदोंकी तो यह स्पष्ट आज्ञा है—'मा हिंस्यात् सर्वां भूतानि।' (किसी भी प्राणीकी हिंसा न करे।) फिर वैदिकी हिंसा क्या वस्तु है। जगत्‌के प्राणियोंको कष्ट देनेवाले दस्युओं, आततायियो तथा पापियोंके लिये जो प्राणदण्डका आदेश मिलता है, वह हिंसा नही, दण्ड है। दण्ड अपराधीको ही दिया जाता है, निरपराधको नहीं। 'दस्युता', 'आततायीपन' अपराध है; अत. इनके लिये दण्डका औचित्य है, किंतु उन भेड़- बकरे आदि पशुओंका क्या अपराध है, जिनको दण्ड दिया जाय। वह भी यज्ञके नामपर। यज्ञ परमेश्वरकी आराधना है। परमेश्वर विश्वके पालक और शिवरूप हैं। अतः विश्वके संरक्षण और कल्याणमे योग देना ही परमेश्वरकी यथार्थ पूजा अथवा यज्ञ है। किसी निरपराध पशुके रक्त-माससे परमेश्वरको तृप्त करनेकी कल्पना कितनी बीभत्स है। यह तो—

मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ।

—के अनुसार स्पष्टतः ईश्वरद्रोह है। यह ईश्वरद्रोह ही जिनकी प्रकृति है, उन असुरोंने ही समय-समयपर वेदोंके अर्थोंको बदलनेकी चेष्टा की है। बृहदारण्यकोपनिषदमें प्रथम अध्यायके तृतीय ब्राह्मणमें कथा आती है कि प्रजापतिके ज्येष्ठ पुत्रों— देवताओंने 'वाक्' आदि प्राणोंसे कहा, 'तुम हमारे लिये उद्गान करो।' उन्होंने वैसा ही किया। तब असुरोंने समझा कि इस प्रकार तो ये देवता हमे पराजित ही कर देंगे, अतः उन्होंने उन वाक् आदिको पापसे विद्ध कर दिया—'पाप्मना- विध्यन्।' इससे उनमे असत्य-भाषण आदिका दोष आ गया। जो असुर हमारी इन्द्रियोंपर भी अपने सस्कार डाल सकते है, उन्होंने ग्रन्थोंमें कुछ मिलानेकी चेष्टा की हो तो क्या आश्चर्य। इसीलिये कहा जाता है कि मास खानेकी प्रवृत्ति मनुष्यमें स्वाभाविक नहीं; यह तो निशाचरोंके प्रयत्नमे हुई है—

मासाना खादन तद्बन्निशाचरसमीरितम् ।

महाभारत अनुशासनपर्वमे कहा गया है कि प्राचीन कालमें मनुष्योंके यज्ञ-यागादि केवल अन्नसे ही हुआ करते थे। मद्य-मास आदिकी प्रथा तो पीछेसे धूर्त असुरोंने चला

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  • वेदों और उपनिषदोंमें मांस-भक्षण और अश्लीलता नहीं है * १२३ दी। वेदमे इन वस्तुओंका विधान नहीं है।* असुर शब्दका अर्थ है—प्राणका पोषण करनेवाला। जो अपने सुखके लिये दूसरे प्राणियोंकी हिंसा करते हैं, वे सभी असुर हैं। आसुरी प्रकृतिके मनुष्य पढ-लिखकर विद्वान् हो जानेपर भी देहा- सक्ति और देहाभिमान नहीं छोड़ पाते। वे शास्त्र इसीलिये पढते हैं कि शास्त्रका मनमाना अर्थ करके अपने मतकी पुष्टि कर सकें। अतः शास्त्रसे वे यथार्थ ज्ञानको नहीं ग्रहण कर पाते। केवल शब्दोंकी व्युत्पत्ति करके खींचतानसे चाहे जो अर्थ निकाल लेना अपनेको और दूसरोंको भी धोखा देना है। वेद ईश्वरीय ज्ञान हैं। महर्षियों तथा मेधावी महात्माओंने वेदार्थको समझनेके लिये भी कुछ पद्धतियाँ निश्चित की हैं, उन्हींके अनुसार चलकर हमें श्रद्धापूर्वक वेदार्थको समझनेका यत्न करना चाहिये। भगवान्‌से प्रार्थना करनी चाहिये कि वे अन्तःकरणमें स्थित होकर कृपापूर्वक वेदोंके सत्य अर्थको प्रकट कर दें। भगवान्‌का आश्रय लेकर यदि वेदार्थका विचार किया जाय तो भगवत्कृपासे निश्चय ही सत्य अर्थका साक्षात्कार हो सकता है। ऋग्वेदमे लिखा है—‘यज्ञेन वाचं पदवीयमानम्’ अर्थात् समस्त वेदवाणी यज्ञके द्वारा ही स्थान पाती है। अतः वेदका जो भी अर्थ किया जाय, वह यज्ञमें कहीं-न-कहीं अवश्य उपयुक्त होता हो—यह ध्यान रखना आवश्यक है। वेदार्थके औचित्यकी दूसरी कसौटी यह है— बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे । (वैशेषिकदर्शन) अर्थात् वेदवाणीकी प्रकृति बुद्धिपूर्वक है। अतः वेदमन्त्र- का अपना किया हुआ अर्थ बुद्धिके विपरीत न हो—बुद्धिमें बैठने योग्य हो, इस बातपर भी ध्यान रखनेकी आवश्यकता है। साथ ही यह भी देखना उचित है कि हमने जो अर्थ किया है, वह तर्कसे सिद्ध तो होता है न ? हमारा अर्थ तर्कसे असङ्गत तो नहीं ठहरता ? निरुक्तकार कहते हैं—ऋषियोंके उत्क्रमण करनेपर मनुष्योंने देवताओंसे पूछा—'अब हमारा ऋषि कौन होगा ? कौन हमें वेदका अर्थ निश्चित करके बतावेगा ? तब देवताओंने उन्हें तर्क नामक ऋषि प्रदान किया।'* अतः तर्कसे गवेषणापूर्वक निश्चित किया हुआ अर्थ ऋषियोंके अनुकूल ही होगा। स्मृतिकार भी कहते हैं— यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्मं वेद नापरः । 'जो तर्कसे वेदार्थका अनुसन्धान करता है, वही धर्मको जानता है, दूसरा नहीं।' अतः समुचित तर्कसे समीक्षा करना वेदार्थके परीक्षणका तीसरा मार्ग है। चौथी रीति वह है कि इस बातपर दृष्टि रक्खी जाय कि हमारा किया हुआ अर्थ शब्दके मूलधातुके विपरीत तो नहीं है; क्योंकि निरुक्तकारने धातुज अर्थको ही ग्रहण किया है। पतञ्जलिने भीअपने महाभाष्यमे इसकी चर्चा की है--'नाम च धातुजमाह निरुक्ते।' इन चारो हेतुओको सामने रखकर यदि वेदार्थपर विचार किया जाय तो भ्रमकी सम्भावना नहीं रहेगी। प्रकृति स्वभावतः निम्नगामिनी होती है, अतः प्रकृतिके वश- मे रहनेवाले मनुष्यकी प्रवृत्ति स्वभावतः विषयभोगकी ओर होती है। शास्त्र ईश्वरीय ज्ञान हैं, वे मनुष्यकी उच्छृङ्खल प्रवृत्तिको रोकने और उसे धर्मएव सदाचारसे प्रतिष्ठित करनेके लिये ही अवतीर्ण हुए हैं। वेद तो साक्षात् भगवान्‌की वाणी हैं, अतः उनमें कोई ऐसी बात हो ही नहीं सकती, जो मनुष्यको अनर्गल विषयभोग एव हिंसाकी ओर जानेके लिये प्रोत्साहन देती हो। वह तो असत्‌से सत्‌की ओर जानेकी ही प्रेरणा देती है। अतः तर्क और बुद्धिसे यही ठीक जान पड़ता है कि वेद हिंसात्मक या अनाचारात्मक कार्योंके लिये आदेश नहीं दे सकते। यदि कहीं कोई ऐसी बात मिलती है तो वह अर्थ करनेवालोंकी ही भूल है। प्रायः यज्ञमे पशु-वधकी बात बतायी जाती है। परंतु यज्ञके ही जो प्राचीन नाम मिलते हैं, उनसे यह सिद्ध हो जाता है कि यज्ञ सर्वथा अहिंसात्मक होते आये हैं। 'न्वर' शब्दका अर्थ है हिंसा। जहाँ ध्वर अर्थात् हिंसा न हो, उसीका नाम 'अध्वर' है। यह 'अध्वर' शब्द यज्ञका ही पर्याय है। अतः हिंसात्मक कृत्य कभी यज्ञ नहीं माना जा सकता। 'यज' धातुमे 'यज्ञ' बनता है। इसका अर्थ है—देवपूजा, सङ्गतिकरण और दान। इनमेंसे किसीके द्वारा भी हिंसाका समर्थन नहीं प्राप्त होता। गो- यज्ञमे गायोंकी पूजा ही होती है, जहाँ असुर सदासे गाय आदि पशुओंको मारकर अपनी रक्त-पिपासा शान्त करते आये हैं, वहीं देवयज्ञमे गौओंको 'अघ्न्या' (न मारने योग्य) बताकर पूज्य ठहराया गया है। आज भी देवताओंके वंशज गोपूजक हैं। --- पाद-टिप्पणियाँ ---
  • श्रूयते हि पुरा कल्पे नॄणा व्रीहिमयो पशु । येनायजन्त यज्वान पुण्यलोकपरायणा ॥ (महा० अनु० ११५।५६) सुरा मत्स्यान् मधु मांसमासव कृसरौदनम् । धूर्त प्रवर्तित ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥ (महा० शान्ति० २६५।९)
  • मनुष्या वा ऋषिषूत्क्रामत्सु देवानब्रुवन् को न ऋषर्भविष्यतीति । तेभ्य एत तर्क्रमृर्षि प्रायच्छन् (निरुक्त २।२०)

१२४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * —-------------------------------------------------------------------------------------------------------

वैदिक यज्ञोंमें तो मासका इतना विरोध है कि मास जलानेवाली आगको सर्वथा त्याज्य निश्चित कर दिया गया है। प्रायः चिताग्नि ही मास जलानेवाली होती है। जहाँ अपनी मृत्युसे मरे हुए मनुष्योंके अन्त्येष्टि-संस्कारमे उपयोग की हुई आगका भी बहिष्कार है, वहाँ पावन वेदीपर प्रतिष्ठापित विशुद्ध अग्निमें अपने मारे हुए पशुके होमका विधान कैसे हो सकता है? आज भी जब वेदीपर अग्निकी स्थापना होती है, तो उसमेंसे थोड़ी-सी आग निकालकर बाहर कर दी जाती है। इसलिये कि कहीं उसमें क्रव्याद (मास-भक्षी या मास जलानेवाली आग) के परमाणु न मिल गये हों। अतएव 'क्रव्यादामं त्यक्त्वा' (क्रव्यादका अंश निकालकर ही) होमकी विधि है। ऋग्वेदका वचन है— क्रव्यादमग्निं प्रहिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः । इहैवायमितरो जातवेदा देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन् ॥ (ऋ० ७ । ६ । २१ । ९)

'मैं मास खाने या जलानेवाली आगको दूर हटाता हूँ, यह पापका भार ढोनेवाली है, अतः यमराजके घरमें जाय। इससे भिन्न जो ये दूसरे पवित्र और सर्वज्ञ अग्निदेव हैं, इनको ही यहाँ स्थापित करता हूँ। ये इस हविष्यको देवताओंके समीप पहुँचायें, क्योंकि ये सब देवताओंको जाननेवाले हैं।'

यजुर्वेदके अनेक मन्त्रोंमें भगवान्‌से प्रार्थना की गयी है कि वे हमारे पुत्रों, पशुओं—गाय और घोड़ोको हिंसाजनित मृत्युसे बचावें— 'मा नस्तनये मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः।'

कुछ मन्त्रोंके वाक्यांश इस प्रकार हैं— पशून् पाहि, गां मा हिंसी., अजा मा हिंसी, अविं मा हिंसी.। इमं मा हिंसीर्द्विपादं पशुम्, मा हिंसीरेकशफं पशुम्, मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि ।

'पशुओंकी रक्षा करो।' 'गायको न मारो।' बकरी- को न मारो।' 'भेड़को न मारो।' 'इन दो पैरवाले प्राणियो- को न मारो।' 'एक खुरवाले घोड़े गधे आदि पशुओंको न मारो।' 'किसी भी प्राणीकी हिंसा न करो।'

ऋग्वेदमें तो यहाँतक कहा गया है कि जो राक्षस मनुष्य, घोड़े और गायका मास खाता हो तथा गायके दूध- को चुरा लेता हो, उसका मस्तक काट डालो— य पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः । यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च ॥ (८ । ४ । ८ । १६)

अब प्रश्न होता है कि वेदमे यदि मासका वाचक या पशुहिंसाका बोधक कोई शब्द ही प्रयुक्त न हुआ होता तो कोई भी कैसे उस तरहका अर्थ निकाल सकता था ? इसके उत्तरमें हम महाभारतसे एक प्रसङ्ग उद्धृत कर देना चाहते है। एक बार ऋषियों तथा दूसरे लोगोंमें 'अज' शब्दके अर्थ- पर विवाद हुआ। एक पक्ष कहता था 'अजेन यष्टव्यम्' का अर्थ है "अन्नसे यज्ञ करना चाहिये। अजका अर्थ है— उत्पत्तिरहित, अन्नका बीज ही अनादि-परम्परासे चला आ रहा है, अतः वही 'अज' का मुख्य अर्थ है, इसकी उत्पत्तिका समय किसीको ज्ञात नहीं है, अतः वही अज है।" दूसरा पक्ष अजका अर्थ बकरा करता था। पहला पक्ष ऋषियोंका था। दोनों राजा वसुके पास निर्णय करानेके लिये गये। वसु अनेक यज्ञ कर चुका था। उसके किसी भी यज्ञमे मासका उपयोग नहीं हुआ था। वह सदा अन्नमय यज्ञ ही करता था, परन्तु म्लेच्छोंके संसर्गसे पीछे चलकर वह ऋषियोंका द्वेषी बन गया था। ऋषि उसकी बदली हुई मनोवृत्तिसे परिचित न थे। वे विश्वास करके गये। राजा सहसा निर्णय न दे सका। उसने पूछा 'किसका क्या पक्ष है?' जब उसे मालूम हुआ कि ऋषिलोग 'अज'का अर्थ अन्न करते हैं, तो उसने उनके विरोधी पक्षका ही समर्थन करते हुए कहा 'छागेनाजेन यष्टव्यम्।' असुर तो यह चाहते ही थे। वे उसके प्रचारक बन गये; परन्तु ऋषियोंने उस मतको ग्रहण नहीं किया; क्योंकि वह पूर्वोक्त चारो हेतुओंसे असङ्गत ठहरता है।

संस्कृत-वाङ्मयमें अनेकार्थक शब्द बहुत हैं। 'शब्दाः कामधेनव' यह प्रसिद्ध है। उनसे अनन्त अर्थोंका दोहन होता है। परंतु कौन-सा अर्थ कहाँ लेना ठीक है, इसका निश्चय विवेकशील विद्वान् ही कर सकते हैं। कोई यात्रापर जा रहा हो और सवारीके लिये 'सैन्धव' लानेका आदेश दे तो, उस समय नमक लानेवाला मनुष्य मूर्ख समझा जाता है, वहाँ सिन्धुदेशीय अश्व ही लाना उचित होगा। इसी प्रकार भोजनमे सैन्धव डालनेका आदेश देनेपर नमक ही डाला जायगा, अश्व नहीं। इसी प्रकार वेदके यज्ञ-प्रकरणमे आये हुए शब्दका वहाँके सात्त्विक वातावरणके अनुरूप ही अर्थ ठीक हो सकता है। जहाँ दवा बनानेके लिये 'प्रस्थं कुमारिकामासम्' की आज्ञा है, वहाँ सेरभर घीकुआरका गूदा ही डाला जायगा। कुमारी-कन्याका एक सेर मास डालनेकी बात तो कोई पिशाच ही सोच सकता है।

यज्ञमें पशु बाँधनेकी बात आती है। प्रश्न होता है, वह

वेदों और उपनिषदोंमें मांस-भक्षण और अश्लीलता नहीं है * १२५


पशु क्या है ? इसका उत्तर शतपथ-ब्राह्मणके एक प्रश्नोत्तरसे स्पष्ट हो जाता है—'कतमः प्रजापति. ?' प्रजापति अर्थात् प्रजाका पालन करनेवाला कौन है ? उत्तर मिलता है—'पशुरिति'—पशु ही प्रजापालक है । तात्पर्य यह कि जो पदार्थ या शक्तियाँ प्रजाका पोषण करनेवाली हैं; उन्हें पशु कहा गया है । इसीलिये भिन्न-भिन्न प्रकारके पशुओंकी यज्ञमें चर्चा की गयी है । 'नृणां व्रीहिमयं पशुः'—मनुष्योंके यज्ञमें अन्नमय पशुका उपयोग होता आया है। 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः' देवताओंने यज्ञसे ही यज्ञ किया था, उनका यज्ञमय पशु था। निरुक्तमें इस मन्त्रका अर्थ करते हुए यास्काचार्य-ने लिखा है—'अग्निः पशुरासीत्तं देवा अलभन्त' 'अग्नि ही पशु था, उसीको देवता प्राप्त हुए।' इतना ही नहीं, अग्नि, वायु और सूर्यको भी 'पशु' नाम दिया गया है—

अग्नि. पशुरासीत्तेनायजन्त । वायु. पशुरासीत्तेनाय-जन्त । सूर्यः पशुरासीत्तेनायजन्त ।

'अबध्नन् पुरुषं पशुम्' इस मन्त्रमे पुरुषको ही पशु कहा गया है। वहाँ सात परिधि और इक्कीस समिधाओंकी भी चर्चा है—

सप्तास्यासन् परिधयस्त्रि.सप्त समिध. कृता. ।

इसके दो अर्थ किये जाते हैं—शरीरगत सात धातु ही सात परिधि हैं और पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, दस प्राण और एक मन—ये ही इक्कीस समिधाएँ हैं, इनको लेकर 'आत्मा' रूपी पुरुषसे देवताओंने 'शरीर-यज्ञ' किया । इन सबके सहयोगसे ही मानव-शरीरकी सम्यक् सृष्टि हुई ।

दूसरा अर्थ सङ्गीत-यज्ञपरक होता है। उसमें सात स्वर ही सात परिधि और इक्कीस मूर्छनाएँ ही समिधाएँ हैं । नाद ही वहाँ पशु है । इनसे 'सङ्गीत-यज्ञ' सम्पन्न होता है ।

इसी प्रकार यदि विवेकको साथ रखते हुए वेदार्थपर विचार किया जायगा तो वेद भगवान् ही ऐसी सामग्री प्रस्तुत कर देंगे, जिससे सत्य अर्थका भान हो जाय। जहाँ द्वयर्थक शब्दोंके कारण भ्रम होनेकी सम्भावना हो सकती है, वहाँ बहुतेरे स्थलोंपर स्वयं वेदने ही अर्थका स्पष्टीकरण कर दिया है—

'धाता धेनुरभवद्, वत्सोऽस्यास्तिल ।' (अथर्ववेद १८ । ४ । ३०)

अर्थात् धान ही धेनु है और तिल ही उसका बछड़ा हुआ है। अथर्ववेदके ११ । ३ । ५ तथा ११ । ३ । ७ मन्त्र-में कहा है—चावलके कण ही अश्व हैं । चावल ही गौ हैं । भूसी ही मशक है । चावलोंका जो श्यामभाग है, वह मास है और लालभाग ही रुधिर है*। यहाँ दिग्दर्शनमात्र कराया गया है ।

इन सब प्रमाणोंसे सिद्ध है कि हवन-प्रकरणमें जहाँ कहीं भी अश्व, गौ, अजा, मास, अस्थि और मज्जा आदि शब्द आते हैं, उनसे अन्नका ही ग्रहण होता है, पशुओं और उनके अवयवोंका नहीं । 'शतपथ ब्राह्मण' आदिमें भी ऐसे स्थलोंका स्पष्टीकरण किया गया है—केवल पीसा हुआ सूखा आटा 'लोम' है । पानी मिलानेपर वह 'चर्म' कहलाता है । गूँधनेपर उसकी 'मास' सज्ञा होती है। तपानेपर उसीको 'अस्थि' कहते हैं । घी डालनेपर उसीका 'मज्जा' नाम होता है। इस प्रकार पककर जो पदार्थ बनता है, उसका नाम 'पाक्तपशु' होता है।†

अथर्ववेदके अनुसार व्रीहि और यव क्रमशः प्राण और अपान हैं‡। 'अनड्वान्' भी प्राणका नाम है। अतः अनड्वान् शब्दसे भी जौको ग्रहण किया जा सकता है। मीमांसासूत्रमें तो पशु-हिंसा और मास पाकका स्पष्टतः निषेध मिलता है—

मांसपाकप्रतिषेधश्च तद्वत् । ( १२ । २ । २ )

'यज्ञमें जैसे पशुहिंसाका निषेध है, उसी प्रकार मास-पाकका भी निषेध है।' 'धेनुवच्च अश्वदक्षिणा' (मीमांसा० १० । ३ । ६५) 'गौकी भाँति घोड़ा भी यज्ञमें दक्षिणाके लिये ही उपयोगमें लाया जाता है।'

अपि वा दानमात्र स्याद् भक्षशब्दानभिसम्बन्धनात् । ( मीमांसा० १० । ७ । १५ )

'अथवा वह केवल दानमात्रके लिये ही है, क्योंकि गौकी


पाद-टिप्पणियाँ (Footnotes):

* अश्वा कणा गावस्तण्डुला मशकास्तुषा ।    श्याममयोऽस्य मांसानि लोहितमस्य लोहितम् ॥

† 'यदा पिष्टान्यथ लोमानि भवन्ति । यदाप आनयत्यथ त्वग् भवति । यदा स यौत्यथ मास भवति । सतत इव हि तर्हि भवति सततभिव हि मासम् । यदा शृतोऽथास्थि भवति । दारुण इव त.र्हि भवति । दारुणमित्यस्थि । अथ यदुद्वासयन्नभिघारयति तं मज्जान ददाति । एषा सा सम्पद् यदाहु' पाक पशुरिति ।' ऐतरेय ब्राह्मणमें भी इसी तरहका स्पष्टीकरण देखा जाता है—'स वा एष पशुरेवालभ्यते यत्पुरोडाशस्तस्य । यानि किंशारूपाणि तानि रोमाणि। ये तुषा सा त्वक् । ये फलीकरणास्तद् असृग् यत्पिष्ट तन्मासम् । एष पशूनां मेधेन यजते ।' इस मन्त्रमें पुरोडाशके अन्तर्गत जो अन्नके दाने हैं, उन्हे अन्नमय पशुका रोम, भूसीको त्वचा, टुकड़ोंको मींग और आटेको मास नाम दिया गया है।

‡ प्राणापानौ व्रीहियवौ अनड्वान् प्राण उच्यते ।    ( अथर्ववेद ११ । ४ । १३ )

१२६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

ही भाँति अश्वके लिये भी कहीं 'भक्षण' शब्द नहीं आया है।' (तात्पर्य यह कि मनुष्यके भोजनमें केवल अन्नका ही उपयोग होता है, गौ और अश्व आदिका नहीं।) आश्वलायन- सूत्रमें स्पष्ट कहा गया है कि हवन-सामग्री मांससे वर्जित होती है—'होमिर्यं च मांसवर्जम्।' कात्यायनका भी यही मत है— 'आहवनीये मांसप्रतिषेध ।'

उपर्युक्त प्रमाणोंसे सिद्ध है कि यज्ञमें मांसका उपयोग कभी शिष्टपुरुषोंद्वारा स्वीकृत नहीं हुआ। कुछ लोग बलि, आलम्भ, मधुपर्क और गोघ्न आदि शब्दोंसे पशु-हिंसाका अर्थ निकालते हैं, परंतु प्राचीन साहित्य या मध्यकालीन साहित्यमें भी इन शब्दोंका कभी हिंसापरक अर्थ नहीं स्वीकृत किया गया है। बलिवैश्वदेवमें जो बलि दी जाती है, वहाँ किसीकी हिंसा नहीं की जाती, अपितु सम्पूर्ण विश्वके प्राणियों- को तृप्त करनेकी भावनासे उन्हें अन्न और जल अर्पण किया जाता है। बलिक्रा अर्थ किरण और कर (टैक्स या लगान) भी होता है। जीव-हिंसाके अर्थमें 'बलि' शब्दका प्रयोग तो पीछे हुआ है और वह भी मांसभक्षी लोगोंके अपने व्यवहार- से। बलिक्रा अर्थ त्याग ही शिष्टसम्मत है। इसी प्रकार 'आलमन' शब्द भी स्पर्श और प्राप्ति-अर्थमें आता है। मीमांसासूत्र (२।३।१७) की सुबोधिनी टीकामें लिखा है 'आलम्भः स्पर्शो भवति' अर्थात् स्पर्शका नाम आलम्भ है। यज्ञोपवीत और विवाह-संस्कारमें 'हृदयमालभते' का प्रयोग आता है। वहाँ गुरु शिष्यके और वर वधुके हृदयका स्पर्शमात्र ही करता है—छातीमें छुरा नहीं भोंकता। 'स्पर्श' शब्द दानके अर्थमें भी आता है। महाकवि कालिदासने 'गा कोटिशः स्पर्शयता घटोनीः' इस पद्यमे 'स्पर्शयता'का प्रयोग 'ददता'के अर्थमें ही किया है। महाभारत अनुशासनपर्वमें स्पर्श-यज्ञकी चर्चा देखी जाती है। पहले जब अदर्शन होता था तो लोग पशु- स्पर्श यज्ञ करते थे*। यही 'पशुका आलम्भन' या 'स्पर्श' कहलाता था। आजकल भी लोग अन्न और पशु आदि छूकर ब्राह्मणोंको देते हैं। यह उसी आलम्भन या स्पर्शयज्ञ का एक रूप है। पशुक्रा ही आलम्भन (छूकर छोड़ देना या दान देना) अधिक प्रचलित था, अतः जहाँ अन्नका स्पर्श, दान या हवन होता है, उस यज्ञमे अन्न ही पशु है,


  • यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासव । स्पर्शयज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातन ॥

यह रूपक दिया गया है। इसीलिये महाभारत अनुशासनपर्व- में कहा गया है— 'श्रूयते हि पुरा कल्पे नृणा व्रीहिमयाः पशुः।'

इसी प्रकार मधुपर्क भी सर्वथा हिंसारहित और निर्दोष है। तीन भाग दही, एक भाग शहद और एक भाग घीको काँसेके पात्रमें रखनेपर उसकी 'मधुपर्क' सज्ञा होती है। 'मधुपर्क' नाम ही मधुर पदार्थोंका सम्पर्क सूचित करता है। अब रही 'गोघ्नोऽतिथिः' की बात। इसका अर्थ लोग भ्रमवश ऐसा मानने लगे हैं कि अतिथिके लिये गाय मारी जाती थी, परंतु बात ऐसी नहीं है। हन् धातुका प्रयोग हिंसा और गति अर्थमें होता है। गतिके भी ज्ञान, गमन और प्राप्ति आदि अनेक अर्थ हैं। इनमेंसे प्राप्ति अर्थको लेकर ही यहाँ 'गोघ्न'का प्रयोग होता है। वह अतिथि जिसे गौकी प्राप्ति हो—जिसे गाय दी जाय वह 'गोघ्न' कहलाता है। व्याकरणके आदि आचार्य महर्षि पाणिनिने अपने एक सूत्रद्वारा इसी अभिप्रायकी पुष्टि की है। वह सूत्र है—'दाशगोघ्नौ सम्प्रदाने' (३।४।७३) इसके द्वारा सम्प्रदान अर्थमें 'दाश' और 'गोघ्न' शब्द सिद्ध होते हैं। यदि यहाँ चतुर्थीमात्र ही अभीष्ट होता—अर्थात् अतिथिके उद्देश्यसे गायको मारना ही सूचित करना होता तो 'सम्प्रदाने' न कहकर 'तस्मै' इस विभक्तिप्रतिरूपक अव्ययका ही प्रयोग कर देते, परंतु ऐसा न करके 'सम्प्रदाने' लिखा है, इससे यहाँ दानार्थकी अभिव्यक्ति सूचित होती है। अतः जिसे गाय दी जाय, उस अतिथिको ही 'गोघ्न' कह सकते हैं। पूर्वकालमें अतिथिको गौ देनेकी साधारण परिपाटी थी। आज भी प्राचीन प्रथाके अनुसार विवाहमे घरपर पधारे हुए वरको आतिथ्यके लिये गोदान किया जाता है। आयुर्वेद- में जो मासप्रधान ओषधियाँ हैं, उन्हें भी द्विजोंने कभी नहीं स्वीकृत किया था; अतएव चरकने लिखा है—द्विजोंकी पुष्टिके लिये तो मिश्रीयुक्त घी और दूध ही औषध है*। मास तो 'यक्षरक्ष पिशाचान्नम्'—(यक्ष, राक्षस और पिशाचों- का भोजन है)। यज्ञके नामपर की जानेवाली हिंसाको लक्ष्य करके विष्णुशर्माने पञ्चतन्त्रमे लिखा है कि 'यदि यही स्वर्ग- का मार्ग है तो नरकमें कौन जायगा ?† अतः यही मानना


  • द्विजानामोषधीसिद्ध घृत मासविद्धये । सितायुक्त प्रदातव्य गव्येन पयसा भृशम् ॥ (चरक चि० ८ । १४९) † वृक्षांश्छित्त्वा पशून् हत्वा कृत्वा रुधिरकर्दमम् । यद्येव गम्यते स्वर्ग नरके केन गम्यते ॥
  • वेदों और उपनिषदोंमें मांस-भक्षण और अश्लीलता नहीं है *- १२७ [बायाँ स्तम्भ] चाहिये कि वेदों और उपनिषदोंमें यज्ञ अथवा भोजनके प्रसग- मे जहाँ कही भी 'पशु'वाचक शब्द आये हैं, उन सबका अर्थ अन्न अथवा औषध है। उदाहरणके लिये बृहदारण्यक उपनिषद्‌के (६।४।१८ वें) मन्त्रपर दृष्टिपात कीजिये। वहाँ सुयोग्य और विद्वान् पुत्र उत्पन्न करनेके लिये दम्पतिको औक्ष अथवा आर्षभके साथ पकायी हुई खिचड़ी खानेका आदेश किया गया है। प्रायः मूँग या उड़दकी दाल मिलाकर ही खिचड़ी बनती है। मूँगकी खिचड़ीको 'मुद्गौदन' और उड़दमिश्रित खिचड़ीको 'माषौदन' कहते हैं। इस 'माषौदन' को सम्भवतः किन्हीं मास- प्रेमियोंने 'मांसौदन' कर दिया है। यदि किसीका यही आग्रह हो कि वहाँ 'मांसौदन' ही पाठ है, तो भी उसका अर्थ वहाँ औषध या अन्न ही है। यह बात पहलेके विवेचनके अनुसार माननी ही होगी। औक्ष या आर्षभ- मिश्रित ओदनके लिये 'माषौदन' या 'मांसौदन' नाम आया है, यही मानना प्रकरणसङ्गत है। अब औक्ष या आर्षभका तात्पर्य क्या है, यह जान लेना आवश्यक है। 'उक्षा' और 'ऋषभ' नामक औषध ही यहाँ 'औक्ष' और 'आर्षभ' नामसे प्रतिपादित हुआ है, उक्षा ऋषभका पर्याय है और सोमको भी उक्ष कहते हैं। 'ऋषभ' एक प्रकारका कन्द है, इसकी जड़ लहसुनसे मिलती-जुलती है। सुश्रुत और भावप्रकाश आदिमें इसके नाम, रूप, गुण और पर्यायोंका विशेष विवरण दिया गया है। इस अङ्कके बृहदारण्यकमे, जहाँ वह प्रसङ्ग है, कुछ प्रमाण भी उद्धृत कर दिये गये हैं। ऋषभके- वृषभ, वीर, विषाणी, गोपति, वृष, शृङ्गी, ककुद्मान् आदि जितने भी नाम आये हैं, सब वृषभ या बैलका अर्थ रखते हैं। इसी भ्रमसे कुछ लोगोंने वहाँ 'वृषभ मास' की वीभत्स कल्पना की है, जो 'प्रस्थं कुमारिकामासम्' के अनुसार 'एक सेर कुमारीकन्याके मास' की कल्पनासे ही मेल खाती है। वैद्यक-ग्रन्थोंमें बहुतसे पशु-पक्षियोंके-से नामवाले औषध देखे जाते हैं। उदाहरणके लिये वृषभ (ऋषभकन्द), श्वान (ग्रन्थिपर्ण या कुत्ता-घास), मार्जार (चित्ता), अश्व (अश्वगन्धा), अज (अजमोदा), सर्प (सर्पगन्धा), मयूरक (अपामार्ग), मयूरी (अजमोदा), कुक्कुटी
  • ऋषभो गोपतिर्वीरो विषाणी धूर्धरो वृष । ककुद्मान् पुङ्गवो वोढा शृङ्गी धुर्यश्च भूपति ॥ (राजनिघण्ड) [दायाँ स्तम्भ] (शाल्मली), मेष (जीवशाक), नकुल (नाकुली बूटी), गौ (गौलोमी), खर (खरपर्णिनी), काक (काकमाची), वाराह (वाराहीकन्द), महिष (गुग्गुल) आदि शब्द द्रष्टव्य हैं। यह भी सबको जानना चाहिये कि फलोंके गूदेको 'मांस', छालको 'चर्म', गुठलीको 'अस्थि', मेदाको 'मेद' और रेशाको 'स्नायु' कहते हैं।* वेदों और उपनिषदोंपर अश्लीलताका भी आरोप लगाया जाता है; परंतु पशुवध और माससम्बन्धी आरोपोंकी भाँति यह आरोप भी निराधार है। पहले अश्लीलता क्या है, यह समझ लेनेकी आवश्यकता है। एक आदमी जब सभ्य-समाजमे कहीं अपने गुप्ताङ्गो या इन्द्रियोंको दिखाता या निर्लज्जतावश कुत्सित चर्चाएँ करता है तो यह सब अश्लील समझा जाता है। परंतु एक रोगी मनुष्य जब डाक्टरके सामने नगा खड़ा होता है, तो उसकी यह क्रिया अश्लील नहीं समझी जाती। वैद्यक या डाक्टरीके ग्रन्थोंमे, जहाँ प्रत्येक अवयवका—गुप्त अङ्गका भी स्पष्ट वर्णन होता है, वह अश्लील नहीं माना जाता। एक व्याख्याता समाज-सुधारके लिये बुराइयोंका नग्न चित्र उपस्थित करता है, उस समय उसकी वह बात अश्लील नहीं समझी जाती। क्रिया एक ही है, पर कहीं वह दोषरूप है और कही गुणरूप। अतः यही निष्कर्ष निकलता है कि स्वरूपतः अश्लील कार्य भी भाव और दृष्टिकोणकी शुद्धिसे शुद्ध बन जाता है और स्वरूपसे अच्छा कार्य भी भावदोषसे दूषित हो जाता है। शल्यचिकित्सादिके लिये विद्यार्थीको स्त्री तथा पुरुषके प्रत्येक अवयवका ही नहीं, उसके सूक्ष्म-से- सूक्ष्म विभागका भी वर्णन पढना पड़ता है, पर वह कभी अश्लील नहीं माना जाता। इसी प्रकार वेद इस विषयकी पूर्ण शिक्षाके लिये ही ऐसी बातें प्रस्तुत करते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद्‌में छठे अध्यायके चतुर्थ ब्राह्मणमे स्त्रियोंके गुप्ताङ्गोंकी और मैथुन-कर्मकी चर्चा आयी है, परंतु वह गर्भाधानका प्रकरण है। मनुष्यकी उत्पत्तिका प्रारम्भिक कृत्य वही है। यदि वही ठीक तरहसे न हो तो अच्छी सन्तान कैसे हो सकती है? प्रकरणके अनुसार वहाँ लिखी हुईं सभी बातोंका महत्त्व बहुत बढ जाता है। मनुष्य
  • सुश्रुतमें आमके प्रसङ्गमें आया है— अपक्वे चूतफले स्नाय्वस्थिमज्जान सूक्ष्मत्वान्नोपलभ्यन्ते पक्वे त्वाविर्भूता उपलभ्यन्ते ॥ 'आमके कच्चे फलमें सूक्ष्म होनेके कारण स्नायु, हड्डी और मज्जा नहीं दिखायी देतीं, परंतु पकनेपर ये सब प्रकट हो जाती हैं।'

१२८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

कामान्ध होकर विवेक खो बैठते और मर्यादाका त्याग करके पशुवत् आचरण करने लगते हैं। इससे जो सन्तान उत्पन्न होती हैं, उनमें भी वैसे ही दुर्गुण भर जाते हैं। अतः वैदिक रीतिसे गर्भाधान आदि सभी संस्कारोंको करना चाहिये, इसीसे श्रेष्ठ मानवकी, जो अपने बल, पौरुष, ज्ञान और विज्ञानसे स्वयं अपने जीवनको सफल करता है और समाजकी बड़ी भारी सेवा करता है, उत्पत्ति हो सकती है। वेदोंमें जो कुछ कहा गया है, वह सब जगत्के कल्याणके लिये ही है। वेदोंके तात्पर्यपर विचार करनेवाले विद्वानोंको उचित है कि वे मनमाना अर्थ न करके वेद-वेदाङ्गोंके अनुशीलनपूर्वक महर्षियोंद्वारा निर्धारित शैलीके अनुसार वेदरूपी कामधेनुसे कल्याणमय अर्थका ही दोहन करें। वेदके कितने ही मन्त्र काव्यमय हैं। वहाँ रसोद्रेकके लिये सरस रूपकोंका आश्रय लिया गया है। ऐसे स्थलोंपर अश्लीलताका आरोप न करके यथार्थ मर्मको समझनेका प्रयास करना चाहिये।

उपनिषद्में युगल स्वरूप

भारतके आर्य-सनातनधर्ममे जितने भी उपासक-सम्प्रदाय हैं, सभी विभिन्न नाम-रूपों तथा विभिन्न उपासना पद्धतियोंके द्वारा वस्तुतः एक ही शक्तिसमन्वित भगवान्‌की उपासना करते हैं। अवश्य ही कोई तो शक्तिको स्वीकार करते हैं और कोई नहीं करते। भगवान्‌के इस शक्तिसमन्वित रूप- को ही युगल-स्वरूप कहा जाता है। निराकारवादी उपासक भगवान्‌को सर्वशक्तिमान् बताते हैं और साकारवादी भक्त उमा महेश्वर, लक्ष्मी नारायण, सीता-राम, राधा-कृष्ण आदि मङ्गलमय स्वरूपोंमे उनका भजन करते हैं। महाकाली, महा- लक्ष्मी, महासरस्वती, दुर्गा, तारा, उमा, अन्नपूर्णा, सीता, राधा आदि स्वरूप एक ही भगवत्स्वरूपा शक्तिके हैं, जो लीलावैचित्र्यकी सिद्धिके लिये विभिन्न रूपोंमें अपने-अपने धामविशेषमे नित्य विराजित हैं। यह शक्ति नित्य शक्तिमान्- के साथ है और शक्ति है इसीसे वह शक्तिमान् है। और इसलिये वह नित्य युगलस्वरूप है। पर यह युगलस्वरूप वैसा नहीं है, जैसे दो परस्पर-निरपेक्ष सम्पूर्ण स्वतन्त्र व्यक्ति या पदार्थ किसी एक स्थानपर स्थित हों। ये वस्तुतः एक होकर ही पृथक्-पृथक् प्रतीत होते हैं। इनमेंसे एकका त्याग कर देनेपर दूसरेके अस्तित्वका परिचय नहीं मिलता। वस्तु और उसकी शक्ति, तत्त्व और उसका प्रकाश, विशेष्य और उसके विशेषणसमूह, पद और उसका अर्थ, सूर्य और उसका तेज, अग्नि और उसका दाहकत्व—इनमे जैसे नित्य युगलभाव विद्यमान है, वैसे ही ब्रह्ममें भी युगलभाव है। जो नित्य दो होकर भी नित्य एक हैं और नित्य एक होकर भी नित्य दो हैं, जो नित्य भिन्न होकर भी नित्य अभिन्न हैं और नित्य अभिन्न होकर भी नित्य भिन्न हैं। जो एकम ही सदा दो हैं और दोमे ही सदा एक हैं। जो स्वरूपतः एक होकर भी द्वैधभावके पारस्परिक सम्बन्धके द्वारा ही अपना परिचय देते और अपनेको प्रकट करते हैं। यह एक ऐसा रहस्यमय परम विलक्षण तत्त्व है कि दो अयुत- सिद्ध रूपोंमे ही जिसके स्वरूपका प्रकाश होता है, जिसका परिचय प्राप्त होता है और जिसकी उपलब्धि होती है। वेदमूलक उपनिषद्‌मे ही इस युगलस्वरूपका प्रथम और स्पष्ट परिचय प्राप्त होता है। उपनिषद् जिस परम तत्त्वका वर्णन करते हैं, उसके मुख्यतया दो स्वरूप हैं—एक 'सर्वातीतः और दूसरा 'सर्वकारणात्मक' । सर्वकारणात्मक स्वरूपके द्वारा ही सर्वातीतका सन्धान प्राप्त होता है और सर्वातीत स्वरूप ही सर्वकारणात्मक स्वरूपका आश्रय है। सर्वातीत स्वरूपको छोड़ दिया जाय तो जगत्की कार्य-कारण- शृङ्खला ही टूट जाय, उसमें अप्रतिष्ठा और अनवस्थाका दोष आ जाय। फिर जगत्‌के किसी मूलका ही पता न लगे। और सर्वकारणात्मक स्वरूपको न माना जाय तो सर्वातीतकी सत्ता कहीं नहीं मिले। वस्तुतः ब्रह्मकी अद्वैतपूर्ण सत्ता इन दोनों स्वरूपोंको लेकर ही है। उपनिषद्के दिव्य-दृष्टिसम्पन्न ऋषियोंने जहाँ विश्वके चरम और परमतत्त्व एक, अद्वितीय, देशकाल अवस्था परिणामसे सर्वथा अनवच्छिन्न सच्चिदानन्द- स्वरूपको देखा, वहीं उन्होंने उस अद्वैत परब्रह्मको ही उसकी अपनी ही विचित्र अचिन्त्य शक्तिके द्वारा अपनेको अनन्त विचित्र रूपोंमे प्रकट भी देखा और यह भी देखा कि वही समस्त देशो, समस्त कालों, समस्त अवस्थाओं और समस्त परिणामोंके अदर छिपा हुआ अपने स्वतन्त्र सच्चिदानन्दमय स्वरूपकी, अपनी नित्य सत्ता, चेतना और आनन्दकी मनोहर झाँकी करा रहा है। ऋषियोंने जहाँ देशकाल-अवस्था- परिणामसे परिच्छिन्न अपूर्ण पदार्थोंको 'यह वह नहीं है, यह

  • उपनिषद्में युगल स्वरूप * १२९ वह नहीं है' (नेति-नेति) कहकर और उनसे विरागी होकर यह अनुभव किया कि—'वह परमतत्त्व ऐसा है जो न कभी देखा जा सकता है, न ग्रहण किया जा सकता है, न उसका कोई गोत्र है, न उसका कोई वर्ण है, न उसके चक्षु-कर्ण और हाथ-पैर आदि हैं।' 'वह न भीतर प्रज्ञावाला है, न बाहर प्रज्ञावाला है, न दोनों प्रकारकी प्रज्ञावाला है, न प्रज्ञान- घन है, न प्रज्ञ है, न अप्रज्ञ है, वह न देखनेमें आता है, न उससे कोई व्यवहार किया जा सकता है, न वह पकड़में आता है, न उसका कोई लक्षण (चिह्न) है, जिसके सम्बन्ध- में न चित्तसे कुछ सोचा जा सकता है और न वाणीमे कुछ कहा ही जा सकता है। जो आत्मप्रत्ययका सार है, प्रपञ्चसे रहित है, शान्त, शिव और अद्वैत है'— यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणि- पादम् । ( मुण्डक० १ । १ । ६ ) नान्त प्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघन न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्य- मव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशम शान्तं शिव- मद्वैतम् । •••• ( माण्डूक्य० ७ ) किसी भी दृश्य, ग्राह्य, कथन करनेयोग्य, चिन्तन करने- योग्य और धारणामें लानेयोग्य पदार्थके साथ उसका कोई भी सम्बन्ध या सादृश्य नहीं है। इसीके साथ, वहीं, उसी क्षण उन्होंने उसी देश-कालातीत, अवस्था-परिणाम-शून्य, इन्द्रिय- मन-बुद्धिके अगोचर शान्त शिव अनन्त एकमात्र सत्तारूप अक्षर परमात्माको ही सर्वकालमें और समस्त देशोंमें नित्य विराजित देखा और कहा कि—'धीर साधक पुरुष उस नित्य पूर्ण, सर्वव्यापक, अत्यन्त सूक्ष्म, अविनाशी और समस्त भूतों- के कारण परमात्माको देखते हैं'— नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥ ( मुण्डक० १ । १ । ६ ) उन्होंने यह भी अनुभव किया कि 'जब वह द्रष्टा उस सबके ईश्वर, ब्रह्माके भी आदिकारण सम्पूर्ण विश्वके स्रष्टा, दिव्य प्रकाशस्वरूप परम पुरुषको देख लेता है, तब वह निर्मल हृदय महात्मा पा०पुण्यसे छूटकर परम साम्यको प्राप्त हो जाता है— यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । उ० सं० १७-१८- तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ( मुण्डक० ३ । १ । ३ ) यहाँतक कि उन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर परमदेव परमात्माकी उस दिव्य अचिन्त्य स्वरूपभूत शक्तिका भी प्रत्यक्ष साक्षात्कार किया जो अपने ही गुणोंसे छिपी हुई है। तब उन्होंने यह निर्णय किया कि कालसे लेकर आत्मातक (काल, स्वभाव, नियति, अकस्मात्, पञ्चमहाभूत, योनि और जीवात्मा ) सम्पूर्ण कारणोंका स्वामी प्रेरक सबका परम कारण एकमात्र परमात्मा ही है— ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् । य कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येक ॥ ( श्वेताश्वतर० १ । ३ ) ऋषियोंने यह अनुभव किया कि वह सर्वातीत परमात्मा ही सर्वकारण-कारण, सर्वगत, सबमें अनुस्यूत और सबका अन्तर्यामी है। वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म, भेदरहित, परिणामशून्य, अद्वय परमतत्त्व ही चराचर भूतमात्रकी योनि है, एवं अनन्त विचित्र पदार्थोंका वही एकमात्र अभिन्न निमित्तोपादान-कारण है। उन्होंने अपनी निर्भ्रान्त निर्मल दृष्टिसे यह देखा कि जो विश्वातीत तत्त्व है, वही विश्वकृत् है, वही विश्ववित् है और वही विश्व है। विश्वमें उसीकी अनन्त सत्ताका, अनन्त ऐश्वर्य, अनन्त ज्ञान और अनन्त शक्तिका प्रकाश है। विश्व-सृजनकी लीला करके विश्वके समस्त वैचित्र्यको, विश्वमें विकसित अखिल ऐश्वर्य, ज्ञान और शक्तिको आलिङ्गन किये हुए ही वह नित्य विश्वके ऊर्ध्वमें विराजित है। उपनिषद्के मन्त्रद्रष्टा ऋषियोंने अपनी सर्वकालव्यापिनी दिव्य दृष्टिसे देखकर कहा—'सोम्य ! इस नामरूपात्मक विश्वकी सृष्टिसे पूर्व एक अद्वितीय सत् ही था'— 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ।' ( छान्दोग्य० ६ । १ । १ ) परन्तु इसीके साथ तुरत ही मुक्तकण्ठसे यह भी कह दिया कि 'उस सत् परमात्माने ईक्षण किया—इच्छा की कि मैं बहुत हो जाऊँ, अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ'— 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय इति' (छान्दोग्य० ६ । २ । ३ ) यहाँ बहुतोंको यह बात समझमें नहीं आती कि जो 'सबसे अतीत' है, वही 'सर्वरूप' कैसे हो सकता है, परन्तु

१३० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * औपनिषद-दृष्टिसे इसमे कोई भी विरोध या असामञ्जस्य नही है। भगवान्‌का नित्य एक रहना, नित्य बहुत से रूपोंमे अपने आस्वादनकी कामना करना और नित्य बहुत-से रूपोमे अपने- को आप ही प्रकट करना एव सम्भोग करना—यह सब उनके एक नित्यस्वरूपके ही अन्तर्गत है। कामना, ईक्षण और आस्वादन—ये सभी उनकी निरवच्छिन्न पूर्ण चेतनाके क्षेत्रमे समान अर्थ ही रखते है। भगवान् वस्तुतः न तो एक अवस्थासे किसी दूसरी अवस्थाविशेषमें जानेकी कामना ही करते हैं और न उनकी सहज नित्य स्वरूप-स्थितिमें कभी कोई परिवर्तन ही होता है। उनके बहुत रूपोंमें प्रकट होनेका यह अर्थ नहीं है कि वे एकत्वकी अवस्थासे बहुत्वकी अवस्था- में, अथवा अद्वैत-स्थितिसे द्वैतस्थितिमे चलकर जाते हैं। उनकी सत्ता तथा स्वरूपपर कालका कोई भी प्रभाव नहीं है और इसीलिये विश्वके प्रकट होनेसे पूर्वकी या पीछेकी अवस्था में जो भेद दिखायी देता है, वह उनकी सत्ता और स्वरूपका स्पर्श भी नहीं कर पाता। अवस्था भेदकी कल्पना तो जड जगत्‌में है। स्थिति और गति, अव्यक्त और व्यक्त, निवृत्ति और प्रवृत्ति, विरति और भोग, साधन और सिद्धि, कामना और परिणाम, भूत और भविष्य, दूर और समीप एव एक और बहुत—ये सभी भेद वस्तुतः जड-जगत्‌के सकीर्ण धरातलमें ही हैं। विशुद्ध पूर्ण सच्चिदानन्द-सत्ता तो सर्वथा भेदशून्य है। वह विशुद्ध अभेद भूमि है। वहाँ स्थिति और गति, अव्यक्त और व्यक्त, निष्क्रियता और सक्रियतामें अभेद है। इसी प्रकार एक और बहुत, साधना और सिद्धि, कामना और भोग, भूत भविष्य वर्तमान तथा दूर और निकट भी अभेदरूप ही हैं। इस अभेदभूमिमें चैतन्यघन पूर्ण परमात्मा परस्परविरोधी धर्मोंको आलिङ्गन किये नित्य विराजित हैं। वे चलते हैं और नहीं चलते, वे दूर भी है, समीप भी हैं, वे सबके भीतर भी हैं और सबके बाहर भी है— तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत ॥ (ईशावास्योपनिषद् ५) वे अपने विश्वातीत रूपमे स्थित रहते हुए ही अपनी वैचित्र्यप्रसविनी कर्मशीला अचिन्त्य शक्तिके द्वारा विश्वका सृजन करके अनादि अनन्तकाल उसीके द्वारा अपने विश्वातीत स्वरूपकी उपलब्धि और उसका सम्भोग करते रहते हैं। उपनिषद्में जो यह आया है कि वह ब्रह्म पहले अकेला था, वह रमण नहीं करता था। इसी कारण आज भी एकाकी पुरुष रमण नहीं करता। उसने दूसरेकी इच्छा की उसने अपनेको ही एकसे दो कर दिया वे पति पत्नी हो गये । 'स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छद् ••••• स इममेवात्मान द्वेधापातयत्त. पतिश्च पत्नी चाभवताम् । • ' (बृहदारण्यक० १।४।३) इसका यह अभिप्राय नहीं है कि इससे पूर्व वे अकेले थे और अकेलेपनमे रमणका अभाव प्रतीत होनेके कारण वे मिथुन (युगल) हो गये। क्योकि कालपरम्पराके क्रमसे अवस्थाभेदको प्राप्त हो जाना ब्रह्मके लिये सम्भव नहीं है। वे नित्य मिथुन (युगल) हे और इस नित्य युगलत्वमे ही उनका पूर्ण एकत्व है। उनका अपने स्वरूपमे ही नित्य अपने ही साथ नित्य रमण—अपनी अनन्त सत्ता, अनन्त ज्ञान, अनन्त ऐश्वर्य और अनन्त माधुर्यका अनवरत आस्वादन चल रहा है। उनके इस स्वरूपगत आत्ममैथुन, आत्मरमण और आत्मस्वादनसे ही अनादि-अनन्तकाल अनादि-अनन्त देशोंमें अनन्त विचित्रतामण्डित, अनन्त रससमन्वित विश्वके सृजन, पालन और महारका लीला प्रवाह चल रहा है। इस युगल रूपमें ही ब्रह्मके अद्वैतस्वरूपका परमोत्कृष्ट परिचय प्राप्त होता है। अतएव श्रीउमा-महेश्वर, श्रीलक्ष्मी नारायण, श्रीसीता-राम, श्रीराधा-कृष्ण, श्रीकाली-रुद्र आदि सभी युगल स्वरूप नित्य सत्य और प्रकारान्तरसे उपनिषत्-प्रतिपादित है। उपनिषदने एक ही साथ सर्वातीत और सर्वकारणरूपमे, स्थितिशील और गतिशीलरूपमें, निष्क्रिय और सक्रियकूपमे, अव्यक्त और व्यक्तरूपमें एव सच्चिदानन्दघन पुरुष और विश्वजननी नारी- रूपमें इसी युगल स्वरूपका विवरण किया है। परतु यह विषय है बहुत ही गहन। यह वस्तुत. अनुभवगम्य रहस्य है। प्रगाढ अनुभूति जब तार्किक्री बुद्धिकी द्वन्द्वमयी सीमाका सर्वथा अतिक्रमण कर जाती है—तभी सक्रियत्व और निष्क्रियत्व, साकारत्व और निराकारत्व, परिणामत्व और अपरिणामत्व एवं बहुरूपत्व और एकरूपत्वके एक ही समय एक ही साथ सर्वाङ्गीण मिलनका रहस्य खुलता है—तभी इसका यथार्थ अनुभव प्राप्त होता है। यद्यपि विशुद्ध तत्त्वमय चैतन्य राज्यमें प्राकृत पुरुष और नारीके सदृश देहेन्द्रियादिगत भेद एव तदनुकूल किसी लौकिक या जडीय सम्बन्धकी सम्भावना नही है, तथापि— जब अप्राकृत तत्त्वकी प्राकृत मन बुद्धि एव इन्द्रियों के द्वारा

  • जाऊँ कैसे ? * १३१ उपासना करनी पडती है, तब प्राकृत उपमा और प्राकृत संज्ञा देनी ही पडती है। प्राकृत पुरुष और प्राकृत नारी एव उनके प्रगाढ सम्बन्धका सहारा लेकर ही परम चित्तत्त्वके स्वरूपगत युगल-भावको समझनेका प्रयत्न करना पड़ता है। वस्तुतः पुरुषरूपमें ब्रह्मका सर्वातीत निर्विकार निष्क्रिय भाव है, और नारीरूपमें उन्हींकी सर्वकारणात्मिका अनन्त लीला वैचित्र्यमयी स्वरूपा शक्तिका सक्रिय भाव है। पुरुषमूर्तिमें भगवान् विश्वातीत'हैं, एक हैं और सर्वथा निष्क्रिय हैं, एव नारीमूर्तिमें वे ही विश्वजननी, बहुप्रसविनी, लीलाविलासिनी रूपमे प्रकाशित हैं। पुरुष विग्रहमें वे सच्चिदानन्दस्वरूप हैं और नारी-विग्रहमें उन्हींकी सत्ताका विचित्र प्रकाश, उन्हींकि चैतन्यकी विचित्र उपलब्धि तथा उन्हींकि आनन्दका विचित्र आस्वादन है। अपने इस नारी-भावके संयोगसे ही वे परम पुरुष ज्ञाता, कर्ता और भोक्ता हैं, - सृजनकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्त्ता हैं। नारीभावके सहयोगसे ही उनके स्वरूपगत, स्वभावगत अनन्त ऐश्वर्य, अनन्त वीर्य, अनन्त सौन्दर्य और अनन्त माधुर्यका प्रकाश है, इसीमे उनकी भगवत्ताका परिचय है। पुरुषरूपसे वे नित्य-निरन्तर अपने अभिन्न नारीरूपका आस्वादन करते हैं और नारी (शक्ति) रूपसे अपनेको ही आप अनन्त आकार-प्रकारोंमे लीलारूपमे प्रकट करके नित्य चिद्रूपमें उसकी उपलब्धि और सम्भोग करते हैं - इसीलिये ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वलोकमहेश्वर, षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् हैं। सच्चिदानन्दमयी अनन्त-वैचित्र्यप्रसविनी लीला- विलासिनी महाशक्ति ब्रह्मकी स्वरूपभूता है, ब्रह्मके विश्वातीतः, देशकालातीत अपरिणामी सच्चिदानन्दस्वरूपके साथ नित्य मिथुनीभूता है। ब्रह्मकी सर्वपरिच्छेदरहित सत्ता, चेतनता और आनन्दको अगणित स्तरोके सत्-पदार्थरूपमे, असख्य प्रकारकी चेतना तथा ज्ञानके रूपमे एव असख्य प्रकारके रस- आनन्दके रूपमे विकसित करके उनको आस्वादनके योग्य बना देना इस महाशक्तिका कार्य है। स्वरूपगत महाशक्ति इस प्रकार अनादि-अनन्तकाल ब्रह्मके स्वरूपगत चित्की सेवा करती रहती हैं। उनका यह शक्तिरूप तथा शक्तिके समस्त परिणाम (लीला) और कार्य स्वरूपतः उस चित्तत्त्वसे अभिन्न हे। यह नारीभाव उस पुरुषभावसे अभिन्न है, यह परिणामशील दिखायी देनेवाला अनन्त विचित्र लीलाविलास उनके कूटस्थ नित्यभावसे अभिन्न है। इस प्रकार उभयभाव अभिन्न होकर ही भिन्नरूपमें परस्पर आलिङ्गन किये हुए एक दूसरेका प्रकाश, सेवा और आस्वादन करते हुए एक दूसरेको आनन्द-रसमे आप्लावित करते हुए नित्य-निरन्तर ब्रह्मके पूर्ण स्वरूपका परिचय दे रहे है। परम पुरुष और उनकी महाशक्ति-भगवान् और उनकी प्रियतमा भगवती भिन्नाभिन्नरूपसे एक ही ब्रह्मस्वरूपमे स्वरूपतः प्रतिष्ठित हैं। इसीलिये ब्रह्म पूर्ण सच्चिदानन्द हैं और साथ ही नित्य आस्वादनमय हैं। यही विचित्र महारास है जो अनादि, अनन्तकाल बिना विराम चल रहा है। उपनिषदोने ब्रह्मके इसी स्वरूपका और उनकी इसी नित्य लीलाका विविध दार्शनिक शब्दोंमे परिचय दिया है और इसी स्वरूपको जानने, समझने, उपलब्ध करने और सम्भोग करनेकी विविध प्रक्रियाएँ, विद्याएँ और साधनाएँ अनुभवी ऋषियोकी दिव्य वाणीके द्वारा उनमें प्रकट हुई हैं ।* जाऊँ कैसे ? (रचयिता-श्रीप्रबोध, बी० ए० (आनर्स), साहित्यरत्न, साहित्यालङ्कार) इंगित पानी दूर क्षितिज से, जाऊँ कैसे ?-हूँ निःसम्बल ! पथ में झंझावात, शत-शत विद्युत् के कटु घात क्षुद्र क्रोड़ में जिनके खिलते उल्का के उत्पात और अति भीषण कोलाहल ! अगणित हैं इस कठिन मार्गमें विघ्न-सरित, गिरि, वन, दल-दल, इन सरिताओं में कूल कहाँ ?-केवल हैं आवर्त्त और ये निष्ठुर प्रखरतर धार, जो बहती हैं खल-खल ॥ किसी भाँति चल गिरूँ उपल-सी छू लूँ प्रिय पद पिघल-पिघल ! और छू, जन्म-मरण से परे उसी क्षण हो जाऊँ निश्चल ॥
  • आचार्य श्रीमक्षयकुमार वन्द्योपाध्यायके एक निबन्धके आधारपर ।

उपनिषदोंसे मैंने क्या सीखा ? (लेखक---प० श्रीहरिभाऊजी उपाध्याय) उपनिषदोंसे मैंने यह सीखा कि सबमे एक ही आत्मा समाया हुआ है। अतः मुझे सबके साथ समान भावसे बर्तना चाहिये, परतु यह भूमिका सहजसाध्य नहीं। यह आत्म-विकासकी अपेक्षा रखती है और सतत साधनासे ही प्राप्त हो सकती है। इसकी पहली सीडीके रूपमें मुझे अपने प्रति कठोर और दूसरोंके प्रति उदार और सहनशील रहना आवश्यक मालूम होता है। अपने प्रति कठोर रहना तप है और दूसरेके प्रति उदार रहना अहिंसा है। इस तरह आत्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये तप और अहिंसा अनिवार्य हो जाते हैं। आत्मसिद्धि या आत्मस्थितिके बाद क्या हो ? आत्मस्थ कैसा व्यवहार करे ? इसका सही उत्तर आत्मस्थ ही दे सकता है। साधक इस चर्चासे उदासीन रहे तो अच्छा ही है। उस स्थितिमे पहुँचनेपर उसे अपने-आप सूझता जायगा कि उसे क्या करना चाहिये और कैसे रहना चाहिये। इतना अवश्य है कि वह मनुष्य-समाजके बनाये नियमोंसे परे हो जाता है। इसका यह अर्थ नहीं कि वह उन नियमोंका पालन नहीं करेगा। बल्कि यह कि वह उन्हे अपने लिये बन्धनकारक नहीं समझेगा। वह उसके लिये नियम नहीं रहेगा, स्वभाव हो जायगा। वह शासन और नियमसे ऊपर उठकर सहज जीवनमें ओतप्रोत रहेगा। उपनिषदोने जो हमें दिया है वह संसारके किसी ग्रन्थने शायद उससे पहले नहीं दिया था। उसी आत्मतत्त्वका हम सदैव स्मरण करें, मनन करें, ध्यान करें और उसीकी साधनामें जीवनके प्रत्येक कर्मकी आहुति दें। उपनिषद्‌की व्युत्पत्ति और अर्थ (लेखक-प० श्रीगोविन्दनारायणजी आसोपा, बी० ए०) 'षदॢ विशरणगत्यवसादनेषु' धातुके पहले 'उप' और 'नि' ये दो उपसर्ग और अन्तमें 'क्विप्' प्रत्यय लगानेसे उपनिषद् शब्द बनता है। 'उपनिषद्यते---प्राप्यते ब्रह्मात्मभावोऽनया इति उपनिषद्।' इसका अर्थ है--जिससे ब्रह्मका साक्षात्कार किया जा सके, वह उपनिषद् कहाती है। उपनिषदोंमें ब्रह्मज्ञान अथवा ब्रह्मविद्याका ही प्रधानतासे विवेचन तथा वर्णन किया हुआ है जिससे उपनिषद्‌को अध्यात्मविद्या भी कहते हैं। ब्रह्मके प्रतिपादक वेदके शिरोभाग अथवा अन्तमें होनेसे ये वेदान्त या उत्तरमीमांसा भी कही जाती है। ब्रह्मज्ञान, आत्मज्ञान, तत्त्वज्ञान और ब्रह्मविद्या--ये सब पर्यायवाची शब्द हैं। वेदके अङ्गभूत सहिता, ब्राह्मण, आरण्यकमेसे ही ब्रह्मज्ञानप्रति- पादक भागोंको पृथक् कर उनको 'उपनिषद्' नाम दिया गया है। अकेले अथर्ववेदमें ५२ उपनिषद् हैं। मुक्तिकोपनिषद्में १०८ उपनिषदोंकी गणना हुई है। अमरकोशकार उपनिषद् शब्दका अर्थ-'धर्मे रहस्युपनिषत् स्यात्' लिखते हैं, इसके अनुसार 'उपनिषत्' शब्द गूढ धर्म एव रहस्यके अर्थमें प्रयुक्त होता है।