कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३२९ सावधानीकी आवश्यकता है। यदि भावनाके अनुसार गुण न आकर अभिमान आ गया तो पतन भी हो सकता है। यदि इस वेदानुवचनके रहस्यको ठीक समझकर इसकी भावना की जाय तो अभिमानकी आशङ्का भी नहीं की जा सकती । ॥ दशम अनुवाक ॥ १० ॥ एकादश अनुवाक वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् । वेदम् अनूच्य=वेदका भलीभाँति अध्ययन कराकर, आचार्यः = आचार्य, अन्तेवासिनम् = अपने आश्रममें रहनेवाले ब्रह्मचारी विद्यार्थीको, अनुशास्ति = शिक्षा देता है; सत्यम् वद = तुम सत्य बोलो, धर्मम् चर = धर्मका आचरण करो; स्वाध्यायात्=स्वाध्यायसे; मा प्रमदः = कभी न चूको, आचार्याय = आचार्यके लिये, प्रियम् धनम्= दक्षिणाके रूपमें वाञ्छित धन, आहृत्य=लाकर (दो, फिर उनकी आज्ञासे गृहस्थ-आश्रममें प्रवेश करके); प्रजातन्तुम् = संतान-परम्पराको (चालू रक्खो, उसका), मा व्यवच्छेत्सीः = उच्छेद न करना, सत्यात् = ( तुमको ) सत्यसे; न प्रमदितव्यम् = कभी नहीं डिगना चाहिये, धर्मात् = धर्मसे; न=नहीं; प्रमदितव्यम् = डिगना चाहिये, कुशलात् = शुभ कर्मोंसे; न प्रमदितव्यम् = कभी नहीं चूकना चाहिये; भूत्यै = उन्नतिके साधनोंसे, न प्रमदितव्यम् = कभी नहीं चूकना चाहिये; स्वाध्यायप्रवचनाभ्याम् = वेदोंके पढने और पढानेमे, न प्रमदितव्यम् = कभी भूल नहीं करनी चाहिये; देवपितृकार्याभ्याम् = देवकार्यसे और पितृकार्यसे, न प्रमदितव्यम् = कभी नहीं चूकना चाहिये । व्याख्या- गृहस्थको अपना जीवन कैसा बनाना चाहिये, यह बात समझानेके लिये इस अनुवाकका आरम्भ किया गया है। आचार्य शिष्यको वेदका भलीभाँति अध्ययन कराकर समावर्त्तन-संस्कारके समय गृहस्थाश्रममे प्रवेश करके गृहस्थ-धर्मका पालन करनेकी शिक्षा देते हैं—'पुत्र ! तुम सदा सत्य-भाषण करना, आपत्ति पड़नेपर भी झूठका कदापि आश्रय न लेना, अपने वर्ण-आश्रमके अनुकूल शास्त्रसम्मत धर्मका अनुष्ठान करना; स्वाध्यायसे अर्थात् वेदोंके अभ्यास, सन्ध्यावन्दन, गायत्रीजप और भगवन्नाम-गुणकीर्तन आदि नित्यकर्ममें कभी भी प्रमाद न करना—अर्थात् न तो कभी उन्हें अनादरपूर्वक करना और न आलस्यवश उनका त्याग ही करना । गुरुके लिये दक्षिणाके रूपमें उनकी रुचिके अनुरूप धन लाकर प्रेमपूर्वक देना, फिर उनकी आज्ञासे गृहस्थाश्रममे प्रवेश करके स्वधर्मका पालन करते हुए संतान-परम्पराको सुरक्षित रखना—उसका लोप न करना। अर्थात् शास्त्रविधिके अनुसार विवाहित धर्मपत्नीके साथ ऋतुकालमें नियमित सहवास करके सन्तानोत्पत्तिका कार्य अनासक्तिपूर्वक करना। तुमको कभी भी सत्यसे नहीं चूकना चाहिये अर्थात् हँसी-दिल्लगी या व्यर्थकी बातोंमें वाणीकी शक्तिको न तो नष्ट करना चाहिये और न परिहास आदिके बहाने कभी झूठ ही बोलना चाहिये। इसी प्रकार धर्मपालनमें भी भूल नहीं करना चाहिये अर्थात् कोई बहाना बनाकर या आलस्यवश कभी धर्मकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। लौकिक और शास्त्रीय—जितने भी कर्तव्यरूपसे प्राप्त शुभ कर्म हैं, उनका कभी त्याग या उपेक्षा नहीं करनी चाहिये, अपितु यथायोग्य उनका अनुष्ठान करते रहना चाहिये । धन-सम्पत्तिको बढ़ानेवाले लौकिक उन्नतिके साधनोंके प्रति भी उदासीन नहीं होना चाहिये। इसके लिये भी वर्ण- धर्मानुकूल चेष्टा करनी चाहिये । पढने और पढानेका जो मुख्य नियम है, उसकी कभी अवहेलना या आलस्यपूर्वक त्याग नहीं करना चाहिये । इसी प्रकार अग्निहोत्र और यज्ञादिके अनुष्ठानरूप देवकार्य तथा श्राद्ध-तर्पण आदि पितृकार्यके सम्पादनमें भी आलस्य या अवहेलनापूर्वक प्रमाद नहीं करना चाहिये । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि । तानि सेवितव्यानि । नो इतराणि । यान्यस्माकँसुचरितानि । तानि त्वयोपास्यानि । नो इतराणि । ये
- ३३० *- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * के चास्मच्छ्रेयाँसो ब्राह्मणाः । तेषां त्वयाऽऽसनेन प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम् । अश्रद्धयादेयम् । श्रिया देयम् । हिया भिया देयम् । संविदा देयम् । मातृदेवः भव=तुम मातामे देवबुद्धि करनेवाले बनो, पितृदेवः=पिताको देवरूप समझनेवाले, भव=होओ; आचार्यदेवः=आचार्यको देवरूप समझनेवाले, भव=बनो, अतिथिदेवः= अतिथिको देवतुल्य समझनेवाले, भव=होओ; यानि=जो जो, अनवद्यानि=निर्दोष, कर्माणि=कर्म हैं, तानि=उन्हेंही, सेवितव्यानि=तुम्हें सेवन करना चाहिये; इतराणि=दूसरे ( दोषयुक्त ) कर्मोंका, नो=कभी आचरण नहीं करना चाहिये, अस्माकम्=हमारे ( आचरणोंमेंसे भी ); यानि=जो-जो, सुचरितानि=अच्छे आचरण हैं तानि=उनका ही; त्वया=तुमको; उपास्यानि=सेवन करना चाहिये; इतराणि=दूसरोंका, नो=कभी नहीं, ये=जो, के=कोई, च=भी, अस्मत्=हमसे, श्रेयांसः= श्रेष्ठ ( गुरुजन एव ); ब्राह्मणाः=ब्राह्मण आयें, तेषाम्=उनको, त्वया=तुम्हें, आसनेन=आसन दान आदिके द्वारा सेवा करके; प्रश्वसितव्यम्=विश्राम देना चाहिये; श्रद्धया देयम्=श्रद्धापूर्वक दान देना चाहिये, अश्रद्धया=बिना श्रद्धाके, अदेयम्= नहीं देना चाहिये, श्रिया=आर्थिक स्थितिके अनुसार, देयम्=देना चाहिये, हिया=लज्जासे, [देयम्=देना चाहिये;] भिया भयसे भी, देयम्=देना चाहिये, (और) सविदा=(जो कुछ भी दिया जाय, वह सब) विवेकपूर्वक, देयम्= देना चाहिये। व्याख्या-पुत्र ! तुम मातामे देवबुद्धि रखना, पितामे भी देवबुद्धि रखना, आचार्यमे देवबुद्धि रखना तथा अतिथिमें भी देवबुद्धि रखना। आशय यह कि इन चारोको ईश्वरकी प्रतिमूर्ति समझकर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सदा इनकी आज्ञाका पालन, नमस्कार और सेवा करते रहना, इन्हें सदा अपने विनयपूर्ण व्यवहारसे प्रसन्न रखना। जगत्में जो-जो निर्दोष कर्म हैं, उन्हींका तुम्हें सेवन करना चाहिये। उनसे भिन्न जो दोषयुक्त-निषिद्ध कर्म हैं, उनका कभी भूलकर-स्वप्नमें भी आचरण नहीं करना चाहिये। हमारे-अपने गुरुजनोंके आचार-व्यवहारमें भी जो उत्तम-शास्त्र एव शिष्ट पुरुषोंद्वारा अनुमोदित आचरण हैं, जिनके विषयमें किसी प्रकारकी शङ्काको स्थान नहीं है, उन्हींका तुम्हें अनुकरण करना चाहिये, उन्हींका सेवन करना चाहिये। जिनके विषयमें जरा-सी भी शङ्का हो, उनका अनुकरण कभी नहीं करना चाहिये। जो कोई भी हमसे श्रेष्ठ-वय, विद्या, तप, आचरण आदिमे बड़े तथा ब्राह्मण आदि पूज्य पुरुष घरपर पधारें, उनको पाद्य, अर्ध्य, आसन आदि प्रदान करके सब प्रकारसे उनका सम्मान तथा यथायोग्य सेवा करनी चाहिये। अपनी शक्तिके अनुसार दान करनेके लिये तुम्हें सदा उदारतापूर्वक तत्पर रहना चाहिये। जो कुछ भी दिया जाय, वह श्रद्धापूर्वक देना चाहिये। अश्रद्धापूर्वक नहीं देना चाहिये, क्योकि बिना श्रद्धाके किये हुए दान आदि कर्म असत् माने गये हैं (गीता १७।२७)। लज्जापूर्वक देना चाहिये। अर्थात् सारा धन भगवान्का है, मैने इसे अपना मानकर उनका अपराध किया है। इसे सब प्राणियोंके हृदयमे स्थित भगवान्की सेवामे ही लगाना उचित था, मैने ऐसा नहीं किया। मै जो कुछ दे रहा हूँ, वह भी बहुत कम है। यों सोचकर सङ्कोचका अनुभव करते हुए देना चाहिये। मनमे दानीपनके अभिमानको नहीं आने देना चाहिये। सर्वत्र और सबमें भगवान् हैं, अत' दान लेनेवाले भी भगवान् ही है। उनकी बड़ी कृपा है कि मेरा दान स्वीकार कर रहे हैं। यों विचारकर भगवान्से भय मानते हुए दान देना चाहिये। 'हम किसीका उपकार कर रहे हैं' ऐसी भावना मनमें लाकर अभिमान या अविनय नहीं प्रकट करना चाहिये। परंतु जो कुछ दिया जाय-वह विवेकपूर्वक, उसके परिणामको समझकर निष्कामभावसे कर्तव्य समझकर देना चाहिये (गीता १७।२०)। इस प्रकार दिया हुआ दान ही भगवान्की प्रीतिका-कल्याणका साधन हो सकता है। वही अक्षय फलका देनेवाला है। अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात् । ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तत्र वर्तेरन् । तथा तत्र वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु । ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तेषु वर्तेरन् । तथा तेषु वर्तेथाः । एष आदेशः । एष उपदेशः । एषा वेदोपनिषत् । एतदनुशासनम् । एवमुपासितव्यम् । एवमु चैतदुपास्यम् ।
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३३१ अथ= इसके बाद, यदि = यदि, ते = तुमको, कर्मविचिकित्सा = कर्तव्यके निर्णय करनेमें किसी प्रकारकी शङ्का हो; वा = या, वृत्तविचिकित्सा = सदाचारके विषयमे कोई शङ्का, वा = कदाचित्; स्यात् = हो जाय तो, तत्र = वहाँ, ये = जो; संमर्शिनः = उत्तम विचारवाले, युक्ताः = परामर्श देनेमें कुशल, आयुक्ताः = कर्म और सदाचारमे पूर्णतया लगे हुए; अलूक्षाः = स्निग्ध स्वभाववाले, (तथा) धर्मकामाः = एकमात्र धर्मके ही अभिलाषी; ब्राह्मणाः = ब्राह्मण, स्युः = हों; ते = वे, यथा = जिस प्रकार, तत्र = उन कर्मोमे और आचरणोंमें, वर्तेरन् = बर्ताव करते हों, तत्र = उन कर्मों और आचरणोंमें; तथा = वैसे ही; वर्तेथाः = तुमको भी बर्ताव करना चाहिये; अथ = तथा यदि, अभ्याख्यातेषु = किसी दोषसे लाञ्छित मनुष्योंके साथ बर्ताव करनेमे (संदेह उत्पन्न हो जाय, तो भी), ये = जो, तत्र = वहाँ, संमर्शिनः = उत्तम विचार- वाले, युक्ताः = परामर्श देनेमें कुशल, आयुक्ताः = सब प्रकारसे यथायोग्य सत्कर्म और सदाचारमें भलीभाँति लगे हुए, अलूक्षाः = रूखेपनसे रहित, धर्मकामाः = धर्मके अभिलाषी, ब्राह्मणाः = (विद्वान्) ब्राह्मण, स्युः = हो, ते = वे, यथा = जिस प्रकार; तेषु = उनके साथ, वर्तेरन् = बर्ताव करें, तेषु = उनके साथ, तथा = वैसा ही, वर्तेथाः = तुमको भी बर्ताव करना चाहिये; एषः = यह, आदेशः = शास्त्रकी आज्ञा है, एषः = यही, उपदेशः = (गुरुजनोंका अपने शिष्यों और पुत्रोंके लिये) उपदेश है; एषा = यही, वेदोपनिषत् = वेदोंका रहस्य है, च = और, एतत् = यही, अनुशासनम् = परम्परागत शिक्षा है, एवम् = इसी प्रकार; उपासितव्यम् = तुमको अनुष्ठान करना चाहिये, एवम् उ = इसी प्रकार, एतत् = यह; उपास्यम् = अनुष्ठान करना चाहिये। व्याख्या - यह सब करते हुए भी यदि तुमको किसी अवसरपर अपना कर्तव्य निश्चित करनेमे दुविधा उत्पन्न हो जाय, अपनी बुद्धिसे किसी एक निश्चयपर पहुँचना कठिन हो जाय - तुम किंकर्तव्यविमूढ हो जाओ, तो ऐसी स्थितिमे वहाँ जो कोई उत्तम विचार रखनेवाले, उचित परामर्श देनेमें कुशल, सत्कर्म और सदाचारमें तत्परतापूर्वक लगे हुए, सबके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करनेवाले तथा एकमात्र धर्म-पालनकी ही इच्छा रखनेवाले विद्वान् ब्राह्मण (या अन्य कोई वैसे ही महापुरुष) हों - वे जिस प्रकार ऐसे प्रसङ्गोंपर आचरण करते हों, उसी प्रकारका आचरण तुम्हे भी करना चाहिये। ऐसे स्थलोंमें उन्हींके सत्परामर्शके अनुसार उन्हींके स्थापित आदर्शका अनुगमन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त जो मनुष्य किसी दोषके कारण लाञ्छित हो गया हो, उसके साथ किम समय कैसा व्यवहार करना चाहिये - इस विषयमे भी यदि तुमको दुविधा प्राप्त हो जाय - तुम अपनी बुद्धिसे निर्णय न कर सको तो वहाँ भी जो विचारशील, परामर्श देनेमें कुशल, सत्कर्म और सदाचारमें पूर्णतया संलग्न तथा धर्मकामी (सासारिक धनादिकी कामनासे रहित) निःस्वार्थी विद्वान् ब्राह्मण हों, वे लोग उसके साथ जैसा व्यवहार करें, वैसा ही तुमको भी करना चाहिये। उनका व्यवहार ही इस विषयमें प्रमाण है। यही शास्त्रकी आज्ञा है - आज्ञाओंका निचोड़ है। यही गुरु एवं माता-पिताका अपने शिष्यों और सन्तानोके प्रति उपदेश है तथा यही सम्पूर्ण वेदोंका रहस्य है। इतना ही नहीं, अनुशासन भी यही है। ईश्वरकी आज्ञा तथा परम्परागत उपदेशका नाम अनुशासन है। इसलिये तुमको इसी प्रकार कर्तव्य एवं सदाचारका पालन करना चाहिये। इसी प्रकार कर्तव्य एवं सदाचारका पालन करना चाहिये। ॥ एकादश अनुवाक समाप्त ॥ ११ ॥ द्वादश अनुवाक शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम् । ऋतमवादिषम् । सत्यमवादिषम् । तन्मामावीत् । तद्वक्तारमावीत् । आवीन्माम् । आवीद्वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! नः = हमारे लिये, मित्रः = (दिन और प्राणके अधिष्ठाता) मित्रदेवता, शम् [भवतु]= कल्याणप्रद हों, (तथा) वरुणः = (रात्रि और अपानके अधिष्ठाता) वरुण भी, शम् [भवतु]=कल्याणप्रद हों; अर्यमा = (चक्षु और
३३२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
सूर्यमण्डलके अधिष्ठाता) अर्यमा, नः = हमारे लिये, शम् = कल्याणमय, भवतु = हों, इन्द्रः = (बल और भुजाओंके अधिष्ठाता) इन्द्र, (तथा) बृहस्पतिः = (वाणी और बुद्धिके अधिष्ठाता) बृहस्पति, नः = हमारे लिये, शम् [भवताम्]=शान्ति प्रदान करनेवाले हों, उरुक्रमः = त्रिविक्रमरूपसे विशाल डगोंवाले, विष्णुः = विष्णु (जो पैरोंके अधिष्ठाता हैं), नः = हमारे लिये; शम् [भवतु]=कल्याणमय हों; ब्रह्मणे=(उपर्युक्त सभी देवताओंके आत्मस्वरूप) ब्रह्मके लिये; नमः = नमस्कार है; वायो = हे वायुदेव, ते=तुम्हारे लिये, नमः = नमस्कार है, त्वम् = तुम, एव = ही, प्रत्यक्षम् = प्रत्यक्ष (प्राणरूपसे प्रतीत होनेवाले), ब्रह्मा = ब्रह्म; असि = हो, (इसलिये मैने) त्वाम् = तुमको, एव = ही, प्रत्यक्षम् = प्रत्यक्ष, ब्रह्म = ब्रह्म, अवादिषम् = कहा है, ऋतम् = (तुम ऋतके अधिष्ठाता हो, इसलिये मैंने तुम्हें) ऋत नामसे, अवादिषम् = पुकारा है; सत्यम् =(तुम- सत्यके अधिष्ठाता हो, अतः मैने तुम्हें) सत्य नामसे, अवादिषम् = कहा है; तत् = उस (सर्वशक्तिमान् परमेश्वरने); माम् आवीत् = मेरी रक्षा की है; तत् = उसने, वक्तारम् आवीत् = वक्ताकी-आचार्यकी रक्षा की है; आवीत् माम् = रक्षा की है मेरी, (और) आवीत् वक्तारम् = रक्षा की है मेरे आचार्यकी, ॐ शान्तिः = भगवान् शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः = शान्तिस्वरूप हैं, शान्तिः = शान्तिस्वरूप हैं।
व्याख्या-शिक्षावल्लीके इस अन्तिम अनुवाकमें भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठाता परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न-भिन्न नाम और रूपोंमें उनकी स्तुति करते हुए प्रार्थनापूर्वक कृतज्ञता प्रकट की गयी है। भाव यह है कि समस्त आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक शक्तियोंके रूपमें तथा उनके अधिष्ठाता मित्र, वरुण आदि देवताओंके रूपमें जो सबके आत्मा अन्तर्यामी परमेश्वर हैं, वे सब प्रकारसे हमारे लिये कल्याणमय हों-हमारी उन्नतिके मार्गमें किसी प्रकारका विघ्न न आने दें। हम सबके अन्तर्यामी ब्रह्मको नमस्कार करते हैं।
इस प्रकार परमात्मासे शान्तिकी प्रार्थना करके सूत्रात्मा प्राणके रूपमें समस्त प्राणियोंमें व्याप्त परमेश्वरकी वायुके नामसे स्तुति करते हैं-'हे सर्वशक्तिमान्, सबके प्राणस्वरूप वायुमय परमेश्वर ! आपको नमस्कार है। आप ही समस्त प्राणियोंके प्राणस्वरूप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं, अतः मैने आपको ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहकर पुकारा है। मैने ऋत नामसे भी आपको ही पुकारा है; क्योंकि सारे प्राणियोंके लिये जो कल्याणकारी नियम है, उस नियमरूप ऋतके आप ही अधिष्ठाता हैं। यही नहीं, मैंने 'सत्य' नामसे भी आपको ही पुकारा है, क्योंकि सत्य-यथार्थ भाषणके अधिष्ठातृ-देवता भी आप ही है। उन सर्वव्यापी अन्तर्यामी परमेश्वरने मुझे सत्-आचरण एव सत्य भाषण करनेकी और सत्-विद्याको ग्रहण करनेकी शक्ति प्रदान करके इस जन्म मरणरूप संसारचक्रसे मेरी रक्षा की है। तथा मेरे आचार्यको उन सबका उपदेश देकर सर्वत्र उस सत्यका प्रचार करनेकी शक्ति प्रदान करके उनकी रक्षा-उनका भी सब प्रकारसे कल्याण किया है। यहाँ 'मेरी रक्षा की है, मेरे वक्ताकी रक्षा की है' इन वाक्योंको दुहरानेका अभिप्राय शिक्षावल्लीकी समाप्तिकी सूचना देना है।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः-इस प्रकार तीन बार 'शान्तिः' पदका उच्चारण करनेका भाव यह है कि आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक-तीनों प्रकारके विघ्नोंका सर्वथा उपशमन हो जाय। भगवान् शान्तिस्वरूप हैं। अतः उनके स्मरणसे सब प्रकारकी शान्ति निश्चित है।
द्वादश अनुवाक समाप्त ॥ १२ ॥ ॥ प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥
ब्रह्मानन्दवल्ली
ॐ ब्रह्मानन्दवल्ली शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ कठोपनिषद्के आरम्भमें दिया गया । प्रथम अनुवाक ब्रह्मविदाप्नोति परम् । तदेषाभ्युक्ता । ब्रह्मवित् = ब्रह्मज्ञानी; परम् = परब्रह्मको; आप्नोति = प्राप्त कर लेता है; तत् = उसी भावको व्यक्त करनेवाली; एषा = यह ( श्रुति ); अभ्युक्ता = कही गयी है । व्याख्या-ब्रह्मज्ञानी महात्मा परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, इसी बातको बतानेके लिये आगे आनेवाली श्रुति कही गयी है । सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह विपश्चितेति । ब्रह्म = ब्रह्म; सत्यम् = सत्य; ज्ञानम् = ज्ञानस्वरूप; ( और ) अनन्तम् = अनन्त है; यः = जो मनुष्य; परमे व्योमन् = परम विशुद्ध आकाशमें ( रहते हुए भी ); गुहायाम् = प्राणियोंके हृदयरूप गुफामें; निहितम् = छिपे हुए ( उस ब्रह्मको ); वेद = जानता है; सः = वह; विपश्चिता = ( उस ) विज्ञानस्वरूप; ब्रह्मणा सह = ब्रह्मके साथ; सर्वान् = समस्त; कामान् अश्नुते = भोगोंका अनुभव करता है; इति = इस प्रकार ( यह ऋचा है )। व्याख्या-इस मन्त्रमें परब्रह्म परमात्माके स्वरूपबोधक लक्षण बताकर उनकी प्राप्तिके स्थानका वर्णन करते हुए उनकी प्राप्तिका फल बताया गया है । भाव यह है कि वे परब्रह्म परमात्मा सत्यस्वरूप हैं। 'सत्य' शब्द यहाँ नित्य सत्ताका बोधक है । अर्थात् वे परब्रह्म नित्य सत् हैं, किसी भी कालमें उनका अभाव नहीं होता । तथा वे ज्ञानस्वरूप हैं, उनमें अज्ञानका लेश भी नहीं है। और वे अनन्त हैं अर्थात् देश और कालकी सीमासे अतीत-सीमारहित हैं। वे ब्रह्म परम विशुद्ध आकाशमें रहते हुए भी सबके हृदयकी गुफामें छिपे हुए हैं । उन परब्रह्म परमात्माको जो साधक तत्त्वसे जान लेता है, वह भलीभाँति सबको जाननेवाले उन ब्रह्मके साथ रहता हुआ सब प्रकारके भोगोंको अलौकिक ढंगसे अनुभव करता है* ।
- इस कथनके रहस्यको समझ लेनेपर ईशावास्योपनिषद्के प्रथम मन्त्रमें साधकके लिये दिये हुए उपदेशका रहस्य भी स्पष्ट हो जाता है । वहाँ कहा है कि इस भूतलपर जो कुछ भी जड-चेतनमय जगत् है, वह ईश्वरसे परिपूर्ण है, उन्हें अपने साथ रखते हुए अर्थात् निरन्तर याद रखते हुए ही त्यागपूर्वक आवश्यक विषयोंका सेवन करना चाहिये । जो उपदेश वहाँ साधकके लिये दिया गया है, वही बात यहाँ सिद्ध महात्माकी स्थिति बतानेके लिये कही गयी है । 'वह ब्रह्मके साथ सब भोगोंका अनुभव करता है' इस कथनका अभिप्राय यही है कि वह परमात्माको प्राप्त सिद्ध पुरुष इन्द्रियोंद्वारा बाह्य विषयोंका सेवन करते हुए भी स्वयं सदा परमात्मामें ही स्थित रहता है । उसके मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके व्यवहार, उनके द्वारा होनेवाली सभी चेष्टाएँ परमात्मामें स्थित रहते हुए ही होती हैं। लोगोंके देखनेमें आवश्यकतानुसार यथायोग्य विषयोंका इन्द्रियोंद्वारा उपभोग करते समय भी वह परमात्मासे कभी एक क्षणके लिये भी अलग नहीं होता, अतः सदा सभी कर्मोंसे निर्लेप रहता है । यही भाव दिखानेके लिये 'विपश्चिता ब्रह्मणा सह सर्वान् कामान् अश्नुते' कहा गया है । इस प्रकार यह श्रुति परब्रह्मके स्वरूप तथा उसके ज्ञानकी महिमाको बतानेवाली है ।
३३४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध-वे परब्रह्म परमात्मा किस प्रकार कैसी गुफामें छिपे हुए हैं, उन्हें कैसे जानना चाहिये-इस जिज्ञासापर आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है- तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः । आकाशाद्वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी । पृथिव्या ओषधयः । ओषधीभ्योऽन्नम् । अन्नात्पुरुषः । स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः । तस्येदमेव शिरः । अयं दक्षिणः पक्षः । अयमुत्तरः पक्षः । अयमात्मा । इदं पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति । वै = निश्चय ही; तस्मात् = ( सर्वत्र प्रसिद्ध ) उस, एतस्मात् = इस, आत्मनः = परमात्मासे; (पहले पहल ) आकाशः = आकाश-तत्त्व, सम्भूतः = उत्पन्न हुआ, आकाशात् = आकाशसे, वायुः = वायु, वायोः = वायुसे, अग्निः = अग्नि, अग्नेः = अग्निसे, आपः = जल, (और) अद्भ्यः = जल-तत्त्वसे; पृथिवी = पृथ्वी-तत्त्व उत्पन्न हुआ, पृथिव्याः = पृथ्वीसे; ओषधयः = समस्त ओषधियाँ उत्पन्न हुईं, ओषधीभ्यः = ओषधियोंसे, अन्नम् = अन्न उत्पन्न हुआ; अन्नात् = अन्नसे ही, पुरुषः = ( यह ) मनुष्य शरीर उत्पन्न हुआ; सः = वह; एषः = यह; पुरुषः = मनुष्य शरीर, वै = निश्चय ही; अन्नरसमयः = अन्न-रसमय है, तस्य = उसका, इदम् = यह ( प्रत्यक्ष दीखनेवाला सिर ); एव = ही; शिरः = (पक्षीकी कल्पनामें ) सिर है, अयम् = यह ( दाहिनी भुजा ) ही, दक्षिणः पक्षः = दाहिना पर है, अयम् = यह ( बायीं भुजा ) ही उत्तरः पक्षः = बायाँ पख है, अयम् = यह ( शरीरका मध्यभाग ) ही, आत्मा = पक्षीके अङ्गोंका मध्य- भाग है*, इदम् = यह ( दोनों पैर ही ), पुच्छम् प्रतिष्ठा = पूँछ एव प्रतिष्ठा है; तत् अपि = उसीके विषयमें; एषः = यह '( आगे कहा जानेवाला ), श्लोकः = श्लोक, भवति = है । व्याख्या--इस मन्त्रमें मनुष्यके हृदयरूप गुफाका वर्णन करनेके उद्देश्यसे पहले मनुष्य शरीरकी उत्पत्तिका प्रकार संक्षेपमें बताकर उसके अङ्गोंकी पक्षीके अङ्गोंके रूपमें कल्पना की गयी है। भाव यह है कि सबके आत्मा अन्तर्यामी परमात्मासे पहले आकाश- तत्त्व उत्पन्न हुआ । आकाशसे वायु तत्त्व, वायुसे अग्नि तत्त्व, अग्निसे जल तत्त्व और जलसे पृथ्वी उत्पन्न हुई । पृथ्वीसे नाना प्रकारकी ओषधियाँ-अनाज के पौधे हुए और ओषधियोंसे मनुष्योंका आहार अन्न उत्पन्न हुआ । उस अन्नसे यह स्थूल- मनुष्य-शरीररूप पुरुष उत्पन्न हुआ । अन्नके रससे बना हुआ यह जो मनुष्य शरीरधारी पुरुष है, इसकी पक्षीके रूपमें कल्पना की गयी है । इसका जो यह प्रत्यक्ष सिर है, वही तो मानो पक्षीका सिर है, दाहिनी भुजा ही दाहिना पख है । बायीं भुजा ही बायाँ पख है । शरीरका मध्यभाग ही मानो उस पक्षीके शरीरका मध्यभाग है। दोनों पैर ही पूँछ एव प्रतिष्ठा (पक्षीके पैर ) है । अन्नकी महिमाके विषयमें यह आगे कहा जानेवाला श्लोक-मन्त्र है । ॥ प्रथम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय अनुवाक अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते । याः काश्च पृथिवीँश्रिताः । अथो अन्नेनैव जीवन्ति । अथैनदपि यन्त्यन्ततः । अन्नँ हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । सर्वं वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति येऽन्नं ब्रह्मोपासते । अन्नँ हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । अन्नाद्भूतानि जायन्ते । जातान्यन्नेन वर्धन्ते । अद्यतेऽत्ति च भूतानि । तस्मादन्नं तदुच्यत इति । पृथिवीम् श्रिताः = पृथ्वीलोकका आश्रय लेकर रहनेवाले, याः = जो, का = कोई; च = भी; प्रजाः = प्राणी हैं (वे सब); अन्नात् = अन्नसे, वै = ही; प्रजायन्ते = उत्पन्न होते हैं, अथो = फिर, अन्नेन एव = अन्नसे ही, जीवन्ति = जीते हैं, अथ = तथा पुनः, अन्तत.= अन्तमें, एनत् अपि = इस अन्नमें ही, यन्ति = विलीन हो जाते हैं, अन्नम् = ( अतः ) अन्न, हि = ही; भूतानाम् = सब भूतोंमें, ज्येष्ठम् = श्रेष्ठ है, तस्मात् = इसलिये, ( यह ) सर्वौषधम् = सर्वौषधरूप, उच्यते = कहलाता है;
- 'मध्य ह्येषामङ्गानामात्मा' इस श्रुतिके अनुसार शरीरका मध्यभाग सब अङ्गोंका आत्मा है ।
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३३५ ये = जो साधक, अन्नम् = अन्न; ब्रह्म = ब्रह्म है; [इति = इस भावसे,] उपासते = (उसकी) उपासना करते हैं, ते = वे, वै = अवश्य ही; सर्वम् = समस्त, अन्नम् = अन्नको, आप्नुवन्ति = प्राप्त कर लेते हैं; हि = क्योंकि, अन्नम् = अन्न ही, भूतानाम् = भूतोंमें; ज्येष्ठम् = श्रेष्ठ है; तस्मात् = इसलिये, सर्वौषधम् = ( यह ) सर्वौषध नामसे, उच्यते = कहा जाता है, अन्नात् = अन्नसे ही; भूतानि = सब प्राणी; जायन्ते = उत्पन्न होते हैं; जातानि = उत्पन्न होकर, अन्नेन = अन्नसे ही; वर्धन्ते = बढ़ते हैं, तत् = वह; अद्यते = ( प्राणियोंद्वारा ) खाया जाता है, च = तथा, भूतानि = ( स्वय भी ) प्राणियोंको, अत्ति = खाता है; तस्मात् = इसलिये, अन्नम् = 'अन्न'; इति = इस नामसे, उच्यते = कहा जाता है। व्याख्या - इस मन्त्रमे अन्नकी महिमाका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि इस पृथ्वीलोकमें निवास करनेवाले जितने भी प्राणी हैं, वे सब अन्नसे ही उत्पन्न हुए हैं - अन्नके परिणामस्वरूप रज और वीर्यसे ही उनके शरीर बने हैं, उत्पन्न होनेके बाद अन्नसे ही उनका पालन-पोषण होता है, अतः अन्नसे ही वे जीते हैं। फिर अन्तमे इस अन्नमे ही - अन्न उत्पन्न करनेवाली पृथ्वीमें ही विलीन हो जाते हैं। तात्पर्य यह कि समस्त प्राणियोंके जन्म, जीवन और मरण स्थूलशरीरके सम्बन्धसे ही होते हैं, और स्थूलशरीर अन्नसे ही उत्पन्न होते हैं, अन्नसे ही जीते हैं तथा अन्नके उद्गमस्थान पृथ्वीमें ही विलीन हो जाते हैं। उन शरीरोंमें रहनेवाले जो जीवात्मा हैं, वे अन्नमें विलीन नहीं होते, वे तो मृत्युकालमें प्राणोंके साथ इस शरीरसे निकलकर दूसरे शरीरोंमें चले जाते हैं। इस प्रकार यह अन्न समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति आदिका कारण है, इसीपर सब कुछ निर्भर करता है; इसलिये यही सबसे श्रेष्ठ है और इसीलिये यह सर्वौषधरूप कहलाता है - क्योंकि इसीसे प्राणियोंका क्षुधर्ाजन्य संताप दूर होता है। सारे संतापोंका मूल क्षुधा है, इसलिये उसके शान्त होनेपर सारे संताप दूर हो जाते हैं। जो साधक इस अन्नकी ब्रह्मरूपमें उपासना करते हैं अर्थात् 'यह अन्न ही सर्वश्रेष्ठ है, सबने बड़ा है' यह समझकर इसकी उपासना करते हैं, वे समस्त अन्नको प्राप्त कर लेते हैं। उन्हें यथेष्ट अन्न प्राप्त हो जाता है, अन्नका अभाव नहीं रहता। यह सर्वथा सत्य है कि यह अन्न ही सब भूतोंमे श्रेष्ठ है, इसलिये यह सर्वौषधमय कहलाता है। तथा सब प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होनेके बाद अन्नसे ही बढ़ते हैं - उनके अङ्गोंकी पुष्टि भी अन्नसे ही होती है। सब प्राणी इसको खाते हैं, तथा यह भी सब प्राणियोंको खा जाता - अपनेमें विलीन कर लेता है। इसीलिये 'अद्यते, अत्ति च इति अन्नम्' इस व्युत्पत्तिके अनुसार इसका नाम अन्न है। तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्राण एव शिरः । व्यानो दक्षिणः पक्षः । अपान उत्तरः पक्षः । आकाश आत्मा । पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति । वै = निश्चय ही, तस्मात् = उस, एतस्मात् = इस, अन्नरसमयात् = अन्न-रसमय मनुष्यशरीरसे, अन्यः = भिन्न; अन्तरः = उसके भीतर रहनेवाला, प्राणमयः आत्मा = प्राणमय पुरुष है; तेन = उससे, एषः = यह ( अन्न-रसमय पुरुष ); पूर्णः = व्याप्त है, सः = वह, एषः = यह प्राणमय आत्मा, वै = निश्चय ही, पुरुषविधः एव = पुरुषके आकारका ही है, तस्य = उस ( अन्न-रसमय ) आत्माकी, पुरुषविधताम् = पुरुषतुल्य आकृतिमें, अनु = अनुगत ( व्याप्त ) होनेसे ही, अयम् = यह; पुरुषविधः = पुरुषके आकारका है, तस्य = उस ( प्राणमय आत्मा ) का, प्राणः = प्राण, एव = ही, शिरः = ( मानो ) शिर है; व्यानः = व्यान, दक्षिणः = दाहिना, पक्षः = पख है, अपानः = अपान, उत्तरः = बायाँ, पक्षः = पख है, आकाशः = आकाश, आत्मा = शरीरका मध्यभाग है, ( और ) पृथिवी = पृथ्वी, पुच्छम् = पूँछ, ( एवम् ) प्रतिष्ठा = आधार है; तत् = उस प्राण ( की महिमा ) के विषयमें, अपि = भी, एषः = यह आगे बताया जानेवाला, श्लोकः = श्लोक; भवति = है । व्याख्या - द्वितीय अनुवाकके इस दूसरे अशंमें प्राणमय शरीरका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि पूर्वोक्त अन्नके रससे बने हुए स्थूलशरीरसे भिन्न उस स्थूलशरीरके भीतर रहनेवाला एक और शरीर है, उसका नाम 'प्राणमय' है, उस प्राणमयसे यह अन्नमय शरीर पूर्ण है। अन्नमय स्थूलशरीरकी अपेक्षा सूक्ष्म होनेके कारण प्राणमय शरीर इसके अङ्ग-प्रत्यङ्गमें व्याप्त है। वह यह प्राणमय शरीर भी पुरुषके आकारका ही है। अन्नमय शरीरकी पुरुषाकारता प्रसिद्ध है, उसमें अनुगत होनेसे ही यह प्राणमय कोश भी पुरुषाकार कहा जाता है। उसकी पक्षीके रूपमें कल्पना इस प्रकार हैं-
३३६ ✣ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ✣ प्राण ही मानो उसका सिर है, क्योंकि शरीरके अङ्गोंमें जैसे मस्तक श्रेष्ठ है, उसी प्रकार पाँचों प्राणोंमे मुख्य प्राण ही सर्वश्रेष्ठ है। व्यान दाहिना पक्ष है। अपान बायाँ पक्ष है। आकाश अर्थात् आकाशमें फैले हुए वायुकी भाँति सर्वशरीरव्यापी 'समान वायु' आत्मा है, क्योंकि वही समस्त शरीरमें समानभावसे रस पहुँचाकर समस्त प्राणमय शरीरको पुष्ट करता है। इसका स्थान शरीरका मध्यभाग है तथा इसीका बाह्य आकाशसे सम्बन्ध है, यह बात प्रश्नोपनिषद्के तीसरे प्रश्नोत्तरके पाँचवें और आठवें मन्त्रोंमें कही गयी है। तथा पृथ्वी पूँछ एव आधार है अर्थात् अपानवायुको रोककर रखनेवाली पृथ्वीकी आधिदैविक शक्ति ही इस प्राणमय पुरुषका आधार है। इसका वर्णन भी प्रश्नोपनिषद्के तीसरे प्रश्नोत्तरके आठवें मन्त्रमें ही आया है। इस प्राणकी महिमाके विषयमें आगे कहा हुआ श्लोक—मन्त्र है। ॥ द्वितीय अनुवाक समाप्त ॥ २ ॥ ⊶ॐ⊷ तृतीय अनुवाक प्राणं देवा अनु प्राणन्ति । मनुष्याः पशवश्च ये । प्राणो हि भूतानामायुः। तस्मात्सर्वायुषमुच्यते । सर्वमेव त आयुर्यन्ति ये प्राणं ब्रह्मोपासते । प्राणो हि भूतानामायुः । तस्मात्सर्वायुषमुच्यत इति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य ये=जो-जो, देवाः=देवता, मनुष्याः=मनुष्य, च=और, पशवः=पशु आदि प्राणी हैं; [ते=वे,] प्राणम् अनु= प्राणका अनुसरण करके ही, प्राणन्ति=चेष्टा करते अर्थात् जीवित रहते हैं, हि=क्योंकि; प्राणः=प्राण ही; भूतानाम्=प्राणियोंकी, आयुः=आयु है; तस्मात्=इसलिये, (यह प्राण) सर्वायुषम्=सबका आयु; उच्यते= कहलाता है; प्राणः=प्राण; हि=ही, भूतानाम्=प्राणियों की; आयुः=आयु—जीवन है; तस्मात्= इसलिये, (यह) सर्वायुषम्=सबका आयु; उच्यते=कहलाता है; इति=यह समझकर; ये=जो कोई; प्राणम्=प्राणकी; ब्रह्म= ब्रह्मरूपसे, उपासते=उपासना करते हैं; ते=वे, सर्वम् एव=निस्सन्देह समस्त; आयुः=आयुको; यन्ति=प्राप्त कर लेते हैं, तस्य=उसका; एषः एव=यही; शारीरः=शरीरमें रहनेवाला; आत्मा=अन्तरात्मा है; यः=जो; पूर्वस्य=पहलेवालेका अर्थात् अन्न-रसमय शरीरका अन्तरात्मा है। व्याख्या—तृतीय अनुवाकके इस पहले अंशमें प्राणकी महिमाका वर्णन करनेवाली श्रुतिका उल्लेख करके फिर इस प्राणमय शरीरके अन्तर्यामी परमेश्वरको लक्ष्य कराया गया है। भाव यह है कि जितने भी देवता, मनुष्य, पशु आदि शरीरधारी प्राणी हैं, वे सब प्राणके सहारे ही जी रहे हैं। प्राणके बिना किसीका भी शरीर नहीं रह सकता, क्योंकि प्राण ही सब प्राणियोंकी आयु—जीवन है, इसीलिये यह प्राण 'सर्वायुष' कहलाता है। जो साधक 'यह प्राणियोंकी आयु है, इसलिये यह सबका आयु—जीवन कहलाता है' यों समझकर इस प्राणकी ब्रह्मरूपसे उपासना करते हैं, वे पूर्ण आयुको प्राप्त कर लेते हैं। प्रश्नोपनिषद्में भी कहा है कि जो मनुष्य इस प्राणके तत्त्वको जान लेता है, वह स्वयं अमर हो जाता है और उसकी प्रजा नष्ट नहीं होती ( ३। ११)। जो सर्वोत्मा परमेश्वर अन्नके रससे बने हुए स्थूलशरीरधारी पुरुषका अन्तरात्मा है, वही उस प्राणमय पुरुषका भी शरीरान्तर्वर्ती अन्तर्यामी आत्मा है। तस्माद्वा एतस्मात्प्राणमयादन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य यजुरेव शिरः । ऋग्दक्षिणः पक्षः । सामोत्तरः पक्षः । आदेश आत्मा । अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति । वै=यह निश्चय है कि, तस्मात्=उस, एतस्मात्=इस; प्राणमयात्=प्राणमय पुरुषसे, अन्यः=भिन्न; अन्तरः= उसके भीतर रहनेवाला, मनोमयः=मनोमय, आत्मा=आत्मा (पुरुष) है; तेन=उस मनोमय आत्मासे; एषः=यह प्राणमय शरीर; पूर्णः=व्याप्त है; सः=वह; एषः=यह मनोमय आत्मा; वै=निश्चय ही; पुरुषविधः=पुरुषके आकारका, एव=ही
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३३७ है; तस्य = उसकी; पुरुषविधताम् अनु = पुरुष-तुल्य आकृतिमें अनुगत (व्याप्त) होनेसे ही, अयम् = यह मनोमय आत्मा; पुरुषविधः = पुरुषके आकारका है, तस्य = उस (मनोमय पुरुष) का, यजुः = यजुर्वेद; एव = ही; शिरः = (मानो) सिर है; ऋक् = ऋग्वेद; दक्षिणः = दाहिना, पक्षः = पंख है, साम = सामवेद, उत्तरः = बायाँ, पक्षः = पख है; आदेशः = आदेश (विधिवाक्य); आत्मा = शरीरका मध्यभाग है, अथर्वाङ्गिरसः = अथर्वा और अङ्गिरा ऋषिद्वारा देखे गये अथर्ववेदके मन्त्र ही, पुच्छम् = पूँछ; (एवं) प्रतिष्ठा = आधार है, तत् = उसकी महिमाके विषयमें; अपि = भी; एषः = यह आगे कहा जानेवाला, श्लोकः = श्लोक, भवति = है। व्याख्या-इस तृतीय अनुवाकके दूसरे अंशमें मनोमय पुरुषका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि पहले बताये हुए प्राणमय पुरुषसे भिन्न, उससे भी सूक्ष्म होनेके कारण उसके भीतर रहनेवाला दूसरा पुरुष है; उसका नाम है मनोमय । उस मनोमयसे यह प्राणमय शरीर पूर्ण है अर्थात् वह इस प्राणमय शरीरमें सर्वत्र व्याप्त हो रहा है। वह यह मनोमय शरीर भी पुरुषके ही आकारका है। प्राणमय पुरुषमें अनुगत होनेसे ही यह मनोमय आत्मा पुरुषके समान आकारवाला है। उसकी पक्षीके रूपमें इस प्रकार कल्पना की गयी है-उस मनोमय पुरुषका मानो यजुर्वेद ही सिर है; ऋग्वेद दाहिना पंख है, सामवेद बायाँ पंख है, आदेश (विधिवाक्य) मानो शरीरका मध्यभाग है तथा अथर्वा और अङ्गिरा ऋषियोंद्वारा देखे हुए अथर्ववेदके मन्त्र ही पूँछ और आधार हैं। यज्ञ आदि कर्मोंमें यजुर्वेदके मन्त्रकी ही प्रधानता है। इसके सिवा जिनके अक्षरोंकी कोई नियत संख्या न हो तथा जिसकी पाद-पूर्तिका कोई नियत नियम न हो, ऐसे मन्त्रोंको 'यजु''छन्दके अन्तर्गत समझा जाता है। इस नियमके अनुसार जिस किसी वैदिकवाक्य या मन्त्रके अन्तमें 'स्वाहा' पद जोड़कर अग्निमें आहुति दी जाती है, वह वाक्य या मन्त्र भी 'यजुः' ही कहलायेगा। इस प्रकार यजुर्मन्त्रोंके द्वारा ही अग्निको हविष्य अर्पित किया जाता है, इसलिये वहाँ यजुः प्रधान है। अङ्गोंमें भी सिर प्रधान है, अतः यजुर्वेदको सिर बतलाना उचित ही है। वेद-मन्त्रोंके वर्ण, पद और वाक्य आदिके उच्चारणके लिये पहले मनमें ही संकल्प उठता है; अतः संकल्पात्मक वृत्तिका द्वारा मनोमय आत्माके साथ वेद-मन्त्रोंका घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसीलिये इन्हें मनोमय पुरुषके ही अङ्गोंमें स्थान दिया गया है। शरीरमें जो स्थान दोनों भुजाओंका है, वही स्थान मनोमय पुरुषके अङ्गोंमें ऋग्वेद और सामवेदका है। यज्ञ-यागादिमें इनके मन्त्रोंद्वारा स्तवन और गायन होता है, अतः यजुर्मन्त्रोंकी अपेक्षा ये अप्रधान हैं; फिर भी भुजाओंकी भाँति यज्ञमें विशेष सहायक हैं, अतएव इनको भुजाओंका रूप दिया गया है। आदेश (विधि)-वाक्य वेदोंके भीतर हैं, अतः उन्हें ही मनोमय पुरुषके अङ्गोंका मध्यभाग बताया गया है। अथर्ववेदमें शान्तिक-पौष्टिक आदि कर्मोंके साधक मन्त्र हैं, जो प्रतिष्ठाके हेतु हैं, अतः उनको पुच्छ एव प्रतिष्ठा कहना सर्वथा युक्तिसगत ही है। संकल्पात्मक वृत्तिका द्वारा मनोमय पुरुषका इन सबके साथ नित्य सम्बन्ध है, इसीलिये वेदमन्त्रोंको उसका अङ्ग बताया गया है-यह बात सदा स्मरण रखनी चाहिये। इस मनोमय पुरुषकी महिमाके विषयमे भी यह आगे चतुर्थ अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है। ॥ तृतीय अनुवाक समाप्त ॥ ३ ॥ चतुर्थ अनुवाक यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कदाचनेति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । यतः = जहाँसे, मनसा सह = मनके सहित, वाचः = वाणी आदि इन्द्रियाँ, अप्राप्य = उसे न पाकर; निवर्तन्ते = लौट आती हैं, [ तस्य ] ब्रह्मणः = उस ब्रह्मके, आनन्दम् = आनन्दको, विद्वान् = जाननेवाला पुरुष; कदाचन = कभी; न बिभेति = भय नहीं करता, इति = इस प्रकार यह श्लोक है, तस्य = उस मनोमय पुरुषका भी; एषः एव = यही परमात्मा, शारीरः = शरीरान्तर्वर्ती, आत्मा = आत्मा है, यः = जो; पूर्वस्य = पहले बताये हुए अन्नरसमय शरीर या प्राणमय शरीरका है। उ० अं० ४३-
३३८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—इस मन्त्रमें ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाले विद्वान्की महिमाके साथ अर्थान्तरसे उसके मनोमय शरीरकी महिमा प्रकट की गयी है । भाव यह है कि परब्रह्म परमात्माका जो स्वरूपभूत परम आनन्द है, वहाँतक मन, वाणी आदि समस्त इन्द्रियोंके समुदायस्वरूप मनोमय शरीरकी भी पहुँच नहीं है, परंतु ब्रह्मको पानेके लिये साधन करनेवाले मनुष्यको यह ब्रह्मके पास पहुँचानेमें विशेष सहायक है । ये मन-वाणी आदि साधनपरायण पुरुषको उन परब्रह्मके द्वारतक पहुँचाकर, उसे वहीं छोड़कर स्वय लौट आते हैं और वह साधक उनको प्राप्त हो जाता है । ब्रह्मके आनन्दमय स्वरूपको जान लेनेवाला विद्वान् कभी भयभीत नहीं होता । इस प्रकार यह मन्त्र है । मनोमय शरीरके भी अन्तर्यामी आत्मा वे ही परमात्मा हैं, जो पूर्वोक्त अन्न-रसमय शरीर और प्राणमय शरीरके अन्तर्यामी हैं। तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयादन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयस्तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य श्रद्धैव शिरः । ऋतं दक्षिणः पक्षः । सत्यमुत्तरः पक्षः । योग आत्मा । महः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति । वै=निश्चय ही; तस्मात्=उस पहले बताये हुए, एतस्मात्=इस, मनोमयात्=मनोमय पुरुषसे; अन्यः= अन्य, अन्तरः=इसके भीतर रहनेवाला, आत्मा=आत्मा, विज्ञानमयः=विज्ञानमय है, तेन=उस विज्ञानमय आत्मासे, एषः=यह मनोमय शरीर, पूर्णः=व्याप्त है; सः=वह, एषः=यह विज्ञानमय आत्मा, वै=निश्चय ही, पुरुषविधः एव=निस्सन्देह पुरुषके आकारका ही है, तस्य=उसकी, पुरुषविधताम् अनु=पुरुषाकृतिमें अनुगत होनेसे ही, अयम्= यह विज्ञानमय आत्मा, पुरुषविधः=पुरुषके आकारका बताया जाता है, तस्य=उस विज्ञानमय आत्माका; श्रद्धा= श्रद्धा; एव=ही; शिरः=( मानो ) सिर है, ऋतम्=सदाचारका निश्चय; दक्षिणः=दाहिना, पक्षः=पख है; सत्यम्= सत्य-भाषणका निश्चय, उत्तरः=बायाँ, पक्षः=पख है, योगः=( ध्यानद्वारा परमात्मामें एकाग्रतारूप ) योग ही; आत्मा= शरीरका मध्यभाग है, महः='महः' नामसे प्रसिद्ध परमात्मा ही, पुच्छम्=पुच्छ, ( एव ) प्रतिष्ठा=आधार है, तत्= उस विषयमें; अपि=भी, एषः=यह आगे कहा जानेवाला, श्लोकः=श्लोक, भवति=है । व्याख्या—चतुर्थ अनुवाकके इस दूसरे अंशमे विज्ञानमय पुरुषका अर्थात् विज्ञानमय शरीरके अधिष्ठाता जीवात्माका वर्णन है । भाव यह है कि पहले बताये हुए मनोमय शरीरसे भी सूक्ष्म होनेके कारण उसके भीतर रहनेवाला जो आत्मा है, वह अन्य है । वह है विज्ञानमय पुरुष अर्थात् बुद्धिरूप गुफामें निवास करनेवाला और उसमें तदाकार-सा बना हुआ जीवात्मा । उससे यह मनोमय शरीर पूर्ण है अर्थात् वह इस मनोमय शरीरमें सर्वत्र व्याप्त है । और मनोमय अपनेसे पहले- वाले प्राणमय और अन्नमयमें व्याप्त है । अतः यह विज्ञानमय जीवात्मा समस्त शरीरमें व्याप्त है । गीतामें भी यही कहा है कि जीवात्मारूप क्षेत्रज्ञ शरीररूप क्षेत्रमें सर्वत्र स्थित है (गीता १३ । ३२) । वह विज्ञानमय आत्मा भी निश्चय ही पुरुषके आकार- का है । उस मनोमय पुरुषमें व्याप्त होनेसे ही वह पुरुषाकार कहा जाता है । उस विज्ञानमयके अङ्गोंकी पक्षीके रूपमे इस प्रकार कल्पना की गयी है । श्रद्धा कहते हैं बुद्धिकी निश्चित विश्वासरूप वृत्तिको, वही उस विज्ञानात्माके शरीरमे प्रधान अङ्गरूप सिर है; क्योंकि यह दृढ विश्वास ही प्रत्येक विषयमें उन्नतिका कारण है । परमात्माकी प्राप्तिमें तो सबसे पहले और सबसे अधिक इसीकी आवश्यकता है । सदाचरणका निश्चय ही इसका दाहिना पख है, सत्य भाषणका निश्चय ही इसका बायाँ पख है । ध्यानद्वारा परमात्माके साथ सयुक्त रहना ही विज्ञानमय शरीरका मध्यभाग है और 'महः' नामसे प्रसिद्ध परमात्मा पुच्छ अर्थात् आधार है, क्योंकि परमात्मा ही जीवात्माका परम आश्रय है । इस विज्ञानात्माकी महिमाके विषयमें भी यह आगे पञ्चम अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है । ॥ चतुर्थ अनुवाक समाप्त ॥ ४ ॥
- शिक्षावल्लीमें 'भू', 'भुव', 'स्व' और 'मह'—इन चार व्याहृतियोंमें 'मह' को ब्रह्मका स्वरूप बताया है, अतः 'मह' व्याहृति ब्रह्मका नाम है और ब्रह्मको आत्माकी प्रतिष्ठा बतलाना सर्वथा युक्तिसङ्गत है ।
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३३९ पञ्चम अनुवाक विज्ञानं यज्ञं तनुते । कर्माणि तनुतेऽपि च । विज्ञानं देवाः सर्वे । ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते । विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद । तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति । शरीरे पाप्मनो हित्वा । सर्वान्कामान्समश्नुत इति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । विज्ञानम् = विज्ञान ही; यज्ञम् तनुते = यज्ञोंका विस्तार करता है; च = और; कर्माणि अपि तनुते = कर्मोंका भी विस्तार करता है, सर्वे = सब; देवाः = इन्द्रियरूप देवता; ज्येष्ठम् = सर्वश्रेष्ठ; ब्रह्म = ब्रह्मके रूपमें, विज्ञानम् उपासते = विज्ञानकी ही सेवा करते हैं; चेत् = यदि; ( कोई ) विज्ञानम् = विज्ञानको; ब्रह्म = ब्रह्मरूपसे; वेद = जानता है, ( और ) चेत् = यदि; तस्मात् = उससे, न प्रमाद्यति = प्रमाद नहीं करता, निरन्तर उसी प्रकार चिन्तन करता रहता है, ( तो ) पाप्मनः = ( शरीराभिमानजनित ) पापसमुदायको; शरीरे = शरीरमें ही, हित्वा = छोड़कर; सर्वान् = समस्त, कामान् समश्नुते = भोगोंका अनुभव करता है; इति = इस प्रकार यह श्लोक है, तस्य = उस विज्ञानमयका, एषः = यह परमात्मा; एव = ही; शारीरः = शरीरान्तर्वर्ती, आत्मा = आत्मा है; यः = जो; पूर्वस्य = पहलेवालेका है। व्याख्या- इस मन्त्रमें विज्ञानात्माकी महिमाका वर्णन और उसकी ब्रह्मरूपसे उपासना करनेका फल बताया गया है । भाव यह है कि यह विज्ञान अर्थात् बुद्धिके साथ तद्रूप हुआ जीवात्मा ही यज्ञोंका अर्थात् शुभ-कर्मरूप पुण्योंका विस्तार करता है और यही अन्यान्य लौकिक कर्मोंका भी विस्तार करता है । अर्थात् बुद्धिसे ही सम्पूर्ण कर्मोंको प्रेरणा मिलती है । सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और मनरूप देवता सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मके रूपमें इस विज्ञानमय जीवात्माकी ही सेवा करते हैं, अपनी-अपनी वृत्तियों- द्वारा इसीको सुख पहुँचाते रहते हैं । यदि कोई साधक इस विज्ञानस्वरूप आत्माको ही ब्रह्म समझता है और यदि यह उस धारणासे कभी च्युत नहीं होता अर्थात् उस धारणामे भूल नहीं करता या शरीर आदिमे स्थित, एकदेशीय एव बद्धस्वरूपमें ब्रह्मका अभिमान नहीं कर लेना तो वह अनेक जन्मोंके संचित पापसमुदायको शरीरमें ही छोड़कर समस्त दिव्य भोगोंका अनुभव करता है । इस प्रकार यह श्लोक है । उस विज्ञानमयके भी अन्तर्यामी आत्मा वे ही परब्रह्म परमेश्वर हैं, जो पहलेवालोंके अर्थात् अन्न-रसमय स्थूलशरीरके, प्राणमयके और मनोमयके हैं । तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द आत्मा । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति । वै = निश्चय ही, तस्मात् = उस पहले कहे हुए; एतस्मात् = इस, विज्ञानमयात् = विज्ञानमय जीवात्मासे; अन्यः = भिन्न, अन्तरः = इसके भी भीतर रहनेवाला आत्मा, आनन्दमयः आत्मा = आनन्दमय परमात्मा है; तेन = उससे, एषः = वह विज्ञानमय, पूर्णः = पूर्णतः व्याप्त है; सः = वह, एषः = यह आनन्दमय परमात्मा, वै = भी, पुरुषविधः = पुरुषके समान आकारवाला; एव = ही है, तस्य = उस विज्ञानमयकी, पुरुषविधताम् अनु = पुरुषाकारतामें अनुगत होनेसे ही, अयम् = यह ( आनन्दमय परमात्मा ), पुरुषविधः = पुरुषाकार कहा जाता है, तस्य = उस आनन्दमय- का, प्रियम् = प्रिय, एव = ही; शिरः = ( मानो ) सिर है, मोदः = मोद, दक्षिणः = दाहिना; पक्षः = पंख है; प्रमोदः = प्रमोद, उत्तरः = बायाँ, पक्षः = पंख है, आनन्दः = आनन्द ही, आत्मा = शरीरका मध्यभाग है, ब्रह्म = ब्रह्म, पुच्छम् = पूँछ, ( एव ) प्रतिष्ठा = आधार है, तत् = उसकी महिमाके विषयमें, अपि = भी, एषः = यह, श्लोकः = श्लोक; भवति = है । व्याख्या- पञ्चम अनुवाकके इस दूसरे अंशमें आनन्दमय परमपुरुषका वर्णन किया गया है । भाव यह है कि पहले अंशमें कहे हुए विज्ञानमय जीवात्मासे भिन्न, उसके भी भीतर रहनेवाला एक दूसरा आत्मा है, वह है आनन्दमय परमात्मा । उससे यह विज्ञानमय पुरुष व्याप्त है अर्थात् वह इसमें भी परिपूर्ण है । बृहदारण्यक उपनिषद् ( ३ । ७ । २३ ) में भी
३४० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * परमात्माको जीवात्मारूप शरीरका शासन करनेवाला और उसका अन्तरात्मा बताया है। वे ही वास्तवमें समस्त पुरुषोंसे उत्तम होनेके कारण 'पुरुष' शब्दके अभिधेय हैं। वे विज्ञानमय पुरुषके समान आकारवाले हैं। उस विज्ञानमय पुरुषमें व्याप्त होनेके कारण ही वे पुरुषाकार कहे जाते हैं। पक्षीके रूपमें उन आनन्दमय परमेश्वरके अङ्गोंकी कल्पना इस प्रकार की गयी है। प्रियभाव उनका सिर है। तात्पर्य यह कि आनन्दमय परमात्मा सबके प्रिय हैं। समस्त प्राणी 'आनन्द' से प्रेम करते हैं, सभी 'आनन्दको' चाहते हैं, परंतु न जाननेके कारण उन्हें पा नहीं सकते। यह 'प्रियता' उन आनन्दमय परमात्मा- का एक प्रधान अंश है; अतः यही मानो उनका प्रधान अङ्ग सिर है। मोद दाहिना पंख है, प्रमोद बायाँ पंख है, आनन्द ही परमात्माका मध्य-अङ्ग है तथा स्वयं ब्रह्म ही इनकी पूँछ एव आधार हैं। परमात्मा अवयवरहित होनेके कारण उनके स्वरूप और अङ्गोंका वर्णन वास्तविकरूपसे नहीं बन सकता। फिर ऐसी कल्पना क्यों की गयी ? इसका समाधान करते हुए ब्रह्मसूत्र (३ । ३ । १२ से ३ । ३ । १४ तक) में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि ब्रह्मके विषयमें ऐसी कल्पना केवल उपासनाकी सुगमताके लिये की जाती है, दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है। इस प्रकरणमें विज्ञानमयका अर्थ जीवात्मा और आनन्दमयका अर्थ परमात्मा ही लेना चाहिये, यह बात ब्रह्मसूत्र ( १ । १ । १२ से १९ तकके विवेचन) में युक्तियों तथा श्रुतियोंके प्रमाणोंद्वारा सिद्ध की गयी है। इन आनन्दमय परमात्माके विषयमें भी आगे षष्ठ अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है। ॥ पञ्चम अनुवाक समाप्त ॥ ५॥ ❧❦❧ षष्ठ अनुवाक असन्नेव स भवति । असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद । सन्तमेनं ततो विदुरिति । चेत्=यदि; (कोई) ब्रह्म=ब्रह्म; असत्=नहीं है; इति=इस प्रकार; वेद=समझता है, (तो) सः=वह, असत्= असत्; एव=ही, भवति=हो जाता है, (और) चेत्=यदि; (कोई) ब्रह्म=ब्रह्म; अस्ति=है; इति=इस प्रकार; वेद= जानता है, ततः=तो, [विद्वांसः=ज्ञानीजन,] एनम्=इसको; सन्तम्=सत्—सत्पुरुष, विदुः=समझते हैं; इति=इस प्रकार यह श्लोक है। व्याख्या—इस मन्त्रमें ब्रह्मकी सत्ता माननेका और न माननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि यदि कोई मनुष्य यह समझता है या ऐसा निश्चय करता है कि 'ब्रह्म असत् है' अर्थात् ब्रह्म या ईश्वर नामकी कोई चीज नहीं है, तो वह 'असत्' हो जाता है, अर्थात् स्वेच्छाचारी होकर सदाचारसे भ्रष्ट, नीच प्रकृतिका हो जाता है। और यदि कोई मनुष्य ब्रह्मके यथार्थ तत्त्वको न जानकर भी यह समझता है कि 'निःसंदेह ब्रह्म है', अर्थात् शास्त्र और महापुरुषोंपर दृढ विश्वास होनेके कारण यदि उसके मनमें ईश्वरकी सत्तापर पूरा विश्वास हो गया है, तो ऐसे मनुष्यको ज्ञानी और महापुरुष 'सत्' अर्थात् सत्पुरुष समझते हैं, क्योंकि परमात्माके तत्त्वज्ञानकी पहली सीढी उनकी सत्तामें विश्वास ही है। परमात्माकी सत्तामें विश्वास बना रहे तो कभी न-कभी किन्हीं महापुरुषकी कृपासे साधनमें लगकर मनुष्य उन्हें प्राप्त भी कर सकता है। तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । तस्य=उस (आनन्दमय) का भी; एषः एव=यही, शारीरः=शरीरान्तर्वर्ती; आत्मा=आत्मा है, यः= जो; पूर्वस्य=पहलेवाले (विज्ञानमय) का है। व्याख्या—षष्ठ अनुवाकके इस दूसरे अंशमें पहलेके वर्णनानुसार आनन्दमयका अन्तरात्मा स्वय आनन्दमयको ही बताया गया है। भाव यह है कि उन आनन्दमय ब्रह्मके वे स्वय ही शरीरान्तर्वर्ती आत्मा हैं, क्योंकि उनमें शरीर और शरीरीका भेद नहीं है। जो पहले बताये हुए अन्न-रसमय आदि सबके अन्तर्यामी परमात्मा हैं, वे स्वय ही अपने अन्तर्यामी हैं; उनका अन्तर्यामी कोई दूसरा नहीं है। इसीलिये इनके आगे किसी दूसरेको न बताकर उस वर्णनकी परम्पराको यहीं समाप्त कर दिया गया है।
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३४१ सम्बन्ध-ऊपर कहे हुए अंशमें ब्रह्मको 'असत्' मानने और 'सत्' माननेका फल बताया गया है, उसे सुनकर प्रत्येक मनुष्यके मनमें जो प्रश्न उठ सकते हैं, उन प्रश्नोंका निर्णय करके उन ब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन करनेके लिये श्रुति स्वयं ही प्रश्न उपस्थित करती है— अथातोऽनुप्रश्नाः । उताविद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चन गच्छती ३ । आहो विद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चित्समश्नुता ३ उ । अथ = इसके बाद; अतः = यहाँसे; अनुप्रश्नाः = अनुप्रश्न आरम्भ होते हैं; उत = क्या, अविद्वान् = ब्रह्मको न जाननेवाला; कश्चन = कोई पुरुष, प्रेत्य = मरकर; अमुम् लोकम् गच्छति = उस लोकमें (परलोकमें) जाता है, आहो = अथवा; कश्चित् = कोई भी; विद्वान् = ज्ञानी; प्रेत्य = मरकर, अमुम् = उस, लोकम् = लोकको; समश्नुते = प्राप्त होता है; उ = क्या ? व्याख्या-अब यहाँसे अनुप्रश्न* आरम्भ करते हैं। पहला प्रश्न तो यह है कि यदि ब्रह्म हैं तो उनको न जाननेवाला कोई भी मनुष्य मरनेके अनन्तर परलोकमें जाता है या नहीं ? दूसरा यह प्रश्न है कि ब्रह्मको जाननेवाला कोई भी विद्वान् मरनेके बाद परलोकको प्राप्त होता है या नहीं ? सम्बन्ध-इन प्रश्नोंके उत्तरमें श्रुति ब्रह्मके स्वरूप और शक्तिका वर्णन करती है तथा पहले अनुवाकमें जो संक्षेपसे सृष्टिकी उत्पत्तिका क्रम बताया था, उसे भी विशदरूपसे समझाया जाता है— सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेयेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा इद सर्वमसृजत यदिदं किं च । तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् । तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत् । निरुक्तं चानिरुक्तं च । निलयनं चानिलयनं च। विज्ञानं चाविज्ञानं च। सत्यं चानृतं च सत्यमभवत् । यदिदं किं च । तत्सत्यमित्याचक्षते । तदप्येष श्लोको भवति । सः = उस परमेश्वरने; अकामयत = विचार किया कि; प्रजायेय = मैं प्रकट होऊँ; (और अनेक नाम-रूप धारण • करके) बहु = बहुत; स्याम् इति = हो जाऊँ; सः = (इसके बाद) उसने, तपः = तप किया अर्थात् अपने संकल्पका विस्तार किया; सः = उसने, तपः तप्त्वा = इस प्रकार संकल्पका विस्तार करके; यत् = जो, किम् = कुछ, च = भी; इदम् = यह देखने और समझनेमें आता है, इदम् = इस, सर्वम् असृजत = समस्त जगत्की रचना की, तत् सृष्ट्वा = उस जगत्की रचना करनेके अनन्तर, तत् एव = (वह स्वयं) उसीमें; अनुप्राविशत् = साथ-साथ प्रविष्ट हो गया, तत् अनुप्रविश्य = उसमें साथ-साथ प्रविष्ट होनेके बाद, (वह स्वयं ही) सत् = मूर्त, च = और, त्यत् = अमूर्त, च = भी, अभवत् = हो गया; निरुक्तम् च अनिरुक्तम् = बतानेमे आनेवाले और न आनेवाले, च = तथा, निलयनम् = आश्रय देनेवाले, च = और,
- अनुप्रश्न उन प्रश्नोंको कहते हैं, जो आचार्यके उपदेशके अनन्तर किसी शिष्यके मनमें उठते हैं या जिन्हें वह उपस्थित करता है। इस अनुवाकमें जो अनुप्रश्न पूछे गये हैं, वे दोके रूपमें तीन हैं-(१) वास्तवमें ब्रह्म है या नहीं ? (२) जब ब्रह्म आकाशकी भाँति सर्वगत तथा पक्षपातरहित-सम है, तब क्या वे अविद्वान् (अपना ज्ञान न रखनेवाले) को भी प्राप्त होते हैं या नहीं ? (३) यदि अविद्वान्को नहीं प्राप्त होते, तब तो सम होनेके कारण वे विद्वान्को भी नहीं प्राप्त होंगे, इसलिये यह तीसरा प्रश्न है कि विद्वान् पुरुष ब्रह्मका अनुभव करता है या नहीं ? इनके उत्तरमें ब्रह्मको सृष्टिका कारण बतलाकर अर्थत उनकी सत्ता सिद्ध कर दी गयी। फिर 'तत् सत्यम् इत्याचक्षते ' इस वाक्यद्वारा श्रुतिने स्पष्टरूपसे भी उनकी सत्ताका प्रतिपादन कर दिया। सातवें अनुवाकमें तो और भी स्पष्ट वचन मिलता है-'को ह्येवान्यात् ? कः प्राण्यात् ? यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्' अर्थात् यदि ये आकाशस्वरूप आनन्दमय परमात्मा न होते तो कौन जीवित रहता और कौन चेष्टा भी कर सकता ? अर्थात् प्राणियोंका जीवन और चेष्टा परमात्मापर ही निर्भर है। दूसरे प्रश्नके उत्तरमें सप्तम अनुवाकमें यह बात कही गयी है कि जबतक मनुष्य परमात्माको पूर्णतया नहीं जान लेता, उनमें थोड़ा-सा भी अन्तर रख लेता है, तबतक वह जन्म-मरणके भयसे नहीं छूटता । तीसरे प्रश्नके उत्तरमें आठवें अनुवाकके उपसंहारमें श्रुति 'स्वयं कहती है-'स य एवंवित् आनन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति' अर्थात् जो यह जानता है, वह क्रमश अन्नमय, प्राणमय आदिको प्राप्त करता हुआ अन्तमें आनन्दमय परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है।'
३४२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अनिलयनम् = आश्रय न देनेवाले, च = तथा, विज्ञानम् = चेतनायुक्त, च = और; अविज्ञानम् = जड पदार्थ, च = तथा; सत्यम् = सत्य; च = और; अनृतम् = झूठ ( इन सबके रूपमें ), च = भी; सत्यम् = वह सत्यस्वरूप परमात्मा ही; अभवत् = हो गया, यत् = जो; किम् = कुछ, च = भी, इदम् = यह दिखायी देता है और अनुभवमें आता है; तत् = वह; सत्यम् = सत्य ही है; इति = इस प्रकार, आचक्षते = ज्ञानीजन कहते हैं, तत् = उस विषयमें, अपि = भी, एषः = यह, श्लोकः = श्लोक, भवति = है । व्याख्या—सर्गके आदिमें परब्रह्म परमात्माने यह विचार किया कि मैं नानारूपमें उत्पन्न होकर बहुत हो जाऊँ । यह विचार करके उन्होंने तप किया अर्थात् जीवोंके कर्मानुसार सृष्टि उत्पन्न करनेके लिये सङ्कल्प किया । सङ्कल्प करके यह जो कुछ भी देखने, सुनने और समझनेमें आता है, उस जड-चेतनमय समस्त जगत्की रचना की, अर्थात् इसका सङ्कल्पमय स्वरूप बना लिया । उसके बाद स्वयं भी उसमें 'प्रविष्ट हो गये। यद्यपि अपनेसे ही उत्पन्न इस जगत्मे वे परमेश्वर पहलेसे ही प्रविष्ट थे, —यह जगत् जब उन्हींका स्वरूप है, तब उसमें उनका प्रविष्ट होना नहीं बनता, —तथापि जड-चेतनमय जगत्में आत्मरूपसे परिपूर्ण हुए उन परब्रह्म परमेश्वरके विशेष स्वरूप—उनके अन्तर्यामी स्वरूपका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ यह बात कही गयी है कि 'इस जगत्की रचना करके वे स्वयं भी उसमें प्रविष्ट हो गये।' प्रविष्ट होनेके बाद वे मूर्त और अमूर्तरूपसे अर्थात् देखनेमें आनेवाले पृथ्वी, जल और तेज—इन भूतोंके रूपमें तथा वायु और आकाश—इन न दिखायी देनेवाले भूतोंके रूपमें प्रकट हो गये । फिर जिनका वर्णन किया जा सकता है और नहीं किया जा सकता, ऐसे विभिन्न नाना पदार्थोंके रूपोंमें हो गये । इसी प्रकार आश्रय देनेवाले और आश्रय न देनेवाले, चेतन और जड—इन सबके रूपमें वे एकमात्र परमेश्वर ही बहुत-से नाम और रूप धारण करके व्यक्त हो गये । वे एक सत्यस्वरूप परमात्मा ही सत्य और झूठ—इन सबके रूपमें हो गये । इसीलिये ज्ञानीजन कहते हैं कि 'यह जो कुछ देखने, सुनने और समझनेमें आता है, वह सब-का सब सत्यस्वरूप परमात्मा ही है।' इस विषयमें भी यह आगे सप्तम अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है । ॥ षष्ठ अनुवाक समाप्त ॥ ६ ॥ स अनुवाक असद्वा इदमग्र आसीत् । ततो वै सदजायत । तदात्मानग्ँस्वयमकुरुत । तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति । अग्रे = प्रकट होनेसे पहले, इदम् = यह जड-चेतनात्मक जगत्; असत् = अव्यक्तरूपमें, वै = ही, आसीत् = था; ततः = उससे, वै = ही, सत् = सत् अर्थात् नामरूपमय प्रत्यक्ष जगत्, अजायत = उत्पन्न हुआ है, तत् = उसने, आत्मानम् = अपनेको, स्वयम् = स्वय, अकुरुत = ( इस रूपमे ) प्रकट किया है, तस्मात् = इसीलिये, तत् = वह; सुकृतम् = 'सुकृत'; उच्यते = कहा जाता है, इति = इस प्रकार यह श्लोक है । व्याख्या—सूक्ष्म और स्थूलरूपमे प्रकट होनेसे पहले यह जड-चेतनमय सम्पूर्ण जगत् असत्—अर्थात् अव्यक्तरूपमें ही था, उस अव्यक्तावस्थासे ही यह सत् अर्थात् नाम-रूपमय प्रत्यक्ष जड-चेतनात्मक जगत् उत्पन्न हुआ है । परमात्माने अपने- को स्वय ही इस जड-चेतनात्मक जगत्के रूपमें बनाया है, इसीलिये उनका नाम 'सुकृत' (अपने-आप बने हुए ) है । *
- गीतामें कई प्रकारसे इस जड-चेतनात्मक जगत्का अव्यक्तसे उत्पन्न होना और उसीमें लय होना बताया गया है ( गीता ८ । १८, ९ । ७, २ । २८ ) । परंतु भगवान् जब स्वय अवतार लेकर लीला करनेके लिये जगत्में प्रकट होते हैं, तब उनका वह प्रकट होना अन्य जीवोंकी भाँति अव्यक्तसे व्यक्त होने अर्थात् कारणसे कार्यरूपमें परिवर्तित होनेके समान नहीं है, वह तो अलौकिक है । इसलिये वहाँ भगवान्ने कहा है कि जो मुझे अव्यक्तसे व्यक्त हुआ मानते हैं, वे बुद्धिहीन हैं ( ७ । २४ ), वहाँ जडतत्त्वों और उनके नियमोंका प्रवेश नहीं है । भगवान्के नाम, रूप, लीला, धाम—सब कुछ अप्राकृत हैं, चिन्मय हैं । उनके जन्म-कर्म दिव्य हैं । भगवान्के प्राकट्यका रहस्य बड़े-बड़े देवता और महर्षिलोग भी नहीं जानते ( गीता १० । २) ।
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३४३ यद्वै तत्सुकृतं रसो वै सः। रस२ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। को ह्येवान्यात्कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष ह्येवानन्दयाति। वै=निश्चय ही; यत्=जो; तत्=वह; सुकृतम्=सुकृत है; सः वै=वही; रसः=रस है; हि=क्योंकि; अयम्=यह (जीवात्मा); रसम्=इस रसको; लब्ध्वा=प्राप्त करके; एव=ही; आनन्दी=आनन्दयुक्त; भवति=होता है; यत्=यदि; एषः=यह; आनन्दः=आनन्दस्वरूप; आकाशः=आकाशकी भाँति व्यापक परमात्मा; न स्यात्=न होता; हि=तो; कः एव= कौन; अन्यात्=जीवित रह सकता; (और) कः=कौन; प्राण्यात्=प्राणोंकी क्रिया (चेष्टा) कर सकता; हि=निःसंदेह; एषः=यह परमात्मा; एव=ही; आनन्दयाति=सबको आनन्द प्रदान करता है। व्याख्या—ये जो ऊपरके वर्णनमे 'सुकृत' नामसे कहे गये हैं, वे परब्रह्म परमात्मा सचमुच रसस्वरूप (आनन्दमय) हैं; ये ही वास्तविक आनन्द हैं; क्योंकि अनादिकालसे जन्म-मृत्युरूप घोर दुःखका अनुभव करनेवाला यह जीवात्मा इन रसमय परब्रह्मको पाकर ही आनन्दयुक्त होता है। जबतक इन परम प्राप्य आनन्दस्वरूप परमेश्वरसे इसका संयोग नहीं हो जाता; तबतक इसे किसी भी स्थितिमें पूर्णानन्द; नित्यानन्द; अखण्डानन्द नहीं मिल सकता। इसीसे उन वास्तविक आनन्दस्वरूप परमात्माका अस्तित्व निःसंदेह सिद्ध होता है; क्योंकि यदि ये आकाशकी भाँति व्यापक आनन्द- स्वरूप परमात्मा नहीं होते तो कौन जीवित रह सकता और कौन प्राणोंकी क्रिया—हिलना-डुलना आदि कर सकता। अर्थात् समस्त प्राणी सुखस्वरूप परमात्माके ही सहारे जीते और हलन-चलन आदि चेष्टा करते हैं। इतना ही नहीं, सबके जीवन- निर्वाहकी सब प्रकारसे सुव्यवस्था करनेवाले भी वे ही हैं; अन्यथा इस जगत्की समस्त भौतिक क्रिया, जो नियमित और व्यवस्थितरूपसे चल रही है, कैसे हो सकती। अतः मनुष्यको यह दृढ़तापूर्वक विश्वास करना चाहिये कि इस जगत्के कर्त्ता- हर्त्ता परब्रह्म परमेश्वर अवश्य हैं तथा निःसंदेह ये परमात्मा ही सबको आनन्द प्रदान करते हैं। जब आनन्दस्वरूप एकमात्र परमात्मा ही हैं, तब दूसरा कौन आनन्द दे सकता है। यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो भवति। हि=क्योंकि; यदा एव=जब कभी; एषः=यह जीवात्मा; एतस्मिन्=इस; अदृश्ये=देखनेमें न आनेवाले; अनात्म्ये= शरीररहित; अनिरुक्ते=बतलानेमें न आनेवाले; (और) अनिलयने=दूसरेका आश्रय न लेनेवाले परब्रह्म परमात्मामें; अभयम्=निर्भयतापूर्वक; प्रतिष्ठाम्=स्थिति; विन्दते=लाभ करता है; अथ=तब; सः=वह; अभयम्=निर्भयपदको; गतः=प्राप्त; भवति=हो जाता है। व्याख्या—क्योंकि उन परब्रह्म परमेश्वरको पानेकी अभिलाषा रखनेवाला यह जीव जब कभी देखनेमें न आनेवाले, बतलानेमें न आनेवाले और किसीके आश्रित न रहनेवाले शरीर-रहित परब्रह्म परमात्मामें निर्भय (अविचल) स्थिति लाभ करता है, उस समय वह निर्भयपदको प्राप्त हो जाता है—सदाके लिये भय एव शोकसे रहित हो जाता है। यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति। तत्त्वेव भयं विदुषो मन्वानस्य। तदप्येष श्लोको भवति। हि=क्योंकि; यदा एव=जवतक; एषः=यह; उदरम्=थोड़ा-सा; वै=भी; एतस्मिन् अन्तरम्=इस परमात्मासे वियोग; कुरुते=किये रहता है; अथ=तबतक; तस्य=उसको; भयम्=जन्म-मृत्युरूप भय; भवति=प्राप्त होता है; तु=तथा; तत् एव=वही; भयम्=भय; (केवल मूर्खको ही नहीं होता; किंतु) =अभिमानी; विदुषः=शास्त्रज्ञ विद्वान्को भी अवश्य होता है; तत्=उसके विषयमें; अपि=भी; एषः=यह (आगे कहा हुआ); श्लोकः=श्लोक; भवति=है। व्याख्या—क्योंकि जबतक यह जीवात्मा उन परब्रह्म परमात्मासे थोड़ा-सा भी अन्तर किये रहता है—उनमें पूर्ण स्थिति लाभ नहीं कर लेता या उनका निरन्तर स्मरण नहीं करता—उन्हें थोड़ी देरके लिये भी भूल जाता है; तबतक उसके
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३४४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * लिये भय है, अर्थात् उसका पुनर्जन्म होना सम्भव है; क्योंकि जिस समय उसकी परमात्मामें स्थिति नहीं है, वह भगवान्को भूला हुआ है, उसी समय यदि उसकी मृत्यु हो गयी तो फिर उसका अन्तिम संस्कारके अनुसार जन्म होना निश्चित है। क्योंकि भगवान्ने गीतामें कहा है—'जिस-जिस भावको स्मरण करता हुआ मनुष्य अन्तकालमे शरीर छोड़ता है, उसीके अनुसार उसे जन्म ग्रहण करना पड़ता है (८।६)।' और मृत्यु प्रारब्धके अनुसार किसी क्षण भी आ सकती है। इसीलिये योगभ्रष्टका पुनर्जन्म होनेकी बात गीतामें कही गयी है (६। ४०-४२)। जबतक परमात्मामे पूर्ण स्थिति नहीं हो जाती अथवा जबतक भगवान्का निरन्तर स्मरण नहीं होता, तबतक यह पुनर्जन्मका भय—जन्म-मृत्युका भय सभीके लिये बना हुआ है—चाहे कोई बड़े-से-बड़ा शास्त्रज्ञ विद्वान् क्यों न हो, चाहे कोई अपनेको बड़े-से-बड़ा ज्ञानी अथवा पण्डित क्यों न माने। वे परमेश्वर सबपर शासन करनेवाले हैं, उन्हींकी शासन-शक्तिसे जगत्की सारी व्यवस्था नियमितरूपसे चल रही है। इसी विषयपर यह आगे अष्टम अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है। ॥ सप्तम अनुवाक समाप्त ॥ ७ ॥ अष्टम अनुवाक सम्बन्ध-पिछले अनुवाकमें जिस श्लोकका लक्ष्य कराया गया था, उसका उल्लेख करते हैं— भीषास्माद्वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चम इति। अस्मात् भीषा = इसीके भयसे, वातः = पवन; पवते = चलता है, भीषा = ( इसीके ) भयसे, सूर्यः = सूर्य; उदेति = उदय होता है, अस्मात् भीषा = इसीके भयसे, अग्निः = अग्नि; च = और, इन्द्रः = इन्द्र, च = और; पञ्चमः = पाँचवाँ; मृत्युः = मृत्यु, धावति = ( ये सब ) अपना-अपना कार्य करनेमें प्रवृत्त हो रहे हैं, इति = इस प्रकार यह श्लोक है। व्याख्या-इन परब्रह्म परमेश्वरके भयसे ही पवन नियमानुसार चलता है, इन्हींके भयसे सूर्य ठीक समयपर उदय होता है और ठीक समयपर अस्त होता है तथा इन्हींके भयसे अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ मृत्यु—ये सब अपना-अपना कार्य नियम- पूर्वक सुव्यवस्थितरूपसे कर रहे हैं। यदि इन सबकी सुव्यवस्था करनेवाला इन सबका प्रेरक कोई न हो तो जगत्के सारे काम कैसे चलें। इससे सिद्ध होता है कि इन सबको बनानेवाला, सबको यथायोग्य नियममे रखनेवाला कोई एक सत्य, ज्ञान और आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मा अवश्य हैं और वे मनुष्यको अवश्य मिल सकते हैं*। सम्बन्ध-उन आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माका वह आनन्द कितना और कैसा है, इस जिज्ञासापर आनन्दविषयक विचार आरम्भ किया जाता है— सैषाऽऽनन्दस्य मीमाᳵसा भवति। युवा स्यात्साधुयुवाध्यायक आशिष्ठो द्रढिष्ठो बलिष्ठस्तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात्। स एको मानुष आनन्दः। सा = वह, एषा = यह, आनन्दस्य = आनन्दसम्बन्धी, मीमांसा = विचार, भवति = आरम्भ होता है; युवा = कोई युवक, स्यात् = हो, ( वह भी ऐसा-वैसा नहीं, ) साधुयुवा = श्रेष्ठ आचरणोंवाला युवक हो; ( तथा ) अध्यापकः = वेदोंका अध्ययन कर चुका हो; आशिष्ठः = शासनमें अत्यन्त कुशल हो, द्रढिष्ठः = उसके सम्पूर्ण अङ्ग और इन्द्रियाँ सर्वथा दृढ हों; ( तथा ) बलिष्ठः = वह सब प्रकारसे बलवान् हो; तस्य = ( फिर ) उसे, इयम् = यह; वित्तस्य पूर्णा = धनसे परिपूर्ण; सर्वा = सब-की-सब, पृथिवी = पृथ्वी, स्यात् = प्राप्त हो जाय, ( तो ) सः = वह, मानुषः = मनुष्यलोकका; एकः = एक, आनन्दः = आनन्द है। व्याख्या-इस वर्णनमे उस आनन्दका विचार आरम्भ करनेकी सूचना देकर सर्वप्रथम मनुष्य-लोकके भोगोंसे मिल सकनेवाले बड़े-से-बड़े आनन्दकी कल्पना की गयी है। भाव यह है कि एक मनुष्य युवा हो, वह भी ऐसा-वैसा
- इसी भावकी श्रुति कठोपनिषद्में भी आयी है (२। ३। ३)।
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३४५ मामूली युवक नहीं—सदाचारी, अच्छे स्वभाववाला, अच्छे कुलमे उत्पन्न श्रेष्ठ पुरुष हो, उसे सम्पूर्ण वेदोंकी शिक्षा मिली हो तथा शासनमे—ब्रह्मचारियोंको सदाचारकी शिक्षा देनेमें अत्यन्त कुशल हो, उसके सम्पूर्ण अङ्ग और इन्द्रियाँ रोगरहित, समर्थ और सुदृढ हों और वह सब प्रकारके बलसे सम्पन्न हो। फिर धन-सम्पत्तिसे भरी यह सम्पूर्ण पृथ्वी उसके अधिकार- में आ जाय, तो यह मनुष्यका एक बड़े-से-बड़ा सुख है। वह मानव-लोकका एक सबसे महान् आनन्द है। ते ये शतं मानुषा आनन्दाः। स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते=वे, ये=जो; मानुषाः=मनुष्यलोक-सम्बन्धी, शतम्=एक सौ, आनन्दाः=आनन्द हैं, सः=वह, मनुष्य- गन्धर्वाणाम्=मानव-गन्धर्वोका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द होता है, अकामहतस्य=जिसका अन्तःकरण भोगोंकी कामनाओंसे दूषित नहीं हुआ है, ऐसे; श्रोत्रियस्य=वेदवेत्ता पुरुषका; च=भी (वह स्वाभाविक आनन्द है) । व्याख्या-जो मनुष्य-योनिमें उत्तम कर्म करके गन्धर्वभावको प्राप्त हुए हैं, उनको 'मनुष्य-गन्धर्व' कहते हैं। यहाँ इनके आनन्दको उपर्युक्त मनुष्यके आनन्दसे सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि जिस मनुष्य-सम्बन्धी आनन्दका पहले वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर आनन्दकी जो एक राशि होती है, उतना मनुष्य-गन्धवोंका एक आनन्द है। परंतु जो पहले बताये हुए मनुष्यलोकके भोगोंकी और इस गन्धर्वलोकके भोगोतककी कामनासे दूषित नहीं है, इन सबसे सर्वथा विरक्त है, उस श्रोत्रिय—वेदज्ञ पुरुषको तो वह आनन्द स्वभावसे ही प्राप्त है। ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दाः । स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते=वे (पूर्वोक्त), ये=जो, मनुष्यगन्धर्वाणाम्=मनुष्य-गन्धवोंके, शतम्=एक सौ, आनन्दाः=आनन्द हैं, सः=वह, देवगन्धर्वाणाम्=देवजातीय गन्धर्वांका, एकः=एक, आनन्दः=आनन्द है, च=तथा, (वही) अकामहतस्य= कामनाओंसे अदूषित चित्तवाले, श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को भी स्वभावतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें पहले बताये हुए मनुष्य-गन्धवोंकी अपेक्षा देव-गन्धवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि जिस मनुष्य-गन्धर्वके आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्द- की राशि होती है, उतना सृष्टिके आरम्भसे देवजातीय गन्धर्वरूपमें उत्पन्न हुए जीवोंका एक आनन्द है। तथा जो मनुष्य इस आनन्दकी कामनासे आहत नहीं हुआ है, अर्थात् जिसको इसकी आवश्यकता नहीं है, तथा जो वेदके उपदेशको हृदयङ्गम कर चुका है, ऐसे विद्वान्को वह आनन्द स्वभावतः प्राप्त है। ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दाः । स एकः पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते=वे (पूर्वोक्त), ये=जो, देवगन्धर्वाणाम्=देवजातीय गन्धर्वोके; शतम्=एक सौ, आनन्दाः=आनन्द हैं, सः=वह; चिरलोकलोकानाम्=चिरस्थायी पितृलोकको प्राप्त हुए; पितॄणाम्=पितरोका, एकः=एक; आनन्दः= आनन्द है, च=और; (वह) अकामहतस्य=भोगोंके प्रति निष्काम, श्रोत्रियस्य=वेदज्ञ पुरुषको स्वतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें देवगन्धर्वोके आनन्दकी अपेक्षा चिरस्थायी पितृलोकको प्राप्त दिव्य पितरोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि देव-गन्धवोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करने- पर आनन्दकी जो एक राशि होती है, उतना चिरस्थायी पितृलोकमे रहनेवाले दिव्य पितरोंका एक आनन्द है। तथा जो उस लोकके भोग-सुखकी कामनासे आहत नहीं है अर्थात् जिसको उसकी आवश्यकता ही नहीं रही है, उस श्रोत्रियको— वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्तको वह आनन्द स्वतः ही प्राप्त है। ते ये शतं पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दाः । स एक आजानजानां देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । उ० सं० ४४-
३४६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ते = वे (पूर्वोक्त); ये = जो; चिरलोकलोकानाम् = चिरस्थायी पितृलोकको प्राप्त हुए; पितृणाम् = पितरोंके; शतम् = एक सौ, आनन्दाः = आनन्द हैं; सः = वह; आजानजानाम् = आजानज नामक; देवानाम् = देवताओंका; एकः = एक; आनन्दः = आनन्द है; च = और; (वह आनन्द) अकामहतस्य = उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य = श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को स्वभावतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें चिरस्थायी लोकोंमें रहनेवाले दिव्य पितरोंके आनन्दकी अपेक्षा 'आजानज' नामक देवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि चिरस्थायी लोकोंमें रहनेवाले दिव्य पितरोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंकी मात्राको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना 'आजानज' नामक देवताओंका एक आनन्द है। देवलोकके एक विशेष स्थानका नाम 'आजान' है; जो लोग स्मृतियोंमें प्रतिपादित किन्हीं पुण्यकर्मोंके कारण वहाँ उत्पन्न हुए हैं, उन्हें 'आजानज' कहते हैं। जो उस लोकतकके भोगोंकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् जो उस आनन्दको भी तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध है। ते ये शतमाजानजानां देवानामानन्दाः । स एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः । ये कर्मणा देवानपियन्ति । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते = वे (पूर्वोक्त); ये = जो; आजानजानाम् = आजानज नामक; देवानाम् = देवोंके; शतम् = एक सौ; आनन्दाः = आनन्द हैं; सः = वह, कर्मदेवानाम् देवानाम् = (उन) कर्मदेव नामक देवताओंका, एकः = एक; आनन्दः = आनन्द है; ये = जो; कर्मणा = वेदोक्त कर्मोंसे; देवान् = देवभावको; अपियन्ति = प्राप्त हुए हैं; च = और; (वह) अकामहतस्य = उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित, श्रोत्रियस्य = श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को तो स्वतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें आजानज देवोंके आनन्दकी अपेक्षा कर्मदेवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि आजानज देवोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना आनन्द जो वेदोक्त कर्मोंद्वारा मनुष्यसे देवभावको प्राप्त हुए हैं, उन कर्मदेवताओंका आनन्द है। जो उन कर्मदेवताओंतकके आनन्दकी कामनासे आहत नहीं है अर्थात् जिसको देवलोकतकके भोगोंकी इच्छा नहीं रही है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध है। ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दाः । स एको देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते = वे (पूर्वोक्त), ये = जो; कर्मदेवानाम् देवानाम् = कर्मदेव नामक देवताओंके, शतम् = एक सौ; आनन्दाः = आनन्द हैं, सः = वह, देवानाम् = देवताओंका; एकः = एक; आनन्दः = आनन्द है, च = और; (वह) अकामहतस्य = उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित, श्रोत्रियस्य = श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को तो स्वभावतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें कर्मदेवोंकी अपेक्षा सृष्टिके आदिकालमे जिन स्थायी देवोंकी उत्पत्ति हुई है, उन स्वभावसिद्ध देवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि कर्मदेवोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना उन स्वभावसिद्ध देवताओंका एक आनन्द है। जो उन स्वभावसिद्ध देवताओंके भोगानन्दकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् उसकी भी जिसको कामना नहीं है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले निष्काम विरक्तके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध ही है। ते ये शतं देवानामानन्दाः । स एक इन्द्रस्यानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते = वे; ये = जो, देवानाम् = देवताओंके, शतम् = एक सौ, आनन्दाः = आनन्द हैं; सः = वह; इन्द्रस्य = इन्द्रका; एकः = एक; आनन्दः = आनन्द है, च = और; (वह) अकामहतस्य = इन्द्रतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य = वेदवेत्ताको स्वतः प्राप्त है।
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३४७ व्याख्या-इस वर्णनमें पहले बताये हुए स्वभावसिद्ध देवोंके आनन्दकी अपेक्षा इन्द्रके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि देवताओंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना इन्द्रभावको प्राप्त देवताका एक आनन्द है। जो इन्द्रके भोगानन्दकी कामनासे आहत नहीं हुआ है, अर्थात् जिसको इन्द्रके सुखकी भी आकाङ्क्षा नहीं है-जो उसे भी तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले निष्काम पुरुषको तो वह आनन्द स्वतः प्राप्त है। ते ये शतमिन्र्दस्यानन्दाः । स एको बृहस्पतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते=वे; ये=जो; इन्द्रस्य=इन्द्रके, शतम्=एक सौ; आनन्दाः = आनन्द हैं, सः=वह, बृहस्पतेः=बृहस्पतिका, एकः = एक, आनन्दः = आनन्द है; च= और; ( वह ) अकामहतस्य = बृहस्पतितकके भोगोंमें निःस्पृह; श्रोत्रियस्य = वेद- वेत्ताको स्वतःप्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें इन्द्रके आनन्दकी अपेक्षा बृहस्पतिके आनन्दको सौगुना बताया गया है । भाव यह है कि इन्द्रके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना बृहस्पतिके पदको प्राप्त हुए देवताका एक आनन्द है। परंतु जो मनुष्य बृहस्पतिके भोगानन्दकी कामनासे भी आहत नहीं है, उस भोगानन्दको भी अनित्य होनेके कारण जो तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो चुका है, उस वेदके रहस्यको जाननेवाले निष्काम मनुष्यको वह आनन्द स्वतःप्राप्त है। ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः । स एकः प्रजापतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते=वे; ये=जो; बृहस्पतेः = बृहस्पतिके, शतम् = एक सौ; आनन्दाः = आनन्द हैं, सः=वह; प्रजापतेः= प्रजापतिका; एकः = एक, आनन्दः = आनन्द है; च = और; ( वह ) अकामहतस्य प्रजापतितकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य = वेदवेत्ता पुरुषको स्वतः प्राप्त है। -इस वर्णनमें बृहस्पतिके आनन्दकी अपेक्षा प्रजापतिके आनन्दको सौगुना बताया गया है । भाव यह है कि बृहस्पतिके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना प्रजापतिके पदपर आरूढ देवताका एक आनन्द है। परंतु जो मनुष्य इस प्रजापतिके भोगानन्दकी कामनासे भी आहत नहीं है, अर्थात् उससे भी जो विरक्त हो चुका है, उस वेदके रहस्यको जाननेवाले निष्काम मनुष्यको तो वह आनन्द स्वभावसे ही प्राप्त है। ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः। स एको आनन्दः । श्रोत्रियस्य चाकांमहतस्य । ते=वे; ये=जो; प्रजापतेः=प्रजापतिके; शतम् = एक सौ; आनन्दाः = आनन्द हैं, सः=वह, ब्रह्मणः =ब्रह्माका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है, च=और; (वह ) अकामहतस्य = ब्रह्मलोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य = श्रोत्रिय ( वेदज्ञ ) को स्वभावतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें प्रजापतिके आनन्दसे भी हिरण्यगर्भ ब्रह्माके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि प्रजापतिके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो एक आनन्दकी राशि होती है, उतना सृष्टिके आरम्भमें सबसे पहले उत्पन्न होनेवाले हिरण्यगर्भ ब्रह्माका एक आनन्द है। तथा जो मनुष्य उस ब्रह्मा- के पदसे प्राप्त भोग-सुखकी कामनासे भी आहत नहीं है, अर्थात् जो उसे भी अनित्य और तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, जिसको एकमात्र परमानन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त करनेकी ही उत्कट अभिलाषा है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषको वह आनन्द स्वतःप्राप्त है। इस प्रकार यहाँ एकसे दूसरे आनन्दकी अधिकताका वर्णन करते-करते सबसे बढकर हिरण्यगर्भके आनन्दको बताकर यह भाव दिखाया गया है कि इस जगत्में जितने प्रकारके जो-जो आनन्द देखने, सुनने तथा समझनेमें आ सकते हैं, वे चाहे
३४८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * कितने ही बड़े क्यों न हों, उस पूर्णानन्दस्वरूप परमात्माके आनन्दकी तुलनामें बहुत ही तुच्छ हैं। बृहदारण्यकमें कहा भी है कि 'समस्त प्राणी इसी परमात्मसम्बन्धी आनन्दके किसी एक अंशको लेकर ही जीते हैं (४।३।३२)।' स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः । स य एवंविदस्माल्लोकात्प्रेत्य । एतमन्नमयमात्मान- मुपसंक्रामति । एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रामति । एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रामति । एतं विज्ञान- मयमात्मानमुपसंक्रामति । एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति । तदप्येष श्लोको भवति । सः=वह (परमात्मा), यः=जो, अयम्=यह, पुरुषे=मनुष्यमें; च=और, यः=जो; असौ=वह, आदित्ये च= सूर्यमें भी है; सः=वह (सबका अन्तर्यामी), एकः=एक ही है, यः=जो, एवंवित्=इस प्रकार जाननेवाला है; सः= वह, अस्मात् लोकात्=इस लोकसे, प्रेत्य=विदा होकर, एतम् = इस, अन्नमयम्=अन्नमय, आत्मानम्=आत्माको; उपसंक्रामति=प्राप्त हो जाता है, एतम् = इस, प्राणमयम् = प्राणमय, आत्मानम्=आत्माको, उपसंक्रामति=प्राप्त होता है, एतम् = इस, मनोमयम् = मनोमय, आत्मानम्=आत्माको, उपसक्रामति=प्राप्त होता है, एतम्=इस; विज्ञानमयम् = विज्ञानमय, आत्मानम् = आत्माको, उपसंक्रामति=प्राप्त होता है, एतम् = इस, आनन्दमयम् = आनन्दमय; आत्मानम् = आत्माको, उपसंक्रामति=प्राप्त होता है, तत्=उसके विषयमें; अपि=भी, एषः=यह (आगे कहा गया); श्लोकः = श्लोक; भवति = है । व्याख्या-ऊपर बताये हुए समस्त आनन्दोंके एकमात्र केन्द्र परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही सबके अन्तर्यामी हैं। जो परमात्मा मनुष्योंमें हैं, वे ही सूर्यमें भी हैं। वे सबके अन्तर्यामी एक ही हैं। जो इस प्रकार जान लेता है, वह मरनेपर इस मनुष्य-शरीरको छोड़कर उस पहले बताये हुए अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है। तात्पर्य यह कि इन पाँचोंके जो आत्मा हैं, ये पाँचों जिनके स्वरूप हैं, उन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। पहले इन पाँचोंका वर्णन करते समय सबका शरीरान्तर्वर्ती आत्मा अन्तर्यामी परमात्माको ही बतलाया था। फलरूपमें उन्हींकी प्राप्ति होती है और वे ही ब्रह्म हैं- यह बतानेके लिये ही यहाँ पाँचोंको क्रमसे प्राप्त होनेकी बात कही गयी है। वास्तवमें इस क्रमसे प्राप्त होनेकी बात यहाँ नहीं कही गयी है; क्योंकि अन्नमय मनुष्य-शरीरको तो वह पहलेसे प्राप्त था ही, उसे छोड़कर जानेके बाद प्राप्त होनेवाला फल परमात्मा है, शरीर नहीं। अतः यहाँ अन्नमय आदिके अन्तर्यामी परमात्माकी ही प्राप्ति बतायी गयी है। इसलिये इन सबमें परिपूर्ण, सर्वरूप, सबके आत्मा, परम आनन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाना ही इस फलश्रुतिका तात्पर्य है। इसके विषयमें आगे नवम अनुवाकमें कहा जानेवाला यह श्लोक भी है। ॥ अष्टम अनुवाक समाप्त ॥८॥ नवम अनुवाक सम्बन्ध-आठवें अनुवाकमें जिस श्लोक (मन्त्र) को लक्ष्य कराया गया है, उसका उल्लेख किया जाता है- यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चनेति । मनसा सह=मनके सहित; वाचः=वाणी आदि समस्त इन्द्रियाँ, यतः=जहाँसे, अप्राप्य=उसे न पाकर, निवर्तन्ते= लौट आती हैं, [तस्य] ब्रह्मणः = उस ब्रह्मके, आनन्दम् = आनन्दको, विद्वान् = जाननेवाला (महापुरुष); कुतश्चन= किसीसे भी, न बिभेति = भय नहीं करता, इति=इस प्रकार यह श्लोक है । व्याख्या-इस मन्त्रमें परब्रह्म परमात्माके परमानन्दस्वरूपको जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि मनके सहित सभी इन्द्रियाँ जहाँसे उसे न पाकर लौट आती हैं- जिस ब्रह्मानन्दको जाननेकी इन मन और इन्द्रियोंकी शक्ति नहीं है, परब्रह्म परमात्माके उस आनन्दको जाननेवाला ज्ञानी महापुरुष कभी किसीसे भी भय नहीं करता, वह सर्वथा निर्भय हो जाता है। इस प्रकार इस श्लोकका तात्पर्य है ।