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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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कंब रामायणं

प्रभु ने सोचा—जानकी में इस मरुप्रदेश को पार करने का सामर्थ्य नहीं है। तुरंत ही सूर्य, चन्द्र के समान शीतल किरणें फैलने लगा। उष्णता से झुलसे हुए वृक्ष पल्लवों से भर गये। दारुण अग्नि से पूर्ण प्रदेश में कमल-वन छा गये।

भूने हुए बीज जैसे उपल-खंड, बिखेरे गये पुष्पों के समान मृदु और शीतल हो गये। छिन्न तथा जली हुई लताएँ कोमल पल्लव निकालने लगीं। वहाँ के फुफकार करनेवाले विषधर सर्प, उनके विष-दंतों में अमृत प्रकट हो जाने से, अत्यन्त आनन्दित हो उठे।

मेघ उमड़-घुमड़कर गरज उठे और शीतल जल-बिन्दु बरसाने लगे। तीक्ष्ण शर लिये हुए व्याध लोग भी प्राणियों पर मुनियों के समान ही दया दिखाने लगे। बाघिनें भूख से हीन हो गईं और सम्मुख आनेवाले प्राणियों का आलिंगन करने लगीं। हरिण-शावक उनके थनों से दूध पीने लगे।

शिलाओं के बिलों में रहनेवाले दारुण विषधर सर्प अब पीडा-मुक्त होकर ऐसे शान्त हो रहे, जैसे वे तरंगायित शीतल जल में पड़े हों, वहाँ के वनों के बाँस जो पहले जल उठते थे, अब मुक्ता-समान दाँतोंवाली नवयुवतियों के कंधों के जैसे ही सुन्दर दिखाई देने लगे।

हरित कवल के समान हरियाली बिछ गई। स्थान-स्थान पर मयूर पंख फैलाकर युवतियों के समान नृत्य-भंगियाँ दिखाने लगे। उनके पार्श्वों में भ्रमर गवैयो के समान नृत्य के अनुकूल संगीत गाने लगे।

अकाल में भी पेड़ों में फल लग गये। बिना मूलवाले पौधों में भी कंद उत्पन्न हो गये। सर्वत्र पुष्पलताएँ आभरण-भूषित युवतियों के समान दिखाई देने लगीं। उत्तम शील से बढ़कर अन्य कौन-सी तपस्या आचरणीय है? (अर्थात्, शील ही सबसे बड़ी तपस्या है।)

व्याधों के निवास ऋषियों के आश्रम जैसे हो गये, माणिक्य-कांतिवाले इन्द्र-गोप (कीट) स्थान-स्थान पर फैल गये। कोकिल घने वृक्षों में बैठी विरह-पीड़ित कोकिल-बालाओं को गा-गाकर शांत करने लगे। करीर के वृक्ष भी हरे-भरे होकर कोमल पल्लवों से भर गये।

वह वन पहले इस प्रकार झुलसा हुआ था, जिस प्रकार एक निश्चित अवधि देकर युद्ध करने के लिए जानेवाले वीरों को गाढ आलिंगन करके भेज देने के पश्चात् उनकी विरहिणी पत्नियों का मन झुलस जाता है। अब वह इस प्रकार लहलहा उठा, जिस प्रकार उन योद्धाओं के लौट आने पर उन युवतियों का मन लहलहा उठता है।

उस मरु-प्रदेश को उन तीनों ने धीरे-धीरे पार किया फिर वे उस चित्रकूट पर्वत पर जा पहुँचे, जहाँ मत्तगज, आकाश में प्रकाशमान चन्द्र के बादलों के मध्य छिप जाने पर, मेघ को देखकर हथिनी समझ लेते हैं और ताड़ (वृक्ष)-जैसी अपनी विशाल सूँड को पसारकर उस (मेघ) को छूने की चेष्टा करते हैं। (१-४७)

अध्याय ८

चित्रकूट पटल

हमारे लिए पूज्य देवताओ तथा हम जैसे मनुष्यो के लिए जो एक समान ही अविज्ञेय हैं, वैसे अनघ, सुन्दर नयनोवाले तथा सहस्र नामवाले अमल विष्णु (के अवतार राम), यौवन से परिपूर्ण कलापी-तुल्य जानकी को चन्दन-वृक्षो से भरे, स्वर्ण से पूर्ण उस (चित्रकूट) पर्वत की प्राकृतिक शोभा दिखाने लगे।

करवाल तथा बरछा—दोनो एक साथ रखे गये हो, ऐसे लगनेवाले नयनो से युक्त (हे सीता)। इस पर्वत के पाद-प्रदेश मे एला की लताएँ तथा तमाल फैले हैं। इस पर्वत की सानुओ पर सोनेवाले दीर्घ तथा जल से भरे मेघों एवं हाथियो मे कोई भेद ज्ञात नही होता।

हे रक्त लगे करवाल-जैसे लाल रेखाओ से युक्त नयनोवाली! इस उन्नत पर्वत पर उछल-कूद करनेवाला पहाड़ी बकरा, (विष्णु के प्रतिपादक) वेदो १ के समान शोभायमान मरकत रत्नो के कान्ति-पुंज से आवृत होकर सूर्यदेव के हरितवर्ण अश्व के समान दिखाई पड़ता है।

रत्नहार से भूषित स्तनोवाली हे कलापी! मत्तगजो को निगलनेवाले विशाल उदरवाले अजगरो की केचुलियाँ बाँसो के झुरमुटो मे लगी हुई हिल रही हैं। वे (केंचुलियाँ) उद्यानो से घिरी अयोध्या के सौधो पर फहरानेवाली श्वेतपट-युक्त ध्वजाओ-सी लगती हैं।

लवण-समुद्र से उत्पन्न न होकर क्षीर-समुद्र मे से उत्पन्न अमृत-समान हे सुन्दरी! (पर्वतो के) प्रवालमय सानुओ मे यत्र-तत्र कवरीमृगो के बाल हिलते हुए ऐसे दिखाई पड़ते हैं, जैसे निर्भर बह रहे हों। उनको देखो।

क्रोध से भरे सिंह से आहत होकर मत्तगज के गिरने पर उसके रक्त के साथ उसके सिर से जो गजमुक्ता बिखर पड़ती हैं, वे प्रणय-कलह मे मानिनी स्त्रियो के द्वारा फेंके गये रक्त-चंदन लगे मोती-जैसे लगते हैं।

इस पर्वत के शिखर पर जब चंद्रमा दिखाई पड़ता है, तब इस पर्वत के पद्मराग रत्नो की कांति जटाजूट का दृश्य उपस्थित करती हैं। इसके उज्ज्वल निर्भर गगा की समता करते हैं। इस प्रकार, यह पर्वत वृषभ पर आरूढ होनेवाले भगवान् (शिव) के समान लगता है।

हाथियो को निगलनेवाले अजगर (उन हाथियो के मद-जल प्रवाह को न सहकर) उनको अपने उज्ज्वल माणिक्यो के साथ ही छोड़कर चले जाते हैं। तब शिलाओ पर 'वेंगे' (नामक वृक्ष के सुनहले) पुष्पो के साथ पड़े हुए वे माणिक्य उन हाथियो के सुखपट्ट का दृश्य उपस्थित करते हैं।


१. विष्णु का रग श्यामल है, अत उनका वर्णन करनेवाले वेदो का रग भी श्यामल माना गया है।

२५० कंब रामायण

'एक सूत्रयुगल रत्नजटित कलशो को ढो रहा हो।'—यो सूक्ष्म कटि तथा पुष्ट स्तनो से युक्त हे पुष्पलता ! इस पर्वत पर के चंदन-वृक्ष मानो आकाश-मार्ग को ही रोक रहे हैं और चन्द्रमा, जैसे इन वृक्षो के बीच में से होकर जा रहा है, यह सुन्दर दृश्य देखो।

चन्द्रकला-जैसे ( आकारवाले ) दाँतो से शोभायमान हे देवी ! हाथी, वृक्ष की शाखाओ पर लगे मधु के छत्ते पर की मक्खियो को उड़ाकर उसमे स्थित सुगंधित अरुण वर्ण मधु को उठाकर अत्यधिक प्रेम के साथ पूर्ण गर्भ से युक्त अपनी हथिनी के मुँह मे डाल देता है, यह दृश्य देखो।

सृष्टि की रक्षा करनेवाले भगवान् (विष्णु) यद्यपि माया मे छिपे रहते हैं, तथापि इंद्रियो का दमन करनेवाले योगियो के लिए अदृश्य नही रहते। उसी प्रकार, इस पर्वत पर रहनेवाले दिव्य हयग्रीव ( घोडे के जैसे मुखवाले) मानव छिप जाने पर भी यहाँ की स्फटिक शिलाओं मे ( प्रतिबिंबित होकर ) प्रकट दीख पड़ते हैं, यह देखो।

नर्त्तनशील कलापी से भी सुन्दर और कोकिल के जैसे स्वरवाली हे सीते ! यहाँ के उन किन्नरमिथुनो को देखो, जो इस प्रकार गा रहे हैं कि अपने प्रियतमो से मान करती हुई पर्वतवासी स्त्रियाँ ( उन गानो को सुनकर ) द्रवितचित्त होकर स्वय अपने प्रियतमो को खोजने लगती हैं।

किसी धनुर्वीर के धनुष के समान शोभायमान ललाटवाली ! हे कुलदीपिके ! अरण्य-निवासी, लबी जड़वाले 'कवलै' (नामक) कद को खोदकर ले जाते हैं। उनके खोदने से जो गड्ढे पड़ जाते हैं, उनको लबे बाँसो के टकराने से झरनेवाले मधु के छत्ते ( अपने मधु से ) भर देते हैं।

नारीत्व-रूपी शरीर के लिए प्राणतुल्य हे सुन्दरी ! देखो, जलाशय मे उसके साथ आनन्द से डुबकी लगानेवाली वानरी जब वानर पर पानी उछालती है, तब वह (वानर) पर्वत के दूसरे पार्श्व मे जाकर वहाँ के एक मेघ को पकड़कर हिलाने लगता हैं—(जिससे वर्षा की बूँदें बिखर पड़ती हैं।

बत्ती के बिना ही अमृत मे जलनेवाले उत्तम दीपक-सदृश हे देवी ! उन माणिक्य-मय शिलाओ को देखो, जो अपनी कांति से अंधकार को चीर डालती है और अपने स्थान से कभी न हटते हुए मंडलाकार सूर्य के समान लगती हैं।

अरुंधती ( जैसी पतिव्रता ) को भी सच्चे शील का आदर्श दिखानेवाली लक्ष्मी-तुल्य, हे सुन्दरी ! जब कालवर्ण भ्रमरो के झुण्ड 'वेंगे' वृक्ष की शाखा पर बैठते हैं तब वे शाखाएँ झुक जाती हैं। फिर, उन (भ्रमरों) के उड़ जाने पर वे ऊपर उठ जाती हैं; वे शाखाएँ ऐसी लगती हैं, जैसे अपने स्वर्णमय पुष्पो को बिखेरकर ( हमारे) चरणो पर नमस्कार कर रही हो।

उज्ज्वल ललाट तथा शोभायमान आभरणो से युक्त हे देवी ! हे पल्लवित शाखा-समान सुन्दरी ! सूर्य को छूनेवाले इस पर्वत पर 'तिनै' ( एक अनाज ) की खेती की रखवाली करनेवाली तीक्ष्ण बरछे-जैसे नयनोवाली स्त्रियाँ, फसलो पर आनेवाले पक्षियो पर

अयोध्याकाण्ड २५१

धुँधुचियाँ फेंकती हैं। वे धुँधुचियाँ आकाश में उड़ते हुए ऐसी लगती हैं, जैसे (आकाश से) नक्षत्र ही गिर रहे हों।

दृढ धनुष को धारण करनेवाले वीरों के फरसे से कटकर गिरी हुई अगरु की लकड़ियों को जलाने से उठनेवाला धूम-समूह, ब्राह्मणों के होम-कुंड के धूम के साथ मिलकर ऐसा फैल रहा है, जैसा कोई विशाल कालवर्ण पर्वत-शिखर हो ।

नव-पुष्प, अगरु-धूम, आदि से सुगन्धित होकर निरंतर वर्षा करनेवाले मेघ-सदृश काले तथा दीर्घ केशों के भार से कंपित होनेवाली सूक्ष्म कटि से युक्त हे मयूर-तुल्य सुन्दरी ! गगन में नक्षत्रों को चमकते हुए देखकर सूखी हुई पर्वत-नदियाँ भी अपने रत्न-समुदाय को चमका रही हैं ।

अपने प्रियतमों से रूठकर चलनेवाली विद्याधर-सुन्दरियों के मनोहर, अलक्तक से अंचित छोटे-छोटे पदों के चिह्न, मेघों को छूनेवाली माणिक्यमय शिलाओं में अदृश्य हो जाते हैं और मरकतमय शिलाओं पर रक्त वर्ण दिखाई पड़ते हैं, देखो ।

रक्त स्वर्णमय गभीर नाभि से शोभायमान हे मेरी सहधर्मिणी ! निर्झरों में स्नान करने के लिए आनेवाली देवस्त्रियों के द्वारा अपने काली मिट्टी-जैसे केशों से उतारकर फेंके गये कल्पवृक्ष के पुष्प, प्रभूत रत्न-राशियों सहित झरनेवाले निर्झरों के साथ गिर रहे हैं, देखो ।

देखो, मुखरित वीर-कंकण और धनुष से युक्त किसी व्याध के द्वारा खेती की रक्षा के लिए (बजाने के उद्देश्य से) रखे हुए पटह (नामक चमड़े के बाजे) को एक वानर खड़ा होकर बजा रहा है, देखो । एक व्याघ्र-स्त्री चन्द्र को पकड़कर प्रेम से उसके कलंक को पोछ देने की चेष्टा कर रही है ।

देखो, घने माधवीलता-कुंजों में पल्लव की शय्याएँ पड़ी हैं, जिनपर देवस्त्रियाँ विश्राम करती थीं और अब उनके चिरकालिक वियोग की सूचना देती हुई-सी मुरझाकर काली पड़ी हुई हैं।

स्मरण-मात्र से अत्यधिक आनन्द प्रदान करनेवाली अमृत-समान आभरण से विभूषित सुन्दरी ! देखो, मधु से भरे 'वंग' वृक्षों में तथा 'कौंगे' वृक्षों में स्थान-स्थान पर लगे हुए हिलनेवाले झूलों पर बैठकर पहाड़ी स्त्रियाँ जब पर्वतीय रागों का आलाप करती हैं, तो उनसे आकृष्ट होकर अशुण (नामक) हरिण¹ उनके समीप आ जाते हैं ।

महुए के पुष्प तथा इन्द्रगोप के समान अधर से युक्त हे सुन्दरी ! इस पर्वत पर के निर्झरों से उठनेवाले तुषार-बिन्दुओं के समुदाय, अप्सराओं के नृत्य के समय बिखरे हुए चन्दन आदि सुगन्धित लेप, कस्तूरी-कुंकुम आदि का लेप एवं कल्पपुष्पों के मकरंद से संयुक्त हैं ।

जैसे कोई लता, इङ्गुलीक के पत्रलेखों से चित्रित उत्तम स्वर्णमय स्तम्भों से शोभायमान हो, यों शोभित होनेवाली हे सुन्दरी ! मध्याह्न काल में असहाय निरपराधता


¹ यह प्रसिद्ध है कि 'अशुण'-मृग संगीत सुनकर मुग्ध हो खड़ा रहता है और संगीत समाप्त होने पर व्याकुल होकर सद्य अपने प्राण छोड़ देता है ।

२५२ | कंब रामायण

सूर्य जब इस स्वर्णमय उन्नत पर्वत पर पहुँचता है, तब यह पर्वत ऐसा लगता है, जैसे यह स्वर्ण-मुकुट धारण कर रहा हो ।

नारियो के तिलक-समान हे सुन्दरी ! बाँसो से बिखरे हुए मुक्ता-माणिक्यमय शिलाओ पर इस प्रकार पडे हैं, जिस प्रकार लालिमा से युक्त आकाश पर तारे चमक रहे हो।

सूक्ष्म रंध्रों से युक्त बाँसुरी की ध्वनि और शीतल तथा मधुर स्वरवाली वीणा की ध्वनि से भी अधिक मधुर वचनो से युक्त, हे शुक-समान सुन्दरी ! सर्वत्र लाल पुष्पो से भरे हुए पलाश-वृक्षो का वन ऐसा लगता है, जैसे (सारा वन) अग्नि की ज्वाला मे जल रहा हो।

'कांदल' पुष्प को ककण पहनाया गया हो, यो अति सुन्दर करो से शोभायमान हे सुन्दरी ! बडे हाथियो के बच्चे अपूर्व तपस्या से सम्पन्न ऋषियो के लिए अपनी सूँडो मे दूर-दूर के निर्झरो से पानी भरकर लाते हैं और उन ऋषियो के कमंडलुओं में भर देते हैं।

आम की फाँक-जैसे सुन्दर नयनोवाली कलापी-तुल्य हे सुन्दरी ! लम्बी तथा झुकी हुई पूँछवाले तथा द्रवित चित्तवाले वानर, वार्द्धक्य से पीडित तथा मन्द दृष्टिवाले व्याकुल मुनियो को जाने का मार्ग दिखाकर उनकी सेवा करते हैं। अहो !

साँप के फन एवं रथ का उपहास करनेवाले विशाल जघन से युक्त, हे सुन्दरी ! देखो, बडे पखोवाले मयूर यज्ञोपवीत से शोभायमान वक्षवाले ब्राह्मणो के होम-कुंडों की अग्नि को अपने दीर्घ पखो से प्रज्वलित कर रहे हैं।

दीर्घ केशो से शोभायमान सुन्दर मयूर-तुल्य स्त्री-कुल का भूषण, हे देवी ! आम्र-वृक्षो पर फलो को खानेवाले वानर, लोकहित में निरत वेदज्ञ ब्राह्मणो के वक्ष पर धारण किये जानेवाले यज्ञोपवीत के लिए रेशम के कीड़ो के घोसलो एवं कपास के पौधो से आवश्यक रेशे ला देते हैं।

नारियो की सृष्टि के लिए आदर्श बनी हुई, हे लक्ष्मी-तुल्य सुन्दरी ! वानर, आम्र, पनस और कदली-वृक्षो से बड़े-बड़े पके हुए अति मधुर फल चुन-चुनकर (मुनियो को) ला देते हैं और जंगली सअर कदो को उखाड़कर ला देते हैं।

तुम्हारे कर मे रखने योग्य, लाल मुखवाले तोते, पर्वत के 'तिनै' धान्य, ज्वार, सेम आदि की बीजो एव झुकनेवाले बाँस मे उत्पन्न होनेवाले चावल को, असत्यरहित ऋषियों के आश्रमो मे जाकर दे आते हैं।

बड़े-बड़े अजगर, जो चिघाड़नेवाले और दाँतो से युक्त बड़े हाथियो को भी निगलने की शक्ति रखते हैं, ज्ञानियो के समान इद्रिय-दमन करके यहाँ रहते हैं और जटा-धारी मुनियो के मार्ग मे सीढियाँ बनकर पड़े रहते है।

देखो, सूर्य के किरणो को ढकनेवाले अनेक स्वर्णमय विमान$^१$ यहाँ आते जाते रहते हैं, मानो वे (विमान) जल के सोतो से युक्त पर्वत पर अपूर्व तपस्या करनेवाले तथा (भगवान् के ध्यान मे) अपने दोनो नयनो से यो आनन्दाश्रु बहानेवाले, जैसे जल का घड़ा ही उडेल रहे हों, ऋषियों को मोक्ष-लोक मे ले जाने के लिए ही यहाँ आते हो।


१. ये विमान चित्रकूट पर्वत पर संचरण करनेवाले देवों के हैं, जो ऐसे लगते हैं, मानों मुनियो को मोक्ष-लोक में ले जाने के लिए आये हुए हों।

अयोध्याकाण्ड २५३

अग्नि मे तप्त, तैल से अर्चित अति तीक्ष्ण बरछे-जैसे अंजनाच्चित एव यम को भी व्याकुल करनेवाले नयनो से शोभायमान, हे सुन्दरी ! देखो, ( बच्चे देने की ) पीडा से युक्त हथिनियो को हाथी अपनी सूँड़ो का सहारा दे रहे हैं।

विष-स्वभाववाले नयनो से युक्त हे देवी ! तुम्हारी कटि को देखकर उसे बिजली समझकर, फनवाले सर्प डर जाते हैं और तड़पकर बिल में घुस जाते हैं । मदपूर्ण घटवाले हाथी, मेघ-गर्जन को सुनकर सिंह-गर्जन समझकर डर जाते हैं और अस्त-व्यस्त हो भागने लगते हैं।

गृहस्थी में रहकर ही सप्त व्रतों का पालन करनेवाले चक्रवर्ती के पुत्र ( राम ) ने, आभरणो से भूषित (सीता) देवी को इस प्रकार के अनेक दृश्य, उनका वर्णन करके दिखाये। फिर, उनका स्वागत करने के लिए सम्मुख आये हुए मुनियो को नमस्कार करके उन पाप-रहित मुनियो के अतिथि बने।

महिमामय सुन्दर तुलसी-मालाधारी भगवान् ( विष्णु ) ने वैर से युक्त अंधकार-सदृश राक्षस-कुल के विनाश की कामना करके कालनेमि¹ नामक राक्षस पर ही अपना चक्र चलाया है, इस प्रकार ( का दृश्य उपस्थित करते हुए ) सूर्य अस्ताचल पर जा पहुँचा।

जब विष्णु का चक्र असुर ( कालनेमि ) के शरीर मे जाकर लगा था, तब उसके शरीर से निकले हुए अत्यधिक रक्त प्रवाह के समान ही आकाश में सर्वत्र लाली फैल गई और उस राक्षस के मुँह से गिरे हुए वक्र दंत के समान ही चंद्रकला प्रकाशमान हो गई।

सूर्य के अस्त होने पर, कमलपुष्प, स्त्रियो को वदन की शोभा प्रदान करके मुकुलित हो गये। आकाश-रूपी जलाशय में सर्वत्र श्वेतवर्ण कुमुद-रूपी नक्षत्र चमक उठे।

उस समय वानर और वानरियाँ वृक्षो की ओर बढे, हाथी और हथिनियाँ जलाशयों की ओर बढे, सुन्दर पक्षी घोंसलो की ओर बढे और तत्त्वज्ञान से संपन्न प्रभु (राम) मध्याकालीन कार्यों की ओर बढ़े (अर्थात्, सायकालीन कृत्यो को करने गये)।

घने दलोवाले सुगन्धित पुष्पो में से कुछ बंद हुए। निर्दोष तथा सुगंध से भरे पुष्पो मे से कुछ विकमित हुए, प्रभु के साथ, अनुज ( लक्ष्मण ) तथा अमृत-समान (सीता) देवी के कर एव नेत्र भी कमलपुष्पो के समान ही बद हुए ( अर्थात्, वे तीनो हाथ जोड़कर और नयन बद करके भगवान् का ध्यान करने लगे) ।

सध्याकाल व्यतीत होने पर (रात्रि के आगमन पर) उत्तम स्वभाववाले, लक्ष्मण ने, अनघ राम तथा उनकी सूक्ष्म कटिवाली देवी के निवास के लिए विचार करके वहाँ किस प्रकार से एक पर्णशाला बनाई, हम उसका वर्णन करेंगे।

लक्ष्मण ने छोटे-छोटे बाँस के टुकड़ो को लेकर खड़ा किया और फिर वक्रता से हीन सीधे तथा लंबे बाँसो को उनपर आड़े रखा। फिर उनपर शहतीरो की तरह बाँसो को रखकर ठाट बनाई और उनपर पत्ते विछाये।


१ कालनेमि हिरण्यकशिपु का एक पुत्र था। उसके एक सौ सिर और एक सौ हाथ थे। विष्णु के द्वारा अपने पिता के मारे जाने पर वह अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और देवो को परास्त करके अपना पराक्रम दिखाने लगा। तब विष्णु भगवान् ने चक्र प्रयोग करके उसके सिर और हाथो को काट डाला।

२५४

कंब रामायण

छप्पर पर शालवृक्ष के पत्ते बिछाये और उन्हें मूंज से बाँध दिया। नीचे खड़े किये बाँसो के टुकड़ो के बीच में मिट्टी भरकर दीवारे खड़ी की और उनपर जल छिड़ककर ( दीवारों को ) समतल बनाया।

पर्णशाला के भीतर शास्त्रोक्त रीति से राम और सीता के ( सोने के ) लिए अलग-अलग आसन बनाये, लाल कुंकुम की मिट्टी से उन्हें लीपा और दीवारो मे भीतर की ओर नदी मे उत्पन्न रत्न और मोती चिपकाये।

( पर्णकुटीर के भीतर ) मयूर-पंखो का एक वितान लगाया। अपनी छुरी से काट-काटकर लटकनेवाले तोरण बनाकर लगाये और नदी-तट के बाँसों को काटकर उस पर्णशाला के चारों ओर एक प्राचीर ( बाड़ ) भी बनाया।

वह प्रभु, जो चतुर्मुख के हृदय मे एव हम जैसे अज्ञ लोगो के हृदयो में एक समान ही रहता है, स्वर्णमय देह कांति से युक्त लक्ष्मी-समान सीता देवी के साथ अपने अनुज के द्वारा इस प्रकार निर्मित पर्णकुटीर में प्रविष्ट हुए।

ज्ञानियो का अविद्या-रहित हृदय है, महिमामय वेद है, या पवित्र क्षीर-सागर है, या बैकुंठधाम ही है—यो कहने योग्य उस पर्णकुटीर मे अगाध प्रेम से प्राप्त होनेवाले प्रभु ( राम ), प्रेम-पूर्ण मन में आनदित होकर निवास करने लगे।

सीता देवी के, पुष्प से भी कोमल, चरण काँटो और कंकड़ो से भरे अरण्य में चले, मेरे दोषहीन भाई के करो ने यह पर्णशाला बना दी। अहो! जिन्हें कोई सहायक नही होता, उन्हें भी कौन-सी वस्तु अप्राप्य होती है? ( भाव यह है—निस्सहाय व्यक्ति के लिए उसके समीपस्थ पदार्थ ही सब आवश्यकताएँ पूर्ण करते हैं।)

यह विचार करके फिर राम ने अपने अनुज से कहा—दो पर्वतो के समान पुष्ट कंधोवाले। तुमने ऐसी सुन्दर पर्णशाला बनाना कब सीखा? उस समय उनके कमल-समान विशाल नयनो से अश्रु-बिंदु बरस पडे।

अपार संपत्ति को प्रदान करनेवाले ( दशरथ ) की आज्ञा से वन मे आकर उत्तम धर्म का पालन करते हुए मैने सूर्य के समान उज्ज्वल सत्य-रूपी यश को प्राप्त किया, ऐसा कहने मे क्या तथ्य है? मै तो अनेक दिनो से तुमको कष्ट ही देता आ रहा हूँ। इस प्रकार, राम ने बड़ी मनोवेदना के साथ कहा।

प्रभु के यह कहने पर लक्ष्मण ने चिंतित होकर उनकी ओर देखा और कहा—हे मेरे पितृ-तुल्य! ( हमारे ) कष्टों का अंकुर तो पहले ही ( अर्थात्, जब कैकेयी को दशरथ ने वर दिये ) फूट निकला था। ( भाव यह है, हमारे इन कष्टो का कारण आप नही हैं। इनका कारण कैकेयी का वर ही है, अतः आप चिंतित न हो।)

फिर, रामचन्द्र ने मन में सोचा—जो हो, अब मुझे और कुछ नही करना है। अब ( लक्ष्मण के कष्टो को देखकर ) मैं धर्म के मार्ग को छोड़कर नही जा सकता। फिर, अपने ज्येष्ठ भ्राता की सेवा मे आनन्द पानेवाले लक्ष्मण की इस मानसिक ताप को ( कि मेरे बड़े भाई वनवास का कष्ट भोग रहे हैं ) जानकर राम सोचने लगे—इस ( लक्ष्मण ) के मानसिक कष्ट को दूर करना असम्भव है।

अयोध्याकाण्ड २५५

फिर अग्रज ( राम ) ने अपने छोटे भाई को देखकर कहा-संसार में प्राप्त होनेवाली सम्पत्ति सीमाबद्ध होती है। किन्तु, भविष्य में अपार आनन्द उत्पन्न करनेवाले हमारे इस वनवास-रूपी सुख के बारे में विचार कर देखो। इसमें क्या कमी है ?

दृढ धनुर्धारी रामचन्द्र अपने अनुज को सान्त्वना देकर, देवों की स्तुति प्राप्त करते हुए, अपने व्रत का पालन करते रहे। उधर महान् तपस्वी ( वसिष्ठ ) की आज्ञा से ( केकय देश को ) गये दूतो का क्या हुआ--अब हम उसका वर्णन करेंगे। ( १-५८ )

अध्याय ६

चिता-शयन पटल

असत्य-रहित अनुपम दूत, जो अयोध्या से चले थे, रात-दिन वेग से चलकर ( केकय देश में ) भरत के भवन में पहुँचे। वहाँ पहुँचकर द्वार-रक्षकों से कहा--द्वाररक्षको। राजा भरत को हमारे आगमन का समाचार दो।

'आपके पिता का समाचार लेकर दूत आये हैं।'-यह वचन सुनकर भरत अत्यन्त आनन्दित हुआ और प्रेमाधिक्य से उन दूतों को अपने निकट लाने की आज्ञा दी। जब वे दूत निकट जाकर नमस्कार करके खड़े हुए, तब भरत ने कहा-मुकुटधारी चक्रवर्ती, किंचित् भी कष्ट के बिना सुखी हैं न ?

दूतों ने कहा-'चक्रवर्ती शक्तिशाली हैं।' यह सुनकर आनन्दित हो फिर भरत ने प्रश्न किया--मेरे प्रभु ( राम ) के साथ आभरण-भूषित अनुज ( लक्ष्मण ) अक्षुण्ण वैभव से युक्त हैं न ? दूतों ने 'हाँ' कहा। तब भरत ने राम को उद्दिष्ट करके अपने शिर पर हाथ जोड़े।

फिर, यथाक्रम सब बंधुओ के समाचार सुनकर भरत आनन्दित हुए। तब दूतो ने भरत से यह कहकर कि चित्रित करने के लिए असाध्य रूप से सम्पन्न हे भरत ! चक्रवर्ती का यह श्रीमुख ( अर्थात्, चिट्ठी ) है, पत्र दिया।

उनके यह कहने पर भरत ने उस पत्र के प्रति नमस्कार किया और उठकर अपने स्वर्ण-आभरण से भूषित दीर्घ कर में उसे लिया और द्रवित-चित्त होकर सद्योविकसित पुष्पो से भूषित अपने शिर पर उसे रख लिया।

यों शिर पर रखने के पश्चात् भरत ने, ऊपर से चंदन से लिप्त मिट्टी लगाकर बंद किये गये उस पत्र के चोगे को खोलकर देखा। उसका समाचार पढ़कर उन दूतो को कोटि से भी अधिक धन दिया।

तब भरत इस उमंग में कि वे अपने ज्येष्ठ भ्राता के दर्शन करनेवाले हैं, उज्ज्वल कांति फैलानेवाली हँसी से युक्त हुए, पुलकित हुए और उस पत्र पर सद्यः तोड़कर लाये गये पुष्प डाले।

२५६कंब रामायण

तुरत भरत ने अपनी सेना को सन्नद्ध होने की आज्ञा दी और यह भी न विचार कर कि वह मुहूर्त्त यात्रा के लिए अच्छा है या नही, कैकेयराज को प्रणाम करके, उनकी आज्ञा लेकर, अपने भाई (शत्रुघ्न) के साथ घोडे जुते हुए रथ पर आसीन होकर चल पडे।

उस समय हाथी (भरत को) घेरकर चल पडे। रथ कोलाहल करते हुए साथ चल पड़े। बड़े महिमापूर्ण राजा लोग घेरकर चल पडे। करवाधारी पदाति-सेना चल पड़ी। शंख बज उठे। नगाड़े, मत्स्यों के निवास समुद्र के समान गरज उठे।

ध्वजाएँ एकत्र होकर निकली। निशान निकले। आम के टिकोरे-जैसे नयनों-वाली युवतियों के आरूढ होने योग्य हथिनियाँ चलीं। मेघों के गर्जन समय कौंधनेवाली बिजली के समान सर्वत्र आभरण चमक उठे।

अनेक रथों पर रखे गये विविध वाद्य बड़ी ध्वनि करने लगे। नारियों की पुष्प-मालाओं के भ्रमर झंकार भरने लगे। शर के समान वेगगामी अश्व मार्ग पर चलने लगे।

अपनी नासिका से साँस छोड़ते हुए बाँसुरी की-सी ध्वनि करनेवाले, मुख पर आभरणों से भूषित, गगन पर भी उड़ जानेवाले, निश्चित समय में कितनी भी दूर चले जानेवाले, झुकी हुई गरदनवाले अश्व चल पड़े।

धनुर्विद्या में निपुण, करवाल-युद्ध में चतुर, खड्ग-युद्ध में कुशल, मल्ल-युद्ध में प्रवीण, बर्च्छे, भाले आदि शस्त्रों के अभ्यासी योद्धा तथा पुराने हाथीवान भी घेरकर चले।

परस्पर टकरानेवाले भैंसे, बकरे, रक्त का चिह्न देखकर लड़ने को झपटनेवाले कुक्कुट, बाज, 'करुंपूलू' (नामक लड़नेवाला पक्षी-विशेष), 'कौदारी' (नामक लड़नेवाले पक्षी-विशेष) आदि को पालनेवाले जो कभी उत्तम मार्ग पर न चलनेवाले थे, ऐसे मनुष्य भी घेरकर चले।

भरत कहीं त्वरित गति से आगे न निकल जायें, इस आशंका से आतुर होकर विद्या, ज्ञान आदि से भरे हुए व्यक्ति आगे-आगे चलने लगे। इस प्रकार चलते हुए वे ऐसे लगते थे, जैसे शापवश इस धरती पर जन्म लिये हुए देवता सद्ज्ञान पाकर पुन. स्वर्ग को जा रहे हो।

बंदी-मागधों के मधुर गीत गगन को भरने लगे। जैसे प्राण शरीर में व्याप्त रहता है, उसी प्रकार मर्दल-ध्वनि सब गीतों में व्याप्त हो गई।

बजनेवाले नगाड़ों की ध्वनि से भी बढ़कर वेदज्ञ ब्राह्मणों के आशीर्वादों की ध्वनि थी। वृषभ-समान मल्ल-वीरों के गर्जन से भी बढ़कर बंदी-मागधों के स्तुति-पाठ की ध्वनि थी।

भरत सात दिन चलकर नदियों, काननों और विशाल पर्वतों को पारकर उस कौशल देश में जा पहुँचे, जहाँ गन्ने के कोल्हुओं से निकला हुआ रस नालों में, बाँध तोड़ता हुआ, वह चलता है और अंकुरों से भरे खेतों को भर देता है।

खेत हलों से शून्य थे। युवकों की भुजाएँ पुष्पमालाओं से शून्य थीं। शीतल धान के खेत पानी से शून्य थे। कमल में वास करनेवाली संपत्ति की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी उस देश को छोड़कर चली गई थीं।

अयोध्याकाण्ड २५७

मधुर फलों के रस विशाल जलाशयों में भर रहे थे और चारों ओर बहकर व्यर्थ हो रहे थे। मनोहर पुष्पों के समूह तोड़े न जाकर पौधों पर ही विकसित होकर, फिर कुम्हलाकर झर रहे थे।

फसल को काटने का उचित समय को जाननेवाले किसानो के अभाव से शालि-धान के पौधे, आम्र-रस की धारा के बहने के कारण, सिर झुकाये टूटकर खड़े थे और धान धरती पर झरकर अंकुरित हो रहे थे।

तिलपुष्प-जैसी नासिकावाली तथा उन खेतो में जहाँ पक्षी आनन्द से सञ्चरण करते थे, काम करनेवाली अंत्यज-नारियाँ काम छोड़कर दुःखी पड़ी थीं, मानों वे अपने प्रियतमो से मान करके निराने का काम छोड़ बैठी हों।

शुक मौन हो बैठे थे। सुन्दर केशोंवाली स्त्रियाँ अपनी सखियों का दौत्य करती हुई उन (सखियों) के प्रियतमों के निकट नहीं जा रही थीं। नगाडे नहीं बज रहे थे। स्वर्ण से अलंकृत वीथियों में विवाह आदि के जुलूस नहीं निकल रहे थे।

संगीत-शास्त्रो में कथित विधान के अनुसार बनाई गई मधुर नादवाली बाँसुरी अब नहीं बज रही थी। नृत्यशालाओ तथा जलाशयो में नृत्य तथा जल-क्रीडा नहीं हो रही थी। (लोगो के) शिर पुष्पालंकार से विहीन थे। विद्युत्-निवारक यन्त्री से युक्त प्रासाद धान कूटनेवाली स्त्रियो के गीतों से विहीन थे।

(लोगो के) प्रकाशमान मुख हास-हीन थे। सौध सुगन्धित अगरु-धूम से विहीन थे। दीप पुष्ट ज्वाला से विहीन हो मंद पड़े थे। नारियो के केश मधुपूर्ण पुष्पों से विहीन थे।

भली भाँति बढ़े हुए तथा लहलहाते हुए सस्य के पौधे, विशाल नालो के निकट रहने पर भी किसी के द्वारा उन नालों में पानी को मोड़कर न बहाने के कारण उसी प्रकार शुष्क खड़े थे, जिस प्रकार निष्ठुर लोभी के द्वार पर, दान पाने की इच्छा से आया हुआ व्यक्ति हो।

वर्णन करने को भी असाध्य, अपार सम्पत्ति से समृद्ध वह कौशल देश, पुष्पहीन हो, पुष्प पर आसीन लक्ष्मी से विहीन हो एवं सारी शोभा से रहित होकर प्राण-विहीन देह के समान लगता था।

इस प्रकार के कौशल देश को देखकर भरत बहुत दुःखी हुए, किन्तु वहाँ घटित किसी वृत्तान्त को न जानने से यह सोचते हुए कि शायद हम अब कोई शोक-समाचार सुनने जा रहे हैं, वे रह-रहकर आह भर रहे थे।

सत्य नामक उत्तम आभरण से भूषित चक्रवर्ती के पुत्र भरत ने कुछ दूर आगे जाकर वेगवान् अश्वों से खींचे जानेवाले रथ से भी आगे जानेवाले अपने मन में (भावी के सम्बन्ध में) विचार करते हुए, अयोध्या के विशाल द्वार को देखा।

भरत ने उस नगर में उन दीर्घ ध्वजाओं को नहीं देखा, जो (ऐसी लगती थी) मानो वे सहस्रकिरण (सूर्य) के पीछे-पीछे चलकर उनसे यह कहती थीं कि तुम सारे ब्रह्माण्ड में घूमते-घूमते थक गये हो, (यहाँ किंचित् समय ठहरकर) विश्राम कर लो, तब जाओ, और उन (सूर्य) की गति को रोक लेती थीं।

२५८कंब रामायण

( भरत ने उस नगर में ) उन नगाडों का शब्द नहीं सुना, जो ( नगांड ) मानो विशाल जनता को यह सूचना देते बजते रहते थे कि राजा को यथेष्ट यश देते हुए यहाँ की समस्त सम्पत्ति को ले जाओ।

भ्रमरों से पिये जानेवाले मधु से युक्त पुष्पमाला को धारण किये हुए भरत ने मंगल-गीत गानेवालों को तथा स्तुति-पाठ करनेवालों को प्रचुर मात्रा में उत्तम हाथी-हथिनी, अन्य सम्पत्ति आदि पुरस्कार के रूप में ले जाते हुए नहीं देखा।

लोक-रक्षक चक्रवर्त्ती के पुत्र ( भरत ) ने भूसुरों ( अर्थात् ब्राह्मणों ) को दान के रूप में गाय, गज, सुन्दर सम्पत्ति आदि को जाते हुए नहीं देखा।

मँडरानेवाले भ्रमरों एव वीणा आदि से सप्त स्वर-युक्त संगीत न गाये जाने के कारण वे ( अर्थात, भ्रमर और वीणा आदि वाद्य ) आम के टिकोरे-जैसे नयनोंवाली ( मूक ) नारियों के केशों की समता कर रहे थे।

उस नगर की वीथियों में रथ, घोडे, हाथी, शिविका, शकट आदि नहीं दिखाई देते थे। अतः, वे ( वीथियाँ ) जल के सूखने पर सिकतामय दिखनेवाली नदियों के समान शोभा-विहीन लगती थीं।

सज्जनों के द्वारा प्रशंसित सद्गुणों से पूर्ण भरत ने नगर के भीतरी प्रदेश को अपनी पूर्व दशा से विहीन देखकर अपने भाई ( शत्रुघ्न ) से कहा—हे अनुज ! चक्रवर्त्ती के निवासभूत इस राजधानी की ऐसी दशा क्यों हुई ?

शत्रुओं को वीर-स्वर्ग पहुँचानेवाले तथा सजल मेघ-जैसे कंधोंवाले हे भाई ! यह नगर मीन-समान नयनोंवाली लक्ष्मी से विहीन विशाल क्षीर-सागर के जैसा लग रहा है, देखो।

तब उत्तम रत्न-खचित आभरणों से भूषित सिंह-समान अनुज ( शत्रुघ्न ) ने हाथ जोडकर निवेदन किया—ऐसा लगता है कि इस नगर में कोई अति दारुण शोकप्रद घटना हुई है, जो साधारण नहीं है। लक्ष्मी भी युगान्त तक अविनाशी रहनेवाले इस नगर को छोड़कर चली गई हैं।

इतने में, कुछ अधिक सोचने के पूर्व ही चक्रवर्ती-कुमार विशाल तोरण से भूषित अत्युन्नत राजप्रासाद के द्वार पर आ पहुँचे और तुरन्त अपने पिता के विश्राम-स्थान में गये।

पर्वतों को लज्जित करनेवाले ऊँचे कंधों से शोभायमान भरत ने जाकर देखा, किन्तु कहीं भी अपने पराक्रमशाली पिता को नहीं देखा। तब उनके मन में आशंका उत्पन्न हुई कि अत्र पिता के न देखने का कारण कुछ साधारण नहीं है।

उस समय, अपने पिता को ढूँढ़नेवाले और अपने पवित्र करों से उनके चरणों को छूने की इच्छा रखनेवाले भरत से, बाँस-जैसे कंधोंवाली एक दासी ने कहा—माता आपका स्मरण कर रही हैं। आप इधर आइए।

भरत ने आकर अपनी माता ( कैकेयी ) के चरणों का नमस्कार किया। माता ने मन-भर उनका आलिंगन किया और पूछा—मेरे पिता, मेरे भाई आदि सब कुशल हैं न ? अपार गुणाकर भरत ने कहा—हाँ वे सब कुशल हैं।

तब भरत ने कहा—मैं उमड़नेवाले प्रेम से पूर्ण चक्रवर्ती के कमल-समान चरणों

अयोध्याकाण्ड २५६

को नमस्कार करने के लिए आया हूँ। पिता के दर्शन करने के लिए मेरा मन आतुर हो रहा है, पौरुष से पूर्ण तथा दीर्घ मुकुटधारी चक्रवर्त्ती कहाँ हैं, बताओ। यह कहकर भरत हाथ जोड़कर खड़ा रहा।

भरत के यह पूछने पर अव्याकुल चित्तवाली कैकेयी ने कहा—दानवों का विनाश करनेवाली सेना से युक्त तथा भ्रमरों से अंचित पुष्पमाला धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती, देवताओं के नमस्कार का पात्र बनते हुए स्वर्ग को सिधार गये हैं, तुम चिन्ता न करो।

आहत करनेवाले वह वचन ज्योंही भरत के कानों में पड़े, त्योंही घुँघराले केशों से शोभायमान वह निःसङ्ग होकर गिर पड़े। विलब तक ऐसे मूर्च्छित पड़े रहे, जैसे कोई बड़ा वृक्ष वज्र से आहत होकर गिरा हो।

फिर, किंचित् प्रज्ञा प्राप्त कर भरत ने मंद पड़ी हुई अपनी मुखकांति के साथ एवं प्रफुल्ल कमल-जैसे नेत्रों में अश्रु भरकर माता को देखकर कहा—कानों में जैसे किसी ने अग्नि-ज्वाला रख दी हो—ऐसे कठोर वचन कहने का विचार तक करनेवाला तुम्हारे अतिरिक्त और कौन हो सकता है ?

सुब्रह्मण्य (शिव के पुत्र कार्त्तिकेय) से भी अधिक सुन्दर वह कुमार (भरत), बड़ी वेदना के साथ उठे। पुनः धरती पर गिर पड़े। उष्ण निःश्वास भरे। रोये। फिर, ये वचन कहने लगे—

हे पिता ! तुमने धर्म को विस्मृत कर दिया। दया को मिटा दिया। अत्युत्तम करुणा-रूपी सम्पत्ति को मिटाकर इस संसार को छोड़ चले। हाय ! तुमने न्याय को भी भुला दिया। इससे बढ़कर दोष और क्या हो सकता है ?

तुमने क्रोध-रूपी दुर्गुण को मिटा दिया था। काम-रूपी अग्नि को बुझा दिया था तथा लोभ आदि के समूह को भी विध्वस्त किया था। सब लोगों के मन के अनुकूल चलने-वाले, हे उदारगुण ! अब दूसरों को भूलकर केवल अपने मन के अनुसार कार्य करना (अर्थात्, हम सबकी इच्छा के विरुद्ध इस संसार को छोड़ जाना) क्या उचित है ?

हे प्रभु ! इस कुल के महान् पूर्व-पुरुष, सूर्य आदि के वीर चारित्र्य को तुमने पुनः नवीन कर दिखाया था। ललाट-नेत्र (शिव) के दृढ़ धनुष को तोड़नेवाले अपने पुत्र (राम) को छोड़कर तुम कैसे चले गये ?

हे तात ! न्याय-मार्ग से आज्ञा-चक्र प्रवर्त्तित करनेवाले राजन् ! इस संसार में किसी भी वंश के हों, सब लोग तुम्हारे सम्मुख याचक ही थे। इसलिए (यहाँ अपने समान मित्रों को न पाकर) क्या उत्तम मित्रों को पाने की इच्छा से तुम स्वर्ग गये हो ?

मल्ल युद्ध में चतुर विशाल कंधोंवाले ! चिरकाल से छाया देते रहनेवाले तुम्हारे श्वेतच्छत्र की विशाल छाया में विश्राम प्राप्त करनेवाले सब प्राणियों को व्याकुल ही छोड़कर क्या तुमने स्वयं (स्वर्ग में) कल्प-वृक्ष की छाया में सुखपूर्वक निवासकरने की इच्छा की है ?

हे तात ! क्या शंबर के समान असुर अब भी आकाश में रहते हैं ? क्या देवता लोग असुरों से हारकर अपने स्वर्ग को भी खोकर रक्षा की प्रार्थना करते हुए तुम्हारी शरण में आये थे ?

२६०कंब रामायण

तुम वेदों में प्रतिपादित अश्वमेध यज्ञ करते थे और वाद्यों के शब्द से युक्त सेना के साथ जाकर अन्य राजाओं के द्वारा समर्पित राजस्व को ब्राह्मणों को दक्षिणा के रूप में दान कर देते थे । इस प्रकार, गार्हपत्य अग्नि को प्रज्वलित करते रहते थे । यह सब कार्य छोड़कर क्या तुम स्वर्ग में निष्क्रिय बैठ सकते हो ?

सात हाथ ऊँचे तथा मद बहानेवाले हाथियों के स्वामी ! क्या यह सोचकर कि श्यामल (राम) (शासन चक्र धारण किये बिना) खाली हाथ रहता है, उन (राम) को शासन का भार देने के लिए तुम इस संसार को छोड़कर चले गये ?

तुमको तप में आसक्ति नहीं थी । अतएव, पहले की हुई बड़ी तपस्या के फलस्वरूप प्राप्त रामचन्द्र को, राज्य मिलने पर होनेवाले अभिषेक के उत्सव की शोभा भी, अपने विशाल नयनों से देखने का भाग्य तुम्हे नही मिला ।

पिता की मृत्यु से उत्पन्न दुःख का सहन न करते हुए भरत ने इस प्रकार के वचन कहे और वे इस प्रकार पिघल उठे कि उनके नेत्रों से नदी-प्रवाह के समान अश्रुधारा वह चली । फिर, वह यम-सदृश धनुर्धारी भरत स्वयं ही अपने आपको सांत्वना देकर किंचित् स्वस्थ हो बोले—

मेरे पिता, मेरी माता, मेरे भगवान्, मेरा भाई, सब कुछ वे अपार मद्गुणाकर राम ही हैं । अतः, जबतक उनके वीर-वलय-भूषित चरणों को नमस्कार न करूँगा, तबतक मेरे मन की पीडा दूर नहीं होगी ।

वह वचन सुनते ही घोर वज्र-तुल्य वचनवाली कैकेयी पुनः बोल उठी—हे शत्रु-नाशक धनुर्धारी ! वह (राम) अपनी देवी तथा भाई-सहित वनवास को गया है ।

(राम) वनवास के लिए गया है ।—कैकेयी के कहे इस वाक्य को सोचकर भरत ऐसे हुए, जैसे उन्होंने आग निगली हो । वे आशंकित होकर बोले—अहो ! मेरे पापकर्म कितने भयंकर हैं ? न जाने, मुझे अभी और क्या-क्या समाचार सुनने हैं ।

पीडा से मौन रहनेवाले उस पुरुष-श्रेष्ठ (भरत) ने पूछा—वीरवलय-धारी उन राम का अरण्य में जाना क्या किसी बुरे कार्य के परिणामस्वरूप हुआ ? या यह दैवी कोप का परिणाम है ? अथवा अति बलवान् नियति का विधान है ? किस कारण से यह हुआ ?

यदि राम स्वयं कोई बुरा कार्य भी करें, तो वह (कार्य) इस संसार के सब प्राणियों के लिए माता के कार्य (जैसे अपने बच्चे के हाथ-पैर दबाकर उसके मुँह में औषध आदि डालने के) जैसे ही हितकारी होगा । राम का वन-गमन क्या पिता के स्वर्ग सिधारने के पश्चात् हुआ या उसके पूर्व हुआ ? कृपया बताओ ।

तब कैकेयी ने उत्तर दिया—राम का वन-गमन गुरुजनों के प्रति कोई अपराध करने के कारण नहीं हुआ । गर्व के कारण भी उसे वन नहीं जाना पड़ा । दैवी प्रकोप से भी यह नहीं हुआ । सूर्य-समान राजवंश में उत्पन्न चक्रवर्ती (दशरथ) के जीवित रहते समय ही वह वन को चला गया ।

तब भरत ने प्रश्न किया—राम का अपना किया हुआ कोई अपराध नहीं, शत्रुओं की दी हुई पराजय नहीं, दैवी प्रकोप भी नहीं है । तो भी पिता के जीवित रहते हुए

अयोध्याकाण्ड २६१

उनको अरण्य जाना पड़ा—इसका क्या कारण है ? उन चक्रवर्त्ती के प्राण छोड़ने का क्या कारण हुआ ?

तब कैकेयी ने कहा—चक्रवर्त्ती ने मुझे दो वर दिये थे। उनके दिये वरों में से एक से मैंने राम को वन भेजा, दूसरे से तुम्हारे लिए राज्य प्राप्त किया। चक्रवर्त्ती इसको नहीं सह सके, अतः उन्होंने अपने प्राण छोड़ दिये।

भरत के कर जो अबतक उनके सिर पर जुड़े हुए थे, कैकेयी के यह वचन समाप्त होने के पूर्व ही, उनके कानों पर आ लगे (अर्थात्, उन्होंने अपने कान बंद कर लिये)। उनकी भौंहें टेढ़ी होकर काँपने लगीं। उनके निःश्वासों से चिनगारियाँ निकलने लगीं तथा उनकी आँखों से रक्त-बिंदु चू पड़े।

उनके कपोल फड़क उठे। रोगटों के चारों ओर अग्निकण छा गये। धूम भी (उनके शरीर से) निकलकर चारों ओर छा गया। ओठ दब गये। मेघ-समान उदार गुण से युक्त उनके दीर्घ हाथ वज्र को भी भीत करते हुए परस्पर आघात कर उठे।

भरत अपने पैरों को वारी-बारी से धरती पर पटकते थे, उससे मेरु पर्वत-सहित यह धरती इस प्रकार डोलायमान हो उठी, जैसे हाथी को लादकर चलनेवाली लंबे मस्तूल से युक्त कोई नौका, आँधी के चलने पर समुद्र के मध्य ऊर्ध्व-द्रव हो उठती है।

(भरत का क्रोध देखकर) देवता डर गये। असुर बड़े भय से मरने लगे। दिग्गजों ने अपने मदस्रावी रंध्रों को बंद कर लिया। सूर्य अस्त हो गया। कठोर क्रोध-वाले यम ने भी अपनी आँखें बंद कर लीं।

घोर क्रोध से भरे सिंह-सदृश भरत ने क्रूर कार्य करनेवाली उस कैकेयी को अपनी माता नहीं समझा। फिर, उसको इसलिए नहीं मारा कि उससे रामचंद्र क्रोध करेंगे। यों चुप रहकर फिर उसे देखकर वज्रघोष से ये वचन कहे—

तुम्हारी क्रूरता के कारण मेरे पिता मर गये। मेरे भाई तपोव्रत धारण कर वन में चले गये। मैं, जो (इस प्रकार के वर माँगनेवाले तुम्हारे) मुँह को चीरे बिना (तुम्हारे वर माँगने की) वह सुनता हुआ खड़ा हूँ, बड़ी इच्छा से राज्य का शासन करनेवाला हूँ!

(मेरे पिता और मेरे भ्राता को दूर करनेवाली) तुम अभी यहीं हो। (तुम्हारे वचन सुनता हुआ) मैं भी यहीं हूँ। क्षण-मात्र में ही तुम्हें मारकर नहीं गिरा देता। मैं इसी विचार से डरता हूँ कि जगत् की माता के समान वे मेरे भाई क्रोध करेंगे। अन्यथा, तुम्हारा माता का पद (तुम्हारी हत्या करने से) मुझे कभी रोक नहीं सकता था।

एक चक्रवर्त्ती ऐसा है, जो कठोर वचन सुनकर प्राण छोड़ देता है। एक वीर भी ऐसा है, जो अपना राज्य त्यागकर चला जाता है और एक भरत भी ऐसा है, जो अपनी माता के द्वारा प्राप्त राज्य का शासन करनेवाला है। ऐसा हो, तो धर्म का मार्ग ही प्रतिकूल है और वह हमारे लिए चाहने योग्य नहीं है।

यदि भविष्य में ऐसा अपवाद उत्पन्न हो कि—'भरत ने वंचनाशील माता के क्रूर षड्यन्त्र के कारण आदिकाल से आये हुए अपने कुल-महत्त्व को मिटा दिया और उस (कुल)

२६२भद्र रामायण

को अमूल्य रत्न-दण्ड का छत्र बना दिया—तो इससे बढ़कर प्रतिकूल बात और क्या हो सकती है?

तुमनें पतिव्रत्य नामक धर्म की सीमा को मिटा दिया। उस जगत्-प्रसिद्ध उत्कृष्ट ऐश्वर्य के तीस लक्षण धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती का तुमने नाश किया—और इस प्रकार के उन नव्बें। तीन लोगों को काटनेवाली नागिन हो। उस पर भी तुम कलङ्क कहती हो।

तुमने अपने पति के प्राण पी डाले। तुम कोई व्याधि नहीं हो, किन्तु पिशाचिनी हो। (भाव है, अगर व्याधि होती, तो वह शरीर से पृथक् होकर उस शरीर के साथ नष्ट होती है। पिशाचिनी शरीर के मिटाने के बाद भी जीवित रहती है। अतएव कैकेयी, पिशाचिनी-तुल्य है)। क्या तुम अब भी जीवित रहने योग्य हो, क्या पापिन हो जाओ। तुमने (पहले) मुझे अपना स्तन पिलाकर बड़ा किया। (उस समय अवकाश दिया। मेरी माँ बनी हुई तुम न जाने मुझे और क्या देनेवाली हो।

कभी असत्य न बोलनेवाले चक्रवर्त्ती को तुमने वचन से मार डाला। उस अपवाद पाकर भी तुमने राज्य प्राप्त करके सुखी जीवन व्यतीत करने का प्रयत्न किया। तुमने राम को अरण्य भेजकर गाय और उसके बछड़े को पृथक् कर दिया (अर्थात्, समस्त नगर के लोगों से पृथक् किया)। ऐसा करते हुए तुम्हारा मन किञ्चित् भी दुःखी नहीं हुआ।

चक्रवर्ती, अपने दिये हुए वरों को न टालकर स्वयं मर गये। ज्येष्ठ पुत्र अपने पिता की आज्ञा को ही धर्म मानकर वन चले गये। किंतु उन (राम) का छोटा भाई मैंने माता के षड्यन्त्र से संसार का राज्य प्राप्त किया, ऐसा अपयश पाना बड़ा कठिन है।

जिनको राज्य करने का अधिकार है, वे राम—यह न सोचकर कि उनके वन जाने से पिता प्राण त्याग देंगे और यह मानकर कि अपयश का पात्र बनेगा—किन्तु यह प्रतिकूल विचार मेरे ही (अर्थात्, भरत के ही) कारण उत्पन्न हुआ तथा निष्कण्टक राज्य करनेवाला हूँ—स्वयं वन को चले गये। यदि वे (राम) ऐसा नहीं मानते, तो वे कभी वन जाने का विचार नहीं करते।

प्रसिद्ध पुरातन कुल में उत्पन्न चक्रवर्ती का विचार जैसा भी रहा हो तथा (राम) यदि यह सोचें कि मेरी सेवा में निरत रहनेवाला भरत (मेरे प्रति) दुष्ट विचार रखता है, तो इसके लिए मेरी माता का राज्य माँगना ही पर्याप्त कारण है।

मेरे ज्येष्ठ भ्राता, वन में अपनी अञ्जलि-रूपी पात्र में शाक आदि वन्य फल-मूलों में क्रय बनकर अपना जीवन रखे हुए, उत्तम (स्वर्ण के) पात्र में श्रेष्ठ धान के पके हुए चावल अमृत समान घृत से सिक्त करके भोजन करता रहूँ? अहो! संसार के लोग मुझपर क्या आक्षेप नहीं सोचेंगे?

धनुर्भूषित कंधेवाले राम वन को चले गये—महा महाराज दशरथ चक्रवर्ती ने अपने प्राण छोड़ दिये। किन्तु विष-समान इस नारी की गोद में अपने को बिना जीवित रहनेवाली मैं ऐसे रो रहा हूँ, जैसे श्मशान-भूमि पर मुझे दफन करने के लिए कितने घोर अपयश का पात्र बन गया हूँ।

अयोध्याकाण्ड२६३

मेरा राज्य करना लोग स्वीकार नही करेगे। मैं भी जैसे जीवन की इच्छा करके अपयश को स्वीकार नही करूँगा। इससे उत्पन्न होनेवाला अपयश किसी भी उपाय से नही मिटेगा। अधर्म से युक्त इस नगर मे लक्ष्मी निवास नही करेगी। अहो ! तुमने (यह सब उत्पात करने के लिए) किसके साथ मत्रणा की ? तुम्हे परामर्श देनेवाले कौन हैं ? धर्म का समूल नाश करके तुम्हे क्या मिला ?

तुम्हारे क्रूर वचन के द्वारा मैने अपने पिता को मारा (अर्थात्, पिता की मृत्यु का निमित्तकारण मै बना)। ज्येष्ठ भ्राता को अरण्य मे भेज दिया। अब संसार का राज्य करने के लिए आ उपस्थित हुआ हूँ। तुम पर क्या दोष डाले ? तुम्हारा क्या अपयश होगा ? पर क्या किसी दिन मेरा अपयश भी मिट सकेगा ?

अब लोग देखे कि मै क्या करने जा रहा हूँ। जबतक लोग (मेरे स्वभाव को) नही देखेगे, तबतक मेरी निन्दा करेंगे। किन्तु हे माता ! तुमने व्यर्थ अपवाद प्राप्त किया (जो किसी भी रूप मे नही मिटनेवाला है)। मेरा यह विचार है कि विष, बिना उसे खाये, किसी को नही मारता, इसलिए अबतक मैं जीवित हूँ। अन्यथा मै प्राण नही रखता (भाव यह है कि जिस प्रकार विष खाने पर ही मारता है, उसी प्रकार जब मै राज्य स्वीकार करूँ, तभी मेरा अपवाद होगा, अन्यथा नही)।

मै तुम्हारे पाप-पूर्ण नरक-तुल्य उदर में रहा—इससे जो पाप मुझे लगा है, उसे मिटाना है। इसलिए, सद्धर्म के देवता को साक्षी बनाकर, त्रिलोक के निवासियो के देखते हुए, मै घोर तपस्या करूँगा।

ज्ञानी लोगो के वचन को ही मै सुनता हूँ। यदि तुम अपने न मिटनेवाले प्राणो को त्याग दोगी, तो तुम्हारे कार्य बुद्धिपूर्वक किये गये ही माने जायेगे। उससे तुम पुनः शुद्ध बन जाओगी। ससार में जन्म लेने का लाभ तुम्हे मिलेगा। इसके अतिरिक्त तुम्हारे निस्तार का अन्य कोई उपाय नही है।

राम के अनुज (भरत) ने फिर यह कहकर कि मै अब अकथनीय क्रूरता से युक्त इस पापिन के निकट नही रहूँगा, अपनी अपूर्व मनोपीडा को मिटाने के लिए पवित्र स्वभाववाली कौशल्या के उत्तम चरणो को नमस्कार करूँगा, उठकर चले गये।

पौरुष से युक्त भरत कौशल्या के निकट जा पहुँचे। वहाँ जाकर धड़ाम से ऐसे गिरे, जैसे धरती फट गई हो और अपने उज्ज्वल करो से कौशल्या के कमल-जैसे चरणो को पकड़कर रोने लगे।

उस समय भरत ये वचन कहकर अश्रु बहाने लगे, जिसे देखकर स्वर्ग के निवासी भी रो उठे—मेरे पिता किस लोक मे गये हैं ? मेरे ज्येष्ठ भाई कहाँ गये हैं ? क्या यह सारा उत्पात देखने के लिए अकेला मैं ही आया हूँ ? हाय ! मेरे हृदय की इस वेदना को आप ही मिटाये।

भरत इस प्रकार लोट गये कि उनके कंधे धूलि से भर गये। वे बोले—मै अपने प्रभु (राम) के चरणो के दर्शन नही पा सका। क्या उन राम को जो इस पृथ्वी के स्वामी हैं, इस देश को छोड़कर जाना चाहिए था ? क्या आपने उनको वन जाने से रोका नही ? (आपने) यह भूल की।

२६४

कंब रामायण

(राम के प्रति ऐसा) क्रूर कृत्य करनेवाले सब लोग अभीतक मिटे नहीं हैं। इस सम्बन्ध में हम क्या कहे ? क्रूरा (कैकेयी) के गर्भ में उत्पन्न मैं प्राण त्याग करूँगा और अपने मन की पीडा को दूर करूँगा। भरत ने पीडित होकर यों कहा।

मरकतमय पर्वत के जैसे बढ़े हुए कंधोंवाले भरत ने फिर कहा—रथ पर आरूढ होकर संसार के अंधकार को दूर करनेवाले उस सूर्य से लेकर उज्ज्वल प्रकाश-युक्त इस पुरातन राजवंश में भरत नामक एक अपयशकारी कलंक भी उत्पन्न हुआ।

जानु तक लंबमान दीर्घ भुजाओंवाले धर्म-स्वरूपी भरत ने पुनः आगे कहा—करवालधारी दशरथ स्वर्ग सिधारे। उनके अनुपम ज्येष्ठ कुमार वन को सिधारे। ऐसे अवलंबों से रहित होकर यह कौशल देश घोर दुःख से पीडित होनेवाला है।

कुलीनता, क्षमा, पातिव्रत्य, इन गुणों से पूर्ण कौशल्या ने रोनेवाले पुरुषवर भरत को देखा और यह जानकर कि भरत में राज्य पाने की इच्छा नहीं है, उसका मन कलंक-रहित है, इसलिए उनका (भरत पर संदेह के कारण उत्पन्न) क्रोध दूर हो गया। फिर वे अधीर होकर बोलीं—

उन कौशल्या ने यह जाना कि भरत का निष्कलंक मन अपराध-जन्य पीडा से मुक्त है। अतः, उन (भरत) से बोलीं कि हे तात ! कदाचित् तुमको कैकेयी का छल विदित नहीं था।

कौशल्या के चरणों पर गिरे हुए भरत, उनके वह वचन सुनते ही, पकड़े गये सिंह के समान घबराकर उठे और रोते हुए ऐसी शपथें खाने लगे कि नित्य प्रवर्धमान धर्म-देवता भी उनकी बात सुनकर काँप उठा।

धर्म का विनाश करनेवाला, किंचित् भी दया से रहित, दूसरों के द्वार पर (उसकी नारी का अपहरण करने के लिए) खड़ा रहनेवाला, दूसरों पर क्रोध करनेवाला क्रूरता के साथ संसार के प्राणियों को मारकर जीवित रहनेवाला, विरागी महातपस्वियों के प्रति क्रूर कार्य करनेवाला,

'कुरा' आदि पुष्पों से भूषित केशोंवाली युवती को करवाल से मारनेवाला, राजा का साथी बनकर युद्ध-क्षेत्र में जाकर फिर भय से शत्रुओं को पीठ दिखाकर भागनेवाला, भिक्षा में स्वल्प धन माँगकर हाथ में रखनेवाले से उस धन को छीननेवाला,

पुष्ट तथा शीतल तुलसी की माला से भूषित भगवान् (विष्णु) के बारे में 'वह भगवान् परम तत्त्व नहीं है'—ऐसा वचन कहनेवाला, धर्म-मार्ग से न हटनेवाले ब्राह्मणों के प्रति अपराध करनेवाला तथा अपौरुषेय एवं त्रुटिहीन वेदों के संबंध में यह कहनेवाला कि 'कई व्यक्तियों की कल्पना-प्रसूत रचना ही वेद है',

अपनी माता के भूखी रहते हुए, स्वयं अपने पापिष्ठ उदर-कुहर को अन्न से भरने-वाला, अपने स्वामी को युद्ध-भूमि में छोड़कर भागनेवाला, ये सब लोग जिस नरक की आग में गिरते हैं, (यदि कैकेयी के षड्यन्त्र में मेरा भाग रहा हो, तो) मैं भी उसी नरक में गिरूँ।

अपने प्राणों के भय के कारण शरण में आये हुए की रक्षा न करनेवाला तथा धर्म को विस्मृत करके आचरण करनेवाला, जो नरक पाते हैं, उसी में मैं भी गिरूँ।

अयोध्याकाण्ड २६५

न्यायालय में झूठी साक्षी देनेवाला, युद्ध से डरकर भागनेवाले व्यक्ति के हाथ की वस्तुओं को स्वयं छिपकर छीन लेनेवाला, विपदा में पड़कर पीड़ित हुए व्यक्ति को और अधिक पीड़ा देनेवाला—ये लोग जिस नरक को पाते हैं, उसी में मैं भी गिरूँ।

ब्राह्मणों के निवास को आग से जलानेवाला, बालकों की हत्या करनेवाला, न्यायालय में (न्यायाधीश के पद से) दोषपूर्ण न्याय करनेवाला, देवताओं की निन्दा करनेवाला—ये लोग जो नरक पाते हैं, उसी में मैं भी पडूँ।

बछड़े को दूध पीने न देकर, उसको भूखा ही रखकर गाय का सब दूध दुहकर स्वयं पीनेवाला, भीड़ में दूसरों की वस्तुओं को चुरानेवाला, दूसरों के किये हुए उपकार को भूलकर उनकी निंदा करनेवाला, न्यायहीन जिह्वा से युक्त व्यक्ति—ये जो नरक पाते हैं, (अगर कैकेयी के षड्यंत्र में मेरा भाग रहा हो, तो) मुझे भी वही नरक मिले।

यात्रा में अपने साथ आनेवाली मधुरभाषिणी नारी के दूसरों के द्वारा सताये जाने पर स्वयं अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए उसे छोड़कर भाग जानेवाला, अपने पास रहनेवाले भूखे व्यक्तियों की भूख मिटाये बिना स्वयं भोजन करनेवाला—ये सब जिस दुर्गति को प्राप्त होते हैं, वही दुर्गति मेरी भी हो।

(यदि मेरे कहने से मेरी माँ ने राम को वन भेजा हो, तो) शस्त्रों से सुसज्जित होकर युद्ध करने के लिए युद्धक्षेत्र में जाकर अपने प्राणों के मोह में पड़कर शत्रुओं के सम्मुख युद्ध न करके शिर झुका देनेवाला तथा धर्म की सीमा लाँघकर (प्रजा से) धन संग्रह करनेवाला राजा—जो नरक पाते हैं, वही नरक मुझे भी मिले।

(यदि कैकेयी के षड्यंत्र में मेरा भी हाथ रहा हो, तो) उत्तम राज्य को पाकर मनमाना आचरण करते हुए नीच कार्य करनेवाले राजा के समान ही मैं भी परंपरा से प्राप्त धर्म का त्याग कर अपयशकारक अधर्म-मार्ग में चलनेवाला हो जाऊँ।

जो राजा, अपनी रक्षा में रहनेवाली प्रजा के व्याकुल होकर अस्त-व्यस्त होते हुए, 'वंशि' पुष्पों की विजयसूचक माला पहने हुए, शत्रु के सम्मुख 'वाहे' पुष्पों की माला¹ पहनकर खड़ा हो, उसकी जो दुर्गति होती है, वही दुर्गति मेरी हो।

(यदि कैकेयी के षड्यंत्र में मेरा भाग रहा हो, तो) कन्या का मान-भंग करने का प्रयत्न करनेवाला, गुरु-पत्नी की ओर कामुक दृष्टि डालनेवाला, मद्यपान करनेवाला, क्षुद्र चौर्य-कर्म से स्वर्ण प्राप्त करनेवाला (अर्थात्, सोना चुरानेवाला)—ये लोग जैसी दुर्गति पाते हैं, मैं भी वैसी ही दुर्गति पाऊँ।

उत्तम भोजन पदार्थ को कुत्ते-जैसे (अर्थात्, दूसरों से छिपाकर अकेले ही) खानेवाला, 'यह पुरुष नहीं, स्त्री भी नहीं है, यह शक्तिहीन नपुंसक है'—ऐसे अपयश का भाजन बनकर निर्लज्ज हो क्षुद्र कार्य करता हुआ जीवन व्यतीत करनेवाला, महात्माओं का कथन भूलकर सदा पापकर्म में रत रहनेवाला तथा सर्वदा दूसरों की निन्दा करते रहनेवाला—ये सब जो नरक पाते हैं, वही मुझे भी मिले।


¹ 'वंशि' पुष्पों की माला विजय-सूचक और 'वाहे' पुष्पों की माला पराजय-सूचक मानी गई है।—अनु०

२६६ | कंब रामायण

( यदि कैकेयी के षड्यन्त्र में मेरा हाथ हो, तो ) दोषहीन प्राचीन वंशों को कलंकित कहकर उनकी निंदा करनेवाला, अकाल के समय में दरिद्र लोगों के कमाये अन्न को बिखेर देनेवाला, सुगंधित भोजन पदार्थों को, समीपस्थ व्यक्तियों को दिये बिना, उनके मुँह में लार टपकाते हुए, स्वयं खानेवाला—जो गति पाते हैं, वही गति मुझे भी मिले।

जो व्यक्ति, धनुष से और करवाल से प्रकट किये जानेवाले पराक्रम को व्यर्थ करके, इस नश्वर शरीर को कुछ समय तक सुरक्षित रखने की लालसा से विरोधियों के घर में उनके द्वारा क्रोध के साथ दिये जानेवाले अन्न को अपने हाथ पसारकर माँगता हुआ रहता है, उसकी जो दुर्गति होती है, वही मेरी भी हो।

कोई व्यक्ति याचक से, उसकी माँगी हुई वस्तु 'मेरे पास है'—कहकर भी उसे न दे और यह भी न कहे कि 'मेरे पास वह वस्तु नहीं है'—ऐसे मूर्ख व्यक्ति को जो नरक मिलता है, वही नरक मुझे भी मिले।

( यदि राम को वन भेजने में मेरा हाथ रहा हो, तो ) जो व्यक्ति शत्रु-भयंकर करवाल को अपने दीर्घ हाथ में लेकर युद्धक्षेत्र में जाय और फिर व्याधियों के आवास, दुर्गंध से युक्त इस क्षुद्र देह को बचाने की इच्छा से, मोती-समान दाँतोंवाली युवती के देखते हुए, शत्रुओं के सम्मुख सिर झुका दे—उस व्यक्ति की जो दुर्गति होती है, वही मेरी भी हो।

विशाल गन्ने के खेतों तथा लाल धान के खेतों से युक्त जल-समृद्ध देश को, शत्रु के द्वारा हरण किये जाते देखकर भी जो व्यक्ति अपने प्राणों को बचाने के लिए बेड़ी में बँधे अपने चरणों के साथ शत्रु के सम्मुख खड़ा रहे, उसकी जो दुर्गति होती है, मेरी भी वही दुर्गति हो।

क्रूर कैकेयी के किये कार्य को यदि मैं जानता ही हूँ, तो मैं भी उन लोगों की दुर्गति को प्राप्त करूँ, जो धर्म से न हटनेवाले अपने पूर्वजों को दुःख देते हुए पाप-कर्म करते रहते हैं।

इस प्रकार अपने मन की निष्कलंकता को प्रकट करनेवाले भरत को देखकर कौशल्या यों आनंदित हुईं, जैसे राज्य त्यागकर वन को गये हुए राम को ही लौट आये हुए देख रही हों। उन्होंने आँसू बहानेवाले भरत को अपने गले से लगा लिया।

कपटहीन उत्तम स्वभाववाले भरत के कार्य को, तथा उनकी माता ( कैकेयी ) के पाप-स्वभाव को, पहचानकर दुःख की अधिकता से कौशल्या यों रोईं कि उनके पीन स्तनों से दूध टपकने लगा और उनका मुख सूज गया।

कौशल्या बोली—हे राजाधिराज ( भरत ) ! तुम्हारे कुल के मनु आदि अति पुरातन पूर्व पुरुषों में भी तुम्हारी समता करनेवाले कौन थे ? यों कहकर उन्होंने आशीर्वाद दिया। भरत बार-बार उनके वचन (अर्थात्, उनका भरत को राजाधिराज कहना) को स्मरण करके द्रवितचित्त होकर रो पड़े।

भरत के अनुज ( शत्रुघ्न ) ने भी, भरत के सद्गुणों को सोचकर प्रेम से पिघलने-वाली माता ( कौशल्या ) के चरणों पर नत हुआ और यथाविधि नमस्कार करके व्याकुल मन से खड़ा रहा। इसी समय वसिष्ठ मुनिवर वहाँ जा पहुँचे।

अयोध्याकाण्ड २६७

तब भरत उन महातपस्वी के चरणों पर गिरकर बोला—मेरे पिता कहाँ हैं ? बताइए। तब वसिष्ठ दुःख की अधिकता के कारण कुछ उत्तर न दे सके और व्याकुल हो आँखों से अश्रु बहाते हुए भरत को गले से लगा लिया।

वसिष्ठ ने कहा—हे दोष-रहित कुमार ! उदारगुणवाले तुम्हारे पिता के प्राण छोड़े, आज सात दिन हो गये। तुम पुत्रों के द्वारा किये जानेवाले कार्य (अंतिम क्रिया) करो। तब कौशल्या ने उनको (उस स्थान पर, जहाँ दशरथ की देह रखी थी) जाने की आज्ञा दी।

पिता की देह को देखने की अनुमति देनेवाली माता (कौशल्या) के चरणों को नमस्कार करके भरत, सुन्दर दीर्घ जटाओंवाले पवित्र वसिष्ठ मुनि के साथ चले और अपने प्राण देकर धर्म की रक्षा करनेवाले चक्रवर्ती दशरथ के अति प्रशंसित साकार धर्म-जैसे शरीर को देखा।

भरत दहाड़ मारकर रो पड़े और धरती पर गिर पड़े और महिमामय आज्ञाचक्र को प्रवर्त्तित करनेवाले (दशरथ) के तैल-पात्र में रखे हुए सोने के रंग के शरीर को अश्रुओं से धो दिया।

चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मणों ने आदर के साथ दशरथ के शरीर को उस स्थान से अपने हाथ से उठाया और स्वर्ण से निर्मित एक विमान में रखा। तब राजा के योग्य नगाड़े बजने लगे।

नगर के लोग, वेला में बँधे समुद्र के समान रुदन से उत्पन्न ध्वनि करते हुए व्याकुलप्राण हो रहे। राजाओं का समूह चारों ओर हाथ जोड़कर खड़ा रहा। ऐसे समय में, गले में रस्सी से युक्त एक हाथी पर उस देह को रखकर लोग ले चले।

सुन्दर तथा विशाल रथ को चलानेवाले सुमंत्र के साथ, मंत्रणा करने में निपुण मंत्री तथा अनुपम सेनापति, मित्रवर्ग तथा अन्य लोग व्याकुल हो चारों ओर से रो रहे थे।

शंख, पटल, शृङ्गी आदि वाद्य सब दिशाओं में उसी प्रकार बज उठे, जिस प्रकार मेघों के आश्रय बननेवाले ऊँचे प्रासादों से युक्त उस नगर की स्त्रियाँ, अपने उमड़ते नेत्रों पर हाथ से मारती हुई रो रही थीं।

घोड़े, हाथी, उज्ज्वल रथ, राजा, चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण, उस देह को लेकर, दशरथ की रानियों के साथ, स्वच्छ वीचियों से पूर्ण जल से समृद्ध सरयू नदी पर जा पहुँचे।

शास्त्रज्ञ पुरोहितों ने यथाविधि सब कर्म कराके चिता सजाई। उस पर दशरथ की देह को रखा। फिर भरत से कहा—हे वीर ! शास्त्रोक्त विधान के अनुसार तुम अपने पिता का अंतिम संस्कार पूर्ण करो।

यों कहने पर भरत पिता का अंतिम संस्कार करने के लिए प्रस्तुत हुए। उस समय उनको देखकर वसिष्ठ ने कहा—तुम्हारी माता के दुर्गुण के कारण चक्रवर्ती (दशरथ) अत्यंत पीड़ित होकर, तुमको भी त्याग कर (अर्थात्, तुम्हारे पुत्रत्व-संबंध को तोड़कर) चल बसे।