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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

२६८ कंब रामायण

हे उत्तम कुमार । मानो यह दिखाने के लिए ही कि तुम्हारे जन्म से परंपरा से आगत धर्म परिवर्तित हो गया है, तुमको त्यागकर वे मृत हुए। यह वचन सुनकर भरत मृत-से हो गये। ऐसा लगा कि वहाँ जो खडे थे, असली भरत नही थे, कोई और थे।

महान् तपस्वी यों कहकर निःश्वास भरते खडे रहे । तब, पर्वताकार कंधोवाले भरत, 'अच्छा है, अच्छा है !'—कहकर मुस्करा उठे ।

जैसे काला सर्प घोर वज्र-घोष से भीत होकर काँप उठा हो, उसी प्रकार भरत काँपकर धरती पर गिर पडे । उनका मन बडी व्याकुलता से तड़प उठा । उनके हृदय का दुःख रोकने पर भी न रुकता था । वे आँसू बहाते हुए कहने लगे—

मृतक-सस्कार करने का अधिकार मुझे नही था । ऐसा मै क्या राज्य का शासन करने की योग्यता रखता हूँ ? सूर्यकुल मे उत्पन्न मेरे पिता से पूर्व उत्पन्न राजाओ मे मुझ से बढकर कीर्त्तिमान् कौन हुए ?

हे कमलभव ( ब्रह्मा ) के पुत्र ( वसिष्ठ ) ! मेरे पूर्वज दोषरहित, धर्म के अप्रतिकूल मार्ग पर चलकर स्वर्ग मे गये । पर मै तो अपने बालकपन मे ही व्यर्थ जीवन धारण करने-वाला हो गया हूँ । हाय !

मै घने पत्तो से युक्त प्रसिद्ध केतकी-पुष्पो के मध्य स्थित रहकर निस्सार तथा गधहीन वस्तु के समान हो गया हूँ । मुझे जन्म देनेवाली मेरी जननी ने मेरा जो उपकार किया है, वह ( उपकार ) भी कैसा है ।

चारों वेदों मे प्रतिपादित विधान के अनुसार सब कार्य कराने मे समर्थ वसिष्ठ उपर्युक्त प्रकार से कहकर दुःखी हो खडे रहनेवाले, पुष्पमाला-भूषित भरत के अनुज (शत्रुघ्न) के द्वारा उस समय यथाविधि प्रेत-सस्कार कराया । १

उत्तम पुष्पलता-सदृश राजपत्नियों अपने हार, आभरण तथा लचकनेवाली कटि के चमकते हुए, इस प्रकार चिता की अग्नि में प्रविष्ट हुईं, जिस प्रकार पर्वत-कंदरा मे निवास करनेवाले कलापियो का समुदाय पत्रहीन कमल पुष्पो से भरे जलाशय मे प्रविष्ट हुआ हो । ( भाव है, प्रधान महिषी कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा इनके अतिरिक्त अन्य सब पत्नियो ने सहगमन किया ) ।

उन स्त्रियो के वदन कमल-पुष्प तथा चन्द्र के समान शोभायमान हो रहे थे । चिता की अग्नि, उनके पति ( दशरथ ) का देह-स्पर्श करके अत्यत शीतल लग रही थी । वे राज-पत्नियों मन की पीडा से रहित होकर, पति के साथ सहगमन करनेवाली नारियों की सद्गति को प्राप्त हुईं ।

इसके पश्चात् भरत ने शत्रुघ्न के द्वारा पिता के सब सस्कार कराये । फिर, माता के क्रूर कृत्य के कारण क्षत्रियोचित जीवन से वंचित होकर उपमाहीन शोक-रूपी समुद्र के साथ अपने निवास मे जा पहुँचे ।


१. राजा दशरथ ने कहा था कि कैकेयी को मै त्याग देता हूँ, भरत को भी मै अपना पुत्र नही मानता । इसी कारण से वसिष्ठ मुनि ने शत्रुघ्न से दशरथ का अग्नि-सस्कार कराया ।—अनु०

अयोध्याकाण्ड २६१

चक्रवर्त्ती के कुमार ने दस दिन तक किये जानेवाले पितृकर्म को, एक-एक दिन को एक-एक युग के समान व्यतीत करते हुए तथा अत्यन्त वेदना के साथ, शास्त्रोक्त विधान से पूर्ण किया।

सब पितृ-संस्कार पूर्ण कराके, अपने कार्य-भार से मुक्त होकर महान् तपस्वी वसिष्ठ त्रिसूत्रयुक्त यज्ञोपवीत से शोभायमान ब्राह्मणो के द्वारा अनुसृत होते हुए, विजयी भाले को धारण करनेवाले भरत के निकट पहुँचे।

कुल-क्रमागत मंत्री यह विचार कर कि बिना राजा के राज्य का रहना उचित नहीं है, भरत को राजा बनाने का दृढ निश्चय करके, उस राज्य के बडे ज्ञानवान् लोगों को साथ लेकर आये। ( १—१४५ )

अध्याय १०

वन-प्रस्थान पटल

मन्त्रणा-कुशल मंत्री (भरत के प्रति) प्रेम से भरे हृदय के साथ यह सोचते हुए कि परम्परा से प्राप्त वेदों को अधिगत करनेवाले तथा तपस्या के सब तत्त्वों को जाननेवाले वसिष्ठ उस राजसभा में उपस्थित हैं, शीघ्र सभा मे आ पहुँचे और भरत को नमस्कार किया।

तपस्या के प्रभाव से गगन मे भी संचरण करने की शक्ति रखनेवाले मुनियो के साथ मंत्री, नगर के लोग, सेनापति, राजा तथा सब बुद्धिमान् एवं विवेकी पुरुष, सुन्दर वीर (भरत) को यथाक्रम घेरकर बैठ गये।

जब सब लोग इस प्रकार बैठे हुए थे, तब ज्ञानी तथा रथ चलाने मे दक्ष सुमन्त्र ने विजयी चक्रवर्ती के कुमार (भरत) को अपने मन के विचार सूचित करने के उद्देश्य से सर्वज्ञ मुनिवर (वसिष्ठ) के मुख की ओर देखा।

तपस्वी वसिष्ठ ने सुमन्त्र के अपनी ओर देखने से, वचनों के बिना ही, उसके मन के आशय को जान लिया। फिर चक्रवर्ती के कुमार से बोले—राज्य की रक्षा करो। यही तुम्हारा कर्त्तव्य है।

(वसिष्ठ ने भरत से कहा—) हे दोष-रहित ! गुणवान्, वेदज्ञ, अपूर्व तपस्या-सपन्न, वृद्ध, नरेश आदि जो तुम्हारे पास आये हैं, इनके आगमन का प्रयोजन यही है कि नीति तथा धर्म को स्थिर बनायें (और उसके लिए तुम्हे राजा बनाये)। तुम इस बात को अपने मन मे समझ लो।

धर्म नामक अनुपम वस्तु का सबसे आचरण कराना तथा उसको स्थापित करना कठिन कार्य है। हे तात ! तुम इस विषय को भली भाँति समझ लो। यह धर्म इहलोक ओर परलोक—दोनो को प्रदान करनेवाला है। स्वच्छ चित्तवाले ही इसका पालन कर सकते हैं।

२७० | कंब रामायण

विचार करने पर विदित होता है कि कटि में दृढ़ करवाल धारण करनेवाले राजा के अभाव में यह संसार सब की इच्छा के पात्र सूर्य से विहीन दिन-जैसा होता है; नक्षत्रों से घिरे हुए चंद्र से विहीन रात्रि-जैसी होती है तथा अपने अंतर में प्राणों से विहीन शरीर-जैसा होता है।

देवलोक में अत्याचार करनेवाले बलवान् असुरों के देश में, तथा लोक कहलाने-वाले सब प्रदेशों में, रक्षा करनेवाले राजा के बिना कोई कार्य नहीं होता है। यह हम देखते हैं।

उचित रीति से विचार करने पर विदित होता है कि ब्रह्मा के द्वारा बनाये गये धरती तथा स्वर्ग में निवास करनेवाले जंगम तथा स्थावर पदार्थ कभी शासक बिना नहीं रहते।

कमलभव ब्रह्मा से लेकर सब पुण्य पुरुषों ने जिस वंश की प्रशंसा की है, ऐसे (तुम्हारे) वंश के लोगों ने अबतक इस संसार की रक्षा की है। अब ऐसे रक्षक के अभाव में यह संसार, उज्ज्वल समुद्र में टूटी हुई नौका के समान हो गया है।

हे तात ! तुम्हारे पिता स्वर्ग सिधारे। तुम्हारे ज्येष्ठ भ्राता राज्य छोड़कर चले गये। अनन्त वैभव से युक्त यह विशाल राज्य तुम्हारी माता के वर से तुम्हें मिला है, इस राज्य पर तुम शासन करो। यही हमारी सलाह है—यों वसिष्ठ ने कहा।

ज्यों ही मुनिवर वसिष्ठ ने कहा कि इस राज्य पर तुम शासन करो, त्यों ही भरत अपने नेत्रों से निर्झर के समान अश्रुधारा बहाते हुए, 'विष खाओ' कहने से भयभीत होकर काँपनेवाले से भी अधिक भीत होकर काँप उठे।

(वसिष्ठ के वचन सुनकर) भरत का मन काँप उठा। कंठ गद्गद हो उठा। नयन मुकुलित हो गये। स्त्रियों के जैसे ही उनका हृदय द्रवित हो उठा। उनके प्राण व्याकुल हुए। कुछ काल यों मूर्च्छित रहने के बाद जब उनमें संज्ञा आई, तब वे उस सभा में स्थित लोगों से अपने विचार कहने लगे—

तीनों लोकों के आदिकारण बने हुए, मेरे ज्येष्ठ भ्राता बनकर उत्पन्न हुए (श्रीराम) के रहते हुए मैं राज्य करूँ। अहो! यह श्रेष्ठ पुरुषों का धर्मोपदेश हो गया। फिर तो अब मेरी जननी के कार्य में भी कोई दोष नहीं रहा।

क्रूरता से युक्त मेरी जननी ने जो कार्य किया, उसके बारे में, सदाचार में निरत आपलोग कहते हैं कि यह उचित है। क्या इस समय, कृतयुग के पश्चात् आनेवाले दोनों युग (द्वापर और त्रेता युग) व्यतीत होकर अंतिम युग (कलियुग) ही आ गया है?

कमलभव ब्रह्मा के सब लोकों में क्या कहीं भी बड़े भाई के रहते हुए छोटा भाई यथाविधि राज्य का शासन करता है?—राजसभा में रहनेवाले आपलोग ही बतायें।

कदाचित् आपलोग इस कार्य को न्याय-संगत भी प्रमाणित कर दें, तो भी मैं इस संसार के प्राणियों के शासन-भार को वहन करता हुआ जीवित नहीं रहूँगा। किन्तु, मैं उनको (अर्थात् - राम को) ले आऊँगा और पुष्पमाला-भूषित किरीट, आदि काल से आगत नीति के अनुसार, उन्हीं को पहनाऊँगा। यह आप देखेंगे।

अयोध्याकाण्ड २७१

यदि मैं उन (राम) को नहीं ले आ सकूँगा, तो दुर्गम अरण्य में रहकर यथाविधि कठोर तपस्या करूँगा। यदि और कोई बात कहकर आपलोग मुझे विवश करने का प्रयत्न करेंगे, तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगा—इस प्रकार भरत ने कहा।

महिमा में श्रेष्ठ चक्रवर्त्ती (दशरथ) जीवित रहते समय भी प्रभु (राम) ने रत्नमय किरीट को धारण करना स्वीकार किया। किन्तु, हे उत्तमशील भरत ! तुम तो, पिता के स्वर्ग-गमन के कारण प्राप्त हुए राज्य को भी अस्वीकार कर रहे हो। राजकुल के पुत्रों में तुम्हारे समान (त्यागी) कौन है ?

आज्ञा-चक्र प्रवर्त्तित करना (अर्थात्, न्याय-पूर्ण शासन करना), धर्म की रक्षा करना, यज्ञ करना—इनके द्वारा तुम्हें अपना यश बढ़ाना आवश्यक नहीं है। चतुर्दश भुवन मिट जाने पर भी तुम्हारा बड़ा यश शाश्वत रहेगा—इस प्रकार कहकर उन सभासदों ने भरत को आशीर्वाद दिये।

भरत ने अपने अनुज (शत्रुघ्न) को बुलाकर कहा—मेघ-गर्जन के समान नगाड़े की ध्वनि करके, यह घोषणा कराओ कि इस राज्य के धार्मिक प्रभु (राम) को हम लौटा ले आनेवाले हैं और सारी सेना को यात्रा के लिए तैयार करो।

सद्गुण भरत की आज्ञा से शत्रुघ्न ने वैसी घोषणा करा दी, तब दुःख में डूबे हुए उस विशाल नगर के लोग यों आनन्द-घोष कर उठे कि मानो उनके प्राणहीन शरीरों पर वचनरूपी अमृत छिड़क दिया गया हो।

‘रामचन्द्र स्वर्णमुकुट धारण करनेवाले हैं’—यह घोषणा होते ही पंचेन्द्रियों का दमन करनेवाले मुनियों से लेकर सभी लोग महान् आनन्द से भर गये। (रामचन्द्र को लौटा लाने की) वह समाचार कानों के लिए दिव्य अमृत ही था।

‘भरत अपने ज्येष्ठ भ्राता को ध्वजाओं से अलंकृत नगर में ले आनेवाले हैं, उनको ले आने के लिए सेनाएँ भी जायेंगी’—नगाड़े बजा-बजाकर इस प्रकार की जो घोषणा की जा रही थी, वह उस वैभवपूर्ण अयोध्या नामक महा-समुद्र में चंद्र के उदय होने के समान थी।

वह बड़ी सेना युगान्त में उमड़नेवाले सप्त समुद्रों के समान उमड़ उठी और घोर शब्द करती हुई आगे बढ़ चली। उसमें कैकेयी की कामना समूल विनष्ट हो गई। नगर के लोग भी प्रेम से उमड़ उठे और उनका (रामचंद्र के वियोग से उत्पन्न) दुःख मिट गया।

अलंकारों से सजे हुए घोड़े, हाथी और रथ, धरती को ढककर छा गये। सेना की अत्युन्नत ध्वजाएँ आकाश-तल को ढककर छा गईं। ऊपर उठी हुई धूल कमलभव ब्रह्मा के भी नयनों को ढककर उन्हें अंधा बनाने लगी।

इन्द्रदेव जिस समय इस सृष्टि का अंत करता है, उस समय उठनेवाली ध्वनि से भी अधिक (भयंकर) ध्वनि उत्पन्न हुई। अकलंक रामचन्द्र के दर्शन करने के लिए उठनेवाली उमंग से भी अधिक उल्लसित होकर वह विशाल सेना उमड़ने लगी।

उस सेना का एक अति विशाल सूँड़वाला हाथी अपनी हथिनी के साथ इस प्रकार जा रहा था, मानो राज्य के जैसे ही उस नगर का त्याग कर विविध वृक्षों से

२७२ || कम्ब रामायण

पूर्ण अरण्य की ओर सीता नामक लता को साथ लिये हुए रामचन्द्र-रूपी मेघ ही जा रहा हो।

कीचड मे उत्पन्न होनेवाले कमल-पुष्प भी जिनके सामने शोभाहीन हो जाये, जैसे मृदु चरणो से युक्त कन्याओ के साथ छोटी हथिनियाँ स्पर्धा करने लगी थी, किन्तु कदाचित् उन सुकुमारियो की मृदुगति से हारकर ही मानो वे (हथिनियाँ) उन सुन्दरियों को ढोये हुए जा रही थी।

वे दीर्घ ध्वजाएँ, जो मेघो के जल-बिदुओं से इस प्रकार सिंचित हो रही कि पीडादायक सूर्य-किरण भी उन (ध्वजाओ) से शीतल हो जाती थी, विजयमाला-भूषित धनुर्धारी राम के राज्याभिषेक का दर्शन न पाने से दुःखी हुई स्त्रियो के समान काँप रही थी।

असंख्य राजा लोग हाथियों पर आरूढ होकर इस प्रकार जा रहे थे, जैसे महिमामय उष्ण किरणो से युक्त सूर्य, असख्य रूप लेकर, अपने ऊपर धवल चन्द्रमा को (छत्र के रूप मे) धारण किये, मेघो पर आरूढ होकर, धरती पर उतरा हो और एक दिशा मे जा रहा हो।

एक समुद्र रथो पर जा रहा था। दूसरा समुद्र लाल चित्तियो से युक्त मुखवाले, मेघ-समान हाथियो पर जा रहा था। अन्य एक काला समुद्र सुन्दर घोडो पर जा रहा था और पदाति सेना-रूपी समुद्र धरती पर सर्वत्र छा गया था।

‘तारे’ (एक वाद्य), ताल, शख, शृङ्गी, चर्म से आवृत्त ‘पवे’ (नामक एक वाद्य), डमरू, भेरी तथा अन्य वाद्य भी उसी प्रकार मौन होकर जा रहे थे, जैसे मूर्खो के समुदाय में ज्ञानी पुरुष (मौन) रहते हैं।

चिरस्थायी लज्जा के अतिरिक्त शरीर से अन्य आभरणो को भी दूर किये हुए तथा अप्सराओ की भ्रान्ति उत्पन्न करनेवाली अति सुन्दरी स्त्रियाँ ऐसी लगती थीं, जैसी, पुष्पो के झड जाने पर, लताएँ हों।

उस सेना मे, गरजते समुद्र से घिरी सारी पृथ्वी का शासन करनेवाले (चक्रवर्ती दशरथ) का परपरा-प्राप्त श्वेतच्छत्र नही था। इसलिए वह सेना, अनेक छोटे-छोटे श्वेतच्छत्र-रूपी नक्षत्रो से युक्त होकर भी कलाओ से पूर्ण चन्द्रमा से रहित रात्रि के समान लगती थी।

वह सेना अपने विस्तार से दिशाओ को बहुत छोटी बना रही थी, ऐसी सेना को जब वह पृथ्वी वहन कर रही थी, तब गरजते समुद्र से आवृत्त इस भूमि को एक ‘स्त्री’ कहना क्या सत्य कथन हो सकता है ?

उन नारियों के, शीतल चन्दन, अगरु आदि से शून्य, कुकुम-लेप से रहित तथा मुक्ता-मालाओं से हीन, (प्रतिक्षण) बढनेवाले मृदुल स्तन किसी भी प्रसाधन से रहित होकर नारिकेल वृक्ष पर लगे हुए कोमल नारिकेल फलो के समान लगते थे।

यौवन से पूर्ण अपनी पत्नियो के स्तनो पर के चन्दन-लेप (के चिह्न) एव सुगन्धित पुष्प-मालाओं से शून्य (पुष्पो के) उन्नत कवे, घने लता-कुंजो तथा घाटी से शून्य पर्वतों के समान लगते थे।

सुगन्ध के सस्कार से शून्य केशोवाली नारियों की, नित्य के शृङ्गार अब न किये

अयोध्याकाण्ड २७३

जाने के कारण, अञ्जन से अनलंकृत आँखें, युद्ध की समाप्ति पर रक्त को धो देने के पश्चात् यम के करवाल जैसी लग रही थी ।

नारियों के जघन-तट, मेखला की मणियो की झनझनाहट से शून्य होकर, घटियो से रहित रथो के समान लगते थे । भ्रमरो से शून्य कमल-पुष्पो के समान ही उन नारियों के अरुण पद भी नूपुर की ध्वनि से शून्य थे ।

नारियों की लचकनेवाली कटियाँ, पहनने योग्य मुक्ताहार आदि के न पहनने से, अब एक प्रकार (बोझ ढोने के काम) से विश्राम पाकर रहती थी, मानो कैकेयी को जो वर दिये गये थे, वे इन नारियों की कटि के लिए ही फलीभूत हुए हो ।

रामचन्द्र के वन चले जाने से शोभाहीन होकर कमल में निवास करनेवाली लक्ष्मी भी तपस्या करने लगी हो तथा मन्मथ भी अपार दुःख-सागर मे डूब गया हो—इसी प्रकार वह सेना भी शोभाहीन और विनोद एव हर्ष से रहित थी ।$^१$

‘वह सेना-भूमि, आकाश, प्रकाशमान दिशाएँ, इन सबको निगलने के लिए उमड़े हुए प्रलयकालिक समुद्र के समान थी’—ऐसा कहना क्या पर्याप्त होगा ? उसकी संख्या का विचार करें, तो यह ज्ञात होगा कि वह सृष्टिकर्त्ता की दृष्टि तथा मन से भी अधिक विशाल थी ।

वीचियो से भरे समस्त विशाल नदियो का जल, वह (सेना) पी सकती थी । वीचियो से भरे समुद्र के सारे जल को वह (सेना) पी सकती थी । वह धरती का संतुलन बनाये रखती थी । ऊँचे उठे हुए पर्वतों को भी अपने पद-भार से धरती मे दबा सकती थी । अतः, वह सेना द्रविड-महर्षि (अर्थात्, अगस्त्य) की समता करती थी ।

वह अयोध्या नगर आबालवृद्ध सब लोगों के तथा समस्त सेना के निकल जाने के कारण, अगस्त्य मुनि के द्वारा समस्त जल के पिये जाने पर समुद्र जैसा लगता था, वैसा ही शून्यता से भराहुआ पड़ा था ।

वह सेना, बड़ी वीचियो से भरी नदियों, खेतो, मनोहर वृक्षो, पर्वतो तथा सैकत श्रेणियो को देखती हुई, मार्ग पर जा रही थी । उस समय वह मार्ग अयोध्या की उस वीथी के समान लगता था, जिसकी सफाई नहीं की गई हो ।

मेघ के समान अति क्रोधी मत्त गजो के मदजल की गध के अतिरिक्त, उस सेना मे, पुष्प, चन्दन या अन्य कुंकुम-लेप आदि, किसी प्रकार की गध नही थी ।

जिस विशाल समुद्र को लोग बड़ी-बड़ी नौकाओ से पार करते है, उस (समुद्र) से भी विशाल उस सेना-रूपी समुद्र मे, उज्ज्वल ललाटवाली सुन्दरियों की कटि के अतिरिक्त, कंधे तक लटकनेवाले कुंडल या अन्य कोई आभरण प्रकाशमान विद्युत् केसमान नही चमक रहा था ।

सुन्दर मर्दल आदि वाद्यों की ध्वनि से हीन होकर चलनेवाली वह सेना विशाल भित्ति पर अंकित सेना के चित्र के समान लगती थी ।


१. वैभव की देवी लक्ष्मी हैं, और स्त्री-पुरुषों की क्रीडाओ का कारण मन्मथ का प्रभाव है। अब लक्ष्मी और मन्मथ के अपने-अपने कार्यों से विरत हो जाने से, उस सेना में न पुराना वैभव था, न स्त्री-पुरुषो की विनोद-क्रीड़ाएँ ही थी।—अनु०

२७४ | कंब रामायण

विष्णु (के अवतारभूत राम) का वन-गमन भी क्या था ?—अयोध्या के युवकों के लिए, प्रफुल्ल पुष्पों की माला से विभूषित सुन्दरियों के कटाक्ष-रूपी बाण उन (पुरुषों) के हृदयों को छेदकर उनके प्राणों को पी न डाले—इसके लिए अपूर्व कवच बन गया था।

मन्मथ के पाँच बाणों से पीडित होनेवाले पुरुषों के हृदय अब पहले की तरह युवतियों के स्तनों पर आसक्त नहीं होते थे। स्वर्णमय कर्णाभरण से भूषित कैकेयी के प्रति उन (पुरुषों) के मन में जो क्रोधाग्नि उत्पन्न हुई थी, वह (दृष्टि के द्वारा प्रकट होकर) युवतियों के स्तनों को कहीं जला न डालें मानो यह सोचकर ही, उन पुरुषों की दृष्टि उनपर से हट गई थी।

इस प्रकार वह विशाल सेना जा रही थी। महिमा से पूर्ण भरत भी, अपनी सुन्दर कटि में वल्कल पहनकर अपने अनुज (शत्रुघ्न) से अनुसृत होते हुए, एक सुन्दर रथ पर बड़ी व्यथा के साथ बैठकर जाने लगे।

माताओं, तपस्वियों, पितृ-समान गौरव के योग्य वृद्ध मन्त्रिगण, असंख्य वधूगण, पवित्र स्वभाववाले ब्राह्मण-वर्ग—इन सब से अनुसृत होते हुए भरत अयोध्या-नगर के बहिर्भाग पर जा पहुंचे।

उस समय मन्थरा नामक उस यम (रूपिणी दासी) को भी चलनेवाले लोगों के मध्य धक्कामधुक्की करते हुए जाते देखकर शत्रुघ्न का क्रोध भड़क उठा और उन्होंने वेग से दौड़कर, गरजते हुए उसे पकड़कर झकझोरा। तब मनोहर कंधोंवाले भरत ने अपने अनुज को रोककर कहा—

कुल-परम्परा को तोड़कर अपनी कामना को पूर्ण करनेवाली माता को मैं टुकड़े-टुकड़े करके अपना क्रोध शान्त कर सकता था। किन्तु हे तात ! वैसा करने पर मुझे मेरे प्रभु (राम) त्याग देंगे—इसी विचार से चुप रह गया। मैंने उसे अपनी माता नहीं समझा।

अतः, हे दोषहीन सद्-अर्थों के प्रतिपादक शास्त्रों के ज्ञाता ! यद्यपि हम इस कुबड़ी से रुष्ट हैं, तो भी प्रभु हमारा यह कार्य पसन्द नहीं करेंगे। अतः इसे छोड़कर हम आगे बढ़ें। यों कहकर कठिनाई से शत्रुघ्न को समझाते हुए उन्हें अपने साथ लेकर वे आगे बढ़े।

समुद्र-जैसी उमड़ती हुई गज आदि की सेना तथा पदाति-सेना के साथ भरत उसी उपवन में जाकर ठहरे, जिसमें पहले (वन-गमन के समय) प्रभु (राम) अपनी पत्नी तथा सिंह-समान भाई के साथ ठहरे थे।

भरत उस रात्रि को, अपने नेत्रों से अश्रुजल का प्रवाह करते हुए ठहरे और पर्वत में उत्पन्न कन्द-फल आदि का आहार किया। धनुर्धारी रामचन्द्र ने जिस स्थान में विश्राम किया था, वही धूल पर घास बिछाकर भरत भी पड़े रहे।

पादपद्मवान् रामचन्द्र उस स्थान से पैदल ही मार्ग तय करते हुए गये थे। इस कारण से भरत भी वहाँ से पैदल ही चले और सारी अश्वों तथा गजों की सेना उनके पीछे-पीछे चली (१-५६)

अध्याय ११

गुह पटल

मनोहर, स्वर्ण-निर्मित वीर-कंकण से भूषित तथा अनुपम सेना-वाहिनी से युक्त भरत, कावेरी नदी से सिंचित चोल देश की समता करनेवाले और उपजाऊ खेतों से भरे कोशल देश को छोड़कर गंगा नदी के तीर पर ऐसे दुःख के साथ आ पहुँचे कि उनको देख-कर स्थावर और जंगम—सब वस्तुएँ द्रवित हो उठीं।

उनकी सेवा में स्थित मत्त गजों का मद-जल अपार जल से पूर्ण गंगा में सर्वत्र बह चला, जिस कारण से वह गंगा-प्रवाह, असंख्य भ्रमरों के अतिरिक्त अन्य प्राणियों के पीने या स्नान करने के अनुपयुक्त हो गया।

उनकी सेना में स्थित अश्वों के खुरों से उठी हुई धूल उड़कर देवताओं के शिरों पर किस प्रकार छा गई, यह हम समझ नहीं सके। वे (अश्व) पानी पीते समय दीर्घकाल तक पानी पीते रहते और फिर लंबी श्वास छोड़ते, जल में उतरकर तैरते और धूल पर लोट जाते थे।

(पहले) गंगा का प्रवाह दूध के रंग से युक्त होकर गरजते हुए समुद्र में जा मिलता था, किन्तु अब वह पहले जैसे रंग से नहीं बह रहा था; क्योंकि पुष्पमाला से भूषित दीर्घ किरीटधारी भरत की सेना-रूपी समुद्र ने उस (गंगा के जल) को पी लिया था।

वन को गये हुए वीर (राम) का अनुसरण करके जानेवाले भरत के पीछे-पीछे जो सेना उस समय जा रही थी, वह साठ सहस्र अक्षौहिणी परिमाण की थी।

जब वह सेना गंगा के (उत्तरी) किनारे पर पहुँची, तब गुह उसे देखकर और यह सोचकर कि यह विशाल समुद्र के जल से भरे मेघ-समान प्रभु (राम) से युद्ध करने के लिए ही जा रही है, अत्यन्त क्रोध से भर गया।

गुह नामक यम-सदृश उस पराक्रमी व्यक्ति ने आकाश तक उड़नेवाली धूल से उस सेना की संख्या का अनुमान कर लिया। तब उस (गुह) की आँखों से चिनगारियाँ निकलीं। नासिका से धुआँ उठा। वह अट्टहास कर उठा। उसकी भौंहें ऐसे झुक गईं, जैसे युद्ध के उपयुक्त धनुष हों।

पाप करनेवाले सब प्राणियों के प्राणों का अंत करनेवाले, अपने कर में त्रिशूल धारण करनेवाले यम ने ही मानो पाँच लाख वीरों के रूप धारण किये हों—इस प्रकार के थे उस (गुह) की सेना के वीर। वह (गुह) धनुर्विद्या में निपुण था।

उस (गुह) ने अपनी कटि में कटार बाँध रखी थी। अपने ओंठ चबा रहा था। कठोर शब्द कह रहा था; उसकी घूरनेवाली आँखों से अग्नि-कण निकल रहे थे। उसकी सेना में डमरू बज रहे थे, शृङ्गी बज रहे थे और उसकी भुजाएँ यह सोचकर कि अब मुझे युद्ध करने का मौका मिला है (हर्ष से) फूल उठी थीं।

उस (गुह) ने यह कहते हुए कि 'यह सेना चूहों का झुंड है और मैं उनके लिए

२७६ | कंब रामायण

विषधर सर्प हूँ'—बड़े कोलाहल से भरी अपनी सेना को पुकारा। वह सेना ऐसी थी, मानो तीक्ष्ण नखोंवाले समस्त घोर व्याघ्रों को एकत्र कर दिया गया हो।

बड़े कोलाहल से भरे और प्रलय-काल में गरजनेवाले मेघ तथा काले समुद्र ही उमड़ आये हों—इस प्रकार उमड़कर आनेवाली अपनी सेना को लेकर वह (गुह), समीप-स्थित (गंगा के) दक्षिणी तट पर आ पहुँचा।

अपने सैनिकों को देखकर गुह ने कहा—मैंने इस षड्यंत्रकारी सेना को वीर-स्वर्ग पहुँचाने तथा अपने प्यारे मित्र (राम) को महिमामय महान् राज्य देने का निश्चय किया है। तुम सब सहमत हो न ?

गुह ने फिर आज्ञा दी—पटहों को बजाओ। रास्तों तथा घाटों को सर्वत्र मिटा दो। एक भी नाव न चलाओ। सुगंध से पूर्ण गंगा-तट पर आनेवाले इन (भरत के) सैनिकों को पकड़ लो और काट डालो।

गुह ने आगे कहा—मेरे प्राणों के नायक, अंजनवर्ण प्रभु (राम) को राज्य से वंचित करके स्वयं (राज्य) लेनेवाले ये राजा यहाँ भी आ पहुँचे, हमारे अग्नि बरसानेवाले तीक्ष्ण बाण क्या इन लोगों पर नहीं चलेंगे? यदि ये मुझसे बचकर चले जायँगे, तो क्या संसार मुझे कुत्ता नहीं कहेगा?

क्या ये (भरत आदि), गंभीर विशाल और वीचियों से भरी इस (गंगा) नदी को पार करके जा सकेंगे? क्या मैं ऐसा धनुर्धर हूँ कि इनकी बड़ी गज-सेना को देखकर (डर से) भाग जाऊँगा? उन (राम) ने मुझ से मित्रता की जो बात कही थी, वह भी तो एक बात थी—(अर्थात्, राम का वह वचन आदरणीय है और मुझे मित्रधर्म का पालन करना है। यदि मित्रधर्म का पालन न करूँ, तो) क्या लोग मेरी निंदा यह कहकर नहीं करेंगे कि यह क्षुद्र निषाद मरा क्यों नहीं?

आह! इस (भरत) ने यह नहीं सोचा कि वे (राम) हमारे ज्येष्ठ भ्राता हैं। यह भी नहीं सोचा कि उनके साथ अति बलिष्ठ व्याघ्र-समान उनका भाई भी है। यदि उन्होंने ये बातें न सोची हों, तो न सही, किन्तु इसने मेरी उपेक्षा कैसे की? जो हो, इसका पराक्रम इस सीमा को पार करने पर ही तो ज्ञात होगा। क्या निषादों के द्वारा प्रयुक्त बाण गजाओं के वक्ष में नहीं लगते ?

क्या धरती पर राज्य करनेवाले ये क्षत्रिय, पाप, स्थिर रहनेवाला अपयश, शत्रु, मित्र (दूसरों को) दुःख देनेवाले कार्य—इनके बारे में विचार नहीं करते? जो हो, सो हो, मेरे अपूर्व प्राण-तुल्य मित्र (राम) पर इनका आक्रमण तभी तो हो सकता है, जब ये अपनी सेना तथा अपने प्राणों को (हम से बचाकर) अपने साथ ले जा सकें।

जब मेरे प्रिय मित्र (राम) अपूर्व तपस्या कर रहे हों, तब क्या यह (भरत) पृथ्वी का राज्य कर सकता है? (हमारे लिए) अपने प्राण कुछ अमर तो नहीं हैं? (भरत से युद्ध करके यदि मरना भी पड़े, तो) बड़ा यश पाकर मरूँगा। मेरे प्रति गंभीर प्रेम रखने-वाले प्रभु के साथ मैं जो वन में नहीं गया और यहीं रह गया, वह भी अच्छा ही हुआ। अब मैं अपना कर्तव्य पूरा करूँगा।

अयोध्याकाण्ड २७७

हाथियो और घोड़ो से भरी सेना से युक्त तथा सुगन्धित पुष्पमाला से भूषित इन ( भरत ) का शस्त्र-पराक्रम तो गंगा को पार करने के पश्चात् ही काम आयगा न १ तुम सब उग्र व्याघ्र यहाँ रहते हो। गंगा के घाटो पर नाव चलाना छोड़ दो। ( यदि आज हमे मरना भी पड़े, तो ) हमारे प्रभु ( राम ) से पहले ही ( युद्ध मे ) अपने प्राण छोड़ देना उचित ही तो होगा १

हमारे साथ आई हुई सेना के साथ एक बार युद्ध के लिए भी यह ( भरत की ) सेना पर्याप्त नही है, यह कहना अनावश्यक है। यदि देवताओ की सेना भी ( हमारे विरुद्ध ) आवे, तो भी हम अपने धनुष-रूपी काल-मेघो से शरो की वर्षा करके उनकी ( चिर स्थिर ) आँखो ( पलको ) को हिला देगे और करवाल से मारी गज-सेना को विध्वस्त कर देंगे। इस प्रकार, सबको अस्त-व्यस्त करके हरा देगे।

उस दिन (जब राम के राज्याभिषेक का निश्चय हुआ था) उदार, दानशील तथा मेरे प्रेम के पात्र प्रभु के पहनने के लिए जिस क्रूर कैकेयी ने वल्कल दिये थे, उसके इस पुत्र ( भरत ) की सेना को अपने शरीर से निहत करूँगा। चर्बी से भरे शवो की राशि को यह गगा नदी बहा ले जायगी और लहरो से भरी विशाल समुद्र मे डालकर उस समुद्र को पाट देगी।

'निषादो ने फहरानेवाली पताकाओ से युक्त (भरत की) सेना को विध्वस्त करके धर्मरूपी राम को ही शासन करने के लिए राज्य दे दिया'—ऐसा यश क्या हम नही पायेंगे। जिन प्रभु ( राम) ने अपना राज्य तक भरत को दे दिया था, वही भरत आज हमारे निवास-भूत इस अरण्य को भी देना नही चाहता और देखो, यहाँ भी चढ़ाई करने आया है।

'महान् तपस्वियो के बंधु होकर अरण्य मे निवास करनेवाले प्रभु ( राम ) क्रोध करेंगे'—यह विचार न करके यदि हम युद्ध-क्षेत्र मे इस ( भरत ) पर शर प्रयुक्त करेंगे, तो चाहे यह सेना सप्त समुद्रो के समान ही क्यो न हो, तो भी हम इसे उसी प्रकार मिटा देंगे, जिस प्रकार गाय अपने सामने की छोटी और कोमल घास को चबा डालती है।

दृढ तथा बड़े धनुष से युक्त, मल्ल-युद्ध मे निपुण भुजाओ से युक्त तथा युद्ध मे प्रवीण प्रभु ( राम ) के प्रति भक्ति से पूर्ण गुह ने लोहे के जैसे शरीरवाले अपने साथियो के प्रति ये वचन कहे। उसको वहाँ खड़े देखकर, दृढ रथ को चलानेवाले सुमंत्र ने सिह-समान बली भरत के निकट आकर कहा—

यह गंगा के दोनो तटों का नायक है। असंख्य नावों का स्वामी है। तुम्हारे वश मे उत्पन्न अनुपम पुरुष राम का प्राणप्रिय मित्र है। उन्नत भुजाओवाला ( वीर ) है, मल्ल-गज-तुल्य है। धनुर्धारी सेना-युक्त है। मधुस्रावी प्रफुल्ल पुष्पो की माला से भूषित है। इसका नाम गुह है।

हे बल की सीमा को देखनेवाली मनोहर तथा दीर्घ भुजाओ से युक्त ! हे नील-मेघ-सदृश नीलवर्ण ! यह पर्वत के जैसे दृढता से पूर्ण है। ( राम के प्रति ) असीम प्रेम से पूर्ण है। देखने मे, रात्रि की जैसी सुन्दर देह-काति से पूर्ण है। ऐसा यह हमारे मार्ग मे सम्मुख आकर खड़ा हुआ है। तुम्हे देखने की इच्छा रखकर आया है, यो सुमंत्र ने कहा।

२७८ कंब रामायण

अपने पिता के मित्र सुमंत्र के द्वारा दूर पर अपने सामने खड़े गुह के विषय में सुनकर, कलंक-रहित भरत के मन में बड़ी उमंग उत्पन्न हुई। फिर, वे यह कहकर आगे बढ़े कि यदि यह प्रभु के आलिंगन का पात्र, प्रिय मित्र है, तो उसके यहाँ आने के पहले ही मैं स्वयं उसके पास जाकर (उससे) मिलूँगा।

यह कहकर वे उठे और अपने अनुज तथा उमड़ते हुए प्रेम के साथ गंगा के किनारे पर ऐसे जा पहुँचे, जैसे कोई पर्वत चला हो। किनारे पर आये हुए भरत को घने तथा काले केशोंवाले गुह ने देखा और उनकी दशा को पहचानकर वह चौंका।

गुह ने, वल्कल पहने हुए, धूल-भरी शरीरवाले, सुन्दर कलाहीन चंद्र-जैसे मंदहास की कांति से हीन वदनवाले तथा ऐसे शोक से पूर्ण कि जिसको देखकर पत्थर भी पिघल जाये, भरत को देखा। देखते ही उसके हाथ से धनुष खिसककर नीचे गिर पड़ा। वह व्याकुल हो उठा। स्तब्ध हो गया।

गुह ने सोचा, यह उत्तम पुरुष (भरत) मेरे प्रभु (राम) के जैसा ही लगता है। उसके पार्श्व में खड़ा हुआ कुमार (शत्रुघ्न) भी प्रभु के अनुज (लक्ष्मण) के जैसा ही है। इस (भरत) ने मुनि-वेष धारण किया है। इसके शोक की कुछ सीमा नहीं है। राम की दिशा में देखकर नमस्कार कर रहा है। अहो! क्या मेरे प्रभु के भाई कुछ दोष करनेवाले हो सकते हैं? (अर्थात्, नहीं होंगे)।

फिर गुह ने यह कहा—यह (भरत) गंभीर शोक से पीड़ित है। अचंचल प्रेम रखनेवाला है। (राम के) धारण किये मुनि-व्रत को स्वयं भी अपनाया है। मैं वहाँ जाकर इसके मनोभावों को समझकर लौट आता हूँ। तबतक तुम लोग घाटों की रक्षा करते हुए यहीं रहो और शीतल गंगा के घाट पर एकाकी ही एक नाव में बैठकर (भरत के निकट) आया।

सम्मुख (राम की दिशा में) खड़े रहकर प्रणाम करते हुए (भरत) के चरणों पर गुह नत हुआ। तब, उत्तम स्वभाववाले, सज्जनों के मन एवं शिर पर धारण किये जाने-वाले, पवित्र यशवाले तथा कमल-पुष्प पर आसीन ब्रह्मा के लिए भी वंदनीय उन (भरत) ने अपने चरणों पर पड़े (गुह) को उठाकर, (पुत्र से मिलनेवाले) पिता से भी अधिक आनंद के साथ उसका आलिंगन किया।

(भरत के द्वारा इस प्रकार) आलिंगित निषाद-पति ने, कमल-समान सुन्दर नयनोंवाले (भरत) से पूछा—हे प्रस्तर-स्तंभ-तुल्य भुजाओंवाले! किस प्रयोजन से तुम (यहाँ) आये हो? भरत ने उत्तर दिया—पृथ्वी की रक्षा करनेवाले मेरे पिता ने कुल-परंपरा के नियम का उल्लंघन किया। उस (अनियम) को दूर करने के लिए रामचन्द्र को लौटा ले जाने के उद्देश्य से मैं आया हूँ।

असत्य-रहित चित्तवाले किरातपति ने (यह वचन) सुना। सुनते ही उसने दीर्घ निःश्वास भरा। उसके मन में हर्ष उत्पन्न हुआ। उसकी देह फूल उठी। फिर, वह धरती पर गिर पड़ा और चित्र में अंकित करने के लिए दुस्साध्य रूपवाले भरत के चरण-कमलों को अपने करों से बाँधकर यह कहने लगा—

अयोध्याकाण्ड २७८

हे यशस्विन् ! ( तुम्हारी ) माता के वचन मानकर ( तुम्हारे ) पिता ने जो राज्य ( तुमको ) दिया, उसे पाप-कृत्य के समान मानकर तुमने ( उसे ) त्याग दिया और अपने मन में चिन्ता रखकर इस प्रकार यहाँ आये हो । तुम्हारे, इस समय का यह भाव देखने पर, क्या महत् रामचन्द्र भी तुम्हारी समता कर सकते हैं ?

हे उत्तम गुणशील तथा बलिष्ठ भुजाओंवाले ! मैं अज्ञ किरात तुम्हारी क्या प्रशंसा करूँ ? जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों के पुंज से अन्य ज्योतियों को मंद कर देता है, उसी प्रकार क्षत्रिय-समुदाय के द्वारा प्रशंसित तुम्हारे कुल के सब पूर्वजों की कीर्त्ति को भी तुमने अपनी कीर्त्ति में अंतर्भूत कर लिया ।

वीर-कंकण तथा मांस-गंध से युक्त शूल को धारण करनेवाले किरातपति ने इस प्रकार के उचित वचन कहकर भरत के प्रति अपना अनुपम प्रेम दिखाया । उन भरत के प्रति प्रेम न रखनेवाले भी क्या कोई हो सकते हैं ? ( रामचन्द्र के ) अचिंतनीय सद्गुणों के कारण ही तो गुह उन ( राम ) का भक्त बना था ।

करुणा के समुद्र-जैसे, सन्मार्ग पर चलनेवाले मन से युक्त भरत ने उस समय रामचन्द्र की दिशा की ओर देखकर नमस्कार किया और गुह से पूछा—हमारे ज्येष्ठ (राम) ने किस स्थान पर विश्राम किया था ? तब किरातपति ने कहा—हे वीर ! मैं ( वह स्थान ) तुम्हें दिखाऊँगा, चलो इस ओर ।

तब भरत मेघ के समान चलकर अतिशीघ्र वहाँ गये और पथरीली भूमि पर उस घास की शय्या को देखा, जिसपर रामचन्द्र ने विश्राम किया था । उसे देखते ही भरत तड़पकर गिर पड़े और अपने अश्रुजल से धरती का मंगल-स्नान कराया और शोक-समुद्र में डूब गये ।

( भरत कह उठे— ) जब मैंने यह सुना कि 'मेरे कारण तुमको यह वनवास का दुःख प्राप्त हुआ है,' तब मैंने अपने प्राण नहीं छोड़े । 'कंद और फलों को ही अमृत मानकर तुमने उनका भोजन किया'—यह सुनकर भी मैंने अपने प्राण नहीं छोड़े । 'दुःख देनेवाली घास की सेज पर तुम सोये'—यह जानकर भी मैंने प्राण नहीं छोड़े । अतः, उज्ज्वल रत्न-जटित मुकुट धारण करने के लिए भी कदाचित् मैं प्रस्तुत हो जाऊँ, तो इसमें आश्चर्य ही क्या होगा ?

स्तंभ-समान दृढ़ भुजाओंवाले भरत ने आगे कहा—यदि उन ( राम ) के विश्राम करने का स्थान यह था, तो कहो कि उनपर अत्यन्त भक्ति रखकर उनके साथ आये हुए अनुज ( लक्ष्मण ) ने कहाँ विश्राम किया ? तब किरातपति ने उत्तर दिया—

हे पर्वत-समान ऊँचे कंधोंवाले ! रात्रि के समान मनोहर वर्णवाले वे प्रभु तथा वह देवी यहाँ विश्राम करते रहे और वह वीर ( लक्ष्मण ) कर में धनुष लेकर निःश्वास भरते हुए और आँखों से अश्रु बहाते हुए रात्रि के व्यतीत होने तक, एक पलक भी मारे बिना, ( पहरे पर ) खड़े रहे ।

यह सुनकर भरत ने कहा—राम के अनुज बनकर एक समान उत्पन्न हुए हम-लोगों में से एक मैं हूँ, जो ( राम के लिए ) अपार कष्ट का कारण बना । और, एक वह

२८०कंब रामायण

(लक्ष्मण) भी है, जो मेरे उत्पादित कष्टो को दूर करने के लिए सहायक बना । अहो। प्रेम की भी कोई सीमा हो सकती है ? मेरा दासत्व भी खूब रहा ।$^१$

फिर, भरत उस रात को वही धूल पर लेटे रहे । प्रातःकाल होने पर उन्होंने गुह से कहा—शत्रु-भयंकर नाद से युक्त वीर-वलय धारण करनेवाले हे वीर ! यदि तुम इस समय हमलोगो को गगा के उस किनारे पर पहुँचा दोगे, तो तुम हमे दुःख के समुद्र से निकालकर प्रभु (राम) के पास पहुँचानेवाले हो जाओगे ।

गुह भी 'अच्छा' कहकर अपने सैनिको के निकट गया और कहा कि तुमलोग शीघ्र जाकर नौकाएँ ले आओ। तब नौकाएँ इस प्रकार आईं, मानो शिवजी का कैलास, उनके द्वारा (धनुष के रूप में) झुकाया गया स्वर्ण-पर्वत मेरु एव कुवेर का पुष्पक विमान—ये तीनो एकाकी ही रहने से लज्जित होकर अब अनेक रूप धारण करके आ गये हो ।

उस किनारे से इस किनारे पर तथा इस किनारे से उस किनारे पर लोगो को ले जाने ओर ले आने के कारण वे नौकाएँ (पुण्य-पाप-रूपी), कर्म-युगल से समान थी, जो जीवो को इस लोक से स्वर्गलोक में तथा स्वर्गलोक से इस लोक में लाते-पहुँचाते रहते हैं। युवतियो की गति एव हसो (की गति) को लजाती हुई चलनेवाली वे नौकाएँ गगा नदी में सर्वत्र फैल गई ।

तब शृङ्गवेरपुराधीश (गुह) ने भरत से कहा—हे दृढ धनुर्धारी वीर । असख्य नौकाएँ आ गई हैं। अब आप क्या करना चाहते हैं ? तब सुन्दर धनुर्धारी भरत ने सुमत्र से कहा—इस सारी सेना को शीघ्र इन नौकाओ पर चढाकर उस पार ले चलो ।

भरत की आज्ञा से, अश्व-जुते बड़े रथ को चलाने में चतुर सुमंत्र ने, क्रम को तोडे बिना, पृथक्-पृथक् वर्गों में, गजो, अश्वों, रथो तथा पदाति सेना को उस पार पहुँचाया। वह सेनावाहिनी, उज्ज्वल रत्नो को अपनी वीचियो से विखेरनेवाली गंगा नदी के दूसरे किनारे पर जा पहुँची ।

प्रलय-काल में मानो मेघो के झुड गरजते हुए समुद्र के सारे जल को भरने के लिए उमड़ आये हो, अथवा जल-नौकाएँ ऊँची ध्वजा और मस्तूल के साथ (जल में) जा रही हो—इसी प्रकार दीर्घ शुडवाले मत्तगज, अपनी सूँड़ को ऊपर उठाये हुए जल में उत्तर-कर तैरते हुए नदी को पार कर गये ।

अति विशाल हाथियो के द्वारा ढकेला जाकर गगा का जल, शख, मकर, मीन, मुक्ता तथा अन्य रत्नो को विखेरता हुआ तट को लाँघकर दक्षिण की दिशा मे उमड़ चला, जिससे (दक्षिण का) समुद्र उसके मार्ग में निकट आ गया, मानो वह गगा-प्रवाह भी रामचन्द्र के दर्शन करने की इच्छा से ही चल रहा हो ।


१. अतिम वाक्य का यह भाव ह कि प्रेम का क्रियात्मक रूप ही दासत्व है। यह वैष्णवों का सिद्धात है। वात्सल्य, दापत्य, सत्य आदि का प्रेम भी क्रिया-रूप में दास्य ही है। अत', भरत यह कहत हैं कि मै राम के प्रति प्रेम रखकर भी उनका कुछ दास्य नही कर सका, जब कि लक्ष्मण दास्योचित कार्य कर रहा है । —अनु०

अयोध्याकाण्ड २८१

( गङ्गा के प्रवाह में जब हाथी तैर रहे थे, तब ) अत्यन्त मदजल वहानेवाले मत्त-गजो के उन्नत कुंभ-मात्र ऊपर दिखाई दे रहे थे । गजो के शरीर के छिपे रहने से, तथा सुन्दर उत्तरीय-जैसी ही वीचियो के, उन कुंभो पर फहराने से, वे कुंभ ऐसे लगते थे, मानो गंगानदी-रूपी युवती के स्तन ही हो ।

रथो के चक्र, धुरी, छत, ध्वजाएँ, पीठ आदि उनके सब भाग पृथक्-पृथक् कर दिये गये । अश्व, तथा रथो के भाग, पृथक्-पृथक् नावो पर चढाये गये तथा दूसरे पार पहुँचाए गये । पुनः रथो के सब अंग जोड़े गये । वह ऐसा था, जैसे मनुष्य के शरीर के अंगों को अलग-अलग करके पुनः उन्हे जोड़नेवाली किसी विद्या के प्रभाव से उन्हें जोड़ दिया गया हो ।

जैसे दूध हो, वैसे ( उज्ज्वल ) शरीरवाले, जैसे भय ही घनीभूत हो गया हो, वैसे हृदयवाले—(अर्थात् , छोटी-सी ध्वनि से भी भड़ककर दौड़नेवाले), जैसे वायु ही घनीभूत हो गई हो, वैसी टाँगोवाले ( अति वेगगामी ) एवं लगाम लगे हुए आठ करोड़ घोडे, मीन जैसी नावो पर चढ़कर उस पार जा पहुँचे ।

कंकणो से भूषित पल्लव-समान करोवाली युवतियाँ, नावो में परस्पर मटकर और आमने सामने होकर, इस प्रकार बैठी थी कि उनके उभरे हुए स्तन परस्पर यो टकराने लगे, जैसे दीर्घ दंतोवाले मनोहर मत्तगजो के झुंड मे उनके दाँत टकरा उठे हो ।

जब वेग से चलती हुई नावें एक दूसरे से टकराकर हिल उठती थी, तब स्वर्ण-कर्णाभरणो से भूषित युवतियाँ भय से व्याकुल होकर दोनो ओर अपनी दृष्टि फेकती थी । वह दृश्य ऐसा था, मानो चञ्चल जल-तरंगो से फेके जाकर मीन घबराकर दोनो ओर उछल रहे हो ।

वेगगामी नावो के दोनो ओर खेवैयो के द्वारा चलाये जानेवाले डाँड़ो से जल-विन्दु उड़-उड़कर युवतियो के पतले वस्त्रो को भिंगो देते थे और उनके विस्तृत जघनो के आकार को प्रकट कर देते थे । वह दृश्य थके-माँदे वीरो की थकावट को मिटा देता था ।

कोलाहल भरी सेना को, इस किनारे से लेकर उस किनारे पर उतारकर खाली लौटनेवाली नावे उन बडे-बडे मेघो-जैसी लगती थी, जो ( मेघ ) समुद्र के जल को भरकर लाये हो और उसे बरसाने के पश्चात् खाली होकर समुद्र की ओर लौट रहे हो ।

अगरु-धूम के समान चुने हुए मयूर-पखों से भूषित दंड, मस्तूलो-जैसे लगत थे । मोती की लडी मे सजी हुई ध्वजाएँ, पाल-जैसी लगती थी । यो वे नावें विशाल जल-नौकाओ की समता करती थी ।

विशाल गङ्गा नदी आकाश के समान थी । उसमे बिखरनेवाले मोती नक्षत्रो के समान थे । कमल-सदृश वदन, अमृत, मधुर रक्त-अधर तथा ( पुष्पो के ) मधु से सिक्त केशोवाली विद्युत्-जैसी सुन्दरियो को ढोकर चलनेवाली नावें उन विमानो के समान थी, जो जल-विहार करके लौटनेवाली देव-स्त्रियो को लेकर चलते हैं ।

जल-बिन्दुओ को उड़ानेवाले डाँड़-समान अपने पैरो के साथ वे नावें, जो शीतल जलयुक्त गङ्गा नदी में चल रही थी, ऐसी लगती थी, मानो हर्ष-भरी, मोर-समान,

२८२ कंब रामायण

घने केशोंवाली तथा मीनाक्षी युवतियों के उज्ज्वल पद-कमलों के स्पर्श से प्राणवान् हो उठी हो।

मुनि, निम्न जाति के लोगों के द्वारा चलाई जानेवाली नावों को न छूकर, सङ्कल्पमात्र से सिद्ध होनेवाले गगन-सञ्चार (गगन-मार्ग) से देवों के जैसे गये। स्वर्ग, भूमि और अन्य किसी भी लोक में सत्य-युक्त तपस्या से बढ़कर और क्या हो सकता है ?

साठ सहस्र अक्षौहिणी संख्यावाली वह सारी सेना तथा नगर की सारी प्रजा, वीचियों से पूर्ण गंगा नदी को पीछे छोड़कर आगे बढ़ चली।

जब सारी सेना भँवरों से भरी नदी को पार कर गई, तब कपट पूर्ण धन-लिप्सा से रहित होकर अपने त्याग के द्वारा पृथ्वी के पुराने बड़े राजाओं को भी नीचा दिखानेवाले भरत, नाव पर आरूढ़ हुए।

उनका अनुपम अनुज (शत्रुघ्न), तीनों माताएँ, उत्तम गुणवाला सुमन्त्र तथा पवित्र मित्र गुह—ये सब जब आसीन हो गये, तब वह नाव भी डाँड़-रूपी अपने पैरों को बढ़ाकर चल पड़ी।

तब गुह ने, बहुजनों तथा देवों के द्वारा भी आवृत होनेवाली अति गभीर कौशल्या देवी को देखकर भरत से पूछा—हे विजयमालाधारी ! ये कौन हैं ? भरत ने उत्तर दिया—जिन चक्रवर्ती के द्वार पर बड़े-बड़े राजा लोग भी खड़े रहते थे, उनकी ये पट्टमहिषी हैं। जिन्होंने त्रिभुवन के सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा को भी उत्पन्न करनेवाले को (अर्थात् विष्णु के अवतार को) अपनी अपूर्व संपत्ति के रूप में पाकर भी मेरे जन्म लेने के कारण खो दिया है।

भरत के यह कहते ही गुह उनके चरणों पर दंडवत् हो गिर पड़ा और रोने लगा। बछड़े से बिछुड़ी हुई गाय के समान दुःख से युक्त कौशल्या ने भरत से पूछा—यह कौन है ? वीर कंकणधारी कुमार (भरत) ने उत्तर दिया—यह पुरुष रामचन्द्र का प्रिय मित्र है। लक्ष्मण, उनके अनुज (शत्रुघ्न) तथा मैं, हम तीनों का बड़ा भाई है। पर्वत-समान कंधोंवाला इस पुरुष का नाम गुह है।

यह वचन सुनकर कौशल्या ने यह कहकर आशीर्वाद दिया—हे पुत्रो ! अब तुम लोग दुःखी मत होओ। पराक्रमी राम-लक्ष्मण का नगर छोड़कर वन जाना भी तो अच्छा ही हुआ। तुम पाँचों पर्वत-समान कंधों तथा सूँडवाले हाथी के जैसे वीर इस गुह के साथ मिलकर एकता से चिरकाल तक इस पृथ्वी की रक्षा करते रहो।

फिर साकार धर्म-जैसी सुमित्रा के बारे में गुह ने भरत से प्रश्न किया—'तात ! ये करुणामयी देवी कौन हैं ? भरत ने उत्तर दिया—सत्य को स्थिर रखकर, सन्मार्ग पर चलकर, अपने प्राण त्यागनेवाले चक्रवर्ती की ये छोटी पत्नी हैं। सबके लिए वंदनीय प्रभु (राम) का अनुज, जो सदा उनका अनुवर्ती रहता है, उस (लक्ष्मण) की जननी हैं।

फिर, उस कैकेयी को, जिसने अपने पति को श्मशान में, पुत्र (भरत) को दुःख-सागर में, करुणा-समुद्र राम को घोर कानन में भेजकर, घोर रूपधारिणी...

अयोध्याकाण्ड २८३

(विष्णु) के द्वारा पूर्वकाल में नापी गई सारी पृथ्वी को अपने मन के षड्यन्त्र से नापा था, देखकर गुह ने भरत से पूछा—ये कौन हैं ?

तब भरत ने कहा—सब विपदाओ को उत्पन्न करनेवाली, लोकनिंदा (रूपी) सतान को पालनेवाली माता, उसके पापी पेट में चिरकाल तक वास करनेवाले मुझ पुत्र के प्राणो को भार बनानेवाली तथा इस लोक में, जहाँ के सब प्राणी प्राणहीन शरीर-जैसे लगते हैं—(अर्थात्, राम-वियोग में दुःखी हैं), पीडा के लक्षणो से रहित होकर रहनेवाली वह एकमात्र व्यक्ति है, ऐसी इस स्त्री को क्या तुमने नहीं पहचाना ? यहाँ खड़ी हुई यही मेरी जननी है।

भरत के वचन सुनकर गुह ने उस दयाहीन स्त्री को भी अपने कर जोड़कर नमस्कार किया। उस समय वह नाव भी पंख-रहित होकर तैरनेवाली हंसिनी के समान किनारे पर आ लगी।

नाव से उतरकर माताएँ पालकियों पर आसीन होकर चलीं। भरत ने अश्रु-प्रवाह बहानेवाली आँखों के साथ पैदल ही चलकर दीर्घ मार्ग पार किया। गुह भी उनसे पृथक् न होकर उनके साथ चला।

फिर, भरत कर्म-भार से मुक्त भरद्वाज नामक, महान् तपस्वी के आश्रम में आदर के साथ जा पहुँचे। उस समय वे महर्षि, वृद्ध तपस्वियों के साथ, उनके सम्मुख आये।

( १–७३ )


अध्याय १२

पादुका-पट्टाभिषेक पटल

भरत ने अपने सम्मुख आये (भरद्वाज) मुनि को, पिता-समान मानकर बड़ी विनम्रता से प्रणाम किया। चन्द्रशेखर (शिव)-सदृश उन मुनिवर ने प्रेम से उन्हें अनेक शुभ आशीर्वाद दिये।

फिर भरद्वाज मुनि ने भरत को देखकर कहा—हे तात ! तुमको जो राज्य प्राप्त हुआ है, किरीट धारणकर उसका शासन किये बिना क्यों इस प्रकार जटा धारण करके यहाँ आये हो ?

यह वचन सुनते ही भरत घोर क्रोधाग्नि से भड़क उठे। किन्तु क्रोध को दबाकर उन महान् तपस्वी को देखकर कहा—हे ज्ञानी ! आपने यह समझकर कि मैंने अपना कर्त्तव्य पूरा नहीं किया, अब यह जो प्रश्न किया है, यह क्या आपके लिए उचित है ?

वेदों के प्रभु (विष्णु) के अवतार राम के योग्य भाई भरत ने पुनः कहा—कुल-परंपरा से आगत धर्म का त्याग कर मैं राज्य नहीं करना चाहता। यदि रामचन्द्र उस

२८४ | कम्ब रामायण

(राज्य) को नहीं स्वीकार करेंगे, तो वनवास की अवधि तक मैं भी उनके साथ वन में ही रहूँगा।

राम के प्रति अत्यन्त प्रेम से पूर्ण उन महान् तपस्वियों ने, ज्योंही यह वचन सुना, त्योंही उनके फूले हुए शरीर और मन में ऐसी शीतलता व्याप्त हुई, जैसे किसी ने चन्दन लगा दिया हो।

भरद्वाज महर्षि प्रेम के साथ भरत को अपने पवित्र आश्रम में ले गये और उनके साथ आई हुई सेना का आतिथ्य करने के विचार से अपने अरुण करों से अग्नि में कुछ आहुतियाँ दीं।

विरागी तपस्वी (भरद्वाज) के स्मरण करने मात्र से स्वर्गलोक शीघ्र वहाँ आ पहुँचा। सेना के लोग मानो पुनर्जन्म प्राप्त कर दूसरे लोक में जा पहुँचे हों—इस प्रकार अपनी पूर्वदशा को भूलकर बड़े आनन्द में निमग्न हो रहे।

स्वर्ग की अप्सराओं ने यह मानकर कि ये लोग शाश्वत धर्म के आश्रय हैं, उस सेना में स्थित लोगों का प्रेम से स्वागत किया और चन्द्र-मण्डल के समान स्थित प्रासाद में उन्हें ले गईं।

उन (अप्सराओं) ने उस सेना के लोगों को स्नान के उपयुक्त सुगंध-चूर्णों का लेप कराकर स्वर्ग-गंगा के दुर्लभ तथा अपूर्व जल में स्नान कराया। सुरभिमय बड़े कल्प-वृक्षों के दिये हुए पुष्प-सदृश मृदु वस्त्र पहनाये।

पुष्पित शाखा के समान लचकती देहवाली उन अप्सराओं ने रक्तस्वर्ण के बने मनोहर आभरण पहनकर बड़े प्रेम से उन लोगों को अमृत-समान भोजन कराया।

फिर, भरत की सेना में स्थित पुरुषों ने अलक्तक-लगे, नूपुरों से भूषित एवं पद्मराग-समान चरणों से युक्त तथा विष-समान नयनों से शोभायमान उन अप्सराओं के साथ पञ्च लक्षणों से युक्त उत्तम शय्या पर सुखनिद्रा की।¹

राजाओं से लेकर पालकी ढोने से सूजे हुए कंधोंवाले लोगों तक, सबका उन सुन्दर केशोंवाली अप्सराओं ने यथाक्रम ऐसा ही सत्कार किया, जैसा देवताओं का करती हैं।

भरत की सेना में आई हुई स्त्रियाँ, बिंबफल-समान रक्त अधरोंवाली तथा निर्दोष वैभव से पूर्ण उन अप्सराओं के सखियों तथा दासियों के समान सेवा करते रहने से, देव-योग्य भोग अनुभव करती रहीं।

उपवनों में स्थित सद्यःविकसित पुष्पों से भरे कल्पवृक्षों से मंद मारुत, गन्धवाह के हाथ का सहारा लिये हुए, अंधे व्यक्ति के समान, धीरे-धीरे आया।

मधु-धारा से सिक्त अन्न-पिंडों तथा लाल धान के पत्तों की राशि को हस्त्यध्यक्षों ने फेंका, तो उनको खाकर मत्तगज तृप्त हुए और उनके मद-जल से भ्रमर भी तृप्त हुए।

नरक से मुक्ति देनेवाले पवित्र आकाश-गंगा के जल को मत्तगजों ने अपने अंगों पर


¹ शय्या के पाँच लक्षण हैं—मार्दव, श्वैत्य, सौगन्ध्य, शैत्य तथा विस्तीर्ण होना। पद्मराग के समान चरणों से युक्त तात्पर्य यह है कि पाँवों में लाल रंग लगाया गया था। -अनु०

अयोध्याकाण्ड २८५

पैरों को पसारकर, लम्बी साँड़ों से भरकर पिया। अश्व-समूह ने मरकत-समान कान्ति से युक्त घास को खाया।

सब लोग इस प्रकार देव-योग्य भोगों का अनुभव कर रहे थे। किन्तु, भरत ने कन्द-मूल और फल खाकर ही, अपनी स्वर्णमय देह को धूल पर डालकर, किसी प्रकार उस रात को व्यतीत किया।

नीलवर्ण अन्धकार के हटने से जिस प्रकार स्वप्न भी मिट जाता है, उसी प्रकार उनके स्वर्गिक भोगों के मिटने का कारण बनकर सूर्य इस प्रकार उदित हुआ, जैसे पुण्यानुभव करनेवालों के पुण्य का ही अन्त हो गया हो।

संयम के साथ जो धर्म का आचरण नहीं करते, उनके जीवन के समान ही उन सैनिकों का भोग भी मिट गया, मानो उन्हें दूसरा जन्म ही प्राप्त हो गया हो। यों (स्वर्ग-भोग के खो जाने से) चिंता न करते हुए वे पूर्व दशा में पहुँच गये।

उस दिन प्रातः ही निद्रा से उठकर वह सेना उपवनों तथा पर्वतों को धूल बनाकर उड़ाती हुई चल पड़ी और एक मरुभूमि में जा पहुँची, जिसे देखकर देवता भी यह संदेह करने लगे कि यह समुद्र है कि सेना है।

ऊपर उठी हुई धूल से आवृत होकर सूर्य, ताप-रहित हो शीतल पड़ गया। गजों के मद-प्रवाह, धूल-भरे उस मरु-प्रदेश में यों बहे कि आगे चलना कठिन हो गया।

तीक्ष्ण भालेवाले राजाओं के श्वेतच्छत्र, वृक्षों की-सी घनी छाया दे रहे थे, जिससे अग्नि के समान उष्ण एवं कंकड़ी से भरा वह मरु-प्रदेश इस प्रकार शीतल हो गया, मानो उसके ऊपर घनी लताओं से युक्त कोई वितान ही छा दिया गया हो।

‘यह विशाल राज्य तुम स्वीकार करो’—यों कहनेवाली माता के प्रति उत्पन्न क्रोध से जिनका मुख लाल हो गया था, ऐसे नीलवर्ण भरत को देखकर सूखे हुए वृक्ष भी प्रेम के कारण द्रवित होकर पल्लवित हो गये।

अपने प्राणों से भी सद्‌धर्म को ही अधिक श्रेष्ठ मानकर प्राण त्यागनेवाले, शासन में चतुर दशरथ की वह सेना, दुःखदायक मरु-प्रदेश को ऐसे पार कर गई, जैसे शीतल वृक्षों से भरे (मरुद नामक) भू-प्रदेश को ही पार कर रही हो और इस प्रकार चित्रकूट पर्वत के निकट जा पहुँची।

धूलि का समूह, अश्वों, रथों तथा मत्तगजों का शब्द एवं पैदल सेना का कोला-हल—यह सब सूचना दे रहे थे कि एक विशाल सेना आ रही है, जिसे सुनकर—

लक्ष्मण उठे और एक ऐसे पर्वत पर चढ़ गये, जो पृथ्वी के सूज उठने से उभरा-सा लगता था और वीचि-पूर्ण सागर को छोटा बना देनेवाली तथा दृढ़ धनुर्धारी उस विशाल सेना को देखा।

तब लक्ष्मण, यह सोचकर कि सारी पृथ्वी का राज्य करने की अदम्य इच्छा से प्रेरित होकर ही भरत इस सेना को लेकर व्रतधारी (रामचन्द्र) पर आक्रमण करने आया है—यह सत्य है।—अत्यन्त क्रोध से भर गये।

वे दौड़कर, उस पर्वत को चूर-चूर करते हुए, भूमि पर कूद पड़े और शीघ्र

२८६ कंब रामायण

रामचन्द्र के निकट जा पहुँचे और बोले—भरत आपका आदर किये बिना प्राचीरों से आवृत्त अयोध्या की सेना को लेकर आप पर आक्रमण करने को आ रहा है ।

यों कहकर लक्ष्मण ने ( कटि मे ) कटार और ( पैरों में ) वीर-वलय धारण किये । अनेक बाणो से भरा तूणीर लिया । युद्ध-कवच पहना । हाथ मे धनुष लिया । और प्रभु के चरणों को प्रणाम करके ये बचन कहे—

इह और पर-लोक दोनो के फलों को खो देनेवाले उस भरत के ऊँचे कंधो के वल को, उसकी सेना के महत्त्व को एवं अपने इस अनुज ( अर्थात्, लक्ष्मण ) के अनुपम पराक्रम को देखकर आप आनन्दित होगे ।

बड़ी पीडा से मरनेवाले हाथियों के ढेरों को लुढ़कानेवाले, रथो को बहानेवाले ( हाथी, अश्व आदि की ) आँतो को बिखेरकर ले चलनेवाले तथा अरण्य मे फैलनेवाले रक्त-प्रवाह को आप अभी देखेगे ।

मेरे बाण ( शत्रुओ के ) हथियार, हाथ, कवच से आवृत्त वक्ष तथा प्राण सबको छिन्न करके उनके शरीर के भीतर प्रविष्ट होगे । ( मेरे वाण ), उनके रक्त से भी सिक्त न होकर बड़े वेग से सब दिशाओ मे जाकर, दिग्गजो को भी भयभीत करेंगे । हे वीर ! आप देखेंगे ।

अति वेग से फाँदनेवाले अश्वो के मर जाने पर, रथो की स्वर्णमय पीठों पर, टूट-कर गिरे हुए ढालों को अपने हाथ में लेकर भूतो को संगीत के साथ नृत्य करते हुए देखेंगे ।

( लक्ष्मण ने राम से कहा—) अलंकारों से युक्त हाथियो से पूर्ण भरत की सेना को मैं एक क्षण मे निर्मूल कर दूँगा, जिससे वीर-स्वर्ग भी भार से अपनी पीठ झुकाने लगेगा तथा समुद्र-रूपी वस्त्र से युक्त पृथ्वी भार-मुक्त होकर विश्राम करेगी । हे उदारगुण ! यह आप देखेगे ।

उमड़कर चलनेवाले रक्त-प्रवाह मे तैरने के कारण लाल हुए सून और उनके साथ छोटी आँखवाले पिशाच तथा शिर-रहित कबध, देवों के जैसे ही यह कहते हुए कि 'सारी पृथ्वी आपके अधीन हो गई है', नाचेंगे ।

मुख-पट्टो से भूषित मत्तगजो, अश्वों, भारी भुजाओ से युक्त पैदल सेना के वीरो आदि के मरने पर उनके समुद्र-सदृश रक्त से सप्त समुद्रो को उथलकर गरजते हुए आप सुनेगे ।

आप देखेंगे कि मेरे शूरो से कैसे पैदल सेना छिन्न-भिन्न होती है । रथ विध्वस्त होते हैं । वीरो के करवाल टूट जाते हैं । दृढ धनुष टूट जात हैं । बडे गजो और अश्वो के पैर, शिर आदि टूट जाते हैं और उनपर आरूढ वीरों के पैर और हाथ कट जाते हैं ।

बडे पखवाले तथा स्वर्णिम काति को बिखेरनेवाले मेरे बाणो को, उन दोनो—( अर्थात्, भरत और शत्रुघ्न ) के वक्षो को छेदकर, उनका मास निकालकर, गगन-मार्ग मे उडते हुए और ( मासभक्षी ) पक्षियो को बुलाते हुए, आप देखेंगे ।

हे चक्रधारी ! एक स्त्री के मोह से समार-भर को दुःख देनेवाले चक्रवर्ती ( दशरथ ) की आज्ञा से जिस भरत ने राज्य पाया है, उसे अब मेरी आज्ञा से यह राज्य

अयोध्याकाण्ड २८७

त्यागकर, पुनरावृत्ति से रहित (अर्थात्, जहाँ से लौट आना असंभव है), नरक-लोक प्राप्त करते हुए देखेंगे।

यह देखकर कि आपको राज्य छोड़कर वन मे निवास करने का दुःख प्राप्त हुआ है, जब आपकी जननी रो रही थी, तब उसे देखकर जो कैकेयी आनन्दित हुई थी, उसे अब (पुत्र के शोक में) पृथ्वी पर गिरकर रोते हुए देखेंगे।

सान पर चढ़ाकर तीक्ष्ण किये गये, अग्नि के समान भयंकर और विजयमाला से भूषित बरछा धारण करनेवाले ! मैं एक क्षण मे एक तीक्ष्ण तथा विध्वंसक बाण से इस सेना-समुद्र को त्रिपुर-दाह करनेवाले शिवजी के समान सुखा दूँगा—इस प्रकार लक्ष्मण ने कहा।

तब रामचन्द्र ने उससे कहा—हे लक्ष्मण ! यदि तुम चतुर्दश लोको को हिला देना चाहो, तो तुम्हारे इस निश्चय को कोई रोक नही सकता। उसके बारे मे कुछ कहने की क्या आवश्यकता है ? (पर मै तुम से) एक उचित वचन कहना चाहता हूँ। उसे सुनो।

उज्ज्वल प्रस्तर-स्तंभ के प्रतिरूप बने कंधोवाले ! हमारे कुल मे जो निष्कलंक गुणवाले राजा उत्पन्न हुए, उनकी गणना नहीं हो सकती। हमारे कुल में कौन ऐसा हुआ, जो अपने कुल-धर्म से हटा हो ?

ताल-वृक्ष जैसी सूँडोवाले हाथियो की सेना से युक्त भरत ने जो कार्य किया है, वह वेद-प्रतिपादित धर्म के अतर्भूत ही है। तुम जैसा कहते हो, वैसा नहीं है (अर्थात्, अधर्म-कार्य नहीं है)। इस सत्य को तुमने मेरे प्रति प्रेमाधिक्य के कारण सोचा नहीं।

भरत, मुझ अपने ज्येष्ठ भ्राता पर प्रेम के कारण ही यहाँ आयगा और राज्य मुझे सौंप देगा—यों सोचने के बदले क्या यह सोचना बुद्धिमत्ता है कि वह (भरत) सेना के साथ आकर मुझसे युद्ध करेगा ?

हे विद्युत् के समान चमकते हुए बरछे को धारण करनेवाले ! वीर-वलयधारी भरत यहाँ आकर विशाल सेना को, राज्य-सपत्ति के साथ, मुझे सौपेगा—इसके विपरीत यह कहना भी अनुचित है कि वह मेरे साथ युद्ध करेगा।

हे आभरण-योग्य कंधोवाले ! उत्तम धर्म के देवता के समान एव सच्चारित्र्य की धुरी बने हुए उस (भरत) के सबंध मे इस प्रकार सोचना क्या उचित है ? उसका यहाँ आना, मुझे देखने के लिए ही है। इसे तुम अभी समझोगे।

प्रभु ने अनुज (लक्ष्मण) से यो कहा—उस समय, भरत अपनी सेना को पीछे छोडकर, अपने से कभी पृथक् न होनेवाले प्रेमयुक्त भाई शत्रुघ्न को साथ लेकर, आगे बढकर (राम के निकट) आया।

नमस्कार की मुद्रा मे हाथो को उठाये हुए, शिथिल देहवाले, अश्रुपूर्ण नेत्रोवाले तथा साकार दुःख बने हुए चित्र-जैसे आनेवाले भरत को सर्वज्ञ प्रभु ने पूर्ण रूप से देखा—(अर्थात्, शिर से पैर तक दृष्टि फेरकर देखा)।

फिर, काले मेघ-जैसे आकारवाले प्रभु ने लक्ष्मण से कहा—शब्दायमान दृढ धनुष से युक्त हे अनुज ! हे तात ! देखो, रथ आदि की सेना को लेकर यह भरत बड़े क्रोध के साथ युद्ध करने के लिए कैसा युद्धोचित वेष धारण कर यहाँ आ रहा है !