भारतकोश
संग्रह पर लौटें

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

भगत मुड़िया जटाधारी, ज्ञानी गुनी अपार ।

षट दर्शन भटकत फिरे, एक लोभ की लार ॥

इसके बाद आता है— मोह | यह तो सबका राजा है । साहिब कह रहे हैं—

मोह सकल व्याधिन को मूला । ता ते उपजत बहु विधि सूला॥

यह सभी बीमारियों की जड़ है । इसकी उत्पत्ति ही माया से है।

मोह नृपति माया ते भयऊ। प्रबल घटा तिहूँ पुर सी छयऊ॥

वरनो तासु नाम गुण बैना । महा मोह राजा को सैना ॥

इस मोह राजा का बहुत बड़ा परिवार भी है।

निज अज्ञान देश राजधानी । आलस महल आशा पटरानी ॥

इच्छा बेटी खरी कठोरी । बाँधे अनेक जीव उठि भोरी ॥

कुमति सखी ताके संग रहई । निति उठि हृदय सबन की दहई ॥

लौंडी छूत टहल घर करई । जाके परसत सब जग डरई ॥

लौंडा लालच नाहिं अघावे । वरजत निलज सबके घर जावे ॥

रोग शोक संशय बहु भांति । पर द्रोही और द्वन्द संघाती ॥

ये राजा के पुत्र प्रचंडा । जाके डर त्रासे नौखंडा॥

पाप सबन को औगुन जानी । दुख दरिद्र मोह अभिमानी ॥

अधर्म ध्वजा जाके अगवानी । बाजा प्रकट कलह निशानी ॥

दम्भ क्षत्र चौतरा शूला। जहँ सिंहासन बैठे फूला ॥

कपट वजीर असत्य खवासा । पाखंड मंत्री संग प्रकाशा ॥

यह मोह अज्ञान के देश में रहता है। इसकी स्त्री है - तृष्णा, , बेटी है- इच्छा, बेटा है- लालच, मंत्री है - पाखंड, वजीर है - कपट, , मित्र हैं— रोग और शोक। इस तरह इस मोह राजा का बहुत बड़ा परिवार है, बहुत बड़ी सेना है । मोह की इस सेना से बचना आसान काम नहीं है, इसलिए साहिब कह रहे हैं-

यह सेना सब मोह की, कहैं कबीर समझाय ।

इनते जो कोई बाचई, भवसागर तरि जाय ॥

अब अंत में आता है— अहंकार । यह सबसे ख़तरनाक है । इसकी स्त्री है— निंदा । अहंकार दूसरे की निंदा करता है। किसी को धन का, किसी को बल का, किसी को विद्या का अहंकार रहता है । जब जब अहंकार हृदय में आता है, तब तब जीव अपने समान किसी को नहीं मानता है ।

छिन छिन गर्व हिया में आवे । आगे कुटिल सबही दिखलावे ॥

ऐंठत चलै निहारत पागा । गर्व खबीस तबहिं उठि लागा ॥

ऐंठ अकड़ अभिमानी माहीं । अभिमानी नीचा हों नाहीं ॥

मूँछे ताव निहारत छांही। काँधे धरे अवर की बाँहीं ॥

टेढ़ी पाग गर्व मन धरई । मन महँ ऊमतवालो फिरई ॥

अनीति वचन औरन सों बकै, हमरी बरोबरी को करि सकै ॥

अहंकारी में अकड़ होती है। वो दूसरे को कुछ नहीं गिनता है । दूसरों को अपशब्द भी बोल देता है । वो सोचता है कि मेरे बराबर कोई नहीं है । साहिब समझा रहे हैं-

अति के गर्व न होय भाई । गर्वहि ते पुनि सर्व नशायी ॥

अभिमानी नहिं छूटे कबहूँ । बहु विलक्षण ज्ञानी होय तबहूँ ॥

भगली दंभ नितही मन माहीं । निकट साँच कछु आवे नाहीं ॥

हम हम हम करत सो डोलै । काहू से सीधा नहिं बोलै ॥

रूपवन्त रूप गरवावै । कोई मौसम दृष्टि न आवै॥

धन कुल विद्या गर्बाना । अनी ऊँच ज्ञानी विखराना ॥

अहै भूप राजा अभिमानी । आपेही को सरवस जानी॥

है योगी योग गर्व धारै । बड़े बड़े सिद्धि काल गहि मारै ॥

साहिब कह रहे हैं कि यह अहंकार नहीं होना चाहिए। इस अहंकार से सब नाश हो जाता है। अभिमानी कभी पार नहीं हो सकता है । अहंकारी सदा ‘मैं’‘मैं' ही लगाए रखता है और किसी से सीधी बात नहीं करता है । धन, कुल, विद्या आदि का अभिमान सबको घेरे रखता है । राजा को अपने बढ़प्पन का अभिमान होता है। योगी को अपने योग का अभिमान रहता है। इस तरह ये पाँचों ही बहुत बुरे हैं। ये पाँचों मन के हाथ हैं, जिनसे यह सबको मरोड़े जा रहा है। मनुष्य इनसे सावधान नहीं है । साहिब सतर्क कर रहे है

चश्म दिल से देख तू, क्या क्या तमाशे हो रहे .... ॥

नाम से क्या होगा जिस दिन गुरु नाम दे देता है, उस दिन वो नाम पूरी सुरक्षा करता है । तब काम का प्रभाव नहीं पड़ता है। जैसे किसान लोग बीज को सुरक्षित कर देते

हैं तो कीड़ा नहीं लगता है । क्योंकि जैसे ही खाता है, कीड़ा मर जाता है। इस तरह गुरु नाम के द्वारा अन्दर से सुरक्षित कर देता है । गुरु माया से सुरक्षित कर देता है, गुरु मन से सुरक्षित कर देता है । माया प्रूफ बना देता है । जैसे वाटर प्रूफ घड़ियाँ बनाई गयी हैं, इस तरह पूरा गुरु माया से सुरक्षित कर देता है । आप खुद नहीं कर सकते हैं। मन से, काम से, क्रोध से, भूत-प्रेतों से, ग्रहों-नक्षत्रों से सुरक्षित कर देता है। इनकी मार से इंसान बच नहीं पाता है । एक महात्मा को मैंने सत्संग करते हुए सुना । उसने जब अपना हाथ ऊपर उठाया तो उसके हाथ में मैंने अंगूठियाँ देखीं, जो ग्रहों वाली थीं । महात्मा ने 3-4 अंगूठियाँ पहनी हुई थीं। वाह, अब वो खुद ग्रहों से डर रहा है, बचता फिर रहा है तो शिष्यों की सुरक्षा क्या करेगा। जब महात्मा लोग कहते हैं कि यह करो, वो करो, तप करो, मंत्र जाप करो तो मैं जान जाता हूँ कि इनको मन से बचने का फार्मूला पता नहीं है, क्योंकि—— कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा ।

गृह छोड़ भये सन्यासी, तऊ न पावत पारा।।

नाम के बिना मन से कोई पार नहीं पा सकता है। नाम पूरी सुरक्षा कर देता है। सतगुरु शब्द सहाई ।

निकट गये तन रोग न व्यापै, पाप ताप मिट जाई ।।

नाम की ताकत से शरीर के रोग नहीं सतायेंगे, पाप कर्मों की ओर नहीं जा पाओगे। भौतिक, दैहिक और दैविक - तीनों तरह के ताप भी नष्ट हो जायेंगे। ग्रह भी नहीं लगेंगे। जबहि नाम हिरदे भया, भया पाप का नाश ।

जैसे चिनगी आग की, परी पुरानी घास ।।

जैसे पुरानी सूखी घास पर आग की चिंगारी भी पड़ जाए तो अनेक घास के तिनकों को जलाकर भस्म कर देती है, इसी तरह जिस हृदय में नाम आ जाता है, उस हृदय में फिर पाप कर्मों की जगह नहीं रहती । इन बातों में सार है। क्या सच में जब नाम हृदय में आ जाता है तो पाप का नाश हो जाता है ? हाँ, नाम के बाद गलत कर्मों की ओर नहीं जा पाता है । I

आप चाहकर भी खोटे कर्म नहीं कर पाते हैं। वो ताकत अंत:करण को आकर रोकती है। ऐसी ही नहीं कह रहे-

सतगुरु शब्द सहाई॥

तो आगे कह रहे हैं—

अठवन पठवन दृष्टि न लागे, उलटे तिहि धर खाई ।

मारन मोहन वशीकरन कर, मन ही मन पछिताई ।।

कह रहे हैं कि बुरी नजर भी नहीं लगेगी । उलटा बुरी दृष्टि लगाने वाले का बुरा हो जायेगा । मारन, मोहन आदि बाणों का भी असर नहीं होगा । इतना ही नहीं— जादू यंत्र युक्ति नहिं लागे, शब्द के बान डहाई ।

ओझा डायन उर डर डरपे, जहर जूड़ हो जाई ।।

शब्द (नाम) रूपी बाण के आगे किसी तरह का जादू -मंत्र टिक नहीं पायेगा। जादू-मंत्र करने वाली डायन, ओझा आदि का हृदय स्वयं ही भय से व्याकुल हो जायेगा। इस नाम की ताकत के आगे जहर भी बेअसर हो जायेगा ।

विषधर मन में कर पछतावा, बहुरि निकट नहिं आई ।

कहैं कबीर काटो यम फंदा, सुकृति लाख दुहाई ।।

इसी नाम से काल का जाल कटेगा । नाम कवच की तरह रक्षा करेगा । इहलौकिक और परालौकिक दोनों सुख नाम देगा।

जो सुख को चाहो सदा, तो शरण नाम क लेह ।।

जिस दिन नाम की ताक़त आ जाती है, इहलौकिक और परालौकिक, दोनों तरह की शक्तियाँ आपमें आ जाती हैं। तभी तो साहिब आख़िर कह रहे हैं-

सत्यनाम के पटतरे, देवे को कछु नाहिं ।

क्या लें गुरु संतोषिये, यह हवस रही मन माहीं ।।

जब नाम की ताक़त आ जाती है तो आन्तरिक शत्रुओं का बस नहीं चलता है, क्योंकि तब आपके पास इनसे लड़ने के लिए दूसरी शक्तियाँ आ जाती हैं। क्षमा, प्रेम, विचार आदि का बुरी शक्तियों से युद्ध चलता है । इनका राजा है— विवेक । आओ, विवेक की सेना तरफ चलते हैं । इसकी उत्पत्ति परम-पुरुष से हुई है।

ऐसे परम पुरुष के अंशू । प्रकटें प्रेम विवेक सुख वंशू ॥

अब यह रहता कहाँ है ?

ज्ञान देश प्रकाश राजधानी । आनन्द रूपी विवेक परवानी ॥

विवेक ज्ञान के देश में रहता है और जहाँ भी रहेगा, वहाँ ज्ञान का प्रकाश होगा। इसलिए यह आनन्द देने वाला है ।

सुनहु विवेक राज की सैना । जाके राज सकल सुख चैना ॥

उमरा धीरज धर्म औ ज्ञाना। प्रेम भक्ति बाजै निशाना ॥

निजानन्द महल पग धरई । श्रद्धा रानी सेवा करई ॥

निर्भय संत सुशील सुभाऊ । ये विवेक के पुत्र कहाऊ ॥

ऐसे नृप विवेक के अंशू । प्रगटे आद प्रेम सुख वंशू ॥

नृप विवेक की बेटी चारी । सत्य क्षमा दया शुभकारी ॥

सत्य संतोष साथ है ताही । नरक परत गहि राखत वाही॥

लौंडी सुबुद्धि सबन की लाजा । लो लौंडा पुरवे सब काजा ॥

सुचित शील और अनुरागी । क्षमा स्वभाव बैठे वैरागी ॥

रहनी क्षत्र चौतरा सुभाऊ । सहज सिंहासन बैठे राऊ ॥

व्रत वजीर और सत्य खवासू । मंत्री निरभै संग प्रकासू ॥

करहिं वेद ताके सुख सेवा । विवेक प्रसाद सदा सुखदेवा ॥

धीरज, धर्म और ज्ञान इसके बड़े-बड़े सरदार हैं, जो विवेक राजा की सहायता को हर क्षण तत्पर रहते हैं । इसकी रानी है - श्रद्धा । क्षमा, दया आदि बेटियाँ हैं और सुबुद्धि इस राजा की दासी है। वजीर है— दृढ़ व्रत, सेवक है— सत्य, मंत्री है— निर्भय ।

धीरज धर्म ज्ञान उमराऊ । ये राजा की करहिं सहाऊ ॥

उग्रज्ञान प्रकटे जब आयी । ताक्षण मोह सबै मिटि जायी ॥

ज्ञानवन्त जब प्रकट है आवै । काल जंजाल सबै मिटि जावै ॥

चौकी मोह सबै उठि भागे । भागे कपट ज्ञान के आगे ॥

दुष्ट काल पल लागत गयऊ। ज्ञान चक्षु हिरदय तब भयऊ ॥

कहौं को तुम को संसारा । काहे बंध्यो सो करो विचारा ॥

झूठे मोह बंधो संसारा। कहे बंध्यो सो करो विचारा॥

दंपति सुख संपति परिवारा। ये सब माया को विस्तारा ॥

जैसे छिन बदरी की छाया । ऐसे गहे देत सुख माया ॥

ये सब सुख सपने को राजू । जागि परे कुछ सरे न काजू ॥

झूठे आहि देह को नाता । ये सब माया केर समातो ॥

तन जारे भस्म होय जाई । मेहरी मातु नातु नहिं काई ॥

ऐसो ज्ञान मन प्रगटे आयी । तो कहु मोह कहाँ ठहराई॥

धैर्य, धर्म और ज्ञान विवेक राजा की सहायता करने वाले हैं। जब ज्ञान हृदय में आता है तो काल का जंजाल मिट जाता है। मोह ने सारे संसार को बाँधा हुआ है। पर ज्ञान कहता है कि सुख, संपति, पत्नी आदि सब माया है। जैसे बदली थोड़ी देर के लिए छाया देती है, ऐसे ही माया का सुख थोड़ी देर का है। सारे सुख सपने की तरह हैं, बाद में कोई काम नहीं आयेगा । देह के रिश्ते भी झूठे हैं, शरीर के नष्ट हो जाने पर कोई माता, पिता, पत्नी आदि का नाता नहीं रह जाता। जब ऐसा ज्ञान हृदय में आ जाता है तो फिर मोह ठहर ही कहाँ सकता है! प्रगटे प्रेम विवेक दल, कहैं कबीर समझाई | उग्रज्ञान अति बली, जेहि सुनि मोह

डराई ॥

इस तरह सद्गुरु कृपा से नाम के साथ जब ये हृदय में आते हैं तो अंत:करण को प्रकाशित कर देते हैं । फिर विवेक की सेना का काम, क्रोध आदि से युद्ध होता है और अंत में ये शत्रु पराजित हो जाते हैं। भाइयो, यह कोई गप्प नहीं है, हरेक के भीतर एक युद्ध चल रहा है...... भीतरी विचारों का युद्ध । बड़ा ही अनोखा युद्ध है यह। जिसके पास नाम नहीं है, वो इन शत्रुओं पर विजय नहीं पा सकता है। नाम की ताक़त से ही ये काबू में आते हैं। आओ, इनके युद्ध को भी देखते है । साहिब ने इनकी लड़ाई का वर्णन भी किया है। विवेक की सेना को अपने राज्य में देख मोह चकित हो जाता है और उन्हें अपने देश से बाहर करने की कोशिश करता है ।

तबहिं मोह मंत्र उपजावा । पाखण्ड मित्र निकट बुलावा ॥

आये प्रबल विवेक नरेशा । लीन्हें आइ हमारो देशा ॥

अब मति मंत्र करो ठहराई । देश आपनो लेहु छुड़ायी ॥

कहै पाखण्ड सुनो मम राजा । यह बड़ कौन अहै सो काजा ॥

राजा मंत्र हमारो लीजै । प्रथम काम को आयसु दीजै ॥

आगे आगे काम रह भरपूरी । ज्ञान विवेक जाहि सब दूरी ॥

तबहिं कम कहँ आयसु दियऊ। दल बादल सह रन सो गयऊ॥

मोह परेशान होकर अपने मित्र पाखण्ड को पास बुलाता है और कहता है कि विवेक की सेना ने हमारे देश पर कब्जा कर लिया है, अब हमारी कुछ नहीं चल रही है। ऐसे में पाखण्ड कहता है कि तुम काम को बुलाकर रण भूमि में भेजो। उसके रहते ज्ञान और विवेक नहीं रह सकते हैं। तब राजा मोह काम को बुलाकर सेना सहित रण में भेजता है । जब काम उठता है तो ज्ञान ही उससे टक्कर लेने आता है । काम जानता है तो केवल ज्ञान ही उससे टक्कर ले सकता है, पर मन के राज्य में ज्ञान को देखर काम चकित हो जाता है ।

काम कुपित वचन सुनायो । हमरे देश ज्ञान कहँ आयो ॥

उतै भयो काम उतै भयो ज्ञाना । मानस भूमि रच्यो संग्रामा ॥

काम कहता है कि हमारे देश में ज्ञान कहाँ से आ गया ! तब दोनों युद्ध को तैयार होते हैं ।

बहु रूप धरि काम तिवाना । तबही चलावै पाँचों बाना ॥

निष्फल कियो ताहि तब ज्ञाना । सुरति शब्द लै रहे निदाना ॥

काम मारन, मोहन आदि पाँचों बान चलाता है, पर ज्ञान सुरति करके सबको निष्फल कर देता है ।

ज्ञान विचार उठे गल गाज । काम निलज्ज न काहे भाजी ॥

धिग तिया धिग धिग अस राजा । निरघिन रुधिर मांस को साजा ॥

हाड़ त्वचा मुख रोम पसारा । नव द्वार बहैं अति खारा ॥

रेंट नाक मख कफ लारा । कीचड़ आँखिन काने छारा ॥

नख निख व्याधि सबै बिस्तारा । विष्ठा मूत्र तिया तन भारा॥

वाहि रांचैं सो पावैं दुक्खू | सपने नहिं तेहि होये सुक्खू ॥

दुख की राशि जो राजी कोई । साचो नरक आहि पुनि सोई ॥

यह कहि ज्ञान रहा ठहराई । काम सैन डारै विचलाई ॥

विचल्यो काम गयो खिसियाई । उग्र ज्ञान ते कछु न बसाई ॥

काम के आने पर ज्ञान विचार करता है कि स्त्री का शरीर तो गंदे माँस और खून से बना है। उसमें तो रोम-रोम से गंदगी ही निकल रही है। नौ द्वारों

से गंदगी-ही-गंदगी निकलती है । विष्ठा और मूत्र से उसकी इंद्रियाँ भरी हैं । मुख से लार और कफ, आँखों से कीच ...... । इनमें खोकर तो दुख ही पाना है। इसमें तो सपने में भी सुख नहीं मिल सकता है। यह तो नरक में गिरने वाली बात है। इस तरह ज्ञान की बात सुनकर काम की सेना विचलित हो जाती है और उसका कुछ भी बस नहीं चलता है। वो ज्ञान को हराने की बड़ी कोशिश करता है, पर अंत में उसे हारना ही पड़ता है ।

काम कहै यह नीकि सुंदरी । कहै ज्ञान यह विष की दहरी ॥

काम कहै याके ढिग जाई । ज्ञान कहै यह सांपिन अहई ॥

काम कहै कामिनी सम तूला । ज्ञान कहै यह विषकर मूला ॥

कामासक्त कुदृष्टि सन राता । ज्ञान सक्ति कर बोलै माता॥

यह सुनि बहुत अजब भौ कामा । सह्यो ज्ञान हमरो संग्रामा ॥

काम हर तरह से लुभाने का प्रयास करता है कि यह देखो सुन्दरी, पर ज्ञान उसे विष से भरी बताता है । काम कहता है कि उसके पास जाओ, पर ज्ञान कहता है कि यह तो सर्पिनी है, डस लेगी। काम उसे स्त्री की ओर कुदृष्टि से देखने को प्रेरित करता है, पर ज्ञान उसे माता कहकर पुकारता है । इस तरह काम युद्ध में ज्ञान से पराजित हो जाता है । नाम की ताक़त नहीं होगी भाइयो तो बड़े-बड़े ज्ञानियों को भी पटकी दे देगा यह काम | तो काम के बाद क्रोध की बारी आती है ।

विचल्यो काम मोह पहँ गयऊ । सबहि वृत्तांत सुनावन लयऊ ॥

मन में मोह बहुत पछतायी। बोलाई क्रोध को बात सुनायी ॥

आई क्रोध जब ठाढे रहेऊ। तबही मोह क्रोध से कहे ऊ ॥

तामस तेज नाम मोहि क्रुद्धा । करु विवेक ज्ञान सो युद्धा ॥

कहँ अस प्रबल तोहि को सहै । तोरे तेज ज्ञान कहँ रहे ॥

पराजित काम तब मोह राजा के पास जाता है और अपनी पराजय की बात बताता है । तब मोह क्रोध को बुलाकर सारी बात बताता है और कहता है कि तुम्हारे आगे तो ज्ञान टिक ही नहीं सकता है, इसलिए तुम जाकर ज्ञान से युद्ध करो।

यह सुनि क्रोध चला समुहाई । करी गवन पहुँचा रन आई॥

तन में आई कियो परवेशा । छाड़ो ज्ञान हमारो देशा ॥

जो तुम निश्चय जीतो कामा । तो अब मोसों करो संग्रामा ॥

यह सुनकर क्रोध आता है और कहता है कि हे ज्ञान, हमारा देश छोड़ दो। अगर तुमने काम को जीत लिया है तो अब मुझसे युद्ध करके बताओ। हम राक्षसों की कहानियाँ सुनाते हैं अपने बच्चों को कि कितने क्रूर थे, भयानक थे। भाइयो, ये सबसे बड़े राक्षस हैं, जो आपके अन्दर में निवास कर रहे हैं। ...तो क्रोध की बात सुनकर ज्ञान अचंभित हो जाता है और जाकर विवेक राजा को यह बात बताता है। तब राजा मंत्री से पूछता है कि क्रोध को किस तरह से मारा जाए ?

तब राजा मंत्रिन सो कहै । प्रबल क्रोध केहि कारण दहै ॥

तब सबहि मिलि मंत्र विचारा । यह तो जाय क्षमा ते मारा॥

बोलि विवेक क्षमा सो कहै । तुम तो जाई क्रोध रन बहै ॥

भक्ति ज्ञान तेहि देइ सहाई । प्रबल क्रोध को मारो जाई ॥

यहि सुनि क्षमा रोपे रन आयी । लीन्हो शील जो धनुष चढ़ायी ॥

तब सब मिलकर विचार करते हैं कि यह तो क्षमा से मारा जाएगा । फिर विवेक क्षमा से कहता है कि तुम जाकर क्रोध को मारो, तुम्हारे साथ भक्ति और ज्ञान भी होंगे। यह सुन क्षमा युद्ध के मैदान में शील रूपी धनुष लेकर आती है।

देखि क्षमा क्रोध चले धायी। मनसा भूमि रोप्यो रन आयी ॥

मारन क्रोध उठे जब धायी । इतने क्षमा दीन्ह मुसकायी ॥

क्रोध आन तब गारी गयी । सुनि क्षमा अनबोली भयी ॥

मीठे वचन क्षमा अति बोलै । कोपै क्रोध पवन ज्यों डोले ॥

क्षमा से अगिन शीतल है जाई । जैसे जल में अग्नि बुझाई ॥

यहि विधि क्रोध क्षमा से भिरई । मानहु अंगार पानी महँ परई ॥

जैसे ही क्रोध मारने को भागता है, क्षमा मुस्करा देती है । क्रोध तब गाली बकता है, पर क्षमा चुप रहती है । फिर क्षमा मीठे वचन बोलती है, जिससे क्रोध की अग्नि वैसे ही शांत हो जाती है, जैसे जल में पड़कर अग्नि । इस तरह क्रोध और क्षमा की लड़ाई ऐसे लगती है मानो अँगार पानी में पड़ गया हो।

भलो भलो सब कोई कहै, रहि गइ क्षमा दुहाई । कहैं कबीर शीतल भये, गयी सो अनि बुझाई || क्षमा से ही क्रोध की आग बुझाई जा सकती है। जब भी क्रोध आता है तो आदमी का दिल करता है कि बस मारूँ, यूँ । गाली बकता है वो। इसलिए साहिब कह रहे हैं-

गाली आवत एक है, उलटत होत अनेक ।

कहैं कबीर न पलटिये, रहे एक की एक ॥

काम, क्रोध दोनों की पराजय देख मोह राजा अब लोभ को बुलाता है और समझाकर रण में भेजता है।

हार्यो क्रोध काम जब जाना । महामोह राजा डर माना ॥

चकित मोह मंत्री हँकरावा । सम्मुख मोह विवेक डरावा ॥

लोभ मंत्री आय भये ठाढ़ा। देखत राव छोभ अति बाढ़ा ॥

तब लोभ मोहहि माथ नवाई | कहु राजा मोहि काहे बुलाई ॥

हौं निज सर्व पाप का मूला । मोरे ते तुम रहत हौ फूला ॥

जीतौं ज्ञान विवेक हि जायी । देश आपनो लेउ छुड़ाई ॥

तो कहँ फिर मैं देहौं राजू । महामोह मोरे बल गाजू ॥

काम और क्रोध के रण में हार जाने से मोह राजा भयभीत हो जाता है। वो अपने मंत्री लोभ को बुलाता है। मंत्री आकर राजा को धैर्य बँधाता है, कहता है कि जब तक मैं हूँ, तब तक ज्ञान नहीं टिक सकता है । मैं सारे पापों की जड़ हूँ, मैं विवेक और ज्ञान को जीतकर अपना देश उनसे छुड़ा लूँगा। फिर आप निष्कंटक राज्य करना ।

यह सुन हर्ष मोह मन भयऊ । तत्क्षण लोभ को आयसु दयऊ॥

लोभ की बातें सुनकर राजा खुश हो जाता है और उसे आशीर्वाद देकर रण में भेजता है । लोभ आकर ज्ञान से कहता है-

जाई रण दियो लोभ हंकारा । ज्ञान तुम का करहु तकरारा ॥

हम बन्दोबस्त कियो परवेशा । छोड़ हु ज्ञान हमारो देशा ॥

तजहु ज्ञान तुम हमरो ठाऊँ । मैं प्रचण्ड लोभ मोर नाऊँ ॥

अब मैं रनमहँ अग्नि परजारौं । करि बल एक एक कै मारौ ॥

चिन्ता शक्ति पाप को मूला । कोउ न जानै मम डर भूला ॥

आशा तृष्णा तहाँ अति बहै । सुनत ज्ञान तहाँ नहिं रहै ॥

नहिं जानो तुम क्रोध औ कामा । हौं अति प्रबल लोभ मोहि नामा॥

छाड़हु ज्ञान हमारो ठाऊँ । नहिं तो तोहि धरि धरि खाऊँ ॥

लोभ जानकर ज्ञान से कहता है कि हमारा देश छोड़ दो, तुम नहीं जानते हो कि मेरा नाम लोभ है, मैं बड़ा प्रचण्ड हूँ, मेरे होते ज्ञान नहीं रह सकता है। यदि तुमने हमारा देश नहीं छोड़ा तो मैं तुम्हें खा जाऊँगा । तब ज्ञान पुनः विवेक के पास आता है और कहता है—

राजा मंत्र करो ठहराई । लोभ न मोपै जीतो जायी ॥

जो तुम लोभ जीतो आजू । तो तुम करो निकंटक राजू ॥

ज्ञान कहता है कि लोभ मुझसे नहीं जीता जाता । यदि तुम आज उसे जीत लो तो फर निर्विघ्न राज्य करना । तब मंत्री कहता है कि लोभ तो संतोष से जीता जा सकता है। अब राजा संतोष को बुलाता है और उसे समझाकर ज्ञान, भक्ति आदि के साथ रण में भेजता है।

इत भौ लोभ उत भौ संतोषा । मनसा भूमि उठयो रन रोषा ॥

लालच बाण लोभ संचारा । क्षमा बाण संतोष तेहि मारा ॥

लोभ चलावै धनुष कहँ खींची। संतोष लीन्ह सुमिरन की ऐंची ॥

चिंता शक्ति लोभ पठायी। ज्ञान शक्ति सो निष्फल जायी॥

अति दुख फाँसी लोभ कर लयऊ। उग्र ज्ञान संतोष मिटैऊ॥

परम संताप लोभ कर लयऊ । सो दया खड्ग ते निष्फल गयऊ ॥

अचेत शक्ति लोभ चलाई। जागृत शक्ति संतोष पठाई ॥

लोभ कहै पैसा तुम लहिये । संतोष कहै कुछ नहिं चाहिए ॥

लोभ कहै नीका है रूपा । संतोष कहै छाड़ि गये

भूपा ॥

लोभ कहै लेव कंचन मोरा । संतोष कहै जीवन है

थोरा ॥

लोभ कहै घोड़ा जोड़ा नीका। संतोष कहै कारज नहिं जीका ॥

लोभ कहै हीरा ल्यो लालू । संतोष कहै संग नहिं चालू ॥

साँच धनुष कर गहि धयऊ। चपल लोभ चापि दल गयऊ॥

उदासी शक्ति उरमें उपजायी । कंप्यो लोभ ज्यों विष खायी ॥

धीरज खड्ग गह्यो संतोषा । विचल्यो लोभ मिट्यो सब धोखा ॥

अब संतोष और लोभ का घमासान युद्ध होता है। लोभ हृदय में चिंता शक्ति छोड़ता है कि पैसे के बिना कुछ नहीं होगा, पर संतोष ज्ञान की शक्ति द्वारा उसका वार निष्फल कर देता है। लोभ पैसे का, सोने का, हीरे का लालच देता है, पर संतोष कहता है कि कुछ चाहिए ही नहीं, क्योंकि बड़े - बड़े राजा भी इसे यहीं छोड़ गये, कुछ भी साथ नहीं जाने वाला है और फिर जीवन की अवधि भी थोड़ी ही है। इस तरह हृदय में उदासी जगाकर लोभ को पराजित कर देता है संतोष । मोह खींझ उठता है...... अब तो राज गया । काम क्रोध विचले, विचले लोभ अकाज । महामोह मनमहँ झखे, गयो हमारो

राज ॥

काम, क्रोध और लोभ के हार जाने पर मोह मन ही मन खींझता है, भयभीत होता है कि अब तो राज्य गया।

मोह बुलाय गर्व सन कहेऊ । विचलो सबै एक तुम रहेऊ ॥

अब मेरो तुम करो सहाऊ । मोरे संग गर्व उठि धाऊ ॥

ज्ञान विवेक को मारि भगावें । जप तप साधन मारि सब लावें ॥

बोले गर्व मोह ते तबहीं। का विसात विवेक की अहहीं ॥

मेरो हंकार फिरे जेहि देशा। रहै न ज्ञान विचार को लेशा॥

बाकी सैन रहे सब जोही । लीन्ह बुलाय मोह तब ओही ॥

लीन्ह सजाय सैन बहु रंगी। मोह गर्व चढ़े एक संगी॥

मोह दल जब पहुँचे रणमाहीं । खबर भयो विवेक पहँ ताहीं ॥

सज्यो सेन तब बहु समुदाई । होय निशंक चले रण भाई ॥

उतते मोह रण रंग मचावा । इत विवेक राजा चढ़ि आवा॥

मोह तब अहंकार को बुलाकर कहता है कि अब तो एक तुम ही मेरे सहारे रह गये हो, जो ज्ञान और विवेक को मारकर मेरे देश से भगा सकते हो। आओ, हम दोनों मिलकर विवेक को अपने देश से निकाल दें। तब अहंकार कहता है कि तुम चिंता मत करो, मैं जहाँ रहता हूँ, वहाँ ज्ञान और विचार थोड़ा भी नहीं रह पाता है । तब मोह सारी सेना को सजाता है और स्वयं गर्व के साथ विराजमान होकर युद्ध के लिए प्रस्थान करता है। उधर विवेक को जब ख़बर मिलती है कि मोह राजा अहंकार को साथ लेकर पूरी सेना सहित आ रहा है तो वो भी अपनी सेना को तैयार कर रण में पहुँच जाता है ।

देख्यो गर्व मोह सकाना। करी क्रोध बाण संधाना ॥

बहु बड़ाई सो बोलन लाग्यो । ज्ञान विवेक कहाँ अब भाग्यो॥

आवे सन्मुख मोसे सब काहू । सुनत वचन नोह उत्साहू॥

बेसुध बाण गर्व तब धारा। उतते चैतन बाण सम्भारा॥

बल करि गर्व उठे समुदाई । तबहिं खवास गयो ठहराई॥

उग्रज्ञान राजा पहँ गयऊ। गर्व गँवार दृढ़ अति भयऊ॥

राजा मोकहँ आयुस देहू | कौन बाण ते

मारौ एहू ॥

गर्व का ज्ञान के साथ युद्ध होता है। उधर गर्व बेसुध करने वाले बा चलाता है तो इधर ज्ञान चेतना के बाण चलाता है, पर जब गर्व का नाश नहीं हो पाता तो वो विवेक राजा के पास जाता है और पूछता है कि गर्व को किस बाण से मारूँ ?

दीन तब बाण राजा कर लयऊ। हित कै उग्र ज्ञान कहि दयऊ ॥

मार्यो ज्ञान दीन तेहि बाना । हार्यो गर्व लाग्यो विरहाना ॥

तब राजा उसे दीनता का बाण देता है, जिसके लगते ही गर्व बिरह से व्याकुल हो उठता है। मोह अब पछताता है कि मेरी तो ख़ैर नहीं है।

गर्व मुये विकल होई, चले आप रणमाहिं ।

मनहिं मन पछतावई, मोर कुशल अब नाहिं ॥

अब मोह राजा खुद सामने आता है।

सुन्यो मोह चल्यो गलगाज । जीतन विवेक चला दल साजी ॥

पहुँची रण अस बोलै मोहा। कहाँ विवेक आऊ मम सोहा ॥

महा मोह राय मम नामा। सहो ज्ञान मोरो संग्रामा ॥

सबै उराव गयो हराय । अब नहिं होई तोर कुशलाई ॥

मैं बाण चलाओं जबहीं । क्षणमहँ होहु नाश तुम तबहीं ॥

मोह ललकारता है, विवेक और ज्ञान को कहता है कि मेरे सब सरदारों को तुमने हरा दिया है, अब तुम्हारी कुशल नहीं है, मैं अब तुम्हारा नाश कर दूँगा।

कहै विवेक बड़का हाको। करो लड़ाई नाशहि ताको॥

विवेक कहता है कि बातें करना बंद करो और लड़ाई करो, नाश तुम्हारा ही होना है।

सुनत मोह क्रोध तब कीन्हा । धनुष उठाय कर गहि लीन्हा ॥

ममता बाण तबहीं ताना । विचित्र बाण विवेक संधाना ॥

आलस शक्ति मोह उपजाई । चैतन शक्ति विवेक चलाई ॥

तब क्रोध करके मोह ममता रूपी बाण चलाता है । इधर विवेक विचित्र बाण चलाता है । मोह आलस्य शक्ति मारता है तो विवेक चेतन शक्ति मारता है। घोर युद्ध होता है ।

निद्रा शक्ति मोह संचारी । जाग्रत शक्ति विवेक तहँ मारी ॥

मोह फाँस माया बिस्तारी । विवेक विचार छिनक महँ टारी ॥

उपजायो तब मोह अँधेरा । हँसै विवेक यह बल तेरा ॥

प्रकाश बाण विवेक चलयऊ। ततक्षन अंधकार मिटि गयऊ ॥

सत्यबाण विवेक संचारा । असत खवास मोह कहँ मारा ॥

ज्ञान बाण विवेक जब छाड़ा। मूर्छित मोह महारथ पाड़ा॥

करि विवेक मोह तज दीढ़ी । विचल्यो मोह हृदय गौ पीढ़ी ॥

विच्लयो मोह दशहू दिशि गयऊ। सुपंथ सकल द्वन्द मिटि गयऊ ॥

अब मोह निद्रा शक्ति का संचार करता है, पर विवेक जाग्रत शक्ति चलाकर उसे निष्फल कर देता है । मोह माया जाल का विस्तार करता है जबकि विवेक विचार करके उससे बाहर निकल आता है । अब मोह अंधकार फैला देता है। यह देख विवेक हँसता है, कहता है कि यही तुम्हारी शक्ति है । फिर विवेक प्रकाश बाण चलाकर उसी अँधकार का नाश कर देता है । इसके बाद विवेक सत्य का बाण चलाकर मोह के सेवक असत्य को मार गिराता है । अब विवेक ज्ञान का बाण छोड़ता है, जिससे मोह भी मूर्छित हो जाता है।

कहै कबीर विवेक दल, अटल ज्ञान दल गाज ।

अब तो निर्मल हो गये, गये मोह दल भाज ॥

तो इस तरह नाम के बाद ये शत्रु कमज़ोर पड़ जाते हैं । रहते तो हैं, पर अपना काम नहीं कर पाते हैं, मूर्छित रहते हैं । साहिब तो कह रहे हैं-

सतगुरु मारा तानि के, शब्द सुरंगे बान ।

मेरा मारा फिर जिये, तो हाथ न गहुँ कमान ॥

अब देखते हैं कि जिस नाम की इतनी महिमा है, वो नाम आया कहाँ से । सुनें ।

कहाँ से आया नाम साहिब (परम पुरुष) से बिछुड़ने के बाद आत्माएँ निरंजन की कैद में आ गयीं । अब निरंजन ने एक भी जीव को अमर लोक वापिस नहीं जाने दिया। बड़े बड़े ऋषि, मुनि, योगी, तपस्वी, सन्यासी आदि सब मन के इशारे पर नाचने लगे। निरंजन ने पाप और पुण्य में जीवों को बाँध दिया। नरक और स्वर्ग में अपने पाप और पुण्य का फल भोगकर जीव मृत्युलोक में चौरासी की यातना भोगने लगे। चौरासी की महाकष्टकारक यातना के बाद उन्हें मानव तन दिया गया, जो ज्ञानमय था, पर उसमें भी उन्हें अपार कष्ट दिया गया । मानव तन को मुक्ति की प्राप्ति के लिए मिला। पर जीव निरंजन तक ही पहुँच पाए, क्योंकि अमर लोक का ज्ञान देने वाला कोई न था । इस तरह एक भी जीव अमर लोक नहीं पहुँच पाया। निरंजन सब जीवों को तप्त शिला पर भून-भून कर खाने लगा, उन्हें कष्ट देने लगा। सब जीव त्राहि त्राहि कर उठे । उन्होंने पुकार की— कहा कि यदि कोई परमात्मा है तो हमें बचाओ, काल पुरुष का कष्ट हमसे सहा नहीं जा रहा है। जीवों की वो पुकार सातवें आकाश को चीरती हुई चौथे लोक में परम पुरुष के पास पहुँची । परम पुरुष जान गये कि जीव असहनीय कष्ट में हैं। तब उन्होंने कबीर साहिब को बुलाया, कहा कि जाओ, शून्य में निरंजन जीवों को बड़ा कष्ट दे रहा है, काल के दण्ड से जीवों को आजाद करके यहाँ ले आओ।

कर परनाम ज्ञानी चले, करन हंस के काज ।

जोपै काल न मानि हैं, तुम्हीं पुरुष को लाज ।।

ऐसे में साहिब हर युग में निरंजन के लोक में आते हैं और जीवों को काल के कष्ट से छुड़ाकर अमर - लोक ले जाते हैं। पहली बार जब साहिब धरती पर आए तो 100 साल रहकर वापिस गये। पर एक भी जीव को नहीं ले जा सके। परम-पुरुष ने पूछा कि कोई भी जीव नहीं लाए। कहा—नहीं । परम- पुरुष ने पूछा- क्यों? कहा कि जिसे सुबह समझाता हूँ, शाम को भुला देता है । जिसे शाम को समझाता हूँ, वो सुबह भुला देता है । तब परम- पुरुष ने कहा कि

यह लो गुप्त वस्तु (नाम) । जिस घट में यह वस्तु दे दोगे, उसपर काल का जोर नहीं चलेगा। तब परम-पुरुष को प्रणाम करके उनकी आज्ञा से साहिब शून्य में निरंजन के लोक की ओर आए। जब साहिब आने लगे तो निरंजन झांझरी दीप साहिब के सम्मुख आया, बोला- यहाँ क्यों आए हो ? वापिस जाओ । यहाँ पर निरंजन और साहिब के मध्य बड़ी गोष्ठी हुई। साहिब ने कहा— तासो को सुनो धर्मराई । जीव काज संसार सिधाई || तप्त शिला पर जीव जरावहु । जारि वारि निज स्वाद करावहु ||

तुम अस कष्ट जीव कह दीन्हा । तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीन्हा ।।

जीव चिताय लोक लै जाऊँ । काल कष्ट से जीव बचाऊँ ।।

कहा कि हे निरंजन, तुमने बहुत छल, बल से जीवों को बाँधा हुआ है। तप्त शिला पर उन्हें अनेक कष्ट देकर आनन्द लूट रहे हो । परम पुरुष ने मुझे यहाँ भेजा है, मैं जीवों को यहाँ से छुड़ाकर अमर लोक ले जाऊँगा।

तबै निरंजन बोले बानी । सकल जीव बस हमरे ज्ञानी ।।

तिनसौ साठ पैठ उरझेरा। कैसे हंसन लेव उबेरा ।।

निरंजन ने कहा कि मैंने सबको उलझाया हुआ है। 360 ऐसे स्थान हैं, जहाँ निरंजन ने थोड़ी-थोड़ी शक्तियाँ रखी हुई हैं। उन्हीं को देख जीव उलझा हुआ है। निरंजन ने कहा कि कैसे छुड़ाओगे हंसों को ?

तब ज्ञानी अस बोले बानी । जमते जीव छुड़ावहुँ आनी ।।

पुरुष नाम को कहूँ समझाई। जम राजा तब छोड़ि पराई ।।

घाट घाट बैठे उरझेरा। हमरे शब्द ते होय निबेरा ।।

सुन रे काल दुष्ट अन्याई । शब्द संग हंसा घर जाई ||

साहिब ने कहा कि मेरे पास नाम है, जिसके सहारे हंस अमर लोक पहुँच जायेगा। अब तुम उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे । तब निरंजन ने कहा-

का ज्ञानी देहो अधिकारा। हमरो नाहिं छूटे जम जारा ।।

पाँच पचीस तीन गुन आही । यह लै सकल शरीर बनाई ।।

तामें पाप पुण्य का वासा । मन बैठा ले हमरी फाँसा ।।

जहाँ तहाँ जग भरमावै । ज्ञान संधि कुछ रहन न पावै ।।

एक शब्द की केतिक आशा । मेरे हैं चौरासी फाँसा ।।

कहा कि तुम जीवों को मुझसे छुड़ाकर नहीं ले जा सकते हो। मैंने पाँच तत्वों से शरीर की रचना की है। उस पर फिर पाप पुण्य में जीवों को बाँध दिया है। फिर मन रूप में खुद भी अन्दर समाया हुआ हूँ। किसी को सोचने भी नहीं दे रहा हूँ कि क्या मामला है। तुम्हारा एक शब्द क्या करेगा, मैंने 84 लाख फाँसें बनाई हुई हैं, एक में से निकाल दूसरी में फेंक देता हूँ । बोले ज्ञानी शब्द विचारी । छूटे चौरासी की धारी ।

छूटै पाँच पचीस गुण तीनों । ऐसा शब्द पुरुष मैं दीन्हो ।।

साहिब ने कहा कि मेरे पास बड़ा जबरदस्त नाम है, जिस घट में दे दूँगा, उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे, वो आजाद हो जायेगा । निरंजन ने कहा-

हे ज्ञानी का करो बढ़ाई। हमते नाहिं छूट जीव जाई ।।

इतने युग भये तुम देखा । ज्ञानी हंस न एको पेखा।।

का तुम करो का शब्द तुमारा । तीन लोक परलय कर डारा ।।

साधु संत हम देखी रीति । परलय परे सकल जगग जीति । ।

करम रेख बाँधै सब साधा। सुन नर मुनि सकलो जग बाँधा ।।

कहा कि इतने युग हो गये, क्या एक भी हंस सतलोक पहुँचा। मैंने इतनी ताक़त से जीवों को बाँधा हुआ है कि छूट नहीं सकते हैं। तुम और तुम्हारा एक शब्द क्या कर लेगा । मैं तीन लोक का नाश कर देता हूँ । निरंजन ने कई बार सृष्टि का प्रलय भी किया है । जलेबी बना देता है दुनिया की । ये सब काम साहिब के नहीं हैं। तो निरंजने ने कहा कि इतने पर भी कर्मों में जीव को बाँधा हुआ हूँ। आम आदमी की क्या बात है, देवता, मुनि आदि सबको बाँधा हुआ है। एक भी हंस को जाने नहीं दूँगा ।

ज्ञानी कहै काल अन्यायी । शब्द बिना तू खाय चबायी ।।

हंस हमारा शब्द अधिकारा । पुरुष परताप को करे सम्हारा ।।

नाम जपै अरु सुरति लगाई । मिले कर्म लागे नहीं काई ।।

शब्द मानि होय शब्द सरूपा । निश्चय हंसा होय अनूपा । ।

साहिब ने कहा कि हे निरंजन, तब इनके पास सच्चा नाम नहीं था, तूने खा लिया। अब मैं परम पुरुष का बड़ा जबरदस्त नाम दूँगा और तुम्हारा जोर अब जीव पर नहीं चलने दूँगा । पाप और पुण्य का ज्ञान भी जीव को अन्दर से होता जायेगा। नाम उनकी रक्षा करेगा और सब बंधनों से छुड़ाकर अमर - लोक ले जायेगा।

निरगुन काल तब बोले बानी । उरझे जीव सकल जमखानी।।

कैसे के तुम शब्द पसारो । कौने विधि तुम जीव उबारो ।।

ऐसे जीव सकल हैं करनी । कैसे पहुँ चैं पुरुष की सरनी।।

जग में जीव क्रोध विकारा । कैसे पहुँचै पुरुष के द्वारा ।।

निरंजन ने कहा कि मैंने काम, क्रोधादि विकारों में जीव को फँसा दिया है। फिर वे परम पुरुष के लोक में कैसे पहुँचेंगे। इस पर भी यम के 14 दूत मैंने प्रत्येक शरीर में बिठाए हुए हैं। तुम उन्हें कैसे निकालोगे ? कहा कि जीव बड़ा गंदा हो गया है, तुम्हारी बात कोई नहीं मानेगा ।

ज्ञानी कहे करहु वरियारा। हमतो कीन्ह सकल निरवारा ।।

जोई ज्ञानी होय हमारा। काम क्रोध ते होय नियारा ।।

तृस्ना लोभहि देई बहाई । विषै जन्म सब दूर पराई ।।

नाम ध्यान बल हंसा घर जाई । क्या रे काल तुम करो बड़ाई ।।

साहिब ने कहा कि जिस शरीर में नाम दे दूँगा, वहाँ तेरा जोर नहीं चलेगा। वहाँ काम, क्रोध आदि कुछ नहीं कर सकेंगे और वो जीव निर्मल हो जायेगा। तुम उस जीव को छू भी नहीं पाओगे और वो हंस रूप होकर अपने देश चला जायेगा |

कहे निरंजन सुनो हो ज्ञानी । कथि हो ज्ञान तुम्हारी बानी ।।

युगत महात्म सबै बताऊँ । तुम्हारा नाम ले पंथ चलाऊँ ।।

अब निरंजन अपनी जगह पर आया, कहा कि मैं भी तुम्हारा नाम लेकर अपना पंथ चलाऊँगा यानी नकली नाम का प्रचार करूँगा । आज आप देखें तो सभी सद्गुरु बने हुए हैं, सभी संत बने हुए हैं, सभी नाम दे रहे हैं। यह सब निरंजन का ही खेल है। बात वे निरंजन की ही कर रहे हैं और मोहर संतों की लगा रखी है। तो निरंजन ने यह भी कहा

ज्ञानी मोर अपरबल ज्ञाना । वेद किताब भरम हम माना । ।

इनको माने सब संसारा । कलि में गंगा मुक्ति द्वारा।।

देही दान से उतरे पारा। ऐसे सुमृत कहे विचारा ।।

यह विधि जग जीव भुलाहीं । जरा मरन सब बंध बंधाहीं ।

सूतक पातक वेद विचारा। पूछ वेद से करहि संहारा ।।

एकादशी मुक्ति को भाई । योग जग्य करवे अधिकाई ॥

कहा कि मैंने वेद आदि के द्वारा कर्मकाण्डों में जीव को उलझाया हुआ है। सब इन्हीं को मानते हैं। वेद में निरंजन ने अपनी ही बात की है । उसी ने बनाए हैं वेद । इसलिए साहिब का रहस्य उसमें नहीं दिया। तो उसने कहा कि कोई तुम्हारी बात नहीं मानेगा, इसलिए मत जाओ दुनिया में । साहिब ने कहा—

सुनहु काल ज्ञान की संधि । छोरो जीव सकल की फँदी ।।

जब निज बीरा हंसा पावै । योग बरत तप सबै नसावै ।।

वेद किताब की छोड़े आसा । हंसा करे शब्द विस्वासा ।।

ताके निकट काल नहिं आवै । निज बीरा जो सुरत लगावै ।।

जोग बरत पतहू है छारा । अद्भुत नाम सदा रखवारा ।।

कहा कि जिसे नाम मिल जाएगा, उसका सारा वहम अन्दर से धुल जाएगा। वो फिर कर्मकाण्डों को छोड़कर नाम में ही विश्वास करेगा । नाम सदा उसकी रक्षा करेगा । काल उसके निकट नहीं आ पायेगा । नोट- सत्यपुरुष का पाँचवां पुत्र निरंजन है जिसको निराकार, निरंजन, नारायण, अथवा मन आदि नामों से जाना जाता है जिसे संसारिक लोग राम, ब्रह्मा, आदि निरंजन, कादर, क्रीम, प्रमेश्वर, प्रमात्मा, हरी, हरि, अद्वैत, भगवान, तथा अलख निरंजन आदि नामों से याद करते हैं । इसी निरंजन के ग्रंथ पोथियों में हज़ारों नाम लिखे गए हैं।

जब निरंजन की बात न चली, वो कटने लगा तो उसने क्रोधित होकर कहा कि तुमने पहले भी मुझे मानसरोवर से निकाला था और अब मेरी दुनिया में तुम आए हो, इसलिए मैं बदला भी लूँगा । यह कह निरंजन ने विकराल हाथी का रूप धारण किया और साहिब पर झपटा।

ज्ञानी पुरुष शब्द कियो जोरा। पकड़ सूँड़ दाँत गहि मोरा ।।

मारेऊ शब्द पाँय पर पेली । तोर सूँड़ समुद्र गहि मेली ।।

पुरुष रूप तबहीं पुनि धारा । जौन सरूप सकल औतारा ।।

साहिब कह रहे हैं कि तब मैंने वहाँ परम पुरुष का रूप धारण किया, अपने मूल रूप में आया और उसकी सूँड़ पकड़कर समुद्र में फेंक दिया। तब निरंजन अधीन हुआ, कहा कि क्षमा करो, मैंने आपको पहचाना नहीं था, आप तो स्वयं साहिब हैं, मेरा बड़ा भाग्य है कि जो आपने मुझे दर्शन दिये। अब आप दुनिया में जाएँ, पर मेरी भी एक विनती सुनें। कहा कि यदि आप सभी जीवों को अपने लोक ले जायेंगे तो मेरे शाप का क्या होगा । (क्योंकि निरंजन को रोज एक लाख जीव निगलने का शाप मिला था ) । निरंजने ने कहा कि जो जीव पाप कर्म करेंगे, क्या वो भी पार हो जायेंगे । तब साहिब ने कहा कि जो जीव मेरे शब्द पर चलेंगे, मेरा कहा मानेंगे, उन्हें तुम हाथ भी नहीं लगाओगे। पर दूसरी ओर जो मेरे शब्द के विपरीत चलेंगे, उन्हें तुम ले जाना ।

सुनो निरंजन वचन हमारा। नहीं सत्त वो जीव तुम्हारा ।।

इस तरह साहिब का निरंजन से करार है । यही कारण है कि मैं आपसे कह रहा हूँ कि भजन हो सके तो करना नहीं तो कोई बात नहीं है, पर नाम लेकर ग़लत नहीं चलना। जो वस्तु दी, उसे संभालना। किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं करना । सत्य नाम निज औषधी, खरी नियत से खाय

औषध खाय अरु पथ रहै, ताकी वेदन जाय ।।