करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
संशोधित रूप है । यदि साधारण शब्दों में कहा जाए तो परम सत्ता स्वयं जीवों को छुड़ाने में संभव नहीं है, इसलिए वो चंदन के पेड़ की तरह है, जबकि गुरु उस समीर की तरह है, जो परम सत्ता की महक, परम सत्ता का प्रकाश घट- घट में प्रकट कर देते हैं। इसलिए संतों ने गुरु को परमात्मा की बराबरी में भी खड़ा नहीं किया, बल्कि बड़ा कहा । इसलिए यह तो तय है कि गुरु का ध्यान ही सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि-
ताते सर्वा रंभ में, गुरु के सुमिरन मात्र से, विनशत विघ्न अनन्त । ध्यावत हैं सब संत।।
संत-सद्गुरु का ध्यान करने से ही हमें आध्यात्मिक शक्तियों की प्राप्ति होती है। याद रहे, किसी तप से, किसी योग से ये शक्तियाँ हमें नहीं मिल सकती हैं। योग से केवल दिव्य शक्तियों की प्राप्ति हो सकती है, आध्यात्मिक शक्तियों की नहीं । वास्तव में जब भी हम महापुरुषों के पास जाते हैं, संत- सद्गुरुओं के पास जाते हैं तो तीन तरह से परम सत्ता की किरणें, या दूसरे शब्दों में परमात्म-शक्तियाँ हमें मिलती हैं। पहले वाणी द्वारा । जब भी हम महापुरुषों सत्संग में जाते हैं तो सबसे पहले जब हम उनकी वाणी को ध्यान लगाकर सुनते हैं तो ये शक्तियाँ हमें मिलती हैं । जैसे तार पर चलती हुई बिजली हमारे कमरे तक आ जाती है, इसी तरह संत-महात्माओं की वाणी पर ये शक्तियाँ चलती हुई हम तक पहुँच जाती हैं। दूसरे दृष्टि द्वारा भी ये आध्यात्मिक शक्तियाँ हमारे पास पहुँचती हैं। संत-महापुरुषों की बंदगी के समय उनके साथ दृष्टि मिलाने से भी यही तात्पर्य है कि वे अपनी दृष्टि द्वारा हमें आध्यात्मिक शक्तियाँ प्रदान करें। जब भी हम महापुरुषों के दर्शन को जाते हैं तो सर्वप्रथम उनसे दृष्टि मिलाने का प्रयास करते हैं और चाहते हैं कि उनकी दृष्टि हम पर पड़े। इसलिए यदि दृष्टि न मिले तो समझो कि दर्शन नहीं हुए। फिर तीसरे स्पर्श से भी ये शक्तियाँ हमें मिलती हैं । कहीं भी स्पर्श करके ये शक्तियाँ ली जा सकती हैं, पर अदब के लिए केवल पाँव छूना ही नियम बना दिया गया। महापुरुषों के पास जाने मात्र से हमें इतनी शक्तियाँ मिल जाती हैं । इसी तरह ध्यान से भी ये शक्तियाँ हमें मिलती हैं। जिन स्थितियों में हम गुरु का दर्शन नहीं कर पाते हैं, उन स्थितियों में हमें गुरु का ध्यान करना चाहिए। संभव हो सके तो गुरु का दर्शन करके सीधे ये आध्यात्मिक शक्तियाँ लेनी चाहिए, पर
यदि ऐसा संभव नहीं हो सके तो उसका विकल्प है - ध्यान ।
यह ध्यान बड़ी ही लाजवाब चीज़ है । हमारा ध्यान जितनी देर जिसमें मा हुआ है, हम भी उतनी देर वैसे ही हो जाते हैं । यदि हमारा ध्यान थोड़ी देर के लिए क्रोध की ओर हो जायेगा तो हम भी उतनी देर के लिए क्रोधमय हो जायेंगे। यदि यह ध्यान आनन्द की तरफ हो जायेगा तो हम भी आनन्दमय हो जायेंगे। इसी तरह सद्गुरु का लगातार ध्यान करने से हम भी उनकी तरह हो जायेंगे। जब हम सद्गुरु का ध्यान करते हैं तो भी हमें परमात्मा की अद्भुत ताक़त मिलती है, इसलिए हमें सब संशय छोड़कर केवल गुरु का ही ध्यान करना चाहिए। धर्मदास जी ने साहिब से पूछा कि परम-तत्व की प्राप्ति कैसे करें ? साहिब ने एक ही शब्द में सारा रहस्य कह दिया, कहा- गुरु में सुरति लगा देना, बाकी काम वो खुद कर लेगा । सकल पसारा मेट कर, गुरु में देय समाय ।
कहैं कबीर धर्मदास से, अगम पंथ लखाय ।।
मैं सिरजौं मैं मारऊँ, मैं जारौं मैं खाऊँ ।
जल थल नभ में रमि रहा, मोर निरंजन नाऊँ ।।
मैं ही अमरधाम परमपुरुष का पंचम शब्द पुत्र हूँ । मैं ही विमूढ़ वरदान लेकर, परमपुरुष से शापित हूँ । मैं ही आद्यशक्ति-सह-हँसों को ले कालपुरुष कहाता हूँ ।
मैं ही निरंजन अमरधाम के मानसरोवर से निष्कासित हूँ।
मैं 'मन' ही आत्मरूप तीन लोक में वासित हूँ ।।
ध्यान करते समय.......
आत्मा के पास एक वांछक ज्ञान है, एक परा ज्ञान है। एक तो क्रियाओं को देखकर, मानव समाज को देखकर सीख लेते हैं, वो बुद्धि से समझा जाता है । पर एक, जो स्वतः ही हमारे अंदर ज्ञान है, वो सही ज्ञान है । कभी-कभी आपके अंदर ज्ञान के भावों का उद्गम होता है। यह क्या है ? यह ज्ञान आपमें है। आत्मा ज्ञान का स्रोत है, क्योंकि परमात्मा का अंश होने के कारण यह ज्ञानमयी है । कभी आप देखते हैं कि आप किसी के विचारों को सुनना चाहते हैं । कोई आत्मा के नज़दीक पहुँच जाता है । उसे चाहे कोई नहीं बताया, पर ऐसे विचार उठने लगते हैं । 'सबकी गठरी लाल है, कोई नहीं कंगाल।' यह ज्ञान स्वतः ही उठने वाला है । यह कहीं प्रगट है तो कहीं गुप्त । यह शिक्षित, अनपढ़, अमीर, ग़रीब सबमें परिपूर्ण है, इसलिए केवल जगाने की ज़रूरत है। गुरु उर्जा हृदय को प्रकाशित करती है । गुरु नाम दान के समय अपनी सुरति देता है । पर शिष्य का भी सहयोग चाहिए । रहनी बोल रहे हैं— 'नाम सत्य गुरु सत्य, आप सत्य जो होय ।' आपको भी सत्य होना होगा । ‘वाणपति जागसी, काह करे तसकरा ।' यदि घर का मालिक जाग रहा हो तो चोर क्या कर सकता है ! 'उसको काल क्या करे, जो आठ पहर हुशियार ।' हमेशा सुरति में रहना, चेतन रहना; चुपचाप बैठकर देखना कि मन क्या कर रहा है । मन अचेतन अवस्था पसंद करता है । यह परेशान करेगा । यह थकान अनुभव करायेगा । मन को ऊब होती है। जब भी आप ध्यान में बैठते हैं तो पाँच बातों को ध्यान में रखें। ध्यान के सूत्र बोलता हूँ । 1. कमर को सीधा करके बैठना । कमर का दिमाग़ से संबंध है। इसी के सीधे रहने से ही सुषुम्ना खुलेगी। इसी के सीधे रहने से 10वाँ द्वार खुल सकता है। 2. स्वाँसा में भजन चलता रहे। जैसे बैल को रस्सी से बाँधकर खूंटे से बाँध देते हैं तो इधर-उधर नहीं जा सकता है । इस तरह मन को बाँधने के लिए
सुमिरन करना है। यदि सुमिरन नहीं चल रहा है तो समझो कि मन ने भटका दिया है। यह सुमिरन मन को बाँधने के लिए है।
सुमिरन मन की रीत है, भावे जहाँ लगाय ।
भावे गुरु की भक्ति कर, भावे विषय कमाय ॥
यह फ्री नहीं रह सकेगा । जैसे आँख खुली है तो कुछ-न-कुछ दिखेगा। ऐसे ही मन कहीं-न-कहीं लगेगा । इसलिए-
चिंता तो गुरु नाम की, और न चितवे दास।
जो कछु चितवे नाम बिनु, सोई काल को फाँस ॥
3. ध्यान-भजन में बैठे हुए हिलना-डुलना नहीं है।
4. मन पर नज़र रखनी है। मन की कोशिश होगी कि किसी तरह से आपकी
सुरति को घुमाकर ले जाए। क्योंकि वो जानता है कि एकाग्र होने पर आत्मा
अपने को जान लेगी और तब मेरी बात नहीं मानेगी । मन कोई भेड़, बकरी
नहीं है जो नज़र रखो। इसके चार रूप हैं । जब यह इच्छा करता है तो इसे मन
कहते हैं। यदि कोई भी इच्छा हुई तो समझो कि यह मन है। मन उन्हीं
इच्छाओं में घुमा देगा। मन ने इच्छा की तो आपकी सुरति घूमने लगी । बड़ी
चालाकी से घुमाता है। मान लो, मन ने इच्छा की कि घर बनाना है। अब वहीं
घुमाता रहेगा। मिस्त्री, बट्टे, सीमेंट में ही घूमते रहोगे । अब ध्यान में बैठने का
क्या लाभ! यह काम मन का है । यदि इच्छा को कण्ट्रोल कर लो तो मन
का दूसरा रूप सामने आता है । फिर मन कुछ पुरानी बातें याद दिलाने लगेगा।
किसी ने आपको गाली दी थी तो वहीं ले जायेगा । 10 साल पहले किसी ने
आपको कुछ कहा था तो वहाँ ले जाकर पटक देगा। आप सोचने लग जायेंगे ।
मनवा तो दस दिस फिरे, यह तो सुमिरन नाहिं ॥
यह नज़र गहरी रखनी पड़ेगी। इससे यह लाभ होगा कि पता चल जायेगा कि यह मन किस तरह से भ्रमित कर रहा है ।
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
कहैं कबीर गुरु पाइये, मन ही की परतीत ॥
मन से हमेशा सावधान रहना । अगर चित्त को रोक दोगे तो फैसला लेने लगेगा। यह मन का तीसरा रूप बुद्धि है । मन चाहता है कि आप किसी भी तरह से अपने आप को न जानें। यदि आपने अपनी आत्मा को जान लिया तो
मन की ताक़त ख़त्म हो जायेगी। क्योंकि आत्मा को बाँधने वाला कोई नहीं है। इसने स्वयं अपनी ही ताक़त अपने ख़िलाफ़ लगा रखी है।
आपा को आपा ही बंध्यो ॥
साहिब कह रहे हैं कि इस आत्मा ने स्वयं अपनी ताक़त से अपने को बाँध दिया है। जैसे स्वान काँच मंदिल में, भरमत भूँक परयो । जैसे काँच के महल में रहने वाला कुत्ता शीशे में अपनी ही परछाई को दूसरे कुत्ते समझ भौंकता - 2 प्राण गँवा देता है। उसने अपने ख़िलाफ़ ही अपनी ताक़त लगाई। ऐसे ही आत्मा भी भ्रमवश स्वयं अपना विनाश कर रही है । इस तरह मन फिर शारीरिक तौर से उलझाने की कोशिश करेगा। ऐसे में इसका चौथा रूप अंहकार सामने आता है । कहेगा कि पाँव सो गया है; कहीं कहेगा कि हाथ थक गये हैं । इस तरह किसी-न-किसी तरह से परेशानी में डालेगा। फिर कहीं कुत्ता ही भौंक देगा, कहीं मच्छर ही काट लेगा। आप उसी के पीछे लग जायेंगे । इसलिए-
समझ पड़े जब ध्यान धरे ॥
आत्म-कल्याण से परे जितनी उर्जा लगा रहे हो, फिज़ूल है। केवल आत्म-साक्षात्कार के लिए यह जीवन मिला है । पर हम शरीर की ज़रूरत के लिए ही सावधान हैं । क्योंकि शरीर की ज़रूरत समझ रहे हैं । आत्मा के लिए फुर्सत नहीं है । किसी ने आत्मा का महत्व नहीं समझा। जो घूमने का शौकीन है, फिज़ूल भी घूमता रहता है । इस तरह आत्म-कल्याण की लग्न होनी चाहिए । जब भी मौका मिले, नाम - भजन में लग जाना चाहिए। एक ने मुझसे पूछा कि नाम - भजन किस समय करना चाहिए? मैंने कहा कि कभी भी कर लो। वो बोला कि कैसे करें? मैंने कहा कि यदि समय न मिले तो चलते-फिरते भी कर सकते हैं, लेटे-लेटे भी कर सकते हैं। पर वैसा भी नहीं करना जैसे एक पटवारी का बेटा कर रहा था। एक दिन पटवारी आकर कहने लगा कि आपने हमारे बेटे को सोने का लाइसेंस दे रखा है; वो सोता ही रहता है। कहा कि वो छोटेपन से अधिक सोता है । पहले तो हम उठा देते थे, पर जबसे आपका नाम लिया है, हम उसे उठा नहीं पाते हैं। मैंने पूछा—क्यों ? वो बोला कि जब भी उसे उठाओ तो कहता है कि मैं ध्यान में हूँ।
क्योंकि पहले मैं लेटे - 2 भी ध्यान - भजन के लिए बोल देता था । पर अब नहीं बोलता हूँ । यह तो मैंने उनके लिए कहा कि जो बैठकर न कर सकें । पर जवान आदमी को तो बैठकर करना चाहिए । तो यह शौक से होना चाहिए । बैठने की फार्मेलिटी नहीं हो । जब भी ध्यान में बैठें तो कोई हरकत न हो। अगर हरकत हो रही है तो वो ध्यान नहीं है फिर । साहिब ने सरल शब्दों में कहा - मन की तरंग मार लो, हो गया भजन.... । इसलिए ध्यान - सूत्र का दूसरा सिद्धांत है कि मन एकाग्र रहे। आपकी सोच होगी कि इसे वश में कैसे करें ! मन के चार रूप हैं - मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार । मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का निग्रह ही ध्यान है; क्योंकि इनके बाद जो बचा, वही आत्मा है। मन की तरंग मार लो हो गया भजन....... कोई भी इच्छा नहीं करना, इच्छा मन का रूप है। इसलिए दूसरा काम यह हो। यह मन इच्छाओं में घुमाना चाहेगा, पर नहीं करना । कभी कहेगा कि बच्चों को इस स्कूल में ले जाना है, कभी कहेगा कि उसके पास जाना है, कभी कहेगा कि कुछ खा लेते हैं, कभी इच्छा होगी कि कुछ और काम कर लेते हैं । ध्यान में बैठे हुए किसी इच्छा पर चिंतन नहीं करना । तीसरा कोई भी निर्णय नहीं लेना। इच्छा होती है तो आप उसपर कुछ निर्णय लेने लगते हैं। नहीं लेना । कोई फैसला करना ही नहीं है, चाहे कितना भी कहे मन । गुरु को समर्पित होना भी यही है। फिर चौथा कुछ भी याद नहीं करना । यह मन बहुत कुछ याद करायेगा। यह चित का काम है । इस चित को पकड़ना । कुछ याद नहीं करना, गुरु के अलावा। बस, आप गुरु को समर्पित हो रहे हैं । यह गुरु की तोहीन समझो कि उनके अलावा कुछ और याद आ रहा है। फिर पाँचवाँ कोई क्रिया नहीं करना। हिल-डुल नहीं हो । कभी टाँगें कहेंगी कि थक गयी हैं, कभी शरीर कहेगा कि आराम कर लेते हैं । नहीं मानना । इच्छा पर नियंत्रण करो तो बुद्धि आ जाती है। बुद्धि पर नियंत्रण करो तो चित्त आ जाता है । कहीं किसी का चेहरा सामने आ जाता है; उसकी आकृति दिखने लगती है । उसने कहीं 2 महीने पहले आपको गाली दी, वो याद आने लगता है, क्रोध उत्पन्न होने लगता है, बुद्धि प्लैनिंग करने लगती है
कि बदला कैसे लें। देखा, इतनी चीजें एक-साथ आ गयीं । आप उलझ गये और ध्यान कहीं का कहीं चला गया। मानत नहीं मन मोरा साधो, मानत नहीं मन मोरा....... मन बहाए जा रहा है। कहीं कल्पनाओं में, कहीं इच्छाओं में। इच्छा करनी है, तो भी आत्मा का साथ चाहिए । आत्मा के बिना कुछ नहीं हो सकता। चित्त भी आत्मा के सहयोग बिना कुछ याद करने में सक्षम नहीं । इसलिए समझ आ गया तो मन को काबू करना मुश्किल नहीं है। मन की क्रिया स्वाभाविक नहीं है। आत्मा के साथ बिना कुछ नहीं हो सकता। स्वाँसा खुद नहीं चल रही है; आप ले रहे हैं; लेने के लिए एक क्रिया कर रहे हैं। वो कोई ले रहा है। आँखों के पीछे बैठ कोई चेतन ले रहा है। बस, जब आप इन पाँच बातों को देख लेंगे, मन वश में हो जाएगा और आप गुरु को समर्पित हो जायेंगे। तब ही आपका ध्यान जम सकेगा । ध्यान में यह मत सोचना कि अब यह दिखे, अब उडूं, अब चाँद दिखेगा, अब सूर्य दिखेगा। यह भी मन का खेल है। आप बस देखना कि यह मन कहाँ जा रहा है । मन को पकड़ना है; उसे ही मारना है । इसे ही कहते हैं 'मैं' को मारना । जब 'मैं' मर गयी तो समझो मन मर गया। इस मन को मारकर ही तो उस दुनिया में जाना है। जब मन के चारों रूपों – मन, बुद्धि, चित और अहंकार को हरकत नहीं करने दोगे तब वो पल आ जायेगा, जिसके लिए आप ध्यान करते हैं । भक्ति- भक्ति सब जगत बखाना, भक्ति भेद कोई बिरला जाना । आगे भक्त भये भव सारी,
करी भक्ति पर युक्ति न धारी ॥
10. ऐसे करें सतगुरु भक्ति
ऐसे करें सतगुरु भक्ति
क्यों करें गुरु भक्ति गुरु-भक्ति क्यों करें? क्या पड़ी है गुरु- सेवा की ? सीधा परमात्मा (परम- पुरुष) की भक्ति कर लेते हैं। आख़िर गुरु-भक्ति के लिए क्यों बोला गया ?
शिष्य को ऐसा चाहिए, गुरु रिझाय आपा खोई ॥
समझें। वो परमात्मा निर्द्वन्द्व है, मायातीत है, व्योमातीत है । उसकी तरंगें आपको नहीं समझा सकती हैं। वो आपको नहीं समझा सकता है । आप उसे नहीं समझ सकते हैं। जबकि गुरु माया में है, मन में है, इंद्रियों में है, इसलिए वो आपको समझा सकता है, आप उसे समझ सकते हैं। वो माया में रहते हुए भी माया से परे है । पर वो इसमें रह रहा है, इसलिए वो आपको ठीक से समझा सकता है, पर परमात्मा (परम - पुरुष ) आपको समझाने में सक्षम नहीं है। आप परम-पुरुष को समझ सकने में सक्षम नहीं हैं । इसलिए उसकी भक्ति करना चाँद पर पत्थर फेंकने की तरह है । साहिब ने तो धर्मदास से कहा कि परम-पुरुष की भक्ति का कोई मतलब नहीं है, कोई लाभ नहीं है। बेकार है उसकी भक्ति करना । जैसे सूर्य को आप स्थूल आँखों से नहीं देख सकते हैं। अँधेरा छा जायेगा। पर चंद्रमा की तरफ देख सकते हैं । उसमें जो प्रकाश है, वो भी सूर्य का ही है, पर वो सौम्य है । इस तरह गुरु सहज है । गुरु में वो सत्ता चेतन है । सत्य पुरुष की आरसी, संतन केरी देह । लखा जो चाहे अलख को, इन्हीं में लख
लेह ॥
इसलिए गुरु-भक्ति बोली । कैसे करें गुरु भक्ति जो-जो गुरु ने मना किया, वो कतई नहीं करना । वो मनमुखता है। जो- जो गुरु ने बताया, केवल वही करना । यही गुरुमुखता है। यही गुरु-भक्ति है ।
गुरुमुख लाहा चले, मनमुख मूल गँवाय ॥
लाहा व्याज को कहते हैं ।
मनमुख चले मूल गँवाय ॥
वो तो मूल ही गँवा देता है। यानी जो गुरु ने पूंजी दी, वो ही गँवा देगा । इसलिए गुरु-भक्ति को समझें । मनमुखता से बचें अब आपको सद्गुरु के अलावा कहीं और भटकना नहीं है। नहीं तो भक्ति दूषित हो जायेगी। जो-जो सद्गुरु कहे, वही करना । जो बातें मना करे, वो कतई नहीं करना। जो-जो बातें वर्जित हैं, मना हैं, मनमुखता की पहचान हैं, वो समझ लें। सयानों के पास नहीं जाना है चाहे कुछ भी हो जाए, सयानों के पास नहीं जाना है। आपको भूत लग ही नहीं सकता है। वो केवल भ्रमित ही करेगा। एक - एक सयाने से विस्तार से पूछता हूँ कि क्या करते हो? एक अखनूर वाले सयाने का पुंछ, राजौरी तक संबंध था। पहले हमारी निंदा करता था, अब भक्त हो गया है । मैंने उससे पूछा कि क्या करते हो ? हत्या कैसे बुलाते हो ? कहा कि यह मत पूछो। मैंने कहा—नहीं, जानना चाहता हूँ। कहा कि हमारी एक टीम होती है। मिलकर काम करते हैं । हम चार लोग थे । उसमें किसी का 20 प्रतिशत होता था, किसी का 30 प्रतिशत हिस्सा था और किसी का 40 प्रतिशत हिस्सा था। कहा कि इसमें ग्राहक बिठाने पड़ते हैं। पहले देखते हैं कि फलाना काकू मानो सीधा है, बीबी भी सीधी है । अब ऐसा होता है कि हममें से एक काकू के घर के बाहर रात को किसी पेड़ पर छिपकर पत्थर फेंकेगा। फिर अजीब-अजीब आवाजें लगाकर काकू को पुकारेगा। अब काकू जब बाहर आयेगा तो पेड़ पर तो रात को दिखता नहीं । वैसे भी ध्यान वहाँ नहीं जाता । तो काकू वापिस अन्दर.... । पर एक थोड़ा-सा डर पैदा हो गया। अब दूसरे का काम है कि काकू के घर रात को जाकर कटड़ा खोल देना । वो रजकर दूध पी लेगा। सुबह जब काकू की बीबी दूध दुहने लगे तो भैंस टाँग मारेगी। अब संशय बढ़ गया। फिर तीसरा किसी बहाने से जाकर पूछता है कि फलाने का घर कहाँ है ? फिर
पानी पीने के बहाने बैठ जाता है । अब यहाँ-वहाँ देखकर कहेगा कि आपके घर तो कुछ ग़लत लग रहा है, ज़रूर कोई चीज़ है । तो काकू की बीबी झट से कहती है कि हाँ, हाँ, हमें भी लगता है। अब वो कहता है कि बहुत बड़े सयाने का नाम सुना है; वो वहाँ है; पूरा तो पता नहीं, पर रहता वार्ड नम्बर इतने में है शायद। यानी सब पता दे देता है। शाम को काकू घर आता है तो बीबी कहती है कि परेशानी है । वो कहता है कि क्या करें ? फिर वो बताती है सयाने का पता । काकू वहाँ पहुँचता है । अब चौथा मैं वहाँ होता हूँ । मुझे पता है कि आने वाला है । काकू परेशानी बताता है । मैं कहता हूँ कि मेरे पास समय नहीं है, मैं नहीं पहुँच सकता। वो कहता है कि आज ही चलो, घर की हालत ख़राब है, कोई मर भी सकता है । फिर मैं चलता हूँ। फिर कहा कि क्या होता है कि कभी खुद ही ढोल पीटता हूँ। अगर माँ जिंदा है तो कहता हूँ कि दादी की हत्या आ गयी है घर में। चीज़ बड़ी ख़तरनाक है, ऐसे नहीं जायेगी, यह - यह करना पड़ेगा, खर्च काफ़ी आयेगा । काकू बेचारा नीमा हो जाता है........ इतना नहीं कर पाऊँगा। तो मैं कुछ कम कर देता हूँ। फिर डायरी लेकर लिखता हूँ कि इस दिन इसके घर । ऐसे कहीं ढोल पीटना, किसी को डोरा - ताबीज देना, कहना कि अब तीन महीने या चार महीने तक कुछ नहीं हो सकता। वो भी खुश रहता है कि अब कुछ नहीं हो रहा है, सोचता है कि कल्याण है। फिर पहले वाला तीन महीने बाद शुरू हो जाता है बट्टे । कहा कि जिंदगीभर नहीं छोड़ते हैं, जिसे एक बार पकड़ लेते हैं। कहा कि कभी-कभी मार भी पड़ जाती है। एक की हत्या निकालने गये तो एक को हिस्सा कम दिया। बाद में वो नाराज़ हो गया, जाकर घर वालों को सच सच बता बैठा । जब अगली बार पहुँचे तो गाँव वालों ने धुनाई कर दी। भागे कहीं कहीं। ख़ैर, जमाना बदल रहा है। अब शास्त्री आ रहे हैं, सतवा कर रहे हैं। सयाने शास्त्रियों के रूप में बदल गये हैं । रोल बदल दिया । क्यों ? क्योंकि सयानों को समझ रहे हैं लोग । जब मैं यहाँ आया तो जागराते होते थे । लोगों ने फेल किया । फिर वही सयाने के रूप में बदल गये । अब वही सयाने शास्त्री हो रहे हैं । जिसने इस तरह का धन खाया, दूसरा धन नहीं का सकता । जिस शेर ने आदमी का माँस खा लिया, फिर उसे किसी जानवर का माँस अच्छा नहीं लगता, क्योंकि आदमी का माँस स्वादिष्ट है । इस तरह वे सयाने फिर कमाकर
नहीं खा सकते। तो जागराते वाले ही सयाने बन गये । फिर वही टीम अब शास्त्री बन गये हैं । जितने शास्त्री हैं, भूत-प्रेत वाला काम भी कर रहे हैं । आपको जो नाम दिया, उससे भूत-प्रेत की नानी भी भाग जायेगी । अन्दर में बैठे यम के 14 दूतों की भी वो नाम ख़बर लेता है । फिर बाहर के भूत क्या करेंगे !
अद्भुत नाम सदा रखवाला ॥
इन चीज़ों पर आदमी नहीं चल रहा है । माई का दोनू, पोत्र नहीं आए दो साल तक तो बहू को सयाने के पास ले जाती है। आलम यह है कि एक माई का सब्जी काटते-काटते हाथ कट गया तो सयाने के पास चली गयी; कहा कि पड़ौसिन डायन है, उसने कुछ कर दिया है। अरे भोली माई, पहले डॉ० के पास जा, खून बह रहा है। एक ने कहा कि मेरी मंज बीमार हो गयी है, बाहरी नुक्स है। मैंने पूछा कि नाम लिया है? कहा- हाँ । मैंने कहा तो क्यों वहम में है ? वो बोली कि सयाना कह रहा है कि नाम तूने लिया है, मंज ने थोड़ा लिया है। भूत मंज को लगा है। मैंने कहा कि उसने तो कहना ही है । फिर किसी माई का बच्चा बीमार था तो आस-पास लोगों ने कहना शुरू किया कि ऐसे-ऐसे बाहरी चीज़ है । मैंने कहा कि नाम लिया है ? कहा- हाँ । वो बोली कि वो कह रहे हैं कि बच्चे ने नहीं लिया है। भूत तो बच्चे को लगा है। यानी आप शुद्ध भक्ति में न जा पाएँ, इसलिए करते हैं ये सब तमाशे । तो जब मैंने लोगों को इन्हीं में उलझे देखा तो सोचा कि सिलसिला यहीं से शूरू करते हैं; बारीक भक्ति की बात बाद में करेंगे। मैंने समझाया कि उन्हें भी भूत नहीं लग पायेंगे। जब आपने नाम लिया है तो उनकी भी सुरक्षा साहिब करेगा । साहिब कह रहे हैं-
भूत पिशाच होय सब नियारा । अद्भुत नाम सदा रखवारा ॥
एक ने कहा कि आप कह रहे हैं कि भूत न मानो तो जो पुरखे हमारे भटक रहे हैं, उनका क्या होगा ? वो कहाँ जायेंगे ? वो माँगते हैं। उन्हें नहीं देंगे तो कहाँ जायेंगे ? मैंने कहा कि उनका भी इलाज है ।
तारूँ तास इकहत्तर बंशा ॥
71 पीढ़ियाँ तर जायेंगी । जैसे नाम की ताक़त आती है तो उनका भी कल्याण हो जाता है । ... तो नाम रक्षा करता है । साहिब वाणी में कह रहे हैं-
सतगुरु शब्द सहाई ॥
निकट गये तन रोग न व्यापै, पाप ताप मिट जाई ॥
जादू यंत्र जुक्ति न लागे, शब्द के बाण डहाई ॥
ओझा डायन उर डर डरपे, जहर जूड़ हो जाई ॥
कहैं कबीर कादूँ यम फँसा, सुकृत लाख दुहाई ॥
तो नाम के बाद बड़ी ताक़त आ जाती है । पहले जब मेरे पास बंदा आया तो ज्ञान- - दृष्टि से नहीं आया। किसी को भूत नचा रहा था तो किसी को कोई और समस्या थी। जब वो ठीक हुआ तो धीरे-धीरे मैंने उसे रूहानियत समझाना शुरू किया। उसे यक़ीन आता गया कि यहाँ कुछ है। धीरे-धीरे मैंने रूहानियत का पाठ पढ़ाया । किसी का धर्म नहीं बदला। हम किसी धर्म के ख़िलाफ़ नहीं हैं। पर कह रहे हैं कि एक परमात्मा की भक्ति से पूरे ब्रह्माण्ड की भक्ति हो जाती है। हम कह रहे हैं कि प्रेतात्मा आती है, पर नाम के बाद नहीं आयेगी । ऐसा नहीं कह रहे हैं कि पितर नहीं हैं । पितर आते हैं । वो डिमाण्ड भी रखते हैं। पर सभी तीन-लोक के दायरे में आ रहे हैं । हम कह रहे हैं कि एक चौथा लोक है। आत्मा का देश वहाँ है । आदमी जब भूत-प्रेतों में भटका है तो तीन-लोक की बात भी बड़ी दूर की बात है, अन्दर की दुनिया की बात भी बड़ी दूर की बात है । घर में सिनक निकल आए तो कहते हैं कि बाबा सुरगल है । सब माथा टेकने लगते हैं उसे। कहते हैं कि बाबा सुरगल कल्याण करेगा । कल्याण तो सयाने का होता है, जो आपको बुद्धू बनाकर आपका माल लूटकर ले जाता है । मैंने एक लड़की को देखा। वो कहती थी कि देवी माता आती है। मैंने कहा- - बैठो। वो सिर घुमाए । मैंने एक को कहा कि इसे थोड़ा कसो । वो चालाकी कर रही थी। 99 प्रतिशत चालाकी वाले होते हैं। वो तेज़ी से काँपती हुई पीछे-पीछे जाती थी। मैं जब तह में जाता हूँ तो अधिकतर नाटक होता है। तो वो चोरी से पीछे भी देख रही थी कि कहीं कोई चीज़ तो नहीं पड़ी, कहीं किसी चीज़ से टकरा न जाऊँ ! फिर वो बड़े स्टाइल से आगे की तरफ गिरी । एक गिरना बनावट से होता है । जो अचानक होता है, उसमें तो सिर भी फट सकता है। मैंने कहा कि दुबारा गिरी तो देखना । कोई भूत नहीं आता है यहाँ। आश्रम की सीढ़ी के अन्दर भूत आता नहीं है । पहले मैं सत्संग करता था तो
4-6 माइयों को उधर ही हत्या आ जाती थी । यहाँ पर तीन कार्रवाही करते हैं । पहला तो चिल्लाने वाला नाटक होता है, फिर डरावनी शक्ल बना लेते हैं और अंत में सिर घुमाना शुरू कर देते हैं। मैंने पहले सोचा कि यह यहाँ नयी किस्म की बीमारी है शायद। पहले तो लिहाज़ किया। फिर मैंने कहा कि यह सब नहीं चलेगा। दो-तीन तगड़ी लड़कियों को तैयार किया; कहा कि जो भी ऐसा करे, उसका जूड़ा पकड़कर कसना । उसके बाद कोई नहीं करता है यह नाटक। तो हम कह रहे हैं कि नाम की ताक़त आयेगी तो भूत-प्रेतों से तो छुटकारा मिलेगा ही, पुरखों का भी कल्याण हो जायेगा । हमारी न तो शिवजी से लड़ाई है और न ही हनुमान जी से कोई झगड़ा है। न तो हम कंस हैं कि कृष्ण जी से कोई युद्ध चल रहा है और न रावण हैं कि राम जी से लड़ाई है। मैं भैरो हूँ कि माता जी से कोई लड़ाई चल रही है। ये तो लोगों ने कहानियाँ बनाई हुई हैं। एक माई मुझे मानती थी, पर उसने दीक्षा नहीं ली थी। परिवार के लोग लिए थे। माई भक्तिन थी । जैसे बंदे चेतन हैं, ऐसे ही माताएँ भी चेतन हैं । जैसे बंदे झंझटी हैं, ऐसे माताएँ भी झंझटी हैं। जैसे बंदे झगड़ालू हैं, ऐसे माताएँ भी हैं। मैं दोनों को समान मानता हूँ। तो माता ने सवाल किया कि ख़ानदान में मैंने यह चीज़ देखी कि जब भी कोई काम बन जाता था, पूरा होने वाला होता था तो अंत में आकर बिगड़ जाता था । पूर्वजों के पीछे ऐसी ताक़तें लगी थीं। यही बात दादा की थी, यही बात मैंने पिता में भी देखी और यही बात अपने साथ भी देख रही हूँ । दादा जी को भी देखा। उनको भी यही समस्या थी । बाप के साथ भी यही समस्या आती थी । यह काम मैंने अपने जीवन में भी देखा । जब काम होने लगता है तो अंत में बिगड़ जाता है। उसने कहा कि बताओ कि क्या मामला है ? जब मैं गहराई में उतरा तो एक आदमी को पकड़ा। जैसे पुराने जमाने में कुएँ में कुछ गिर जाए तो बिल्ली भेजते थे । रस्सी से बाँधकर भेजते थे । उसमें कुण्डे लगे होते थे। तो वो घुमाते थे। जो चीज़ होती थी, किसी में फँस जाती थी। तो मैंने भी ऐसा किया; देखा कि कारण क्या है । निराकार रूप में एक बंदा था। मैंने उसे पकड़कर ऊपर किया, कहा कि तू है ? कहा- हाँ । मैंने कहा कि तू क्या करता है ? कहा कि अंत में दिमाग़ में बैठकर पूरी गड़बड़ कर देता हूँ। वो इतनी बारीकी से काम करता था कि पता ही नहीं चलता था।
माई कहती कि झगड़े का मूड भी नहीं होता तो पता नहीं क्यों हो जाता है। तो मैंने बंदे को कहा कि तुमको क्या पड़ी इनके काम बिगाड़ने की ? इनको नुक़सान क्यों कर रहा है ? कहा कि 400 साल से इस ख़ानदान के पीछे लगा हूँ। वो बोला कि मैं प्रेत-योनि में हूँ । ये प्रेत तीन तरह से मिलते हैं । एक तो सामने आ जाते हैं, एक चिंतन में आते हैं और एक नींद में दबाव डालते हैं। जो चिंतन में आते हैं, लगेगा कि कोई है। बोला कि निराकार रूप में इनको बरबाद करने में लगा हूँ। मैंने पूछा कि भाई, क्या बात है ? कहा कि इनके पूर्वजों ने मुझे मार डाला था। फिर मैं वंशहीन हो गया; मेरा वंश ख़त्म हो गया। पुराने जमाने में इंसान अपने वंश को ख़त्म नहीं होने देना चाहता था। मान लो कि मोहनलाल के दो बेटे हैं। यदि एक के पुत्र हुआ तो भी वंश रहेगा । पर दोनों को नहीं है तो वंश नहीं चलेगा। तो वंश चलाना चाहता था । तो श्राद्ध में जब एक-एक करके माँ, बाप, दादे आदि का श्राद्ध कर देते हैं तो आख़िरी यानी 16वाँ श्राद्ध अन्य पितरों के नाम करते हैं। यानी जिनके बारे में जानता नहीं हूँ। यह भूले-बिसरों के लिए होता है। तर्पण दिया जाता है। जैसे एक तो कार्ड भेजना होता है, पर एक अचानक मिल जाए तो कहते हैं कि तू भी शामिल हो जाना। यह ऐसे होता है । तो वो बोला कि मुझे तर्पण भी नहीं मिलता है; मैं चाहता हूँ कि इनका भी वंश ख़त्म हो जाए। वो बोला कि मैं इसमें कामयाब भी था । पर अब रुकावट आ गयी है। जबसे ये आपकी भक्ति में आए हैं, मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूँ। मैंने माई को समझाया कि जो मुझसे जुड़े हैं, उनपर प्रभाव नहीं पड़ पा रहा है | सच है, मैंने आपको नाम के बाद सुरक्षित कर दिया है। लोगों को इतना मिसगाइड किया गया, कितना भड़काया गया, पर फिर भी इतने लोग जुड़े, हमारा पंथ बढ़ता ही चला गया। यानी कुछ ताक़त है नाम की । क्योंकि बंदे को अन्दर से पता चल गया है कि कोई ताक़त साथ में काम कर रही है । तो वो बोला कि अब रुकावट आ रही है । वो बोला कि मैं इनके ख़ानदान को समेट दिया था, काफ़ी क्लोज कर दिया था । पर अब नहीं समेट पाऊँगा। क्योंकि जो आपसे जुड़े हैं, उनके पास नहीं जा पाता हूँ ।
एक चीज़ आप देखते होंगे कि आप नाम के बाद बड़े सुरक्षित हैं । एक सुरक्षा कवच आपके ऊपर है । आप देखते हैं कि आप सुरक्षित हैं, आप पाते हैं कि कोई ताक़त आपको सुरक्षा दे रही है। आपके पास भूत-प्रेत आदि नहीं आ पा रहे हैं। आपके विश्वास के पीछे आधार है । आप अपने को सुरक्षित पा रहे हैं । जैसे बुलिटप्रूफ पहन लिया तो सुरक्षित महसूस करते हैं । गोली कुछ नहीं बिगाड़ सकती है। इस तरह ग्रह-नक्षत्र, जादू-टोना आदि आपका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे हैं। इसलिए आप दृढ़ हो गये हैं । आपकी दृढ़ता देखकर दूसरों को लगता है कि धर्म बदल दिया है। हम तो शुद्ध धर्म बता रहे हैं। हम सत्य और अहिंसा पर चल रहे हैं। हम तो धर्म पर आरूढ़ हैं । हमने भ्रम छोड़ दिया, जादू-टोना नहीं मान रहे, ग्रह-नक्षत्र नहीं मान रहे । ये चीजें होती बहुत कम हैं, पर पाखण्डी बताकर अपने हितों की पूर्ति करता है। मंज बीमार हो जाए तो कहता है कि भूत लगा है । जब माई कहती है कि नाम लिया है तो कहता है कि नाम तूने लिया है, मंज ने नहीं लिया है, भूत मंज को लगा है। यानी बुद्ध बनाता है। मैंने किसी को नहीं कहा कि इतना पैसा लाओ, यह करो, वो करो। जब भी कोई दुखी आया तो ढाँढस बँधाया कि कोई ग्रह, कोई भूत कुछ नहीं कर सकता है। मैंने समझाया कि नाम के आगे ये नहीं टिक पायेंगे। हमने किसी का धर्म नहीं छुड़ाया, हमने भ्रम से लोगों को छुड़ाया है । पर पाखण्डी लोगों को भ्रमित करता है । साहिब कह रहे हैं- -
ये केवल भ्रम के उत्पाती ॥
ये भ्रमित करके पैसा लूटते हैं । यह तबका बड़ा ख़तरनाक है। धन- प्राप्ति के लिए भ्रमित कर रहा है। तो जबसे आपने नाम लिया है, ये चीजें प्रभावित नहीं कर पा रही हैं । आपने आजमाया होगा। कई मौकों पर आपके साथ यह अनुभव हुआ होगा। तो वो 400 साल से उनके पीछे लगा हुआ था। कहा कि अब नहीं समेट पाऊँगा। जो आपके साथ जुड़े हैं, उनके नज़दीक भी नहीं जा पाता हूँ। बोला कि मैंने मरते समय सोचा था कि इनसे बदला लूँगा, इसलिए मेरी यही सोच है कि इनको समाप्त करना है, ख़ानदान रहित करना है । मेरी गति भी नहीं हुई है। तो माई का शक ठीक-ठीक था । आत्मा तो सबमें है न! वो अच्छा- बुरा सब समझती है। सुरति का ही खेल है । मन इसी सुरति को अपने साथ में
घुमा रहा है । वही इसे ग़लत दिशा की ओर ले जा रहा है । पर नाम के बाद यह नहीं ले पाता है ।
नाम होय तो माथ नमावे ॥
... तो केवल नाम की ताक़त से ही यह सुरक्षित हो सकता है। ज्योतिषियों के पास नहीं जाना है न जन्म के समय, न विवाह आदि के समय, न अन्य किसी कारण से ज्योतिषियों के पास जाना है। ज़रूरत ही नहीं है आपको। ग्रह-नक्षत्रों का आपपर अब कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है । क्योंकि—
नव ग्रह का बस नहीं चलाई। सबहि विघ्न सदा टल जाई ।।
नाम के बाद नौ ग्रहों का भी आपपर बस नहीं चलेगा। हम कह रहे हैं कि ग्रह-नक्षत्र न मानो । यह 99 प्रतिशत धोखा है । 2005 का इलेक्शन था। वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे; दुबारा इलेक्शन होना था। 200 ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि वाजपेयी जी दुबारा प्रधानमंत्री बनेंगे । कोई भी ग्रह उनके विरुद्ध नहीं जा रहा है। मेरे पास कटिंग भी पड़ी है। मैंने कहा कि सुनिये, जब इलेक्शन हुआ तो बी. जे. पी. नहीं जीती, मनमोहनसिंह प्रधानमंत्री बना। एक ने नहीं लिखा था कि मनमोहनसिंह प्रधानमंत्री होगा । तो मेरा सवाल है कि यह फराड़ नहीं है क्या ! ये तो पढ़े-लिखे ज्योतिषि थे, मुख्य अगुआ ज्योतिषि थे । उनका यह हाल है तो बाकी जो गली-गली घूम रहे हैं, उनका क्या हाल होगा ! वो ख़ामख़ाह लोगों को ग्रहों के नाम पर डराकर लूटते हैं। हमारे सिद्धांत उन्हें ख़त्म कर रहे हैं । हमें शनि महाराज जी से भी कुछ लेना नहीं है। हम कह रहे हैं कि दृढ़ होकर भक्ति करो। | मंदिर आदि जगहों पर माथा टेकने की ज़रूरत नहीं है आपको ऐसा क्यों ? यह कोई ख़राब बात नहीं है, पर यह सगुण-भक्ति है और हमने आपको परा-भक्ति का दान दिया है। शादी से पहले तो लड़की गुड्डा- गुड्डियों से खेलती है, पर जब शादी हो जाती है, तब थोड़ा वो यह खेल खेलती है। मंदिर आदि आपके दिल में भक्ति का शौक पैदा करने के लिए हैं । जब तक पूर्ण गुरु न मिले, तब तक ठीक है, पर जब पूर्ण गुरु मिल जाए तब
आपको इनमें नहीं उलझना है। अब तो आपको गुरु भक्ति की ऊँची सीढ़ी पर आगे-ही-आगे बढ़ना है । फिर गुरु की भक्ति से पूरे ब्रह्माण्ड की भक्ति एक साथ हो जाती है।
देवी देवल जगत में, कोटिन पूजे कोय ।
सतगुरु की पूजा किये, सबकी पूजा होय ।।
तथा-
कोटिन तीर्थ भ्रम भ्रम आवे । सो फल गुरु के चरणन पावे ।।
फिर यह काम करने से भक्ति भी दूषित होगी । अगर कहीं मजबूर हो जाओ, घर वाले जबरन ले जाएँ तो कोई बात नहीं, दिल में सद्गुरु का ही नाम लेते रहना, पर भूल से भी पैसा नहीं चढ़ाना । चंदा नहीं देना है चंदा और भीख नहीं देनी है । गुरु चरणों के अलावा कहीं भी अपने धन को दान रूप में देना या चढ़ाना नहीं है । यह इसलिए मना किया क्योंकि यदि आपके द्वारा दिये गये धन का ग़लत इस्तेमाल हुआ तो उस अपराध में आप भी शामिल हो जायेंगे। इसलिए बचना। चंदा और भीख दोनों को समान मानता हूँ। दोनों से परहेज करना। अन्य बातें किसी का जूठा मत खाएँ । क्योंकि आप महात्मा हो जायेंगे । आप हंस हो जायेंगे। हंस न किसी गंदी जगह चोंच मारता है, न किसी का झूठा खाता है। जिसके पास नाम नहीं, वो कभी भी अच्छा नहीं हो सकता है। ‘ऊँच वही जो नाम है जाना । बिना नाम सब नीच बखाना।।' जिसका जूठा खायेंगे, उसके गुण भी आपमें आ जायेंगे। इसलिए सावधान रहना । जिस घर में माँस बनता हो, वहाँ मत खाएँ। हो सके तो पानी से भी परहेज रखें। क्योंकि माँस के अंश धोने के बाद भी बर्तनों में लगे होंगे। किसी भी जगह का प्रसाद मत खाएँ ।
नाम के साथ ही आपके पितरों का भी कल्याण हो जाता है, इसलिए उनके कल्याण के लिए भी चिंता नहीं करनी है। श्राद्ध आदि जो किया जाता है, जरुरी नहीं है। मृत्यु-लोक का एक वर्ष पितर-लोक का एक दिन होता है । जिसे नाम मिल जाता है, उसकी 71 पीढ़ी तर जाती है। इसलिए अब पितरों के कल्याण के लिए कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है । फिर किसी भी तरह से पितरों की भक्ति न हो, यह भी ध्यान रखना है । वासुदेव कृष्ण ने भी अर्जुन को यही शिक्षा दी थी कि तू देवताओं की भक्ति मत कर, पितरों की भक्ति भी मत कर, प्रेतों की भक्ति भी मत कर, तू केवल मुझमें समा । क्योंकि वे अर्जुन के गुरु थे। इसलिए चाहे आपके पितर स्वर्ग - लोक, पितर- लोक आदि में चले गये हों या प्रेतात्मा बनकर भटक रहे हों, उनके लिए कुछ चिंता नहीं करना। फिर आपके जो पितर नाम लेकर शरीर छोड़ दिये हैं, वो तो अमर-लोक में गये हैं और वहाँ कोई भूख, प्यास आदि भी नहीं है, इसलिए उनके लिए भोजन भेजने की चिंता मत करो। फिर यह पितरों की भक्ति भी हो जायेगी । इसलिए गुरु में ही ध्यान रखना । ऐसे व्रत, तिथि-त्यौहार आदि, जिनमें काल या बाहरी अन्य भक्ति के काम करने होते हैं, कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है। आपको सब भ्रमों, बाहरी भक्ति और वहमों से आज़ाद कर दिया है। अब गुरु के अलावा कहीं भी मन को नहीं लगाना । कोई भी काम ऐसा नहीं करना, जिससे आपकी भक्ति दूषित हो, जिससे गुरुजन नाराज़ हों । अन्यान्य भी पूजने की ज़रूरत नहीं है । यह इसलिए कि आपका ध्यान दूसरी जगह न लगे । यह भी अन्य भक्ति में आ जाता है। आपको तो बस गुरु की ही भक्ति करनी है, गुरु को ही रिझाना है। सुक्खन आदि नहीं करनी है । यदि नाम से पहले की हो तो भी उसे पूरा करने की ज़रूरत अब नहीं है, क्योंकि सब पिछले कर्म काट दिये गुरुने। माता जी से या किसी और से हमारी लड़ाई नहीं है, पर यह केवल इसलिए कि आपका ध्यान, आपका भरोसा एक जगह पर रहे, जगह-जगह भटके नहीं। तभी गुरु भक्ति जमेगी, तभी आपका ध्यान भी जमेगा, तभी आप सत्लोक जा पायेंगे ।
मैं अन्य तीर्थ स्थानों पर भी गया हूँ । जहाँ-जहाँ गया हूँ, वहाँ-वहाँ जाकर सबसे बात भी की है । वहाँ क्या-क्या चल रहा है, कैसे-कैसे रीति-रिवाज हैं, यह सब जानने के लिए मैं सब तीर्थ स्थानों पर गया हूँ। सब धर्म-शास्त्रों का भी ज्ञान है । सब पढ़े हैं। इतने आपने नहीं पढ़े होंगे। इतने तीर्थ भी आपने नहीं किये होंगे। इसलिए इस बात को अच्छी तरह से समझ लें कि हमारी किसी से कोई लड़ाई नहीं है, लेकिन इन चीज़ों से आपकी आत्मा का कल्याण नहीं हो सकता है और फिर आपका ध्यान दो जगहों पर होगा तो गुरु-भक्ति जमेगी नहीं, इसलिए अपने गिर्द ही घुमा रहा हूँ। यह एक ही मन है, इसलिए एक जगह पर ही लगना चाहिए। संक्षेप में यह बात समझ लें कि गुरु-भक्ति के अलावा अन्य कोई भी भक्ति न करें। कोई भी ऐसा काम न करें, जो अन्य भक्ति में भक्ति दूषित हो जाए। नहीं तो आपका ध्यान और विश्वास दो शामिल हो जाए। कोई भी ऐसा काम न करें, जिससे गुरु- जगहों पर हो जायेगा और आप काल - पुरुष की दुनिया में ही अटक जायेंगे। गुरु पर पूरा भरोसा रखना है । अगर आप अन्य काम कर रहे हैं तो इसका सीधा मतलब है कि गुरु पर भरोसा नहीं है । इसलिए गुरु पर पूर्ण भरोसा और समर्पण के लिए ही इन सब चीज़ों से बचना है अन्यथा हमारी किसी से लड़ाई नहीं 'सब अपनी-अपनी जगह पर हैं। पर आपको इनसे ऊपर उठकर अब गुरु-भक्ति की ऊँची सीढ़ी पर चढ़ना है। अब नयी जिंदगी जीनी है, जिसमें गुरु के अलावा कोई सहारा न ढूँढ़ना। पहले जो-जो किया, सब भूल जाएँ । कोई भी आपको तंग नहीं कर सकता है। शिष्य को चाहिए कि चाहे कितनी भी मुसीबत आ जाए, गुरु को त्यागकर अन्य जगहों पर न भटके।
सुख में तुझे न भूलूँ, दुख न हार मानूँ ।
ऐसा प्रभाव भर दे, मेरे अधीर मन में ।।
यह सब मनमुखता से बचने को कहा।
गुरुमुख बनें अब क्या-कुछ करें, जिससे गुरुमुख बन सकें? धर्मदास जी ने साहिब
पूछा कि हे साहिब ! हे कृपानिधान ! गुरुमुख की क्या पहचान होती है? साहिब ने कहा—
जब लग तन में हंस रहाई । निरखे शब्द अंतै नहीं जाई ॥
यानी जब तक शरीर में प्राण हैं, गुरु के शब्द को नहीं काटे । गुरु आज्ञा निरखत रहे, जैसे मणिहिं भुजंग। गुरु के शब्द की तरफ ही ध्यान रखे । भुजंग साँप को कहते हैं। मणि की तरफ ही ध्यान रखता है । ओस चाटने जाता है तो मणि को बाहर करके रखता है, पर ध्यान मणि में ही होता है । कभी नहीं हटाता है I
कहैं कबीर धर्मदास से, यह गुरुमुख को अंग ॥
यही गुरुमुखता है। इससे हृदय प्रकाशित हो जायेगा और दुर्मति का नाश हो जायेगा। गुरु नानक देव भी वाणी में कह रहे हैं-
शब्दहि सेवे सो गुरुमुख होई ॥
पहली बात यह कि आपको मैंने क्या शब्द बोले ? जो भी शब्द बोले, उसमें मेरा क्या स्वार्थ है ? किसके कल्याण के लिए हैं ? आपके ही कल्याण के लिए हैं । यदि कोई दिन में 50 झूठ बोल रहा है और कह रहा है कि मैं भक्त हूँ तो यह भक्ति की मजाक है । आपकी नज़र में भी उसका कोई मूल्य नहीं रहेगा। दूसरा, जो दारू पी रहा है, नशे में घूम रहा है, उसका भी आपकी नज़र में कोई मूल्य नहीं होगा । जो अपनी स्त्री को छोड़कर पराई स्त्री की तरफ जा रहा है, चरित्रहीन है, उसके लिए आपका नज़रिया अच्छा नहीं हो सकता है। जो जुआ खेल रहा है, वो भी आपकी नज़रों में बेकार ही होगा। जो ठगी, बेइमानी कर रहा है, उसका भी आपकी नज़रों में कोई मूल्य नहीं होगा। जो जीवों को मार रहा है, उस आदमी के लिए आपके हृदय में क्या स्थान हो सकता है ! ये सब दुर्गुण हैं। इनसे हटाने के लिए कहा कि ये सब नहीं करना । इनमें कुछ भी ठीक नहीं है। ये क्यों बोले ? नहीं तो आप कौड़ी के भी नहीं रह जायेंगे। इनसे आपका मूल्य बहुत बढ़ गया है। I कभी ऐसी परिस्थिति आ जाती हैं कि लगता है कि जो गुरु कह रहे हैं। वो ठीक नहीं है और जो मेरा दिमाग़ कह रहा है, वो ठीक है । नहीं, ऐसा नहीं करना। जहाँ मन का प्रयोग करोगे, मन संसार में ही पटकेगा। इसलिए गुरु के आगे समर्पित होना। अपनी अक्ल नहीं चलाना ।