भारतकोश
संग्रह पर लौटें

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

मैं अन्य तीर्थ स्थानों पर भी गया हूँ । जहाँ-जहाँ गया हूँ, वहाँ-वहाँ जाकर सबसे बात भी की है । वहाँ क्या-क्या चल रहा है, कैसे-कैसे रीति-रिवाज हैं, यह सब जानने के लिए मैं सब तीर्थ स्थानों पर गया हूँ। सब धर्म-शास्त्रों का भी ज्ञान है । सब पढ़े हैं। इतने आपने नहीं पढ़े होंगे। इतने तीर्थ भी आपने नहीं किये होंगे। इसलिए इस बात को अच्छी तरह से समझ लें कि हमारी किसी से कोई लड़ाई नहीं है, लेकिन इन चीज़ों से आपकी आत्मा का कल्याण नहीं हो सकता है और फिर आपका ध्यान दो जगहों पर होगा तो गुरु-भक्ति जमेगी नहीं, इसलिए अपने गिर्द ही घुमा रहा हूँ। यह एक ही मन है, इसलिए एक जगह पर ही लगना चाहिए। संक्षेप में यह बात समझ लें कि गुरु-भक्ति के अलावा अन्य कोई भी भक्ति न करें। कोई भी ऐसा काम न करें, जो अन्य भक्ति में भक्ति दूषित हो जाए। नहीं तो आपका ध्यान और विश्वास दो शामिल हो जाए। कोई भी ऐसा काम न करें, जिससे गुरु- जगहों पर हो जायेगा और आप काल - पुरुष की दुनिया में ही अटक जायेंगे। गुरु पर पूरा भरोसा रखना है । अगर आप अन्य काम कर रहे हैं तो इसका सीधा मतलब है कि गुरु पर भरोसा नहीं है । इसलिए गुरु पर पूर्ण भरोसा और समर्पण के लिए ही इन सब चीज़ों से बचना है अन्यथा हमारी किसी से लड़ाई नहीं 'सब अपनी-अपनी जगह पर हैं। पर आपको इनसे ऊपर उठकर अब गुरु-भक्ति की ऊँची सीढ़ी पर चढ़ना है। अब नयी जिंदगी जीनी है, जिसमें गुरु के अलावा कोई सहारा न ढूँढ़ना। पहले जो-जो किया, सब भूल जाएँ । कोई भी आपको तंग नहीं कर सकता है। शिष्य को चाहिए कि चाहे कितनी भी मुसीबत आ जाए, गुरु को त्यागकर अन्य जगहों पर न भटके।

सुख में तुझे न भूलूँ, दुख न हार मानूँ ।

ऐसा प्रभाव भर दे, मेरे अधीर मन में ।।

यह सब मनमुखता से बचने को कहा।

गुरुमुख बनें अब क्या-कुछ करें, जिससे गुरुमुख बन सकें? धर्मदास जी ने साहिब

पूछा कि हे साहिब ! हे कृपानिधान ! गुरुमुख की क्या पहचान होती है? साहिब ने कहा—

जब लग तन में हंस रहाई । निरखे शब्द अंतै नहीं जाई ॥

यानी जब तक शरीर में प्राण हैं, गुरु के शब्द को नहीं काटे । गुरु आज्ञा निरखत रहे, जैसे मणिहिं भुजंग। गुरु के शब्द की तरफ ही ध्यान रखे । भुजंग साँप को कहते हैं। मणि की तरफ ही ध्यान रखता है । ओस चाटने जाता है तो मणि को बाहर करके रखता है, पर ध्यान मणि में ही होता है । कभी नहीं हटाता है I

कहैं कबीर धर्मदास से, यह गुरुमुख को अंग ॥

यही गुरुमुखता है। इससे हृदय प्रकाशित हो जायेगा और दुर्मति का नाश हो जायेगा। गुरु नानक देव भी वाणी में कह रहे हैं-

शब्दहि सेवे सो गुरुमुख होई ॥

पहली बात यह कि आपको मैंने क्या शब्द बोले ? जो भी शब्द बोले, उसमें मेरा क्या स्वार्थ है ? किसके कल्याण के लिए हैं ? आपके ही कल्याण के लिए हैं । यदि कोई दिन में 50 झूठ बोल रहा है और कह रहा है कि मैं भक्त हूँ तो यह भक्ति की मजाक है । आपकी नज़र में भी उसका कोई मूल्य नहीं रहेगा। दूसरा, जो दारू पी रहा है, नशे में घूम रहा है, उसका भी आपकी नज़र में कोई मूल्य नहीं होगा । जो अपनी स्त्री को छोड़कर पराई स्त्री की तरफ जा रहा है, चरित्रहीन है, उसके लिए आपका नज़रिया अच्छा नहीं हो सकता है। जो जुआ खेल रहा है, वो भी आपकी नज़रों में बेकार ही होगा। जो ठगी, बेइमानी कर रहा है, उसका भी आपकी नज़रों में कोई मूल्य नहीं होगा। जो जीवों को मार रहा है, उस आदमी के लिए आपके हृदय में क्या स्थान हो सकता है ! ये सब दुर्गुण हैं। इनसे हटाने के लिए कहा कि ये सब नहीं करना । इनमें कुछ भी ठीक नहीं है। ये क्यों बोले ? नहीं तो आप कौड़ी के भी नहीं रह जायेंगे। इनसे आपका मूल्य बहुत बढ़ गया है। I कभी ऐसी परिस्थिति आ जाती हैं कि लगता है कि जो गुरु कह रहे हैं। वो ठीक नहीं है और जो मेरा दिमाग़ कह रहा है, वो ठीक है । नहीं, ऐसा नहीं करना। जहाँ मन का प्रयोग करोगे, मन संसार में ही पटकेगा। इसलिए गुरु के आगे समर्पित होना। अपनी अक्ल नहीं चलाना ।

नाम सत्य गुरु सत्य हो, आप सत्य जो होय ।

तीन सत्य जब एक हों, विष से अमृत होय ॥

यह तीसरा आप सत्य कैसा ? जो गुरु कहता चले, करते जाना । अपनी अक्ल नहीं चलाना, अपने मन की नहीं करना । जो गुरु कहे, वो करना ।

खाक हो गुरु के चरण में, तो तुझे मंजिल मिले ॥

नहीं सोचना कि जो मैं सोच रहा हूँ, वो ठीक है ।

मुझे है काम सतगुरु से, दुनिया रूठे तो रूठन दे ॥

कभी ऐसी भी परिस्थिति आयेगी कि पूरी दुनिया कहेगी कि यह काम ठीक है, पर गुरु कहेगा कि यह ठीक नहीं है । तो गुरु की मान लेना। एक महापुरुष दुनिया की धारा में नहीं बहता है । वो दुनिया की धारा से बाहर निकल जाता है। वो मन - माया की सीमा से बाहर है । इसलिए उसकी मान लेना। बस, बाजी आपके हाथ में आ गयी। दुनिया कहे कि फ़लानी जगह माथा टेको । आप मत सोचें कि दुनिया नाराज़ हो जायेगी । होने देना ।

गुरु आज्ञा ले आवही, गुरु आज्ञा ले जाय ।

कहैं कबीर वा दास फिर बहु विधि अमृत पाय॥

गुरु-आज्ञा से बड़ी उपासना नहीं है । जो गुरु - आज्ञा का पालन कर रहा है, वो गुरुमुख है।

गुरु आज्ञा ले आवही, गुरु आज्ञा ले जाय ॥

यही गुरु-भक्ति है। गुरु भक्ति अटल अमान अडोल धर्मन, यह सरस दूजा नहीं ।

जप योग व्रत तप दान पूजा, तृण सदृश यह जग कही ॥

तीर्थ, पूजा आदि तिनके के समान हैं गुरु-भक्ति के आगे । फिर तन, मन, धन से गुरु की सेवा करनी है। गुरु सेवा का महत्व है । साहिब वाणी में कह रहे हैं—

गुरु सेवा जो करे सुभागा। जन्म जन्म का पातक भाजा ॥

जन्म-जन्मांतर के पाप नाश हो जायेंगे। आगे कह रहे हैं-

गुरु सेवा से हृदय प्रकाशे ॥

हृदय प्रकाशित हो जायेगा ।

दुर्मति भाजे पातक नाशे ॥

दुर्मति भाग जायेगी। पापों को नाश हो जायेगा । सुभागा यानी भाग्यवान । सद्गुरु की सेवा सफल है । यह तीनों तरह से होनी चाहिए । एक जगह साहिब शिष्य के चार धर्म बता रहे हैं । शिष्य में चार धर्म होने चाहिए। पहला-

तन मन धन से गुरु की सेवा ॥

क्योंकि गुरु की सेवा दूसरे के लिए परमात्म-तत्व तक पहुँचने का रास्ता प्रश्स्त करती है। इसलिए धर्म - शास्त्रों में गुरु-सेवा के लिए बोला। गुरु के दिल में अपने लिए खास जगह बनानी हो तो सेवा करना, नहीं तो कभी नहीं बन पायेगी जिंदगी में । नानक देव ऐसे ही नहीं कह रहे हैं- 'सुसेवा बस साहिबा ।' साहिब वाणी में कह रहे हैं-

नामवंत बहुते मिले, ध्यानवंत अनेक ।

कहैं कबीर धर्मदास से, गुरुवंता कोई एक ॥

दूसरा—

सेवा में विषय को त्यागे ॥

अर्थात उसका रहन-सहन विषयों से रहित हो । दिन-भर नाटक करता रहे, विषय-विकारों में उलझा रहे और सोचे कि भक्त हूँ तो यह नहीं है । उसका चाल-चलन अलग होना चाहिए; उसकी जीवन-शैली अलग रहे। तीसरा-

मन में अहंकार न आने ॥

मन में सेवा का घमण्ड भी न रहे । चौथा-

गुरु के शब्द प्रतीती ॥

साहिब कह रहे हैं—

गुरु आज्ञा ले आवही, गुरु आज्ञा ले जाहीं ।

कहैं कबीर ता दास को, तीन लोक डर नाहीं ॥

गुरु समरथ जेहि सम खड़े, कमी काहू को दास ।

रिद्धि सिद्धि सेवा करें, मुक्ति न छाड़े साथ ॥

इसलिए भरोसा हो। ये चार धर्म होने चाहिए शिष्य में। इनमें से दो सर्वोपरि हैं ।

गुरु सेवा बाकी निश्चय कर ॥

पहला गुरु की सेवा और फिर गुरु शब्द का भरोसा । यानी बचन का भरोसा।

जो कोई गहे चले यम जीती ॥

जो इन दोनों को धारण कर लेगा, संसार - सागर को जीतकर अपने ठिकाने चल पड़ेगा। गुरु शिष्य और ईश्वर, मिल कीना भक्ति विवेक । तीनों त्रिधारा बनीं, आगे गंगा

एक ॥

गुरु समाना शिष्य में, शिष्य लिया कर नेह | बिलगाए बिलगे नहीं, एक रूप दो

देह ॥

साहिब ने तो यहाँ तक कह दिया-

गुरु का कथन मान सब लीजे । सत्य असत्य विचार न कीजे ।।

कह रहे हैं कि गुरु की हर बात को मान लेना । उसपर अपनी अक्ल नहीं लड़ाना कि ठीक है या गलत। जैसे फसल के लिए जमीन उत्तम होनी चाहिए, किसान को ज्ञान होना चाहिए। इस तरह नाम - प्राप्ति के बाद शिष्य उत्तम हो । खेलना हो तो खेलिए, पक्का होकर खेल । कच्ची सरसों पेर के, खड़ी भया न

तेल ॥

सत्संग में आएँ जितनी देर आप सत्संग में बैठे हैं, यह गुरु-भक्ति में शुमार होगा। यह ध्यान - भजन से भी बढ़कर है। जब तक सत्संग न मिला, भक्ति की प्राप्ति नहीं हो सकती है। गोस्वामी जी कह रहे हैं—

भक्ति स्वतंत्र सकल गुण खानी । बिनु सत्संग न पावत प्राणी ॥

भक्ति निरुपण विविध विधाना । क्षमा दया सत शील निधाना ॥

भक्ति वो है, जिसके अंदर सद्गुण रूपी फल लगता है। अब सत्संग क्या है ? हमने किस्से-कहानियों को सत्संग मान लिया। कथा यानी जो हो चुका । साहिब ने बड़ा प्यारा कहा-

माला लक्कड़ पूजा पत्थर, तीरथ है सब पानी ।

कहैं कबीर सुनो भाई साधो, चारों वेद कहानी ॥

सत्संग का उद्गम हृदय से होता है । कथा दिमाग़ से होती है । कथा कोई भी बोल सकता है । रट लिया और बोल दी। पर सत्संग से ही भक्ति की प्राप्ति होगी । सबसे पहले भक्ति शब्द का अर्थ समझते हैं । इसका अर्थ है विषय का त्याग । साहिब कह रहे हैं कि कोई भी विषय का त्याग नहीं कर पा रहा है 1

चौदह लोक बसे भग माहीं । भग से कोऊ न्यारा नाहीं ॥

कोई भी इससे परे नहीं है । ज्ञान चदरिया जिसने लीनी, मैली कर धर दीनी । एक कबीरा जतन से लीनी, ज्यों की त्यों धर दीनी । चदरिया झीनी रे

झीनी ॥

आप देखना, कभी सत्संग करते हुए वक्ता लोग रोने लग जाते हैं, भावुक हो उठते हैं। एक महापुरुष यह नहीं करता है । क्योंकि— मन ही रोवे, मन ही गावे ... । साहिब कह रहे हैं—

बाहर न दिखलाइये, अंदर कीजिए हेत ॥

यह सब कुछ तो मन है । इसे भक्ति नहीं समझना । बाहरी घण्टे बजाना भक्ति नहीं है । यह काल का खेल है। कभी आप देखते हैं कि कुछ लोग बाहरी अलंकार सुंदर रखते हैं, भक्त बनने की कोशिश करते हैं । साहिब कह रहे हैं कि यह भक्ति नहीं है । इसलिए पहले भक्ति देने वाले को पहचानना होगा, देखना होगा कि प्रभु की प्राप्ति किया है या ऐसे ही पढ़ - पढ़कर सुना रहा है। यदि पूर्ण गुरु के यानी सद्गुरु के लक्षणों पर खरा उतरता है, विषय-वासनाओं से परे है, शादी- विवाह नहीं किया है, या फिर ज्ञान हो जाने पर सबकुछ छोड़कर सन्यासी हो गया है तो समझना कि ऐसे संत का संग ही सत्संग है । ऐसे संत के एक पल के सत्संग के लिए कह रहे हैं-

सात स्वर्ग औ अपवर्ग, धरौं तुला इक अंग ।

ताहि सकल मिल नाहीं तुलें, जा क्षण लौं सत्संग ॥

सत्संग में तीन चीज़ें साफ़ तौर पर प्राप्त हो जाती हैं । सत्संग के तीन लाभ हैं—

| शंकाओं का निराकरण होगा पहला तो सत्संग में शंकाओं का समाधान मिल जाता है । जब भी महापुरुषों की बात को सुनते हैं तो उनकी बुद्धि की अलौकिकता समझ आने लगती है। आपके प्रश्नों का उत्तर मिलता जाएगा। कथा और सत्संग में अंतर है। कथा में वेदों, शास्त्रों आदि की कहानियाँ सुनाई जाती हैं। उसमें आख्यान हैं । पर कथा की निंदा नहीं कर रहे। महापुरुष आत्म-तत्व की बात करता है । इसलिए सत्संग में समग्र शंकाओं का निराकरण होगा । हृदय का अँधकार नष्ट हो जायेगा। आप एकाग्र होंगे महापुरुषों की हाज़िरी में पूरा वातावरण एकाग्र हो जाता है। वो कोई जटाएँ नहीं बढ़ाता है, कपड़े नहीं रंगाता है।

मन न रंगाए योगी, कपड़ा रंगाए लिया ॥

आप आदमी की सुरति दुनिया में घूम रही है, जिससे कुंद है। महापुरुषों के पास जाने से सुरति एकाग्र होती है, उसकी चेतना बड़ जाती है आध्यात्मिक शक्तियाँ मिलेंगी तीसरा, एक अध्यात्मिक उर्जा महापुरुषों के शरीर से निकलती है, वो मिल जाती है। उनकी वाणी कानों से सुनी तो भी वो उर्जा निकलकर हममें आती है। महापुरुषों से निकलने वाली उर्जा वातावरण में फैलती है। विज्ञान भी सहमत है कि हरेक के अंदर से किरणें निकलती हैं । यदि कोई आपके घर आया तो उसकी किरणें कई दिन आपके घर में रहती हैं। यह आपको पता भी चल जाता है कि कोई आने वाला है । कभी आप किसी के बारे में सोच रहे | होते हैं और वो आ जाता है । आप कहते हैं अभी आपके बारे में ही सोच रहा था। यानी वो किरणें पहले ही वहाँ पहुँच गयीं। आपको पता चल गया कि वो आने वाला है। तो जब महापुरुषों के शरीर से अध्यात्मिक किरणें निकलकर आपतक पहुँचती हैं तो आपको अपने वजूद को समझने का मौका मिल जाता है ।

कबीर संगत साधु की, ज्यों गंदी की बास ।

जो गंदी कुछ देत नहीं, तो भी बास सुवास ॥

महापुरुषों के दर्शन से इतनी आध्यात्मिक उर्जा मिलेगी, जितनी कि दीर्घ साधना करने पर भी नहीं मिलेगी । फिर जब दीक्षा ली जाती है तो एक नाम के रूप में एक मूल उर्जा मिल जाती है । तब बात और हो जाती है । ... तो महापुरुषों के शरीर से किरणें निकलती हैं; वो मिलने से शांति का अनुभव करेंगे। वैज्ञानिक कह रहे हैं कि गुलाब के फूल में ताक़त है कि मस्तिष्क को ताक़त देता है, तरोताजा रखता है। नेहरू जी अपने पास गुलाब का फूल रखते थे। जब भी आप बगीचे में पहुँचते हैं, तो सकून मिलता है। इसी तरह महापुरुष के पास से आध्यात्मिक शक्तियाँ निकलती हैं, जिनसे शांति मिलती है । इसलिए उनके दर्शन का लाभ है ।

कबीरा मन पंछी भया, उड़ के चला आकाश ।

स्वर्ग लोक खाली पड़ा, साहिब संतन पास ॥

रामायण भी कह रही है-

नहीं दरिद्र सम दुख जम आना । संत मिलन सम सुख नहीं जाना ॥

इसलिए महापुरुष के सत्संग में आस्था मिलती जायेगी, अंत:करण स्वीकार करता जायेगा, इसलिए महापुरुष कहता है कि सत्संग सुनो। इसलिए गुरु अच्छी तरह परखकर करना चाहिए। पर बाद में कहीं परखने की गुंजाइश नहीं है। पहले आप स्वतंत्र हो, शंकाओं का निराकरण करें । इसलिए सत्संग शंकाओं का निराकरण करने का सूत्र है। बार-बार गुरु-दर्शन करें गुरु का दर्शन कीजिए, दिन में कई-कई बार । आसूया का मेह ज्यों, आसूया के मेह में क्या है ? जब स्वाति की बूँद सीपी के पेट में पड़ती

बहुत करे उपकार ॥

है तो मोती बन जाती है; वही बूँद जब बाँस में पड़ती है तो बंसलोचन बन

जाती है; जब वो बूँद पत्थर पर पड़ती है तो पारा बन जाती है; वही जब हाथी

के कान में पड़ती है तो गजमुक्ता बनती है और केले के पड़ती है तो कपूर बन

जाती है। तो कई लाभ हैं उसके । इस तरह पूर्ण गुरु का दर्शन लाजवाब है।

गुरु-दर्शन करना। यह गुरु- भक्ति है । गुरु दर्शन का बड़ा महत्त्व है। इसलिए तो साहिब कह रहे हैं कि दिन में एक नहीं बल्कि हो सके तो अनेक बार गुरु का दर्शन करना चाहिए । आख़िर गुरु- दर्शन का इतना महत्त्व क्यों कहा गया ? क्या मिलेगा हमें गुरु-दर्शन से ? आओ, इस ओर चलते हैं । मनुष्य के पास तीन शक्तियाँ हैं – भौतिक, दिव्य तथा - आध्यात्मिक । भौतिक दृष्टि से मनुष्य बड़ा सक्षम जीव है। भौतिक शक्तियों के बल से ही इसने पृथ्वी को सजाया तथा सँवारा है। बड़ी-बड़ी निराली चीज़ें बना डाली हैं। जैसे हमारे अधुरे काम को आगे चलकर हमारे बच्चे पूरा करते हैं, इसी तरह परमात्मा ने कुल सृजन तो स्वयं किया, यानी उसने चाँद, तारे, सूर्य, पृथ्वी, जल, पहाड़ आदि बनाए; पर यदि पृथ्वी को किसी ने सुन्दर बनाया तो केवल मानव ने। कहीं पहाड़ों को काट-काट कर सड़कें बनाईं, कहीं मकान बनाए, कहीं बड़ी-बड़ी ईमारतें खड़ी कर दीं। यह सब परमात्मा ने नहीं बनाया था। फिर कहीं टेलिफोन, कहीं हवाई जहाज़ और न जाने क्या-क्या ! ये चीज़ें परमात्मा ने आकाश से नहीं टपकाईं; मनुष्य ने ही इनका सृजन किया। इन सबके पीछे इन्सान की भौतिक शक्ति काम कर रही है । पर इस भौतिक शक्ति की एक सीमा है। जैसे यदि कोई सोचे कि वह उड़े तो वो उड़ नहीं पाता है। यह क्षमता इन्सान में नहीं है । हमारी आँखें कुछ दूर तक ही देख पाती है। अधिक दूर होने पर कोई भी चीज़ हमें स्पष्ट नज़र नहीं आती है। इसलिए इन आँखों की एक सीमा है । हमारे कानों की क्षमता भी सीमित दायरे में है । एक किलोमीटर दूर अगर कोई चिल्ला-चिल्ला कर भी बोल रहा हो तो हमें उसकी आवाज़ सुनाई नहीं पड़ती है । इस तरह भौतिक शक्तियों की एक सीमा है। पर फिर भी इनसे हम बड़े-बड़े काम कर लेते हैं। इसके ऊपर फिर दिव्य शक्तियों का स्थान आता है । ये दिव्य शक्तियाँ भी प्रत्येक मानव की पकड़ में हैं; पर अफ़सोस ! मानव इनसे परिचित नहीं है। ये दिव्य शक्तियाँ हमारे शरीर में पाँच स्थानों पर स्थित हैं। आम आदमी इन शक्तियों से बेख़बर है; वो इनका इस्तेमाल नहीं करता है । किसी भी चीज़ का यदि हम अधिक देर तक इस्तेमाल न करें तो वो काम करना बंद कर देती है। जैसे कोई गाड़ी यदि दो-तीन महीने ऐसे ही पड़ी रहे तो वो सीज़ हो जाती है;

उसकी सब चीजें काम करना बंद कर देती हैं; फिर यदि उसे चलाना हो तो दिक्कत आयेगी। इसी तरह इन शक्तियों का इस्तेमाल मानव ने नहीं किया, इसलिए ये भी सोयी पड़ी हैं । योगी लोग ध्यान करके इन शक्तियों को जगाते हैं; इसलिए ज़रूर वे आम आदमी से श्रेष्ठ हैं, ताक़तवर हैं । कुछ योगी आँखों के मध्य छिद्र में ध्यान करके वहाँ सोयी पड़ी शक्तियों को जगाते हैं, उन्हें प्राप्त करते हैं और साधारण आदमी से बहुत ऊँचे उठ जाते हैं । साधारण मनुष्य तो उनसे आँख नहीं मिला पाते, क्योंकि उनके मस्तिष्क का हिस्सा बहुत तेज़ हो जाता है । फिर कुछ योगी आज्ञाचक्र पर अपने ध्यान को रोककर वहाँ की दिव्य शक्तियों को जगाते हैं । कुछ योगी बंकनाल में अपने ध्यान को रोकते हैं; वहाँ वे अनहद धुनें सुनते हैं और अनेक दिव्य शक्तियों को प्राप्त करते हैं । इसके बाद फिर आध्यात्मिक शक्तियों का स्थान आता है । ये भी प्रत्येक मनुष्य के अन्दर हैं, पर इन शक्तियों को मनुष्य अपने ज़ोर से प्राप्त नहीं कर सकता। ‘बिन सतगुरु पावे नहीं, कोई कोटिन करे उपाय ।' अतः आध्यात्मिक शक्तियों का ख़ज़ाना केवल संत-सद्गुरुओं के पास है । इसलिए संत - सद्गुरु की कृपा के बिना इस ख़ज़ाने को प्राप्त नहीं किया जा सकता । जैसे बालक स्तन-पान करता है । वो बालक की उर्जा का स्त्रोत है। ऐसे ही गुरु स्त्रोत है। उनका ध्यान स्त्रोत है उर्जा का, लेते जाना । यह है- आसान मार्ग । कोई साधना आपने नहीं की, आप बदलते जायेंगे । एक फौजी आया, कहा- पहले मैं बड़ा बुरा इंसान था, किसी को देखते ही मारना शुरू कर देता था, पर अब बिलकुल बदल चुका हूँ; मुझे खुद भी पता नहीं चला कि यह सब कैसे हुआ । मैं उसे समझाने लगा। मैं : यह ध्यान की ताक़त है । : कभी किया ही नहीं ध्यान । ठाठ : वो भी नहीं किया करता हूँ । यह नाम की ताक़त है । सत्संग का कमाल है ।

वो : सत्संग नहीं सुनता हूँ।

: यह दर्शन की ताक़त है । वो : हाँ! दर्शन बहुत करता हूँ । सच यह था कि मैं जल्दी यह बात बोलना नहीं चाहता था, पर अंत में मजबूर होकर यह कहना पड़ा मुझे। दर्शन से बड़ी उर्जा मिलती है। ध्यान तो दर्शन न कर पाने के विकल्प में किया जाता है | जब हम संत-सद्गुरुओं के पास जाते हैं तो तीन तरह से यह आध्यात्मिक ऊर्जा हमें प्राप्त होती है । दृष्टि द्वारा: सबसे पहले जब गुरुजनों की दृष्टि हम पर पड़ती है तो वह आध्यात्मिक ऊर्जा हमारे अन्दर आती है । इसलिए हम गुरुजनों के पास जाकर कहते हैं कि कृपा की दृष्टि रखना । देखो, गाँधारी ने दृष्टि से ही तो दुर्योधन के शरीर को वज्र के समान किया था न ! यानी दृष्टि से दिव्य शक्तियाँ चल सकती हैं तो आध्यात्मिक शक्तियाँ क्यों नहीं चलेंगी ! वाणी द्वारा: फिर दूसरे वाणी द्वारा ये शक्तियाँ हम तक पहुँचती हैं। इसलिए सत्संग का बड़ा महत्व है । 'धन्य घड़ी जब हो सत्संगा'। आपने सुना होगा कि फलाने ऋषि ने शाप देकर फलाने को भस्म कर दिया। यानी वाणी द्वारा दिव्य शक्तियाँ चलीं। इस तरह आध्यात्मिक शक्तियाँ भी चलती हैं। स्पर्श द्वारा: इसी तरह तीसरे यह उर्जा हमें स्पर्श द्वारा भी मिलती है। कहीं भी स्पर्श करके यह उर्जा ली जा सकती है, पर अदब के लिए केवल पाँव छूना ही नियम बना दिया गया। इसी कारण से गुरु-दर्शन का इतना महत्त्व है । जब भी गुरु-जन हमारे निकट हों तो हमें उनका दर्शन करते रहना चाहिए। इसलिए साहिब कह रहे हैं-

कई बार न होइ सके, दोय वक्त कर लेइ ।

सद्गुरु दर्शन के किये, काल दग़ा नहि देइ ॥

कह रहे हैं कि दिन में ज़्यादा बार नहीं हो सके तो दो बार ही कर लो । इससे काल का ज़ोर नहीं चल सकेगा। लेकिन यदि इतना भी सम्भव न हो सके तो इस पर साहिब कह रहे हैं-

दोय वक्त न हो सके, दिन में करै इक बार ।

सद्गुरु दर्शन के किये, उतरे भवजल पार ॥

कह रहे हैं कि फिर दिन में एक बार ही कर लो; संसार-सागर से पार हो जाओगे। जैसे हम एक दिन खाना नहीं खाएँ तो हमारा शरीर कमज़ोर होने लगता है, शरीर की क्षमता थोड़ी कम हो जाती है, क्योंकि रोटी से ही तो शरीर को उर्जा मिलती है; पर यदि दूसरे दिन भी भोजन मिल जाए तो वो कमी पूरी हो जाती है । तभी तो साहिब आगे कह रहे हैं- एक दिना न करि सके, दूजे दिन करि लेहि ।

सद्गुरु दर्शन के किये, पावे उत्तम देही॥

पर यदि ऐसा भी सम्भव न हो सके यानी यदि गुरुजन बहुत दूर हैं, तो फिर साहिब उसका भी विकल्प दे रहे हैं-

दूजे दिन न कर सके, चौथे दिन कर जाय ।

सद्गुरु दर्शन के किये, मोक्ष मुक्ति फल पाय ॥

कह रहे हैं कि फिर चौथे दिन ही करो, मोक्ष के अधिकारी बन जाओगे। यदि तीन दिन रोटी नहीं मिली, कमज़ोरी तो आ गयी, पर चौथे दिन भी मिल गयी तो वो कमी पूरी हो सकती है । इसी तरह मन तो मोटा होता जाएगा, पर फिर उर्जा मिलते ही वापिस अपनी जगह आ जाएगा। आत्मा के ऊपर मन-माया का जो आवरण पड़ा हुआ है, उसे हटाने के लिए हमें आध्यात्मिक उर्जा की सख्त जरूरत है, इसलिए हमें समय-समय पर गुरु - दर्शन करके यह उर्जा लेते रहनी चाहिए । लेकिन यदि कहीं गुरुजन और दूर हों, इतना भी सम्भव न हो सके, तो फिर ! साहिब इसका भी विकल्प दे रहे हैं- चौथे दिन नहिं कर सके, बार-बार करु जाय ।

यामें विलम्ब न कीजिये, कहै कबीर समुझाय ॥

अब यहाँ साहिब सतर्क कर रहे हैं । कह रहे हैं कि यदि चौथे दिन भी सम्भव न हो सके तो सप्ताह में, हफ्ते में एक बार गुरु-दर्शन अवश्य करो। इसमें विलम्ब न हो, देरी न हो । नहीं तो आत्मा कुंद होती जाएगी और मन का ज़ोर बढ़ता जाएगा; मन आत्मा पर हावी होता जाएगा। आध्यात्मिक उर्जा से ही आत्मा के ऊपर से मन-माया का आवरण हटता है, इसलिए हमें जल्दी - 2 गुरु - दर्शन करने चाहिए । जितनी बार हो सके,

उतने करने चाहिए। गुरु-दर्शन में बहुत सारी बाधाएँ भी आयेंगी, पर हमें उन बाधाओं के होते भी रुकना नहीं है । साहिब कह रहे हैं- माता पिता सुत स्त्री, बन्धु कुटम्ब को जान । गुरु दर्शन उनका अटका ना रहे, गुरु दर्शन को जाय।

को जब चले, ये अटकावे आन ॥

कहै कबीर सो सन्त जन, मोक्ष मुक्ति फल पाय ॥

ये सब गुरु-दर्शन में रुकावट डालेंगे, पर तुम नहीं रुकना, क्योंकि तुम्हें वो उर्जा लेनी ही लेनी है। जैसे वृक्ष अपनी उर्जा ज़मीन से लेते हैं; पूरी शक्ति ज़मीन से लेने के बाद भी एक उर्जा की ज़रूरत उन्हें पड़ती है और वो है सूर्य की । उसके बिना वृक्ष पोषित नहीं हो सकता। इसी तरह अपनी शक्ति से योगिक क्रियाओं द्वारा मनुष्य कितनी ही शक्तियाँ क्यों न प्राप्त कर ले, इस भवसागर से पार नहीं हो सकता। इसके लिए सद्गुरु के द्वारा प्राप्त होने वाली आध्यात्मिक उर्जा की नितान्त ज़रूरत है । इस पर साहिब बड़ा प्यारा शब्द कह रहे हैं- - अबहीं नाहीं गुरु कै बच्चा, अबहीं कच्चा रे कच्चा । कहीं गुप्त कहीं परगट होवे, गोकुल मथुरा काशी । पवन चढ़ावे सिद्ध कहावे, होय सूर्य लोक का वासी ।

तबहूँ नाहीं गुरु कै बच्चा, अबहीं कच्चा रे कच्चा ॥

कह रहे हैं यदि इतनी शक्तियाँ आ जाएँ कि एक जगह से प्रगट होकर दूसरी जगह पहुँच जाए यानी जम्मू से गुप्त होकर काशी में प्रगट जो जाए या फिर मथुरा से गुप्त होकर कैलाश पर्वत पर प्रगट हो जाए तो भी समझो, आध्यात्मिक शक्तियों की प्राप्ति नहीं हुई, वो उर्जा नहीं मिली; इसलिए ‘अबहीं कच्चा रे कच्चा ' । जब तक सद्गुरु द्वारा मूल उर्जा नहीं मिलती, तब तक अपूर्ण रहेगा। आगे कह रहे हैं- करि अस्नान भभूत चढ़ावे, ब्रह्म अग्नि उद्गारे गा । जल के ऊपर आसन मारे, जो बोले सो होवेगा ।

तबहूँ नाहीं गुरु कै बच्चा, अबहीं कच्चा रे कच्चा ॥

यदि इतनी शक्ति भी आ जाए कि जो बोले, हो जाए यानी वाक्

सिद्धि भी आ जाए तो भी समझो पूर्ण नहीं हुआ । ओह ! अभी भी अपूर्ण ही रहा । जो कोइ कहे पुरुष अविनाशी, ज्योति स्वरूप लखावेगा।

वेद विविध के मारग छाने, तन लक्कड़ करि डारेगा ।

तबहूँ नाहिं गुरु कै बच्चा, अबहीं कच्चा रे कच्चा॥

यदि चारों वेदों का ज्ञान हो जाए; तपस्या करके तन को लकड़ी कर दे, तो भी साहिब कह रहे हैं कि अभी पूर्ण नहीं हुआ। वाह ! अभी भी 'कच्चा रे कच्चा ।' फिर कह रहे हैं- जोगी होयके जोग कमावे, रोम रोम करि छानेगा।

तीन लोक में कछु न छोड़े, पूरा जोग कमावेगा ।

तबहूँ नाहीं गुरु कै बच्चा, अबहीं कच्चा रे कच्चा ॥

कितना भी योग क्यों न कर ले। इतनी शक्ति आ जाए कि तीन- लोक में कहीं भी पहुँच जाए, तो भी समझो – ' तबहूँ नाहीं - गुरु कै बच्चा, अबहीं कच्चा रे कच्चा ।' आगे कह रहे हैं- एक शून्य को कौन कहावै, सात शून्य ले जावेगा ।

महाशून्य पर आसन मारे, सोहं का घर पावेगा ।

तबहूँ नाहीं गुरु कै बच्चा, अबहीं कच्चा रे कच्चा ॥

शून्य से ऊपर महाशून्य में भी पहुँच जाए; सोहं की प्राप्ति भी कर ले तो भी अपूर्ण ही रहेगा । वाह ! इतना कुछ करने के बाद भी पूर्ण नहीं हुआ। क्यों! क्योंकि अभी भी सद्गुरु से मिलने वाली मूल उर्जा नहीं मिल पाई । तभी तो कह रहे हैं- जोग भोग से न्यारा होवै, निः अक्षर नहिं भावैगा । हद बेहद अजपा से भागे, निज स्वरूप को पावैगा

अब भया रे गुरु कै बच्चा, अब पक्का रे पक्का ॥

कहैं 'कबीर' ठहर पद अपने, जो तीन काल नहिं नासत । नाम रूप यश जोड़ा बहुतै; परखत छूटै साँसत ।

अब भया रे गुरु कै बच्चा, अब पक्का रे पक्का ॥

योग और भोग-दानों से ऊपर उठकर जब सद्गुरु द्वारा 'नाम' की प्राप्ति करेगा, तभी गुरु का बच्चा बन सकेगा, तभी पूर्ण हो पायेगा; अन्यथा कच्चा ही रह जायेगा, अपूर्ण ही रह जायेगा । इसका मतलब है कि गुरु ने जो 'नाम' दिया, वो मूल आध्यात्मिक उर्जा थी। उसके बिना जीव संसार-सागर से पार नहीं हो सकता। गुरु के दर्शन से यह उर्जा बढ़ती जाती है। ध्यान करने पर भी यह उर्जा हमें मिल सकती है, पर यदि गुरुजन साक्षात् सामने हों तो यह उर्जा अधिक प्राप्त होती है। ध्यान तो दर्शन न कर पाने के विकल्प के रूप में किया जाता है। ध्यान में भी तो हम गुरुजनों की मूरत को चित्त में बिठाने का प्रयास करते हैं और यह उर्जा प्राप्त करते हैं। पर यदि गुरुजन सामने हों तो सीधे यह उर्जा हमें मिल जाती है । इसलिए शास्त्रानुसार यदि गुरुजन सामने हों तो हमें उनके समक्ष आँखें बंद नहीं करनी चाहिए, क्योंकि तब हमें सीधे-सीधे यह उर्जा मिल रही होती है; उस समय ध्यान की कोई आवश्यकता नहीं । इसलिए गुरु - दर्शन के महत्त्व को समझाते हुए साहिब आगे कह रहे हैं-

बार-बार न करि सके, पक्षे पक्ष करे सोय ।

कहै कबीर ता दास का जन्म सुफल ही होय ॥

कह रहे हैं कि यदि हफ्तें में एक बार भी सम्भव न हो सके तो फिर 15-15 दिन में ही कर लो; जीवन सफल हो जायेगा । पर किसी कारणवश इतना भी सम्भव नहीं हो पाता है। कई परेशानियों, दुनिया के झंझटों में मनुष्य उलझा रहता है। तो फिर ... ! फिर उसके लिए भी साहिब आगे बोल रहे हैं।

पक्षे पक्ष न करि सके, मास-मास करु जाय ।

यामें देर न लाइये, कहैं कबीर समुझाय ।।

कह रहे हैं कि फिर महीने में एक बार ज़रूर कर लो। साहिब सतर्क करते हुए समझा रहे हैं कि महीने में एक दिन गुरु के दर्शन को पहुँचना ही पहुँचना है। कमी तो आ जाएगी; मन का ज़ोर भी बढ़ जायेगा; पर फिर भी यदि महीने में एक बार भी गुरु का दर्शन कर लिया तो वो उर्जा मिलते ही कमी पूरी होनी शुरू हो जायेगी।

जिन परिस्थितियों में हम गुरु का दर्शन नहीं कर पाते हैं, उन परिस्थितियों में हमें गुरु का ध्यान करना चाहिए । सम्भव हो सके तो गुरु का दर्शन करना चाहिए, पर यदि ऐसा सम्भव न हो सके तो फिर उसका विकल्प है—‘ध्यान'। पर दर्शन तो फिर भी करने - ही करने हैं। अगर कुछ भक्त-जन, जो गुरु से बहुत दूर हों, किराए के पैसे भी न जुटा पाते हों, तो उनकी मजबूरी को समझते हुए साहिब कह रहे हैं—

मास-मास ना करि सके, छठे मास अलबत्त ।

या में ढील न कीजिये, कहै कबीर अविगत्त ॥

फिर छह महीने में एक बार कर लो; पर इसमें ढील न बरतना। क्योंकि यदि इसमें ढील बरती तो वो उर्जा कम हो जायेगी, जिससे आत्मा कुंद हो जायेगी। फिर ग़लतियाँ भी होने लग जायेंगी । लेकिन कुछ भक्त- जन, जो गुरु से इतनी ज़्यादा दूर हों कि छठे महीने में पहुँचना भी जिनके लिए सम्भव न हो सके तो केवल उनके लिए अंतिम विकल्प देते हुए साहिब कह रहे हैं—

छठे मास न करि सके, बरस दिना करि लेहि ।

कहै कबीर सो सन्त जन, यमहिं चुनौती देहि ॥

कह रहे हैं कि ऐसे भक्त - जन, जो छठे मास में भी गुरु दर्शन को न पहुँच सकें, वे बरस में एक बार ज़रूर गुरु का दर्शन करें। ऐसे भक्त - जन भी यम को चुनौती दे सकते हैं अर्थात् उनका आवागमन भी मिट सकता है। लेकिन यदि कोई ऐसा भी न कर सके यानी वर्ष में एक बार भी गुरु-दर्शन को न पहुँचे तो उस अभागे के लिए साहिब के पास भी कोई विकल्प नहीं है-

बरस बरस न कर सके, ताको लागे दोष ।

कहै कबीर वा जीव सो, कबहुँ न पावे मोक्ष॥

11. सहज मार्ग है हमारा

सहज-मार्ग है हमारा

परमात्म-तत्व की प्राप्ति के लिए तीन सूत्र नज़र आ रहे हैं- 1. योग - मार्ग 2. ज्ञान - योग 3. भक्ति - योग कोई योग-मार्ग बोल रहा है, कोई ज्ञान - योग बोल रहा है तो कोई भक्ति-योग बोल रहा है। तीन मार्ग दिखाई दे रहे हैं। अगर खामोशी से देखें तो दुनिया में जितने भी लोग हैं, इन तीन रास्तों का अनुकरण कर रहे हैं । ये तीनों मार्ग नज़र आ रहे हैं । इस तीन सूत्रों पर अच्छी तरह से चिंतन करना होगा । इन तीन पर चलकर हम कहाँ पहुँच सकते हैं! क्या है योग-मार्ग अंदर की दुनिया में जाने के लिए तीन सूत्र हैं - मीन, पपील और विहंगम । इस तरह काफ़ी लोग योग, कमाई की बात कर रहे हैं । जब भी योग या ध्यान की तरफ चलेंगे तो पंच मुद्राएँ हैं। योग पंच मुद्राओं की तरफ है। भारत के बड़े-बड़े जो पंथ हैं, वो इन्हीं की ओर इशारा कर रहे हैं। पर क्या चाचरी मुद्रा से परम-मोक्ष की प्राप्ति मिल जायेगी ? साहिब ने आपेक्ष किया, कहा कि नहीं होगा ऐसा । कुछ शक्तियाँ प्राप्त हो सकती हैं, लेकिन इस योग मुद्रा से हम परम तत्व की प्राप्ति कतई नहीं कर सकते हैं । इससे हम अंदर की विरोधी शक्तियों से बाहर नहीं निकल सकते हैं। बड़े-बड़े योगियों ने बड़ी कठिन तपस्याएँ की, पर विरोधी शक्तियों ने आगे नहीं बढ़ने दिया। पराशर आदि बड़ी तपस्याएँ करके भी काम को नहीं जीत पाए । कपिल मुनि आदि की तपस्या भी क्रोध ने समाप्त कर दी। इस तरह पता चल रहा है कि जिनके द्वारा आत्मा आच्छादित है, उनको हम योग आदि के द्वारा काबू में नहीं

कर सकते हैं। क्योंकि घोर साधनाएँ करने वाले भी इनसे प्रभावित हुए।

जब तक मनुष्य मन-माया के नियंत्रण में है, तब तक मोक्ष का प्रश्न ही नहीं उठता है । साहिब कह रहे हैं- हे हंसा तू अमर लोक का, पड़ा काल बस आई ।

पाँच पचीस तीन का पिंजड़ा, जामें तोहि राखा भरमाई ॥

आपका बैरी मन के अलावा और कोई नहीं है । इसलिए योग की क्रियाओं के द्वारा मन को नहीं जीत सकते हैं । जब भी कोई साधना पर चले तो उसे चिंतन करना होगा कि प्राप्त क्या होगा और सही सूत्र क्या है ! पंच मुद्राओं में कुछ ओंकार का नाम जपते हैं। ओंकार निरंजन का ही नाम है। पर सच्चा नाम गुप्त है । इसलिए ओंकार के द्वारा परम तत्व की प्राप्ति नहीं हो सकती है। इस तरह सोहं के द्वारा भी परम तत्व को नहीं पाया जा सकता है। साहिब कह रहे हैं- जो जन होइहैं जौहरी, शब्द लेहु बिलगाय । सोहं सोहं जप मुआ,

मिथ्या जन्म गँवाय॥

सोहं शब्द के विशेषज्ञ शुकदेव जी थे, पर उन्हें आगे का रास्ता तय करने के लिए उनमुनि मुद्रा में जाना पड़ा। उन्हें राजा जनक से दीक्षा लेनी पड़ी। राजा जनक उनमुनि मुद्रा के विशेषज्ञ थे, पर उन्हें भी आगे की मंजिल तय करने के लिए अष्टावक्र के पास जाना पड़ा। फिर आगे ररंकार शब्द है, जो दसवें द्वार की ओर जाता है । ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि यह साधना करते हैं, पर साहिब कह रहे हैं— ब्रह्मा विष्णु महेशादि ले, ररंकार को जाना।

उसके आगे पुरुष पुरातन, उसकी ख़बर न जाना ॥

दसवें द्वार के खुलने पर भी यह आत्मा काल के दायरे से बाहर नहीं निकल सकती है। सिद्ध साध त्रिदेवादि ले, पाँच शब्द में अटके ।

मुद्रा साध रहे घट भीतर, फिर औंधे मुँह लटके ॥

बार-बार मृत्यु लोक में आना पड़ता है । इस तरह कोई भी मुद्रा, जो हमारे ऋषि-मुनि, योगी, योगेश्वर आदि कर रहे थे, हमें अमर - लोक यानी महानिर्वाण की ओर नहीं ले जा सकती है ।

इन मुद्राओं से हम कतई अमर - लोक नहीं जा सकते हैं। इसलिए साहिब ने तथा संतों ने ऋषि-मुनियों, पीर पैगंबरों आदि का उदाहरण नहीं दिया, देव- चरित्र पर भी ज़्यादा व्याख्या नहीं की। क्या निंदा की ? नहीं, वो कह रहे हैं कि ये सब तीन-लोक के दायरे में हैं । साहिब की वाणी कह रही है कि पहले जितने भी लोग आए, तीन- लोक तक ही गये, आगे का यात्रा कोई नहीं कर पाया। आप देखें कि हॉलिकाप्टर पर बैठकर मंगल पर जाने की सोचें तो नहीं हो पायेगा न! उसकी क्षमता से बाहर है । इस तरह पंच मुद्राओं की क्षमता से बाहर है वो देश। इसलिए साहिब ऋषि-मुनियों के ज़्यादा उदाहरण नहीं दे रहे हैं। इसलिए उनका विरोध भी हुआ। क्योंकि हम जन्म-जन्मांतरों से जिन सूत्रों पर चलते आ रहे हैं, जिन सूत्रों को हमने बड़ी देर से पकड़ रखा है, उनसे आगे या उनसे हटकर नहीं जाना चाहते हैं । हमारे दिल में भय उत्पन्न होता है कि कहीं पाप न लग जाए। .....तो संतों ने कहा कि योग के द्वारा परम-तत्व की प्राप्ति नहीं हो पायेगी। जब साहिब की गोरखनाथ जी से गोष्ठी हुई तो कहा- इड़ा विनशे पिंगला विनशे, विनशे सुषुम्ना नाड़ी।

कहैं कबीर सुनो हो गोरख, कहाँ लगाओ ताड़ी ॥

जब भी बंकनाल में जाता है, तो स्वाँसा पर नियंत्रण करता है । मृत्यु के समय पर ये नष्ट हो जाती है, फिर कहाँ करना है ध्यान! यानी संतत्व की धारा योग पर केंद्रित नहीं कर रही है। साहिब कह रहे हैं कि इससे सूक्ष्म मन के तंत्र से बाहर नहीं निकल सकते हैं । आप देखें, योगियों को समय-समय पर क्रोध भी आया, वासना भी आई। योग को बुरा नहीं बोल रहे हैं। इससे शक्तियाँ मिल जायेंगी, बहुत शक्तियाँ मिल जायेंगी, पर उससे कुछ नहीं होने वाला, क्योंकि सब सिद्धियाँ - शक्तियाँ माया का खेल है। यही तो निरंजन ने जीव को आत्म- ज्ञान में जाने के लिए बाधा के रूप में रख रखीं हैं, ताकि जीव इनको प्राप्त करके इन्हीं में खो जाए, आगे बढ़ने की कोशिश न करे । इसी पर तो साहिब कह रहे हैं-

कोई कोई पहुँचा ब्रह्म लोक में, धर माया ले आई ॥

बस, इन शक्तियों को प्राप्त करके जीव सच्चे लक्ष्य से भटक जाता है।

फिर आप देखें कि इन शक्तियों को प्राप्त करके ऋषि-मुनियों ने हिंसा, क्रूरता ही तो दिखाई। इस शक्तियों को प्राप्त करके दूसरों को कष्ट ही तो दिया । पर एक महात्मा किसी को कष्ट नहीं देता है । उनकी निंदा नहीं कर रहे, क्योंकि उनकी ग़लती नहीं थी, निरंजन के दायरे में थे न । मौका आने पर कपिल मुनि ने राजा सगर के 60 हज़ार पुत्रों को जो भस्म किया, वो क्या था! यानी अंदर के विकारों को नहीं जीत पाए थे न ! दुर्वासा जी ने 56 कोटि यादवों को जो शाप दिया, वो क्या था ! अगर इतनी तपस्या करके वो क्रोध को नहीं जीत सके, तो फिर तपस्या से आत्म-ज्ञान कैसे प्राप्त करोगे! वहाँ तो मन को पूरी तरह से मारना होता है जबकि काम को तो मन का एक ही हाथ समझो, क्रोध तो मन का एक ही हाथ समझो । पराशर ऋषि को ही ले लें। मछोदरी के साथ जो किया, क्या एक आत्म- ज्ञानी कर सकता है ! तपस्या की तो क्या यही प्राप्त करके आए थे ! क्या हासिल किया फिर तपस्या से ! लड़की तो बचना चाह रही थी । उसने कहा कि सूर्य देव देख रहा है। ऋषि ने अपनी तपस्या के बल से सूर्यदेव को बादलों से ढक दिया। लड़की ने कहा कि जल देवता देख रहा है । पराशर ने हाथ घुमाया, जल पर रेत-ही-रेत हो गयी । उसे भी गुम कर दिया। लड़की फिर बचना चाह रही थी, कहा कि मैं मच्छोदरी हूँ, मेरे शरीर से मच्छी की बदबू आती है। ऋषि ने अपनी तपस्या के बल से लड़की के शरीर को भी महकदार बना दिया, योजन दूरी तक उसके शरीर की महक फैलने लगी। तपस्या से यही सब प्राप्त कर पाए थे ऋषिवर । सबने यही सब शक्तियाँ ही तो प्राप्त की। पर जो काम ऋषि पर सवार हुआ था, उससे नहीं बच सके और अंत में लड़की के साथ रति-क्रिया की । लड़की बेचारी बचना चाह रही थी, पर शक्तिशाली ऋषि से बच नहीं सकी। क्या आत्म- ज्ञानी कहेंगे ऋषि को! आत्मज्ञानी को तो सबमें एक आत्मा ही नज़र आती है। वो शरीर की तरफ आकर्षित होता ही नहीं । यह निंदा है क्या ! यह तो तपस्या से क्या हासिल होगा, यह समझाने के लिए कहा । इस तरह देवी - देवताओं की भक्ति से आप अमर-लोक नहीं जा सकते हैं, साहिब यह कह रहे हैं, निंदा तो की ही नहीं, किस भक्ति से क्या प्राप्त होगा, किसी भक्ति से कहाँ तक जाओगे, यह सब बताया। दुनिया है कि लड़ने आ जाती है। तो इसका मतलब है कि योग के द्वारा मन - माया से बाहर नहीं