करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
के लिए आत्मदेव अज्ञानवश स्वयं अपनी ही उर्जा लगा रहा है। आत्मा के लिए तो शास्त्रों में कहा कि नाश नहीं होता, अजर-अमर है । वासुदेव कृष्ण ने जब कहा कि मैं गीता का संदेश पहले भी सूर्य को दे चुका हूँ। अर्जुन ने कहा कि आप तो इसी युग में हुए हैं और सूर्य पुरातनकाल से है, फिर यह कैसे संभव है? तब वासुदेव ने कहा कि तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं, पर अन्तर यह है कि वो सब तुझे याद नहीं हैं, पर मुझे याद हैं।
यानी आत्मा ने कई शरीर धारण किये। सभी छूट गये ।
आखिर यह तन खाक मिलेगा, कहाँ फिरत मगरूरी में ॥
यह भी छूट जायेगा। यह पूरा - पूरा सच है । इसके बाद भी कैसा अज्ञान है कि सच मान रहे हैं। क्योंकि मोह आ जाता है तो सच लगता है । मोह के कारण आत्मा भी मेरा-मेरा कहने लगी, लोभ के कारण पाप करने लगी । यह आत्मा का स्वभाव नहीं है। यानी वर्तमान में बिना नाम के आपमें आत्मा का स्वभाव मिल नहीं रहा है। | किसी को भी जानने का प्रयास करते हैं तो दो चीज़ों से। एक तो शारीरिक नाक-नक्शे से और दूसरा स्वभाव से । नाक, आँख आदि देखकर पहचाना। यह याददाश्त में रखा हुआ है कि उसका रूप ऐसा है । दूसरा स्वभाव से जानता है कि कैसा है। पूछा जाता है कि फ़लाना कैसा है ? क्यों पूछा जा रहा है ? कर्म से कैसा है, स्वभाव से कैसा है, क्रिया से कैसा है, यह पूछा जा रहा है। कहता है कि अच्छा है । धोखा नहीं दे रहे हैं, परमार्थी हैं, पीड़ा नहीं दे रहे हैं तो अच्छा है । आत्मा को भी देखते हैं । आत्मा कहाँ है ? स्वभाव भी देखते हैं। ढाँचा तो बड़ा निर्मल है। यह स्त्री भी नहीं है, पुरुष भी नहीं है। पंच भौतिक तत्व भी नहीं है । यानी वायु भी नहीं, आग भी नहीं । परमात्मा का अंश है । बहुत निर्मल है। यह छोटी भी नहीं है, बड़ी भी नहीं है । अजर, अमर है । इसका ढाँचा भी निराला है । कमती - बढ़ती भी नहीं है । कभी भी नाश नहीं होती। मजबूत है । नित्य है । इसका बाहरी स्वरूप बड़ा ज़ोरदार बनावट भी मजबूत है । तत्वों से परे है । जहाँ भी तत्व हैं, वहाँ विनाश है। पृथ्वी का विनाश जल कर देता है, जल का विनाश आग कर देती है, आग का विनाश हवा कर देती है और हवा का विनाश आकाश कर देता है । पर आत्मा इनसे परे है। अब आत्मा के गुण देखते हैं । इसे आत्मदेव कहते हैं, कोई राक्षस
नहीं। इसमें ज्ञान है, विचार है, दोष नहीं हैं, निर्मल है, क्रोध नहीं है, लोभ भी नहीं है, हिंसा भी नहीं है, विकार भी नहीं हैं । विवेक है, आनन्द है । शील भी है, संतोष भी है। वे ही सद्गुण हैं, जो प्रभु में हैं। रामायण भी कह रही है—
ईश्वर अंश जीव अविनाशी । चेतन अमल सहज सुखरासी ॥
सो माया बस भयो गुसाईं । बंध्यो कीर मरकट की नाईं ॥
यह अनाश्रित भी है। इसे किसी का सहारा नहीं चाहिए। यानी यह बाहरी संसाधनों पर निर्भर नहीं है । शरीर तो निर्भर है। पानी न मिले तो नष्ट हो जायेगा, हवा न मिले तो समाप्त हो जायेगा। पर आत्मा को ये समस्याएँ भी नहीं हैं। बड़ी आनन्दमयी है, अविनाशी है । यह है इसका स्वभाव, यह है इसकी प्रवृत्ति । बड़ी शील है आत्मा । पर कहाँ खो गयी है ? किसी में जो कुछ भी दिख रहा है, अनात्म दिख रहा है, मन का परिवार दिख रहा है। जो भी दिख रहा है, आत्मा नहीं है । जैसा कर्म मनुष्य कर रहा है, उसे आत्मा नहीं कहा जा सकता है। सबमें देखो, लोभ है, अहंकार है, घृणा है । रूह गयी कहाँ है ? यही आत्मा है क्या? यही है तो फिर निर्मल नहीं कही जा सकती है। यह बहुत बुरी तरह से जकड़ी है। जो दिख रहा है, मन दिख रहा है, दोष दिख रहे हैं, क्रूर परिवार दिख रहा है। आत्मदेव गुम हो गया है। इसलिए तो आत्मसाक्षात्कार की ज़रूरत है । सभी कह रहे हैं कि आत्मा को जानें। बड़ी बिडंबना है कि इसी से विचार कर रहे हैं और पता नहीं चल रहा है । आत्मा को भ्रमित करने वाली सत्ता इसे निकलने नहीं दे रही है, समझने नहीं दे रही है ।
बहु बंधन ते बाँधिया, एक विचारा जीव ।
जीव विचारा क्या करे, जो न छुड़ावे पीव ॥
यह पूरा आत्मा का बंधन है।
प्रबल अविद्या का परिवारा ॥
यह अविद्या का परिवार है । गोस्वामी जी भी कह रहे हैं-
जड़ चेतन है ग्रंथ पड़ गयी । यद्यपि मिथ्या छूटत कठिनई ॥
यही शब्द साहिब कह रहे हैं कि कहीं जकड़न में है आत्मा ।
पार लगन को हर कोई चाहे । बिन सतगुरु कोई पार न पावे ॥
पर गुरु की इतनी महिमा है कि बदल देगा। दुनिया का झूठा धर्म है। मैंने आपको छल, कपट आदि से युक्त मन का गंदा धर्म छुड़ाकर बदल दिया।
अब मधुमय बना दिया। नहीं तो पहले मन की ही हुकूमत थी। कई जन्मों की तपस्या से भी नहीं बदल सकते थे, इतने शुद्ध नहीं हो सकते थे। तभी तो साहिब कह रहे हैं-
यह सब साहिब तुम्हीं कीना । बरना मैं था परम मलीना ॥
यह सब कैसे हुआ? नाम के बाद आपके पास दूसरी ताकतें आ गयीं, जिन्होंने काम, क्रोध आदि गंदी ताक़तों से युद्ध किया ।
पहले इनकी पूरी फौज को समझते हैं ।
प्रथम काम धनुष कर लीन्हें । पाँच बान सो तासंग चीन्हें ॥
मोहन वशीकरण उचाटा। बान लगत घर भूले बाटा ॥
दुष्ट काम उर प्रकटे आयी । ज्ञान विचार बिसरि सब जायी ॥
ऋतु बसंत त्रिय सैन सिंगारा । कहि न काम की सेन अपारा ॥
सोलह श्रृंगार देखी मन मानी । निरखत अंग अंग की वाणी ॥
ऐसी निरखि काल की सेना । सुर नर मुनि उर धरत न चैना ॥
काम के पाँच बाण हैं- मारण, मरण, मोहन, वशीकरण और उच्चाटन। इन पाँच बाणों से काम ने सबकी मति मार दी है। क्या देवता, क्या मनुष्य, क्या ऋषि-मुनि, सबका चैन काम ने छीन लिया है। इसके बाणों से आहत होकर सभी बेहाल घूम रहे हैं । यह काम अति प्रचण्ड है, होय उत्पन्न तिय अंग । सैन चैन अतिही बढ़े, चढ़े काम रति
रंग ॥
तन मन अस्थिर न रहे, काम बान उर साल ।
एक बाण से सब किये, सुर नर मुनि विहाल ॥
यह काम बड़ा प्रबल है, जो तपस्वियों का तप नहीं रहने देता है । यह काम स्त्री के संग से उत्पन्न होता है । देवता लोगों को भी यह अपने वश में रखता है। शास्त्रों में प्रमाण मिलते हैं—
चलै काम यह सबै पलाने । महारुद्र की करत न काने ॥
महारुद्र पहँ पहुँचे जानी । मारयो पुहुप बान शर तानी ॥
देखि कामिनी मोहे देवा । पुहुप बान को कुछ लह्यो न भेवा ॥
छांडि ध्यान धाये त्रिपुरारी । समुझे जबहिं परे जुहारी ॥
बड़े-बड़ों की ख़बर ली है इसने । महारुद्र को भी नहीं छोड़ा। मोहिनी
रूप ने मोहित कर लिया । इसे मामूली नहीं समझना ।
तब रति देख दीन है गयऊ। विनती करत विषय तन भयऊ॥
जब रति देखि दीन है आई । विनती करी तब लखि पाई ॥
सृष्टि न होय न चलै संसारा । महा रुद्र तुम करहु विचारा ॥
जब शिव देख दया मन लावा । ता दुख मेटन मन में आवा ॥
तब ति जानि बहुरि निर्मयऊ । अंगहीन सो अति बलि भयऊ ॥
शिव महापुराण में भी कथा आती है। तो—
बहुरि काम चले समुहाई । तेतिस क्रोड किये वशि जाई ॥
काम बान शर धरि लीन्हा । जीतन चले सो आपु वशि कीन्हा ॥
इंद्रसेन जब गयी सब हारी । इंद्रहु की गई बुद्धि मति मारी ॥
जबहिं इंद्र काम वश भयऊ । गौतम नारि छलन तब गयऊ ॥
जबते चित में चितये पापू । सहे उग्र गौतम का शापू ॥
सहस्र भग ताकहँ भयऊ। काम बान कर फल यह ठयऊ॥
काम चंद्र पर चितवे जबहीं । जाइ हरे गुरुपत्नी तबहीं ॥
इस काम ने तैतींस करोड़ देवताओं को भी अपने वश में किया हुआ है। उनके राजा को ही लेते हैं। राक्षसों से युद्ध में हार जाने पर इंद्र का दिमाग़ ख़राब हो गया और वो गौतम रिषी की पत्नी अहिल्या के पास पहुँच गया। देखा न, देवताओं के राजा का यह हाल हो गया ! फिर आम आदमी की क्या बात करें ! आदमी क्या, अन्य देवताओं की बात भी क्या की जाए ! देवताओं के राजा का यह हाल हो गया। कोई अच्छा हो तो कहते हैं कि देवता समान है । अब देवताओं के राजा का यह हाल है कि पराई स्त्री के पास पहुँच गया तो क्या कहा जाए! गौतम ऋषि ने शाप दे दिया, कहा कि जाओ, सहस्र भग हो जाएँ शरीर में। उसके शरीर में हज़ार भग द्वार हो गये, मुँह में, टाँगों में ....... सब जगह। जब चंद्रमा पर काम की नज़र पड़ गयी तो वो गुरु- पत्नी के पास पहुँच गया। साहिब कह रहे हैं-
ऐसो असुर घट मों बसे, सुनहु हो धर्मदास ॥
घट परिचय जाने बिना, सबका भया विनाश ॥
तन मन लज्जा ना रहै, काम बाण उर साल॥
एक काम सब बसि किये, सुर नर मुनि विहाल ॥
इस तरह यह काम बड़ा ख़तरनाक है । इसका अपना एक परिवार भी है। इस काम की स्त्री है—रति, पुत्र है – लालच और बंधु है—लोलुपता । ये सभी बुरा काम करने वाले हैं। बहुत ही बुरे हैं ये सब | तो आगे कह रहे हैं-
श्रृंगी ऋषि जो वन महँ जाये । कन्द मूल खनी बन फल खाये ॥
ऐसन ज्ञान ध्यान मन धरई । सोउ काम वसि फिरि फिरि परई ॥
शृंगी ऋषि ने तो अपने शरीर को सुखाकर लकड़ी समान कर लिया था। वो सबसे दूर जंगल में एक खोह में रहा करता था। उसे भी एक वेश्या ने वश में कर लिया और फिर वो तीन बच्चों का बाप भी बन बैठा । जब होश आया तो सब छोड़ पुन: जंगल में चला गया। जब काम मनुष्य पर सवार हो जाता है तो उसे कुछ भी होश नहीं रहने
है | कामातुर होकर मनुष्य बड़े बड़े अनर्थकार्य भी कर डालता है।
काम वशि भये रावण राऊ । हरण सीता किया नाश उपाऊ॥
बड़ बड़ त्रानी जग महँ भयऊ। काम त्रास सबन कहँ दयऊ ॥
रावण बड़ा ज्ञानी था, चारों वेदों का ज्ञान रखता था वो। पर काम को नहीं जीत सका और सीता जी का हरण कर लिया।
नारद आदि पंच शर तानी । और अनेक जेहि नर ज्ञानी ॥
काम बाण जब दशरथ लागे । राम छुटे
तब प्राण त्यागे ॥
काम बली अति बलवंडा । जासु बान रहे विकल ब्रह्मण्डा ॥
नारद जैसे ज्ञानी को भी नहीं छोड़ा। यह पूरे ब्रह्माण्ड को व्याकुल रखता है। सोचो, कितने बड़े-बड़े महारथियों को नचाया है काम ने! अब क्रोध की तरफ चलते हैं । यह तो काम का जुड़वा भाई समझो। साहिब कह रहे हैं-
काम ते अधिक क्रोध प्रचंडा । जाके डर त्रासे नौ खंडा॥
गुरु कुबुद्धि क्रोध के संगा । अढर भेष धरि चढ़त जो अंगा ॥
जब उर क्रोध प्रगटे आयी । कांपै देह थर थर हो जायी ॥
टेढ़ी भोहैं अंकित नैना । अशुभ असार मुख बोले बैना ॥
जरे हृदय मुख निकसे झारा । रोम रोम पावक पर जारा ॥
मार मार करै अपघाता। गिनैं न मात पिता औ भ्राता॥
दुई जाय कै विनशै आपा । दारुण हिया क्रोध कै रूपा ॥
यह क्रोध भी बड़ा ख़तरनाक है । जब यह हृदय में आता है तो शरीर काँपता है। तब भौहें टेढ़ी हो जाती हैं, आँखें लाल, अनाप-शनाप बकता है। मुँह से तब झार निकलती है, रोम-रोम में क्रोध की अग्नि जलने लगती है । तब इंसान को अपना-पराया, हित-अनहित कुछ भी नहीं सूझता है । उसके मस्तिष्क पर एक पर्दा-सा छा जाता है और वो बड़े-बड़े मूर्खों वाले कार्य भी कर डालता है । इस क्रोध ने भी बड़े बड़ों की ख़बर ली है । इस क्रोध की स्त्री है— हिंसा, पुत्र है – अविचार और बंधु है- - भूल । जब-जब क्रोध आता है, विनाश होता है । इस तरह क्रोध ने समय-समय पर इस संसार का बड़ा विनाश किया है। साहिब कह रहे हैं-
प्रथमें क्रोध ब्रह्मा को भयऊ । षट पुत्रन कहँ शाप जो दयऊ ॥
सनकादिक वैकुंठे गयऊ । रोकत पौरी क्रोध मन भयऊ ॥
जब जब शिव क्रोध करै संसारा । परलय होत न लागे बारा ॥
दुरवासा क्रोध न सहेऊ । उलटी हानी तप में भयेऊ ॥
छप्पन कोटि यादव संघारा । आपुहिं आप क्रोध परजारा ॥
कौरव पाण्डव क्रोधहि जारे । आपहि आप गये सब मारे ॥
ब्रह्मा जी सृष्टि के कर्त्ता हैं। भाइयो, यह मामूली बात नहीं है, विचार करना होगा। छह पुत्रों को शाप देकर भस्म कर डाला । सनकादिक ऋषि वैकुण्ठ में जा रहे थे तो जय-विजय नामक द्वारपालों ने अन्दर नहीं जाने दिया। ओह, इतना बड़ा ऋषि, मुझे रोका। क्रोध आ गया सनकादिक को और बस, दे डाला शाप, कहा- -जाओ, तीन जन्म के लिए राक्षस हो जाओ । शिवजी क्रोध करते हैं तो तीन-लोक में प्रलय कर देते हैं । यह तो सब जानते हैं । दुरवासा ऋषि क्रोध को न जीत सके और 56 कोटि यादवों को शाप देकर भस्म कर डाला । देखा न, कितने बड़े बड़ों को वश में कर रखा है इसने ! सारा संसार इसकी चपेट में है।
क्रोध अनि घट घट बरी, जरत सकल संसार ।
दीन लीन निज भक्ति सो, ताकर निकट उबार ॥
दसो दिशा ते उठी परबल क्रोध की आग।
संगति शीतल साधु की, शरण उबरिये भाग॥
संतों की शरण में जाकर ही इससे बचा जा सकता है, अन्यथा पूरा संसार इस क्रोध की आग में जल रहा है।
कहैं कबीर क्रोध परहरै । सोई प्राणी भवसागर तरै ॥
क्षण क्षण क्रोध हृदय में आवै । जप तप ज्ञान रहन नहिं पावै ॥
पंडित गुणी योगी वैरागी । ये सब जरैं क्रोध की आगी ॥
पंच अग्नि ग्रीष्म ऋतु धरई । ऐसी विधि त्रिकाल तप करई ॥
पाँचो इंद्री करै निरासा | साधे निदा भूख पियासा ॥
जतन जतन बहुत तप करहीं । क्रोध छुड़ाय छन एकमहँ हरहीं॥
सिद्ध काज विनास क्रोधा । सब फल जाइ न पावै सोधा ॥
इस क्रोध को जो त्याग देता है, वो भवसागर से पार हो जाता है । जब यह क्रोध हृदय में आ जाता है तो जप, तप, ज्ञान कुछ भी रहने नहीं देता है। चाहे कोई पाँचों इंद्रियों को साध ले, भूख, नींद आदि को भी वश में कर ले, पर जब क्रोध आता है तो एक पल में सब कुछ हर लेता है । यह क्रोध बने बनाए काम बिगाड़ देता है और सारे फल का नाश कर देता है ।
बहुत जतन तप कीनेऊ, सब फल क्रोध नसाय।
कहैं कबीर धन संचै चोर मूसि लै जाय ॥
, तपस्वी बड़े यत्न से तप करते हैं, पर क्रोध आता है तो सारे तप को नष्ट कर देता है। जैसे कोई धन का संचय करता है, पर आख़िर चोर चुरा ले जाता है, ऐसे ही क्रोध सारे तप का नाश कर देता है । क्रोध के बाद अब लोभ की तरफ चलते हैं । साहिब कह रहे हैं—
बुरा लोभ ते और न कोई । सकल अधर्म लोभ ते होई ॥
यह लोभ सभी पापों की जड़ है। लोभ की स्त्री है - तृष्णा, बेटा है— पाप। यानी यह लोभ पाप का बाप है । इस लोभ की कहानी भी बड़ी ही निराली है ।
पहिले पैसा मों मन लावै । पैसा मिले टका को धावे ॥
टका देखि मन में सुख भयऊ। दो टका का उद्यम कियऊ ॥
दुई जोरे जोरे फिर चारी । लोभ पाति दीन्हों परचारी ॥
चारि जोरि मन उपज्यो रंगू । अब दश कै जोर होय जनि भंगू ॥
दश जुरै मन रहे न ठोरा। जोरि बीस मन आगे दौरा ॥
बीस जोरि मन बाढ़ी आशा । अब जो कैसेहु के जुरे पचासा ॥
जोर पसाच गाँठ सो दीन्हा । तब सहस्र को उद्यम कीन्हा ॥
जोरि सहस्र तृष्णा नहिं साखू । अब लागै जोरन लाखू ॥
लाख जोरि विनवै कर जोरी। अब परमेश्वर मोहि देहि करोरी ॥
जोरि करोर क्षण कल नहिं परै । लोभ अग्नि छिन छिन तनु जरै ॥
ज्यों ज्यों लोभ मिलै नौखंडा । त्यों त्यों लोभ भयो परचंडा॥
दस मिलें तो बीस चाहिए, बीस मिलें तो पचास, पचास मिलें तो एक सौ, एक सौ के बाद एक हज़ार, फिर लाख, करोड़। नहीं, कभी ख़त्म नहीं होता यह लोभ । साहिब धर्मदास से कह रहे हैं-
कलियुग वैराग अस होवे भाई । सुनु धर्मदास मैं कहौं बुझाई ॥
कलियुग पाप कर्म बहु बढ़िहैं । करि करि पाप दुख में परिहैं ॥
ताते दरिद्र होय बहु लोगा । सहिहैं बहुते दुख अरू सोगा ॥
पाइ दुख बहु भेष सों धरिहैं । लागे लोभ पाप बहु करिहैं ॥
मांगि मांगि कछु द्रव्य कमायी । ऋण ब्याज दर दिहैं उठायी ॥
नाम साधु जग माहिं कहायी । खैहैं ब्याज करि कर्म कसायी ॥
मठ मंदिर कारण धन लैहैं । सेवक साख बहुत बढ़े हैं ॥
पाइ द्रव्य विषय सो भोग हैं । बहु विधि इंद्रिन सुख लगिहैं ॥
विषय भोग को द्रव्य सो चाही । तब पडिहैं वह तृष्णा माहीं ॥
तृष्णा अति परबल जग भंगी । सदा रहै वह लोभ की संगी॥
साहिब कह रहे हैं कि कलयुग में मनुष्य लोभ के कारण बड़ा पाप करता है, इसलिए दरिद्र होता है और बड़ा दुख सहता है। कलयुग में पाखण्डी साधु धर्म के नाम पर भीख माँगते हैं और बहुत धन जोड़ लेते हैं। उनके दिल में विषय-भोगों की तृष्णा रहती है । यह तृष्णा लोभ की पत्नी है, जो सदा उसके संग रहती है। यह लोभ तो काम और क्रोध से भी बढ़कर है, इसलिए साहिब कह रहे हैं— कामी लोभी बंदा न तरे, नर बहुते तरे, कहैं क्रोधी कबीर तरे सिद्धंत ॥ अनन्त । इस लोभ के चंगुल में एक-दो नहीं हैं ।
भगत मुड़िया जटाधारी, ज्ञानी गुनी अपार ।
षट दर्शन भटकत फिरे, एक लोभ की लार ॥
इसके बाद आता है— मोह | यह तो सबका राजा है । साहिब कह रहे हैं—
मोह सकल व्याधिन को मूला । ता ते उपजत बहु विधि सूला॥
यह सभी बीमारियों की जड़ है । इसकी उत्पत्ति ही माया से है।
मोह नृपति माया ते भयऊ। प्रबल घटा तिहूँ पुर सी छयऊ॥
वरनो तासु नाम गुण बैना । महा मोह राजा को सैना ॥
इस मोह राजा का बहुत बड़ा परिवार भी है।
निज अज्ञान देश राजधानी । आलस महल आशा पटरानी ॥
इच्छा बेटी खरी कठोरी । बाँधे अनेक जीव उठि भोरी ॥
कुमति सखी ताके संग रहई । निति उठि हृदय सबन की दहई ॥
लौंडी छूत टहल घर करई । जाके परसत सब जग डरई ॥
लौंडा लालच नाहिं अघावे । वरजत निलज सबके घर जावे ॥
रोग शोक संशय बहु भांति । पर द्रोही और द्वन्द संघाती ॥
ये राजा के पुत्र प्रचंडा । जाके डर त्रासे नौखंडा॥
पाप सबन को औगुन जानी । दुख दरिद्र मोह अभिमानी ॥
अधर्म ध्वजा जाके अगवानी । बाजा प्रकट कलह निशानी ॥
दम्भ क्षत्र चौतरा शूला। जहँ सिंहासन बैठे फूला ॥
कपट वजीर असत्य खवासा । पाखंड मंत्री संग प्रकाशा ॥
यह मोह अज्ञान के देश में रहता है। इसकी स्त्री है - तृष्णा, , बेटी है- इच्छा, बेटा है- लालच, मंत्री है - पाखंड, वजीर है - कपट, , मित्र हैं— रोग और शोक। इस तरह इस मोह राजा का बहुत बड़ा परिवार है, बहुत बड़ी सेना है । मोह की इस सेना से बचना आसान काम नहीं है, इसलिए साहिब कह रहे हैं-
यह सेना सब मोह की, कहैं कबीर समझाय ।
इनते जो कोई बाचई, भवसागर तरि जाय ॥
अब अंत में आता है— अहंकार । यह सबसे ख़तरनाक है । इसकी स्त्री है— निंदा । अहंकार दूसरे की निंदा करता है। किसी को धन का, किसी को बल का, किसी को विद्या का अहंकार रहता है । जब जब अहंकार हृदय में आता है, तब तब जीव अपने समान किसी को नहीं मानता है ।
छिन छिन गर्व हिया में आवे । आगे कुटिल सबही दिखलावे ॥
ऐंठत चलै निहारत पागा । गर्व खबीस तबहिं उठि लागा ॥
ऐंठ अकड़ अभिमानी माहीं । अभिमानी नीचा हों नाहीं ॥
मूँछे ताव निहारत छांही। काँधे धरे अवर की बाँहीं ॥
टेढ़ी पाग गर्व मन धरई । मन महँ ऊमतवालो फिरई ॥
अनीति वचन औरन सों बकै, हमरी बरोबरी को करि सकै ॥
अहंकारी में अकड़ होती है। वो दूसरे को कुछ नहीं गिनता है । दूसरों को अपशब्द भी बोल देता है । वो सोचता है कि मेरे बराबर कोई नहीं है । साहिब समझा रहे हैं-
अति के गर्व न होय भाई । गर्वहि ते पुनि सर्व नशायी ॥
अभिमानी नहिं छूटे कबहूँ । बहु विलक्षण ज्ञानी होय तबहूँ ॥
भगली दंभ नितही मन माहीं । निकट साँच कछु आवे नाहीं ॥
हम हम हम करत सो डोलै । काहू से सीधा नहिं बोलै ॥
रूपवन्त रूप गरवावै । कोई मौसम दृष्टि न आवै॥
धन कुल विद्या गर्बाना । अनी ऊँच ज्ञानी विखराना ॥
अहै भूप राजा अभिमानी । आपेही को सरवस जानी॥
है योगी योग गर्व धारै । बड़े बड़े सिद्धि काल गहि मारै ॥
साहिब कह रहे हैं कि यह अहंकार नहीं होना चाहिए। इस अहंकार से सब नाश हो जाता है। अभिमानी कभी पार नहीं हो सकता है । अहंकारी सदा ‘मैं’‘मैं' ही लगाए रखता है और किसी से सीधी बात नहीं करता है । धन, कुल, विद्या आदि का अभिमान सबको घेरे रखता है । राजा को अपने बढ़प्पन का अभिमान होता है। योगी को अपने योग का अभिमान रहता है। इस तरह ये पाँचों ही बहुत बुरे हैं। ये पाँचों मन के हाथ हैं, जिनसे यह सबको मरोड़े जा रहा है। मनुष्य इनसे सावधान नहीं है । साहिब सतर्क कर रहे है
चश्म दिल से देख तू, क्या क्या तमाशे हो रहे .... ॥
नाम से क्या होगा जिस दिन गुरु नाम दे देता है, उस दिन वो नाम पूरी सुरक्षा करता है । तब काम का प्रभाव नहीं पड़ता है। जैसे किसान लोग बीज को सुरक्षित कर देते
हैं तो कीड़ा नहीं लगता है । क्योंकि जैसे ही खाता है, कीड़ा मर जाता है। इस तरह गुरु नाम के द्वारा अन्दर से सुरक्षित कर देता है । गुरु माया से सुरक्षित कर देता है, गुरु मन से सुरक्षित कर देता है । माया प्रूफ बना देता है । जैसे वाटर प्रूफ घड़ियाँ बनाई गयी हैं, इस तरह पूरा गुरु माया से सुरक्षित कर देता है । आप खुद नहीं कर सकते हैं। मन से, काम से, क्रोध से, भूत-प्रेतों से, ग्रहों-नक्षत्रों से सुरक्षित कर देता है। इनकी मार से इंसान बच नहीं पाता है । एक महात्मा को मैंने सत्संग करते हुए सुना । उसने जब अपना हाथ ऊपर उठाया तो उसके हाथ में मैंने अंगूठियाँ देखीं, जो ग्रहों वाली थीं । महात्मा ने 3-4 अंगूठियाँ पहनी हुई थीं। वाह, अब वो खुद ग्रहों से डर रहा है, बचता फिर रहा है तो शिष्यों की सुरक्षा क्या करेगा। जब महात्मा लोग कहते हैं कि यह करो, वो करो, तप करो, मंत्र जाप करो तो मैं जान जाता हूँ कि इनको मन से बचने का फार्मूला पता नहीं है, क्योंकि—— कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा ।
गृह छोड़ भये सन्यासी, तऊ न पावत पारा।।
नाम के बिना मन से कोई पार नहीं पा सकता है। नाम पूरी सुरक्षा कर देता है। सतगुरु शब्द सहाई ।
निकट गये तन रोग न व्यापै, पाप ताप मिट जाई ।।
नाम की ताकत से शरीर के रोग नहीं सतायेंगे, पाप कर्मों की ओर नहीं जा पाओगे। भौतिक, दैहिक और दैविक - तीनों तरह के ताप भी नष्ट हो जायेंगे। ग्रह भी नहीं लगेंगे। जबहि नाम हिरदे भया, भया पाप का नाश ।
जैसे चिनगी आग की, परी पुरानी घास ।।
जैसे पुरानी सूखी घास पर आग की चिंगारी भी पड़ जाए तो अनेक घास के तिनकों को जलाकर भस्म कर देती है, इसी तरह जिस हृदय में नाम आ जाता है, उस हृदय में फिर पाप कर्मों की जगह नहीं रहती । इन बातों में सार है। क्या सच में जब नाम हृदय में आ जाता है तो पाप का नाश हो जाता है ? हाँ, नाम के बाद गलत कर्मों की ओर नहीं जा पाता है । I
आप चाहकर भी खोटे कर्म नहीं कर पाते हैं। वो ताकत अंत:करण को आकर रोकती है। ऐसी ही नहीं कह रहे-
सतगुरु शब्द सहाई॥
तो आगे कह रहे हैं—
अठवन पठवन दृष्टि न लागे, उलटे तिहि धर खाई ।
मारन मोहन वशीकरन कर, मन ही मन पछिताई ।।
कह रहे हैं कि बुरी नजर भी नहीं लगेगी । उलटा बुरी दृष्टि लगाने वाले का बुरा हो जायेगा । मारन, मोहन आदि बाणों का भी असर नहीं होगा । इतना ही नहीं— जादू यंत्र युक्ति नहिं लागे, शब्द के बान डहाई ।
ओझा डायन उर डर डरपे, जहर जूड़ हो जाई ।।
शब्द (नाम) रूपी बाण के आगे किसी तरह का जादू -मंत्र टिक नहीं पायेगा। जादू-मंत्र करने वाली डायन, ओझा आदि का हृदय स्वयं ही भय से व्याकुल हो जायेगा। इस नाम की ताकत के आगे जहर भी बेअसर हो जायेगा ।
विषधर मन में कर पछतावा, बहुरि निकट नहिं आई ।
कहैं कबीर काटो यम फंदा, सुकृति लाख दुहाई ।।
इसी नाम से काल का जाल कटेगा । नाम कवच की तरह रक्षा करेगा । इहलौकिक और परालौकिक दोनों सुख नाम देगा।
जो सुख को चाहो सदा, तो शरण नाम क लेह ।।
जिस दिन नाम की ताक़त आ जाती है, इहलौकिक और परालौकिक, दोनों तरह की शक्तियाँ आपमें आ जाती हैं। तभी तो साहिब आख़िर कह रहे हैं-
सत्यनाम के पटतरे, देवे को कछु नाहिं ।
क्या लें गुरु संतोषिये, यह हवस रही मन माहीं ।।
जब नाम की ताक़त आ जाती है तो आन्तरिक शत्रुओं का बस नहीं चलता है, क्योंकि तब आपके पास इनसे लड़ने के लिए दूसरी शक्तियाँ आ जाती हैं। क्षमा, प्रेम, विचार आदि का बुरी शक्तियों से युद्ध चलता है । इनका राजा है— विवेक । आओ, विवेक की सेना तरफ चलते हैं । इसकी उत्पत्ति परम-पुरुष से हुई है।
ऐसे परम पुरुष के अंशू । प्रकटें प्रेम विवेक सुख वंशू ॥
अब यह रहता कहाँ है ?
ज्ञान देश प्रकाश राजधानी । आनन्द रूपी विवेक परवानी ॥
विवेक ज्ञान के देश में रहता है और जहाँ भी रहेगा, वहाँ ज्ञान का प्रकाश होगा। इसलिए यह आनन्द देने वाला है ।
सुनहु विवेक राज की सैना । जाके राज सकल सुख चैना ॥
उमरा धीरज धर्म औ ज्ञाना। प्रेम भक्ति बाजै निशाना ॥
निजानन्द महल पग धरई । श्रद्धा रानी सेवा करई ॥
निर्भय संत सुशील सुभाऊ । ये विवेक के पुत्र कहाऊ ॥
ऐसे नृप विवेक के अंशू । प्रगटे आद प्रेम सुख वंशू ॥
नृप विवेक की बेटी चारी । सत्य क्षमा दया शुभकारी ॥
सत्य संतोष साथ है ताही । नरक परत गहि राखत वाही॥
लौंडी सुबुद्धि सबन की लाजा । लो लौंडा पुरवे सब काजा ॥
सुचित शील और अनुरागी । क्षमा स्वभाव बैठे वैरागी ॥
रहनी क्षत्र चौतरा सुभाऊ । सहज सिंहासन बैठे राऊ ॥
व्रत वजीर और सत्य खवासू । मंत्री निरभै संग प्रकासू ॥
करहिं वेद ताके सुख सेवा । विवेक प्रसाद सदा सुखदेवा ॥
धीरज, धर्म और ज्ञान इसके बड़े-बड़े सरदार हैं, जो विवेक राजा की सहायता को हर क्षण तत्पर रहते हैं । इसकी रानी है - श्रद्धा । क्षमा, दया आदि बेटियाँ हैं और सुबुद्धि इस राजा की दासी है। वजीर है— दृढ़ व्रत, सेवक है— सत्य, मंत्री है— निर्भय ।
धीरज धर्म ज्ञान उमराऊ । ये राजा की करहिं सहाऊ ॥
उग्रज्ञान प्रकटे जब आयी । ताक्षण मोह सबै मिटि जायी ॥
ज्ञानवन्त जब प्रकट है आवै । काल जंजाल सबै मिटि जावै ॥
चौकी मोह सबै उठि भागे । भागे कपट ज्ञान के आगे ॥
दुष्ट काल पल लागत गयऊ। ज्ञान चक्षु हिरदय तब भयऊ ॥
कहौं को तुम को संसारा । काहे बंध्यो सो करो विचारा ॥
झूठे मोह बंधो संसारा। कहे बंध्यो सो करो विचारा॥
दंपति सुख संपति परिवारा। ये सब माया को विस्तारा ॥
जैसे छिन बदरी की छाया । ऐसे गहे देत सुख माया ॥
ये सब सुख सपने को राजू । जागि परे कुछ सरे न काजू ॥
झूठे आहि देह को नाता । ये सब माया केर समातो ॥
तन जारे भस्म होय जाई । मेहरी मातु नातु नहिं काई ॥
ऐसो ज्ञान मन प्रगटे आयी । तो कहु मोह कहाँ ठहराई॥
धैर्य, धर्म और ज्ञान विवेक राजा की सहायता करने वाले हैं। जब ज्ञान हृदय में आता है तो काल का जंजाल मिट जाता है। मोह ने सारे संसार को बाँधा हुआ है। पर ज्ञान कहता है कि सुख, संपति, पत्नी आदि सब माया है। जैसे बदली थोड़ी देर के लिए छाया देती है, ऐसे ही माया का सुख थोड़ी देर का है। सारे सुख सपने की तरह हैं, बाद में कोई काम नहीं आयेगा । देह के रिश्ते भी झूठे हैं, शरीर के नष्ट हो जाने पर कोई माता, पिता, पत्नी आदि का नाता नहीं रह जाता। जब ऐसा ज्ञान हृदय में आ जाता है तो फिर मोह ठहर ही कहाँ सकता है! प्रगटे प्रेम विवेक दल, कहैं कबीर समझाई | उग्रज्ञान अति बली, जेहि सुनि मोह
डराई ॥
इस तरह सद्गुरु कृपा से नाम के साथ जब ये हृदय में आते हैं तो अंत:करण को प्रकाशित कर देते हैं । फिर विवेक की सेना का काम, क्रोध आदि से युद्ध होता है और अंत में ये शत्रु पराजित हो जाते हैं। भाइयो, यह कोई गप्प नहीं है, हरेक के भीतर एक युद्ध चल रहा है...... भीतरी विचारों का युद्ध । बड़ा ही अनोखा युद्ध है यह। जिसके पास नाम नहीं है, वो इन शत्रुओं पर विजय नहीं पा सकता है। नाम की ताक़त से ही ये काबू में आते हैं। आओ, इनके युद्ध को भी देखते है । साहिब ने इनकी लड़ाई का वर्णन भी किया है। विवेक की सेना को अपने राज्य में देख मोह चकित हो जाता है और उन्हें अपने देश से बाहर करने की कोशिश करता है ।
तबहिं मोह मंत्र उपजावा । पाखण्ड मित्र निकट बुलावा ॥
आये प्रबल विवेक नरेशा । लीन्हें आइ हमारो देशा ॥
अब मति मंत्र करो ठहराई । देश आपनो लेहु छुड़ायी ॥
कहै पाखण्ड सुनो मम राजा । यह बड़ कौन अहै सो काजा ॥
राजा मंत्र हमारो लीजै । प्रथम काम को आयसु दीजै ॥
आगे आगे काम रह भरपूरी । ज्ञान विवेक जाहि सब दूरी ॥
तबहिं कम कहँ आयसु दियऊ। दल बादल सह रन सो गयऊ॥
मोह परेशान होकर अपने मित्र पाखण्ड को पास बुलाता है और कहता है कि विवेक की सेना ने हमारे देश पर कब्जा कर लिया है, अब हमारी कुछ नहीं चल रही है। ऐसे में पाखण्ड कहता है कि तुम काम को बुलाकर रण भूमि में भेजो। उसके रहते ज्ञान और विवेक नहीं रह सकते हैं। तब राजा मोह काम को बुलाकर सेना सहित रण में भेजता है । जब काम उठता है तो ज्ञान ही उससे टक्कर लेने आता है । काम जानता है तो केवल ज्ञान ही उससे टक्कर ले सकता है, पर मन के राज्य में ज्ञान को देखर काम चकित हो जाता है ।
काम कुपित वचन सुनायो । हमरे देश ज्ञान कहँ आयो ॥
उतै भयो काम उतै भयो ज्ञाना । मानस भूमि रच्यो संग्रामा ॥
काम कहता है कि हमारे देश में ज्ञान कहाँ से आ गया ! तब दोनों युद्ध को तैयार होते हैं ।
बहु रूप धरि काम तिवाना । तबही चलावै पाँचों बाना ॥
निष्फल कियो ताहि तब ज्ञाना । सुरति शब्द लै रहे निदाना ॥
काम मारन, मोहन आदि पाँचों बान चलाता है, पर ज्ञान सुरति करके सबको निष्फल कर देता है ।
ज्ञान विचार उठे गल गाज । काम निलज्ज न काहे भाजी ॥
धिग तिया धिग धिग अस राजा । निरघिन रुधिर मांस को साजा ॥
हाड़ त्वचा मुख रोम पसारा । नव द्वार बहैं अति खारा ॥
रेंट नाक मख कफ लारा । कीचड़ आँखिन काने छारा ॥
नख निख व्याधि सबै बिस्तारा । विष्ठा मूत्र तिया तन भारा॥
वाहि रांचैं सो पावैं दुक्खू | सपने नहिं तेहि होये सुक्खू ॥
दुख की राशि जो राजी कोई । साचो नरक आहि पुनि सोई ॥
यह कहि ज्ञान रहा ठहराई । काम सैन डारै विचलाई ॥
विचल्यो काम गयो खिसियाई । उग्र ज्ञान ते कछु न बसाई ॥
काम के आने पर ज्ञान विचार करता है कि स्त्री का शरीर तो गंदे माँस और खून से बना है। उसमें तो रोम-रोम से गंदगी ही निकल रही है। नौ द्वारों
से गंदगी-ही-गंदगी निकलती है । विष्ठा और मूत्र से उसकी इंद्रियाँ भरी हैं । मुख से लार और कफ, आँखों से कीच ...... । इनमें खोकर तो दुख ही पाना है। इसमें तो सपने में भी सुख नहीं मिल सकता है। यह तो नरक में गिरने वाली बात है। इस तरह ज्ञान की बात सुनकर काम की सेना विचलित हो जाती है और उसका कुछ भी बस नहीं चलता है। वो ज्ञान को हराने की बड़ी कोशिश करता है, पर अंत में उसे हारना ही पड़ता है ।
काम कहै यह नीकि सुंदरी । कहै ज्ञान यह विष की दहरी ॥
काम कहै याके ढिग जाई । ज्ञान कहै यह सांपिन अहई ॥
काम कहै कामिनी सम तूला । ज्ञान कहै यह विषकर मूला ॥
कामासक्त कुदृष्टि सन राता । ज्ञान सक्ति कर बोलै माता॥
यह सुनि बहुत अजब भौ कामा । सह्यो ज्ञान हमरो संग्रामा ॥
काम हर तरह से लुभाने का प्रयास करता है कि यह देखो सुन्दरी, पर ज्ञान उसे विष से भरी बताता है । काम कहता है कि उसके पास जाओ, पर ज्ञान कहता है कि यह तो सर्पिनी है, डस लेगी। काम उसे स्त्री की ओर कुदृष्टि से देखने को प्रेरित करता है, पर ज्ञान उसे माता कहकर पुकारता है । इस तरह काम युद्ध में ज्ञान से पराजित हो जाता है । नाम की ताक़त नहीं होगी भाइयो तो बड़े-बड़े ज्ञानियों को भी पटकी दे देगा यह काम | तो काम के बाद क्रोध की बारी आती है ।
विचल्यो काम मोह पहँ गयऊ । सबहि वृत्तांत सुनावन लयऊ ॥
मन में मोह बहुत पछतायी। बोलाई क्रोध को बात सुनायी ॥
आई क्रोध जब ठाढे रहेऊ। तबही मोह क्रोध से कहे ऊ ॥
तामस तेज नाम मोहि क्रुद्धा । करु विवेक ज्ञान सो युद्धा ॥
कहँ अस प्रबल तोहि को सहै । तोरे तेज ज्ञान कहँ रहे ॥
पराजित काम तब मोह राजा के पास जाता है और अपनी पराजय की बात बताता है । तब मोह क्रोध को बुलाकर सारी बात बताता है और कहता है कि तुम्हारे आगे तो ज्ञान टिक ही नहीं सकता है, इसलिए तुम जाकर ज्ञान से युद्ध करो।
यह सुनि क्रोध चला समुहाई । करी गवन पहुँचा रन आई॥
तन में आई कियो परवेशा । छाड़ो ज्ञान हमारो देशा ॥
जो तुम निश्चय जीतो कामा । तो अब मोसों करो संग्रामा ॥
यह सुनकर क्रोध आता है और कहता है कि हे ज्ञान, हमारा देश छोड़ दो। अगर तुमने काम को जीत लिया है तो अब मुझसे युद्ध करके बताओ। हम राक्षसों की कहानियाँ सुनाते हैं अपने बच्चों को कि कितने क्रूर थे, भयानक थे। भाइयो, ये सबसे बड़े राक्षस हैं, जो आपके अन्दर में निवास कर रहे हैं। ...तो क्रोध की बात सुनकर ज्ञान अचंभित हो जाता है और जाकर विवेक राजा को यह बात बताता है। तब राजा मंत्री से पूछता है कि क्रोध को किस तरह से मारा जाए ?
तब राजा मंत्रिन सो कहै । प्रबल क्रोध केहि कारण दहै ॥
तब सबहि मिलि मंत्र विचारा । यह तो जाय क्षमा ते मारा॥
बोलि विवेक क्षमा सो कहै । तुम तो जाई क्रोध रन बहै ॥
भक्ति ज्ञान तेहि देइ सहाई । प्रबल क्रोध को मारो जाई ॥
यहि सुनि क्षमा रोपे रन आयी । लीन्हो शील जो धनुष चढ़ायी ॥
तब सब मिलकर विचार करते हैं कि यह तो क्षमा से मारा जाएगा । फिर विवेक क्षमा से कहता है कि तुम जाकर क्रोध को मारो, तुम्हारे साथ भक्ति और ज्ञान भी होंगे। यह सुन क्षमा युद्ध के मैदान में शील रूपी धनुष लेकर आती है।
देखि क्षमा क्रोध चले धायी। मनसा भूमि रोप्यो रन आयी ॥
मारन क्रोध उठे जब धायी । इतने क्षमा दीन्ह मुसकायी ॥
क्रोध आन तब गारी गयी । सुनि क्षमा अनबोली भयी ॥
मीठे वचन क्षमा अति बोलै । कोपै क्रोध पवन ज्यों डोले ॥
क्षमा से अगिन शीतल है जाई । जैसे जल में अग्नि बुझाई ॥
यहि विधि क्रोध क्षमा से भिरई । मानहु अंगार पानी महँ परई ॥
जैसे ही क्रोध मारने को भागता है, क्षमा मुस्करा देती है । क्रोध तब गाली बकता है, पर क्षमा चुप रहती है । फिर क्षमा मीठे वचन बोलती है, जिससे क्रोध की अग्नि वैसे ही शांत हो जाती है, जैसे जल में पड़कर अग्नि । इस तरह क्रोध और क्षमा की लड़ाई ऐसे लगती है मानो अँगार पानी में पड़ गया हो।
भलो भलो सब कोई कहै, रहि गइ क्षमा दुहाई । कहैं कबीर शीतल भये, गयी सो अनि बुझाई || क्षमा से ही क्रोध की आग बुझाई जा सकती है। जब भी क्रोध आता है तो आदमी का दिल करता है कि बस मारूँ, यूँ । गाली बकता है वो। इसलिए साहिब कह रहे हैं-
गाली आवत एक है, उलटत होत अनेक ।
कहैं कबीर न पलटिये, रहे एक की एक ॥
काम, क्रोध दोनों की पराजय देख मोह राजा अब लोभ को बुलाता है और समझाकर रण में भेजता है।
हार्यो क्रोध काम जब जाना । महामोह राजा डर माना ॥
चकित मोह मंत्री हँकरावा । सम्मुख मोह विवेक डरावा ॥
लोभ मंत्री आय भये ठाढ़ा। देखत राव छोभ अति बाढ़ा ॥
तब लोभ मोहहि माथ नवाई | कहु राजा मोहि काहे बुलाई ॥
हौं निज सर्व पाप का मूला । मोरे ते तुम रहत हौ फूला ॥
जीतौं ज्ञान विवेक हि जायी । देश आपनो लेउ छुड़ाई ॥
तो कहँ फिर मैं देहौं राजू । महामोह मोरे बल गाजू ॥
काम और क्रोध के रण में हार जाने से मोह राजा भयभीत हो जाता है। वो अपने मंत्री लोभ को बुलाता है। मंत्री आकर राजा को धैर्य बँधाता है, कहता है कि जब तक मैं हूँ, तब तक ज्ञान नहीं टिक सकता है । मैं सारे पापों की जड़ हूँ, मैं विवेक और ज्ञान को जीतकर अपना देश उनसे छुड़ा लूँगा। फिर आप निष्कंटक राज्य करना ।
यह सुन हर्ष मोह मन भयऊ । तत्क्षण लोभ को आयसु दयऊ॥
लोभ की बातें सुनकर राजा खुश हो जाता है और उसे आशीर्वाद देकर रण में भेजता है । लोभ आकर ज्ञान से कहता है-
जाई रण दियो लोभ हंकारा । ज्ञान तुम का करहु तकरारा ॥
हम बन्दोबस्त कियो परवेशा । छोड़ हु ज्ञान हमारो देशा ॥
तजहु ज्ञान तुम हमरो ठाऊँ । मैं प्रचण्ड लोभ मोर नाऊँ ॥
अब मैं रनमहँ अग्नि परजारौं । करि बल एक एक कै मारौ ॥
चिन्ता शक्ति पाप को मूला । कोउ न जानै मम डर भूला ॥
आशा तृष्णा तहाँ अति बहै । सुनत ज्ञान तहाँ नहिं रहै ॥
नहिं जानो तुम क्रोध औ कामा । हौं अति प्रबल लोभ मोहि नामा॥
छाड़हु ज्ञान हमारो ठाऊँ । नहिं तो तोहि धरि धरि खाऊँ ॥
लोभ जानकर ज्ञान से कहता है कि हमारा देश छोड़ दो, तुम नहीं जानते हो कि मेरा नाम लोभ है, मैं बड़ा प्रचण्ड हूँ, मेरे होते ज्ञान नहीं रह सकता है। यदि तुमने हमारा देश नहीं छोड़ा तो मैं तुम्हें खा जाऊँगा । तब ज्ञान पुनः विवेक के पास आता है और कहता है—
राजा मंत्र करो ठहराई । लोभ न मोपै जीतो जायी ॥
जो तुम लोभ जीतो आजू । तो तुम करो निकंटक राजू ॥
ज्ञान कहता है कि लोभ मुझसे नहीं जीता जाता । यदि तुम आज उसे जीत लो तो फर निर्विघ्न राज्य करना । तब मंत्री कहता है कि लोभ तो संतोष से जीता जा सकता है। अब राजा संतोष को बुलाता है और उसे समझाकर ज्ञान, भक्ति आदि के साथ रण में भेजता है।
इत भौ लोभ उत भौ संतोषा । मनसा भूमि उठयो रन रोषा ॥
लालच बाण लोभ संचारा । क्षमा बाण संतोष तेहि मारा ॥
लोभ चलावै धनुष कहँ खींची। संतोष लीन्ह सुमिरन की ऐंची ॥
चिंता शक्ति लोभ पठायी। ज्ञान शक्ति सो निष्फल जायी॥
अति दुख फाँसी लोभ कर लयऊ। उग्र ज्ञान संतोष मिटैऊ॥
परम संताप लोभ कर लयऊ । सो दया खड्ग ते निष्फल गयऊ ॥
अचेत शक्ति लोभ चलाई। जागृत शक्ति संतोष पठाई ॥
लोभ कहै पैसा तुम लहिये । संतोष कहै कुछ नहिं चाहिए ॥
लोभ कहै नीका है रूपा । संतोष कहै छाड़ि गये
भूपा ॥
लोभ कहै लेव कंचन मोरा । संतोष कहै जीवन है
थोरा ॥
लोभ कहै घोड़ा जोड़ा नीका। संतोष कहै कारज नहिं जीका ॥
लोभ कहै हीरा ल्यो लालू । संतोष कहै संग नहिं चालू ॥
साँच धनुष कर गहि धयऊ। चपल लोभ चापि दल गयऊ॥
उदासी शक्ति उरमें उपजायी । कंप्यो लोभ ज्यों विष खायी ॥
धीरज खड्ग गह्यो संतोषा । विचल्यो लोभ मिट्यो सब धोखा ॥
अब संतोष और लोभ का घमासान युद्ध होता है। लोभ हृदय में चिंता शक्ति छोड़ता है कि पैसे के बिना कुछ नहीं होगा, पर संतोष ज्ञान की शक्ति द्वारा उसका वार निष्फल कर देता है। लोभ पैसे का, सोने का, हीरे का लालच देता है, पर संतोष कहता है कि कुछ चाहिए ही नहीं, क्योंकि बड़े - बड़े राजा भी इसे यहीं छोड़ गये, कुछ भी साथ नहीं जाने वाला है और फिर जीवन की अवधि भी थोड़ी ही है। इस तरह हृदय में उदासी जगाकर लोभ को पराजित कर देता है संतोष । मोह खींझ उठता है...... अब तो राज गया । काम क्रोध विचले, विचले लोभ अकाज । महामोह मनमहँ झखे, गयो हमारो
राज ॥
काम, क्रोध और लोभ के हार जाने पर मोह मन ही मन खींझता है, भयभीत होता है कि अब तो राज्य गया।
मोह बुलाय गर्व सन कहेऊ । विचलो सबै एक तुम रहेऊ ॥
अब मेरो तुम करो सहाऊ । मोरे संग गर्व उठि धाऊ ॥
ज्ञान विवेक को मारि भगावें । जप तप साधन मारि सब लावें ॥
बोले गर्व मोह ते तबहीं। का विसात विवेक की अहहीं ॥
मेरो हंकार फिरे जेहि देशा। रहै न ज्ञान विचार को लेशा॥
बाकी सैन रहे सब जोही । लीन्ह बुलाय मोह तब ओही ॥
लीन्ह सजाय सैन बहु रंगी। मोह गर्व चढ़े एक संगी॥
मोह दल जब पहुँचे रणमाहीं । खबर भयो विवेक पहँ ताहीं ॥
सज्यो सेन तब बहु समुदाई । होय निशंक चले रण भाई ॥
उतते मोह रण रंग मचावा । इत विवेक राजा चढ़ि आवा॥
मोह तब अहंकार को बुलाकर कहता है कि अब तो एक तुम ही मेरे सहारे रह गये हो, जो ज्ञान और विवेक को मारकर मेरे देश से भगा सकते हो। आओ, हम दोनों मिलकर विवेक को अपने देश से निकाल दें। तब अहंकार कहता है कि तुम चिंता मत करो, मैं जहाँ रहता हूँ, वहाँ ज्ञान और विचार थोड़ा भी नहीं रह पाता है । तब मोह सारी सेना को सजाता है और स्वयं गर्व के साथ विराजमान होकर युद्ध के लिए प्रस्थान करता है। उधर विवेक को जब ख़बर मिलती है कि मोह राजा अहंकार को साथ लेकर पूरी सेना सहित आ रहा है तो वो भी अपनी सेना को तैयार कर रण में पहुँच जाता है ।