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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ
जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]शारीरस्थानम्११७

आस्थापन तथा अनुवासन द्वारा क्रमशः शुद्ध करके दूध तथा घृत से पुष्ट हुए २ पुरुष को मधुर ओषधियों से सिद्ध घृत का तथा स्त्री को तैल और मांस (माष पाठ होने पर उड़द अर्थ होगा) का सेवन करायें-ऐसा कुछ लोग कहते हैं परन्तु प्रजापति कश्यप के मत में जिसे जो सात्म्य हो उसे उसी का सेवन करायें। चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—अथाप्येतौ स्त्रीपुरुषौ स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्य वमनविरेचनाभ्यां संशोध्य क्रमेण प्रकृतिमापादयेत, संशुद्धौ चास्थापनानुवासनाभ्यामुपाचरेत्, उपाचरेच्च मधुरौषधसंस्कृताभ्या पुरुषं, स्त्रिय तु तैलमाषाभ्याम्। अष्टाङ्ग संग्रह में भी कहा है—विशेषतस्तु धृतक्षीरवद्भिर्मधुरौषधसंस्कारैः पुरुषं, तैलेन नारीं पित्तलैश्च मांसैः शुक्र एवं रज को शुद्ध करने तथा उनको पूर्ण करने के लिये यह निधान दिया गया है ॥३॥

यथा च पुष्पमध्ये फलमनिर्वृत्तं सुसूक्ष्ममस्ति न चोपलभ्यते, यथा चाग्निदारुषु सर्वगतः प्रयत्नाभावान्नोपलभ्यते, तथा स्त्रीपुंसयोः शोणितशुक्रे कालावक्षे स्वकर्मावक्षे च भवतः । षाडशवर्षयोर्हि शोणित१शुक्रयोर्मध्ये प्रभवतः; अर्वागपि यदाहारविशेषादारोग्याच्च पूर्णे भवत इति परिषत् ।।४।।

जिस प्रकार पुष्प में फल सूक्ष्म तथा अनुत्पन्न (Latent) या अदृश्य अवस्था में होने से उपलब्ध नहीं होता अथवा जिस प्रकार लकड़ियों में सब जगह अग्नि होने पर भी प्रयत्न के बिना प्राप्त नहीं होती है उसी प्रकार स्त्री एवं पुरुष में क्रमशः शोणित (आर्तव) तथा शुक्र (वीर्य) काल तथा अपने कर्मों की अपेक्षा रखते हैं अर्थात् उचित समय पर प्रकट होते हैं। स्त्री एव पुरुष के १६ वर्ष के होने पर शोणित तथा शुक्र कार्य करने में समर्थ होते हैं अथवा पूर्ण होते हैं। १६ वर्ष की अवस्था से पूर्व भी आहार की विशेषता तथा आरोग्य के कारण शोणित और शुक्र पूर्ण हो सकते हैं। अर्थात् साधारणतया १६ वर्ष की अवस्था में शुक्र एवं शोणित पूर्ण परिपक्व होता है परन्तु यदि पौष्टिक आहार मिले तथा स्वास्थ्य उत्तम हो तो इससे पूर्व भी शुक्र एवं शोणित पूर्ण हो सकते हैं।

वक्तव्य—सुश्रुत में पुरुष के २५ वर्ष तथा स्त्री के १६ वर्ष का होने पर ही मैथुन का विधान दिया गया है। शोणित एवं शुक्र की उपस्थिति इससे पूर्व भी होती है परन्तु वे पूर्ण अवस्था में नहीं होते हैं। शारीर स्थान के दशवें अध्याय में कहा है—ऊनषोडशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम्। यद्याधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विपद्यते ।। जातो वा न चिरञ्जीवेज्जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः ।। इस अवस्था में जो गर्भ की स्थिति होगी वह या तो गर्भाशय में ही मृत हो जाता है अथवा उत्पन्न होने के बाद मृत हो जायगा या अत्यन्त ही दुर्बल सन्तान उत्पन्न होगी। स्त्री में १६-२० वर्ष तक की अवस्था में सन्तानोत्पत्ति की शक्ति सबसे अधिक होती है। उससे पूर्व अपक्वावस्था होती है तथा उसके बाद वह शक्ति क्रमशः क्षीण होने लगती है। इसी प्रकार पुरुष में २० वर्ष की अवस्था से लकर प्रायः ३०-३५ वर्ष की अवस्था तक सन्तानोत्पत्ति की शक्ति सबसे अधिक विद्यमान होती है। उसके बाद वह शक्ति क्रमशः क्षीण होने लगती है। यह सामान्य नियम है। इसके अपवाद भी हो सकते हैं तथा वाजीकरण ओषधियों के द्वारा इस शक्ति को बहुत बड़ी अवस्था तक भी स्थिर रखा जा सकता है ॥४॥

रजस्वलायाश्चेत् प्रथमेऽहनि गर्भ आपद्येत तं वातगर्भमाचक्षते विफलं वातपुष्पमिवोद्भिदानां; द्वितीयेऽहनि चेत् स्रंसते च्यवते वा; तृतीयेऽहनि सूतिकासने म्रियते, न वा दीर्घायुर्भवति, हीनाङ्गश्च जायते; अतऊर्ध्वमृतुर्द्वादशाहं ब्राह्मणीनाम्, एकादशाहं क्षत्रियाणां, दशाहं वैश्यानां, नवरात्रमितरासाम् । ऋतुर्बीजकालमवेक्षत इत्याहुर्महर्षयः । अत ऊर्ध्वमकालजमाहुः । अकालजं हीनं दुर्बलमस्थिरमदृढ़मपीनभङ्गुरं धान्यमिव भवति ।।५।।


१. 'शोताणुशुक्रे पूर्णे भवतः' इति पाठश्चेत् साधु ।

१९८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]

यदि रजस्वला स्त्री के रजोदर्शन के प्रथम दिन ही गर्भ की स्थिति हो जाय तो उसे वृक्षों के वातपुष्प की तरह 'वातगर्भ' कहते हैं तथा वह फलशून्य होता है अर्थात् उस गर्भ के सन्तान की उत्पत्ति नहीं होती है। यदि (रजोदर्शन के) दूसरे दिन गर्भाधान किया जाय तो गर्भपात (स्राव अथवा पतन$^१$) हो जाता है। रजोदर्शन के तीसरे दिन यदि गर्भाधान हुआ हो तो उत्पन्न बालक की सूतिकागृह में ही मृत्यु हो जाती है अथवा यदि मृत्यु न भी हो तो वह बालक दीर्घायु नहीं होता तथा हीन अङ्गों वाला उत्पन्न होता है। चरक. शा. अ. ८ में भी रजोदर्शन के बाद की प्रथम तीन रात्रियों में सहवास करना निषिद्ध है। कहा है—ततः पुष्पात्प्रभृति त्रिरात्रमासीत ब्रह्मचारिण्यधःशायिनी पाणिभ्यामन्त्रमजर्जरपात्रे भुञ्जाना न च कांचिद् मृजामापद्येत। सुश्रुत शा. अ. २ में भी कहा है—ऋतौ प्रथमदिवसात् प्रभृति ब्रह्मचारिणी दिवास्वप्नाञ्जनाश्रुपात-स्नानानुलेपनाभ्यङ्गनखच्छेदनप्रधावनहसनकथनातिशब्दश्रवणावलेखनानिलायासान् परिहरेत्। किं कारणं ? दिवा स्वपन्त्याः स्वापशीलः, अञ्जनादन्धः, रोदनाद्विकृतदृष्टिः, स्नानानुलेपनाद् दुःखशीलः, तैलाभ्यङ्गात् कुष्ठी, नखापकर्तनात् कुनखी, प्रधावनाच्चञ्चल, हसनाच्छ्यावदन्तौष्ठतालुजिह्वः, प्रलापी चातिकथनात्, अतिशब्दश्रवणाद्वधिरः, अवलेखनात् खलतिः, मारुतायाससेवनादुन्मत्तोगर्भं भवतीत्येवमेतान् परिहरेत्। इन तीन रात्रियों के बाद ऋतुकाल होता है जो कि ब्राह्मणी के लिये १२ दिन, क्षत्रिय स्त्री के लिये ११ दिन, वैश्य स्त्री के लिये १० दिन तथा अन्य शूद्र आदि स्त्रियों के लिये ९ दिन होता है। सुश्रुत शा. अ. २ में भी कहा है—तत्र प्रथमे दिवसे ऋतुमत्यां मैथुनमनापुष्यं पुंसां भवति, यश्च तत्राधीयते गर्भः स प्रसवमानो विमुच्यते, द्वितीयेऽप्येवं सूतिकागृहे वा, तृतीयेऽप्येवं पूर्णाङ्गोऽल्पायुर्वा भवति, चतुर्थेतु संपूर्णाङ्गो दीर्घायुश्च भवति। न च प्रवर्तमाने रक्ते बीजं प्रविष्टं गुणकरं भवति, यथा नद्यां प्रतिस्रोतः प्लाविवद्रव्यं प्रक्षिप्तं प्रतिनिवर्त्तते नोर्ध्वं गच्छति तद्वदेव द्रष्टव्यम्। तस्मान्नियमवर्ती त्रिरात्रं परिहरेत्। अतः परं मासादुपेयात्। चतुर्थ दिन से लेकर अगले रजोदर्शन तक स्त्री-पुरुष परस्पर सहवास कर सकते हैं। यदि रजोदर्शन न हो तो इसका अभिप्राय यह है कि गर्भ की स्थिति हो चुकी है। उस अवस्था में पुनः मैथुन नहीं करना चाहिये। ऋतु-बीज (शुक्र और शोणित) तथा काल की भी अपेक्षा रखता है—ऐसा महर्षियों ने कहा है। अर्थात् केवल ऋतु के यथोचित होने मात्र से ही गर्भोत्पत्ति नहीं होती है अपितु उसके साथ स्त्री-पुरुष का शोणित तथा शुक्र शुद्ध एवं पूर्ण होना चाहिये तथा काल भी यथावत् होना चाहिए तब गर्भ की स्थिति होती है। सुश्रुत शा. अ. २ में गर्भोत्पत्ति की अङ्कुरोत्पत्ति के साथ बड़ी सुन्दर तुलना की गई है—ध्रुवं चतुर्णां सन्निध्याद् गर्भः स्याद्विधिपूर्वकः। ऋतुक्षेत्राम्बुबीजानां सामग्र्यादङ्कुरो यथा।। जिस प्रकार अंकुर की उत्पत्ति ऋतु (वर्षा आदि काल), क्षेत्र (खेत-भूमि), अम्बु (जल) तथा बीज पर निर्भर है उसी प्रकार गर्भ की उत्पत्ति भी ऋतु (रजोकाल) क्षेत्र (गर्भाशय का शुद्ध होना), अम्बु (आहार के परिणाम से उत्पन्न होने वाली रसधातु) तथा बीज (शुक्र तथा आर्तव) पर निर्भर है। अर्थात् ये चारों अवस्थायें ठीक हों तभी गर्भ की स्थिति सम्यक् प्रकार से हो सकती है। इन उपर्युक्त १२ रात्रियों के अतिरिक्त समय 'अकाल' कहलाता है अर्थात् इन में मैथुन नहीं करना चाहिये। इसीलिये सुश्रुत में कहा है—"त्रयोदशीप्रभृतयो निन्द्याः”। इस अकाल में स्थित गर्भ अकाल में होने वाले धान्य की तरह हीन गुणों वाला, दुर्बल, अस्थिर, अदृढ (कमजोर), पतला तथा भङ्गुर होता है ॥५॥

युग्मेष्वहःसु पुत्रकामोऽन्यत्र कन्यार्थी हर्षितस्तृप्तोऽनुरुद्धः स्त्रियमुपेयादिति सिद्धम् ॥६॥

पुरुष यदि पुत्रोत्पत्ति का इच्छुक है तो हर्षयुक्त (प्रसन्न अथवा ध्वजहर्ष होने पर), तृप्त तथा अनुरुद्ध (किसी अन्य स्त्री को न चाहता) हुआ युग्म दिनों में अर्थात् रजोदर्शन से चौथी, छठी, आठवीं, दसवीं तथा बारहवीं रात्रि में स्त्री से


१. सुश्रुत निदान अ. ८ में गर्भपात तथा गर्भास्राव का निम्न भेद दिया है—आचतुर्थातत्तो मासात् प्रस्रवेदगर्भ विद्रवः । ततः स्थिरतर शरीरस्य पातः पञ्चमषष्ठयोः ॥ अर्थात् गर्भाधान से चतुर्थमास तक गर्भस्राव होता है अर्थात् गर्भ, स्राव के रूप में गिरता है तथा उसके बाद पांचवें और छठे मास में स्थिर (घन) गर्भ का पात होता है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार गर्भस्राव को Abortion तथा गर्भपात को miscarriage कहते हैं।

जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ११९

सहवास करे। यदि वह कन्या की उत्पत्ति का इच्छुक है तो अयुग्म (पांचवीं, सातवीं, नवमी, इग्यारहवीं, तेरहवीं) रात्रियों में मैथुन करना चाहिये। चरक शा. अ. ८ में कहा है—स्नानात्प्रभृति युग्मेष्वहःसु संवसेतां पुत्रकामौ, अयुग्मेषु दुहितृकामौ। सुश्रुत शा. अ. २ में भी कहा है—नारीमुपेयाद्रात्रौ सामादिभिरभिविश्वास्य। विकल्प्यैवं चतुर्थ्यां षष्ठयामष्टम्यां दशम्यां द्वादश्यां चोपेयादिति पुत्रकामः। एषूत्तरोत्तरं विद्यादायुरारोग्यमेव च। प्रजासौभाग्यमैश्वर्यं बलं च दिवसेषु वै ।। अतः परं पञ्चम्यां सप्तम्यां नवम्यानेकादश्यां च स्त्रीकामः, त्रयोदशीप्रभृतयो निन्द्याः ॥६॥

अथ शुद्धस्नातां (ता) स्त्रियं (स्त्री) चतुर्थेऽहनि स्नानगृहे श्वेतेन एवाऽन्येन वाससाऽवगुण्ठ्यानवलोकयन्ती शुचिर्देवगृहं प्रविश्योद्धताग्नि१ प्रज्वलन्तं घृताक्षतेनाभ्यर्च्य ब्राह्मणमीश्वरं विष्णुं स्कन्दं च संप्रेक्ष्याभिवाद्य, निष्क्रम्य सूर्यचन्द्रमसाविति, न तु प्रेतपिशाचरक्षांसि; शुद्धस्नातमात्रा हि स्त्री यं वा पश्यति मनसा वाऽभिध्यायति तादृशाचारवपुषं प्रायेण जनयति; तस्माद्देवगोब्राह्मणगुरुवृद्धाचार्यान् सन्तः पश्येत्, कल्याणमनाश्च स्यात्। न तु सन्ध्ययोः स्नानं मैथुनं वोपेयान्नान्यमना इति ॥७॥

इससे बाद स्नान आदि के द्वारा शुद्ध हुई स्त्री चौथे दिन स्नानगृह में अन्य श्वेत (शुभ्र) वस्त्र से अपने आपको ढककर इधर उधर न देखती हुई पवित्र मन से देवगृह (मन्दिर) में जाकर प्रज्वलित तथा हवन की हुई अग्नि की घृत तथा अक्षत द्वारा अभ्यर्चना (पूजा) करके, ब्राह्मण, ईश्वर, विष्णु तथा स्कन्द को देखकर तथा उनका अभिवादन करके, सूर्य एवं चन्द्रमा को नमस्कार करे। वह प्रेत, पिशाच तथा राक्षस आदिकों को नमस्कार न करे। स्नान द्वारा शुद्ध हुई स्त्री सबसे प्रथम जिसे देखती है अथवा जिसका ध्यान करती है उसी प्रकार के आचार एवं शरीर वाली सन्तान को उत्पन्न करती है। इसलिये सब से पहले वह स्त्री-देवता, गौ, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध पुरुष (गुरुजन) तथा आचार्य का दर्शन करे एवं कल्याणयुक्त मन वाली रहे अर्थात् मन में सदा कल्याण की ही इच्छा करे। सन्ध्या काल में स्त्री स्नान तथा मैथुन न करे। तथा उसे अन्यमना (पति के अतिरिक्त किसी दूसरे व्यक्ति में मन वाली) नहीं होना चाहिये। सुश्रुत शा. अ. २ में कहा है—पूर्व पश्येद् ऋतुस्नाता यादृशं नरमङ्गना। तादृशं जनयेत्पुत्रं भर्तारं दर्शयेदतः ॥७॥

तत ऋत्विक् पुत्रीयामिष्टिं निर्वपेत्। सिद्धमांसौदना वातघ्नौ (?) वाऽऽज्यभागौ, यवमयः पुरोडा- शोऽष्टाकपालो, ब्रीहिमयरुः, उभौ वागायुर्युतौ प्रजायेते; नत्वदे ....... क्षे, 'आब्रह्मन्ब्राह्मण' इति यजमानभागमभिमन्त्र्य शेषं दम्पती प्राश्नीयाताम्। श्वेत ऋषभोऽश्वो वा हिरण्यं वा भिषजे सैव दक्षिणा, सैवमनाहिताग्नेः, शलाग्नौ नित्यं होमं हुत्वा, तेनैव मन्त्रेण हुतशेषं तौ प्रा (श्नीतः)। शयनीये मृदुस्वास्तीर्णोपहितेऽस्यै भर्ता .......... त्र लक्ष्मणामद्भिरालोड्य, 'सोमः पवत' इत्येतेन शतजप्तेन सावित्र्या व्याहृतिभिः 'अपो देवीरुपसृज' इति मन्त्रेण नस्यं दत्त्वा, वामदेव्यं जपित्वा, दक्षिणेन पार्श्वेन स्त्रियं शाययीत, वामपार्श्वेन पुमानूर्ध्वोत्तरेणोपशयीत्। शनैः प्रजार्थं चाचरेत्। बीजेऽवसिक्ते विधार्यावसर्फेत्। शीतोदकेन च शौचं कुर्यात्। तत ऊर्ध्वमग्निकर्मप्रतापायासव्यायामशोकादिवर्जनमिति ॥८॥

इसके बाद ऋत्विक् पुत्रीय इष्टि (पुत्रेष्टि यज्ञ) को करे। एतदर्थ आज्याहुति के निमित्त वातनाशक एवं सिद्ध किये हुए मांस और ओदन, आठ कपालों में संस्कृत होने वाला यव का बना हुआ पुरोडाश (पूड़ा-अपूप) तथा ब्रीहि के बने हुए चरु (हविविशेष) इत्यादि पदार्थों को तैयार करे। इससे वे दोनों (पति तथा पत्नी) वाणी और आयु से युक्त हो जाते हैं। फिर "ओं आब्रह्मन् ब्राह्मण" इत्यादि मन्त्र बोलकर उससे यजमान के भाग को अभिमन्त्रित करके शेष भाग की दम्पती (पति-पत्नी) खायें। अनाहिताग्नि (जिसने अग्नि का आधान नहीं किया है) वद्य को सफेद बैल, घोड़ा अथवा धन की


१. 'उद्वाहाग्निं' इति पाठश्चेत् साधु।

१२० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]


दक्षिणा देवे । तदनन्तर शालाग्नि (गार्हपत्य अग्नि) में आहुति डालकर उसी मन्त्र के द्वारा दोनों पति तथा पत्नी यज्ञशेष को खायें । इसके बाद पति मृदु तथा आस्तीर्ण युक्त बिछौने पर पत्नी को लिटाकर लक्ष्मणा (पुत्रदा-श्वेत कटेरी) नामक ओषधि को जल में घोलकर “सोमः पवत” इत्यादि मन्त्र को १०० वार जपकर सावित्री (गायत्री) मन्त्र की “भूर्भुवः स्वः महः” इत्यादि व्याहृतियों के द्वारा 'अपो देवीरुपसृज' इत्यादि मन्त्र से (लक्ष्मणा ओषधि का) नस्य देवे । तदनन्तर वामदेव (सामगान) को गाकर दाईं ओर स्त्री को लिटाये तथा बाईं ओर पुरुष लेटे । फिर ऊपर तथा नीचे की स्थिति में होकर लेट जायें और शनैः २ सन्तानोत्पत्ति के निमित्त आचरण करें अर्थात् मैथुन करें । चरक में भी पुत्रेष्टि का विधान दिया गया है । शारीर स्थान के आठवें अध्याय में कहा है—ततस्तस्या आशासानाया ऋत्विक् प्रजापतिमभिनिर्दिश्य योनौ तस्याः कामपरिपूरणार्थं काम्यामिष्टं निर्वपेत विष्णुर्योनिं कल्पयतु” इत्यनया ऋचा । ततश्चैवाज्येन स्थालीपाकमभिधार्य त्रिजुहुयात्, यथाऽऽम्नायं चोपमन्त्रितमुदकपात्रं तस्यै दद्यात्सर्वोदकार्थान् कुरुष्वेति । ततः समाप्ते कर्मणि पूर्वं दक्षिणपादमभिरन्ती प्रदक्षिणमग्निमनुपरिक्रामेत् । ततो ब्राह्मणान् स्वस्ति सह भर्त्राऽऽज्यशेषं प्राश्नीयात्, पूर्वं पुमान् पश्चात्स्त्री, न चोच्छिष्टमवशेषयेत्; ततस्तौ सह संवसेतामष्टरात्रं तथाविधपरिच्छदावेव च स्यातां, यथेष्टपुत्रं जनयेताम् ।

वक्तव्य—सन्तानोत्पत्ति के लिये मैथुन के समय पुरुष को ऊपर तथा स्त्री को नीचे लेटना चाहिये । केवल मैथुन के आनन्द के लिए यद्यपि कामशास्त्र के अनुसार अनेक प्रकार के आसनों का प्रयोग किया जाता है तथापि उनका उद्देश्य केवल आनन्द मात्र ही है । सन्तानोत्पत्ति नहीं । सन्तानोत्पत्ति के लिये तो सर्वश्रेष्ठ आसन पुरुष को ऊपर तथा स्त्री को नीचे लेटना ही है । इसीलिये चरक शा. अ. ८ में कहा है—न च न्युब्जां पार्श्वगतां वा संसेवेत, न्युब्जाया वातो बलवान् स योनिं पीडयति, पार्श्वगताया दक्षिणे पार्श्वे श्लेष्मा संच्युतोऽपिदधाति गर्भाशयं, वामे पित्तं पार्श्वे तस्याः पीडितं विदहति रक्तशुक्रं, तस्मादुत्ताना सती बीजं गृह्णीयात्; तस्या हि यथास्थानमवतिष्ठते दोषाः । बीज (शुक्र) के योनि में अवसिंचन हो जाने पर स्त्री को उसे धारण करके अलग सो जाना चाहिये । उसके बाद मैथुन के समाप्त हो जाने पर ठण्डे पानी से शुद्धि करनी चाहिये । ठण्डे पानी से योनि की मांसपेशियां सिकुड़ेंगी जिससे धारण किये हुए वीर्य की योनि में स्थिरता होकर गर्भोत्पत्ति की संभावना अधिक होगी । इसीलिये चरक में कहा है-‘पर्याप्ते चैनां शीतोदकेन परिषिञ्चेत्’ इसकी व्याख्या में 'गङ्गाधर' ने लिखा है-एनां कृतकर्मणां स्त्रियं मैथुनश्रमोष्मप्रशमार्थं शोतोदकेन मुखनयनादिषु योनिषु च परिषिश्चेत्” । मुख, नेत्र तथा योनि में शीतल जल के छींटे देने चाहिये । इसके साथ ही चरक शा. अ. ८ में गर्भस्थापनकारक औषधियां दी हुई हैं, इनका सेवन किया जा सकता है। कहा है-अत ऊर्ध्वं गर्भस्थापनानि व्याख्यास्यामः—ऐन्द्रीब्राह्मीशतवीर्यासहस्रवीर्याऽमोघाऽव्यथाशिवा बलाऽरिष्टावाट्यपुष्पीविष्वक्सेनकान्ता च, आसामोषधीनां शिरसादक्षिणेन पाणिना धारणम्, एताभिश्चैव सिद्धस्य पयसः सर्पिषो वा पानं, एताभिश्चैव पुष्ये पुष्ये स्नानं, सदा समालभेत च ताः, तथा सर्वासां जीवनीयाक्तानामोषधीनां सदोपयोगस्तैस्तैरुपयोगविधिभिः, इति गर्भस्थापनानि व्याख्यातानि भवन्ति । इसके बाद अग्निकर्म (अग्नि के पास बैठकर कार्य आदि का अधिक करना), धूप, आयास (परिश्रम), व्यायाम तथा शोक आदि का त्याग कर देना चाहिये अर्थात् इनका अधिक सेवन नहीं करना चाहिये । चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—तस्मादहितानाहारविहारान् प्रयोजसम्पदमिच्छन्ती स्त्री विशेषेण वर्जयेत्, साध्वाचारा चात्मानमुपचरेद्धिताभ्यामाहार विहाराभ्याम् ॥८॥

सा चेदिच्छेद् गौरमोजस्विनं शुचिमायुष्मन्तं पुत्रं जनयेयमिति, तस्या एवं शुद्धस्नानात् प्रभृति, शुक्लयवंसक्तूनां मधुघृताभ्यां श्वेतायाः श्वेतपुंवत्साया गोः क्षीरेण संसृज्य मन्थं राजते पात्रे कांस्ये वा सदा पाययेत्, शालिगौरयवक्षीरदधिघृतप्रायं च काले मात्रया अश्नीयात्, पुष्पाभरणवासांसि च शुक्लानि बिभृयात्, सायं प्रातश्च श्वेतमश्वं वृषभं वा पश्येत्, सौम्यहितप्रियकथाभिरासीत अनुकूलपरिवारा च स्यादिष्टमपत्यं जनयति । या तु श्यामं लोहिताक्षं व्यूढोरस्कं पुत्रमिच्छेत् कृष्णं वा तत्र तादृगुपचारो

जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १२१

भोजनवसनकुसुमाल्याङ्काराणां, तादृग्देशानुचिन्तनं चेति। यवागूं तु कन्यार्थिनीभ्योदद्यात्; क्षीरोदकतिलसिद्धास्तु वर्ण्याः। गौरश्यामकृष्णोभ्योऽन्ये वर्णा निन्दिताः ।।९।।

यदि वह स्त्री गौरवर्ण, ओजस्वी, पवित्र तथा दीर्घायु पुत्र को उत्पन्न करना चाहे तो उसे स्नान द्वारा शुद्ध होने के पहले दिन से ही मधु तथा घृत (असमान मात्रा) सहित सफेद जौ के सतुओं से बनाये हुए मन्थ में श्वेत रंग की तथा जीवित श्वेत रंग के बछड़े वाली गौ का दूध मिलाकर चांदी अथवा कांसी के पात्र में सदा पिलाये। तथा यथासमय शालि, सफेद जौ, दूध, दही तथा घी मिलाकर मात्रा में सेवन करे। वह श्वेत पुष्प एवं वस्त्रों को धारण करे, सायं तथा प्रातः काल श्वेत घोड़े तथा बैल का दर्शन करे। सौम्य, हितकारी तथा प्रिय कथाओं (बातचीत) से युक्त रहे अर्थात् उससे सौम्य तथा प्रिय बातचीत ही करनी चाहिये तथा उसके पास उसके मन के अनुकूल परिवार के व्यक्ति ही रहने चाहिये। इस प्रकार वह अभिलषित पुत्र को उत्पन्न करती है। चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—सा चेदेवमाशासीत बृहन्तमवदातं हर्यक्षमोजस्विनं शुचिं सत्वसंपन्नं पुत्रमिच्छेयमिति शुद्धस्नानात्प्रभृत्यस्यै मन्थमवदातयवानां मधुसर्पिभ्यां संसृज्य श्वेताया गौः सरूपवत्सायाः पयसाऽऽलोड्य राजते कांस्ये वा पात्रे काले काले सप्ताहं सततं प्रयच्छेत्पानाय, प्राप्ततश्च शालियवान्निकारान् दधिमधुसर्पिर्भिः पयोभिर्वा संसृज्य भुञ्जीत, तथा सायमावदातशरणशयनासनयानवसनभूषणा च स्यात्, सायं प्रातश्च शश्वच्छ्वेतं महान्तमृषभमाजानेयं हरिचन्दनाङ्गदं पश्येत्, सौम्याभिश्चैनां कथाभिर्मनोऽनुकूल भिरुपासीत, सौम्याकृतिवचनोपचारचेष्टांश्च स्त्रीपुरुषानितरानपि चेन्द्रियार्थानवदातान् पश्येत्, सहचर्यश्चैनां प्रियहिताभ्यां सततमुपचरेयुः, तया भर्ता, न च मिश्रीभावयापद्येयाताम्। जो स्त्री श्याम वर्ण के, लाल आखों वाले, विस्तृत एवं उन्नत छाती वाले अथवा कृष्ण वर्ण के पुत्र को उत्पन्न करना चाहे तो उसके लिये भी भोजन, वस्त्र, पुष्प तथा अलंकार आदिका उसी प्रकार का उपचार करना चाहिये तथा उसीप्रकार के देश (स्थान) का चिन्तन भी करना चाहिये। अर्थात् जिस वर्ण के पुत्र को चाहे उसी वर्ण के वस्त्र, अलंकार भोजन आदि होने चाहिये। चरक शा. अ. ८ में कहा है—या तु स्त्री श्यामं लोहिताक्षं व्यूढोरस्कं महाबाहुं च पुत्रमाशासीत, या वा कृष्णं कृष्णमृदुदीर्घकेशं शुक्लाक्षं, शुक्लदन्तं तेजस्विनमात्मवन्तम्, एष एवानयोरपिहोमविधिः, किन्तु परिबर्हवर्ज्यं स्यात्, पुत्रवर्णानुरूपस्तु यथाऽऽशोः परिबर्होऽन्यकार्यः स्यात्। परिबर्ह (भोजन, पुष्प, आसन, बिछौना इत्यादि बाह्य वस्तुओं) को छोड़कर उसके लिये भी शेष होम आदि की वही पूर्वोक्त विधि ही है। इसके आगे स्त्री जैसे भी वर्ण के पुत्रों को चाहती हो उसके लिये चरक में विधान दिया गया है—या या च यथाविधं पुत्रमाशासीत तस्यास्तस्यास्तां पुत्राशिषमनुनिशाम्य तांस्तान् जनपदान् मनसाऽनुपरिक्रामयेत्, ताननुपरिक्रम्य या या येषां जनपदानां मनुष्याणामनुरूपं पुत्रमाशासीत सा सा तेषां तेषां जनपदानामाहारविहारोपचारपरिच्छादाननुविधत्स्वेति वाच्या स्यात्; इत्येतत्सर्वं पुत्राशिषां समृद्धिकरं कर्म व्याख्यातं भवति। कन्या को चाहनेवाली स्त्री को यवागू देना चाहिये। सिद्ध किये हुए क्षीरोदक तथा तिल वर्ण्य (वर्ण को बढ़ाने वाले) होते हैं। गौर, श्याम तथा कृष्ण वर्णों से भिन्न वर्ण (रंग) निन्दित माने गये हैं ।।९।।

आहारश्चतुर्विधः, षड्रसाश्रयो, विंशतिविकल्पोगुरुलघुशीतोष्णस्निग्धरूक्षमन्दतीक्ष्णस्थिरसर-मृदुकठिनविशदपिच्छिलश्लक्ष्ण-खरसूक्ष्मस्थूलसान्द्रद्रवविकल्पात्; तेन त्वगादयः शुक्रान्ता धातव आप्यायन्ते। तेषां समानं वर्धनमविरुद्धाशनम्। वातादीनां तु धातूनामन्ये धातवआप्यायिता (रो) भवन्ति; भुज्यमानं मांसं मांसस्य, शोणितं शोणितस्येति; तद्धर्मभयादनिष्टं, तद्गुणैस्तु शुचिभिराहारैः क्षीणधातूनाप्याययेत्। शुक्रक्षये क्षीरघृतोपयोगो मधुरस्निग्धजीवनानां चान्येषामपि द्रव्याणामविदाहिनां प्रशस्यते, मूत्रक्षये पुनरिक्षुरसवारुणीमण्डद्रवमधुराम्ललवणतक्रगुडत्रपुसोपक्लेदिनां, पुरीषक्षये यवान्नविकृतिकुल्माषमाषषष्टिकयावकगोरसाम्ललवणस्निग्धशाकोपयोगः, वातक्षये कटुतिक्त-

१२२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]

कषायलघुरूक्षशीतयवान्नोपयोगः, पित्तक्षये कटुलवणाम्लतीक्ष्णोष्ण-क्षाराणां, कफक्षये स्निग्धमधुर-गुरुसान्द्रादीनाम् ।।१९०।। ...........................................................
(इति ताडपत्रपुस्तके ८५ पत्रम् १ ।)

आहार चार प्रकार का (पेय, लेह्य, भक्ष्य तथा भोज्य), होता है। यह मधुर आदि ६ रसों के आश्रित होता है तथा गुरु-लघु, शीत-उष्ण, स्निग्ध-रूक्ष, मन्द-तीक्ष्ण, स्थिर-सर, मृदु-कठिन, विशद-पिच्छिल, श्लक्ष्ण-खर, सूक्ष्म-स्थूल, सान्द्र-द्रव आदि विकल्पों (भेदों) से २० प्रकार का होता है। उस आहार से त्वचा से लेकर शुक्र पर्यन्त सम्पूर्ण धातुओं का पोषण होता है। समान गुण तथा समान गुण भूयिष्ठ द्रव्यों के सेवन से उनकी वृद्धि होती है परन्तु विरुद्धाशन नहीं होना चाहिये। वात आदि धातुओं को अन्य धातुऐं बढ़ाने वाली होती हैं। मांस का सेवन करने पर मांस धातु की वृद्धि होती है, शोणित का सेवन करने पर शोणित की वृद्धि होती है। परन्तु अधर्म के कारण इसका सेवन इष्ट (हितकर) नहीं माना जाता है। इसलिये उन्हीं धातुओं के गुण वाले अन्य पवित्र आहारों के द्वारा क्षीण हुई धातुओं को बढ़ाना चाहिये। शुक्र के क्षय में क्षीर एवं घृत का उपयोग तथा अन्य भी मधुर स्निग्ध एवं जीवनीय आदि अविदाही द्रव्यों का सेवन प्रशस्त माना जाता है। मूत्र के क्षय में ईख का रस, वारुणी, मण्ड, द्रव, मधुर, अम्ल, लवण, तक्र, गुड, त्रपुस आदि उपक्लेदी (शरीर को गीला रखने वाले) द्रव्य हितकर होते हैं। पुरीष के क्षय में यवान्न (यवकृतभक्त) विकृति, कुल्माष (कुलत्थ), माष (उड़द), षष्टिक (सांठी के चावल), यावक (यवागू), गोरस (गोदुग्ध आदि), अम्ल, लवण तथा स्निग्ध शाकों का प्रयोग करना चाहिये। वात के क्षय में कटु, तिक्त, कषाय, लघु, रूक्ष एवं शीत द्रव्य तथा यवान्न का, पित्त के क्षय में कटु, लवण, अम्ल, तीक्ष्ण, उष्ण तथा क्षार द्रव्यों का और कफ के क्षय में स्निग्ध, मधुर, गुरु तथा सान्द्र आदि द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिये।

**वक्तव्य—**आहार विहार आदि की समानता होने पर शारीर धातुओं में वृद्धि होती है। चरक सू. अ. १ में कहा है-सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्। गुरु धातुएँ गुरु आहार-विहार से तथा लघु धातुएँ लघु आहार-विहार के सेवन से वृद्धि को प्राप्त होती हैं। इसीलिये चरक शा. अ. ६ में कहा है—‘‘एवमेव सर्वधातुगुणानां सामान्ययोगाद् वृद्धिविपर्ययाद् ह्रासः, एतस्मान्मासमाप्याय्यते मांसेन भूयस्तरमन्येभ्यः शरीरधातुभ्यस्तथा लोहितं लोहितेन, मेदो मेदसा, वसा वसया, अस्थि तरुणास्थ्ना, मज्जा मज्जया, शुक्रं शुक्रेण गर्भस्त्वामगर्भेण’’। मांस के सेवन से अन्य धातुओं की अपेक्षा मांस अधिक बढ़ता हैं। रक्त से रक्त, मेद से मेद, वसा से वसा, तरुणास्थि से अस्थि, मज्जा से मज्जा, शुक्र से शुक्र तथा कच्चे गर्भ से गर्भ की वृद्धि होती है। परन्तु इस सामान्य नियम के अनुसार यदि किसी धातु की वृद्धि के लिये तत्समान धातु न मिल सके अथवा मिलने पर भी घृणा अथवा अन्य कारणों से उसका प्रयोग न किया जा सके तो उस अवस्था में उसके समान गुण वाले अन्य द्रव्यों का भी प्रयोग किया जा सकता है। उदाहरण के लिये शुक्र के क्षीण होने पर उपर्युक्त सिद्धान्त के अनुसार उसकी सर्वश्रेष्ठ एवं आदर्श चिकित्सा में तो शुक्र का प्रयोग करना ही है इसीलिये नक्र के वीर्य अथवा बकरे के अण्डों (Testicles) का सेवन कराया जाता है। परन्तु घृणा के कारण यदि कोई व्यक्ति इसका सेवन न कर सके तो उसको शुक्र के गुणों के समान गुणवाले दूध एवं घी का प्रयोग कराना चाहिये। चरक शा. अ. ६ में उसका विस्तार से बड़ा सुन्दर वर्णन किया गया है—यत्रत्वेवं लक्षणेन सामान्येन सामान्यवतामाहारविकाराणाम- सांनिध्यं स्यात् संनिहितानां वाऽप्ययुक्तत्वादप्रोपयोगे घृणित्वादन्यस्माद्वा कारणात्, स च धातुरभिवर्धयितव्यः स्यात् तस्य ये समानगुणाः स्युराहार विकारा असेव्याश्च, तत्र समानगुणभूयिष्ठानामन्यप्रकृतीनामप्याहारविकाराणामुपयोगः स्यात्, तद्यथा-शुक्रक्षये क्षीरसर्पिषोरुपयोगो मधुरस्निग्धसमाख्यातानां चापरेषामेव द्रव्याणां, मूत्रक्षये पुनरिक्षुरसवारुणीमण्डद्रवमधुराम्ललवणो-


१. अस्याग्रे ताडपत्रपुस्तके ८६ तमं पत्रं त्रुटितम्।

जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ८ ] शारीरस्थानम् १२३

पक्लेदिनां, पुरीषक्षये कुल्माषमाषकुष्माण्डामध्ययवशाकधान्याम्लानां, वातक्षये कटुतिक्तकषायरूक्षलघुशीतानां, पित्तक्षयेऽम्ललवणकटुकक्षारोष्णातीक्ष्णानां, श्लेष्मक्षये स्निग्धगुरुमधुरसान्द्रपिच्छिलानां द्रव्याणां, कर्माणि च यद्यद्यस्य धातोर्वृद्धिकरं तत्तदासेव्यं, एवमन्येषामपि शरीरधातूनां सामान्यविपर्ययाभ्यां वृद्धिक्षयौ यथाकालं कार्यौ, इति सर्वधातूनामेकैकशोऽतिदेशतश्च वृद्धिकराणि व्याख्यातानि भवन्ति ॥१०॥ .......................................

यानि द्रव्याणि पुण्यानि मङ्गल्यानि शुचीनि च।
नवान्यभग्नखण्डानि पुन्नामानि प्रियाणि च॥
गर्भिण्यै तान्युपहरेद्वासांस्याभरणानि च। न स्त्रीनपुंसकाख्यानि धारयेद्वा लभेत वा ।।

गर्भिणी का आचार व्यवहार—पुण्यकारक, मङ्गलमय, पवित्र, नवीन, अभग्न तथा अखण्डित, पुरुष नाम वाले (अथवा पुल्लिंग) एवं प्रिय द्रव्य तथा वस्त्र आभरणादि गर्भिणी को देवे। स्त्री अथवा नपुंसक नाम अथवा लिङ्ग वाले द्रव्यों को गर्भिणी न धारण करे और न प्राप्त करे।

धूपितार्चितसंभृष्टं मशकाद्यपवर्जितम्। ब्रह्मघोषैः सवादित्रैर्वादितं वेश्म शस्यते ।।
(प्रातरुत्थाय) शौचान्ते गुरुदेवार्चने रता। अर्चेदादित्यमुद्यन्तं गन्धधूपार्घ्यवाजपैः ।।
क्षीयमाणं च शशिनमस्तं यान्तं च भास्करम्। न पश्येद्गर्भिणी नित्यं नाप्युभौ राहुदर्शने ।।
सोमार्कौ सग्रहौ श्रुत्वा गर्भिणी गर्भवेश्मनि। शान्तिहोमपराऽऽसीत मुक्तयोगं तु याचयेत् ।।
न द्विष्यादतिथिं भिक्षां दद्यान्न प्रतिवारयेत्। स्वयं प्रज्वालिते चाग्नौ शान्त्यर्थं जुहुयाद्धृतम् ।।
पूर्णकुम्भं घृतं माल्यं पूर्णपात्रं घृतं दधि। न किञ्चित् प्रतिरुन्धीयान्न च बध्नीत गर्भिणी ।।
सूत्रेण तनुना रज्ज्वा स्तम्भनं बन्धनानि च। वर्जयेद्गर्भिणी नित्यं कामं बन्धानि मोक्षयेत् ।।

गर्भिणी जिस घर में रहती हो उसमें सदा धूप जलानी चाहिये, पूजा होनी चाहिये, घर मच्छर आदि से रहित होना चाहिये तथा गाजे बाजों सहित घर में सदा गाना-बजाना होता रहना चाहिये। गर्भिणी को प्रातः उठकर शौच स्नान आदि नित्य कर्म से निवृत्त होकर गुरु तथा देवता की अर्चना करनी चाहिये तथा गन्ध, धूप, अर्घ्य (नैवेद्य) तथा जप आदि के द्वारा उदय होते हुए सूर्य की पूजा करनी चाहिये। गर्भिणी को चाहिये कि वह क्षीण होते हुए (कृष्ण पक्ष के) चन्द्रमा तथा अस्त होते हुए (सायंकालीन) सूर्य को न देखे तथा दोनों राहुओं (राहु तथा केतु) को भी न देखे। चन्द्र ग्रहण तथा सूर्यग्रहण का ज्ञान होने पर गर्भिणी को गर्भगृह में जाकर शान्ति होम आदि कार्यों में लगकर सूर्य तथा चन्द्रमा की ग्रह द्वारा मुक्ति की प्रार्थना करनी चाहिये। वह अतिथि से द्वेष न करे, उसे भिक्षा देवे, अतिथि को कभी खाली न लौटाये तथा स्वयं शान्ति के निमित्त प्रज्वलित अग्नि में घृत की आहुति देवे। गर्भिणी स्त्री को जल से भरे हुए घड़े, घृत, माला, तथा घृत एवं दही से भरा हुआ पात्र इत्यादि किसी चीज का प्रतिरोध नहीं करना चाहिये। तथा गर्भिणी स्त्री को धागे अथवा पतली रस्सी आदि से स्तम्भन तथा बन्धन आदि नहीं बांधना चाहिये तथा उसे अपने सम्पूर्ण बन्धनों को ढीला रखना चाहिये। अर्थात् गर्भिणी स्त्री को कोई भी वस्त्र अथवा अन्य बन्धन आदि बहुत कस कर नहीं बांधना चाहिये।

अथ हीमानि रूपाणि गर्भिण्या उपलक्षयेत्।
यानिदृष्ट्वा विजानीयाद्गालजन्म(न्म)न्युपक्रमेत् (मम्) ।।

इसके बाद गर्भिणी के निम्न लक्षणों को देखकर यह जान ले कि अब बालक का जन्म होनेवाला है अर्थात् अब वह उपस्थित प्रसवा है॥

मुखग्लानिः क्लमोऽङ्गानामक्षिबन्धनमुक्तता। कुक्षेश्च स्यादवस्त्रंसस्त्वधोभागस्य गौरवम् ।।
पृष्ठपार्श्वकटीबस्तिवंक्षणं चातितुद्यति। योनिप्रस्रवणौदार्यभक्तद्वेषारतिक्‍लमाः ।।

१२४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]

उपस्थितप्रसवा के लक्षण—मुख की ग्लानि अथवा मुख का मुरझाना, अङ्गों का क्लम या शिथिलता, अक्षिबन्धन की शिथिलता, कुक्षि का शिथिल होना (उरोदेश से गर्भाशय के नीचे खिसक जाने से), अधोभाग (शरीर के निचले हिस्से) का भारी होना, पीठ, पार्श्व, कटि, बस्ति तथां वंक्षण (राननों) में अत्यन्त पीडा होना, योनिस्राव, उदारता, भक्तद्वेष (भोजन में अरुचि), अरति (अरुचि) तथा थकावट—ये उपस्थित, प्रसवा के लक्षण हैं। चरक शा. अ. ८ में कहा है—तस्यास्तु खल्विमानि लिङ्गानि प्रजननकालमभितो भवन्ति, तद्यथा—क्लमो गात्राणां, ग्लानिराननस्य, अक्ष्णोः शैथिल्यं, विमुक्तबन्धनत्वमिव वक्षसः, कुक्षेरवस्रंसनं, अधोगुरुत्वं, वंक्षणबस्तिकटिकुक्षिपाश्वपृष्ठनिस्तोदो, योनेः प्रस्रवणं, अनन्नाभिलाषश्चेति, ततोऽनन्तरभावीनां प्रादुर्भावः प्रसेकश्च गर्भोदकस्य। इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. १० में भी कहा है—जाते हि शिथिले कुक्षौ मुक्ते हृदयबन्धने । सशूले जघना नारी ज्ञेया सा तु प्रजायिनी॥ तथा इसके आगे फिर कहा है—तत्रोपस्थितप्रसवायाः कटीपृष्ठं प्रति समन्ताद्वेदना भवत्यभीक्ष्णं पुरीषप्रवृत्तिमूत्रं प्रसिच्यते योनिमुखाच्छ्लेष्मा च॥

एतानि दृष्ट्वा रूपाणि कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् । प्रविशेयुः स्त्रियो वृद्धाः कुशलाः शस्तधाविताः १ ॥

इन उपर्युक्त लक्षणों को देखकर ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन करवाकर वृद्ध, कुशल, प्रशस्त तथा स्नान द्वारा शुद्ध हुई स्त्रियां गर्भिणी के पास गर्भग्रह में प्रवेश करें। चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—तां ताः समन्ततः परिवार्य यथोक्तगुणाः स्त्रियः पर्युपासीरन्नाश्वासयन्त्यो वाग्भिर्ग्राहिणीयाभिः सान्त्वनीयाभिः। इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. १० में भी कहा है—प्रजनयिष्यमाणां कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनां कुमारपरिवृतां पुत्रामफलहस्तां स्वभ्यक्तामुष्णोदकपरिषिक्तामथैनां सम्भृतां यवागूमाकण्ठात् पाययेत्। ततः कृतोपधाने मृदुनि विस्तीर्णे शयने स्थितामाभुग्नसक्थीमुत्तानामशङ्कनीयाश्चतस्रः स्त्रियः परिणतवयसः प्रजननकुशलाः कर्तितनखाः परिचरेयुरिति॥

गर्भिणीं सान्त्वयेयुस्ता हर्षयेयुः प्रियंवदाः ।। आश्वासयेयुर्धर्मार्थों चोदयन्तं प्रजापतिम् ।। लोकान् पुत्रवतीनां च सुखानि विविधानि च । कीर्तयेयुरपुत्राणां दुःखानि निरयादिषु ।। अदितिं कश्यपं देवमिन्द्राणीमिन्द्रमश्विनौ । आयुष्मतां पुत्रवतां मङ्गल्यानां च कीर्तनम् ।।

प्रिय वचनों को बोलने वाली वे स्त्रियां धर्म और अर्थ के निमित्त प्रजापति ब्रह्मा को प्रेरित करती हुई गर्भिणी को सान्त्वना दें, उसे हर्षित (प्रसन्न) करें तथा उसे आश्वासन दें। उसके सामने पुत्रवती स्त्रियों के विविध सुखों तथा अपुत्रवती (पुत्र रहित) स्त्रियों के दुःखों का वर्णन करें। तथा उसके सामने अदिति और कश्यप देवता, इन्द्राणी, इन्द्रअश्विनीकुमार तथा अन्य आयुष्मान् पुत्रवान् तथा मङ्गलकारी देवताओं का कीर्तन करना चाहिए॥

तन्त्रीवर्णोऽल्पश२: स्त्रावः पिच्छिलः पुत्रजन्मनि । किंशुकोदकसंकाशः पुत्रिकाजन्म शंसति ।।

पुत्र की उत्पत्ति में स्त्री की योनि से गिलोय के रस के समान थोड़ा २ तथा चिपचिपा स्राव निकलता है। तथा कन्या (पुत्री) की उत्पत्ति में किंशुकोदक (पलाशढाक के फूल) के समान स्राव होता है॥

सूतेरूर्ध्वं तु ये स्त्रावा निन्दिताञ् शमयेत्तु तान् । तस्या अस्यामवस्थायामुपयाचेत देवताः ।।

प्रसव के बाद स्त्री की योनि से जो स्त्राव (Abnormal Dischargés) होते हैं, वे निन्दित माने गये हैं अतः उनको शान्त करे अर्थात् उनकी चिकित्सा करे। इस अवस्था में उसके लिये देवताओं से प्रार्थना करनी चाहिये॥


१. शस्ताः प्रशस्ताः, धाविताः शुद्धाश्चेत्यर्थः। २. गुडूची रस सदृश इत्यर्थः।

जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १२५

अव्यावृते स्त्रिया गर्भे विवृते चापरामुखे¹ । ग्राहीषु² वर्तमानासु सा विवर्तेत गर्भिणी ।।

स्त्री के गर्भ के अव्यावृत (संकुचित) होने पर, जरायु के मुख के फैल जाने पर तथा ग्राही (प्रसववेदनाओं Labour Pains) के उपस्थित होने पर गर्भिणी को इसके लिये तैयार हो जाना चाहिये ।।

न तीक्ष्णं³ ग्राहिशूलेषु क्षिप्रं नारी प्रजायते । विलम्बिताभिरावीभिर्गर्भः क्लेशयते स्त्रियम् ।।

प्रसव वेदनाओं के तीक्ष्ण (तीव्र-Acute) हो जाने पर गर्भिणी को शीघ्र ही प्रसव हो जाता है। परन्तु यदि प्रसव वेदनायें ठीक समय पर न होकर देर में हो तो गर्भिणी को अत्यन्त क्लेश होता है।

केचिदस्यामवस्थायां व्यायामं मुसलादिकम् । जृम्भाचङ्क्रमणायं च भिषजो ब्रुवते हितम् ।।

कुछ वैद्य इस अवस्था में अर्थात् प्रसव वेदनाओं के देर में होने पर कहते हैं कि गर्भिणी को मूसल आदि द्वारा व्यायाम, जंभाई तथा इधर उधर चलना फिरना हितकारी है। अर्थात् इन क्रियाओं द्वारा शीघ्र ही प्रसव हो जाता है। चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—सा चेदावीभिः संक्लिश्यमाना न प्रजायेताथैनां ब्रूयात् उत्तिष्ठ मुसलमन्यतरत् गृह्णीष्वानेनतदुलूखलं धान्यपूर्णं मुहुर्मुहुरभिंजहि, मुहुर्मुहुरवजृम्भस्व, चङ्क्रमस्व चान्तरान्तरा इत्येवमुपदिशन्त्येके ।।

वर्जनीयं तु तत् सर्वं भगवानाह कश्यपः । नार्याः प्रसवकाले हि शरीरमुपमृद्यते ।।
त्रयो दोषाः प्रकुप्यन्ति विचाल्यन्ते च धातवः । गर्भिणी तदवस्था हि यत्नधार्या विशेषतः ।।

परन्तु भगवान् कश्यप कहते हैं कि मूसल आदि द्वारा व्यायाम, जंभाई एवं चङ्क्रमण आदि सब क्रियाओं का त्याग करना चाहिये। अर्थात् प्रसव को शीघ्र करने के लिये उपर्युक्त क्रियाओं का प्रयोग नहीं करना चाहिये। क्योंकि प्रसवकाल के समय स्त्री का शरीर अत्यन्त मृदु होता है, वातपित्त कफ तीनों दोष प्रकुपित होते हैं तथा उस समय शरीर की सब धातुएं अपने स्थान से विचलित हुई होती हैं। गर्भिणी की वह अवस्था अत्यन्त यत्नपूर्वक धारण करने योग्य होती है।

अधिकं सौकुमार्यं हि गर्भिण्याः क्लेद्यमेव च । स्रावकाले विशेषेण विषादभयसंश्रयः ।।
एकपादो यमकुले पाद एक इह स्थितः । दृष्ट्वा दुःखं स्त्रियस्तस्या इत्येवं ब्रुवते मिथः ।।

उस समय गर्भिणी अत्यन्त सुकुमार होती है तथा उसमें क्लेद की वृद्धि हुई होती है। उपर्युक्त क्रियाओं से जब गर्भ का स्राव होता है उस समय विशेष विषाद तथा भय होता है। उस समय अन्य स्त्रियाँ उसके दुःख (कष्ट) को देखकर परस्पर कहती हैं कि इसका एक पैर यम के घर में तथा एक पैर इस लोक में है अर्थात् इसकी इस प्रसवावस्था में कभी भी मृत्यु हो सकती है ।।

तस्यास्त्वस्यामवस्थायां व्यायामो न प्रशस्यते । व्यायामः सेव्यमानो हि गर्भिणीमाशु नाशयेत् ।।
अतिचङ्क्रमणेनापि हन्याद्गर्भमुपस्थितम् । अत्ययं प्राप्नुयाद्घोरं देहान्तकरणं महत् ।।

इसलिये गर्भिणी की इस अवस्था में व्यायाम हितकर नहीं है। व्यायाम करने से गर्भिणी की मृत्यु हो सकती है। अतिचङ्क्रमण (अधिक इधर उधर घूमने) से भी उपस्थित गर्भ नष्ट हो जाता है। उस स्त्री को देह का अन्त करने वाले, महान् तथा भयंकर रोग हो जाते हैं। उपर्युक्त मूसल आदि के व्यवहार तथा चङ्क्रमण आदि क्रियाओं का चरक में भी निषेध किया गया है। चरक शा. अ. ८ में कहा है—तन्नेत्याह भगवानात्रेयः–दारुणव्यायामवर्जनं हि गर्भिण्याः सततमुपदिश्यते, विशेषतश्च प्रजननकाले प्रचलितसर्वधातुदोषायाः सुकुमार्या नार्या मुसलव्यायामस्मीरितो वायुरन्तरं लब्ध्वा


१. अपरामुखे जरायुमुखे इत्यर्थः ।
२. 'आवीषु' इति पाठश्चेत् साधु ।
३. 'न तीक्ष्णं' इत्यत्र 'तीक्ष्णेषु' इति पाठश्चेत् साधु ।

१२६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् जातिसूत्रीयशरीराध्यायः ? ]

प्राणान् हिंस्यात्, दुष्प्रतीकारा हि तस्मिन् काले विशेषेण भवति गर्भिणी, तस्मान्मुसलग्रहणं परिहार्यमृषयो मन्यन्ते, जृम्भणं चङ्क्रमणं च पुनरनुष्ठेयमिति ।।

उपविष्टाऽसकृत्तस्मादनिर्विण्णा(ऽ)त्रपान्विता । वृद्धस्त्रीद्रव्यसंपन्ना प्रजायेत प्रजार्थिनी ।।

इसलिये प्रसव की इच्छा वाली स्त्री को चाहिये कि वह प्रसन्न मन वाली, लज्जा से रहित तथा वृद्धस्त्रियों एवं धन से युक्त हुई बार २ बैठी हुई प्रसव (प्रजननकार्य) को करे।

वचा लाङ्गलीकी कुष्ठं चिरबिल्वैलचित्रकाः । चूर्णितं मुख(हु)राजिघ्रेत्तथा शीघ्रं प्रजायते ।। आजिघ्रेद्भूर्जधूपं वा नमेरोगुग्गुलोस्तथा । अथ(धः) प्रपद्यते गर्भस्तथा क्षिप्रं विमुच्यते ।। पार्श्वसन्धिकटीपृष्ठं तैलेनोष्णेन प्रक्षितम् । मृद्नीयुरवकर्षेयुः शनैः प्राज्ञ्यः स्त्रियः सुखाः(खम्) ।।

चिरप्रसव की चिकित्सा अथवा उपाय—वचा, कलिहारी, कुष्ठ, चिरबिल्व (करञ्ज), छोटी इलायची तथा चित्रक का सूक्ष्म चूर्ण बार २ सूंघने के लिये देने से शीघ्र ही प्रसव हो जाता है। अथवा भोजपत्र के धुएँ को या सरल देवदारु और गूगल के धुएँ को सूंघने से गर्भ शीघ्र ही नीचे की ओर आ जाता है तथा अपने स्थान से छूट जाता है। तथा बीच २ में निपुण स्त्रियां उसके पार्श्व, सन्धियां, कटी तथा पृष्ठ देश में धीरे २ सुखपूर्वक उष्ण तेल चुपड़कर मालिश करें तथा अवकर्षण करें अर्थात् गर्भ को नीचे लाने का प्रयत्न करें। चरक शा. अ. ८ में भी ये भी ही विधियां दी हैं-अथास्यै दद्यात्कुष्ठैलालाङ्गलिकीवचा चित्रकचिरबिल्वचूर्णमुपाघ्रातुं, सा तन्मुर्मुहुरुपजिघ्रेत्, तथा भूर्जपत्रधूमं शिंशपाधूमं वा, तस्याश्चान्तरान्तरा कटीपार्श्वपृष्ठ सक्थिदेशानीषदुष्णेन तैलेनाभ्यज्यानुसुखमवमृद्नीयात्, इत्यनेन तु कर्मणा गर्भोऽवाक्प्रतिपद्यते ।।

दुर्बलां पाययेन्मद्यमित्येके, नेति कश्यपः । पूर्वक्लिष्टा तथैवास्या(ऽसौ)यवागूं तृषिता पिबेत् ।।

उपर्युक्त चिकित्साओं के अतिरिक्त कुछ लोग कहते हैं कि यदि वह दुर्बल हो तो उसे मद्य (Brandy) पिलाये, परन्तु भगवान् कश्यपं कहते हैं कि यह ठीक नहीं है। क्लान्त एवं तृषित (प्यासी) होने पर उसे यवागू पीना चाहिये।

यदा गर्भोदकं योनौ सशूलं संप्रवर्तते । कालेन चोदितो गर्भो विमुच्य हृदयोदरम् ।। बस्तिशीर्षमधोभागमवगृह्णाति जन्मनि । ग्लानिश्च जायतेऽत्यर्थं योन्युत्पीडनभेदनम् ।। इत्येतैः कारणैर्विद्याद्गर्भस्य परिवर्तनम् । अथास्याः प्रसवश्चेति ततः पर्यङ्कमारुहेत् ।। प्रावारमुपधानं वा ....................................................

(इति ताडपत्रपुस्तके ८७ तमं¹ पत्रम्² ।)

(शारीरस्थानस्यैतावानेव भाग उपलब्धः)


जब शूल सहित गर्भोदक योनि में आ जाये तथा काल से प्रेरित हुआ गर्भ हृदय प्रदेश को छोड़कर नीचे आ जाता है, बस्तिशीर्ष तथा उसके अधोभाग को पकड़ लेता है, ग्लानि अत्यधिक होती है, योनि में उत्पीडन तथा भेदन (वेदना)


१. अस्मिंश्च पत्रे ताडपत्रीयपुस्तके आपाततो दर्शने २२ किल पत्राङ्काः प्रतिभान्ति, परन्त्रापूर्वापरग्रन्थसन्निकर्षौचित्येन ८७ तमत्रुटितपत्रस्थानीयत्वेनेदं निर्दिष्टम् । २. अस्याग्रे चतुष्पत्रात्मको ग्रन्थः खण्डितस्ताडपत्रपुस्तके ।

जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १२७

अनुभव हो—तब इन उपर्युक्त लक्षणों से यह जाना जाता है कि गर्भ का नीचे की ओर परिवर्तन हो गया है तथा प्रसव होने वाला है। इस अवस्था में उस उपस्थितप्रसवा स्त्री को प्रावार (चादर) तथा उपधान (तकिया) लगे हुए पलंग पर लिटाकर—(प्रवाहण करना प्रारम्भ कराये)

वक्तव्य—चरक शा. अ. ८ में कहा है—स यदा जानीयाद्विमुक्तं हृदयमुदरमस्यास्तवाविशति, बस्तिशिरोऽवगृह्णाति, त्वरयन्त्येनामावयः, परिवर्तते अधो गर्भ इति, अस्यामवस्थायां पर्यङ्कमेनामारोप्य प्रवाहयितुमुपक्रामयेत्। यह अध्याय यहीं पर मध्य में ही खण्डित हो गया है। प्रकरण को देखते हुए कहा जा सकता है कि सम्भवतः इससे आगे इसमें प्रवाहण द्वारा गर्भ की उत्पत्ति (Delivery) अपरापातन तथा माता एवं शिशु के जातकर्म का उल्लेख किया गया होगा। पाठकों के ज्ञान के लिये हम इन विषयों को अन्य ग्रन्थों के आधार पर संक्षेप से देते हैं। उपस्थित प्रसवा स्त्री के प्रवाहण के लिये चरक शा. अ. ८ में कहा है—ताश्चैनां यथोक्तगुणाः स्त्रियोऽनुशिष्युः—अनागतावीर्मा प्रवाहिष्ठाः, या ह्यनागतावीः प्रवाहयते व्यर्थमेवास्यास्तत्कर्मभवति, प्रजा चास्याविकृतिमापन्ना श्वासकाशशोषप्लीहप्रसक्ता वा भवति, यथा हि क्षवथूद्गारवातमूत्र पुरीषवेगान् प्रयतमानोऽप्यप्राप्तकालाान्न लभते कृच्छ्रेण वाप्यवाप्नोति तथाऽनागतकालं गर्भमपि प्रवाहमाणा, यथा चैषामेव क्षवथ्वादीनां सन्धारणमुपघातायोपपद्यते तथा प्राप्तकालस्य गर्भस्याप्रवाहणं, सा यथानिर्देशं कुरुष्वेति वक्तव्या, तथा च कुर्वती शनैः शनैः पूर्वं प्रवाहेत ततोऽनन्तरं बलवत्तरं, तस्यां च प्रवाहमाणायां स्त्रियः शब्दं कुर्युः ‘प्रजाता प्रजाता धन्यं धन्यं पुत्रम्’ इति, तथाऽस्या हर्षेणाप्यायन्ते प्राणाः। जब उसे प्रसववेदनाएं हो रही हों उस समय उसे प्रवाहण करना चाहिये। जब वेदनाएं न हो रही हों उस समय प्रवाहण का कोई लाभ नहीं होता। इस प्रकार वेदनाओं के साथ २ धीरे २ प्रवाहण को भी बढ़ा देना चाहिये। इससे गर्भ विशेष कष्ट के बिना बाहर आ जाता है। अपरापातन—गर्भ के बाहर आने के बाद परिचारिकाओं का सबसे प्रथम कर्तव्य यह देखना है कि अपरा (Placenta) बाहर आई है या नहीं। प्रसव के ४० मिनिट के बाद तक भी वह यदि बाहर नहीं आई है तो उसे निम्न विधि से गिराने का प्रयत्न करें ! एक स्त्री प्रसूता के पेट की दीवार में से गर्भाशय को इसप्रकार पकड़े कि उसका अंगूठा सामने तथा अंगुलियां गर्भाशय के पीछे रहें। अब गर्भाशय के आकुञ्चन (Contraction) के समय गर्भाशय को सामने से पीछे तथा नीचे की ओर दबाये। आकुञ्चन के साथ ही यह क्रिया करनी चाहिये। इस विधि में गर्भाशय को पार्श्व से नहीं पकड़ना चाहिये। इससे अपरा बाहर आ जाती है। इस विधि को (Crede's method) कहते हैं। योनि में तैल का अनुवासन तथा आस्थापन बस्ति द्वारा भी वायु के अनुलोम हो जाने से वात मूत्र एवं पुरीष के साथ ही अपरा भी बाहर आ जाती है। शिशुपरिचर्या—इस अपरापातन के साथ २ दूसरी ओर सद्योजात शिशु का भी ध्यान रखना चाहिये। अपत्यमार्ग से आते हुए शिशु को बहुत क्लेश उठाने पड़ते हैं अतः बालक कुछ मूर्च्छित सा होता है तथा पूरा श्वास भी नहीं लेता रहता है। उत्पन्न होने के बाद शिशु स्वयं रोता है। यह रोना (Cry) उसके लिये बहुत अच्छा एवं आवश्यक होता है क्योंकि इस रोने के द्वारा वह प्रथम बार श्वास लेता है तथा उसके फुफ्फुसों (Lungs) में हवा जाती है। यदि बालक स्वयं न रोये तथा होश में न आये तो उसे होश में लाने तथा डराकर रुलाने का प्रयत्न किया जाता है। इसके लिये चरक में उसके कानों के पास पत्थर बजाने तथा काले रंग के छाज से हवा करने को लिखा है। कहा है—अश्मयोः संघट्टनं कर्णयोर्मूले, शीतोदकेनोष्णोदकेन वा मुखे परिषेकः, तथा संक्लेशविहितान् प्राणान् पुनर्लभेत, कृष्णकपालिकाशूर्पेण चैनमभिनिष्पूणीपुर्यद्यच्चेष्टः स्यात् यावत्प्राणानां प्रत्यागमनम्। सद्योजात शिशु ऐसे स्थान से बाहर आता है जहां कि बाह्य वायुमण्डल का किसी प्रकार का संसर्ग नहीं होता। बाहर आकर वह अपना स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करता है। जीवन की दृष्टि से उसका अब माता के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं रहता है। उसके जीवन को प्रारम्भ करने के लिये ही उपर्युक्त विधि से उसमें (Cry) उत्पन्न की जाती है। इसके साथ ही शिशु के गले में श्लेष्मा आदि फंसी हो तो उसे भी अंगुली में कपड़ा लपेट कर उससे साफ कर देना चाहिये जिससे श्वास प्रश्वास ठीक तरह से हो सके। जब यह निश्चित रूप से मालूम हो जाय कि शिशु जीवित है अर्थात् स्वतन्त्र रूप से वह श्वास प्रश्वास लेने लगा है तब नाभिच्छेदन करना चाहिये। नाभिच्छेदन—शिशु की उत्पत्ति के कुछ ही देर बाद

३१ का.सं.

१२८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]

नाभिनाल (Umbilical cord) के स्पन्दन बन्द हो जाने पर नाभि से २ इञ्च तथा ३ इञ्च दूर—जो बन्धन लगाकर बीच में से नाभिनाल को काट देना चाहिये। ये बन्धन रक्तस्राव को रोकने के लिये लगाये जाते हैं। दूसरा बन्धन गर्भ में कहीं दूसरा शिशु (यमल-Twin) न हो—उसकी रक्षा के लिये सावधानी के रूप में लगाया जाता है। नाभिनाल को काटने से पूर्व उसके स्पन्दनों का बन्द हो जाना आवश्यक है। उसके बाद नाभि पर (Dusting powder) या कोई अन्य अवचूर्णन ओषध लगाकर पट्टी बांध देनी चाहिये। इसके बाद उसकी आंखों की ओर अवश्य ध्यान देना चाहिये। उन्हें अच्छी प्रकार Boric lotion से साफ करके उसमें १/२% Caustic की एक २ बूंद डाल देनी चाहिये क्योंकि यदि माता को कोई औपसर्गिक रोग हो तो उससे मुख्यरूप से शिशु की आंख में विकृति (Opthalmia Neonotorum) होने का डर रहता है। इन सब आवश्यक कार्यों को करके अब बच्चे को सुला देना चाहिये क्योंकि वह प्रसवजन्य श्रम के कारण पर्याप्त थका हुआ होता है। इनके अतिरिक्त शिशु को साधारण जीवन प्रारंभ करने से पूर्व अन्य भी कई उपद्रव होने का डर रहता है। इनकी ओर परिचारिकाओं को ध्यान देना आवश्यक है। नवजात शिशु में कई दिन तक उष्णता का नियन्त्रण ठीक तरह से नहीं होता है जिसके परिणामस्वरूप उनको सर्दी-जुकाम आदि (Exposure to cold) बहुत जल्दी होते हैं तथा यदि सावधानी न रखी जाय तो ये अत्यन्त घातक परिणाम तक उत्पन्न कर देते हैं। इसी प्रकार उष्णता का नियन्त्रण न होने से उनके तापमान में वृद्धि भी बहुत जल्दी हो जाती है। शिशु को दो चार दिन तक तो यदि तापमान में थोड़ी वृद्धि (१००°F तक) रहे तो उसे सामान्य अवस्था ही समझनी चाहिये परन्तु यदि बिना किसी विशेष कारण के लगातार तापमान में अधिक वृद्धि (१०३°F या इससे अधिक) रहे तो शरीर में द्रव की कमी समझनी चाहिये। शिशु के इस ज्वर को Dehydration fever कहते हैं। इस अवस्था में शिशु को आधी शक्ति वाला Normal saline Solution धीरे २ कई बार देना चाहिये जिससे यह ज्वर की अवस्था ठीक हो जाती है। दूसरा मुख्य उपद्रव शिशु को श्वासावरोध का होता है। यदि शिशु के गले की श्लेष्मा (Mucus) अच्छी तरह साफ होने पर भी नासिका (Nasal passages) में बाधा हो तो उसे श्वास लेने में कठिनाई होती है। यद्यपि वह मुख से श्वास ले सकता है तथापि शिशु को नासिका से श्वास लेने की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है इसलिये उसका श्वासावरोध होने लगता है। Robert Hutchison ने अपनी पुस्तक Diseases of children में लिखा है—The new born baby has such an intense instinctive urge to breathe through the nose (Probably because breast feeding can only be accomplished if the nose is used for breathing) that it will go blue in the face, struggle Cry and even stop breathing altogether rather than breath easily through the mouth इस अवस्था में एक रबड़ कैथेटर (Catheter) नाक के द्वारा बालक के गले में डालकर मार्ग को साफ कर देना चाहिये। भोजन—साधारणतया प्रथम तीन दिनों तक माता के स्तनों में शुद्ध दूध नहीं होता है अपितु एक भारी तथा पीला सा द्रव होता है जिसे खीस (Collustrum) कहते हैं। यह भारी तथा विरेचक (Lexative) होता है। इसलिये प्रारंभ में यह दूध नहीं दिया जाता है। आयुर्वेद में इस समय मधु एवं घृत (असमान मात्रा में) चटाने को लिखा है। चरक शा. अ. ८ में कहा है—‘‘ततोऽनन्तरं जातकर्म कुमारस्य कार्यम्, तद्यथा—मधुसर्पिषीमन्त्रोपमन्त्रिते यथाम्नायं-प्रथमं प्राशितुमस्मै दद्यात्। स्तनमत ऊर्ध्वम्’’। सुश्रुत शा. अ. १० में उस समय सुवर्ण प्राशन का विधान दिया है—‘‘अथ कुमारं शीताभिरद्भिराश्वास्य जातकर्मणि कृते मधुसर्पिरनन्ता ब्राह्मीरसेन सुवर्णचूर्णमङ्गुल्याऽनामिकया लेहयेत्’’। परन्तु इसके विपरीत कई चिकित्सक शिशु को उन दिनों भी माता का दूध देना ही पसन्द करते हैं। उनकी राय में वह खीस वाला दूध भारी होने पर भी विरेचक होने से शिशु के पेट को साफ कर देता है। आंतों में जो सूखा हुआ मल जिसे Muconium कहते हैं—एकत्रित होता है वह निकल जाता है। तथा स्तन को मुंह में देने से दूसरा लाभ यह होता है कि प्रत्यावर्तन क्रिया (Reflex action) द्वारा माता का गर्भाशय भी सिकुड़ता है जिससे गर्भाशय का स्त्राव (Lochia) निकलता रहता है। इसके बाद कुछ काल तक शिशु के तापमान, श्वास प्रश्वास गति, नाड़ीगति तथा मलमूत्र आदि का अवश्य ध्यान रखना चाहिये। प्रारंभ में शिशु का तापमान कुछ अधिक (99.8°F. के लगभग) रहता है परन्तु

जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]शारीरस्थानम्१२९

कुछ ही समय में घटकर यह 98.8.°F. हो जाता है। यदि चार दिन तक शिशु का तापमान 100°F. या इससे अधिक रहे तो ध्यान पूर्वक इसका कारण मालूम करने का प्रयत्न करना चाहिये। शिशु की श्वासगति ३०-६० तक तथा नाडीगति १४०-१५० तक रहती है। शिशु का भार (तौल) तथा ऊँचाई आदि भी उसके स्वास्थ्य की निश्चित पहचान है। उत्पत्ति के समय शिशु का भार लगभग ६ से ८ पौण्ड होता है। प्रारंभ के दो तीन दिनों में यह भार थोड़ा सा घटता है परन्तु सप्ताह भर बाद यह फिर बढ़ जाता है तथा आगे नियमपूर्वक बढ़ता रहता है। शिशु के भार में यदि प्रतिसप्ताह वृद्धि न हो तो उसका कारण ढूंढ़ना चाहिये। प्रथम ३ मास तक शिशु का भार ७ औंस प्रति सप्ताह बढ़ता है। जन्म के समय उसकी लम्बाई लगभग १९-१/२ इञ्च होती है। शिशु के लिये सबसे आवश्यक उसका भोजन (माता का दूध) तथा निद्रा है। नियमित समय पर शिशु को स्तनपान कराना चाहिये। शिशु जब रोये तब ही मुंह में स्तन दे देने की प्रथा अच्छी नहीं है। एतदर्थ इसे चम्मच भर पानी अथवा अजवायन के अर्क में मधु मिलाकर दिया जा सकता है। अधिक दूध से बालक को अजीर्ण, वमन, अतिसार आदि उपद्रव हो जाते हैं अतः दूध देने का समय निश्चित होना चाहिये। यदि माता का दूध न हो तो यथोक्त गुण वाला धात्री का दूध या कृत्रिम दूध भी आवश्यकतानुसार दिया जा सकता है। शिशु को दूध कितना, कितने अन्तर से तथा कब देना चाहिये इसके लिये निम्न तालिका है—

आयुअन्तररात्रिमात्रा
१ म सप्ताह२ घण्टे२ बार१-१-१/२ औंस
२ से ३ सप्ताह,,,,१-१/२-३ ,,
४ से ५ सप्ताह,,१ बार२-१/२-३-१/२ ,,
६ से १२ सप्ताह२-१/२ घण्टे,,३-४-१/२ ,,
३ से ५ मास३ ,,,,४-५-१/२ ,,
५ से ९ ,,,, ,,Nil५-१/२-७ ,,
९ से १२ ,,३-१/२ ,,,,७-१/२-९ ,,

निन्द्रा—शिशु अपना अधिक समय सोने में बिताता है। प्रारंभ में वह २१ घण्टे सोता है तथा धीरे २ कम करते हुये ६ मास के बाद यह १४-१६ घण्टे पर पहुंच जाता है। नींद के लिये बालक को अफीम आदि का प्रयोग कराना कभी अच्छा नहीं होता है। शिशु के साथ २ माता के स्वस्थवृत्त का पूर्ण ध्यान रखना चाहिये। इस समय माता के शरीर में वायु की वृद्धि हुई होती है। इसलिये उसे भोजन में लघु आहार तथा सात्म्यानुसार घृत आदि किसी स्नेह में पञ्चकोल चूर्ण मिलाकर देना चाहिये अथवा ५-७ दिन तक लगातार दशमूल के क्वाथ में घृत अथवा एरण्ड तेल की योग्य मात्रा मिलाकर दोनों समय पीने को देनी चाहिये। इससे प्रकुपित हुआ वायु शान्त हो जाता है तथा विकार नहीं हो पाते हैं। फिर क्रमशः पुष्टिकारक आहार देकर उसके शरीर को पुष्ट कर दें। माता को २-४ दिन साधारण सा ज्वर हो जाना स्वाभाविक है जो उपर्युक्त उपचार से ठीक हो जाता है परन्तु यदि ज्वर अधिक दिन तक लगातार बना रहे तो उसे प्रसूति ज्वर (Perpual Fever) समझ कर प्रमाद रहित होकर सावधानी से चिकित्सा करनी चाहिये। दस दिन बाद बालक का नामकरण संस्कार किया जाता है। चरक तथा सुश्रुत में बालक के दो नाम रखने को लिखा है। (१) नक्षत्र नाम—अर्थात् जिस नक्षत्र में बालक उत्पन्न हुआ है उसके अनुसार तथा (२) अभीष्ट नाम। सुश्रुत शा. अ. १० में कहा भी है—'ततो दशमेऽहनि मातापितरौ कृतमङ्गलकौतुकौ स्वस्तिवाचनं कृत्वा नाम कुर्यातां यदभिप्रेतं नक्षत्र नाम वा। इसके बाद चरक तथा सुश्रुत में शिशु के वस्त्र, आभूषण, मणिधारण तथा खिलौने आदि का विस्तृत वर्णन किया गया है यह सब पाठकों को वहीं से देखना चाहिये॥

पञ्चममिन्द्रियस्थानम्

...................................

ओषधभेषजेन्द्रियाध्यायः ।

(अथात ओषधभेषजीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ।।१।।)
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम औषधभेषजीय इन्द्रिय अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में औषध तथा भेषजरूप चिकित्सा संबन्धी इन्द्रियों (अरिष्ट लक्षणों) का वर्णन किया जायगा।

वक्तव्य—इस इन्द्रिय स्थान का केवल यही (अन्तिम) अध्याय ही उपलब्ध हुआ है। इससे पूर्व के सब अध्याय खण्डित हैं। इस स्थान का नाम इन्द्रिय स्थान इसलिये रखा गया है कि इसमें इन्द्र (जीवात्मा) के ज्ञापक लिङ्ग (लक्षण) दिये गये हैं। इन्द्र जीवात्मा को कहते हैं। जीवात्मा के अन्य बहुत से ज्ञापक लिङ्गों में ‘मृत्यु होना’ मुख्य लिङ्ग है। इस स्थान में मृत्यु के निदर्शक चिह्न दिये गये हैं अर्थात् जिन्हें देखकर वैद्य यह जान सके कि रोग असाध्य है तथा रोगी की मृत्यु होने वाली है—उन २ लक्षणों, पूर्वरूपों, भावों तथा अवस्थाओं का इस स्थान में समावेश किया गया है। इसी लिये इस स्थान का नाम इन्द्रिय स्थान है। मृत्यु के निदर्शक चिह्नों को रिष्ट या अरिष्ट भी कहते हैं। कहा भी है—रोगिणो मरणं यस्मादवश्यं भावि लक्ष्यते। तल्लक्षणमरिष्टं स्याद्रिष्टं चापि तदुच्यते ।। चिकित्सा से पूर्व इन अरिष्ट लक्षणों का जानना आवश्यक है। रोगों की साध्यासाध्यता का विचार करके ही चिकित्सा में प्रवृत्त होना चाहिये क्योंकि मरणासन्न, असाध्य अथवा गतायुष रोगी की चिकित्सा से कोई लाभ नहीं होता। इसके विपरीत अपनी प्रतिष्ठा की ही हानि होती है। इसी लिये सुश्रुत सू. अ. २९ में कहा है—असिद्धिमाप्नुयाल्लोके प्रतिकुर्वन् गतायुषः। अतोऽरिष्टानि यत्नेन लक्षयेत् कुशलो भिषक् ।। इसीलिये चिकित्सा से पूर्व इन्द्रियस्थान दिया गया है। चरक संहिता में भी इसी दृष्टि से चिकित्सास्थान से पूर्व इन्द्रिय स्थान दिया गया है ।।१-२।।

ओषधं भेषजं प्रोक्तं द्विप्रकारं चिकित्सितम्। तयोर्विशेषं वक्ष्यामि भेषजौषधयोर्द्वयोः ।।३।।

चिकित्सा दो प्रकार की कही है (१) ओषध चिकित्सा। (२) भेषज चिकित्सा। अब मैं ओषध तथा भेषज दोनों के अन्तर-भेद को कहता हूँ ।।३।।

ओषधं द्रव्यसंयोगं ब्रुवते दीपनादिकम्। हुतव्रततपोदानं शान्तिकर्म च भेषजम् ।।४।।

औषध तथा भेषज का अन्तर-दीपन आदि द्रव्यों के संयोग से जो चिकित्सा की जाती है उसे औषध कहते हैं तथा होम, व्रत, तप, दान एवं शान्ति कर्म आदि को भेषज कहते हैं ।।

उभयं तद्यदा जन्तोः कृतं न कुरुते गुणम्। क्षीणायुरिति सं(तं)ज्ञात्वा न चिकित्सेद्विचक्षणः ।।५।।

इन दोनों चिकित्साओं द्वारा चिकित्सा किये जाने पर भी यदि रोगी को लाभ न हो तो बुद्धिमान व्यक्ति उसे क्षीणायु

औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ] इन्द्रियस्थानम् १३१

(गतायु मरणासन्न) जाने तथा उसकी चिकित्सा न करे। चिकित्सा द्वारा गतायुष रोगी को लाभ क्यों नहीं होता इसके लिये सुश्रुत सू. अ. ३१ में कहा है—प्रेता भूताः पिशाचाश्च रक्षांसि विविधानि च। मरणाभिमुखं नित्यमुपसर्पन्ति मानवम् ॥ तानि भेषजवीर्याणि प्रतिघ्नन्ति जिघांसया। तस्मान्मोघाः क्रियाः सर्वा भवन्त्येव गतायुषाम् ॥५॥

यस्य गोमयचूर्णाभं चूर्णं मूर्धनि जायते। सस्नेते भ्रश्यते चैव मासान्तं तस्य जीवितम् ॥६॥

जिस मनुष्य के सिर पर गोबर के चूर्ण के सदृश तथा स्निग्ध चूर्ण हो जाता है और स्वयं विलीन हो जाता है, उसका जीवन एक मास अवशिष्ट समझना चाहिये। चरक इन्द्रिय अ. १२ में भी यह श्लोक बिलकुल इसी रूप में दिया गया है। इसी प्रकार सुश्रुत में भी कहा है—गोमयचूर्णप्रकाशस्य वा रजसो दर्शनमुत्तमाङ्गे बिलयनञ्च ॥६॥

कुक्षिः स्नातानुलिप्तस्य पूर्वं यस्य विशुष्यति। आर्द्वेषु सर्वगात्रेषु मासार्धं तस्य जीवितम् ॥७॥

जिस पुरुष के स्नान तथा अनुलेपन (चन्दन आदि का लेप) के बाद अन्य अङ्गों के गीला रहते हुए सबसे पूर्व कुक्षि (कोख) सूख जाती है। वह १५ दिन तक जीवित रहता है। चरक इन्द्रिय स्थान १२ में कुक्षि के स्थान पर उर (छाती) पढ़ा गया है—यस्य स्नानानुलिप्तस्य पूर्वं शुष्यत्युरोभृशम्। आर्द्वेषु सर्वगात्रेषु सोऽर्धमासं न जीवति ॥ इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. ३२ में कुक्षि के स्थान पर हृदय पढ़ा है—"प्राग्विशुष्यमाणहृदय आर्द्रशरीरः” ॥७॥

स्वप्नाधिपानगो नाशो ज्योतिषां पतनानि च। अग्निदाहोपशान्तिश्च पतनं गृहवृक्षयोः ॥८॥
गुहाटवीप्रवेशश्च स्वप्नं स्वप्ने विगर्हितम्। कृष्णां दण्डधरां नग्नां मुण्डां लोहितलोचनाम् ॥९॥
स्वप्ने दृष्ट्वैव जानीयाद्यमदूतानुपस्थितान्।

जो मनुष्य स्वप्न की अवस्था में नग (पर्वत) का नाश, ज्योतिवाले पदार्थों का गिरना, अग्निदाह से शान्ति, गृह एवं वृक्षों का पतन, गुफा तथा जंगल में प्रवेश और निन्दित स्वप्न देखता है तथा जो स्वप्न में काले रंग वाली, दण्ड को धारण करने वाली, नग्न मुण्डित (सिर जिसका मुंडा हुआ है) तथा लाल आंखों वाली स्त्री को देखता है-वह यम के दूतों को उपस्थित जाने अर्थात् मृत्यु को सन्निकृष्ट समझे ॥८-९॥

दीर्घकेशस्तननखीं विरागकुसुमाम्बराम् ॥१०॥
स्वप्ने दृष्ट्वा स्त्रियं कृष्णां कालरात्रीं निवेदयेत्।

स्वप्न में लम्बे बाल, लम्बे स्तन तथा लम्बे नखों वाली, विराग (विकृत रंग अथवा लाल रंग के) पुष्प एवं नक्षत्रों वाली, काली स्त्री को देखकर उसे कालरात्रि समझे अर्थात् उस रात्रि को कालरात्रि अथवा अन्तिम रात्रि समझे ॥१०॥

गन्धान् पुष्पाणि वासांसि या रक्तानि निषेवते ॥११॥
यदा स्वप्ने शिशुर्वादपि तदा स्कन्दग्रहाद्द्वयम्।
मयूरं कुक्कुटं बस्तं मेषं वा योऽधिरोहति ॥१२॥
रक्तार्चितः सहैतैर्वा तत्रापि स्कन्दतो भयम्।
घण्टां पताकां यः स्वप्ने विध्वस्तां भुवि पश्यति ॥१३॥
शयनं शोणिताक्तं वा तत्रापि स्कन्दतो भयम्।

अब ग्रहों द्वारा आक्रान्त शिशु के लक्षण कहे जाते हैं—स्कन्दग्रह—जब माता या शिशु स्वप्न में गन्ध वाले पदार्थ तथा लाल रंग के पुष्प एवं वस्त्रों को धारण करते हैं। अथवा बालक स्वप्न में मोर, मुर्गे, बकरे तथा मेंढे पर सवार होता है तथा रक्तचन्दन द्वारा उसका शरीर अर्चित हो। अथवा बालक स्वप्न में घण्टे तथा पताका को भूमि पर विध्वस्त

१३२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ]

हुआ (फटा हुआ तथा नीचे गिरा हुआ) देखे तथा शयन (बिस्तरे) को रक्त से गीला देखे तो उस अवस्था में स्कन्दग्रह का भय समझना चाहिये ॥११-१३॥

रक्तपुष्पाम्बरधरा रक्तचन्दनरूषिता ।। १४ ।। नृत्यते सह भूतैर्वा स्कन्दापस्मारतो भयम् ।

यदि माता स्वप्न में लाल पुष्प तथा वस्त्रों को धारण करके तथा शरीर पर रक्तचन्दन का लेप करके भूतों (पिशाच आदियों) के साथ नृत्य करे तो उस अवस्था में स्कन्दापस्मार (स्कन्दसखा अथवा विशाख) का भय समझना चाहिये ॥१४॥

रक्तपद्मवनं प्राप्य धात्र्यात्मानं यदाऽर्चति ।। १५ ।। बालं वा पद्ममालाभिस्तदा स्कन्दपितुर्भयम् ।

यदि धात्री लाल कमल के वन में पहुंच कर पद्ममालाओं के द्वारा अपनी अथवा बालक की अर्चना करे तो स्कन्द के पिता अर्थात् त्रिपुरारि महादेव का भय समझना चाहिये ॥१५॥

रक्तपुष्पवनं धात्री स्वप्नेऽग्निं वा यदा विशेत् ।। १६ ।। दह्यते वाऽग्निना बालः पौण्डरीकाद्भयं तदा ।

पुण्डरीक—यदि धात्री स्वप्न में लाल फूलों वाले वन में अथवा अग्नि में प्रवेश करे तथा उसका शिशु अग्नि में जलाया जाता हो तो उस अवस्था में पुण्डरीक का भय समझना चाहिये ॥१६॥

समुद्रादिषु तोयेषु निमग्ने रेवतीभयम् ।। १७ ।। रेवती—स्वप्न में यदि बालक समुद्र आदि में अथवा अन्य जलों में डूबे-तो रेवती का भय समझना चाहिये ॥१७॥

शुष्ककूपनदीदर्श निहन्याच्छुष्करेवती । मांसादान् पक्षिणोदृष्ट्वा शकुन्या ब(व)ध्यते शिशुः ।। १८ ।। शुष्क रेवती—यदि स्वप्न में सूखे हुए कूंए तथा नदी का दर्शन हो तो शिशु शुष्क रेवती से आक्रान्त हुआ मर जाता है। शकुनी—यदि स्वप्न में मांसभक्षी पक्षियों (गिद्ध-बाज आदि) को देखे तो वह शकुनि द्वारा मार दिया जाता है ॥१८॥

अवडीनाभिदष्टस्तु सद्यो मरणमृच्छति । हरितालादिभी रङ्गैर्मण्डितः पीतकाम्बरः ।। १९ ।। मांसलोऽलङ्कृतः स्वप्ने तं हन्ति मुखमण्डिका ।

मुखमण्डिका—यदि बालक स्वप्न में किसी पक्षी के द्वारा काटा जाता है तो वह शीघ्र मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। स्वप्न में हरिताल आदि के रंगों से यदि आकाश को पीला रंगा हुआ देखता है तथा मांस का सेवन और अलंकारों (आभूषणों) को धारण करता है—उसे मुखमण्डिका नामक ग्रह मार देता है ॥१९॥

नक्षत्रग्रहचन्द्रार्कतारकाऽक्षिकनीनिकाः ।। २० ।। दृष्ट्वा प्रपतिताः स्वप्ने पूतनाभ्यो भयं भवेत् ।

पूतना—यदि स्वप्न में नक्षत्र, ग्रह, चन्द्र, सूर्य, तारे तथा आंखों की पुतलियां नीचे गिरी हुई दिखाई दें-तो पूतना का भय समझना चाहिये ॥२०॥

सर्वाण्येतानि रूपाणि नैगमेष्यां प्रपश्यति ।। २१ ।।

नैगमेष—ये ही पूर्वोक्त सब लक्षण नैगमेष ग्रह के होते है ॥२१॥

औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ] इन्द्रियस्थानम् १३३

कीटवृश्चिकसर्पैर्वा दष्टः स्याद्विषमृत्युःकः१। श्वभिर्दुष्टैः खरैर्वाऽपि दक्षिणां याति मुण्डितः ।।२२।।
कृष्यते मृद्यते तैर्वा ज्वरस्यान्तस्तदुच्यते ।

ज्वर के मारक रूप—यदि स्वप्न में कीड़े, बिच्छू अथवा सर्प के द्वारा काटा जाकर विष से मृत्यु हो जाय अथवा मुण्डित हुआ कुत्ते, दुष्टप्राणी अथवा गदहों द्वारा दक्षिण दिशा की ओर ले जाया जाता हो तथा उन्हीं के द्वारा रोगी खींचा जाता हो तथा उसका मर्दन किया जाता हो तो वह रोगी ज्वर के द्वारा समाप्त हो जाता है। अर्थात् ज्वर के द्वारा उसकी मृत्यु हो जाती है ।।२२।।

प्रार्थितं कल्पितं दृष्टमनुभूतं श्रुतं च यत् ।।२३।।
भावितः पश्यति स्वप्ने ह्रस्वं दीर्घं दिवा च यत् ।
अफलाः सर्व एवैते निदानोक्तास्तु दोषजाः ।।२४।।

स्वप्नों के प्रकार—जो स्वप्न (१) प्रार्थित (२) कल्पित (३) दृष्ट (४) अनुभूत (५) श्रुत एवं (६) भावित होते हैं तथा (७) जो अत्यन्त छोटे (८) जो अत्यन्त लम्बे (९) जो स्वप्न दिन में देखे जाने वाले तथा (१०) जो निदान स्थान में दोषज (वातादि दोषों से उत्पन्न होने वाले) कहे गये हैं—ये सब स्वप्न निष्फल होते हैं। चरक इन्द्रिय अ. ५ में ७ प्रकार के स्वप्न कहे हैं—दृष्टं श्रुतानुभूतं च प्रार्थितं कल्पितं । तथा भाविकं दोषजं चैव स्वप्नं सप्तविधं विदुः ।। तत्र पञ्चविधं पूर्वमफलं भिषगादिशेत् । दिवा स्वप्नमतिह्रस्वमतिदीर्घं तथैव च ।। अरुणदत्त ने इन सातों स्वप्नों का अपनी टीका में निम्न विवरण दिया है—१. दृष्टं—यश्चक्षुषा जाग्रदवस्थायां किंचिद् वस्तुजातं दृष्ट्वा तदानीं सुप्तावस्थायां तादृशं वस्तुजातं संवित्तिरूपतयाऽनुभूयते स ‘दृष्ट’ उच्यते। दृष्ट स्वप्न वह होता है जिसे हम कभी भी जागृत अवस्था में देख चुके हों। २. श्रुत—यश्च शब्दमात्रेण वस्तुजातं श्रोत्रेन्द्रियेण गृह्यते तदिदानीं सुप्तावस्थायां तादृक्संवित्तिरूपतयाऽनुभूयते स ‘श्रुत’ उच्यते। जिसे हम पहले कभी सुन चुके हों। ३. अनुभूत—यस्तु जाग्रदवस्थायां यथायथमिन्द्रियैरनुभूयते सुप्तावस्थायां तादृगन्तः संवित्तिरूपतयाऽनुभूयते सोऽ ‘नुभूत’ उच्यते। जो कभी हमारे अनुभव में आया हो। ४. प्रार्थित—यस्मिन् दृष्टे श्रुतेऽनुभूते वा यत्पूर्वं जाग्रदवस्थायां वस्तुजातं मनसाऽभ्यर्थ्यते तथैव च सुप्तावस्थायामन्तः संवित्तिरूपतयाऽनुभूयते स ‘प्रार्थित’ उच्यते। जिसकी हमें जागृत अवस्था में आकांक्षा होती है। ५ कल्पित—यस्तु षड्भिः प्रत्यक्षानुमानादिभिर्न दृष्टो नापि श्रुतो नाप्यनुमतो दृष्टश्रुतानुभूतत्वाभावादेव न च प्रार्थितोऽपि तु केवलं मनसा यथेच्छमुत्प्रेक्ष्य यत्किंचनरूपाभिः कल्पनाभिः कल्पितो जाग्रदवस्थायां वस्तुजातान्तः संवित्तावपारूढस्तदानीं सुप्तावस्थायां तादृगनुभूयते स “कल्पितः” । जिसकी पहले हम कभी कल्पना कर चुके हैं। ६. भाविक—यश्च दृष्टश्रुतादिभ्यः स्वप्नेभ्योऽन्यो विलक्षणः स्वप्नो यथा दृश्यते सुप्तावस्थायामुत्तरकालं तथैव स्वप्नदर्शिना नरेण तन्मुखाबगततदर्थैरपि प्रत्यक्षतो दृश्यते स ‘भाविकः’। जो भावी शुभ या अशुभ फलों के सूचक होते हैं। ७. दोषज—दोषजः स स्वप्नो यो वातजः पित्तजः कफजो वा यथायथं दोषाणामनुरूपोऽन्तः संवित्ताव्नुभूयते स ‘दोषज’ उच्यते। अर्थात् जो वातादि दोष से उत्पन्न होते हैं। इन उपर्युक्त ७. प्रकार के स्वप्नों में से प्रथम पांच (अर्थात् दृष्ट, श्रुत, अनुभूत, प्रार्थित तथा कल्पित) तथा अत्यन्त लम्बे, अत्यन्त छोटे तथा दिवास्वप्न निष्फल माने गये हैं अर्थात् इन स्वप्नों का कोई फल नहीं होता है। शेष दोनों अर्थात् भाविक और दोषज फलप्रद होते हैं। चरक संहिता में दोषज स्वप्न को फलप्रद माना है परन्तु इस संहिता में उपर्युक्त श्लोक में दोषज स्वप्न को


१. यहां कीटादि का दंश विष के द्वारा मृत्यु का सूचक बताया गया है। इसके विपरीत सुश्रुत में ‘उरगो वा जलौको वा भ्रमरो वाऽपि यं दंशेत्। आरोग्यं निर्दिशेत्तस्य धनलाभं च बुद्धिमान् ।। इत्यादि शुभ फलों का सूचक श्लोक मुद्रित पुस्तक में मिलता है परन्तु सुश्रुत की ताडपत्र पुस्तक में यह श्लोक नहीं है।

१३४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ]

भी निष्फल माना है। अष्टाङ्गहृदय में भी प्रकृति के अनुकूल दोषज स्वप्न को निष्फल ही माना है। यदि पित्त प्रकृति के मनुष्य को पित्तानुकूल स्वप्न आये तो वह दोषज होने पर भी प्रकृति के अनुकूल होने से निष्फल ही होता है। वहां कहा है—‘‘तेष्वद्या निष्फलाः पञ्च यथा स्वप्रकृतिर्दिवा विस्मृतो दीर्घह्रस्वोऽति’’ ।।

यथा तु फलवान् स्वप्नो वृद्धजीवक ! तच्छृणु । अदृष्टमश्रुतानुक्तमकल्पितमभाषितम् ।। २५ ।। कार्यमात्रं च यः स्वप्नो जीर्णान्ते फलवांस्तु सः । एतांश्चान्यांश्च दुःस्वप्नान् दृष्ट्वा रोगी विनश्यति ।। २६ ।। स्वस्थस्तु संशयं गत्वा धर्मशीलो विमुच्यते ।

हे वृद्धजीवक ! जिस प्रकार के स्वप्न फल वाले (फलप्रद) होते हैं वे तू मेरे से सुन । १. अदृष्ट—जो कभी देखा न हो । २. अश्रुत—जो कभी सुना न हो । ३. अनुक्त—जो कभी कहा न गया हो । ४. अकल्पित—जिसकी कभी कल्पना न की गई हो तथा ५. अभाषित—जिसका कभी भाषण न किया गया हो । तथा ६. जो केवल कार्यमात्र हों अर्थात् जिनका देखना सुनना आदि कोई कारण विद्यमान न हों । समाप्त होने के बाद ये उपर्युक्त स्वप्न फलवाले होते हैं । इन उपर्युक्त तथा अन्य भी दुःस्वप्नों (बुरे स्वप्नों) को देखने से रोगी नष्ट हो जाता है अर्थात् जो रोगी इन बुरे स्वप्नों को देखता है उसकी मृत्यु हो जाती है तथा स्वस्थ व्यक्ति का जीवन संशय में पड़ जाता है । इससे केवल धर्मपरायण व्यक्ति ही बच सकता है । चरक इन्द्रिय अ. ५ में कहा है—इत्येते दारुणाः स्वप्ना रोगी यैर्याति पञ्चताम् । अरोगः संशयं गत्वा कश्चिदेव विमुच्यते ।। इसी प्रकार सुश्रुत सू. अध्याय २९ में भी कहा है—स्वस्थः स लभते व्याधिं व्याधितो मृत्युमृच्छति ।। २५-२६।।

यद्यदेव द्विजादीनां स्वप्ने शीतकृशात्मनाम् ।। २७ ।। मलिनाम्बरपुष्पाणां दर्शनं न प्रशस्यते । तेषामेव तु हृष्टानां शुद्धपुष्पाम्बरात्मनाम् ।। २८ ।। दर्शनं शस्यते स्वप्ने तैश्च संभाषणं शुभम् ।

अब शुभ फल वाले स्वप्न कहे जायेंगे—शीत (ठण्डे) एवं कृश शरीर वाले जिन द्विज (ब्राह्मण) आदियों का मैले वस्त्र तथा मैले रंग के पुष्प धारण किये हुए दर्शन प्रशस्त नहीं माना गया है । वे ही यदि स्वप्न में प्रसन्न तथा शुद्ध (श्वेत) पुष्प एवं वस्त्र धारण किये हुए दिखाई दें तथा उनसे बातचीत हो तो शुभ माना जाता है ।।२७-२८।।

प्रासादवृक्षशैलांश्च हस्तिगोवृषपूरुषान् ।। २९ ।। अधिरोहन्ति ये स्वप्ने तेषां स्वस्त्ययनं कृतम् ।

स्वप्न में जो प्रासाद (महल), वृक्ष, पर्वत, हाथी, गौ, वृष (बैल) तथा पुरुष की सवारी करते हैं उनका स्वस्त्ययन (कल्याण) होता है ।।२९।।

सूर्यसोमाग्निविप्राणां नृणां पुण्यकृतां गवाम् ।। ३० ।। मत्स्यामिषस्य चाषस्य दर्शनं पुण्यमुच्यते ।

स्वप्न में सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, विप्र (ब्राह्मण), पुण्यवाले मनुष्य, गौ, मछली के मांस तथा चाष नाम की मछली के दर्शन शुभ माने जाते हैं ।।३०।।

शुक्लपुष्पाददर्शच्छत्रग्रहणं तोयलङ्घनम् ।। ३१ ।। स्वरक्तदर्शनं चैव सुरापानं च शस्यते ।

औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ] इन्द्रियस्थानम् १३५

स्वप्न में श्वेत पुष्प, आदर्श (दर्पण-शीशा) तथा छत्र (छाते का धारण करना) एवं पानी (नदी आदि) को लांघना, अपने रक्त का दर्शन तथा सुरापान प्रशस्त माना जाता है ॥३१॥

गवाश्वरथयानं च यानं पूर्वोत्तरेण च ।।३२।।
रोदनं पतितोत्थानं रिपूणां निग्रहस्तथा ।
पङ्ककूपगुहाभ्यश्च समुत्तारोऽध्वनस्तथा ।।३३।।
एवंविधानि चान्यानि सिद्धये मुनयोऽब्रुवन् ।

गौ तथा घोड़े के रथ पर सवार होना, पूर्व तथा उत्तर दिशा की ओर जाना, रोना, गिर कर पुनः उठना, शत्रुओं का दमन, कीचड़, कुएं, गुहा तथा मार्ग से पार होना—इत्यादि तथा इसी प्रकार के अन्य स्वप्नों को मुनियों ने सिद्धि (फल) वाला कहा है ॥३२-३३॥

अदारुणत्वं रोगाणां वैद्यभैषज्यसंभवम् ।।३४।।
धृतिर्जन्मानुकूल्यं च सत्त्वं धर्मश्च भूतये ।

इस प्रकार के स्वप्नों से रोग भयंकर नहीं होते । वैद्य तथा भैषज्य द्वारा अच्छे हो जाते हैं । धारण शक्ति बढ़ती है, जन्म की अनुकूलता होती है अर्थात् व्यक्ति स्वस्थ होकर जीवित रहता है तथा सत्त्व, धर्म एवं भूति (कल्याण) की वृद्धि होती है । चरक इन्द्रिय अ. ५ में शुभ फलवाले निम्न स्वप्न दिये हैं—दृष्टः प्रथमरात्रे यः स्वप्नः सोऽल्पफली भवेत् । न स्वपेद्यः पुनर्द्दष्ट्वा स सद्यः स्यान्महाफलः ।। अकल्याणमपि स्वप्नं दृष्ट्वा तत्रैव यः पुनः । पश्येत्सौम्यं शुभाकारं तस्य विद्याच्छुभं फलम् ।। रात्रि के पहले प्रहर में देखा हुआ स्वप्न अल्प फलवाला होता है । परन्तु स्वप्न देखने के पश्चात् यदि फिर निद्रा न आये तो वह स्वप्न महाफल वाला होता है । इसी प्रकार अशुभ स्वप्न देखने के पश्चात् यदि उसी समय दूसरा शुभ स्वप्न आ जाय तो उसका अशुभ फल नष्ट होकर शुभ फल ही होता है। इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. २९ में भी शुभस्वप्नों का निर्देश किया गया है—अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि प्रशस्तं स्वप्नदर्शनम् । देवान् विद्वान् गोवृषभान् जीवितः सुहृदो नृपान् ।। समिद्धमग्निं साधूंश्च निर्मलानि जलानि च । पश्येत् कल्याणलाभाय व्याधेरपगमाय च ।। मांसं मत्स्यान् स्त्रजः श्वेता वांसासि च फलानि च । लभन्ते धनलाभाय व्याधेरपगमाय च ।। महाप्रासादसफलवृक्षवारणपर्वतान् । आरोहेद् द्रव्यलाभाय व्याधेरपगमाय च ।। नदीनदसमुद्रांश्च क्षुभितान् कलुषोदकान् तरेत् कल्यांणलाभाय व्याधेरपगमाय च ।। उरगो वा जलौको वा भ्रमरो वाऽपि यं दशेत् । आरोग्यं निर्दिशेत्तस्य धनलाभं च बुद्धिमान् ।। एवं रूपान् शुभान् स्वप्नान् यः पश्येदृत्याधितो नरः । स दीर्घायुरिति ज्ञेयस्तस्मै कर्म समाचरेत् ॥३४॥

दृष्ट्वा स्वप्नान् दारुणांन्वेतरान् वा पूतः स्नातः सर्षपानग्निवर्णान् ।
हुत्वा सावित्र्या सर्पिषाक्तांस्तिलांश्च पूतः पापैर्मुच्यते व्याधिभिश्च ।।३५।।

अशुभ स्वप्नों का परिहार—इन दारुण अथवा इसी प्रकार के अन्य स्वप्नों को देखने के बाद व्यक्ति को स्नान द्वारा पवित्र होकर अग्नि के वर्ण वाले सर्षप (सरसों) तथा घी से मुक्त तिलों को सावित्री (गायत्री मन्त्र) के द्वारा अग्नि में आहुति देनी चाहिये । इससे वह पवित्र हो जाता है तथा पाप एवं व्याधियों से मुक्त हो जाता है । सुश्रुत सू. अ. २९ में भी अशुभ स्वप्नों का परिहार दिया गया है—स्वप्नानेवं विधान् दृष्ट्वा प्रतरुत्थाय यत्नवान् । दद्यान्माषांस्तिलांल्लोहं विप्रेभ्यः काञ्चनं तथा ।। जपेच्चापि शुभान् मन्त्रान् गायत्रीं त्रिपदां तथा । दृष्ट्वा तु प्रथमे यागे स्वप्याद् ध्यात्वा पुनः शुभम् ।। जयेद्वाऽन्यतमं देवं ब्रह्मचारी समाहितः । न चाचक्षीत कस्मैचिद् दृष्ट्वा स्वप्नमशोभनम् ।। देवतायतने चैव वसेद्रात्रित्रयं तथा । विप्रांश्च पूजयेन्नित्यं दुःस्वप्नात् प्रविमुच्यते ॥३५॥

१३६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ]

कौमारभृत्यमतिवर्धनमुक्तमेतज्ज्ञात्वा हि देहगतमिन्द्रियमादिरूपैः । श-श्चिकित्सितपरांस्तु विवर्जयध्वं शास्त्रं च धर्ममतयः परिपालयध्वम् ।। ३६ ।।

यह कौमारभृत्य सब से अधिक विशिष्ट (प्रशस्त) कहा गया है। अपने प्रारंभिक रूपों (लक्षणों) के द्वारा रोगी के देहगत इन्द्रियों (अरिष्टों) को जानकर सब चिकित्सकों को चाहिये कि वे रोगी को छोड़ दें अर्थात् उसकी चिकित्सा न करें तथा धर्ममति (धर्म में बुद्धि वाला) होकर शास्त्रों का पालन करना चाहिये। अर्थात् अरिष्ट लक्षण उत्पन्न हो जाने पर चिकित्सा से कोई लाभ नहीं होता है इसलिये इस अवस्था में व्यर्थ में चिकित्सा के पीछे न पड़कर धर्म-कर्म एवं शास्त्रों में मन लगाना चाहिये। संभवतः इससे कुछ लाभ हो सके।

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

(इति) वृद्धजीवकीये कौमारभृत्ये वास्त्वप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने औषधभेषजीयं नामेन्द्रियम् ।। समाप्तानि चेन्द्रियाणि ।।

(इन्द्रियस्थानस्यायमन्तिमोऽध्याय एवोपलब्धः)