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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

प्लीहहलीमकचिकित्सिताध्यायः ? ] | चिकित्सास्थानम् | १५७

क्षयं श्वासं हिक्कां च विषमज्वरम् ।। हन्यात्तथाऽशौंग्रहणी हृद्रोगारुचिपीनसान् अगस्त्यविहितं श्रेष्ठं रसायनमिदं शुभम् ।। (ii) चरक चि. अ. १६ में भी हलीमक रोग की चिकित्सा निम्न प्रकार दी है—गुडूचीस्वरसक्षीरसाधितं माहिषं घृतम्। स पिबेत् त्रिवृतां स्निग्धो रसेनामलकस्य तु ।। विरिक्तो मधुर प्रायं भजेत्पित्तानिलापहम् ।। द्राक्षालेहं च पूर्वोक्तं सर्पीषि मधुराणि च । यापन्नक्षीरबस्तींश्च शीलयेत्सानुवासनान् ।। मृद्वीकारिष्टयोगांश्च पिबेद्युक्त्याऽग्निवृद्धये । कासिकं चाभयालेहं पिप्पलीं मधुकं बलाम् । पयसा च प्रयुञ्जीत यथादोषं यथाबलम् ।।

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।

(इति) प्लीहाहलीमकचिकित्सतम् ।

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

**वक्तव्य—**इस अध्याय में नाम के अनुसार प्लीहारोग (प्लीहोदर-प्लीहावृद्धि) तथा हलीमक रोग की चिकित्सा होनी चाहिये । परन्तु इस अध्याय के प्रारम्भिक भाग के खण्डित होने से उपलब्ध अध्याय में प्लीहारोग का बिलकुल वर्णन नहीं है । इसमें केवल हलीमक रोग की चिकित्सा ही है । हलीमकरोग-पाण्डु, कामला तथा कुम्भकामला का ही प्रवृद्ध रूप है । चरक चि. अ. १६ में हलीमकरोग का निम्न स्वरूप दिया है—यदा तु पाण्डोर्वर्णः स्याद्धरितश्यावपीतकः । बलोत्साहक्षयस्तन्द्रा मन्दाग्नित्वं मृदुज्वरः ।। स्त्रीष्वहर्षोऽङ्गमर्दश्च श्वासस्तृष्णाऽरुचिर्भ्रमः । हलीमकं तदा तस्य विद्यादनिलपित्ततः ।। सुश्रुत उ. अ. ४४ में भी कहा है—तं वातपित्ताद्धरिपीतनीलं हलीमकं नाम वदन्ति तज्ज्ञाः ।। अर्थात् हलीमक रोग वात तथा पित्त से होता है । इसीलिये प्रकृत ग्रन्थ में वातिक तथा पैत्तिक हलीमक रोग की पृथक् चिकित्सा दी है। अब हम प्लीहारोग का वर्णन करते हैं प्लीहारोग से अभिप्राय प्लीहा (Spleen) की वृद्धि (Entargement) है । चरक चि. अ. १३ में इस वृद्धि के निम्न कारण दिये हैं—अशितस्यातिसंक्षोभाद्यानपापातिचेष्टितैः । अतिव्यवायभाराध्ववमनव्याधिकर्शनैः ।। वामपार्श्वश्रितः प्लीहा च्युतः स्थानात्प्रवर्धते । शोणितं वा रसादिभ्यो विवृद्धं तं विवर्धयेत् ।। अर्थात् भोजन के पश्चात् सवारी आदि अत्यधिक शारीरिक चेष्टाओं के कारण प्लीहा की वृद्धि हो जाती है । प्लीहावृद्धि का स्वरूप—तस्य प्लीहा कठिनोऽष्ठीलेवादौ वर्धमानः कच्छपसंस्थान उपलभ्यते, स चोपेक्षितःक्रमेण कुक्षिं जठरम रन्यधिष्ठानं च परिक्षिपन्नुदरमभिनिर्वर्तयति । अर्थात् प्लीहा कठिन होकर आकार में बढ़ जाती है तथा कुक्षि आदि को घेर लेती है। प्लीहावृद्धि के लक्षण—तस्य रूपाणि—दौर्बल्यारोचकाविपाकवर्चोमूत्रग्रहतमःप्रवेशपिपासाऽङ्गमर्द्दच्छर्द्दिमूर्च्छाऽङ्गसादकासश्वास मृदुज्वरानाहाग्निनाशकार्श्यास्य-वैरस्यपर्वभेदाः कोष्ठे वातशूलं चापि चोदरमरुणवर्णं विवर्णं वा नीलहरितहारिद्रराजिमद्भवति । सुश्रुत नि. अ. ७ में इस रोग की सम्प्राप्ति निम्न प्रकार से दी है—विदाह्यभिष्यन्दिरतस्य जन्तोः प्रदुष्टमत्यर्थमसृक् कफश्च । प्लीहाभिवृद्धिं सततं करोति प्लीहोदरं तत्रवदन्ति तज्ज्ञाः ।। वामे च पार्श्वे परिवृद्धिमेति विशेषतः सीदति चातुरोऽत्र । मन्दज्वराग्निः कफपित्तलिङ्गैरुपद्रुतः क्षीणबलोऽतिपाण्डुः ।। प्लीहा वृद्धि की चिकित्सा च. चि. अ. १३ में कहा है—चिकित्सां संप्रकुर्वीत यथादोषं यथाबलम् । स्नेहं स्वेदं विरेकं च निरूहमनुवासनम् ।। समीक्ष्य कारयेद्राह्वौ वामे वा व्यधयेत् शिराम् ।। अर्थात् प्लीहावृद्धि में स्नेहन, स्वेदन, विरेचन, अनुवासन कराना चाहिये तथा वाम बाहु में शिरावेध कराना चाहिये ।। सुश्रुत चि. अ. १४ में भी कहा है—“प्लीहोदरिणः स्निग्धस्विन्नस्य दध्ना भुक्तवतो वामबाहौ कूर्पराम्यन्तरतः शिरां विध्येद्दिमर्दयेत् पाणिना प्लीहानं रुधिरस्यन्दनार्थम्” इसी प्रकार इसमें षट्पल अथवा क्षीरषट्पल घृत, रोहितक घृत, गुडहरीतकी, पिप्पलीवर्धनमान, आदि का भी प्रयोग किया जाता है । तथा वात और कफ की प्रधानता में चरक में अग्निकर्म का विधान भी दिया है कहा भी है—“अग्निकर्म च कुर्वीत भिषग्वातकफोल्वणे” ।

(इति) प्लीहाहलीमकचिकित्सिताध्यायः ।

१५८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् उदावर्त्तचिकित्सिताध्यायः ? ]

उदावर्त्तचिकित्सिताध्यायः ।

अथात उदावर्त्तचिकित्सितमध्यायं व्याख्यास्यामः ।। १ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। २ ।।

अब हम उदावर्त चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।। १-२ ।।

कषायकटुतिक्तरूक्षशीतपूतिशुष्कशाकवल्लूरपिण्याकसुनिषण्णकदुग्धिकाकोद्रवश्यामाकनीवारयवककट्ट (?) वेत्राग्रकर्कन्धूकपित्थबिल्वकरीरगाङ्गेरुकीलिकुचपारावतभव्यकाञ्जिकशुक्तारनालतुषोदकमुद्गकलायात-सीप्रभृतिनिषेवणाद्रूक्षात्मनो वातभूयिष्ठप्रकृतेर्वेगविधारणादनिलः प्रकुपितो देहमूर्ध्वमुदामृत्य वायुनोदानेन प्रत्याहतो गुदमासाद्याशयं कृत्वाऽधोवहानि स्रोतांसि दूषयित्वा विण्मूत्रकफपित्तानिलशुक्रमार्गानुपपरुणद्धि, तत् सानाहमुपजनयति प्राणहरं, तल्लक्षणं वा। क्षीरमुपसेवमानस्य शिशोरचिरं वा कटीधारणद्वस्ति-गुदसंरोधनादतिरोदनात् प्रजागरादस्नेहात्क्षीरानुपसेवनाद्वेगविधारिण्या उपवासप्रमिताशनविषमाशनप्रजागर-चित्तेर्ष्याव्यायामनित्यायाः क्षीरमामोद्यते वायुना; तत् पीयमानमुदावर्तय संपद्यते । तत्र षडुदावर्ताः । वातविण्मूत्रशुक्रच्छर्दिक्षवथूनां संधारणादप्रवृत्तेश्च षण्णां षडुच्यन्ते । तदुदावर्तसामान्यात्तु तमेकमेवाहुरेके । तेषां नवेगान्धारणीयेऽध्याये लक्षणान्यौषधानि चोक्तानि । तानीहापि तु दारुणत्वादस्य व्याधेर्यत्किञ्चिदुपदेक्ष्यामः । शूलमूर्च्छादाहानाहाध्मानानि, प्रवृत्तिद्वेषो, वैवर्ण्यं, संज्ञानाशस्खलनपतनविलपनतृष्णाहिक्काश्वास-प्रस्वेदाऽङ्गारपरिकर्तिकाभिरभीक्ष्णं बाध्यते, बस्तिगुदहृदयपार्श्ववङ्क्षणोदरशूलमूरुसादो व्यथा चेत्युदा-वर्तलक्षणानि । पञ्चादौ पूर्वरूपाणि भवन्ति ।। ३ ।।

आनाह का हेतु-कषाय, कटु, तिक्त, रूक्ष, शीत, पूति (दुर्गन्धयुक्त) द्रव्य, सूखे शाक, वल्लूर (सूखा मांस), पिण्याक (खल), सुनिषण्णक (चौपतिया Marsilea-Inradrifolia), दुग्धिका (दुद्धी), कोद्रव (कोदों), श्यामाक, नीवार, जौ, कक्कट्ट (?), वेत्राग्र (बेंत का अग्रभाग) कर्कन्धू, कैथ, बिल्व, करीर (टैंट), गांगेरुकी (गंगोठ) कटहल, पारावत (कबूतर अथवा एक प्रकार का फल-फालसा), भव्य (एक प्रकार का फल), कांजी, सिरका, आरनाल (कांजी का भेद), तुषोदक, मृग, कलाय (मटर) तथा अलसी आदि के सेवन से रूक्ष तथा वातप्रकृति वाले पुरुष के मलमूत्रादि के वेगों को धारण करने से प्रकुपित हुआ वायु शरीर के ऊपर की ओर रुका हुआ उदानवायु द्वारा आहत होकर गुदा में पहुंच कर वहां अपना स्थान बनाकर अधोवाही स्रोतों को दूषित करके मल, मूत्र, कफ, पित्त, वायु तथा शुक्र के मार्गों को बन्द कर देता है जिससे प्राणनाशक आनाह अथवा उसके लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। सुश्रुत में आनाह का निम्न स्वरूप दिया है—'आमं शकृद्वा निचितं क्रमेण भूयो विबद्धं विगुणानिलेन । प्रवर्तमानं न यथास्वमेनं विकारमानाहमुदाहरन्ति ।। तस्मिन् भवत्याम समुद्भवे तु' अर्थात् आनाह आमदोष से उत्पन्न होता है। दूध पीने वाले बालक को बहुत देर तक कटि पर धारण करने से अर्थात् गोद में उठाये रखने से, बस्ति तथा गुदा के वेग अर्थात् मल तथा मूत्र को रोकने से, अधिक रोने से, जागरण से, स्नेह की कमी से, तथा दूध के सेवन न करने के कारण मलमूत्र आदि के वेगों को धारण करने वाली तथा नित्य उपवास, प्रमिताशन (मपा हुआ आहार करना) विषनाशन (विषम भोजन), जागरण, चित्त में ईर्ष्या तथा व्यायाम करने वाली स्त्री का दूध वायु के द्वारा विकृत हो जाता है। उस दूध के पीने से शिशु को उदावर्त हो जाता है। चरक चि. अ. २६ में उदावर्त का हेतु तथा संप्राप्ति निम्न प्रकार से दी है—कषायतिक्तोष्णरूक्षभोज्यैः संधारणोदीरणमैथुनैश्च । पक्वाशये कुप्यति चेदपानः स्रोतांस्यधोगानि बली स रुद्ध्वा ।। करोति विण्मूत्रमूत्रसङ्गं क्रमादुदावर्तमतः सुघोरम् ।। अर्थात् कषाय तिक्त आदि भोजनों तथा वेगसंधारण आदि से पक्वाशय में कुपित हुआ अपान वायु अधोगामी स्रोतों में


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उदावर्त्तचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १५९

रुकावट पैदाकर देता है जिससे पुरीष, मूत्र एवं वायु आदि की प्रवृत्ति बन्द हो जाती है। इसे ही उदावर्त कहते हैं। इसी प्रकार सुश्रुत उ. अ. ५५ में भी कहा है। उदावर्त ६ प्रकार के होते हैं। वात, पुरीष, मूत्र, शुक्र, छर्दि (वमन) और क्षवथु (छींक)। इन ६ के रोकने तथा अप्रवृत्ति से ६ प्रकार के उदावर्त होते हैं। इन सबमें उदावर्त के सामान्य होने से कुछ लोग एक ही प्रकार का उदावर्त मानते हैं। चरक सू. अ. १९ में भी ६ प्रकार का ही उदावर्त दिया है—षडुदावर्ता इति—‘वातमूत्रपुरीष शुक्रच्छर्दिक्षवथुजा’। सुश्रुत उ. अ. ५५ में वात मल मूत्र, जृम्भा आदि के रोकने से १३ प्रकार का उदावर्त दिया है। ‘न वेगान्धारणीय’ अध्याय में उपर्युक्त ६ प्रकार के उदावर्तों के लक्षण तथा चिकित्सा दी गई है। इस व्याधि के दारुण (भयंकर) होने से उनमें से कुछ लक्षण यहां भी कहे जाते हैं—शूल (पेट में दर्द), मूर्छा, दाह, आनाह तथा आध्मान (अफारा-Flatulance), प्रवृत्तिद्वेष (किसी चीज में प्रवृत्ति-रुचि न होना), विवर्णता (वर्ण का विकृत होना), संज्ञानाश, स्खलन (फिसलना), पतन (गिरना), विलपन (विलाप करना), तृष्णा, हिक्का, श्वास स्वेद (अधिक पसीना आना), अङ्गारों की तरह जलना, तथा परिकर्तिका (गुदा में कर्तनवत् पीडा अथवा Colic) द्वारा रोगी निरन्तर कष्ट पाता है। बस्ति, गुदा, हृदय, पार्श्व, वंक्षण (कटि) तथा उदर में शूल होती है। उरुसाद (घुटनों में वेदना) तथा व्यथा (पीडा) इत्यादि उदावर्त के लक्षण होते हैं। इनमें से प्रारंभ के पांच अर्थात् शूल, मूर्छा, दाह, आनाह एवं आध्मान—उदावर्त के पूर्वरूप होते हैं। चरक चि. अ. २६ में उदावर्त के निम्न लक्षण दिये हैं—रुग्बस्तिहत्कुक्ष्युरेष्वभीक्ष्णं सपृष्ठपार्श्वेष्वतिदारुणा स्यात्। आध्मानहृल्लासविकर्तिकाश्च तोदोऽविपाकश्च सबस्तिशोथः ॥ वर्चोऽप्रवृत्तिर्जठरे च गण्डान्यूर्ध्वश्च वायुर्विहतो गुदे स्यात्। कृच्छ्रेण शुक्रस्य चिरात्प्रवृत्तिः स्याद्वा तनुः स्यात्खररूक्षशीता ॥

वक्तव्य—आनाह के लिये माधवनिदान में कहा है—आमं शकृद्वा निचितं क्रमेण भूयो विबद्धं विगुणानिलेन। प्रवर्तमानं न यथास्वमेनं विकारमानाहमुदाहरन्ति ॥ आध्मान—के लिये सुश्रुत में कहा है—साटोपमत्युग्ररुजमाध्मातमुदरं भृशम्। आध्मानमिति जानीयाद् घोरं वातनिरोधजम् ॥३॥

पञ्चजनमादावुष्णालवणतैलाभ्यक्तं यथायोगं स्विन्नशरीरं फलवर्तिभिरुपक्रमेत्। विस्त्रंसितं च संतमुष्णस्निग्धमधुरलवणप्रायमशनं यवगोधूमषष्टिकशाकघृतप्रायमानूपौदकमांसप्रायं वाऽऽहारमनुपद्रवाय बलिने उपकल्पयेत्। कोशातकीकक्ष्वलाबुबीजपिप्पलीसैन्धवहिङ्गुवचाहरितालेमनःशिलामाषचूर्णैर्गोमूत्रपिष्टैः फलवर्त्य उपवाता (क्लृप्ता) घृताक्ते कटुतैलाक्ते वा गुदे शलाकया प्रणयेत्। पूर्ववदेव चोपचारः। प्रक्षणाच्छादनपरिशेकाशनानि तानि चास्य स्निग्धोष्णानि विदध्यात्। सक्तुवाट्यकुलमाषापूपवास्तुकयवशाक-सुधापत्रत्रिवृच्छाकपञ्चाङ्गुलश्रीवारिकाश्रीफलासुवर्चलाकाकमाचीकलायपालङ्क्यादिभिश्च शाकैर्घृतसिद्धैर्भोज-येद्यवाग्नम्। त्रिवृत्पीलुयवोत्कारान् वा गोमूत्रेण पाययेत्। त्रिवृद्धरीतकीश्यामासुधाः क्षीरेण युक्ता मूत्रेर्वाऽऽनाहभेदनम्। त्रिफलादन्तीश्मामात्रिवृत्कम्पिल्लकपीलुस्वर्णक्षीरीवचासप्तलानीलिकायहणीचूर्णानि सुधाक्षीरेण गुटिका आमलकमात्रीः कृत्वा तत एकां भक्षयित्वोष्णोदकमूत्रानुपानादानाहैर्मुच्यते। एतान्येव त्रिफलादीनि क्षीरमूत्रवर्जितानि पञ्चकटुकपञ्चलवणहिङ्कुकुष्ठक्षारद्वयशतपुष्पापाठाश्रीफलयुतानि चूर्णानि कृत्वा बिडालपदकं क्षीरमद्योष्णवारिगोमूत्रान्यतमपीतमानाहशूलगुल्मभगन्दराशांसि निर्णाशनं चूर्ण, नाराचकमित्युच्यते तत् ॥४॥

सबसे पूर्व उष्ण तथा लवणयुक्त तैल से अभ्यक्त (मालिश किये हुए) उस पञ्चजन (मनुष्य-रोगी) को आवश्यकतानुसार स्वेदन करके फलवर्तियों (गुदवर्तियों—Suppositories) द्वारा चिकित्सा करे। विरेचन हो जाने के बाद यदि कोई उपद्रव न हो तथा रोगी बलवान हो तो उसे उष्ण, स्निग्ध, मधुर एवं लवण रस प्रधान, जौ, गेहूं, षष्टिक, शाक तथा घृतयुक्त एवं आनूप तथा औदक पशुओं के मांस वाला आहार देना चाहिए। तथा कोशातकी, कड़वी तुम्बी के बीज,

३३ का.सं.

१६०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्उदावर्तचिकित्सिताध्यायः ? ]

पिप्पली, सेन्धानमक, हींग, हरताल, मनःशिला तथा उड़द के चूर्ण को गोमूत्र में घोटकर बनाई हुई फलवर्तियां घी अथवा कडुवा तैल लगाकर गुदा में शलाका के द्वारा अन्दर प्रविष्ट कर दे। इनका उपचार पहले के समान ही करना चाहिये। इसके लिये प्रक्षण (मालिश), आच्छादन (वस्त्र), परिषेक तथा भोजन आदि सब स्निग्ध तथा उष्ण होने चाहिये। सत्तु, वाट्य (यवमण्ड-अथवा जौ का दलिया), कुल्माष (अर्धस्विन्न मुद्ग आदि घुघुनी-Powdered varley, halg boiled in warm water and then made into cakes is called kulmasha), अपूप (मालपूआ), बथुआ, यव, शाक, सेहुण्ड के पत्ते, त्रिवृत् शाक, पञ्चाङ्गुल (एरण्ड), श्रीवारिका (शितावर शाक), श्रीफला (बिल्व), सुवर्चला (हुलहुल), काकमाची (मकोय), कलाय (मटर), पालङ्क्य (पालक) इत्यादि घी में बनाये हुए शाकों के साथ यवान्न (जौ का अन्न) रोगी को खिलाये। त्रिवृत्, पीलु, एवं यवोत्कार गोमूत्र से पिलाये। त्रिवृत्, हरीतकी, श्यामा, सुधा (थूहर) को दूध अथवा गोमूत्र के साथ देने से आनाह नष्ट होता है। त्रिफला, दन्ती (जमालगोटा), श्यामा (काली निशोत), त्रिवृत्, कमीला, कपीलु, स्वर्णक्षीरी (सत्यानाशी), वचा, सातला, नीलिका (नीली), ग्रहघ्नी (श्वेत सर्षप) के चूर्णों को सेहुण्ड (थूहर) के दूध में घोटकर आंवले के प्रमाण की गुटिका बनाकर उष्ण जल अथवा गोमूत्र के अनुपान से एक गोली का प्रयोग करने से आनाह शान्त हो जाता है। क्षीर (दूध) तथा गोमूत्र से रहित इन्हीं उपर्युक्त त्रिफला आदि को पञ्चकटु (पञ्चकोल-पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, सोंठ), पञ्चलवण (सेन्धानमक, कालानमक, विड् लवण या नौसादर, सामुद्र तथा सांभरनमक), हींग, कुष्ठ, क्षारद्वय (सज्जीक्षार तथा यवक्षार), सौंफ, पाठा तथा श्रीफल (बिल्व) के सहित चूर्ण करके इसको विडाल (१ कर्ष) मात्रा में दूध, मद्य, उष्णजल, अथवा गोमूत्र में से किसी के अनुपान से पीने से आनाह, शूल, गुल्म, भगन्दर तथा अर्श का नाश करता है—इसे 'नाराचक' चूर्ण कहते हैं ॥४॥

तत्र श्लोकाः—

यदि व्यतिक्रमेदेतानुदावर्त उपक्रमान्। युक्तोष्णलवणं तस्य निरूहमुपकल्पयेत् ॥५॥
आस्थापनं च .....................................................
..................................................................................
..................................................................................
(इति ताडपत्रपुस्तके ११४ तमं पत्रं¹म्)

यदि उदावर्त रोग इन उपर्युक्त उपक्रमों—(चिकित्साओं से ठीक न हो तो उसे उष्ण तथा उचित परिमाण में लवण से युक्त निरूह तथा आस्थापन बस्ति देनी चाहिये ..........।

**वक्तव्य—**चरक चि. अ. २६ में उदावर्त का निम्न चिकित्साक्रम दिया है—तं तैलशीतज्वरनाशनाक्तं स्वेदैर्यथोक्तैः प्रविलीनदोषम्। उपाचरेद्वर्तिनिरूहबस्तिस्नेहैर्विरेकैरनुलोमनान्नैः ।। इससे आगे चरक में कई फलवर्तियों तथा प्रधमन चूर्णों का उपयोग देने के बाद लिखा है—तेषां विघाते तु भिषग्विद्ध्यात्स्वभ्यक्तसुस्विन्नतनोर्निरूहम्। ऊर्ध्वानुलोमौषध-मूत्रतैलक्षीराम्लवातघ्नयुतं सुतीक्ष्णम् ॥ अर्थात् यदि इन वर्तियों तथा प्रधमन चूर्णों से लाभ न हो तो देह पर अभ्यङ्ग एवं स्वेदन करके वमन, विरेचन, औषध, गोमूत्र, तैल, दूध तथा कांजी आदि से युक्त अच्छी तीक्ष्ण निरूहबस्ति दे। इसके बाद दोषभेद से निरूह बस्ति में भिन्न २ द्रव्यों की योजना दी है—वातेऽधिकेऽम्लं लवणं सतैलं क्षीरेण पित्तेतु कफे समूत्रम्। स मूत्रवर्चोऽनिलसङ्गमाशु गुदं सिराश्च प्रगुणीकरोति ।। अर्थात् वात की अधिकता में अम्ल, लवण तथा तैल-युक्त, पित्त की अधिकता में दूध तथा कफ की अधिकता में गोमूत्र युक्त बस्ति दी जाती है ॥५॥

(इति ताडपत्रपुस्तके ११४ तमं पत्रम्)


१. अस्याग्रे पत्रद्वयात्मको ग्रन्थस्त्रुटितस्ताडपत्रपुस्तके।

राजयक्ष्मचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १६१

राजयक्ष्मचिकित्सिताध्यायः

....................................................................................

.............. (रोगा) नीकविनाशनम् ।। पिप्पल्यो विंशतिः श्रेष्ठा उदकार्धाढके शृताः ।।
चतुर्भागावशेषं तं छागक्षीरेण तावता । शृतं नित्यं पिबेच्छोषी तेनैवाश्नीत नित्यदा$^१$ ।।
विना वाऽन्नोदकं शक्त्या तत्प्रधानो विमुच्यते ।

**वक्तव्य—**इस अध्याय में राजयक्ष्मा रोग की चिकित्सा का वर्णन है। राजयक्ष्मा ‘क्षय’ रोग को कहते हैं। क्योंकि यह रोग सब से पूर्व नक्षत्रराज चन्द्रमा को हुआ था इसलिये इसका नाम राजयक्ष्मा है। चरक चि. अ. ८ में कहा है—यस्मात्स राज्ञः प्रागासीद्राजयक्ष्मा ततो मतः । सुश्रुत उ. अ. ४१ में भी इसी प्रकार कहा है। इस रोग को शोष भी कहते हैं क्योंकि इस रोग में शरीर के रस का शोषण हो जाता है। कहा भी है—संशोषणाइरसादीनां शोष इत्यभिधीयते । क्रिया क्षयकरत्वाच्च क्षय इत्युच्यते पुनः ।। यह अध्याय प्रारंभ में खण्डित है। इस खण्डित अंश में राजयक्ष्मा के हेतु, सम्प्राप्ति, पूर्वरूप तथा लक्षण इत्यादि होंगे। राजयक्ष्मा रोग के मुख्य चार कारण माने जाते हैं—(१) अपने बल या शक्ति से अधिक कार्य करना, (२) वेगों को रोकना, (३) धातुक्षय, (४) विषम भोजन।

अब हम अध्यायोक्त विषय पर आते हैं—बीस उत्तम पिप्पलियों को आधे आढक-(२ प्रस्थ) जल में पकाया जाय । जब चतुर्थांश जल शेष रहे तब उतार कर फिर उसमें उतना ही बकरी का दूध डालकर पकाया जाय । सिद्ध होने पर उस दूध को शोष रोग के रोगी को नित्य पीना चाहिये तथा अपनी शक्ति के अनुसार अन्न और जल का त्याग करके केवल उसी दुग्ध का आहार करना चाहिये । इससे वह रोग दूर हो जाता है ।।

द्वादशाब्दानतीतो वा स्निग्धस्विन्नो विशोधितः ।।
पिबेत् क्षीरेण पिप्पल्यः (लीः) पञ्च पञ्च च वर्धयेत् । शतं तथैव ह्रसयेद्भोज्नोदकवर्जितः ।।
पिप्पलीवर्धनमानं तु सर्वरोगविनाशनम् ।

यदि रोग १२ वर्ष का पुराना हो गया हो तो रोगी स्नेहन, स्वेदन तथा शोधन (पञ्चकर्म द्वारा) करके दूध के साथ पिप्पलियों का सेवन करें । प्रतिदिन पांच पांच पिप्पलियां बढ़ाकर १०० तक ले जाये तथा फिर उसी प्रकार क्रमशः घटाये । भोजन (अन्न) तथा जल का त्याग कर देना चाहिये । यह ‘पिप्पली वर्धमान’ योग सब रोगों को नष्ट करने वाला है ।

**वक्तव्य—**यक्ष्मा रोग के रोगी को वमन तथा विरेचन यथासंभव नहीं कराने चाहिये और यदि कराने ही पड़े तो बहुत संभल करके कराने चाहिये । चरक में कहा है—‘यन्न कर्षणम्’ अर्थात् वमन विरेचन ऐसे होने चाहिये जो शरीर का कर्षण न करें ।

पिप्पलीनां शतं वाऽपि शृतं तोयाढके सदा ।।
पादशिष्टं समक्षीरं श्रपयेत् पुनरेव तत् । कफाधिके तु सक्षौद्रं, सघृतं पवनाधिके ।।
पित्तोत्तरे शर्करया सेवमानः सुखी भवेत् ।

अथवा १०० पिप्पलियों को १ आढक जल में पकाकर चतुर्थांश शेष रहने पर उतना ही दूध मिलाकर पुनः पकाया जाय । कफ की अधिकता में इसमें मधु, वायु की अधिकता में घृत तथा पित्त की अधिकता में शर्करा (खाण्ड) मिलाकर सेवन करने से रोगी स्वस्थ हो जाता है ।।


१. सर्वदा इत्यभिसन्धिः ।

१६२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | राजयक्ष्मचिकित्सिताध्यायः ? ]

पिप्पलीवर्धमानं तु वातश्लेष्मोत्तरे हितम् ।।
सर्वत्र पिप्पलीक्षीरं हितं कालादिदर्शनात् ।

वायु तथा कफ की अधिकता में ‘पिप्पली वर्धमान योग’ हितकर है तथा काल आदि के अनुसार ‘पिप्पलीक्षीर’ (पिप्पलियों के द्वारा शृत-पकाया हुआ दूध) सब जगह हितकर है ।।

शरन्मुखे नागबलामूलान्युद्धृत्य शोषयेत् ।।
सन्निधाय नवे भाण्डे ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । स्त्रीशूद्रवर्जी विजने चूर्णं क्षीरेण पाययेत् ।।
प्रथमे दिवसे कर्षं ततश्चोर्ध्वं विवर्धयेत् । ततः पलं पलं नित्यं पाययेत् पयसा शुचिः ।।
जीर्णे तस्मिन् पिबेत् क्षीरं भक्तोदकविवर्जितः ।
मासात् सोपद्रवं शोषं हन्ति नागबला नृणाम् ।।
प्रजामायुर्बलं मेधां प्रयताय ददात्यपि । षण्मासेन श्रुतधरः सर्वरोगविवर्जितः ।।
अशीतिकोऽपि च युवा भवेत् संवत्सराश्नरः ।

शरद् ऋतु के प्रारंभ में नागबला की जड़ों को उखाड़कर सुखाले । उनका चूर्ण बनाकर एक नवीन बर्तन में रखले । तब रोगी को जितेन्द्रिय होकर, ब्रह्मचर्य पूर्वक वन में रहकर इस चूर्ण का दूध के साथ सेवन करना चाहिये । तथा उन दिनों स्त्री एवं शूद्र का सहवास नहीं करना चाहिये । पहले दिन चूर्ण की १ कर्ष मात्रा होनी चाहिये । तथा उसे बढ़ाकर प्रतिदिन शुद्ध तथा पवित्र होकर दूध के साथ नित्य १ पल मात्रा सेवन करनी चाहिये । इसके जीर्ण हो जाने (पच जाने) पर दूध का सेवन करना चाहिये तथा अन्न एवं जल का त्याग कर देना चाहिये । नागबला का एक मास तक सेवन करने से मनुष्यों का उपद्रव युक्त शोष रोग नष्ट हो जाता है तथा सन्तान, आयु, बल और मेधा की वृद्धि होती है । ६ मास के अन्दर रोगी सब रोगों से छुटकारा पाकर श्रुतधर (सुनी हुई चीज को धारण करने वाला) हो जाता है तथा उसकी स्मरण एवं धारणाशक्ति बढ़ जाती है । तथा एक वर्ष तक इसका सेवन करने से ८० वर्ष का वृद्ध भी युवा (जवान) हो जाता है ।।

मण्डूकपर्ण्याः शुण्ठ्याश्च ब्राह्मायाश्च मधुकस्य च ।।
तद्गुणः सर्वरोगघ्नो विधिर्नागबलासमः ।

इसी प्रकार मण्डूकपर्णी सोंठ, ब्राह्मी तथा मुलहठी का भी प्रयोग करना चाहिये । ये भी सब रोगों को नष्ट करने वाले हैं । इनकी प्रयोग विधि नागबला के समान ही है ।।

उद्वर्तितस्त्वजालेण्डैरजामूत्राभिषेचितः ।।
अजाक्षीरं पिबेन्नान्यदजाभिश्च वसेत् सह । अधस्तादवटेऽजानां वसञ्छोषी विमुच्यते ।।
आजं रसायनं ह्येतत् क्षयघ्नं बलवर्धनम् ।

क्षय रोग के रोगी को बकरियों की मेंगनियों (पुरीष) के रस से उद्वर्तन कराना चाहिये, बकरी के मूत्र से परिषेचन करना चाहिये । बकरी के दूध के अतिरिक्त दूसरे दूध का सेवन नहीं करना चाहिये । बकरियों के साथ ही रहना चाहिये तथा जहां बकरियां बांधी जाती हैं उस छप्पर आदि के नीचे ही उसे सोना चाहिये । इससे क्षय रोग से छुटकारा हो जाता है । यह उपर्युक्त बकरियों का रसायन क्षय को नष्ट करता है तथा बल को बढ़ाता है । सुश्रुत सू. अ. ४१ में कहा है— अजाशकृन्मूत्रपयोघृतासृङ्मांसालयानि प्रतिसेवमानः। स्नानादिनानाविधिना जहाति मासादशेषं नियमेन शोषम्। राजयक्ष्मा में बकरियों के महत्त्व के विषय में अन्यत्र भी कहा है—‘छागं मांसं पयश्छागं छागं सर्पिःसशर्करम्। छागोपसेवाशयनं छाग-मध्ये तु यक्ष्मनुत्’ ।।

दशमूलसुधादन्तीकरञ्जाथोगुडासनाः । मयूरकं देवदारु निचुलं कुटजाटजी (?) ।।

राजयक्ष्मचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १६३

हरीतकीनां श्रेष्ठानां द्वे शते जर्जरीकृते ।। दशमूलसुधादन्तीकरञ्जाथोगुडासनाः । मयूरकं देवदारु निचुलं कुटजाटजी (?) ।। कटङ्कटेरी बृहती रास्ना श्योनाकचित्रकौ । वरुणं चेति संकुट्य पञ्चविंशतिकैः पलैः ।। षड्द्रोणेऽपां पचेदेतद्यावत् पञ्चाढकं स्थितम् । तस्मिन् पूते गुडतुलां दत्त्वा भूयश्च साधयेत् ।। परिवृत्तं समालक्ष्य घृतभाण्डे निधापयेत् । मरिचानि विडङ्गानि भार्गी शक्रयवांस्तथा ।। आवपेत् कुटबीजानि पिप्पलीप्रस्थमेव च । मधुप्रस्थं च संसृज्य मासादूर्ध्वं प्रयोजयेत् ।। पथ्याशी मात्रया काले मुच्यते कफजैर्गदैः । महाभयारिष्ट इति कश्यपेन प्रकल्पितः ।।

यवकुट की हुई (कूटी हुई) २०० उत्तम हरड़, दशमूल, सुधा (थूहर), दन्ती (जमालगोटा), करञ्ज, अधोगुड, असन (विजयसार), अपामार्ग, देवदारु, निचुल (हिज्जलसमुद्रफल), कुटज, अटजी (?), कटङ्कटेरी (दारुहल्दी), बृहती, रास्ना, श्योनाक (अरलू), चित्रक तथा वरुण-इन्हें कूटकर सम्मिलित २५ पर लेकर ६ द्रोण जल में पकाये । ५ आढक जल शेष रहने पर उतारकर छान लें । उसमें १ तुला गुड डालकर पुनः पाक करें । पाक हो जाने पर उसे पहले से घी का लेप किये हुए बर्तन में डालदें । इसमें मरिच, विडङ्ग, भारंगी, इन्द्रजौ, कुट (गुवाक बीज) तथा पिप्पली का चूर्ण १ प्रस्थ प्रक्षेप के रूप में डालदें । अब इसमें १ प्रस्थ मधु मिलादें । मात्रा एवं काल के अनुसार एक वर्ष तक पथ्य सेवन पूर्वक इसका प्रयोग करने से श्लैष्मिक रोग नष्ट हो जाते हैं । यह कश्यप द्वारा प्रयुक्त 'महाभयारिष्ट' है ।।

अपामार्गोऽश्वगन्धा च नाकुली गौरसर्षपाः । तिला बिल्वं च कल्कः स्यात् क्षयेषूद्वर्तनं हितम् ।

क्षयरोग में अपामार्ग, अश्वगन्धा, गन्धनाकुली, श्वेत सरसों, तिल तथा बिल्व के कल्क का उद्वर्तन हितकर होता है ।।

लशुनानां पलशतं निस्तुषं जर्जरीकृतम् । जलद्रोणेषु दशसु श्रपयेत् पादशेषितम् ।। घृताढकद्वयं तत्र विपचेज्जीवनीयैः सह । आजस्य पयसो द्रोणं क्वाथं च दशमूलिकम् ।। आवपेत्तद्धृतं गोप्यं प्रयोज्यं मास्तः परम् । इन्द्राणीघृतमित्येतद्राजयक्ष्मविनाशनम् ।। वन्ध्याषण्ढकवृद्धानां कामदं पथ्यभोजिनाम् ।

एक सौ (१००) पल लहसन के छिलके उतार कर यवकुट करके १० द्रोण पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष रहने पर उतार ले । इसमें जीवनीय ओषधियों के सहित २ आढक घी, एक द्रोण बकरी का दूध तथा दशमूल का क्वाथ डालकर पकाये । घृत सिद्ध होने पर उतार कर गुप्तस्थान (धान्यराशि आदि) में रखदें । एक मास बाद इसका सेवन करना चाहिये । इसका नाम 'इन्द्राणी घृत' है । यह राजयक्ष्मा को नष्ट करता है तथा पथ्य का सेवन करने वाले वन्ध्या (बांझ), नपुंसक तथा वृद्ध पुरुषों की कामशक्ति को बढ़ाता है ।।

लशुनं वाऽपि कल्पेन यथोक्तेनोपचारयेत् । घृतस्यार्धाढके गव्ये जर्जरं लशुनाढकम् ।। घृतभाण्डे समावाप्य वर्षं धान्येषु गोपयेत् । षण्मासमष्टमासं वा चतुर्मासमथो ततः ।। पेयं नागबलावच्च सर्वरोगैर्विमुच्यते ।

अथवा यथोक्त कल्प के द्वारा लशुन का उपचार करे । आधे आढक (२ प्रस्थ) गोघृत में एक आढक (४ प्रस्थ) यवकुट किया हुआ लहसन डालकर उसे घी से लिये हुए बर्तन में डालदें । वर्ष भर तक उसे धान्यराशि में पड़ा रहने दें । इसका आवश्यकतानुसार ६ मास ८ मास अथवा ४ मास तक नागबला के समान सेवन करने से सब रोग नष्ट हो जाते हैं ।।

१६४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | राजयक्ष्मचिकित्सिताध्यायः ? ]

इन्द्राणीघृतकल्पेन द्राक्षासर्पिर्विपाचयेत् ।। तथा पीलुघृतं चैव सर्वरोगैर्विमुच्यते ।

'इन्द्राणी घृत' के समान ही 'द्राक्षा घृत' तथा 'पीलु घृत' का पाक करें । इनके सेवन से भी सब रोगों की शान्ति हो जाती है ।।

इष्टयो रोहिणीस्नानं तयोर्मङ्गलसेवनम् ।। रुद्रपूजा धृतिः शौचं ब्रह्मचर्यं च शान्तये ।

इस रोग की शान्ति के लिये इष्टियां (यज्ञ), रोहिणी नक्षत्र में स्नान तथा उनका मंगल, रुद्र की पूजा, धैर्य, पवित्रता तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये । चरक चिकित्सा अध्याय ८ में कहा है—यया प्रयुक्तया चेष्ट्या राजयक्ष्मा पुराजितः । तां वेदविहितामिष्टिमारोग्यार्थी प्रयोजयेत् ।। अर्थात् इसमें वेदविहित इष्टि का विधान दिया गया है ।।

षडेकादश चोक्तानि यानि रूपाणि यक्ष्मणः ।। त एवोपद्रवास्तेषामशान्तौ स्वं चिकित्सितम् ।

यक्ष्मा रोगी के जो ६ तथा ११ रूप (लक्षण) कहे हैं वे ही इसके उपद्रव होते हैं । उन उपद्रवों के होने पर उन २ की चिकित्सा करनी चाहिये ।

वक्तव्य—यह अध्याय प्रारंभ में खण्डित है । उस अंग में यक्ष्मा के ये ६ तथा ११ रूप दिये गये होंगे । चरक चि. अ. ८ में ये ११ तथा ६ रूप निम्न दिये हैं—कासोऽसतापो वैस्वर्यं ज्वरः पार्श्वशिरोरुजा । शोणितश्लेष्मणोश्छर्दिः श्वासः कोष्ठामयोऽरुचिः ।। रूपाण्येकादशैतानि यक्ष्मणः षडिमानि वा । कासो ज्वरः पार्श्वशूलं स्वरवर्चो गदोऽरुचिः ।। अर्थात् १. कास २. अंसाभिताप ३. स्वरभेद ४. ज्वर ५. पार्श्वशूल ६. शिरःशूल ७. रक्त वमन ८. कफ का थूकना ९. श्वास १०. कोष्ठामय (अतिसार) ११. अरुचि—ये यक्ष्मा रोगी के ११ रूप हैं । तथा १. कास २. ज्वर ३. पार्श्वशूल ४. स्वरभेद ५. मलभेद ६. अरुचि—ये ६ रूप होते हैं । अर्थात् यदि दोष अत्यन्त प्रबल हों तो रोग के उपर्युक्त ११ रूप प्रकट होते हैं अन्यथा ६ रूप होते हैं । सुश्रुत उ. अ. ४१ में यक्ष्मारोग के क्रमशः ११, ६ तथा ३ रूप दिये हैं—स्वरभेदोऽनिलाच्छूलं संलोचश्वांसपार्श्वयोः । ज्वरो दाहोऽतिसारश्च पित्ताद्रक्तस्य चागमः ।। शिरसः परिपूर्णत्वमभक्तच्छन्द एव च । कासः कण्ठस्य चोद्ध्वंसो विज्ञेयः कफकोषतः ।। एकादशभिरेतैर्वा षड्भिर्वापि समन्वितम् । कासातिसारपार्श्वार्ति स्वरभेदारुचिज्वरैः ।। त्रिभिर्वा पीडितं लिङ्गैर्ज्वरकासासृगामयैः । जह्याच्छोषार्दितं जन्तुमिच्छन् सुविपुलं यशः ।। अर्थात् यहां यक्ष्मारोग के ११ तथा ६ रूपों के अतिरिक्त १. ज्वर २. कास ३. रक्तवमन—ये तीन रूप भी दिये हैं ।।

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। (इति) चिकित्सितेषु राजयक्ष्मचिकित्सितम् ।। (इति ताडपत्रपुस्तके ११७ तमं पत्रम् ।)

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था !

(इति) चिकित्सितेषु राजयक्ष्मचिकित्सिताध्यायः ।।

गुल्मचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १६५

गुल्मचिकित्सिताध्यायः ।

अथातो गुल्मिनां चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ।। १ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। २ ।।

अब हम गुल्म रोगियों की चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।। १-२ ।।

वातादिसर्वरक्तोत्थाः कुक्षिहृत्पार्श्वबस्तिजाः । पञ्च पञ्चापदामम्या गुल्माः सूत्रे निदर्शिताः ।। ३ ।।

वातादि दोषों से पृथक् (वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक), सम्मिलित (सान्निपातिक) तथा रक्त से उत्पन्न होने वाले सब रोगों के अग्रणी ५ गुल्मों का सूत्रस्थान में निर्देश किया गया है जो कि १ कुक्षि २ हृदय ३-४ दोनों पार्श्व तथा ५ बस्ति में पैदा होते हैं। चरक चि. अ. ५ में भी गुल्मों के ये ही पांच स्थान दिये हैं—बस्तौ च नाभ्यां हृदि पार्श्वयोश्च स्थानानि गुल्मस्य भवन्ति पञ्च ।। ३ ।।

चेष्टान्नपानसामान्या दोषाः प्रकुपिता नृणाम् । आमाशयमधिष्ठाय ततो गुल्मान् प्रकुर्वते ।। ४ ।।

चेष्टा तथा सामान्य अन्नपान से मनुष्य के प्रकुपित हुए दोष आमाशय में गुल्मों को उत्पन्न करते हैं। चरक चि. अ. ५ में गुल्म रोग की निदान तथा सम्प्राप्ति निम्न प्रकार से दी है—विट्सुश्लेष्मपित्तातिपरिस्रवाद्द्वा तैरेव वृद्धैरतिपीडनाद्द्वा । वेगैरुदीर्णैर्विहतैरधो वा बाह्याभिघातैरतिपीडनैर्वा ।। रूक्षान्नपानैरतिसेवितैर्वा शोकेन मिथ्याप्रतिकर्मणा वा । विचेष्ठितैर्वा विषमातिमात्रैः कोष्ठे प्रकोपं समुपैति वायुः ।। कफं च पित्तं च स दूषयित्वा प्रोद्धूपमार्गांन्विनिबद्ध्यताभ्याम् । हृन्नाभिपार्श्वोदरबस्तिशूलं करोत्यधोयाति न बद्धमार्गः ।। अर्थात् पुरीष, कफ, पित्त आदि के अत्यधिक स्राव अथवा अन्य उदीर्ण हुए वेगों को रोकने इत्यादि कारणों से कोष्ठ में वायु का प्रकोप हो जाता है। वह प्रकुपित वायु कफ तथा पित्त को अपने स्थान से विचलित करके मार्गों को रोक देता है जिससे हृदय, नाभि, पार्श्व उदर तथा बस्ति में शूल उत्पन्न हो जाता है तथा मार्ग के रुके होने से वह नीचे की ओर नहीं जाता ।। ४ ।।

वातश्लेष्मन्नपानेषु वातलो यः प्रसज्जति । धावति प्लवतेऽधीते भृशं गायति नृत्यति ।। ५ ।।
शीतवाताम्बुसेवी च शीतरूक्षकटुप्रियः । व्याधिक्लिष्टः कृशो रूक्षः सेवते तीक्ष्णमौषधम् ।। ६ ।।
उदीरयति च्छर्दिं च बलाच्छर्दयतेऽपि वा । निरुणद्धि च वातादीन् तृप्तः पिबति वा बहु ।। ७ ।।
शीघ्रयानेन वा यति व्यवायं वाऽतिसेवते । व्यायामाध्ययनस्त्रीषु बालो रूक्षश्च यो रतः ।। ८ ।।
एतैश्चान्यैश्च कुपितो मारुतो दोषसंचयम् । करोति यत्र तत्रास्य स्थाने गुल्मो निचीयते ।। ९ ।।

वातगुल्म का निदान—जो वात प्रकृति वाला मनुष्य वात प्रधान अन्नपानों का सेवन करता है, अधिक दौड़ता है, तैरता है, पढ़ता है, गाता है, नाचता है, शीतल वायु एवं जल का सेवन करता है, शीतल सूक्ष्म तथा कटु पदार्थ जिसे प्रिय हों, जो व्याधि से आक्रान्त हो, कृश तथा रूक्ष हो, जो तीक्ष्ण ओषधियों का सेवन करतो हो, जो वमन के वेग को उदीर्ण करता हो तथा बलपूर्वक वमन करता हो, जो वातादियों के वेगों को रोकता हो तथा तृप्त होने के बाद भी बहुत अधिक जल पीता हो, जो शीघ्र चलने वाली सवारी पर चलता हो, अत्यन्त मैथुन करता हो, जो बालक एवं रूक्ष व्यक्ति व्यायाम, अध्ययन तथा स्त्री में रत रहता हो-इन कारणों से तथा अन्य भी कारणों से कुपित हुआ वायु जिस २ स्थान में दोषों को संचित करता है उसके उन २ स्थानों में गुल्म कर देता है। चरक नि. अ. ३ में इसकी निदान तथा सम्प्राप्ति निम्न प्रकार से दी है—यदा पुरुषो वातलो विशेषेण ज्वरवमनविरेचनातीसाराणामन्यतमेन कर्शनेन कर्शितो वातलमाहारमाहरति शीतं वा विशेषेणातिमात्रमस्नेहपूर्वे वा वमनविरेचने पिबत्यनुदीर्णो वा छर्दिमुदीरयति

१६६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्गुल्मचिकित्सिताध्यायः ? ]

वातमूत्रपुरीषवेगातिरुणद्धयत्यशितो वा पिबति नवोदकमतिमात्रमतिमात्रसंक्षोभिणा वा यानेन यात्यतिव्यवायव्या- याममध्वरुचिर्वाऽभिघातमूर्च्छति वा विषमाशनशयनासनस्थानचङ्क्रमणसेवी भवत्यन्यद्वा किंचिदेवंविधं विषममतिमात्रं व्यायामजातमारभते, तस्यापचाराद्वातः प्रकोपमापद्यते स प्रकुपितो महास्रोतोऽनुप्रविश्य रौक्ष्यात्कठिनीभूतमाप्लुत्य पिण्डतोऽवस्थानं करोति हृदिबस्तौ पार्श्वयोर्नाभ्यां वा, स शूलमुपजनयति ग्रन्थींश्चानेकविधान्, पिण्डतश्चावतिष्ठते, स पिण्डतत्त्वाद् गुल्म इत्युच्यते ॥५-९॥

अग्निनाशोऽरुचिः शूलं च्छर्द्दुद्गारान्त्रकूजनम् । पुरीषवर्तनं कार्श्यं गुल्मानां पूर्वलक्षणम् ।।१०।।

गुल्म के पूर्वरूप— अग्निनाश, अरुचि, शूल, छर्दि, उद्गार (डकार), आन्त्रकूजन (आंतों में गुड़गुड़ शब्द होना), मल का रुक जाना तथा कृशता—ये गुल्म रोगों के पूर्वरूप होते हैं । चरक नि. अ. ३ में कहा है—एषां तु खलु पञ्चानां गुल्मानां प्रागभिनिर्वृत्तेरिमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति, तद्यथा—अनन्नाभिलषणं, अरोचकाविपाकौ, अग्निवैषम्यं, विदाहो भुक्तस्य, पाककाले चायुत्तया च्छर्द्दुद्गारौ, वातमूत्रपुरीषवेगानामप्रादुर्भावः प्रादुर्भूतानां चाप्रवृत्तिः ईषदागमनं वा, वातशूलाटो- पान्त्रकूजनापरिक्षेणानिवृत्तपुरीषता, बुभुक्षा, दौर्बल्यं, सौहित्यस्य चासहत्वमिति गुल्मपूर्वरूपाणि भवन्ति । सुश्रुत उ. अ. ४२ में भी इसी प्रकार कहा है ॥१०॥

शूलंमूर्च्छाज्वरस्तोदः कार्श्यं तृ(कृ)ष्णाऽरुणात्म(भ)ता । पार्श्वां साक्षकशूलं च वातगुल्मस्य लक्षणम् ।।११।।

वात गुल्म के लक्षण— शूल, मूर्च्छा, ज्वर, तोद (पीडा), कृशता, प्यास (अथवा काला) और अरुण आभा (रंग) का होना, पार्श्व अंस (कन्धे) तथा अक्षक (हंसली) में शूल होना—ये वातगुल्म के लक्षण हैं । चरक नि. अ. ३ में इसके निम्न लक्षण दिये हैं—स मुहुराधमति, मुहुरल्पत्वमापद्यते, अनियतविपुलाणुवेदनश्च भवति चलत्वाद्वायोः, पिपीलिकासञ्चार इवाङ्गेषु, तोदस्फुरणायामसंङ्कोचसुप्तिहर्षप्रलयोदयबहुलः, तदातुरश्च सूच्येव शङ्कुनेव चातिविद्धमात्मानं मन्यते, अपि च दिवसान्ते जीर्यति शुष्यति चास्यांस्यं, उच्छ्वासश्चोपरोध्यते, हृष्यन्ति चास्य रोमाणि वेदनायाः प्रादुर्भावे, प्लीहाटोपान्त्रकूजनाविपाकोदावर्ताङ्गमर्द मन्या शिरः शङ्खशूलब्रध्नरोगाश्चैनमुपद्रवन्ति, कृष्णारुणपरुषत्वङ्नखनयनवदनमूत्रपुरीषश्च भवति, निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते, विपरीतानि चोपशेरत इति वातगुल्मः । इसी प्रकार चरक नि. अ. ५ में भी कहा है ॥११॥

उषायणं ज्वरो दाहस्तृष्णाविद्भेदपीतताः । पित्तगुल्मे विजानीयात् पित्तलान्नोष्णसेविनः ।।१२।।

पित्त गुल्म के लक्षण— पित्त प्रधान अन्न तथा उष्ण पदार्थों का सेवन करने वाले व्यक्ति के पैत्तिक गुल्म में बहुत उष्णता (जलन), ज्वर, दाह, तृष्णा, विद्भेद (अतिसार) तथा शरीर का रंग पीला होना—ये पैत्तिक गुल्म के लक्षण होते हैं । चरक नि. अ. ३ में इसके निम्न लक्षण दिये हैं—पित्तं त्वेनं विदहति कुक्षौ हृुरसि कण्ठे च, स विदह्यमानः सधूममिवोद्गारमुद्गिरति अम्लान्वितं, गुल्मावकाशश्चास्य दह्यते इयते धूष्यते ऊष्मायते स्विद्यति क्लिद्यति, शिथिल इव च स्पर्शासहोऽल्परोमाञ्चो भवति, ज्वरभ्रमदवथुपिपासागलवदनतालुशोषप्रमोहविङ्भेदाश्चैनमुपद्रवन्ति, हरितहारिद्रत्वङ्नखनयनवदनमूत्रपुरीषश्च भवति, निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते, विपरीतानि चोपशेरत इति पित्तगुल्मः । इसमें निदानोक्त आहार-विहार असात्म्य होते हैं तथा इससे विपरीत सात्म्य होते हैं । इसी प्रकार चरक चि. अ. ५ में भी कहा है—ज्वरः पिपासा वदनाङ्गरागः शूलं महज्जीर्यति भोजने च । स्वेदो विदाहो व्रणवच्च गुल्मः स्पर्शासहः पैत्तिकगुल्मरूपम् ॥१२॥

रोमहर्षो ज्वरश्छर्द्दिररुचिर्हृद्दयग्रहः । मूत्राक्षिनखविट्शौक्ल्यं शैत्यं च कफगुल्मिनः ।।१३।।

कफ गुल्म के लक्षण— रोमहर्ष, ज्वर, छर्दि, अरुचि, हृदयग्रहः (हृदय प्रदेश का जकड़ जाना), मूत्र, आंखें, नाखून तथा मल का सफेद होना तथा शीतलता—ये कफगुल्म के लक्षण होते हैं । चरक नि. अ. ३ में इसके निम्न लक्षण दिये

गुल्मचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १६७

हैं—श्लेष्मा त्वरय शीतज्वरारोचकाविपाकाङ्गमर्दहर्षहृद्रोगच्छर्दिनिद्रालस्यस्तैमित्यगौरवशिरोभितापानुपनयति, अपि च गुल्मस्य स्थैर्यगौरवकाठिन्यावगाढसुप्तताः, तथा कासश्वासप्रतिश्यायायान् राजयक्ष्माणं चातिप्रवृद्धः, श्वैत्यं च त्वङ्नखनयनवदनमूत्रपुरीषे, षूपजनयति, निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते, तद्विपरीतानि चोपशेरत इति श्लेष्मगुल्मः। अर्थात् अन्य लक्षणों के साथ २ जिन आहार विहार आदि से श्लेष्मगुल्म उत्पन्न होता है वे असात्म्य तथा उनसे विपरीत सात्म्य होते हैं। इसी प्रकार चरक चि. अ. ५ में भी कहा है ॥१३॥

सर्वाण्येतानि रूपाणि लक्ष्यन्ते सान्निपातिके।

सान्निपातिक गुल्म के लक्षण—सान्निपातिक गुल्म में ये सब लक्षण होते हैं। चरक नि. अ. ३ में कहा है— त्रिदोषहेतुलिङ्गसन्निपातस्तु सान्निपातिकं गुल्ममुपदिशन्ति कुशलाः। स विप्रतिषिद्धोपक्रमत्वादसाध्यो निचयगुल्मः। इसी प्रकार चरक चि. अ. ५ में भी कहा है ॥१३-१/३॥

रक्तगुल्मः स्त्रिया योनौ जायते न नृणां क्वचित् ॥१४॥

रक्तगुल्म—रक्तगुल्म केवल स्त्रियों की योनि (स्त्रीजाति) में ही होता है। पुरुषों में कभी नहीं होता। चरक नि. अ. ३ में भी कहा है—शोणितगुल्मस्तु खलु स्त्रिया एवं भवति न पुरुषस्य, गर्भकोष्ठार्त्तवागमनवैशेष्यात्। अर्थात् दूषित आर्तव के कारण जो रक्तगुल्म होता है वह केवल स्त्रियों को ही होता है। अन्यत्र भी कहा है—स्त्रीणामात्तर्वजो गुल्मो न पुंसामुपजायते। अन्यस्त्वसृग्भवो गुल्मः स्त्रीणां पुंसाञ्च जायते॥ अर्थात् सामान्य रक्त की दृष्टि से पुरुषों में भी रक्तगुल्म हो सकता है परन्तु रक्त के दूष्य होने से इसका अन्तर्भाव पित्तगुल्म में ही हो जाता है ॥१४॥

दुष्प्रजाता (ऽऽम)गर्भा च गर्भस्त्रूर्बहुमैथुना। अन्व१क्षगर्भकामा च बहुशीतार्तवा च या ॥१५॥
उदावर्त्तनशीला च वातलान्ननिषेविणी। या स्त्री तस्याः प्रकुपितो वातो योनिं प्रपद्यते ॥१६॥
निरुणद्ध्यार्तवं तत्र मासिकं संचिनोति च। रक्ते च संस्थिते नारी गर्भिण्यस्मीति मन्यते ॥१७॥

रक्तगुल्म का निदान एवं सम्प्राप्ति—जो स्त्री दुष्प्रजाता (जिसका प्रसव सम्यक् प्रकार न हुआ) हो, जिसका गर्भ अभी कच्चा हो, जिसका गर्भस्राव हो गया हो, जो बहुत मैथुन करती हो, जो बहुत शीघ्रता से गर्भ को धारण करती हो, जिसका आर्तव बहुत शीतल हो, जिसे प्रायः उदावर्त होता हो, जो वातकारक अन्नों (आहारों) का सेवन करती हो- उसका प्रकुपित हुआ वायु योनि में पहुंचकर आर्तव को रोक देता है जिससे मासिक स्राव इकट्ठा हो जाता है। इस प्रकार वहां रक्त के स्थिर हो जाने से स्त्री अपने आपको गर्भिणी समझने लगती है। चरक चि. अ. ५ में कहा है— ऋतावानाहारतया भयेन विरूक्षणैर्वेगविनिग्रहैश्च। संस्तम्भनोल्लेखनयोनिदोषैर्गुल्मः स्त्रियं रक्तभवोऽभ्युपैति॥ अर्थात् ऋतुकाल में आहार न करने से, गर्भस्थिति के भयमात्र से रूक्ष आहार विहार आदि से, वेगों को रोकने से, रक्तस्तम्भक आहार विहार अथवा औषध के प्रयोग से तथा वमन एवं योनि रोगों के कारण स्त्री को रक्तगुल्म हो जाता है। इसी प्रकार चरक नि. अ. ३ में और सुश्रुत उ. अ. ४२ में भी कहा है ॥१५-१७॥

स्तनमण्डलकृष्णत्वं रोमराजिः सदोहदा। गर्भिणीरूप २मव्यक्तं भजते सर्वमेव तु ॥१८॥
वि(अ)पाकपाण्डुकाश्र्यानि भवन्त्यभ्यधिकानि तु। इत्येवं लक्षणं स्त्रीणां रक्तगुल्मं प्रचक्षते ॥१९॥


१. 'अन्वगन्वक्षमनुगेऽनुपदम्' इत्यमरः। अतिशीघ्रमिति यावत्।
२. एवंप्राय एव विषयश्चरके निदानस्थाने तृतीयाध्याये मुद्रितभेडसंहितायां चिकित्सास्थानस्य पञ्चमाध्याये (गुल्मचिकित्सायां) च प्रपञ्चितः।

१६८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्गुल्मचिकित्सिताध्यायः ? ]

रक्तगुल्म का लक्षण—उस स्त्री के स्तन के मण्डल (अग्रभाग) काले हो जाते हैं, लोमराजि प्रकट हो जाती है, दोहद (विशेष इच्छायें जो गर्भावस्था के समय गर्भिणी को हुआ करती है) के लक्षण प्रकट होने लगते हैं तथा अव्यक्त (अस्पष्ट) रूप से गर्भिणी के सभी लक्षण उसे प्रतीत होने लगते हैं। उसे अपचन, पाण्डु तथा कृशता विशेषरूप से हो जाती हैं। इस प्रकार के लक्षणों वाला स्त्रियों में रक्तगुल्म कहलाता है। चरक नि. अ. ३ में कहा है—तस्याः शूलकासातिसारच्छर्द्यरोचकाविपाकाङ्गमर्दनिद्रालस्यस्तैमित्यकफप्रसेकाः समुपजायन्ते, स्तनयोश्च स्तन्यं, ओष्ठयोः स्तनमण्डलयोश्च कार्ष्ण्यं, ग्लानिश्चक्षुषोः, मूर्च्छा, हल्लासो, दोहदः, श्वयथुः पादयोः, ईषच्चोद्गमो रोमराज्याः, योन्याश्चारालत्वं, अपि च योन्या दौर्गन्ध्यमास्त्रावश्चोपजायते, केवलश्चास्याः गुल्मः पिण्डित एव स्पन्दते, तामगर्भो गर्भिणीमित्याहुर्मूढाः। चरक चि. अ. ५ में और सुश्रुत उ. अ. ४२ में भी ऐसा ही कहा है ॥१८-१९॥

अनेकदोषसंघातो गुल्मवद्गुल्म उच्यते। त्रिदोषजादृते गुल्माः सिद्ध्यन्ति न चिरोत्थिताः ॥२०॥

गुल्म का स्वरूप—गुल्म के समान अनेक दोषों का संघात होने से इसे गुल्म कहते हैं। सब चिरोत्थित गुल्म त्रिदोष के बिना नहीं हो सकते हैं। सुश्रुत उ. अ. ४२ में भी कहा है—कुपितानिलमूलत्वाद् गूढमूलोदयादपि। गुल्मवद्वा विशालत्वाद् गुल्म इत्यभिधीयते॥ अर्थात् सब गुल्मों का मूल कुपित वायु के होने से, मूल (उत्पत्ति कारण) के गूढ (गुप्त-अनिश्चित) होने से, तथा गुल्म (वनस्पति संघात) के समान विशाल होने से इसे गुल्म कहते हैं॥

गुल्मिनं प्रथमं वैद्यः स्नेहस्वेदोपपादितम्। यथास्वदोषशमनैरौषधैः समुपक्रमेत् ॥२१॥

सर्वप्रथम वैद्य स्नेहन तथा स्वेदन किये हुए गुल्म रोगी की भिन्न २ दोषों की शामक ओषधियों से चिकित्सा करे। चरक चि. अ. ५ में कहा है—भोजनाभ्यञ्जनैः पानैर्निरूहैः सानुवासनैः। स्निग्धस्य भिषजा स्वेदः कर्तव्यो गुल्मशान्तये॥ अन्यत्र भी कहा है—सर्वत्र गुल्मे प्रथमं स्नेहस्वेदोपपादिते। या क्रिया क्रियते सिद्धिं सा याति न विरुक्षिते ॥२१॥

बृंहणं चातिगुल्मेषु भृशं चातिविरूक्षणम्। अतिसंशोधनं चैव गुल्मिनां न प्रशस्यते ॥२२॥

गुल्मरोगी में अतिबृंहण, अतिरूक्षण तथा अतिसंशोधन (वमन-विरेचन) हितकर नहीं होता है। चरक चि. अ. ५ में भी कहा है—तस्मान्ना नातिसौहित्यं कुर्यान्नातिविलङ्घनम् ॥२२॥

अभया पिप्पली व्योषं यावशूकोऽथ चित्रकः। सौवर्चलं विडङ्गानि वचा चेत्यक्षसंमिताः ॥२३॥
सम्यक्पक्वं घृतप्रस्थं तत् पिबेच्च यथाबलम्। घृतं दशाङ्गमित्येतद्वातगुल्मनिवारणम् ॥२४॥

वातगुल्म की चिकित्सा—हरड़, पिप्पली, त्रिकटु (सोंठ, मरीच, पीपल), यवक्षार, चित्रक, काला नमक, विडङ्ग तथा वच प्रत्येक १ कर्ष। १ प्रस्थ-घृत। इसे अच्छी प्रकार पकाकर अपनी शक्ति के अनुसार सेवन करें। यह दशाङ्ग घृत कहलाता है। यह वातगुल्म को नष्ट करता है ॥२३-२४॥

सैन्धवं यावशूकश्च पिप्पली हस्तिपिप्पली।
शुण्ठी चित्रक इत्येषां षड्भागाः पलिका पृथक् ॥२५॥
तुल्यक्षीरं घृतं प्रस्थं पक्वं षट्पलमुच्यते। षट्पलं सर्वगुल्मेषु वैद्याः प्राहुर्यथाऽमृतम् ॥२६॥

सैन्धव, यवक्षार, पिप्पली, गजपिप्पली, सोंठ तथा चित्रक इनके ६ भाग पृथक् एक २ पल (अर्थात् सब मिलाकर ६ पल लें) दूध- १ प्रस्थ। घृत- १ प्रस्थ। यथाविधि घृत पाक करे। यह षट्पल घृत कहलाता है। वैद्य सब गुल्मों में षट्पल घृत को अमृत के समान मानते हैं। चरक चि. अ. ५ में भी कहा है—षट्पलं वा पिबेत्सर्पिर्यदुक्तं राजयक्ष्मणि ॥२५-२६॥

गुल्मचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १६१

अभया पिप्पली द्राक्षा गुडूची सपुनर्नवा । लवणक्षारगन्धर्वभार्गीरास्नारसाञ्जनम् ॥२७॥ तुल्यक्षीरं पचेदेतैर्घृतमक्षमसैर्भिषक् । शैशुकं नाम तत् सर्पिर्वातगुल्मनिवारणम् ॥२८॥

हरड़, पिप्पली, द्राक्षा, गिलोय, पुनर्नवा, सैन्धव नमक, सर्जक्षार, गन्धर्व (श्वेत एरण्ड), भार्गी, रास्ना, तथा रसौंत-प्रत्येक १ कर्ष। दूध तथा घृत समान मात्रा में लेकर यथाविधि घृत पाक करे। यह शैशुक घृत (शिशुसर्पि) कहलाता है। यह वातगुल्म को नष्ट करता है ॥२७-२८॥

स्निग्धस्विन्नसमाश्वस्तं गुल्मिनं स्त्रंसयेत्ततः । विरेचनेन मृदुना तैलेनैरण्डजेन वा ॥२९॥

स्नेहन तथा स्वेदन किये हुए गुल्म रोगी को आश्वासन देकर किसी मृदु विरेचन (Mild Lexative) या ऐरण्ड तैल से विरेचन कराये ॥२९॥

विरिक्तं च यथाकालं नातिरूक्षाणि भोजयेत् । युक्तामुलवणोष्णानि युक्तस्नेहरसानि च ॥३०॥ भोजयेद्गुल्मिनं नित्यं निदानगुरुवर्जकम् । न चातिभोजनं नित्यं शस्यते सर्वगुल्मिनाम् ॥३१॥

विरेचन हो जाने पर उचित काल में रोगी को ऐसे पदार्थ खिलाये जो अत्यन्त रूक्ष न हों तथा जिनमें योग्य परिमाण में अम्ल तथा लवण पड़ा हो, जो उष्ण हो तथा अच्छी प्रकार स्निग्ध हों। रोगी को सदा निदान (वातिक गुल्म के कारण) तथा गुरु पदार्थों का त्याग कर देनो चाहिये। सब प्रकार के गुल्मरोगियों को अधिक भोजन करना हितकर नहीं है ॥३०-३१॥

पिप्पलीं पिप्पलीमूलं चव्यं चित्रकनागरम् । बिल्वं कपित्थं बदरं वृषकं गणिकारिकाम् ॥३२॥ हिङ्गुदाडिमजीवन्तीवृक्षाम्लं साम्लवेतसम् । पौष्करं शटिन्दन्त्यौ च लवणानि च सर्वशः ॥३३॥ द्वौ क्षारावजमोदं च तुल्यं शुष्काणि चूर्णयेत् । मातुलुङ्गरसेनेते वटका बदरोपमाः ॥३४॥ कृताः सुखाम्बुना पेया मद्यैरम्लेन वा भिषक्! । वातगुल्ममुदावर्तं प्लीहशूलं च नाशयेत् ॥३५॥

पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, सोंठ, बिल्व, कैथफल, बेर, बांसा, गणिकारिका (क्षुद्र अग्निमन्थ), हींग, अनारदाना, जीवन्ती, वृक्षाम्ल (विषांबिल), अम्लवेत, पुष्करमूल, शठि (कपूरकचरी-या कचूर), दन्ती (जमालगोटा) पांचों नमक, दोनों क्षार (सर्जक्षार तथा यवक्षार) तथा अजमोद-इन सबको समान मात्रा में लेकर शुष्क चूर्ण करे। बिजौरे के रस में भावना देकर इसकी बेर के समान गोलियां बनाये। इन्हें वैद्य गरम पानी या मद्य के अनुपान से सेवन कराये। इससे वातगुल्म, उदावर्त, तथा प्लीहाशूल, नष्ट हो जाता है ॥३२-३५॥

मयूरांस्तित्तिरीम् क्रौञ्चान् कपोतान् वनकुक्कुटान् । यवगोधूमशालींश्च वातगुल्मी सदाऽश्रि(श्री)यात् ॥३६॥

वातगुल्म में पथ्य—वातगुल्म का रोगी सदा मयूर, तीतर, क्रौञ्च, कबूतर और जंगली मुर्गे का मांस तथा जौ, गेहूं तथा शालि चावलों का सेवन करे। चरक चि. अ. ५ में भी कहा है—कुक्कुटांश्च मयूरांश्च तित्तिरिक्रौञ्चवर्तकाः । शालयो मदिरा सर्पिर्वातगुल्मभिषग्जितम् ॥ हितमुष्णं द्रवं स्निग्धं भोजनं वातगुल्मिनाम् । समण्डवारुणीपानं पक्वं वा धान्यकैर्जलम् ॥३६॥

यति तु स्निह्यमानस्य वातगुल्मो न शाम्यति । हितमास्थापनं तस्य तथैवाप्यनुवासनम् । क्षीरानुपानामभयां सगुडां संप्रयोजयेत् ॥३७॥

यदि स्नेहन करते हुए भी रोगी का वातगुल्म शान्त न हो तो उसे आस्थापन एवं अनुवासन बस्तियां देनी चाहिये तथा दूध के अनुपान से गुड़ और हरड़ को मिलाकर प्रयोग करना चाहिये। चरक चि. अ. ५ में भी गुल्म (वातिक) में बस्ति की श्रेष्ठता बताई है—बस्तिकर्म परं विद्याद् गुल्मघ्नं तद्धिमारुतम् । स्वे स्थाने प्रथमं जित्वा सद्यो गुल्ममपोहति ॥३७॥

१७० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | गुल्मचिकित्सिताध्यायः ? ]

गुल्मिनां बद्धवर्चसां ......................... । ..................................................... .....................................................

(इति ताडपत्रपुस्तके ११८ तमं पत्र¹म् ।)


तथा जिन्हें मलबन्ध रहता हो उन गुल्म रोगियों की ......... (स्नेहन के द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये)। .........................................................................................................

वक्तव्य— यह अध्याय उपर्युक्त श्लोक के मध्य में ही खण्डित हो गया है इसलिये उसी श्लोक के शब्दों को बतलाना तो कठिन है परन्तु फिर भी चरक चि. अ. ५ में कहा है—बद्धविण्मरुतं स्नेहैरादितः समुपाचरेत्। इसीके अनुसार उपर्युक्त श्लोक के भावार्थ को पूर्ण किया गया है। अथवा सुश्रुत उ. अ. ४२ में कहा है—बद्धवर्चोनिलानां तु सार्द्रकं क्षीरमिष्यते। अर्थात् उन्हें दूध में अदरक डालकर देनी चाहिये। इससे आगे इस अध्याय में अन्य गुल्मों की चिकित्सा दी जानी चाहिये। परन्तु इस अध्याय के मध्य में ही खण्डित हो जाने से वे उपलब्ध नहीं हैं। अतः हम पाठकों के साधारण ज्ञान के लिये अन्य आर्ष ग्रन्थों के आधार पर शेष गुल्मों की सामान्य चिकित्सा लिखेंगे। पित्तगुल्म की चिकित्सा चरक चि. अ. ५ में कहा है—स्निग्धोष्णोन्मर्दिते गुल्मे पैत्तिके स्त्रंसनं हितम्। रूक्षोष्णेन तु संभूते सर्पिः प्रशमनं परम्।। अर्थात् पित्तगुल्म में स्त्रंसन कराना चाहिये। तीव्र विरेचन नहीं देना चाहिये। सुश्रुत उ. अ. ४२ में कहा है—पित्तगुल्मर्दितं स्निग्धं काकोल्यादि घृतेन तु। विरिक्तं मधुरैर्योगैर्निरूहैः सानुवासनैः ।। अर्थात् काकोल्यादि घृत अथवा अन्य मधुरगण युक्त निरूहों से मृदु विरेचन देना चाहिये। यदि गुल्म के विदग्ध होने की सम्भावना हो तो विदाह से पूर्व ही रक्तावसेचन कराना चाहिये। इससे गुल्म विदाह को प्राप्त नहीं होगा। रक्तावसेचन के बाद जांगल पशुपक्षियों के मांस रसों से तर्पण करे। यदि किसी कारण से गुल्म में विदाह हो ही जाय तो उसमें शस्त्रकर्म ही करना चाहिये। चरक में कहा है—रक्तपित्तातिवृद्धत्वात्क्रियामनुपलभ्य च। यदि गुल्मो विदह्येत शस्त्रं तत्र भिषग्जितम्।। कफ गुल्म की चिकित्सा चरक चि. अ. ५ में कहा है—शीतलैर्गुरुभिः स्निग्धैर्गुल्मे वाते कफात्मके। अवम्यस्याल्पकायाग्नेः कुर्याल्लङ्घनमादितः ।। इसके बाद रोगी को उष्ण, कटु तथा तिक्त द्रव्यों का सेवन कराना चाहिये। यदि रोगी को आनाह तथा विबन्ध हो तो उसको युक्तिपूर्वक स्वेदन कराना चाहिये। इस प्रकार लङ्घन, वमन, एवं स्वेदन से अग्नि के प्रदीप्त हो जाने पर क्षार तथा कटु द्रव्यों से युक्त घी का प्रयोग करे। यदि गुल्म बहुत हठी हो अर्थात् ठीक न होता हो और जड़ जमाली हो तो उसमें देश, काल तथा ऋतु के अनुसार क्षार प्रयोग, अरिष्टपान तथा अग्निकर्म कराना चाहिये। चरक चि. च. ५ में कहा है—कृतमूलं महावास्तुं कठिनं स्तिमितं गुरुम्। जयेत्कफकृतं गुल्मं क्षारारिष्टाग्निकर्मभिः ।। दोषप्रकृतिगुल्मर्तुयोगं बुद्ध्वा कफोल्बणे । बलदोषप्रमाणज्ञः क्षारं गुल्मे प्रयोजयेत् ।। एकान्तरं द्वयन्तरं वा त्र्यहं विश्रम्य वा पुनः। शरीरबलदोषाणां वृद्धिक्षपणकोविदः ।। श्लेष्माणं मधुरं स्निग्धं मांसक्षीरघृताशिनः । भित्त्वाभित्त्वाऽऽशयात्क्षारः क्षरत्वात्क्षारयत्यधः ।। मन्देऽग्नावुरुचौ सात्म्ये मद्ये सस्नेहमशनताम्। प्रयोज्या मार्गशुद्ध्यर्थमरिष्टाः कफगुल्मिनाम् ।। लङ्घनोल्लेखनैः स्वेदैः सर्पिष्पानैर्विरेचनैः। बस्तिभिर्गुटिका चूर्णक्षारारिष्टगणैरपि ।। श्लैष्मिकः कृतमूलत्वाद्यस्य गुल्मो न शाम्यति। तस्य दाहो हृते रक्ते शरलोहादिभिर्हितः ।। औष्यात्तैक्ष्ण्याच्च शमयेदग्निर्गूल्मे कफानिलौ । तयोः शमाच्च संघातौ गुल्मस्य विनिवर्तते ।। सन्निपातिक गुल्म की चिकित्सा—व्यामिश्रदोषैर्व्यामित्र एष एव क्रियाक्रमः । अर्थात् सान्निपातिक गुल्म में दोषों के अनुसार उपर्युक्त मिश्रित चिकित्सा करनी चाहिये। रक्तगुल्म की चिकित्सा—रक्त गुल्म की चिकित्सा पित्तगुल्म की तरह ही की जाती है। सुश्रुत उ. अ. ४२ में कहा है—पित्तवद्रक्तगुल्मिन्या नार्याः कार्यः क्रियाविधिः । विशेषमपरं चास्याः शृणु रक्तविभेदनम् ।। पलाशक्षारलोपेन सिद्धं सर्पिः प्रयोजयेत् ।। दद्यादुत्तरवस्तिं च


१. अस्याग्रे पत्रमेकं खण्डितं ताडपत्रपुस्तके ।

कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ]चिकित्सास्थानम्१७१

पिप्पल्यादिघृतेन तु। ऊर्ध्वौर्वा भेदयेन्निन्ने विधिरासृग्दरोहितः॥ अर्थात् इसमें अधोगत रक्तपित्त की चिकित्सा करनी चाहिये। रक्तगुल्म की चिकित्सा का विधान १० मास व्यतीत हो जाने के बाद दिया गया है। चरक चि. अ. ५ में कहा है—स रौधिरः स्त्रीभव एव गुल्मो। मासि व्यतीते दशमे चिकित्स्यः॥ क्योंकि उस समय ही यह सुख साध्य होता है। कहा भी है—'रक्तगुल्मे पुराणत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम्'। इसे देखकर कई लोग कहते हैं कि प्राचीन आचार्यों को रक्तगुल्म तथा गर्भ की भेदक पहचान न होने से ही १० वें मास (गर्भ काल) के व्यतीत हो जाने पर चिकित्सा करने का लिखा है। परन्तु उनका यह विचार ठीक नहीं है क्योंकि 'यः स्पन्दते पिण्डित एव नाङ्गैः, द्वारा उन्होंने गुल्म का गर्भ से स्पष्ट भेद दिखाया है। इसलिये प्राचीन आचार्य इससे अनभिज्ञ नहीं थे अपितु १०वें मास के बाद जो चिकित्सा का विधान लिखा है वह उसके सुखसाध्य होने के कारण ही लिखा है। १० मास व्यतीत हो जाने के बाद रक्तगुल्म के रोगी (स्त्री) को स्नेहन तथा स्वेदन के बाद एरण्ड तैल अथवा किसी अन्य स्नेह का विरेचन देना चाहिये। चरक में कहा है—रौधिरस्य तु गुल्मस्य गर्भकालव्यतिक्रमे। स्निग्धस्विन्नशरीरायै दद्यात्स्नेहविरेचनम्॥ गुल्म को शिथिल करने के लिये पलाशक्षारयमक—(पलाश क्षार के साथ समभाग तिलतैल तथा घृत का पाक करने से बनता है) का प्रयोग करना चाहिये। यदि इन प्रयोगों से भी गुल्म का भेदन न हो तो रोगिणी को उत्तरबस्ति (दशमूलक्वाथ की) तथा योनिविशोधन करना चाहिये। योनि से रक्त के प्रवृत्त होने पर उसे मांसरस और ओदन खाने को दे तथा घी और तेल की मालिश करे तथा पीने के लिये मद्य दे। आगे प्रकृत ग्रन्थ के खिलस्थान के रक्तगुल्मविनिश्चयाध्याय में इस विषय का विशद विवेचन स्वयं आचार्य ने किया है। वहां गर्भ से रक्तगुल्म का भेद, उसके लक्षण एवं चिकित्सा आदि का विस्तार से वर्णन किया है। इस विषय को पाठक वहां पर देखें।

कुष्ठचिकित्सिताऽध्यायः ।

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स्वेदो वाऽतिखरत्वमङ्गानामतिश्लक्ष्णता वा वैवर्ण्यं रौक्ष्यं लोमहर्षः पिपासा गौरवं रागो दौर्बल्यं वेपथुः पिडकारुषां संभवश्चातिवेदना च क्षतविसर्पणमिति ।।

वक्तव्य—इस अध्याय में कुष्ठ रोगों की चिकित्सा कही गई है। यह अध्याय प्रारंभ में खण्डित है। उस अंश में कुष्ठ रोग के उत्पन्न होने के कारण तथा सम्प्राप्ति इत्यादियों का वर्णन किया गया होगा। तथा 'स्वेदो वाऽतिखरत्वं' इत्यादि अध्याय के प्रारंभिक वाक्य द्वारा कुष्ठों के पूर्वरूप दिये गये हैं। अब हम अध्यायोक्त विषय पर आते हैं—

कुष्ठों के पूर्वरूप—स्वेद (स्वेद का अधिक आना या बिलकुल न आना), अङ्गों की खरता (खुरदरापन) अथवा अत्यन्त चिकना होना, वर्ण का विकृत हो जाना, रूक्षता, लोम (रोम) हर्ष, प्यास, शरीर का भारीपन, उस स्थान का लाल होना, दुर्बलता, कंपकंपी, पिडकाओं तथा छोटी २ फुन्सियों की उत्पत्ति, अत्यन्त वेदना तथा क्षतविसर्प—ये कुष्ठों के पूर्वरूप होते हैं। चरक नि. अ. ५ में कुष्ठ के निम्न पूर्वरूप दिये हैं—तेषामिमानि खलु पूर्वरूपाणि; तद्यथा-अस्वेदन-प्रतिस्वेदन-पारुष्यमतिश्लक्ष्णता वैवर्ण्यं कण्डूर्निस्तोदः सुप्तता परिदाहः परिहर्षो लोमहर्षः खरत्वमुष्मायणं गौरवं श्वयथुर्विसर्पणमभीक्ष्णं कायच्छिद्रेषूदेहपक्वदग्धदष्टक्षतोपस्खलितेष्वतिमात्रं वेदना स्वल्पानामपि च व्रणानां दुष्टिरसंरोहणं चेति कुष्ठपूर्वरूपाणि भवन्ति। चरक चि. अ. ७ में भी कहा है—स्पर्शाज्ञत्वमतिस्वेदो न वा वैवर्ण्यमुन्नतिः। कोठानां लोमहर्षश्च कण्डूस्तोदः श्रमः क्लमः॥ व्रणानामधिकं शूलं शीघ्रोत्पत्तिश्चिरस्थितिः। दाहः सुप्ताङ्गता चेति कुष्ठलक्षणमग्रजम्॥ इसी प्रकार सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—त्वक्पारुष्यमकस्माद्रोमहर्षः कण्डूः स्वेदबाहुल्यमस्वेदनं वाऽङ्गप्रदेशानां स्वापः क्षतविसर्पणमसृजः कृष्णता चेति॥

१७२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ]

तत ऊर्ध्वमक्रियावतां कुष्ठानि जायन्ते। तत्र, श्यावारुणशूलकण्डूचिमिचिमखरत्वपारुष्य-संस्तम्भायामैर्वातोत्तराणि विद्यात्; दाहवेदनाज्वरविभेदोषायनपाकस्त्रावकोठानिकर्णा(?) क्षिप्रोत्थानैः शीतमधुरकषाय सर्पिरनुशयैश्च पित्तोत्तराणि विद्यात्; श्वेतपाण्डुघनोत्सेधगुरुस्तैमित्यस्तम्भमहापरिग्रहाग्निसार्दैः शीतादितरानुशयैः कफोत्तराणि विद्यात्; व्याविद्धरूपबहुस्फुटितपरिस्रावकृमिदाहरुजोपेतशरीरावयवपातनमशुचिविगन्धिशोथबहुलमनेकोपद्रवं सान्निपातिकं रक्तत्वात् काकणमित्युच्यते। द्विदोषजानीतराणि; तान्यनुव्याख्यामः—वातोत्तरे कपालकुष्ठं, पित्तोत्तरे त्वौदुम्बरं, कफोत्तरे मण्डलकुष्ठं, वातपैत्तिकमृष्यजिह्वं, पित्तश्लैष्मिकं पौण्डरीकं सिध्मं च, इति समासलक्षणम्। विस्तरतस्त्वष्टादश कुष्ठानि; तान्यनुव्याख्यास्यामः—सिध्मं च विचर्चिका च पामा च दद्रुश्च किटिभं च कपालं च स्थूलारुष्कं च मण्डलकुष्ठं च विषजं चेति नव साध्यानि; पौण्डरीकं च श्वित्रं च ऋष्यजिह्वं च शतारुष्कं चौदुम्बरं च काकणं च चर्मदलं चैककुष्ठं च विपादिका चेति नवासाध्यानि। सर्वं तु कुष्ठं त्वङ्मांसरुधिरलसीकाश्रयं स्पर्शघ्नं चेति; वर्धमान च वैरूप्यकरं भवति। तत्तृ(त्र) रजोध्वस्तमलाबुवारणपुष्पीपुष्यसदृशं सिध्मं; श्यामलोहितव्रणवेदनास्त्रावपाकवती विचर्चिका; कण्डूतोदपाकस्त्रावारुष्मती पामा; रौक्ष्यकण्डूदाहस्त्राववन्ति मण्डलानि वृद्धिद्विमन्ति दद्रुः; कृष्णाश्यावारुणखरपरुषस्त्रावृद्धिमन्ति गुरूणि प्रशान्तानि च पुनः पुनरुत्पद्यन्ते किटिभानि; कृष्णखरपरुषमलिनमनेक-संस्थानमण्डलं मण्डूलमृतुसन्धिषूष्णो चातिबाधते कपालाकृति कपालं; पिच्छास्त्राववेदनादाह-कण्डूतोदज्वरवैसर्पमहाव्रणपरिग्रहं मृदुखरनिभं महारुष्कं; मण्डलैर्रन्धुजीवकुसुमोपमर्दैककण्डूवेदनास्त्राव-वद्धिर्मण्डलकुष्ठं; लूताकीटपतङ्गसर्पदशनदष्टमुपेक्षितं व्यभिचारेण खरीभवति कृच्छ्रसाध्यं विषजं; महाशयसमुत्सेधं जातं चिराद्भैदि पुण्डरीकपलाशवर्णं पौण्डरीकं; श्वेतभावाच्छिवत्रं पञ्चविधमुत्तरत्रोपदेक्ष्यामः; ऋष्यजिह्वोपमं पारुष्यवैवर्ण्यगौरवर्णविक्केदैर्ऋष्यजिह्वं; नीललोहितपीतासितैरनेकैरुद्धिः खरैः स्त्राविभिरुपद्रुतं शतारुष्कं; पक्वोदुम्बरफलसदृशमस्त्रावि जडमननेकमौदुम्बरं व्याख्यातं; काकणं हस्तिचर्मसदृशं खरं; वृद्धिमच्चर्मदलं वैसर्पोद्भवं नित्यविसर्पि स्त्राववेदनाक्रिमिमदेककुष्ठं; पाणिपादाङ्गुष्ठोष्ठजङ्घादण्डदेशेषुस्फुटित-स्त्राविवेदनावतीमविपाकिनीं विपादिकां विद्यात्। सर्वरोगाश्चैव मोहादुपेक्ष्यमाणा असाध्यतां यान्ति, असाध्यास्त्वाशु नृणां घ्नन्ति; तस्मादात्महितायाशु प्रयतेत्।

इसके बाद यज्ञ, याग, होम, बलि, अतिथि-सेवा आदि क्रियाएं न करने वाले व्यक्तियों को कुष्ठ उत्पन्न हो जाते हैं। चरक चि. अ. ७ में कुष्ठों का निदान देते हुए अन्य कारणों के साथ "विप्रान् गुरून् धर्षयतां पापं कर्म च कुर्वताम्' भी दिया हुआ है। वातिक कुष्ठ के लक्षण—श्याव (काला), अरुण (लाल), शूल, कण्डू (खुजली), चिमचिमाहट, खरता (खुरदरापन), पारुष्य (कठोरता), संस्तम्भ (स्तब्धता), आयाम (फैलाव) इत्यादि लक्षणों से वातिक कुष्ठ जाने। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—'कुष्ठेषु तु त्वक्संकोचस्वापस्वेदशोफभेदकौष्ण्यस्वरोपघाता वातेन''। चरक चि. अ. ७ में भी कहा है—रौक्ष्यं शोषस्तोदः शूलं संकोचनं तथाऽऽयासः। पारुष्यं खरभावो हर्षः श्यावारुणत्वं च ।। कुष्ठेषु वातलिङ्गं ।। पैत्तिक कुष्ठ के लक्षण—दाह, वेदना, ज्वर, विड्भेद (अतिसार), ऊषायन (जलन), पाक (पकना), स्त्राव, कोष्ठ, निकर्णा, शीघ्र उत्थान (उत्पत्ति, वृद्धि) तथा शीतल मधुर कषाय द्रव्य एवं घृत से शान्ति हो जाना—ये पैत्तिक कुष्ठ के लक्षण हैं। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—"पाकावदरणाङ्गुलिपतनकर्णनासाभङ्गाक्षिरागसत्वोत्पत्तयः पित्तेन''। यहां 'सत्वोत्पत्तयः' से अभिप्राय कृमियों की उत्पत्ति से है। चरक चि. अ. ७ में भी कहा है—दाहो रागः परिस्रवः पाकः। विस्रो गन्धः क्लेदस्तथाऽङ्गपतनं च पित्तकृतम् ।। श्लैष्मिक कुष्ठ के लक्षण श्वेत, पाण्डु, घन, उत्सेध (ऊंचाई), गुरु (भारीपन), स्तिमितता, स्तम्भ, महापरिग्रह (बड़े मूल वाला होना), अग्निसार्द (अग्निमांद्य), तथा शीत के विपरीत अर्थात् उष्णता से शान्ति होना ये श्लैष्मिक कुष्ठ के लक्षण हैं। सुश्रुत नि. अ. ५ में कहा है—कण्डूवर्णभेदशोफास्त्रावगौरवाणि

कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ]चिकित्सास्थानम्१७३

श्लेष्मणा। चरक चि. अ. ७ में कहा है—शैत्यं शैत्यं कण्डूः स्थैर्य सोत्सेधगौरवस्नेहाः। कुष्ठेषु तु कफलिङ्गं जन्तुभिरभिमक्षणं क्लेदः।। सन्निपातिक कुष्ठ के लक्षण—लक्षणों का मिश्रित होना, बहुत स्फुटित (फटा हुआ) होना, परिस्राव (बहना), कृमि तथा दाह रोग से युक्त होना, शरीर के अवयवों का गिरना, अपवित्र, दुर्गन्धि तथा शोथ की अधिकता, अनेक उपद्रवों से युक्त होना—ये सान्निपातिक कुष्ठ के लक्षण हैं। यह लाल होने के कारण काकणक कहलाता है (काकणक रत्ती को कहते हैं जिसका रंग लाल होता है—इसीलिये लाल होने के कारण इसे काकणक कहते हैं) इसके अतिरिक्त द्विदोषज (दो २ दोषों के संसर्ग से उत्पन्न होने वाले अर्थात् वातपित्त, पित्तश्लेष्म तथा वातश्लेष्म) होते हैं। उनकी हम आगे व्याख्या करेंगे। वात की अपेक्षाकृत अधिकता होने पर कपालकुष्ठ, पित्त की अधिकता होने पर औदुम्बर कुष्ठ, कफ की अधिकता, होने पर मण्डल कुष्ठ, वात और पित्त की अधिकता होने पर ऋष्य जिह्व, तथा पित्त और श्लेष्मा की अधिका होने पर पौण्डरीक और सिध्म कुष्ठ होते हैं—ये संक्षेप से लक्षण कहे हैं। वास्तव में सभी कुष्ठ तीनों दोषों से उत्पन्न होने के कारण त्रिदोषज ही हैं तथापि भिन्न २ दोषों की प्रधानता के कारण ही ऐसा निर्देश किया गया है। चरक में पित्त और श्लेष्मा की अधिकता में पुण्डरीक तथा वात और कफ की अधिकता में सिध्म कुष्ठ—ये पृथक् २ दिये हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—वातेऽधिकतरे कुष्ठं कापालं मण्डलं कफे। पित्ते त्वौदुम्बरं विद्यात्काकणं तु त्रिदोषजम्॥ वातपित्ते श्लेष्मपित्त वताश्लेष्मणि चाधिके। ऋष्य जिह्वं पुंडरीकं सिध्मकुष्ठं च जायते॥ अब हम विस्तार से जो १८ प्रकार के कुष्ठ हैं उनकी व्याख्या करेंगे—१. सिध्म २. विचर्चिका ३. पामा ४. दद्रु ५. किटिभ ६. कपाल ७. स्थूला रुष्क ८. मण्डल ९. विषज—ये नौ ९ साध्य कुष्ठ हैं। तथा १. पौण्डरीक २ श्वित्र ३ ऋष्यजिह्व ४. शतारुष्क, ५. औदुम्बर ६. काकणक ७. चर्मदल ८ एककुष्ठ ९ विपादिका ये नौ ९ असाध्य कुष्ठ हैं। चरक तथा सुश्रुत में क्षुद्रकुष्ठ तथा महाकुष्ठ भेद दिये हैं। क्षुद्रकुष्ठ ११ तथा महाकुष्ठ ७ होते हैं। चरक के अनुसार—१. कपाल २. औदुम्बर ३. मण्डल ४. ऋष्यजिह्व ५. पुण्डरीक ६. सिध्म तथा ७. काकणक—ये ७ महाकुष्ठ हैं। तथा १. एककुष्ठ २ चर्मकुष्ठ ३ किटिभ ४. विपादिका ५. अलसक ६. दद्रु ७ चर्मदल ८ पामा ९ विस्फोट १० शतारु ११ विचर्चिका—ये ११ क्षुद्रकुष्ठ दिये हैं। प्रकृत ग्रन्थोक्त १८ प्रकार के कुष्ठों में से चरक में स्थूलारुष्क, विषज तथा श्वित्र का उल्लेख नहीं है। तथा चरक में आये हुए चर्माख्य, अलसक तथा विस्फोटक कुष्ठ का इस ग्रन्थ में उल्लेख नहीं है। चरक में श्वित्र (किलास) का वर्णन इनसे पृथक् दिया है। इस ग्रन्थ के समान इसका इन १८ प्रकार के कुष्ठों में परिगणन नहीं किया गया है। इसी प्रकार सुश्रुत के अनुसार—१. अरुण २. औदुम्बर ३. ऋष्यजिह्व ४. कपाल ५. काकणक ६. पुण्डरीक ७. दद्रु—ये ७ महाकुष्ठ हैं। तथा १. स्थूलारुष्क २. महाकुष्ठ ३. एककुष्ठ ४. चर्मदल ५. विसर्प ६. परिसर्प ७. सिध्म ८ विचर्चिका ९. किकिभ (म) १०. पामा तथा ११. रसका—ये ११ महाकुष्ठ होते हैं। ये सब कुष्ठ त्वचा, मांस, रुधिर (रक्त) तथा लसीका के आश्रित होते हैं और स्पर्श ज्ञान को नष्ट करने वाले हैं तथा वृद्धि को प्राप्त होने पर विरूपता कर देते हैं। अर्थात् दूषित वात, पित्त, कफ, त्वचा, रक्त, मांस एवं लसीका को दूषित कर देते हैं। अर्थात् ये चारों दूषित धातुएं कुष्ठ के आश्रय हैं चरक चि. अ. ७ में कहा है—वातादयस्त्रयो दुष्टास्त्वग्रक्तं मांसमम्बु च। दूषयन्ति स दुष्टानां सप्तको द्रव्यसंग्रहः॥ इसी प्रकार चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—दूष्याश्च शरीरधातवस्त्वङ्मांसं शोणितलसीकाश्र्चतुर्थी दोषोपघातविकृताः (विसर्प में भी ये ही तीनों दोष तथा त्वचा, रक्त, मांस एवं लसीका आदि चारों दूष्य भाग लेते हैं। इन दोनों का भेद हमने खिलस्थान के विसर्पचिकित्साध्याय की व्याख्या में दिया है। इसे वहीं देखें) सिध्म कुष्ठ के लक्षण—जिसपर धूलि लगी हुई प्रतीत हो, तथा जो धियाकददू एवं वारणपुष्पी के फूल के समान हो—वह सिध्मकुष्ठ है। चरक नि. अ. ५ में कहा है—परुषाणूंविशीर्णबहिरन्तनून्यन्तःस्निग्धानि शुक्लरक्तावभासानि बहून्यल्पवेदनान्यल्प-कण्डूदाहपूयलसीकानि लघुसमुत्थानान्यल्पभेदकृमीण्यलाबुपुष्पसङ्गाशानि सिध्मकुष्ठानीति विद्यात्। चरक चि. अ. ७ में भी कहा है—श्वेतं ताम्रं तनु च यद्रजो घृष्टं विमुञ्चति। अलाबुपुष्पवर्णं तत् सिध्मं प्रायेण चोरसि। अर्थात् यह छाती में होता है इसे अंगरेजी में Ptyriasis Versicolor या Ptyriasis cloasma कहते हैं। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—कण्ड्वन्वितं श्वेतमपाति सिध्न विद्यात्तनु प्रायश ऊर्ध्वकाये। यहां सिध्म को साध्य कुष्ठों में गिना है। चरक में इसे महाकुष्ठ

१७४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ]

तथा सुश्रुत में क्षुद्रकुष्ठ के रूप में दिया है। इस विरोध के निराकरण के लिये सुश्रुत की टीका में डल्हण ने लिखा है कि-‘सिध्मकुष्ठं द्विविधं–सिध्मं पुष्पिकासिध्मं च। पुष्पिकासिध्मस्य सुखसाध्यत्वात् सुश्रुते क्षुद्रकुष्ठेषु पाठः, सिध्मस्य दुःखसाध्यत्वाच्चरके महाकुष्ठ पाठ इत्यदोषः। अर्थात् सिध्मकुष्ठ के दो भेद हैं १ सिध्म २ पुष्पिका सिध्म। पुष्पिका सिध्म के सुख साध्य होने से उसके अनुसार सुश्रुत में इसे क्षुद्रकुष्ठों में दिया गया है तथा सिध्म के कष्टसाध्य होने के कारण चरक में इसे महाकुष्ठों में गिना गया है। इस ग्रन्थ में भी पुष्पिकासिध्म को दृष्टि में रखते हुए ही इसे साध्य कुष्ठों में दिया गया है। विचर्चिका का लक्षण—इसमें कृष्ण तथा लोहित (लाल) वर्ण के व्रण होते हैं जिसमें वेदना (पीडा) स्राव तथा पाक होता है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—सकण्डुपिडका श्यावा बहुस्रावा विचर्चिका। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—राजयोऽतिकण्ड्वर्तिरुजः सरूक्षा भवन्ति गात्रेषु विचर्चिकायाम्। कण्डूमती दाहरुजोपपन्ना॥ इसे अंगरेजी में (Pemphigus) कहते हैं। पामा का लक्षण–इसमें कण्डू, तोद, पाक, स्राव तथा छोटी २ फुन्सियां होती है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—पामा श्वेतारुणश्यावाः पिडका कण्डुला भृशम्। इसी प्रकार सुश्रुत नि. अ. ५ में कहा है—सास्रावकण्डूपरिदाहकाभिः पामाऽणुकाभिः पिडकाभिरुह्याः॥ इसे आधुनिक विज्ञान के अनुसार (Eezema) कहते हैं। दद्रू का लक्षण—ये रूक्षता, कण्डू, दाह एवं स्राववाले मण्डलाकार तथा बढ़ने वाले होते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—सकण्डूरागपिडकं दद्रूमण्डलमुद्गतम्। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—अतसीपुष्पवर्णानि ताम्राणि वा विसर्पिणि पिडकावन्ति च दद्रुकुष्ठानि। इसे (Ringworm) कहते हैं। दद्रुकुष्ठ को चरक में क्षुद्रकुष्ठों में तथा सुश्रुत में महाकुष्ठों में गिना गया है। सिध्म की तरह इसके भी सित तथा असित दो भेद हैं। असित (दद्रू) कुष्ठ के असाध्य होने से सुश्रुत में महाकुष्ठ में तथा सित के सुखसाध्य होने से इसका चरक में क्षुद्रकुष्ठों में परिगणन किया गया है। सुश्रुत नि. अ. ५ की टीका में डल्हण ने लिखा है—“दद्रुकुष्ठं द्विविधं सितमसितं च, असितस्य महोपक्रमसाध्यत्वादनुबन्धित्वप्रकर्षाच्च महाकुष्ठेषु मध्ये सुश्रुते पाठः, सितदद्रुकुष्ठस्य सुखसाध्यत्वादुत्तरोत्तरधात्वनुप्रवेशाभावत्ताऽत्यर्थपीडारहितत्वाच्च चरके क्षुद्रकुष्ठेषु मध्ये पाठ इत्यदोषः”। किटिभ का लक्षण–ये कृष्ण, श्याव एवं अरुण वर्ण वाले, खुरदरे, कठोर, स्रावयुक्त और बढ़ने वाले होते हैं। बड़े होते हैं, तथा एक बार शान्त होकर पुनः २ हो जाते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—श्यावं किणखरस्पर्शं परुषं किटिभं स्मृतम्। अर्थात् ये किण (Scar) के समान खुरदरे तथा कठोर होते हैं। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—यत् स्रावि वृत्तं घनममुग्रकण्डु। तत् स्निग्धकृष्णं किटिभं (मं) वदन्ति॥ इसमें खुजली बहुत अधिक होती है, इसे (Psoriasis) कहते हैं। कपालकुष्ठ के लक्षण–यह कृष्ण वर्ण का, खुरदरा, कठोर तथा मैला, अनेक स्थानों वाला तथा मण्डलाकार होता है। इसमें खुजली होती है। दो ऋतुओं की सन्धियों (जहां दो ऋतुओं का मेल होता है–एक ऋतु समाप्त होती है तथा दूसरी प्रारंभ होती है) में और उष्णकाल में अत्यन्त कष्ट पहुंचता है। तथा कपाल (घड़े के ठीकरे) की आकृति वाला होता है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—कृष्णारुणकपालाभं यद्रूक्षं परुषं तनु। कपालं तोदबहुलं तत्कुष्ठं विषमं स्मृतम्॥ इसी प्रकार चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—रूक्षारुणपरुषाणि विषमविसृतानि. खरपर्यन्तानि तनून्युद्वृत्तबहिस्तनूनि सुप्तसुप्तानि हृषितलोमाचितानि निस्तोदबहुलान्यल्पकण्डूदाहपूल्यसीकान्याशुगतिसमुत्थानान्याशुभेदीनि जन्तुमन्ति कृष्णारुणकपालवर्णानि कापालकुष्ठानीति विद्यात्। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—“कृष्णकपालिकाप्रकाशानि कपालकुष्ठानि”। स्थूलारुष्क या महारुष्क कुष्ठ का लक्षण–जो पिच्छा (चिपचिपापन), स्राव, वेदना, दाह, कण्डू, तोद, ज्वर, विसर्प (Erysipelas) तथा जो मूल में बड़े २ व्रणों से युक्त हो तथा मृदु एवं खुरदरा हो उसे महारुष्क कहते हैं। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—स्थूलानि सन्धिष्वतिदारुणानि। स्थूलारूषि स्युः कठिनान्त्यरुंषि॥ अर्थात् इसमें अत्यन्त दारुण एवं बड़े २ व्रण होते हैं। चरक में इसका परिगणन नहीं किया गया है। मण्डलकुष्ठ–इसमें दोपहरिया के फूलों के सदृश (लालरंग के) मण्डल होते हैं तथा दाह, कण्डू, वेदना और स्राव होते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—श्वेतं रक्तं स्थिरं स्त्यानं स्निग्धमुत्सन्नमण्डलम्। कृच्छ्रमन्योन्यसंसक्तं कुष्ठं मण्डलमुच्यते॥ अर्थात् इसमें मण्डल परस्पर एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं। चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—स्निग्धानि गुरूण्युत्सेधवन्ति श्लक्ष्णस्थिरपीनपर्यन्तानि शुक्लरक्तावभासानि शुक्लरोमराजीसन्तानानि बहुबहलशुक्लपिच्छिलस्रावीणि बहुक्लेदकण्डूकृमीणि

कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १७५

सक्तगतिसमुत्थानभेदीनि परिमण्डलानि मण्डलकुष्ठानीति विद्यात्। (बन्धुपुष्प एक वृक्ष होता है जिसका फूल मध्याह्न में विकसित होता है इसे दुपहरिया (Pantapetes Phoenicea) कहते हैं। इसका फूल लाल रंग का होता है। रा. नि. में कहा है—अस्य पुष्पं मध्याह्ने विकसति पराह्ने च सूर्योदये शुष्यति। विषज कुष्ठ के लक्षण-मकड़ी, कीड़े, पतंगे, तथा सांप के दांतों से काटे हुए की यदि उपेक्षा की जाय तो वह स्थान खर (खुरदरा) हो जाता है-इसे विषज कुष्ठ कहते हैं यह कृच्छ्र साध्य होता है। पौण्डरीक कुष्ठ के लक्षण-जो बड़े आशय वाला एवं उन्नत हो, जो देर में उत्पन्न हो तथा देर में ही फटे, जो पुण्डरीक (रक्तकमल) तथा पलाश के वर्ण का हो उसे पौण्डरीक कहते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है-सश्वेतं रक्तपर्यन्तं पुण्डरीकदलोपमम्। सोत्सेधं च सरागं च पुण्डरीकं तदुच्यते ।। चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—शुक्लरक्तावभासानि रक्तपर्यन्तानि रक्तराजीसन्ततान्युत्सेधवन्ति बहुबहलरक्तपूयलसीकानि कण्डूकृमिदाहपाकवन्त्याशुगतिसमुत्थानभेदीनि पुण्डरीकपलाशसङ्काशानि पुण्डरीकाणीति विद्यात्। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—पुण्डरीक पत्रप्रकाशानि पौण्डरीकाणि श्लेष्मणा। श्वित्रकुष्ठ-श्वेत होने से इसे श्वित्र कहते हैं। इसके ५ प्रकारों का आगे वर्णन करेंगे। चरक में १८ प्रकार के कुष्ठों से भिन्न श्वित्रकुष्ठ का वर्णन किया है। इसे किलास भी कहा है। सुश्रुत नि. अ. ५ में कहा है-‘‘किलासमपि कुष्ठविकल्प एव, तत्रिविधं वातेन, पित्तेन, श्लेष्मणा चेति’’। अर्थात् इन दोनों में भेद यह है कि कुष्ठ तो त्वचा, रक्त तथा मांस में अधिष्ठित होकर त्वचा में प्रकट होता है परन्तु इसके विपरीत किलास केवल त्वचा में ही अधिष्ठित होता है। कहा है—‘‘कुष्ठकिलासयोरन्तरं त्वग्गतमेव किलासमपरिस्रावि च’’। कुछ लोग त्वचा में स्थित होने पर उसे किलास कहते हैं तथा उसी के धातुओं में प्रवेश करने पर श्वित्र कहते हैं। कहा भी है—त्वग्गतन्तु यदस्रावि किलासं तत्रकीर्तितम्। यदा त्वचमतिक्रम्य तद्धातूनवगाहते ।। हित्वा किलाससंज्ञां च श्वित्रसंज्ञां लभेत तत् ।। चरक चि. अ. ७ में श्वित्र के ३ भेद दिये हैं—दारुणं चारुणं श्वित्रं किलासं नामभिस्त्रिभिः। यदुच्यते तत् त्रिविधं त्रिदोषं प्रायशश्च तत् ।। अर्थात् किलास (श्वित्र) के दारुण, चारुण और श्वित्र ये तीन भेद हैं। भालुकितन्त्र में भी धात्वाश्रय के भेद से किलास के तीनों भेद दिये हैं—वारुणं तत्तु विज्ञेयमांसधातुसमाश्रयम्। मेदः श्रितं भवेच्छ्वित्रं दारुणं रक्तसंश्रयम्। अर्थात् जब किलास का आश्रय मांस होता है तब उसका नाम वारुण (चरक के अनुसार चारुण) होता है। मेद में आश्रित होने पर श्वित्र तथा रक्त में आश्रित होने पर दारुण कहते हैं। यह रोग जैसा कि पहले कहा जा चुका है, केवल त्वचागत ही होता है। यहां दी हुई मांस मेद तथा रक्त धातुओं का यही अभिप्राय है कि दोष उन २ धातुओं में आश्रित रहता हुआ ही त्वचा में क्रमशः ताम्र, श्वेत तथा रक्तवर्णों को उत्पन्न करता है। अन्य कुष्ठों की तरह इसमें धातुसंबन्धी विशेष विकार उत्पन्न नहीं होते हैं। श्वित्र या किलास को आधुनिक विज्ञान के अनुसार Leuco derma कहा जा सकता है। ऋष्यजिह्व— जो ऋष्य (नीले अण्डकोष वाले हरिण) की जिह्वा के समान, कठोर, विवर्ण, गौरवर्ण एवं क्लेद से युक्त होता है उसे ऋष्यजिह्व कहते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—कर्कशं रक्तपर्यन्तमन्तःश्यावं सवेदनम्। यदृष्यजिह्वा संस्थानमृष्यजिह्वं तदुच्यते ।। इसी प्रकार चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—परुषाण्यरुणवर्णानि बहिरन्तः-श्यावानि नीलपीतताम्रावभासान्याशुगतिसमुत्थानान्यल्पकण्डूक्लेदकृमीणि दाहभेदनिस्तोदपाकबहुलानि शूकोपहतोपमवेदनान्युत्सन्नमध्यानि तनुपपर्यन्तानि कर्कशपिडकाचितानि दीर्घपरिमण्डलानि ऋष्यजिह्वाकृतीनि ऋष्यजिह्वानीति विद्यात्। सुश्रुत नि. अ. ५ में कहा है—ऋष्यजिह्वाप्रकाशानि खराणि ऋष्यजिह्नानि। कोई ऋष्य जिह्व के स्थान पर ऋक्षजिह्व पढ़ते हैं उस अवस्था में ऋक्ष का अर्थ रीछ करना होगा। शतारुष्क कुष्ठ का लक्षण—स्रावों से युक्त नीले, लाल, पीले, काले आदि अनेक वर्णों वाले कठोर व्रणों से युक्त होता है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—रक्तं श्यावं सदाहार्ति शतारुः स्याद् बहुव्रणम्। इसे Rupia कहते हैं। औदुम्बर कुष्ठ का लक्षण—जो पके हुए गूलर के फल के समान, बिना स्राव वाला तथा अनेक जड़ों (Roots) वाला होता है उसे औदुम्बर कुष्ठ कहते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—कण्डूविदाहरुग्रागपरीतं लोमपिञ्जरम्। उदुम्बरफलाभासं कुष्ठमौदुम्बरं विदुः ।। चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—ताम्राणि ताम्रखररोमराजीभिरवनद्धानि बहलानि बहुबहलरक्तपूयलसीकानि कण्डूक्लेदकोथदाहपाकवन्त्याशुगतिसमुत्थानभेदीनि ससन्तापकृमीणि पक्वोदुम्बरफलवर्णाण्युदुम्बरकुष्ठानीति विद्यात्। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है-“पित्तेन पक्वोदुम्बरफलाकृतिवर्णान्यौदुम्बराणि”।

३४ का.सं.

१७६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ]

काकण कुष्ठ का लक्षण—यह हाथी के चमड़े के समान खुरदरा होता है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—यत्काकणन्तिकावर्णमपाकं तीव्रवेदनम्। त्रिदोषलिङ्गं तत्कुष्ठं काकणं नैव सिध्यति ।। अर्थात् यह असाध्य माना गया है। चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—काकणन्तिकावर्ण्यान्त्यादौ पश्चात्सर्वकुष्ठलिङ्गसमन्वितानि पापीयासं सर्वकुष्ठलिङ्गसंभवेनानेकवर्णानि काकणकानीति विद्यात्, तान्यसाध्यानि। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—'काकणन्तिकाफलसदृशाण्यतीवरक्तकृष्णानि । अर्थात् रत्ती के समान चारों ओर से अत्यन्त लाल तथा बीच में काला होने के कारण ही इसका यह नाम है। चर्मदल—यह वृद्धि वाला होता है—अर्थात् यह निरन्तर बढ़ता चला जाता है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—रक्तं सकण्डुसस्फोटं सरुग् दलति चापि यत्। तच्चर्मदलमाख्यातं संस्पर्शासहमुच्यते ।। अर्थात् इसमें हाथ आदि के स्पर्श से तीव्र वेदना होती है। सुश्रुत नि. अ. ५ में कहा है—स्युर्येन कण्डूव्यथनौषचोषास्तलेषु तच्चर्मदलं वदन्ति। यह हाथों तथा पैरों की तलियों में होता है। इसे आधुनिक विज्ञान के अनुसार Zeroderma कहते हैं। एककुष्ठ—जो विसर्प से उत्पन्न हुआ हो, सदा विसर्पण करता हो (फैलता हो) तथा स्राव, वेदना एवं कृमियों से युक्त हो। चरक चि. अ. ७ में कहा है—अरवेदनं महावास्तु यन्मत्स्यशकलोपमम्। तदेककुष्ठं, .............. ।। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—कृष्णारुणं येन भवेच्छरीरं तदेककुष्ठं प्रवदन्ति कुष्ठम् ।। विपादिका का लक्षण—जो हाथ, पैर, अंगुष्ठ, ओष्ठ, तथा जङ्घाओं में फट जाता हो, जिसमें स्राव तथा वेदना होती हो तथा जिसका पाक न होता हो अर्थात् पकता न हो उसे विपादिका कहते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—वैपादिकं पाणिपादस्फुटनं तीव्रवेदनम्। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—विपादिका पादगतेयमेव। डल्लण ने इसकी टीका में लिखा है—इयमेव विचर्चिका पादगता यदा स्यात्तदा विचर्चिकासंज्ञां विहाय विपादिकासंज्ञां प्राप्नोतीत्यर्थः'। अर्थात् जब विचर्चिका ही पैरों में हो तो उसे विपादिका कहते हैं। आधुनिक विज्ञान के अनुसार इसे Rhagades कहते हैं। सभी रोग अज्ञान पूर्वक उपेक्षा किये जाने पर असाध्य हो जाते हैं तथा जो असाध्य होते हैं वे मनुष्यों को मार देते हैं अर्थात् वे घातक हो जाते हैं। इसलिये अपने हित को दृष्टि में रखते हुए शीघ्र ही प्रयत्नशील होना चाहिये अर्थात् यथा शीघ्र चिकित्सा का प्रयत्न करना चाहिये।

कुष्ठेष्वादौ वातोत्तरेषु घृताच्छपानमनेकशो मण्डान्तरितं प्रशस्यते, तिक्तसर्पिष इतरोत्तरयोः, वमनविरेचनास्था (पन)..........................................................................

(इति ताडपत्रपुस्तके १२० तमं पत्रं^१म्)


वातिक कुष्ठ की चिकित्सा—वातिक कुष्ठों में सबसे पूर्व मण्ड से रहित अच्छ (स्वच्छ—केवल) घृत का पान कराना चाहिये। तथा पैत्तिक एवं श्लैष्मिक में तिक्त घृत—पिलाना, वमन, विरेचन, आस्थापन .......... (आदि का आवश्यकतानुसार प्रयोग करना चाहिये)

वक्तव्य—यह अध्याय बीच में ही खण्डित हो गया है। इसलिये अन्य आर्ष ग्रन्थों के आधार पर हम इन मुख्य २ कुष्ठों के सामान्य चिकित्सा क्रम का उल्लेख करते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—वातोत्तरेषु सर्पिर्वमनं श्लेष्मोत्तरेषु कुष्ठेषु। पित्तोत्तरेषु मोक्षो रक्तस्य विरेचन चाग्रे ।। अर्थात् वातिक कुष्ठ में घृत पान, पैत्तिक में रक्तमोक्षण अथवा विरेचन तथा श्लेष्मिक में वमन कराना चाहिये। आवश्यकतानुसार उपर्युक्त विधियों से कोष्ठ के शुद्ध हो जाने पर उसे वातप्रकोप से बचाने के लिये स्नेहपान कराना चाहिये। चरक चि. अ. ७ में कहा है—स्नेहस्य पानमिष्टं शुद्धे कोष्ठे प्रवाहिते रुधिरे। वायुर्हि शुद्धकोष्ठं कुष्ठिनमबलं विशति शीघ्रम् ।। इस सामान्य चिकित्सा (General treatment) के साथ ही स्थानिक


१. अस्याग्रे पत्रचतुष्टयात्मको ग्रन्थस्त्रुटितस्ताडपत्रपुस्तके।