काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
१९४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् प्रतिश्यायचिकित्सिताध्यायः ? ]
को बहुत अधिक पीने से, वेगों को रोकने से, निरन्तर वेगों के रुके रहने से, सदा ठीक ढंग से न सोने से, लगातार एक ही करवट से सोने से, मुख ढककर सोने से तथा अन्य कारणों से मन्द अग्नि वाले तथा विषम भोजन करने वाले व्यक्ति का कुपित हुआ वायु ऊर्ध्व कफाशय (मूर्धा) को दूषित कर के स्रोतों के प्रति गमन करता है। वह दूषित हुआ वायु जब मुख के स्रोतों को दूषित करता है तब मुखरोग हो जाते हैं। जब कानों के स्रोतों को दूषित करता है तब कर्णरोग और जब नासिका मूल में स्थित कफ, पित्त या रक्त के प्रति गमन करता है तब वह प्रतिश्याय कहलाता है। सुश्रुत उ. अ. २४ में प्रतिश्याय का निदान एवं संप्राप्ति निम्न प्रकार से कही है—नारीप्रसङ्गः शिरसोऽभितापो धूमो रजः शीतमतिप्रतापः। संधारणं मूत्रपुरीषयोश्च सद्यः प्रतिश्यायनिदानमुक्तम्। चयं गता मूर्धनि मारुतादयः पृथक् समस्ताश्च तथैव शोणितम्। प्रकोष्यमाणा विविधैः प्रकोपणैर्नृणां प्रतिश्यायकरा भवन्ति हि।। चरक चि. अ. २६ में कहा है—सन्धारणाजीर्णरजोऽतिभाष्यक्रोधार्तुवैषम्यशिरोऽभितापैः। प्रजागरातिस्वपनाम्बुशीतै रवश्यया मैथुनबाष्पधूमैः।। संस्त्यानदोषे शिरसि प्रवृद्धो वायुः प्रतिश्यायमुदीरयेत् ।।
तस्य प्रतिनद्धा इव शिरोमुखनासिका भवन्तीष्टानिष्ठाव्यक्ताश्च ठा(न्थाः) ..... ते तस्य वातात् प्रतिबन्धः, कफाद्वैशद्यं, रक्तात् परिक्लेदः, पित्ताद्दौर्गन्ध्यं स्रोतसउपजायते ।।४।।
उसका शिर, मुख एवं नासिका वायु से पूर्ण होकर मानों रुक से जाते हैं इसलिये उसे इष्ट अथवा अनिष्ट गन्धें अव्यक्त हो जाती हैं अर्थात् उसे किसी भी प्रकार की गन्धों का ज्ञान नहीं होता। उसमें वायु से स्रोतों का प्रतिबन्ध (रुकावट), कफ से विशदता का अभाव, रक्त से परिक्लेद तथा पित्त से दुर्गन्धि हो जाती है ॥४॥
स एतदवस्थो जाड्यारोचकहल्लासप्रतिघातार्थं भृशोष्णतीक्ष्णाम्ललवणेषु प्रसज्यते, ततोऽस्य पित्तं प्रकुप्यति। बलाभिवर्धनात्तस्य ज्वरं तृष्णामन्तर्दाहमरति ......... नी स्रोतसां वैगन्ध्यं पाकं च दिवाकरावर्तं चोत्पादयति ।।५।।
इस अवस्था में वह जड़ता, अरुचि तथा हल्लास (जीमचलाना) को दूर करने के लिये अत्यन्त उष्ण, तीक्ष्ण, अम्ल एवं लवण पदार्थों का सेवन करता है। इससे उसका पित्त प्रकुपित हो जाता है। पित्त के अधिक बलवान् होने से उसे ज्वर, तृष्णा, अन्तर्दाह, अरति (ग्लानि), स्रोतों में दुर्गन्धि, पाक तथा सूर्यावर्त हो जाते हैं।
वक्तव्य—सूर्यावर्त–यह एक प्रकार का शिरःशूल होता है–जिसमें सूर्य के उदय होने के साथ २ सिर में वेदना बढ़ती जाती है तथा सूर्यास्त के साथ ही वेदना की भी शान्ति हो जाती है। सुश्रुत उ. अ. २५ में इसका स्वरूप निम्न प्रकार दिया है—सूर्योदयं या प्रति मन्दमन्दमक्षिध्रुवं रुक् समुपैति गाढम्। विवर्धते चांशुमता सहैव सूर्यापवृत्तौ विनिवर्तते च ।। शीतेन शान्तिं लभते कदाचिदुष्णेन जन्तुः सुखमाप्नुयाच्च। तं भास्करावर्तमुदाहरन्ति सर्वात्मकं कष्टतमं विकारम् ।।
अतश्चैनं चतुर्विधमृषयो वदन्ति–वातिकः, पैत्तिकः, श्लैष्मिकः, सान्निपातिक इति। तद्यथा–यो रौति न रमते जागर्त्यभीक्ष्णं क्षौति नासिका चोत्ताानस्यापि तनुश्लेष्म .....................................
(इति ताडपत्रपुस्तके १३२ तमं पत्रम्।)
.................................................................... र्भवति स्निग्धोष्णलवणाम्लोपशयि चेतं प्रतिश्यायं वातिकं विद्यात्; ज्वरदाहपिपासाप्रलापितातालुशोषमुखनासिकाक्षिपाकैराशुकफसंपाकैः ........................ ....................... (पैत्ति)कं विद्यात्; चिरकारित्वारोचकहल्लासशिरोगौरवातिस्त्रावमन्दक्षवथुमन्याग्रहहृदय-प्रलेपविपाकैरूष्णकटुकषायरूक्षणोपशयैः प्रतिश्यायं कफजं विद्यात्, सर्वरूपं स्रोतोवैगन्ध्यकृमि ............ (सान्निपातिकं विद्यात्) ।।६।।
प्रतिश्यायचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १९५
ऋषियों ने चार प्रकार का प्रतिश्याय माना है। १ वातिक २ पैत्तिक ३ श्लैष्मिक ४ सान्निपातिक। वातिक प्रतिश्याय के लक्षण—जो रोता रहता है, प्रसन्न नहीं होता, निरन्तर जागता रहता है, छींकता है, सीधा लेटने या सोने पर भी उसकी नासिका में पतली श्लेष्मा का स्राव होता रहता है तथा यदि उसे स्निग्ध, उष्ण एवं लवण युक्त द्रव्यों से आराम हो जाता हो तो उस प्रतिश्याय को वातिक जाने। चरक चि. अ. २६ में कहा है—घ्राणार्तितोदैः क्षवथुर्जलाभः स्रावोऽनिलात्स्वस्वरमूर्धरोगः। अर्थात् इसमें नासिका में वेदना और तोद, छींक, जल के सदृश स्राव का बहना तथा स्वरभेद और सिर में पीडा होती है। पैत्तिक प्रतिश्याय के लक्षण—ज्वर, दाह, पिपासा, प्रलाप, तालुशोष, मुख, आंखों तथा नासिका का पकना और कफ के शीघ्र पक जाने से प्रतिश्याय को पैत्तिक जाने। चरक चि. अ. २६ में कहा है—नासाग्रपाकज्वरवक्त्रशोषतृष्णोष्णपीतस्रवणानि पित्तात् ।। श्लैष्मिक प्रतिश्याय के लक्षण—उसे चिरकारिता (बहुत देर में अच्छा होना), अरुचि, हल्लास (जीमचलाना), सिर का भारी होना, अत्यन्त स्राव, हलकी २ छीकें आना, मन्याग्रह, हृदय प्रलेप (हृदय का कफ के द्वारा लिप्त सा रहना), अविपाक (भोजन का न पचना) होते हैं तथा उसे उष्ण, कटु, कषाय एवं रूक्ष द्रव्यों के सेवन से आराम हो जाता हो तो उसे श्लैष्मिक प्रतिश्याय जाने। चरक चि. अ. २६ में कहा है—कासारुचिस्त्रावघनप्रसेकाः कफाद् गुरुः स्रोतसि चापि कण्डूः। सान्निपातिक प्रतिश्याय के लक्षण—इसमें उपर्युक्त सब लक्षण विद्यमान होते हैं, तथा स्रोतों में दुर्गन्धि एवं कृमि आदि कों की उपस्थिति से प्रतिश्याय को सान्निपातिक जाने। चरक चि. अ. २६ में कहा है—सर्वाणि रूपाणि तु सन्निपातात्स्युः पीनसे तीव्ररुजेऽतिदुःखे ॥६॥
(तत्र) श्लोकाः—
वातश्लेष्मोत्तरः प्रायः प्रतिश्यायस्त्रिदोषजः । बलाग्निवर्णशमनो निहन्ता चाप्युपेक्षितः ।।७।।
वात एवं श्लेष्मा की अधिकता वाला प्रतिश्याय प्रायः त्रिदोषज होता है अर्थात् प्रतिश्याय में यद्यपि वात एवं श्लेष्मा की प्रधानता होती है तथापि वह साधारणतया त्रिदोषज ही होता है। वह बल, जठराग्नि एवं वर्ण को कम करता है तथा उपेक्षा किया हुआ वह मनुष्य को मार डालता है।
तस्मात् प्रथमतस्तस्मिन्नुपवासः प्रशस्यते । सुखोष्णं दीपनीयाम्बु पिबेद्वा पाञ्चमूलिकम् ।।८।।
इसलिये इसमें प्रारम्भ से ही उपवास कराना चाहिये। अथवा पञ्चमूल का दीपनीय (अग्नि को दीप्त करने वाला) एवं सुखोष्ण क्वाथ पिलाना चाहिये।।
यथाशक्त्य ......................। .................... दकेऽपि वा ।।
यवागूं रक्तशालीनामुष्णां त्रिलवणान्विताम् । पिबेद्यवानांमथवा दृष्ट्वा दोषबलाबलम् ।।
दोष और बल के अनुसार रक्त शालि चावलों की उष्ण यवागू में तीनों नमक (सैन्धव, सौवर्चल एवं विड्) मिला कर पिलायें अथवा जौ की यवागू पिलायें ।।
अग्निप्रावरणोपेतो निवातशयनासनः । लघ्वन्नमुष्णं भुञ्जानो मुच्यते नातिसंपिबेत् ।।
वेष्टनं धूमपानं च ..................... । .................... गुडहरीतकीम् ।
जिस व्यक्ति के सोने एवं बैठने का स्थान अग्नि एवं उष्ण वस्त्रों से युक्त हो तथा ऐसे स्थान पर हो जहां सीधी हवा न आती हो, जो लघु एवं उष्ण अन्न का ही सेवन करता हो वह व्यक्ति प्रतिश्याय से मुक्त हो जाता है। उस व्यक्ति को बहुत अधिक जल नहीं पीना चाहिये। उसे वेष्टन (उष्णीय) धारण करना चाहिये तथा धूम्रपान और गुडहरीतकी का सेवन करना चाहिये। सुश्रुत उ. अ. २४ में निम्न पथ्य का सेवन बताया है—निवातशय्यासनवेष्टनानि मूर्ध्नो गुरूष्णं च तथैव वासः। तीक्ष्णा विरेकाः शिरसः सधूमा रूक्षं यवान्नं विजया च सेव्या ।। विजया से अभिप्राय हरीतकी से है ।।
१९६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् प्रतिश्यायचिकित्सिताध्यायः ? ]
जीर्णे च सर्पिषः पानं निशि भुक्त्वा प्रशस्यते ।।
अशाम्यमाने तेनापि पुराणं पाययेद्घृतम् । षट्पलं पञ्चगव्यं वा कल्याणकमथाभयम् ।।
यवान्नं च सदाऽत्युष्णं लवणस्नेहव(र्धि)तम् ।
पिप्प ...................
............. सं पिबेद्वा मरिचान्वितम् ।।
जीर्ण प्रतिश्याय में रात्रि को भोजन करके घी पीना चाहिये । यदि इसके भी यह शान्त न हो तो उसे पुराना षट्पल, पञ्चगव्य, कल्याणक तथा अभय घृत का सेवन करना चाहिये तथा सदा लवण एवं स्नेह (घृत) से युक्त यवान्न (जौ का भात) खिलाना चाहिये तथा मरिच से युक्त पिप्पली आदि के क्वाथ का पान कराना चाहिये ।।
मरिचानि मुखे नित्यं धारयेदापरिक्षयम् । सैन्धवोष्णोदकोपेतां पिबेच्छुण्ठीं विमुच्यते ।।
रोग के नष्ट होने तक मुख में सदा मरिच को धारण करना चाहिये । अर्थात् मरिचों को मुख में रख कर सदा चूसते रहना चाहिये । तथा सेन्धा नमक एवं उष्ण जल के साथ सोंठ का सेवन करना चाहिये ।।
पिप्पलीवर्धनमानं वा युञ्जानो वा गुडाभयाम् । पथ्याशी रोगतत्त्वज्ञः सात्म्यज्ञश्च विमुच्यते ।।
रोग के तत्त्व एवं सात्म्य को जानने वाला व्यक्ति पथ्य सेवन पूर्वक वर्धमान पिप्पली तथा अभयागुड का सेवन करने से रोग से मुक्त हो जाता है ।।
पटोलपत्रत्रिफला .............................. प्रतिश्यायाद्विमुच्यते ।
पटोलपत्र, त्रिफला ........... आदि का सेवन करने से प्रतिश्याय से मुक्ति (छुटकारा) हो जाती है ।
अपानं सर्पिषाऽभ्यज्य निवाते स्वेदयेत् सदा ।।
विष्टम्भिगुरुशीतान्नं दिवास्वप्नं च वर्जयेत् ।
प्रतिश्याय के रोगी को जल का त्याग कर देना चाहिये तथा उसे शरीर पर घी की मालिश करके निवातस्थान में स्वेदन करना चाहिये । तथा उसे विष्टम्भि, गुरु एवं शीतल अन्न तथा दिवास्वप्न का त्याग कर देना चाहिये । सुश्रुत उ. अ. २४ में निम्न परिहार बताया है—शीताम्बुयोषिच्छिशिरावगाह-चिन्तातिरूर्क्षाशनवेगरोधान् । शोकं च मद्यानि नवानि चैव विवर्जयेत् पीनसरोगजुष्टः ।।
प्रतिश्यायस्य यत् प्रोक्तमेतत् सर्वं चिकित्सितम् ।।
अतिबालस्य तत् सर्वं धात्री कुर्यादशङ्किता । इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
(इति चिकित्सास्थाने प्रतिश्यायचिकित्सितम् ।)
प्रतिश्याय की यह जो कुछ भी चिकित्सा कही है । अत्यन्त छोटे बालकों के लिये, धात्री उस सबको निःशंक होकर कर सकती है । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था '!
(इति चिकित्सास्थाने प्रतिश्यायचिकित्सितम्) ।
| उरोघातचिकित्सिताध्यायः ? ] | चिकित्सास्थानम् | १९७ |
|---|
उरोघातचिकित्सिताध्यायः ।
(अथात उरोघात)चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम उरोघात चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
वक्तव्य—उरोघात से अभिप्राय उरःक्षत से है । चरक तथा सुश्रुत में उरोघात शब्द नहीं आया है । वहां उरःक्षत ही दिया है । यह क्षय अथवा राजयक्ष्मा रोग का अगला रूप है जिसमें फुफ्फुस में (Cavities) बन जाती हैं तथा उसमें स्थान २ पर घनीभाव (Consolidation) हो जाते हैं ।।
स्वहेतुकुपिता दोषा उरोघातं चतुर्विधम् । कुर्वन्ति सेवमानानां लौल्यमध्यशनादि च ।।३।।
उरोघात का हेतु—जिह्वालौल्य एवं अध्यशन आदि का सेवन करने वाले व्यक्तियों को अपने २ कारणों से कुपित वातादि दोष चार प्रकार का उरोघात कर देते हैं । चरक चि. अ. ११ में इसका निम्न निदान दिया है–धनुषाऽऽयस्यतोऽत्यर्थं भारमुद्वहतो गुरुम् । ........ इत्यादि । अर्थात् नानाप्रकार के अति परिश्रम युक्त कर्मों को करने से छाती (फुफ्फुस) में क्षत हो जाता है जिससे यह रोग प्रारंभ हो जाता है । इसमें छाती विदीर्ण हो जाती है तथा उसमें विदाह उत्पन्न हो जाता है उसके बाद पार्श्वों में पीडा होने लगती है तथा अङ्ग सूखने लगता है । धीरे २ वीर्य, बल, वर्ण, रुचि और अग्नि हीन हो जाती है । ज्वर, वेदना, मानसिक दीनता, अतिसार, जाठराग्निनाश ये लक्षण उपस्थित होते हैं । उसके खांसने पर दूषित श्यामवर्ण का, पीला, दुर्गन्धित तथा अत्यन्त गाढ़ा एवं रक्त मिश्रित कफ निकलता है । वह रोगी शुक्र एवं ओज के क्षीण होने से अत्यन्त क्षीण हो जाता है ।।
शीतज्वरः प्रतिश्यायः कण्ठः शूकैरिवावृतः । उत्कासिक(का)मन्दक ............ ।।
इस रोग में शीतज्वर तथा प्रतिश्याय होता है और कण्ठ ऐसा प्रतीत होता है मानों शूक़ों (धान या गेहूँ की बालियों) से युक्त हो । तथा उसे कास एवं मन्दक रोग हो जाते हैं । चरक चि. अ. ११ में कहा है—उरोरुक् शोणितच्छर्दिः कासो वैशेषिकः क्षते । क्षीणे सरक्तमूत्रत्वं पार्श्वपृष्ठकटिग्रहः ।।
........................................................
........ समेति समाख्याता सर्वरोगविनाशिनी ।।
एषैव व्योषसहिता हन्त्युरोघातमुद्धलम् ।।
...... इत्यादि द्रव्य मिलाकर प्रयोग करने से सब रोग नष्ट होते हैं । इसी उपर्युक्त योग के साथ त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल) मिलाकर देने से यह भयंकर उरोघात को नष्ट करता है ।।
कफाधिके तु सक्षौद्रा लीढाऽऽरोग्याय कल्पते ।
कफाधिक उरोघात के उपर्युक्त योग को मधु के साथ चटा देने से रोगी आरोग्य को प्राप्त करता है ।।
पित्तश्लेष्मोत्तरो व्याधिरुरोघातस्त्रिदोषजः ।।
तस्मात् पित्तकफघ्नानि धात्री (नित्यं समाचरेत्) ।
(इति चिकित्सास्थाने उ) रोघातचिकित्सितम् ।।
त्रिदोषज उरोघात—पित्त एवं श्लेष्मा की अधिकता (प्रधानता) वाला होता है इसलिये धात्री को नित्य पित्त एवं कफनाशक द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिये । चरक चि अ. ११ में इसका निम्न चिकित्सा सूत्र दिया है—उरो मत्वा क्षतं
| १९८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | शोफचिकित्सिताध्यायः ? ] |
|---|
लाक्षां पयसा मधुसंयुताम् । सद्य एव पिबेज्जीर्णे पयसाऽघात्स शर्करम् ॥ अर्थात् उरोघात रोग में लाक्षाचूर्ण विशेष स्थान रखता है। इसके अतिरिक्त एलादिगुटिका, यष्ट्याह्रादि घृत, अमृतप्राशघृत तथा अनेक प्रकार के सर्पिर्गुडों का प्रयोग प्रशस्त माना गया है ।।
इति चिकित्सितस्थाने उरोघातचिकित्सितम् ।।
(अथ शोफचिकित्सिताध्यायः ।)
अथातः शोफचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम शोफचिकित्सा का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
वमनविरेचनोपवासव्याधिकर्शनापथ्याजीर्णेषु यः सदाऽत्यर्थलवणाम्लकटुक्षारोष्णोपसेवी भ(वति) ............ यनान्ते वा लवणादिषु प्रसज्यते, यथेष्टं च शीतोदकस्नानपानशयनव्यवायव्यायामादिभिर्व्यभिचरति तथा तद्गुणक्षीरा वा भवति, तस्याः श्वयथुर्नाम रोग उत्पद्यते दारुणश्चतुर्विधः । दोषा ह्यस्याः .................................................... पथः कृष्णारुणवर्णोऽल्पो रूक्षः पिपीलिकापूर्ण इव संवेदनः पीडितश्च निम्नो भवत्यनिमित्त (रुज) श्चोष्णास्नेहाभ्यां प्रशाम्यति तं वातिकं विद्यात्; नीललोहितपीत ........................................................................
(इति ताडपत्रपुस्तके¹ १३३ तमं पत्रम्² ।)
**श्वयथु का निदान—**जिन बालकों का वमन, विरेचन, उपवास तथा व्याधि से अत्यन्त कर्षण हो चुका हो अर्थात् जो अत्यन्त कृश हो गये हों उनमें, तथा अपथ्य एवं अजीर्ण रोग में जो सदा अत्यधिक लवण, अम्ल, कटु, क्षार एवं उष्ण पदार्थों का सेवन करते हैं .......... जो लवणयुक्त पदार्थों में अत्यधिक आसक्त रहता है । तथा जो धात्री यथेष्ट शीतल जल का स्नान एवं पान, शयन, व्यवाय (मैथुन) तथा व्यायाम आदि करती हो, अथवा उसी गुण वाला उसका दूध हो गया हो । उन्हें चार प्रकार का श्वयथु (शोथ या शोफ) नामक भयंकर रोग हो जाता है । .......... (चरक चि. अ. १२ में साधारणतया तीन प्रकार का शोफ दिया है। १. वातिक २. पैत्तिक ३. श्लैष्मिक । तथा इन्हीं के पुनः निज और आगन्तु भेद दिये हैं । निज (वातिक, पैत्तिक तथा श्लैष्मिक) शोथ के साथ आगन्तु शोथ को मिला देने से ४ भेद हो सकते हैं । सुश्रुत चि. अ. २३ में ५ प्रकार का शोथ दिया है। १. वातिक २. पैत्तिक ३. श्लैष्मिक ४. सन्निपातिक ५. विषज । इनमें प्रथम चार को निज तथा अन्तिम को आगन्तु शोथ कह सकते हैं । अन्य ग्रन्थों में शोथ के ९ भेद दिये हैं—एक दोषज ३+द्विदोषज ३+त्रिदोषज १+अभिघातज १+विषज १=९ इनमें से अभिघातज एवं विषज आगन्तु के भेद हैं । तथा द्वन्द्वज एवं त्रिदोष को पृथक् पढ़ने का विशेष प्रयोजन नहीं होता है । इस प्रकार एकदोषज ३ (वातिक, पैत्तिक एवं श्लैष्मिक) तथा आगन्तु—ये मिलाकर मुख्यरूप से ४ ही शोथ होते हैं । इन्हीं चार का ही यहां निर्देश किया गया प्रतीत
१. मूलताडपत्रपुस्तके अस्मिन् १३३ तमे पत्रे अग्रेतनेषु १३८ तमपत्रतः १५० तमपत्रपर्यन्तपत्रेष्वपि एकपार्श्वे विशेषतो मूषकदंशात् किल शकलापगमनेन प्रायः प्रतिपङ्क्तिन्यूनाधिकभावेन ग्रन्थावयवा विलुप्ताः सन्ति, तेनेत्थं बिन्दुमालाः पुनः पुनर्निवाशिताः ।
२. अस्याग्रे पत्रद्वयात्मको ग्रन्थो लुप्तस्ताडपत्रपुस्तके ।
शोफचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १९९
होता है। तथा यहां मुख्य रूप से होने के कारण निज शोथ का ही निदान दिया गया प्रतीत होता है। इसमें आगन्तु का निदान नहीं दिया है। चरक चि. १२ में निज शोथ का निम्न निदान दिया है—शुद्ध्यामयाभक्तकृशाबलानां क्षाराम्लतीक्ष्णोष्णगुरूपसेवा। दध्याममृच्छकाकविरोधिदुष्टगरोपसृष्टान्न निषेवणं च ।। अर्शांस्य चेष्टा न च देहशुद्धिर्मर्मोपघातो विषमा प्रसूतिः । मिथ्योपचारः प्रतिकर्मणां च निजस्य हेतुः श्वयथोः प्रदिष्टः ।। इसी प्रकार चरक सू. अ. १८ में और सुश्रुत चि. अ. २३ में भी कहा है। वातिक शोथ के लक्षण—जो कृष्ण एवं अरुण (लाल) वर्ण का होता है, अल्प (थोड़ा) एवं रूक्ष होता है तथा ऐसा प्रतीत होता है मानो शोथ प्रदेश पिपीलिकाओं (चिउंटियों) से पूर्ण हो, जो वेदना एवं पीडा से युक्त होता है, निम्न (नीचे झुका हुआ) होता है, जो बिना किसी कारण के ही हो जाता है तथा जो उष्ण द्रव्यों एवं स्नेह के प्रयोग से शान्त हो जाय उसे वातिक शोथ समझना चाहिये। चरक चि. अ. १२ में कहा है—चलस्तनुत्वक्परुषोऽरुणोऽसितः प्रसुप्तिहर्षार्तियुतोऽनिमित्ततः । प्रशाम्यति प्रोन्नमति प्रपीडितो दिवाबली च श्वयथुः समीरणात् ।। पैत्तिक शोथ के लक्षण—यह नील, लोहित एवं पीत वर्ण का ......... (होता है) ........ ।
वक्तव्य—यह अध्याय यहीं खण्डितं हो गया है। अगले खण्डित अंश में पैत्तिक, श्लैष्मिक एवं आगन्तु शोथ के लक्षण उनकी साध्यासाध्यता एवं चिकित्सा आदि का वर्णन होना चाहिये। पाठकों के ज्ञान के लिये उन्हें हम अन्य आर्षग्रन्थों से उद्धृत करते हैं।
पैत्तिक शोथ का लक्षण—चरक चि. अ. १२ में कहा है—मृदुः सुगन्धोऽसितपीतरागवान्भ्रमज्वरस्वेदतृषामदान्वितः । यदुष्यते स्पर्शरुगक्षिरागकृत्स पित्तशोथो भृशदाहपाकवान् ।। अर्थात् जो शोथ मृदु, गन्धयुक्त, काले एवं पीले वर्ण वाला हो जिसमें रोगी भ्रम, ज्वर, स्वेद, प्यास एवं मद से युक्त हो। जिसमें दाह हो, छूने से ही वेदना होती हो तथा जिसमें रोगी की आंखें रक्तवर्ण की हों, जिसमें अत्यन्त दाह हो तथा जो पक जाता हो वह शोथ पैत्तिक होता है। चरक सू. अ. १८ में कहा है—स क्षिप्रोत्थानप्रशमो भवति कृष्णपीतनीलताम्रावभास उष्णो मृदुः कपिलताम्रलोमा उष्यते दूष्यते दह्यते धूप्यते ऊष्मायते स्विद्यति क्लिद्यते न च स्पर्शमुष्णं वा सह्यत इति पित्तशोथः। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. २३ में कहा है—‘‘पित्तश्वयथुः पीतो रक्तो वा शीघ्रानुसार्योषचोषदाद्यश्चात्र वेदनाविशेषाः’’। अष्टाङ्ग संग्रह में भी कहा है—पीतरक्तासिताभासः पित्तादाताम्ररोमकृत् । शीघ्रानुसारप्रशमो मध्ये प्राग्जायते तनोः ।। सतृड्दाहज्वरस्वेददवकलेदमदभ्रमः । शीताभिलाषी विड्भेदी गन्धी स्पर्शासहो मृदुः ।।
श्लैष्मिकशोथ का लक्षण—चरक चि. अ. १२ में कहा है—गुरुः स्थिरः पाण्डुररोचकान्वितः-प्रसेकनिद्रावमिवह्निमान्द्यकृत् । स कृच्छ्रजन्मप्रशमो निपीडितो-न चोन्नमेद्रात्रिबली कफात्मकः ।। अर्थात् श्लैष्मिक शोथ—गुरु, स्थिर एवं पाण्डु वर्ण होता है। इसमें अरुचि, लालास्राव, निद्रा, वमन तथा अग्निमान्द्य होता है। यह शोथ देर में ही उत्पन्न होता है तथा देर में ही शान्त होता है तथा शोथ को दबाने पर पुनः उन्नत नहीं होता (Pitting on Pressure) तथा यह रात्रि को अधिक होता है। चरक सू. अ. १८ में कहा है—सं कृच्छ्रोत्थानप्रशमो भवति, पाण्डुः श्वेतावभासः स्निग्धः श्लक्ष्णो गुरुः स्थिरः स्त्यानः शुक्लाग्ररोमा स्पर्शोष्णसहश्चेति । श्लेष्मशोथः । इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. २३ में भी कहा है—‘श्लेष्मश्वयथुः पाण्डुः शुक्लो वा स्निग्धः कठिनः शीतो मन्दानुसारी कण्ड्वादयश्चात्र वेदनाविशेषाः’’। अष्टाङ्गसंग्रह में भी कहा है—कण्डूमान् पाण्डुरोमत्वक्कठिनः शीतलो गुरुः । स्निग्धः श्लक्ष्णः स्थिरः स्त्यानो निद्राच्छर्द्यग्निसादकृत् ।। आक्रान्तो नोन्नमेत् कृच्छ्रशामजन्मा निशाबलः । स्रवेन्नासृक् चिरात्पिच्छां कुशशस्त्रादिविक्षतः ।। स्पर्शोष्णाकाङ्क्षी च कफाद् ।। शोथों की साध्यासाध्यता—जिसका मांस क्षीण नहीं है ऐसे पुरुष को हुआ एकदोषज, नवीन और बलरहित शोथ ‘सुखसाध्य’ होता है तथा जो शोथ कृश एवं दुर्बल व्यक्ति को हो, जो वमन आदि उपद्रवों से युक्त हो, मर्मदेश में पहुंच गया हो तथा जो सर्वाङ्ग में फैला हुआ हो वह शोथ असाध्य होता है।
२०० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् कृमिचिकित्सिताध्यायः ? ]
शोथों का चिकित्साक्रम—साध्य शोथ का निदान, दोष एवं ऋतु-विपरीत चिकित्सा करनी चाहिये। चरक चि. अ. १२ में कहा है—अथामजं लङ्घनपाचनक्रमैर्विशोधनैर्बह्वल्पदोषमादितः। शिरोगतं शीर्षविरेचनैरधोविरेचनैरूर्ध्वमधस्तयोर्ध्वगम् उपचारेत् स्नेहकृतं विरूक्षणैः प्रकल्पयेत्स्नेहविधिं च रूक्षजे ।। अर्थात् आम दोष से उत्पन्न शोथ में प्रारम्भ में लङ्घन तथा पाचन कराना चाहिये। यदि दोष अत्यन्त प्रवृद्ध हो तो दोषों के अनुसार प्रारम्भ में वमनविरेचन द्वारा संशोधन कराये। यदि शोथ शिरोगत हो तो नस्य द्वारा तथा यदि शरीर के अधोभाग में हो तो अधोविरेचन तथा ऊर्ध्वभाग में स्थित हो तो वमन द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये। यदि शोथ अधिक स्निग्ध द्रव्यों के सेवन से उत्पन्न हुआ हो तो रोगी का रूक्षण करना चाहिये तथा यदि शोथ रूक्ष पदार्थों के अधिक सेवन से उत्पन्न हुआ हो तो स्निग्ध पदार्थों द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये। अष्टाङ्गसंग्रह में भी कहा है—श्वयथुषु दोषजेषु सर्वेषु सर्वसरेष्वामानुबद्धेषु लङ्घनपाचनशोधनान्यादौ योजयेत्। स्नेहजेषु विरूक्षणान्यौषधानि। विरूक्षणोत्थेषु स्नेहनानि। तदुपरान्त भिन्न २ दोषों के लिये भिन्न २ चिकित्सा का विधान दिया गया है। सुश्रुत चि. अ. २३ में कहा है—तत्र वातश्वयथौ त्रैवृतमेरण्डतैलं वा मासमर्धमासं वा पाययेत्, न्यग्रोधादिककषायसिद्धं सर्पिः पित्तश्वयथौ, आरग्वधादिसिद्धं श्लेष्मश्वयथौ, सन्निपातश्वयथौ स्नुहीक्षीरपात्रं द्वादशभिरम्लपात्रैः प्रतिसंसृष्टं दन्तीप्रतीवापं सर्पिः पाचायित्वा पाययेत्। इसके अतिरिक्त सब शोथों में गण्डीराद्यरिष्ट, पुनर्नवासव, फलत्रिकाद्यरिष्ट, गुडार्द्रकप्रयोग, शिलाजतु प्रयोग, कंसहरीतकी आदि का प्रयोग करना चाहिये। इन आभ्यन्तर प्रयोगों के अतिरिक्त दोषों के अनुसार भिन्न २ बाह्य प्रलेप, प्रदेह एवं परिषेक आदि का भी प्रयोग करना चाहिये ॥३॥
कृमिचिकित्सिताध्यायः ।
. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
............ च लाभतः समुपानयेत् । पादशेषे जलद्रोणे शृते सर्पिर्विपाचयेत् ।।
प्रस्थं सैन्धवसंयुक्तं तत् परं कृमिनाशनम् । विडङ्गघृतमित्येतल्लेह्यं शर्करया सह ।।
सर्वकृमीन् प्रणुदति वज्रो मुक्त इवासुरान् ।
**वक्तव्य—**इस अध्याय में उदरकृमियों की चिकित्सा कही जायगी। यह अध्याय प्रारम्भ में खण्डित है। उस खण्डित अंश में सम्भवतः कृमियों के भेद, उनका निदान तथा लक्षण आदि का वर्णन होना चाहिये। अन्य ग्रंथों के आधार पर इन उपर्युक्त विषयों को हम अध्याय के अन्त में पाठकों के ज्ञान के लिये देंगे।
विडङ्गघृत—(विडङ्ग आदि) ............. में से जो २ ओषधियां मिल जायें उन्हें लेकर एक द्रोण पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष रखे। उसमें एक प्रस्थ घृत डालकर सिद्ध करे। इस घृत में थोड़ा नमक मिला दे। यह घृत अत्यन्त कृमि नाशक है। इसे 'विडङ्ग घृत' कहते हैं। जिस प्रकार वज्र छोड़ा जाने पर असुरों को नष्ट कर देता है। उसी प्रकार शर्करा के साथ इसका लेहन (चाटना) करने पर यह सब प्रकार के कृमियों को नष्ट कर देता है।
वक्तव्य—'वृन्दमाधव' तथा 'चक्रदत्त' आदि में कृमिरोग अधिकार में 'विडङ्ग घृत' का निम्न योग दिया हुआ है—
त्रिफला यास्त्रयः प्रस्था विडङ्गप्रस्थ एव च। द्विपलं दशमूलञ्च लाभतः समुपाचरेत् ।। पादशेषे जलद्रोणे शृतं सर्पिर्विपाचयेत्। प्रस्थोन्मितं सिन्धुयुतं तत्परं कृमिनाशनम् ।। विडङ्गघृतमेतच्च लेह्यं शर्करया सह। सर्वान् कृमीन् प्रणुदति वज्रं मुक्तमिवासुरान् ।।
उपर्युक्त खण्डित भाग वाला यही योग प्रतीत होता है। विडङ्ग का कृमिनाशन के लिए अन्य रूपों में भी प्रयोग चरक-सुश्रुत आदि में अनेक स्थानों पर किया गया है॥
कृमिचिकित्सिताध्यायः ? ] | चिकित्सास्थानम् | २०१
तिक्तोष्णकटुरूक्षाणां मूत्राणां लवणस्य च ।।
स्नेहस्वेदोपसेवा च पथ्यं च कृमिनाशने ।
कृमियों के नाश के लिये तिक्त, उष्ण, कटु, एवं रूक्ष पदार्थ, गोमूत्र, सैन्धव तथा स्नेहन एवं स्वेदन का प्रयोग पथ्य माना गया है ।।
बहिःकृमीणां स्नानाद्यं द्विव्रणीये प्रकीर्तितम् ।।
अतिबालस्य तु शिशोर्धात्री सर्वं समाचरेत् ।
द्विव्रणीय अध्याय में बाह्य कृमियों के लिये स्नान आदि (बाह्य शुद्धि) का निर्देश किया गया है । अत्यन्त छोटे शिशु के लिये धात्री यह उपर्युक्त सम्पूर्ण चिकित्सा करे ।।
संशोधनैर्विशुद्धं च पथ्यान्नैश्च लघूकृतम् ।।
भावितं चौषधैः क्षीरममृतत्वाय कल्पते ।
वमन विरेचन आदि संशोधनों से शुद्ध हुए तथा पथ्य आहार के द्वारा लघु (हलके) हुए रोगी के लिए भिन्न २ ओषधियों से सिद्ध किया हुआ दूध अमृत के समान माना जाता है ।।
अ(ना)त्युष्णं कटुतैलं तु गुदे दत्त्वा ससैन्धवम् ।।
स्वेदयेद् गुदमङ्गुल्या तथाऽऽशु लभते सुखम् ।
जो बहुत अधिक गरम नहीं है ऐसे कड़वे तेल (सरसों के तेल) को सैन्धव सहित गुदा में लगाकर गुदा का अङ्गुलि के द्वारा स्वेदन करे (अर्थात् उँगली से रगड़कर स्वेदन करे) इससे रोगी शीघ्र ही सुख (आरोग्य) को प्राप्त करता है ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
इति चिकित्सास्थाने कृमिचिकित्सितम् ।।
ऐसे भगवान् कश्यप ने कहा था ।
वक्तव्य—चरक तथा सुश्रुत में कृमियों की २० जातियां दी गई हैं । उत्पत्ति की दृष्टि से चरक वि. अ. ७ में इन्हें चार प्रकार का माना है । १. पुरीषज, २. श्लेष्मज, ३. रक्तज, ४. मलज (बाह्यमलज) 'परन्तु सुश्रुत उ. अ. ५४ में ये तीन प्रकार के ही दिये हैं—विंशतेः कृमिजातीनां त्रिविधः संभवः स्मृतः । पुरीषकफरक्तानि ।। अर्थात् इसमें मलज कृमियों को नहीं दिया गया है । कृमियों का सामान्य निदान सुश्रुत उ. अ. ५४ में कहा है—प्रजीर्णाध्यशनासात्म्यविरुद्धमलिनाशनैः । अव्यायामदिवास्वप्नगुर्वतिस्निग्धशीतलैः ।। माषपिष्टान्नविदल बिसशालूकसेरुकैः । पर्णशाकसुराशुक्तदधिक्षीरगुडेक्षुभिः ।। पललानूपपिशितपिण्याकपृथुकादिभिः । स्वाद्वम्लद्रवपानैश्च श्लेष्मा पित्तं च कुप्यति ।। कृमीन् बहुविधाकारान् करोति विविधाश्रयान् । आमपक्वाशये तेषां कफविङ्जन्मनां पुनः ।। धमन्यां रक्तजानां च प्रसवः प्रायशः स्मृतः । इस सामान्य निदान के अतिरिक्त सुश्रुत में प्रत्येक का पृथक् २ विशेष निदान एवं सामान्य लक्षण निम्न प्रकार दिया है—माषपिष्टान्नविदलपर्णशाकैः पुरीषजाः । मांसमाषगुडक्षीरदधितैलैः कफोद्भवाः ।। विरुद्धार्जीर्णशाकाद्यैः शोणितोत्था भवन्ति हि । ज्वरो विवर्णता शूलं हृद्रोगः सदनं भ्रमः । भक्तद्वेषोऽतिसारश्च संजातकृमिलक्षणम् ।। चिकित्सा चरक वि. अ. ७ में कहा है—तत्र सर्वकृमीणामपकर्षणमेवादितः कार्यम्, ततः प्रकृतिविघातः, अनन्तरं निदानोक्तानां भावानामनुपसेवनम् । अर्थात् सबसे पूर्व कृमियों का अपकर्षण करना चाहिये । ये हाथ से पकड़कर निकाले जा सकते हैं अथवा आमाशय एवं पक्वाशय में ही
२०२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् मदात्ययचिकित्सिताध्यायः ? ]
स्थित होने पर वमन, विरेचन, शिरोविरेचन, आस्थापन आदि से निकालें। इसके पश्चात् उनके उत्पत्ति कारण का नाश करना चाहिये। यह कटु, तिक्त, कषाय, क्षार तथा उष्ण पदार्थों के सेवन से होता है। तथा अन्त में उन्हें पुनः उत्पन्न न होने देने के लिये निदान परिवर्जन करना चाहिये अर्थात् निदानोक्त पदार्थों का त्याग करना चाहिये। इनका विस्तृत विवरण चरक वि. अ. ७ तथा सुश्रुत उ. अ. ५४ में देखना चाहिये।
इति चिकित्सास्थाने कृमिचिकित्सितम् ॥
मदात्ययचिकित्सिताध्यायः ।
अथातः पानात्ययचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम पानात्यय (मदात्यय) चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।१-२।।
मद्यप्रवृत्तौ रोगस्तु प्रोच्यते त्रिविधो नृणाम्। पानात्ययो विभ्रमश्च पानापक्रम एव च ।।३।।
मद्य की प्रवृत्ति में मनुष्य को तीन प्रकार के रोग हो जाते हैं। १. पानात्यय २. विभ्रम (पानविभ्रम) ३. पानापक्रम ।।
तत्र योऽध्युषिते पाने त्वजीर्णे पिबते नरः।
तत् पानमत्ययं याति तस्मात् पानात्ययो मतः ।।४।।
पानात्यय का हेतु—जो व्यक्ति पहले पीये हुए मद्य के ऊपर अथवा उसके जीर्ण न होने पर पुनः मद्य पी लेता है—उसका पीया हुआ वह मद्य अत्यय (रोग) को प्राप्त हो जाता इसलिये इसे पानात्यय (मदात्यय) कहते हैं ।।४।।
विभ्रान्तानां तु पानानां सेवनात्(पानविभ्रमः) । सहसा पानविच्छेदः पानापक्रम उच्यते ।।५।।
पानविभ्रम का हेतु—विभ्रान्त मद्य के सेवन से पानविभ्रम हो जाता है। (मद्य के कारण चित्तवृत्तियों की अनवस्थिति या अस्थिरता को पानविभ्रम कहते हैं ।) पानापक्रम का हेतुमद्य का सहसा विच्छेद (न मिलना) हो जाने से पानापक्रम कहाता है। अर्थात् जो व्यक्ति सदा मद्यपान करता हो उसे सहसा यदि मद्य न मिले तो उस अवस्था को पानापक्रम कहते हैं ।।५।।
दीपनं रोचनं वृष्यं रतिवैशद्यकारकम्। कार्श्यचित्तश्रमहरं हर्षणं बलवर्धनम् ।।६।।
युक्तोपसेवितं मद्यं सात्त्विकानां विशेषतः। प्रमोदारोग्यपुष्टीनां तन्मूलं चान्नभोजनम् ।।७।।
युक्तिपूर्वक सेवन किये हुए मद्य के गुण—सात्विक पुरुषों में युक्तिपूर्वक सेवन किया गया मद्य दीपक, रोचक (भोजन में रुचि को बढ़ाने वाला), वृष्य, रति (मैथुन शक्ति) को विशद करने वाला अर्थात् मैथुन शक्ति को बढ़ानेवाला, कृशता एवं चित्त की थकावट को दूर करने वाला, तथा हर्ष एवं बल को बढ़ाने वाला होता है। यह प्रमोद (आनन्द) एवं आरोग्य (स्वास्थ्य) का मूल (कारण) है तथा यह अन्न एवं भोजन है। चरक चि. अ. २४ में कहा है—'किन्तु मद्यं स्वभावेन यथैवान्नं तथा स्मृतम्' । अर्थात् मद्य में भोजन के गुण विद्यमान हैं। इसी को प्रकट करने के लिये चरक में 'पानान्नगुणदर्शकः' शब्द भी दिया हुआ है। घोष की मैटेरिया मैडिका में भी लिखा है कि—"The question whether alcohal is a food has been much discussed, and the chief point is whether it can be regarded as a protain sparer. It possesses the power of lessening nitrogenous waste, though inferior to carbohydrate and fat. It is chemically allied to sugar and
| मदात्ययचिकित्सिताध्यायः ? ] | चिकित्सास्थानम् | २०३ |
|---|
undergoes combustion in the body, therefore, furnishes some energy to the organism and the chief claim of alcohal as a food is due to the fact that it will help to support life if given along with other food.
स्तन्यक्षये च धात्रीणामुत्पन्ने चाप्य ....... । .......... वातशूलेषु शीतके विषमज्वरे ॥८८॥ नारीणां सुकुमारीणां रोगेषु विविधेषु च । सूतानां दुष्प्रजातानां योनिभ्रंशेऽतिमैथुने ॥८९॥ दन्तजन्मनि बालानां पीडितानां पिपासया । तालुकण्ठौष्ठशोषे च रोदितेऽतिप्रजागरे ॥९०॥ वातश्लेष्मात्मके व्याधौ मद्यमाहुर्यथाऽमृतम् ।
मद्य का सेवन कहां २ करना चाहिये—धात्री के दूध का क्षय हो जाने पर, वातिक शूल में, शीतज्वर तथा विषमज्वर में, नारियों एवं सुकुमारियों के अनेक प्रकार के रोगों में, सूतिका एवं दुष्प्रजाता (जिन्हें प्रसव ठीक तरह से न हुआ हो) स्त्रियों के योनिभ्रंश (Prolapse of vagina or uterus) तथा अत्यधिक मैथुन में, बालकों के दन्तोत्पत्ति के समय, उनके पिपासा (प्यास) से पीड़ित होने पर, तालु, कण्ठ एवं ओष्ठ के शोष (सूख जाने) में, रोने के बाद, अत्यन्त जागरण करने के बाद तथा वातश्लैष्मिक व्याधि में मद्य को अमृत के समान कहा है। चरक चि. अ. २४ में कहा है—सुश्रुत उ. अ. ४७ में भी कहा है—स्निग्धैस्तदन्नैर्मांसैश्च भक्ष्यैश्च सह सेवितम्। भवेदायुः प्रकर्षाय बलायोपचयाय च॥
तदेवातिप्रसङ्गेन पीयमानं पुनः पुनः ॥९१॥ सर्वव्याधिमुखं प्रोक्तं विषवत् कारयत्यपि । मदात्ययं वातकरं कृच्छ्रसाध्यं करोति वा ॥९२॥
वही मद्य जब मात्रा से अधिक तथा पुनः २ पीई जाती है तब उसे सब रोगों का मुख (कारण) कहा गया है तथा विष की तरह यह वायु को बढ़ाने वाले तथा कृच्छ्रसाध्य मदात्यय रोग को उत्पन्न कर देता है। चरक चि. अ. २४ में कहा है—अयुक्तियुक्तं रोगाय युक्तियुक्तं यथाऽमृतम् ॥९१-९२॥
तरुणं वाऽप्यजीर्णे वा यो मद्यमतिसेवते । लघुसत्त्वो निराहरो रसस्तस्य विदुष्यति ॥९३॥ अनिलं रूक्षतीक्ष्णत्वात् पित्तमौष्ण्याद्विपाकतः । युगपत् कुपितौ दोषौ प्राप्तावामाशयं ततः ॥९४॥ विष्टभ्यश्लेष्मणा(ऽ)त्यक्तौ विप्लवेते महासिराः । ततो हृदयमूलासु विप्लुतासु सिरासु च ॥९५॥ शरीरं क्लिश्यतेऽत्यर्थं तस्य वक्ष्यामि लक्षणम् ।
मदात्यय रोग की सम्प्राप्ति—जो लघु सत्त्व (साधारण मन वाला) तथा निराहार व्यक्ति नवीन मद्य का सेवन करता है अथवा अजीर्ण में मद्य का अतिमात्रा में सेवन करता है, उसका रस दूषित हो जाता है। इस रस के रूक्ष एवं तीक्ष्ण होने से वायु तथा उष्ण विपाक होने से पित्तदोष युगपत् प्रकुपित होकर आमाशय में पहुँचते हैं। उसके बाद दूषित हुई श्लेष्मा के कारण वे दोष महासिराओं में तथा वहां से विप्लुत हुई हृदय मूल वाली सिराओं में पहुँचते हैं। इससे शरीर को अत्यन्त क्लेश होता है। उसके मैं लक्षण कहूँगा॥
मुह्यते घृष्यते रौति दह्यते ज्वर्यते भृशम् ॥९६॥ हृद्द्रवो वेपथुर्हर्षः पार्श्वशूलं शिरोरुजा । अरुचिः स्वेदविष्टम्भो विह्वलत्यतिसार्यते ॥९७॥ शुष्यते ......... याति विलपत्यपि । एवं मदात्ययं विद्यात्तस्य वक्ष्यामि लक्षणम् ॥९८॥
मदात्यय के लक्षण—मदात्यय में मनुष्य मूढ़ हो जाता है, उसका घर्षण किया जाता है, वह शब्द करता है, उसे दाह एवं ज्वर हो जाता है। उसे हृद्द्रव (Palpitation of the heart), वेपथु (कंपकपी), हर्ष, पार्श्वशूल, शिरो रोग,
| २०४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | मदात्ययचिकित्सिताध्यायः ? ] |
|---|
अरुचि, स्वेद तथा विष्टम्भ हो जाता है तथा रोगी अत्यन्त विह्वल हो जाता है और उसे अतिसार हो जाता है। उसका शरीर सूखजाता है, तथा वह अत्यन्त विलाप करता है। इन लक्षणों से मदात्यय रोग को जाने। अब मैं उनके (दोष भेद से पृथक् २) लक्षण कहूंगा॥
हृत्पार्श्वपर्वरुजनं प्रलापोऽतिप्रजागरः। उन्मत्त इव चाभाति पवनोत्थे मदात्यये ।।१९।।
वातिक मदात्यय के लक्षण—वातिक मदात्यय में रोगी के हृदय, पार्श्व तथा जोड़ों में दर्द होता है। रोगी प्रलाप (Delirium) करता है, वह अत्यन्त जागरण करता है (उसे निद्रा नहीं जाती) और वह उन्मत्त (पागल) की तरह प्रतीत होता है। चरक चि. अ. २४ में कहा है—हिक्काश्वासशिरःकम्पपार्श्वशूलप्रजागरैः। विद्याद्बहुप्रलापस्य वातप्रायं मदात्ययम् ॥ सुश्रुत उ. अ. ४७ में कहा है—स्तम्भाङ्गमर्दहृदयग्रहतोदकम्पाः पानात्ययेऽनिलकृते शिरसो रुजश्च॥
स्रोतःपाको ज्वरो दाहो विड्भेदः स्वेदपीतता। छर्दि रक्तप्रकोपो वा पीतं पश्यति पैत्तिके ।।२०।।
पैत्तिक मदात्यय के लक्षण—पैत्तिक मदात्यय में रोगी के स्रोतों का पाक, ज्वर, दाह, विड्भेद (अतिसार), स्वेद (पसीने) का पीला होना, छर्दि एवं रक्तप्रकोप हो जाता है तथा उसे पीला दिखाई देता है। चरक चि. अ. २४ में कहा है—तृष्णादाहज्वरस्वेदमूर्च्छातौसारविभ्रमैः। विद्याद्धरितवर्णस्य पित्तप्रायं मदात्ययम् ॥
आ............सेकच्छर्दिशीतज्वरालसाः। तन्द्रा स्तम्भो विसंज्ञत्वं विषादश्च कफात्मके ।।२१।। श्वासकासभ्रमोत्साहविड्भेदानाहवेपकाः। शूलमोहौ च सामान्यौ सर्वरूपस्तु सर्वजः ।।२२।।
श्लैष्मिक मदात्यय के लक्षण—श्लैष्मिक मदात्यय में सेक (कफप्रसेक), वमन, शीतज्वर, अलसरोग, तन्द्रा (आलस्य), स्तम्भ, संज्ञा का अभाव, विषाद, श्वास, कास, भ्रम, उत्साह, अतिसार, आनाह, कम्पन, शूल तथा मोह होते हैं। चरक च. अ. २४ में कहा है—छर्दिंरोचकहृल्लासतन्द्रास्तैमित्यगौरवैः। विद्याच्छीतपरीतस्य कफप्रायं मदात्ययम् ॥
त्रिदोषज मदात्यय सब रूपों वाला होता है अर्थात् उपर्युक्त सब लक्षण सम्मिलित होते हैं—सुश्रुत उ. अ. ४७ में कहा है—सर्वात्मके भवति सर्वविकारसम्पत् ।।
भूयिष्ठमामप्रभवं प्रवदन्ति मदात्ययम्। तस्मान्मदात्यये पूर्वं हितं लङ्घनमेव तु ।।२३।।
मदात्यय रोग को विशेषरूप से आमदोष से उत्पन्न हुआ माना जाता है। इसलिये मदात्यय रोग में सर्वप्रथम लङ्घन कराना हितकर माना गया है। चरक चि. अ. २४ में इसे त्रिदोषज मानकर ही चिकित्सा का विधान किया गया है—सर्वं मदात्ययं विद्यात् त्रिदोषमधिकं तु यम्। दोषं मदात्यये पत्येत् तमादौ प्रतिकारयेत् ॥ अर्थात् मदात्यय के त्रिदोषज होने पर भी जिस दोष की प्रधानता हो पहले उसकी चिकित्सा करनी चाहिये। अथवा वहीं पर ही पहले कफ दोष की चिकित्सा का विधान दिया है—कफस्थानानुपूर्व्या वा क्रिया कार्या मदात्यये। पित्तमारुतपर्यन्तः प्रायेण हि मदात्ययः ।। अर्थात् पहले कफ की चिकित्सा करें। उसके बाद क्रमशः पित्त और वायु की चिकित्सा करनी चाहिये ॥२३॥
प्रकाङ्क्षा लाघवं स्थैर्यमिन्द्रियाणां प्रसन्नता। रोगोपशान्तिर्वाक्शुद्धी रूपं सम्यग्विोषिते ।।२४।।
लङ्घन द्वारा आम दोष के सम्यक् प्रकार से शोषण हो जाने पर प्रकाक्षा (आहार की अभिलाषा), लघुता, स्थिरता, इन्द्रियों की प्रसन्नता, रोगों की शान्ति तथा वाणी की शुद्धि हो जाती है ॥२४॥
एतानि कृत्वा विकृतिं याति चातिविशोषणात्। असंप्राप्तिमतैतेषां जानीयात्तमलङ्घिते ।।२५।।
आम से अधिक शोषण होने पर उपर्युक्त लक्षणों के उत्पन्न होने के बाद उनमें विकार हो जाता है। तथा यदि लङ्घन कम हुआ हो अथवा ठीक तरह से न हुआ हो तो उपर्युक्त लक्षण उत्पन्न नहीं होते हैं ॥२५॥
मदात्ययचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् २०५
इत्येतैः कारणैर्दृष्ट्वा विदग्धमदपीडितम् । पाययेत्तर्पणं काले शीतं दाडिमवारिणा ।।२६।।
उपर्युक्त कारणों से रोगी को विदग्ध मद से पीडित जानकर उसे यथासमय अनार के रस के साथ शीतल तर्पण पिलाना चाहिये ॥२६॥
येनैव मद्येन भवेत् समुत्पन्नो मदात्ययः । तथैवोपहरैत् पातुं बहुशीतोदकान्वितम् ।।२७।।
कायाग्निस्तन्मयो ह्यस्य सिरा रसवहास्तथा । मनश्च भावितं तेन तस्मात्तद्ध्यस्य भेषजम् ।।२८।।
जिस मद्य के द्वारा ही रोगी को मदात्यय रोग उत्पन्न हुआ हो उसे बहुत अधिक तथा शीतल जल के साथ मिलाकर वही अर्थात् सजातीय मद्य पीने को देना चाहिये । क्योंकि उस मनुष्य की कायाग्नि, सिरा तथा रसवहा नाडियां तन्मय (उसी मद्य के ही अनुकूल) होती हैं तथा मन भी उसी (मद्य) से ही भावित (ओतप्रोत) होता है । इसलिये यही इसकी चिकित्सा है। चरक चि. अ. २४ में कहा है—मिथ्यातिहीनपीतेन यो व्याधिरुपजायते । समपीतेन तेनैव स मद्येनोपशाम्यति ।। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह (चि. ७ अ. ७) में भी कहा है ।।
अथवा क्लान्तविक्लिष्टयथर्तुसुखवारिणा । स्नातानुलिप्तं प्रयतं मनोज्ञासनवेश्मगम् ।।२९।।
पाययेत्तर्पणं युक्त्या हृद्यपात्रोपनायकम् ।
अथवा थके हुए एवं क्लेशयुक्त रोगी को भिन्न २ ऋतुओं के अनुसार सुखकारक पानी से स्नान कराकर तथा चन्दन आदि का लेप करके प्रयत्नपूर्वक एवं सुन्दर आसन तथा घर में बैठे हुए को हृद्य (मन को अच्छे लगने वाले) बर्तनों में रखकर युक्तिपूर्वक तर्पण पिलाये ॥२९॥
सक्तवः पारणा हृद्या अथवा लाजसक्तवः ।।३०।।
विड्सौवर्चलाजाज्यः सुशीतं दाडिमोदकम् । तन्मद्यमल्पतक्रं च रूषिताः सक्तवोऽल्पशः ।।३१।।
अथवा उसे हृदय को अच्छे लगने वाले सत्तू, पारणा, लाजसत्तू (चावलों के सत्तू) देवे । तथा विड्नमक, सौवर्चल नमक (कालानमक) तथा अजाजी (जीरा) युक्त शीतल दाडिमोदक (अनार का रस) का मद्य बनाकर उसमें थोड़ा तक्र मिलाकर देवे अथवा थोड़े २ करके सत्तू देवे ॥३०-३१॥
कुठेरभूस्तृणक्षौद्रजम्बीरसुमुखादयः ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १३६ तमं पत्रम्)
युक्ताम्लाः षाडवा मुख्याः पक्वापक्वाः सुगन्धिनः ।।३२।।
कुठेर (सितार्जक नामक श्वेत तुलसी भेद), भूतृण, मधु, जम्बीर (बिजौरा) तथा सुमुख (पर्णासभेद-बनबबरी) से युक्त एवं खट्टे, पक्व तथा अपक्व और सुगन्धित षाडव (अचार आदि) उसे देवे ॥३२॥
केशरं मातुलुङ्गानामार्द्रकं जीव(र)दाडिमम् । शर्करागुडखण्डानि जाङ्ग्लान्यामिषाणि च ।।३३।।
अम्लानम्लानि सिद्धानि संस्कृतानि विभागशः ।
उसे बिजौरे के केशर (पराग), आर्द्रक, जीरा, अनार, शर्करा तथा गुड़ के खण्ड (टुकड़े अथवा गुड और खाण्ड) तथा अम्ल (खट्टे) अनम्ल (जो खट्टे न हों) क्रमशः सिद्ध एवं संस्कृत किये हुए जांगल पशु-पक्षियों का मांस देवे ॥३३॥
उपोदिकां तक्रसिद्धां सिद्धां वा गुडचुक्रयोः ।।३४।।
एवंविधां त्ववक्षीरीं पानात्ययनिपीडितम् ।
२०६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् मदात्ययचिकित्सिताध्यायः ? ]
पानात्यय रोग से पीड़ित रोगी को तक्र से अथवा गुड और चुक्र के साथ सिद्ध की हुई उपोदिका (पोई-पत्रशाकविशेष-Indian Spinach) अथवा अवक्षीरी देनी चाहिये ॥३४॥
यथालाभोपसंपन्नां पाययेत् सिद्धये भिषक् ॥३५॥
इन उपर्युक्त प्रयोगों में से जो २ भी वस्तुएँ मिल जांय उन्हें चिकित्सक रोगसिद्धि के लिये रोगी को पिलाये ॥३५॥
कानिचिद्भक्ष्यत्र भक्ष्याणि कानिचित् स्वादयेद् बुधः । जिघ्रेत् पश्येत् पिबेत् किञ्चिच्छ्रद्धाजननकारणात् ।।
जो भी उस रोगी के लिये भक्ष्य पदार्थ हों वे उसे अच्छी प्रकार खिलाये। जिस वस्तु में उसकी श्रद्धा (रुचि) हो उसे सूंघे, देखे तथा पीये ॥३६॥
सुखं चास्यानुजानीयादृतुयोग्यं यथाक्रमम् । यच्च यच्चानुशेतेऽस्य तत्तदेवोपचारयेत् ।।३७।।
प्रत्येक ऋतु के अनुसार उसके सुख या स्वास्थ्य को जानकर जो भी आहार-विहार आदि उसके अनुकूल हो उसका उसे सेवन कराये ॥३७॥
क्रमेण चास्य संसर्गमन्नपानेषु योजयेत् । दुकूलक्षौमकदलीपद्मपत्रादि सेवयेत् ।।३८।। चन्दनानि च मुक्तानि शीतानि विविधानि च।
उसे धीरे २ संसर्जन क्रम से अन्न एवं पान देवे। तथा दुकूल (उत्तरीय वस्त्र), क्षौम (रेशमी वस्त्र), कदली तथा कमल के पत्र, चन्दन तथा अनेक प्रकार के शीतल मोती आदि का प्रयोग करे। चरक चि. अ. २४ में कहा है— कुमुदोत्पलपत्राणां सिक्तानां चन्दनाम्बुना । हिताः स्पर्शा मनोज्ञानां दाहे मद्यसमुत्थिते ।। कथाश्च विविधाः शीताः शब्दाश्च शिखिनां शिवाः । तोयदानां च संशब्दाः शमयन्ति मदात्ययम् ।। जलयन्त्राभिवर्षीणि वातयन्त्रवहनि च । कल्पनीयानि भिषजा दाहे धारागृहाणि च ॥३८॥
उष्णानि त्वन्नपानानि रूक्षाणि च गुरूणि च ।।३९।। अग्निसूर्योपसेवांच दिवास्वप्नं विशोषणम् । शोकाध्वमैथुनायासान् व्यायामांश्च विवर्जयेत् ।।४०।। मण्डा यवाग्वो यूषाश्च न शस्यन्ते मदात्यये ।
मदात्यय रोग में अपथ्य—मदात्यय का रोगी उष्ण, रूक्ष तथा गुरु अन्न-पान, अग्नि तथा सूर्य (धूप) का सेवन, दिन में सोना, लङ्घन आदि द्वारा शोषण, शोक, मार्गगमन, मैथुन, अधिक परिश्रम तथा व्यायाम का त्याग कर दे तथा उसे मण्ड, यवागू एवं यूष का सेवन नहीं करना चाहिये ॥३९-४०॥
एवं चेन्नोपशाम्येत तत्रेमां कारयेत् क्रियाम् ।।४१।।
यदि इन उपर्युक्त उपचारों से भी मदात्यय रोग शान्त न हो तो उसमें निम्न चिकित्सा करनी चाहिये ॥४१॥
उशीरं तिन्तिडीकं च दाडिमस्वरसं मधु । पानात्यये पित्तकृते श्रेष्ठं तर्पणपानकम् ।।४२।।
पैत्तिक मदात्यय में खस, इमली तथा अनार के स्वरस में मधु मिलाकर देना श्रेष्ठ एवं तृप्तिकारक पानक है ॥४२॥
काश्मर्यं दाडिमं द्राक्षाः खर्जूराणि परूषकम् । दद्यात् कुडवशस्तानि लोध्रादीनि तु युक्तितः ।।४३।।
गम्भारी, अनारदाना, द्राक्षा, खजूर, फालसा तथा लोध्र आदि को युक्तिपूर्वक एक कुडवमात्रा में रोगी को देवे ॥४३॥
लोध्रामलकमञ्जिष्ठाः सूक्ष्मं पि(ष्ट्वा) ........ । तोयाढके प्लुतं स्थाप्यं सजाति वा सकेशरम् ।।४४।। तृष्णां छर्दिमतीसारमदमूर्च्छाविलापकम् । अनवस्थानमरुचिं ग्लानिं चैतदपोहति ।।४५।।
फक्कचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् २०७
लोध्र, आंवला, मंजीठ, जायफल तथा नागकेसर को सूक्ष्म पीसकर एक आढक जल में डालकर रख दें। इसका सेवन करने से तृष्णा, छर्दि, अतिसार, मद, मूर्च्छा, प्रलाप, अनवस्थान (मन की अस्थिरता), अरुचि तथा ग्लानि दूर हो जाते हैं ॥४४-४५॥
लामज्जकमृणालत्वङ्मधुकान्युत्पलं तथा । पलं पलं गुडूच्या द्वे अष्टौ गुडपलानि तु ॥४६॥
जलाढके नवे भाण्डे गोपयेत् केशरान्वितम् । वातपित्तोत्तरं हन्ति मदं सोपद्रवं नृणाम् ॥४७॥
लामज्जक, मृणाल, दालचीनी, मुलहठी तथा उत्पल (नील कमल)-प्रत्येक १ पल। गिलोय-२ पल, गुड-८ पल तथा जल-१ आढक। इन्हें एक नये बर्तन में डालकर ऊपर से थोड़ी केसर मिलाकर किसी सुरक्षित स्थान पर रख दे। इसके प्रयोग से उपद्रवयुक्त वातिक एवं पैत्तिक मद नष्ट हो जाता है ॥४६-४७॥
लोकसिद्धानि चान्यानि पानकान्युपकल्पयेत् । समद्यान्यन्नपानानि भूयिष्ठं चोपपादयेत् ॥४८॥
अन्य भी जो लोक में प्रसिद्ध पानक हैं, उनका रोगी को प्रयोग कराये। तथा उसे मद्यसहित अन्नपान का पर्याप्त मात्रा में सेवन कराये ॥४८॥
अथानुबन्धं कुर्वीत स रोगी च बली भवेत् ।
यथादोषं ततस्तस्य कुर्यात् संशोधनं बुधः ॥४९॥
इसके साथ ही अनुबन्धरूप से कोई दूसरा रोग हो जाने पर यदि रोगी बलवान् है तो दोष के अनुसार बुद्धिमान व्यक्ति उसका संशोधन करे ॥४९॥
मद्ययुक्तं त्रिवृच्चूर्णं पेयं स्यादनुलोमनम् । पानकेनाप्यवत् कार्यं समद्यगुडयुक्तया ॥५०॥
मद्य के साथ त्रिवृत् का चूर्ण देने से अनुलोमन हो जाता है। तथा मद्य एवं गुड मिले हुए पानक से भी यही प्रयोजन सिद्ध हो जाता है ॥५०॥
विसर्पदाहज्वरयोरेवं चोक्ता परिक्रिया । पिपासाज्वरदाहार्ते सैव कार्या मदात्यये ॥५१॥
विसर्प एवं दाह ज्वर में जो चिकित्सा कही गई है, मदात्यय रोग में पिपासा, ज्वर एवं दाह होने पर वही चिकित्सा करनी चाहिये ॥५१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥५२॥
इति चिकित्सास्थाने पाना(मदा)त्ययचिकित्सितम् ॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥५२॥
इति चिकित्सास्थाने पाना (मदा) त्ययचिकित्सितम् ॥
फक्कचिकित्सिताध्यायः ।
अथातः फक्कचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम फक्कचिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
३६ का.सं.
२०८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् फक्कचिकित्सिताध्यायः ? ]
वक्तव्य—रोग के लक्षणों को देखते हुए आधुनिक Ricket रोग से इसकी समानता है। अतः इसे बालकों का Ricket रोग कहा जा सकता है ॥१-२॥
बालः संवत्सरा(पन्नः)पादाभ्यां यो न गच्छति।
स फक्क इति विज्ञेयस्तस्य वक्ष्यामि लक्षणम् ॥३॥
एक वर्ष की अवस्था तक यदि बालक स्वयं अपने पैरों से न चल सके तो उस अवस्था को फक्क रोग कहते हैं। उसका मैं लक्षण कहूँगा ॥३॥
धात्री श्लैष्मिकदुग्धा तु फक्कदुग्धेतिसंज्ञिता।
तत्क्षीरपो बहुव्याधिः कार्श्यात् फक्कत्वमाप्नुयात् ॥४॥
क्षीरज फक्क के निदान, सम्प्राप्ति एवं लक्षण—जिस धात्री का दुग्ध श्लैष्मिक होता है उसे 'फक्कदुग्धा' कहते हैं। उस धात्री के दुग्ध का सेवन करने वाला बालक अनेक व्याधियों से आक्रान्त हो जाता है तथा कृशता के कारण उसे 'फक्कारोग' हो जाता है ॥४॥
पित्तानिलप्रकृतिकी पटुक्षीरा पटुप्रजा । कुतः पङ्गुजडा मूका त्रिदोषक्षीरभोजिनः ॥५॥
पित्त या वातप्रकृति वाली स्त्री, जिसका दुग्ध लवण युक्त हो तथा जिसके सन्तान अधिक हो-उसके दूध के सेवन से अथवा त्रिदोषज दूध के सेवन से बालकों में पङ्गुता, जड़ता तथा मूकता (Dumbness) आ जाती है ॥५॥
हृदयात् संप्रवर्तन्ते मनःपूर्वाणि देहिनाम् । इन्द्रियाणीन्द्रियावश्रौद्धा(?) ........ हितम् ॥६॥
हृदय से ये लक्षण मनसहित इन्द्रियों में पहुंचते हैं अर्थात् मन और इन्द्रियों में भी इस रोग का प्रभाव हो जाता है ॥६॥
तत्र वागिन्द्रियं त्वेकं द्विधा भिन्नं यथा करौ । अर्धेन शब्दं वदति गृह्णात्यर्धेन तं पुनः ॥७॥
इन इन्द्रियों में एक वाक् इन्द्रिय होती है। इसके हाथों के समान दो भाग होते हैं। अर्थात् जिस प्रकार मनुष्य के हाथ दो होते हैं उसी प्रकार वाक् इन्द्रिय के भी दो भाग होते हैं। उनमें से एक भाग के द्वारा वह बोलता है और दूसरे के द्वारा उसे पुनः ग्रहण करता है अर्थात् सुनता है ॥७॥
तस्माच्च मूका भूयिष्ठं भवन्ति बधिरा नराः ।
वाङ्मूलं हि स्मृतं श्रोत्रं वाग्भ्रंशे भ्रश्यते हि तत् ॥८॥
मूलं वाच्छोत्रं म......च्च बधिरो नरः । ब्रवीति मूले हि हते हतावा ........... ॥९॥
इसलिये जो बालक मूक (Dumb) होता है वह साथ ही प्रायः बधिर (बहरा-Deaf) भी होता है। श्रोत्र (श्रवणशक्ति) वाङ् मूल में स्थित होती है। इंसलिये वाणी (वाक्शक्ति) के नष्ट होने पर श्रवण शक्ति भी स्वयमेव नष्ट हो जाती है। इस प्रकार मूल के नष्ट होने पर व्यक्ति बधिर (बहरा) हो जाता है। क्योंकि मूल के नष्ट होने पर उसके आश्रित भाव भी नष्ट हो जाते हैं।
वक्तव्य—आधुनिक विद्वान् भी बोलने तथा सुनने का परस्पर घनिष्ठ संबन्ध मानते हैं। प्रारंभ में बालक को बोलना सिखाने के लिये आवश्यक है कि वह शब्दों को सुन सके। जिस व्यक्ति ने जो बात कभी सुनी नहीं है वह उसे निश्चित रूप से बोल भी नहीं सकता। एक बार सुनने के बाद ही वह बोल सकता है। इसलिये बोलने की शक्ति उत्पन्न होने से पहले जो बालक किसी कारण से बहरा (deaf) हो जाय वह बोल भी नहीं सकता। इसे Deaf-mutism कहते
फक्कचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् २०९
हैं। बोलने की शक्ति उत्पन्न होने के बाद जो व्यक्ति बहरा होता है उसके विषय में यह सिद्धान्त लागू नहीं होता है। क्योंकि तब तक वह बोलना सीख चुका है। अब उसे कोई बात बोलने के लिये सुनने पर आश्रित नहीं रहना पड़ता जैसा कि बालक की बिलकुल प्रारंभिक अवस्था में होता है। यहां यह स्मरण रखना चाहिये कि वाणी (वाक्) शक्ति के नष्ट होने पर श्रवण शक्ति नष्ट नहीं होती है जैसा कि ऊपर मूल श्लोक में कहा गया है। अपितु इसके विपरीत श्रवण शक्ति के नष्ट हो जाने पर वाक्शक्ति नष्ट हो जाती है ॥८-९॥
क्षीरजं गर्भजं चैव तृतीयं व्याधिसंभवम्। फक्कत्वं त्रिविधं प्रोक्तं क्षीरजं तत्र वर्णितम् ।।१०।।
फक्क रोग तीन प्रकार का होता है। १. क्षीरज २. गर्भज तथा ३. व्याधिजन्य। इनमें से क्षीरज फक्क रोग का वर्णन कर दिया गया है ॥१०॥
गर्भिणीमातृकः क्षिप्रं स्तन्यस्य विनिवर्तनात्। क्षीयते म्रियते वाऽपि स फक्को गर्भपीडितः ।।११।।
गर्भज फक्कारोग—जिसकी माता गर्भिणी है—उसका दूध शीघ्र ही समाप्त हो जाने से अर्थात् गर्भ के कारण उसका दूध बन्द हो जाने से वह बालक क्षीण हो जाता है अथवा उसकी मृत्यु हो जाती है। यह गर्भ द्वारा पीडित फक्क रोग है ॥११॥
निजैरागन्तुभिश्चैव .......... रो ज्वरादिभिः। अनाथः क्लिश्यते बालः क्षीणमांसबलद्युतिः ।।१२।।
संशुष्कस्फिचबाहूरुर्महोदरशिरोमुखः। पीताक्षो हृषिताङ्गश्च दृश्यमानास्थिपञ्जरः ।।१३।।
म्लानाधरकायश्च नित्यमूत्रपुरीषकृत्। निश्चेष्टाधरकायो वा पाणिजानुगमोऽपि वा ।।१४।।
दौर्बल्यान्मन्दचेष्टश्च मन्दत्वात् परिभूतकः। मक्षिकाकृमिकीटानां गम्यश्चासन्नमृत्युरुकू ।।१५।।
विशीर्णहृष्टरोमा च स्तब्धरोमा महानखः। दुर्गन्धी मलिनः क्रोधी फक्कः श्वसिति ताम्यति ।।१६।।
अतिविण्मूत्रदूषिकाशिङ्घाणकमलोद्भवः। इत्येतैः कारणैर्विद्याद्व्याधिजां फक्कतां शिशोः ।।१७।।
व्याधिज फक्क रोग के लक्षण—निज तथा आगन्तु ज्वर आदि रोगों से अनाथ बालकों को क्लेश होकर उनका मांस, बल एवं द्युति (तेज) क्षीण हो जाता है। उस बालक के स्फिच् (नितम्ब–Buttocks), बाहु तथा जंघायें शुष्क हो जाती हैं तथा उदर (पेट), सिर और मुख बड़े हो जाते हैं, उसकी आंखें पीली हो जाती हैं, अङ्ग हर्ष (रोमहर्ष) युक्त होता है तथा शरीर केवल अस्थियों का पञ्जर (ढांचा) ही दिखाई देता है। उसका अधर काय (शरीर का निचला भाग) म्लान दिखाई देता है, उसका मूत्र एवं मल सदा निकलता रहता है अर्थात् Incontinance of urine and foeces हो जाता है) उसका निचला भाग निश्चेष्ट (Paralysed) हो जाता है तथा वह हाथों और घुटनों के बल चलता है। दुर्बलता के कारण उसकी चेष्टाएं मन्द हो जाती हैं तथा चेष्टाओं के मन्द हो जाने से मक्खियां, कृमि एवं कीड़े आदि उसे आक्रान्त करके शीघ्र मृत्यु कर देने वाले रोग उत्पन्न कर देते हैं। फक्क रोगी के रोम (बाल) विशीर्ण (सूखे हुए), हृष्ट तथा स्तब्ध होते हैं, उसके नख बड़े २ होते हैं तथा उसके पास से दुर्गन्धि आती है। वह मलिन एवं क्रोधी होता है तथा वह विशेष प्रकार से श्वास लेता है। मल-मूत्र की अधिकता, दूषित सिंङ्घाण (नासिका का मल) एवं मल आदि लक्षणों को देखकर बालक के व्याधिजन्य फक्क रोग को जाने ॥१२-१७॥
गर्भिणीमातृकेनैव .................. ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १३७ तमं पत्रम्।)
........... ।।
......... मनाथानां विशेषतः। प्रदुष्टग्रहणीकाश्च प्रायशो बहुभोजिनः ।।
फक्का भवन्ति तस्माच्च भुक्तं तेषामपार्थकम्। मन्दाग्नित्वाद्व्रवो (सो) त्सर्गाद्बहुमूत्रपुरीषिणः ।।
२१० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् फक्कचिकित्सिताध्यायः ? ]
जिसकी माता गर्भिणी है ऐसे बालक ...... तथा अनाथ, दुष्ट ग्रहणी रोग वाले और प्रायः अधिक भोजन करने वाले बालक फक्क रोगी होते हैं इसलिये उनका खाया-पीया सब व्यर्थ हो जाता है। अग्नि के मन्द होने से तथा रस का उत्सर्ग होने से उन्हें मूत्र एवं पुरीष अधिक होता है ॥
..................................................... ।
..................................................... ।।
................................ कारयेत् क्रियाम् ।।
इन रोगियों में निम्न चिकित्सा करे ॥
कल्याणकं पिबेत् फक्कः षट्पलं वा यथाऽमृतम् ।
सप्तरात्रात् परं चैनं त्रिवृत्क्षीरेण शोधयेत् ।।
शुद्धकोष्ठस्ततः फक्कः पि ......... ।
..................................................... ।
..................................................... ।।
न तु ब्राह्मीघृतं शूद्रः पिबेत्तद्व्यस्य नाशनम् । प्रजाक्षयेण युज्यन्ते शूद्रा ब्राह्मीं पिबन्ति ये ।।
मृताः स्वर्गं न गच्छन्ति धर्मश्चैषां विलुप्यते ।
चिकित्सा—फक्कोरोगी कल्याणकघृत, षट्पलघृत अथवा अमृतघृत का पान करे। इससे स्नेहन हो जाने पर ७ दिन के बाद रोगी का त्रिवृत् क्षीर के द्वारा शोधन करे। कोष्ठ का शोधन हो जाने पर फक्कोरोगी (ब्राह्मीघृत) का सेवन करे।
....... परन्तु शूद्रों को ब्राह्मी घृत का सेवन नहीं करना चाहिये। इससे उसका नाश हो जाता है। जो शूद्र ब्राह्मी (घृत) का सेवन करते हैं उनकी सन्तान का क्षय (नाश) हो जाता है। वे मृत्यु के उपरान्त स्वर्ग में नहीं जाते हैं तथा उनके धर्म का भी लोप हो जाता है ॥
दीप ............................................. ।।
.............................. । ........... ल्या वा रास्नया मधुकेन वा ।।
पुनर्नवैकपर्णीभ्यामेरण्डशतपुष्पयोः । द्राक्षापीलुत्रिवृद्भिर्वा शृतं क्षीरं प्रयोजयेत् ।।
एतानि त्वेव सर्वाणि संभृत्य मतिमान् भिषक् ।
....... तथा रास्ना, मुलहठी, पुनर्नवा तथा एकपर्णी, एरण्ड और सौंफ तथा द्राक्षा, पीलु और त्रिवृत् के द्वारा पकाये हुए दूध का प्रयोग करना चाहिये। बुद्धिमान् वैद्य को इन सबको एकत्र करके रखना चाहिये ॥
मांसस्य ............................................. ।।
.......... पुनर्यूषं संस्कृतं क्षीरमेव वा । शाल्यन्नेन सहाश्रीयात् पिबेत्तं चापि नित्यशः ।।
तेन प्राणं च लभते याति रोगैश्च मुच्यते । तेनैव तैलं विपचेत् फक्कानां सर्वथोदितम् ।।
इसके अतिरिक्त मांस ..... यूष तथा संस्कार किया हुआ दूध शालि अन्न के साथ नित्य सेवन करना चाहिये। इससे प्राणलाभ होकर रोग नष्ट हो जाते हैं। इन्हीं उपर्युक्त ओषधियों से ही तेल सिद्ध करके सम्पूर्ण फक्क रोगों में प्रयुक्त करना चाहिये ॥
रास्नामधु ............................. । ...... घृतं वा तैलं वा क्षीरं यूषमथो रसम् ।।
फक्कचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् २११
द्विःसंस्कृतं प्रयुञ्जीत सर्वयोगैर्विमुच्यते ।
इसी प्रकार रास्ना, मधु .... आदि औषधियों से यथा-विधि घृत, तेल, दूध, यूष या मांसरेस को दो बार संस्कार करके प्रयोग करने से सब रोग नष्ट हो जाते हैं॥
कफाधिकं चेन्मन्येत मूत्रमिश्रं पयः पिबेत् ।।
प्रयोगेण हिताशी च फक्करोगैर्विमुच्यते ।
यदि इस रोग में कफ की प्रधानता हो तो दूध में गोमूत्र मिलाकर पीना चाहिये। इसके प्रयोग तथा पथ्य सेवन से फक्क रोग दूर हो जाता है॥
एरण्डांशुमतीबिल्व .......................... ।।
........ शास्ते कार्या दशपलाः पृथक् । यवकोलकुलत्थानां प्रस्थं प्रस्थं समावपेत् ।।
अपां पचेच्चतुर्द्रोणे कषायं पादशेषितम् । तैलप्रस्थं दधिप्रस्थं कषायं च पुनः पचेत् ।।
तत् सिद्धं गोपयेद्यत्नात् सर्वथा संप्रयोजयेत् । बन्ध्यापङ्गु ............. ।।
........ ते इक्ष्वाकोः सुबाहोः सगरस्य च । नहुषस्य दिलीपस्य भरतस्य गयस्य च ।।
एतेन लेभिरे पुत्रा गतिमायुर्बलं सुखम् । राज्ञां पूर्वोपदेशाच्च राजतैलमिति स्मृतम् ।।
अनुग्रहप्रवृत्तौ हि राज्ञामासी ......... । ............................ प्रशस्यते ।।
राजतैल का प्रयोग—एरण्ड, अंशुमती (शालपर्णी) तथा बिल्व ...... आदि प्रत्येक १० पल। यव, कोल (बेर) तथा कुलत्थ १-१ प्रस्थ। जल ४ द्रोण। इन सबका क्वाथ करके चतुर्थांश शेष रखे। अब १ प्रस्थ तैल तथा १ प्रस्थ दही के साथ उपर्युक्त कषाय का पुनः पाक करे। तैल सिद्ध होने पर उसे यत्नपूर्वक सुरक्षित स्थान पर रखे। इसका सम्यक् प्रकार से प्रयोग करने से बन्ध्यात्व, पङ्गुत्व, आदि नष्ट होते हैं। इस तैल के प्रयोग से इक्ष्वाकु, सुबाहु, सगर, नहुष, दिलीप, भरत, गय आदि राजाओं के पुत्रों ने गति, आयु, बल तथा सुख को प्राप्त किया था। राजाओं को पहले उपदेश किया जाने से इसे राजतैल कहते हैं राजाओं के अनुग्रह के लिये इसका प्रयोग प्रशस्त माना गया है॥
त्रिचक्रं फक्करथकं प्राज्ञः शिल्पिकनिर्मितम् । विदध्यात्तेन शनकैर्गृहीतो गतिमभ्यसेत् ।।
उपर्युक्त चिकित्सा के अतिरिक्त बुद्धिमान वैद्य को किसी शिल्पी (बढ़ई-कारीगर) से एक तीन पहियों वाला फक्क रथ (Tricycle) बनवाकर उसके सहारे धीरे २ उस फक्क रोग से आक्रान्त बालक को चलने का अभ्यास कराना चाहिये॥
बस्तयः स्नेहपानानि स्वेदाश्चोद्वर्तनानि च । वातरोगेषु बालानां संसृष्टेषु विशे (षतः) ।।
............................. । ............ जन्तोः सुखाश्च शय्यासनबस्तियोगाः ।।
यदि इसके साथ में वात रोगों का संसर्ग हो तो उन बालकों को बस्ति, स्नेहपान, स्वेदन तथा उद्वर्तन (उबटन) आदि कराना चाहिये। ...... तथा उसे सुखकारी शय्या (चारपाई-बिस्तरा), आसन तथा बस्ति योगों का प्रयोग कराना चाहिये॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
इति (चिकित्सास्थाने) फक्कचिकित्सतम् ।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
इति (चिकित्सितस्थाने) फक्कचिकित्सितम् ।
२१२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् धात्रीचिकित्सिताध्यायः ? ]
धात्रीचिकित्सिताध्यायः ।
अथातो धात्रीचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम धात्री-चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
............................... । धात्रीचिकित्सां निखिलां वक्तुमर्हसि मे मुने ।।
सुखं दुःखं हि बालानां धात्रीमूलमसंशयम् ।
हे महर्षि ! आप मुझे सम्पूर्ण धात्री-चिकित्सा का उपदेश कीजिये । क्योंकि बालकों के सब दुःख और सुख (रोग और आरोग्य) धात्री पर ही आश्रित होते हैं ॥
इति पृष्टः स शिष्येण स्थविरेण महातपाः ।।
धात्रीचिकित्सितं कृत्स्नं प्रोवाच वदतां वरः ।।
इस प्रकार ज्ञानी शिष्य द्वारा प्रश्न किये जाने पर महातपस्वी एवं श्रेष्ठ विद्वान् महर्षि कश्यप ने उसे सम्पूर्ण धात्रीचिकित्सा का उपदेश किया ॥
....................... । ................ ।।
........ (पु)ष्पिकी धात्री तीक्ष्णाग्निर्वातपैत्तिकी ।।
समधातुः समाग्निस्तु विषमैर्विषमाग्निकी ।
..... जिस धात्री को मासिक स्राव नियमपूर्वक होता हो तथा वात और पित्त की प्रधानता हो वह धात्री तीक्ष्ण अग्नि वाली होती है । वातादि धातुओं के समावस्था में होने से अग्नि सम होती है तथा उनके विषम होने से अग्नि विषम होती है । चरक वि. अ. ६ में चार प्रकार की अग्नि (जाठराग्नि) का वर्णन किया है—अग्निषु तु शरीरेषु चतुर्विधो विशेषो बलभेदेन भवति तद्यथा-तीक्ष्णो मन्दः समो विषम इति । तत्र तीक्ष्णोऽग्निः सर्वोपचारसहः, तद्विपरीतलक्षणो मन्दः, समस्तु खल्वपचारतो विकृतिमापद्यतेऽनपचारतस्तु प्रकृताववतिष्ठते, समलक्षण-विपरीतलक्षणस्तु विषमः, इत्येते चतुर्विधा भवन्त्यग्नयश्चतुर्विधानामेव पुरुषाणाम् । तत्र समवातश्लेष्मणां प्रकृतिस्थानां समाभवन्त्यग्नयः, वातलानां तु वाताभिभूतेऽग्न्यधिष्ठाने विषमा भवन्त्यग्नयः, पित्तलानां तु पित्ताभिभूतेऽग्न्यधिष्ठाने तीक्ष्णा भवन्त्यग्नयः, श्लेष्मलानां तु श्लेष्माभिभूते ह्यग्न्यधिष्ठाने मन्दा भवन्त्यग्नयः । अर्थात् शारीर अग्नियां बल भेद से चार प्रकार की होती हैं । १. तीक्ष्ण, २. मन्द, ३. सम, ४. विषम । जिन पुरुषों में वात, पित्त तथा कफ समावस्था में हों उनकी सम होती है । वातप्रधान पुरुषों की अग्नि विषम होती है । पित्तप्रधान पुरुषों की अग्नि तीक्ष्ण होती है तथा श्लेष्मप्रधान पुरुषों की अग्नि मन्द होती है ॥
आयुरायोग्यमूलं प्रजानां च समाग्निता ।।
विषमः सर्वरोगाणां मूलं ह्रास .......... ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १३८ तमं पत्रम् ।)
सम अग्नि प्राणियों की आयु एवं आरोग्य का कारण होती है तथा विषम अग्नि सब रोगों का मूल है और शरीर का ह्रास करती है ॥
धात्रीचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् २१३
...................................................................... । तीक्ष्णस्य बृंहणं नित्यं मन्दाग्नेर्दीपनक्रिया ।।
पथ्याशनं तु सततं विषमाग्नेः सुखावहम्। कल्याणकं षट्पलं वा प्रयोगेनोपयुज्यते ।।
यथाबलं यथायोगं पञ्चक .......... । ........................................................ ।।
................................................... ति यथाविधि ।
...... तीक्ष्ण अग्नि वाले पुरुष का सदा वृहण करना चाहिये। मन्दाग्नि का दीपन तथा विषम अग्निवाले को सदा पथ्य का सेवन कराना सुखकारक होता है। इनमें कल्याणघृत अथवा षट्पल घृत का प्रयोग करना चाहिये। तथा आवश्यकतानुसार बल को देखकर यथाविधि पञ्चकर्म करना चाहिये ।। ......
न तूपयोजयेत् क्षारं क्षारप्रायौषधानि वा ।।
प्रजाविनाशनः क्षारो धात्रीणां स न शस्यते ।
इनमें क्षार अथवा क्षारप्रधान ओषधियों का उपयोग नहीं करना चाहिये। क्षार सन्तान का नाश करने वाला होने से धात्रियों के लिये प्रशस्त नहीं माना गया है। चरक वि. अ. १ में भी क्षार का अधिक प्रयोग पुंस्त्वघातक कहा गया है—
क्षारः पुनरौष्ण्यतैक्ष्ण्यलाघवोपपन्नः क्लेदयत्यादौ पश्चाद्विशोषयति, स पचनदहनभेदनाथर्मुपयुज्यते; सोऽतिप्रयुज्यमानः केशाक्षिक्षहृदयपुंस्त्वोपघातकरः संपद्यते, ये ह्येनं ग्रामनगरनिगमजनपदाः सततमुपयुञ्जते ते ह्यान्ध्यषाण्ड्यखालित्यपालित्यभाजो हृदयापकर्तिनश्च भवन्ति, तद्यथा-प्राच्याश्चीनाश्च, तस्मात्क्षारं नात्युपयुञ्जीत ॥९॥
म्रक्षणोद्वर्त्तनस्नानं शुक्लाम्बरनिषेवणम् ।।
मृष्टमन्नं सुखा ..................... । ................................................ ।।
............. (ध)र्मरतिधार्त्रीणां सुखहेतवः ।
उनका म्रक्षण (मालिश), उद्वर्तन (उबटन), स्नान, शुभ्र (श्वेत) वस्त्रों का धारण करना तथा पवित्र अन्न (भोजन) ...... ये धात्री के धर्म, रति (भोगविलास) एवं सुख के कारण हैं ।।
मेदस्विनीनां धात्रीणां सिराकर्म प्रशस्यते ।।
तथा जो धात्री मेद (चर्बी) वाली अर्थात् स्थूल होती है उसका सिराकर्म (सिराव्यध) करना चाहिये ।।
स्नेहस्वेदोपपन्नानामूर्ध्वं चाधश्च शोधनम् । ततः सा मेदसि क्षीणे स्त्रोतःसु विवृतेषु च ।।
.................................. । ................ यो रसः ।।
कृशां च नष्टपुष्पां च बृंहयेत्तेन सिद्ध्यति ।
स्नेहन एवं स्वेदन कराकर धात्री का ऊर्ध्व एवं अधः शोधन (वमन एवं विरेचन) कराना चाहिये। इससे वह मेद के क्षीण हो जाने से तथा स्रोतों के खुल जाने से ...... स्वस्थ हो जाती है। कृश एवं नष्टपुष्पा (जिसका आर्तव नष्ट हो गया हो अर्थात् Menopause. हो गया हो) धात्री को बृंहण कराने से वह स्वस्थ हो जाती है ।।
बलामूलतुला धौता दशमूलं शतावरी ।।
गुडूची रोहिषं रास्ना वृश्चिकाली पुनर्नवा । वृषः सहचरोशीरसारिवामूर्व च.......... ।।
......................................... । .................... काकजङ्घांऽशुमत्यपि ।।
अश्वगन्धा मृगैर्वारुः कालाऽथ नवमालिका । अतिमुक्तकशाङ्गैंष्टाकपित्थं त्रिफलेति च ।।