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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

गुल्मचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १६१

अभया पिप्पली द्राक्षा गुडूची सपुनर्नवा । लवणक्षारगन्धर्वभार्गीरास्नारसाञ्जनम् ॥२७॥ तुल्यक्षीरं पचेदेतैर्घृतमक्षमसैर्भिषक् । शैशुकं नाम तत् सर्पिर्वातगुल्मनिवारणम् ॥२८॥

हरड़, पिप्पली, द्राक्षा, गिलोय, पुनर्नवा, सैन्धव नमक, सर्जक्षार, गन्धर्व (श्वेत एरण्ड), भार्गी, रास्ना, तथा रसौंत-प्रत्येक १ कर्ष। दूध तथा घृत समान मात्रा में लेकर यथाविधि घृत पाक करे। यह शैशुक घृत (शिशुसर्पि) कहलाता है। यह वातगुल्म को नष्ट करता है ॥२७-२८॥

स्निग्धस्विन्नसमाश्वस्तं गुल्मिनं स्त्रंसयेत्ततः । विरेचनेन मृदुना तैलेनैरण्डजेन वा ॥२९॥

स्नेहन तथा स्वेदन किये हुए गुल्म रोगी को आश्वासन देकर किसी मृदु विरेचन (Mild Lexative) या ऐरण्ड तैल से विरेचन कराये ॥२९॥

विरिक्तं च यथाकालं नातिरूक्षाणि भोजयेत् । युक्तामुलवणोष्णानि युक्तस्नेहरसानि च ॥३०॥ भोजयेद्गुल्मिनं नित्यं निदानगुरुवर्जकम् । न चातिभोजनं नित्यं शस्यते सर्वगुल्मिनाम् ॥३१॥

विरेचन हो जाने पर उचित काल में रोगी को ऐसे पदार्थ खिलाये जो अत्यन्त रूक्ष न हों तथा जिनमें योग्य परिमाण में अम्ल तथा लवण पड़ा हो, जो उष्ण हो तथा अच्छी प्रकार स्निग्ध हों। रोगी को सदा निदान (वातिक गुल्म के कारण) तथा गुरु पदार्थों का त्याग कर देनो चाहिये। सब प्रकार के गुल्मरोगियों को अधिक भोजन करना हितकर नहीं है ॥३०-३१॥

पिप्पलीं पिप्पलीमूलं चव्यं चित्रकनागरम् । बिल्वं कपित्थं बदरं वृषकं गणिकारिकाम् ॥३२॥ हिङ्गुदाडिमजीवन्तीवृक्षाम्लं साम्लवेतसम् । पौष्करं शटिन्दन्त्यौ च लवणानि च सर्वशः ॥३३॥ द्वौ क्षारावजमोदं च तुल्यं शुष्काणि चूर्णयेत् । मातुलुङ्गरसेनेते वटका बदरोपमाः ॥३४॥ कृताः सुखाम्बुना पेया मद्यैरम्लेन वा भिषक्! । वातगुल्ममुदावर्तं प्लीहशूलं च नाशयेत् ॥३५॥

पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, सोंठ, बिल्व, कैथफल, बेर, बांसा, गणिकारिका (क्षुद्र अग्निमन्थ), हींग, अनारदाना, जीवन्ती, वृक्षाम्ल (विषांबिल), अम्लवेत, पुष्करमूल, शठि (कपूरकचरी-या कचूर), दन्ती (जमालगोटा) पांचों नमक, दोनों क्षार (सर्जक्षार तथा यवक्षार) तथा अजमोद-इन सबको समान मात्रा में लेकर शुष्क चूर्ण करे। बिजौरे के रस में भावना देकर इसकी बेर के समान गोलियां बनाये। इन्हें वैद्य गरम पानी या मद्य के अनुपान से सेवन कराये। इससे वातगुल्म, उदावर्त, तथा प्लीहाशूल, नष्ट हो जाता है ॥३२-३५॥

मयूरांस्तित्तिरीम् क्रौञ्चान् कपोतान् वनकुक्कुटान् । यवगोधूमशालींश्च वातगुल्मी सदाऽश्रि(श्री)यात् ॥३६॥

वातगुल्म में पथ्य—वातगुल्म का रोगी सदा मयूर, तीतर, क्रौञ्च, कबूतर और जंगली मुर्गे का मांस तथा जौ, गेहूं तथा शालि चावलों का सेवन करे। चरक चि. अ. ५ में भी कहा है—कुक्कुटांश्च मयूरांश्च तित्तिरिक्रौञ्चवर्तकाः । शालयो मदिरा सर्पिर्वातगुल्मभिषग्जितम् ॥ हितमुष्णं द्रवं स्निग्धं भोजनं वातगुल्मिनाम् । समण्डवारुणीपानं पक्वं वा धान्यकैर्जलम् ॥३६॥

यति तु स्निह्यमानस्य वातगुल्मो न शाम्यति । हितमास्थापनं तस्य तथैवाप्यनुवासनम् । क्षीरानुपानामभयां सगुडां संप्रयोजयेत् ॥३७॥

यदि स्नेहन करते हुए भी रोगी का वातगुल्म शान्त न हो तो उसे आस्थापन एवं अनुवासन बस्तियां देनी चाहिये तथा दूध के अनुपान से गुड़ और हरड़ को मिलाकर प्रयोग करना चाहिये। चरक चि. अ. ५ में भी गुल्म (वातिक) में बस्ति की श्रेष्ठता बताई है—बस्तिकर्म परं विद्याद् गुल्मघ्नं तद्धिमारुतम् । स्वे स्थाने प्रथमं जित्वा सद्यो गुल्ममपोहति ॥३७॥

१७० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | गुल्मचिकित्सिताध्यायः ? ]

गुल्मिनां बद्धवर्चसां ......................... । ..................................................... .....................................................

(इति ताडपत्रपुस्तके ११८ तमं पत्र¹म् ।)


तथा जिन्हें मलबन्ध रहता हो उन गुल्म रोगियों की ......... (स्नेहन के द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये)। .........................................................................................................

वक्तव्य— यह अध्याय उपर्युक्त श्लोक के मध्य में ही खण्डित हो गया है इसलिये उसी श्लोक के शब्दों को बतलाना तो कठिन है परन्तु फिर भी चरक चि. अ. ५ में कहा है—बद्धविण्मरुतं स्नेहैरादितः समुपाचरेत्। इसीके अनुसार उपर्युक्त श्लोक के भावार्थ को पूर्ण किया गया है। अथवा सुश्रुत उ. अ. ४२ में कहा है—बद्धवर्चोनिलानां तु सार्द्रकं क्षीरमिष्यते। अर्थात् उन्हें दूध में अदरक डालकर देनी चाहिये। इससे आगे इस अध्याय में अन्य गुल्मों की चिकित्सा दी जानी चाहिये। परन्तु इस अध्याय के मध्य में ही खण्डित हो जाने से वे उपलब्ध नहीं हैं। अतः हम पाठकों के साधारण ज्ञान के लिये अन्य आर्ष ग्रन्थों के आधार पर शेष गुल्मों की सामान्य चिकित्सा लिखेंगे। पित्तगुल्म की चिकित्सा चरक चि. अ. ५ में कहा है—स्निग्धोष्णोन्मर्दिते गुल्मे पैत्तिके स्त्रंसनं हितम्। रूक्षोष्णेन तु संभूते सर्पिः प्रशमनं परम्।। अर्थात् पित्तगुल्म में स्त्रंसन कराना चाहिये। तीव्र विरेचन नहीं देना चाहिये। सुश्रुत उ. अ. ४२ में कहा है—पित्तगुल्मर्दितं स्निग्धं काकोल्यादि घृतेन तु। विरिक्तं मधुरैर्योगैर्निरूहैः सानुवासनैः ।। अर्थात् काकोल्यादि घृत अथवा अन्य मधुरगण युक्त निरूहों से मृदु विरेचन देना चाहिये। यदि गुल्म के विदग्ध होने की सम्भावना हो तो विदाह से पूर्व ही रक्तावसेचन कराना चाहिये। इससे गुल्म विदाह को प्राप्त नहीं होगा। रक्तावसेचन के बाद जांगल पशुपक्षियों के मांस रसों से तर्पण करे। यदि किसी कारण से गुल्म में विदाह हो ही जाय तो उसमें शस्त्रकर्म ही करना चाहिये। चरक में कहा है—रक्तपित्तातिवृद्धत्वात्क्रियामनुपलभ्य च। यदि गुल्मो विदह्येत शस्त्रं तत्र भिषग्जितम्।। कफ गुल्म की चिकित्सा चरक चि. अ. ५ में कहा है—शीतलैर्गुरुभिः स्निग्धैर्गुल्मे वाते कफात्मके। अवम्यस्याल्पकायाग्नेः कुर्याल्लङ्घनमादितः ।। इसके बाद रोगी को उष्ण, कटु तथा तिक्त द्रव्यों का सेवन कराना चाहिये। यदि रोगी को आनाह तथा विबन्ध हो तो उसको युक्तिपूर्वक स्वेदन कराना चाहिये। इस प्रकार लङ्घन, वमन, एवं स्वेदन से अग्नि के प्रदीप्त हो जाने पर क्षार तथा कटु द्रव्यों से युक्त घी का प्रयोग करे। यदि गुल्म बहुत हठी हो अर्थात् ठीक न होता हो और जड़ जमाली हो तो उसमें देश, काल तथा ऋतु के अनुसार क्षार प्रयोग, अरिष्टपान तथा अग्निकर्म कराना चाहिये। चरक चि. च. ५ में कहा है—कृतमूलं महावास्तुं कठिनं स्तिमितं गुरुम्। जयेत्कफकृतं गुल्मं क्षारारिष्टाग्निकर्मभिः ।। दोषप्रकृतिगुल्मर्तुयोगं बुद्ध्वा कफोल्बणे । बलदोषप्रमाणज्ञः क्षारं गुल्मे प्रयोजयेत् ।। एकान्तरं द्वयन्तरं वा त्र्यहं विश्रम्य वा पुनः। शरीरबलदोषाणां वृद्धिक्षपणकोविदः ।। श्लेष्माणं मधुरं स्निग्धं मांसक्षीरघृताशिनः । भित्त्वाभित्त्वाऽऽशयात्क्षारः क्षरत्वात्क्षारयत्यधः ।। मन्देऽग्नावुरुचौ सात्म्ये मद्ये सस्नेहमशनताम्। प्रयोज्या मार्गशुद्ध्यर्थमरिष्टाः कफगुल्मिनाम् ।। लङ्घनोल्लेखनैः स्वेदैः सर्पिष्पानैर्विरेचनैः। बस्तिभिर्गुटिका चूर्णक्षारारिष्टगणैरपि ।। श्लैष्मिकः कृतमूलत्वाद्यस्य गुल्मो न शाम्यति। तस्य दाहो हृते रक्ते शरलोहादिभिर्हितः ।। औष्यात्तैक्ष्ण्याच्च शमयेदग्निर्गूल्मे कफानिलौ । तयोः शमाच्च संघातौ गुल्मस्य विनिवर्तते ।। सन्निपातिक गुल्म की चिकित्सा—व्यामिश्रदोषैर्व्यामित्र एष एव क्रियाक्रमः । अर्थात् सान्निपातिक गुल्म में दोषों के अनुसार उपर्युक्त मिश्रित चिकित्सा करनी चाहिये। रक्तगुल्म की चिकित्सा—रक्त गुल्म की चिकित्सा पित्तगुल्म की तरह ही की जाती है। सुश्रुत उ. अ. ४२ में कहा है—पित्तवद्रक्तगुल्मिन्या नार्याः कार्यः क्रियाविधिः । विशेषमपरं चास्याः शृणु रक्तविभेदनम् ।। पलाशक्षारलोपेन सिद्धं सर्पिः प्रयोजयेत् ।। दद्यादुत्तरवस्तिं च


१. अस्याग्रे पत्रमेकं खण्डितं ताडपत्रपुस्तके ।

कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ]चिकित्सास्थानम्१७१

पिप्पल्यादिघृतेन तु। ऊर्ध्वौर्वा भेदयेन्निन्ने विधिरासृग्दरोहितः॥ अर्थात् इसमें अधोगत रक्तपित्त की चिकित्सा करनी चाहिये। रक्तगुल्म की चिकित्सा का विधान १० मास व्यतीत हो जाने के बाद दिया गया है। चरक चि. अ. ५ में कहा है—स रौधिरः स्त्रीभव एव गुल्मो। मासि व्यतीते दशमे चिकित्स्यः॥ क्योंकि उस समय ही यह सुख साध्य होता है। कहा भी है—'रक्तगुल्मे पुराणत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम्'। इसे देखकर कई लोग कहते हैं कि प्राचीन आचार्यों को रक्तगुल्म तथा गर्भ की भेदक पहचान न होने से ही १० वें मास (गर्भ काल) के व्यतीत हो जाने पर चिकित्सा करने का लिखा है। परन्तु उनका यह विचार ठीक नहीं है क्योंकि 'यः स्पन्दते पिण्डित एव नाङ्गैः, द्वारा उन्होंने गुल्म का गर्भ से स्पष्ट भेद दिखाया है। इसलिये प्राचीन आचार्य इससे अनभिज्ञ नहीं थे अपितु १०वें मास के बाद जो चिकित्सा का विधान लिखा है वह उसके सुखसाध्य होने के कारण ही लिखा है। १० मास व्यतीत हो जाने के बाद रक्तगुल्म के रोगी (स्त्री) को स्नेहन तथा स्वेदन के बाद एरण्ड तैल अथवा किसी अन्य स्नेह का विरेचन देना चाहिये। चरक में कहा है—रौधिरस्य तु गुल्मस्य गर्भकालव्यतिक्रमे। स्निग्धस्विन्नशरीरायै दद्यात्स्नेहविरेचनम्॥ गुल्म को शिथिल करने के लिये पलाशक्षारयमक—(पलाश क्षार के साथ समभाग तिलतैल तथा घृत का पाक करने से बनता है) का प्रयोग करना चाहिये। यदि इन प्रयोगों से भी गुल्म का भेदन न हो तो रोगिणी को उत्तरबस्ति (दशमूलक्वाथ की) तथा योनिविशोधन करना चाहिये। योनि से रक्त के प्रवृत्त होने पर उसे मांसरस और ओदन खाने को दे तथा घी और तेल की मालिश करे तथा पीने के लिये मद्य दे। आगे प्रकृत ग्रन्थ के खिलस्थान के रक्तगुल्मविनिश्चयाध्याय में इस विषय का विशद विवेचन स्वयं आचार्य ने किया है। वहां गर्भ से रक्तगुल्म का भेद, उसके लक्षण एवं चिकित्सा आदि का विस्तार से वर्णन किया है। इस विषय को पाठक वहां पर देखें।

कुष्ठचिकित्सिताऽध्यायः ।

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स्वेदो वाऽतिखरत्वमङ्गानामतिश्लक्ष्णता वा वैवर्ण्यं रौक्ष्यं लोमहर्षः पिपासा गौरवं रागो दौर्बल्यं वेपथुः पिडकारुषां संभवश्चातिवेदना च क्षतविसर्पणमिति ।।

वक्तव्य—इस अध्याय में कुष्ठ रोगों की चिकित्सा कही गई है। यह अध्याय प्रारंभ में खण्डित है। उस अंश में कुष्ठ रोग के उत्पन्न होने के कारण तथा सम्प्राप्ति इत्यादियों का वर्णन किया गया होगा। तथा 'स्वेदो वाऽतिखरत्वं' इत्यादि अध्याय के प्रारंभिक वाक्य द्वारा कुष्ठों के पूर्वरूप दिये गये हैं। अब हम अध्यायोक्त विषय पर आते हैं—

कुष्ठों के पूर्वरूप—स्वेद (स्वेद का अधिक आना या बिलकुल न आना), अङ्गों की खरता (खुरदरापन) अथवा अत्यन्त चिकना होना, वर्ण का विकृत हो जाना, रूक्षता, लोम (रोम) हर्ष, प्यास, शरीर का भारीपन, उस स्थान का लाल होना, दुर्बलता, कंपकंपी, पिडकाओं तथा छोटी २ फुन्सियों की उत्पत्ति, अत्यन्त वेदना तथा क्षतविसर्प—ये कुष्ठों के पूर्वरूप होते हैं। चरक नि. अ. ५ में कुष्ठ के निम्न पूर्वरूप दिये हैं—तेषामिमानि खलु पूर्वरूपाणि; तद्यथा-अस्वेदन-प्रतिस्वेदन-पारुष्यमतिश्लक्ष्णता वैवर्ण्यं कण्डूर्निस्तोदः सुप्तता परिदाहः परिहर्षो लोमहर्षः खरत्वमुष्मायणं गौरवं श्वयथुर्विसर्पणमभीक्ष्णं कायच्छिद्रेषूदेहपक्वदग्धदष्टक्षतोपस्खलितेष्वतिमात्रं वेदना स्वल्पानामपि च व्रणानां दुष्टिरसंरोहणं चेति कुष्ठपूर्वरूपाणि भवन्ति। चरक चि. अ. ७ में भी कहा है—स्पर्शाज्ञत्वमतिस्वेदो न वा वैवर्ण्यमुन्नतिः। कोठानां लोमहर्षश्च कण्डूस्तोदः श्रमः क्लमः॥ व्रणानामधिकं शूलं शीघ्रोत्पत्तिश्चिरस्थितिः। दाहः सुप्ताङ्गता चेति कुष्ठलक्षणमग्रजम्॥ इसी प्रकार सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—त्वक्पारुष्यमकस्माद्रोमहर्षः कण्डूः स्वेदबाहुल्यमस्वेदनं वाऽङ्गप्रदेशानां स्वापः क्षतविसर्पणमसृजः कृष्णता चेति॥

१७२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ]

तत ऊर्ध्वमक्रियावतां कुष्ठानि जायन्ते। तत्र, श्यावारुणशूलकण्डूचिमिचिमखरत्वपारुष्य-संस्तम्भायामैर्वातोत्तराणि विद्यात्; दाहवेदनाज्वरविभेदोषायनपाकस्त्रावकोठानिकर्णा(?) क्षिप्रोत्थानैः शीतमधुरकषाय सर्पिरनुशयैश्च पित्तोत्तराणि विद्यात्; श्वेतपाण्डुघनोत्सेधगुरुस्तैमित्यस्तम्भमहापरिग्रहाग्निसार्दैः शीतादितरानुशयैः कफोत्तराणि विद्यात्; व्याविद्धरूपबहुस्फुटितपरिस्रावकृमिदाहरुजोपेतशरीरावयवपातनमशुचिविगन्धिशोथबहुलमनेकोपद्रवं सान्निपातिकं रक्तत्वात् काकणमित्युच्यते। द्विदोषजानीतराणि; तान्यनुव्याख्यामः—वातोत्तरे कपालकुष्ठं, पित्तोत्तरे त्वौदुम्बरं, कफोत्तरे मण्डलकुष्ठं, वातपैत्तिकमृष्यजिह्वं, पित्तश्लैष्मिकं पौण्डरीकं सिध्मं च, इति समासलक्षणम्। विस्तरतस्त्वष्टादश कुष्ठानि; तान्यनुव्याख्यास्यामः—सिध्मं च विचर्चिका च पामा च दद्रुश्च किटिभं च कपालं च स्थूलारुष्कं च मण्डलकुष्ठं च विषजं चेति नव साध्यानि; पौण्डरीकं च श्वित्रं च ऋष्यजिह्वं च शतारुष्कं चौदुम्बरं च काकणं च चर्मदलं चैककुष्ठं च विपादिका चेति नवासाध्यानि। सर्वं तु कुष्ठं त्वङ्मांसरुधिरलसीकाश्रयं स्पर्शघ्नं चेति; वर्धमान च वैरूप्यकरं भवति। तत्तृ(त्र) रजोध्वस्तमलाबुवारणपुष्पीपुष्यसदृशं सिध्मं; श्यामलोहितव्रणवेदनास्त्रावपाकवती विचर्चिका; कण्डूतोदपाकस्त्रावारुष्मती पामा; रौक्ष्यकण्डूदाहस्त्राववन्ति मण्डलानि वृद्धिद्विमन्ति दद्रुः; कृष्णाश्यावारुणखरपरुषस्त्रावृद्धिमन्ति गुरूणि प्रशान्तानि च पुनः पुनरुत्पद्यन्ते किटिभानि; कृष्णखरपरुषमलिनमनेक-संस्थानमण्डलं मण्डूलमृतुसन्धिषूष्णो चातिबाधते कपालाकृति कपालं; पिच्छास्त्राववेदनादाह-कण्डूतोदज्वरवैसर्पमहाव्रणपरिग्रहं मृदुखरनिभं महारुष्कं; मण्डलैर्रन्धुजीवकुसुमोपमर्दैककण्डूवेदनास्त्राव-वद्धिर्मण्डलकुष्ठं; लूताकीटपतङ्गसर्पदशनदष्टमुपेक्षितं व्यभिचारेण खरीभवति कृच्छ्रसाध्यं विषजं; महाशयसमुत्सेधं जातं चिराद्भैदि पुण्डरीकपलाशवर्णं पौण्डरीकं; श्वेतभावाच्छिवत्रं पञ्चविधमुत्तरत्रोपदेक्ष्यामः; ऋष्यजिह्वोपमं पारुष्यवैवर्ण्यगौरवर्णविक्केदैर्ऋष्यजिह्वं; नीललोहितपीतासितैरनेकैरुद्धिः खरैः स्त्राविभिरुपद्रुतं शतारुष्कं; पक्वोदुम्बरफलसदृशमस्त्रावि जडमननेकमौदुम्बरं व्याख्यातं; काकणं हस्तिचर्मसदृशं खरं; वृद्धिमच्चर्मदलं वैसर्पोद्भवं नित्यविसर्पि स्त्राववेदनाक्रिमिमदेककुष्ठं; पाणिपादाङ्गुष्ठोष्ठजङ्घादण्डदेशेषुस्फुटित-स्त्राविवेदनावतीमविपाकिनीं विपादिकां विद्यात्। सर्वरोगाश्चैव मोहादुपेक्ष्यमाणा असाध्यतां यान्ति, असाध्यास्त्वाशु नृणां घ्नन्ति; तस्मादात्महितायाशु प्रयतेत्।

इसके बाद यज्ञ, याग, होम, बलि, अतिथि-सेवा आदि क्रियाएं न करने वाले व्यक्तियों को कुष्ठ उत्पन्न हो जाते हैं। चरक चि. अ. ७ में कुष्ठों का निदान देते हुए अन्य कारणों के साथ "विप्रान् गुरून् धर्षयतां पापं कर्म च कुर्वताम्' भी दिया हुआ है। वातिक कुष्ठ के लक्षण—श्याव (काला), अरुण (लाल), शूल, कण्डू (खुजली), चिमचिमाहट, खरता (खुरदरापन), पारुष्य (कठोरता), संस्तम्भ (स्तब्धता), आयाम (फैलाव) इत्यादि लक्षणों से वातिक कुष्ठ जाने। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—'कुष्ठेषु तु त्वक्संकोचस्वापस्वेदशोफभेदकौष्ण्यस्वरोपघाता वातेन''। चरक चि. अ. ७ में भी कहा है—रौक्ष्यं शोषस्तोदः शूलं संकोचनं तथाऽऽयासः। पारुष्यं खरभावो हर्षः श्यावारुणत्वं च ।। कुष्ठेषु वातलिङ्गं ।। पैत्तिक कुष्ठ के लक्षण—दाह, वेदना, ज्वर, विड्भेद (अतिसार), ऊषायन (जलन), पाक (पकना), स्त्राव, कोष्ठ, निकर्णा, शीघ्र उत्थान (उत्पत्ति, वृद्धि) तथा शीतल मधुर कषाय द्रव्य एवं घृत से शान्ति हो जाना—ये पैत्तिक कुष्ठ के लक्षण हैं। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—"पाकावदरणाङ्गुलिपतनकर्णनासाभङ्गाक्षिरागसत्वोत्पत्तयः पित्तेन''। यहां 'सत्वोत्पत्तयः' से अभिप्राय कृमियों की उत्पत्ति से है। चरक चि. अ. ७ में भी कहा है—दाहो रागः परिस्रवः पाकः। विस्रो गन्धः क्लेदस्तथाऽङ्गपतनं च पित्तकृतम् ।। श्लैष्मिक कुष्ठ के लक्षण श्वेत, पाण्डु, घन, उत्सेध (ऊंचाई), गुरु (भारीपन), स्तिमितता, स्तम्भ, महापरिग्रह (बड़े मूल वाला होना), अग्निसार्द (अग्निमांद्य), तथा शीत के विपरीत अर्थात् उष्णता से शान्ति होना ये श्लैष्मिक कुष्ठ के लक्षण हैं। सुश्रुत नि. अ. ५ में कहा है—कण्डूवर्णभेदशोफास्त्रावगौरवाणि

कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ]चिकित्सास्थानम्१७३

श्लेष्मणा। चरक चि. अ. ७ में कहा है—शैत्यं शैत्यं कण्डूः स्थैर्य सोत्सेधगौरवस्नेहाः। कुष्ठेषु तु कफलिङ्गं जन्तुभिरभिमक्षणं क्लेदः।। सन्निपातिक कुष्ठ के लक्षण—लक्षणों का मिश्रित होना, बहुत स्फुटित (फटा हुआ) होना, परिस्राव (बहना), कृमि तथा दाह रोग से युक्त होना, शरीर के अवयवों का गिरना, अपवित्र, दुर्गन्धि तथा शोथ की अधिकता, अनेक उपद्रवों से युक्त होना—ये सान्निपातिक कुष्ठ के लक्षण हैं। यह लाल होने के कारण काकणक कहलाता है (काकणक रत्ती को कहते हैं जिसका रंग लाल होता है—इसीलिये लाल होने के कारण इसे काकणक कहते हैं) इसके अतिरिक्त द्विदोषज (दो २ दोषों के संसर्ग से उत्पन्न होने वाले अर्थात् वातपित्त, पित्तश्लेष्म तथा वातश्लेष्म) होते हैं। उनकी हम आगे व्याख्या करेंगे। वात की अपेक्षाकृत अधिकता होने पर कपालकुष्ठ, पित्त की अधिकता होने पर औदुम्बर कुष्ठ, कफ की अधिकता, होने पर मण्डल कुष्ठ, वात और पित्त की अधिकता होने पर ऋष्य जिह्व, तथा पित्त और श्लेष्मा की अधिका होने पर पौण्डरीक और सिध्म कुष्ठ होते हैं—ये संक्षेप से लक्षण कहे हैं। वास्तव में सभी कुष्ठ तीनों दोषों से उत्पन्न होने के कारण त्रिदोषज ही हैं तथापि भिन्न २ दोषों की प्रधानता के कारण ही ऐसा निर्देश किया गया है। चरक में पित्त और श्लेष्मा की अधिकता में पुण्डरीक तथा वात और कफ की अधिकता में सिध्म कुष्ठ—ये पृथक् २ दिये हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—वातेऽधिकतरे कुष्ठं कापालं मण्डलं कफे। पित्ते त्वौदुम्बरं विद्यात्काकणं तु त्रिदोषजम्॥ वातपित्ते श्लेष्मपित्त वताश्लेष्मणि चाधिके। ऋष्य जिह्वं पुंडरीकं सिध्मकुष्ठं च जायते॥ अब हम विस्तार से जो १८ प्रकार के कुष्ठ हैं उनकी व्याख्या करेंगे—१. सिध्म २. विचर्चिका ३. पामा ४. दद्रु ५. किटिभ ६. कपाल ७. स्थूला रुष्क ८. मण्डल ९. विषज—ये नौ ९ साध्य कुष्ठ हैं। तथा १. पौण्डरीक २ श्वित्र ३ ऋष्यजिह्व ४. शतारुष्क, ५. औदुम्बर ६. काकणक ७. चर्मदल ८ एककुष्ठ ९ विपादिका ये नौ ९ असाध्य कुष्ठ हैं। चरक तथा सुश्रुत में क्षुद्रकुष्ठ तथा महाकुष्ठ भेद दिये हैं। क्षुद्रकुष्ठ ११ तथा महाकुष्ठ ७ होते हैं। चरक के अनुसार—१. कपाल २. औदुम्बर ३. मण्डल ४. ऋष्यजिह्व ५. पुण्डरीक ६. सिध्म तथा ७. काकणक—ये ७ महाकुष्ठ हैं। तथा १. एककुष्ठ २ चर्मकुष्ठ ३ किटिभ ४. विपादिका ५. अलसक ६. दद्रु ७ चर्मदल ८ पामा ९ विस्फोट १० शतारु ११ विचर्चिका—ये ११ क्षुद्रकुष्ठ दिये हैं। प्रकृत ग्रन्थोक्त १८ प्रकार के कुष्ठों में से चरक में स्थूलारुष्क, विषज तथा श्वित्र का उल्लेख नहीं है। तथा चरक में आये हुए चर्माख्य, अलसक तथा विस्फोटक कुष्ठ का इस ग्रन्थ में उल्लेख नहीं है। चरक में श्वित्र (किलास) का वर्णन इनसे पृथक् दिया है। इस ग्रन्थ के समान इसका इन १८ प्रकार के कुष्ठों में परिगणन नहीं किया गया है। इसी प्रकार सुश्रुत के अनुसार—१. अरुण २. औदुम्बर ३. ऋष्यजिह्व ४. कपाल ५. काकणक ६. पुण्डरीक ७. दद्रु—ये ७ महाकुष्ठ हैं। तथा १. स्थूलारुष्क २. महाकुष्ठ ३. एककुष्ठ ४. चर्मदल ५. विसर्प ६. परिसर्प ७. सिध्म ८ विचर्चिका ९. किकिभ (म) १०. पामा तथा ११. रसका—ये ११ महाकुष्ठ होते हैं। ये सब कुष्ठ त्वचा, मांस, रुधिर (रक्त) तथा लसीका के आश्रित होते हैं और स्पर्श ज्ञान को नष्ट करने वाले हैं तथा वृद्धि को प्राप्त होने पर विरूपता कर देते हैं। अर्थात् दूषित वात, पित्त, कफ, त्वचा, रक्त, मांस एवं लसीका को दूषित कर देते हैं। अर्थात् ये चारों दूषित धातुएं कुष्ठ के आश्रय हैं चरक चि. अ. ७ में कहा है—वातादयस्त्रयो दुष्टास्त्वग्रक्तं मांसमम्बु च। दूषयन्ति स दुष्टानां सप्तको द्रव्यसंग्रहः॥ इसी प्रकार चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—दूष्याश्च शरीरधातवस्त्वङ्मांसं शोणितलसीकाश्र्चतुर्थी दोषोपघातविकृताः (विसर्प में भी ये ही तीनों दोष तथा त्वचा, रक्त, मांस एवं लसीका आदि चारों दूष्य भाग लेते हैं। इन दोनों का भेद हमने खिलस्थान के विसर्पचिकित्साध्याय की व्याख्या में दिया है। इसे वहीं देखें) सिध्म कुष्ठ के लक्षण—जिसपर धूलि लगी हुई प्रतीत हो, तथा जो धियाकददू एवं वारणपुष्पी के फूल के समान हो—वह सिध्मकुष्ठ है। चरक नि. अ. ५ में कहा है—परुषाणूंविशीर्णबहिरन्तनून्यन्तःस्निग्धानि शुक्लरक्तावभासानि बहून्यल्पवेदनान्यल्प-कण्डूदाहपूयलसीकानि लघुसमुत्थानान्यल्पभेदकृमीण्यलाबुपुष्पसङ्गाशानि सिध्मकुष्ठानीति विद्यात्। चरक चि. अ. ७ में भी कहा है—श्वेतं ताम्रं तनु च यद्रजो घृष्टं विमुञ्चति। अलाबुपुष्पवर्णं तत् सिध्मं प्रायेण चोरसि। अर्थात् यह छाती में होता है इसे अंगरेजी में Ptyriasis Versicolor या Ptyriasis cloasma कहते हैं। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—कण्ड्वन्वितं श्वेतमपाति सिध्न विद्यात्तनु प्रायश ऊर्ध्वकाये। यहां सिध्म को साध्य कुष्ठों में गिना है। चरक में इसे महाकुष्ठ

१७४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ]

तथा सुश्रुत में क्षुद्रकुष्ठ के रूप में दिया है। इस विरोध के निराकरण के लिये सुश्रुत की टीका में डल्हण ने लिखा है कि-‘सिध्मकुष्ठं द्विविधं–सिध्मं पुष्पिकासिध्मं च। पुष्पिकासिध्मस्य सुखसाध्यत्वात् सुश्रुते क्षुद्रकुष्ठेषु पाठः, सिध्मस्य दुःखसाध्यत्वाच्चरके महाकुष्ठ पाठ इत्यदोषः। अर्थात् सिध्मकुष्ठ के दो भेद हैं १ सिध्म २ पुष्पिका सिध्म। पुष्पिका सिध्म के सुख साध्य होने से उसके अनुसार सुश्रुत में इसे क्षुद्रकुष्ठों में दिया गया है तथा सिध्म के कष्टसाध्य होने के कारण चरक में इसे महाकुष्ठों में गिना गया है। इस ग्रन्थ में भी पुष्पिकासिध्म को दृष्टि में रखते हुए ही इसे साध्य कुष्ठों में दिया गया है। विचर्चिका का लक्षण—इसमें कृष्ण तथा लोहित (लाल) वर्ण के व्रण होते हैं जिसमें वेदना (पीडा) स्राव तथा पाक होता है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—सकण्डुपिडका श्यावा बहुस्रावा विचर्चिका। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—राजयोऽतिकण्ड्वर्तिरुजः सरूक्षा भवन्ति गात्रेषु विचर्चिकायाम्। कण्डूमती दाहरुजोपपन्ना॥ इसे अंगरेजी में (Pemphigus) कहते हैं। पामा का लक्षण–इसमें कण्डू, तोद, पाक, स्राव तथा छोटी २ फुन्सियां होती है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—पामा श्वेतारुणश्यावाः पिडका कण्डुला भृशम्। इसी प्रकार सुश्रुत नि. अ. ५ में कहा है—सास्रावकण्डूपरिदाहकाभिः पामाऽणुकाभिः पिडकाभिरुह्याः॥ इसे आधुनिक विज्ञान के अनुसार (Eezema) कहते हैं। दद्रू का लक्षण—ये रूक्षता, कण्डू, दाह एवं स्राववाले मण्डलाकार तथा बढ़ने वाले होते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—सकण्डूरागपिडकं दद्रूमण्डलमुद्गतम्। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—अतसीपुष्पवर्णानि ताम्राणि वा विसर्पिणि पिडकावन्ति च दद्रुकुष्ठानि। इसे (Ringworm) कहते हैं। दद्रुकुष्ठ को चरक में क्षुद्रकुष्ठों में तथा सुश्रुत में महाकुष्ठों में गिना गया है। सिध्म की तरह इसके भी सित तथा असित दो भेद हैं। असित (दद्रू) कुष्ठ के असाध्य होने से सुश्रुत में महाकुष्ठ में तथा सित के सुखसाध्य होने से इसका चरक में क्षुद्रकुष्ठों में परिगणन किया गया है। सुश्रुत नि. अ. ५ की टीका में डल्हण ने लिखा है—“दद्रुकुष्ठं द्विविधं सितमसितं च, असितस्य महोपक्रमसाध्यत्वादनुबन्धित्वप्रकर्षाच्च महाकुष्ठेषु मध्ये सुश्रुते पाठः, सितदद्रुकुष्ठस्य सुखसाध्यत्वादुत्तरोत्तरधात्वनुप्रवेशाभावत्ताऽत्यर्थपीडारहितत्वाच्च चरके क्षुद्रकुष्ठेषु मध्ये पाठ इत्यदोषः”। किटिभ का लक्षण–ये कृष्ण, श्याव एवं अरुण वर्ण वाले, खुरदरे, कठोर, स्रावयुक्त और बढ़ने वाले होते हैं। बड़े होते हैं, तथा एक बार शान्त होकर पुनः २ हो जाते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—श्यावं किणखरस्पर्शं परुषं किटिभं स्मृतम्। अर्थात् ये किण (Scar) के समान खुरदरे तथा कठोर होते हैं। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—यत् स्रावि वृत्तं घनममुग्रकण्डु। तत् स्निग्धकृष्णं किटिभं (मं) वदन्ति॥ इसमें खुजली बहुत अधिक होती है, इसे (Psoriasis) कहते हैं। कपालकुष्ठ के लक्षण–यह कृष्ण वर्ण का, खुरदरा, कठोर तथा मैला, अनेक स्थानों वाला तथा मण्डलाकार होता है। इसमें खुजली होती है। दो ऋतुओं की सन्धियों (जहां दो ऋतुओं का मेल होता है–एक ऋतु समाप्त होती है तथा दूसरी प्रारंभ होती है) में और उष्णकाल में अत्यन्त कष्ट पहुंचता है। तथा कपाल (घड़े के ठीकरे) की आकृति वाला होता है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—कृष्णारुणकपालाभं यद्रूक्षं परुषं तनु। कपालं तोदबहुलं तत्कुष्ठं विषमं स्मृतम्॥ इसी प्रकार चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—रूक्षारुणपरुषाणि विषमविसृतानि. खरपर्यन्तानि तनून्युद्वृत्तबहिस्तनूनि सुप्तसुप्तानि हृषितलोमाचितानि निस्तोदबहुलान्यल्पकण्डूदाहपूल्यसीकान्याशुगतिसमुत्थानान्याशुभेदीनि जन्तुमन्ति कृष्णारुणकपालवर्णानि कापालकुष्ठानीति विद्यात्। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—“कृष्णकपालिकाप्रकाशानि कपालकुष्ठानि”। स्थूलारुष्क या महारुष्क कुष्ठ का लक्षण–जो पिच्छा (चिपचिपापन), स्राव, वेदना, दाह, कण्डू, तोद, ज्वर, विसर्प (Erysipelas) तथा जो मूल में बड़े २ व्रणों से युक्त हो तथा मृदु एवं खुरदरा हो उसे महारुष्क कहते हैं। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—स्थूलानि सन्धिष्वतिदारुणानि। स्थूलारूषि स्युः कठिनान्त्यरुंषि॥ अर्थात् इसमें अत्यन्त दारुण एवं बड़े २ व्रण होते हैं। चरक में इसका परिगणन नहीं किया गया है। मण्डलकुष्ठ–इसमें दोपहरिया के फूलों के सदृश (लालरंग के) मण्डल होते हैं तथा दाह, कण्डू, वेदना और स्राव होते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—श्वेतं रक्तं स्थिरं स्त्यानं स्निग्धमुत्सन्नमण्डलम्। कृच्छ्रमन्योन्यसंसक्तं कुष्ठं मण्डलमुच्यते॥ अर्थात् इसमें मण्डल परस्पर एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं। चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—स्निग्धानि गुरूण्युत्सेधवन्ति श्लक्ष्णस्थिरपीनपर्यन्तानि शुक्लरक्तावभासानि शुक्लरोमराजीसन्तानानि बहुबहलशुक्लपिच्छिलस्रावीणि बहुक्लेदकण्डूकृमीणि

कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १७५

सक्तगतिसमुत्थानभेदीनि परिमण्डलानि मण्डलकुष्ठानीति विद्यात्। (बन्धुपुष्प एक वृक्ष होता है जिसका फूल मध्याह्न में विकसित होता है इसे दुपहरिया (Pantapetes Phoenicea) कहते हैं। इसका फूल लाल रंग का होता है। रा. नि. में कहा है—अस्य पुष्पं मध्याह्ने विकसति पराह्ने च सूर्योदये शुष्यति। विषज कुष्ठ के लक्षण-मकड़ी, कीड़े, पतंगे, तथा सांप के दांतों से काटे हुए की यदि उपेक्षा की जाय तो वह स्थान खर (खुरदरा) हो जाता है-इसे विषज कुष्ठ कहते हैं यह कृच्छ्र साध्य होता है। पौण्डरीक कुष्ठ के लक्षण-जो बड़े आशय वाला एवं उन्नत हो, जो देर में उत्पन्न हो तथा देर में ही फटे, जो पुण्डरीक (रक्तकमल) तथा पलाश के वर्ण का हो उसे पौण्डरीक कहते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है-सश्वेतं रक्तपर्यन्तं पुण्डरीकदलोपमम्। सोत्सेधं च सरागं च पुण्डरीकं तदुच्यते ।। चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—शुक्लरक्तावभासानि रक्तपर्यन्तानि रक्तराजीसन्ततान्युत्सेधवन्ति बहुबहलरक्तपूयलसीकानि कण्डूकृमिदाहपाकवन्त्याशुगतिसमुत्थानभेदीनि पुण्डरीकपलाशसङ्काशानि पुण्डरीकाणीति विद्यात्। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—पुण्डरीक पत्रप्रकाशानि पौण्डरीकाणि श्लेष्मणा। श्वित्रकुष्ठ-श्वेत होने से इसे श्वित्र कहते हैं। इसके ५ प्रकारों का आगे वर्णन करेंगे। चरक में १८ प्रकार के कुष्ठों से भिन्न श्वित्रकुष्ठ का वर्णन किया है। इसे किलास भी कहा है। सुश्रुत नि. अ. ५ में कहा है-‘‘किलासमपि कुष्ठविकल्प एव, तत्रिविधं वातेन, पित्तेन, श्लेष्मणा चेति’’। अर्थात् इन दोनों में भेद यह है कि कुष्ठ तो त्वचा, रक्त तथा मांस में अधिष्ठित होकर त्वचा में प्रकट होता है परन्तु इसके विपरीत किलास केवल त्वचा में ही अधिष्ठित होता है। कहा है—‘‘कुष्ठकिलासयोरन्तरं त्वग्गतमेव किलासमपरिस्रावि च’’। कुछ लोग त्वचा में स्थित होने पर उसे किलास कहते हैं तथा उसी के धातुओं में प्रवेश करने पर श्वित्र कहते हैं। कहा भी है—त्वग्गतन्तु यदस्रावि किलासं तत्रकीर्तितम्। यदा त्वचमतिक्रम्य तद्धातूनवगाहते ।। हित्वा किलाससंज्ञां च श्वित्रसंज्ञां लभेत तत् ।। चरक चि. अ. ७ में श्वित्र के ३ भेद दिये हैं—दारुणं चारुणं श्वित्रं किलासं नामभिस्त्रिभिः। यदुच्यते तत् त्रिविधं त्रिदोषं प्रायशश्च तत् ।। अर्थात् किलास (श्वित्र) के दारुण, चारुण और श्वित्र ये तीन भेद हैं। भालुकितन्त्र में भी धात्वाश्रय के भेद से किलास के तीनों भेद दिये हैं—वारुणं तत्तु विज्ञेयमांसधातुसमाश्रयम्। मेदः श्रितं भवेच्छ्वित्रं दारुणं रक्तसंश्रयम्। अर्थात् जब किलास का आश्रय मांस होता है तब उसका नाम वारुण (चरक के अनुसार चारुण) होता है। मेद में आश्रित होने पर श्वित्र तथा रक्त में आश्रित होने पर दारुण कहते हैं। यह रोग जैसा कि पहले कहा जा चुका है, केवल त्वचागत ही होता है। यहां दी हुई मांस मेद तथा रक्त धातुओं का यही अभिप्राय है कि दोष उन २ धातुओं में आश्रित रहता हुआ ही त्वचा में क्रमशः ताम्र, श्वेत तथा रक्तवर्णों को उत्पन्न करता है। अन्य कुष्ठों की तरह इसमें धातुसंबन्धी विशेष विकार उत्पन्न नहीं होते हैं। श्वित्र या किलास को आधुनिक विज्ञान के अनुसार Leuco derma कहा जा सकता है। ऋष्यजिह्व— जो ऋष्य (नीले अण्डकोष वाले हरिण) की जिह्वा के समान, कठोर, विवर्ण, गौरवर्ण एवं क्लेद से युक्त होता है उसे ऋष्यजिह्व कहते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—कर्कशं रक्तपर्यन्तमन्तःश्यावं सवेदनम्। यदृष्यजिह्वा संस्थानमृष्यजिह्वं तदुच्यते ।। इसी प्रकार चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—परुषाण्यरुणवर्णानि बहिरन्तः-श्यावानि नीलपीतताम्रावभासान्याशुगतिसमुत्थानान्यल्पकण्डूक्लेदकृमीणि दाहभेदनिस्तोदपाकबहुलानि शूकोपहतोपमवेदनान्युत्सन्नमध्यानि तनुपपर्यन्तानि कर्कशपिडकाचितानि दीर्घपरिमण्डलानि ऋष्यजिह्वाकृतीनि ऋष्यजिह्वानीति विद्यात्। सुश्रुत नि. अ. ५ में कहा है—ऋष्यजिह्वाप्रकाशानि खराणि ऋष्यजिह्नानि। कोई ऋष्य जिह्व के स्थान पर ऋक्षजिह्व पढ़ते हैं उस अवस्था में ऋक्ष का अर्थ रीछ करना होगा। शतारुष्क कुष्ठ का लक्षण—स्रावों से युक्त नीले, लाल, पीले, काले आदि अनेक वर्णों वाले कठोर व्रणों से युक्त होता है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—रक्तं श्यावं सदाहार्ति शतारुः स्याद् बहुव्रणम्। इसे Rupia कहते हैं। औदुम्बर कुष्ठ का लक्षण—जो पके हुए गूलर के फल के समान, बिना स्राव वाला तथा अनेक जड़ों (Roots) वाला होता है उसे औदुम्बर कुष्ठ कहते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—कण्डूविदाहरुग्रागपरीतं लोमपिञ्जरम्। उदुम्बरफलाभासं कुष्ठमौदुम्बरं विदुः ।। चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—ताम्राणि ताम्रखररोमराजीभिरवनद्धानि बहलानि बहुबहलरक्तपूयलसीकानि कण्डूक्लेदकोथदाहपाकवन्त्याशुगतिसमुत्थानभेदीनि ससन्तापकृमीणि पक्वोदुम्बरफलवर्णाण्युदुम्बरकुष्ठानीति विद्यात्। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है-“पित्तेन पक्वोदुम्बरफलाकृतिवर्णान्यौदुम्बराणि”।

३४ का.सं.

१७६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ]

काकण कुष्ठ का लक्षण—यह हाथी के चमड़े के समान खुरदरा होता है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—यत्काकणन्तिकावर्णमपाकं तीव्रवेदनम्। त्रिदोषलिङ्गं तत्कुष्ठं काकणं नैव सिध्यति ।। अर्थात् यह असाध्य माना गया है। चरक नि. अ. ५ में भी कहा है—काकणन्तिकावर्ण्यान्त्यादौ पश्चात्सर्वकुष्ठलिङ्गसमन्वितानि पापीयासं सर्वकुष्ठलिङ्गसंभवेनानेकवर्णानि काकणकानीति विद्यात्, तान्यसाध्यानि। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—'काकणन्तिकाफलसदृशाण्यतीवरक्तकृष्णानि । अर्थात् रत्ती के समान चारों ओर से अत्यन्त लाल तथा बीच में काला होने के कारण ही इसका यह नाम है। चर्मदल—यह वृद्धि वाला होता है—अर्थात् यह निरन्तर बढ़ता चला जाता है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—रक्तं सकण्डुसस्फोटं सरुग् दलति चापि यत्। तच्चर्मदलमाख्यातं संस्पर्शासहमुच्यते ।। अर्थात् इसमें हाथ आदि के स्पर्श से तीव्र वेदना होती है। सुश्रुत नि. अ. ५ में कहा है—स्युर्येन कण्डूव्यथनौषचोषास्तलेषु तच्चर्मदलं वदन्ति। यह हाथों तथा पैरों की तलियों में होता है। इसे आधुनिक विज्ञान के अनुसार Zeroderma कहते हैं। एककुष्ठ—जो विसर्प से उत्पन्न हुआ हो, सदा विसर्पण करता हो (फैलता हो) तथा स्राव, वेदना एवं कृमियों से युक्त हो। चरक चि. अ. ७ में कहा है—अरवेदनं महावास्तु यन्मत्स्यशकलोपमम्। तदेककुष्ठं, .............. ।। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—कृष्णारुणं येन भवेच्छरीरं तदेककुष्ठं प्रवदन्ति कुष्ठम् ।। विपादिका का लक्षण—जो हाथ, पैर, अंगुष्ठ, ओष्ठ, तथा जङ्घाओं में फट जाता हो, जिसमें स्राव तथा वेदना होती हो तथा जिसका पाक न होता हो अर्थात् पकता न हो उसे विपादिका कहते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—वैपादिकं पाणिपादस्फुटनं तीव्रवेदनम्। सुश्रुत नि. अ. ५ में भी कहा है—विपादिका पादगतेयमेव। डल्लण ने इसकी टीका में लिखा है—इयमेव विचर्चिका पादगता यदा स्यात्तदा विचर्चिकासंज्ञां विहाय विपादिकासंज्ञां प्राप्नोतीत्यर्थः'। अर्थात् जब विचर्चिका ही पैरों में हो तो उसे विपादिका कहते हैं। आधुनिक विज्ञान के अनुसार इसे Rhagades कहते हैं। सभी रोग अज्ञान पूर्वक उपेक्षा किये जाने पर असाध्य हो जाते हैं तथा जो असाध्य होते हैं वे मनुष्यों को मार देते हैं अर्थात् वे घातक हो जाते हैं। इसलिये अपने हित को दृष्टि में रखते हुए शीघ्र ही प्रयत्नशील होना चाहिये अर्थात् यथा शीघ्र चिकित्सा का प्रयत्न करना चाहिये।

कुष्ठेष्वादौ वातोत्तरेषु घृताच्छपानमनेकशो मण्डान्तरितं प्रशस्यते, तिक्तसर्पिष इतरोत्तरयोः, वमनविरेचनास्था (पन)..........................................................................

(इति ताडपत्रपुस्तके १२० तमं पत्रं^१म्)


वातिक कुष्ठ की चिकित्सा—वातिक कुष्ठों में सबसे पूर्व मण्ड से रहित अच्छ (स्वच्छ—केवल) घृत का पान कराना चाहिये। तथा पैत्तिक एवं श्लैष्मिक में तिक्त घृत—पिलाना, वमन, विरेचन, आस्थापन .......... (आदि का आवश्यकतानुसार प्रयोग करना चाहिये)

वक्तव्य—यह अध्याय बीच में ही खण्डित हो गया है। इसलिये अन्य आर्ष ग्रन्थों के आधार पर हम इन मुख्य २ कुष्ठों के सामान्य चिकित्सा क्रम का उल्लेख करते हैं। चरक चि. अ. ७ में कहा है—वातोत्तरेषु सर्पिर्वमनं श्लेष्मोत्तरेषु कुष्ठेषु। पित्तोत्तरेषु मोक्षो रक्तस्य विरेचन चाग्रे ।। अर्थात् वातिक कुष्ठ में घृत पान, पैत्तिक में रक्तमोक्षण अथवा विरेचन तथा श्लेष्मिक में वमन कराना चाहिये। आवश्यकतानुसार उपर्युक्त विधियों से कोष्ठ के शुद्ध हो जाने पर उसे वातप्रकोप से बचाने के लिये स्नेहपान कराना चाहिये। चरक चि. अ. ७ में कहा है—स्नेहस्य पानमिष्टं शुद्धे कोष्ठे प्रवाहिते रुधिरे। वायुर्हि शुद्धकोष्ठं कुष्ठिनमबलं विशति शीघ्रम् ।। इस सामान्य चिकित्सा (General treatment) के साथ ही स्थानिक


१. अस्याग्रे पत्रचतुष्टयात्मको ग्रन्थस्त्रुटितस्ताडपत्रपुस्तके।

मूत्रकृच्छ्रचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १७७

चिकित्सा (Local application) भी करनी चाहिये। उस स्थान को अच्छी प्रकार स्वेदन कर के कूर्चशस्त्र (Scraper) से अच्छी प्रकार लेखन (Scrape) करे जिससे रक्त का उत्क्लेश कम हो जाय। इस प्रकार शुद्धि हो जाने के बाद आवश्यकतानुसार लेप लगाने चाहियें। लेप लगाने से पूर्व उपर्युक्त स्थानिक तथा आशय संबन्धी शुद्धि करना आवश्यक है। कुष्ठ रोग में आभ्यन्तरिक एवं बाह्य सब प्रकार से विडङ्ग तथा खदिर का प्रयोग श्रेष्ठ माना गया है। चरक चि. अ. ७ में कहा है—पानाहारविधाने प्रसेचने धूपने प्रदेहे च। कृमिनाशनं विडङ्गं विशिष्यते कुष्ठहा खदिरः॥ श्वित्र चिकित्सा—श्वित्र रोग में सब से पहले वमन विरेचना आदि द्वारा रोगी के आशय का शोधन करने के बाद सवर्णीकरणलेपों का प्रयोग करना चाहिये। तथा अन्य जो भी कुष्ठनाशक प्रयोग हैं उनका व्यवहार करना चाहिये।


मूत्रकृच्छ्रचिकित्सिताध्यायः ।

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कटीस्कन्धातिधिरणात् पित्तं क्रुद्धं कफानिलौ। अनुसृत्य यदा बस्तिं दूषयन्ति तदाश्रयाः ॥।
मूत्रकृच्छ्रं तदा जन्तोर्दारुणं संप्रवर्तते ।

वक्तव्य—यह अध्याय प्रारंभ में खण्डित है। इसमें मूत्र कृच्छ्र रोग की चिकित्सा कही जायगी। मूत्र कृच्छ्र से अभिप्राय मूत्र के कष्ट पूर्वक आने से है।

मूत्र कृच्छ्र का निदान—कटि तथा स्कन्ध पर अत्यन्त अधिक भार के धारण करने से कुपित हुआ पित्त कफ तथा वायु का अनुसरण करके जब बस्ति (Bladder) को दूषित कर देता है तब उस प्राणी को भयंकर मूत्र कृच्छ्र रोग हो जाता है। चरक चि. अ. २६ में इस का निदान निम्न प्रकार से दिया है—व्यायाम तीक्ष्णौषधरूक्षमद्यप्रसङ्गनित्यद्रुतपृष्ठयानात्। आनूपमत्स्याध्यशनादजीर्णात्स्यूमूत्रकृच्छ्राणि नृणामिहाष्टौ ॥

सफेनमल्पमरुणं कालं वा शूलसंततम् ।।
मूत्रमानद्धवर्चस्त्वं वाताघातस्य लक्षणम्।

वातिक मूत्रकृच्छ्र के लक्षण—इसमें मूत्र फेन (झाग) वाला तथा थोड़ा २ आता है, रंग अरुण (ईंट जैसा लाल) तथा काल होता है, मूत्र त्याग के समय वेदना होती है, तथा मल भी रुक जाता है। चरक चि. अ. २६ में कहा है—तीव्रा हि रुग्वंक्षणबस्ति मेढ्रे स्वल्पं मुहुर्मूत्रयतीह वातात्। सुश्रुत उ. अ. ५९ में कहा है—अल्पमल्पं समुत्पीड्य मुष्कमेहनबस्तिभिः। फलद्भिरिव कृच्छ्रेण वाताघातेन मेहति ।।

सदाहवेदनं पीतमत्युष्णं बाष्पसंहितम् ।।
स्विद्यमानमुखो मूत्रं कुरुते पैत्तिके शिशुः।

पैत्तिक मूत्रकृच्छ्र के लक्षण—इसमें बालक को मूत्र दाह एवं वेदना से युक्त आता है, रंग अत्यन्त पीला होता है (पित्त के कारण), अत्यन्त उष्ण तथा वाष्प से युक्त होता है तथा मूत्र त्याग के समय मुख पर पसीना आ जाता है। चरक चि. अ. २६ में कहा है—पीतं सरक्तं सरुजं सदाहं कृच्छ्रान्मुहुर्मूत्रयतीह पित्तात्। सुश्रुत उ. अ. ५९ में भी कहा है—हारिद्रमुष्णं रक्तं वा मुष्कमेहनबस्तिभिः। अग्निना दह्यमानाभैः, पित्ताघातेन मेहति ।।

१७८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ]

बहुलं कुरुते मूत्रमल्पबाधं सितं घनम् ।। बस्तिगौरवशोथौ च मूत्राघाते कफात्मके ।

श्लैष्मिक मूत्रकृच्छ्र के लक्षण—इसमें रोगी को मूत्र बहुत आता है तथा मूत्रत्याग के समय कष्ट कम होता है। मूत्र का रंग श्वेत और घना (सान्द्र) होता है तथा बस्ति में भारीपन एवं शोथ हो जाती है। चरक चि. अ. २६ में कहा है—बस्तेः सलिङ्गस्य गुरुत्वशोथौ मूत्रं सपिच्छं कफमूत्रकृच्छ्रे। सुश्रुत उ. अ. ५९ में भी कहा है—स्निग्धं शुक्लमनुष्णं च मुष्कमेहनबस्तिभिः । संहृष्टरोमागुरुभिः श्लेष्माघातेन मेहति ।।

द्वन्द्वजं द्वन्द्वरूपेभ्यः सर्वेभ्यः सान्निपातिकम् ।। रक्तजं पित्तवज्ज्ञेयं सरक्तस्य च मूत्रणात् ।

दो २ दोषों के मिले हुए लक्षणों से मूत्रकृच्छ्र को द्वन्द्वज तथा सब दोषों के सम्मिलित लक्षणों से उसे सान्निपातिक जाने। चरक चि. अ. २६ में कहा है—सर्वाणि रूपाणि तु सन्निपाताद्भवन्ति तत्कृच्छ्रतमं तु कृच्छ्रम्। सुश्रुत उ. अ. ५९ में कहा है—दाहशीतरुजाविष्टो नानावर्णं मुहुर्मुहुः । ताम्यमानस्तु कृच्छ्रेण सन्निपातेन मेहति ।। रक्तज मूत्रकृच्छ्र का लक्षण—रक्तज मूत्रकृच्छ्र पैत्तिकमूत्रकृच्छ्र के समान लक्षणों वाला होता है तथा इसमें मूत्र में रक्त आता है। चरक चि. अ. २६ में कहा है—क्षताभिघातात्क्षतजं क्षयाद्वा प्रकोपितं बस्तिगतं विबद्धम्। तीव्रार्ति मूत्रेण सहाल्पमल्पमायाति तस्मिन्नतिसञ्चिते च ।। आध्माततां विन्दति गौरवं च बस्तिर्लघुत्वं च विनिःसृतेऽस्मिन् ।।

विशेषाः सन्निपातोत्थे मूर्च्छाभ्रमविलापकाः ।। सर्वेषु कार्श्यमरतिरुचिः सानवस्थितिः । तृष्णाशूलविषादातिस्त एव स्युरुपद्रवाः ।।

सन्निपातज मूत्रकृच्छ्र में मूर्च्छा, भ्रम तथा प्रलाप-विशेष लक्षण होते हैं सब प्रकार के मूत्रकृच्छ्रों में कृशता, अरति (ग्लानि) अरुचि, मन की अस्थिरता, तृष्णा, शूल, विषाद, अर्ति(पीडा) आदि उपद्रव (लक्षण) होते हैं।

वक्तव्य—इस प्रकार यहां १. वातिक २. पैत्तिक ३. श्लैष्मिक ४. वातपैत्तिक ५. वातश्लैष्मिक ६. पित्तश्लैष्मिक ७. सान्निपातिक ८. रक्तज—ये आठ भेद दिये हैं। चरक में-१. वातिक २. पैत्तिक ३. श्लैष्मिक ४ सान्निपातिक ५. अश्मरीज ६. शर्कराज ७. शुक्रज ८. रक्तज-ये आठ भेद दिये हैं। सुश्रुत में—१. वातिक २. पैत्तिक ३. श्लैष्मिक ४. सान्निपातिक ५. अभिघातज ६. पुरीषज ७. अश्मरीज तथा ८. शर्कराज—ये आठ भेद दिये हैं।

चिरात् प्रमेहाः कुप्यन्ति सद्यः कृच्छ्राणि देहिनाम् । विशेषः कृच्छ्रमेहानां कृच्छ्रे दाहोऽति चेन्द्रिये ।। कृच्छ्राण्याशु निवर्तन्ते प्रमेहास्तु प्रसङ्गिनः । पित्तप्रायाणि कृच्छ्राणि वातस्थानाश्रयाणि च ।।

प्रमेह तथा मूत्रकृच्छ्र में भेद—प्राणियों में प्रमेह रोग बहुत देर से प्रकुपित होते हैं जब कि मूत्रकृच्छ्र शीघ्र ही कुपित हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त मूत्रकृच्छ्र तथा प्रमेह में यह भेद है कि मूत्रकृच्छ्र रोग में मूत्रेन्द्रिय में अत्यन्त दाह होता है। मूत्रकृच्छ्र रोग शीघ्र ही ठीक हो जाते हैं तथा प्रमेह धीरे २ ठीक होता है। मूत्रकृच्छ्र में पित्त की प्रधानता है तथा वायु के स्थान इसके आश्रय होते हैं ।।

तस्मात् सामान्ययोगेन चिकित्सा ह्युपदेक्ष्यते ।

इसलिये दोनों की चिकित्सा समानरूप से कही जायेगी।

कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १७९

शरमूलानि निष्क्वाथ्य शीतं पूतं च तज्जलम् ।।
शर्करामधुसंयुक्तं पिबेत् कृच्छ्रोपशान्तये ।

अब मूत्रकृच्छ्र की सामान्य चिकित्सा कही जायगी—मूत्र-कृच्छ्र की चिकित्सा—मूत्रकृच्छ्र रोग की शान्ति के लिये शर मूलों का क्वाथ बनाकर उसे शीतल करके छान कर उसमें शर्करा एवं मधु मिलाकर पिलाना चाहिये ॥

मधुकं शरमूलं च त्रिफला सितवारिका ।।
शृतं सशर्कराक्षौद्रं मूत्रकृच्छ्रनिवारणम् ।

मुलहठी, शरमूल, त्रिफला, सितवारिका (सिंहल पिप्पली) इनके क्वाथ में शर्करा एवं मधु मिलाकर पीने से मूत्रकृच्छ्र दूर होता है ॥

तार्णस्य पञ्चमूलस्य रसं निष्क्वाथ्य पाययेत् ।।
शर्कराक्षौद्रसंयुक्तं सर्वकृच्छ्रनिवारणम् ।

पञ्चतृण मूल के रस का क्वाथ करके उसमें शर्करा एवं मधु मिलाकर पिलाने से सब प्रकार के मूत्रकृच्छ्रों की शान्ति होती है ॥

शतावरी पृथक्पर्णी कुलत्थबदराणि च ।।
शर्करामधुसंयुक्तो लेहो मूत्रग्रहापहः ।

शतावरी, पृथक्पर्णी (पृश्निपर्णी), कुलत्थ तथा बेर इनका शर्करा एवं मधु के साथ अवलेह बनाकर देने से मूत्रग्रह (मूत्रकृच्छ्र) नष्ट होते हैं ॥

विपरीतं प्रमेहेभ्यो मूत्रकृच्छ्रेषु कल्पयेत् ।।
औषधं पानमन्नं च सुस्निग्धं मृदु शोधयेत् ।

मूत्रकृच्छ्र में प्रमेह के विपरीत (भिन्न) औषध, पान तथा अन्न (आहार) का व्यवहार करना चाहिये तथा अच्छी प्रकार स्निग्ध एवं मृदु शोधन (वमन-विरेचन) कराये ॥

मधुराणीक्षुविकृतीस्त्रपुसानि घृतं पयः ।।
सेवेत वर्जयेन्नित्यं यत् संग्राही विदाहि च ।

मूत्रकृच्छ्र में पथ्यापथ्य मधुर पदार्थ, गन्ने के विकार (गुड आदि), त्रपुस (खीरा), घी तथा दूध का सेवन करना चाहिये तथा संग्राही (Astringent) एवं विदाही पदार्थों का त्याग करना चाहिये। चरक चि. अ. २६ में इसका निम्न परहेज बताया है—व्यायामसंधारणशुष्कभक्षपिष्टान्नवातार्ककरव्यवायान् । खर्जूरशालूककपित्यजम्बूबिसं कषायं न रसं भजेत् ॥

ऊषकोऽथ बृहत्यौ द्वे श्वदंष्ट्रा वसुकावुभौ ।।
शृङ्गवेरं यवाश्चैव दर्भो वृक्षादनी बला । पिप्पली तैः शृतं क्षीरं घृतमात्रादि(वि)मूर्च्छितम् ।।
सरक्ते पाययेत् कृच्छ्रे क्षिप्रमेतेन सिध्यति ।

रक्तज मूत्रकृच्छ्र की चिकित्सा—दूषक (कल्लर नामक वृष्य कन्द), छोटी कटेरी, बड़ी, कटेरी, गोखुरु, दोनों कुटज (मीठा और कड़वा), आर्द्रक, जौ, दर्भ (डाभ) वृक्षादनी (बन्दाक), बला (खरैटी) तथा पिप्पली–इनके द्वारा दूध को पकाकर उसे थोड़े से घृत से मूर्छित करके पिलाने से रक्तज मूत्रकृच्छ्र शीघ्र ही नष्ट होता है ॥

१८०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ]

कनीयसीं पञ्चमूलीं कुलत्थं बदराणि च ।।
शर्करामधुसंयुक्तो लेहो मूत्रग्रहे हितः ।

स्वल्प पञ्चमूल (शालिपर्णी, पृश्निपर्णी, वृहती, कण्टकारी तथा गोखुरु), कुलत्थ तथा बेर–इनका शर्करा एवं मधु से अवलेह बनाकर मूत्रग्रह (मूत्रकृच्छ्र) में देना चाहिये ॥

ससैन्धवो रसः कार्यो मूत्राघाते घृतायु(न्वि)तः ।।
सतार्णपञ्चमूलो वा रास्नागोक्षुरकेण वा ।

पञ्चतृण मूल के रस में नमक एवं घृत मिलाकर अथवा रास्ना एवं गोखुरु के साथ मूत्रकृच्छ्र में देना चाहिये ॥

द्वौ करञ्जौ निर्गर्भा(?)च कार्पासो मधुशिग्रुकः ।।
श्वदंष्ट्रा वसुकौ द्वौ च मृणालं चोत्पलानि च ।
पिप्पल्यः सैन्धवं चैव सूक्ष्मैला मरिचानि च ।।
एतैः सिद्धां पिबेद्वालो यवागूं ससुवर्चलाम् ।

दोनों करञ्ज (करञ्ज तथा पूतिकरञ्ज) निर्गर्भा ?, कपास, मीठा सुहांजना, गोखरु, दोनों कुटज (मीठा और कड़वा) मृणाल (कमलनाल), उत्पल (नील कमल), पिप्पली, सैन्धा नमक, छोटी इलायची, मरिच, तथा सुवर्चला (हुलहुल) इन से सिद्ध की हुई यवागू को बालक पीये ॥

एतैरेवौषधैर्लेहं शर्करामधुसंयुक्तम् ।।
प्रयुञ्जीत घृतं चैव पक्वं कृच्छ्रनिवारणम् ।

इन्हीं उपर्युक्त ओषधियों से शर्कर एवं मधु के साथ अवलेह बनाकर अथवा घृत पाक करके प्रयोग करने से मूत्रकृच्छ्र रोग नष्ट होता है ॥

कनीयसी पञ्चमूली पञ्चकोलयवैः सह । कुलत्थमधुशिग्रूणि कार्यश्च सतिलो भवेत् ।।
मन्दस्नेहो रसस्त्वेष सौवर्चलयुतो भवेत् । मूत्राघाते प्रयोक्तव्यः शर्करासु विशेषतः ।।

लघु पञ्चमूल, पञ्चकोल (पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक सोंठ), जै, कुलत्थ, मीठा सुहांजना, तथा तिल–इनके रस में थोड़ा स्नेह (घृत) तथा सौवर्चल (काला नमक) मिलाकर मूत्राघात (मूत्रकृच्छ्र) तथा विशेषरूप से शर्करा (शर्कराजन्य मूत्रकृच्छ्र) में प्रयुक्त करना चाहिये ॥

एकत्रिदोषजैः कृच्छ्रैः शर्करास्तुल्यलक्षणाः । सुवर्णचूर्णसदृशास्तथा सर्षपसन्निभाः ।।
रोचनेव गवां पित्ते संभवन्त्यनिलात्मनाम् । वातेनोन्मथितं मूत्रं खजितं पापकर्मणाम् ।।
शर्कराः स्युर्विबृद्धास्ता अश्मर्यः संभवन्त्यथ ।

जिस प्रकार गौ के पित्त (Bile) में क्रमशः गोरोचना बन जाती है उसी प्रकार वात की अधिकता वाले व्यक्तियों में एक दोषज अथवा त्रिदोषज मूत्रकृच्छ्रों से पापकर्म वाले व्यक्तियों में वायु के द्वारा मथा जाता हुआ मूत्र शर्करा के समान लक्षणवाली सुवर्ण के चूर्ण तथा सरसों के समान शर्करा (Sand) उत्पन्न कर देता है । तथा वे ही शर्करायें बढ़कर अश्मरियाँ (Stones) बन जाती हैं । चरक चि. अ. २६ में कहा है—‘‘क्रमेण पित्तेष्विव रोचना गोः’’ सुश्रुत नि. अ. ३ में अश्मरी किस प्रकार बनती है इसका एक अन्य उदाहरण दिया है—अप्सु स्वच्छा (स्था) स्वपि यथा निषिक्तासु नवे

कुष्ठचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १८१

घटे। कालान्तरेण पङ्कः स्यादश्मरीसंभवस्तथा॥ अर्थात् घड़े में रखे हुए साफ पानी में भी जिस प्रकार कुछ समय के पश्चात् कीच (Precipitate) जमा हो जाता है उसी प्रकार बस्ति में स्थित मूत्र में अश्मरी बनती है। इस विषय में आधुनिक विद्वानों की भी यही राय है। वृक्कस्थ नालियों द्वारा जब मूत्र में यूरिक एसिड, Urates, oxalate, phosphates आदि लवण मात्रा में उत्पन्न होते हैं। मूत्रस्थ जलीयांश में इनका विलयन होना असंभव हो जाता है। और इनका कुछ अंश सूक्ष्म Crystals के रूप में बस्ति या गुदों में अवलिप्त हो जाता है और उसके चारों ओर अन्य लवण एकत्रित होने लगते हैं तथा धीरे २ अश्मरी बनजाती है। कभी २ ये लवण सूखी हुई श्लेष्मा, सूखे रक्त या कृमियों के अण्डों पर भी एकत्रित हो जाते हैं। यदि मूत्र की प्रतिक्रिया (Reaction) अम्लीय होगी तो (Uric acid) और उसके लवण निक्षिप्त होंगे तथा प्रतिक्रिया क्षारीय होने पर (Phosphate) निक्षिप्त होंगे। अश्मरी का केन्द्र (Nucleus) प्रायः शुष्क श्लेष्मा होता है। इसीलिये सुश्रुत नि. अ. ३ में कहा है—'चतस्रोऽश्मर्यः भवन्ति श्लेष्माधिष्ठानाः'। आयुर्वेद के मतानुसार अश्मरियां चार प्रकार की होती हैं १ वातज २ पित्तज ३ कफज ४ शुक्रज। इनमें से बालकों को प्रथम तीन तथा वृद्धों में अन्तिम अर्थात् शुक्रज अश्मरी होती है। पाश्चात्य विज्ञान में रासायनिक संगठन के अनुसार अश्मरियों के भेद किये गये हैं। श्लैष्मिक अश्मरी को हम रंग रूप आदि के अनुसार Phosphatic calculus कह सकते हैं। यह श्वेत एवं चिकनी होती है। पैत्तिक अश्मरी को Uric acid calculus कहा जा सकता है—इसका रंग कुछ लाल भूरा सा होता है। वातिक अश्मरी को हम Oxalate calculus कह सकते हैं। इसका रंग कुछ काला होता है। यह कठोर होती है तथा खुरदरी होती है। इसमें नोकीले उभार बने होते हैं। यह रोगी को अत्यन्त पीडा देती है। अश्मरियों के अनेक कारण होने पर भी आयुर्वेद में इसके मुख्य कारण दो माने गये हैं। १ शोधन का अभाव तथा २ आहार विहार का अपथ्य॥

तदेतल्लक्षणं तासां नित्यमेव तु वेदना ।।
शर्करा सहमूत्रेण निर्धावत्यपि कस्यचित् । शल्यवत्यश्मरी बस्तौ वर्धमानाऽवतिष्ठते ।।
क्षीयते क्षीयमाणस्य पुष्यमाणस्य पुष्यति ।

अश्मरी तथा शर्करा के लक्षण-नित्य वेदना होती है किसी २ के मूत्र के साथ शर्करा (Sand) आती है। वह शल्यरूप अश्मरी बस्ति (Bladder) में वृद्धि को प्राप्त होती जाती है। वह अश्मरी ज्यों २ रोगी क्षीण होता जाता है-त्यों २ क्षीण होती जाती है तथा रोगी की पुष्टि के साथ २ अश्मरी भी पुष्ट होती जाती है अर्थात् बढ़ती जाती है। सुश्रुत नि. अ. ३ में अश्मरी होने पर निम्न लक्षण दिये हैं—अथ जातासु नाभिबस्तिसेवनीमेहनेष्वन्यतमस्मिन् मेहतो वेदना मूत्रधारासङ्गः सरुधिरमूत्रता मूत्रविकिरणं गोमेदकप्रकाशमत्याविलं ससिकतं विसृजन्ति धावनलङ्घनप्लवनपृष्ठयानोषणाध्वगमनैश्चास्य वेदना भवन्ति। अर्थात् मूत्र त्याग के समय नाभि, बस्ति, शिश्न, सीवनी आदि में वेदना, मूत्र का बीच २ में रुक जाना, मूत्र में रक्त आना, तथा दौड़ने चलने आदि से बस्ति में पीड़ा होती है। अष्टाङ्गहृदय में इसके निम्न लक्षण दिये हैं—सामान्यालिङ्गं रुङ्नाभिसेवनीवस्तिमूर्धसु । विशीर्णधारं मूत्रं स्यात्तयामार्गनिरोधने ।। तद्व्यापायात्सुखं मेहेदच्छं गोमेदकोपमम् । तत्सक्षोभात् क्षते सास्त्रमायासाच्चाति रुग्भवेत् ।।

तस्मान्न नित्यं रुजति तस्योद्धरणमिष्यते ।।
अश्मर्युद्धरणं तीक्ष्णमौषधं स्त्रोत ईरणम् । साहसादतिबालेषु सर्वं नेच्छति कश्यपः ।।

इसलिये रुग्ण अवस्था में अश्मरी (पथरी) को नहीं निकालना चाहिये। उस अवस्था में स्त्रोतों को प्रेरित करने वाली तीक्ष्ण ओषधियों से भी अश्मरी का उद्धरण नहीं करना चाहिये। तथा महर्षि कश्यप के मत में अत्यन्त छोटे बालक में साहसपूर्वक अश्मरी को बिलकुल नहीं निकालना चाहिये। सुश्रुत चि. अ. ७ में अश्मरी का निम्न चिकित्सा सूत्र दिया

१८२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? ]

है—औषधैस्तरुणः साध्यः प्रवृद्धश्छेदमर्हति। तस्य पूर्वेषु रूपेषु स्नेहादिक्रम इष्यते ।। अर्थात् यदि अश्मरी के अभी पूर्वरूप ही है या अश्मरी अभी प्रारंभ ही हुई है तो स्नेहन आदि के क्रम के बाद भिन्न २ अश्मरीघ्न (Lithotrite) ओषधियों के प्रयोग से वह बस्ति में स्वयं घुलकर मूत्र के साथ शर्कराूप में बाहर निकल आती है। परन्तु यदि वह बहुत प्रवृद्धावस्था में पहुंच चुकी हो तो उसे शस्त्रकर्म द्वारा ही निकालना पड़ता है। सुश्रुत में कहा है—घृतैः क्षारैः कषायैश्च क्षीरैः सोत्तरबस्तिभिः । यदि नोपशामं गच्छेच्छेदस्तत्रोत्तरोविधिः ।।

इति ह स्माह भगवान् (कश्यपः) ।
(इति चिकित्सास्थाने मूत्रकृच्छ्रचिकित्सिताध्यायः ॥)
(इति ताडपत्रपुस्तके १२५ तमं पत्रम् ।)

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति चिकित्सास्थाने मूत्रकृच्छ्रचिकित्सिताध्यायः)


अथ द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ?

अथातो द्विव्रणीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम द्विव्रणीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

वक्तव्य—इस अध्याय में दो प्रकार के (अर्थात् दो प्रकार के कारणों–निज तथा आगन्तु–से उत्पन्न हुए) व्रणों तथा उनकी चिकित्सा का वर्णन किया गया है। इसलिये इसका यह नाम है। सुश्रुत चिकित्सास्थान प्रथम अध्याय में लिखा है—तत्र तुल्ये व्रणसामान्ये द्विकारणो थानप्रयोजनसामर्थ्याद् ‘द्विव्रणीय' इत्युच्यते। इसकी व्याख्या करते हुए डल्लण ने लिखा है–व्रणसामान्यं व्रणजातिर्व्रणत्वमित्यर्थः, तस्मिंस्तुल्ये सत्यपि द्विकारणोत्थानप्रयोजनसामर्थ्याद् 'द्विव्रणीय' इत्युच्यते; । द्विकारणं द्विहेतुकं यदुत्थानमुत्पत्तिः तस्य प्रयोजनं शीतक्रियादि, तस्य सामर्थ्य शक्तिः, तस्माद् 'द्विव्रणीय' इत्युच्यते ॥१-२॥

सूत्रस्थाने भगवता द्वौ व्रणौ परिकीर्तितौ । तयोर्विस्तरमिच्छामि श्रोतुं लक्षणमेव च ।।३।।
अनुग्रहाय बालानां चेष्टाहारौषधानि च । इति पृष्टः स शिष्येण संपूज्याह प्रजापतिः ।।४।।

भगवान् सूत्र स्थान में आपने दो प्रकार के व्रणों का उल्लेख किया था। बालकों के अनुग्रह की दृष्टि से उनके लक्षण, चेष्टा, आहार तथा ओषधि आदियों को मैं विस्तार–पूर्वक सुनना चाहता हूँ। इस प्रकार पूजा करके शिष्य द्वारा पूछे जाने पर प्रजापति–कश्यप ने कहा ।।३-४।।

परतन्त्रस्य समयं प्रब्रुवन्न च विस्तरम् । न शोभते सतां मध्ये लुब्धः काक इवाचितः ।।५।।
अवश्यं भिषजा त्वेतज्ज्ञातव्यमनसूयया । तस्मात् समयमात्रं भो शृणु बालहितेप्सया ।।६।।

परतन्त्र (अन्य प्रस्थान) के विषय में संक्षेप से ही कहना चाहिये। उसके विषय में विस्तार पूर्वक कहने वाला व्यक्ति पूजा किये गये लोभी कौए की तरह सज्जनों के बीच में शोभा नहीं देता। तथापि असूया (दूसरे के गुणों में दोषों को

द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः २ ] चिकित्सास्थानम् १८३

ढूंढ़ना) न करते हुए वैद्य को इस विषय में भी ज्ञान अवश्य होना चाहिये। इसलिये बालकों के हित की दृष्टि से इस विषय का संकेत मात्र मेरे से सुन ॥५-६॥

अथ खलु द्वौ व्रणौ निजश्चागन्तुश्च। निजो वाता द्यैकैकसर्वद्वन्द्वजः। क्षतभङ्ग(ग्न)विद्धपाटित-दग्धच्छिन्ननिष्पिष्टाभिरू (लू) नशस्त्रतृणकाष्ठाग्निविषदन्तनखशापमन्त्रमूलकर्मादिज आगन्तु। तस्य निजवदेव लक्षणमौषधं च स्वतर्केणानुविदध्यात् ।।७।।

निज और आगन्तु भेद से व्रण दो प्रकार के होते हैं। इनमें से निज व्रण वातादि दोषों से पृथक् २, सर्वज (त्रिदोषज) तथा द्वन्द्वज होते हैं। तथा आगन्तु व्रण क्षत भग्न (टूटना), विद्ध (बींधा जाना), पाटन (भेदन), दग्ध (जलना), छिन्न, निष्पिष्ट (पिस जाना), अभिलून (काटा जाना) तथा शस्त्र, तृण, काष्ठ, अग्नि, विष, दांत, नाखून, शाप, मन्त्र, मूल आदि कर्मों से उत्पन्न होते हैं। इन आगन्तु व्रणों के लक्षण तथा ओषधि अपनी बुद्धि के अनुसार निज के समान ही समझें। सुश्रुत चि. अ. १ में कहा है—द्वौ व्रणौ भवतः शारीर आगन्तुश्चेति। तयोः शारीरः पवनपित्तकफशोणितसन्निपातनिमित्तः, आगन्तुरपि पुरुषपशुपक्षिव्यालसरीसृपप्रपतनपीडनप्रहाराग्निक्षारविषातीक्ष्णौषधशकलकपालशृङ्गचक्रेषु परशुशक्ति कुन्ताद्यायुधाभिघातनिमित्तः। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह में भी कहा है—स च द्विविधो निज आगन्तुश्च। तत्र निजो दोष समुत्थः। आगन्तु शस्त्रानुशस्त्रो पललगुडनखदशनविषाणविषारुष्करादि निमित्तः। यहां शारीर से अभिप्राय निज व्रण से है। निज व्रण को सुश्रुत में वातादि दोषों के अतिरिक्त रक्तज भी माना है। आगन्तु व्रणों की भी औषध तथा लक्षण आदि निज व्रण के समान ही होते हैं क्योंकि उनका प्रत्यक्ष हेतु भिन्न होने पर भी पीछे से इनमें वातादि दोषों का अनुबन्ध हो जाने से वे निज व्रण ही हो जाते हैं। चरक चि. अ. २५ में कहा है—व्रणानां निजहेतूनामागन्तूनामशाम्यताम् । कुर्याद्दोषबलावेक्षी निजानामौषधं यथा ।। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह में भी कहा है—'सोऽपि पुनर्वातादिभिरधिष्ठितो निजतां लभते। सुश्रुत चि. अ. १ में भी कहा है—उत्तरकालं तु दोषोपप्लवंविशेषाच्छारीरवत् प्रतीकारः ॥७॥

स्तम्भकाठिन्याल्पस्त्रावशूलतोदस्फुरणकषायास्यत्वैर्वातिकं विद्यात्, ज्वरदाहमोहतृष्णाशुपाकलौहित्याव-दारणारुचिदौर्गन्ध्यैः पैत्तिकं विद्यात्, स्तैमित्यशैत्यमार्दवमन्दवेदनास्नेहपाण्डुवचिरकारित्वातिस्रावैः कफजं विद्यात्, सर्वरूपं सान्निपातिकं, द्विदोषं संसृष्टं विद्यात् ।।

वातिक व्रण के लक्षण—स्तम्भ (जकड़ना), कठिनता, अल्पस्त्राव, शूल, तोद (सूचीव्यधनवत् पीडा), स्फुरण, मुख का कसैला स्वाद होना-इन लक्षणों से व्रण को वातिक जाने। चरक चि. अ. २५ में कहा है—स्तब्धः कठिनसंस्पर्शो मन्दस्रावोऽतितीव्ररुक्। तुद्यते स्फुरति श्यावो व्रणो मारुतसंभवः ॥ अष्टाङ्ग संग्रह उ. अ. २९ में कहा है—तत्र श्यावोऽरुणः कृष्णो भस्मास्थिकपोतगलाव्यतमवर्णो वा दधिमस्तुक्षाराम्बुमांसधावनपुलाकोदकनिभाल्पस्त्रावो रूक्षश्चटचटायमानशीलोऽ-कस्माद्विविधशूलस्फुरणायामततोदभेदस्वापबहुलो निर्मोसिश्च वातात्। सुश्रुत चि. अ. १ में भी कहा है—तत्र श्यावारुणाभास्तनुः शीताः पिच्छिलोऽल्पस्रावी रूक्षश्चटचटायमानशीलः स्फुरणायामततोदभेदवेदनावहुलो निर्मोसिश्चेति वातात्। पैत्तिक व्रण के लक्षण—ज्वर, दाह, मोह, तृष्णा, आशुपाक (व्रण का शीघ्र पकना), लालिमा, अवदारण, (व्रण का विदीर्ण होना), अरुचि तथा दुर्गन्धि-इन लक्षणों से व्रण को पैत्तिक जाने। चरक चि. अ. २५ में कहा है—तृष्णामोहज्वरक्लेददाहदुष्टत्वदारणैः। व्रणं पित्तकृतं विद्याद्गन्धैः स्रावैश्च पूतिकैः ॥ अष्टांग संग्रह उ. अ. २९ में कहा है—क्षिप्रजः पीतनीलहरितकृष्णकपिलपिङ्गलो गोमूत्रभस्मशङ्खकिंशूकोदकमार्द्धीकतैलाभोष्णभूरिक्लेदो दाहोषार्ज्वररागपाकावदरणधूमयानान्वितः क्षारोक्षितक्षतोपमवेदनः पिटकाजुष्टश्च पित्तात्। सुश्रुत चि. अ. १ में भी कहा है—क्षिप्रजः पीतनीलाभः किंशुंकोदकाभोष्णस्रावी दाहपाकरागविकारी पीतपिडकाजुष्टश्चेति पित्तात्। श्लैष्मिक व्रण के लक्षण-स्तिमितता (चिपचिपा होना), शीतलता, मृदुता, मन्दवेदना, स्निग्धता, वर्ण में पाण्डु होना, चिरकारिता (देर में पकना) तथा स्राव की अधिकता इन लक्षणों से व्रण को श्लैष्मिक जाने। चरक चि. अ. २५

१८४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? ]

में कहा है—बहुपिच्छो गुरुः स्निग्धः स्तिमितो मन्दवेदनः। पाण्डुवर्णोऽल्पसंक्लेदश्चिरकारी कफव्रणः।। अष्टाङ्गसंग्रह उ. अ. २९ में कहा है—स्निग्धः स्थूलौष्ठः पाण्डुश्षण्डकण्डूर्नवनीतवसा मज्जपिष्टतिलनारिकेलाम्बुसदृशश्वेतशीतबहलपिच्छिलक्लेदः स्वापस्तम्भस्तैमित्यगौरवोपदेहयुक्तः सिरास्नायुजालावततो मन्दवेदनः कठिनश्च कफात्। सुश्रुत चि. अ. १ में कहा है—प्रततचण्डकण्डूबहुलः स्थूलौष्ठः स्तब्धसिरास्नायुजालावततः कठिनः पाण्ड्ववभासो मन्दवेदनः शुक्लशीतसान्द्रपिच्छिलास्त्रावी गुरुश्चेति कफात्। इन सब (वात, पित्त तथा कफ) के सम्मिलितरूप होने पर व्रण को सान्निपातिक तथा दो दोषों के लक्षणों से संसृष्ट (द्विदोषज) जाने। सुश्रुत चि. अ. १ में इनके अतिरिक्त रक्तज व्रण भी दिया है जिसके लक्षण निम्न होते हैं—प्रवालदलनिश्चयप्रकाशः कृष्णस्फोटपिडकाजालोपचितस्तुरङ्गस्थानगन्धिःसंवेदनो धूमायनशीलो रक्तस्त्रावी पित्तलिङ्गैश्चेति रक्तात् ।।८।।

इत्यत्र श्लोकः—

सर्वव्रणानां प्रकृतिर्नििरुक्ता दोषदर्शनात्। न हि दोषाननाश्रित्य व्रणः कश्चिच्छरीरिणः ।।९।।

दोषों के अनुसार सब व्रणों की प्रकृति कही गई है। क्योंकि प्राणियों का कोई भी व्रण दोषों का आश्रय किये बिना नहीं होता ॥९॥

तेषामुपक्रमं धात्रीबालनिग्रहौ, संशमनं, बन्धनम्, उत्क्लिन्नप्रक्षालनं, कल्कप्रणिधानं, शोधनं, रोपणं, सवर्णीकरणम्; इत्येतैः स्नेहपानसंभोजनोपनाहस्वेदोष्णपरिषेकमधुराम्ललवणैर्वातव्रणं, शीतोदकदुग्धपरिषेकशीतप्रलेपनमधुरकषायतिक्तकल्कघृतपानमुद्गशालिजाङ्गलोपचारैरूष्णाम्लकटुलवणबन्धनसंपूरणवर्जनैश्च पैत्तिकव्रणम्, उष्णतीक्ष्णतिक्तकटुकषायक्षारसंशोधनोपनाहस्वेदनोष्णवारिपरिषेकलङ्घनबन्धनस्त्रावणैः कफव्रणं शमयेत्। अतो युक्त्येतरान्। स्त्रावणपाटनदहनसीवनैषणसाहसादीन्यतिबालेषु न कुर्यादिति ।।१०।।

**व्रणों के उपक्रम—**धात्री तथा बालक की चिकित्सा, संशमन, बन्धन, उत्क्लिन्न मांस का प्रक्षालन, कल्कप्रणिधान (औषधि का कल्क–Paste बनाकर बांधना), शोधन, रोपण, सवर्णीकरण (त्वचा के समान वर्ण करना) इत्यादि व्रणों के उपक्रम होते हैं। सुश्रुत चि. अ. १ में व्रणों के ६० उपक्रम दिये हैं—तस्य व्रणस्य षष्टिरुपक्रमा भवन्ति। तद्यथा—अपतर्पणमालेपः परिषेकोऽभ्यङ्गः स्वेदो विम्लापनमुपनाहः पाचनंविस्त्रावणं स्नेहो वमनं विरेचनं छेदनं भेदनं दारणं लेखनमेषणमाहरणं व्यधनं विस्त्रावणं सीवनं सन्धानं पीडनं शोणितास्थापनं निर्वापणमुत्कारिका कषायो वर्तिः कल्कः सर्पिस्तैलं रसक्रियाऽवचूर्णनं व्रणधूपनमुत्सादनमवसादनं मृदुकर्म दारुणकर्म क्षारकर्माग्निकर्म कृष्णकर्म पाण्डुकर्म प्रतिसारणं रोमसञ्जननं लोमापहरणं बस्तिकर्मोत्तरबस्तिकर्म बन्धः पत्रदानं कृमिघ्नं बृंहणं विषघ्नं शिरोविरेचनं नस्यकवलधारणं धूमो मधु सर्पिर्यन्त्रमाहारो रक्षाविधानमिति। चरक चि. अ. २५ में व्रणों के ३६ उपक्रम दिये हैं—यथाक्रममतश्चोर्ध्वं शृणु सर्वानुपक्रमान्। शोफघ्नं षड्विधं चैव शस्त्रकर्मावपीडनम्।। निर्वापणं ससन्धानं स्वेदः शमनमेषणम्। शोधनारोपणीयौ च कषायौ सप्रलेपनौ।। द्वे तैले तद्गुणे पत्रच्छादनं द्वे च बन्धने। भोज्यमुत्सादनं दाहो द्विविधः सावसादनः।। काठिन्यमार्दवकरे धूपने लेपने शुभे। व्रणावचूर्णनं वर्ण्यं लेपनं लोमरोहणम्॥ इति षट्त्रिंशदुद्दिष्टा व्रणानां समुपक्रमाः।। **वातव्रण की चिकित्सा—**इनमें से वातव्रण की स्नेहपान, स्निग्धभोजन, स्निग्ध उपनाह (पुलटिस), स्निग्धस्वेद, उष्णपरिषेक तथा मधुर, अम्ल एवं लवणद्रव्यों से चिकित्सा करे। चरक चि. अ. २५ में कहा है—पूर्वे कषायैः सर्पिर्भिर्जयेद्रा मारुतोत्तरान्। तथा—संपूरणैः स्नेहपानैः स्निग्धैः स्वेदोपनाहनैः। प्रदेहः परिषेकैश्च वातव्रणमुपाचरेत्॥ **पैत्तिक व्रण की चिकित्सा—**शीतलजल, दूध का परिषेक, शीतललेप तथा मधुर कषाय एवं तिक्त द्रव्यों द्वारा प्रस्तुत कल्क, घृतपान, मूंग, शालि चावल, जांगल पशुपक्षियों के मांस रस से तथा उष्ण अम्ल कटु लवण, बन्धन, संपूरण (बृंहण) आदि के त्याग के द्वारा पैत्तिक व्रण की चिकित्सा करें। चरक चि. अ. २५ में कहा है—शीतलैर्मधुरैस्तिक्तैः प्रदेहपरिषेचनैः। सर्पिष्पानैर्विरेकैश्च पैत्तिकं शमयेद् व्रणम्॥ **कफव्रण की चिकित्सा—**उष्ण, तीक्ष्ण, तिक्त, कटु, कषाय, क्षार, संशोधन, उपनाह, स्वेदन,

द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १८५

उष्णजल का परिषेक, लङ्घन (उपवास) बन्धन तथा स्रावण के द्वारा कफव्रण को शान्त करे। चरक चि. अ. २५ में कहा है—कषायकटुरूक्षोष्णैः प्रदेहपरिषेचनैः। कफव्रणं प्रशमयेत्तथा लङ्घनपाचनैः॥ इसी युक्ति से अन्य व्रणों की चिकित्सा करे। स्रावण (Drainage), पाटन (भेदन-Incision), दहन (जलाना-Canterisation), सीवन (Suturing-stiching), एषण (शलाका द्वारा अन्वेषण-Probing-Exploring) तथा साहस आदि का प्रयोग अत्यन्त छोटे बालकों में नहीं करना चाहिये॥१०॥

अत्र श्लोकाः—

जीर्णैः प्रक्षालितैर्वस्त्रैस्तथा बद्धं निधापयेत्। यथौषधं न पतति बालकं च न पीडयेत् ॥११॥

पुराने तथा धोए हुए वस्त्रों के द्वारा व्रण पर इस ढंग से बन्ध (पट्टी) बांधकर रखे जिससे औषधि नीचे न गिरे तथा बालक को अत्यन्त पीडा नहीं देनी चाहिये॥

वैसर्पः श्वयथुर्दाहो ज्वरस्तृडतिबन्धनात्। शिथिलादनवस्थां मध्यमस्तु प्रशस्यते ॥१२॥

यदि पट्टी बहुत जोर से बांधी जाय तो विसर्प, श्वयथु, दाह, ज्वर तथा तृषा हो जाती है। यदि पट्टी बहुत ढीली बांधी जाय तो औषधि आदि अपने स्थान पर ही नहीं ठहरेंगी। इसलिये यही मध्यम (अर्थात् न बहुत जोर से तथा न बहुत ढीली) प्रशस्त मानी जाती है॥१२॥

वातातर्पत्तृणकाष्ठाम्बुमक्षिकादिभयाद्व्रणम्। बन्धो रक्षति शीघ्रं च दह्यते न च खादति ॥१३॥

पट्टी—वायु, धूप, तृण, काष्ठ, पानी तथा मक्खी आदि के भय से व्रण की रक्षा करती है। इससे व्रण का दहन नहीं होता तथा यह कृमि आदियों द्वारा खाया नहीं जाता। सुश्रुत चि. अ. १ में कहा है—यस्माच्छुध्यति बन्धेन व्रणो याति च मार्दवम्। रोहत्यपि च निःशङ्कस्तस्माद्बन्धो विधीयते॥१३॥

ज्वरवैसर्पदाहर्तं रक्तपित्तोल्बणं व्रणम्। न बध्नीयाद्द्विरहस्तु सर्वं प्रक्षालयेद्व्रणम् ॥१४॥

ज्वर, विसर्प तथा दाह से युक्त एवं रक्तपित्त की अधिकता वाले व्रणों पर बन्ध (पट्टी) नहीं बांधनी चाहिये। इस प्रकार के सब व्रणों का दिन में दो बार प्रक्षालन करना चाहिये॥१४॥

द्वे हरिद्रे तिलाः सर्पिः सैन्धवं मधुकं त्रिवृत्। अरिष्टपत्रमित्येष कल्कः शोधनरोपणः ॥१५॥

हरिद्रा, दारुहरिद्रा, तिल, घी, सैन्धव, मुलहठी, त्रिवृत् तथा नीम के पत्ते—इनका कल्क व्रण का शोधन एवं रोपण करता है। सुश्रुत चि. अ. १ में कल्कप्रणिधान का निम्न प्रयोजन कहा है—पूतिमांसप्रतिच्छन्नान् महादोषांश्च शोधयेत्। कल्कीकृतैर्थालाभं .......॥

शोधने रोपणे चैव युक्त्या क्षौद्ररसक्रिया। तत्र निर्वापणे चोक्ता घृतेनोदकसक्तवः ॥१६॥

व्रण के शोधन तथा रोपण में युक्तिपूर्वक क्षौद्र (मधु) तथा रसक्रिया (Extracts) का प्रयोग करना चाहिये। तथा निर्वापण के लिये पानी में तैयार किये हुए सत्तूओं का घी के साथ प्रयोग करना चाहिये। निर्वापण से अभिप्राय दाह को शान्त करने वाले लेपों से है। सुश्रुत चि. अ. १ में व्रण में क्षौद्र (मधु) का निम्न स्थानों पर विधान दिया है—क्षतोष्मणो निग्रहार्थं सन्धानार्थं तथैव च। सद्यो व्रणेष्व्यायतेषु क्षौद्रसर्पिर्विधीयते॥ सुश्रुत में रसक्रिया का निम्न प्रयोजन बताया है—तैलेनाशुध्यमानानां शोधनीयां रसक्रियाम्। व्रणानां स्थिरमांसानां कुर्याद् द्रव्यैरुदीरितैः॥ सुश्रुत में निर्वापण का निम्न प्रयोजन दिया है—दाहपाकज्वरवतां व्रणानां पित्तकोपततः। रक्तेन चाभिभूतानां कार्ये निर्वापणं भवेत्॥ यथोक्तैः शीतलद्रव्यैः क्षीरपिष्टैर्घृतप्लुतैः। दिह्यादबह (हु) लान् सेकान् सुशीतांश्चावचारयेत्॥ इसके द्वारा सेक और लेप दो प्रकार का निर्वापण

१८६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? ]

कहा है। निर्वापण के लिये चरक चि. अ. २५ में भी कहा है—सर्पिषा शतधौतेन पयसा मधुकाम्बुना। निर्वापयेत् सुशीतेन रक्तपित्तोत्तरान् व्रणान्। अर्थात् रक्त और पित्त प्रधान व्रणों में निर्वापण किया जाता है ॥१६॥

समङ्गाधातकीपुष्पमग्रस्थामलकीत्वचम्। घृतं कृष्णास्तिला मांसी कल्कोऽयं व्रणरोपणः ।।१७।।

मंजिष्ठा, धाय के फूल, अग्रस्था, आंवले की छाल, घी, काले तिल तथा जटामांसी का कल्क व्रण का रोपण करते हैं। कषाय, लेप आदियों से शोधन हो जाने पर व्रण का रोपण करना चाहिये। सुश्रुत में रोपण का उद्देश्य एवं विधान निम्न प्रकार से बताया है—पित्तरक्तविषागन्तून् गम्भीरानपि च व्रणान्। रोपयेद्रोपणीयेन क्षीरसिद्धेन सर्पिषा ।। कफवाताभिभूतानां व्रणानां मतिमान् भिषक्। कारयेद्रोपणं तैलं भेषजैस्तद्यथोदितैः ।।१७।।

एतैरेवौषधैः सर्वैः सर्पिस्तैलमथो पचेत्। व्रणरोपणमित्याहुः कट्फलं वाऽवचूर्णितम् ।।१८।।

इन्हीं मंजिष्ठा आदि उपर्युक्त औषधियों से ही घी तथा तेल का पाक करे। ये व्रणरोपण कहलाते हैं। अथवा इन पर कट्फल चूर्ण का अवचूर्णन (Dusting) करना चाहिये ॥१८॥

ज्वरदाहपिपासातर्या पच्यमानं व्रणं वदेत्। तेषां निवृत्तौ जानीयात् पक्वं पीनोन्नताकृतिम् ।।१९।।

पच्यमान व्रण का लक्ष्य—ज्वर, दाह, एवं पिपासा से युक्त होने पर व्रण को पच्यमान (पकने की स्थिति में विद्यमान) जाने। तथा इन उपर्युक्त दाह आदि लक्षणों के निवृत्त हो जाने (हट जाने) पर मोटे तथा उठी हुई आकृति वाले व्रण को पक्व (पका हुआ) समझे ॥१९॥

मर्मस्थश्चेदुपेक्ष्यः स्याद्बालं धात्रीं च पूरयेत्। गोदध्ना प्रक्षितं चैनं बध्नीयाल्लवणान्वितम् ।।२०।।

यदि व्रण मर्मस्थान पर हो तथा यदि रोगी धात्री और बालक हो तो उसकी उपेक्षा करनी चाहिये अर्थात् उसे चीरना नहीं चाहिये। अपितु व्रण को पहले थोड़ा रगड़ कर उन पर गौ की दही में नमक मिलाकर बांध दे तथा इसके द्वारा व्रण का पूरण करे ॥२०॥

अमर्मजं पाटयेद्वा नेत्येके पूर्वदर्शनात्। रक्तक्षयादल्पभावाद्धन्याद्बालं कुपण्डितः ।।२१।।

यदि व्रण मर्मस्थान पर न हो तो उसका पाटन (दारण-Incision)कर देना चाहिये। कुछ लोग कहते हैं कि पूर्व दर्शन (अच्छी प्रकार देखे बिना अथवा पहले इस कार्य को अच्छी प्रकार जब तक देखा हुआ न हो) के बिना इस पाटन (भेदन) के कार्य को न करे। क्योंकि जो अज्ञानी वैद्य है वह रक्तक्षय (Bleeding) तथा रक्त के कम होने से बालक को मार देता है। अर्थात् बालक में पहले ही रक्त की कमी होती है उस अवस्था में यदि रक्तस्राव (Bleeding) अधिक हो जाय तो बालक की मृत्यु हो सकती है। व्रण का पाटन (भेदन) करने के बाद ........ (उसे स्नेहपान तथा स्निग्ध सेक आदि उपचार करना चाहिये) ॥२१॥

पाटितं वा प्र......................................................
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(इति ताडपत्रपुस्तके १२६ तमं पत्र¹म्।)
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१. अस्याग्रे १२७ तमं पत्रं खण्डितं ताड़पत्रपुस्तके।

द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १८७

......................... (मञ्जि) ष्ठाऽथ मनःशिला।
प्रलेपः सघृतक्षौद्रः सवर्णकरणः परम्।।

सवर्ण करण योग—मंजिष्ठा, मनःशिला ........ इत्यादि का घी एवं मधु के साथ मिलाकर लेप करना उत्तम सवर्णकरण (त्वचा के वर्ण के समान वर्ण का करना) योग है।।

त्रिफला जातिपुष्पाणि कासीसं लोहपत्रिका। लेपः सगोमयरसः सवर्णकरणः परम्।।

त्रिफला, जातिपुष्प (लौंग), कासीस तथा लोहचूर्ण इनका गोबर के रस (पानी) के साथ मिलाकर लेप करना उत्तम सवर्णकरण माना गया है। व्रण का रोहण होने के बाद त्वचा आ जाने पर यदि उस नवीन त्वचा का वर्ण देह की अन्य त्वचा के साथ न मिले तो उसका रंग उसके समान करने का प्रयत्न करना चाहिये इसे सवर्णकरण कहते हैं। सुश्रुत चि. अ. १ में कहा है—दुरुढत्वा कृष्णानां पाण्डुकर्म हितं भवेत्। सप्तरात्रं स्थिरं क्षीरे छागले रोहिणीफलम्।। तेनैव पिष्टं सुश्लक्ष्णं सवर्णकरणं हितम्।। इसी प्रकार चरक चि. अ. २५ में भी सवर्णकरण योग दिये हैं।

चतुष्पदानां त्वग्रोमखुरशृङ्गास्थिभस्मना। तैलाक्ता चूर्णिता भूमिर्र्भवेल्लोमभरुहा पुनः।।

लोमोत्पादन—जहां लोम उत्पन्न करने हों उस स्थान पर तैल चुपड़कर गौ घोड़े आदि चौपाये पशुओं की त्वचा, रोम (बाल), खुर (सींग) तथा अस्थि की भस्म का अवचूर्णन करे इससे उस स्थान पर पुनः बाल उग जाते हैं। सुश्रुत चि. अ. १ में भी यह श्लोक इसी रूप में दिया गया है। इसी प्रकार चरक चि. अ. २५ में भी यह श्लोक बिलकुल इसी रूप में दिया गया है।

अथ खलु बालानामष्टौ पिडकाः स्वशरीरदोषात् स्वदोषाच्चोत्पद्यन्ते। तासां निदानलक्षणे प्रोक्ते; नामरूपचिकित्सां च ब्रूमः-शराविका च कच्छपिका च जालिनी च ताः कफप्रायाः, सर्षपिका चाऽलजी च विद्रधिश्च ताः पित्ताधिकाः, विनता वाताधिका, सर्वदोषजा त्वरुंषिका। तासां लक्षणानि-मध्ये निम्ना शराविका, श्लक्ष्णोन्नता कच्छपिका, सिराजालतनुच्छिद्रवती जालिनी, सर्षपाभाऽल्पाऽऽशुपाकिनी बहुला वा सर्षपिका, बहुपद्रवाऽऽशुपाकवैसर्पाऽलजी, विनता तूदरे पृष्ठे वाऽवगाढनीला रुजावती; मांसपाकस्तु पित्तप्रकोपो वा उत्पद्यते; स एव सन्धिषु मर्मसु वा विद्रधिरित्युच्यते विदह्याशु अङ्गं विदीर्यत इति विद्रधिः, सा बहिरन्तश्चोत्पद्यते; ते चोभे बालानां कृच्छ्रसाध्ये। त्रिदोषजा त्वरुंषिका चतुर्विधा दोषभेदादेकैकाधिकसमदोषत्वात्; शूलतोदाटोपस्फुरणानाहपामा वातलिङ्गानि, ज्वरतृष्णादाहमोहमदप्रलापाः पित्तलिङ्गानि, शैत्यपैच्छिल्यबहुक्लेदारुचिस्तैमित्यानि कफलिङ्गानि, सर्वैः समदोषत्वम्, अन्यत्रापि च व्रणे पूर्वोक्तानि च लक्षणानि।।

बालकों को अपने शरीर के दोष से अथवा अपने ही दोष के कारण आठ पिडकाऐं हो जाती हैं। उनके निदान तथा लक्षण पहले कहे जा चुके हैं। अब हम उनके नाम, स्वरूप, तथा चिकित्सा कहेंगे। इनमें शराविका, कच्छपिका, तथा जालिनी—ये तीन कफ की अधिकता वाली, सर्षपिका, अलजी तथा विद्रधि-ये तीन पित्त की अधिकता वाली, विनता वात की अधिकता वाली तथा अरूंषिका त्रिदोषज होती है। चरक सू. अ. १७ में अरूंषिका को छोड़कर शेष ७ पिडकाऐं दी हैं जो कि प्रमेह पिडकाऐं कहलाती हैं। ये मधुमेह की उपेक्षा से हो जाती हैं। सुश्रुत नि. अ. ६ में १० पिडकाओं का उल्लेख किया गया है—'तत्र वसामेदोभ्यामभिपन्नशरीरस्य त्रिभिर्दोषैरनुगतधातोः प्रमेहिणो दश पिडकाः जायन्ते। तद्यथा-शराविका सर्षपिका कच्छपिका जालिनी विनता पुत्रिणी मसूरिका अलजी विदारिका विद्रधिका चेति। इन पिडकाओं के लक्षण निम्न हैं। शराविका का लक्षण—बीच में से दबी हुई होती है। चरक सू. अ. १७ में इसका निम्न लक्षण

१८८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? ]

दिया है—अन्तोन्नता मध्यनिम्ना श्यावाक्लेदरुजान्विता। शराविका स्यात्पिडका शरावाकृतिसंस्थिता।। अर्थात् जिस पिडका के किनारे ऊंचे उठे हुए हों, बीच में से दबी हुई हो, श्याम वर्ण की हो तथा जिसमें क्लेद और वेदना हो उसे शराविका कहते हैं। इसकी आकृति शराव (सकोरे) की तरह होती है। इसी प्रकार सुश्रुत नि. अ. ६ में भी कहा है। कच्छपिका का लक्षण—यह श्लक्ष्ण एवं उन्नत होती है। चरक सू. अ. १७ में कहा है—स्वगाढार्तिनिस्तोदा महावास्तुपरिग्रहा। श्लक्ष्णा कच्छपपृष्ठाभा पिडकाकच्छपीमता ॥ अर्थात् जिस पिडका में अर्ति (पीडा), तोद (सुई चुभने के समान वेदना), हो जिसका आश्रय बहुत बड़ा हो, जो चिकनी तथा कछुए की पीठ के समान उभरी हुई हो उसे कच्छपी कहते हैं। सुश्रुत नि. अ. ६ में भी कहा है—सदाहाकूर्मसंस्थाना ज्ञेया कच्छपिका बुधैः॥ जालिनी के लक्षण-यह शिराओं के जाल से युक्त होती है तथा इसमें छोटे २ छिद्र होते हैं। चरक सू. अ. १७ में कहा है—स्तब्धा शिराजालवती स्निग्धस्त्रावामहाशया। रुजानिस्तोदबहुला सूक्ष्मच्छिद्रा च जालिनी ॥ अर्थात् जो स्तब्ध, शिराओं के जाल से युक्त, स्निग्ध स्त्राव युक्त, बड़े आशय वाली हो, जिसमें पीडा तथा तोद (सूचीवेध वत् पीडा) हो, जिसमें सूक्ष्म छिद्र हों उसे जालिनी कहते हैं। सर्षपिक का लक्षण—जो सरसों के आकार की होती है तथा जो छोटी शीघ्र पकने वाली और संख्या में बहुत सी होती हैं। अर्थात् सरसों के प्रमाण की छोटी २ बहुत सी पिडकाओं के एकत्र मिलने से जो एक पिडका बन जाती है। तथा जो बहुत बड़ी न हो और शीघ्र पक जाती हो उसे सर्षषिका कहते हैं। चरक सू. अ. १७ में कहा है—पिडका नातिमहती क्षिप्रपाका महारुजा। सर्षपी सर्षपाभाभिः पिडकाभिश्चिता भवेत् ॥ इसी प्रकार सुश्रुत नि. अ. ६ में भी कहा है। अलजी का लक्षण जो अनेक उपद्रवों से युक्त हो, शीघ्र पक जाती हो तथा चारों ओर फैलती जाती हो उसे अलजी कहते हैं। चरक सू. अ. १७ में कहा है—दहति त्वचमुत्थाने तृष्णामोहज्वरप्रदा। विसर्पत्यनिशं दुःखाहत्यग्नि रेवालजी ॥ अर्थात् अलजी नामक पिडका के उत्पन्न होने के समय त्वचा में दाह होती है। इसमें प्यास, मोह तथा ज्वर भी हो जाता है। यह चारों ओर फैलती जाती है तथा इसमें अग्नि के समान अत्यन्त दारुण दाह होता है। सुश्रुत नि. अ. ६ में कहा है—रक्ता सिता स्फोटवती दारुणा त्वलजी भवेत्। विनता का लक्षण—जो पेट और पीठ पर होती है, जो वर्ण में गहरी नीली हो, तथा जिसमें पीडा होती हो उसे विनता कहते हैं। चरक सू. अ. १७ में कहा है—अवगाढरुजाक्लेदा पृष्ठे वाऽप्युदरेऽपि वा। महती विनता नीला पिडका विनता मता ॥ विद्रधि का लक्षण—इसमें जब मांस का पाक हो जाय तथा पित्त का प्रकोप हो और यह सन्धि एवं मर्मस्थान पर हो तब उसे विद्रधि कहते हैं। यह शीघ्र ही विदाह को प्राप्त हो जाती है तथा अङ्गों को विदीर्ण करती है इसलिये इसका नाम विद्रधि है। विद्रधि दो प्रकार उत्पन्न होती है। १. शरीर के बाहरी भाग में (बाह्य विद्रधि) तथा २. शरीर के अन्तः भाग में (अन्तर्विद्रधि)। बालकों में ये दोनों विद्रधियां कृच्छ्रसाध्य होती हैं। (विद्रधि को Abscess कहते हैं) चरक सू. अ. १७ में इन दोनों प्रकार की विद्रधियों का स्वरूप दिया है—विद्रधिं द्विविधामाहुर्बाह्यामाभ्यन्तरीं तथा ! बाह्य विद्रधि के लक्षण—बाह्या त्वक्स्नायुमांसोत्था कण्डराभा महारुजा। अर्थात् यह शरीर के बाहर त्वचा स्नायु एवं मांस में होती है। यह कण्डरासदृश तथा अतिवेदना युक्त होती है। आगे चरक में अन्तर्विद्रधि के निम्न लक्षण दिये हैं—अन्तः शरीरे मांसासृगाविशन्ति यदा मलाः। तदा संजायते ग्रन्थिर्गम्भीरस्थः सुदारुणः॥ हृदये क्लोम्नि यकृति प्लीह्नि कुक्षौ च वृक्कयोः॥ अर्थात् भिन्न २ कारणों से कुपित हुए दोष जब शरीर के अन्दर मांस तथा रक्त में प्रविष्ट होते हैं तब हृदय, क्लोम, यकृत आदि अवयवों में गम्भीर एवं अत्यन्त कष्टकर ग्रन्थि उत्पन्न हो जाती है। इसमें तीव्र वेदना होती है। अरूंषिका का लक्षण—त्रिदोषज अरूंषिका चार प्रकार की होती है। दोष भेद से एक २ दोष की अधिकता से तीन तथा तीनों दोषों के समान होने से चौथी होती है। अर्थात् त्रिदोषज होने पर भी वात, पित्त तथा कफ की अधिकता होने से तीन तथा चौथी जिसमें तीनों दोष समान मात्रा में बढ़े हुए हों—ये चार होती हैं। अरूंषिका के विषय में सुश्रुत नि. अ. १३ में कहा है—अरूंषि बहुवक्त्राणि बहुक्लेदानि मूर्ध न। कफासृक् कृमिकोपेन नृणां विद्यादरुंषिकाम् ॥ अर्थात् कफ रक्त और कृमियों के प्रकोप से मनुष्यों के शिर में अनेक मुख वाले और स्त्रावयुक्त व्रण हो जाते हैं उन्हें अरुंषिका