कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
७१ कथासरित्सागर
७१ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा सा सथेत्युक्त्वा तमनभीप्सिआधयम्। मनोरथप्रभा श्वश्रूश्यालारोपित पुत ॥१४३॥ तावत् प्रियङ्करो मन्त्री तस्य सामप्रभस्य स। विचिन्वानश्च पदवीं सत्रैवागात् ससैनिक ॥१४४॥ मिश्रिताय ततस्तस्मै प्रहृष्टो निजमन्त्रिणे। सोमप्रभ स्ववृत्तान्त मावत्सर्वं स शंसति ॥१४५॥ तावत्तस्याययौ दूत शीघ्रमागभ्यतामिति। लेखे लिखित्वा सन्देशमादाय पितुरन्तिकात् ॥१४६॥ तन सैन्य समादाय सचिवातुमतेन सः। पित्राज्ञामनतिक्रामञ्जगाम नगरं निजम् ॥१४७॥ तात दृष्ट्वाहमेष्यामि नचिरादित्युवाच च। मनोरथप्रभां तां च तं च श्वश्रूय श्वश्रून् ॥१४८॥ सोऽथ श्वश्रूयो गत्वा तत्सर्वं मकरन्दिकाम्। तथैवाबोधयत्तत जज्ञे सा विरहातुर ॥१४९॥ नोद्याने सा रतिं लेभे न गीते न सखीजने। शुकानामपि शुश्राव न विनोदमतीर्गिर ॥१५०॥ नाहारमपि सा मेने का कथा मण्डनादिक। प्रयत्नेर्बोध्यमानापि पितृभ्यां नाग्रहीद्धृतिम् ॥१५१॥ उत्सृज्य विलिनीपद्मशयन चाचिरेण सा। उन्मादिनीव बभ्राम पित्रोरुद्वेगदायिनी ॥१५२॥ यदा न प्रतिपेदे सा समाश्वासमतोस्तयोः। वचस्तत तौ कुपितो पितरौ शपत स्म ताम् ॥१५३॥ निषादमख्ये निर्धीवे कश्चित्त्वां वतिष्यति। अननेव शरीरेण स्वजातिस्मृतिवर्जिता ॥१५४॥ इति शप्ता पितृभ्यां सा निषादभवन गता। निषादकन्या सम्पन्ना सदव मकरन्दिका ॥१५५॥ स चानुध्य तच्छोकात्सलिता सिंहविक्रमः। विद्याधरेश्वर पल्या सह पुष्करखमाययौ ॥१५६॥ स च विद्याधरेन्द्रोऽभूत्प्रागुपि सर्वशास्त्रवित्। वेनापि प्राक्तनापुण्यगणे मुक्तां गत ॥१५७॥
दशम लम्बक ७११
दशम लम्बक ७११ यह सुनकर और 'ठीक है' इस प्रकार कहकर मनोरथप्रभा सोमप्रभ को वेषजय की गोद में बैठाकर फिर अपने आश्रम को ले गई ॥१४३॥ जैसे ही वे लोग आश्रम में पहुँचे वैसे ही सोमप्रभ का मन्त्री प्रियंकर, उसे ढूँढ़ता हुआ वहीं आया ॥१४४॥ इतने में ही उसके पिता के पास से 'शीघ्र आओ' इस प्रकार का सन्देश लेकर एक दूत भी वहाँ जा पहुँचा ॥१४५॥ तब सोमप्रभ मन्त्री की सम्मति से सारी सेना को लेकर पिता की आज्ञा का पालन करता हुआ अपने नगर को गया ॥१४६॥ 'पिताजी का दर्शन करके मैं तुरन्त आऊँगा' इस प्रकार जाते हुए सोमप्रभ ने मनोरथ प्रभा और वेषजय से कहा ॥१४७॥ तदनन्तर, वेषजय ने जाकर यह सब समाचार मकरन्दिका से कहा। इससे वह विरह से व्याकुल हो उठी ॥१४८॥ उसे (मकरन्दिका को) न तो उद्यान में शान्ति मिलती थी न संगीत में और न सहेलियों के बीच में। वह अब सुग्गे की भी विनोदपूर्ण बातियाँ नहीं सुनती थी ॥१४९-१५०॥ वह भोजन भी न करती थी शृंगार आदि करने की तो बात ही कहाँ ? माता और पिता द्वारा अनेक प्रयत्नों से समझाने पर भी उसकी अधीरता नहीं गई ॥१५१॥ वह कमलिनी के पत्तों की शय्या त्याग कर और पागलों की भाँति तुरन्त उठकर घूमने लगती थी। इस कारण उसके माता-पिता व्याकुल होते थे ॥१५२॥ बार-बार समझाते हुए माता-पिता की बातों को जब उसने नहीं माना तब क्रुद्ध माता- पिता ने उसे शाप दिया ॥१५३॥ तू अपने पूर्वजन्म की स्मृति को भूलकर इसी शरीर से दरिद्र निषादों (भीलों) के बीच कुछ समय तक रहेगी ॥१५४॥ माता-पिता से इस प्रकार शापित मकरन्दिका उसी समय निषाद के घर पर जाकर भील- कन्या बन गई ॥१५५॥ और उसी शोक से संतप्त उसका पिता सिंहविक्रम अपनी पत्नी के साथ ही मर गया ॥१५६॥ और वह पूर्वजन्म का ऋषि विद्याधरों का राजा जो सब शास्त्रों का ज्ञाता था पूर्वजन्म के किसी पाप के शेष रह जाने के कारण सुग्गा बन गया ॥१५७॥ ९५
७६२ कथासरित्सागर
७६२ कथासरित्सागर तयैव तस्य भार्या च सा जातारण्यसूकरी। सोऽद्य शुकः पुराद्यैतत् वेत्ति सर्वं तपोबलात्॥१५८॥ अद्य खमगतिं चित्रां दृष्ट्वास्य हृषितं मया। एतां राजमदस्योक्त्वा कथां चेयं विमोक्ष्यते॥१५९॥ सोमप्रभस्य तामस्य सुतां पुष्करजन्मनि। प्राप्स्यत्येष विद्याधरीत्वमागतां मकरन्दिकाम्॥१६०॥ मनोरथप्रभा सा च जातं सम्प्रति भूमिपम्। रश्मिमन्तं मुनिसुतं सैव पतिमाप्स्यति॥१६१॥ सोमप्रभोऽपि पितरं दृष्ट्वा गत्वा सदाश्रमे। साम्प्रतं स प्रियाप्राप्त्यै शक्रमाराधयिष्यति॥१६२॥ इत्याख्याय कथां तत्र पुलस्त्यो व्यरमन्मुनिः। अहं च जातिमस्मार्षं हृष्टात्स्वपरिवर्जितः॥१६३॥ ततो येनाहमनव नीतस्तद्रूपपाधमम्। स मरीचिमुनिस्त्यक्त्वा गृहीत्वा मामथाययौ॥१६४॥ जातमदश्च पतितस्तृणगुल्माङ्गारपाण्ड्वहम्। इतस्ततः परिभ्राम्यन् विद्याधर्यं प्रदत्तवान्॥१६५॥ निशार्द्धेन पतितः प्रमादाद्राजसन्निधौ। पन्नगी च मम भीतं शुकं पक्षियोनिजम्॥१६६॥ इति सर्वं मयाश्रुत्य तस्मिन् विदुषि शुक्रे विग्ने विमित्रवाचि। तदद्य च शुकनामाहमुद्गीर्णमन्त्रार्थदूतविमुक्तमानवरूपः॥१६७॥ अथाऽहं स परिष्वज्य दम्भुं गत्वान च सोमप्रभामन्त्रिणम्। उक्तित् गजन् गगनानुगः पश्य यत्र प्राप्स्यसि तत्र वान्ताम्॥१६८॥ मुखास्वादात् पितृणां हि भूत्वा निपाती मकरन्दिकाऽया। आनय तं नृपं शिरः स्पृष्ट्वा प्रज्ञावितां सा राजसमपादपम्॥१६९॥ स्पृष्ट्वाऽसि तां तु शिरसा प्राति विद्याधरः सा विनिमुक्तशापा। अपारविद्याधरवल्लभार्था भविष्यत्येष गच्छता वाम्॥१७०॥ इति मथित्वा विदितं स सिद्धिं स्वाश्रमं गच्छेत् माम्। प्राप्तं स गनात्प्रभा शापप्रदाद्राजराजेश्वरः॥१७१॥ : सा सोमप्रभामुनिप्रार्थाभया वरस्य प्राप्तं गन्तव्या पुन गगनाभिपातः। : ततस्त्वं प्राप्तवानसि गन्तव्या गतं स्पृष्ट्वाऽसि राधेता इत्यनेन॥१७२॥
इस कथा को राजसभा में कहकर वह मुक्त हो जायगा ।।१५८ १५९।।
और, उसकी पत्नी जंगल की सूकरी बन गई वही सुग्गा तप के प्रभाव से पहले पड़ा हुआ सब कुछ जानता है। इसलिए, इस सुग्गे की इस विचित्र कर्मगति को देखकर ही मैं हँसा था। इस कथा को राजसभा में कहकर वह मुक्त हो जायगा ।।१५८ १५९।। सोमप्रभ भी विद्याधर बनकर उस भीरुकन्या-शरीर को प्राप्त मकरन्दिका को प्राप्त करेगा ही ।।१६०।। और, यह मनोरथप्रभा भी इस समय राजा बने हुए मुनिकुमार रश्मिमान् को पति के रूप में प्राप्त करेगी ।।१६१।। सोमप्रभ भी पिता से मिलकर और फिर इसके आश्रम में जाकर प्रिया (मकरन्दिका) की प्राप्ति के लिए शिवजी की आराधना कर रहा है ।।१६२।। पुलस्त्य मुनि इस प्रकार कथा कहकर चुप हो गये और हर्ष तथा शोक से भरे हुए मैंने अपने पूर्वजन्म का स्मरण किया ।।१६३।। तब जो मुनि कृपा करके मुझे आश्रम तक ले गये थे उन मरीचि मुनि ने मुझे पाल-पोस कर बड़ा किया ।।१६४।। पंखों के जम जाने पर पक्षियों की स्वाभाविक चंचलता के कारण इधर उधर घूमता और अपनी विद्या के आश्चर्य दिखाता हुआ मैं एक निषाद के हाथ लग गया और क्रमशः आपके पास भी आ पहुँचा। अब पक्षियोनि में मेरा पाप क्षीण हो गया ।।१६५ १६६।। इस प्रकार, उस राजसभा में अपनी कथा सुनाकर उस विद्वान् और विचित्र वाणीवाले सुग्गे के मौन हो जाने पर वह राजा सुमन अत्यन्त हर्ष के कारण आत्मविस्मृत-सा हो गया ।।१६७।। इसी बीच तपस्या से प्रसन्न शिव ने स्वप्न में सोमप्रभ को आदेश दिया—'राजन् ! उठो राजा सुमन के पास चलो। वह अपनी पत्नी मकरन्दिका को प्राप्त करोगे जो पिता के शाप से मुक्ताफला नाम की धीवरपुत्री हो गई है और सुग्गा बने हुए अपने पिता को लेकर वह राजा के पास गई है। वह विद्याधरी मुझे देखकर शापमुक्त होकर अपने पूर्वजन्म का स्मरण करेगी। परस्पर परिचय से बढ़े हुए हर्ष में शोभित तुम दोनों का संगम होगा' ।।१६८-१७०।। प्रसन्नवदन शिवजी ने स्वप्न में इस प्रकार कहकर अपने आश्रम में तप करती हुई उस दूसरी मनोरथप्रभा से भी कहा—।।१७१।। 'जिसे तू चाहती थी वह इस समय सुमन नाम के राजा के रूप में अवतीर्ण हुआ रश्मिमान् तू बन गया है। हे कल्याणी! वह तुम्हें देखते ही अपने पूर्वजन्म का स्मरण करेगा' ।।१७२।।
७६४ कथासरित्सागर
७६४ कथासरित्सागर एवं ते सोमप्रभविद्याधरकन्यके पृथग्विभुना। स्वप्नादिष्टे भूपतेस्तस्य सदः सुमनसस्तदा ययतुः ॥१७३॥ सोमप्रभं तत्र च तं विलोक्य संस्मृत्य जातिं मकरन्दिका स्वाम्। दिव्यं प्रपद्यैव निजं वपुस्तज्जग्राह कण्ठं चिरशापमुक्ता ॥१७४॥ सोऽपि प्रसादाद् गिरिजापतेस्तां सम्प्राप्य विद्याधरराजपुत्रीम्। सोमप्रभः शङ्कुसिदिव्यभोगलक्ष्मीमिवाश्लिष्य कृती बभूव ॥१७५॥ स चापि दृष्ट्वैव मनोरथप्रभां स्मृतस्वजातिः सुमनोमहीपतिः। प्रविश्य पूर्वां नभसश्च्युतां तनुं मुनीन्द्रपुत्रश्च बभूव रश्मिमान् ॥१७६॥ तया च सङ्गम्य पुनः स्वकान्त्या चिरोत्सुकः स प्रययौ स्वमाश्रमम्। ययौ स सोमप्रभभूपतिश्च तां प्रियां समादाय निजां निजं पुरम् ॥१७७॥ शुकोऽपि मुक्त्वाैव स विहङ्गीं तनुं जगाम धाम स्वतपोभिरर्जितम्। इतीह दूरान्तरितोऽपि देहिनां भवत्यवश्यं विहितः समागमः ॥१७८॥ इति नरवाहनदत्तो निजसचिवाद् गोमुखात्कथां श्रुत्वा। अद्भुतविचित्ररुचिरां सप्रितियज्ञः सोत्सुकस्तुतोष तदा ॥१७९॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे शक्तिमद्यशोलम्बके तृतीयस्तरङ्गः समाप्तः। चतुर्थस्तरङ्गः ततो विद्याधरीयुग्मकथामाख्याय गोमुखः। नरवाहनदत्तं तमुवाच सचिवाग्रणीः ॥१॥ क्वचिदेव सहन्तेऽत्र लोकद्वयहितैषिणः। सामान्या अपि कामादेरावेगं धृतबुद्धयः ॥२॥ राज्ञः कुलधरस्य सेवकस्य कथा तथा च पूर्वमासीद्यो बभूव कुलपुत्रकः। राज्ञः कुलधराख्यस्य सेवकः ख्यातपौरुषः ॥३॥ स ग्रामादागतो जातु प्रविष्टोऽशङ्कितो गृहे। भार्यां स्वेनैव मित्रेण ददर्श स्वरसहृताम् ॥४॥
दशम लम्बक ७६५
दशम लम्बक ७६५ इसी प्रकार, शिवजी से स्वप्न में पृथक्-पृथक आदिष्ट वे सभी राजा सुमन की सभा में आये ॥१७३॥ उस सभा में आये हुए सोमप्रभ को देखकर और अपने पूर्वजन्म का स्मरण करके मकरन्दिका फिर उसी दिव्य विद्याधरी के रूप में आ गई और उसने सोमप्रभा के गले से मिलकर आलिङ्गन किया ॥१७४॥ वह सोमप्रभ भी शिवजी की कृपा से उस विद्याधर राजकुमारी मकरन्दिका को पाकर मूर्त्तिमती दिव्य भाग्यलक्ष्मी के समान उसका आलिङ्गन करके सफल हुआ ॥१७५॥ वह राजा सुमनस् भी जो पूर्वजन्म में रश्मिमान् नामक मुनिपुत्र था मनोरथप्रभा को देखकर और अपने पूर्वजन्म का स्मरण करके आकाश से गिरे हुए अपने पूर्व शरीर में प्रवेश करके फिर मुनिपुत्र रश्मिमान् बन गया। और, उस अपनी प्रियतमा मनोरथप्रभा को चिरकालीन उत्सुकता के पश्चात् प्राप्त करके उसके साथ अपने आश्रम को गया वह राजा सोमप्रभ भी अपनी प्रियतमा मकरन्दिका को लेकर अपने नगर को गया ॥१७६-१७७॥ इसी प्रकार वह शुक (मुञ्जा) भी अपने शरीर को छोड़कर अपने तपोबल से प्राप्त अपने स्थान (विद्याधरपुर) को गया। इस प्रकार, बहुत दूरी का अन्तर रहने पर भी विधि से विहित प्रणियों का समागम होता ही है ॥१७८॥ इस प्रकार, शक्तिप्रभा के लिए उत्सुक नरवाहनदत्त गोमुख मन्त्री से सुनाई गई आश्चर्यमयी और रुचिकर कथा को सुनकर प्रसन्न हुआ ॥१७९॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियशोलम्बक का तृतीय तरंग समाप्त चतुर्थ तरंग मन्त्रियों में श्रेष्ठ गोमुख ने इस प्रकार दो विद्याधरियाँ (मकरन्दिका और मनोरम प्रभा) की कथा सुनाकर नरवाहनदत्त से कहा ॥१॥ स्वामी इहलोक और परलोक—दोनों लोकों—का हित चाहनेवाले कुछ ही ऐसे विद्वान् व्यक्ति होते हैं जो साधारण होकर भी काम-क्रोध-लोभ आदि की उत्तरोत्तर साधना करते हैं ॥२॥ राजा सुन्दर के सेवक की कथा इस प्रसंग में एक कथा सुनो—राजा सुन्दर का अमित पराक्रमी शूरवर्मा नाम का एक सेवक था ॥३॥ वह किसी समय अपने गाँव से लौटकर सहसा आने पर न पूछा, तो उसने अपनी स्त्री को अपने एक मित्र के साथ एकान्त में स्वच्छन्दता-पूर्वक विहार करते देखा ॥४॥
७६६ कथासरित्सागर
७६६ कथासरित्सागर दृष्ट्वा नियम्य स क्रोधं चिन्तयामास धैर्यतः । किं मित्रद्रोहिणैतेन पङ्गुना निहतेन मे ॥५॥ दुश्चारित्र्यानया वापि पापया निगृहीतया । किं करोम्यहमप्येनान्मात्मानं पापभागिनम् ॥६॥ इत्यालोच्य परित्यज्य तावुभावप्युवाच सः । हन्यामहं न युवयोः पश्येयं पुनरेव च ॥७॥ नागन्तव्यमितो भूयो मम लोचनगोचरम् । इत्युक्त्या तौ च मुक्तौ तौ ययतुः क्वापि दूरतः ॥८॥ स स्वस्यां परिणीतायामभूच्छूरवर्मा सुनिर्वृतः । एवं नूनं जितक्रोधो न दुःखस्यास्पदीभवेत् ॥९॥ कृतप्रज्ञश्च विपदा न जातु न बाध्यते । निगदाम्यपि हि प्रज्ञा श्रेयसे न परायणम् ॥१०॥ तथा च शृण्विमां सिंहवृषभादिगतां कथाम् । सञ्जीवकवृषभस्य पिङ्गलकसिंहस्य च कथा आसीत् कोऽपि वणिक्पुत्रो धनवान् नगरे क्वचित् ॥११॥ तस्यैकदा वणिज्यार्थं गच्छतो मथुरां पुरीम् । भारवोढा युगं भग्नं भरेण न्यपतद्भुवि ॥१२॥ गिरिप्रस्रवणोद्भूतपङ्के मग्नः स एव पथि । सञ्जीवाख्यो वृषभः पपाताद्भूवनिर्गतः ॥१३॥ दृष्ट्वाभिपालितमिदमश्मगिरिदारणायतनम् । निरागसं चिरात् त्यक्त्वा वणिक्पुत्रो जगाम सः ॥१४॥ स च सञ्जीवको दैवाद् गतान्वक्षा युगं शनैः । उत्थाय शान्तदम्भोजदुर्वलस्तद्भविभाण्डवान् ॥१५॥ चरंश्च यमुनातारे हरितानि तृणानि च । पीत्वा स्वच्छतरं वारि शनैर्हृष्टतनुर्बभूव ॥१६॥ उत्प्लवन् पीनसर्वाङ्गः माद्यन् द्युतिमयस्तथा । शृङ्गोल्लिखितपद्माक्षः स च सन्नादनन् वने ॥१७॥ तत्राथ चाभवत्तत्र महासिंहो वनान्तरम् । यियुः पिङ्गलको नाम रिपुमारणकोविदः ॥१८॥ दमनकः करटकश्च द्वौ शृगालावरचैतयोः । एषां मन्त्री स हि नाम तथा करटकस्तयोः ॥१९॥
दशम लम्बक ७२७
[Header] दशम लम्बक ७२७ [/Header]
यह देखकर और क्रोध को रोककर वह धैर्यपूर्वक सोचने लगा कि इस मित्रद्रोही पशु को मारने से क्या लाभ ? और, इस दुष्टा स्त्री को मारकर भी क्या होगा ? मैं भी इन्हें मारकर पाप का भागी क्यों बनूँ ॥५६॥ इस प्रकार सोचकर और उन दोनों को छोड़कर वह बोला—'मैं तुम दोनों में से उसे मार डालूँगा जिसे बार-बार देखूँगा। अब यहाँ मेरी आँखों के आगे कभी न जाना'। इस प्रकार, कहकर उसके द्वारा छोड़े गये वे दोनों कहीं दूर चले गये ॥५७-८॥ तदनन्तर, दूसरी स्त्री से विवाह करके वह शूरवर्मा निश्चिन्त हो गया हे महाराज समुचित बुद्धिवाला व्यक्ति विपत्तियों से कभी बाधित नहीं होता। पदुओं की भी बुद्धि ही कल्याणकारिणी होती है पराक्रम नहीं ॥५ ९ १ ॥
संजीवक बैल और पिंगलक सिंह की कथा १
सिंह बैल आदि की कथा इस सम्बन्ध में सुनो। किसी नगर में एक धनी वैश्यपुत्र था ॥१२१॥ एक बार व्यापार के लिए मथुरा को जाते हुए उसके रथ का भार ढोनेवाला संजीवक नाम का एक बैल पहाड़ के टपकते जल से कीचड़वाले मार्ग में जाने हुए, गाड़ी का जुआ टूट जाने से दलदल म गिरकर फँस गया और उसके अंग शत-विक्षत हो गये ॥१२२ १३॥ उसे गिरकर बेहोश हुए देखकर और उसके उठाने के सभी प्रयत्नों को विफल जानकर निराश वैश्य ने बहुत समय के पश्चात् उसे वहीं छोड़ दिया और आगे की यात्रा की ॥१२४॥ दैवयोग से वह अनाथ और असहाय संजीवक बैल धीरे-धीरे कुछ स्वस्थ होकर नई कोमल घासों को खाता हुआ दलदल से निकलकर पहले के समान स्वस्थ हो गया और यमुना के तट पर जाकर, वहाँ भी हरी-हरी घासों को खाता हुआ स्वच्छन्दतापूर्वक विचरण करने लगा और महा बलवान् होगया ॥१२५ २६॥ उठी हुई और मोटी डीलवाला शिव के वाहन नन्दी के समान मस्त संजीवक सींगों से मिट्टी के डूहों को उखाड़ता हुआ बार-बार रँभाया करता था ॥१२७॥ उस स्थान के समीप ही अपने पराक्रम से सारे जंगल पर छाया हुआ पिंगलक नाम का एक सिंह रहता था। दो शृगाल उस मृगराज के मन्त्री थे जिनमे एक का नाम करटक और दूसरे का नाम दमनक था ॥१२८ १ ॥
१ पंचतन्त्र के मित्रभेद नामक प्रथम तन्त्र की कथा जिसका प्रारम्भ इस श्लोक से होता है— वर्धमानो महान् स्नेहः सिंहगोवृषयोर्वने। पिशुनेनातिक्रुद्धेन जम्बुकेन विनाशितः॥ यही कथा बगदाद के शाह हारूँ रशीद के समय कलीला दिमना के नाम से अरबी में अनूदित हुई है।—अनु
स सिंहो जातु तोयार्थमागच्छन् यमुनातटम् । तस्याराक्षादमशृणोत् सञ्जीवनकहुङ्कृतम् ॥२०॥ श्रुत्वा चाश्रुतपूर्वं स तन्नादं दिक्षु मूर्च्छितम् । स सिंहोऽचिन्तयत् कस्य बत नादोऽयमईदृशः ॥२१॥ नूनमत्र महत्सत्त्वं किञ्चित्तिष्ठत्यवेमि सत् । तन्मे दृष्ट्वैव मां हन्यादनाद्वापि प्रवासयेत् ॥२२॥ इति सोऽपीतपानीय एव गत्वा वनं द्रुतम् । भीतः सिंहो निगूढासीदाकारमनुयायिषु ॥२३॥ अथ प्राज्ञो दमनकः स मन्त्री तस्य जम्बुकः । तमवोचत् करटकं द्वितीयं मन्त्रिणं रहः ॥२४॥ अस्मत्स्वामी पयः पातुं गतो पीत्वैव सत्त्वरम् । आगतस्त्वरितं भद्र प्रच्छन्नोऽधैव कारणम् ॥२५॥ ततः करटकोऽवादीद् व्यापारोऽस्माकमेष कः । श्रुतस्त्वया न वृत्तान्तः किं कीलोत्पाटिनः कपेः ॥२६॥
कीलोत्पादिनो वानरस्य कथा
नगरे क्वापि केनापि वणिजा देवतागृहम् । कर्तुमारब्धमभवन् भूरिसम्भूृतदायकम् ॥२७॥ तत्र कर्मकराः काष्ठं क्रकचोर्ध्वार्धपाटितम् । दत्त्वान्तःकीलकमत्रं ते स्थापयित्वा गृहं ययुः ॥२८॥ तावदागत्य तत्रैको वानरश्चापलोत्प्लुतैः । कीलकन्यस्तविभागेऽपि काष्ठे तस्मिन्नुपाविशत् ॥२९॥ नाड्यन्तरे मुखे भूत्योरिव तत्रोपविश्य च । कीलमुत्पाटयामास हस्ताभ्यां निष्प्रयोजनम् ॥३०॥ मिथोश्लिष्टात्कीलेन सह काष्ठेन तेन च । सषूमागढमसङ्घट्टपीडिताङ्गो ममार सः ॥३१॥ एवं न यस्य यत्कर्म स तत्कुर्वन् विनश्यति । तस्मात् किं मृगराजस्य विज्ञातेनाद्यचेन नः ॥३२॥ एतत्करटकाच्छ्रुत्वा धीरो दमनकोऽब्रवीत् । अन्तर्भूमं प्रभोः प्राप्यो विशेषः सर्वदा बुधैः ॥३३॥
प्रथम तन्त्र ७६१ उस सिंह ने एकबार पानी पीने के लिए यमुना के किनारे की ओर आते हुए उस बड़ी डील- वाले बैल की गर्जना सुनी ॥२ ॥ चारों दिशाओं में फैलनेवाले और इस प्रकार कभी इस न सुनाई पड़नेवाले शब्द को सुनकर वह सिंह सोचने लगा कि 'यह किसका शब्द है ! मालूम होता है कि यहाँ कोई बलवान् प्राणी रहता है । वह मुझे देखते ही मार डालेगा या इस वन से निकाल देगा' ॥२१ २२॥ ऐसा सोचकर सिंह बिना पानी पिये ही वन को लौट और अपने अनुचरों में अपने को छिपाकर बैठ गया ॥२३॥ उसकी यह दशा देखकर उमरा बुद्धिमान् शृगाल रूपी दमनक दूसरे मन्त्री करटक से एकान्त में बोला-॥२४॥ 'हमारा स्वामी सिंह पानी पीने के लिए गया था किन्तु वह बिना पानी पिय ही क्यों लौट आया इसका कारण पूछना चाहिए ॥२५॥ तब करटक ने कहा- 'यह हमारा व्यापार (काम) नहीं है क्या तू ने खूँटा उखाड़नेवाले बन्दर की कहानी नहीं सुनी ? ॥२६॥ कील उखाड़नेवाले बन्दर की कथा कहीं किसी नगर में एक बनिया
७७ कथासरित्सागर
७७ कथासरित्सागर दमनककरटकयोः संवादः को हि नाम न कुर्यात् केवलोदरपूरणम्। एवं दमनकेनोक्ते साधु करटकोऽब्रवीत् ॥३४॥ स्वेच्छयातिप्रवृत्तो यो न धर्मः सेवकस्य सः। इति चोक्तः करटकेनेदं दमनकोऽभ्यधात् ॥३५॥ मैवमात्मानुरूपं हि फलं सर्वोऽपि वाञ्छति। श्वा तुष्यत्यस्थिमात्रेण केसरी धावति द्विपे ॥३६॥ एतच्छ्रुत्वा करटकोऽवादीदेवं कृते यदि। कुप्यति प्रत्युत स्वामी तद्विशेषफलं कुतः ॥३७॥ अतीव कर्कशा स्तब्धा हिंस्रजन्तुभिरावृता। दुरासदाश्च विषमा ईश्वराः पर्वता इव ॥३८॥ ततो दमनकोऽवादीत् सत्यमेतद्बुधस्तु यः। स्वभावानुप्रवृत्त्या स्वीकरोति शनैः प्रभुम् ॥३९॥ एवं कुरुत चेत्युक्तस्ततः करटकेन सः। ययौ दमनकस्तस्य सिंहस्य स्वामिनोऽन्तिकम् ॥४०॥ प्रणिपत्योपविष्टश्च सिंहं पिङ्गलकं स तम्। स्वामिनं कृतसत्कारं क्षणादेव व्यजिज्ञपत् ॥४१॥ अहं क्रमागतस्तावद् भृत्यो हितस्तव। हितः परोऽपि स्वीकार्यो हेयः स्वोऽप्यहितः पुनः ॥४२॥ क्रीत्वा यतोऽपि मूल्येन मार्जारः पोष्यते हितः। अहितो हन्यते यत्नाद् गृहजातोऽपि मूषकः ॥४३॥ श्रोतव्यं च हितैषिभ्यो भृत्यैभ्यो भूतिमिच्छता। अपृष्टैरपि वक्तव्यं तैश्च काले हितं प्रभो ॥४४॥ तद्विश्वसिषि चेद्देव न कुप्यसि न निह्नुषे। पृच्छामि तदहं किञ्चिन्न सोद्वेगं करोषि चेत् ॥४५॥ एवं दमनकेनोक्तः सिंहः पिङ्गलकोऽब्रवीत्। विश्वासाह्रोऽसि भक्तोऽसि तन्निःशङ्कं त्वयोच्यताम् ॥४६॥ इति पिङ्गलकेनोक्तेऽथोचेद्दमनकोऽथ सः। देव पानीयपानार्थं तृषितो गतवानसि ॥४७॥ तदपीतजलः किं त्वमागतो विमना इव। एतत्तद्वचनं श्रुत्वा स मृगेन्द्रो व्यचिन्तयत् ॥४८॥
दशम लम्बक ४७१
दशम लम्बक ४७१ दमनक और करटक का संवाद केवल पेट भरना कौन नहीं जानता ? दमनक के ऐसा कहने पर सरलहृदय करटक बोला- ॥३४॥ 'अपनी इच्छा से राजा की अंतरंग बातों में अधिक घुसना सेवक का धर्म नहीं है। करटक के इस प्रकार कहने पर दमनक बोला-'ऐसा नहीं ! सभी अपने योग्य फल पाना चाहते हैं। कुत्ता हड्डी का एक टुकड़ा पाकर सन्तुष्ट हो जाता है किन्तु सिंह हाथी पर दौड़ता है ॥३५ ३६॥ यह सुनकर करटक बोला- ऐसा जानकर स्वामी उल्टे ही कोप करने लगे तो उसका विशेष फल कैसे मिल सकता है ॥३७॥ क्योंकि स्वामी जन पर्वतों के समान अत्यन्त कठिन हिंसक प्राणियों से घिरे होने के कारण कठिनाई से वश में आते हैं ॥३८॥ तब दमनक ने कहा- 'यह सच है किन्तु जो समझदार है, वह मालिक के स्वभाव के अनुसार चलकर उसे धीरे-धीरे वश में कर लेते हैं ॥३९॥ 'तब ऐसा ही करो' इस प्रकार करटक ने उससे कहा। तदनन्तर दमनक अपने राजा सिंह के पास गया ॥४०॥ प्रणाम करके पास में बैठे हुए दमनक ने अपने स्वामी पिंगलक सिंह द्वारा 'आओ बैठो' कहकर स्वागत किये जाने पर, इस प्रकार निवेदन किया-॥४१॥ 'स्वामी मैं आपका कुल-परम्परागत सेवक हूँ। दूसरा व्यक्ति भी यदि आपका हितैषी हो तो उसे स्वीकार करना चाहिए। और, आपका आत्मीय व्यक्ति भी यदि अ-हितचिन्तक हो तो उसे छोड़ देना चाहिए ॥४२॥ अपना हित चाहनेवाले बिलाव को भी मूल्य देकर घर में लाकर रखा जाता है और हानि पहुँचानेवाले चूहे को अपने घर में ही उत्पन्न होने पर भी मार दिया जाता है ॥४३॥ अपना कल्याण चाहनेवाले राजा को अपने हितैषी सेवकों की बात सुननी चाहिए। और सेवकों को भी चाहिए कि वे बिना पूछे भी अपने स्वामी का हित चिन्तन करें और उसे हित बात कहे ॥४४॥ इसलिए स्वामिन् यदि आप विश्वास करते हैं साथ ही कोप न करें और छिपावें नहीं तो मैं कुछ पूछना चाहता हूँ ॥४५॥ दमनक के इस प्रकार पूछने पर पिंगलक सिंह उससे बोला- 'तुम विश्वास करने योग्य और हमारे भक्त सेवक हो इसलिए जो भी कहना हो निश्शंक होकर कहो' ॥४६॥ पिंगलक के इस प्रकार कहने के पश्चात् दमनक बोला- 'देव तुम प्यासे होकर पानी पीने के लिए गये थे ॥४७॥ किन्तु, आप बिना पानी पिये ही कुछ उदास-से होकर क्यों लौट आये ? दमनक की यह बात सुनकर पिंगलक सिंह सोचने लगा ॥४८॥
लक्षितोऽस्म्यमुना तत्किं मत्तस्त्यास्य निगूह्यत। इत्यालोच्याब्रवीत् स शृणु गोप्यं न तदस्ति मे ॥४९॥ जलपार्श्वगतेनात्र नादोऽपूर्वः श्रुतो मया। स चास्मदधिकस्योग्रो जाने सत्त्वस्य कस्यचित् ॥५०॥ भार्यं शब्दानुरूपेण प्रायेण प्राणिनां महत्। प्रजापतिर्विचित्रो हि प्राणिसर्गोऽधिकाधिकः ॥५१॥ येन बहु प्रविष्टेन न शरीरं म मे वनम्। तस्मादितो मयान्यत्र गन्तव्यं कानने क्वचित् ॥५२॥ इति वादिनमाह स्म सिंहं दमनकोऽथ तम्। शूरः समित्यतां देव किं वनं त्यक्तुमिच्छसि ॥५३॥ जलेन भज्यते सेतुः स्नेहः कर्णेजपेन तु। अरक्षणेन मन्त्रश्च शब्दमात्रेण कातरः ॥५४॥ यन्त्रादिहृच्छब्दास्ते ते हि भवन्त्येव भयङ्कराः। परमार्थमविज्ञाय न भेतव्यमत प्रभो ॥५५॥
भेरीगोमायुकथा
तथा च भेरीगोमायुकथेयं श्रूयतां त्वया। कोऽपि क्वापि वनोद्देशे गोमायुरनशत्पुरा ॥५६॥ स भक्ष्यार्थी भ्रमन्नुत्तुङ्गां प्राप्य भुवं ध्वनिम्। गम्भीरमेकतः श्रुत्वा भीतो दृष्टिं ततो ददौ ॥५७॥ तत्रादृष्टचरां भेरीमपश्यत् पतितस्थिताम्। किमीदृशोऽयं प्राणी स्यात् कोऽप्येवंरूपशब्दकृत् ॥५८॥ इति सञ्चिन्तयन् दृष्ट्वा निस्पन्दां तामुपाययौ। यावत्पश्यति तावत्स नायं प्राणीत्यबुध्यत ॥५९॥ वातप्रेल्लच्छरस्तम्बहतचर्मपुटोद्भवम् । शब्दं निरूप्य तस्यां च स गोमायुर्जहौ भयम् ॥६०॥ स्यात्किञ्चिद्भक्ष्यमत्रान्तरित्युत्पाट्य स पुष्करम्। प्रविश्य वीक्षते यावत् केवले दारुचर्मणी ॥६१॥ तन्मेव शब्दमात्रेण किं विभ्यति भवादृशाः। मन्यसे यदि तत्तत्र तद्विज्ञातुं व्रजाम्यहम् ॥६२॥
दशम लम्बक ७७१
दशम लम्बक ७७१ इसने मुझे ताड़ लिया है अब तो इस अपने भक्त से क्या छिपाया जाय ? ऐसा सोचकर वह बोला—'सखे तेरे लिए कुछ छिपाने की बात नहीं है॥४९॥ जल के पास गये हुए मैंने एक अपूर्व शब्द सुना जो पहले कभी नहीं सुना था। वह शब्द मुझसे भी अधिक बल किसी प्राणी का था ॥५० ॥ क्योंकि वह प्राणी भी शब्द के ही अनुरूप होगा। ब्रह्मा की सृष्टि विचित्र है। उसमें एक-से-एक बढ़कर प्राणी हैं ॥५१॥ ऐसे प्राणी के मेरे इस वन में घुस आने पर यह शरीर और वन अब मेरे नहीं रहे। इसलिए, अब मुझे यहाँ से किसी दूसरे वन में चला जाना चाहिए' ॥५२॥ ऐसा कहते हुए सिंह से दमनक ने कहा—'स्वामिन् ! आप शूर हैं और अच्छे नेता (राजा) हैं, तो वन को क्यों छोड़ना चाहते हैं ? ॥५३॥ पानी के प्रवाह से पुल टूटता है और कानाफूसी से प्रेम टूटता है ! बिना रक्षा किये मन्त्र (नीति) फूट पड़ता है और कायर व्यक्ति केवल शब्द से ही टूट जाता है ॥५४॥ भेरी, शंख आदि के शब्द भी भयंकर होते हैं। इसलिए, वास्तविक बात को बिना जाने डरना नहीं चाहिए॥५५॥ नगाड़ा और सियार की कथा इस प्रसंग में आप 'नगाड़ा और एक सियार की कथा सुनें' । प्राचीन समय में किसी जंगल में एक सियार रहता था ॥५६॥ उसने भोजन की खोज में घूमते हुए पहले की पुरानी युद्ध-भूमि में पहुँचकर और उसके एक ओर से गम्भीर शब्द सुनकर डरते हुए उधर देखा। वहाँ उसने पहले कभी न देखे हुए और गिर कर भूमि में पड़े हुए एक नगाड़े को देखा। तब उसे देखकर उसने सोचा क्या यह इस प्रकार का शब्द करनेवाला कोई प्राणी है ? ॥५७-५८॥ ऐसा सोचता हुआ वह एकदम स्थिर पड़े हुए उस नगाड़े के पास गया और जब उसे भली भाँति देखा तब उसे मालूम हुआ कि यह कोई प्राणवाली वस्तु नहीं है॥५९॥ वायु से हिलते हुए सरकंडों के आघात से बोलते हुए नगाड़े के चमड़े के उस शब्द को सुनकर उस सियार ने भय छोड़ दिया ॥६० ॥ उसके भीतर कुछ खाने योग्य वस्तु मिलेगी इस प्रकार सोचकर, उसके चमड़े को उधेड़ कर जब उसने देखा तब तो उसे केवल लकड़ी और चमड़ा ही उसे दीखा ॥६१॥ अतः हे स्वामी आप-जैसे व्यक्ति भी क्या केवल शब्द से डरते हैं? यदि आप यहाँ भय का कारण समझते हैं तो मैं उसे जानने के लिए जाता हूँ ॥६२॥
३७४ कथासरित्सागर
३७४ कथासरित्सागर इत्युक्त्वाऽथ दमनको गच्छ क्षमतोऽसि चेदिति। गदितस्तेन सिंहेन स ययौ यमुनातटम्॥६३॥ तत्र शब्दानुसारेण यावत्त्वरं स गच्छति। तावत्तृणानि खादन्तं वृषभं तं ददर्श सः ॥६४॥ उपेत्य चान्तिकं तस्य कृत्वा तेन च संविदम्। गत्वा तस्मै स सिंहाय यथावस्तु शशंस तत्॥६५॥ महोक्षः स त्वया दृष्टः संस्तवश्च कृतो यदि। तदिहानय तं भुक्त्वा तावत्पश्यामि कीदृशः ॥६६॥ इत्युक्त्वा स प्रहृष्टस्तं सिंहः पिङ्गलकस्ततः। वृषस्य प्राहिणोत्तस्य पार्श्वं दमनकं पुनः॥६७॥ एह्याह्वयति तुष्टस्त्वामस्मत्स्वामी मृगाधिपः। इति गत्वा दमनकेनोक्तः स वृषभो भयात् ॥६८॥ यदा न प्रतिपेदे तत्सदा गत्वा पुनर्वनम्। तं निजस्वामिनं सिंहं तस्याभयमदापयत्॥६९॥ एत्याभयेन चाश्वास्य ततः सञ्जीवकं स तम्। वृषभं तं दमनकोऽनयीत् केसरिणोऽन्तिकम् ॥७०॥ स चागतं तं प्रणतं दृष्ट्वा सिंहः कृतादरः। उवाच हैव तिष्ठ त्वं मत्पार्श्वे निर्भयोऽधुना॥७१॥ तथेति तेन तत्रस्थेनाहृतः स तथा क्रमात्। उक्त्या यथान्यविमुखस्तद्गतोऽभूत्स केसरी ॥७२॥ ततो दमनकोऽवादीत्खिन्नः करटकं रहः। पश्य सञ्जीवकवृतः स्वामी नावामवेक्षते ॥७३॥ एक एवामिषं भुङ्क्ते न भागं नौ प्रयच्छति। मूढबुद्धिः प्रभुश्चायमुख्यानेनाथ शिक्ष्यते ॥७४॥ कृतो मयैव दोषोऽस्य यदेवं वृषमानयम्। तत्पाहं करिष्यामि यथोक्षाय विस्रक्ष्यति॥७५॥ मस्यान्मव्यसनाच्चायं निवर्त्स्यति यथा प्रभुः। एतद्दमनकाच्छ्रुत्वा वचः करटकोऽथ सः॥७६॥ सखे न कर्तुमधुना शक्यमेतद्भवताऽपि। ततो दमनकोऽवादीच्छक्ष्यामि प्रज्ञया ध्रुवम् ॥७७॥
दशम लम्बक ७७५
दशम लम्बक ७७५ दमनक के इस प्रकार कहने पर सिंह ने कहा कि 'तुम समर्थ हो तो जाओ। स्वामी से यह सुनकर वह यमुना-तट पर गया ॥६३॥ वहाँ पर जब वह शब्द के अनुसार चुपचाप जा रहा था तब उसने घास चरते हुए एक बैल को देखा ॥६४॥ तब वह उस बैल के पास आकर और उससे बातचीत करके सिंह के पास लौट आया और उसे उसने वास्तविक समाचार दिया ॥६५॥ 'यदि तूने बड़े साँड़ को देखा है और उससे बातचीत की है तो उसे युक्तिपूर्वक समझा बुझाकर यहाँ ले आ। मैं भी देखूँ वह कैसा है ?' ॥६६॥ इस प्रकार कहकर उस प्रसन्न पिंगलक ने दमनक को फिर उस बैल के पास भेजा ॥६७॥ 'आओ आओ हमारा प्रसन्न स्वामी मृगराज तुम्हें बुलाता है। दमनक ने जाकर बैल से इस प्रकार कहा किन्तु उसने भय के कारण विश्वास नहीं किया। तब दमनक ने फिर से वन में जाकर अपने स्वामी सिंह द्वारा उस बैल को अभयदान दिलाया ॥६८-६९॥ और फिर, बैल के पास जाकर उसे अभयदान द्वारा विश्वास दिलाकर और उसे धीरज बँधाकर दमनक बैल को सिंह के पास ले आया ॥७०॥ सिंह ने आये हुए और प्रणाम करते हुए बैल से आदर के साथ कहा—'तुम अब यहाँ मेरे पास निडर होकर रहो' ॥७१॥ 'ठीक है' ऐसा कहकर उसके पास आदर से रहते हुए बैल ने धीरे-धीरे सिंह को इस प्रकार वश में कर लिया कि वह दूसरों से उदासीन हो गया ॥७२॥ तब उपेक्षा के कारण दुःखी दमनक ने एकान्त में करटक से कहा—'देखो संजीवक की ओर खिंचा हुआ स्वामी अब हम दोनों की उपेक्षा करता है ॥७३॥ शिकार मारकर सब मांस अकेले ही खा जाता है, हम लोगों को नहीं देता। आज यह मूर्ख सिंह इस बैल से सिखाया जा रहा है ॥७४॥ यह दोष मेरा ही है कि मैं इस बैल को यहाँ लाया। अब मैं ऐसा करूँगा कि यह बैल नष्ट हो जायगा ॥७५॥ और हमारा स्वामी भी इस अनुचित व्यसन से दूर हो जायगा। दमनक के ये वचन सुनकर करटक बोला—'मित्र अब यह कार्य तुम भी नहीं कर सकते। उसके ऐसा कहने पर दमनक ने कहा—'बुद्धि द्वारा अवश्य कर सकता हूँ' ॥७६-७७॥
७७६ कथासरित्सागर
[Page Header] ७७६ कथासरित्सागर
न स शक्नोति किं यस्य प्रज्ञा नापदि हीयते । तथा च मकरस्तैतां बकहन्तुः कथां शृणु ॥७८॥
बककर्कटयोः कथा
आसीत् कोऽपि बकः पूर्वं मत्स्याढ्ये सरसि क्वचित् । मत्स्यास्तत्र पलायन्त तस्य दृष्टिपथाद्रुमात् ॥७९॥ अप्राप्नुवंश्च मिथ्या तान्स मत्स्यान्ब्रवीद्वकः । इहागतो मत्स्यघाती पुरुषः कोऽपि जालबान् ॥८०॥ स जालेनाचिराद्युष्मान् गृहीत्वा विहनिष्यति । तत्कुरुध्वं मम वचो विश्वासो वोऽस्ति यन्मयि ॥८१॥ अस्त्येकान्ते सरः स्वच्छमज्ञातमिह धीवरैः । एते तत्र निवासाथ नीत्वैकैकं क्षिपामि वः ॥८२॥ तच्छ्रुत्वा समयेरुक्त मत्स्यैस्तैर्जडबुद्धिभिः । एव कुरुष्व विवस्ता वय त्वन्मयसिला इति ॥८३॥ ततो बकस्तानेकैक मत्स्यान् नीत्वा शिलातले। विन्यस्य भक्षयामास स बहून् विप्रलम्भकः ॥८४॥ दृष्ट्वा मीनानमन्तं तं 'मकरस्तत्सरो गतः । एको बक स पप्रच्छ नयसि क्व तिमीमिति ॥८५॥ ततस्त स तदेवाह बको मत्स्यानुवाच यत् । तेन भीतो भयोऽत्रोचत् स मामपि नयति त्वम् ॥८६॥ सोऽपि तन्मांसगर्धान्धबुद्धिरादाय त बकः । उत्पत्य प्रापयति तथावद्यम्यशिलातलम् ॥८७॥ तावत्तज्जग्धमीनास्थिशकला न्यत्र वीक्ष्य सः । त बुध्यते स्म मकरो बक विश्वास्य भक्षकम् ॥८८॥ तत शिलातल न्यस्तमात्रस्तस्य स तत्क्षणम् । बकस्य मकरो धीमांश्चकर्ताविव्हल शिरः ॥८९॥ गत्वा च शेषमत्स्यानां यथावत् स शशंस तत् । तेऽप्याप्यभिननन्दुस्तं तुष्टा प्राणप्रदायिनम् ॥९०॥
[Footnote] १ हितोपदेशे पञ्चतन्त्रादिषु मकरस्थाने कर्कटस्योल्लेखो दृश्यते। स एव च सङ्गत प्रतीपते। मकरस्य बकेन मैत्री तयोश्चाहवं च दुर्घटमेव प्रतीपते।
दशम लम्बक ७७७
दशम लम्बक ७७७ आपत्ति के समय जिसकी बुद्धि नष्ट नहीं होती वह क्या नहीं कर सकता। इस सम्बन्ध में बगुले को मारनेवाले मकर¹ की कथा सुनो ॥७८॥ बगुला और केकड़े की कथा किसी समय मछलियों से भरे हुए तालाब में एक बगुला रहता था। उसके अंगूठ में ग फैले इसलिए मछलियाँ उसकी आँखों से ओझल रहती थीं ॥७९॥ इस प्रकार, उन मछलियों को न पाकर बगुले ने मछलियों से झूठ कहा कि 'यहाँ पर जाल फेंककर कोई मछली मारनेवाला पुरुष आया है। वह शीघ्र ही तुमलोगों को जाल से पकड़कर मार डालेगा। इसलिए, यदि तुम लोगों को मुझपर विश्वास है तो मेरी बात मानो ॥८०-८१॥ यहाँ पर एकान्त में एक तालाब है जिसे धीवर नहीं जानते। तुमलोग रहने के लिए वहाँ चलो। मैं तुमलोगों को एक-एक करके वहाँ पहुँचा दूँगा ॥८२॥ यह सुनकर उन मूर्ख मछलियों ने डरते हुए उससे कहा—'ऐसा ही करो। हम सब तुम्हारे प्रति विश्वास करते हैं' ॥८३॥ तब वह ठग बगुला उन मछलियों को एक-एक करके ले जाकर एक चट्टान पर पटककर खाने लगा। इस प्रकार, धीरे-धीरे वह बहुत-सी मछलियों को खा गया ॥८४॥ मछलियों को इस प्रकार ले जाते हुए बगुले को देखकर उस तालाब में रहनेवाले एक मकर (केकड़े) ने उस बगुले से पूछा कि 'तुम इन मछलियों को कहाँ ले जाते हो ? ॥८५॥ यह सुनकर बगुले ने उसे भी वही उत्तर दिया जो मछलियों को दिया था। तब उस डरे हुए मगरमच्छ (केकड़े) ने भी कहा कि 'मुझे भी ले चलो' ॥८६॥ उसके मांस के लालच से अन्धी बुद्धिवाला बगुला उसे भी लेकर जब मछलियों का वध करनेवाली चट्टान पर पहुँचा तो उन लाई हुई मछलियों के बची और बिखरी हुई हड्डियों के टुकड़ों को देखकर वह मगरमच्छ (केकड़ा) बगुले को विश्वासघाती मयंक समझ गया ॥८७-८८॥ तब उस बुद्धिमान मकर (केकड़े) ने उस बगुले द्वारा चट्टान पर रखते ही बगुले का गला काट लिया ॥८९॥ और, जाकर बची हुई मछलियों को सब समाचार सुनाया। उन सब ने भी प्राणदान देने वाले उसका अभिवादन करके कृतज्ञता स्वीकार की ॥९० ॥ १ पंचतन्त्र में यहाँ केकड़ा लिखा है जो उचित मालूम पड़ता है। अतः, आगे मकर के स्थान पर केकड़ा ही कोष्ठक में लिखा गया है।—अनु ९८
४७८ कथासरित्सागर
४७८ कथासरित्सागर प्रज्ञा नाम बल यस्मात् निष्प्रज्ञस्य बलम् किम् । एतां च सिंहशशयोः कथामत्रापरां शृणु ॥९१॥ सिंहशशकयोः कथा अभूत् क्वापि वने सिंह एकवीरोऽपराजितः । स ध य य ददर्शत्रि सत्त्व त त न्यपातयत् ॥९२॥ ततः सार्डम्यर्थित सर्वै सम्भूयात्र मृगादिभिः । आहाराम तवैकैंक प्रेषयामो दिने दिने ॥९३॥ सर्वांक्षो युगपद्गत्वा स्वार्थहानि करोषि किम् । इति तद्वचन सिंह स सधेत्यन्वमन्यत ॥९४॥ तत प्राणिनमेकैक तस्मिन्नन्वहमश्नति । एकदा शशकस्यागाद्वार एकस्य तत्कृते ॥९५॥ स सर्वै प्रेषितो गच्छञ्छश धीमानचिन्तयत् । स धीरो यो न सम्मोहमापत्कालेऽपि गच्छति ॥९६॥ उपस्थितावपि मृत्यौ समुक्ति तावत्करोम्यहम् । इत्यालोच्य स त सिंह विलम्ब्य शशकोऽभ्यगात् ॥९७॥ आगत तु विलम्बेन केसरी निजगाद सः । अरे वेळा व्यतिक्रान्ता ममाहारे कथ त्वया ॥९८॥ वधादप्यधिकं कि वा कर्त्तव्यं ते मया शठ । इत्युक्तवन्त त सिंह प्रह्व स शशकोऽब्रवीत् ॥९९॥ न मे देवापराधोऽयं स्ववशो नाहमद्य यत् । मार्गे विधार्य सिंहेन द्वितीयेनोज्झितश्चिरात् ॥१ ०॥ तच्छ्रुत्वास्यास्य लाङ्गूलं सिंह क्रोधारुणेक्षणः । सोऽब्रवीत्को द्वितीयोऽसौ सिंहो मे दर्शयतां त्वया ॥१०१॥ आगत्य दृश्यतां देवत्युक्त्वा सोऽपि निनाय तम् । सद्येत्यन्वागत सिहं दूरं कूपान्तिक पथि ॥१०२॥ इहान्त स्थं स्थित पश्येत्युक्तस्तत्र च तेन सः । शशकेन कुभा गर्जत्सिहोऽन्त कूपमैक्षत ॥१०३॥ दृष्ट्वा स्तब्धे च तोये स्व प्रतिबिम्ब निशम्य च । स्वगर्जितप्रतिरव मत्वा तत्रातिगर्जितम् ॥१ ४॥
क्या लाभ ? इस सम्बन्ध में भी सिंह और शश (खरगोश) की एक कथा सुनो ॥९१॥
इसलिए बुद्धि ही वास्तविक बल है। बुद्धिहीन व्यक्ति के पास बल होने पर भी उससे क्या लाभ ? इस सम्बन्ध में भी सिंह और शश (खरगोश) की एक कथा सुनो ॥९१॥
सिंह और शश की कथा
किसी जङ्गल में एकमात्र वीर और अपराजित सिंह रहता था। वह जंगल में जिस-जिस जीव को देखता था उसे मार डालता था ॥९२॥ तब एक बार जंगल के सभी मृग आदि पशुओं ने एकत्र होकर, उससे प्रार्थना की कि हमलोग तुम्हारे भोजन के लिए प्रतिदिन एक-एक जीव को भेजेंगे। एक साथ ही हम सब को मारकर तुम अपने ही स्वार्थ की हानि क्यों करते हो ? उन लोगों के इस प्रस्ताव को सिंह ने 'ठीक है' कहकर मान लिया ॥९३-९४॥ इस निश्चय के पश्चात् एक-एक जीव को प्रतिदिन जब वह खा रहा था तब एक दिन उसके लिए एक शश (खरगोश) की बारी आई ॥९५॥ सब जानवरों से भेजे गये उस शश ने जाते हुए सोचा कि धीर व्यक्ति वही है जो आपत्ति काल में भी नहीं घबराता ॥९६॥ इसलिए, अब मृत्यु के सिर पर मँडराते हुए भी एक युक्ति करता हूँ। ऐसा सोचकर वह शश देर करके सिंह के पास पहुँचा ॥९७॥ विलम्ब से आए हुये उसे देखकर सिंह बोला-'क्यों रे, तूने आज मेरे भोजन का समय क्यों बिता दिया ? अरे दुष्ट क्षुध करने न मिला और मैं तेरा भक्ष कर ही क्या सकता हूँ। इस प्रकार कहते हुए उस सिंह से वह विनम्र शश (खरगोश—बोला) ॥९८-९९॥ 'हे स्वामी मेरा दोष नहीं है। आज मैं अपने वश में नहीं रह गया था। आते हुए मार्ग में मुझे दूसरे सिंह ने देर तक रोकने के बाद छोड़ा ॥१००॥ यह सुनकर पूँछ को उठाकर हिलाता हुआ और कोप से आँखें लाल करके गुर्रारता हुआ वह सिंह बोला—'वह कौन दूसरा सिंह है ? तू उसे मुझे दिखा' ॥१०१॥ 'स्वामी आकर देखिए। यह कहकर पीछे आते हुए सिंह को वह शश उसे एक कुएँ के पास ले गया ॥१०२॥ और बोला—'इस कुएँ के अन्दर बैठे हुए उसे देखो। शश के ऐसा कहने पर सिंह ने कुएँ के भीतर देखा और स्वच्छ जल में अपनी परछाई को देखकर, अपनी गर्जना की प्रति ध्वनि को ही दूसरे सिंह की अपने से भी तेज गर्जना समझ ली ॥१०३-१०४॥
१ पञ्चतन्त्र में इस कथा का प्रारम्भ इस प्रकार होता है— बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्। पश्य सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः॥