भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

४५४ * कूर्मपुराण *


दन्तोलूखलिनस्त्वन्ये ह्मश्मकुट्टास्तथा परे।
शाकपर्णाशिनः केचित् सम्प्रक्षाला मरीचिपाः ॥ ९६ ॥
वृक्षमूलनिकेताश्च शिलाशय्यास्तथा परे।
कालं नयन्ति तपसा पूजयन्तो महेश्वरम् ॥ ९७ ॥
ततस्तेषां प्रसादार्थं प्रपन्नार्तिहरो हरः।
चकार भगवान् बुद्धिं प्रबोधाय वृषध्वजः ॥ ९८ ॥

देवः कृतयुगे ह्यस्मिन् शृङ्गे हिमवतः शुभे।
देवदारुवनं प्राप्तः प्रसन्नः परमेश्वरः ॥ ९९ ॥

भस्मपाण्डुरदिग्धाङ्गो नग्नो विकृतलक्षणः।
उल्मुकव्यग्रहस्तश्च रक्तपिङ्गललोचनः ॥ १०० ॥
क्वचिच्च हसते रौद्रं क्वचिद् गायति विस्मितः।
क्वचिन्नृत्यति शृङ्गारी क्वचिद् रौति मुहुर्मुहुः ॥ १०१ ॥

आश्रमेऽभ्यागतो भिक्षां याचते च पुनः पुनः।
मायां कृत्वात्मनो रूपं देवस्तद् वनमागतः ॥ १०२ ॥

कृत्वा गिरिसुतां गौरीं पार्श्वे देवः पिनाकधृक्।
सा च पूर्ववद् देवेशी देवदारुवनं गता ॥ १०३ ॥
दृष्ट्वा समागतं देवं देव्या सह कपर्दिनम्।
प्रणेमुः शिरसा भूमौ तोषयामासुरीश्वरम् ॥ १०४ ॥

वैदिकैर्विविधैर्मन्त्रैः सूक्तैर्माहेश्वरैः शुभैः।
अथर्वशिरसा चान्ये रुद्राद्यैर्ब्रह्मभिर्भवम् ॥ १०५ ॥


कुछ दूसरे दन्तोलूखली अर्थात् दाँतोंके ही द्वारा अनाजको तुष (भूसी) आदिसे रहितकर बिना पकाये खा लेते थे, कुछ दूसरे पत्थरपर ही अन्नको कूटकर खा लेते थे*। कुछ शाक तथा पत्तोंका ही भोजन करते थे, कुछ लोग एक समय भोजन करके अङ्गोंकी चिन्ता (शारीरिक सौष्ठव आदिकी चिन्ता) नहीं रखते थे, कुछ लोग स्नानपरायण एवं कुछ लोग सूर्य-किरणोंका ही पान करते थे। कुछ लोग वृक्षके नीचे रहते थे, दूसरे शिलारूपी शय्यापर ही सोते थे। इस प्रकार तपस्या (विविधाके) द्वारा महेश्वरकी पूजा करते हुए वे (मुनिजन) समय व्यतीत कर रहे थे॥ ९६-९७॥

(मुनियोंको इस प्रकार पश्चात्तापपूर्वक तपस्यामें निरत देखकर) उनकी व्याकुलता दूर करनेके लिये शरणागतोंके दुःखहर्ता भगवान् वृषध्वज हरने उन्हें प्रबोधित (मोहमुक्त) करनेका विचार किया। इसलिये प्रसन्न परमेश्वर वे देव (शंकर) सत्ययुगमें हिमालयके इस शुभ शिखरपर स्थित देवदारु-वनमें पुनः आये। उनके सारे अङ्ग भस्मसे उपलिप्त होनेके कारण श्वेत वर्णके थे, नग्न थे, विकृत लक्षणवाले थे, हाथमें उल्मुक (जलती लकड़ी) लेकर उसे घुमा रहे थे और उनके नेत्र लाल तथा पिंगलवर्णके थे॥ ९८–१००॥

कभी वे भयंकर रूपसे हँसते, कभी आश्चर्ययुक्त हो गान करने लगते, कभी शृंगारपूर्वक नृत्य करने लगते और कभी बार-बार रोने लगते। (इस स्थितिमें भगवान्) महादेव आश्रममें आकर बार-बार भिक्षा माँगने लगे। इस प्रकार अपना मायामय रूप बनाकर वे देव (शंकर) उस (देवदारु) वनमें विचरने लगे और उन पिनाकधारी देवने पर्वतपुत्री गौरीको अपने पार्श्वभागमें कर लिया था। वे देवेशी पूर्वके समान ही देवदारु-वनमें महादेवके साथ आयीं॥ १०१-१०३॥

देवीके साथ कपर्दी (शंकर) देवको आया देखकर उन्होंने (मुनियोंने) भूमिमें सिर रखकर ईश्वरको प्रणाम किया और स्तुति की। वे विविध वैदिक मन्त्रों, शुभ माहेश्वर सूक्तों, अथर्वशिरस् तथा अन्य रुद्रसम्बन्धी वेदमन्त्रोंसे शंकरकी स्तुति करने लगे— ॥ १०४-१०५ ॥


* भोज्य अन्नकी स्वादिष्टताके प्रति अनासक्त होनेसे अन्नके परिष्कारके साधन उलूखल तथा सिलको उपयोगमें नहीं लाते थे। (इनके उपयोगमें हिंसा भी होती है, इसलिये तपस्वी लोग विशेषरूपसे इनका वर्जन करते हैं।)

* अध्याय ३७ *

४५५

नमो देवादिदेवाय महादेवाय ते नमः।<br>त्र्यम्बकाय नमस्तुभ्यं त्रिशूलवरधारिणे ॥ १०६ ॥देवोंके आदिदेवको नमस्कार है। महादेव ! आपको नमस्कार है। श्रेष्ठ त्रिशूल धारण करनेवाले त्र्यम्बक ! आपको नमस्कार है। दिगम्बर, (स्वेच्छासे) विकृत (रूप धारण करनेवाले) तथा पिनाकी आपको नमस्कार है। समस्त प्रणतजनोंके आश्रय तथा स्वयं निराश्रय (निरधिष्ठान देव)-को नमस्कार है। अन्त करनेवाले (यम)-का भी अन्त करनेवाले और सबका संहार करनेवाले आपको नमस्कार है। नृत्यपरायण और भैरवरूप आपको नमस्कार है। नर-नारी शरीरवाले (अर्धनारीश्वर) एवं योगियोंके गुरु आपको नमस्कार है। दान्त, शान्त, तापस (विरक्त) तथा हरको नमस्कार है। अत्यन्त भीषण, चर्माम्बरधारी रुद्रको नमस्कार है। लेलिहानको नमस्कार है, शितिकण्ठको नमस्कार है। अघोर तथा घोर रूपवाले वामदेवको नमस्कार है। धतूरेकी माला धारण करनेवाले और देवीके प्रियकर्ताको नमस्कार है। गङ्गाजलकी धाराको धारण करनेवाले परमेष्ठी शम्भुको नमस्कार है। योगाधिपतिको नमस्कार है तथा ब्रह्माधिपतिको नमस्कार है ॥ १०६-११२ ॥
नमो दिग्वाससे तुभ्यं विकृताय पिनाकिने।<br>सर्वप्रणतदेहाय स्वयमप्रणतात्मने ॥ १०७ ॥
अन्तकान्तकृते तुभ्यं सर्वसंहरणाय च।<br>नमोऽस्तु नृत्यशीलाय नमो भैरवरूपिणे ॥ १०८ ॥
नरनारीशरीराय योगिनां गुरवे नमः।<br>नमो दान्ताय शान्ताय तापसाय हराय च ॥ १०९ ॥
विभीषणाय रुद्राय नमस्ते कृत्तिवाससे।<br>नमस्ते लेलिहानाय शितिकण्ठाय ते नमः ॥ ११० ॥
अघोरघोररूपाय वामदेवाय वै नमः।<br>नमः कनकमालाय देव्याः प्रियकराय च ॥ १११ ॥
गङ्गासलिलधाराय शम्भवे परमेष्ठिने।<br>नमो योगाधिपतये ब्रह्माधिपतये नमः ॥ ११२ ॥
प्राणाय च नमस्तुभ्यं नमो भस्माङ्गरागिणे।<br>नमस्ते घनवाहाय दंष्ट्रिणे वह्निरेतसे ॥ ११३ ॥भस्मका अङ्गराग लगानेवाले प्राणरूप आपको बार-बार नमस्कार है। घनवाह<sup></sup>! दंष्ट्री तथा वह्निरेतसको<sup></sup> नमस्कार है। ब्रह्माके सिरका हरण करनेवाले कालरूपको नमस्कार है। हम आपके न आगमनको जानते हैं और न गमनको ही जानते हैं। विश्वेश्वर ! महादेव ! आप जिस रूपमें हैं, उसी रूपमें आपको नमस्कार है। प्रमथनाथ तथा शुभ सम्पदा देनेवालेको नमस्कार है। हाथमें कपाल<sup></sup> धारण करनेवाले आपको तथा आप मीढुष्टम—शिवलिङ्ग-विग्रहको नमस्कार है। कनकलिङ्ग<sup></sup> और वारिलिङ्ग<sup></sup> आपको नमस्कार है। अग्नि तथा सूर्यस्वरूप लिङ्गवालेको नमस्कार है, ज्ञानलिङ्ग ! आपको नमस्कार है। सर्पोंकी मालावाले और कर्णिकारप्रिय<sup></sup> आपको नमस्कार है। किरीटी, कुण्डल धारण करनेवाले तथा कालके भी काल आपको नमस्कार है ॥ ११३-११६ ॥
ब्रह्मणश्च शिरोहर्त्रे नमस्ते कालरूपिणे।<br>आगतिं ते न जानीमो गतिं नैव च नैव च।<br>विश्वेश्वर महादेव योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते ॥ ११४ ॥
नमः प्रमथनाथाय दात्रे च शुभसम्पदाम्।<br>कपालपाणये तुभ्यं नमो मीढुष्टमाय ते।<br>नमः कनकलिङ्गाय वारिलिङ्गाय ते नमः ॥ ११५ ॥
नमो वह्न्यर्कलिङ्गाय ज्ञानलिङ्गाय ते नमः।<br>नमो भुजंगहाराय कर्णिकारप्रियाय च।<br>किरीटिने कुण्डलिने कालकालाय ते नमः ॥ ११६ ॥

१-मेघ शंकरके वाहन हैं, इसलिये वे 'घनवाहन' हैं।
२-भगवान् शंकरके वीर्यसे स्वर्णकी उत्पत्ति हुई है और स्वर्ण वह्निका ही एक रूप है, इसलिये भगवान् शंकरको 'वह्निरता' कहते हैं।
३-ब्रह्माके सिर-हरणकी कथा पिछले अध्यायमें आयी है।
४-वह्नि महादेवकी मूर्ति है और वह्निका ही रूप कनक (स्वर्ण) है, इसीलिये महादेवको 'कनकलिङ्ग' कहते हैं।
५-जल भी भगवान् महादेवकी मूर्ति है, इसलिये महादेवको वारि (जल)-की मूर्ति कहते हैं।
६-कर्णिकार पुष्पविशेषका नाम है।

४५६* कूर्मपुराण *
वामदेव महेशान देवदेव त्रिलोचन।<br>क्षम्यतां यत्कृतं मोहात् त्वमेव शरणं हि नः॥ ११७॥<br>चरितानि विचित्राणि गुह्यानि गहनानि च।<br>ब्रह्मादीनां च सर्वेषां दुर्विज्ञेयोऽसि शंकर॥ ११८॥<br>अज्ञानाद् यदि वा ज्ञानाद् यत्किंचित् कुरुते नरः।<br>तत्सर्वं भगवान्नेव कुरुते योगमायया॥ ११९॥<br>एवं स्तुत्वा महादेवं प्रहृष्टेनान्तरात्मना।<br>ऊचुः प्रणम्य गिरिशं पश्यामस्त्वां यथा पुरा॥ १२०॥<br>तेषां संस्तवमाकर्ण्य सोमः सोमविभूषणः।<br>स्वमेव परमं रूपं दर्शयामास शंकरः॥ १२१॥<br>तं ते दृष्ट्वा गिरिशं देव्या सह पिनाकिनम्।<br>यथा पूर्वं स्थिता विप्राः प्रणेमुर्हृष्टमानसाः॥ १२२॥<br>ततस्ते मुनयः सर्वे संस्तूय च महेश्वरम्।<br>भृग्वङ्गिरोवसिष्ठास्तु विश्वामित्रस्तथैव च॥ १२३॥<br>गौतमोऽत्रिः सुकेशश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः।<br>मरीचिः कश्यपश्चापि संवर्तश्च महातपाः।<br>प्रणम्य देवदेवेशमिदं वचनमब्रुवन्॥ १२४॥<br>कथं त्वां देवदेवेश कर्मयोगेन वा प्रभो।<br>ज्ञानेन वाथ योगेन पूजयामः सदैव हि॥ १२५॥<br><br>केन वा देवमार्गेण सम्पूज्यो भगवानिह।<br>किं सेव्यमसेव्यं वा सर्वमेतद् ब्रवीहि नः॥ १२६॥<br>देवदेव उवाच<br>एतद् वः सम्प्रवक्ष्यामि गूढं गहनमुत्तमम्।<br>ब्रह्मणे कथितं पूर्वमादावेव महर्षयः॥ १२७॥<br>सांख्ययोगो द्विधा ज्ञेयः पुरुषाणां हि साधनम्।<br>योगेन सहितं सांख्यं पुरुषाणां विमुक्तिदम्॥ १२८॥<br><br>न केवल्रेन योगेन दृश्यते पुरुषः परः।<br>ज्ञानं तु केवलं सम्यगपवर्गफलप्रदम्॥ १२९॥<br><br>भवन्तः केवलं योगं समाश्रित्य विमुक्तये।<br>विहाय सांख्यं विमलमकुर्वन्त परिश्रमम्॥ १३०॥<br><br>एतस्मात् कारणात् विप्रा नृणां केवलधर्मिणाम्।<br>आगतोऽहमिमं देशं ज्ञापयन् मोहसम्भवम्॥ १३१॥वामदेव! त्रिलोचन! महेशान! देवाधिदेव! मोहवश हमने जो किया, उसे आप क्षमा करें। हम सभी आपकी शरणमें हैं। आपके चरित्र विचित्र, गहन तथा गुह्य हैं। शंकर! आप ब्रह्मा आदि सभीके लिये दुर्विज्ञेय हैं। मनुष्य ज्ञान अथवा अज्ञानसे जो कुछ भी करता है, वह सब आप भगवान् ही अपनी योगमायासे करते हैं। इस प्रकार महादेवकी स्तुतिकर प्रसन्न-मनसे (मुनियोंने) उनको प्रणाम किया और कहा—हम लोग आपको पूर्वरूपमें देखना चाहते हैं॥ ११७-१२०॥<br>उनकी (मुनियोंकी इस) स्तुतिको सुनकर चन्द्रभूषण सोम शंकरने अपने परम रूपका दर्शन (उन्हें) कराया। उन पिनाकी गिरिशको देवी (पार्वती)-के साथ पहले-जैसे (मङ्गलमय) रूपमें स्थित देखकर प्रसन्न-मनवाले ब्राह्मणोंने उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ तथा विश्वामित्र, गौतम, अत्रि, सुकेश, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरीचि, कश्यप तथा महातपस्वी संवर्त आदि सभी ऋषियोंने महेश्वरकी स्तुतिकर उन देवदेवेशको प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—॥ १२१-१२४॥<br>देवदेवेश! प्रभो! हम सब किस प्रकारसे आपकी सदा पूजा करें, कर्मयोग या ज्ञानयोगसे? किस देवमार्ग (प्रशस्त मार्ग)-के द्वारा भगवान्की पूजा करनी चाहिये, हम लोगोंके लिये क्या सेवनीय है, क्या असेवनीय है, यह सब आप हमें बतलायें॥ १२५-१२६॥<br>देवदेवने कहा—महर्षियो! मैं आप लोगोंको यह उत्तम और गम्भीर रहस्य बतलाता हूँ। पूर्वकालमें (मैंने) इसे ब्रह्माजीको बतलाया था॥ १२७॥<br>पुरुषोंके लिये साधनस्वरूप दो प्रकारका सांख्ययोग समझना चाहिये। योगसहित (कर्मयोगसहित अर्थात् अनासक्त-भावसे कर्मनिष्ठाके साथ) सांख्य (ज्ञाननिष्ठा) पुरुषोंको मुक्ति प्रदान करनेवाला है। केवल योगके द्वारा परम पुरुषका दर्शन नहीं होता। (शुद्ध) ज्ञान (ज्ञाननिष्ठा) भलीभाँति केवल मोक्षफलको देनेवाला है। आप लोग मुक्ति प्राप्त करनेके लिये विमल सांख्यका परित्याग करके केवल योगका ही अवलम्बनकर परिश्रम कर रहे थे। ब्राह्मणो! इसी कारणसे केवल धर्म करनेवाले (कर्ममात्रनिष्ठ-कर्मव्यसनी) मनुष्योंको मोह उत्पन्न होता है, यह बतानेके लिये मैं इस स्थानपर आया हूँ॥ १२८-१३१॥
  • अध्याय ३७ * ४५७

तस्माद् भवद्भिर्विमलं ज्ञानं कैवल्यसाधनम् ।
ज्ञातव्यं हि प्रयत्नेन श्रोतव्यं दृश्यमेव च ॥ १३२ ॥
अतः आप लोगोंको मोक्षके साधनरूप विशुद्ध ज्ञानको प्रयत्नपूर्वक जानना, सुनना तथा उसका साक्षात्कार करना चाहिये ॥ १३२ ॥

एकः सर्वत्रगो ह्यात्मा केवलश्चितिमात्रकः ।
आनन्दो निर्मलो नित्यं स्यादेतत् सांख्यदर्शनम् ॥ १३३ ॥

एतदेव परं ज्ञानमेष मोक्षोऽत्र गीयते ।
एतत् कैवल्यममलं ब्रह्मभावश्च वर्णितः ॥ १३४ ॥

आश्रित्य चैतत् परमं तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
पश्यन्ति मां महात्मानो यतयो विश्वमीश्वरम् ॥ १३५ ॥
आत्मा सर्वत्र व्याप्त, विशुद्ध, चिन्मात्र, आनन्द, निर्मल, नित्य तथा एक है। यही सांख्य (ज्ञाननिष्ठाका) दर्शन है। यही परम ज्ञान है, इसीको यहाँ मोक्ष कहा गया है। यही निर्मल मोक्ष है और यही शुद्ध ब्रह्मभाव बताया गया है। इस परम (ज्ञान)-का आश्रय ग्रहणकर उसमें ही निष्ठा रखते हुए और उसीके परायण रहते हुए महात्मा तथा यतिजन मुझ विश्वरूप ईश्वरका दर्शन करते हैं ॥ १३३-१३५ ॥

एतत् तत् परमं ज्ञानं केवलं सन्निरञ्जनम् ।
अहं हि वेद्यो भगवान् मम मूर्तिरियं शिवा ॥ १३६ ॥

बहूनि साधनानीह सिद्धये कथितानि तु ।
तेषामभ्यधिकं ज्ञानं मामकं द्विजपुंगवाः ॥ १३७ ॥
यही वह सत्, निरञ्जन तथा अद्वितीय परम ज्ञान है। मुझे ही भगवान् जानना चाहिये और यह शिवा मेरी ही मूर्ति है। श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! सिद्धिके लिये यहाँ (शास्त्रोंमें) बहुतसे साधन बताये गये हैं, किंतु उनमें मेरे विषयका ज्ञान सर्वश्रेष्ठ है ॥ १३६-१३७ ॥

ज्ञानयोगरताः शान्ता मामेव शरणं गताः ।
ये हि मां भस्मनिरता ध्यायन्ति सततं हृदि ॥ १३८ ॥

मद्भक्तिपरमा नित्यं यतयः क्षीणकल्मषाः ।
नाशयाम्यचिरात् तेषां घोरं संसारसागरम् ॥ १३९ ॥
भस्म धारण करनेवाले, (संसारकी निःसारताको हृदयसे समझनेवाले) ज्ञानयोगपरायण, शान्त और मेरे ही शरणमें आये हुए जो लोग हृदयमें निरन्तर मेरा ही ध्यान करते हैं और नित्य मेरी परम भक्तिमें तत्पर हैं, कल्मषोंसे रहित एवं पूर्ण संयत हैं, उन लोगोंके घोर संसाररूपी सागरको मैं शीघ्र ही नष्ट कर देता हूँ ॥ १३८-१३९ ॥

प्रशान्तः संयतमना भस्मोद्धूलितविग्रहः ।
ब्रह्मचर्यरतो नग्नो व्रतं पाशुपतं चरेत् ॥ १४० ॥

निर्मितं हि मया पूर्वं व्रतं पाशुपतं परम् ।
गुह्याद् गुह्यतमं सूक्ष्मं वेदसारं विमुक्तये ॥ १४१ ॥
भस्मसे धूसरित शरीरवाला होकर संयतमन तथा शान्त होकर, ब्रह्मचर्यव्रत-परायण होते हुए वस्त्रादि परिधानकी आसक्तिसे रहित होकर पाशुपत-व्रतका पालन करना चाहिये। मुक्तिप्राप्तिके लिये मैंने पूर्वकालमें गुह्यसे भी गुह्यतम, वेदके साररूप, सूक्ष्म एवं श्रेष्ठ पाशुपत-व्रतका उपदेश किया था ॥ १४०-१४१ ॥

यद वा कौपीनवसनः स्याद् वैकवसनो मुनिः ।
वेदाभ्यासरतो विद्वान् ध्यायेत् पशुपतिं शिवम् ॥ १४२ ॥

एष पाशुपतो योगः सेवनीयो मुमुक्षुभिः ।
भस्मच्छन्नैर्हि सततं निष्कामैरिति विश्रुतिः ॥ १४३ ॥

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवोऽनेन योगेन पूता मद्भावमागताः ॥ १४४ ॥
अथवा कौपीन वस्त्र या एक वस्त्र धारणकर विद्वान् मुनिको वेदाभ्यासमें रत रहते हुए पशुपति शिवका (सतत) ध्यान करना चाहिये। मोक्षकी अभिलाषावाले मुमुक्षुजनोंको सतत भस्मसे उपलिप्त रहकर निष्कामभावसे इस पाशुपतयोगका सेवन करना चाहिये। ऐसा श्रुतिका कथन है। राग, भय तथा क्रोधसे सर्वथा रहित, मुझे ही सर्वस्व समझनेवाले और मेरा ही आश्रय ग्रहण करनेवाले बहुतसे (भक्तजन) इस योगके द्वारा पवित्र होकर मेरे भावको प्राप्त हुए हैं ॥ १४२-१४४ ॥

४५८ * कूर्मपुराण *


अन्यानि चैव शास्त्राणि लोकेऽस्मिन् मोहनानि तु।<br>वेदवादविरुद्धानि मयैव कथितानि तु॥ १४५॥<br><br>वामं पाशुपतं सोमं लाकुलं चैव भैरवम्।<br>असेव्यमेतत् कथितं वेदबाह्यं तथेतरम्॥ १४६॥<br><br>वेदमूर्तिरहं विप्रा नान्यशास्त्रार्थवेदिभिः।<br>ज्ञायते मत्स्वरूपं तु मुक्त्वा वेदं सनातनम्॥ १४७॥<br><br>स्थापयध्वमिदं मार्गं पूजयध्वं महेश्वरम्।<br>अचिरादैश्वरं ज्ञानमुत्पत्स्यति न संशयः॥ १४८॥<br><br>मयि भक्तिश्च विपुला भवतामस्तु सत्तमाः।<br>ध्यातमात्रो हि सांनिध्यं दास्यामि मुनिसत्तमाः॥ १४९॥<br><br>इत्युक्त्वा भगवान् सोमस्तत्रैवान्तरधीयत।<br>तेऽपि दारुवने तस्मिन् पूजयन्ति स्म शंकरम्।<br>ब्रह्मचर्यरताः शान्ता ज्ञानयोगपरायणाः॥ १५०॥इस संसारमें मोहित करनेवाले तथा वेदमतका विरोध करनेवाले अन्य भी शास्त्र हैं, वे मेरे द्वारा ही कहे गये हैं। वाम (मार्ग), पाशुपत, सोम, लाकुल तथा भैरव (मार्ग) तथा अन्य—ये असेव्य और वेदबाह्य कहे गये हैं॥ १४५-१४६॥<br><br>ब्राह्मणो! मैं वेदमूर्ति हूँ। सनातन वेदका परित्यागकर दूसरे शास्त्रको जाननेवाले लोग मेरे स्वरूपको नहीं जान सकते। (अतः आप लोग) इस मार्गकी स्थापना करें, महेश्वरकी पूजा करें (इससे) शीघ्र ही आप लोगोंको ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त होगा, इसमें संशय नहीं है। श्रेष्ठ जनो! आप सभीकी मुझमें महान् भक्ति हो। श्रेष्ठ मुनियो! ध्यान करनेमात्रसे मैं आपको अपना सांनिध्य प्रदान करूँगा॥ १४७-१४९॥<br><br>इतना कहकर भगवान् सोम (शंकर) वहींपर अन्तर्धान हो गये। वे शान्त महर्षि भी ब्रह्मचर्यपरायण होकर, ज्ञानयोग-परायण रहते हुए उस दारुवनमें शंकरकी पूजा करने लगे। उन ब्रह्मवादी महात्मा मुनिगणोंने (स्वयं मोहरहित हो जानेके कारण) एकत्रित होकर अध्यात्मज्ञान-सम्बन्धी बहुतसे सिद्धान्तोंका विस्तार किया॥ १५०-१५१॥
समेत्य ते महात्मानो मुनयो ब्रह्मवादिनः।<br>वितेनिरे बहून् वादानध्यात्मज्ञानसंश्रयान्॥ १५१॥<br><br>किमस्र्य जगतो मूलमात्मा चास्माकमेव हि।<br>कोऽपि स्यात् सर्वभावानां हेतुरीश्वर एव च॥ १५२॥<br><br>इत्येवं मन्यमानानां ध्यानमार्गावलम्बिनाम्।<br>आविरासीन्महादेवी देवी गिरिवरात्मजा॥ १५३॥<br><br>कोटिसूर्यप्रतीकाशा ज्वालामालासमावृता।<br>स्वभाभिर्विमलाभिस्तु पूरयन्ती नभस्तलम्॥ १५४॥इस जगत्का मूल (कारण) क्या है? (उत्तर—) हमारी आत्मा ही इस जगत्का मूल है। सभी भाव पदार्थोंका हेतु कौन है? (उत्तर—) ईश्वर ही सभी भावोंका जनक है। इस प्रकारकी दृढ़ धारणाके साथ ध्यानमार्गका अवलम्बन करनेवाले उन महर्षियोंके समक्ष श्रेष्ठ पर्वत (हिमालय)-की पुत्री महादेवी पार्वती प्रकट हुईं॥ १५२-१५३॥<br><br>करोड़ों सूर्यके समान, ज्वालामालाओं (तेजो-राशि)-से समावृत वे अपनी विमल प्रभासे आकाशमण्डलको आपूरित कर रही थीं। हजारों ज्वालाओं (तेजोमण्डल)-के मध्यमें प्रतिष्ठित, अतुलनीय, अद्वितीय, सम्पूर्ण जगत्के ईश (शंकर)-की पत्नी, उन गिरिजाका दर्शनकर मुनियोंने उन्हें प्रणाम किया। क्योंकि वे जानते हैं कि ये ही परमेश्वरी परमेश्वर महेश्वरकी मूलशक्ति (बीज) हैं॥ १५४-१५५॥
तामन्वपश्यन् गिरिजाममेयां<br>ज्वालासहस्रान्तरसंनिविष्टाम् ।<br>प्रणेमुरेकामखिलेशपत्नीं<br>जानन्ति ते तत् परमस्य बीजम्॥ १५५॥
* अध्याय ३७ *४५९
अस्माकमेषा परमेशपत्नी<br>गतिस्तथात्मा गगनाभिधाना।<br>पश्यन्त्यथात्मानमिदं च कृत्स्नं<br>तस्यामथैते मुनयश्च विप्राः॥ १५६॥अनन्तर उन लोगोंने ऐसी भावना की—ये ही परमेश-पत्नी हम सबकी गति हैं, आत्मा हैं, इन्हें गगन (आकाश) नामसे कहा जाता है, (क्योंकि ये महादेवी वस्तुगत्या निराकार तथा परम व्यापक हैं, अतएव परम अवकाशस्वरूप सर्वाधिष्ठान होनेसे कथंचित् आकाशके द्वारा तुलनीय हैं और परब्रह्मका व्योम (आकाश) नाम है ही तथा इन महादेवी एवं परब्रह्ममें सर्वथा अभेद है।) समस्त मुनि एवं समस्त विप्र इन्हींमें अपनेको तथा समस्त प्रपञ्चको देखते हैं। (मुनियोंके इस पवित्र भावसे संतुष्ट होकर) परमेश्वरकी पत्नी (पार्वती)-ने उन्हें (विशेषरूपसे) देखा। इसी बीच (मुनियोंने) सभीके मूल कारण, नियामक, पुराण पुरुष, बृहत् एवं रुद्रात्मक कवि, देव शम्भु (महादेव)-का दर्शन किया। तदनन्तर देवी (पार्वती) तथा देव (शंकर)-को देखकर उन्होंने (मुनियोंने) प्रणाम किया, उत्तम आनन्द प्राप्त किया और उनमें भगवान् (परमेश)-की कृपासे जन्मके विनाशके हेतुरूप अर्थात् पुनर्जन्म न करानेवाले ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञानका आविर्भाव हुआ॥ १५६-१५८॥
निरीक्षितास्ते परमेशपत्न्या<br>तदन्तरे देवमशेषहेतुम्।<br>पश्यन्ति शम्भुं कविमीशितारं<br>रुद्रं बृहन्तं पुरुषं पुराणम्॥ १५७॥
आलोक्य देवीमथ देवमीशं<br>प्रणेमुरानन्दमवापुरग्र्यम् ।<br>ज्ञानं तदैशं भगवत्प्रसादा-<br>दाविर्बभौ जन्मविनाशहेतु ॥ १५८॥
इयं हि सा जगतो योनिरैका<br>सर्वात्मिका सर्वनियामिका च।<br>माहेश्वरीशक्तिरनादिसिद्धा<br>व्योमाभिधाना दिवि राजतीव॥ १५९॥(इस ज्ञानके आविर्भावके साथ ही मुनियोंने यह अनुभव किया) ये ही देवी जगत्की एकमात्र मूल कारण, सर्वात्मिका, सबका नियन्त्रण करनेवाली तथा अनादिसिद्ध व्योम नामवाली माहेश्वरी शक्ति हैं, जो द्युलोकमें शोभित होती हुई प्रतीत हो रही हैं। देवाधिदेव महान् परमेष्ठी, परसे भी पर, अद्वितीय रुद्र महेश्वर शिवने इसी परम शक्ति (महादेवी)-में अंशरूपसे विद्यमान मायाका आश्रय ग्रहणकर विश्वकी सृष्टि की॥ १५९-१६०॥
अस्यां महत्परमेष्ठी परस्ता-<br>न्महेश्वरः शिव एकोऽथ रुद्रः।<br>चकार विश्वं परशक्तिनिष्ठां<br>मायामथारुह्य स देवदेवः॥ १६०॥
एको देवः सर्वभूतेषु गूढो<br>मायी रुद्रः सकलो निष्कलश्च।<br>स एव देवी न च तद्विभिन्न-<br>मेतज्ज्ञात्वा ह्यमृतत्वं व्रजन्ति॥ १६१॥ये देव ही सभी प्राणियोंमें गूढ़रूपसे प्रतिष्ठित हैं अर्थात् सर्वत्र सूक्ष्मरूपसे व्याप्त हैं। वे मायी (मायाके नियन्ता) रुद्र सकल (साकार) तथा निष्कल (निराकार) हैं। वे ही देवी (रूप) हैं, उनसे भिन्न (जगत्में और कुछ भी) नहीं है, ऐसा जानकर अमृतत्वकी प्राप्ति होती है। इधर भर्ग (वरेण्य तेजोरूप), देवाधिदेव, भगवान् परमेश मुनियोंके मोहको दूरकर तथा उन्हें परमज्ञानसे सम्पन्न कर महादेवीके साथ अन्तर्हित हो गये और एकमात्र अरण्यको ही अपना घर माननेवाले वे परम ज्ञानी मुनि लोग उन परम देव रुद्रकी आराधनामें दत्तचित्त हो गये॥ १६१-१६२॥
अन्तर्हितोऽभूद् भगवानथेशो<br>देव्या भर्गः सह देवादिदेवः।<br>आराधयन्ति स्म तमेव देवं<br>वनौकसस्ते पुनरेव रुद्रम्॥ १६२॥

४६० * कूर्मपुराण *

एतद् वः कथितं सर्वं देवदेवविचेष्टितम्।<br>देवदारुवने पूर्वं पुराणे यन्मया श्रुतम्॥ १६३॥<br><br>यः पठेच्छृणुयान्नित्यं मुच्यते सर्वपातकैः।<br>श्रावयेद् वा द्विजान् शान्तान् स याति परमां गतिम्॥ १६४॥इस तरह प्राचीन कालमें देवदारु-वनमें घटित देवाधिदेवका जो वृत्तान्त मैंने पुराणमें सुना था, वह आप लोगोंको बता दिया। जो नित्य इसका पाठ करेगा अथवा श्रवण करेगा, वह सभी पातकोंसे मुक्त हो जायगा अथवा जो शान्त द्विजोंको इसे सुनायेगा, वह परम गतिको प्राप्त होगा॥ १६३-१६४॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ ३७॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३७॥


अड़तीसवाँ अध्याय

तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें मार्कण्डेय-युधिष्ठिर-संवादका प्रारम्भ, मार्कण्डेयजीद्वारा नर्मदा तथा अमरकण्टकतीर्थके माहात्म्यका प्रतिपादन

सूत उवाच<br>एषा पुण्यतमा देवी देवगन्धर्वसेविता।<br>नर्मदा लोकविख्याता तीर्थानामुत्तमा नदी॥ १॥<br><br>तस्याः शृणुध्वं माहात्म्यं मार्कण्डेयेन भाषितम्।<br>युधिष्ठिराय तु शुभं सर्वपापप्रणाशनम्॥ २॥**सूतजीने कहा—**देवताओं तथा गन्धर्वोंद्वारा सेवित ये अत्यन्त पवित्र नर्मदादेवी संसारमें प्रसिद्ध हैं तथा नदीरूपमें सभी तीर्थोंमें उत्तम तीर्थ हैं। इनका वह शुभ माहात्म्य आप लोग सुनें, जो महर्षि मार्कण्डेयद्वारा युधिष्ठिरको बताया गया है तथा सभी पापोंका नाशक होनेके कारण शुभ है॥ १-२॥
युधिष्ठिर उवाच<br>श्रुतास्तु विविधा धर्मास्त्वत्प्रसादान्महामुने।<br>माहात्म्यं च प्रयागस्य तीर्थानि विविधानि च॥ ३॥<br><br>नर्मदा सर्वतीर्थानां मुख्या हि भवतेरिता।<br>तस्यास्त्विदानीं माहात्म्यं वक्तुमर्हसि सत्तम॥ ४॥**युधिष्ठिर बोले—**महामुने! आपकी कृपासे मैंने विविध धर्मोंको सुना, साथ ही प्रयागका माहात्म्य और विविध तीर्थोंका भी (माहात्म्य) श्रवण किया। आपने बतलाया कि सभी तीर्थोंमें नर्मदा मुख्य हैं, अतः हे सत्तम! इस समय आप उन्हींका माहात्म्य मुझे बतलायें॥ ३-४॥
मार्कण्डेय उवाच<br>नर्मदा सरितां श्रेष्ठा रुद्रदेहाद् विनिःसृता।<br>तारयेत् सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ ५॥<br><br>नर्मदायास्तु माहात्म्यं पुराणे यन्मया श्रुतम्।<br>इदानीं तत् प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमनाः शुभम्॥ ६॥<br><br>पुण्या कनखले गङ्गा कुरुक्षेत्रे सरस्वती।<br>ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा॥ ७॥<br><br>त्रिभिः सारस्वतं तोयं सप्ताहेन तु यामुनम्।<br>सद्यः पुनाति गाङ्गेयं दर्शनादेव नार्मदम्॥ ८॥**मार्कण्डेयने कहा—**रुद्रकी देहसे निकली हुई नर्मदा सभी नदियोंमें श्रेष्ठ हैं। (वे) सभी चर-अचर प्राणियोंको पार उतारनेवाली हैं। पुराणमें नर्मदाका जो माहात्म्य मैंने सुना है, उसे अब बतलाता हूँ, आप लोग एकाग्र होकर सुनें—॥ ५-६॥<br><br>गङ्गा कनखलमें तथा सरस्वती कुरुक्षेत्रमें पवित्र (कही गयी) हैं, किंतु ग्राम अथवा अरण्यमें सर्वत्र ही नर्मदाको पवित्र कहा गया है। सरस्वतीका जल तीन दिनोंतक, यमुनाका जल सात दिनोंतक तथा गङ्गाजल तत्काल स्नान-पानसे पवित्र करता है, किंतु नर्मदाका जल तो दर्शनमात्रसे ही पवित्र कर देता है॥ ७-८॥
* अध्याय ३८ *४६१
कलिङ्गदेशपश्चार्धे पर्वतेऽमरकण्टके।<br>पुण्या च त्रिषु लोकेषु रमणीया मनोरमा॥ ९ ॥<br>सदेवसुरगन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>तपस्तप्त्वा तु राजेन्द्र सिद्धिं तु परमां गताः॥ १०॥<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् नियमस्थो जितेन्द्रियः।<br>उपोष्‍य रजनीमेकां कुलानां तारयेच्छतम्॥ ११॥कलिंग देशके पश्चार्धमें अमरकण्टक पर्वतपर तीनों लोकोंमें पवित्र, रमणीय, मनोरम नर्मदाका उद्गम स्थल है। राजेन्द्र! वहाँ देवताओंसहित असुरों, गन्धर्वों, ऋषियों तथा तपस्वियोंने तपस्या कर परम सिद्धि प्राप्त की है। राजन्! मनुष्य वहाँ (नर्मदामें) स्नान करके जितेन्द्रिय तथा नियम-परायण रहते हुए एक रात्रि उपवास करे तो अपने सौ पीढ़ियोंको तार देता है॥ ९-११॥
योजनानां शतं साग्रं श्रूयते सरिदुत्तमा।<br>विस्तारेण तु राजेन्द्र योजनद्वयमायता ॥ १२ ॥<br>षष्टितीर्थसहस्राणि षष्टिकोट्यस्तथैव च।<br>पर्वतस्य समन्तात् तु तिष्ठन्त्यमरकण्टके ॥ १३॥<br>ब्रह्मचारी शुचिर्भूत्वा जितक्रोधो जितेन्द्रियः।<br>सर्वहिंसानिवृत्तस्तु सर्वभूतहिते रतः॥ १४॥<br>एवं सर्वसमाचारो यस्तु प्राणान् समुत्सृजेत्।<br>तस्य पुण्यफलं राजन् शृणुष्वावहितो नृप॥ १५॥राजेन्द्र! सुना जाता है कि वह श्रेष्ठ नदी सौ योजनसे कुछ अधिक लम्बी तथा दो योजन चौड़े विस्तारमें फैली है। अमरकण्टक पर्वतमें चारों ओर साठ करोड़ साठ हजार तीर्थ स्थित हैं। राजन्! जो ब्रह्मचर्यपरायण है, पवित्र है, क्रोध तथा इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त किया है, सभी प्रकारकी हिंसाओंसे सर्वथा निवृत्त है, सभी प्राणियोंके हितमें परायण है तथा ऐसे ही सभी पवित्र आचारोंसे सम्पन्न है, वह मनुष्य यहाँ प्राणोंका परित्यागकर जिस पुण्य फलको प्राप्त करता है, उसे आप सावधान होकर सुनें- ॥ १२-१५॥
शतवर्षसहस्राणि स्वर्गे मोदति पाण्डव।<br>अप्सरोगणसंकीर्णो दिव्यस्त्रीपरिवारितः ॥ १६॥<br>दिव्यगन्धानुलिप्तश्च दिव्यपुष्पोपशोभितः।<br>क्रीडते देवलोके तु दैवतैः सह मोदते ॥ १७॥<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः।<br>गृहं तु लभतेऽसौ वै नानारत्नसमन्वितम् ॥ १८॥<br>स्तम्भैर्मणिमयैर्दिव्यैर्वज्रवैदूर्यभूषितम् ।<br>आलेख्यवाहनैः शुभ्रैर्दासीदाससमन्वितम् ॥ १९॥<br>राजराजेश्वरः श्रीमान् सर्वस्त्रीजनवल्लभः।<br>जीवेद् वर्षशतं साग्रं तत्र भोगसमन्वितः ॥ २०॥पाण्डव! वह पुरुष अप्सराओंके समूहोंसे व्याप्त अर्थात् सेवित तथा चारों ओर दिव्य स्त्रियोंसे आवृत रहकर स्वर्गमें सौ हजार वर्षोंतक आनन्द प्राप्त करता है। दिव्य गन्ध (चन्दन)-से अनुलिप्त होकर तथा दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित होकर देवलोकमें क्रीडा करता है और देवताओंके साथ आनन्द प्राप्त करता है। स्वर्गमें सुख भोगने योग्य पुण्योंके निःशेष होनेपर वह धार्मिक राजा होता है और नाना प्रकारके रत्नोंसे समन्वित दिव्य मणिमय स्तम्भों, हीरे एवं वैदूर्यमणिसे विभूषित, उत्तम चित्रों तथा वाहनोंसे अलंकृत और दासी-दाससे समन्वित भवन प्राप्त करता है। वह राजराजेश्वर श्रीसम्पन्न, सभी स्त्रियोंका प्रियकर तथा भोगोंसे युक्त होकर वहाँ (पृथ्वीपर) सौ वर्षसे भी अधिक समयतक जीवित रहता है॥ १६-२०॥
अग्निप्रवेशेऽथ जले अथवाऽनशने कृते।<br>अनिवर्तिका गतिस्तस्य पवनस्याम्बरे यथा ॥ २१ ॥(इस तीर्थमें) अग्नि अथवा जलमें प्रवेश करने अथवा अनशन-व्रत करनेसे वैसी ही पुनरागमनरहित गति होती है, जैसी कि आकाशमें पवनकी होती है (इसका आशय यह है कि शास्त्रविहित तपके रूपमें अग्निप्रवेश आदि तप इस तीर्थमें अक्षय पुण्य देनेवाले होते हैं) ॥ २१ ॥

४६२ * कूर्मपुराण *


| पश्चिमे पर्वततटे सर्वपापविनाशनः।<br>ह्रदो जलेश्वरो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥ २२॥<br><br>तत्र पिण्डप्रदानेन संध्योपासनकर्मणा।<br>दशवर्षाणि पितरस्तर्पिताः स्युर्न संशयः॥ २३॥<br>दक्षिणे नर्मदाकूले कपिलाख्या महानदी।<br>सरलार्जुनसंच्छन्ना नातिदूरे व्यवस्थिता॥ २४॥<br><br>सा तु पुण्या महाभागा त्रिषु लोकेषु विश्रुता।<br>तत्र कोटिशतं साग्रं तीर्थानां तु युधिष्ठिर॥ २५॥<br><br>तस्मिंस्तीर्थे तु ये वृक्षाः पतिताः कालपर्ययात्।<br>नर्मदातोयसंस्पृष्टास्ते यान्ति परमां गतिम्॥ २६॥<br><br>द्वितीया तु महाभागा विशल्यकरणी शुभा।<br>तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा विशल्यो भवति क्षणात्॥ २७॥<br><br>कपिला च विशल्या च श्रूयते राजसत्तम।<br>ईश्वरेण पुरा प्रोक्ता लोकानां हितकाम्यया॥ २८॥<br><br>अनाशकं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति॥ २९॥<br><br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्नश्वमेधफलं लभेत्।<br>ये वसन्त्युत्तरे कूले रुद्रलोके वसन्ति ते॥ ३०॥<br>सरस्वत्यां च गङ्गायां नर्मदायां युधिष्ठिर।<br>समं स्नानं च दानं च यथा मे शंकरोऽब्रवीत्॥ ३१॥<br><br>परित्यजति यः प्राणान् पर्वतेऽमरकण्टके।<br>वर्षकोटिशतं साग्रं रुद्रलोके महीयते॥ ३२॥<br><br>नर्मदायां जलं पुण्यं फेनोर्मिसमलंकृतम्।<br>पवित्रं शिरसावन्द्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ३३॥<br><br>नर्मदा सर्वतः पुण्या ब्रह्महत्यापहारिणी।<br>अहोरात्रोपवासेन मुच्यते ब्रह्महत्यया॥ ३४॥<br><br>जालेश्वरं तीर्थवरं सर्वपापविनाशनम्।<br>तत्र गत्वा नियमवान् सर्वकामाँल्लभेन्नरः॥ ३५॥<br><br>चन्द्रसूर्योपरागे तु गत्वा ह्यमरकण्टकम्।<br>अश्वमेधाद् दशगुणं पुण्यमाप्नोति मानवः॥ ३६॥ | (अमरकण्टक) पर्वतके पश्चिमी किनारेपर सभी पापोंका नाश करनेवाला और तीनों लोकोंमें विख्यात जलेश्वर नामका एक ह्रद (तालाब) है। वहाँ पिण्डदान करने तथा संध्योपासन कर्म करनेसे दस (हजार) वर्षतक पितर तृप्त रहते हैं, इसमें संदेह नहीं॥ २२-२३॥<br><br>नर्मदाके दक्षिण तटके समीपमें ही कपिला नामवाली महानदी स्थित है, जो साल तथा अर्जुनके वृक्षोंसे घिरी हुई है। वह महाभागा (नदी) पवित्र तथा तीनों लोकोंमें विख्यात है। युधिष्ठिर! वहाँ सौ करोड़से भी अधिक तीर्थ हैं। कालक्रमसे जो वृक्ष उस तीर्थमें गिरते हैं, वे नर्मदाके जलका स्पर्श प्राप्त हो जानेके कारण परम गतिको प्राप्त होते हैं। दूसरी महाभागा शुभ नदी विशल्यकरणी है, उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य तत्क्षण ही शल्यसे (सभी प्रकारके पापरूपी काँटोंसे) रहित हो जाता है। राजश्रेष्ठ! यह आप्त श्रुति है कि ईश्वरने इन कपिला तथा विशल्या नामकी दोनों नदियोंको प्राणिमात्रके कल्याण करनेका आदेश पहलेसे ही दे रखा है। नराधिपति!<br>उस तीर्थमें जो (शास्त्रीय विधिसे) अनशनव्रत करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकमें जाता है। राजन्! वहाँ स्नानकर मनुष्य अश्वमेधका फल प्राप्त करता है और जो लोग उत्तरी तटपर निवास करते हैं, वे रुद्रलोकमें निवास करते हैं॥ २४-३०॥<br><br>युधिष्ठिर! शंकरने मुझे जैसा बतलाया था, उसके अनुसार गङ्गा, सरस्वती एवं नर्मदामें किया गया स्नान और दान समान फलदायक होता है। जो अमरकण्टक पर्वतपर प्राणोंका परित्याग करता है, वह सौ करोड़ वर्षोंसे भी अधिक समयतक रुद्रलोकमें पूजित होता है। फेन और ऊर्मियों (तरङ्गों)-से अलंकृत नर्मदाके पवित्र जलको पवित्रतापूर्वक सिरसे वन्दित करनेपर अर्थात् सिरपर धारण करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। नर्मदा सभी प्रकारसे पवित्र और ब्रह्महत्याको दूर करनेवाली है। वहाँ एक अहोरात्र उपवास करनेसे ब्रह्महत्या (-के पाप)-से मुक्ति हो जाती है। जालेश्वर नामका श्रेष्ठ तीर्थ सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है। वहाँ जाकर नियमसे रहनेवाला मनुष्य सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। चन्द्र तथा सूर्यग्रहणमें अमरकण्टककी यात्रा करनेसे मनुष्य अश्वमेध-यज्ञसे दस गुना अधिक पुण्य प्राप्त करता है॥ ३१-३६॥ |

  • अध्याय ३९ * | ४६३

एष पुण्यो गिरिवरो देवगन्धर्वसेवितः।
नानाद्रुमलताकीर्णो नानापुष्पोपशोभितः ॥ ३७ ॥

तत्र संनिहितो राजन् देव्या सह महेश्वरः।
ब्रह्मा विष्णुस्तथा चेन्द्रो विद्याधरगणैः सह ॥ ३८ ॥

प्रदक्षिणं तु यः कुर्यात् पर्वतं ह्यमरकण्टकम्।
पौण्डरीकस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ३९ ॥

कावेरी नाम विपुला नदी कल्मषनाशिनी।
तत्र स्नात्वा महादेवमर्चयेद् वृषभध्वजम्।
संगमे नर्मदायास्तु रुद्रलोके महीयते ॥ ४० ॥

यह पुण्यप्रद श्रेष्ठ पर्वत (अमरकण्टक) देवताओं तथा गन्धर्वोंद्वारा सेवित, नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे परिपूर्ण एवं विविध प्रकारके पुष्पोंसे सुशोभित है। राजन्! यहाँ देवी (पार्वती)-के साथ महेश्वर और विद्याधरगणोंके साथ ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्र भी स्थित रहते हैं। जो मानव अमरकण्टक पर्वतकी परिक्रमा करता है, वह पौण्डरीक यज्ञका फल प्राप्त करता है। ऐसे ही कावेरी नामकी एक प्रसिद्ध नदी है। यह विशाल है तथा कल्मषोंका नाश करनेवाली है। उसमें स्नानकर तथा नर्मदाके संगममें स्नान करके वृषभध्वज महादेवकी आराधना करनेसे रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है॥ ३७–४०॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३८॥


उनतालीसवाँ अध्याय

तीर्थमाहात्म्य-वर्णनके प्रसंगमें नर्मदाके तटवर्ती तीर्थोंका विस्तारसे वर्णन

मार्कण्डेय उवाच
नर्मदा सरितां श्रेष्ठा सर्वपापविनाशिनी।
मुनिभिः कथिता पूर्वमीश्वरेण स्वयम्भुवा ॥ १ ॥
मुनिभिः संस्तुता ह्येषा नर्मदा प्रवरा नदी।
रुद्रगात्राद् विनिष्क्रान्ता लोकानां हितकाम्यया ॥ २ ॥
सर्वपापहरा नित्यं सर्वदेवनमस्कृता।
संस्तुता देवगन्धर्वैरप्सरोभिस्तथैव च ॥ ३ ॥
उत्तरे चैव तत्कूले तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।
नाम्ना भद्रेश्वरं पुण्यं सर्वपापहरं शुभम्।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् दैवतैः सह मोदते ॥ ४ ॥

मार्कण्डेयने कहा— मुनियोंने तथा उनसे पूर्व स्वयम्भू ईश्वरने नर्मदाका वर्णन सभी पापोंका नाश करनेवाली सर्वश्रेष्ठ नदीके रूपमें किया है। मुनियोंद्वारा स्तुति करनेपर यह श्रेष्ठ नर्मदा नदी लोगोंके कल्याणकी कामनासे रुद्रके शरीरसे निकली है। यह नित्य सभी पापोंको हरनेवाली है, सभी देवोंद्वारा नमस्कृत है और देवताओं, गन्धर्वों तथा अप्सराओंके द्वारा स्तुत्य है॥ १–३॥
इस (नर्मदा) नदीके उत्तरी किनारेपर तीनों लोकोंमें विख्यात भद्रेश्वरनामका तीर्थ है, जो पवित्र, शुभ तथा सभी पापोंका हरण करनेवाला है। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य देवताओंके साथ आनन्दित होता है।

ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थमाम्नातकेश्वरम्।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ५ ॥

राजेन्द्र! वहाँसे आम्रातकेश्वर तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य हजार गौओंके दानका फल प्राप्त करता है॥ ४–५॥

ततोऽङ्गारेश्वरं गच्छेन्नियतो नियताशनः।
सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोके महीयते ॥ ६ ॥

तदनन्तर संयमपूर्वक नियत आहार करते हुए अङ्गारेश्वर तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। इससे (तीर्थ-विधि सम्पन्न करनेसे) सभी पापोंका शोधन होता है और रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है॥ ६॥

४६४ * कूर्मपुराण *


ततो गच्छेत राजेन्द्र केदारं नाम पुण्यदम् । तत्र स्नात्वोदकं कृत्वा सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ ७ ॥

पिप्पलेशं ततो गच्छेत् सर्वपापविनाशनम्। तत्र स्नात्वा महाराज रुद्रलोके महीयते ॥ ८ ॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र विमलेश्वरमुत्तमम्। तत्र प्राणान् परित्यज्य रुद्रलोकमवाप्नुयात् ॥ ९ ॥

ततः पुष्करिणीं गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् । स्नातमात्रो नरस्तत्र इन्द्रस्यार्धासनं लभेत् ॥ १०॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र शूलभेदमिति श्रुतम् । तत्र स्नात्वार्चयेद् देवं गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ११॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र बलितीर्थमनुत्तमम्। तत्र स्नात्वा नरो राजन् सिंहासनपतिर्भवेत् ॥ १२ ॥

शक्रतीर्थं ततो गच्छेत् कूले चैव तु दक्षिणे । उपोष्‍य रजनीमेकां स्नानं कृत्वा यथाविधि ॥ १३ ॥

आराधयेन्महायोगं देवं नारायणं हरिम् । गोसहस्रफलं प्राप्य विष्णुलोकं स गच्छति ॥ १४ ॥ ऋषितीर्थं ततो गत्वा सर्वपापहरं नृणाम्। स्नातमात्रो नरस्तत्र शिवलोके महीयते ॥ १५ ॥

नारदस्य तु तत्रैव तीर्थं परमशोभनम् । स्नातमात्रो नरस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १६ ॥

यत्र तप्तं तपः पूर्वं नारदेन सुरर्षिणा । प्रीतस्तस्य ददौ योगं देवदेवो महेश्वरः ॥ १७ ॥

ब्रह्मणा निर्मितं लिङ्गं ब्रह्मोश्वरमिति श्रुतम् । यत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मलोके महीयते ॥ १८ ॥

ऋणतीर्थं ततो गच्छेत् स ऋणान्मुच्यते ध्रुवम् । महेश्वरं ततो गच्छेत् पर्याप्तं जन्मनः फलम् ॥ १९ ॥

राजेन्द्र ! इसके बाद पुण्य प्रदान करनेवाले केदार नामक तीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ स्नान करके उदकदान (तर्पण आदि क्रिया) करनेसे सभी कामनाओंकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर सभी पापोंका विनाश करनेवाले पिप्पलेश (तीर्थ) - में जाना चाहिये। महाराज! वहाँ स्नान करनेसे रुद्रलोकमें आदर प्राप्त होता है। राजेन्द्र ! तदनन्तर श्रेष्ठ विमलेश्वर (तीर्थ)-में जाना चाहिये। वहाँ प्राणोंका परित्याग करनेसे रुद्रलोक प्राप्त होता है। इसके बाद पुष्करिणीमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य इन्द्रका आधा आसन प्राप्त करता है ॥ ७-१० ॥

राजेन्द्र ! ऐसी श्रुति है कि वहाँसे शूलभेद नामके तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नान करके देवाराधना करनी चाहिये। इससे हजार गौओंके दानका फल प्राप्त होता है। राजेन्द्र! तदनन्तर परम उत्तम बलितीर्थमें जाना चाहिये। राजन् ! वहाँ स्नान करके मनुष्य सिंहासनाधिपति अर्थात् राजा होता है। इसके उपरान्त (बलितीर्थके) दक्षिणी किनारेपर स्थित शक्रतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ एक रात्रि उपवास करके यथाविधि स्नान करना चाहिये तथा महायोगस्वरूप नारायण हरिकी आराधना करनी चाहिये। इनसे हजार गौओंके दानका फल प्राप्तकर मनुष्य विष्णुलोकमें जाता है ॥ ११-१४॥

तदनन्तर मनुष्योंके समस्त पापोंको हरनेवाले ऋषितीर्थमें जाकर वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य शिवलोकमें पूजित होता है। वहींपर नारदजीका परम शोभन तीर्थ है। वहाँ स्नानमात्र करके मनुष्य हजार गोदानका फल प्राप्त करता है। पूर्वकालमें इसी तीर्थमें देवर्षि नारदने तपस्या की थी और इसी तपस्याके फलस्वरूप देवाधिदेव महेश्वरने प्रसन्न होकर उन्हें योग प्रदान किया था। राजन् ! ब्रह्माके द्वारा स्थापित लिङ्ग ब्रह्मोश्वर नामसे प्रसिद्ध है। इस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ १५-१८ ॥

तदनन्तर ऋणतीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ जानेवाला निश्चित ही ऋणसे मुक्त हो जाता है। इसके बाद महेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ जाकर तीर्थसेवन करनेसे जन्मका अन्तिम फल (महेश्वरका दर्शन) प्राप्त होता है ॥ १९ ॥

  • अध्याय ३९ * | ४६५ ---|---

भीमेश्वरं ततो गच्छेत् सर्वव्याधिविनाशनम्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वदुःखैः प्रमुच्यते ॥ २० ॥ | तदुपरांत सभी व्याधियोंका विनाश करनेवाले भीमेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य सभी दुःखोंसे मुक्त हो जाता है॥२०॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र पिङ्गलेश्वरमुत्तमम्।<br>अहोरात्रोपवासेन त्रिरात्रफलमाप्नुयात् ॥ २१ ॥<br><br>तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र कपिलां यः प्रयच्छति।<br>यावन्ति तस्या रोमाणि तत्प्रसूतिकुलेषु च।<br>तावद् वर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते ॥ २२ ॥<br><br>यस्तु प्राणपरित्यागं कुर्यात् तत्र नराधिप।<br>अक्षयं मोदते कालं यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥ २३ ॥<br><br>नर्मदातटमाश्रित्य तिष्ठन्ते ये तु मानवाः।<br>ते मृताः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ २४ ॥ | राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम पिङ्गलेश्वर (तीर्थमें) जाना चाहिये। वहाँ अहोरात्रका उपवास करनेसे त्रिरात्र (उपवास)-का फल प्राप्त होता है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जो कपिला (गौ)-का दान करता है, वह उस कपिलाके तथा उसके कुलमें उत्पन्न संतानोंके शरीरोंपर जितने रोम होते हैं, उतने ही हजार वर्षपर्यन्त रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। नराधिप! वहाँ जो प्राणोंका त्याग करता है, वह जबतक सूर्य-चन्द्रमा हैं, तबतक अक्षय आनन्द प्राप्त करता है। जो मनुष्य नर्मदाके तटका आश्रयकर (वहाँ) रहते हैं, वे मरनेपर पुण्यवान् संतोंके समान स्वर्ग प्राप्त करते हैं॥ २१—२४॥ ततो दीप्तेश्वरं गच्छेद व्यासतीर्थं तपोवनम्।<br>निवर्तिता पुरा तत्र व्यासभीता महानदी।<br>हुंकारिता तु व्यासेन दक्षिणेन ततो गता ॥ २५ ॥<br><br>प्रदक्षिणं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे युधिष्ठिर।<br>प्रीतस्तस्य भवेद् व्यासो वाञ्छितं लभते फलम् ॥ २६ ॥ | तदनन्तर व्यासतीर्थ नामक तपोवनमें स्थित दीप्तेश्वर (तीर्थमें) जाना चाहिये। प्राचीन कालमें वहाँ व्यासजीसे भयभीत होकर महानदी (नर्मदा) वापस हो गयी थी और व्यासके द्वारा हुंकार किये जानेपर (अर्थात् रोष प्रकट करनेपर) वहाँसे दक्षिणकी ओर चली गयी। युधिष्ठिर! उस तीर्थमें जो प्रदक्षिणा करता है, प्रसन्न होकर व्यासजी उसे अभिलषित फल प्रदान करते हैं॥ २५-२६॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र इक्षुनद्यास्तु संगमम्।<br>त्रैलोक्यविश्रुतं पुण्यं तत्र संनिहितः शिवः।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥ २७ ॥<br><br>स्कन्दतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्<br>आजन्मनः कृतं पापं स्नातस्तीव्रं व्यपोहति ॥ २८ ॥<br><br>तत्र देवाः सगन्धर्वा भवात्मजमनुत्तमम्।<br>उपासते महात्मानं स्कन्दं शक्तिधरं प्रभुम् ॥ २९ ॥<br><br>ततो गच्छेदाङ्गिरसं स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>गोसहस्रफलं प्राप्य रुद्रलोकं स गच्छति ॥ ३० ॥ | राजेन्द्र! तदनन्तर तीनों लोकोंमें विख्यात तथा पवित्र इक्षुनदीके संगमपर जाना चाहिये। वहाँ शिव प्रतिष्ठित हैं। राजन्! वहाँ मनुष्य स्नानकर (शिवका) गाणपत्य-पद प्राप्त करता है। इसके बाद सभी पापोंका विनाश करनेवाले स्कन्दतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नान करनेसे जन्मभरका किया हुआ पाप शीघ्र ही दूर हो जाता है। वहाँ शंकरजीके पुत्र, श्रेष्ठ महात्मा, शक्तिसम्पन्न प्रभु स्कन्दकी गन्धर्वोंसहित देवता उपासना करते हैं। तदनन्तर आङ्गिरस तीर्थमें जाकर स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नान करनेवाला व्यक्ति हजार गोदानका फल प्राप्त कर रुद्रलोकमें जाता है॥ २७-३०॥ अङ्गिरा यत्र देवेशं ब्रह्मपुत्रो वृषध्वजम्।<br>तपसाराध्य विश्वेशं लब्धवान् योगमुत्तमम् ॥ ३१ ॥<br><br>कुशतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्।<br>स्नानं तत्र प्रकुर्वीत अश्वमेधफलं लभेत् ॥ ३२ ॥ | वहाँ ब्रह्माजीके पुत्र (महर्षि) अङ्गिराने तपस्याके द्वारा देवेश वृषध्वज विश्वेश्वरकी आराधना कर उत्तम योग प्राप्त किया था। तदनन्तर समस्त पापोंको नष्ट करनेवाले कुशतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नान करनेसे व्यक्ति अश्वमेधका फल प्राप्त करता है॥ ३१-३२॥

४६६* कूर्मपुराण *
कोटितीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राज्यं लभते नात्र संशयः ॥ ३३ ॥इसके पश्चात् सभी पापोंको नष्ट करनेवाले कोटितीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नानकर मनुष्य राज्य प्राप्त कर लेता है, इसमें कोई संदेह नहीं ॥ ३३ ॥
चन्द्रभागां ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सोमलोके महीयते ॥ ३४ ॥तदुपरान्त चन्द्रभागामें स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्रसे ही मनुष्य सोमलोकमें आदर प्राप्त करता
नर्मदादक्षिणे कूले संगमेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ ३५ ॥है। राजन्! नर्मदाके दक्षिणी किनारेपर उत्तम संगमेश्वर (तीर्थ) है। वहाँ स्नान करके मनुष्य सभी यज्ञोंका
नर्मदायोत्तरे कूले तीर्थं परमशोभनम्।<br>आदित्यायतनं रम्यमीश्वरेण तु भाषितम् ॥ ३६ ॥फल प्राप्त कर लेता है। नर्मदाके उत्तरी किनारेपर अत्यन्त सुन्दर तीर्थ है। वहाँ आदित्यका रमणीय मन्दिर
तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र दत्त्वा दानं तु शक्तितः।<br>तस्य तीर्थप्रभावेण लभते चाक्षयं फलम् ॥ ३७॥है। यह स्वयं ईश्वरने बताया है। राजेन्द्र! वहाँ स्नानकर यथाशक्ति दान देनेपर उस तीर्थके प्रभावसे अक्षय फल
दरिद्रा व्याधिता ये तु ये च दुष्कृतकारिणः।<br>मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं प्रयान्ति च ॥ ३८ ॥प्राप्त होता है तथा जो लोग दरिद्र, व्याधियुक्त और दुष्कर्म करनेवाले हैं, वे सभी पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकको जाते हैं ॥ ३४-३८ ॥
मार्गेश्वरं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र स्वर्गलोकमवाप्नुयात् ॥ ३९ ॥तदनन्तर मार्गेश्वर (तीर्थ) जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त करता है। इसके पश्चात् पश्चिमकी ओर स्थित श्रेष्ठ
ततः पश्चिमतो गच्छेन्मरुदालयमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र शुचिर्भूत्वा प्रयत्नतः ॥ ४० ॥मरुदालयमें (वायुके स्थानमें) जाना चाहिये। राजेन्द्र! वहाँ स्नान करके प्रयत्नपूर्वक पवित्र होकर अपनी
काञ्चनं तु द्विजो दद्याद् यथाविभवविस्तरम्।<br>पुष्पकेण विमानेन वायुलोकं स गच्छति ॥ ४१ ॥सम्पत्तिके विस्तारके अनुसार द्विजको स्वर्ण प्रदान करना चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य पुष्पक-विमानके द्वारा वायुलोक जाता है ॥ ३९-४१ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र अहल्यातीर्थमुत्तमम्।<br>स्नानमात्रादप्सरोभिर्मोदते कालमक्षयम् ॥ ४२ ॥राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ अहल्यातीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नानमात्रसे मनुष्य अक्षय (अनन्त) कालतक
चैत्रमासे तु सम्प्राप्ते शुक्लपक्षे त्रयोदशी।<br>कामदेवदिने तस्मिन्नहल्यां यस्तु पूजयेत् ॥ ४३ ॥अप्सराओंके साथ आनन्द करता है। चैत्र शुक्ल पक्षकी त्रयोदशी कामदेवका दिन है। उस दिन इस अहल्यातीर्थमें
यत्र तत्र नरोत्पन्नो वरस्तत्र प्रियो भवेत्।<br>स्त्रीवल्लभो भवेच्छ्रीमान् कामदेव इवापरः ॥ ४४ ॥जो मनुष्य अहल्याकी पूजा करता है, वह जहाँ-कहीं भी उत्पन्न होता है, श्रेष्ठ तथा प्रिय होता है और विशेषरूपसे दूसरे कामदेवके समान हो जानेसे श्री-
अयोध्यां तु समासाद्य तीर्थं शक्रस्य विश्रुतम्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ४५ ॥शोभासम्पन्न तथा स्त्रीवल्लभ होता है। इन्द्रके प्रसिद्ध तीर्थ अयोध्यामें आकर स्नानमात्र करनेवाला मनुष्य हजार गोदानका फल प्राप्त करता है ॥ ४२-४५ ॥
सोमतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४६ ॥तदनन्तर सोमतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे
सोमग्रहे तु राजेन्द्र पापक्षयकरं भवेत्।<br>त्रैलोक्यविश्रुतं राजन् सोमतीर्थं महाफलम् ॥ ४७ ॥मुक्त हो जाता है। राजन्! तीनों लोकोंमें विख्यात सोमतीर्थ महान् फल देनेवाला है ॥ ४६-४७ ॥
* अध्याय ३९ *४६७
यस्तु चान्द्रायणं कुर्यात् तत्र तीर्थे समाहितः ।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा सोमलोकं स गच्छति ॥ ४८ ॥<br><br>अग्निप्रवेशं यः कुर्यात् सोमतीर्थे नराधिप ।<br>जले चानशनं वापि नासौ मर्त्योऽभिजायते ॥ ४९ ॥<br><br>स्तम्भतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् ।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सोमलोके महीयते ॥ ५० ॥<br>ततो गच्छेत राजेन्द्र विष्णुतीर्थमनुत्तमम् ।<br>योधनीपुरमाख्यातं विष्णोः स्थानमनुत्तमम् ॥ ५१ ॥<br><br>असुरा योधितस्तत्र वासुदेवेन कोटिशः ।<br>तत्र तीर्थं समुत्पन्नं विष्णुश्रीको भवेदिह ।<br>अहोरात्रोपवासेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥ ५२ ॥<br><br>नर्मदादक्षिणे कूले तीर्थं परमशोभनम् ।<br>कामतीर्थमिति ख्यातं यत्र कामोऽर्चयद् भवम् ॥ ५३ ॥<br><br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा उपवासपरायणः ।<br>कुसुमायुधरूपेण रुद्रलोके महीयते ॥ ५४ ॥<br>ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मतीर्थमनुत्तमम् ।<br>उमाहकमिति ख्यातं तत्र संतर्पयेत् पितॄन् ॥ ५५ ॥<br><br>पौर्णमास्याममावास्यां श्राद्धं कुर्याद् यथाविधि ।<br>गजरूपा शिला तत्र तोयमध्ये व्यवस्थिता ॥ ५६ ॥<br><br>तस्मिंस्तु दापयेत् पिण्डान् वैशाख्यां तु विशेषतः ।<br>स्नात्वा समाहितमना दम्भमात्सर्यवर्जितः ।<br>तृप्यन्ति पितरस्तस्य यावत् तिष्ठति मेदिनी ॥ ५७ ॥<br>सिद्धेश्वरं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् ।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र गाणपत्यपदं लभेत् ॥ ५८ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र लिङ्गो यत्र जनार्दनः ।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र विष्णुलोके महीयते ॥ ५९ ॥<br><br>यत्र नारायणो देवो मुनीनां भावितात्मनाम् ।<br>स्वात्मानं दर्शयामास लिङ्गं तत् परमं पदम् ॥ ६० ॥राजेन्द्र! वहाँ चन्द्रग्रहण (-का स्नान) पापोंका क्षय करनेवाला होता है। उस तीर्थमें जो एकाग्र-मनसे चान्द्रायणव्रत करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो विशुद्ध आत्मावाला होकर सोमलोकको जाता है। नराधिप ! जो सोमतीर्थमें अग्निप्रवेश, जलप्रवेश अथवा अनशन करता है, वह मनुष्य पुनः उत्पन्न नहीं होता। तदनन्तर स्तम्भतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य सोमलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है अर्थात् पूजित होता है ॥ ४८-५० ॥<br><br>राजेन्द्र ! तदनन्तर परम उत्तम विष्णुतीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ योधनीपुर नामक विष्णुका श्रेष्ठ स्थान है। वहाँ वासुदेवने करोड़ों असुरोंसे युद्ध किया था। अतः वह स्थान (वासुदेवकी पवित्र संनिधिके कारण) तीर्थ (पुण्यमय) हो गया है। जो मनुष्य उस तीर्थका सेवन करता है, वह विष्णके समान श्रीसम्पन्न हो जाता है। वहाँ एक अहोरात्र उपवास करनेसे ब्रह्महत्या दूर हो जाती है। नर्मदाके दक्षिणी किनारेपर कामतीर्थ नामसे प्रसिद्ध एक अत्यन्त सुन्दर तीर्थ है। वहाँपर कामदेवने शंकरकी आराधना की थी। उस तीर्थमें स्नानकर उपवासपरायण रहनेवाला मनुष्य कामदेवके समान रूपवाला होकर रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ५१-५४ ॥<br><br>राजेन्द्र ! तदनन्तर उत्तम ब्रह्मतीर्थमें जाना चाहिये। वह तीर्थ 'उमाहक' इस नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ पितरोंका तर्पण करना चाहिये। पूर्णिमा तथा अमावास्याको विधिपूर्वक श्राद्ध करना चाहिये। वहाँ जलके भीतर हाथीके आकारकी शिला स्थित है। उस शिलापर विशेष रूपसे वैशाख पूर्णिमाको स्नानके अनन्तर दम्भ तथा मात्सर्यसे रहित होकर एकाग्रमनसे पिण्डदान करना चाहिये। इससे पिण्डदाताके पितर जबतक पृथ्वी रहती है, तबतक तृप्त रहते हैं ॥ ५५-५७ ॥<br><br>इसके बाद सिद्धेश्वर (तीर्थमें) जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य गाणपत्य-पद प्राप्त करता है। राजेन्द्र! तदनन्तर जहाँ जनार्दन लिङ्गरूपमें प्रतिष्ठित हैं, वहाँ जाना चाहिये। राजेन्द्र ! वहाँ स्नान करनेसे विष्णुलोकमें आदर प्राप्त होता है। यही एकमात्र वह स्थान है, जहाँ नारायणदेवने भक्तिपूर्ण मुनियोंको लिङ्गरूपमें अपना दर्शन कराया था। यह लिङ्ग विष्णुरूप होनेसे परमपद है ॥ ५८-६० ॥

४६८ * कूर्मपुराण *

अङ्कोलं तु ततो गच्छेत् सर्वपापविनाशनम्।<br>स्नानं दानं च तत्रैव ब्राह्मणानां च भोजनम्।<br>पिण्डप्रदानं च कृतं प्रेत्यानन्तफलप्रदम् ॥ ६१ ॥<br><br>त्रैयम्बकेन तोयेन यश्चरुं श्रपयेत् ततः।<br>अङ्कोलमूले दद्याच्च पिण्डांश्चैव यथाविधि।<br>तारिताः पितरस्तेन तृप्यन्त्याचन्द्रतारकम् ॥ ६२ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र तापसेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र प्राप्नुयात् तपसः फलम् ॥ ६३ ॥<br>शुक्लतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापविनाशनम्।<br>नास्ति तेन समं तीर्थं नर्मदायां युधिष्ठिर ॥ ६४ ॥<br><br>दर्शनात् स्पर्शनात् तस्य स्नानदानतपोजपात्।<br>होमाच्चैवोपवासाच्च शुक्लतीर्थे महत् फलम् ॥ ६५ ॥<br><br>योजनं तत् स्मृतं क्षेत्रं देवगन्धर्वसेवितम्।<br>शुक्लतीर्थमिति ख्यातं सर्वपापविनाशनम् ॥ ६६ ॥<br><br>पादपाग्रेण दृष्टेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति।<br>देव्या सह सदा भर्गस्तत्र तिष्ठति शंकरः ॥ ६७ ॥<br><br>कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां वैशाखे मासि सुव्रत।<br>कैलासाच्चाभिनिष्क्रम्य तत्र संनिहितो हरः ॥ ६८ ॥<br><br>देवदानवगन्धर्वाः सिद्धविद्याधरास्तथा।<br>गणाश्चाप्सरसां नागास्तत्र तिष्ठन्ति पुंगव ॥ ६९ ॥<br>रजकेन यथा वस्त्रं शुक्लं भवति वारिणा।<br>आजन्मनि कृतं पापं शुक्लतीर्थे व्यपोहति।<br>स्नानं दानं तपः श्राद्धमनन्तं तत्र दृश्यते ॥ ७० ॥<br><br>शुक्लतीर्थात् परं तीर्थं न भूतं न भविष्यति।<br>पूर्वे वयसि कर्माणि कृत्वा पापानि मानवः।<br>अहोरात्रोपवासेन शुक्लतीर्थे व्यपोहति ॥ ७१ ॥<br><br>कार्तिकस्य तु मासस्य कृष्णपक्षे चतुर्दशी।<br>घृतेन स्नापयेद् देवमुपोष्य परमेश्वरम्।<br>एकविंशत्कुलोपेतो न च्यवेदेश्वरात् पदात् ॥ ७२ ॥<br><br>तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञदानेन वा पुनः।<br>न तां गतिमवाप्नोति शुक्लतीर्थे तु यां लभेत् ॥ ७३ ॥तदनन्तर सभी पापोंको नष्ट करनेवाले अंकोल तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ किया गया स्नान, दान, ब्राह्मण-भोजन तथा पिण्डदान परलोकमें अनन्त फल प्रदान करनेवाला होता है। जो त्रैयम्बक (त्र्यम्बक) मन्त्रके द्वारा जलसे चरु पकाकर उससे अंकोल (वृक्ष)-के मूलमें यथाविधि पिण्डदान करता है, उसके द्वारा तारे गये पितर जबतक चन्द्रमा तथा तारे रहते हैं, तबतक तृप्त रहते हैं। राजेन्द्र ! तदनन्तर उत्तम तापसेश्वर (तीर्थमें) जाना चाहिये। राजेन्द्र ! वहाँ स्नानमात्र करनेसे व्यक्ति तपस्याका फल प्राप्त करता है ॥ ६१-६३ ॥<br><br>इसके पश्चात् सभी पापोंका नाश करनेवाले शुक्लतीर्थमें जाना चाहिये। युधिष्ठिर ! नर्मदामें उसके समान कोई तीर्थ नहीं है। उस शुक्लतीर्थके दर्शन करने, स्पर्श करने तथा वहाँ स्नान, दान, तप, जप, होम और उपवास करनेसे महान् फल प्राप्त होता है। देवताओं तथा गन्धर्वोंसे सेवित वह एक योजनका क्षेत्र शुक्लतीर्थ इस नामसे विख्यात है। वह समस्त पापोंको नष्ट करनेवाला है। (इस तीर्थमें स्थित) वृक्षके अग्रभागको भी देखनेसे ब्रह्महत्या दूर हो जाती है, वहाँ देवी (पार्वती)-के साथ भर्ग (तेजोमय) शंकर सदैव निवास करते हैं। सुव्रत ! वैशाख मासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको वहाँ कैलाससे आकर हर (शंकर) स्थित होते हैं। श्रेष्ठ! वहाँ देवता, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, अप्सराओंके समूह तथा नाग रहते हैं ॥ ६४-६९ ॥<br><br>जिस प्रकार रजक (धोबी)-के द्वारा जलसे (धोनेसे) वस्त्र स्वच्छ (मलरहित) हो जाता है, उसी प्रकार शुक्लतीर्थमें स्नानसे जन्मभरका किया हुआ पाप दूर हो जाता है, वहाँ किया गया स्नान, दान, तप तथा श्राद्ध अनन्त फलदायक हो जाता है। शुक्लतीर्थ-सा परम तीर्थ न कोई हुआ न होगा। मनुष्य पूरी अवस्थाभरमें किये गये पापोंको शुक्लतीर्थमें एक अहोरात्रके उपवाससे दूर कर देता है। कार्तिक मासमें कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको उपवासकर परमेश्वर देवको घृतसे स्नान कराना चाहिये। इससे मनुष्य अपनी इक्कीस पीढ़ियोंके साथ ईश्वरके लोकमें निवास करता है। कभी भी वहाँसे च्युत नहीं होता। शुक्लतीर्थमें जो गति प्राप्त होती है, वह तपस्या, ब्रह्मचर्य, यज्ञ अथवा दानसे प्राप्त नहीं होती ॥ ७०-७३ ॥
* अध्याय ३९ *४६१
शुक्लतीर्थं महातीर्थमृषिसिद्धनिषेवितम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् पुनर्जन्म न विन्दति ॥ ७४ ॥<br><br>अयने वा चतुर्दश्यां संक्रान्तौ विषुवे तथा।<br>स्नात्वा तु सोपवासः सन् विजितात्मा समाहितः ॥ ७५ ॥<br><br>दानं दद्याद् यथाशक्ति प्रीयेतां हरिशंकरौ।<br>एतत् तीर्थप्रभावेण सर्वं भवति चाक्षयम् ॥ ७६ ॥<br><br>अनाथं दुर्गतं विप्रं नाथवन्तमथापि वा।<br>उद्वाहयति यस्तीर्थे तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ ७७ ॥<br><br>यावत् तद्रोमसंख्या तु तत्प्रसूतिकुलेषु च।<br>तावद् वर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते ॥ ७८ ॥ऋषियों तथा सिद्धोंसे सेवित शुक्लतीर्थ महान् तीर्थ है। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य पुनर्जन्म नहीं प्राप्त करता। वहाँ अयन, चतुर्दशी, संक्रान्ति तथा विषुव (योग)-में स्नानोपरान्त उपवास करते हुए विजितात्मा पुरुषको समाहित होकर यथाशक्ति दान देना चाहिये। इससे विष्णु तथा शिव प्रसन्न होते हैं। इस तीर्थके प्रभावसे सब कुछ अक्षय होता है। अनाथ, दुर्गतिको प्राप्त अथवा सनाथ ब्राह्मणका भी इस तीर्थमें विवाह करानेसे जो पुण्य-फल प्राप्त होता है, उसे सुनो—उसके (विवाह सम्पन्न करानेवालेके) शरीरमें तथा उसके कुलकी संतानोंके शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ७४-७८॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र यमतीर्थमनुत्तमम्।<br>कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां माघमासे युधिष्ठिर ।<br>स्नानं कृत्वा नक्तभोजी न पश्येद् योनिसङ्कटम् ॥ ७९ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र एरण्डीतीर्थमुत्तमम्।<br>संगमे तु नरः स्नायादुपवासपरायणः।<br>ब्राह्मणं भोजयेदेकं कोटिर्भवति भोजिताः ॥ ८० ॥<br><br>एरण्डीसंगमे स्नात्वा भक्तिभावात् तु रञ्जितः।<br>मृत्तिकां शिरसि स्थाप्य अवगाह्य च तज्जलम्।<br>नर्मदोदकसम्मिश्रं मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥ ८१ ॥राजेन्द्र! तदनन्तर परम उत्तम यमतीर्थमें जाना चाहिये। युधिष्ठिर! माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको इस यमतीर्थमें स्नान करके रात्रिमें भोजन करनेवालेको गर्भके संकटका सामना नहीं करना पड़ता। राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ एरण्डी-तीर्थमें जाना चाहिये। व्यक्ति वहाँ संगममें स्नानकर उपवासपरायण रहते हुए एक ब्राह्मणको भोजन कराये, इससे करोड़ों (ब्राह्मणों)-को भोजन करानेका फल मिलता है। एरण्डी-संगममें स्नान करके भक्तिभावसे परिपूर्ण होकर मस्तकमें वहाँकी मिट्टी लगानेसे तथा नर्मदाके जलसे मिश्रित उस (एरण्डी-संगम)-के जलमें स्नान करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ७९-८१॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं कार्णाटिकेश्वरम्।<br>गङ्गावतरते तत्र दिने पुण्ये न संशयः ॥ ८२ ॥<br><br>तत्र स्नात्वा च पीत्वा च दत्त्वा चैव यथाविधि।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥ ८३ ॥<br><br>नन्दितीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>प्रीयते तस्य नन्दीशः सोमलोके महीयते ॥ ८४ ॥राजेन्द्र! इसके पश्चात् कार्णाटिकेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ पुण्य (पर्व)-दिनमें निश्चित रूपसे गङ्गा अवतरित होती हैं। वहाँ स्नानकर, (जल) पीकर और विधिपूर्वक दान देनेसे व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। तदनन्तर नन्दितीर्थमें जाकर स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेसे उसपर नन्दीश्वर प्रसन्न होते हैं और वह सोमलोकमें आदर प्राप्त करता है॥ ८२-८४॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं त्वनरकं शुभम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् नरकं नैव पश्यति ॥ ८५ ॥<br><br>तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र स्वान्यस्थीनि विनिक्षिपेत्।<br>रूपवान् जायते लोके धनभोगसमन्वितः ॥ ८६ ॥राजेन्द्र! तदुपरान्त शुभ अनरक नामक तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य नरकका दर्शन नहीं करता। राजेन्द्र! उस तीर्थमें अपनी अस्थियोंके विसर्जनकी प्रेरणा अपने परिजनोंको देनी चाहिये। (वहाँ जिसकी अस्थि विसर्जित होती है) वह जन्मान्तरमें दिव्य रूप एवं विविध ऐश्वर्यसे सम्पन्न होता है॥ ८५-८६॥

४७० * कूर्मपुराण *


ततो गच्छेत राजेन्द्र कपिलातीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ८७॥<br><br>ज्येष्ठमासे तु सम्प्राप्ते चतुर्दश्यां विशेषतः।<br>तत्रोपोष्‍य नरो भक्त्या दद्याद् दीपं घृतेन तु ॥ ८८॥<br><br>घृतेन स्नापयेद् रुद्रं सघृतं श्रीफलं दहेत्।<br>घण्टाभरणसंयुक्तां कपिलां वै प्रदापयेत् ॥ ८९॥<br><br>सर्वाभरणसंयुक्तः सर्वदेवनमस्कृतः।<br>शिवतुल्यबलो भूत्वा शिववत् क्रीडते चिरम् ॥ ९०॥राजेन्द्र ! तदनन्तर उत्तम कपिलातीर्थमें जाना चाहिये। राजन् ! वहाँ स्नानकर व्यक्ति हजार गोदानका फल प्राप्त करता है। ज्येष्ठ मासके आनेपर विशेषरूपसे चतुर्दशी तिथिको वहाँ उपवास कर मनुष्यको भक्तिपूर्वक घृतका दीप-दान करना चाहिये। घृतसे ही रुद्रका अभिषेक करना चाहिये, घृतयुक्त श्रीफलका हवन करना चाहिये और घंटा तथा आभरणोंसे सम्पन्न कपिला गौका दान करना चाहिये। इससे मनुष्य सभी अलंकारोंसे युक्त, सभी देवताओंके लिये वन्दनीय और शिवके समान तुल्य बलवाला होकर चिरकालतक शिवके समान क्रीडा करता है॥ ८७-९०॥
अङ्गारकदिने प्राप्ते चतुर्थ्यां तु विशेषतः।<br>स्नापयित्वा शिवं दद्याद् ब्राह्मणेभ्यस्तु भोजनम् ॥ ९१॥<br><br>सर्वभोगसमायुक्तो विमानैः सार्वकामिकैः।<br>गत्वा शक्रस्य भवनं शक्रेण सह मोदते ॥ ९२॥<br><br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो धनवान् भोगवान् भवेत्।<br>अङ्गारकनवम्यां तु अमावास्यां तथैव च।<br>स्नापयेत् तत्र यत्नेन रूपवान् सुभगो भवेत् ॥ ९३॥विशेषरूपसे मंगलके दिन चतुर्थी पड़नेपर (इस कपिलातीर्थमें) शिवका अभिषेककर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य सभी भोगोंसे समन्वित होकर अपनी इच्छाके अनुसार सर्वत्र अप्रतिहतगति एवं सभी प्रकारकी सुविधाओंसे परिपूर्ण विमानोंके द्वारा इन्द्रके भवनमें जाकर इन्द्रके साथ आनन्दित होता है। स्वर्गसे च्युत होनेपर इस लोकमें भी धनवान् और भोगवान् होता है। अङ्गारक-नवमी (मंगलवारयुक्त नवमी) तथा अमावास्याको भी वहाँ (कपिलातीर्थमें) प्रयत्नपूर्वक अभिषेक करनेसे व्यक्ति रूपवान् तथा सौभाग्यशाली होता है॥ ९१-९३॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र गणेश्वरमनुत्तमम्।<br>श्रावणे मासि सम्प्राप्ते कृष्णपक्षे चतुर्दशी ॥ ९४॥<br><br>स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते।<br>पितॄणां तर्पणं कृत्वा मुच्यतेऽसावृणत्रयात् ॥ ९५॥राजेन्द्र ! तदनन्तर उत्तम गणेश्वर (तीर्थ)-में जाना चाहिये। श्रावण मास आनेपर कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है और पितरोंका तर्पण करनेसे तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है॥ ९४-९५॥
गङ्गेश्वरसमीपे तु गङ्गावदनमुत्तमम्।<br>अकामो वा सकामो वा तत्र स्नात्वा तु मानवः।<br>आजन्मजनितैः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः ॥ ९६॥गणेश्वर (तीर्थ)-के समीप श्रेष्ठ गङ्गावदन नामक तीर्थ है। वहाँ मनुष्य कामनापूर्वक अथवा निष्कामभावसे स्नान करके जन्मभरके किये गये पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है॥ ९६॥
तस्य वै पश्चिमे देशे समीपे नातिदूरतः।<br>दशाश्वमेधिकं तीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ९७॥<br><br>उपोष्‍य रजनीमेकां मासि भाद्रपदे शुभे।<br>अमावस्यां नरः स्नात्वा पूजयेद् वृषभध्वजम् ॥ ९८॥उस (गङ्गावदन)-के पश्चिमी भागमें बहुत दूर नहीं अपितु समीपमें ही तीनों लोकोंमें विख्यात दशाश्वमेधिक नामक तीर्थ है। वहाँ शुभ भाद्रपद मासकी अमावास्याको एक रात्रिका उपवासकर स्नानपूर्वक वृषभध्वजका पूजन करना चाहिये॥ ९७-९८॥
  • अध्याय ४० * | ४७१ ---|---

काञ्चनेन विमानेन किङ्किणीजालमालिना ।
गत्वा रुद्रपुरं रम्यं रुद्रेण सह मोदते ॥ ९९ ॥
सर्वत्र सर्वदिवसे स्नानं तत्र समाचरेत् ।
पितॄणां तर्पणं कुर्यादश्वमेधफलं लभेत् ॥ १०० ॥ | ऐसा करनेसे किंकिणीके समूहसे अलंकृत सोनेके विमानसे रमणीय रुद्रपुरमें पहुँचने तथा वहाँ रुद्रके साथ आनन्दानुभव करनेका सुअवसर प्राप्त होता है। उस (दशाश्वमेधिक) तीर्थमें सर्वत्र सभी दिनोंमें स्नान करना चाहिये और पितरोंका तर्पण करना चाहिये, इससे अश्वमेधका फल प्राप्त होता है ॥ ९९-१०० ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें उनतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३९ ॥


चालीसवाँ अध्याय

तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें नर्मदा तथा उसके समीपवर्ती तीर्थोंकी महिमा, मार्कण्डेय तथा युधिष्ठिरके संवादकी समाप्ति

मार्कण्डेय उवाच

ततो गच्छेत राजेन्द्र भृगुतीर्थमनुत्तमम् ।
तत्र देवो भृगुः पूर्वं रुद्रमाराधयत् पुरा ॥ १ ॥

दर्शनात् तस्य देवस्य सद्यः पापात् प्रमुच्यते ।
एतत् क्षेत्रं सुविपुलं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ २ ॥

तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः ।
उपानहोस्तथा युग्मं देयमन्नं सकाञ्चनम् ।
भोजनं च यथाशक्ति तदस्याक्षयमुच्यते ॥ ३ ॥

क्षरन्ति सर्वदानानि यज्ञदानं तपः क्रिया ।
अक्षयं तत् तपस्तप्तं भृगुतीर्थे युधिष्ठिर ॥ ४ ॥

तस्यैव तपसोग्रेण तुष्टेन त्रिपुरारिणा ।
सांनिध्यं तत्र कथितं भृगुतीर्थे युधिष्ठिर ॥ ५ ॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र गौतमेश्वरमुत्तमम् ।
यत्राराध्य त्रिशूलाङ्कं गौतमः सिद्धिमाप्नुयात् ॥ ६ ॥

तत्र स्नात्वा नरो राजन् उपवासपरायणः ।
काञ्चनेन विमानेन ब्रह्मलोके महीयते ॥ ७ ॥

वृषोत्सर्गं ततो गच्छेच्छाश्वतं पदमाप्नुयात् ।
न जानन्ति नरा मूढा विष्णोर्मायाविमोहिताः ॥ ८ ॥


मार्कण्डेयजीने कहा— राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ भृगुतीर्थमें जाना चाहिये। प्राचीन कालमें यहाँ महर्षि भृगुदेवने भगवान् रुद्रकी आराधना की थी। उन देवके दर्शन करनेसे तत्काल पापसे मुक्ति हो जाती है। यह क्षेत्र बहुत बड़ा तथा सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है। यहाँ स्नान कर व्यक्ति स्वर्ग जाते हैं और यहाँ मृत्युको प्राप्त होनेवालोंका पुनर्जन्म नहीं होता। यहाँ जूतेका जोड़ा तथा सोनेके साथ अन्नका दान करना चाहिये। यथाशक्ति भोजन भी कराना चाहिये। यह सब अक्षय (फलवाला) कहा गया है। युधिष्ठिर! सभी दान, यज्ञ, तप तथा कर्म नष्ट हो जाते हैं (किंतु) भृगुतीर्थमें किया हुआ तप अक्षय होता है। युधिष्ठिर! उन्हीं (महर्षि भृगु)-की उग्र तपस्यासे प्रसन्न होकर त्रिपुरारि भगवान् शंकर भृगुतीर्थमें सदैव संनिहित रहते हैं, यह शास्त्रोंमें कहा गया है ॥ १–५ ॥

राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम गौतमेश्वर (तीर्थ)-में जाना चाहिये। जहाँ त्रिशूलका चिह्न धारण करनेवाले त्रिशूली (भगवान् शंकर)-की आराधनाकर (महर्षि) गौतमने सिद्धि प्राप्त की थी। राजन्! वहाँ (गौतमेश्वर-तीर्थमें) स्नानकर उपवासरत व्यक्ति सोनेके विमानद्वारा ब्रह्मलोक जाता है तथा वहाँ आदर प्राप्त करता है। तदुपरान्त वृषोत्सर्ग-तीर्थकी यात्रा कर शाश्वत पद प्राप्त करना चाहिये। विष्णुकी मायासे मोहित मूढ़ व्यक्ति इस तीर्थको नहीं जानते ॥ ६–८ ॥

४७२ * कूर्मपुराण *

धौतपापं ततो गच्छेद् धौतं यत्र वृषेण तु।<br>नर्मदायां स्थितं राजन् सर्वपातकनाशनम्।<br>तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥ ९ ॥<br><br>तत्र तीर्थे तु राजेन्द्र प्राणत्यागं करोति यः।<br>चतुर्भुजस्त्रिनेत्रश्च हरतुल्यबलो भवेत् ॥ १० ॥<br><br>वसेत् कल्पायुतं साग्रं शिवतुल्यपराक्रमः।<br>कालेन महता जातः पृथिव्यामेकराड् भवेत् ॥ ११ ॥इसके पश्चात् धौतपाप नामक तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ स्वयं वृष (अर्थात् भगवान् धर्म)-ने अपना (पाप) धोया था। राजन्! सभी पातकोंका नाश करनेवाला वह तीर्थ नर्मदामें स्थित है। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जो प्राणोंका त्याग करता है, वह चार भुजावाला, तीन नेत्रोंवाला और शंकरके समान बलवाला होता है। शिवके समान पराक्रमी होकर वह दस हजार कल्पोंसे भी अधिक समयतक शिवलोकमें निवास करता है और बहुत समयके बाद वह पृथ्वीपर एकच्छत्र सम्राट् बनकर उत्पन्न होता है॥ ९-११॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र हंसतीर्थमनुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मलोके महीयते ॥ १२ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र सिद्धो यत्र जनार्दनः।<br>वराहतीर्थमाख्यातं विष्णुलोकगतिप्रदम् ॥ १३ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र चन्द्रतीर्थमनुत्तमम्।<br>पौर्णमास्यां विशेषेण स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र चन्द्रलोके महीयते ॥ १४ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र कन्यातीर्थमनुत्तमम्।<br>शुक्लपक्षे तृतीयायां स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र पृथिव्यामेकराड् भवेत् ॥ १५ ॥<br><br>देवतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वदेवनमस्कृतम्।<br>तत्र स्नात्वा च राजेन्द्र देवैः सह मोदते ॥ १६ ॥राजेन्द्र! उसके बाद श्रेष्ठ हंस-तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। राजेन्द्र! वहाँसे विष्णुलोककी गति प्रदान करनेवाले वराहतीर्थ नामसे प्रसिद्ध तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ जनार्दनने सिद्धि प्राप्त की थी। राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ चन्द्रतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ विशेषरूपसे पौर्णमासीको स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेवाला व्यक्ति चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। राजेन्द्र! इसके पश्चात् अत्युत्तम कन्यातीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे व्यक्ति पृथ्वीमें एकमात्र सम्राट् होता है। तदनन्तर सभी देवताओंसे वन्दित देवतीर्थमें जाना चाहिये। राजेन्द्र! वहाँ स्नान करनेसे देवताओंके साथ आनन्द (-के अनुभवका अवसर) प्राप्त होता है॥ १२-१६॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र शिखितीर्थमनुत्तमम्।<br>यत् तत्र दीयते दानं सर्वं कोटिगुणं भवेत् ॥ १७ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं पैतामहं शुभम्।<br>यत् तत्र क्रियते श्राद्धं सर्वं तदक्षयं भवेत् ॥ १८ ॥<br><br>सावित्रीतीर्थमासाद्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>विधूय सर्वपापानि ब्रह्मलोके महीयते ॥ १९ ॥<br><br>मनोहरं तु तत्रैव तीर्थं परमशोभनम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् देवैः सह मोदते ॥ २० ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र मानसं तीर्थमुत्तमम्।<br>स्नात्वा तत्र नरो राजन् रुद्रलोके महीयते ॥ २१ ॥राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ शिखितीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ जो कुछ दान दिया जाता है, वह सब करोड़ गुना फलवाला हो जाता है। राजेन्द्र! शुभ पैतामह तीर्थमें भी जाना चाहिये। वहाँ जो श्राद्ध किया जाता है, वह अक्षय (फलवाला) हो जाता है। सावित्रीतीर्थमें पहुँचकर जो प्राणोंका परित्याग करता है, वह सभी पापोंको धोकर ब्रह्मलोकमें महिमा प्राप्त करता है। वहीं मनोहर नामक परम सुन्दर तीर्थ है। राजन्! वहाँ स्नानकर मनुष्य देवताओंके साथ आनन्द प्राप्त करता है। राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम मानस तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ १७-२१॥
* अध्याय ४० *४७३
स्वर्गबिन्दुं ततो गच्छेत् तीर्थं देवनमस्कृतम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् दुर्गतिं नैव गच्छति॥ २२॥<br><br>अप्सरेशं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>क्रीडते नाकलोकस्थो ह्यप्सरोभिः स मोदते॥ २३॥<br>ततो गच्छेत राजेन्द्र भारभूतिमनुत्तमम्।<br>उपोषितोऽर्चयेदीशं रुद्रलोके महीयते।<br>अस्मिंस्तीर्थे मृतो राजन् गाणपत्यमवाप्नुयात्॥ २४॥<br><br>कार्तिके मासि देवेशमर्चयेत् पार्वतीपतिम्।<br>अश्वमेधात् दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ २५॥<br><br>वृषभं यः प्रयच्छेत तत्र कुन्देन्दुसप्रभम्।<br>वृषयुक्तेन यानेन रुद्रलोकं स गच्छति॥ २६॥<br><br>एतत् तीर्थं समासाद्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति॥ २७॥<br><br>जलप्रवेशं यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>हंसयुक्तेन यानेन स्वर्गलोकं स गच्छति॥ २८॥<br>एरण्ड्या नर्मदायास्तु संगमं लोकविश्रुतम्।<br>तत्र तीर्थं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥ २९॥<br><br>उपवासपरो भूत्वा नित्यं व्रतपरायणः।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र मुच्यते ब्रह्महत्यया॥ ३०॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र नर्मदोदधिसंगमम्।<br>जमदग्निरिति ख्यातः सिद्धो यत्र जनार्दनः॥ ३१॥<br><br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् नर्मदोदधिसंगमे।<br>त्रिगुणं चाश्वमेधस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ३२॥<br>ततो गच्छेत राजेन्द्र पिङ्गलेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रलोके महीयते॥ ३३॥<br><br>तत्रोपवासं यः कृत्वा पश्येत विमलेश्वरम्।<br>सप्तजन्मकृतं पापं हित्वा याति शिवालयम्॥ ३४॥तदुपरान्त देवताओंसे नमस्कृत स्वर्गबिन्दु नामक तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्यकी दुर्गति नहीं होती। इसके बाद अप्सरेश-तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। इससे वह स्वर्गलोकमें निवास करते हुए क्रीड़ा करता है और अप्सराओंके साथ आनन्दित होता है॥ २२-२३॥<br><br>राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम भारभूति नामक तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ उपवास करते हुए ईश्वरकी आराधना करनेसे रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। राजन्! इस तीर्थमें मरनेवाला (शिवलोकमें) गाणपत्य-पद प्राप्त करता है। (यहाँ) कार्तिक मासमें पार्वतीपति देवताओंके ईश शंकरकी पूजा करनी चाहिये। इसका फल मनीषी लोग अश्वमेधके फलसे भी दस गुना अधिक बताते हैं। जो वहाँ कुन्दपुष्प तथा इन्दु (चन्द्रमा)-के समान (श्वेत) वर्णवाले वृषभका दान करता है, वह वृषयुक्त विमानसे रुद्रलोकमें जाता है। इस तीर्थमें पहुँचकर जो प्राणोंका परित्याग करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो विशुद्ध आत्मावाला होकर रुद्रलोकमें जाता है। नराधिप! इस तीर्थमें जो जलमें प्रवेश (-कर प्राणत्याग) करता है, वह हंसयुक्त विमानसे स्वर्गलोक जाता है॥ २४-२८॥<br><br>एरण्डी तथा नर्मदाका संगम विख्यात है। वहाँ सभी पापोंको नष्ट करनेवाला महान् पुण्यप्रद तीर्थ है। राजेन्द्र! वहाँ स्नानकर उपवास करनेवाला तथा नित्य व्रतपरायण रहनेवाला व्यक्ति ब्रह्महत्या (-के पाप)-से मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! तदनन्तर नर्मदा और सागरके संगम-स्थलमें जाना चाहिये। जहाँ जमदग्नि नामसे विख्यात जनार्दनको सिद्धि प्राप्त हुई थी। राजन्! वहाँ नर्मदा तथा सागरके संगममें स्नान करनेसे मनुष्य अश्वमेधके फलका तिगुना फल प्राप्त करता है॥ २९-३२॥<br><br>राजेन्द्र! तदुपरान्त उत्तम पिङ्गलेश्वर तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। वहाँ उपवास करके जो विमलेश्वरका दर्शन करता है, वह सात जन्मोंमें किये पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकमें जाता है॥ ३३-३४॥