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संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
  • अध्याय ३८ * २१३

पुष्करे सवनस्यापि महावीतः सुतोऽभवत्। धातकिश्चैव द्वावेतौ पुत्रौ पुत्रवतां वरौ ॥ १४॥ महावीतं स्मृतं वर्षं तस्य नाम्ना महात्मनः। नाम्ना तु धातकेश्चापि धातकीखण्डमुच्यते ॥ १५॥ शाकद्वीपेश्वरस्याथ हव्यस्याप्यभवन् सुताः। जलदश्च कुमारश्च सुकुमारो मणीचकः। कुसुमोत्तरोऽथ मोदाकिः सप्तमः स्यान्महाद्रुमः ॥ १६॥ जलदं जलदस्याथ वर्षं प्रथममुच्यते। कुमारस्य तु कौमारं तृतीयं सुकुमारकम् ॥ १७॥ मणीचकं चतुर्थं तु पञ्चमं कुसुमोत्तरम्। मोदाकं षष्ठमित्युक्तं सप्तमं तु महाद्रुमम् ॥ १८॥ क्रौञ्चद्वीपेश्वरस्यापि सुता द्युतिमतोऽभवन्। कुशलः प्रथमस्तेषां द्वितीयस्तु मनोहरः ॥ १९॥ उष्णास्तृतीयः सम्प्रोक्तश्चतुर्थः प्रवरः स्मृतः। अन्धकारो मुनिश्चैव दुन्दुभिश्चैव सप्तमः। तेषां स्वनामभिर्देशाः क्रौञ्चद्वीपाश्रयाः शुभाः ॥ २०॥ ज्योतिष्मतः कुशद्वीपे सप्तैवासन् महौजसः। उद्भेदो वेणुमांश्चैवाश्वरथो लम्बनो धृतिः। षष्ठः प्रभाकरश्चापि सप्तमः कपिलः स्मृतः ॥ २१॥ स्वनामचिह्नितान् यत्र तथा वर्षाणि सुव्रताः। ज्ञेयानि सप्त तान्येषु द्वीपेष्वेवं नयो मतः ॥ २२॥ शाल्मलद्वीपनाथस्य सुताश्चासन् वपुष्मतः। श्वेतश्च हरितश्चैव जीमूतो रोहितस्तथा। वैद्युतो मानसश्चैव सप्तमः सुप्रभो मतः ॥ २३॥ प्लक्षद्वीपेश्वरस्यापि सप्त मेधातिथेः सुताः। ज्येष्ठः शान्तभयस्तेषां शिशिरश्च सुखोदयः। आनन्दश्च शिवश्चैव क्षेमकश्च ध्रुवस्तथा ॥ २४॥ प्लक्षद्वीपादिषु ज्ञेयः शाकद्वीपान्तिकेषु वै। वर्णाश्रमविभागेन स्वधर्मो मुक्तये द्विजाः ॥ २५॥ जम्बूद्वीपेश्वरस्यापि पुत्रास्त्वासन् महाबलाः। अग्नीध्रस्य द्विजश्रेष्ठास्तन्नामानि निबोधत ॥ २६॥ नाभिः किंपुरुषश्चैव तथा हरिरिलावृतः। रम्यो हिरणवांश्च कुरुर्भद्राश्वः केतुमालकः ॥ २७॥ जम्बूद्वीपेश्वरो राजा स चाग्नीध्रो महामतिः। विभज्य नवधा तेभ्यो यथान्यायं ददौ पुनः ॥ २८॥


पुष्करमें सवनको भी महावीत तथा धातकि नामक दो पुत्र हुए। पुत्रवानोंके पुत्रोंमें ये दोनों ही पुत्र श्रेष्ठ थे। उन महात्मा (महावीत)-के नामसे उस वर्षको महावीतवर्ष कहा गया है और धातकिके भी नामसे धातकिखण्ड कहा जाता है। शाकद्वीपके राजा हव्यको जलद, कुमार, सुकुमार, मणीचक, कुसुमोत्तर तथा मोदाकि एवं सातवाँ महाद्रुम नामक पुत्र हुआ॥ १४—१६॥

(इन सातों पुत्रोंके राज्यक्षेत्र इनके नामसे एक-एक वर्ष कहलाये—इसीलिये) जलदका जलद नामक प्रथम वर्ष कहा जाता है। कुमारका कौमार नामक वर्ष, इसी प्रकार तीसरा सुकुमारक (वर्ष), चौथा मणीचक, पाँचवाँ कुसुमोत्तर, छठा मोदाक और सातवाँ महाद्रुम नामक वर्ष है। क्रौञ्चद्वीपके राजा द्युतिमान्‌को भी पुत्र हुए। उनमें कुशल पहला, मनोहर दूसरा, उष्ण तीसरा पुत्र कहा गया है और चौथा पुत्र प्रवर नामसे जाना जाता है। इसी प्रकार अन्धकार (पाँचवाँ), मुनि (छठा) तथा दुन्दुभि सातवाँ पुत्र था। उनके (अपने ही) नामसे प्रसिद्ध सुन्दर देश क्रौञ्चद्वीपमें स्थित हैं। कुशद्वीपमें ज्योतिष्मान्‌को महान् ओजस्वी सात पुत्र हुए। उद्भेद, वेणुमान्, अश्वरथ, लम्बन, धृति तथा छठा प्रभाकर और सातवाँ कपिल कहा गया है॥ १७—२१॥

हे सुव्रतो! इस (कुशद्वीप)-में उनके नामसे युक्त वर्ष हैं। इसी प्रकार उन अन्य द्वीपोंमें भी स्थिति समझनी चाहिये। शाल्मलद्वीपके स्वामी वपुष्मान्‌के श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत और मानस तथा सातवें सुप्रभ नामक पुत्र थे। प्लक्षद्वीपके राजा मेधातिथिके भी सात पुत्र हुए। उनमें ज्येष्ठ पुत्र शान्तभय था। इसके अतिरिक्त शिशिर, सुखोदय, आनन्द, शिव, क्षेमक तथा ध्रुव नामक पुत्र थे॥ २२—२४॥

द्विजो! प्लक्षद्वीप आदिसे लेकर शाकद्वीपतक वर्ण और आश्रमके भेदसे स्वधर्म (पालन)-को मुक्तिका साधन समझना चाहिये। हे श्रेष्ठ द्विजो! जम्बूद्वीपके अधिपति अग्नीध्रके भी महान् बलशाली पुत्र थे, उनके नाम सुनो—नाभि, किंपुरुष, हरि, इलावृत, रम्य, हिरण्वान्, कुरु, भद्राश्व तथा केतुमालक नामक नौ पुत्र थे॥ २५—२७॥

जम्बूद्वीपेश्वर महामति उन राजा अग्नीध्रने (जम्बूद्वीपको) नौ भागोंमें बाँटकर न्यायानुसार उन (पुत्रों)-को दे दिया॥ २८॥

२१४ * कूर्मपुराण *


नाभेस्तु दक्षिणं वर्षं हिमाह्वं प्रददौ पुनः।
हेमकूटं ततो वर्षं ददौ किंपुरुषाय तु॥ २९॥
तृतीयं नैषधं वर्षं हरये दत्तवान् पिता।
इलावृताय प्रददौ मेरुमध्यमिलावृतम्॥ ३०॥
नीलाचलाश्रितं वर्षं रम्याय प्रददौ पिता।
श्वेतं यदुत्तरं वर्षं पित्रा दत्तं हिरण्वते॥ ३१॥
यदुत्तरं शृङ्गवतो वर्षं तत् कुरवे ददौ।
मेरोः पूर्वेण यद् वर्षं भद्राश्वाय न्यवेदयत्।
गन्धमादनवर्षं तु केतुमालाय दत्तवान्॥ ३२॥
वर्षेष्वेतेषु तान् पुत्रानभिषिच्य नराधिपः।
संसारकष्टतां ज्ञात्वा तपस्तेपे वनं गतः॥ ३३॥
हिमाह्वयं तु यस्यैतन्नाभेरासीन्महात्मनः।
तस्यार्षभोऽभवत् पुत्रो मरुदेव्यां महाद्युतिः॥ ३४॥
ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताग्रजः।
सोऽभिषिच्यर्षभः पुत्रं भरतं पृथिवीपतिः।
वानप्रस्थाश्रमं गत्वा तपस्तेपे यथाविधि॥ ३५॥
तपसा कर्षितोऽत्यर्थं कृशो धमनिसंततः।
ज्ञानयोगरतो भूत्वा महापाशुपतोऽभवत्॥ ३६॥
सुमतिर्भरतस्याभूत् पुत्रः परमधार्मिकः।
सुमतेस्तैजसस्तस्मादिन्द्रद्युम्नो व्यजायत॥ ३७॥
परमेष्ठी सुतस्तस्मात् प्रतीहारस्तदन्वयः।
प्रतिहर्तेति विख्यात उत्पन्नस्तस्य चात्मजः॥ ३८॥
भवस्तस्मादथोग्दीथः प्रस्तावस्तत्सुतोऽभवत्।
पृथुस्ततस्ततो रक्तो रक्तस्यापि गयः सुतः॥ ३९॥
नरो गयस्य तनयस्तस्य पुत्रो विराडभूत्।
तस्य पुत्रो महावीर्यो धीमांस्तस्मादजायत॥ ४०॥
महान्तोऽपि ततश्चाभूद् भौवनस्तत्सुतोऽभवत्।
त्वष्टा त्वष्टुश्च विरजो रजस्तस्याप्यभूत् सुतः॥ ४१॥

(अग्नीध्रने) नाभिको दक्षिण दिशामें स्थित हिम नामक वर्ष प्रदान किया। तदनन्तर किंपुरुषको हेमकूट नामक वर्ष दिया। पिता (अग्नीध्र)-ने हरिको तृतीय नैषध नामक वर्ष प्रदान किया और इलावृतको मेरुके मध्यमें स्थित इलावृत (नामक वर्ष) दिया। पिताने रम्यको नीलाचलयुक्त वर्ष प्रदान किया और जो उत्तरमें स्थित श्वेतवर्ष है, उसे हिरण्वान्‌को दिया। शृंगवान् पर्वतके उत्तरमें स्थित (उत्तरकुरु नामक) वर्ष कुरुको दिया और मेरुके पूर्वमें स्थित (भद्राश्व नामक) वर्ष भद्राश्वको दिया तथा गन्धमादन नामक वर्ष केतुमालको प्रदान किया॥ २९-३२॥

इन वर्षोंमें अपने पुत्रोंको अभिषिक्त कर राजा (अग्नीध्र) संसारके कष्टको जानकर तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये। जिन महात्मा नाभिके पास हिम नामक वर्ष था, उन्हें मरुदेवीसे महान् द्युतिमान् ऋषभ नामक पुत्र हुआ। ऋषभको सौ पुत्रोंमें सबसे ज्येष्ठ भरत नामक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ। भरत नामक पुत्रको पृथ्वीके अधिपति के रूपमें अभिषिक्त कर राजा ऋषभ वानप्रस्थाश्रमका आश्रय लेकर यथाविधि तप करने लगे। तपस्यासे अत्यन्त क्षीण होनेके कारण वे इतने कृश हो गये कि उनके शरीरकी नाड़ियाँ दीखती थीं। (तपःपूत वे) ज्ञानयोगपरायण होकर महापाशुपत* हो गये॥ ३३-३६॥

(उन) भरतको भी सुमति नामक परम धार्मिक पुत्र हुआ। सुमतिका पुत्र तैजस और उस (तैजस)-से इन्द्रद्युम्न उत्पन्न हुआ। उस इन्द्रद्युम्नका पुत्र परमेष्ठी हुआ और उस (परमेष्ठी)-का पुत्र प्रतीहार हुआ। उस प्रतीहारका जो पुत्र उत्पन्न हुआ, वह प्रतिहर्ताके नामसे विख्यात हुआ। उससे भव, भवसे उद्गीथ तथा उस (उद्गीथ)-से प्रस्ताव नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। उस (प्रस्ताव)-से पृथु एवं पृथुसे रक्त उत्पन्न हुआ और रक्तको भी गय नामक पुत्र हुआ। गयका पुत्र नर और उसका पुत्र विराट् हुआ। उस (विराट्)-का पुत्र महावीर्य और उससे धीमान् (नामक पुत्र) उत्पन्न हुआ॥ ३७-४०॥

उस (धीमान्)-से महान्त नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र भौवन हुआ। उस (भौवन)-का त्वष्टा हुआ। उस (त्वष्टा)-से विरज तथा विरजसे रज नामक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ ४१॥


* पाशुपत (पशुपति-महादेवको परम ध्येय माननेवाला) व्रत है। इसमें पूर्ण परिनिष्ठित परम विरक्त मनुष्य महापाशुपत कहा जाता है।

  • अध्याय ३९ * २१५

शतजिद् रजसस्तस्य जज्ञे पुत्रशतं द्विजाः।<br>तेषां प्रधानो बलवान् विश्वज्योतिरिति स्मृतः॥ ४२॥द्विजो! उस रजस्को शतजित् नामक पुत्र हुआ और उसके सौ पुत्र हुए। उनमें जो प्रधान और बलवान् था, वह विश्वज्योति नामसे प्रसिद्ध हुआ। देव ब्रह्माकी आराधना कर (विश्वज्योतिने) क्षेमक नामके महाबाहु और शत्रुमर्दन तथा धर्मज्ञ राजाको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया॥ ४२-४३॥
आराध्य देवं ब्रह्माणं क्षेमकं नाम पार्थिवम्।<br>असूत पुत्रं धर्मज्ञं महाबाहुमरिंदमम्॥ ४३॥
एते पुरस्ताद् राजानो महासत्त्वा महौजसः।<br>एषां वंशप्रसूतैश्च भुक्तेयं पृथिवी पुरा॥ ४४॥पूर्वकालमें ये महासत्त्वसम्पन्न और महान् ओजस्वी राजा थे। इनके वंशमें उत्पन्न लोगोंने प्राचीन कालमें इस पृथिवीका उपभोग किया॥ ४४॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे अष्टात्रिंशोऽध्यायः॥ ३८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३८॥


उनतालीसवाँ अध्याय

'भू' आदि सात लोकोंका वर्णन, ग्रह-नक्षत्रोंकी स्थितिका वर्णन तथा उनका परिमाप, सूर्यरथका वर्णन, पूर्व आदि दिशाओंमें स्थित इन्द्रादि देवोंकी अमरावती आदि पुरियोंका नाम-निर्देश, सूर्यकी महिमा

सूत उवाचसूतजीने कहा—
अतः परं प्रवक्ष्यामि संक्षेपेण द्विजोत्तमाः।<br>त्रैलोक्यस्यास्य मानं वो न शक्यं विस्तरेण तु॥ १॥हे द्विजोत्तमो! अब मैं आप लोगोंसे संक्षेपमें इस त्रैलोक्यके परिमाणका वर्णन करूँगा, क्योंकि इसका विस्तारसे वर्णन नहीं किया जा सकता। (सृष्टिके आदिमें) भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक—ये (सातों) लोक अण्डसे उत्पन्न बताये गये हैं॥ १-२॥
भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकोऽथ महस्ततः।<br>जनस्तपश्च सत्यं च लोकास्त्वण्डोद्भवा मताः॥ २॥
सूर्याचन्द्रमसोर्यावत् किरणैरवभासते।<br>तावद् भूर्लोक आख्यातः पुराणे द्विजपुंगवाः॥ ३॥द्विजश्रेष्ठो! सूर्य और चन्द्रमाकी किरणोंसे जहाँतकका भाग प्रकाशित होता है, उतने भागको पुराणमें भूलोक कहा गया है। सूर्यके परिमण्डलसे भूलोकका जितना परिमाण है, उतना ही विस्तार भुवर्लोकका भी सूर्यके मण्डलसे है। आकाशमें ऊपरकी ओर जहाँ ध्रुव (तारा) स्थित है, वहाँतकके मण्डलको स्वर्लोक कहा जाता है। वहाँ वायुकी नेमियाँ* हैं। आवह, प्रवह, अनुवह, संवह, विवह तथा उसके ऊपर परावह और उसके ऊपर परिवह नामक वायुकी सात नेमियाँ हैं। भूमिसे एक लाख योजन ऊपर सूर्यका मण्डल स्थित है॥ ३-७॥
यावत्प्रमाणो भूर्लोको विस्तरात् परिमण्डलात्।<br>भुवर्लोकोऽपि तावान् स्यान्मण्डलाद् भास्करस्य तु॥ ४॥
ऊर्ध्वं यन्मण्डलाद् व्योम ध्रुवो यावद् व्यवस्थितः।<br>स्वर्लोकः स समाख्यातस्तत्र वायोस्तु नेमयः॥ ५॥
आवहः प्रवहश्चैव तथैवानुवहः परः।<br>संवहो विवहश्चाथ तदूर्ध्वं स्यात् परावहः॥ ६॥
तथा परिवहश्चोर्ध्वं वायोर्वै सप्त नेमयः।<br>भूमेर्योजनलक्षे तु भानोर्वै मण्डलं स्थितम्॥ ७॥

* चक्र (रथके पहिया)-के ऊपर लोहेकी गोलाकार हाल (परिधि) लगी होती है, इसीके कारण चक्र बिखरता नहीं है। इसी गोलाकार हाल (परिधि)-को नेमि कहते हैं।

२१६ * कूर्मपुराण *

लक्षे दिवाकरस्यापि मण्डलं शशिनः स्मृतम्।<br>नक्षत्रमण्डलं कृत्स्नं तल्लक्षेण प्रकाशते॥ ८ ॥सूर्यसे भी एक लाख (योजन) ऊपरके भागमें चन्द्रमाका मण्डल कहा गया है। उससे एक लाख योजनपर स्थित सम्पूर्ण नक्षत्र-मण्डल प्रकाशित होता है॥ ८॥
द्वे लक्षे ह्युत्तरे विप्रा बुधो नक्षत्रमण्डलात्।<br>तावत्प्रमाणभागे तु बुधस्याप्युशना स्थितः॥ ९ ॥हे विप्रो! नक्षत्रमण्डलसे उत्तर दो लाख योजनकी दूरीपर बुध है। बुधसे उतने प्रमाणकी दूरीपर शुक्र स्थित है। शुक्रसे उतने ही प्रमाणपर मंगलकी स्थिति है।
अङ्गारकोऽपि शुक्रस्य तत्प्रमाणे व्यवस्थितः।<br>लक्षद्वयेन भौमस्य स्थितो देवपुरोहितः॥ १०॥मंगलसे दो लाख योजनकी दूरीपर देवताओंके पुरोहित बृहस्पति स्थित हैं। बृहस्पतिसे दो लाख योजन दूर
सौरिर्द्विलक्षेण गुरोर्ग्रहाणामथ मण्डलम्।<br>सप्तर्षिमण्डलं तस्माल्लक्षमात्रे प्रकाशते॥ ११॥सूर्यपुत्र शनैश्चर स्थित है। यह ग्रहोंका मण्डल है। ग्रहोंके उस मण्डलसे लाख योजनकी दूरीपर सप्तर्षि-मण्डल प्रकाशित होता है। ऋषियोंके मण्डल (सप्तर्षि-
ऋषीणां मण्डलादूर्ध्वं लक्षमात्रे स्थितो ध्रुवः।<br>मेढीभूतः समस्तस्य ज्योतिष्चक्रस्य वै ध्रुवः।<br>तत्र धर्मः स भगवान् विष्णुर्नारायणः स्थितः॥ १२॥मण्डल)-से एक लाख योजन ऊपर ध्रुव स्थित है। ध्रुव सम्पूर्ण ज्योतिश्चक्रका केन्द्र-रूप है। वहाँ धर्मरूप नारायण भगवान् विष्णु स्थित हैं॥ ९—१२॥
नवयोजनसाहस्रो विष्कम्भः सवितुः स्मृतः।<br>त्रिगुणस्तस्य विस्तारो मण्डलस्य प्रमाणतः॥ १३॥सूर्यका व्यास नौ हजार योजन कहा गया है। उसका तीन गुना सूर्यमण्डलका विस्तार है। सूर्यके विस्तारका
द्विगुणस्तस्य विस्ताराद् विस्तारः शशिनः स्मृतः।<br>तुल्यस्तयोस्तु स्वर्भानुर्भूत्वाऽधस्तात् प्रसर्पति॥ १४॥दो गुना चन्द्रमाका विस्तार कहा गया है। उन दोनोंके तुल्य राहु उन दोनोंके नीचे भ्रमण करता है। पृथ्वीकी
उद्धृत्य पृथिवीच्छायां निर्मितो मण्डलाकृतिः।<br>स्वर्भानोस्तु बृहत् स्थानं तृतीयं यत् तमोमयम्॥ १५॥छायाको लेकर मण्डलाकारनिर्मित राहुका जो तीसरा बृहत् स्थान है, वह तमोमय है। चन्द्रमाका सोलहवाँ
चन्द्रस्य षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते।<br>भार्गवात् पादहीनस्तु विज्ञेयो वै बृहस्पतिः॥ १६॥भाग शुक्रका है। शुक्रसे चतुर्थांश कम बृहस्पति (-का विस्तार) जानना चाहिये। बृहस्पतिसे चतुर्थांश कम
बृहस्पतेः पादहीनौ वक्रसौरौवुभौ स्मृतौ।<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव पादहीनस्तयोर्बुधः॥ १७॥मंगल एवं शनि—इन दोनोंका मण्डल कहा गया है। इन दोनोंके मण्डल तथा विस्तारसे चतुर्थांश कम बुधका
तारानक्षत्ररूपाणि वपुष्मन्तीह यानि वै।<br>बुधेन तानि तुल्यानि विस्ताराम्मण्डलात् तथा॥ १८॥मण्डल है। तारा और नक्षत्ररूपी* जो शरीरधारी हैं, वे सभी मण्डल एवं विस्तारसे बुधके तुल्य हैं॥ १३—१८॥
तारानक्षत्ररूपाणि हीनानि तु परस्परात्।<br>शतानि पञ्च चत्वारि त्रीणि द्वे चैव योजने॥ १९॥जो तारा एवं नक्षत्र-रूप हैं, वे एक-दूसरेसे पाँच, चार, तीन या दो सौ योजन कम विस्तारवाले हैं। सभी
सर्वावरनिकृष्टानि तारकामण्डलानि तु।<br>योजनान्यर्धमात्राणि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते॥ २०॥छोटे-बड़े ताराओंका मण्डल (ग्रह-पिण्डोंसे छोटे और एक) योजन या आधे योजन परिमाणवाले हैं, उनसे छोटा कोई विद्यमान नहीं है। उनसे ऊपर दूरगामी जो
उपरिष्टात् त्रयस्तेषां ग्रहा ये दूरसर्पिणः।<br>सौरोग्ङ्गिराश्च वक्रश्च ज्ञेया मन्दविचारिणः॥ २१॥शनि, बृहस्पति तथा मंगल हैं, उन्हें मन्दगतिसे विचरण करनेवाला समझना चाहिये। उनसे नीचे जो दूसरे सूर्य,
तेभ्योऽधस्ताच्च चत्वारः पुनरन्ये महाग्रहाः।<br>सूर्यः सोमो बुधश्चैव भार्गवश्चैव शीघ्रगाः॥ २२॥चन्द्रमा, बुध तथा शुक्र—चार महाग्रह हैं, ये शीघ्र गतिवाले हैं॥ १९—२२॥

* ज्योतिषमें अश्विनी आदि २७ अथवा 'अभिजत्' नामके नक्षत्रको लेकर २८ नक्षत्र प्रसिद्ध हैं—ये ही आकाशमें नक्षत्र नामसे विद्यमान हैं। इनके अतिरिक्त आकाशमें अगणित ज्योतिष्पिण्ड हैं, वे ही 'तारा' कहे जाते हैं।

  • अध्याय ३९ * २१७

दक्षिणायनमार्गस्थो यदा चरति रश्मिमान्।<br>तदा सर्वग्रहाणां स सूर्योऽधस्तात् प्रसर्पति॥ २३॥<br><br>विस्तीर्णं मण्डलं कृत्वा तस्योर्ध्वं चरते शशी।<br>नक्षत्रमण्डलं कृत्स्नं सोमादूर्ध्वं प्रसर्पति॥ २४॥<br>नक्षत्रेभ्यो बुधश्चोर्ध्वं बुधादूर्ध्वं तु भार्गवः।<br>वक्रस्तु भार्गवादूर्ध्वं वक्रादूर्ध्वं बृहस्पतिः॥ २५॥<br>तस्माच्छनैश्चरोऽप्यूर्ध्वं तस्मात् सप्तर्षिमण्डलम्।<br>ऋषीणां चैव सप्तानां ध्रुवश्चोर्ध्वं व्यवस्थितः॥ २६॥<br>योजनानां सहस्राणि भास्करस्य रथो नव।<br>ईषादण्डस्तथैव स्याद् द्विगुणो द्विजसत्तमाः॥ २७॥<br>सार्धकोटिस्तथा सप्त नियुतान्यधिकानि तु।<br>योजनानां तु तस्याक्षस्तत्र चक्रं प्रतिष्ठितम्॥ २८॥<br>त्रिनाभिमति पञ्चारे षण्णेमिन्यक्षयात्मके।<br>संवत्सरमये कृत्स्नं कालचक्रं प्रतिष्ठितम्॥ २९॥<br>चत्वारिंशत् सहस्राणि द्वितीयोऽक्षो विवस्वतः।<br>पञ्चान्यानि तु सार्धानि स्यन्दनस्य द्विजोत्तमाः॥ ३०॥<br>अक्षप्रमाणमुभयोः प्रमाणं तद् युगार्धयोः।<br>ह्रस्वोऽक्षस्तद्युगार्धेन ध्रुवाधारे रथस्य तु॥ ३१॥<br><br>द्वितीयोऽक्षे तु तच्चक्रं संस्थितं मानसाचले।<br>हयाश्च सप्त छन्दांसि तन्नामानि निबोधत॥ ३२॥<br>गायत्री च बृहत्युष्णिग् जगती पङ्क्तिरेव च।<br>अनुष्टुप् त्रिष्टुबित्युक्ताश्छन्दांसि हरयो हरेः॥ ३३॥<br>मानसोपरि माहेन्द्री प्राच्यां दिशि महापुरी।<br>दक्षिणेन यमस्याथ वरुणस्य तु पश्चिमे॥ ३४॥<br>उत्तरेण तु सोमस्य तन्नामानि निबोधत।<br>अमरावती संयमनी सुखा चैव विभा क्रमात्॥ ३५॥<br>काष्ठां गतो दक्षिणतः क्षिप्तेषुरिव सर्पति।<br>ज्योतिषां चक्रमादाय देवदेवः प्रजापतिः॥ ३६॥जब सूर्य दक्षिणायनके मार्गमें विचरण करता है, तब वह (सूर्य) सभी ग्रहोंके निम्न भागोंमें भ्रमण करता है। उसके ऊपर विस्तृत मण्डल बनाकर चन्द्रमा विचरण करता है। सम्पूर्ण नक्षत्र-मण्डल चन्द्रमासे ऊपर भ्रमण करता है॥ २३-२४॥<br><br>नक्षत्रोंसे ऊपर बुध, बुधसे ऊपर शुक्र, शुक्रसे ऊपर मंगल और मंगलसे ऊपर बृहस्पति है। उस बृहस्पतिसे भी ऊपर शनैश्चर, उससे ऊपर सप्तर्षि-मण्डल तथा सप्तर्षि-मण्डलके ऊपर ध्रुव स्थित है॥ २५-२६॥<br><br>हे श्रेष्ठ द्विजो! भास्करका रथ नौ हजार योजनका है। उसका ईषादण्ड¹ उसी प्रकार दो गुना (अर्थात् अठारह हजार योजनका) है। उसका धुरा डेढ़ करोड़ सत्तर लाख योजनका है और उसीमें चक्र (रथका पहिया) प्रतिष्ठित है। तीन नाभि,² पाँच अरे³ और छः नेमियोंवाले⁴ संवत्सरमय उस अक्षय चक्रमें यह सम्पूर्ण कालचक्र प्रतिष्ठित है। द्विजोत्तमो! सूर्यके रथका दूसरा अक्ष (चक्र या धुरा) चालीस तथा साढ़े पाँच हजार योजनका है॥ २७-३०॥<br><br>दोनों ओरके युगार्ध (जूआ)-का प्रमाण उस अक्ष (धुरे)-के परिमाणके बराबर है। धुरेके आधारमें स्थित ह्रस्व अक्ष उस युगार्ध (जूआ)-के बराबर है। द्वितीय अक्षमें स्थित उस (रथ)-का चक्र मानसाचलपर स्थित है। सात छन्द (उस रथके) अश्व हैं। उनके नाम सुनो—॥ ३१-३२॥<br><br>गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, पंक्ति, अनुष्टुप् तथा त्रिष्टुप्—ये (सात) छन्द सूर्यके (सात) अश्व कहे गये हैं। मानसाचलपर पूर्व दिशामें महेन्द्रकी महापुरी है। दक्षिणमें यमकी, पश्चिममें वरुणकी, उत्तरमें सोमकी नगरी है, उनके (भी)नाम सुनो—अमरावती, संयमनी, सुखा तथा विभा—ये क्रमसे इन्द्रादिकी महापुरियाँ हैं। दक्षिण दिशामें स्थित देवोंके भी देव प्रजापति (सूर्य) ज्योतिश्चक्रको ग्रहणकर प्रक्षिप्त बाणके समान भ्रमण करते हैं॥ ३३-३६॥

१-ईषादण्ड—यह रथका अवयव-विशेष है। यह अवयव-विशेष उन दो लम्बे दण्डोंको समझना चाहिये जो रथके आगे होते हैं। इन्हींके मध्य एक या अपेक्षानुसार एकसे अधिक अश्व जोड़े जाते हैं।
२-नाभि—रथके चक्रके बीचका भाग, जिसमें चारों ओरसे काष्ठ जुड़े रहते हैं।
३-नाभिके चारों ओर जो काष्ठ जुड़े रहते हैं, वे ही 'अर' या 'आर' कहे जाते हैं।
४-नेमि—रथके चक्रके ऊपरवाली लोहेकी परिधि (हाल)।

२१८ * कूर्मपुराण *


| दिवसस्य रविर्मध्ये सर्वकालं व्यवस्थितः।<br>सप्तद्वीपेषु विप्रेन्द्रा निशामध्यस्य सम्मुखम्॥ ३७॥<br><br>उदयास्तमने चैव सर्वकालं तु सम्मुखे।<br>अशेषासु दिशास्वेव तथैव विदिशासु च॥ ३८॥<br><br>कुलालचक्रपर्यन्तो भ्रमनेष यथेश्वरः।<br>करोत्यहस्तथा रात्रिं विमुञ्चन् मेदिनीं द्विजाः॥ ३९॥<br><br>दिवाकरकरैरेतत् पूरितं भुवनत्रयम्।<br>त्रैलोक्यं कथितं सद्भिर्लोकानां मुनिपुंगवाः॥ ४०॥<br><br>आदित्यमूलमखिलं त्रिलोकं नात्र संशयः।<br>भवत्यस्मात् जगत् कृत्स्नं सदेवासुरमानुषम्॥ ४१॥<br><br>रुद्रेन्द्रोपेन्द्रचन्द्राणां विप्रेन्द्राणां दिवौकसाम्।<br>द्युतिर्द्युतिमतां कृत्स्नं यत्तेजः सार्वलौकिकम्॥ ४२॥<br><br>सर्वात्मा सर्वलोकेशो महादेवः प्रजापतिः।<br>सूर्य एव त्रिलोकस्य मूलं परमदैवतम्॥ ४३॥<br><br>द्वादशान्ये तथादित्या देवास्ते येऽधिकारिणः।<br>निर्वहन्ति पदं तस्य तदंशा विष्णुमूर्तयः॥ ४४॥<br><br>सर्वे नमस्यन्ति सहस्त्रभानुं<br>गन्धर्वदेवोरगकिन्नराद्याः ।<br>यजन्ति यज्ञैर्विविधैर्द्विजेन्द्रा-<br>श्छन्दोमयं ब्रह्ममयं पुराणम्॥ ४५॥ | विप्रेन्द्रो! सात द्वीपोंमें दिनके मध्य एवं रात्रिके अर्धभागमें सूर्य सदा सम्मुख रहता है, उदय और अस्तके समय भी सदा सम्मुख रहता है। ये ईश्वर (सूर्य) कुम्हारके चक्रके समान सभी दिशाओं तथा विदिशाओंमें भ्रमण करते हैं। हे द्विजो! पृथ्वीका त्याग करते हुए ये दिन और रात्रिका निर्माण करते हैं। ये तीनों भुवन सूर्यकी किरणोंसे व्याप्त हैं। हे मुनिश्रेष्ठो! विद्वानोंने (समस्त) लोकोंको त्रैलोक्यके नामसे कहा है॥ ३७–४०॥<br><br>सम्पूर्ण त्रिलोकीके मूल सूर्य ही हैं, इसमें संशय नहीं। देवता, असुर तथा मनुष्योंसे युक्त सम्पूर्ण जगत् इन्हींसे उत्पन्न होता है। रुद्र, इन्द्र, उपेन्द्र, चन्द्रमा एवं श्रेष्ठ विप्रों तथा समस्त देवताओंका जो तेज है, द्युतिमानोंका जो प्रकाश है और समस्त लोकोंका जो सम्पूर्ण तेज है, (वह सूर्यका ही तेज है)। सूर्य ही सभी लोकोंके स्वामी, सर्वात्मा, प्रजापति, महान् देव, तीनों लोकोंके मूल और परम देवता हैं। इसी प्रकार अधिकारी-रूपमें जो अन्य बारह आदित्य देवता हैं, वे उन्हीं सूर्यके अंश हैं और विष्णुके मूर्तिरूप हैं। वे उन्हींके पद (कार्य)-को सम्पन्न करते हैं॥ ४१–४४॥<br><br>गन्धर्व, देवता, नाग तथा किन्नर आदि सभी हजारों किरणोंवाले सूर्यको नमस्कार करते हैं। श्रेष्ठ द्विज विविध यज्ञोंके द्वारा छन्दोमय एवं ब्रह्मस्वरूप पुरातन सूर्यदेवका यजन करते हैं॥ ४५॥ |


इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें उनतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३९॥

  • अध्याय ४० * | २१९ ---|---

चालीसवाँ अध्याय

सूर्य-रथ तथा द्वादश आदित्योंके नाम, सूर्य-रथके अधिष्ठातृ देवता आदिका वर्णन, सूर्यकी महिमा

सूत उवाचसूतजीने कहा—वे (सूर्यदेव) (सभी) देवों, (द्वादश) आदित्यों, (अष्ट) वसुओं, गन्धर्वों, अप्सराओं, ग्रामणी*, सर्पों तथा राक्षसोंसहित उस रथपर अधिष्ठित रहते हैं। धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, पर्जन्य, अंशु, भग, त्वष्टा तथा विष्णु—ये बारह आदित्य हैं। ये क्रमशः वसन्त आदि ऋतुओंमें भानुको आप्यायित करते हैं। पुलस्त्य, पुलह, अत्रि, वसिष्ठ, अंगिरा, भृगु, भरद्वाज, गौतम, कश्यप, क्रतु, जमदग्नि तथा कौशिक—ये ब्रह्मवादी मुनि अनेक प्रकारके छन्दों (वैदिक मन्त्रों)-के द्वारा क्रमशः सूर्यदेवकी स्तुति करते हैं॥ १-५॥
स रथोऽधिष्ठितो देवैरादित्यैर्वसुभिस्तथा।<br>गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः॥ १ ॥<br>धातार्यमाथ मित्रश्च वरुणः शक्र एव च।<br>विवस्वानथ पूषा च पर्जन्यश्चांशुरेव च॥ २ ॥<br>भगस्त्वष्टा च विष्णुश्च द्वादशैते दिवाकराः।<br>आप्याययन्ति वै भानुं वसन्तादिषु वै क्रमात्॥ ३ ॥<br>पुलस्त्यः पुलहश्चात्रिर्वसिष्ठश्चाङ्गिरा भृगुः।<br>भरद्वाजो गौतमश्च कश्यपः क्रतुरेव च॥ ४ ॥<br>जमदग्निः कौशिकश्च मुनयो ब्रह्मवादिनः।<br>स्तुवन्ति देवं विविधैश्छन्दोभिस्ते यथाक्रमम्॥ ५ ॥
रथकृच्च रथौजाश्च रथचित्रः सुबाहुकः।<br>रथस्वनोऽथ वरुणः सुषेणः सेनजित् तथा॥ ६ ॥<br>तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च रथजित् सत्यजित् तथा।<br>ग्रामण्यो देवदेवस्य कुर्वतेऽभीशुसंग्रहम्॥ ७ ॥<br>अथ हेतिः प्रहेतिश्च पौरुषेयो वधस्तथा।<br>सर्पो व्याघ्रस्तथापश्च वातो विद्युद् दिवाकरः॥ ८ ॥<br>ब्रह्मोपेतश्च विप्रेन्द्रा यज्ञोपेतस्तथैव च।<br>राक्षसप्रवरा ह्येते प्रयान्ति पुरतः क्रमात्॥ ९ ॥<br>वासुकिः कङ्कनीरश्च तक्षकः सर्पपुंगवः।<br>एलापत्रः शङ्खपालस्तथैरावतसंज्ञितः॥ १०॥<br>धनंजयो महापद्मस्तथा कर्कोटको द्विजाः।<br>कम्बलाश्वतरश्चैव वहन्त्येनं यथाक्रमम्॥ ११॥रथकृत्, रथौजा, रथचित्र, सुबाहुक, रथस्वन, वरुण, सुषेण, सेनजित्, तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, रथजित् और सत्यजित्—ये (बारह) ग्रामणी देवोंके देव सूर्यकी रश्मियोंका संग्रह करते हैं। हे विप्रेन्द्रो! हेति, प्रहेति, पौरुषेय, वध, सर्प, व्याघ्र, आप, वात, विद्युत्, दिवाकर, ब्रह्मोपेत और यज्ञोपेत—ये (बारह) श्रेष्ठ राक्षस क्रमसे सूर्यके आगे-आगे चलते हैं। हे द्विजो! वासुकि, कङ्कनीर, तक्षक, सर्पपुङ्गव, एलापत्र, शंखपाल, ऐरावत, धनंजय, महापद्म, कर्कोटक, कम्बल तथा अश्वतर—ये (बारह) नाग क्रमशः इन सूर्यदेवको वहन करते हैं॥ ६-११॥
तुम्बुरुर्नारदो हाहा हूहूर्विश्वावसुस्तथा।<br>उग्रसेनो वसुरुचिर्वावसुस्तथापरः॥ १२॥<br><br>चित्रसेनस्तथोर्णायुर्धृतराष्ट्रो द्विजोत्तमाः।<br>सूर्यवर्चा द्वादशैते गन्धर्वा गायतां वराः।<br>गायन्ति विविधैर्गानैर्भानुं षड्जादिभिः क्रमात्॥ १३॥<br><br>क्रतुस्थलाप्सरोवर्या तथान्या पुञ्जिकस्थला।<br>मेनका सहजन्या च प्रम्लोचा च द्विजोत्तमाः॥ १४॥द्विजोत्तमो! तुम्बुरु, नारद, हाहा, हूहू, विश्वावसु, उग्रसेन, वसुरुचि, अर्वावसु, चित्रसेन, ऊर्णायु, धृतराष्ट्र और सूर्यवर्चा—ये (बारह) श्रेष्ठ गायन करनेवाले गन्धर्व क्रमशः षड्ज आदि स्वरोंके द्वारा विविध प्रकारके गीतोंसे सूर्यके समीप गान करते रहते हैं। हे द्विजोत्तमो! अप्सराओंमें श्रेष्ठ अप्सरा—क्रतुस्थला, पुञ्जिक-स्थला, मेनका, सहजन्या, प्रम्लोचा,

* अग्रणी (नेता)।

२२०* कूर्मपुराण *
अनुम्लोचा घृताची च विश्वाची चोर्वशी तथा।<br>अन्या च पूर्वचित्तिः स्यादन्या चैव तिलोत्तमा॥ १५॥<br><br>ताण्डवैर्विविधैरेनं वसन्तादिषु वै क्रमात्।<br>तोषयन्ति महादेवं भानुमात्मानमव्ययम्॥ १६॥<br>एवं देवा वसन्त्यर्के द्वौ द्वौ मासौ क्रमेण तु।<br>सूर्यमाप्याययन्त्येते तेजसा तेजसां निधिम्॥ १७॥<br><br>ग्रथितैः स्वैर्वचोभिस्तु स्तुवन्ति मुनयो रविम्।<br>गन्धर्वाप्सरसश्चैनं नृत्यगेयैरुपासते॥ १८॥<br>ग्रामणीयक्षभूतानि कुर्वतेऽभीषुसंग्रहम्।<br>सर्पा वहन्ति देवेशं यातुधानाः प्रयान्ति च॥ १९॥<br><br>बालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयाद् रविम्।<br>एते तपन्ति वर्षन्ति भान्ति वान्ति सृजन्ति च।<br>भूतानामशुभं कर्म व्यपोहन्तीह कीर्तिताः॥ २०॥<br><br>एते सहैव सूर्येण भ्रमन्ति दिवि सानुगाः।<br>विमाने च स्थिता नित्यं कामगे वातरंहसि॥ २१॥<br><br>वर्षन्तश्च तपन्तश्च ह्लादयन्तश्च वै प्रजाः।<br>गोपयन्तीह भूतानि सर्वाणीवायुगक्षयात्॥ २२॥<br><br>एतेषामेव देवानां यथावीर्यं यथातपः।<br>यथायोगं यथासत्त्वं स एष तपति प्रभुः॥ २३॥<br>अहोरात्रव्यवस्थानकारणं स प्रजापतिः।<br>पितृदेवमनुष्यादीन् स सदाप्याययेद् रविः॥ २४॥<br><br>तत्र देवो महादेवो भास्वान् साक्षान्महेश्वरः।<br>भासते वेदविदुषां नीलग्रीवः सनातनः॥ २५॥<br><br>स एष देवो भगवान् परमेष्ठी प्रजापतिः।<br>स्थानं तद् विदुरादित्यं वेदज्ञा वेदविग्रहम्॥ २६॥अनुम्लोचा, घृताची, विश्वाची, उर्वशी, पूर्वचित्ति, अन्या और तिलोत्तमा—ये (बारह) अप्सराएँ क्रमशः वसन्त आदि ऋतुओंमें विविध ताण्डव आदि (नृत्यों)-के द्वारा इन अव्यय, आत्मस्वरूप महान् देवता भानुको संतुष्ट करती हैं॥ १२—१६॥<br><br>इस प्रकार ये देवता क्रमशः दो-दो महीनोंमें (वसन्त आदि ६ ऋतुओंमें) सूर्यमें प्रतिष्ठित रहते हुए तेजोनिधि सूर्यको अपने तेजसे आप्यायित करते हैं। मुनिगण स्वयंरचित स्तुतियोंसे सूर्यकी स्तुति करते रहते हैं और अप्सराएँ एवं गन्धर्व नृत्य तथा गीतोंके द्वारा इनकी उपासना करते हैं॥ १७-१८॥<br><br>ग्रामणी, यक्ष और भूतगण (सूर्यदेवसे) रश्मियोंका संग्रह करते हैं, सर्प देवताओंके ईश (सूर्य)-को वहन करते हैं और राक्षस (उनके आगे-आगे) चलते हैं। बालखिल्य नामक मुनिगण सूर्यको आवृतकर उदयाचलसे अस्ताचलतक ले जाते हैं। (पूर्वमें कहे गये) ये (द्वादश आदित्य) तपते, बरसते, प्रकाश करते, बहते एवं सृष्टि करते हैं। इनका कीर्तन करनेपर ये प्राणियोंके अशुभ कर्मोंको दूर करते हैं। ये नित्य कामचारी तथा वायुके समान गतिवाले विमानपर सूर्यके साथ अपने अनुचरोंसहित आकाशमें भ्रमण करते हैं। ये क्रमशः वर्षा, ताप एवं प्रजाको आनन्द प्रदान करते हुए प्रलयपर्यन्त सभी प्राणियोंकी रक्षा करते हैं। ये प्रभु सूर्य इन्हीं देवोंके वीर्य, तप, योग और सत्त्वके अनुसार (प्राणिमात्रको) ताप देते हैं॥ १९—२३॥<br><br>वे प्रजापति (सूर्य) दिन और रात्रिकी व्यवस्थाके कारण हैं। ये सूर्य पितरों, देवों तथा मनुष्य आदि सभीको सदा आप्यायित करते हैं। वेदज्ञोंके (आराध्य) सनातन, नीलग्रीव, महादेव साक्षात् देव महादेव महेश्वर ही सूर्यके रूपमें प्रकाशित होते हैं। वेदज्ञ लोग आदित्य (सूर्य)-को वेदका विग्रह (शरीर ही) मानते हैं और यही वेदविग्रह आदित्य, देव भगवान् परमेष्ठी प्रजापति हैं॥ २४—२६॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४०॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४०॥

  • अध्याय ४१ * | २२१ ---|---

एकतालीसवाँ अध्याय

सूर्यकी प्रधान सात रश्मियोंके नाम, इनके द्वारा ग्रहोंका आप्यायन, सूर्यकी अन्य हजारों नाडियोंका वर्णन तथा उनका कार्य, बारह महीनोंके बारह सूर्योंके नाम तथा छः ऋतुओंमें उनका वर्ण, आठ ग्रहोंका वर्णन, सोमके रथका वर्णन, देवोंद्वारा चन्द्रकलाओंका पान करना, पितरोंद्वारा अमावस्याको चन्द्रमाकी कलाका पान, बुध आदि ग्रहोंके रथका वर्णन

सूत उवाचसूतजी बोले— इस प्रकार ये महादेव कालात्मा
एवमेष महादेवो देवदेवः पितामहः।<br>करोति नियतं कालं कालात्मा ह्यैश्वरी तनुः॥ १ ॥ऐश्वर्यमय विग्रहवाले देवाधिदेव पितामह (सूर्य) कालका नियमन करते हैं। विप्रो! सभी लोकोंको प्रकाशित
तस्य ये रश्मयो विप्राः सर्वलोकप्रदीपकाः।<br>तेषां श्रेष्ठाः पुनः सप्त रश्मयो ग्रहयोनयः॥ २ ॥करनेवाली उनकी जो रश्मियाँ हैं, उनमें भी ग्रहोंकी योनिरूप सात रश्मियाँ अत्यन्त श्रेष्ठ हैं॥ १-२॥
सुषुम्नो हरिकेशश्च विश्वकर्मा तथैव च।<br>विश्वव्यचाः पुनश्चान्यः संयद्वसुरतः परः॥ ३ ॥सुषुम्न, हरिकेश, विश्वकर्मा, विश्वव्यचा, संयद्वसु, अर्वावसु तथा स्वराट्—ये सात रश्मियाँ कही गयी हैं।
अर्वावसुरीति ख्यातः स्वराडन्यः प्रकीर्तितः।<br>सुषुम्नः सूर्यरश्मिस्तु पुष्णाति शिशिरद्युतिम्॥ ४ ॥सुषुम्न नामक सूर्यकी रश्मि चन्द्रमाकी चाँदनीको पुष्ट करती है। यह सुषुम्न रश्मि तिरछे रूपसे ऊपरको जानेवाली
तिर्यगूर्ध्वप्रचारोऽसौ सुषुम्नः परिपठ्यते।<br>हरिकेशस्तु यः प्रोक्तो रश्मिर्नक्षत्रपोषकः॥ ५ ॥कही गयी है। हरिकेश नामक जो रश्मि कही गयी है, वह नक्षत्रोंका पोषण करनेवाली है। विश्वकर्मा नामक
विश्वकर्मा तथा रश्मिर्बुधं पुष्णाति सर्वदा।<br>विश्वव्यचास्तु यो रश्मिः शुक्रं पुष्णाति नित्यदा॥ ६ ॥रश्मि सदा बुध (ग्रह)-का पोषण करती है। विश्वव्यचा नामकी जो रश्मि है, वह नित्य शुक्र (ग्रह)-का पोषण
संयद्वसुरिति ख्यातः स पुष्णाति च लोहितम्।<br>बृहस्पतिं प्रपुष्णाति रश्मिरर्वावसुः प्रभोः।<br>शनैश्चरं प्रपुष्णाति सप्तमस्तु सुराट् तथा॥ ७ ॥करती है। संयद्वसु नामसे प्रसिद्ध रश्मि मंगलका पोषण करती है और प्रभु सूर्यकी अर्वावसु नामक रश्मि बृहस्पतिका पोषण करती है तथा सातवीं सुराट् (स्वराट्) नामक रश्मि शनैश्चरका पोषण करती है॥ ३—७॥
एवं सूर्यप्रभावेण सर्वा नक्षत्रतारकाः।<br>वर्धन्ते वर्धिता नित्यं नित्यमाप्याययन्ति च॥ ८ ॥इस प्रकार सूर्यके प्रभावसे सभी नक्षत्र एवं तारे नित्य बढ़ते हैं तथा वृद्धि प्राप्तकर नित्य दूसरोंको आप्यायित करते हैं। द्युलोक एवं पृथ्वीसे सम्बद्ध समस्त
दिव्यानां पार्थिवानां च नैशानां चैव सर्वशः।<br>आदानान्नित्यमादित्यस्तेजसां तमसां प्रभुः॥ ९ ॥तेज-समूह और निशा-सम्बन्धी तम—अन्धकारका नित्य आदान अर्थात् ग्रहण करनेके कारण प्रभु (सूर्य)-को आदित्य कहा जाता है। हजारों नेत्रवाले वे अपनी हजारों
आदत्ते स तु नाडीनां सहस्रेण समंततः।<br>नादेयांश्चैव सामुद्रान् कूप्यांश्चैव सहस्रदृक्।<br>स्थावराज्जङ्गमांश्चैव यच्च कुल्यादिकं पयः॥ १०॥नाडियों (किरणों)-द्वारा चारों ओरके नदियों, समुद्रों, कूपों, स्थावर तथा जङ्गम और नहरों आदिके जलका ग्रहण करते हैं। उनकी हजारों रश्मियाँ शीत, वर्षा एवं
तस्य रश्मिसहस्रं तच्छीतवर्षोष्णनिस्स्रवम्।<br>तासां चतुःशतं नाड्यो वर्षन्ते चित्रमूर्तयः॥ ११॥उष्णताकी सृष्टि करनेवाली हैं और उनमें चार सौ विचित्र मूर्तिस्वरूपा रश्मियाँ वर्षा करती हैं वन्दना,
वन्दनाश्चैव याज्याश्च केतना भूतनास्तथा।<br>अमृता नाम ताः सर्वा रश्मयो वृष्टिसर्जनाः॥ १२॥याज्या, केतना और भूतना—ये अमृता नामवाली सभी रश्मियाँ वर्षा करनेवाली हैं॥ ८-१२॥
२२२* कूर्मपुराण *
हिमोद्वाहाश्च ता नाड्यो रश्मयस्त्रिशतं पुनः ।<br>रश्म्यो मेष्यश्च पौष्यश्च ह्लादिन्यो हिमसर्जनाः ।<br>चन्द्रास्ता नामतः सर्वा पीताभाः स्युर्गभस्तयः ॥ १३ ॥<br><br>शुक्राश्च ककुभश्चैव गावो विश्वभृतस्तथा ।<br>शुक्रास्ता नामतः सर्वास्त्रिविधा घर्मसर्जनाः ॥ १४ ॥नाडीस्वरूपिणी तीन सौ रश्मियाँ हिमकी सृष्टि करती हैं। मेषी, पौषी तथा ह्लादिनी नामकी रश्मियाँ हिमकी सृष्टि करनेवाली हैं। ये सभी रश्मियाँ पीत वर्णकी और चन्द्र नामवाली हैं। शुक्रा, ककुभ् और विश्वभृत् नामक सभी रश्मियोंका नाम शुक्रा है। ये तीनों प्रकारकी रश्मियाँ धूपकी सृष्टि करनेवाली हैं॥ १३-१४॥
समं बिभर्ति ताभिः स मनुष्यपितृदेवताः ।<br>मनुष्यानौषधेनेह स्वधया च पितॄनपि ।<br>अमृतेन सुरान् सर्वांस्त्रिभिस्त्रींस्तर्पयत्यसौ ॥ १५ ॥उनके द्वारा वे (सूर्य) समान-रूपसे मनुष्यों, पितरों तथा देवताओंका पोषण करते हैं। वे (इन किरणोंके माध्यमसे) मनुष्योंको औषधके द्वारा, पितरोंको स्वधाके द्वारा और देवताओंको अमृतके द्वारा—इस प्रकार तीनोंको तीन पदार्थोंद्वारा संतृप्त करते हैं॥ १५॥
वसन्ते ग्रैष्मिके चैव शतैः स तपति त्रिभिः ।<br>शरद्यपि च वर्षासु चतुर्भिः सम्प्रवर्षति ।<br>हेमन्ते शिशिरे चैव हिममुत्सृजति त्रिभिः ॥ १६ ॥<br><br>वरुणो माघमासे तु सूर्यः पूषा तु फाल्गुने ।<br>चैत्रे मासि भवेदंशो धाता वैशाखतापनः ॥ १७ ॥<br><br>ज्येष्ठामूले भवेदिन्द्रः आषाढे सविता रविः ।<br>विवस्वान् श्रावणे मासि प्रौष्ठपद्यां भगः स्मृतः ॥ १८ ॥<br><br>पर्जन्योऽश्वयुजि त्वष्टा कार्तिके मासि भास्करः ।<br>मार्गशीर्षे भवेन्मित्रः पौषे विष्णुः सनातनः ॥ १९ ॥वे (सूर्य) वसन्त एवं ग्रीष्म ऋतुमें तीन सौ किरणोंसे तपते हैं। शरद् और वर्षा ऋतुमें चार सौ रश्मियोंके द्वारा वर्षा करते हैं तथा हेमन्त एवं शिशिर ऋतुमें तीन सौ रश्मियोंसे हिम प्रदान करते हैं। माघमासमें सूर्यका नाम वरुण होता है, फाल्गुनमें वे पूषा कहलाते हैं। सूर्य चैत्र-मासमें अंश, वैशाखमें धाता, ज्येष्ठा-मूल अर्थात् ज्येष्ठ-मासमें इन्द्र, आषाढ़में सविता, श्रावणमें विवस्वान् तथा भाद्रपदमासमें भग कहे जाते हैं। (ये ही) सूर्य आश्विनमें पर्जन्य, कार्तिकमें त्वष्टा, मार्गशीर्षमें मित्र और पौषमें सनातन विष्णु कहलाते हैं॥ १६-१९॥
पञ्चरश्मिसहस्राणि वरुणस्यार्ककर्मणि ।<br>षड्भिः सहस्रैः पूषा तु देवोंऽशः सप्तभिस्तथा ॥ २० ॥<br><br>धाताष्टभिः सहस्रैस्तु नवभिस्तु शतक्रतुः ।<br>विवस्वान् दशभिः पाति पात्येकादशभिर्भगः ॥ २१ ॥<br><br>सप्तभिस्तपते मित्रस्त्वष्टा चैवाष्टभिस्तपेत् ।<br>अर्यमा दशभिः पाति पर्जन्यो नवभिस्तपेत् ।<br>षड्भी रश्मिसहस्रैस्तु विष्णुस्तपति विश्वसृक् ॥ २२ ॥वरुण (नामक सूर्य)-की पाँच हजार रश्मियाँ सूर्यका कार्य सम्पादित करती हैं। इसी प्रकार पूषा छः हजार, अंश देव सात हजार, धाता आठ हजार, शतक्रतु इन्द्र नौ हजार, विवस्वान् दस हजार और भग ग्यारह हजार रश्मियोंसे पालन करते हैं। मित्र नामक सूर्य सात हजार और त्वष्टा आठ हजार रश्मियोंसे तपते हैं। अर्यमा दस हजार रश्मियोंसे पालन करते हैं और पर्जन्य नौ हजार रश्मियोंसे ताप प्रदान करते हैं। विश्वकी सृष्टि करनेवाले विष्णु (नामक सूर्य) छः हजार रश्मियोंसे तपते हैं॥ २०-२२॥
वसन्ते कपिलः सूर्यो ग्रीष्मे काञ्चनसप्रभः ।<br>श्वेतो वर्षासु वर्णेन पाण्डुरः शरदि प्रभुः ।<br>हेमन्ते ताम्रवर्णः स्याच्छिशिरे लोहितो रविः ॥ २३ ॥<br><br>ओषधीषु बलं धत्ते स्वधामपि पितृष्वथ ।<br>सूर्योऽमरत्वममृते त्रयं त्रिषु नियच्छति ॥ २४ ॥प्रभु सूर्य वसन्त ऋतुमें कपिल (भूरे) वर्णके, ग्रीष्ममें स्वर्णके समान, वर्षांमें श्वेत, शरद्में पाण्डुर (सफेद-मिश्रित पीले) रंगके, हेमन्तमें ताँबेके समान वर्णवाले और शिशिरमें सूर्य लोहित (लाल) वर्णके होते हैं। सूर्य ओषधियोंमें बलका आधान करते हैं, पितरोंको स्वधा और देवताओंको अमरत्व—इस प्रकार तीनोंको तीन पदार्थ प्रदान करते हैं॥ २३-२४॥
  • अध्याय ४१ * २२३
अन्ये चाष्टौ ग्रहा ज्ञेयाः सूर्येणाधिष्ठिता द्विजाः।<br>चन्द्रमाः सोमपुत्रश्च शुक्रश्चैव बृहस्पतिः।<br>भौमो मन्दस्तथा राहुः केतुमानपि चाष्टमः॥ २५॥हे द्विजो! अन्य आठ ग्रहोंको सूर्यसे अधिष्ठित जानना चाहिये। चन्द्रमा, चन्द्रमाका पुत्र बुध, शुक्र, बृहस्पति, मंगल, शनि, राहु तथा केतु नामक आठवाँ ग्रह है। वातरश्मियोंके द्वारा ध्रुवमें आबद्ध वे सभी ग्रह (अपनी कक्षामें) भ्रमण करते हुए यथास्थान सूर्यकी परिक्रमा करते हैं। द्विजो! वायुचक्रसे प्रेरित (ग्रहगण) अलातचक्रके समान भ्रमण करते हैं। चूँकि वायु उनका वहन करती है, इसलिये उसे 'प्रवह' कहा जाता है। सोमका रथ तीन चक्रोंवाला है। उसके वाम और दक्षिण भागमें कुन्द पुष्पके समान वर्णवाले दस अश्व जुते हैं, इसी रथसे निशाकर चन्द्रमा सूर्यके समान (अपनी) कक्षामें स्थित होकर नक्षत्रोंके मध्य परिभ्रमण करता है। हे विप्रेन्द्रो! चन्द्रमाकी रश्मियोंकी क्रमशः ह्रास और वृद्धि होती रहती है। दिनके क्रमानुसार शुक्लपक्षमें चन्द्रमाके परभागमें स्थित सूर्य सोम (चन्द्र)-को निरन्तर आपूरित करता है॥ २५–३०॥
सर्वे ध्रुवे निबद्धा वै ग्रहास्ते वातरश्मिभिः।<br>भ्राम्यमाणा यथायोगं भ्रमन्त्यनुदिवाकरम्॥ २६॥
अलातचक्रवद् यान्ति वातचक्रेरिता द्विजाः।<br>यस्माद् वहति तान् वायुः प्रवहस्तेन स स्मृतः॥ २७॥
रथस्त्रिचक्रः सोमस्य कुन्दाभास्तस्य वाजिनः।<br>वामदक्षिणतो युक्ता दश तेन निशाकरः॥ २८॥
वीथ्याश्रयाणि चरति नक्षत्राणि रविर्यथा।<br>ह्रासवृद्धी च विप्रेन्द्रा ध्रुवाधाराणि सर्वदा॥ २९॥
स सोमः शुक्लपक्षे तु भास्करे परतः स्थिते।<br>आपूर्यते परस्यान्तः सततं दिवसक्रमात्॥ ३०॥
क्षीणायितं सुरैः सोममाप्याययति नित्यदा।<br>एकेन रश्मिना विप्राः सुषुम्नाख्येन भास्करः॥ ३१॥हे विप्रो! देवताओं द्वारा (अमृत) पान किये जानेके कारण क्षीण हुए चन्द्रमाको सूर्य सुषुम्न नामक एक रश्मि (किरण)-से नित्य आप्यायित करते हैं। सूर्यके तेजसे चन्द्रमाका यह (क्षीण) शरीर पुष्ट होता है, अतएव दिनके क्रमानुसार पूर्णिमाको वह चन्द्रमा सम्पूर्ण रूपसे दिखायी देता है। हे विप्रो! देवता उस अमृतस्वरूप सम्पूर्ण सोमका आधे महीनेतक पान करते हैं, क्योंकि वे (देवता) अमृतका भोजन करनेवाले होते हैं। तदनन्तर पंद्रहवें भागके किंचित् कलात्मक भाग शेष बचनेपर अपराह्नमें पितृगण उस अन्तिम भागका सेवन करते हैं। पितृगण चन्द्रमाकी अवशिष्ट अमृतस्वरूपिणी अमृतमयी तथा पवित्र सुधा नामक कलाका दो लव (कालविशेष)-तक पान करते हैं॥ ३१–३५॥
एषा सूर्यस्य वीर्येण सोमस्याप्यायिता तनुः।<br>पौर्णमास्यां स दृश्येत सम्पूर्णो दिवसक्रमात्॥ ३२॥
सम्पूर्णमर्धमासेन तं सोमममृतात्मकम्।<br>पिबन्ति देवता विप्रा यतस्तेऽमृतभोजनाः॥ ३३॥
ततः पञ्चदशे भागे किंचिच्छिष्टे कलात्मके।<br>अपराह्ने पितृगणा जघन्यं पर्युपासते॥ ३४॥
पिबन्ति द्विकलं कालं शिष्टा तस्य कला तु या।<br>सुधामृतमयीं पुण्यां तामिन्दोरमृतात्मिकाम्॥ ३५॥
निःसृतं तदमावास्यां गभस्तिभ्यः स्वधामृतम्।<br>मासतृप्तिमवाप्याग्र्यां पितरः सन्ति निर्वृताः॥ ३६॥अमावस्याके दिन (चन्द्रमाकी) किरणोंसे निकलनेवाले स्वधा नामक अमृतका पान करनेसे पितर महीनेभरके लिये तृप्ति प्राप्त कर स्वस्थ हो जाते हैं। देवताओंके द्वारा (चन्द्रमाके) अमृतका पान किये जानेपर सोमका विनाश नहीं होता। श्रेष्ठ जनो! इस प्रकार सूर्यके कारण चन्द्रमाके क्षय एवं वृद्धिका क्रम चलता है। सोमके पुत्र (बुध)-के रथमें वायुके समान वेगवाले जलसे उत्पन्न आठ घोड़े जुते रहते हैं। वह बुध उसी रथसे सर्वत्र गमन करता है॥ ३६–३८॥
न सोमस्य विनाशः स्यात् सुधा देवैस्तु पीयते।<br>एवं सूर्यनिमित्तस्य क्षयो वृद्धिश्च सत्तमाः॥ ३७॥
सोमपुत्रस्य चाष्टाभिर्वाजिभिर्वायुवेगिभिः।<br>वारिजैः स्यन्दनो युक्तस्तेनासौ याति सर्वतः॥ ३८॥

२२४ * कूर्मपुराण *


| शुक्रस्य भूमिजैरश्वैः स्यन्दनो दशभिर्वृतः ।<br>अष्टाभिश्चाथ भौमस्य रथो हैमः सुशोभनः ॥ ३९ ॥<br><br>बृहस्पतेरथाष्टाश्वः स्यन्दनो हेमनिर्मितः ।<br>रथस्तमोमयोऽष्टाश्वो मन्दस्यायसनिर्मितः ।<br>स्वर्भानोर्भास्करारेश्च तथा षड्भिर्हयैर्वृतः ॥ ४० ॥ | शुक्रका रथ भूमिसे उत्पन्न दस घोड़ोंसे और मंगलका स्वर्णमय अत्यन्त सुन्दर रथ आठ घोड़ोंसे युक्त रहता है। बृहस्पतिका भी आठ घोड़ोंवाला रथ स्वर्णसे निर्मित है। शनिका लोहेसे बना हुआ रथ तमोमय है और आठ घोड़ोंवाला है। सूर्यके शत्रु राहु और केतुके रथ छः-छः अश्वोंसे युक्त हैं ॥ ३९-४० ॥ | | एते महाग्रहाणां वै समाख्याता रथा नव ।<br>सर्वे ध्रुवे महाभागा निबद्धा वातरश्मिभिः ॥ ४१ ॥<br><br>ग्रहर्क्षताराधिष्ण्यानि ध्रुवे बद्धान्यशेषतः ।<br>भ्रमन्ति भ्रामयन्त्येनं सर्वाण्यनिलरश्मिभिः ॥ ४२ ॥ | इस प्रकार महाग्रहोंके नौ रथोंका वर्णन किया गया। ये सभी महाभाग (ग्रह) वायुकी रश्मियोंके द्वारा ध्रुवमें आबद्ध हैं। सभी ग्रह, नक्षत्र और तारागण भी ध्रुवमें पूर्णतः निबद्ध हैं। वायुकी रश्मियोंद्वारा परिचालित होकर ये सभी परिभ्रमण करते रहते हैं ॥ ४१-४२ ॥ |

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें एकतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४१ ॥


बयालीसवाँ अध्याय

महः आदि सात लोकों तथा सात पातालोंका और वहाँके निवासियोंका वर्णन, वैष्णवी तथा शाम्भवी शक्तियोंका वर्णन

सूत उवाचसूतजी बोले—
ध्रुवादूर्ध्वं महर्लोकः कोटियोजनविस्तृतः ।<br>कल्पाधिकारिणस्तत्र संस्थिता द्विजपुंगवाः ॥ १ ॥<br><br>जनलोको महर्लोकात् तथा कोटिद्वयात्मकः ।<br>सनन्दनादयस्तत्र संस्थिता ब्रह्मणः सुताः ॥ २ ॥<br><br>जनलोकात् तपोलोकः कोटित्रयसमन्वितः ।<br>वैराजास्तत्र वै देवाः स्थिता दाहविवर्जिताः ॥ ३ ॥<br><br>प्राजापत्यात् सत्यलोकः कोटिषट्केन संयुतः ।<br>अपुनर्मारकास्तत्र ब्रह्मलोकस्तु स स्मृतः ॥ ४ ॥<br><br>अत्र लोकगुरुर्ब्रह्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः ।<br>आस्ते स योगिभिर्नित्यं पीत्वा योगामृतं परम् ॥ ५ ॥हे द्विजश्रेष्ठो! ध्रुवके ऊपर एक करोड़ योजन विस्तारवाला महर्लोक है। वहाँ कल्पके अधिकारीगण निवास करते हैं। इसी प्रकार महर्लोकसे ऊपर दो करोड़ योजनवाला जनलोक है। वहाँ ब्रह्माके (मानस) पुत्र सनन्दन आदि रहते हैं। जनलोकसे ऊपर तपोलोक तीन करोड़ योजनका है। वहाँ दाहरहित* वैराज नामक देवता रहते हैं। प्रजापत्यलोक अर्थात् तपोलोकके ऊपर छः करोड़ योजनका सत्यलोक है। वहाँ अपुनर्मारक (जन्म-मरणसे रहित जन) रहते हैं। वह ब्रह्मलोक कहा गया है। यहाँ परम योगामृतका पान कर विश्वतोमुख विश्वात्मा लोकगुरु ब्रह्मा योगियोंके साथ नित्य निवास करते हैं ॥ १-५ ॥
विशन्ति यतयः शान्ता नैष्ठिका ब्रह्मचारिणः ।<br>योगिनस्तापसाः सिद्धा जापकाः परमेष्ठिनम् ॥ ६ ॥<br><br>द्वारं तद्योगिनामेकं गच्छतां परमं पदम् ।<br>तत्र गत्वा न शोचन्ति स विष्णुः स च शंकरः ॥ ७ ॥शान्त स्वभाववाले यतिगण, नैष्ठिक ब्रह्मचारी, योगी, तपस्वी, सिद्ध तथा परमेष्ठीका जप करनेवाले यहाँ प्रवेश करते हैं। परमपदको प्राप्त करनेवाले योगियोंका वह एकमात्र द्वार है। वहाँ पहुँचकर (लोग) शोक नहीं करते। वही (यहाँ निवास करनेवाला) विष्णु है, शंकर है ॥ ६-७ ॥

* दाह-तापसे रहित (दैहिक, दैविक, भौतिक तापोंसे सर्वथा मुक्त)।

  • अध्याय ४२ * | २२५ ---|---

सूर्यकोटिप्रतीकाशं पुरं तस्य दुरासदम्।
न मे वर्णयितुं शक्यं ज्वालामालासमाकुलम्॥ ८ ॥
तत्र नारायणस्यापि भवनं ब्रह्मणः पुरे।
शेते तत्र हरिः श्रीमान् मायी मायामयः परः॥ ९ ॥
स विष्णुलोकः कथितः पुनरावृत्तिवर्जितः।
यान्ति तत्र महात्मानो ये प्रपन्ना जनार्दनम्॥ १० ॥
ऊर्ध्वं तद् ब्रह्मसदनात् पुरं ज्योतिर्मयं शुभम्।
वह्निना च परिक्षिप्तं तत्रास्ते भगवान् भवः॥ ११ ॥
देव्या सह महादेवश्चिन्त्यमानो मनीषिभिः।
योगिभिः शतसाहस्रैर्भूतै रुद्रैश्च संवृतः॥ १२ ॥
तत्र ते यान्ति नियता द्विजा वै ब्रह्मचारिणः।
महादेवपराः शान्तास्तापसा ब्रह्मवादिनः॥ १३ ॥

निर्ममा निरहंकाराः कामक्रोधविवर्जिताः।
द्रक्ष्यन्ति ब्रह्मणा युक्ता रुद्रलोकः स वै स्मृतः॥ १४॥
एते सप्त महालोकाः पृथिव्याः परिकीर्तिताः।
महातलादयश्चाधः पातालाः सन्ति वै द्विजाः॥ १५ ॥
महातलं च पातालं सर्वरत्नोपशोभितम्।
प्रासादैर्विविधैः शुभ्रैर्देवतायतनैर्युतम्॥ १६॥
अनन्तेन च संयुक्तं मुचुकुन्देन धीमता।
नृपेण बलिना चैव पातालस्वर्गवासिना॥ १७ ॥
शैलं रसातलं विप्राः शर्करं हि तलातलम्।
पीतं सुतलमित्युक्तं नितलं विद्रुमप्रभम्।
सितं हि वितलं प्रोक्तं तलं चैव सितेतरम्॥ १८॥
सुपर्णेन मुनिश्रेष्ठास्तथा वासुकिना शुभम्।
रसातलमिति ख्यातं तथान्यैश्च निषेवितम्॥ १९ ॥
विरोचनहिरण्याक्षतक्षकाद्यैश्च सेवितम्।
तलातलमिति ख्यातं सर्वशोभासमन्वितम्॥ २०॥
वैनतेयादिभिश्चैव कालनेमिपुरोगमैः।
पूर्वदेवैः समाकीर्णं सुतलं च तथापरैः॥ २१॥
नितलं यवनाद्यैश्च तारकाग्निमुखैस्तथा।
महान्तकाद्यैर्नागैश्च प्रह्लादेनासुरेण च॥ २२॥
वितलं चैव विख्यातं कम्बलाहीन्द्रसेवितम्।
महाजम्भेन वीरेण हयग्रीवेण वै तथा॥ २३॥
शंकुकर्णेन सम्भिन्नं तथा नमुचिपूर्वकैः।
तथान्यैर्विविधैर्नागैस्तलं चैव सुशोभनम्॥ २४॥

करोड़ों सूर्यके समान उन (ब्रह्मा)-का वह पुर अत्यन्त दुर्गम है। अग्निशिखाकी मालाओंसे समन्वित उस पुरका मैं वर्णन नहीं कर सकता। ब्रह्माके उस पुरमें नारायणका भी भवन है। वहाँ मायामय परम मायावान् श्रीमान् हरि शयन करते हैं। पुनरागमनसे रहित वह विष्णुलोक कहा गया है। जो जनार्दनके शरणागत हैं, वे महात्मा वहाँ जाते हैं। उस ब्रह्म-सदनसे ऊपर ज्योतिर्मय, अग्निसे व्याप्त कल्याणकारी पुर है। वहाँ सैकड़ों-हजारों योगियों, भूतों तथा रुद्रोंसे परिवृत, मनीषियोंके द्वारा ध्यान किये जाते हुए वे भगवान् भव महादेव देवी पार्वतीके साथ निवास करते हैं॥ ८-१२॥

वहाँ वे ही जाते हैं जो संयमी ब्राह्मण हैं, ब्रह्मचारी हैं, महादेवपरायण हैं, शान्त, तपस्वी और ब्रह्मवादी हैं, ममत्वरहित, अहंकारशून्य तथा काम-क्रोधसे रहित हैं। ब्रह्मज्ञानसम्पन्न ये (व्यक्ति इस लोकका) दर्शन करते हैं। उस लोकको रुद्रलोक कहा गया है॥ १३-१४॥

हे द्विजो! पृथ्वीके ये सात महालोक कहे गये हैं। (पृथ्वीके) अधोभागमें महातल आदि (सात) पाताल हैं। महातल नामक पाताल सभी रत्नोंसे सुशोभित और अनेक प्रकारके महलों और शुभ्र देवमन्दिरोंसे सम्पन्न है। वह (महातल) अनन्त (नाग), धीमान् मुचुकुन्द एवं पाताल-स्वर्गवासी राजा बलिसे युक्त है। हे विप्रो! रसातल शैलमय है, तलातल शर्करामय है। सुतल पीत वर्णका कहा गया है। नितल विद्रुम (मूँगे)-के समान वर्णवाला, वितल श्वेत वर्णका और तल कृष्ण वर्णका कहा गया है॥ १५-१८॥

हे मुनिश्रेष्ठो! शुभ रसातल गरुड, वासुकि (नाग) तथा अन्य (महात्माओं)-से सेवित कहा गया है। सभी शोभाओंसे युक्त तलातल विरोचन, हिरण्याक्ष तथा तक्षक आदिके द्वारा सेवित कहा गया है। सुतल वैनतेय आदि पक्षी, कालनेमि प्रभृति दूसरे श्रेष्ठ असुरोंसे समाकीर्ण है। तारक, अग्निमुख आदि यवन और महान् अन्तक आदि नागों तथा असुर प्रह्लादसे नितल नामक पाताल सेवित है। वितल नामक प्रसिद्ध पाताल कम्बल नामक नागराज, महाजम्भ और वीर हयग्रीवसे सेवित है। तल नामक पाताल शंकुकर्णसे युक्त तथा प्रधान नमुचि आदि दैत्यों और अन्य विविध प्रकारके नागोंसे सुशोभित है॥ १९-२४॥

२२६ * कूर्मपुराण *


तेषामधस्तान्नरका मायाद्याः परिकीर्तिताः।
पापिनस्तेषु पच्यन्ते न ते वर्णयितुं क्षमाः॥ २५॥

पातालानामधश्चास्ते शेषाख्या वैष्णवी तनुः।
कालाग्निरुद्रो योगात्मा नारसिंहोऽपि माधवः ॥ २६॥

योऽनन्तः पठ्यते देवो नागरूपी जनार्दनः।
तदाधारमिदं सर्वं स कालाग्निमपाश्रितः ॥ २७॥

तमाविश्य महायोगी कालस्तद्वदनोत्थितः।
विषज्वालामयोऽन्तेऽसौ जगत् संहरति स्वयम्॥ २८॥

सहस्रमायोऽप्रतिमः संहर्ता शंकरोद्भवः।
तामसी शाम्भवी मूर्तिः कालो लोकप्रकालनः॥ २९॥

उन (पातालों)-के नीचे माया आदि नरक कहे गये हैं, उनमें पापी लोग यातना पाते हैं। उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। पाताललोकके नीचे शेष नामवाली वैष्णवी मूर्ति विद्यमान है। जिसे कालाग्नि रुद्र, योगात्मा, नारसिंह, माधव, अनन्त, देव और नागरूपी जनार्दन भी कहा जाता है। यह सब उन्हींके आधारपर (टिका) है और वे कालाग्निके आश्रित हैं। उनमें प्रविष्ट होकर और उनके मुखसे प्रकट हुई विषकी ज्वालारूप होकर महायोगी काल स्वयं अन्तमें जगत्‌का संहार करते हैं॥ २५–२८॥

हजारों मायावाला एवं शंकरसे उत्पन्न अद्वितीय (काल) संहार करनेवाला है। वह शम्भुकी तामसी मूर्ति है। काल ही लोकोंका संहार करता है॥ २९॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४२॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें बयालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४२॥


तैंतालीसवाँ अध्याय

सात महाद्वीपों और सात महासागरोंका परिमाण, जम्बूद्वीप तथा मेरुपर्वतकी स्थिति, भारत तथा किंपुरुष आदि वर्षोंका वर्णन, वर्षपर्वतोंकी स्थिति, जम्बूद्वीपके नाम पड़नेका कारण, जम्बूद्वीपके नदी एवं पर्वतोंका और वहाँके निवासियोंका वर्णन

सूत उवाच

एतद् ब्रह्माण्डमाख्यातं चतुर्दशविधं महत्।
अतः परं प्रवक्ष्यामि भूर्लोकस्यास्य निर्णयम्॥ १॥

जम्बुद्वीपः प्रधानोऽयं प्लक्षः शाल्मल एव च।
कुशः क्रौञ्चश्च शाकश्च पुष्करश्चैव सप्तमः॥ २॥

एते सप्त महाद्वीपाः समुद्रैः सप्तभिर्वृताः।
द्वीपाद् द्वीपो महानुक्तः सागरादपि सागरः ॥ ३॥

क्षारोदेक्षुरसोदश्च सुरोदश्च घृतोदकः।
दध्योदः क्षीरसलिलः स्वादूदश्चेति सागराः ॥ ४॥

पञ्चाशत्कोटिविस्तीर्णा ससमुद्रा धरा स्मृता।
द्वीपेश्च सप्तभिर्युक्ता योजनानां समासतः॥ ५॥

जम्बूद्वीपः समस्तानां द्वीपानां मध्यतः शुभः।
तस्य मध्ये महामेरुर्विश्रुतः कनकप्रभः ॥ ६॥

सूतजी बोले— इस चौदह (सात पाताल तथा सात ऊर्ध्वलोक) प्रकारके महान् ब्रह्माण्डका वर्णन किया गया। इसके बाद इस भूलोकके निर्णयको कहूँगा। (भूलोकमें) जम्बूद्वीप प्रधान है। (इसके अतिरिक्त) प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौञ्च, शाक तथा सातवाँ पुष्कर द्वीप है। ये सातों महाद्वीप सात समुद्रोंसे घिरे हैं, एक द्वीपसे दूसरा द्वीप तथा एक सागरसे दूसरा सागर महान् कहा गया है। क्षारोदक, इक्षुरसोदक, सुरोदक, घृतोदक, दध्योदक, क्षीरोदक तथा स्वादूदक—ये (सात) महासागर हैं। संक्षेपमें समुद्रसहित यह पृथ्वी पचास करोड़ योजन विस्तारवाली कही जाती है। यह सात द्वीपोंसे परिवेष्टित है समस्त द्वीपोंके मध्यमें शुभ जम्बूद्वीप स्थित है। उसके बीचमें स्वर्णके समान आभावाला महामेरु कहा गया है॥ १–६॥

* अध्याय ४३ *२२७
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चतुरशीतिसाहस्रो योजनैस्तस्य चोच्छ्रयः।<br>प्रविष्टः षोडशाधस्ताद् द्वात्रिंशन्मूर्ध्नि विस्तृतः॥ ७ ॥<br>मूले षोडशसाहस्रो विस्तारस्तस्य सर्वतः।<br><br>भूपद्मस्यास्य शैलोऽसौ कर्णिकात्वेन संस्थितः॥ ८ ॥<br><br>हिमवान् हेमकूटश्च निषधश्चास्य दक्षिणे।<br>नीलः श्वेतश्च शृङ्गी च उत्तरे वर्षपर्वताः॥ ९ ॥<br><br>लक्षप्रमाणौ द्वौ मध्ये दशहीनास्तथा परे।<br>सहस्रद्वितयोच्छायास्तावद्विस्तारिणश्च ते॥ १० ॥<br>भारतं दक्षिणं वर्षं ततः किंपुरुषं स्मृतम्।<br>हरिवर्षं तथैवान्यन्मेरोर्दक्षिणतो द्विजाः॥ ११ ॥<br><br>रम्यकं चोत्तरं वर्षं तस्यैवानुहिरण्मयम्।<br>उत्तराः कुरवश्चैव यथैते भरतास्तथा॥ १२ ॥<br>नवसाहस्रमेकैकमेतेषां द्विजसत्तमाः।<br>इलावृतं च तन्मध्ये तन्मध्ये मेरुरुच्छ्रितः॥ १३ ॥<br><br>मेरोश्चतुर्दिशं तत्र नवसाहस्रविस्तृतम्।<br>इलावृतं महाभागाश्चत्वारस्तत्र पर्वताः।<br>विष्कम्भा रचिता मेरोर्योजनायुतमुच्छ्रिताः॥ १४ ॥<br><br>पूर्वेण मन्दरो नाम दक्षिणे गन्धमादनः।<br>विपुलः पश्चिमे पार्श्वे सुपार्श्वश्चोत्तरे स्मृतः॥ १५ ॥<br>कदम्बस्तेषु जम्बूश्च पिप्पलो वट एव च।<br>जम्बूद्वीपस्य सा जम्बूर्नामहेतुर्महर्षयः॥ १६ ॥<br><br>महागजप्रमाणानि जम्ब्वास्तस्याः फलानि च।<br>पतन्ति भूभृतः पृष्ठे शीर्यमाणानि सर्वतः॥ १७ ॥<br><br>रसेन तस्याः प्रख्याता तत्र जम्बूनदीति वै।<br>सरित् प्रवर्तते चापि पीयते तत्र वासिभिः॥ १८ ॥<br><br>न स्वेदो न च दौर्गन्ध्यं न जरा नेन्द्रियक्षयः।<br>तत्पानात् सुस्थमनसां नराणां तत्र जायते॥ १९ ॥<br><br>तीरमृत् तत्र सम्प्राप्य वायुना सुविशोषिता।<br>जाम्बूनदाख्यं भवति सुवर्णं सिद्धभूषणम्॥ २० ॥उसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। नीचेकी ओर यह सोलह योजनतक प्रविष्ट है और ऊपरकी ओर बत्तीस योजन विस्तृत है। उस पर्वतके मूलमें सभी ओर सोलह हजार योजनका विस्तार है। यह पर्वत इस पृथ्वीरूप कमलकी कर्णिकाके रूपमें अवस्थित है। इसके दक्षिणमें हिमवान्, हेमकूट तथा निषध और उत्तरमें नील, श्वेत एवं शृंगी नामक वर्षपर्वत हैं। इनमें दो (हिमवान् एवं हेमकूट वर्षपर्वत) एक लाख योजन परिमाणवाले हैं और अन्य (वर्षपर्वत) दस योजन कम विस्तारवाले हैं। इनकी ऊँचाई दो हजार योजनकी है और उनका विस्तार भी उतना ही है॥ ७–१०॥<br><br>हे द्विजो! मेरुके दक्षिण भागमें प्रथम भारतवर्ष, तदनन्तर किंपुरुषवर्ष और फिर हरिवर्ष तथा अन्य भी वैसे ही स्थित हैं। उसके उत्तरमें रम्यक, हिरण्मय एवं उत्तरकुरुवर्ष स्थित है। ये सभी भारतवर्षके समान हैं॥ ११–१२॥<br><br>द्विजश्रेष्ठो! इनमेंसे प्रत्येक नौ हजार योजनका है। इनके मध्यमें इलावृतवर्ष है और इसके मध्यमें उन्नत मेरु पर्वत है। हे महाभागो! वहाँ मेरुके चारों ओर नौ हजार योजनका इलावृत नामक वर्ष है। वहाँ चार पर्वत हैं। मेरुके व्यासके रूपमें विरचित इनकी ऊँचाई दस हजार योजन है। इसके पूर्वमें मन्दर, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिम पार्श्वमें विपुल और उत्तरमें सुपार्श्व नामक पर्वत कहा गया है॥ १३–१५॥<br><br>उसमें (सुपार्श्व पर्वतमें) कदम्ब, जम्बू, पीपल और वट वृक्ष हैं। हे महर्षियो! यही जम्बूवृक्ष जम्बूद्वीप नाम पड़नेका कारण है। उस जम्बूवृक्षके फल महान् हाथीके प्रमाणवाले होते हैं। पर्वतके पृष्ठपर गिरनेसे वे विशीर्ण हो जाते हैं। वहाँ उनके रससे प्रवाहित होनेवाली नदी जम्बूनदीके नामसे विख्यात है। वहाँके निवासी उस रसका पान किया करते हैं। वहाँ उस रस (जल)-का पान करनेसे स्वस्थ मनवाले मनुष्योंको न स्वेद (पसीना) होता है, न उनमें दुर्गन्ध होती है, न वृद्धावस्था आती है और न ही उनकी इन्द्रियाँ क्षीण होती हैं। उस (जम्बू नदी)-के तटपर स्थित मिट्टीके रसका वायु शोषण कर लेता है, जिससे जाम्बूनद नामक सुवर्ण होता है, सिद्धगण उसीका आभूषण धारण करते हैं॥ १६–२०॥

२२८ * कूर्मपुराण *


भद्राश्वः पूर्वतो मेरोः केतुमालश्च पश्चिमे।
वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठास्तयोर्मध्ये इलावृतम्॥ २१॥
वनं चैत्ररथं पूर्वे दक्षिणे गन्धमादनम्।
वैभ्राजं पश्चिमे विद्यादुत्तरे सवितुर्व॑नम्॥ २२॥
अरुणोदं महाभद्रमसितोदं च मानसम्।
सरांस्येतानि चत्वारि देवभोग्यानि सर्वदा॥ २३॥
सितान्तश्च कुमुद्रांश्च कुररी माल्यवांस्तथा।
वैकङ्को मणिशैलश्च ऋक्षवांश्चाचलोत्तमाः॥ २४॥
महानीलोऽथ रुचकः सबिन्दुर्मन्दरस्तथा।
वेणुमांश्चैव मेघश्च निषधो देवपर्वतः।
इत्येते देवरचिताः सिद्धावासाः प्रकीर्तिताः॥ २५॥

मेरुके पूर्वमें भद्राश्व, पश्चिममें केतुमाल नामक दो वर्ष हैं। मुनिश्रेष्ठो! उन दोनोंके मध्य इलावृत वर्ष है। पूर्वमें चैत्ररथ नामक वन, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिममें वैभ्राज और उत्तरमें सवितृवन स्थित है। उन (वनों)- में अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस नामक—ये चार सरोवर हैं। ये सदा देवताओं‌द्वारा उपभोग किये जाने योग्य हैं। सितान्त, कुमुद्वान्, कुररी, माल्यवान्, वैकङ्क, मणिशैल, ऋक्षवान्, महानील, रुचक, सबिन्दु, मन्दर, वेणुमान्, मेघ, निषध एवं देवपर्वत—इन सभी श्रेष्ठ पर्वतोंकी रचना देवताओं‌द्वारा हुई है और इन्हें सिद्धोंका आवास कहा जाता है॥ २१—२५॥

अरुणोदस्य सरसः पूर्वतः केसराचलः।
त्रिकूटशिखरश्चैव पतङ्गो रुचकस्तथा॥ २६॥
निषधो वसुधारश्च कलिङ्गस्त्रिशिखः शुभः।
समूलो वसुधारश्च कुरवश्चैव सानुमान्॥ २७॥
ताम्रातश्च विशालश्च कुमुदो वेणुपर्वतः।
एकशृङ्गो महाशैलो गजशैलः पिशाचकः॥ २८॥
पञ्चशैलोऽथ कैलासो हिमवांश्चाचलोत्तमः।
इत्येते देवचरिता उत्कटाः पर्वतोत्तमाः॥ २९॥

अरुणोद सरोवरके पूर्वमें केसराचल, त्रिकूट-शिखर, पतङ्ग, रुचक, निषध, वसुधार, कलिंग, शुभ त्रिशिख, समूल, वसुधार, कुरव, सानुमान्, ताम्रात, विशाल, कुमुद, वेणुपर्वत, एकशृंग, महाशैल, गजशैल, पिशाचक, पञ्चशैल, कैलास और पर्वतोंमें उत्तम हिमवान्—ये सभी देवताओं‌द्वारा सेवित अत्यन्त श्रेष्ठ पर्वत हैं॥ २६—२९॥

महाभद्रस्य सरसो दक्षिणे केसराचलः।
शिखिवासश्च वैदूर्यः कपिलो गन्धमादनः॥ ३०॥
जारुधिश्च सुगन्धिश्च श्रीशृङ्गश्चाचलोत्तमः।
सुपार्श्वश्च सुपक्षश्च कङ्कः कपिल एव च॥ ३१॥
पिञ्जरो भद्रशैलश्च सुरसश्च महाबलः।
अञ्जनो मधुमांस्तद्वत् कुमुदो मुकुटस्तथा॥ ३२॥
सहस्रशिखरश्चैव पाण्डुरः कृष्ण एव च।
पारिजातो महाशैलस्तथैव कपिलोदकः॥ ३३॥
सुषेणः पुण्डरीकश्च महामेघस्तथैव च।
एते पर्वतराजानः सिद्धगन्धर्वसेविताः॥ ३४॥

महाभद्र सरोवरके दक्षिणमें—केसराचल, शिखिवास, वैदूर्य, कपिल, गन्धमादन, जारुधि, सुगन्धि, उत्तम पर्वत श्रीशृंग, सुपार्श्व, सुपक्ष, कङ्क, कपिल, पिञ्जर, भद्रशैल, सुरस, महाबल, अञ्जन, मधुमान्, कुमुद, मुकुट, सहस्रशिखर, पाण्डुर, कृष्ण, पारिजात, महाशैल, कपिलोदक, सुषेण, पुण्डरीक और महामेघ—ये सभी पर्वतराज सिद्धों और गन्धर्वोंसे सेवित हैं॥ ३०—३४॥

असितोदस्य सरसः पश्चिमे केसराचलः।
शङ्खकूतोऽथ वृषभो हंसो नागस्तथा परः॥ ३५॥
कालाञ्जनः शुक्रशैलो नीलः कमल एव च।
पुष्पकश्च सुमेघश्च वाराहो विरजास्तथा।
मयूरः कपिलश्चैव महाकपिल एव च॥ ३६॥
इत्येते देवगन्धर्वसिद्धसङ्घनिषेविताः।
सरसो मानसस्येह उत्तरे केसराचलः॥ ३७॥

असितोद सरोवरके पश्चिममें केसराचल, शंखकूट, वृषभ, हंस, नाग, कालाञ्जन, शुक्रशैल, नील, कमल, पुष्पक, सुमेघ, वाराह, विरजा, मयूर, कपिल तथा महाकपिल—ये सभी (पर्वत) देव, गन्धर्व और सिद्धोंके समूहोंद्वारा सेवित हैं। मानसरोवरके उत्तरमें केसराचल नामक पर्वत है॥ ३५—३७॥

  • अध्याय ४४ * | २२९ ---|---

एतेषां शैलमुख्यानामन्तरेषु यथाक्रमम्।|इन प्रधान शैलोंके मध्य क्रमानुसार घाटियाँ, सरोवर सन्ति चैवान्तरद्रोण्यः सरांसि च वनानि च॥ ३८॥|और अनेक वन हैं। वहाँ प्रसन्न, रजोगुणरहित और सभी वसन्ति तत्र मुनयः सिद्धाश्च ब्रह्मभाविताः।|दुःखोंसे विनिर्मुक्त ब्रह्मवादी मुनि और सिद्ध निवास प्रसन्नाः शान्तरजसः सर्वदुःखविवर्जिताः॥ ३९॥|करते हैं॥ ३८-३९॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४३॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४३॥


चौवालीसवाँ अध्याय

ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र, अग्नि, वरुण आदि देवताओंकी पुरियोंका तथा वहाँके निवासियोंका वर्णन, गङ्गाकी चार धाराओं और आठ मर्यादापर्वतोंका वर्णन

सूत उवाच|**सूतजी बोले—**देवाधिदेव ब्रह्माकी मेरु पर्वतके चतुर्दशसहस्राणि योजनानां महापुरी।|ऊपर चौदह हजार योजन विस्तारवाली महापुरी विख्यात मेरोरुपरि विख्याता देवदेवस्य वेधसः॥ १॥|है। वहाँ विश्वभावन विश्वात्मा भगवान् ब्रह्मा रहते हैं। तत्रास्ते भगवान् ब्रह्मा विश्वात्मा विश्वभावनः।|योगीन्द्र, मुनीन्द्र, उपेन्द्र (विष्णु) और शंकर उनकी उपास्यमानो योगीन्द्रैर्मुनीन्द्रोपेन्द्रशंकरैः॥ २॥|उपासना करते रहते हैं। वहाँ भगवान् सनत्कुमार नित्य तत्र देवेश्वरेशानं विश्वात्मानं प्रजापतिम्।|ही ईशान देवेश्वर विश्वात्मा प्रजापतिकी उपासना करते सनत्कुमारो भगवानुपास्ते नित्यमेव हि॥ ३॥|हैं। वे (सनत्कुमार) योगात्मा सिद्ध, ऋषि, गन्धर्व तथा स सिद्धैर्ऋषिगन्धर्वैः पूज्यमानः सुरैरपि।|देवताओंसे पूजित होते हुए परम अमृतका पान करते समास्ते योगयुक्तात्मा पीत्वा तत्परमामृतम्॥ ४॥|हैं और वहाँ निवास करते हैं॥ १-४॥ तत्र देवादिदेवस्य शम्भोरमिततेजसः।|वहाँ देवोंके आदिदेव अमित तेजस्वी शंकरका शुभ्र दीप्तमायतनं शुभ्रं पुरस्ताद् ब्रह्मणः स्थितम्॥ ५॥|एवं दीप्तियुक्त मन्दिर है, जो ब्रह्माके (आयतनके) सामने ||स्थित है। (यह मन्दिर) दिव्य कान्तिसे सुसम्पन्न, चार दिव्यकान्तिसमायुक्तं चतुर्द्वारं सुशोभनम्।|द्वारोंसे युक्त, अत्यन्त सुन्दर, महर्षियोंसे पूर्ण और ब्रह्मज्ञानियोंद्वारा महर्षिगणसंकीर्णं ब्रह्मविद्भिर्निषेवितम्॥ ६॥|सेवित है। चन्द्रमा, सूर्य एवं अग्निस্বরূপ (तीन) नेत्रोंवाले देव्या सह महादेवः शशाङ्कार्काग्निलोचनः।|प्रमथेश्वर विश्वेश महादेव देवी (पार्वती) एवं प्रमथगणोंके रमते तत्र विश्वेशः प्रमथैः प्रमथेश्वरः॥ ७॥|साथ वहाँ रमण करते हैं॥ ५-७॥ तत्र वेदविदः शान्ता मुनयो ब्रह्मचारिणः।|वहाँ वेदज्ञ शान्तचित्त मुनि, ब्रह्मचारी, तपस्वी और पूजयन्ति महादेवं तापसाः सत्यवादिनः॥ ८॥|सत्यवादी लोग महादेवकी पूजा करते हैं। इन ब्रह्मवादी तेषां साक्षान्महादेवो मुनीनां ब्रह्मवादिनाम्।|मुनियोंकी पूजाको पार्वतीके साथ साक्षात् परमेश्वर गृह्णाति पूजां शिरसा पार्वत्या परमेश्वरः॥ ९॥|महादेव सिरसे आदरपूर्वक स्वीकार करते हैं। वहीं श्रेष्ठ तत्रैव पर्वतवरे शक्रस्य परमा पुरी।|पर्वत (मेरु)-पर पूर्वकी ओर इन्द्रकी सभी शोभाओंसे नाम्नाऽमरावती पूर्वे सर्वशोभासमन्विता॥ १०॥|समन्वित अमरावती नामकी श्रेष्ठ पुरी है॥ ८-१०॥ तमिन्द्रमप्सरःसङ्घा गन्धर्वा गीततत्पराः।|अप्सराओंका समूह, गान-परायण गन्धर्व तथा हजारों उपासते सहस्राक्षं देवास्तत्र सहस्रशः॥ ११॥|देवता हजार नेत्रोंवाले इन्द्रकी वहाँ उपासना करते हैं। जो ये धार्मिका वेदविदो यागहोमपरायणाः।|धार्मिक हैं, वेदज्ञ हैं, यज्ञ एवं होमपरायण हैं, उनका वह तेषां तत् परमं स्थानं देवानामपि दुर्लभम्॥ १२॥|परम स्थान देवताओंके लिये भी दुर्लभ है॥ ११-१२॥

२३०* कूर्मपुराण *

| तस्य दक्षिणदिग्भागे वह्नेरमिततेजसः।<br>तेजोवती नाम पुरी दिव्याश्चर्यसमन्विता॥ १३॥<br><br>तत्रास्ते भगवान् वह्निर्भ्राजमानः स्वतेजसा।<br>जपिनां होमिनां स्थानं दानवानां दुरासदम्॥ १४॥ | उसके दक्षिण दिशामें अमित तेजस्वी अग्निकी दिव्य आश्चर्योंसे युक्त तेजोवती नामकी पुरी स्थित है। भगवान् वह्नि अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए वहाँ रहते हैं। जप करनेवालों तथा होम करनेवालोंका वह स्थान दानवोंके लिये दुष्प्राप्य है॥ १३-१४॥ | | दक्षिणे पर्वतवरे यमस्यापि महापुरी।<br>नाम्ना संयमनी दिव्या सिद्धगन्धर्वसेविता॥ १५॥<br><br>तत्र वैवस्वतं देवं देवाद्याः पर्युपासते।<br>स्थानं तत् सत्यसंधानां लोके पुण्यकृतां नृणाम्॥ १६॥<br><br>तस्यास्तु पश्चिमे भागे निर्ऋतेस्तु महात्मनः।<br>रक्षोवती नाम पुरी राक्षसैः सर्वतो वृता॥ १७॥<br><br>तत्र तं निर्ऋतिं देवं राक्षसाः पर्युपासते।<br>गच्छन्ति तां धर्मरता ये वै तामसवृत्तयः॥ १८॥<br><br>पश्चिमे पर्वतवरे वरुणस्य महापुरी।<br>नाम्ना शुद्धवती पुण्या सर्वकामर्द्धिसंयुता॥ १९॥ | श्रेष्ठ (मेरु) पर्वतपर दक्षिण भागमें यमराजकी भी सिद्धों तथा गन्धर्वोंसे सेवित संयमनी नामक दिव्य महापुरी है। वहाँ देवादिगण विवस्वान्¹ (सूर्य) देवकी उपासना करते रहते हैं। वह स्थान संसारमें पुण्य करनेवाले सत्यव्रती मनुष्योंका है। उसके पश्चिम भागमें महात्मा निर्ऋतिकी रक्षोवती नामक पुरी है, जो चारों ओरसे राक्षसोंसे घिरी है। वहाँ राक्षस निर्ऋतिदेवकी उपासना करते हैं तथा जो तमोगुणी जीविकावाले होते हुए भी धार्मिक होते हैं, वे उसी पुरीमें जाते हैं। पश्चिममें इस श्रेष्ठ पर्वतपर सभी प्रकारकी कामनाओंकी समृद्धिसे समन्वित वरुणकी शुद्धवती नामकी पुण्य महापुरी है॥ १५-१९॥ | | तत्राप्सरोगणैः सिद्धैः सेव्यमानोऽमराधिपः।<br>आस्ते स वरुणो राजा तत्र गच्छन्ति येऽम्बुदाः।<br>तीर्थयात्रापरा नित्यं ये च लोकेऽघमर्षणः॥ २०॥ | यहाँ अप्सराओं तथा सिद्धोंसे सेवित अमराधिप राजा वरुण रहते हैं। यहाँ वे ही मनुष्य जाते हैं, जो संसारमें नित्य जलदान करते हैं, तीर्थयात्रा-परायण रहते हैं और जो अघमर्षण किया करते हैं॥ २०॥ | | तस्या उत्तरदिग्भागे वायोरपि महापुरी।<br>नाम्ना गन्धवती पुण्या तत्रास्तेऽसौ प्रभञ्जनः॥ २१॥<br><br>अप्सरोगणगन्धर्वैः सेव्यमानोऽमरप्रभुः।<br>प्राणायामपरा मर्त्या स्थानं तद् यान्ति शाश्वतम्॥ २२॥ | उस (शुद्धवती पुरी)-के उत्तरभागमें वायु देवताकी भी गन्धवती नामवाली पवित्र महापुरी स्थित है। वहाँ प्रभञ्जन (वायुदेवता) निवास करते हैं। देवोंके स्वामी इन वायुदेवताकी अप्सराओंके समूह और गन्धर्व सेवा करते रहते हैं। जो प्राणायाम-परायण मनुष्य हैं, वे इस शाश्वत स्थानमें जाते हैं॥ २१-२२॥ | | तस्याः पूर्वेण दिग्भागे सोमस्य परमा पुरी।<br>नाम्ना कान्तिमती शुभ्रा तत्र सोमो विराजते॥ २३॥<br><br>तत्र ये भोगनिरता स्वधर्मं पर्युपासते।<br>तेषां तद् रचितं स्थानं नानाभोगसमन्वितम्॥ २४॥<br><br>तस्याश्च पूर्वदिग्भागे शंकरस्य महापुरी।<br>नाम्ना यशोवती पुण्या सर्वेषां सुदुरासदा॥ २५॥<br><br>तत्रेशानस्य भवनं रुद्रविष्णुतनोः शुभम्।<br>गणेश्वरस्य विपुलं तत्रास्ते स गणैर्वृतः॥ २६॥ | उसके पूर्व दिशामें सोम (चन्द्रमा)-की कान्तिमती नामवाली शुभ श्रेष्ठ पुरी है, वहाँ चन्द्रमा विराजमान रहते हैं, जो भोगपरायण रहते हुए अपने धर्मका पालन करते हैं उन्हींके लिये वहाँपर अनेक प्रकारके भोगोंसे युक्त स्थान बना² है। उसके पूर्वकी ओर (भगवान् शंकरकी यशोवती नामक पवित्र महापुरी है, जो सभीके लिये दुर्लभ है, वहाँ रुद्र एवं विष्णुमय शरीरवाले गणाधिपति ईशान (शंकर)-का विशाल भवन है |


१-विवस्वान्—विव=रश्मि=किरणसे युक्त सूर्य।
२-कुछ लोग ऐसे होते हैं जो धर्मनिष्ठ होते हैं, पर जन्म-जन्मान्तरके संस्कारवश उनमें मृत्युके समय भोगवासना शेष रह जाती है, ऐसे लोग चन्द्रलोकको प्राप्त करते हैं।

* अध्याय ४४ *२३१
तत्र भोगाभिलिप्सूनां भक्तानां परमेष्ठिनः।<br>निवासः कल्पितः पूर्वं देवदेवेन शूलिना ॥ २७ ॥<br><br>विष्णुपादाद् विनिष्क्रान्ता प्लावयित्वेन्दुमण्डलम्।<br>समन्ताद् ब्रह्मणः पुर्यां गङ्गा पतति वै दिवः ॥ २८ ॥<br>सा तत्र पतिता दिक्षु चतुर्धा ह्यभवद् द्विजाः।<br>सीता चालकनन्दा च सुचक्षुर्भद्रनामिका ॥ २९ ॥<br><br>पूर्वेण सीता शैलात् तु शैलं यात्यन्तरिक्षतः।<br>ततश्च पूर्ववर्षेण भद्राश्वेनैति चार्णवम् ॥ ३० ॥<br>तथैवालकनन्दा च दक्षिणादेत्य भारतम्।<br>प्रयाति सागरं भित्त्वा सप्तभेदा द्विजोत्तमाः ॥ ३१ ॥<br><br>सुचक्षुः पश्चिमगिरीनतीत्य सकलांस्तथा।<br>पश्चिमं केतुमालाख्यं वर्षं गत्वैति चार्णवम् ॥ ३२ ॥<br><br>भद्रा तथोत्तरगिरीनुत्तरांश्च तथा कुरून्।<br>अतीत्य चोत्तराम्भोधिं समभ्येति महर्षयः ॥ ३३ ॥<br><br>आनीलनिषधायामौ माल्यवान् गन्धमादनः।<br>तयोर्मध्यगतो मेरुः कर्णिकाकारसंस्थितः ॥ ३४ ॥<br><br>भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा।<br>पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः ॥ ३५ ॥<br>जठरो देवकूटश्च मर्यादापर्वतावुभौ।<br>दक्षिणोत्तरमायामावानीलनिषधायतौ ॥ ३६ ॥<br><br>गन्धमादनकैलासौ पूर्वपश्चायतावुभौ।<br>अशीतियोजनायामावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥ ३७ ॥<br><br>निषधः पारियात्रश्च मर्यादापर्वताविमौ।<br>मेरोः पश्चिमदिग्भागे यथापूर्वौ तथा स्थितौ ॥ ३८ ॥<br><br>त्रिशृङ्गो जारुधिश्चैतदुत्तरे वर्षपर्वतौ।<br>पूर्वपश्चायतावेतौ अर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥ ३९ ॥<br><br>मर्यादापर्वताः प्रोक्ता अष्टाविह मया द्विजाः।<br>जठराद्याः स्थिता मेरोश्चतुर्दिक्षु महर्षयः ॥ ४० ॥गणोंसे आवृत्त (शंकरदेव) उसमें रहते हैं। पूर्वकालमें देवोंके देव शूल धारण करनेवाले शंकरने वहाँपर परमेष्ठीके भोगाभिलाषी भक्तोंका निवास-स्थान बनाया था। विष्णुके चरणसे निकली हुई गङ्गा चन्द्रमण्डलको आप्लावित कर स्वर्गसे ब्रह्मपुरीके चारों ओर गिरती हैं ॥ २३–२८ ॥<br><br>द्विजो! वे वहाँ गिरकर सीता, अलकनन्दा, सुचक्षु एवं भद्रा नामसे चार भागोंमें (दिशाओंमें) विभक्त हो गयी हैं। अन्तरिक्षसे निकलकर सीता नामक गङ्गा एक शैलसे दूसरे शैलपर जाती हुई पूर्व दिशामें भद्राश्ववर्षमें प्रवाहित होती हुई समुद्रमें जाती हैं ॥ २९-३० ॥<br><br>हे द्विजोत्तमो! इसी प्रकार अलकनन्दा नामक गङ्गा दक्षिण दिशासे भारतवर्षमें आनेके बाद सात भागोंमें विभक्त होकर सागरमें जाती हैं। ऐसे ही सुचक्षु नामक गङ्गा पश्चिम दिशाके सभी पर्वतोंका अतिक्रमण करके पश्चिम दिशाके केतुमाल नामक वर्षमें प्रवाहित होकर समुद्रमें जाती हैं। महर्षियो! भद्रा नामक गङ्गा उत्तर दिशाके पर्वतों और उत्तरकुरुवर्षका अतिक्रमण कर उत्तर समुद्रमें मिलती हैं। माल्यवान् तथा गन्धमादन पर्वत नील तथा निषध पर्वतोंके समान विस्तारवाले हैं। उन दोनोंके मध्यमें कर्णिकाके आकारके समान मेरु (पर्वत) स्थित है। इन मर्यादापर्वतोंके बाहरकी ओर संसाररूपी कमलके पत्रोंके रूपमें भारतवर्ष, केतुमाल, भद्राश्व और कुरुवर्ष स्थित हैं ॥ ३१—३५ ॥<br><br>जठर एवं देवकूट नामक दो मर्यादापर्वत नील और निषध पर्वतोंतक दक्षिणोत्तर-दिशामें फैले हुए हैं। गन्धमादन और कैलास नामक दोनों पर्वत पूर्व-पश्चिममें फैले हुए हैं, (ये) अस्सी योजन विस्तारवाले हैं और समुद्रके अंदरतक स्थित हैं। निषध और पारियात्र नामक दो मर्यादापर्वत मेरुकी पश्चिम दिशामें पूर्वके पर्वतोंके समान स्थित हैं। इसी प्रकार उत्तरमें त्रिशृङ्ग और जारुधि नामक दो वर्षपर्वत हैं। ये पूर्व-पश्चिममें फैले हुए हैं तथा समुद्रके भीतरतक स्थित हैं ॥ ३६—३९ ॥<br><br>हे द्विजो! मैंने यहाँ इन आठ मर्यादापर्वतोंको बतलाया। हे महर्षियो! मेरुके चारों दिशाओंमें जठर आदि (वर्षपर्वत) स्थित हैं ॥ ४० ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौवालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४४ ॥

२३२ * कूर्मपुराण *


पैंतालीसवाँ अध्याय

केतुमाल, भद्राश्व, रम्यकवर्ष तथा वहाँके निवासियोंका वर्णन, हरिवर्षमें स्थित विष्णुके विमानका वर्णन, जम्बूद्वीपके वर्णनमें भारतवर्षके कुलपर्वतों, महानदियों, जनपदों और वहाँके निवासियोंका वर्णन, भारतवर्षमें चार युगोंकी स्थितिका प्रतिपादन

सूत उवाच

केतुमाले नराः कालाः सर्वे पनसभाजनाः।
स्त्रियश्चोत्पलपत्राभा जीवन्ति च वर्षायुतम्॥ १ ॥

भद्राश्वे पुरुषाः शुक्लाः स्त्रियश्चन्द्रांशुसंनिभाः।
दश वर्षसहस्राणि जीवन्ते आम्रभोजनाः॥ २ ॥

रम्यके पुरुषा नार्यो रमन्ते रजतप्रभाः।
दशवर्षसहस्राणि शतानि दश पञ्च च।
जीवन्ति चैव सत्त्वस्था न्यग्रोधफलभोजनाः॥ ३ ॥

हिरण्मये हिरण्याभाः सर्वे च लकुचाशनाः।
एकादशसहस्राणि शतानि दश पञ्च च।
जीवन्ति पुरुषा नार्यो देवलोकस्थिता इव॥ ४ ॥

त्रयोदशसहस्राणि शतानि दश पञ्च च।
जीवन्ति कुरुवर्षे तु श्यामाङ्गाः क्षीरभोजनाः॥ ५ ॥

सर्वे ते मैथुनाजाताः नित्यं सुखनिषेविनः।
चन्द्रद्वीपे महादेवं यजन्ति सततं शिवम्॥ ६ ॥

तथा किम्पुरुषे विप्रा मानवा हेमसन्निभाः।
दशवर्षसहस्राणि जीवन्ति प्लक्षभोजनाः॥ ७ ॥

यजन्ति सततं देवं चतुर्मूर्तिं चतुर्मुखम्।
ध्याने मनः समाधाय सादरं भक्तिसंयुताः॥ ८ ॥

तथा च हरिवर्षे तु महारजतसंनिभाः।
दशवर्षसहस्राणि जीवन्तीक्षुरसाशिनः॥ ९ ॥

तत्र नारायणं देवं विश्वयोनिं सनातनम्।
उपासते सदा विष्णुं मानवा विष्णुभाविताः॥ १०॥


सूतजीने कहा—केतुमालवर्षके पुरुष कृष्णवर्णके होते हैं और सभी पनस (कटहल)-का भोजन करनेवाले होते हैं। वहाँकी स्त्रियाँ कमलपत्रके समान वर्णवाली होती हैं। ये सभी दस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं।

भद्राश्ववर्षके पुरुष शुक्ल वर्णके होते हैं और स्त्रियाँ चन्द्रमाकी किरणों (चाँदनी)-के समान वर्णवाली होती हैं। ये सब आमका आहार करते हैं तथा दस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। रम्यकवर्षके पुरुष और स्त्रियाँ—सभी चाँदीकी प्रभाके समान दिखायी देते हैं। ये सत्त्वभावमें स्थित रहनेवाले होते हैं तथा वटवृक्षके फलका भोजन करते हैं और ग्यारह हजार पाँच सौ वर्षोतक जीवित रहते हैं। हिरण्मयवर्षमें सोनेकी आभावाले निवास करते हैं, सभी लकुच (बड़हरके फल)-का भोजन करते हैं और बारह हजार पाँच सौ वर्षतक सभी स्त्री-पुरुष उसी प्रकार जीवित रहते हैं, जैसे कि देवलोकमें स्थित हों॥ १–४॥

कुरुवर्षमें दुग्धाहार करनेवाले श्यामवर्णके (स्त्री-पुरुष) चौदह हजार पाँच सौ वर्षतक जीवित रहते हैं। वे सभी मैथुनसे उत्पन्न होते हैं, नित्य सुखोपभोगी होते हैं और चन्द्रद्वीपमें महादेव शिवकी निरन्तर उपासना करते हैं। हे विप्रो! इसी प्रकार किंपुरुषवर्षके मनुष्य स्वर्ण-वर्णके समान होते हैं। पाकड़ वृक्षके फलोंका भोजन करनेवाले ये दस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। ये भक्तियुक्त होकर आदरसहित मनको ध्यानमें समाधिस्थकर चतुर्मूर्ति चतुर्मुख देव (ब्रह्मा)-की निरन्तर उपासना करते रहते हैं। इसी प्रकार हरिवर्षमें रहनेवाले महारजत* (स्वर्ण)-के समान आभावाले होते हैं। वे दस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। ईखके रसका भोजन करते हैं। यहाँ ये मनुष्य विष्णुकी भावनासे भावित होकर विश्वयोनि नारायणदेव विष्णुकी सदा उपासना करते हैं॥ ५–१०॥


* महारजत शब्द स्वर्णका पर्याय है। (अमरकोश २।९।९५)