महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
भी) शीतलताका अनुभव होता है।
विमलादित्यवर्णाभिः पताकाभिरलङ्कृतम्।
व्यक्तबद्धं वनोद्देशे चतुर्दिशि महाध्वजम्॥
निर्मल सूर्यके समान तेजस्विनी पताकाएँ उस मनोरम प्रासादकी शोभा बढ़ाती हैं। एक सुन्दर उद्यानमें उस भवनका निर्माण किया गया है। उसके चारों ओर ऊँची-ऊँची ध्वजाएँ फहराती रहती हैं।
स च प्रासादमुख्योऽत्र जाम्बवत्या विभूषितः।
प्रभया भूषणैश्चित्रैस्त्रैलोक्यमिव भासयन्॥
यस्तु पाण्डरवर्णभस्तयोरन्तरमाश्रितः।
विश्वकर्माकरोदेनं कैलासशिखरोपमम्॥
इसके सिवा वह प्रमुख प्रासाद, जो रुक्मिणी तथा सत्यभामाके महलोंके बीचमें पड़ता है और जिसकी उज्ज्वल प्रभा सब ओर फैली रहती है, जाम्बवतीदेवीद्वारा विभूषित किया गया है। वह अपनी दिव्य प्रभा और विचित्र सजावटसे मानो तीनों लोकोंको प्रकाशित कर रहा है। उसे भी विश्वकर्माने ही बनाया है। जाम्बवतीका वह विशाल भवन कैलास-शिखरके समान सुशोभित होता है।
जाम्बूनदप्रदीप्ताग्रः प्रदीप्तज्वलनोपमः।
सागरप्रतिमोऽतिष्ठन्मेरुरित्यभिविश्रुतः॥
तस्मिन् गान्धारराजस्य दुहिता कुलशालिनी।
सुकेशी नाम विख्याता केशवेन निवेशिता॥
जिसका दरवाजा जाम्बूनद सुवर्णके समान उद्दीप्त होता है, जो देखनेमें प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ता है। विशालतामें समुद्रसे जिसकी उपमा दी जाती है, जो मेरुके नामसे विख्यात है, उस महान् प्रासादमें गान्धारराजकी कुलीन कन्या सुकेशीको भगवान् श्रीकृष्णने ठहराया है।
पद्मकूट इति ख्यातः पद्मवर्णो महाप्रभः।
सुप्रभाया महाबाहो निवासः परमार्चितः॥
महाबाहो! पद्मकूट नामसे विख्यात जो कमलके समान कान्तिवाला प्रासाद है, वह महारानी सुप्रभाका परम पूजित निवासस्थान है।
यस्तु सूर्यप्रभो नाम प्रासादवर उच्यते।
लक्ष्मणायाः कुरुश्रेष्ठ स दत्तः शार्ङ्गधन्वना॥
कुरुश्रेष्ठ! जिस उत्तम प्रासादकी प्रभा सूर्यके समान है, उसे शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्णने महारानी लक्ष्मणाको दे रखा है।
वैडूर्यवरवर्णाभः प्रासादो हरितप्रभः।
यं विदुः सर्वभूतानि हरिरित्येव भारत।
वासः स मित्रविन्दाया देवर्षिगणपूजितः ।। महिष्या वासुदेवस्य भूषणं सर्ववेश्मनाम् । भारत! वैदूर्यमणिके समान कान्तिमान् हरे रंगका महल, जिसे देखकर सब प्राणियोंको ‘श्रीहरि’ ही हैं, ऐसा अनुभव होता है, वह मित्रविन्दाका निवासस्थान है। उसकी देवगण भी सराहना करते हैं। भगवान् वासुदेवकी रानी मित्रविन्दाका यह भवन अन्य सब महलोंका आभूषणरूप है। यस्तु प्रासादमुख्योऽत्र विहितः सर्वशिल्पिभिः ।। अतीव रम्यः सोऽप्यत्र प्रहसन्निव तिष्ठति । सुदत्तायाः सुवासस्तु पूजितः सर्वशिल्पिभिः ।। महिष्या वासुदेवस्य केतुमानिति विश्रुतः । युधिष्ठिर! द्वारकामें जो दूसरा प्रमुख प्रासाद है, उसे सम्पूर्ण शिल्पियोंने मिलकर बनाया है। वह अत्यन्त रमणीय भवन हँसता-सा खड़ा है। सभी शिल्पी उसके निर्माण-कौशलकी सराहना करते हैं। उस प्रासादका नाम है केतुमान्। वह भगवान् वासुदेवकी महारानी सुदत्तादेवीका सुन्दर निवासस्थान है। प्रासादो विरजो नाम विरजस्को महात्मनः ।। उपस्थानगृहं तात केशवस्य महात्मनः । वहीं ‘विरज’ नामसे प्रसिद्ध एक प्रासाद है, जो निर्मल एवं रजोगुणके प्रभावसे शून्य है। वह परमात्मा श्रीकृष्णका उपस्थानगृह (खास रहनेका स्थान) है। यस्तु प्रासादमुख्योऽत्र यं त्वष्टा व्यदधात् स्वयम् ।। योजनायतविष्कम्भं सर्वरत्नमयं विभोः । इसी प्रकार वहाँ एक और भी प्रमुख प्रासाद है, जिसे स्वयं विश्वकर्माने बनाया है। उसकी लंबाई-चौड़ाई एक-एक योजनकी है। भगवान्का वह भवन सब प्रकारके रत्नोंद्वारा निर्मित हुआ है। तेषां तु विहिताः सर्वे रुक्मदण्डाः पताकिनः । सदने वासुदेवस्य मार्गसंजनना ध्वजाः ।। वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके सुन्दर सदनमें जो मार्गदर्शक ध्वज हैं, उन सबके दण्ड सुवर्णमय बनाये गये हैं। उन सबपर पताकाएँ फहराती रहती हैं। घण्टाजालानि तत्रैव सर्वेषां च निवेशने । आहृत्य यदुसिंहेन वैजयन्त्यचलो महान् ।। द्वारकापुरीमें सभीके घरोंमें घंटा लगाया गया है। यदुसिंह श्रीकृष्णने वहाँ लाकर वैजयन्ती पताकाओंसे युक्त पर्वत स्थापित किया है। हंसकूटस्य यच्छृङ्गमिन्रद्युम्नसरो महत् । षष्टितालसमुत्सेधमर्धयोजनविस्तृतम् ।।
वहाँ हंसकूट पर्वतका शिखर है, जो साठ ताड़के बराबर ऊँचा और आधा योजन चौड़ा है। वहीं इन्द्रद्युम्नसरोवर भी है, जिसका विस्तार बहुत बड़ा है। सकिन्नरमहानादं तदप्यमिततेजसः । पश्यतां सर्वभूतानां त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ वहाँ सब भूतोंके देखते-देखते किन्नरोंके संगीतका महान् शब्द होता रहता है। वह भी अमिततेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णका ही लीलास्थल है। उसकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि है। आदित्यपथगं यत् तन्मेरोः शिखरमुत्तमम् । जाम्बूनदमयं दिव्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ तदप्युत्पाट्य कृच्छ्रेण स्वं निवेशनमाहृतम् । भ्राजमानं पुरा तत्र सर्वौषधिविभूषितम् ॥ मेरुपर्वतका जो सूर्यके मार्गतक पहुँचा हुआ जाम्बूनदमय दिव्य और त्रिभुवनविख्यात उत्तम शिखर है, उसे उखाड़कर भगवान् श्रीकृष्ण कठिनाई उठाकर भी अपने महलमें ले आये हैं। सब प्रकारकी ओषधियोंसे अलंकृत वह मेरुशिखर द्वारकामें पूर्ववत् प्रकाशित है। यमिन्द्रभवनाच्छौरिराजहार परंतपः । पारिजातः स तत्रैव केशवेन निवेशितः ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण जिसे इन्द्रभवनसे हर ले आये थे, वह पारिजातवृक्ष भी उन्होंने द्वारकामें ही लगा रखा है। विहिता वासुदेवेन ब्रह्मस्थलमहाद्रुमाः ॥ शालतालाश्वकर्णाश्चशतशाखाश्च रोहिणाः । भल्लातककपित्थाश्च चन्द्रवृक्षाश्च चम्पकाः ॥ खर्जूराः केतकाश्चैव समन्तात् परिरोपिताः । भगवान् वासुदेवने ब्रह्मलोकके बड़े-बड़े वृक्षोंको भी लाकर द्वारकामें लगाया है। साल, ताल, अश्वकर्ण (कनेर), सौ शाखाओंसे सुशोभित वटवृक्ष, भल्लातक (भिलावा), कपित्थ (कैथ), चन्द्र (बड़ी इलायचीके) वृक्ष, चम्पा, खजूर और केतक (केवड़ा)—ये वृक्ष वहाँ सब ओर लगाये गये थे। पद्माकुलजलोपेता रक्ताः सौगन्धिकोत्पलाः ॥ मणिमौक्तिकवालूकाः पुष्करिण्यः सरांसि च । तासां परमकूलानि शोभयन्ति महाद्रुमाः ॥ द्वारकामें जो पुष्करिणियाँ और सरोवर हैं, वे कमलपुष्पोंसे सुशोभित स्वच्छ जलसे भरे हुए हैं। उनकी आभा लाल रंगकी है। उनमें सुगन्धयुक्त उत्पल खिले हुए हैं। उनमें स्थित बालूके कण मणियों और मोतियोंके चूर्ण-जैसे जान पड़ते हैं। वहाँ लगाये हुए बड़े-बड़े वृक्ष उन सरोवरोंके सुन्दर तटोंकी शोभा बढ़ाते हैं। ये च हैमवता वृक्षा ये च नन्दनजास्तथा ।
आहृत्य यदुसिंहेन तेऽपि तत्र निवेशिताः ॥ जो वृक्ष हिमालयपर उगते हैं तथा जो नन्दनवनमें उत्पन्न होते हैं, उन्हें भी यदुप्रवर श्रीकृष्णने वहाँ लाकर लगाया है। रक्तपीतारुणप्रख्याः सितपुष्पाश्च पादपाः । सर्वर्तुफलपूर्णास्ते तेषु काननसंधिषु ॥ कोई वृक्ष लाल रंगके हैं, कोई पीत वर्णके हैं और कोई अरुण कान्तिसे सुशोभित हैं तथा बहुत-से वृक्ष ऐसे हैं, जिनमें श्वेत रंगके पुष्प शोभा पाते हैं। द्वारकाके उपवनोंमें लगे हुए पूर्वोक्त सभी वृक्ष सम्पूर्ण ऋतुओंके फलोंसे परिपूर्ण हैं। सहस्रपत्रपद्माश्च मन्दराश्च सहस्रशः । अशोकाः कर्णिकाराश्च तिलका नागमल्लिकाः ॥ कुरवा नागपुष्पाश्च चम्पकास्तृणगुल्मकाः । सप्तपर्णाः कदम्बाश्च नीपाः कुरबकास्तथा ॥ केतक्यः केसराश्चैव हिन्तालतलताटकाः । तालाः प्रियङ्गुवकुलाः पिण्डिका बीजपूरकाः ॥ द्राक्षामलकखर्जूरा मृद्वीका जम्बुकास्तथा । आम्राः पनसवृक्षाश्च अङ्कोलास्तिलतिन्दुकाः ॥ लिकुचाम्रातकाश्चैव क्षीरिका कण्टकी तथा । नालिकेरेङ्गुदाश्चैव उत्क्रोशकवनानि च ॥ वनानि च कदल्याश्च जातिमल्लिकपाटलाः । भल्लातककपित्थाश्च तैतभा बन्धुजीवकाः ॥ प्रवाला शोककाश्मर्यः प्राचीनाश्चैव सर्वशः । प्रियङ्गुबदरीभिश्च यवैः स्पन्दनचन्दनैः ॥ शमीबिल्वपलाशैश्च पाटलावटपिप्पलैः । उदुम्बरैश्च द्विदलैः पालाशैः पारिभद्रकैः ॥ इन्द्रवृक्षार्जुनैश्चैव अश्वत्थैश्चिरिबिल्वकैः । सौभञ्जनकवृक्षैश्च भल्लटैरृक्षसाह्वयैः ॥ सर्जैस्ताम्बूलवल्लीभिर्लवङ्गैः क्रमुकैस्तथा । वंशैश्च विविधैस्तत्र समन्तात् परिरोपितैः ॥ सहस्रदल कमल, सहस्रों मन्दार, अशोक, कर्णिकार, तिलक, नागमल्लिका, कुरव (कटसरैया), नागपुष्प, चम्पक, तृण, गुल्म, सप्तपर्ण (छितवन), कदम्ब, नीप, कुरबक, केतकी, केसर, हिंताल, तल, ताटक, ताल, प्रियंगु, वकुल (मौलसिरी), पिण्डिका, बीजपूर (बिजौरा), दाख, आँवला, खजूर, मुनक्का, जामुन, आम, कटहल, अंकोल, तिल, तिन्दुक, लिकुच (लीची), आमड़ा, क्षीरिका (काकोली नामकी जड़ी या पिंडखजूर), करटकी (बेर),
नारियल, इंगुद (हिंगोट), उत्क्रोशक़वन, कदलीवन, जाति (चमेली), मल्लिका (मोतिया), पाटल, भल्लातक, कपित्थ, तैतभ, बन्धुजीव (दुपहरिया), प्रवाल, अशोक और काश्मरी (गाँभारी) आदि सब प्रकारके प्राचीन वृक्ष, प्रियंगुलता, बेर, जौ, स्पन्दन, चन्दन, शमी, बिल्व, पलाश, पाटला, बड़, पीपल, गूलर, द्विदल, पालाश, पारिभद्रक, इन्द्रवृक्ष, अर्जुनवृक्ष, अश्वत्थ, चिरिबिल्व, सौभंजन, भल्लट, अश्वपुष्प, सर्ज, ताम्बूललता, लवंग, सुपारी तथा नाना प्रकारके बाँस—ये सब द्वारकापुरीमें श्रीकृष्णभवनके चारों ओर लगाये हैं।
ये च नन्दनजा वृक्षा ये च चैत्ररथे वने ।
सर्वे ते यदुनाथेन समन्तात् परिरोपिताः ॥
नन्दनवनमें और चैत्ररथवनमें जो-जो वृक्ष होते हैं, वे सभी यदुपति भगवान् श्रीकृष्णने लाकर यहाँ सब ओर लगाये हैं।
कुमुदोत्पलपूर्णाश्च वाप्यः कूपाः सहस्रशः ।
समाकुलमहावाप्यः पीता लोहितवालुकाः ॥
भगवान् श्रीकृष्णके गृहोद्यानमें कुमुद और कमलोंसे भरी हुई कितनी ही छोटी बावलियाँ हैं। सहस्रों कुएँ बने हुए हैं। जलसे भरी हुई बड़ी-बड़ी वापिकाएँ भी तैयार करायी गयी हैं, जो देखनेमें पीत वर्णकी हैं और जिनकी बालुकाएँ लाल हैं।
तस्मिन् गृहवने नद्यः प्रसन्नसलिला हृदाः ।
फुल्लोत्पलजलोपेता नानाद्रुमसमाकुलाः ॥
उनके गृहोद्यानमें स्वच्छ जलसे भरे हुए कुण्डवाली कितनी ही कृत्रिम नदियाँ प्रवाहित होती रहती हैं, जो प्रफुल्ल उत्पलयुक्त जलसे परिपूर्ण हैं तथा जिन्हें दोनों ओरसे अनेक प्रकारके वृक्षोंने घेर रखा है।
तस्मिन् गृहवने नद्यो मणिशर्करवालुकाः ।
मत्तबर्हिणसङ्घाश्च कोकिलाश्च मदोद्धताः ॥
उस भवनके उद्यानकी सीमामें मणिमय कंकड़ और बालुकाओंसे सुशोभित नदियाँ निकाली गयी हैं, जहाँ मतवाले मयूरोंके झुंड विचरते हैं और मदोन्मत्त कोकिलाएँ कुहू-कुहू किया करती हैं।
बभूवुः परमोपेताः सर्वे जगतिपर्वताः ।
तत्रैव गजयूथानि तत्र गोमहिषास्तथा ॥
निवासाश्च कृतास्तत्र वराहमृगपक्षिणाम् ।
उस गृहोद्यानमें जगत्के सभी श्रेष्ठ पर्वत अंशतः संगृहीत हुए हैं। वहाँ हाथियोंके यूथ तथा गाय-भैंसोंके झुंड रहते हैं। वहीं जंगली सूअर, मृग और पक्षियोंके रहनेयोग्य निवासस्थान भी बनाये गये हैं।
विश्वकर्मकृतः शैलः प्राकारस्तस्य वेश्मनः ॥
व्यक्तं किष्कुशतोद्यामः सुधाकरसमप्रभः ।
विश्वकर्माद्वारा निर्मित पर्वतमाला ही उस विशाल भवनकी चहारदीवारी है। उसकी ऊँचाई सौ हाथकी है और वह चन्द्रमाके समान अपनी श्वेत छटा छिटकाती रहती है। तेन ते च महाशैलाः सरितश्च सरांसि च ।। परिक्षिप्तानि हर्म्यस्य वनान्युपवनानि च । पूर्वोक्त बड़े-बड़े पर्वत, सरिताएँ, सरोवर और प्रासादके समीपवर्ती वन-उपवन इस चहारदीवारीसे घिरे हुए हैं। एवं तच्छिल्पिवर्येण विहितं विश्वकर्मणा ।। प्रविशन्नेव गोविन्दो ददर्श परितो मुहुः । इस प्रकार शिल्पियोंमें श्रेष्ठ विश्वकर्माद्वारा बनाये हुए द्वारकानगरमें प्रवेश करते समय भगवान् श्रीकृष्णने बारंबार सब ओर दृष्टिपात किया। इन्द्रः सहामरैः श्रीमांस्तत्र तत्रावलोकयत् । देवताओंके साथ श्रीमान् इन्द्रने वहाँ द्वारकाको सब ओर दृष्टि दौड़ाते हुए देखा। एवमालोक्यांचक्रुर्द्वारकामृभास्त्रयः । उपेन्द्रबलदेवौ च वासवश्च महायशाः ।। इस प्रकार उपेन्द्र (श्रीकृष्ण), बलराम तथा महायशस्वी इन्द्र इन तीनों श्रेष्ठ महापुरुषोंने द्वारकापुरीकी शोभा देखी। ततस्तं पाण्डरं शौरिर्मूर्ध्नि तिष्ठन् गरुत्मतः ।। प्रीतः शङ्खमुपादध्मौ विद्धिषां रोमहर्षणम् । तदनन्तर गरुडके ऊपर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक श्वेतवर्णवाले अपने उस पांचजन्य शंखको बजाया, जो शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला है। तस्य शङ्खस्य शब्देन सागरश्चुक्षुभे भृशम् ।। ररास च नभः सर्वं तच्चित्रमभवत् तदा । उस घोर शंखध्वनिसे समुद्र विक्षुब्ध हो उठा तथा सारा आकाशमण्डल गूँजने लगा। उस समय वहाँ यह अद्भुत बात हुई। पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं निशम्य कुकुरान्धकाः ।। विशोकाः समपद्यन्त गरुडस्य च दर्शनात् । पांचजन्यका गम्भीर घोष सुनकर और गरुडका दर्शन कर कुकुर और अन्धकवंशी यादव शोकरहित हो गये। शङ्खचक्रगदापाणिं सुपर्णशिरसि स्थितम् ।। दृष्ट्वा जहृषिरे कृष्णं भास्करोदयतेजसम् । भगवान् श्रीकृष्णके हाथोंमें शंख, चक्र और गदा आदि आयुध सुशोभित थे। वे गरुडके ऊपर बैठे थे। उनका तेज सूर्योदयके समान नूतन चेतना और उत्साह पैदा करनेवाला था। उन्हें देखकर सबको बड़ा हर्ष हुआ।
ततस्तूर्यप्रणादश्च भेरीणां च महास्वनः ॥ सिंहनादश्च सञ्जज्ञे सर्वेषां पुरवासिनाम् । तदनन्तर तुरही और भेरियाँ बज उठीं। उनकी आवाज बहुत दूरतक फैल गयी। समस्त पुरवासी भी सिंहनाद कर उठे।
ततस्ते सर्वदाशार्हाः सर्वे च कुकुरान्धकाः ॥ प्रीयमाणाः समाजग्मुरालोक्य मधुसूदनम् । उस समय दाशार्ह, कुकुर और अन्धकवंशके सब लोग भगवान् मधुसूदनका दर्शन करके बड़े प्रसन्न हुए और सभी उनकी अगवानीके लिये आ गये।
वासुदेवं पुरस्कृत्य वेणुशंखरवैः सह ॥ उग्रसेनो ययौ राजा वासुदेवनिवेशनम् । राजा उग्रसेन भगवान् वासुदेवको आगे करके वेणुनाद और शंखध्वनिके साथ उनके महलतक उन्हें पहुँचानेके लिये गये।
आनन्दितुं पर्यचरन् स्वेषु वेश्मसु देवकी ॥ रोहिणी च यथोद्देशमाहुकस्य च याः स्त्रियः । देवकी, रोहिणी तथा उग्रसेनकी स्त्रियाँ अपने-अपने महलोंमें भगवान् श्रीकृष्णका अभिनन्दन करनेके लिये यथास्थान खड़ी थीं। पास आनेपर उन सबने उनका यथावत् सत्कार किया।
हता ब्रह्मद्विषः सर्वे जयन्त्यन्धकवृष्णयः ॥ एवमुक्तः स ह स्त्रीभिरीक्षितो मधुसूदनः । वे आशीर्वाद देती हुई इस प्रकार बोलीं—‘समस्त ब्राह्मणद्वेषी असुर मारे गये; अन्धक और वृष्णिवंशके वीर सर्वत्र विजयी हो रहे हैं।’ स्त्रियोंने भगवान् मधुसूदनसे ऐसा कहकर उनकी ओर देखा।
ततः शौरिः सुपर्णेन स्वं निवेशनमभ्ययात् ॥ चकाराथ यथोद्देशमीश्वरो मणिपर्वतम् । तदनन्तर श्रीकृष्ण गरुडके द्वारा ही अपने महलमें गये। वहाँ उन परमेश्वरने एक उपयुक्त स्थानमें मणिपर्वतको स्थापित कर दिया।
ततो धनानि रत्नानि सभायां मधुसूदनः ॥ निधाय पुण्डरीकाक्षः पितुर्दर्शनलालसः । इसके बाद कमलनयन मधुसूदनने सभाभवनमें धन और रत्नोंको रखकर मन-ही-मन पिताके दर्शनकी अभिलाषा की।
ततः सान्दीपनिं पूर्वमुपस्पृष्ट्वा महायशाः ॥ ववन्दे पृथुताम्राक्षः प्रीयमाणो महाभुजः ।
फिर विशाल एवं कुछ लाल नेत्रोंवाले उन महायशस्वी महाबाहुने पहले मन-ही-मन गुरु सान्दीपनिके चरणोंका स्पर्श किया। तथाश्रुपरिपूर्णाक्षमानन्दगतचेतसम् ।। ववन्दे सह रामेण पितरं वासवानुजः । तत्पश्चात् भाई बलरामजीके साथ जाकर श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक पिताके चरणोंमें प्रणाम किया। उस समय पिता वसुदेवके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू भर आये और उनका हृदय आनन्दके समुद्रके निमग्न हो गया। रामकृष्णौ समाश्लिष्य सर्वे चान्धकवृष्णयः ।। अन्धक और वृष्णिवंशके सब लोगोंने बलराम और श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया। तं तु कृष्णः समाहृत्य रत्नौघधनसंचयम् ।। व्यभजत् सर्ववृष्णिभ्य आध्वमिति चाब्रवीत् । भगवान् श्रीकृष्णने रत्न और धनकी उस राशिको एकत्र करके अलग-अलग बाँट दिया और सम्पूर्ण वृष्णिवंशियोंसे कहा—‘यह सब आपलोग ग्रहण करें’। यथाश्रेष्ठमुपागम्य सात्वतान् यदुनन्दनः ।। सर्वेषां नाम जग्राह दाशार्हाणामधोक्षजः । ततः सर्वाणि वित्तानि सर्वरत्नमयानि च ।। व्यभजत् तानि तेभ्योऽथ सर्वेभ्यो यदुनन्दनः । तदनन्तर यदुनन्दन श्रीकृष्णने यदुवंशियोंमें जो श्रेष्ठ पुरुष थे, उन सबसे क्रमशः मिलकर सब यादवोंको नाम ले-लेकर बुलाया और उन सबको वे सभी रत्नमय धन पृथक्-पृथक् बाँट दिये। सा केशवमहामात्रैर्महेन्द्रप्रमुखैः सह ।। शुशुभे वृष्णिशार्दूलैः सिंहैरिव गिरेर्गुहा । जैसे पर्वतकी कन्दरा सिंहोंसे सुशोभित होती है, उसी प्रकार द्वारकापुरी उस समय भगवान् श्रीकृष्ण, देवराज इन्द्र तथा वृष्णिवंशी वीर पुरुषसिंहोंसे अत्यन्त शोभा पा रही थी। अथासनगतान् सर्वानुवाच विबुधाधिपः ।। शुभया हर्षयन् वाचा महेन्द्रस्तान् महायशाः । कुकुरान्धकमुख्यांश्च तं च राजानमाहुकम् ।। जब सभी यदुवंशी अपने-अपने आसनोंपर बैठ गये, उस समय देवताओंके स्वामी महायशस्वी महेन्द्र अपनी कल्याणमयी वाणीद्वारा कुकुर और अन्धक आदि यादवों तथा राजा उग्रसेनका हर्ष बढ़ाते हुए बोले।
इन्द्र उवाच
यदर्थं जन्म कृष्णस्य मानुषेषु महात्मनः ।
यत् कृतं वासुदेवेन तद् वक्ष्यामि समासतः ॥
इन्द्रने कहा— यदुवंशी वीरो! परमात्मा श्रीकृष्णका मनुष्य-योनिमें जिस उद्देश्यको लेकर अवतार हुआ है और भगवान् वासुदेवने इस समय जो महान् पुरुषार्थ किया है, वह सब मैं संक्षेपमें बताऊँगा।
अयं शतसहस्राणि दानवानामरंदिमः ।
निहत्य पुण्डरीकाक्षः पातालविवरं ययौ ॥
यच्च नाधिगतं पूर्वैः प्रह्लादबलिशम्बरैः ।
तदिदं शौरिणा वित्तं प्रापितं भवतामिह ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले कमलनयन श्रीहरिने एक लाख दानवोंका संहार करके उस पाताल-विवरमें प्रवेश किया था, जहाँ पहलेके प्रह्लाद, बलि और शम्बर आदि दैत्य भी नहीं पहुँच सके थे। भगवान् आपलोगोंके लिये यह धन वहींसे लाये हैं।
सपाशं मुरमाक्रम्य पाञ्चजन्यं च धीमता ।
शिलासङ्घानतिक्रम्य निशुम्भः सगणो हतः ।
बुद्धिमान् श्रीकृष्णने पाशसहित मुर नामक दैत्यको कुचलकर पंचजन नामवाले राक्षसोंका विनाश किया और शिला-समूहोंको लाँघकर सेवकगणोंसहित निशुम्भको मौतके घाट उतार दिया।
हयग्रीवश्च विक्रान्तो निहतो दानवो बली ॥
मथितश्च मृधे भौमः कुण्डले चाहृते पुनः ।
प्राप्तं च दिवि देवेषु केशवेन महद् यशः ॥
तत्पश्चात् इन्होंने बलवान् एवं पराक्रमी दानव हयग्रीवपर आक्रमण करके उसे मार गिराया और भौमासुरका भी युद्धमें संहार कर डाला। इसके बाद केशवने माता अदितिके कुण्डल प्राप्त करके उन्हें यथास्थान पहुँचाया और स्वर्गलोक तथा देवताओंमें अपने महान् यशका विस्तार किया।
वीतशोकभयाबाधाः कृष्णबाहुबलाश्रयाः ।
यजन्तु विविधैः सोमैर्मखैरन्धकवृष्णयः ॥
अन्धक और वृष्णिवंशके लोग श्रीकृष्णके बाहुबलका आश्रय लेकर शोक, भय और बाधाओंसे मुक्त हैं। अब ये सभी नाना प्रकारके यज्ञों तथा सोमरसद्वारा भगवान्का यजन करें।
पुनर्बाणवधे शौरिमादित्या वसुभिः सह ।
मन्मुखा हि गमिष्यन्ति साध्याश्च मधुसूदनम् ॥
अब पुनः बाणासुरके वधका अवसर उपस्थित होनेपर मैं तथा सब देवता, वसु और साध्यगण मधुसूदन श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित होंगे।
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा ततः सर्वानामन्त्र्य कुकुरान्धकान् । सस्वजे रामकृष्णौ च वसुदेवं च वासवः ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! समस्त कुकुर और अन्धकवंशके लोगोंसे ऐसा कहकर सबसे विदा ले देवराज इन्द्रने बलराम, श्रीकृष्ण और वसुदेवको हृदयसे लगाया। प्रद्युम्नसाम्बनिश्ठाननिरुद्धं च सारणम् । बभ्रुं झल्लिं गदं भानुं चारुदेष्णं च वृत्रहा ॥ सत्कृत्य सारणाक्रूरौ पुनराभाष्य सात्यकिम् । सस्वजे वृष्णिराजानमाहुकं कुकुराधिपम् ॥ प्रद्युम्न, साम्ब, निशठ, अनिरुद्ध, सारण, बभ्रु, झल्लि, गद, भानु, चारुदेष्ण, सारण और अक्रूरका भी सत्कार करके वृत्रासुरनिषूदन इन्द्रने पुनः सात्यकिसे वार्तालाप किया। इसके बाद वृष्णि और कुकुरवंशके अधिपति राजा उग्रसेनको गले लगाया। भोजं च कृतवर्माणमन्यांश्चान्धकवृष्णिषु । आमन्त्र्य देवप्रवरो वासवो वासवानुजम् ॥ तत्पश्चात् भोज, कृतवर्मा तथा अन्य अन्धकवंशी एवं वृष्णिवंशियोंका आलिंगन करके देवराजने अपने छोटे भाई श्रीकृष्णसे विदा ली। ततः श्वेताचलप्रख्यं गजमैरावतं प्रभुः । पश्यतां सर्वभूतानामारुरोह शचीपतिः ॥ तदनन्तर शचीपति भगवान् इन्द्र सब प्राणियोंके देखते-देखते श्वेतपर्वतके समान सुशोभित ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हुए। पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिवं च वरवारणम् । मुखाडम्बरनिर्घोषैः पूरयन्नमिवासकृत् ॥ वह श्रेष्ठ गजराज अपनी गम्भीर गर्जनासे पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्गलोकको बारंबार निनादित-सा कर रहा था। हैमयन्त्रमहाकक्ष्यं हिरण्मयविषाणिनम् । मनोहरकुथास्तीर्णं सर्वरत्नविभूषितम् ॥ उसकी पीठपर सोनेके खंभोंसे युक्त बहुत बड़ा हौदा कसा हुआ था। उसके दाँतोंमें सोना मढ़ा गया था। उसके ऊपर मनोहर झूल पड़ी हुई थी। वह सब प्रकारके रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित था। अनेकशतरत्नाभिः पताकाभिरलङ्कृतम् । नित्यस्रुतमदस्रावं क्षरन्तमिव तोयदम् ॥ सैकड़ों रत्नोंसे अलंकृत पताकाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। उसके मस्तकसे निरन्तर मदकी धारा इस प्रकार बहती रहती थी, मानो मेघ पानी बरसा रहा हो। दिशागजं महामात्रं काञ्चनस्रजमास्थितः ।
प्रबभौ मन्दराग्रस्थः प्रतपन् भानुमानिव ॥
वह विशालकाय दिग्गज सोनेकी माला धारण किये हुए था। उसपर बैठे हुए देवराज इन्द्र मन्दराचलके शिखरपर तपते हुए सूर्यदेवकी भाँति उद्भासित हो रहे थे।
ततो वज्रमयं भीमं प्रगृह्य परमाङ्कुशम् ।
ययौ बलवता सार्धं पावकेन शचीपतिः ॥
तदनन्तर शचीपति इन्द्र वज्रमय भयंकर एवं विशाल अंकुश लेकर बलवान् अग्निदेवके साथ स्वर्गलोकको चल दिये।
तं करेणुगजव्रातैर्विमानैश्च मरुद्गणाः ।
पृष्ठतोऽनुययुः प्रीताः कुबेरवरुणग्रहाः ॥
उनके पीछे हाथी-हथिनियोंके समुदायों और विमानोंद्वारा मरुद्गण, कुबेर तथा वरुण आदि देवता भी प्रसन्नतापूर्वक चल पड़े।
स वायुपथमास्थाय वैश्वानरपथं गतः ।
प्राप्य सूर्यपथं देवस्तत्रैवान्तरधीयत ॥
इन्द्रदेव पहले वायुपथमें पहुँचकर वैश्वानरपथ (तेजोमय लोक)-में जा पहुँचे। तत्पश्चात् सूर्यदेवके मार्गमें जाकर वहाँ अन्तर्धान हो गये।
ततः सर्वदशार्हाणामाहुकस्य च याः स्त्रियः ।
नन्दगोपस्य महिषी यशोदा लोकविश्रुता ॥
रेवती च महाभागा रुक्मिणी च पतिव्रता ।
सत्या जाम्बवती चोभे गान्धारी शिंशुमापि वा ॥
विशोका लक्ष्मणा साध्वी सुमित्रा केतुमा तथा ।
वासुदेवमहिष्योऽन्याः श्रिया सार्धं ययुस्तदा ॥
विभूतिं द्रष्टुमनसः केशवस्य वराङ्गनाः ।
प्रीयमाणाः सभां जग्मुरालोकयितुमच्युतम् ॥
तदनन्तर सब दशार्हकुलकी स्त्रियाँ, राजा उग्रसेनकी रानियाँ, नन्दगोपकी विश्वविख्यात रानी यशोदा, महाभागा रेवती (बलभद्र-पत्नी) तथा पतिव्रता रुक्मिणी, सत्या, जाम्बवती, गान्धारराजकन्या शिंशुमा, विशोका, लक्ष्मणा, साध्वी सुमित्रा, केतुमा तथा भगवान् वासुदेवकी अन्य रानियाँ—वे सब-की-सब श्रीजीके साथ भगवान् केशवकी विभूति एवं नवागत सुन्दरी रानियोंको देखनेके लिये और श्रीअच्युतका दर्शन करनेके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ सभाभवनमें गयीं।
देवकी सर्वदेवीनां रोहिणी च पुरस्कृता ।
ददृशुर्देवमासीनं कृष्णं हलभृता सह ॥
देवकी तथा रोहिणीजी सब रानियोंके आगे चल रही थीं। सबने वहाँ जाकर श्रीबलरामजीके साथ बैठे हुए श्रीकृष्णको देखा।
तौ तु पूर्वमुपक्रम्य रोहिणीमभिवाद्य च । अभ्यवादयतां देवौ देवकीं रामकेशवौ ॥ देवकीं सप्तदेवीनां यथाश्रेष्ठं च मातरः । उन दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्णने उठकर पहले रोहिणीजीको प्रणाम किया। फिर देवकीजीकी तथा सात देवियोंमेंसे श्रेष्ठताके क्रमसे अन्य सभी माताओंकी चरणवन्दना की। ववन्दे सह रामेण भगवान् वासवानुजः ॥ अथासनवरं प्राप्य वृष्णिदारपुरस्कृता ॥ उभावङ्कगतौ चक्रे देवकी रामकेशवौ । बलरामसहित भगवान् उपेन्द्रने जब इस प्रकार मातृचरणोंमें प्रणाम किया, तब वृष्णिकुलकी महिलाओंमें अग्रणी माता देवकीजीने एक श्रेष्ठ आसनपर बैठकर बलराम और श्रीकृष्ण दोनोंको गोदमें ले लिया। सा ताभ्यामृषभाक्षाभ्यां पुत्राभ्यां शुशुभे तदा ॥ देवकी देवमातेव मित्रेण वरुणेन च । वृषभके सदृश विशाल नेत्रोंवाले उन दोनों पुत्रोंके साथ उस समय माता देवकीकी वैसी ही शोभा हुई, जैसी मित्र और वरुणके साथ देवमाता अदितिकी होती है। ततः प्राप्ता यशोदाया दुहिता वै क्षणेन हि ॥ जाज्वल्यमाना वपुषा प्रभयातीव भारत । इसी समय यशोदाजीकी पुत्री क्षणभरमें वहाँ आ पहुँची। भारत! उसके श्रीअंग दिव्य प्रभासे प्रज्वलित-से हो रहे थे। एकानङ्गेति यामाहुः कन्यां तां कामरूपिणीम् ॥ यत्कृते सगणं कंसं जघान पुरुषोत्तमः । उस कामरूपिणी कन्याका नाम था 'एकानंगा'। जिसके निमित्तसे पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने सेवकोंसहित कंसका वध किया था। ततः स भगवान् समस्तामुपाक्रम्य भामिनीम् ॥ मूर्ध्युपाघ्राय सव्येन परिजग्राह पाणिना । दक्षिणेन कराग्रेण परिजग्राह माधवः ॥ तब भगवान् बलरामने आगे बढ़कर उस मानिनी बहिनको बायें हाथसे पकड़ लिया और वात्सल्य-स्नेहसे उसका मस्तक सूँघा। तदनन्तर श्रीकृष्णने भी उस कन्याको दाहिने हाथसे पकड़ लिया। ददृशुस्तां सभामध्ये भगिनीं रामकृष्णयोः ॥ रुक्मपद्मशयां पद्मां श्रीमिवोत्तमनागयोः । लोगोंने उस सभामें बलराम और श्रीकृष्णकी इस बहिनको देखा; मानो दो श्रेष्ठ गजराजोंके बीचमें सुवर्णमय कमलके आसनपर विराजमान भगवती लक्ष्मी हों।
अथाक्षतमहावृष्ट्या लाजपुष्पघृतैरपि ।। वृष्णयोऽवाकिरन् प्रीताः संकर्षणजनार्दनौ । तत्पश्चात् वृष्णिवंशी पुरुषोंने प्रसन्न होकर बलराम और श्रीकृष्णपर लाजा (खील), फूल और घीसे युक्त अक्षतकी वर्षा की। सबालाः सहवृद्धाश्च सजातिकुलबान्धवाः ।। उपोपविविशुः प्रीता वृष्णयो मधुसूदनम् । उस समय बालक, वृद्ध, ज्ञाति, कुल और बन्धु-बान्धवोंसहित समस्त वृष्णिवंशी प्रसन्नतापूर्वक भगवान् मधुसूदनके समीप बैठ गये। पूज्यमानो महाबाहुः पौराणां रतिवर्धनः ।। विवेश पुरुषव्याघ्रः स्ववेश्म मधुसूदनः । इसके बाद पुरवासियोंकी प्रीति बढ़ानेवाले पुरुषसिंह महाबाहु मधुसूदनने सबसे पूजित हो अपने महलमें प्रवेश किया। रुक्मिण्या सहितो देव्या प्रमुमोद सुखी सुखम् । अनन्तरं च सत्याया जाम्बवत्याश्च भारत । सर्वासां च यदुश्रेष्ठः सर्वकालविहारवान् ।। वहाँ सदा प्रसन्न रहनेवाले श्रीकृष्ण रुक्मिणीदेवीके साथ बड़े सुखका अनुभव करने लगे। भारत! तत्पश्चात् सदा लीला-विहार करनेवाले यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण क्रमशः सत्यभामा तथा जाम्बवती आदि सभी देवियोंके निवास-स्थानोंमें गये। जगाम च हृषीकेशो रुक्मिण्याः स्वं निवेशनम् । फिर अन्तमें श्रीकृष्ण रुक्मिणीदेवीके महलमें पधारे। एष तात महाबाहो विजयः शार्ङ्गधन्वनः ।। एतदर्थं च जन्माहुर्मानुषेषु महात्मनः । तात! महाबाहु युधिष्ठिर! शार्ङ्ग नामक धनुष धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी यह विजयगाथा कही गयी है। इसीके लिये महात्मा श्रीकृष्णका मनुष्योंमें अवतार हुआ बताया जाता है।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा बाणासुरपर विजय और भीष्मके द्वारा श्रीकृष्ण-माहात्म्यका उपसंहार]
भीष्म उवाच
द्वारकायां ततः कृष्णः स्वदारेषु दिवानिशम् । सुखं लब्ध्वा महाराज प्रमुमोद महायशाः ॥
भीष्मजी कहते हैं—महाराज युधिष्ठिर! तदनन्तर महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्ण अपनी रानियोंके साथ दिन-रात सुखका अनुभव करते हुए द्वारकापुरीमें आनन्दपूर्वक रहने लगे।
पौत्रस्य कारणाच्चक्रे विबुधानां हितं तदा । सवासवैः सुरैः सर्वैर्दुष्करं भरतर्षभ ॥
भरतश्रेष्ठ! उन्होंने अपने पौत्र अनिरुद्धको निमित्त बनाकर देवताओंका जो हित-साधन किया, वह इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये अत्यन्त दुष्कर था।
बाणो नामाभवद् राजा बलेर्ज्येष्ठसुतो बली । वीर्यवान् भरतश्रेष्ठ स च बाहुसहस्रवान् ॥
भरतकुलभूषण! बाण नामक एक राजा हुआ था, जो बलिका ज्येष्ठ पुत्र था। वह महान् बलवान् और पराक्रमी होनेके साथ ही सहस्र भुजाओंसे सुशोभित था।
ततश्चक्रे तपस्तीव्रं सत्येन मनसा नृप । रुद्रमाराधयामास स च बाणः समा बहूः ॥
राजन्! बाणासुरने सच्चे मनसे बड़ी कठोर तपस्या की। उसने बहुत वर्षोंतक भगवान् शंकरकी आराधना की।
तस्मै बहुवरा दत्ताः शङ्करेण महात्मना । तस्माल्लब्ध्वा वरान् बाणो दुर्लभान् ससुरैरपि ॥ स शोणितपुरे राज्यं चकाराप्रतिमो बली ।
महात्मा शंकरने उसे अनेक वरदान दिये। भगवान् शंकरसे देवदुर्लभ वरदान पाकर बाणासुर अनुपम बलशाली हो गया और शोणितपुरमें राज्य करने लगा।
त्रासिताश्च सुराः सर्वे तेन बाणेन पाण्डव ॥ विजित्य विबुधान् सर्वान् सेन्द्रान् बाणः समा बहूः । अशासत महद् राज्यं कुबेर इव भारत ॥
भरतवंशी पाण्डुनन्दन! बाणासुरने सब देवताओंको आतंकित कर रखा था। उसने इन्द्र आदि सब देवताओंको जीतकर कुबेरकी भाँति दीर्घकालतक इस भूतलपर महान् राज्यका शासन किया।
ऋद्ध्यर्थं कुरुते यत्नं तस्य चैवोशना कविः ।
ज्ञानी विद्वान् शुक्राचार्य उसकी समृद्धि बढ़ानेके लिये प्रयत्न करते रहते थे।
ततो राजन्नुषा नाम बाणस्य दुहिता तथा ।।
रूपेणाप्रतिमा लोके मेनकायाः सुता यथा ।
राजन्! बाणासुरके एक पुत्री थी, जिसका नाम उषा था। संसारमें उसके रूपकी तुलना करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी। वह मेनका अप्सराकी पुत्री-सी प्रतीत होती थी।
अथोपायेन कौन्तेय अनिरुद्धो महाद्युतिः ।।
प्राद्युम्निस्तामुषां प्राप्य प्रच्छन्नः प्रमुमोद ह ।
कुन्तीनन्दन! महान् तेजस्वी प्रद्युम्नपुत्र अनिरुद्ध किसी उपायसे उषातक पहुँचकर छिपे रहकर उसके साथ आनन्दका उपभोग करने लगे।
अथ बाणो महातेजास्तदा तत्र युधिष्ठिर ।।
तं गुह्यनिलयं ज्ञात्वा प्राद्युम्निं सुतया सह ।
गृहीत्वा कारयामास वस्तुं कारागृहे बलात् ।।
युधिष्ठिर! महातेजस्वी बाणासुरने गुप्तरूपसे छिपे हुए प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धका अपनी पुत्रीके साथ रहना जान लिया और उन्हें अपनी पुत्रीसहित बलपूर्वक कारागारमें ठूँस देनेके लिये बंदी बना लिया।
सुकुमारः सुखार्होऽथ तदा दुःखमवाप सः ।
बाणेन खेदितो राजन्ननिरुद्धो मुमोह च ।।
राजन्! वे सुकुमार एवं सुख भोगनेके योग्य थे, तो भी उन्हें उस समय दुःख उठाना पड़ा। बाणासुरके द्वारा भाँति-भाँतिके कष्ट दिये जानेपर अनिरुद्ध मूर्च्छित हो गये।
एतस्मिन्नेव काले तु नारदो मुनिपुङ्गवः ।
द्वारकां प्राप्य कौन्तेय कृष्णं दृष्ट्वा वचोऽब्रवीत् ।।
कुन्तीकुमार! इसी समय मुनिप्रवर नारदजी द्वारकामें आकर श्रीकृष्णसे मिले और इस प्रकार बोले।
नारद उवाच
कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां कीर्तिवर्धन ।
त्वत्पौत्रो बाध्यमानोऽथ बाणेनामिततेजसा ।।
कृच्छ्रं प्राप्तोऽनिरुद्धो वै शेते कारागृहे सदा ।
**नारदजीने कहा—**महाबाहु श्रीकृष्ण! आप यदुवंशियोंकी कीर्ति बढ़ानेवाले हैं। इस समय अमित-तेजस्वी बाणासुर आपके पौत्र अनिरुद्धको बहुत कष्ट दे रहा है। वे संकटमें पड़े हैं और सदा कारागारमें निवास कर रहे हैं।
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा सुरर्षिर्वै बाणस्याथ पुरं ययौ ।।
नारदस्य वचः श्रुत्वा ततो राजन् जनार्दनः । आहूय बलदेवं वै प्रद्युम्नं च महाद्युतिम् ॥ आरुरोह गरुत्मन्तं ताभ्यां सह जनार्दनः । भीष्मजी कहते हैं— राजन्! ऐसा कहकर देवर्षि नारद बाणासुरकी राजधानी शोणितपुरको चले गये। नारदजीकी बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने बलरामजी तथा महातेजस्वी प्रद्युम्नको बुलाया और उन दोनोंके साथ वे गरुड़पर आरूढ़ हुए। ततः सुपर्णमारुह्य त्रयस्ते पुरुषर्षभाः ॥ जग्मुः क्रुद्धा महावीर्या बाणस्य नगरं प्रति । तदनन्तर वे तीनों महापराक्रमी पुरुषरत्न गरुड़पर आरूढ़ हो क्रोधमें भरकर बाणासुरके नगरकी ओर चल दिये। अथासाद्य महाराज तत्पुरीं ददृशुश्च ते ॥ ताम्रप्राकारसंवीतां रूप्यद्वारैश्च शोभिताम् । महाराज! वहाँ जाकर उन्होंने बाणासुरकी पुरीको देखा, जो ताँबेकी चहारदीवारीसे घिरी हुई थी। चाँदीके बने हुए दरवाजे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। हेमप्रासादसम्बाधां मुक्तामणिविचित्रताम् ॥ उद्यानवनसम्पन्नां नृत्तगीतैश्च शोभिताम् । वह पुरी सुवर्णमय प्रासादोंसे भरी हुई थी और मुक्तामणियोंसे उसकी विचित्र शोभा हो रही थी। उसमें स्थान-स्थानपर उद्यान और वन शोभा पा रहे थे। वह नगरी नृत्य और गीतोंसे सुशोभित थी। तोरणैः पक्षिभिः कीर्णां पुष्करिण्या च शोभिताम् ॥ तां पुरीं स्वर्गसंकाशां हृष्टपुष्टजनाकुलाम् । दृष्ट्वा मुदा युतां हैमां विस्मयं परमं ययुः ॥ वहाँ अनेक सुन्दर फाटक बने थे। सब ओर भाँति-भाँतिके पक्षी चहचहाते थे। कमलोंसे भरी हुई पुष्करिणी उस पुरीकी शोभा बढ़ाती थी। उसमें हृष्ट-पुष्ट स्त्री-पुरुष निवास करते थे और वह पुरी स्वर्गके समान मनोहर दिखायी देती थी। प्रसन्नतासे भरी हुई उस सुवर्णमयी नगरीको देखकर श्रीकृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न तीनोंको बड़ा विस्मय हुआ। तस्य बाणपुरस्यासन् द्वारस्था देवताः सदा । महेश्वरो गुहश्चैव भद्रकाली च पावकः ॥ एता वै देवता राजन् ररक्षुस्तां पुरीं सदा । बाणासुरकी राजधानीमें कितने ही देवता सदा द्वारपर बैठकर पहरा देते थे। राजन्! भगवान् शंकर, कार्तिकेय, भद्रकालीदेवी और अग्नि—ये देवता सदा उस पुरीकी रक्षा करते थे।
अथ कृष्णो बलाज्जित्वा द्वारपालान् युधिष्ठिर ॥
सुसंक्रुद्धो महातेजाः शङ्खचक्रगदाधरः । आससादोत्तरद्वारं शङ्करेणाभिपालितम् ॥ युधिष्ठिर! शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले महातेजस्वी श्रीकृष्णने अत्यन्त कुपित हो पूर्वद्वारके रक्षकोंको बलपूर्वक जीतकर भगवान् शंकरके द्वारा सुरक्षित उत्तरद्वारपर आक्रमण किया।
तत्र तस्थौ महातेजाः शूलपाणिर्महेश्वरः । पिनाकं सशरं गृह्य बाणस्य हितकाम्यया ॥ ज्ञात्वा तमागतं कृष्णं व्यादितास्यमिवान्तकम् । महेश्वरो महाबाहुः कृष्णाभिमुखमाययौ ॥ वहाँ महान् तेजस्वी भगवान् महेश्वर हाथमें त्रिशूल लिये खड़े थे। जब उन्हें मालूम हुआ कि भगवान् श्रीकृष्ण मुँह बाये कालकी भाँति आ रहे हैं, तब वे महाबाहु महेश्वर बाणासुरके हित-साधनकी इच्छासे बाणसहित पिनाक नामक धनुष हाथमें लेकर श्रीकृष्णके सम्मुख आये।
ततस्तौ चक्रतुर्युद्धं वासुदेवमहेश्वरौ । तद् युद्धमभवद् घोरमचिन्त्यं रोमहर्षणम् ॥ तदनन्तर भगवान् वासुदेव और महेश्वर परस्पर युद्ध करने लगे। उनका वह युद्ध अचिन्त्य, रोमांचकारी तथा भयंकर था।
अन्योन्यं तौ ततक्षाते अन्योन्यजयकाङ्क्षिणौ । दिव्यास्त्राणि च तौ देवौ क्रुद्धौ मुमुचतुस्तदा ॥ वे दोनों देवता एक-दूसरेपर विजय पानेकी इच्छासे परस्पर प्रहार करने लगे। दोनों ही क्रोधमें भरकर एक-दूसरेपर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करते थे।
ततः कृष्णो रणं कृत्वा मुहूर्तं शूलपाणिना । विजित्य तं महादेवं ततो युद्धे जनार्दनः ॥ अन्यांश्च जित्वा द्वारस्थान् प्रविवेश पुरोत्तमम् । तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने शूलपाणि भगवान् शंकरके साथ दो घड़ीतक युद्ध करके महादेवजीको जीत लिया तथा द्वारपर खड़े हुए अन्य शिवगणोंको भी परास्त करके उस उत्तम नगरमें प्रवेश किया।
प्रविश्य बाणमासाद्य स तत्राथ जनार्दनः ॥ चक्रे युद्धं महाक्रुद्धस्तेन बाणेन पाण्डव । पाण्डुनन्दन! पुरीमें प्रवेश करके अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए श्रीजनार्दनने बाणासुरके पास पहुँचकर उसके साथ युद्ध छेड़ दिया।
बाणोऽपि सर्वशस्त्राणि शितानि भरतर्षभ ॥ सुसंक्रुद्धस्तदा युद्धे पातयामास केशवे ।
भरतश्रेष्ठ! बाणासुर भी क्रोधसे आगबबूला हो रहा था। उसने भी युद्धमें भगवान् केशवपर सभी तीखे-तीखे अस्त्र-शस्त्र चलाये।
पुनरुद्यम्य शस्त्राणां सहस्रं सर्वबाहुभिः ॥ मुमोच बाणः संक्रुद्धः कृष्णं प्रति रणाजिरे । फिर उसने उद्योगपूर्वक अपनी सभी भुजाओंसे उस समरांगणमें कुपित हो श्रीकृष्णपर सहस्रों शस्त्रोंका प्रहार किया।
ततः कृष्णस्तु सच्छिद्य तानि सर्वाणि भारत ।। कृत्वा मुहूर्तं बाणेन युद्धं राजन्नधोक्षजः । चक्रमुद्यम्य राजन् वै दिव्यं शस्त्रोत्तमं ततः ।। सहस्रबाहूंश्चिच्छेद बाणस्यामिततेजसः । भारत! परंतु श्रीकृष्णने वे सभी शस्त्र काट डाले। राजन्! तदनन्तर भगवान् अधोक्षजने दो घड़ीतक बाणासुरके साथ युद्ध करके अपना दिव्य उत्तम शस्त्र चक्र हाथमें उठाया और अमिततेजस्वी बाणासुरकी सहस्र भुजाओंको काट दिया।
ततो बाणो महाराज कृष्णेन भृशपीडितः ।। छिन्नबाहुः पपाताशु विशाख इव पादपः । महाराज! तब श्रीकृष्णद्वारा अत्यन्त पीड़ित होकर बाणासुर भुजाएँ कट जानेपर शाखाहीन वृक्षकी भाँति धरतीपर गिर पड़ा।
स पातयित्वा बालेयं बाणं कृष्णस्त्वरान्वितः ।।
प्राद्युम्निं मोक्षयामास क्षिप्तं कारागृहे तदा ।
इस प्रकार बलिपुत्र बाणासुरको रणभूमिमें गिराकर श्रीकृष्णने बड़ी उतावलीके साथ कैदमें पड़े हुए प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धको छुड़ा लिया।
मोक्षयित्वाथ गोविन्दः प्राद्युम्निं सह भार्यया ।
बाणस्य सर्वरत्नानि असंख्यानि जहार सः ॥
पत्नीसहित अनिरुद्धको छुड़ाकर भगवान् गोविन्दने बाणासुरके सभी प्रकारके असंख्य रत्न हर लिये।
गोधनान्यथ सर्वस्वं स बाणस्यालये बलात् ।
जहार च हृषीकेशो यदूनां कीर्तिवर्धनः ॥
ततः स सर्वरत्नानि चाहृत्य मधुसूदनः ।
क्षिप्रमारोपयाञ्चक्रे तत् सर्वं गरुडोपरि ॥
उसके घरमें जो भी गोधन अथवा अन्य किसी प्रकारके धन मौजूद थे, उन सबको भी यदुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले भगवान् हृषीकेशने हर लिया। फिर वे सब रत्न लेकर मधुसूदनने शीघ्रतापूर्वक गरुड़पर रख लिये।
त्वरयाथ स कौन्तेय बलदेवं महाबलम् ।
प्रद्युम्नं च महावीर्यमनिरुद्धं महाद्युतिम् ॥
उषां च सुन्दरीं राजन् भृत्यदासीगणैः सह ।
सर्वनेतान् समारोप्य रत्नानि विविधानि च ॥
कुन्तीनन्दन! तत्पश्चात् उन्होंने महाबली बलदेव, अमितपराक्रमी प्रद्युम्न, परम कान्तिमान् अनिरुद्ध तथा सेवकों और दासियोंसहित सुन्दरी उषा—इन सबको और नाना प्रकारके रत्नोंको भी गरुड़पर चढ़ाया।
मुदा युक्तो महातेजाः पीताम्बरधरो बली ।
दिव्याभरणचित्राङ्गः शङ्खचक्रगदासिभृत् ॥
आरुरोह गरुत्मन्तमुदयं भास्करो यथा ।
इसके बाद शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले, पीताम्बरधारी, महाबली एवं महातेजस्वी श्रीकृष्ण बड़ी प्रसन्नताके साथ स्वयं भी गरुड़पर आरूढ़ हुए, मानो भगवान् भास्कर उदयाचलपर आसीन हुए हों। उस समय भगवान्के श्रीअंग दिव्य आभूषणोंसे विचित्र शोभा धारण कर रहे थे।
अथारुह्य सुपर्णं स प्रययौ द्वारकां प्रति ॥
प्रविश्य स्वपुरं कृष्णो यादवैः सहितस्ततः ।
प्रमुमोद तदा राजन् स्वर्गस्थो वासवो यथा ॥
गरुड़पर आरूढ़ हो श्रीकृष्ण द्वारकाकी ओर चल दिये। राजन्! अपनी पुरी द्वारकामें पहुँचकर वे यदुवंशियोंके साथ ठीक वैसे ही आनन्दपूर्वक रहने लगे, जैसे इन्द्र स्वर्गलोकमें
देवताओंके साथ रहते हैं।
सूदिता मौरवाः पाशा निशुम्भनरकौ हतौ ।
कृतक्षेमः पुनः पन्थाः पुरं प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥
शौरिणा पृथिवीपालास्त्रासिता भरतर्षभ ।
धनुषश्च प्रणादेन पाञ्चजन्यस्वनेन च ॥
भरतश्रेष्ठ! भगवान् श्रीकृष्णने मुरदैत्यके पाश काट दिये, निशुम्भ और नरकासुरको मार डाला और प्राग्ज्योतिषपुरका मार्ग सब लोगोंके लिये निष्कण्टक बना दिया। इन्होंने अपने धनुषकी टंकार और पांचजन्य शंखके हुंकारसे समस्त भूपालोंको आतंकित कर दिया है।
मेघप्रख्यैरनीकैश्च दाक्षिणात्यैः सुसंवृतम् ।
रुक्मिणं त्रासयामास केशवो भरतर्षभ ॥
भरतकुलभूषण! भगवान् केशवने उस रुक्मीको भी भयभीत कर दिया, जिसके पास मेघोंकी घटाके समान असंख्य सेनाएँ हैं और जो दाक्षिणात्य सेवकोंसे सदा सुरक्षित रहता है।
ततः पर्जन्यघोषेण रथेनादित्यवर्चसा ।
उवाह महिषीं भोज्यामेष चक्रगदाधरः ॥
इन चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान्ने रुक्मीको हराकर सूर्यके समान तेजस्वी तथा मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले रथके द्वारा भोजकुलोत्पन्ना रुक्मिणीका अपहरण किया, जो इस समय इनकी महारानीके पदपर प्रतिष्ठित हैं।
जारूथ्यामाहुतिः क्राथः शिशुपालश्च निर्जितः ।
वक्रश्च सह शैब्येन शतधन्वा च क्षत्रियः ॥
ये जारूथी नगरीमें वहाँके राजा आहुतिको तथा क्राथ एवं शिशुपालको भी परास्त कर चुके हैं। इन्होंने शैब्य, दन्तवक्र तथा शतधन्वा नामक क्षत्रियोंको भी हराया है।
इन्द्रद्युम्नो हतः क्रोधाद् यवनश्च कशेरुमान् ।
इन्होंने इन्द्रद्युम्न, कालयवन और कशेरुमान्का भी क्रोधपूर्वक वध किया है।
पर्वतानां सहस्रं च चक्रेण पुरुषोत्तमः ॥
विभिद्य पुण्डरीकाक्षो द्युमत्सेनमयोधयत् ।
कमलनयन पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने चक्रद्वारा सहस्रों पर्वतोंको विदीर्ण करके द्युमत्सेनके साथ युद्ध किया।
महेन्द्रशिखरे चैव निमेषान्तरचारिणौ ॥
जग्राह भरतश्रेष्ठ वरुणस्याभितश्चरौ ।
इरावत्यामुभौ चैतावग्निसूर्यसमौ बले ॥
गोपतिस्तालकेतुश्च निहतौ शार्ङ्गधन्वना ।