महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
कुरुकुलनन्दन पाण्डव द्रौपदीके साथ धीरे-धीरे पैदल ही चल दिये। उनके मनमें अर्जुनको देखनेकी बड़ी उत्कण्ठा थी। अतः वे बड़े हर्ष और उल्लासके साथ उस देशसे प्रस्थित हुए॥ २७—२९॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४०॥
युधिष्ठिरका भीमसेनसे अर्जुनको न देखनेके कारण मानसिक चिन्ता प्रकट करना एवं उनके गुणोंका स्मरण करते हुए गन्धमादन पर्वतपर जानेका दृढ़ निश्चय करना
एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका भीमसेनसे अर्जुनको न देखनेके कारण मानसिक चिन्ता प्रकट करना एवं उनके गुणोंका स्मरण करते हुए गन्धमादन पर्वतपर जानेका दृढ़ निश्चय करना
युधिष्ठिर उवाच
भीमसेन यमौ चोभौ पाञ्चालि च निबोधत ।
नास्ति भूतस्य नाशो वै पश्यतास्मान् वनेचरान् ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले— भीमसेन, नकुल-सहदेव और द्रौपदी! तुम सब लोग ध्यान देकर सुनो। यह निश्चय है कि पूर्वकृत कर्मोंका बिना भोगे कभी नाश नहीं होता। देखो, उन्हींके कारण आज हम राजकुमार होकर भी वन-वनमें भटक रहे हैं ॥ १ ॥
दुर्बलाः क्लेशिताः स्मेति यद् ब्रुवामेतरेतरम् ।
अशक्येऽपि व्रजामो यद् धनंजयदिदृक्षया ॥ २ ॥
यद्यपि हमलोग दुर्बल हैं, क्लेशमें पड़े हुए हैं, तथापि जो एक-दूसरेसे उत्साहपूर्वक बातें करते हैं और जहाँ जाना सम्भव नहीं उस मार्गपर भी आगे बढ़ते जा रहे हैं, उसमें एक ही कारण है, हम सबके हृदयमें अर्जुनको देखनेके लिये प्रबल उत्कण्ठा है ॥ २ ॥
तन्मे दहति गात्राणि तूलराशिमिवानलः ।
यच्च वीरं न पश्यामि धनंजयमुपान्तिकात् ॥ ३ ॥
इतना प्रयास करनेपर भी मैं वीर धनंजयको जो अबतक अपने समीप नहीं देख पा रहा हूँ, इसकी चिन्ता मेरे सम्पूर्ण अंगोंको उसी प्रकार दग्ध कर रही है, जैसे आग रूईके ढेरको जलाती रहती है ॥ ३ ॥
तस्य दर्शनतृष्णं मां सानुजं वनमास्थितम् ।
याज्ञसेन्याः परामर्शः स च वीर दहत्युत ॥ ४ ॥
उसीके दर्शनकी प्यास लेकर मैं भाइयोंसहित इस वनमें आया हूँ। वीर भीमसेन! दुःशासनने जो द्रौपदीके केश पकड़ लिये थे, वह घटना याद आकर मुझे और भी शोकसे दग्ध कर देती है ॥ ४ ॥
नकुलात् पूर्वजं पार्थं न पश्याम्यमितौजसम् ।
अजेयमुग्रधन्वानं तेन तप्ये वृकोदर ॥ ५ ॥
वृकोदर! भयंकर धनुष धारण करनेवाले अजेय वीर अमिततेजस्वी अर्जुनको जो नकुलसे पहले उत्पन्न हुआ है, मैं अबतक नहीं देख रहा हूँ, इसके कारण मुझे बड़ा संताप हो रहा है ॥ ५ ॥
तीर्थानि चैव रम्याणि वनानि च सरांसि च । चरामि सह युष्माभिस्तस्य दर्शनकाङ्क्षया ॥ ६ ॥ अर्जुनको देखनेकी ही अभिलाषासे मैं तुमलोगोंके साथ विभिन्न तीर्थोंमें, रमणीय वनोंमें और सुन्दर सरोवरोंके तटपर विचर रहा हूँ ॥ ६ ॥ पञ्चवर्षाण्यहं वीरं सत्यसंधं धनंजयम् । यन्न पश्यामि बीभत्सुं तेन तप्ये वृकोदर ॥ ७ ॥ भीमसेन! आज पाँच वर्ष हो गये, मैं अपने वीर भाई सत्यप्रतिज्ञ अर्जुनके दर्शनसे वंचित हो गया हूँ। इसके कारण मुझे बड़ी चिन्ता हो रही है ॥ ७ ॥ तं वै श्यामं गुडाकेशं सिंहविक्रान्तगामिनम् । न पश्यामि महाबाहुं तेन तप्ये वृकोदर ॥ ८ ॥ वृकोदर! सिंहके समान मस्तानी चालसे चलनेवाले, निद्राविजयी, श्यामवर्ण, महाबाहु अर्जुनको नहीं देख पा रहा हूँ, इसलिये मेरे मनमें बड़ा संताप हो रहा है ॥ ८ ॥ कृतास्त्रं निपुणं युद्धेऽप्रतिमानं धनुष्मताम् । न पश्यामि कुरुश्रेष्ठ तेन तप्ये वृकोदर ॥ ९ ॥ कुरुश्रेष्ठ भीमसेन! अस्त्रविद्यामें प्रवीण, युद्धकुशल और अनुपम धनुर्धर उस अर्जुनको नहीं देखता हूँ, इस कारण मुझे बड़ा कष्ट होता है ॥ ९ ॥ चरन्तमरिसंघेषु काले क्रुद्धमिवान्तकम् । प्रभिन्नमिव मातङ्गं सिंहस्कन्धं धनंजयम् ॥ १० ॥ जो युद्धके समय शत्रुओंके समूहमें कुपित यमराजकी भाँति विचरता है, जिसके कंधे सिंहके समान हैं तथा जो मदकी धारा बहानेवाले मत्त गजराजके समान शोभा पाता है, उस वीर धनंजयसे अबतक भेंट न हो सकी; इसका मुझे बड़ा दुःख है ॥ १० ॥ यः स शक्रादनवरो वीर्येण द्रविणेन च । यमयोः पूर्वजः पार्थः श्वेताश्वोऽमितविक्रमः ॥ ११ ॥ दुःखेन महताविष्टस्तं न पश्यामि फाल्गुनम् । अजेयमुग्रधन्वानं तेन तप्ये वृकोदर ॥ १२ ॥ वृकोदर! जो पराक्रम और सम्पत्तिमें देवराज इन्द्रसे तनिक भी कम नहीं है, जिसके रथके घोड़े श्वेत रंगके हैं, जो नकुल-सहदेवसे अवस्थामें बड़ा है, जिसके पराक्रमकी कोई सीमा नहीं है तथा जो उग्र धनुर्धर एवं अजेय है, उस वीरवर अर्जुनके दर्शनसे मैं वंचित हूँ; इसके लिये मुझे महान कष्ट हो रहा है। मैं चिन्ताकी आगमें जला जा रहा हूँ ॥ ११-१२ ॥ सततं यः क्षमाशीलः क्षिप्यमाणोऽप्यणीयसा । ऋजुमार्गप्रपन्नस्य शर्मदाताभयस्य च ॥ १३ ॥ स तु जिह्मप्रवृत्तस्य माययाभिजिघांसतः । अपि वज्रधरस्यापि भवेत् कालविषोपमः ॥ १४ ॥
जो छोटे लोगोंके आक्षेप करनेपर भी सदा क्षमाशील होनेके कारण उस आक्षेपको सह लेता है तथा सरल मार्गसे अपनी शरणमें आनेवाले लोगोंको सुख पहुँचाकर उन्हें अभयदान देता है, वही अर्जुन, जब कोई कुटिल मार्गका आश्रय ले छल-कपटसे उसपर आघात करना चाहता है तब वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, उसके लिये काल और विषके समान भयंकर हो जाता है ।। १३-१४ ।।
शत्रोरपि प्रपन्नस्य सोऽनृशंसः प्रतापवान् । दाताभयस्य बीभत्सुरमितात्मा महाबलः ।। १५ ।। सर्वेषामाश्रयोऽस्माकं रणेऽरीणां प्रमर्दिता । आहर्ता सर्वरत्नानां सर्वेषां नः सुखावहः ।। १६ ।। यदि शत्रु भी शरणमें आ जाय तो वह प्रतापी वीर उसके प्रति दयालु हो जाता और उसे निर्भय कर देता है। वह महाबली महामना अर्जुन ही हमलोगोंका सहारा है। वही समरांगणमें हमारे शत्रुओंको रौंद डालनेकी शक्ति रखता है। उसीने हमारे लिये सब प्रकारके रत्न लाकर सुलभ किये थे और वही हम सबको सदा सुख पहुँचानेवाला है ।। १५-१६ ।।
रत्नानि यस्य वीर्येण दिव्याण्यासन् पुरा मम । बहूनि बहुजातीनि यानि प्राप्तः सुयोधनः ।। १७ ।। जिसके पराक्रमसे हमारे पास पहले अनेक प्रकारकी असंख्य रत्नराशि संचित हो गयी थी, जिसे सुयोधनने ले लिया ।। १७ ।।
यस्य बाहुबलाद् वीर सभा चासीत् पुरा मम । सर्वरत्नमयी ख्याता त्रिषु लोकेषु पाण्डव ।। १८ ।। वीर भीमसेन! जिसके बाहुबलसे पहले मेरे अधिकारमें सम्पूर्ण रत्नोंकी बनी हुई त्रिभुवनविख्यात सभा थी ।। १८ ।।
वासुदेवसमं वीर्ये कार्तवीर्यसमं युधि । अजेयममितं युद्धे तं न पश्यामि फाल्गुनम् ।। १९ ।। जो पराक्रममें भगवान् श्रीकृष्ण और युद्धमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान है; तथा जो समरभूमिमें एक होकर भी असंख्य-सा प्रतीत होता है, उस अजेय वीर अर्जुनको मैं बहुत दिनोंसे नहीं देख पाता हूँ ।। १९ ।।
संकर्षणं महावीर्यं त्वां च भीमापराजितम् । अनुयातः स्ववीर्येण वासुदेवं च शत्रुहा ।। २० ।। भीमसेन! शत्रुनाशक अर्जुन अपने पराक्रमसे महाबली बलरामकी, तुझ अपराजित वीरकी और वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णकी समानता कर सकता है ।। २० ।।
यस्य बाहुबले तुल्यः प्रभावे च पुरंदरः । जवे वायुर्मुखे सोमः क्रोधे मृत्युः सनातनः ।। २१ ।। ते वयं तं नरव्याघ्रं सर्वे वीर दिदृक्षवः ।
प्रवेक्ष्यामो महाबाहो पर्वतं गन्धमादनम् ॥ २२ ॥
महाबाहो! जो बाहुबल और प्रभावमें देवराज इन्द्रके समान है, जिसके वेगमें वायु, मुखमें चन्द्रमा और क्रोधमें सनातन मृत्युका निवास है, उसी नरश्रेष्ठ अर्जुनको देखनेके लिये उत्सुक होकर हम सब लोग आज गन्धमादन पर्वतकी घाटियोंमें प्रवेश करेंगे ॥ २१-२२ ॥
विशाला बदरी यत्र नरनारायणाश्रमः ।
तं सदाध्युषितं यक्षैर्द्रक्ष्यामो गिरिमुत्तमम् ॥ २३ ॥
कुबेरनलिनीं रम्यां राक्षसैर्भिसेविताम् ।
पद्भिरेव गमिष्यामस्तप्यमाना महत् तपः ॥ २४ ॥
गन्धमादन वही है, जहाँ विशाल बदरीका वृक्ष और भगवान् नर-नारायणका आश्रम है; उस उत्तम पर्वतपर सदा यक्षगण निवास करते हैं; हमलोग उसका दर्शन करेंगे। इसके सिवा, राक्षसोंद्वारा सेवित कुबेरकी सुरम्य पुष्करिणी भी है जहाँ हमलोग भारी तपस्या करते हुए पैदल ही चलेंगे ॥ २३-२४ ॥
न च यानवता शक्यो गन्तुं देशो वृकोदर ।
न नृशंसेन लुब्धेन नाप्रशान्तेन भारत ॥ २५ ॥
भरतनन्दन! वृकोदर! उस प्रदेशमें किसी सवारीसे नहीं जाया जा सकता तथा जो क्रूर, लोभी और अशान्त है, ऐसे मनुष्यके लिये श्रद्धाकी कमीके कारण उस स्थानपर जाना असम्भव है ॥ २५ ॥
तत्र सर्वे गमिष्यामो भीमार्जुनगवेषिणः ।
सायुधा बद्धनिस्त्रिंशाः सार्धं विप्रैर्महाव्रतैः ॥ २६ ॥
भीमसेन! हम सब लोग अर्जुनकी खोज करते हुए तलवार बाँधकर अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो इन महान् व्रतधारी ब्राह्मणोंके साथ वहाँ चलेंगे ॥ २६ ॥
मक्षिकादंशमशकान् सिंहान् व्याघ्रान् सरीसृपान् ।
प्राप्नोत्यनियतः पार्थ नियतस्तान् न पश्यति ॥ २७ ॥
भीमसेन! जो अपने मन और इन्द्रियोंपर संयम नहीं रखता, ऐसे मनुष्यको वहाँ जानेपर मक्खी, डाँस, मच्छर, सिंह, व्याघ्र और सर्पोंका सामना करना पड़ता है, परंतु जो संयम-नियमसे रहनेवाला है, उसे उन जन्तुओंका दर्शनतक नहीं होता ॥ २७ ॥
ते वयं नियतात्मानः पर्वतं गन्धमादनम् ।
प्रवेक्ष्यामो मिताहारा धनंजयदिदृक्षवः ॥ २८ ॥
अतः हमलोग भी अर्जुनको देखनेकी इच्छासे अपने मनको संयममें रखकर स्वल्पाहार करते हुए गन्धमादनकी पर्वतमालाओंमें प्रवेश करेंगे ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ इकलीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४१ ।।
पाण्डवोंद्वारा गङ्गाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना
द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवोंद्वारा गङ्गाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना
लोमश उवाच
द्रष्टारः पर्वताः सर्वे नद्यः सपुरकाननाः ।
तीर्थानि चैव श्रीमन्ति स्पृष्टं च सलिलं करैः ॥ १ ॥
लोमशजीने कहा—तीर्थदर्शी पाण्डुकुमारो! तुमने सब पर्वतोंके दर्शन कर लिये। नगरों और वनोंसहित नदियोंका भी अवलोकन किया। शोभाशाली तीर्थोंके भी दर्शन किये और उन सबके जलका अपने हाथोंसे स्पर्श भी कर लिया ॥ १ ॥
पर्वतं मन्दरं दिव्यमेष पन्थाः प्रयास्यति ।
समाहिता निरुद्विग्नाः सर्वे भवत पाण्डवाः ॥ २ ॥
अयं देवनिवासो वै गन्तव्यो वो भविष्यति ।
ऋषीणां चैव दिव्यानां निवासः पुण्यकर्मणाम् ॥ ३ ॥
पाण्डवो! यह मार्ग दिव्य मन्दराचलकी ओर जायगा। अब तुम सब लोग उद्वेगशून्य और एकाग्रचित्त हो जाओ। यह देवताओंका निवासस्थान है, जिसपर तुम्हें चलना होगा। यहाँ पुण्यकर्म करनेवाले दिव्य ऋषियोंका भी निवास है ॥ २-३ ॥
एषा शिवजला पुण्या याति सौम्य महानदी ।
बदरीप्रभवा राजन् देवर्षिगणसेविता ॥ ४ ॥
सौम्य स्वभाववाले नरेश! यह कल्याणमय जलसे भरी हुई पुण्यस्वरूपा महानदी अलकनन्दा (गंगा) प्रवाहित होती है, जो देवर्षियोंके समुदायसे सेवित है। इसका प्रादुर्भाव बदरिकाश्रमसे ही हुआ है ॥ ४ ॥
एषा वैहायसैर्नित्यं बालखिल्यैर्महात्मभिः ।
अर्चिता चोपयाता च गन्धर्वैश्च महात्मभिः ॥ ५ ॥
आकाशचारी महात्मा बालखिल्य तथा महामना गन्धर्वगण भी नित्य इसके तटपर आते-जाते हैं और इसकी पूजा करते हैं ॥ ५ ॥
अत्र साम स्म गायन्ति सामगाः पुण्यनिःस्वनाः ।
मरीचिः पुलहश्चैव भृगुश्चैवाङ्गिरास्तथा ॥ ६ ॥
सामगान करनेवाले विद्वान् वेदमन्त्रोंकी पुण्यमयी ध्वनि फैलाते हुए यहाँ सामवेदकी ऋचाओंका गान करते हैं। मरीचि, पुलह, भृगु तथा अंगिरा भी यहाँ जप एवं स्वाध्याय करते
हैं ॥ ६ ॥ अत्राह्निकं सुरश्रेष्ठो जपते समरुद्गणः । साध्याश्चैवाश्विनौ चैव परिधावन्ति तं तदा ॥ ७ ॥ देवश्रेष्ठ इन्द्र भी मरुद्गणोंके साथ यहाँ आकर प्रतिदिन नियमपूर्वक जप करते हैं। उस समय साध्य तथा अश्विनीकुमार भी उनकी परिचर्यामें रहते हैं ॥ ७ ॥ चन्द्रमाः सह सूर्येण ज्योतींषि च ग्रहैः सह । अहोरात्रविभागेन नदीमेनामनुव्रजन् ॥ ८ ॥ चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह और नक्षत्र भी दिन-रातके विभागपूर्वक इस पुण्य नदीकी यात्रा करते हैं ॥ ८ ॥ एतस्याः सलिलं मूर्ध्नि वृषाङ्कः पर्यधारयत् । गङ्गाद्वारे महाभाग येन लोकस्थितिर्भवेत् ॥ ९ ॥ महाभाग! गङ्गाद्वार (हरिद्वार)-में साक्षात् भगवान् शंकरने इसके पावन जलको अपने मस्तकपर धारण किया है, जिससे जगत्की रक्षा हो ॥ ९ ॥ एतां भगवतीं देवीं भवन्तः सर्व एव हि । प्रयतेनात्मना तात प्रतिगम्याभिवादत ॥ १० ॥ तात! तुम सब लोग मनको संयममें रखते हुए इस ऐश्वर्यशालिनी दिव्य नदीके तटपर चलकर इसे सादर प्रणाम करो ॥ १० ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लोमशस्य महात्मनः । आकाशगङ्गां प्रयताः पाण्डवास्तेऽभ्यवादयन् ॥ ११ ॥ महात्मा लोमशका यह वचन सुनकर सब पाण्डवोंने संयतचित्तसे भगवती आकाशगंगा (अलकनन्दा) को प्रणाम किया ॥ ११ ॥ अभिवाद्य च ते सर्वे पाण्डवा धर्मचारिणः । पुनः प्रयाताः संहृष्टाः सर्वैर्ऋषिगणैः सह ॥ १२ ॥ प्रणाम करके धर्मका आचरण करनेवाले वे समस्त पाण्डव पुनः सम्पूर्ण ऋषि-मुनियोंके साथ हर्षपूर्वक आगे बढ़े ॥ १२ ॥ ततो दूरात् प्रकाशन्तं पाण्डुरं मेरुसंनिभम् । ददृशुस्ते नरश्रेष्ठा विकीर्णं सर्वतोदिशम् ॥ १३ ॥ तदनन्तर उन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंने एक श्वेत पर्वत-सा देखा जो मेरुगिरिके समान दूरसे ही प्रकाशित हो रहा था। वह सम्पूर्ण दिशाओंमें बिखरा जान पड़ता था ॥ १३ ॥ तान् प्रष्टुकामान् विज्ञाय पाण्डवान् स तु लोमशः । उवाच वाक्यं वाक्यज्ञः शृणुध्वं पाण्डुनन्दनाः ॥ १४ ॥ लोमशजी ताड़ गये कि पाण्डवलोग उस श्वेत पर्वताकार वस्तुके विषयमें कुछ पूछना चाहते हैं, तब प्रवचनकी कला जाननेवाले उन महर्षिने कहा—'पाण्डवो! सुनो ॥ १४ ॥
एतद् विकीर्णं सुश्रीमत् कैलासशिखरोपमम् । यत् पश्यसि नरश्रेष्ठ पर्वतप्रतिमं स्थितम् ॥ १५ ॥ एतान्यस्थीनि दैत्यस्य नरकस्य महात्मनः । पर्वतप्रतिमं भाति पर्वतप्रस्तराश्रितम् ॥ १६ ॥ 'नरश्रेष्ठ! यह जो सब ओर बिखरी हुई कैलासशिखरके समान सुन्दर प्रकाशयुक्त पर्वताकार वस्तु देख रहे हो, ये सब विशालकाय नरकासुरकी हड्डियाँ हैं। पर्वत और शिलाखण्डोंपर स्थित होनेके कारण ये भी पर्वतके समान ही प्रतीत होती हैं ॥ १५-१६ ॥
पुरातनेन देवेन विष्णुना परमात्मना । दैत्यो विनिहतस्तेन सुरराजहितैषिणा ॥ १७ ॥ 'पुरातन परमात्मा श्रीविष्णुदेवने देवराज इन्द्रका हित करनेकी इच्छासे उस दैत्यका वध किया था ॥ १७ ॥
दशवर्षसहस्राणि तपस्तप्यन् महामनाः । ऐन्द्रं प्रार्थयते स्थानं तपःस्वाध्यायविक्रमात् ॥ १८ ॥ 'वह महामना दैत्य दस हजार वर्षोंतक कठोर तपस्या करके तप, स्वाध्याय और पराक्रमसे इन्द्रका स्थान लेना चाहता था ॥ १८ ॥
तपोबलेन महता बाहुवेगबलेन च । नित्यमेव दुराधर्षो धर्षयन् स दितेः सुतः ॥ १९ ॥ 'अपने महान् तपोबल तथा वेगयुक्त बाहुबलसे वह देवताओंके लिये सदा अजेय बना रहता था और स्वयं सब देवताओंको सताया करता था ॥ १९ ॥
स तु तस्य बलं ज्ञात्वा धर्मे च चरितव्रतम् । भयाभिभूतः संविग्नः शक्र आसीत् तदानघ ॥ २० ॥ 'निष्पाप युधिष्ठिर! नरकासुर बलवान् तो था ही, धर्मके लिये भी उसने कितने ही उत्तम व्रतोंका आचरण किया था, यह सब जानकर इन्द्रको बड़ा भय हुआ, वे घबरा उठे ॥ २० ॥
तेन संचिन्तितो देवो मनसा विष्णुरव्ययः । सर्वत्रगः प्रभुः श्रीमानागतश्च स्थितो बभौ ॥ २१ ॥ 'तब उन्होंने मन-ही-मन अविनाशी भगवान् विष्णुका चिन्तन किया, उनके स्मरण करते ही सर्वव्यापी भगवान् श्रीपति वहाँ उपस्थित हो प्रकाशित हुए ॥ २१ ॥
ऋषयश्चापि तं सर्वे तुष्टुवुश्च दिवौकसः । तं दृष्ट्वा ज्वलमानश्रीर्भगवान् हव्यवाहनः ॥ २२ ॥ नष्टतेजाः समभवत् तस्य तेजोऽभिभर्त्सितः । तं दृष्ट्वा वरदं देवं विष्णुं देवगणेश्वरम् ॥ २३ ॥ प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा नमस्कृत्य च वज्रभृत् । प्राह वाक्यं ततस्तत्त्वं यतस्तस्य भयं भवेत् ॥ २४ ॥
'उस समय सभी देवताओं तथा ऋषियोंने उनकी स्तुति की। उन्हें देखते ही प्रज्वलित कान्तिसे सुशोभित भगवान् अग्निदेवका तेज नष्ट-सा हो गया। वे श्रीहरिके तेजसे तिरस्कृत हो गये। समस्त देवसमुदायके स्वामी एवं वरदायक भगवान् विष्णुका दर्शन करके वज्रधारी इन्द्रने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और बार-बार मस्तक झुकाया। तदनन्तर वे सारी बातें भगवान्से कह सुनायीं, जिनके कारण उन्हें उस दैत्यसे भय हो रहा था' ।। २२—२४ ।।
विष्णुरुवाच जानामि ते भयं शक्र दैत्येन्द्रान्नरकात् ततः । ऐन्द्रं प्रार्थयते स्थानं तपःसिद्धेन कर्मणा ॥ २५ ॥ **तब भगवान् विष्णुने कहा—**इन्द्र! मैं जानता हूँ, तुम्हें दैत्यराज नरकासुरसे भय प्राप्त हुआ है। वह अपने तपःसिद्ध कर्मोंद्वारा इन्द्रपदको लेना चाहता है ।। २५ ।।
सोऽहमेनं तव प्रीत्या तपःसिद्धमपि ध्रुवम् । वियुनज्मि देहाद् देवेन्द्र मुहूर्तं प्रतिपालय ॥ २६ ॥
देवेन्द्र! यद्यपि तपस्याद्वारा उसे सिद्धि प्राप्त हो चुकी है तो भी मैं तुम्हारे प्रेमवश निश्चय ही उस दैत्यको मार डालूँगा, तुम थोड़ी देर और प्रतीक्षा करो ।। २६ ।।
तस्य विष्णुर्महातेजाः पाणिना चेतनां हरत् । स पपात ततो भूमौ गिरिराज इवाहतः ॥ २७ ॥
ऐसा कहकर महातेजस्वी भगवान् विष्णुने हाथसे मारकर उस दैत्यके प्राण हर लिये और वह वज्रके मारे हुए गिरिराजकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २७ ॥ तस्यैतदस्थिसंघातं मायाविनिहतस्य वै । इदं द्वितीयमपरं विष्णोः कर्म प्रकाशते ॥ २८ ॥ इस प्रकार मायाद्वारा मारे गये उस दैत्यकी हड्डियोंका यह समूह दिखायी देता है। अब मैं भगवान् विष्णुका यह दूसरा पराक्रम बता रहा हूँ, जो सर्वत्र प्रकाशमान है ॥ २८ ॥ नष्टा वसुमती कृत्स्ना पाताले चैव मज्जिता । पुनरुद्धरिता तेन वाराहेणैकशृङ्गिणा ॥ २९ ॥ एक समय सारी पृथ्वी एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो गयी, पातालमें डूब गयी। उस समय भगवान् विष्णुने पर्वतशिखरके सदृश एक दाँतवाले वाराहका रूप धारण करके पुनः इसका उद्धार किया था ॥ २९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
भगवन् विस्तरेणेमां कथां कथय तत्त्वतः । कथं तेन सुरेशेन नष्टा वसुमती तदा ॥ ३० ॥ योजनानां शतं ब्रह्मन् पुनरुद्धरिता तदा । केन चैव प्रकारेण जगतो धरणी ध्रुवा ॥ ३१ ॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**भगवन्! देवेश्वर भगवान् विष्णुने पातालमें सैकड़ों योजन नीचे डूबी हुई इस पृथ्वीका पुनरुद्धार किस प्रकार किया? आप इस कथाको यथार्थरूपसे और विस्तारपूर्वक कहिये। जगत्का भार धारण करनेवाली इस अचला पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये उन्होंने किस उपायका अवलम्बन किया? ॥ ३०-३१ ॥ शिवा देवी महाभागा सर्वसस्यप्ररोहिणी । कस्य चैव प्रभावाद्धि योजनानां शतं गता ॥ ३२ ॥ सम्पूर्ण शस्योंका उत्पादन करनेवाली यह कल्याणमयी महाभागा वसुधादेवी किसके प्रभावसे सैकड़ों योजन नीचे धँस गयी थी ॥ ३२ ॥ केन तद् वीर्यसर्वस्वं दर्शितं परमात्मनः । एतत् सर्वं यथातत्त्वमिच्छामि द्विजसत्तम । श्रोतुं विस्तरशः सर्वं त्वं हि तस्य प्रतिश्रयः ॥ ३३ ॥ परमात्माके उस अद्भुत पराक्रमका दर्शन (ज्ञान) किसने कराया था? द्विजश्रेष्ठ! यह सब मैं यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। आप इस वृत्तान्तके आश्रय (ज्ञाता) हैं ॥ ३३ ॥
लोमश उवाच
यत् तेऽहं परिपृष्टोऽस्मि कथामेतां युधिष्ठिर ।
तत् सर्वमखिलेनेह श्रूयतां मम भाषतः ॥ ३४ ॥ लोमशजीने कहा— युधिष्ठिर! तुमने जिसके विषयमें मुझसे प्रश्न किया है, वह कथा—वह सारा वृत्तान्त मैं बता रहा हूँ, सुनो ॥ ३४ ॥ पुरा कृतयुगे तात वर्तमाने भयंकरे । यमत्वं कारयामास आदिदेवः पुरातनः ॥ ३५ ॥ तात! इस कल्पके प्रथम सत्ययुगकी बात है, एक समय बड़ी भयंकर परिस्थिति उत्पन्न हो गयी थी। उस समय आदिदेव पुरातन पुरुष भगवान् श्रीहरि ही यमराजका भी कार्य सम्पन्न करते थे ॥ ३५ ॥ यमत्वं कुर्वतस्तस्य देवदेवस्य धीमतः । न तत्र म्रियते कश्चिज्जायते वा तथाप्युत ॥ ३६ ॥ युधिष्ठिर! परम बुद्धिमान् देवदेव भगवान् श्रीहरिके यमराजका कार्य सँभालते समय किसी भी प्राणीकी मृत्यु नहीं होती थी; परंतु उत्पत्तिका कार्य पूर्ववत् चलता रहा ॥ वर्धन्ते पक्षिसंघाश्च तथा पशुगवेडकम् । गवाश्वं च मृगाश्चैव सर्वे ते पिशिताशनाः ॥ ३७ ॥ फिर तो पक्षियोंके समूह बढ़ने लगे। गाय, बैल, भेड़-बकरे आदि पशु, घोड़े, मृग तथा मांसाहारी जीव सभी बढ़ने लगे ॥ ३७ ॥ तथा पुरुषशार्दूल मानुषाश्च परंतप । सहस्रशो ह्ययुतशो वर्धन्ते सलिलं यथा ॥ ३८ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले नरश्रेष्ठ! जैसे बरसातमें पानी बढ़ता है, उसी प्रकार मनुष्य भी हजार एवं दस हजार गुनी संख्यामें बढ़ने लगे ॥ ३८ ॥ एतस्मिन् संकुले तात वर्तमाने भयंकरे । अतिभाराद् वसुमती योजनानां शतं गता ॥ ३९ ॥ तात! इस प्रकार सब प्राणियोंकी वृद्धि होनेसे जब बड़ी भयंकर अवस्था आ गयी तब अत्यन्त भारसे दबकर यह पृथ्वी सैकड़ों योजन नीचे चली गयी ॥ ३९ ॥ सा वै व्यथितसर्वाङ्गी भारेणाक्रान्तचेतना । नारायणं वरं देवं प्रपन्ना शरणं गता ॥ ४० ॥ भारी भारके कारण पृथ्वी देवीके सम्पूर्ण अंगोंमें बड़ी पीड़ा हो रही थी। उसकी चेतना लुप्त होती जा रही थी। अतः वह सर्वश्रेष्ठ देवता भगवान् नारायणकी शरणमें गयी ॥ ४० ॥
पृथिव्युवाच भगवंस्त्वत्प्रसादाद्धि तिष्ठेयं सुचिरं त्विह । भारेणास्मि समाक्रान्ता न शक्नोमि स्म वर्तितुम् ॥ ४१ ॥
पृथ्वी बोली— भगवन्! आप ऐसी कृपा करें जिससे मैं दीर्घ कालतक यहाँ स्थिर रह सकूँ। इस समय मैं भारसे इतनी दब गयी हूँ कि जीवन धारण नहीं कर सकती ॥ ४१ ॥ ममेमं भगवन् भारं व्यपनेतुं त्वमर्हसि । शरणागतास्मि ते देव प्रसादं कुरु मे विभो ॥ ४२ ॥ भगवन्! मेरे इस भारको आप दूर करनेकी कृपा करें। देव! मैं आपकी शरणमें आयी हूँ। विभो! मुझपर कृपाप्रसाद कीजिये ॥ ४२ ॥ तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा भगवानक्षरः प्रभुः । प्रोवाच वचनं हृष्टः श्रव्याक्षरसमीरितम् ॥ ४३ ॥ पृथ्वीका यह वचन सुनकर अविनाशी भगवान् नारायणने प्रसन्न होकर श्रवणमधुर अक्षरोंसे युक्त मीठी वाणीमें कहा ॥ ४३ ॥
विष्णुरुवाच न ते महि भयं कार्यं भारार्ते वसुधारिणि । अहमेवं तथा कुर्मि यथा लघ्वी भविष्यसि ॥ ४४ ॥ भगवान् विष्णु बोले— वसुधे! तू भारसे पीड़ित है; किंतु अब उसके लिये भय न कर। मैं अभी ऐसा उपाय करता हूँ जिससे तू हलकी हो जायगी ॥ ४४ ॥
लोमश उवाच स तां विसर्जयित्वा तु वसुधां शैलकुण्डलाम् । ततो वराहः संवृत्त एकशृङ्गो महाद्युतिः ॥ ४५ ॥ लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! पर्वतरूपी कुण्डलोंसे विभूषित वसुधादेवीको विदा करके महातेजस्वी भगवान् विष्णुने वाराहका रूप धारण कर लिया। उस समय उनके एक ही दाँत था, जो पर्वत-शिखरके समान सुशोभित होता था ॥ ४५ ॥ रक्ताभ्यां नयनाभ्यां तु भयमुत्पादयन्निव । धूमं च ज्वलयँल्लक्ष्म्या तत्र देशे व्यवर्धत ॥ ४६ ॥ वे अपने लाल-लाल नेत्रोंसे मानो भय उत्पन्न कर रहे थे और अपनी अंगकान्तिसे धूम प्रकट करते हुए उस स्थानपर बढ़ने लगे ॥ ४६ ॥ स गृहीत्वा वसुमतीं शृङ्गेणैकेन भास्वता । योजनानां शतं वीर समुद्धरति सोऽक्षरः ॥ ४७ ॥ वीर युधिष्ठिर! अविनाशी भगवान् विष्णुने अपने एक ही तेजस्वी दाँतके द्वारा पृथ्वीको थामकर उसे सौ योजन ऊपर उठा दिया ॥ ४७ ॥ तस्यां चोद्धार्यमाणायां संक्षोभः समजायत । देवाः संक्षुभिताः सर्वे ऋषयश्च तपोधनाः ॥ ४८ ॥
पृथ्वीको उठाते समय सब ओर भारी हलचल मच गयी। सम्पूर्ण देवता तथा तपस्वी ऋषि क्षुब्ध हो उठे ।। हाहाभूतमभूत् सर्वं त्रिदिवं व्योम भूस्तथा । न पर्यवस्थितः कश्चिद् देवो वा मानुषोऽपि वा ।। ४९ ।। ततो ब्रह्माणमासीनं ज्वलमानमिव श्रिया । देवाः सर्षिगणाश्चैव उपतस्थुरनेकणः ।। ५० ।। स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूलोक सबमें अत्यन्त हाहाकार मच गया। कोई भी देवता या मनुष्य स्थिर नहीं रह सका। तब अनेक देवता और ऋषि ब्रह्माजीके समीप गये। उस समय वे अपने आसनपर बैठकर दिव्य कान्तिसे प्रकाशित हो रहे थे ।। ४९-५० ।। उपसर्प्य च देवेशं ब्रह्माणं लोकसाक्षिकम् । भूत्वा प्राञ्जलयः सर्वे वाक्यमुच्चारयंस्तदा ।। ५१ ।। लोकसाक्षी देवेश्वर ब्रह्माके निकट पहुँचकर सबने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा— ।। ५१ ।। लोकाः संक्षुभिताः सर्वे व्याकुलं च चराचरम् । समुद्राणां च संक्षोभस्त्रिदशेश प्रकाशते ।। ५२ ।। ‘देवेश्वर! सम्पूर्ण लोकोंमें हलचल मच गयी है। चर और अचर सभी प्राणी व्याकुल हैं। समुद्रोंमें बड़ा भारी क्षोभ दिखायी दे रहा है ।। ५२ ।। सैषा वसुमती कृत्स्ना योजनानां शतं गता । किमेतद् किं प्रभावेण येनेदं व्याकुलं जगत् । अख्यातु नो भवान् शीघ्रं विसंज्ञाः स्मेह सर्वशः ।। ५३ ।। ‘यह सारी पृथ्वी सैकड़ों योजन नीचे चली गयी थी, अब यह किसके प्रभावसे कौन-सी अद्भुत घटना घटित हो रही है जिससे सारा संसार व्याकुल हो उठा है। आप शीघ्र हमें इसका कारण बताइये। हम सब लोग अचेत-से हो रहे हैं’ ।। ५३ ।।
ब्रह्मोवाच
असुरेभ्यो भयं नास्ति युष्माकं कुत्रचित् क्वचित् । श्रूयतां यत्कृतेष्वेष संक्षोभो जायतेऽमराः ।। ५४ ।। योऽसौ सर्वत्रगः श्रीमानक्षरात्मा व्यवस्थितः। तस्य प्रभावात् संक्षोभस्त्रिदिवस्य प्रकाशते ।। ५५ ।। ब्रह्माजीने कहा—देवताओ! तुम्हें असुरोंसे कभी और कोई भय नहीं है। यह जो चारों ओर क्षोभ फैल रहा है, इसका क्या कारण है? वह सुनो। वे जो सर्वव्यापी अक्षरस्वरूप श्रीमान् भगवान् नारायण हैं, उन्हींके प्रभावसे यह स्वर्गलोकमें क्षोभ प्रकट हो रहा है ।। ५४-५५ ।।
यैषा वसुमती कृत्स्ना योजनानां शतं गता । समुद्धृता पुनस्तेन विष्णुना परमात्मना ॥ ५६ ॥ यह सारी पृथ्वी, जो सैकड़ों योजन नीचे चली गयी थी, इसे परमात्मा श्रीविष्णुने पुनः ऊपर उठाया है ॥ ५६ ॥
तस्यामुद्धार्यमाणायां संक्षोभः समजायत । एवं भवन्तो जानन्तु छिद्यतां संशयश्च वः ॥ ५७ ॥ इस पृथ्वीका उद्धार करते समय ही सब ओर यह महान् क्षोभ प्रकट हुआ है। इस प्रकार तुम्हें इस विश्वव्यापी हलचलका यथार्थ कारण ज्ञात होना और तुम्हारा आन्तरिक संशय दूर हो जाना चाहिये ॥ ५७ ॥
देवा ऊचुः क्व तद् भूतं वसुमतीं समुद्धरति हृष्टवत् । तं देशं भगवन् ब्रूहि तत्र यास्यामहे वयम् ॥ ५८ ॥ देवता बोले—भगवन्! वे वाराहरूपधारी भगवान् प्रसन्न-से होकर कहाँ पृथ्वीका उद्धार कर रहे हैं, उस प्रदेशका पता हमें बताइये; हम सब लोग वहाँ जायेंगे ॥ ५८ ॥
ब्रह्मोवाच हन्त गच्छत भद्रं वो नन्दने पश्यत स्थितम् । एषोऽत्र भगवान् श्रीमान् सुपर्णः सम्प्रकाशते ॥ ५९ ॥ वाराहेणैव रूपेण भगवाँल्लोकभावनः । कालानल इवाभाति पृथिवीतलमुद्धरन् ॥ ६० ॥ ब्रह्माजीने कहा—देवताओ! बड़े हर्षकी बात है, जाओ। तुम्हारा कल्याण हो। भगवान् नन्दनवनमें विराजमान हैं। वहीं उनका दर्शन करो। उस वनके निकट ये स्वर्णके समान सुन्दर रोमवाले परम कान्तिमान् विश्वभावन भगवान् श्रीविष्णु वाराहरूपसे प्रकाशित हो रहे हैं। भूतलका उद्धार करते हुए वे प्रलयकालीन अग्निके समान उद्भासित होते हैं ॥ ५९-६० ॥
एतस्योरसि सुव्यक्तं श्रीवत्समभिराजते । पश्यध्वं विबुधाः सर्वे भूतमेतदनामयम् ॥ ६१ ॥ इनके वक्षःस्थलमें स्पष्टरूपसे श्रीवत्सचिह्न प्रकाशित हो रहा है। देवताओ! ये रोग-शोकसे रहित साक्षात् भगवान् ही वाराहरूपसे प्रकट हुए हैं, तुम सब लोग इनका दर्शन करो ॥ ६१ ॥
लोमश उवाच ततो दृष्ट्वा महात्मानं श्रुत्वा चामन्त्र्य चामराः ।
पितामहं पुरस्कृत्य जग्मुर्देवा यथागतम् ॥ ६२ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर देवताओंने जाकर वाराहरूपधारी परमात्मा श्रीविष्णुका दर्शन किया, उनकी महिमा सुनी और उनकी आज्ञा लेकर वे ब्रह्माजीको आगे करके जैसे आये थे वैसे लौट गये ॥ ६२ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा तु तां कथां सर्वे पाण्डवा जनमेजय ।
लोमशादेशितेनाशु पथा जग्मुः प्रहृष्टवत् ॥ ६३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह कथा सुनकर सब पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए और लोमशजीके बताये हुए मार्गसे शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ गये ॥ ६३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे
द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४२ ॥
१४३-
त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
गन्धमादनकी यात्राके समय पाण्डवोंका आँधी-पानीसे सामना
वैशम्पायन उवाच
ते शूरास्ततधन्वानस्तूणवन्तः समागॆणाः ।
बद्धगोधाङ्गुलित्राणाः खड्गवन्तोऽमितौजसः ॥ १ ॥
परिगृह्य द्विजश्रेष्ठाञ्ज्येष्ठाः सर्वधनुष्मताम् ।
पाञ्चालीसहिता राजन् प्रययुर्गन्धमान्दनम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें अग्रगण्य वे अमिततेजस्वी शूरवीर पाण्डव धनुष, बाण, तरकश, ढाल और तलवार लिये, हाथोंमें गोहके चमड़ेके बने दस्ताने पहने और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको आगे किये द्रौपदीके साथ गन्धमादन पर्वतकी ओर प्रस्थित हुए ॥ १-२ ॥
सरांसि सरितश्चैव पर्वतांश्च वनानि च ।
वृक्षांश्च बहुलच्छायान् ददृशुर्गिरिमूर्धनि ॥ ३ ॥
पर्वतके शिखरपर उन्होंने बहुत-से सरोवर, सरिताएँ, पर्वत, वन तथा घनी छायावाले वृक्ष देखे ॥ ३ ॥
नित्यपुष्पफलान् देशान् देवर्षिगणसेवितान् ।
आत्मन्यात्मानमाधाय वीरा मूलफलाशिनः ॥ ४ ॥
चेरुरुच्चावचाकारान् देशान् विषमसंकटान् ।
पश्यन्तो मृगजातानि बहूनि विविधानि च ॥ ५ ॥
उन्हें कितने ही ऐसे स्थान दृष्टिगोचर हुए जहाँ सदा फूल और फलोंकी बहुतायत रहती थी। उन प्रदेशोंमें देवर्षियोंके समुदाय निवास करते थे। वीर पाण्डव अपने मनको परमात्माके चिन्तनमें लगाकर फल-मूलका आहार करते हुए ऊँचे-नीचे विषम-संकटपूर्ण स्थानोंमें विचर रहे थे। मार्गमें उन्हें नाना प्रकारके मृगसमूह दिखायी देते थे जिनकी संख्या बहुत थी ॥ ४-५ ॥
ऋषिसिद्धामरयुतं गन्धर्वाप्सरसां प्रियम् ।
विविशुस्ते महात्मानः किन्नराचरितं गिरिम् ॥ ६ ॥
इस प्रकार उन महात्मा पाण्डवोंने गन्धर्वों और अप्सराओंकी प्रिय भूमि, किन्नरोंकी क्रीडास्थली तथा ऋषियों, सिद्धों और देवताओंके निवासस्थान गन्धमादन पर्वतकी घाटीमें प्रवेश किया ॥ ६ ॥
प्रविशत्स्वथ वीरेषु पर्वत॑ गन्धमादनम् । चण्डवातं महद् वर्षं प्रादुरासीद् विशाम्पते ॥ ७ ॥ राजन्! वीर पाण्डवोंके गन्धमादन पर्वतपर पदार्पण करते ही प्रचण्ड आँधीके साथ बड़े जोरकी वर्षा होने लगी ॥ ७ ॥
ततो रेणुः समुद्भूतः सपत्रबहुलो महान् । पृथिवीं चान्तरिक्षं च द्यां चैव सहसाऽऽवृणोत् ॥ ८ ॥ फिर धूल और पत्तोंसे भरा हुआ बड़ा भारी बवंडर (आँधी) उठा, जिसने पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा स्वर्गको भी सहसा आच्छादित कर दिया ॥ ८ ॥
न स्म प्रज्ञायते किंचिदावृते व्योम्नि रेणुना । न चापि शेकुस्तत् कर्तुमन्योन्यस्याभिभाषणम् ॥ ९ ॥ न चापश्यंस्ततोऽन्योन्यं तमसावृतचक्षुषः । आकृष्यमाणा वातेन साश्मचूर्णेन भारत ॥ १० ॥ धूलसे आकाशके ढक जानेसे कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था; इसलिये वे एक-दूसरेसे बातचीत भी नहीं कर पाते थे। अन्धकारने आँखोंपर पर्दा डाल दिया था; जिससे पाण्डवलोग एक-दूसरेके दर्शनसे भी वञ्चित हो गये थे। भारत! पत्थरोंका चूर्ण बिखेरती हुई वायु उन्हें कहीं-से-कहीं खींच लिये जाती थी ॥ ९-१० ॥
द्रुमाणां वातभग्नानां पततां भूतलेऽनिशम् । अन्येषां च महीजानां शब्दः समभवन्महान् ॥ ११ ॥ प्रचण्ड वायुके वेगसे टूटकर निरन्तर धरतीपर गिरनेवाले वृक्षों तथा अन्य झाड़ोंका भयंकर शब्द सुनायी पड़ता था ॥ ११ ॥
द्यौः स्वित् पतति किं भूमिर्दीर्यते पर्वतो नु किम् । इति ते मेनिरे सर्वे पवनेनापि मोहिताः ॥ १२ ॥ हवाके झोंकेसे मोहित होकर वे सब-के-सब मन-ही-मन सोचने लगे कि आकाश तो नहीं फट पड़ा है। पृथ्वी तो नहीं विदीर्ण हो रही है अथवा कोई पर्वत तो नहीं फटा जा रहा है ॥ १२ ॥
ते पथानन्तरान् वृक्षान् वल्मीकान् विषमाणि च । पाणिभिः परिमार्गन्तो भीता वायोर्निलिल्यिरे ॥ १३ ॥ तत्पश्चात् वे रास्तेके आस-पासके वृक्षों, मिट्टीके ढेरों और ऊँचे-नीचे स्थानोंको हाथोंसे टटोलते हुए हवासे डरकर यत्र-तत्र छिपने लगे ॥ १३ ॥
ततः कार्मुकमादाय भीमसेनो महाबलः । कृष्णामादाय संगम्य तस्थावाश्रित्य पादपम् ॥ १४ ॥ उस समय महाबली भीमसेन हाथमें धनुष लिये द्रौपदीको अपने साथ रखकर एक वृक्षके सहारे खड़े हो गये ॥ १४ ॥
धर्मराजश्च धौम्यश्च निलिल्येते महावने । अग्निहोत्राण्युपादाय सहदेवस्तु पर्वते ॥ १५ ॥ धर्मराज युधिष्ठिर और पुरोहित धौम्य अग्निहोत्रकी सामग्री लिये उस महान् वनमें कहीं जा छिपे। सहदेव पर्वतपर ही (कहीं सुरक्षित स्थानमें) छिप गये ॥ १५ ॥
नकुलो ब्राह्मणांश्चान्ये लोमशश्च महातपाः । वृक्षानासाद्य संत्रस्तास्तत्र तत्र निलिल्यिरे ॥ १६ ॥ नकुल, अन्यान्य ब्राह्मणलोग तथा महातपस्वी लोमशजी भी भयभीत होकर जहाँ-तहाँ वृक्षोंकी आड़ लेकर छिपे रहे ॥ १६ ॥
मन्दीभूते तु पवने तस्मिन् रजसि शाम्यति । महद्भिर्जलधारौघैर्वर्षमभ्याजगाम ह ॥ १७ ॥ भृशं चटचटाशब्दो वज्राणां क्षिप्यतामिव । ततस्ताश्चञ्चलाभासश्चेरुरभ्रेषु विद्युततः ॥ १८ ॥ थोड़ी देरमें जब वायुका वेग कुछ कम हुआ और धूल उड़नी बंद हो गयी, उस समय बड़ी भारी जलधारा बरसने लगी। तदनन्तर वज्रपातके समान मेघोंकी गड़गड़ाहट होने लगी और मेघमालाओंमें चारों ओर चंचल चमकवाली बिजलियाँ संचरण करने लगीं ॥ १७-१८ ॥
ततोऽश्मसहिता धाराः संवृण्वन्त्यः समन्ततः । प्रपेतुरनिशं तत्र शीघ्रवातसमीरिताः ॥ १९ ॥ तत्पश्चात् तीव्र वायुसे प्रेरित हो समस्त दिशाओंको आच्छादित करती हुई ओलोंसहित जलकी धाराएँ अविराम गतिसे गिरने लगीं ॥ १९ ॥
तत्र सागरगा ह्यापः कीर्यमाणाः समन्ततः । प्रादुरासन् सकलुषाः फेनवत्यो विशाम्पते ॥ २० ॥ महाराज! वहाँ चारों ओर बिखरी हुई जलराशि समुद्रगामिनी नदियोंके रूपमें प्रकट हो गयी जो मिट्टी मिल जानेसे मलिन दीख पड़ती थी। उसमें झाग उठ रहे थे ॥ २० ॥
वहन्त्यो वारि बहुलं फेनोडुपपरिप्लुतम् । परिसस्रुर्महाशब्दाः प्रकर्षन्त्यो महीरुहान् ॥ २१ ॥ फेनरूपी नौकासे व्याप्त अगाध जलसमूहको बहाती हुई सरिताएँ टूटकर गिरे हुए वृक्षोंको अपनी लहरोंसे समेटकर जोर-जोरसे 'हर-हर' ध्वनि करती हुई बह रही थीं ॥ २१ ॥
तस्मिन्नुपरते शब्दे वाते च समतां गते । गते ह्यम्भसि निम्नानि प्रादुर्भूते दिवाकरे ॥ २२ ॥ निर्जग्मुस्ते शनैः सर्वे समाजग्मुश्च भारत । प्रतस्थिरे पुनर्वीराः पर्वतं गन्धमादनम् ॥ २३ ॥
भारत! थोड़ी देर बाद जब तूफानका कोलाहल शान्त हुआ, वायुका वेग कम एवं सम हो गया, पर्वतका सारा जल बहकर नीचे चला गया और बादलोंका आवरण दूर हो जानेसे सूर्यदेव प्रकाशित हो उठे, उस समय वे समस्त वीर पाण्डव धीरे-धीरे अपने स्थानसे निकले और गन्धमादन पर्वतकी ओर प्रस्थित हो गये ॥ २२-२३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४३ ॥